निर्मला के मुंह से अपनी मदमस्त बर्बादी की मगर बेहद रंगीन कहानी सुनकर शीतल पूरी तरह से उत्तेजना से भर गई थी,,, जिस तरह से निर्मला ने खुद अपनी आपबीती अपने मुंह से सुनी थी उसे सुनकर शीतल को ऐसा लग रहा था कि जैसे वो कोई मूवी देख रही हो,,, और बार-बार उस मूवी में गरमा-गरम दृश्य आ रहे हो,,, शीतल इस कदर उत्तेजना से भर गई थी कि उसका बच्चन का तो इसी समय निर्मला की आंखों के सामने ही उसके बेटे से उसे अपना मोटा तगड़ा लंड उसकी बुर में डालने को बोलती और उससे चुदाई का भरपूर आनंद लूटती,,,
निर्मला अपनी आपबीती शीतल को सुनाकर नजरें झुकाए कुर्सी पर बैठी हुई थी ,,, शीतल उसके ठीक सामने कुर्सी पर बैठी हुई निर्मला के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी,,, शीतल बेहद उत्सुक कि अपने मन की बात निर्मला को बताने के लिए वह क्या चाहती है वह सब कुछ निर्मला से कह देना चाहती थी अब तो उसके पास मौका भी था लेकिन ना जाने क्यों उसके मन में झीझक हो रही थी कि वह कैसे उससे यह कह दे कि वह उसके बेटे के साथ में वही करना चाह रही है जैसा कि वह खुद अपने बेटे के साथ करती आ रही है,,,। अपने मन की बात शीतल से कहने के लिए वह उतावली थी,, उसका दिल जोरों से धड़क रहा था क्योंकि आज की घटना के बाद से उसे लगने लगा था कि उसकी मंशा बहुत ही जल्द पूरी होने वाली है,, ,,, पूरे कमरे में खामोशी छाई हुई थी दीवार में टंगी घड़ी में 7:00 बजने का अलार्म बजने लगा था,,,। शुभम के वापस आने का समय हो गया था वह नहीं चाहती थी कि शीतल की मौजूदगी में शुभम घर पर आएं इसलिए वह कुर्सी पर से ऊठते हुए बोली,,
शीतल शुभम के आने का समय हो गया है अब मुझे खाना बनाना होगा लेकिन मैं तुम से गुजारिश करती हूं एक बार फिर से हाथ जोड़कर कि आज की बात तुम कभी भी किसी को नहीं कहोगी,,,
तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो आज जो कुछ भी मै अपनी आंखों से देखी हूं वह मेरे सीने में एक राज की तरह दफन रहेगा,,( इतना कहते हुए वह भी कुर्सी से उठ खड़ी हुई शीतल की बात सुनकर निर्मला के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई,, उसे विश्वास हो गया कि शीतल यह बात किसी से नहीं कहेगी। वह किचन की तरफ जाने ही वाली थी कि उसे रोकते हुए शीतल बोली,,।)
रुको तो सही निर्मला मेरी पूरी बात तो सुनो,,,( शीतल की बात सुनते हीनिर्मला के पेड़ वही चमके और वह उसी जगह से घूम कर शीतल की तरफ देखते हुए बोली,,,,)
क्या हुआ,,,?
निर्मला मैं तुम्हारा इतना बड़ा राज जानती हूं जो कि अगर यह राज इस घर की चारदीवारी से बाहर निकल गया तो तुम अच्छी तरह से जानती हो कि क्या होगा,,,,, सब कुछ बर्बाद हो जाएगा लेकिन मैं ऐसा नहीं चाहती,,, (शीतल अपनी बड़ी बड़ी आंखों को गोल गोल नचाते हुए बोली,,,)
मुझे तुमसे यही उम्मीद थी शीतल,,,, एक पक्की सहेली होने के नाते मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि तुम मेरी बर्बादी कभी नहीं होने दोगी,,,(निर्मला मुस्कुराते हुए शीतल से बोली)
हां यह तो है निर्मला,,,(अपनी दोनों हथेलियों को आपस मेरा रगडते हुए शीतल आगे बढ़ने लगी और वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) मैं कभी नहीं चाहूंगी कि तुम बदनाम हो तुम्हारी बर्बादी हो या तुम्हारे संस्कारों पर तुम्हारी चरित्र पर किसी भी प्रकार की उंगली उठे जिससे तुम्हें तुम्हारे परिवार को पूरे समाज में बदनामी का दाग लेकर जीना पड़े,,, लेकिन निर्मला,,,(इतना कहते हुए शीतल अपनी दोनों हथेली को वापस में रखते हुए निर्मला के चक्कर काटने लगी उसे ऊपर से नीचे तक देखी जा रही थी और निर्मला समझ नहीं पा रही थी कि आखिरकार शीतल कहना क्या चाहती है उसका इरादा क्या है वह आश्चर्य में थी क्योंकि जिस तरह से वह चहलकदमी कर रही थी,, वह बड़ा ही अजीब था,,,, निर्मला को शीतल की मुस्कुराहट के पीछे कुछ गलत करने की आशंका नजर आ रही थी निर्मला का मन अंदर से कह रहा था कि शीतल जरूर कुछ गड़बड़ करेगी इसलिए वह फिर से अंदर ही अंदर घबराने लगी,,, और शीतल अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)
तुम्हारा इतना बड़ा राज मेरे सीने में दफन रहेगा लेकिन उसके बदले में तुम्हें कुछ कीमत चुकानी पड़ेगी,,,
( शीतल के मुंह से यह बात सुनकर निर्मला आश्चर्य से शीतल की तरफ देखने लगी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि शीतल क्या कह रही है,,,)
कीमत कैसी कीमत शीतल तुम्हारे मन में लालच आ गया है तुम राज को राज रखने के लिए मुझसे पैसे मांग रही हो,,,
नहीं नहीं निर्मला तुम बहुत भोली हो पैसा लेकर मैं क्या करूंगी मैं तो कुछ और ही चाह रही हूं,,,(इस बार शीतल अपनी मादकता भरा रूप दिखाते हुए अपनी जीभ को अपने लाल-लाल होठों पर फिराते हुए बोली,,)
पैसा नहीं चाहती हो तो क्या चाहती हो,,,,(निर्मला आश्चर्य से बोली)
देखो निर्मला एक औरत होने के नाते मैं तुमसे यह बात कह रही हूं,,,जिस तरह से तुम अपने पति से संतुष्ट नहीं हो उसी तरह से मैं भी अपने पति से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हूं या यूं कह लो कि तुम्हारे ही शब्दों में मेरा पति मुझे शारीरिक सुख नहीं दे पाता,,, (शीतल की यह बात सुनते ही निर्मला को उसकी बात सुनकर झटका तो लगा लेकिन वह मन में सोचने लगी कि उसकी भी हालत ठीक उसी की तरह ही है,,, वह भी ऊसी कश्ती मैं सहार थी जिसमें वह पहले से ही मुसाफिर बन कर बैठी हुई थी,,,)
तुम्हारी हालत भी बिल्कुल मेरी तरह ही है तुम्हें भी हंसता खिलखिलाता ,,,,मजाक करता हुआ देखकर कोई यह नहीं कह पाएगा कि तुम अपने पति से संतुष्ट नहीं हो या शारीरिक सुख से अभी तक वंचित हो,,,, मुझे तुम्हारी यह बात सुनकर बहुत दुख हो रहा है शीतल,,
लेकिन तुम मेरे दुख को दुर भी कर सकती हो निर्मला,,,,
मैं कुछ समझी नहीं तुम क्या कहना चाह रही हो।
बहुत ही आसान है निर्मला जिस तरह से तुमने अपना दुख दूर की हो उसी तरह से तुम चाहो तो मेरा भी दुख दूर कर सकती हो,,,,
( शीतल की बात सुनते ही निर्मला को इस बात का एहसास होने लगा कि वह क्या कहना चाह रही है पल भर में उसके चेहरे पर गुस्से के भाव पैदा होने लगे लेकिन शीतल बिल्कुल शांत थी वह मुस्कुराते हुए निर्मला को देखे जा रही थी,,।)
मैं,,,,, मैं तुम्हारा दुख कैसे दूर कर सकती हूं,,?
तुम दूर कर सकती हो निर्मला,,, क्योंकि तुम्हारे पास शुभम है और मैं यही चाहती हूं कि जिस तरह से तुम अपने बेटे का उपयोग करके अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरी करती आ रही हो ठीक उसी तरह से तुम्हें राज को राज रखने के एवज में अपने बेटे को मेरे पास भेजना होगा,,,
(शीतल की यह बात सुनते ही निर्मला गुस्से से तिलमिला उठी और जोर से चिल्लाते हुए बोली,,)
शीतल,,, तुम्हें यह कहते हुए शर्म भी नहीं आ रही है,,, तुम सोच भी कैसे सकती हो कि जो तुम कह रही हो मैं वह करूंगी,,,,
तुम वही करोगी जो मैं कहूंगी यह मुझे पूरा विश्वास है,,,
तुम भूल कर रही हो शीतल ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी क्योंकि तुम्हारी नियत गंदी है तुम्हारे मन में लालच आ गया है और लालच भी ऐसा जो कि एक औरत को शर्म आनी चाहिए,,,,
(निर्मला की यह बात सुनते ही सीतल जोर-जोर से हंसने लगी ठहाके लगा लगा कर हंसने लगी,,, और हंसते हुए बोली।)
अरे वाह सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली यह कहावत तुमने सच कर दी हो निर्मला,,,,, मुझसे शर्म और लिहाज की बात कर रही हो और तुम क्या की हो बहुत जल्दी भूल गई,, अपने ही बेटे से चुदवाती आ रही हो,, तुम करो तो मान मर्यादा वाली बात और हम करें तो बेशर्मी,,,
(शीतल की यह बात सुनकर निर्मला एकदम खामोश हो गई ऐसा लग रहा था कि जैसे उसने उसे आईना दिखा दिया हो,,)
लेकिन शीतल जो कुछ भी तुम कह रही हो मैं कभी होने नहीं दुंगी,,,
तो मैं यह राज इस चारदीवारी के बाहर तक ले जाऊंगी,,,
नहीं नहीं तुम ऐसा नहीं कर सकती शीतल,,,
मैं कर सकती हूं,,, और शुभम के साथ वह सब करूंगी जो तुम उसके साथ करती आ रही हो,,,
लेकिन तुम जो कह रही हो क्या दुनिया वाले तुम्हारी बात पर विश्वास कर पाएंगे,,,,नहीं करेंगे वह तुम्हें ही झूठा साबित कर देंगे तुम बदनाम हो जाओगी,,
उसकी चिंता तुम बिल्कुल मत करो निर्मल मेरे पास तुम मां बेटे दोनों की संभोग लीला की पूरी वीडियो है और वीडियो पर तो सब लोग विश्वास करेंगे ही,,,
(शीतल की यह बात सुनकर निर्मला को ऐसा लगने लगा कि जैसे उसके सर पर पूरा आसमान गिर गया हो और पूरी तरह से सदमे में आ गई उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहें फिर भी अपना बचाव करते हुए वह बोली।)
नहीं शीतल तुम ऐसा बिल्कुल भी नहीं करोगी तुम्हें याद है मैं क्लास में तुम्हें अपने बेटे के साथ गंदी अवस्था में पकड़ ली थी फिर भी मैं यह बात किसी को नहीं बताई,,,
तुम बता सकती थी तुम्हारे पास मौका था ,,,
नहीं मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी क्योंकि मुझे भी तुम्हारी इज्जत प्यारी थी मैं नहीं चाहती थी कि तुम बदनाम हो जाओ,,,
मैं भी तो यही चाहती हूं निर्मला कि तुम बदनाम ना हो इसलिए जो कहते हु वही करो,,,
(शीतल की बात सुनकर निर्मला का दिमाग काम नहीं कर रहा था उसकी इज्जत शीतल के हाथों में थी,,, अगर उसके पास वीडियो ना होता तो निर्मला इस मुसीबत से निकल सकती थी क्योंकि वह जानती थी कि उसका इज्जत और रुतबा समाज में बहुत था वह किसी भी तरह से शीतल की बात को झुठला सकती थी,,, वह उसी तरह से खड़ी रही,,,
अब उसके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था वह उसी तरह से खामोश खड़ी थी शीतल को अब एहसास होने लगा कि उसका काम बन गया है अब समय भी हो रहा था उसका बेटा शुभम किसी भी वक्त घर पर आ सकता था इसलिए वह निर्मला से जाते-जाते बोली।
देखो निर्मला मैं तो बिल्कुल भी नहीं चाहती कि तुम्हारी किसी भी प्रकार से बदनामी हो अगर तुम चाहती हो कि तुम्हारी बदनामी हो तो जैसा मैं कह रही हूं वैसा मत करो लेकिन अगर अपनी इज्जत बचाना चाहती हो तो जैसा मैं कह रही हूं ठीक वैसा ही करो,, कल रात 9:00 बजे तुम अपने बेटे को मेरे घर भेज देना कोई भी बहाना करके कैसे भेजना है यह तुम अच्छी तरह से जानती हो मैं इंतजार करूंगी और अगर कल 9:00 बजे तुम अपने बेटे को मेरे घर नहीं भेजी तो इसकी जिम्मेदार तुम खुद होगी,,,
(इतना कहकर शीतल निर्मला के घर से बाहर चली गई और निर्मला उसे घर से बाहर जाते हुए देखती रही.)
.............................
शीतल निर्मला के घर से जा चुकी थी लेकिन जाते-जाते अपने पीछे तूफान छोड़ गई थी,,, और उस तूफान से कैसे निकलना है इस बारे में खुद निर्मला को फैसला लेना था,,, शीतल की बात माल लेने में ही निर्मला के लिए भलाई थी,,, यह बात निर्मला भी अच्छी तरह से जानती थी। निर्मला को एक बार फिर से अपनी गलती पर गुस्सा आने लगा और शीतल पर भी जिसकी नजर पहले से ही उसके लड़के पर बिगड़ी हुई थी भले ही वह सब कुछ निर्मला से मजाक में कह जाती थी लेकिन उसके मजाक के पीछे का जो राज था वह खुलकर आज उसके सामने आ गया था,,, वह कुर्सी पर धम्म से बैठ गई,, और अपनी गलती का क्या क्या परिणाम हो सकता है उस बारे में सोचने लगी,,, हजार बार सोचने के बाद उसे अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि शीतल की बात ना मानने की वजह से उसकी जिंदगी में भूचाल आ जाएगा जिसका परिणाम बेहद डरावना और भयानक होगा,, वह शुभम को किसी और औरत से बांटना भी नहीं चाहती थी,,, लेकिन अब वह पूरी तरह से मजबूर हो चुकी थी,,,अगर वह शीतल के कहे अनुसार कल रात 9:00 बजे उसके घर नहीं भेजेगी तो वह कुछ भी कर सकती है क्योंकि यह बात निर्मला अच्छी तरह से जानती थी कि एक कामांध नारी पुरुष संसर्ग के लिए किसी भी हद तक जा सकती है,,,,, और शीतल की बातों से यही लग रहा था कि अगर वह शुभम को उसके घर नहीं भेजेगी तो वह उसे पूरे समाज में बदनाम कर देगी,,, निर्मला उसकी बातों को झुठला भी सकती थी लेकिन निर्मला की काम लेना की वीडियो जो उसके पास थी जिसे वह झुठला नहीं सकती थी सारा समाज झुठला नहीं सकता था,,, लाख सोचने विचारने के बाद ही निर्मला ईसी निष्कर्ष पर आई कि अगर पूरे परिवार की उसकी खुद की इज्जत को बचाना है तो शुभम को ना चाहते हुए भी शीतल के पास भेजना ही होगा,,,
यह बात सोच कर ही निर्मला के माथे पर पसीना आ गया क्योंकि अच्छी तरह से जानती थी कि शुभम को शीतल के पास भेजने का मतलब है कि शीतल उससे चुदवाएगी,, और एक खूबसूरत नारी के संसर्ग में आकर दुनिया का कोई भी मर्द उस नारी को भोगने की इच्छा को मार नहीं सकता भले ही उस पर कितनी भी जिम्मेदारी और भरोसे का दबाव हो,,
और शीतल तो इस काम में पूरी तरह से माहिर थी अपनी खूबसूरत बदन अपने अंगों का जलवा दिखा कर वो किसी भी मर्द को आकर्षित करने में सक्षम थी और शुभम तो अभी नादान था,,, वह अब तक अपनी मां के ही खूबसूरत अंगो और बदन को देखता आया है और उसे ही भोगता आया है,,, अगर वह किसी दूसरी औरत का खूबसूरत नंगा बदन देखेगा तो अपने आप को रोक नहीं पाएगा और वह उसके साथ भी वही करेगा जो अपनी मां के साथ करता आया है,,,, यह सब ख्याल निर्मला के मन में आ रहा था और वह परेशान हो जा रही थी क्योंकि मैं कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि वह सुभम को किसी और औरत से बांटेगी,,, वह सुभम पर अपना ही हक समझती थी,,, लेकिन अब पल भर में ही हालात बदल चुके थे,,, शीतल की बात मानने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था,,,,। निर्मला का मनभारी होता जा रहा था क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि अब क्या होने वाला है ना चाहते हुए भी वह शुभम को उसके पास भेजेगी और शीतल उसके साथ मनमानी करेंगी,,, सुभम तो एक और खूबसूरत ओरत को देखकर पागल हो जाएगा और वह वहीं करेगा जो वह कहेगी,, मतलब साफ था जिस तरह से शुभम उसकी बुर में लंड डालता था उसी तरह से वह अब शीतल की बुर में लंड डालेगा,,, उसके लाल-लाल होठों को अपने मुंह में भर कर चुसेगा,,, उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को जोर-जोर से दबाएगा उसके निप्पल को मुंह में लेकर वैसे ही पिएगा जैसे कि वह उसकी चूची को पीता आ रहा था,,,, उसकी बुर को अपनी जीभ से चाट कर उसे भी मस्ती के सागर में हिलोरे मारने के लिए ले जाएगा,,, उसकी गांड के भूरे रंग के छेद को चाटेगा जिस पर पहली बार वह अपनी जीभ का स्पर्श कराके उसे उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंचा दिया था,,, अब वह शीतल को भी इसी प्रकार का सुख देगा जिसे पाकर शीतल पूरी तरह से उसकी दीवानी हो जाएगी जैसा कि वह खुद अपने बेटे की दीवानी हो गई है।
शीतल यही सब सोच सोच कर पागल हुए जा रही थी कि उसका बेटा शीतल के साथ वह सब कुछ करेगा जो कि अब तक वह उसके साथ करता आया है।,,, अपने मोटे तगड़े मर्दाना ताकत से भरे हुए लंड से ऊसकी चुदाई करके उसे पूरी तरह से अपनी गुलाम बना देगा,,, वो पागल हो जाएगी और बार-बार सुभम से चुदवाने के लिए अातुर रहेगी,,,, निर्मला को सब कुछ अपने हाथ से फिसलता हुआ महसूस हो रहा था उसकी आंखों में आंसू आ गए थे क्योंकि वो सपने में भी कभी नहीं सोची थी कि शुभम किसी गैर औरत के साथ जिस्मानी ताल्लुकात रखेगा लेकिन वक्त ऐसा बदला था कि उसे खुद अपने बेटे को उस औरत के पास भेजना था और वह भी शारीरिक संपर्क बनाने के लिए। उसे सोच कर ही घृणा और खुद पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि जिस औरत के साथ उसे गंदी अवस्था में पकड़ कर उस औरत को इतना बड़ा बुरा कही थी और उसे कभी भी अपने बेटे के आसपास ना आने की हिदायत भी दी थी लेकिन वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि सब कुछ बदल गया जिस औरत से अपनी बेटे को दूर रहने के लिए बोली थी अब उसी औरत के पास उसे खुद अपने बेटे को भेजना था,,,
थक हार का निर्मला यह मान चुकी थी कि शीतल के पास उसे अपने बेटे को भेजना ही है लेकिन अब सवाल यह था कि ,,,, वह अपने बेटे को क्या कहकर शीतल के पास भेजेगी जिससे दूर रहने की खुद ही वह उसे हिदायत दे रखी थी और वह भी रात के समय,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कह कर शुभम को शीतल के पास भेजें बाकी वहां पर पहुंचने के बाद शीतल को क्या करना है यह शीतल अच्छी तरह से जानती थी आगे के प्रकरण को वह खुद संभाल लेगी क्योंकि मर्दों को कैसे रिझाना है शीतल अच्छी तरह से जानती थी,,, शीतल के एक इशारे पर उसका बेटा उसकी टांगों के बीच में होगा यह बात भी निर्मला अच्छी तरह से जानती थी,,, वह अपने बेटे की सबसे बड़ी कमजोरी को अच्छी तरह से समझती थी,,, शीतल की बड़ी-बड़ी मटकती हुई गांड खुद ही शीतल के अंतर्मन को बयां कर देगी शीतल को अपने होठों को खोलने की जरूरत भी नहीं होगी कि वह क्या चाहती है,,, शुभम शीतल के खूबसूरत अंगों की मादकता भरी हरकतों से ही समझ जाएगा कि शीतल क्या चाहती है और उसे क्या करना है,,,
निर्मला कुर्सी पर बैठे-बैठे यही सोच रही थी कि तभी दीवार पर कहीं घड़ी में 8:00 बजे का अलार्म बजने लगा और अलार्म बजने की आवाज के साथ ही निर्मला की तंद्रा भंग हुई तो उसे इस बात का अहसास हुआ कि उसे काफी देर हो चुकी है वह जल्दी से कुर्सी पर से उठे और रसोई घर में चली गई अब तक सुबह घर पर वापस नहीं आया था वह जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी और इसी उधेड़बुन में थी कि वह सुभम से क्या कहें और कैसे कहे,,,,
गैस के दोनों चुल्हो पर दाल और चावल रखकर रोटी बनाने की तैयारी कर ही रही थी कि एक बार फिर से डोरबेल बज गई,,, वह समझ गई कि शुभम आ गया है,,, वह अपनी साड़ी से हाथ को साफ करते हुए दरवाजा खोल दी और दरवाजे पर शुभम ही खड़ा था जो कि काफी खुश नजर आ रहा था उसे खुश होता हुआ देखकर निर्मला के चेहरे पर भी मुस्कुराहट तैरने लगी और वह मुस्कुराते हुए सुभम से बोली,,,
क्या बात है आज बहुत खुश नजर आ रहा है ,,,,
हां मम्मी आज मैं बहुत खुश हूं क्योंकि आज बात ही कुछ ऐसी है ,,,,
क्या बात है मुझे भी तो बता,,,
अरे पहले मुझे अंदर तो आने के लिए सब दरवाजे पर खड़े खड़े बात करनी है,,,
बोल तो ऐसे रहा है जैसे मेहमान बनकर इस घर में आया है,,,
मेहमान तो नहीं मम्मी लेकिन तुम्हारा लवर बनके घर में आया हुं,,,,,(ऐसा कहते हुए शुभम घर में प्रवेश किया और निर्मला दरवाजा बंद करके लॉक कर दी...)
लवर प्रेमी आशिक सब कुछ तो है तू मेरा,,,,(इतना कहकर निर्मला दरवाजा लॉक करके जैसे ही पलटी तो उसकी नजर शुभम पर पड़ी छोटी अपने दोनों हाथ के पीछे की तरफ ले जाकर कुछ छुपा रहा था उसे इस तरह से हरकत करता हुआ देखकर निर्मला बोली,,,)
तु मुझसे क्या छुपा रहा है दिखा तो,,,,
मैं तुमसे भला क्या छुपाऊंगा तुम्हारे लिए ही तो लाया हूं,,,
क्या लाया है मुझे भी तो दिखा ,,,,(निर्मला उत्सुकता के साथ बोली,,)
यह लो मम्मी,,,,,( इतना कहकर शुभम अपना दोनों हाथ आगे की तरफ ले आकर अपनी मां को गुलाबों से भरा हुआ गुलदस्ता देते हुए बोला,,,गुलाबों का गुलदस्ता देखकर बेहद खुशी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई वह हंसते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाई और गुलाब के गुलदस्ते को थाम ते हुए बोली,,,)
सच में तु मेरा लवर बन कर आया है,,, लेकिन यह फूलों का गुलदस्ता क्यों,,,?
तुम भूल गई हो मम्मी लेकिन मुझे पूरा याद है आज ही के दिन हम दोनों के नए रिश्ते की शुरुआत हुई थी,,,
नए रिश्ते कि मैं कुछ समझी नहीं,,,!
याद है मम्मी आज के दिन शीतल मैडम की सालगिरह थी,, और तुम अच्छी तरह से जानती हो कि आज की रात को क्या हुआ था,,,,
( इतना सुनते ही निर्मला हंसने लगी,,, उसे खुशी इस बात की थी कि उसका बेटा उसके लिए गुलाब लाया था और वह भी आज ही के दिन शुरू हुए नए रिश्ते के लिए जो कि मां बेटे के बीच का रिश्ता खत्म होकर एक औरत और मर्द के बीच का रिश्ता रह गया था,,, लेकिन फिर भी वह अपने बेटे को याद दिलाते हुए बोली,,,)
मेरा राजा बेटा आज के दिन नहीं बल्कि वह कल के दिन से हम दोनों के बीच का नया रिश्ता शुरू हुआ था तुम थोड़ा सा धोखा खा गए,,,,
( अपनी गलती का एहसास होते ही शुभम बुरा सा मुंह बना लिया लेकिन फिर भी वह अपनी मां की तरफ आगे बढ़ता हुआ बोला,,)
कोई बात नहीं मेरे रानी मुड़ तो मेरा बन चुका है,,, इसलिए हम दोनों के बीच के रिश्ते की शुरुआत आज हुई थी या कल इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन इस बात को याद करके मैं इस पल को और भी बेहतरीन और रंगीन बनाना चाहता हूं,,,( शुभम ऐसा कहता हुआ निर्मला की तरफ आगे बढ़ रहा था और निर्मला इस तरह से अपने बेटे को अपनी तरफ आगे बढ़ता हुआ देखकर सब कुछ समझ गई कि सुभम क्या चाहता है,,, इसलिए वह उसे दर्शाते हुए पीछे की तरफ अपने कदम लेने लगी वह जितना पीछे जा रही थी शुभम इतना उत्सुकता और आतुरता के साथ आगे बढ़ रहा था,,,)
आज तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा मम्मी,,, मेरी हालत खराब नहीं है तुम्हारी मदमस्त जवानी देखकर मेरा लंड खड़ा हो रहा है,,,
लेकिन मेरा अभी बिल्कुल भी मूड नहीं है मैं खाना बना रही हूं,,, (ऐसा कहते हुए निर्मला पीछे जा रही थी और शुभम आगे आ रहा था)
लेकिन मुझे अभी भूख लगी है,,,
तू खाना बन जान दे फिर खा लेना,,,
मुझे वह खाना नहीं खाना जो तुम किचन में बना रही हो मुझे वह खाना है जिसका मैं जन्मों से भूखा हूं,,,
तो क्या खाना है तुझे,,,,? (निर्मला अपनी बेटे को तरसाते हुए पीछे की तरफ कदम लेते हुए मादक स्वर में बोली,,,)
मुझे वह खाना है जो तुम अपनी टांगों के बीच में छुपा कर रखी हो जोकि थाली में नहीं चड्डी में सजा कर रखी हो,,,, मैं तुम्हारी टांगों के बीच की उस रसमलाई का स्वाद लेना चाहता हूं और वह भी अपने मुंह से नहीं बल्कि अपने लंड से ,,,,(पजामे के ऊपर से अपने खड़े लंड को पकड़ता हुआ बोला,,,)
देख अभी नहीं सुभम,,,,
नहीं मेरी जान में इसीलिए तो तुम्हारे लिए गुलाब का गुलदस्ता लाया था कि इसे पाकर खुशी खुशी अपनी टांगें फैला दोगी लेकिन तुम तो नखरा कर रही हो,,,
तेरे लिए मैं अपनी टांगे फैला देती लेकिन क्या करूं अभी व्यस्त हूं काम में,,,
तो कब तुम काम में व्यस्त नहीं रहती हो,,, (ऐसा कहते हुए शुभम आगे बढ़ रहा था और निर्मला पीछे,,, तभी निर्मला सोफे से टकराकर खुद ही सोफे पर गिर कर बैठ गई,,,अपनी मां की हालत को देखकर शुभम हंसने लगा और बोला अब कहां जाओगे मेरी रानी,,,,)
देख शुभम मुझे परेशान मत कर रात में आना मेरे कमरे में तुझे खुश कर दूंगी,,,
लेकिन मुझे अभी खुश होना है,,, रात की बात रात को देखेंगे,,,,(इतना कहते हुए शुभम पूरी तरह से अपनी मां के ऊपर छा गया और उसकी लाल लाल होठों को जबरदस्ती अपने मुंह में भर कर चूसना शुरू कर दिया वह जानता था कि उसकी मां कब कैसे और किस तरह से चुदवाने के लिए तैयार हो जाएगी,,,और वह तुरंत ब्लाउज के ऊपर से अपनी मां की बड़ी चूची को जोर जोर से दबाना शुरू कर दिया,,,शुभम इतनी जोर से अपनी मां की चूची को दबा रहा था कि मानो वह किसी गैर औरत के साथ यह सब कर रहा है,,, निर्मला को दर्द हो रहा था लेकिन सुभम की हरकत की वजह से उसे मजा भी आने लगा था,,, शुभम काफी उतावला हो चुका था इसलिए देखते ही देखते अपनी मां के ब्लाउज के बटन खोल कर उसकी नंगी चूचियों को बाहर निकाल कर उसे जोर जोर से दबाते हुए अपनी मां के लाल लाल होठों को चूसने का आनंद ले रहा था । थोड़ी ही देर में निर्मला के मुंह से गर्म सिसकारीयो की आवाज आने लगी,,, अपनी मां की मादकता भरी गरम सिसकारी की आवाज सुनकर शुभम का जोश बढ़ने लगा ,,,वह पागल हुए जा रहा था देखते ही देखते अपने दोनों हाथों से अपनी मां की साड़ी को उठाकर कमर तक कर दिया,, उसकी आंखों के सामने उसकी मां सोफे पर लाल पेंटिं मैं बैठी हुई थी,,, और उसके चेहरे पर उत्तेजना का असर साफ नजर आने लगा था। गहरी गहरी सांसें लेते हुए अपने बेटे की हर हरकत को देख रही थी ,,,
लाल पेंटिं में तो कयामत लगती हो मेरी जान,,, अब इसे उतार दो तो आगे का कार्यक्रम शुरू हो,,,
इतना कुछ कर लिया है तो पेंटी भी अपने हाथ से उतार ले,,,
जो आज्ञा महारानी,,,,सच कहूं तो मम्मी तुम्हारी पेंटी को अपने हाथ से उतारने का मजा ही कुछ और है इतना कहने के साथ ही सुभम अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाया और अपनी मम्मी की लाल रंग की पैंटी को दोनों हाथों से पकड़कर खींचने लगा ,,