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Adultery एक रात ऐसी भी

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एक रात ऐसी भी

राज कचहरी की इमारत से बाहर निकला । बाहर अन्धेरा छा चुका था और ठन्डी बर्फीली हवा चल रही थी ।

अखबार में मौसम का जो पूर्वाभास छपा था, उसके अनुसार उर रात कश्मीर में बर्फ का भीषण तूफान आने वाला था लेकिन अभी तक उस तूफान के कोई लक्षण वातावरण में प्रकट नहीं हुए थे ।

कोर्ट में से मजिस्ट्रेट साधारणतया पांच बजे उठ जाता था लेकिन उस रोज ऐसा नहीं हुआ था । उस रोज गवाही के लिए उसकी बारी आने तक ही साढे छः बज चुके थे ।

उसने अपने कोट का कालर ऊंचा कर लिया और कम्पाउन्ड में उस ओर बढा जिधर खड़ी कई कारों में उसकी फियेट भी खड़ी थी ।

उसे अपनी खूबसूरत बीवी कामिनी का ख्याल आया ।

कामिनी से उसकी शादी हुए तीन महीने हुए थे और उन तीन महीनों में वह पहला मौका था जब राज वक्त पर घर नहीं पहुंचा था । उसके फ्लैट पर फोन था लेकिन इत्तफाक से वह फोन पर भी कामिनी को खबर नहीं कर सका था कि उस रोज लौटने में उसे देर हो सकती थी ।

बेचारी चिंता न कर रही हो मेरी - उसने सोचा ।

चिंता तो वह जरूर कर रही होगी । ऐसा पहले कभी हुआ जो नहीं था ।

तभी एक कार की ओट में से एक साया प्रकट हुआ और उसके सामने आ खड़ा हुआ ।

राज ठिठका ।

वह केवल इतना ही देख पाया कि वह एक लम्बा-चौड़ा आदमी था । कम्पाउन्ड के नीम अन्धेरे में उसे उसकी सूरत दिखाई न दी ।

“क्या है ?” - राज तनिक कठोर स्वर में बोला ।

“तुम्हारा नाम राज है ?” - उस आदमी ने पूछा ।

“हां ।” - वह बोला । ठन्ड इतनी थी कि उस एक शब्द के साथ भी उसके मुंह से ढेर सारी भाप निकली और उसके चश्मे के शीशे धुंधला गए ।

“तुम प्रोफेसर हो ?”

“हां, हां !”

“तुम गवर्नमेन्ट कालेज में इतिहास पढाते हो ?”

“हां भई । लेकिन क्या बात है ?”

लम्बे-चौड़े आदमी ने उसके सवाल की ओर ध्यान नहीं दिया, उसने एक ओर मुंह फेरा और उच्च स्वर में बोला - “वीरू ! यही है वो आदमी ।”

कार के पीछे से एक आदमी और प्रकट हुआ ।‘’

“क्या बात है ?” - राज ने फिर पूछा ।

“अभी मालूम हुआ जाता है ।” - दूसरा आदमी बोला ।

उसी क्षण कचहरी की इमारत के खुले दरवाजे में से एक हवलदार ने बाहर कदम रखा । उसके एक कदम पीछे हथकड़ियों से बंधा कुणाल चल रहा था । वे दोनों समीप आए तो कुणाल ने राज को पहचान लिया ।

“प्रोफेसर साहब” - कुणाल नफरत भरे स्वर में बोला - “लानत है आप पर । मेरी खातिर जरा-सा झूठ बोल देते तो क्या बिगड़ जाता आपका ?”

“मेरा तो कुछ न बिगड़ता ।” - राज बोला - “लेकिन मेरे झूठ बोल देने से तुम्हारा बहुत-कुछ बिगड़ जाता ।”

“मेरा क्या बिगड़ जाता ?”

“यह तुम्हें इस वक्त समझ नहीं आएगा लेकिन आने वाला वक्त बताएगा कि मैंने झूठ न बोलकर तुम्हारा भला ही किया है ।”

“लानत है तुम्हारे ऐसे भले पर जिसकी वजह से मुझे जेल की हवा खानी पड़ने वाली है ।”

“इसी में तुम्हारी भलाई है ।”

“आए बड़े मेरी भलाई परखने वाले । प्रोफेसर ! तुम्हारी वजह से मुझे जेल जाना पड़ रहा है । देख लेना तुम्हें पछताना पड़ेगा । शिमले में मेरे बड़े हिमायती हैं ।”

हवलदार ने कुणाल के हाथों में लगी हथकड़ी को एक झटका दिया और कठोर स्वर में बोला - “छोकरे ! क्या प्रोफेसर साहब को धमकी दे रहा है ?”

“ये इसे जो चाहे समझ सकते हैं ।” - कुणाल लापरवाही से बोला ।

“चलो हिलो यहां से ।”

कुणाल और हवलदार परे खड़ी पुलिस की जीप की ओर बढ गए ।

राज ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई । कुणाल अभी उन्नीस साल का था और सेकेन्ड ईयर का विद्यार्थी था । गलत सोहबत की वजह से ही वह अपने आज के अंजाम तक पहुंचा था । उसे मालूम हुआ था कि जो कुछ उसने किया था, उसी कालेज की एक लड़की की वजह से किया था ।

लम्बे-चौड़े आदमी ने उत्सुक भाव से राज से पूछा - “क्या किया है इस छोकरे ने ?”

“दिन-दहाड़े एक दुकानदार का गल्ला लूटने की कोशिश की थी इसने ।” - राज ने बताया - “किसी छोकरी के साथ ऐश करने के लिए । लेकिन बाद में पकड़ा गया था ।”

“तुमसे क्यों खफा है वो ?”

“पकड़े जाने के बाद यह इस बात से साफ मुकर गया था कि इसने दोपहर के समय किसी दुकानदार को चाकू दिखाकर उसका गल्ला लूटा था । इसने कहा था कि उस घटना के समय यह कालेज में था और मेरी क्लास में बैठा इतिहास पढ रहा था । यह मुझसे अपनी खातिर झूठ बुलवाना चाहता था ।”

“अगर तुम कह देते कि उस वक्त यह तुम्हारी क्लास में मौजूद था तो पुलिस उसे छोड़ देती ?”

“हां ।”

“तुमने ऐसा क्यों नहीं कहा ?”

“मैं क्यों कहता ऐसा ?”

“क्योंकि तुम्हारे ऐसा कह देने से बेचारा जेल जाने से बच सकता है । अभी बच्चा ही तो है वो ।”

“मेरे झूठ बोल देने से नरेश इस बार तो बच जाता लेकिन इस बात से क्या यह कोई सबक लेता ? क्या यह सुधरने की कोशिश करता ? हरगिज नहीं । सजा पाये बिना छूट जाने को यह अपनी कामयाबी मानता । इसके हौसले बुलन्द हो जाते और यह पहले से बड़ा अपराध करने की कोशिश करता । आज इसके हाथ में चाकू लग गया था । कल यह पिस्तौल मुहैया करने की कोशिश करता । आज यह मामूली सजा पाकर छूट जाएगा । कल तक इसने अपने लिए फांसी की सजा का सामान कर लेना था । आग को भड़कने से पहले दबा देना ही समझदारी होती है । बुराई को शुरू में रोकना जरूरी होता है । यह इस बात को आज नहीं समझ सकता लेकिन आगे चलकर समझ जाएगा कि इसके हक में झूठी गवाही न देकर मैंने इसका भला किया है ।”

“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”

“लेकिन तुम लोग कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो ?”

तभी वहां से रवाना होने को तत्पर पुलिस की जीप की हैडलाइट की रोशनी उन दोनों आदमियों पर पड़ी । राज ने देखा वे दोनों बड़े सलीके के कपड़े पहने हुए थे और बड़े रोबदार लग रहे थे । राज सोचने लगा क्य वे सी आई डी के आदमी थे ।

“हम लोग ।” - लम्बा-चौड़ा आदमी बोला - “यह समझ लो कि कामिनी के दोस्त हैं ।”

“तुम लोग मेरी बीवी को जानते हो ?”

“बहुत अच्छी तरह से ।” - दूसरा आदमी बोला - “क्या कामिनी ने तुम्हें हमारे बारे में कभी नहीं बताया ?”

“नहीं ।”

“कभी हमारा जिक्र तक नहीं किया ?”

“नहीं ।”

“यह कैसे हो सकता है ?”

“मैं सच कह रहा हूं । आप लोग बराय मेहरबानी मुझे इजाजत दीजिए । मुझे घर पहुंचना है ।”

और राज ने अपनी कार की दिशा में कदम बढाया ।
 
तभी लम्बे-चौड़े आदमी ने बिना किसी चेतावनी के एकाएक उस पर प्रहार कर दिया । ठंड से बचने के लिए राज ने अपने हाथ ओवरकोट की जेब में डाले हुए थे । इसलिए उस प्रहार से उसका सन्तुलन बिगड़ गया और वह कम्पाउन्ड की पथरीली जमीन पर धराशायी हो गया । उसका सिर उस कार के एक दरवाजे से टकराया जिसके समीप वे उस वक्त खड़े थे । उसने जल्दी से अपने हाथ अपनी जेबों से बाहर निकाले और उठकर खड़ा हो गया ।

“यह क्या बदतमीजी है ?” - वह क्रोधित स्वर में बोला ।

“यह बदतमीजी नहीं ।” - लम्बा-चौड़ा आदमी बोला - “हमारे खतरनाक इरादों का एक नमूना है । तुम्हारी बीवी समझती है कि वह हमें घिस्सा दे सकती है, लेकिन हम इतनी आसानी से बेवकूफ बनने वाले नहीं हैं । यह बात तुम अपनी बीवी को अच्छी तरह समझा देना - और अब मेरी बात गौर से सुनो - क्योंकि यह बात तुमने कामिनी तक पहुंचानी है । वीरू ! लिफाफा निकालना ।”

उसके साथी ने अपनी जेब से एक मोटा-सा लिफाफा निकालकर उसके हाथ में सौंप दिया ।

“यह लिफाफा” - लम्बा-चौड़ा आदमी बोला - “तुम अपनी बीवी को सौंप देना । इससे कामिनी यह समझ जाएगी कि हमारे मन में उसके लिए कोई बैर-भाव नहीं है । उसे कहना कि यादव वाले काम में यह उसका हिस्सा है ।” - उसने लिफाफा जबरन राज के ओवरकोट की ऊपर वाली जेब में डाल दिया - “साथ ही उसे यह भी बता देना कि अब हमारे सब्र का प्याला छलकने लगा है । मोटा माल अपने काबू में करने के लिए इस बार हम कुछ भी करने से हिचकने वाले नहीं हैं । इस बार हमने किसी भी तरह से कामयाब होने की ठानी हुई है । कामिनी को कह देना कि वह कल दोपहर एक और दो बजे के बीच में हमें टिपटॉप मिले । याद रहेगा सब-कुछ तुम्हें ?”

“यह क्या बकवास है ? तुम लोग...”

“यानी कि तुम्हारी याददाश्त का भी इन्तजाम करना पड़ेगा । अच्छी बात है, वह भी करते हैं । इससे कामिनी की भी समझ में आ जाएगा कि अगर वह अपना लालच नहीं छोड़ेगी तो तुम्हारी क्या मत बनेगी ।”

फिर उसके बाएं हाथ का एक ऐसा प्रचण्ड घूंसा राज की कनपटी से टकराया कि उसकी आंखों के सामने अन्धेरा छा गया । बड़ी मुश्किल से वह स्वयं को धराशायी होने से बचा पाया ।

“और मारो साले को ।” - वीरू के नाम से पुकारा जाने वाला आदमी क्रूर स्वर में बोला - “एक-दो दांत निकाल दो हरामजादे के । तभी कामिनी को भी मालूम होगा कि हम क्या कुछ कर गुजरने का इरादा रखते हैं ।”

राज ने अपने मुंह की ओर आते अगले प्रहार को अपनी बांह अड़ाकर रोका और जवाब में अपने दाएं हाथ का घूंसा अपने आक्रमणकारी पर चलाया । लम्बे-चौड़े आदमी के मुंह से एक अजीब-सी आवाज निकली और वह पीछे को उलटकर कार के पहलू से टकराया ।

अपने साथी पर आक्रमण होता पाकर वीरू के नेत्र सिकुड़ गए । उसने अपने ओवरकोट की जेब में हाथ डाला । उसने हाथ जब वहां से बाहर निकाला तो उसमें एक डन्डा था । उसने राज के सिर को निशाना बनाकर डन्डा हवा में घुकामिनी । राज ने सिर को झुकाई देकर वार बचाया । फिर उसने झुके हुए सिर को ही सामने हूलकर उसका प्रहार वीरू पर किया । उसका सिर वीरू की नाक से टकराया । वीरू पीछे को उलट गया ।

वह जब सम्भलकर खड़ा हुआ तो उसको नाक से खून बह रहा था ।

“तुम वाकई बच्चे पढाते हो ?” - वह हैरानी से बोला ।

“शक है तुम्हें ?” राज क्रूर स्वर में बोला ।

“यूं लड़ना कहां से सीख गए मास्टर जी ?”

“देखो, मुझे नहीं मालूम तुम किस फिराक में हो... लेकिन मुझे लगता है कि तुम किसी गलत राज पर हाथ डाल बैठे हो... और तुम किसी गलत कामिनी के फेर में हो । तुम लोग...”

तभी कार के समीप गिर पड़े लम्बे-चौड़े आदमी ने नीचे गिरे-गिरे ही सामने को छलांग लगाई । उसकी दोनों बांहें राज की टांगों से लिपट गई । उसने जोर से राज की टांगें खींचीं । अगले ही क्षण राज धड़ाम से जमीन पर आ गिरा ।

फिर दोनों आदमियों के लात-घूंसे राज पर बरसने लगे ।

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राज को जब होश आया तो उसने स्वयं को कचहरी के कम्पाउण्ड में औंधे मुंह पड़े पाया । उसने सिर उठाने की कोशिश की तो उसका सिर भड़ाक से किसी चीज से टकराया । उसने आंखें फाड़कर अपने चारों ओर देखा तो पाया कि वह कार के नीचे पड़ा था । प्रत्यक्षत: वे दोनों बदमाश उसकी चेतना लुप्त हो जाने के बाद उसके शरीर को एक कार के नीचे धकेल गए थे ।

वे कार के नीचे से बाहर निकला और उठ खड़ा हुआ । उसने अपनी जेब से रूमाल निकालकर अपने खून से लिथड़े हुए चेहरे को पौंछा ।

उसने कम्पाउन्ड में चारों ओर निगाह दौड़ाई । तभी उसे एक पुलिस अधिकारी कचहरी के मुख्य द्वार से बाहर निकलकर कम्पाउन्ड में आता दिखाई दिया ।

राज ने पहले उसे आवाज देकर समीप बुलाने का इरादा किया, लेकिन फिर उसने अपना इरादा बदल दिया । उसे मार तो पड़ी थी, लेकिन वह गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ था । उसने अपनी जेब टटोली तो पाया कि उसका बटुआ भी सही-सलामत था । यानी कि उसको लूटने की नीयत से उस पर आक्रमण नहीं किया गया था । उसने यही फैसला किया कि यह बात आम न ही होती तो अच्छा था कि एक कालेज प्रोफेसर, जो कि निकट भविष्य में प्रिन्सिपल बनने वाला था, मार कुटाई की ऐसी अप्रिय घटना में भागीदार बना था ।

फिर उसे कामिनी का भी ख्याल करना था । आखिर वे दोनों बदमाश उसकी बीवी को कैसे जानते थे ?

पुलिस के मामले में राज ने फिलहाल खामोश ही रहना मुनासिब समझा ।

राज ने अपने मुंह में जबान फिराई । उसे अपने सामने के दो दांत हिलते हुए महसूस हुए । बहरहाल उसे एक बात की खुशी थी कि वह चुपचाप मार नहीं खा गया था । उन दोनों बदमाशों को भी उसके कई करारे हाथों का खूब मजा चखने को मिला था ।

फिर उसे उस लिफाफे का ख्याल आया जो उन दोनों में से एक ने जबरन उसके कोट की जेब में डाल दिया था । लिफाफा देते समय लम्बे-चौड़े आदमी के मुंह से निकले शब्द उसके जहन में बजने लगे ।

यादव वाला काम कौन-सा काम था ?

और टिपटाप क्या बला थी, जहां कामिनी को कल दोपहर उनसे मिलना था ?

और वे दोनों उसके बारे में इतना कुछ कैसे जानते थे ? उन्हें कैसे मालूम था कि कामिनी उसकी बीवी थी ? वे दोनों तो कामिनी का नाम यूं ले रहे थे जैसे उनकी कामिनी से बड़ी गहरी जान-पहचान हो ।

उसने लिफाफा निकालकर अपने हाथों में ले लिया और अपनी कार के समीप पहुंचा । कार का दरवाजा खोलकर वह भीतर बैठ गया । उसने डोम लाईट जलाई और फिर लिफाफा खोला । लिफाफे के भीतर निगाह पड़ते ही वह सन्नाटे में आ गया ।

भीतर सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी मौजूद थी ।

उसने नोट गिने ।

पूरे दस हजार रुपये ।

एक क्षण के लिए वह अपने बुरी तरह दुखते जिस्म को भूल गया ।

उसे कामिनी से फौरन बात करना इन्तहाई जरूरी लगने लगा । इतनी मोटी रकम उन बदमाशों ने कामिनी के लिए भिजवाई थी उसने कार का इंजन चालू किया और उसे गियर में डालने ही लगा था कि उसे तब पहली बार यह महसूस हुआ कि उसका चश्मा उसकी नाक पर मौजूद नहीं था ।

वह कार से बाहर निकला ।‘

कम्पाउन्ड में चश्मा तो उसने तलाश कर लिया, लेकिन वह उसके किसी काम का नहीं रह गया था । उसने दोनों शीशे भी टूटे पड़े थे और फ्रेम भी टूटा पड़ा था । लगता था उन दोनों बदमाशों में से किसी ने उस पर अपना भारी पांव रख दिया था ।

वह वापिस कार में आ बैठा । उसने कार आगे बढाई ।

उसके चश्में का नम्बर बहुत अधिक नहीं था, लेकिन फिर भी रात के वक्त चश्मे के बिना कार चलाने में उसे काफी दिक्कत महसूस हुई ।

अपने घर की ओर बढते हुए उस क्षण पहली बार उसे इस बात का अहसास हुआ कि अपनी बीवी के बारे में उसकी जानकारी कितनी अपर्याप्त थी । कामिनी की पृष्ठभूमि को उसने कभी महत्व नहीं दिया था । उसका महत्व उसकी निगाह में उस वक्त भी नहीं था । महत्वपूर्ण बात केवल यह थी कि वह कामिनी से बेहद मुहब्बत करता था और कामिनी उससे बेहद मुहब्बत करती थी ।

वह केवल इतना जानता था कि कामिनी तेईस साल की, खूब गोरी, बेहद जवान और निहायत खूबसूरत युवती थी । अपने कालेज के एक अन्य प्रोफेसर के यहां हुई एक पार्टी में वह उससे पहली बार मिला था और पहली ही निगाह में वह उस पर मोहित हो गया था । उसकी देखते ही उसके मन में से अपने आप पुकार उठने लगी थी कि अगर वह शादी करेगा तो उससे ।

और तीन महीने बाद उन दोनों ने शादी कर ली थी ।

शादी के वक्त तक भी उसे केवल इतना मालूम था कि उसका नाम कामिनी सिप्पी था । वह होटल मैसोनिक में रहती थी और वह एक वकील के आफिस में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी करती थी । वकील का नाम भी उसे मालूम था, लेकिन उस वक्त मार-कुटाई से जड़ हुए उसके दिमाग में वह नाम आ नहीं रहा था ।

वह मानता था कि जिस लड़की से शादी करनी हो उसके बारे में उससे ज्यादा जानकारी की दरकार होती थी, लेकिन वह दिल के हाथों मजबूर था । कामिनी पर वह इस कदर मर मिटा था कि उसने कभी यह जानना जरूरी नहीं समझा था कि वह कौन थी, कहां से आयी थी, उसका घर-बार कहां था, उसके रिश्ते-नाते के लोग कहां रहते थे वगैरह... । कामिनी के मुंह से हां निकलने की देर थी कि राज ने यूं आनन-फानन, बिना उसके बारे में और कुछ पूछे जाने, उससे शादी कर ली थी जैसे उसे भय हो कि देर हो जाने से कहीं कामिनी अपना इरादा बदल न दे और शादी करने से इनकार न कर दे ।

उसने माल रोड पर स्थित एक तीन-मंजिली इमारत के सामने अपनी कार रोकी ।
 
वह तीन-मंजिली इमारत राज की अपनी मिल्कियत थी जो उसे विरासत में मिली थी इमारत पुराने ढंग की थी, लेकिन मजबूत और सलामत थी । उसकी दो मंजिलों पर उसने दो किराएदार रखे हुए थे, जिनसे उसे चौदह सौ रुपए महीना किराया हासिल होता था । कश्मीर में उसका फलों का एक बगीचा था जिससे उसे अच्छी-खासी सालाना आमदनी थी । उसके अतिरिक्त प्रोफेसर के तौर पर उसे बारह सौ रुपए तनख्वाह मिलती थी । उसकी कुल जमा माली हालत ऐसी थी कि वह रईस नहीं तो गरीब भी नहीं था । कम-से-कम वह यही समझता था कि वह बड़े ठाठ से जिन्दगी गुजार रहा था ।

वह कार से बाहर निकला और पिछली रात को गिरी बर्फ से ढकी राहदारी पर चलता हुआ इमारत के मुख्य द्वार की ओर बढा ।

वह इमारत में दाखिल हुआ ।

सीढियां चढने से पहले उसने आदतन तहखाने का दरवाजा खोला और नीचे झांका । उसे अपना नौकर मंगतराम तो कहीं दिखाई न दिया, लेकिन उसे यह देखकर बड़ी सन्तुष्टि हुई कि भट्टी में आग जल रही थी ।

तहखाने में एक विशाल भट्टी थी, जिसमें लकड़ी से आग जलाई जाती थी । उस आग से ब्वायलर में पड़ा पानी उबलता था और भाप तैयार होती थी । फिर उस पानी और भाप की सहायता से सारी इमारत के कमरे गर्म होते थे । इस काम के लिए लोहे के पाइपों का एक जाल विशेष रूप से सारी इमारत में फैलाया गया था । इमारत के वातावरण को गर्म रखने का यह इन्तजाम तब से चला आ रहा था जबकि एयर कंडीशनर का आविष्कार तक नहीं हुआ था । आज भी इमारत को गर्म करने का वह इन्तजाम एयर कंडीशनर लगवाने से कहीं सस्ता था ।

राज ने तहखाने का दरवाजा बन्द कर दिया और पिछवाड़े की सीढियों के रास्ते ऊपर को बढा ।

पहली मंजिल के फ्लैट में से लहसुन और सिरके की तीखी गन्ध आ रही थी । उसकी पहली मंजिल के किराएदार मिस्टर एन्ड मिसेज गोंसाल्वेज गोवानी थे और वे अपनी प्रकार का ही भोजन बनाते थे ।

फिर एकाएक उसकी खयाल आया कि बेचारी कामिनी उसकी फिक्र भी तो कर रही होगी । जब से उनकी शादी हुई थी, तब से वह पहला मौका था जब उसे घर जाने में देर हुई थी । तब पहली बार उसे कुणाल पर भी गुस्सा आया । न वह छोकरा बटमारी की वह हरकत करता, न विटनेस के तौर पर उसे कोर्ट में पेश होना पड़ता और न उन बदमाशों से उसका टकराव होता ।

वह दूसरी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट के दरवाजे पर पहुंचा ।

उसने कालबैल बजाई ।

कामिनी ने दरवाजा खोला । वह एक निहायत खूबसूरत, निहायत झीना, नाइट-गाउन पहने हुई थी और उसके हाथ में तब भी थमी कड़छी जाहिर कर रही थी कि वह सीधी किचन में से आई थी ।

राज भीतर दाखिल हुआ ।

“बड़ी देर लगाई ।” - वह शिकायत भरे स्वर में बोलो ।

राज मुस्कराया । उसने कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया और उसके एक गाल पर एक चुम्बन अंकित कर दिया ।

“अरे ! छोड़ो ।” - वह उसकी पकड़ में छटपटाती हुई बोली ।

“क्यों छोडूं ?” वह बोला । झीने गाउन के नीचे से निकलती कामिनी के नौजवान जिस्म की गर्मी वह साफ महसूस कर रहा था । प्रत्यक्षत: उस गाउन के नीचे कामिनी और कुछ नहीं पहने थी । उसने जिस्म पर कोई सेंट लगाया हुआ था जिसके साथ उसके अपने भरपूर जवान जिस्म की मादक गन्ध रच बस रही थी और राज दीवाना हुआ जा रहा था ।

“अरे, गाउन फट जाएगा ।” - वह बोली - “यह तीन सौ रुपये का गाउन है और मैंने आज पहली बार इसे पहली बार इसे पहना है । यूं छीना झपटी करोगे तो यह तार-तार हो जाएगा ।”

“तुमने ऐसी पोशाक पहनी क्यों जो छीना-झपटी से तार-तार हो सकती हो ?”

वह बड़े चित्ताकर्षक ढंग से मुस्कराई ।

“या कैसी भी कोई पोशाक क्यों पहनी ?”

वह खिलखिलाकर हंसी ।

राज का दिल झूम उठा । कैसी मोहक हंसी थी उसकी बीवी की । यूं लगता था जैसे मंदिर की घंटियां बजी हों ।

राज ने उसे बन्धनमुक्त किया ।

तब उसे पहली बार अनुभव हुआ कि कामिनी की सांसों में ब्रांडी की गन्ध बसी हुई थी । प्रत्यक्षत: उस रोज के असाधारण ठन्डे मौसम का रौब खाकर कामिनी ब्रांडी का एकाध पैग पहले ही ले चुकी थी । डिनर के बाद तो वैसे वे कॉफी के साथ ब्रांडी रात को अवश्य लेते थे ।

फ्लैट का वातावरण सैन्ट्रल हीटिंग की वजह से खूब गर्म था, लेकिन कामिनी के जिस्म पर मौजूद झीने गाउन के पीछे उस ब्रांडी की गर्मी का भी हाथ था, जो वह पी चुकी थी ।

उसने देखा डायनिंग टेबल पर ब्रांडी की खुली बोतल रखी हुई थी ।

“आज देर कैसे हो गई ?” - कामिनी ने पूछा ।

“बस हो गई ।” - राज तनिक हड़बड़ाकर बोला ।

“बस हो गई ।” - कामिनी बड़े प्यार भरे अन्दाज से उसके स्वर की नकल करती हुई बोली - “क्यों हो गई ?”

“आगे से नहीं होगी, माई-बाप ! इस बार माफ फरमाइये ।”

“ठीक है - फरकामिनी । तुम कपड़े बदलो, मैं खाना लगाती हूं ।”

“ओके ।”

वह बैडरूम में चला गया ।

कामिनी वापिस किचन में चली गई ।

वह जब डायनिंग टेबल पर पहुंचा तो उसने पाया कि कामिनी खाना लगा चुकी थी और उसके आगमन का इन्तजार कर रही थी ।

राज ने भोजन आरम्भ किया ।

अभी उसने कुछ ही निवाले खाए थे कि उसका मन भोजन से हट गया । साधारणतया कामिनी का बनाया खाना बहुत अच्छा होता था, लेकिन आज हर चीज का बुरा हाल था । रोटियां जल गई थीं या कच्ची थीं । चावल खुश्क नहीं हुए थे । दाल पतली थी और उसमें कच्चा प्याज साफ तैर रहा था । पनीर इतना तला गया था कि वह काला पड़ गया था और कड़-कड़ बोलने लगा था ।

उसके जेहन में एक खयाल आया ।

आज झौंक में कामिनी ब्रांडी इतनी ज्यादा तो नहीं पी गई थी कि उसे नशा हो गया था और उस नशे की हालत का अंजाम वह बदमजा खाना था ?

उसने बड़ी गौर से कामिनी की तरफ देखा ।

उसके चेहरे पर वह तमतमाहट मौजूद तो थी जो ब्रांडी के नशे से पैदा होती थी ।

बदमजा खाने के अलावा एक बात से वह और भी हैरान था ।

कामिनी ने उसके चश्मे के बारे में उससे कोई सवाल नहीं किया था । न ही उसने उसके सूजे हुए जबड़े की ओर ध्यान दिया था । साधारणतया ऐसी बातों की तरफ उसका फौरन ध्यान जाया करता था ।
 
भोजन के दौरान राज ने दो बार उन दो बदमाशों का जिक्र करने की कोशिश की जो कचहरी के कम्पाउण्ड में उस पर झपट पड़े थे, लेकिन दोनों ही बार कामिनी ने पहले ही घर-गृहस्थी की किसी छोटी-मोटी गैर-जरूरी बात का ऐसा जिक्र छेड़ दिया कि उसकी अपनी बात उसके मन में ही गुम होकर रह गई ।

प्याज मंहगे हो गए थे ।

आलू मिल नहीं रहे थे ।

पनीर उसने घर पर खुद बनाया था ।

वगैरह... वगैरह ।

राम-राम करके राज ने खाना खतम किया ।

कामिनी ने जूठे बरतन उठाकर किचन के सिंक में डाल दिये ।

आम तौर पर भोजन के बाद कामिनी बर्तन धोती थी और राज इस काम में उसकी मदद करता था, लेकिन आज कामिनी का बर्तन धोने का कोई इरादा नहीं दिखाई दे रहा था ।

“बर्तन !” - फिर भी राज बोला ।

“छोड़ो ।” - वह लापरवाही से बोली - “सुबह देखी जाएगी ।”

तीन महीने हो गये थे उन दोनों की शादी को - कामिनी की पीठ को घूरते हुए उसने सोचा - एक मर्द को मुनासिब तौर से अपनी बीवी को समझने के लिए कितना अरसा दरकार होता है ? क्या वह यह दावा कर सकता था कि वह कामिनी को पूरी तरह समझ चुका था ?

एकाएक कामिनी घूमी ।

राज को एकटक अपनी ओर देखता पाकर वह नर्वस भाव से बोली - “क्या देख रहे हो ?”

“देख रहा हूं ।” - राज गहरी सांस लेकर बोला - “कि तुम कितनी खूबसूरत हो ?”

“चलो हटो !” - वह शर्माई ।

“जानती हो ?”

“क्या ?”

“कि मैं तुमसे कितनी मुहब्बत करता हूं ।”

“जानती हूं, लेकिन मुझसे ज्यादा नहीं करते हो ।”

“क्या मतलब ?”

“समझो । आखिर प्रोफेसर हो ।”

राज अर्थहीन ढंग से हंसा ।

कामिनी किचन में चली गई और कॉफी बना लाई । कॉफी के बड़े-बड़े मगों में उसने ब्रांडी डाली । उसने एक मग सोफे पर बैठे राज को थमा दिया और स्वयं ड्राईगरूम के एक कोने में पड़ रेडियोग्राम के पास पहुंची । उसन डिस्क पर अब्बा का एल पी चढाया और रेडियोग्राम चालू कर दिया ।

राज ने कॉफी का एक घूंट पिया और शिकायतभरे स्वर में बोला - “बहुत ज्यादा ब्रांडी डाल दी ।”

“वहम है तुम्हारा ।” - वह बोली ।

“अरे कॉफी कहां है मग में ! यह तो एकदम नीट ब्रांडी है ।”

“ऐसा है तो ऐसा ही सही ।” - वह बड़े अधिकारभरे स्वर में बोली - “आज ठण्ड भी तो ज्यादा है और रात को बर्फ का भीषण तूफान चलने वाला है ।”

“क्या कहने ?”

कामिनी ने अपना मन सम्भाला और सोफे पर उसकी बगल में आ बैठी ।

दोनों कॉफी चुसकते रहे ।

“आज खाने में मजा नहीं आया न ?” - एकाएक वह बोली ।

“इससे कहीं बेहतर खाना तुम मुझे कई बार खिला चुकी हो ।” - राज बात को मजाक का पुट देता हुआ बोला ।

“मुझे मालूम है ।”

राज ने अपना मग खाली करके एक ओर रख दिया और बड़ी संजीदगी से बोला - “कामिनी ! बात क्या है ? तुम कुछ परेशान-सी लग रही हो या यह वहम है मेरा ?”

“कोई खास बात नहीं ।” - वह जबरन मुस्कराई । फिर उसने भी अपना मग खाली करके राज के खाली मग के समीप रख दिया और राज के साथ सटकर बैठ गई ।

राज को फिर उसके जवान जिस्म की गर्मी का एहसास होने लगा । उसने हौले से उसे अपने पहलू में खींच लिया । हौले से इसलिए ताकि कामिनी अपने नए गाउन के मसल जाने की फिर से शिकायत न करने लगे ।

कामिनी ने अपनी लम्बी, पतली, सुडौल उंगलियां उसके चेहरे पर फिरायी और फिर एकाएक पूछा - “यह तुम्हारे चेहरे को क्या हुआ है ? और तुम्हारा चश्मा कहां गया ?”

“दोनों ही बातें बड़ी देर में सूझी मेम साहब ।”

“बताओ तो ।”

“आज तुम्हारे पतिदेव पिटकर आये हैं । चश्मा टूट गया है और चेहरे की मरम्मत हुई है ।”

“हे भगवान ! तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?”

“मैंने बताने की कोशिश तो की थी, लेकिन बता नहीं पाया था । तुमने आलू और प्याज की ज्यादा जरूरी बातें करनी थी, इसलिए अपनी बात कहने की मेरी बारी ही नहीं आ रही थी ।”

“हुआ क्या था ?”

“कचहरी में अपनी गवाही देकर जब मैं बाहर निकला था तो दो बदमाश एकाएक मुझ पर झपट पड़े थे ।”

“कौन थे वो ?”

“मुझे नहीं मालूम ।”

“तो फिर तुम लड़े क्यों उनसे ?”

“अरे... मैं नहीं लड़ा । वे मुझसे लड़े खामखाह ।”

“लेकिन क्यों ?”

“पता नहीं... मैं तो अपनी कार में सवार होने की नीयत से आगे बढ रहा था कि एकाएक एक आदमी कार की ओट में से निकला और मेरा रास्ता रोककर खड़ा हो गया । वह मुझसे पूछने लगा क्या मेरा नाम राज है और क्या मैं गवर्नमैंट कालेज में हिस्ट्री पढाता हूं । मैंने हामी भरी और उससे उसके बारे में पूछा । तभी उस आदमी ने अपनी एक साथी को भी आवाज देकर बुला लिया ।”

“वे दो थे ?”

“हां ।”

“लेकिन वे थे कौन ?

“वे कहते थे कि वे तुम्हारे दोस्त थे ।”

“मेरे ?”

“हां ।”

“अपने नाम बताये थे उन्होंने ?”

“नहीं, लेकिन उनमें से एक ने दूसरे को वीरू के नाम से पुकारा था ।”

“देखने में कैसे थे वो ?”

“कम्पाउन्ड में नीम-अन्धेरा था, इसलिए मैं ठीक से उनकी सूरतें नहीं देख पाया था, लेकिन थे वे खूब लम्बे-चौड़े । पहले तो मैं उन्हें सी आई डी के आदमी समझा था ।”

“मैं किन्हीं सी आई डी के आदमियों को नहीं जानती ।”

“मैंने यह नहीं कहा कि वे सी आई डी के आदमी थे । मैंने कहा है कि मैंने उन्हें सी आई डी का आदमी समझा था ।”

“फिर ?”

“फिर मैंने उनसे पीछा छुड़ाकर वहां से टलने की कोशिश की, लेकिन फिर उनमें से एक ने, जो कि ज्यादा लम्बा-चौड़ा था, एकाएक मुझ पर आक्रमण कर दिया । मैं जमीन पर ढेर हो गया ।”

कामिनी की मुट्ठियां भिंच गई । वह कहरभरे स्वर में बोली - “कमीने ! हरामजादे !”’

राज हैरानी से उसकी तमतमाई हुई सूरत देखने लगा । वह पहला मौका था, जब उसने कामिनी के मुंह से गाली सुनी थी ।

“फिर ?” - कामिनी ने पूछा - “फिर क्या हुआ ?”

“फिर वह आदमी बोला - कि वह तो उनके खतरनाक इरादों का सिर्फ नमूना था । वह बोला कि मैं अपनी बीवी को समझा दूं कि वे इतनी आसानी से बेवकूफ बनने वाले नहीं थे और यह कि तुम उन्हें घिस्सा नहीं दे सकती थीं । इस चेतावनी का क्या मतलब हुआ कामिनी ?”

“मुझे क्या मालूम ? तुम आगे बढो ।”

“फिर उसने मुझे जबरन एक लिफाफा दिया ।”

“कैसा लिफाफा ?”
 
लिफाफा उसके ओवरकोट की जेब में था और ओवरकोट बैडरूम में बनी वार्डरोब में टंगा हुआ था । राज ने कामिनी को अपने से अलग किया और बैडरूम में जाकर लिफाफा ले आया । वह फिर सोफे पर कामिनी की बगल में आ बैठा । उसने लिफाफा कामिनी की गोद में डाल दिया ।

कामिनी ने लिफाफा खोला । भीतर भरे नोटों पर निगाह पड़ते ही उसके नेत्र फैल गए ।

“यह...” - वह हड़बड़ाकर बोली - “लिफाफा तुम्हें उन बदमाशों ने दिया था ?”’

“हां ।” - राज बोला - “जबरदस्ती, उनमें से एक ने लिफाफा जबरदस्ती मेरे ओवरकोट की जेब में ठूंस दिया था ।”

“लेकिन किसलिए ?”

“तुम्हें देने के लिए ।”

“मुझे देने के लिए ?”

“हां ।”

“लेकिन इसमें तो हजारों के नोट भरे हुए हैं ।”

“मैंने गिने हैं । पूरे दस हजार रुपये हैं ।”’

“कमाल है ।”

“उसने कहा था कि जब मैं यह लिफाफा तुम्हें दूंगा तो तुम फौरन सब-कुछ समझ जाओगी । तुम क्या समझी हो ?”

“कुछ भी नहीं ।”

“उन्होंने यह भी कहा था कि उनके मन में तुम्हारे लिए कोई वैर-भाव नहीं है और यह कि यह यादव वाले काम में तुम्हारा हिस्सा है । फिर मेरी पिटाई आरम्भ करने से पहले उन्होंने कहा था कि अगर तुम अपना लालच नहीं छोड़ोगी तो मेरी क्या गत बनेगी, यह मैं अपनी मौजूदा हालत में समझ सकता था ।”

कामिनी के दांत भिंच गए । कई क्षण वह बुत की तरह खामोश बैठी रही । अन्त में वह धीरे-से बोली - “और क्या कहा था उन्होंने ?”

“यह कि उनके सब्र का प्याला छलकने लगा था । मोटा माल काबू में करने के लिए वे कुछ भी करने से हिचकने वाले नहीं थे और इस बार उन्होंने हर हालात में कामयाब होने की ठानी हुई थी और यह कि मैं तुम्हें कह दूं कि कल दोपहर एक बजे और दो बजे के बीच में तुम उन्हें टिपटाप में मिलो ।”

“कमाल है । मेरे पल्ले तो कुछ नहीं पड़ रहा । मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि यह टिपटाप क्या बला है ।”

राज खामोश रहा ।

“वे तुम्हें बेहोश करके छोड़ गये थे ?” - कामिनी ने बड़ प्यार से उसका चेहरा सहलाते हुए पूछा ।

“हां । मुझे बेहोश करने के बाद वे मुझे एक कार के नीचे लुढका गए थे, ताकि किसी आते-जाते की मुझ पर निगाह न पड़े ।”

“तुम काफी देर तक बेहोश रहे थे ?”

“शायद दस या पन्द्रह मिनट ।”

“तुमने पुलिस में रिपोर्ट नहीं की ?”

“नहीं ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि पहले मैं इस बारे में तुमसे बात करना चाहता था ।”

“लेकिन मैं तो इस बारे में कतई कुछ नहीं जानती ।” - वह तीव्र विरोधपूर्ण स्वर में बोली - “भला मुझे कोई ऐसा अनोखा सन्देशा क्यों देगा और साथ में इतनी बड़ी रकम क्यों भेजेगा ?”

राज ने उसे अपनी बांहों में कस लिया और धीरे-से बोला - “शायद कोई वजह हो ?”

“पागल हुए हो क्या ?” - वह ना गीभरे स्वर में बोली - “ऐसे गम्भीर मामले में मैं क्या तुमसे झूठ बोलूंगी ?”

राज तनिक शर्मिन्दा हो गया ।

“और मेरे खयाल से तो तुम्हें फौरन पुलिस के पास पहुंचना चाहिए था । पुलिस तो मेरे खयाल से कचहरी में भी होती है ।”

“कामिनी ! मैं पहले ही कह चुका हूं कि इस बारे में सबसे पहले मैं तुमसे बात करना चाहता था ।”

“और मैं पहले ही कह चुकी हूं कि इस बारे में मैं कुछ नहीं जानती ।”

“फिर ठीक है । कहानी खतम ।”

फिर खामोशी छा गई ।

राज धीरे-धीरे कामिनी के बालों को सहलाता रहा ।

“उन्होंने” - कामिनी धीरे बोली - “यह कहा था कि अगर मैं उन्हें टिपटाप में नहीं मिलूंगी तो वे तुम्हारे साथ मारपीट करने की कोशिश करेंगे ?”

“हां । वे कहते थे कि जो मार मुझे मारी गई थी, वह तो सिर्फ नमूना थी ।”

“तुम्हें कल सुबह होते ही पुलिस के पास चले जाना चाहिए ।”

“मैं यही करूंगा, लेकिन जब बात हमारे पल्ले नहीं पड़ रही तो क्या पुलिस के पल्ले पड़ेगी ?”

“फिर भी तुम रिपोर्ट लिखवाने जरूर जाना ।”

“ठीक है ।”

कामिनी खामोश हो गई ।

राज भी एक क्षण खामोश रहा और फिर बोला - “कामिनी, जिस वकील के पास तुम नौकरी करती थीं, उसका नाम क्या था ?”

“शास्त्री ! जय शास्त्री । क्लार्क होटल के पास बीमा कम्पनी की बिल्डिंग में उसका दफ्तर है ।”

“आम तौर पर केस कैसे देखता है वो ?”

“फौजदारी के, क्यों ?”

“तुम शास्त्री के आफिस में काम करती थीं । शायद उसका कोई क्लायन्ट यह समझ रहा हो कि तुम्हें शास्त्री के किसी केस की कोई ऐसी जानकारी हो सकती थी, जो वह शास्त्री जी से तो नहीं उगलवा सकता था, लेकिन तुमसे उगलवा सकता था ।”

“नॉनसेंस । मुझे शास्त्री के किसी केस की कोई जानकारी नहीं । मैं वहां रिसैप्शनिस्ट थी, उसकी प्राइवेट सेक्रेट्री नहीं थी मैं ।”

राज खामोश हो गया ।

“उन दोनों आदमियों को तुम दोबारा देखो तो पहचान लोगे ?” - एकाएक कामिनी ने पूछा ।

“उम्मीद तो है ।” - राज बोला ।

“पुलिस के सामने उनका हुलिया बयान कर सकते हो ?”

“मोटे तौर पर । बारीकी से उनके नख-शिख बयान नहीं कर सकता मैं ।”

“हूं ।” - वह एक क्षण सोचती रही और फिर बोली - “मेरे ख्याल से तो वे किसी और आदमी के चक्कर में तुम पर हाथ डाल बैठे थे, राज एक बड़ा आम नाम है । कश्मीर में कई राज होंगे ।”

“लेकिन ऐसा राज शायद कोई दूसरा न हो, जिसकी बीवी का नाम कामिनी हो ।”

“हो सकता है । कामिनी भी बड़ा आम नाम है ।”

“लेकिन...”

“छोड़ो, क्या नीरस विषय ले बैठे । एक बात बताओ ।”

“पूछो ।”

“तुम मुझे प्यार करते हो ?”

“यह भी कोई पूछने की बात है !”

“लेकिन मैं फिर भी पूछती हूं, यह एक ऐसी बात है, जिसे मैं बार-बार पूछती हूं, जिसका जवाब मैं बार-बार सुनती हूं, लेकिन फिर भी मेरा मन नहीं भरता ।”

राज का दिल प्यार से भर उठा । उसने अपनी खूबसूरत बीवी के रसीले होंठों पर एक चुम्बन अंकित कर दिया । कामिनी की बांहें उसकी गरदन से लिपट गई । उसकी आंखें बन्द हो गयीं और वह अपने पति पर ढेर हो गई ।

राज के हाथ की उंगलियां अपने आप ही उसके गाउन की डोरी टटोलने लगी ।

उसका पहला खयाल एकदम सही था । कामिनी उस गाउन के नीचे कुछ नहीं पहने थी ।

फिर कामिनी का एकदम नया, झीना, खींचातानी से मसल सकने वाला गाउन उसके जिस्म से अलग होकर फर्श पर जा गिरा ।
 
मैने कामिनी को अपनी बाहों मे भरते हुए उसके होंठो से अपने होंठ मिला दिए , कामिनी राज के होंठो कोचूमने लगती है……राज भी पूरा साथ देता है. साथ मे एक हाथ लेफ्ट चूची पर रख कर

ज़ोर से मसल्ने लगता है तो दूसरा हाथ नीचे चिकनी चूत मे ले जाकर फेरने लगता है.

दोनो की साँस जब तक फूल नही जाती तब तक एक दूसरे के होंठो का रस पीते रहते हैं.

धीरे धीरे राज कामिनी को वही रूम के बेड पर लिटा कर खुद भी उसके उपर चढ़ जाता है…एक बार फिर से कामिनी के होंठो का रस

निचोड़ने लगता है कामिनी भी उसको बाहों मे भरकर पूरा साथ देती है.

आगे की कहानी राज की ज़ुबानी………………..

अब मेरी उंगलिया कामिनी की चूत के मुहाने पर थी और मेरा लंड कामिनी की गान्ड की दरार मे घुसा जा रहा था...मैं होठ छोड़ कर कामिनी की आँखो मे देखने लगा.

कामिनी तो बस मस्ती मे सिसक रही थी..और इंतज़ार कर रही थी कि मैं आगे क्या करता हूँ...

मैने अपनी उंगलियों को थोड़ा आगे बढ़ाया और कामिनी की जाघो को हाथो मे कस लिया...

कामिनी- आअहह...

मैं- अपने पैर थोड़ा फैलाओ कामिनी...देखने दो चूत मे कितना रस भरा है…

कामिनी ने जल्दी से अपने पैर फैला दिए और अपनी चूत का रास्ता खोल दिया...

मैने अपने एक हाथ को आगे ले जाकर चूत के चारो तरफ उंगली घुमाई...

कामिनी- आअहह.. सस्स्स्शीईई....

कामिनी- उउउंम...हहाा..

और मैने कामिनी को आगे करके उसकी गान्ड की दरार मे अपनी उंगली फिराने लगा ...

कामिनी- उउंम....आहह...हाअ...आहह...

फिर मैं नीचे बैठ गया और कामिनी को अपने साइड घुमा कर उसकी टांगे फैला दी...

अब कामिनी की चूत मेरे सामने थी...उसकी चूत जिसे मैने चोद चोद कर खूब फैला दी थी...

उसकी चूत देख कर तो मेरा कंट्रोल ख़त्म होने लगा था......

मैने अपना एक हाथ बढ़ा कर कामिनी की चूत पर रख दिया...

कामिनी की चूत से पानी आ रहा था...जिससे मेरा हाथ भीग गया..

कामिनी- आआहह.....आअहह...उउंम...

मैं- देखो कामिनी..चूत बहुत पानी बहा रही है...उसको चूत से उंगली बाहर निकालकर दिखाते हुए कहा..

कामिनी- उउंम..हाअ….तुम्हारे लिए ही है मेरी जान

फिर मैं खड़ा हो गया...

कामिनी- बस...जल्दी से कुछ करो ना बर्दास्त नही हो रहा है अब

कामिनी की आँखो मे मुझे एक रिक्वेस्ट दिख रही थी कि रूको मत...मैं फिर से कामिनी के उपर लेटकर होंठो को चूसने लगा..

अब मेरे दोनो हाथ से कामिनी के चूची को दबा रहा था...और मेरा खड़ा लंड कामिनी की चूत पर दस्तक दे रहा था...

कामिनी ने फिर से अपनी गान्ड को आगे धकेल कर अपनी चूत को मेरे लंड पर घिसना शुरू कर दिया...

मैं- ओह्ह ..कामिनी...तुम बहुत टेस्टी हो...

कामिनी- आहह...तो खा जाओ ना...रोका किसने है...आहह..आहह...

अब कामिनी पूरी मस्त हो गई थी...उसे अब चुदाई की फुल ज़रूरत थी...पर मैं उसके उपर से उठकर चूत मे जीभ लगा दिया...

कामिनी- आहह...हम्म....उउंम..

कामिनी- उउंम... ऐसे ही करते रहो जान खा जाओ ना मेरी चूत को...मसल्ते रहो मेरी चूचियों को…और ज़ोर से दबाओ…..

मैं- क्यो मेरी जान कामिनी..मैं चूत छोड़ कर कामिनी के निपल चूसने लगा…

मैं बारी-बारी कामिनी के निप्पल पीता रहा और फिर एक निप्पल को होंठो से पकड़ के खीच दिया....

कामिनी- आआहह....उउउम्म्म्म...

मैं- आहह...बहुत टेस्टी है ये...

कामिनी- उउउंम.....तभी तो मेरा मन तुमको देखते ही अपने दूध दबवाने का करने लगता है..

मैने फिर से दूसरे निप्पल को होंठ से पकड़ कर खींचा और कुछ देर ऐसा ही करता रहा....कामिनी अब पूरी गरम थी...उसकी चूत पानी छोड़े जा रही थी...

फिर मैने कामिनी के दूध को छोड़ा और उसके पैरो के साइड आ गया...

फिर मैने कामिनी की टांगे खोली...और दोनो टाँगो के बीच बैठ गया...और फिर से चूत मे मूह भिड़ा दिया …चूत की दरार मे जीब नीचे से उपर तक फिराने लगा..

मैने कई बार ऐसा ही किया....कामिनी सिसकती रही और मस्ती मे अपनी गान्ड को उठा-उठा कर पटकती रही...

और फिर मैने जीभ को कामिनी की नाभि मे डाल दिया और घुमाने लगा...

कामिनी- श...आअहह. .उउंम...उउंम्म...

मैं- सस्ररुउउउप्प्प्प....सस्स्रररुउउप्प्प्प....सस्स्रररुउउउप्प्प...आहह...सस्स्ररुउउप्प्प...सस्ररुउउप्प्प्प.....

कामिनी-श...आहह....आहह...उउउफ़फ्फ़...हहूओ...आहह..आअहह...

कामिनी बिन पानी की मछली की तरह मचल रही थी...और अपनी गान्ड को उठा कर मुझसे कह रही थी कि अब डाल दो अपना लंड...और

फाड़ दो चूत को..

मैने फिर कामिनी की जाँघ पर अपनी जीभ फिराई और कामिनी की चूत ने पानी छोड़ दिया...

मैं उसकी जाघो को बारी-बारी चाट ता रहा और कामिनी मादक आवाज़े करती रही...

मैं- सस्स्रररुउउप्प...सस्स्रररुउउप्प्प्प...सस्स्रररुउउ..आआहह....सस्स्रररुउउप्प्प्प...सस्स्रररुउुउउप्प्प्प...सस्स्र्र्ररुउउउप्प्प...आअहह....

कामिनी- उउउफफफफ्फ़...माअस...आअहह...आअहब...उउउंम्म...ऊहह..माआ....उउउंम्म...उउंम्म...

मैने कामिनी की जाघे चाट कर उसकी टाँगो को थोड़ा और फैला दिया...अब उसकी रस बहती चूत मेरे सामने थी...

मैं- आहह...बहुत टेस्टी है ये...

कामिनी- उउउंम.....तभी तो मेरा मन तुमको देखते ही अपने दूध दबवाने का करने लगता है..
 
मैने फिर से दूसरे निप्पल को होंठ से पकड़ कर खींचा और कुछ देर ऐसा ही करता रहा....कामिनी अब पूरी गरम थी...उसकी चूत पानी छोड़े जा रही थी...

फिर मैने कामिनी के दूध को छोड़ा और उसके पैरो के साइड आ गया...

फिर मैने कामिनी की टांगे खोली...और दोनो टाँगो के बीच बैठ गया...और फिर से चूत मे मूह भिड़ा दिया …चूत की दरार मे जीब नीचे से उपर तक फिराने लगा..

मैने कई बार ऐसा ही किया....कामिनी सिसकती रही और मस्ती मे अपनी गान्ड को उठा-उठा कर पटकती रही...

और फिर मैने जीभ को कामिनी की नाभि मे डाल दिया और घुमाने लगा...

कामिनी- श...आअहह. .उउंम...उउंम्म...

मैं- सस्ररुउउउप्प्प्प....सस्स्रररुउउप्प्प्प....सस्स्रररुउउउप्प्प...आहह...सस्स्ररुउउप्प्प...सस्ररुउउप्प्प्प.....

कामिनी-श...आहह....आहह...उउउफ़फ्फ़...हहूओ...आहह..आअहह...

कामिनी बिन पानी की मछली की तरह मचल रही थी...और अपनी गान्ड को उठा कर मुझसे कह रही थी कि अब डाल दो अपना लंड...और

फाड़ दो चूत को..

मैने फिर कामिनी की जाँघ पर अपनी जीभ फिराई और कामिनी की चूत ने पानी छोड़ दिया...

मैं उसकी जाघो को बारी-बारी चाट ता रहा और कामिनी मादक आवाज़े करती रही...

मैं- सस्स्रररुउउप्प...सस्स्रररुउउप्प्प्प...सस्स्रररुउउ..आआहह....सस्स्रररुउउप्प्प्प...सस्स्रररुउुउउप्प्प्प...सस्स्र्र्ररुउउउप्प्प...आअहह....

कामिनी- उउउफफफफ्फ़...माअस...आअहह...आअहब...उउउंम्म...ऊहह..माआ....उउउंम्म...उउंम्म...

मैने कामिनी की जाघे चाट कर उसकी टाँगो को थोड़ा और फैला दिया...अब उसकी रस बहती चूत मेरे सामने थी...

मैं - कामिनी...अब पलटो ...थोड़ा तुम्हारी गान्ड चख लू...

कामिनी गान्ड सुनते ही पलट गई...अब उसकी उभरी हुई गान्ड मेरे सामने आ गई...जिसे देख कर मेरे लंड ने बग़ावत शुरू कर दी...

फिर मैने अपनी जीभ कामिनी की गान्ड पर फिरण चालू की और अपने थूक से उसकी गान्ड को गीला कर दिया...

कामिनी अपनी ही आग मे तड़पति हुई सिसकती रही और मेरी जीभ का आनंद लेती रही...

मैं- आहह...मज़ा आ गया कामिनी...बहुत मस्त गान्ड है तुम्हारी कामिनी क्या गोरे गोरे चूतड़ हैं और उनमे एक थप्पड़ जड़ देता हूँ.

कामिनी-आहह…दर्द होता है…तुमने ही तो मेरी गान्ड पेल पेलकर इतने बड़े चूतड़ कर दिए हैं.

मैं- चलो सीधे होकर लेट जाओ…..

कामिनी- जान मुझे भी अपना लंड पिलाओ ना मूह मे..

मैं- दोनो 69 पोज़िशन मे आ गये….कामिनी लंड के सुपाडे को अपने मूह मे लेकर चाटने लगी वही मैं भी उसकी चूत को चूसने लगा…

कामिनी चूत चाटने से पूरी गरम हो गई ओर मेरा सिर अपनी चूत मे दबाते हुए झड़ने लगी.....

कामिनी-आहह…आआईयइ….ईीस्स..यईीस..स….ऊओह..ऊहह…आहह..आहह

कामिनी का चूत रस बहने लगा और मैं उसे चूस कर पीने लगा…

मैं तब तक कामिनी की चूत चाट ता रहा जब तक कि चूत रस ख़त्म नही हुआ….ऑर तब तक कामिनी…मस्ती मे पागल होती रही ऑर सिसकती रही…

जैसे ही चूत से रस ख़त्म हो गया मैने मूह हटा लिया….

मैं- मैं उसकी दोनो टाँगो के बीच बैठकर चूत मे लंड टिका दिया…
 
मैने फिर एक जोरदार धक्का मारा और मेरा आधा लंड कामिनी की चूत मे चला गया...और कामिनी की चीख निकल गई...

कामिनी- आआहह.....थोड़ा धीरे डालो…

मैं- बस जान..थोड़ा सा और...फिर एक धक्के मे पूरा लंड अंदर कर देता हूँ…कामिनी तड़प उठती है..

मैं- ओह डार्लिंग....बस हो गया...अब और दर्द नही...

मैने झुक कर कामिनी की आँखो को चूम लिया...

मैं- मेरी जान रो रही है..

कामिनी- ये तो ख़ुसी के आँसू है...

मैं- कैसी खुशी...

कामिनी- तुमसे चुदने की खुशी...तुम जितनी बार भी चोदते हो ऐसा लगता है मैं 1स्ट टाइम चुद रही हूँ…..हर बार उतना ही दर्द होता

है….जबकि तुम साल भर से हर रोज टाइम टाइम 5 से 6 बार चोदते हो तब भी क्यो जान….

मैं- ओह माइ डार्लिंग...अब मैं अपनी जान को जन्नत का मज़ा दूगा...

कामिनी- मैं तैयार हूँ...आप शुरू करो...

फिर मैने कामिनी के होंठो को अपने होंठो मे दबा लिया और धीरे-धीरे धक्के मारने लगा...

हर धक्के के साथ कामिनी का दर्द कम हो रहा था और थोड़ी देर बाद वो बिल्कुल नॉर्मल हो गई...

फिर कामिनी ने अपनी गान्ड उछाल कर लंड को अंदर लेना चालू कर दिया और मैं समझ गया कि अब कामिनी की जोरदार चुदाई करने का टाइम आ गया..

मैने किस ख़तम किया और खड़ा होकर कामिनी की जाघो को पकड़ कर तेज़ी से चुदाई करने लगा....

और कामिनी की मस्ती बढ़ती गई और उसकी सिसकारियाँ भी....

कामिनी- आहह…आअहह....आहह...….ज़ोर से…

मैं- हाँ मेरी जान...ये लो...एस्स..एस्स...एसस्स...

कामिनी- आहह...आअहह......आहह....उउउंम....

मैं- एसस्स..ये ले...ये ले...ऐसे ही ना...

कामिनी- हमम्म..आअहह..हाअ,,...आईससीए,,,हहीी,,,,,,आहहह.....

मैने झुक कर कामिनी के बूब्स हाथ मे लिए और फुल स्पीड मे चुदाई शुरू कर दी...

मैं- कामिनी...तुम्हारी फट गई आज तो..हम्म..

कामिनी-आहह…ज़ोर से….फाआ,…आहह…दूओ..आहह….आहह

मैं- ये लो जान.. …ओर लो…यीहह

कामिनी- अहहह....आहह...आईसीई..हहीी...आहह......माअर्ररूव....माअर्ररूव...तीएजज्ज़...

और 20 मिनिट की चुदाई मे कामिनी फिर से झड़ने लगी.....

कामिनी झड़ने लगी ऑर चुदाई की आवाज़ बदलने लगी

आअहह…..स्शहहह..आहह…त्ततहुूप्प्प…कचहुप्प्प…..ईएहहाअ…आहह…त्ततहुूप्प्प…त्ततहुूप्प्प….फ़फफूूककचह…फ़फफूूककच….ऊओ…ईीस

जब कामिनी झड गई तो शांत पड़ गई...मैं भी खड़ा हुआ थकने लगा था...

तो मैं बेड पर लेट गया और कामिनी को अपनी तरफ खीच लिया...

फिर मैने कामिनी को पीछे से बाहों मे भर लिया और उसके बूब्स दवाने लगा...

कामिनी- आहह..आपका तो अभी भी खड़ा हुआ है जी...

मैं- हाँ मेरी जान...

कामिनी- तो फिर रुक क्यो गये

मैं- तुम्हे थोड़ा आराम दे दूं..फिर करता हूँ...

कामिनी- आप करो..मुझे ज़्यादा आराम मिलेगा...

मैं- ह्म..ठीक है जान...

और मैने कामिनी की एक टाँग हवा मे उठाई और अपना लंड उसकी चूत मे डाल दिया...और हल्के धक्के मारने लगा....

कामिनी- आअहह..कितना अच्छा है...ऐसे ही डाले रहो...और धक्के मारते रहो जी..

मैं- ओके जान...

फिर मैने कामिनी को पीछे से चोदना शुरू कर दिया...
 
कामिनी- आहह...आप कितना अच्छा करते हो...

मैं- क्या करता हूँ जान...

कामिनी- जो आप कर रहे हो...

मैं- मैं क्या कर रहा हूँ जान...

कामिनी- आप चुदाई कर रहे हो...

मैं- किसकी चुदाई..

कामिनी(शरमा कर)- आअहह...अपनी बीवी की...

और कामिनी ने मूह घुमा कर मुझे किस कर दिया...

कामिनी अब बहुत खुल चुकी थी...वो चुदाई को एंजोई कर रही थी..और ये देख कर मैं बहुत खुश था...

मैं- कामिनी...फाड़ दूं तुम्हारी...

कामिनी- अब मुझसे क्यो पूछते है..मैं आपकी बीवी हूँ...जो मान हो करो ना..

मैं- नही...तुम बोलो...बिना मर्ज़ी के नही..

कामिनी- करो ना...ज़ोर से धक्के मारो जी..

मैने कामिनी को चूमा और तेज़ी से धक्के मारना शुरू कर दिया...

कामिनी- आहह..आअहह...आहह...ज़ोर से...

मैं- हाँ जान..ये लो...एसस्शह...ईएहह...

कामिनी- आहह..बहुत मज़ा आ रहा ....आअहह...आअहह...

मैं- एस्स ...एसस्स...ईीस्स...ईीस्स...

कामिनी- मेरा पानी...फिर से...ओह्ह्ह....ज़ोर से..ज़ोर से....

मैं- यस जान..ये लो...यीह..यीह...यीह...

और कुछ धक्को बाद कामिनी तीसरी बार झड गई...और मैं भी झड़ने के करीब आ गया तो मैने अपनी स्पीड बढ़ा दी...

मैं- यीह..यीहह...ईएह...ईएह..

कामिनी- उउउंम...उउंम..आअहह..आअहह...

मैं- मैं आया जान...कहाँ निकालु..

कामिनी- आअहह..अपनी बीवी के अंदर डाल दो जी...उउंम्म

यीहह...आआहह…त्ततहुूप्प्प…कचहुप्प्प…..ईएहहाअ…आहह…त्ततहुूप्प्प…त्ततहुूप्प्प….फ़फफूूककचह…फ़फफूूककच….ऊओ…ईीस्स…यईीसस…आअहह….ऊओ……फफफफकक्चाआप्प्प….

और ऐसी ही आवाज़ो के साथ मैने अपना पानी कामिनी की चूत मे भर दिया और फिर मैं कामिनी से लिपट कर लेट गया...
 
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