वह निर्मला के घर क्या करने आई थी यह एकदम भूल गई वह तो बस निर्मला की खूबसूरती के आकर्षण में खोते चली जा रही थी। एक औरत होने के नाते हुए वह इतना तो जानती ही थी कि इस उम्र में औरत कितनी भी खूबसूरत हो उसके अंग का कसाव कमजोर पड़ जाता है और उसकी छातियों झूले लगती है लेकिन निर्मला को देखकर वह चकाचौंध हो चुकी थी उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था उसे ऐसा ही लग रहा था कि जैसे वह 40 साल की निर्मला को नहीं बल्कि 25 साल की निर्मला को देख रही है निर्मला की खूबसूरती में उम्र किसी भी रूप से बाधा रूप नहीं बन रही थी बल्कि जैसे-जैसे उम्र गुजरती जा रही थी वैसे वैसे जैसे निर्मला की खूबसूरती में और ज्यादा निखार आता जा रहा था खुले बालों में और खूबसूरत लग रही थी हाथ में टावल लिए वह ऐसा लग रहा था मानो किसी से बातें कर रही हो।
सरला चाची को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे वह अपने पति से ही बात कर रही है लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी दोपहर में निर्मला नंगी होकर क्या कर रही है लेकिन वह मर्दों की हरकत से भी वाकिफ थी अच्छी तरह से जानती थी कि मर्द कभी भी शुरू पड़ जाते हैं और उसे ऐसा ही लग रहा था कि हो सकता है आज दीन में ही दोनों ने प्रोग्राम बना लिया हो।
क्योंकि यह बात वह भी अच्छी तरह से जानती थी कि इसी तरह से उसके साथ भी होता था दिन में भी मौका मिलने पर उसके पति उसके साथ इसी तरह की हरकत करते थे और उसके बदन से मजा लेने में बिल्कुल नहीं चूकते थे उसे अपनी जवानी के दिन याद आ गए जब वह भी इसी तरह से घर में एकदम नंगी होकर इधर से उधर घूमती रहती थी और अपने पति को तड़पाती रहती थी और ऐसे ही तड़पाते तड़पाते अपने पति से चुदवाने का आनंद लेते थे इस बात को याद करते ही सरला चाची की टांगों के बीच सुरसुरी से फैलने लगी।
वह इससे भी ज्यादा देखने की उम्मीद रखती थी इसलिए वहां से जाने का नाम नहीं ले रही थी वह मन ही मन सोच रही थी कि जल्द ही उसकी आंखों के सामने निर्मला की चुदाई वाला दृश्य पेश हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा था निर्मला काफी देर से सीढ़ियों के पास खड़ी होकर किसी से बातें कर रही थी जो कि इस समय पर्दे की ओट में दिखाई नहीं दे रहा था ऐसा लग रहा था कि जैसे वह उधर खड़े खड़े निर्मला के ऊपर पानी की बूंदे फेकरा और जिस से बचकर वह अपने ऊपर टवाल से ढक ले रही थी और हंस रही थी।
दोनों में हंसी मजाक चल रही थी इस दृश्य को देखने के बाद सरला को यही लग रहा था। सरला चाचा की निगाहें निर्मला की मस्त कड़क चूचियों पर टिकी हुई थी जो अपनी हंसने की वजह से हल्का-हल्का उछल रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे पानी भरे गुब्बारे उछल रहे हो।... इस उन्मादम दृश्य को देखकर सरला चाची इस उम्र में भी मचल रही थी।
निर्मला की कड़क और चलती हुई चूचियों को देख कर अपने आप ही अनायास सरला चाची के हाथ अपने चुचियों पर चले गए जो कि इस समय ब्लाउज के अंदर ही थे। अंदर का दृश्य देखकर सरला चाची के बदन में भी हलचल मची हुई थी। वह एक टक अपनी नजरों को शीशे के पार टिकाए हुए थी।
सरला चाची के बदन में उस समय और ज्यादा हलचल मचने लगी जब वह किसी बात पर अपनी आंखों को बंद करके अपनी हथेली को अपनी टांगों के बीच ले जाकर बड़ी बेशर्मी के साथ अपनी रसीली बुर की गुलाबी पत्तियों को मसल ना शुरू कर दी जिसका असर निर्मला के बदन में भी हो रहा था और उस नजारे को देखकर सरला चाची की हालत खराब होने लगी उसे अपनी आंखों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं हो रहा था कि वहां निर्मला का एक और रूप देख रही है हालांकि इस बात सेवर अच्छी तरह से वाकिफ थी कि समाज के सामने औरत भले ही कितनी सीधी साधी और संस्कारी हो जाए लेकिन पति के सामने पति के साथ चुदवाते समय एकदम रंडी हो जाती है तभी तो दोनों को मजा मिलता है और वही इस समय निर्मला के घर में भी हो रहा था और निर्मला एकदम बेशर्म होते हुए अपनी रसीली पूर्व को अपनी हथेली से रगड़ रही थी और सरला के देखते ही देखते वह अपनी बीच वाली उंगली को अपनी बुर के अंदर डालकर उसे अंदर बाहर करने लगी और लगातार मुस्कुराते हुए किसी से बातें कर रही थीजोकि सरला यही समझ रही है कि वह अंदर अशोक सही बातें कर रही थी क्योंकि कोई भी औरत अपने घर में किसी गैर मर्द से इस तरह से तो बेशर्मी की हद पार करते हुए इस तरह की हरकत नहीं करेगी और वैसे भी निर्मला के चरित्र सेवा चित्र सेवा की थी इसीलिए उसे इतना पक्का यकीन था कि अंदर घर में अशोक ही है लेकिन अभी तक उसे अशोक नजर नहीं आया था वह चाहती थी कि जल्द ही अशोक उसे नजर आए वह भी उसे देखना चाहती थी।ज्यादातर उत्सुकता उसे इस बात से लेकर थी कि ऐसी खूबसूरत औरत के नंगी होने पर एक मर्द का लंड कितना ज्यादा खड़ा होता है और इसीलिए वह अशोक को देखना चाहती थी उसके लंड को देखना चाहती थी उसके मन में हलचल मची हुई थी।
लेकिन तभी उसके दिमाग में एक झटका सा लगा क्योंकि जब वह गेट के अंदर प्रवेश कर रही थी तो वहां सिर्फ निर्मला की ही गाड़ी थी अशोक की गाड़ी नहीं थी इस बात को जेहन में आते ही सरला चाची एकदम सकते में आ गई उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है क्योंकि अक्सर जब भी अशोक घर पर होता था तो उसकी गाड़ी हमेशा पार्क होती थी लेकिन इस समय केवल एक ही गाड़ी घर में पार्टी थी जो कि निर्मला की थी इसका मतलब हुआ किसके सामने एकदम नंगी होकर इस तरह की हरकत कर रही है अब उसकी उत्सुकता एकदम पड़ने लगी थी और इस उत्सुकता के कारण उसकी दिल की धड़कन और ज्यादा तेज चलने लगी थी।
अंदर का दृश्य लगातार मादक होता जा रहा था निर्मला उसी तरह से अपनी बीच वाली उंगली को जोर जोर से अपनी पूर्ण के अंदर बाहर कर रही थी और अपनी चूची को एक हाथ से मसल रही थी। साला को ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके सामने वाला व्यक्ति जिसे वह अशोक समझ रही थी लेकिन अब उसका मन भी शंका के घेराव में आ चुका था वह उसे इशारा करके उसे उस तरह की हरकत करने को कह रहा था और निर्मला भी मस्त होते हुए उसके बताए निर्देश के हिसाब से ही हरकत कर रही थी अब सरला उस शख्स को देखना चाहती थी जो कि इस समय घर में मौजूद था।
लेकिन निर्मला के चरित्र को देखते हुए उसे ऐसा भी लग रहा था कि हो सकता है उसे सोचने में कुछ धोखा हो रहा हो ऐसा भी हो सकता है कि अंदर और सो कहीं हो और वह अपनी गाड़ी कहीं और पारित किया हो लेकिन फिर भी वह उसे देखना चाहती थी जो कि इस समय बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहा था वह सब सोच रही थी कि तभी उसे एक शख्स नजर आया जोकि टावर लपेटे हुआ था और डावल के आगे वाला भाग एकदम तंबू बना हुआ था जिसके नजर आते ही सरला चाची को समझते देर नहीं लगी की निर्मला की मदमस्त जवानी को देखकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो गया है।
उस शख्स का चेहरा उसे नजर नहीं आ रहा था केवल पीठ ही नजर आ रही थी जो कि टावर लपेटे हुए उस शख्स को देखकर इतना तो अंदाजा लगा दी थी कि वह कोई उम्र वाला शख्स नहीं था बल्कि नौजवान लड़का ही था लेकिन यह लड़का कौन हो सकता है व उसके चेहरे को देखना चाहती थी लेकिन वह सीडीओ से होता हुआ ऊपर की तरफ चला गया जिससे उसकी उम्मीद पर पानी फिर गया और देखते ही देखते उसकी आंखों के सामने ही निर्मला भी उसके पीछे-पीछे जाने लगी लेकिन जाते-जाते जब वह सिढ़ीया चढ़ रही थी इसलिए उसकी बड़ी-बड़ी मदमस्त गांड का घेराव और उसकी लचक देखकर इस उम्र में भी सरला की बुर नमकीन पानी से भर गए जो कि यह उसके साथ पहली बार हुआ था कि वह किसी ऐसी मादक दृश्य को देखकर इस तरह से उत्तेजित हो गई थी वह निर्मला को सीढ़ियां चढ़ते हुए देखती रह गई जो कि उस जवान लड़के की पीछे पीछे जा रही थी।
दोनों को इस हालात में देखकर सरला चाची को समझते देर नहीं लगी कि अब क्या होने वाला है वह अच्छी तरह से जान गई थी कि अब निर्मला जबरदस्त चुदाई के लिए तैयार हो चुकी थी लेकिन वह शख्स कौन था इस बात का खुलासा सरला के सामने बिल्कुल भी नहीं हो पाया था लेकिन तभी उसे तेज झटका सा लगा... उसके मन में शंका होने लगी कि कहीं वह जवान लड़का उसका खुद का बेटा शुभम तो नहीं क्योंकि उसकी भी कद काठी बिल्कुल वैसी ही थी जैसा कि उसने शीशे में से देखी थी हालांकि उसका चेहरा नजर नहीं आया था लेकिन कद काठी उसका गठीला बदन बिल्कुल शुभम की तरह ही थी।
अब उसका मन उत्सुकता से भरने लगा उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या समझे क्या हुआ अपने बेटे के सामने से पूरी नंगी होकर इस तरह की गंदी हरकत कर रही थी कि कोई और लड़का था जिसके साथ निर्मला रंगरलिया मना रही है।
नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता कोई मां अपने बेटे के सामने इस तरह की गंदी हरकत और वह भी एकदम पूरी तरह से नंगी होकर कैसे कर सकती है। एक तरफ उसका मन कह रहा था कि अंदर टावर लपेटे हुए वह शक्स उसका बेटा ही था तो दूसरा मन कहता था कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता भला निर्मला इस तरह की हरकत कैसे कर सकती है और वह भी अपने ही बेटे के साथ लेकिन इस बात को झुठला भी नहीं पा रही थी कि इस समय घर पर केवल निर्मला और शुभम ही होते हैं और कभी-कभी अशोक भी होता है लेकिन उस शख्स की कद काठी अशोक के उम्र से बिल्कुल भी मैच नहीं कर रही थी इसलिए सरला चाची के मन में सवालों का बवंडर उठने लगा था कि अगर वह शख्स शुभम नहीं था तो वह कोई और लड़का था और अगर वह कोई और लड़का था तो इसका मतलब है कि निर्मला जिस तरह से दिखती है उस तरह की बिल्कुल भी नहीं है वह किसी के लड़के को अपने घर बुलाकर उसे चुदाई करवा रहे हैं और अगर वह कोई गैर लड़का नहीं है तो वह शुभम ही था और अगर शुभम ही था तो यह कैसे मुमकिन हो सकता है कि एक मां खुद अपने बेटे के सामने इस तरह की गंदी हरकत कर रही हो और वह भी हंस-हंसकर और उसके सामने उसका लड़का इस अवस्था में खड़ा हो जो कि टावल लपेटे होने के बावजूद भी उसका लंड पूरी तरह से खड़ा था।
सरला अपने मन में उठ रहे सवालों का जवाब खुद से ही ढूंढना चाहती थी इसलिए गेट पर आंख दिखाकर घंटों बैठी रही वह देखना चाह रही थी कि अगर दूसरा कोई लड़का होगा तो थोड़ी ही देर में घर से बाहर जरूर जाएगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ वह शाम तक बैठे रहे गई लेकिन घर से कोई भी दूसरा शख्स बाहर नहीं निकला और ना ही घर का दरवाजा ही खुला इसका मतलब पक्का था कि घर के अंदर शुभम ही था लेकिन फिर भी वह अपने मन को बार-बार झूठे लाने के लिए झूठी दिलासा दे रही थी कि एक मां भले अपने बेटे के साथ ऐसा कैसे कर सकती है लेकिन फिर भी जो नजारा उसकी आंखों में देखा था उसे वह भी कतई तौर पर चुटकुला नहीं सकती थी क्योंकि शाम तक अगर घर से कोई बाहर नहीं निकला और वह शख्स शुभम नहीं था तो शुभम कहां गया अगर उसे बंद नहीं होता तो 1 घंटे बाद 2 घंटे बाद शुभम जरूर अपने घर वापस तो लौटता लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ ना तो कोई घर से बाहर ही निकला और ना ही कोई घर के अंदर ही आया इसका मतलब साफ था कि अंदर जो दृश्य उसके सामने नजर आ रहा था । उस दृश्य में दोनों मां-बेटे ही थे अब इस बात से सरला जांच एकदम रोमांचित हो उठी थी वह अपने संघ के को पूरी तरह से विश्वसनीय कर लेना चाहती थी इसलिए अब दिन-रात उन दोनों के ताका झांकी में लगाए रहती थी वह बार-बार घंटों बैठकर निर्मला के घर की तरफ देखती रहती थी।
जो कि इस ताका झांकी का एहसास निर्मला को भी अच्छी तरह से हो गया था उसे समझते देर नहीं लगी कि सरला चाची उस पर नजर रख रही है क्योंकि दोपहर वाली बात वह 2 दिन बाद उससे एक बहाने से पूछ ही ली थी कि वह दोपहर में उसके घर दही लेने आई थी तो बेल बजाने के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला था। सरला चाची के इस बात का जवाब देते हुए निर्मला बोली थी कि उसकी बेल खराब हो गई है इसलिए आवाज नहीं आई थी जो कि यह बात सच है कि निर्मला के डोरबेल में खराबी हो गई थी लेकिन अगली बात सुनकर वो एकदम से चौंक गई थी कि उसके घर कोई और आया था क्या कोई लड़का जिसे वह शीशे मै से देखी थी। लेकिन निर्मला यह कहकर टाल गई थी कि नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है कोई नहीं आया था जबकि निर्मला यह बात नहीं जानती थी कि सरला चाची ने उसे नग्न अवस्था में देख ली थी।और ना ही सरला ने इस बात का जिक्र की थी कि वह कमरे में नंग धड़ंग क्यों घूमती है। सरला नहीं चाहती थी कि उसे इस बात से आगाह कर दिया जाए ताकि वह आगे से संभल कर रहे क्योंकि वह उसे रंगे हाथ पकड़ना चाहती थी।
लेकिन सर ना जाने की बात सुनकर निर्मला सकते में आ गई थी और इस बारे में शुभम से भी बात कर चुकी थी और उसे समझा दि थी कि सरला चाची को हम पर शक हो गया है इसलिए आइंदा कमरे के बाहर कहीं भी इस तरह की कोई भी हरकत नहीं होनी चाहिए कि सरला चाची का शक यकीन में बदल जाए।
अपनी मां की बातें सुनकर शुभम भी कुछ हद तक घबरा गया था क्योंकि वह नहीं चाहता था कि दोनों की करतूत किसी भी रूप में सबके सामने आए इसलिए वह कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहता था लेकिन अपने मन में यह बात बना लिया था कि कुछ ऐसा करना पड़ेगा ताकि सरला चाची अगर यह बात जान भी जाए कि उन दोनों में क्या चल रहा है तो भी वह किसी से भी कह सकने में समर्थ ना हो इसलिए वह अपने मन में ही प्लान बनाने लगा।
जबसे शुभम को उसकी मां ने यह बात बताई थी कि उसकी बाजू वाली सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से शुभम पूरी तरह से चौकन्ना हो गया था और कुछ ऐसा करना चाहता था कि अगर उसे इस बात का पता भी चल जाएगी शुभम खुद अपनी मां की चुदाई करता है तो भी वह किसी को कुछ भी बताने लायक ना रहे और ऐसा तभी हो सकता है जब वह वही करें जो कि गांव में अपनी मामी और मामी की लड़की के साथ किया था उनके साथ भी संबंध बनाकर वह उन दोनों की बोलती बंद कर दिया था और मामी की लड़की को यह बात अच्छी तरह से मालूम होने के बावजूद भी की शुभम अपनी मां को चोदता है फिर भी वह यह बात किसी को बता नहीं सकी क्योंकि शुभम खुद उसकी मां की चुदाई कर चुका था जो कि उसकी मामा की लड़की ने खुद अपनी आंखों से देखी थी।
अब शुभम को इधर भी वही करना था जो वह गांव में किया था इसलिए वह किसी भी तरह से बस अपनी बाजू वाली सरला चाची के घर में प्रवेश करना था लेकिन कैसे यह उसे भी पता नहीं था।
सरला चाची का एक लड़का था जिसकी अभी 3 साल ही हुए थे शादी को और वह अक्सर शहर के बाहर ही रहता था जिसकी वजह से घर में केवल सरला चाची और उनकी जवान बहू ही रहती थी सरला चाची के पति का काफी समय पहले ही देहांत हो चुका था।
शुभम के लिए यह बात राहत दिलाने वाली थी कि घर में केवल सरला चाची और उनकी जवान बहू हुई थी बाकी कोई भी नहीं था उनका लड़का जो कि शहर के बाहर रहता था वह कभी-कभी ही घर पर आता था उसी काम के सिलसिले में हमेशा बाहर ही रहना पड़ता था। शुभम को इतना तो पता ही था लेकिन अब सवाल यह था कि उसके घर में प्रवेश कैसे किया जाए इसी जुगाड़ में वह लगा हुआ था।
इसी तरह से दिन गुजरने लगे निर्मला और शुभम अब कमरे के अंदर ही और वह भी खिड़की और पर्दे लगाने के बाद ही एक दूसरे मैं समाने की भरपूर प्रयास में लगे रहते थे जो कि दोनों चुदाई का भरपूर मजा लेने के बावजूद भी हमेशा प्यासे ही रहते थे।
दोनों की प्यास एक दूसरे से पूछती ही नहीं थी हालांकि दोनों को तृप्ति का अहसास अद्भुत होता था लेकिन जब कभी भी एकांत पाते थे तो शुरू पड़ जाते थे एक दूसरे के बदन को नोचने खसोटने लगते थे।
शाम के वक्त शुभम के पास कोई काम ना होने की वजह से वह घूमने निकल गया था। संभोग सुख की प्राप्ति करते करते उसके बदन में काफी बदलाव आ गया था अब वह पहले से भी ज्यादा और हैंडसम और मजबूत शरीर वाला लगने लगा था या यूं कह सकते हैं कि वह पूरी तरह से मर्द हो चुका था।
वह काफी समय गुजरने के बाद अपने घर की तरफ लौट रहा था तो रास्ते में ही उसे सरला चाची नजर आ गई जो कि दोनों हाथ में थैला लिए घर की तरफ चले जा रहे थे। सरला को देखते ही शुभम के दिमाग में हलचल होने लगी वह तुरंत दौड़ते हुए सरला के पास गया और उनके हाथों में से जबरदस्ती दोनों थेले लेते हुए बोला।
क्या कर रही हो चाची मेरे होते हुए आप इतना वजन उठाकर घर ले जा रही हो मैं किस दिन काम आऊंगा।
नहीं नहीं रहने दे मैं उठा लूंगी अभी मेरे में काफी दम बाकी है। (ऐसा कहते हुए सरला सब्जियों से भरे हुए थे वे को पीछे की तरफ खींचने लगी। क्योंकि शुभम को देखते ही उसकी आंखों के सामने उस दिन वाला नजारा घूमने लगा जब हुआ एक कटोरी दही लेने गई थी और उसकी आंखों ने वह दृश्य को देख ली थी जिसकी वह सपने में भी कल्पना नहीं कर सकती थी तुरंत उसकी आंखों के सामने निर्मला का नंगा बदन और टावर में लिपटा हुआ मजबूत शरीर वाला लड़का नजर आने लगा लेकिन वह अभी भी पक्के तौर पर नहीं कह सकती थी कि वह सुबह में था लेकिन उसे संघ का पूरा था कि वह शुभम ही था और वैसे भी उसकी मां इतनी ज्यादा खूबसूरत है कि कोई भी हो उसकी जवानी और वह भी नंगी जवानी देखकर फिसल जाए।इसलिए वह शुभम को खेला नहीं लेने देना चाहती थी लेकिन सुबह हाथ में आई इस मौके को गंवाना नहीं चाहता था इसलिए जबरजस्ती करते हुए सरला के हाथों से थेला ले लिया और बोला।)
मैं अच्छी तरह से जानता हूं चाची की अभी आप बुरी नहीं हुई है पक्के तौर पर मैं कह सकता हूं कि आप जैसी खूबसूरत औरत पूरे सोसाइटी में नहीं है सच कहूं तो आपने अपने बदन को इतना संभाल कर रखी है कि अभी भी मुझे ऐसा लग रहा है कि आप 28 या 30 साल की हैं। ,,( इतना कहकर वह सरला चाची के साथ साथ चलने लगा शुभम की बातें सुनकर एक पल के लिए सरला चाची अंदर ही अंदर खुश होने लगी और वैसे ही भी औरतों को अपनी तारीफ सुनना सबसे अच्छा लगता है लेकिन फिर मन में सोचे कि है कल का छोकरा कितना चालाक है एक औरत की तारीफ उसके ही मुंह पर कैसे बेशर्म होकर कह रहा है इसलिए वह शुभम से बोली। )
कैसा बेशर्म है रे तू इस तरह से औरत की तारीफ कर रहा है...।
सरला चाची इसमें बेशर्म वाली कौन सी बात आ गई आखिर चलो आप ही एक बात बताओ अगर आप किसी गुलाब के फूल को देखेंगे तो क्या कहेंगी...(शुभम की बात सुनकर उसकी तरफ देखते हुए)
नहीं नहीं बताइए आप क्या कहेंगी... यह कहेंगी कि यह कितना गंदा फुल है। ....ऐसा तो नहीं कहेंगी ना आप यह कहेंगे कि कितना खूबसूरत फूल है बस यही . ....यही मैं कह रहा हूं...।
तू बड़ा बेशर्म है । (इस बार शुभम की चालाकी देखकर सरला के चेहरे पर मुस्कान फैल गई और यह मुस्कान केवल शुभम के द्वारा की गई उसकी तारीफ की वजह से ही थी... औरतों की संगत की वजह से शुभम काफी चालाक हो गया था औरतों को किस तरह से अपने बस में करना है यह वह अच्छी तरह से जानता था इसी हथकंडे को अपनाते हुए अब तक वह कई औरतों के साथ संभोग सुख का मजा ले चुका था बातों से हुई शुरुआत उस औरत के बिस्तर पर ही जाकर खत्म होती थी और यही उद्देश्य लेकर के वह सरला चाची से चिकनी चुपड़ी बातें कर रहा था। पीछे से आते समय ही बस अल्लाह चाची की खूबसूरत बदन के साथ-साथ उसके भरपूर पिछवाड़े का जायजा वह अपनी नजरों से ले चुका था कमर के नीचे का घेराव देखकर शुभम की टांगों के बीच हलचल शुरू हो गई थी और वह दूर से सरला चाची को जाते हुए देख कर उसकी मटकती हुई गांड के आकर्षण में बंधता चला जा रहा था। जब से उसकी मां ने यह बताई थी कि वह उन दोनों को नजर रख रही है तब से वह इसी फिराक में था कि कब वह सरला के साथ भी हमबिस्तर हो और और उसका मुंह उसके राज से राज ही रह जाए लेकिन अब वह दृढ़ निश्चय कर चुका था की सरला चाची की चुदाई वह करके ही रहेगा क्योंकि उसकी मटकती हुई गांड ने शुभम को पूरी तरह से दीवाना बना दिया था। पड़ोस में रहने के बावजूद भी अब तक शुभम ने सरला चाची पर नजर नहीं डाली थी हालांकि कभी-कभार दोनों के बीच मुलाकात होती थी लेकिन कभी भी शुभम ने सरला चाची को उस नजरिए से नहीं देखा था क्योंकि वैसे भी उसकी 10 की 10 उंगलियां निर्मला नाम की एक ही में जो थी इसलिए दूसरी औरतों को देखने का उसका कोई मन भी नहीं था लेकिन आज सरला चाची की मटकती हुई गांड और उसकी खूबसूरती और खास करके ब्लाउज के अंदर का भरपूर भार देखकर उसके तन बदन में हलचल होने लगी थी और उसे भोगने के लिए वह तड़पने लगा था जिसके पीछे उसका इरादा भी सरला चाची को उनके राज से एकदम से शांत करने को था। शुभम हाथों में थैला लिए सरला चाची के कदम से कदम मिलाते हुए आगे बढ़ रहा था सरला को यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या समझे जिस तरह से वह उसकी मदद कर रहा था उसे अच्छा तो लग ही रहा था और खास करके उसके द्वारा की गई उसकी खूबसूरती और इस उम्र में भी शरीर को अच्छी तरह से संभाल कर रखने की तारीफ सुनकर उसका मन गदगद हुए जा रहा था।..... दोनों अब एक दूसरे से बिना बोले ही आगे बढ़ रहे थे शुभम सोच रहा था कि बात की शुरुआत कहां से की जाए वह पूरी तरह से सरला को अपनी बातों के जाल में फंसा लेना चाहता था इसलिए ऐसे ही बात को आगे बढ़ाते वह बोला।)
सरला चाची आपके दोनों थैले काफी वजनदार हैं जरूर इसमें कुछ अच्छी सी चीज खरीद के ले जा रही है।
ज्यादा वजन हो तो ला एक थैला मुझे दे दे....
नहीं नहीं चाहती ऐसी कोई भी बात नहीं है मैं तो यूं ही कह रहा था कि आप इसमें ढेर सारी सब्जियां लेकर जा रही हैं आज लगता है कुछ खास है।
खास कुछ भी नहीं है मैं ऐसे ही सप्ताह की सब्जियां खरीद कर ले जाती हूं।
वैसे चाची सब्जियों में क्या-क्या है।
कुछ खास नहीं है मटर है करेला है बैंगन है और कद्दू है। (बैगन का नाम सुनते ही शुभम मन में ही सोचने लगा कि घर पर कोई नहीं है इसलिए लगता है बैगन घर पर ले जाकर के खुद ही अपनी बुर की प्यास बुझाती है क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मा भी जब उसके पास अपनी प्यास बुझाने का कोई रास्ता ना था तो वह भी बाजार से लंबे मोटे बैगन खरीद कर लाती थी और उसी से अपनी बुर की प्यास बुझाती थी। हालांकि कद्दू का जिक्र सुनते ही वह बोला।)
चाची सच कहूं तो मुझे कद्दू बहुत पसंद है कद्दू की सब्जी मेरी सबसे ज्यादा फेवरेट है।
कोई बात नहीं सुबह जब बनेगी तो मैं तुझे बुला लूंगी। (सरला के ना चाहते हुए भी उसके मुंह से यह बात निकल गई वह साफ तौर पर शुभम को खाने का न्योता दे रही थी जोकि शुभम द्वारा की गई उसकी तारीफ का ही नतीजा था।)
मैं जरूर आऊंगा चाची बस जब बनाना तो मुझे मत भूल जाना।
इसमें भूलने वाली कौन सी बात है सब्जी ही तो तुझे खाना है की जमीन जायदाद खा जाएगा जो मैं तुझे ना बुलाऊ।
(सरला की बात सुनते ही शुभम अपने आप से ही बात करते हो बोला एक बार घर में तो आने दो उसके बाद तो मैं क्या-क्या खा जाऊंगा तुम्हें खुद पता नहीं चलेगा और अभी तुम्हारी आंखों के सामने)
चलो अच्छी बात है कि इसी बहाने मैं आपका घर भी देख लूंगा वैसे भी इतनी पड़ोस में होने के बावजूद भी मैं कभी आपके घर नहीं आया।
शुभम सरला की बातें सुनकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था उन दोनों को चलते हुए काफी देर हो चुकी थी लेकिन शुभम को इतनी देर में ऐसा कभी भी नहीं लगा कि सरला को उन पर शुभम और निर्मला के रिश्ते को लेकर किसी भी प्रकार का शक हो वरना वह कह चुकी होती लेकिन ऐसा कुछ भी साला चाची ने नहीं कहा था कि जिससे यह पता चलता कि वाकई में उन्हें उन दोनों पर शक है।और सलाह के मन में भी यही उत्तल पुथल चल रहा था वह अपनी शंका वाली बात शुभम से कहे भी तो कैसे कहे अगर वाकई में उसकी आंखों ने धोखा खा गई हो तो इस तरह का लांछन लगाना भी अच्छी बात नहीं है इसलिए वह शांत रह गई लेकिन उसकी तरफ से निर्मला और शुभम को चरित्रवान होने का सर्टिफिकेट नहीं मिल गया था वह मैंने फैसला कर चुकी थी कि वह सच्चाई का पता लगाकर रहेगी... दोनों के बीच काफी बातचीत होती रही।
शाम ढल चुकी थी दूर आसमान में सूरज अपनी लालिमा भी खेलते हुए अस्त होने जा रहा था जिसकी वजह से वातावरण में अंधेरा पन छाने लगा था। शुभम रह-रहकर चोर नजरों से निर्मला के कमर के नीचे के भराव दार हिस्से को देख ले रहा था और मन ही मन में गर्म आ भर ले रहा था और उसकी नजरें सुगंधा के ब्लाउज पर भी चली जा रही थी जो कि बड़ी-बड़ी चुचियों को अंदर समाने की वजह से ब्लाउज में से बीच की लकीर साफ नजर आ रही थी। वह मन ही मन सोचने लगा कि सरला चाची के उम्र में और उसकी मां की उम्र में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था तीन-चार साल का ही फर्क था जोकि सरला ने भी अपने बदन को अच्छे से मेंटेन की हुई थी तभी तो इस उम्र में भी कसी हुई लग रही थी हालांकि निर्मला के सामने फीकी ही थी फिर भी खूबसूरत थी। शुभम को और क्या चाहिए था। वह मन ही मन खुश हो रहा था कि सपना चाची ने उसे अच्छे से बात की थी और उसे अपने घर आने का आमंत्रण भी दे दी थी लेकिन इतनी जल्दबाजी करना उसके लिए ठीक नहीं था इसलिए वह सही समय का इंतजार कर रहा था चलते चलते दोनों का घर आ गया सरला अपने हाथों से गेट खोल कर अंदर आते हुए बोली।
चल अंदरर आजा चाय पी कर जाना वैसे भी तूने मेरी बहुत मदद की है।
क्या चाची आप तो मुझे शर्मिंदा कर रही हैं यह कोई मदद नहीं थी यह तो मेरा फर्ज था एक पड़ोसी होने के नाते वैसे भी आप की जगह पर मेरी मम्मी होती तो क्या मैं उन्हें इस तरह से खेले उठाकर घर ला दे देता नहीं ना मैं तो बस अपना फर्ज निभा रहा था।
बातें बहुत बनाता है (सरला हंसते हुए बोली )चल अच्छा आज आप चाय पी कर जाना।
नहीं-नहीं चाची किसी और दिन मैं जरूर आपके हाथ की चाय पीने आऊंगा अभी मुझे जाना है ..(इतना कहते हुए शुभम दोनों थैले को सरला आंटी को पकड़ाने लगा कि तभी अंदर का दरवाजा खुला और सरला आंटी की बहू बाहर आ गई।)
लाइए माजी में रख देती हूं। (इतना कहते हुए उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाई और सरला ने शुभम के हाथों से थैला लेते हुए अपनी बहू को पकड़ते हुए बोली।)
ले रुचि बहू इसे किचन में संभाल कर रख देना...
ठीक है मम्मी जी (इतना कहते हुए वह सरला के हाथों से दोनों थेली पकड़ ली और एक नजर शुभम की तरफ फेरकर वापस अंदर जाने लगी। इतना शुभम के लिए बहुत था। वह सरला चाची के बहू की खूबसूरती देखा तो देखता ही रह गया इतना खूबसूरत गोल चेहरा ऐसा लग रहा था कि जैसे चांद जमीन पर आ गया हो वह कुछ सेकंड तक उसे जाते हुए देखता रहा और कसी हुई साड़ी में उसकी चूसत गांड को देखकर अपने मन को बेकरार करने लगा। वह वापस घर के अंदर चली गई तो सरला शुभम से बोली।
यह मेरी बहू है रुचि बहुत प्यारी है। (शुभम अब वहां पर ज्यादा देर खड़ा रहना उचित नहीं समझ रहा था इसलिए अपने संस्कार दिखाते हुए अपने दोनों हाथ जोड़कर सरला से इजाजत मांगते हुए बोला ।
अच्छा तो चाची में अब चलता हूं अगर किसी भी प्रकार का कोई भी छोटा मोटा काम हो तो मुझे जरुर याद करिएगा आपको परेशानी नहीं होगी मैं आपका काम कर दूंगा।
ठीक है शुभम बेटा तो कितना अच्छा है मुझे आज पता चला कोई भी काम होगा तो मैं तुझे जरूर याद करूंगी।
बेफिक्र होकर याद करिएगा चाची।
(इतना कहकर वह अपने घर की तरफ चला गया आज सरला से मिलकर वह काफी उत्तेजित नजर आ रहा था और खास करके उसकी बहू रुचि से मिलकर हालांकि उसकी एक झलक भर देखा था लेकिन उसकी खूबसूरती देखकर उसकी आंखें चकाचौंध हो चुकी थी वह आपने कमरे में बैठकर सरला और उनकी बहू रुचि के बारे में सोच रहा था और इन सभी बातों को वह अपनी मां से बिल्कुल भी नहीं बताना चाहता था क्योंकि एक बार वह भुगत चुका है इसलिए किसी भी औरत की बात अब वह अपनी मां से नहीं बताएगा यह निश्चय कर चुका था। सरला की मटकती हुई गांड के बारे में सोचकर व काफी उत्तेजित हो चुका था दीवार घड़ी में 8:00 बज रहा था वह समझ गया था कि खाना बन रहा है और उसकी मां किचन में ही होगी इसलिए वह उत्तेजना बस किचन की तरफ जाने लगा।
सरला चाची के भराव दार बदन और उसकी बहू रुचि के खूबसूरत चेहरे को देखकर शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था बार बार उसकी आंखों के सामने सरला चाची की बड़ी-बड़ी मटकती गांड नजर आ रही थी। अब तक के अपने सेक्स जीवन के सफर को देखते हुए उसे इतना तो ज्ञान हो ही गया था कि हर औरत अंदर से प्यासी होती है उसके अंदर मोटे तगड़े लंड से चोदने का सपना हमेशा बना होता है बस उसे जगाना होता है और यही काम अब सरला के साथ उसे करना था।
लेकिन इस समय उसे एक रसीली बुर की आवश्यकता थी जिसके लिए वह पूरी तरह से उत्तेजित हो चुका था इसलिए वह किचन की तरफ जाने लगा उसे पूरा यकीन था कि उसकी मां किचन में खाना बना रही होगी और घर में उन दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था माहौल और मौका सब कुछ शुभम के पक्ष में था। वैसे कई औरतों के साथ संभोग सुख पाने के बाद उसे इतना तो यकीन था कि वह दुनिया के किसी भी औरत के साथ संभोग कर ले लेकिन जो मजा उसे उसकी मां के साथ संभोग करने में आता था वैसा मजा किसी और औरत के साथ कभी नहीं मिला। और वैसे भी उसकी नजरों में उसकी ही नजरों में क्या निर्मला को जानने वाला हर कोई व्यक्ति की नजर में निर्मला बेहद खूबसूरत और हसीन औरत थी क्योंकि इस उम्र में भी उसके बदन की बनावट और अंगों का ढांचा एकदम जवान और कसा हुआ था जितना कसा हुआ बदन उसका वस्त्रों में लगता था उससे भी कहीं ज्यादा चुस्त उसका बदन नग्न अवस्था में लगता है और उन्हीं कसाव भरे अंगो के साथ खेल खेल कर शुभम जवान मर्द हो चुका था।
अगले ही पल सुभम किचन के बाहर खड़े होकर दीवार से अपना कंधा टेक कर अंदर के नजारे को देख रहा था। किचन के अंदर का नजारा पूरी तरह से कामुकता से भरा हुआ था...। उसकी मां रोटियां बेल रही थी... गर्मी का असर कुछ ज्यादा ही था जिसकी वजह से वह अपनी साड़ी को उतार कर हैंगर में टांग दी थी और इस समय उसके बदन पर मात्र ब्लाउज और पेटीकोट ही था ब्लाउज भी ऐसा की पीछे की उसकी चिकनी पीठ पूरी तरह से नंगी नजर आ रही थी बस उसके ऊपर पतली सी डोरी बनी हुई थी जिससे उसके पूरे ब्लाउज का हिस्सा टिका हुआ था और उस पतली सी रस्सी के वजह से ही निर्मला की मदमस्त दोनों जवानियां छलकने से बची हुई थी अगर जरा सी भी डोरी ढीली हो जाए तो देखते ही देखते निर्मला की दोनों जवानियां किसी भरे हुए पेमाने की तरह छलक जाए... निर्मला ने अपनी पेटीकोट को थोड़ा सा ऊपर की तरफ उठाकर उसे कमर पर खुश रखी थी जिससे नीचे से उसकी दोनों चिकनी मोटी टांगे पिंडलियों से नंगी थी उसकी मजबूत गोरी गोरी पिंडलियों देखकर शुभम का दिल बहक रहा था।
शुभम के पैंट में तंबू बना हुआ था दिल तो कर रहा था कि अभी किचन में घुस जाए और पेटीकोट उठाकर खड़े लंड को उसकी बुर में पेल कर चुदाई करना शुरू कर दें लेकिन उसकी आंखों के सामने जो अद्भुत और किसी चित्रकार की चित्रकारी की तरह नजर आने वाले दृश्य से वह अपना मन बहला रहा था। इसलिए वह वही खड़े होकर कुछ देर तक अपनी मां की मदमस्त जवानी का रसपान अपनी आंखों से कर रहा था
निर्मला रोटी बेलने के लिए जैसे जैसे अपने हाथों को आगे पीछे करके बैलेंस घुमा रही थी उसकी वजह से उसके बदन में एक अद्भुत तरंग नुमा लहर पैदा हो रही थी जिसकी वजह से उसके कमर के नीचे वाले भाग में उसकी मदमस्त नितंबों में एक अजीब सी थीरकन हो रही थी मानो की किसी बड़े बड़े दो गुब्बारों में पानी भरकर उसे हिलाया जा रहा हो। निर्मला की गांड की धड़कन शुभम के दिन पर छुरियां चला रही थी।
अपनी मां के भजन की पीछे की खूबसूरती को देखकर शुभम अपने आपसे ही बातें करते हुए बोला इसलिए कहता हूं कि मेरी मां से खूबसूरत इस दुनिया में कोई दूसरी औरत नहीं है भले ही मेरा मन इधर उधर की औरतों में भटक जाए लेकिन आखिरकार जो सुकून मुझे अपनी मां के साथ मिलता है वैसा सुकून मुझे किसी औरत के साथ नहीं मिलता।
अपनी मां के मदमस्त बदन को देखकर शुभम पैंट के ऊपर से अपने लंड को सहला ना शुरू कर दिया जो कि पैंट में तंबू बनाए हुए था । निर्मला इन सबसे बेखबर रोटियां बनाने में व्यस्त थे उसे तो इसका आभास तक नहीं हुआ था कि उसके पीछे उसका बेटा खड़े होकर उसके मदमस्त यौवन का रसपान अपनी आंखों से कर रहा है। निर्मला इस समय पीछे से एक अद्भुत मुरत की तरह लग रही थी। जैसे कि खजुराहो की कलाकृति हो वैसे भी निर्मला का पिछवाड़ा कुछ ज्यादा ही आकर्षक था और पेटीकोट कशी होने के नाते उसका हर एक काटा उसका हर एक उपांग साफ साफ नजर आ रहा था शुभम तो यह देखकर एकदम उत्तेजित हो गया था उससे रहा नहीं जा रहा था पहले से ही सरला और उसकी बहू ने जिस तरह से उसके तन बदन में उत्तेजना की आग लगाई थी उसे बुझाना बहुत जरूरी था।
अपनी मां की मदमस्त भराव दार जवानी को देखकर शुभम के लिए अपने आप पर काबू पाना अब मुमकिन नहीं था इसलिए वह किचन में घुस गया और पीछे से जाकर अपनी मां को अपनी बाहों में भर लिया यू एकाएक अपने आप को किसी के बाहों में भरा हुआ देखकर वह एकदम से चौंक गई हालांकि उसे मालूम था कि ऐसी हरकत शुभम के सिवा कोई नहीं कर सकता लेकिन फिर भी वो डर गई थी। और ऊपर से तुरंत वह अपनी गांड के बीचोबीच ठोस अंग की चुभन महसूस करने लगी लेकिन शुभम कुछ बोल पाता इससे पहले ही उसे इस बात का एहसास हो गया कि उसे इस तरह से पीछे से अपनी बाहों में भरने वाला उसका बेटा नहीं है तो वह मन ही मन मुस्कुराने लगी।
शुभम उत्तेजना बस अपनी दोनों हथेली में अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को ब्लाउज के ऊपर से पकड़कर दबाते हुए बोला।
वह मम्मी तुम ब्लाउज और पेटीकोट में कितनी खूबसूरत और सेक्सी लग रही हो और वैसे सच कहूं तो अगर तुम इसे उतारकर नंगी होकर खाना बनाती तो अभी कोई हर्ज नहीं था वैसे भी घर में मेरे और तुम्हारे सिवा कोई नहीं है।
धत कैसी बातें कर रहा है मैं नंगी होकर खाना नहीं बनाती। (निर्मला उसी तरह से तवे पर रोटियां सेकते हुए बोली।)
तुम सिर्फ नंगी होकर चुदवाती हो खाना नहीं बना सकती। (शुभम अपनी कमर को अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर दबाते हुए और धीरे-धीरे ब्लाउज के बटन खोलते हुए बोला।)
तुझे क्या हो गया है शुभम जरा भी सब्र नहीं होता।
सब्र कैसे होगा मेरी रानी जब मेरी आंखों के सामने एक बेहद खूबसूरत औरत केवल ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी होकर अपनी बड़ी बड़ी गांड ( एक हाथ नीचे की तरफ ले जाकर पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी मां की गांड दबाते हुए) खिलाते हुए खाना बना रही हो तो बना मेरे जैसा लड़का बेसब्र क्यों ना हो।
चल अच्छा बातें मत बना और अपना यह (एक हाथ पीछे की तरफ ले जाकर पैंट के ऊपर से ही अपने बेटे के खड़े लंड़ को पकड़ते हुए) इसे पीछे कर मेरी गांड में चुभ रहा है।
अच्छा गांड में चुभ रहा है और जब अपनी बुर में लेती हो तब नहीं चुभता।
तब तो बहुत मजा आता है। (तवे पर फूल रही रोटी को हाथ से गोल-गोल घुमाते हुए बोली।)
देख रही हो मम्मी जैसे तवे पर गर्म होकर रोटी फूलती है वैसे ही तुम जब गर्म होती हो तो तुम्हारी भूल भूल जाती है ऐसा लगता है कि जैसे गरम गरम रोटी हो।
बातें बहुत बनाने आता है तुझे अगर तुझे मेरी बुर भी गरम गरम रोटी लगती है तो खा जाया कर।
सच कहूं तो तुम्हारी बुर को खा जाने का बहुत मन करता है लेकिन उस में लंड डालने का भी बहुत मन करता है अगर उसे खा जाऊंगा तो लंड किस में डालूंगा।
(शुभम की ऐसी गंदी गंदी बातें सुनकर निर्मला को मज़ा आ रहा था और वह अपने बेटे की इस बात पर हंसते हुए बोली।)
चल अब तो बहुत बड़ा हो गया है और इस तरह की गंदी गंदी बातें करने लगा है अब तो मुझे खाना बना दे दे वरना रात को खाने के लिए कुछ नहीं रहेगा।
चलेगा मम्मी खाने के लिए कुछ नहीं रहेगा तो पेलने के लिए तुम्हारी ( पेटीकोट के ऊपर से ही अपनी मां की बुर दबाते हुए )यह तो है ना इसी से पेट भर लूंगा....
आहहहहहहहह..... क्या कर रहा है।(शुभम के द्वारा इस तरह से बुर दबाने की वजह से निर्मला के मुंह से सिसकारी की आवाज छूट गई हालांकि उसकी हरकतों की वजह से निर्मला भी काफी गर्म हो चुकी थी।)
वही कर रहा हूं जो एक खूबसूरत औरत के साथ करना चाहिए।
आज बहुत ज्यादा उतावला हो गया है तू खाना तो बना लेने दे।
नहीं मुझसे रहा नहीं जा रहा है।(शुभम काफी उत्तेजित हो गया था और बातों ही बातों में उसने अपनी मां की ब्लाउज के सारे बटन खोल दिए थे और राहत वाली बात यह थी कि आज निर्मला ने ब्लाउज के अंदर अपनी ब्रा नहीं पहनी थी पसीने की वजह से वह काफी चिपचिपी हो गई थी जिसे पकड़ कर दबाने में शुभम को काफी आनंद की अनुभूति हो रही थी।शुभम अपनी मां की गर्दन को चुमते हुए जोर-जोर से चूची को दबाना शुरू कर दिया जिसका असर निर्मला के बदन पर भी काफी हद तक मादकता का एहसास दिला रहा था।
ससससज्हहहहहहह आहहहहहहहह.... शुभम यह क्या कर रहा है कुछ तो सब्र कर मुझे खाना बना लेने दे।(निर्मला ऊपरी मन से अपनी बेटी को रुकने के लिए कह रही थी...जबकि अंदर से वह यही चाहती थी कि उसका बेटा बिना रुके अपना काम करते रहें क्योंकि शुभम की हरकतों ने उसकी लहसुन में भी आग लगाना शुरू कर दिया था जिसमें से मधुर रस बह रहा था।)
तुम खाना बनाती रहो मम्मी तुम्हें रोका किसने है मुझे अपना काम करने दो और इतना कहते हुए शुभम दोनों हाथों से अपनी मां की पेटीकोट पकड़कर ऊपर की तरफ उठाने लगा और अगले ही पल वो अपनी मां की पेटीकोट को कमर तक उठा दिया था।.....अपनी मां की नंगी गोरी गोरी बड़ी गांड देखते ही उसकी आंखों में चमक आ गई उसे इस बात की खुशी थी कि आज उसकी मां ने पेंटी नहीं पहनी हुई थी इसलिए वह अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर चपत लगाते हुए बोला।
वाह मम्मी आज तो ऐसा लग रहा है कि तुम पहले से ही तैयारी करके रखी हो तभी तो देखो आज तुमने चड्डी भी नहीं पहनी हो अपनी गांड एकदम नंगी रखी हो शायद मेरे लिए ही।
ऐसा कुछ नहीं है आज गर्मी ज्यादा थी इसलिए मैं ना तो ब्रा पहनी हूं और ना ही चड्डी समझ गया ना तू (निर्मला जानबूझकर इतराते हुए बोली।)
कुछ भी हो मुझे तो खजाना मिल गया है।
खजाना तभी हाथ लगता है जब पहरेदार की रजामंदी हो मेरी रजामंदी है इसलिए तू खजाने तक आराम से पहुंच जाता है। (इतना कहते हुए निर्मला तवे पर फूली हुई रोटी को उठाकर बर्तन में रखने लगी तब तक शुभम अपनी पेंट घुटनों तक सरकार कर अपने मोटी खड़े लंड को हाथ में लेकर ही लाना शुरू कर दिया था जो कि इस समय काफी तगड़ा और कठोर नजर आ रहा था।निर्मला को भी इस बात का एहसास हो गया था कि अब सुभम क्या करने वाला है इसलिए वह पीछे नजर करके अपने बेटे के खड़े लंड को देखने लगी जिस पर नजर पड़ते ही उत्तेजना के मारे उसकी बुर कचोरी की तरह फूलने पीचकने लगी। शुभम एक हाथ में अपने लंड को पकड़ कर अपने लिए जगह बना रहा था जिसका साथ देते हुए निर्मला हल्के से नीचे की तरफ झुकी और अपनी गांड को ऊपर उठा दी जिससे उसकी बुर की गुलाबी छेद शुभम की आंखों के सामने साफ-साफ नजर आने लगी।
शुभम को अपनी मंजिल साफ नजर आने लगी बस अपनी गाड़ी को आगे बढ़ाना था और बा अपने लंड को एक हाथ में पकड़ कर उसके गर्म सुपाड़े को अपनी मां की बुर की गुलाबी छेद पर रख दिया जिससे निर्मला के बदन में आग लग गई वह सिहर उठी उसकी गुलाबी बुर भी जैसे लंड को अंदर लेने के लिए मचल रही हो इस तरह से सिकुड़ रही थी।
देखते ही देखते शुभम धीरे-धीरे करके अपने लंड को अपनी मां की बुर की गहराई में उतार दिया।
कुछ ही सेकंड में शुभम का मोटा तगड़ा लैंड निर्मला की गुलाबी पुर की गहराई में खो गया और शुभम की जांग निर्मला की जांघों से सट गई शुभम ने अपनी लंड को पूरी तरह से अपनी मां की बुर में उतार दिया था और दोनों का बदन आपस में इतना सड़ गया था कि दोनों के बीच से हवा भी गुजर नहीं रही थी।
यही पोजीशन इसी अवस्था में रोहन को चुदाई करना बेहद पसंद था वह अपने दोनों हाथों से अपनी मां की कमर को थामकर हल्के हल्के धक्के लगाने लगा और निर्मला भी अपने बदन की गर्मी दिखाते हुए अपने बेटे के हर धक्के के साथ गर्म सिसकारी छोड़ रही थी। एक बार फिर से सारे जग से अनजान मां बेटे दोनों अपने रिश्तो की मर्यादा भूल कर एक दूसरे में समाने के भरपूर प्रयास में लगे हुए थे शुभम हल्के धक्कों से शुरू करते हुए धक्कों की रफ़्तार बढ़ाने लगा। रसोई घर में जहां निर्मला खाना बना रही थी अब वहां चुदाई का खेल शुरू हो गया था। एक अद्भुत नजारा रसोई घर में नजर आ रहा था निर्मला किचन के फ्लोर पर झुकी हुई थी और शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठाए हुए उसकी रसीली बुर में लंड पेल रहा था और साथ ही एक हाथ आगे बढ़ा कर उसके बड़े बड़े दूध को दबा रहा था निर्मला मस्त हुए जा रहे थे उसके मुंह से सिसकारी की आवाज लगातार पूरे रसोईघर में गूंज रही थी हालांकि इस मादक भरी सिसकारी को सुनने वाला शुभम के सिवा वहां कोई नहीं था और यही तो दोनों चाहते ही थे कि घर में केवल उन्हीं दो रहे ताकि वह जब चाहे तब चुदाई का सुख भोग सकें।
अशोक अपने काम में व्यस्त था और उसके पीठ पीछे उसका ही बेटा उसकी बीवी को चोद कर मस्त कर रहा था। शुभम के कमर की रफ्तार बढ़ने लगी वह तेज झटकों के साथ अपनी मां की चुदाई कर रहा था और उसके हर धक्के के साथ निर्मला की बड़ी बड़ी गांड पानी से भरे हुए गुब्बारे की तरह लहर जा रही थी। दोनों की सांसो की गति तेज चल रही थी। शुभम अपनी मां की बुर में लंड डालते हुए एक हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की एक टांग को घुटनों से पकड़ कर ऊपर उठाते हुए बोला।
वैसे मम्मी आज तुम बना कर रही हो।
कद्दू की सब्जी। (शुभम के तेज धक्कों की वजह से निर्मला के मुख से हर एक शब्द सीहरते हुए निकले।)
कद्दू की सब्जी मम्मी तुम जानती हो कि मुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी नहीं पसंद है।
मैं अच्छी तरह जानती हूं बेटा लेकिन तू ही तो कह रहा था कि पहले खाने को कुछ ना हो चोदने के लिए बुर तो मिलेगी ना तु इसी से पेट भर लेना। .....
चलेगा मम्मी मैं तो कह रहा हूं कि खाने को भले कुछ ना हो बस चोदने के लिए बुर चाहिए। चोद कर ही पेट भर जाता है ।(इतना कहते हुए और जोर जोर से धक्के लगाने लगा कद्दू की सब्जी का नाम सुनकर शुभम को सरला चाची की बात याद आ गई क्योंकि वह झूठ बोला था कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है वह किसी बहाने से सरला के घर में प्रवेश करना चाहता था। जबकि उसे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी।)
मेरे बेटे पर चिंता मत कर तेरे लिए मैंने सूजी का हलवा बनाकर रखी हूं। तू मेरा इतना ख्याल रखता है तो इतना तो मैं तेरा ख्याल रख ही सकती हूं।
(शुभम जिस टांग को पकड़ कर थोड़ा सा उठाए हुआ था निर्मला उसी काम को थोड़ा सा और उठाकर उसे किचन पर रख दी ताकि और ज्यादा आराम से शुभंकर लंड उसकी बुर में अंदर बाहर हो सके।)
क्या बात कर रही है मम्मी तुम सच कह रही हो आज तो मजा आ जाएगा। (शुभम को इस तरह से खुश होता देखकर वह भी मुस्कुराने लगी और खुशी और उत्तेजना का मिलाजुला असर शुभम के धक्के पर पड़ने लगा वह जोर जोर से धक्के लगाते हुए अपनी मां को चोदने लगा। निर्मला अपने बेटे के हर धक्के का मजा लेते हुए जोर जोर से सिसकारी की आवाज निकाल रही थी। और देखते ही देखते दोनों एक साथ झड़ गए। शुभम झड़ने के साथ ही अपनी मां के ऊपर एक दम से पसर गया। कुछ देर तक निर्मला भी उसी तरह से झुकी रही।
जब थोड़ी देर बाद निर्मला की सांसे शांत हुई तो वह शुभम को पीछे की तरफ धक्का देते हुए बोली।
अब हटे गा भी कि ऐसे ही मेरे ऊपर पड़े रहेगा चल हट मुझे खाना बनाने दे बहुत देर हो गई है।
(शुभम अपनी मां के ऊपर से हटा और पेंट पहनने लगा निर्मला भी अपनी पेटीकोट को व्यवस्थित करके ब्लाउज के बटन लगाने लगी। इसी तरह से एकाएक हुई चुदाई में निर्मला को काफी मजा आता था इसलिए उसके चेहरे पर संतुष्टि भरा एहसास साफ नजर आ रहा था वह वापस खाना बनाने लगी और शुभम अपने कमरे में चला गया।
रात को अपने बिस्तर पर सरला शुभम की कही बातें याद कर करके करवट बदल रही थी यह उसके साथ पहली बार हुआ था कि कोई जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था जिससे वह गदगद हुए जा रही थी। कुछ घंटों पहले वह शुभम के ऊपर एकदम शक कर दी थी कि वह खुद अपनी मां को चोदता है और इस बात को लेकर हुआ है उसे से काफी नाराज भी थी लेकिन आज बाजार में जिस तरह से उसने थैला उठाकर उसकी मदद किया था और बातों ही बातों में उसकी खूबसूरती उसके बदन की तारीफ किया था उसे सुनकर सरला के तो जैसे होश उड़ गए थे वह सपनों की दुनिया में खोने लगी थी उसे यकीन नहीं हो रहा था कि शुभम जैसा जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा है। वह बार-बार बिस्तर पर करवट बदल रही थी सरला को अपनी टांगों के बीच हलचल सी महसूस होने लगी और इसी तरह की हलचल उसे उस दिन महसूस हुई थी जब वह निर्मला के घर पर शीशे की दीवार से अंदर का दृश्य देखी थी जहां पर खड़ी होकर निर्मला एकदम नग्न अवस्था में अपनी बुर के साथ खेल रही थी उस दृश्य को याद करके सरला का इमान भी गड़बड़ाने लगा।
उसके मन में तुरंत यह ख्याल आया कि निर्मला की उम्र में और उसकी उम्र में कुछ ज्यादा फर्क नहीं था केवल तीन चार साल का ही फर्क था । हां थोड़ा यह बात था कि वह निर्मला से शरीर में कुछ ज्यादा भारी थी और वह भी ज्यादा नहीं बल्कि बदन का हर हिस्सा कसा हुआ ही था और वह यह भी बात जानती थी कि निर्मला उससे ज्यादा ही खूबसूरत है लेकिन वह भी किसी से कम नहीं थी इसलिए वह अपने बदन की तुलना निर्मला के बदन से करने हेतु बिस्तर पर से होती और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई वह इधर-उधर घूमकर आईने में अपने अक्स को देखने लगी। उसे अपने बदन पर अपने चेहरे पर उम्र का प्रभाव ज्यादा नहीं लग रहा था उसका चेहरा गोल मटोल एकदम गोरा हॉट एकदम लाल-लाल थे और हर तरह से आकर्षक चेहरा था रही बात बाकी के इसे की तो वह अपने कंधे पर से साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा कर अपनी छातियों को देखने लगी जो कि ब्लाउज के अंदर काफी आकर्षक लग रहे थे और ऊपर का एक बटन खुला होने की वजह से दोनों के बीच की लकीर किसी नहर की तरह नजर आ रही थी।उससे अभी भी रहा नहीं किया तो वह आईने में देखते हुए अपने हाथों से अपने ब्लाउज के बटन खोल कर अपने दोनों चुचियों को आजाद कर दी वह ब्रा नहीं पहनती थी जिसकी वजह से उसकी चुचियों में हल्का सा लटक पना गया था जिसे वो खुद अपने हाथों से ऊपर की तरफ उठाते हुए बोली की
यह मेरी ही गलती है अगर मैं हमेशा ब्रा पहनती तो आज भी मेरी चूचियां एकदम टाइट रहती। वह मन में निश्चय कर ली कि आगे से वह हमेशा ब्रा पहनेगी।
वह अपनी नजर नीचे की तरफ ले गई तो उसे अपने पेट को देखकर अपने आप ही इस बात का ख्याल आ गया कि अगर थोड़ा सा मेहनत की होती तो उसका पेट और आकर्षक लगता जो कि उस दिन चिकना दूधिया रंग का था। वह अपने हाथों से अपने पेट को सहलाने लगी।
सरना अपने पेट को चलाते हुए आईने में अपने आप को देख रही थी जो कि सांस लेने की वजह से उसकी भारी-भरकम चूचियां ऊपर नीचे हो रही थी जिसे देखकर उसके मन में कुछ-कुछ हो रहा था और उससे रहा नहीं गया और वह अपने एक हाथ से अपनी चूची पकड़ कर दबाना शुरू कर दी यह शुभम की कही बातों का ही असर था कि आज वह इस कदर अपने आपको आईने में अर्धनग्न अवस्था में देख रही थी। सरला को अपनी ही हरकत पर मजा आ रहा था उसे अपने मन में यह सवाल उठ रहा था कि जरूर उसके बदन में कुछ बात होगी तभी तो शुभम जैसा जवान लड़का उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहा था। इसलिए अपने आप को जांचने के उद्देश्य से वह कमर से पति अपनी साड़ी को खोलकर नीचे फर्श पर गिरा दी अब हुआ आईने के सामने केवल पेटीकोट में खड़ी थी जिसकी डोरी उसकी नाजुक नाजुक उंगलियों में थी और उसे खींचकर अगले ही पल पेटीकोट को भी नीचे गिरा दी।
आईने में अपने आप को एकदम नंगी देखकर वह शरमा गई पहली बार वह अपने आप को नंगी देख रही थी और वह भी खुद ही अपने हाथों से ही अपने आप को नंगी की थी।
अपने पति के देहांत के बाद वह अपने आप को कभी भी नग्न अवस्था में नहीं देखी थी वह नहाती भी थी तो कपड़े पहने हुए ही होते थे लेकिन आज पहली बार वह आईने के सामने अपने आप को पूरी तरह से निर्वस्त्र करके आईने के सामने नंगी खड़ी थी।
वह आदम कद आईने में अपने आप को देख रही थी उसके बदन की बनावट और खूबसूरती देखकर उसे पहली बार ऐसा लग रहा था कि वह भी किसी से कम नहीं है। वह ना चाहते हुए भी अपने दोनों हाथों से अपनी बड़ी-बड़ी चुचियों को पकड़ कर दबाने लगी उसे निर्मला की हरकत याद आ रही थी और उसकी हरकत को याद करके आईने में अपनी टांगों के बीच के उस पतली दरार की तरफ नजर घुमाई तो वहां पर उसे ढेर सारा झांटों का झुरमुट देखने को मिला। उसे देखकर वह एक हाथ नीचे की तरफ ले गई और अपने झांटो के रेशमी बालों में उंगली फिराते हुए मन ही मन बोली की बालों वाली ही उसके पति को पसंद थी इसलिए वह जल्दी साफ नहीं करती थी।
अपने बुर के बाल में उंगली घुमाते हुए उसे इस बात का एहसास हो गया कि उसकी बुर पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जिस की बूंदे उसकी उंगली को भिगो रही थी। वह मस्त होने लगी और निर्मला वाला दृश्य याद करके वह अपने आप ही अपनी बुर को मसल ना शुरू कर दी जैसे कि निर्मला कर रही थी और देखते ही देखते वह शुभम की बातों के असर में और निर्मला की हरकत की वजह से अपनी बुर के अंदर अपनी एक उंगली डालकर उसे अंदर बाहर करने लगी जिसमें उसे मजा आने लगा बरसों से सूखी पड़ी बुर में सावन भादो बरसने लगा। सूखी पड़ी बंजर जमीन में पानी की बौछार पड़ने लगी उसका बदन करेगा तो हमें लगा थोड़ी ही देर में उसकी सांसों की गति तेज होने लगी अपनी बुर को उंगली से ही चोदने में उसे मजा आने लगा हालांकि इस तरह की हरकत उसने अभी तक बिल्कुल भी नहीं की थी। लेकिन आज वह मजबूर थी एक छोकरे ने उसे अपनी जवानी के दिन याद दिला दिए थे।
उत्तेजना बस और बदन में आनंद की लहर उठता हुआ देखकर उसकी उंगली रोक नहीं रही थी और वह जोर-जोर से अपनी एक उंगली को बुर में डालकर अंदर बाहर कर रही थी उसे मज़ा आने लगा था आईने में अपने आप को देख कर वह मस्त हुए जा रही थी वह हल्के से अपनी दोनों काम को थोड़ा सा और फैला दी जिससे उंगली डालने में उसे आसानी हो।
आज पहली बार बार इस तरह से बहक गई थी और जोर जोर से अपनी बुर में उंगली पर रही थी थोड़ी ही देर में उसकी बुर से भलभलख कर नमकीन रस बहने लगा।
वह आनंद के सागर में गोते लगा रही थी उसे मजा आ गया था और वह अपने ऊपर दी सांसों को व्यवस्थित करने के लिए बिस्तर पर आकर बैठ गई।
थोड़ी ही देर में उसे ऐसा महसूस होने लगा कि तूफान गुजर चुका है वह काफी शांत हो चुकी थी लेकिन एक अद्भुत अहसास से गुजर चुकी थी जिसका एहसास उसके चेहरे पर संतुष्टि का प्रभाव छोड़ गया था वह मस्त हो चुकी थी।
वह नंगी ही बिस्तर पर लेट गई और कब उसकी आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला।
शुभम की नजर अब तीन औरतों पर थी एक तो थी उसकी शीतल मैडम जिसकी मदहोश जवानी को वह एकदम करीब से देख पाया था उसकी मदहोश कर देने वाली खुशबू हर पल उसके बारे में सोचने से ही मादकता का एहसास दिलाती थी वह किसी भी हाल में शीतल से संभोग सुख प्राप्त करना चाहता था हालांकि उसे मंजिल दूर लग रही थी लेकिन नामुमकिन नहीं।अच्छी तरह से जानता था कि एक ना एक दिन शीतल को अपनी बाहों में लेकर उसकी भरपूर चुदाई का सुख भोगेगा।
शीतल के साथ-साथ आप उसकी नजर उसकी पड़ोस की सरला चाची और उसकी बहू रुचि थी जिसे देखते ही उसके तन बदन में झंकार बजने लगे थे वह रुचि का केवल मुखड़ा ही देख पाया था और जाते समय उसके नितंबों का सीमित घेराव जिस पर नजर पड़ते ही उसे इस बात का आभास हो चुका था कि रुचि की मदहोश जवानी अभी तक पंखुड़ियों के भीतर ही छुपी हुई है वह पंख लेकर बाहर उड़ने के लिए तड़प रही है। और सरला चाची जिसकी परिपक्व जवानी का रस पीना चाहता था। उसके बड़े बड़े नितंबों को अपनी दोनों हथेली में भर कर उसे अपने लंड पर बिठाकर जवानी की शेर कराना चाहता था।अब उसके सामने सवाल ये था कि आप यह काम कैसे पूरा किया जाए और उसे उम्मीद थी कि वह अपनी मंजिल को जरूर प्राप्त कर लेगा क्योंकि अभी तक उसकी जिंदगी में सब कुछ अच्छा ही होता आ रहा था जो शुरुआत उसने अपनी मां के साथ संभोग करके शुरू किया था उस कारवा में अब तक उसकी तीनों मामी और बड़ी मामी की खूबसूरत लड़की के साथ साथ खुद उसकी बुआ जुड़ी हुई थी। और जब से उसकी मुलाकात सर लाचारी और उसकी बाहों से हुई थी तब से उसे लगने लगा था कि उसके कारवां में शीतल सरला और रुचि के भी जुड़ने की उम्मीद हो गई है। अब वह इसी ताक झांक में हमेशा लगा हुआ था।
आए दिन वह हमेशा जब भी चलना चाची को देखता था तो किसी ना किसी बहाने उनसे मुलाकात कर लेता था और आए दिन उनके छोटे-मोटे काम भी कर दिया करता था।अब तो ऐसा लगने लगा था कि सरला चाची जैसे खुद उत्सुक थी उससे अपना काम कराने के लिए क्योंकि जिस तरह का अनुभव शुभम के द्वारा उसे महसूस हुआ था उम्र गुजर गई थी उस तरह का अनुभव उसे कभी नहीं हुआ था शुभम की कही बातों की वजह से वह बरसों के बाद अपनी सूखी पड़ी बुर में नमी महसूस कर पाई थी उसे भी यह सब अच्छा लगने लगा था तभी तो वह दूसरे दिन से ही ब्रा और पैंटी पहनना शुरू कर दी थी और अब तो वह अपना कुछ ज्यादा ही ध्यान देती थी पहले वह साधारण रूप से तैयार होती थी लेकिन अब थोड़ा सा बदलाव लाई थी। और थोड़ा सा बदलाव लाने के बाद वह और ज्यादा सुंदर लगने लगी थी यह सब देख कर उसकी बहू खुद टोकते हुए बोलती थी कि।
वाह मम्मी अब तो तुम बहुत खूबसूरत लगने लगी हो क्या बात है।...
वह अपनी बाहों की बात सुनकर हंस देती थी और इतना कहती थी कि क्या मैं सजने सवरने लायक नहीं हूं क्या तो जवाब नहीं उसकी बहू यह कहकर उसका हौसला बढ़ा दी थी कि
क्यों नहीं मम्मी आप तो बहुत खूबसूरत लगती हो आजकल तो कितनी उम्र होने के बाद भी औरतें सजना सवरना नहीं छोड़ती लेकिन अभी तो आप मेरी बड़ी बहन जैसी लगती हो मैं भी यही चाहती थी कि आप सज संवर कर अच्छी तरह से रहे।
अपनी बहू की बातें सुनकर वह जवाब में मुस्कुरा देती थी।
उसकी जिंदगी में यह बदलाव शुभम के द्वारा आया था लेकिन फिर भी वह निर्मला के घर पर ताक झाक बनाए हुए थी। कोई और बात होती तो वह कब से भूल जाती लेकिन उसकी संका मां बेटे के बीच में अनैतिक संबंध को लेकर था इसलिए ना चाहते हुए भी उसके मन की उत्सुकता उसे बार बार उन दोनों पर नजर रखने को उकसा रही थी और वह लगातार उन पर नजर बनाए हुए थी इस बात से वाकिफ निर्मला अब कदम कदम पर बचकर चलती थी उसे इस बात का डर बराबर बना हुआ था कि कहीं उसके और उसके बेटे के बीच के संबंध के बारे में सरला को कुछ पता ना चल जाए।
दूसरी तरफ शीतल जो कि अपनी गलती के कारण अब हाथ मलने के सिवा उसके पास कोई दूसरा रास्ता ना होता देखकर वह बार-बार निर्मला से माफी मांगने की कोशिश कर रही थी लेकिन निर्मला थी कि उसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं दे रही थी। आखिरकार निर्मला भी एक औरत थी और एक औरत होने के नाते वा चित्र से जानती थी कि मर्दों का झुकाव हमेशा औरतों की तरफ बढ़ता ही रहता है भले ही उनकी झोली में दुनिया की सबसे हसीन औरत ही क्यों ना हो। इसलिए वह यही चाहती थी कि शीतल से वह और उसका बेटा जितना दूर रहेंगे उतना खुश रहेंगे और उतना ही निर्मला खुद निश्चिंत रहेगी। इसलिए शीतल के लाख कोशिश के बावजूद भी वह निर्मला से ना तो बात ही कर पा रही थी और ना ही उससे माफी मांग पा रही थी वह अंदर ही अंदर घुट रही थी।
हालांकि जब भी उसकी आंखों के सामने शुभम नजर आता था उसके अंदर के सारे दुख दर्द गायब हो जाते थे उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगती थी और यही हाल शुभम का भी था जब भी वह शीतल को देखता तो उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगती थी वह शीतल के मजबूत बदन को अपनी बाहों में भर कर उन्हें प्यार करने के लिए मचलने लगता था लेकिन अपनी मां की उपस्थिति में वह केवल नजरों से ही शीतल के सुंदरता का रसपान कर पा रहा था।
ऐसे ही एक दिन सीढ़ियों से उतरते समय शीतल की मुलाकात शुभम से हो गई और उसका दिल फिर से जोरो से धड़कने लगा क्योंकि उस समय सीढ़ियों पर दूसरा कोई नहीं था क्योंकि क्लास चालू था और किसी काम की वजह से शीतल ऊपर की तरफ जा रही थी और शुभम नीचे आ रहा था और दोनों की मुलाकात सीढ़ीयो के बीच हो गई दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराने लगे ....
Sheetal or Shubham sidhiyo par kuch is tarah se
क्या शुभम तू तो अब मुझ पर ध्यान ही नहीं देता क्या मैं तुझे खराब लगने लगी हूं या ....(इतना कहने के साथ है उसके चेहरे पर उदासी की लकीर साफ नजर आने लगी)
नहीं नहीं मैडम ऐसी कोई भी बात नहीं है। (शुभम उसके ब्लाउज में से झांकते दोनों कबूतरों को देखते हुए बोला)
नहीं ऐसी ही बात है तभी तो तू मुझे मैडम कह रहा है वरना मैं तुझे कितनी बार कहीं हूं कि तुम मुझे अकेले में शीतल बोला कर।
देखो शीतल तुम भी अच्छी तरह से जानती हो कि अभी हालात कुछ ठीक नहीं है मम्मी ने जिस दिन से हम दोनों को उस अवस्था में देखी है तब से वह मुझसे और तुमसे दोनों से खफा है इसलिए अभी हम दोनों का मिलना और मुश्किलें बढ़ा सकता है।
मैं जानती हूं शुभम मेरी गलती की वजह से हम दोनों आज इतनी दूर है वरना हम दोनों का मिलन अब तक हो चुका होता (शीतल तिरछी नजरों से शुभम के पेंट में बन रहे तंबू को देखते हुए बोली और उस तंबू को देखकर उसकी बुर कुल बुलाने लगी)
देखो शीतल अपने आप को दोषी मत ठहराओ जो होना था हो गया....
लेकिन मैं तो तुमसे दूर हो गई ना पहले तो मैं तुमसे बात भी कर लेती थी लेकिन अब वह भी मुश्किल होता जा रहा है। (शीतल बात तो कर रही थी शुभम से लेकिन उसकी नजरों पर अपनी नजर गड़ाए हुए थे क्योंकि वह अच्छी तरह से जान रहे थे कि शुभम उससे बात करते समय उसकी चूचियों को घूर घूर कर देख रहा था जो कि इस समय ट्रांसपेरेंट साड़ी में से साफ साफ नजर आ रही थी और यह देखकर वह खुश भी हो रही थी।)
देखो शीतल सब कुछ ठीक हो जाएगा बस सब्र करो मुझे भी तुमसे मिले बिना चैन नहीं मिलता लेकिन क्या करूं मजबूर हूं। (काफी समय बाद शीतल को अपने इतने करीब पाकर शुभम काफी उत्तेजित होने लगा था शीतल के बदन से उठ रही माधव खुशबू का अहसास शुभम को उत्तेजना के सागर में लिए जा रहा था वह अपने आप पर कंट्रोल नहीं कर पा रहा था और इसीलिए इतना बोलते समय वह एक कदम आगे बढ़ाकर शीतल के और करीब आने की कोशिश करने लगा और शीतल भी उसके बढ़ाए कदम को देखकर अपने चारों तरफ नजर दौड़ाते ही तुरंत उसे अपनी बाहों में कस ली और बिना एक पल गांव आए ही अपने होठों को उसके होठों पर रखकर चूसना शुरू कर दी .. शीतल के मन में और उसके बदन में अजीब सी भावनाएं उठ रही थी कि एक शिक्षिका होने के बावजूद स्कूल के अंदर वह एकांत पाकर शुभम के सामने वह अपनी भावनाओं पर बिल्कुल भी काबू नहीं कर पाई थी और इसी के चलते वह उसे अपनी बाहों में लेकर लोक लाज शर्म सब कुछ त्याग कर उसके होठों का रसपान कर रही थी शीतल की इस कामुक हरकत की वजह से शुभम के तन बदन में आग लग गई थी और वह भी तुरंत शीतल के मजबूत खूबसूरत बदन को अपनी बाहों में करते हुए अपनी दोनों हथेलियों को पीठ पर से फीसलाते हुए नीचे की तरफ लेकर आया और तुरंतअपनी दोनों हथेलियों में जितना हो सकता था उतना साड़ी के ऊपर से ही सीतल की मत मस्त बड़ी बड़ी गांड को भर कर दबाना शुरू कर दिया रुई से भी नरम मुलायम गांड को अपनी हथेली भरकर दबाते हुए शुभम पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था और उसके पेंट में तुरंत तंबू बन गया था जो कि इस समय उसकी ठोकर शीतल को अपनी टांगों के बीच अपनी रसीली फूली हुई बुर के ऊपर बराबर हो रही थी जिसका अहसास होते ही उसकी बुर ने समर्पण की भावना के अधीन होकर अपनी बुर में से मधुर रस की दो बूंदे नीचे टपका दी जो कि उसके बदन की स्वीकृति थी।
करीब-करीब केवल दोनों के मिलन मैं अभी 1 मिनट भी नहीं हुआ था कि सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आहट सुनते ही दोनों फिर से अलग हो गए ना तो शीतल ही उसे अपनी बाहों से अलग करना चाहती थी और ना ही शुभम शीतल को अपने से जुदा करना चाहता था लेकिन मजबूरी थी दोनों अलग हो गए और अपने अपने रास्ते पर चलते बने लेकिन दोनों पीछे पलट कर एक दूसरे को देखने लगे जोकि शुभम तो काफी खुश नजर आ रहा था लेकिन इस बिछड़ने के पल की वेदना शीतल की आंखों में साफ नजर आ रही थी। वह भारी मन से अपने रास्ते चली गई और शुभम अपने रास्ते शुभम को इस बात से राहत थी कि मौका मिलते ही जब चाहे तब शीतल के खूबसूरत बदन कुआं भोग सकता था लेकिन खासा मेहनत उसे सरला चाची और उसकी बहू को पाने में करनी थी इस बात का अंदाजा उसे अच्छी तरह से था इसलिए वह अपने काम में जुटा हुआ था।
आए दिन वह छत पर टहलने के लिए चला जाया करता था जहां से सरला चाची की छत आपस में जुड़ी हुई थी और एक दूसरे की छत पर बिना अड़चन के आया जा सकता था । क्योंकि छत पर ढेर सारे कपड़े हमेशा सूखने के लिए तंगी रहते थे और वह चित्र से जानता था कि उन्हें लेने के लिए सरला चाची या उनकी बहू जरूर आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था।
वह रोज छत पर इसी तरह से टहलने के लिए चला जाया करता था कि उन दोनों का दीदार हो जाए और उनसे बातें करके कुछ रास्ता निकले लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा था एक दिन ऐसे ही वह छत पर टहल रहा था उसे उम्मीद थी कि आज सरला चाची जरूर कपड़े उतारने के लिए आएगी। वह ईसी ताक में इधर से उधर छत पर टहल रहा था। कि तभी उसे सरला चाची की बहू रुचि नजर आ गई जोकि आते ही कपड़े उतारने लगी रस्सी पर टंगे हुए सारे कपड़ों को एक-एक करके उतार कर संभाल कर रख रही थी मौका देख कर शुभम तुरंत रुचि के करीब गया। उसका कसा हुआ और सीमित पिछवाड़ा देखकर वह एकदम पागल हो गया था।
अब तक कई औरतों के संगत और उनसे संभोग के कारण वह काफी परिपक्व हो चुका था और खास करके औरतों के मामले में तो कुछ ज्यादा ही परित कहो गया था उनसे बात करने का ढंग से किया था उन्हें कैसे अपनी बातों के जादू में उलझाना है यह उसे अच्छी तरह से आने लगा था इसलिए वह रुचि के करीब पहुंचते ही बोला।
और भाभी क्या कर रही हो...
(यू एकाएक आवाज सुनते ही रुचि एकदम से डर गई और चौक ते हुए बोली।)
बाप रे तुम तो मुझे डरा ही दिया इस तरह से कोई बोलता है क्या।
मैं तो इसी तरह से बोलता हूं।
अरे मेरा मतलब है अपने आने का कुछ तो आहट देते मैं तो डर ही गई कि यह कौन सी बला टपक पड़ी। (रुचि रस्सी पर से कपड़ों को उतारते हुए बोली।)
अच्छा भाभी तो मैं आपके लिए बला हो गया। (शुभम रुचि के सामने तकरीबन 3 _ 4 की फीट की दूरी पर रस्सी पकड़कर खड़े होते हुए बोला)
इस तरह से आकर किसी को डर आओगे तो वह तुम्हें बला ही कहेगी।
अच्छा चलो कोई बात नहीं बला ही सही...(शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे को देख रहा था रुचि किसी हीरोइन से कम नहीं लगती थी पतली सी काया चर्बी ओ का नामोनिशान नहीं था चर्बी उतनी ही थी जितनी की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे ब्लाउज में कैद दोनों कबूतर अभी खा पीकर बड़े नहीं हुए थे लेकिन इतने बड़े तो हो ही गए थे कि हवा में उड़ सके जिन्हें देखकर शुभम को ऐसा लग रहा था कि जैसे भाभी ने हथेली में आ सके उतने साइज के संतरे अपनी ब्लाउज में कैद करके रखे हो. होठों की लालीमां बदन के लहू की तरह लग रही थी.. जिसे शुभम अपने होंठों में भर कर पीना चाहता था... कलाइयों में लाल रंग की चूड़ी बेहद खूबसूरत लग रही थी और उससे भी ज्यादा खूबसूरत चूड़ियों की खनक से उठ रही मधुर ध्वनि की थी जो कि उसके कानों में मादकता का एहसास दिला रही थी। शुभम रुचि की खूबसूरती के रसपान करने में इतना खो गया कि वह एकटक बस उसे ही देखे जा रहा था और रुचि सुभम की इस हरकत से शर्मा आ रही थी। इसलिए वह बोल दी।)
ऐसे क्या देख रहे हो?
(रुचि की बात सुनते ही शुभम हड़बड़ाते हुए बोला)
ककककक... कुछ नहीं बस यह देख रहा हूं कि मेरे बगल में इतनी खूबसूरत औरत है और मेरी नजर उस पर पड़ी ही नहीं। (शुभम अपनी बातों का जाल बुनता हुआ बोला। शुभम की ऐसी बातें सुनते ही रूचि एकदम से जीत गई वह रस्सी पर से कपड़े उतारते उतारते वैसे ही खड़ी रह गई उसे समझ में नहीं आया कि यह शुभम ने क्या कह दिया वह आश्चर्य से शुभम की तरफ देखने लगी तो शुभम अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला।)
क्यों क्या हुआ ऐसे क्यों देख रही हो मैं जो कुछ भी कह रहा हूं एकदम सच कह रहा हूं मेरी बातों में इतनी सी भी झूठा पर नहीं है एक एक शब्द शतप्रतिशत खरा है...
ऐसे मत कहो कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा...(रुचि अपने चारों तरफ नजर दौड़ आते हुए बोली जिसका मतलब एकदम साफ था कि शुभम की कही बातें उसे अच्छी लग रही थी..)
मुझे तुम पागल समझी हो क्या कि मैं किसी के सामने तुम से ऐसी बातें कहूंगा मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि घर में बहू की क्या मर्यादा होती है इसलिए मैं दुनिया की नजरो से बचकर तुमसे यह बात कह रहा हूं अगर मेरी बात से तुम्हें जरा भी दुख पहुंचा हो या बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहता हूं (शुभम जानबूझकर हाथ जोड़कर माफी मांगते हैं बोला।)
नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । देखो मुझे इस तरह की बातें पसंद नहीं अगर मम्मी जी आ गई और इस तरह की बातें करते हुए सुन ली तो क्या कहेंगी।
चलो कोई बात नहीं अगर तुम्हें इस तरह की बातें पसंद नहीं है तो मैं अब कभी नहीं कहूंगा लेकिन जो मैंने कहा वह बिल्कुल सच है तुम बहुत खूबसूरत हो।
(इस बार रुचि के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई और वह मंद मंद मुस्कुराने लगी उसकी मुस्कुराहट में भी एक अद्भुत आकर्षण था जिस के आकर्षण में शुभम पूरी तरह से बंधता चला जा रहा था। रुचि को हंसता हुआ देखकर शुभम तुरंत बोला ।)
तुम हंसती मतलब कि तुम्हें मेरी बात अच्छी लग रही है और वैसे भी कही हुई सच्ची बात हमेशा अच्छी ही लगती है यह बात तुम भी अच्छी तरह से जानती हो।
चलो सब बात छोड़ो तुम मुझे यह बताओ कि यहां क्या करने आए हो। (रुचि उसी तरह से अपने स्थान पर खड़े होकर बोल रही थी वह रस्सी से कपड़े उतारना भूल चुकी थी ऐसा लग रहा था कि उसे भी शुभम का यह साथ अच्छा लग रहा है इसलिए तो वह उसी तरह से खड़े होकर उससे बातें कर रही थी।)
कुछ नहीं बस ऐसे ही छत पर डाल रहा था थोड़ा व्यायाम कर रहा था। और तुमको देखा तो सोचा चलो अपनी भाभी से थोड़ी गपशप कर लिया जाए वैसे भी मैं पहली बार तुमसे मिल रहा हूं जबकि हम दोनों इतने पास में रहते हैं फिर भी।
अच्छा तो जनाब मुझसे मिलने आए हैं और तुम व्ययाम करते हो लगता तो बिल्कुल भी नहीं है कि तुम व्यायाम करते हो.. ( रुचि शुभम को ऊपर से नीचे की तरफ देखते हुए बोली।.... रुचि की बात सुनकर शुभम को यही सही मौका लगा अपना खूबसूरत और गठीला बदन दिखाने के लिए ... क्योंकि यह बात शुभम अच्छी तरह से जानता था कि औरतें हमेशा गठीले बदन को पसंद करती हैं उन्हें हट्टी कट्टी चौड़ी और मजबूत शरीर वाले मर्द पसंद होते हैं और वह उनके प्रति आकर्षित भी होती हैं। और शुभम को अपनी जवान मजबूत बदन पर भरोसा और विश्वास दोनों था वह अच्छी तरह से जानता था कि अगर वह किसी तरह से अपनी चौड़ी छाती खूबसूरत शरीर को वह रुचि को दिखा दे तो रुचि उसके प्रति आकर्षित हो जाएगी और रुचि कि कहीं बात का फायदा उठाते हुए बिना एक शब्द बोले वह तुरंत अपनी टीशर्ट को ऊपर की तरफ करते हुए बोला।)
तुम्हें विश्वास नहीं होता ना रुको रुको मैं बताता हूं कि मैं व्ययाम करता हूं कि नहीं...(शुभम को अपनी टीशर्ट निकालता हुआ देखकर वह उसे रोकते हुए बोली।)
अरे अरे अरे यह क्या कर रहा है अरे मत निकाल टीशर्ट कोई देखेगा तो क्या कहेगा ...(रुचि अपने चारों तरफ नजर दौड़ते हुए बोली।.. वह अपनी बात पूरी कर पाती इससे पहले ही फुर्ती दिखाते हुए शुभम अपनी टीशर्ट निकाल दिया और टीशर्ट निकालते ही वह दोनों हाथ फेरते हुए अपने बदन को रुचि को दिखाते हुए बोला..)
(रुचि अभी भी इधर उधर देख ले रही थी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि कोई यह देखकर कुछ भी कहे लेकिन चारों तरफ देखने के बाद वह जब सुभम की तरफ नजर दौड़ाई तो वह उसे देखते ही रह गई.... मजबूत शरीर आकर्षक चेहरा चौड़ी छाती चर्बी का नामोनिशान नहीं एकदम किसी हीरो की तरह उसका बदन एकदम फिट देखकर रूचि के तन बदन में एक अजीब सी हलचल होने लगी उसके मन के कोने के साथ-साथ उसकी टांगों के बीच भी झंकार बजने लगी जैसे मर्दे कि वह कल्पना करते आ रहे थे उस कल्पना को साक्षात रुप शुभम देता हुआ नजर आ रहा था वह उसे एकटक देखती ही रह गई । शुभम के लाजवाब और मजबूत शरीर को देखकर उसे अपना पति याद आ गया जिसके पतले शरीर की ओट में वह अपनी जवानी पिघला नहीं पा रही थी उसकी कमजोर भुजाओं में अपनी प्यास नहीं बुझा पा रही थी इस दौरान उसकी नजर उसके पैंट में बने हल्के से तंबू की तरफ गई जो कि हल्का सा उठा हुआ था जो इस बात को साबित कर रहा था कि शुभम रुचि के संदिग्ध में उत्तेजित हुआ जा रहा था रुचि शुभम के पेंट में बने हल्के से उठाव को देखकर उत्तेजित होने लगी उसकी टांगों के बीच पेंटी के अंदर हलचल होने लगी। वह शुभम की खूबसूरत बदन को देखती ही जा रही थी कभी चौड़ी छाती को देखती तो कभी पेंट में बने उभार को देखती रहती जोकि हल्का-हल्का ऊठ रहा था यह देख कर रुचि शर्म से लाल हो गई उसके गालों पर सूर्ख लालिमा छाने लगी।
दूर आसमान में सूरज ढल रहा था जिसकी पीली रोशनी छत पर बिक्री हुई थी और पीली रोशनी में रुचि का खूबसूरत बदन सोने की तरह चमक रहा था और साथ ही शुभम की नंगी छाती मर्दाना ताकत को उजागर कर रही थी रुचि तो शुभम को देखती रह गई उस पर से नजर हटाने का उसका मन नहीं हो रहा था वह उसी तरह से रस्सी पकड़े खड़ी होकर शुभम की जवानी भरे बदन को देख रही थी।
शुभम भी जानबूझकर उसी तरह से खड़ा था वह अच्छी तरह से जानता था कि रुचि की नजर उसके पैंट में बने उभार पर भी चली जा रही थी जिससे शुभम भी अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था और वह इस पल को जी लेना चाहता था इसलिए अपने बदन को ढकने की बिल्कुल भी दरकार नहीं ले रहा था रुचि ही इस तंद्रा को भंग करते हुए बोली।
बस बस शुभम टी शर्ट पहन ले मैं अच्छी तरह से समझ गई हूं कि तू बहुत कसरत करता है तभी तेरा बदन इतना गठीला हो गया है। (रुचि के मुंह से अपने बदन की तारीफ सुनकर शुभम पूरी तरह से गदगद हो गया हुआ अच्छी तरह से समझ गया कि थोड़ी सी और मेहनत करने पर रुचि उसके जाल में आ जाएगी। इसलिए वह खुद रस्सी पर से कपड़ों को उतारते हुए रुचि को दबाने लगा और रुचि भी शुभम की मदहोश जवानी के आकर्षण में आकर्षित होते हुए उसके हाथ से कपड़े ले रही थी।
भाभी तुम रोज शाम को इसी तरह से कपड़े उतारने आती हो।...
क्या कह रहा है तू तुझे जरा भी अंदाजा है।
(रुचि की बात सुनकर वह अपने कहे गए शब्दों पर ध्यान देता हुआ बोला।)
मुझे माफ करना मेरा मतलब वह नहीं था मैं कहना चाहता हूं कि तुम इसी तरह से रस्सी पर से सूखे हुए कपड़े उतारने आती हो।(शुभम रस्सी पर से रुचि की साड़ी को उतारते हुए बोला... और रूचि भी शुभम की हड़बड़ाहट देख कर मुस्कुराते हुए बोली।)
हां मेरा तो काम ही यही है मैं रोज इसी तरह से शाम को रस्सी पर से सूखे हुए कपड़े इकट्ठे करके वापस ले जाते हैं क्यों कोई काम है क्या।
नहीं काम तो नहीं है बस तुमसे मुलाकात होती रहेगी तो मुझे भी अच्छा लगेगा। (शुभम साड़ी को रुचि के हाथों में थमाते हुए बोला।)
लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगेगा तुम्हारी इस तरह की मुलाकात के बारे में अगर मम्मी जी को पता चल गया तो वह क्या समझेंगी।
अरे कुछ नहीं समझेंगी मैं सब संभाल लूंगा...(इतना कहते हुए शुभम रस्सी पर से रुचि की सूखी हुई पेटीकोट को उतारने लगा जो कि यह देखकर रुचि शर्मिंदा होने लगी लेकिन वह कुछ कह पाती इससे पहले ही वह रस्सी पर से पेटिकोट उतार कर रुचि को थमाने लगा लेकिन तभी पेटिकोट के नीचे रखी हुई जोकि रुचि ने खुद अपने हाथों से सूखने के लिए रखी थी वह पैंटी और ब्रा हाथ से छूट कर नीचे गिर गई। जिस पर नजर पड़ते ही रूचि एकदम से हड़बड़ा गई लेकिन वह कुछ कह पाती इससे पहले ही शुभम नीचे झुक कर उसे अपने हाथों में उठा लिया और अपने दोनों हाथ में उसे पकड़ कर रुचि को थमाने लगा जो कि रुचि तुरंत अपना हाथ आगे बढ़ाकर एक झटके से शुभम के हाथ में से अपनी ब्रा और पेंटी को खींचकर कपड़ों में छुपा ली और हंसते हुए वहां से चली गई... शुभम पूरी तरह से उसकी खूबसूरती के आकर्षण में जकड़ चुका था उसे इस बात का अंदाजा बिल्कुल भी नहीं था कि वह नीचे झुककर जिससे कपड़े को उठा रहा है वह रोजी की पैंटी और ब्रा थी जब इस बात का एहसास उसे हुआ तो वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया कि रुचि के खूबसूरत बदन को ढकने वाले अंग वस्त्र जो कि वह उसके बदन से लिपटे हुए रहते थे उन कपड़ों को अपने हाथों में उठाया था इस बात का एहसास उसे पूरी तरह से उत्तेजित कर गया और जो उधार उसकी पेंट में हल्का सा उठा हुआ था वह पूरी तरह से तंबु बन गया।
रुचि जिस तरह से उसके हाथ से अपनी ब्रा और पेंटी को छीन कर हंसते हुए गई थी उसे देखते हुए शुभम को इस बात का अंदाजा लग गया कि उसके जाल में एक और नई चिड़िया फंसने वाली है बस अब दाना डालने की जरूरत है। रुचि से बात करता हुआ पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था। पेंट में उसका लंड पूरी तरह से तन कर खड़ा हो गया था अब उसको शांत करना उसके लिए बेहद जरूरी हो गया था और वह तुरंत अपने कमरे में गया जो कि वह अच्छी तरह से जानता था कि इस समय उसकी मां बाजार से सब्जी लेने गई थी।
वह अपने कमरे में जाते ही दरवाजा बंद करके एकदम नंगा हो गया और रूचि के खूबसूरत बदन की कल्पना करते हुए अपने लंड को हिलाने लगा और तब तक हिलाता रहा जब तक की रुचि के नाम से उसके लंड ने पानी नहीं फेंक दिया।........
स्कूल जाने का समय हो गया था शुभम जल्दी जल्दी तैयार हो गया वैसे भी आज उठने में देर हो गई थी इसलिए जैसे तैसे करके नाश्ता करके वह अपनी मम्मी को आवाज लगाने लगा।
मम्मी..... ओ मम्मी आज बहुत देर हो रही है आप कहां रह गई...
अभी आई...(इतना कहकर निर्मला फिर से अपनी ब्लाउज की डोरी बांधने की कोशिश करने लगी जो कि उससे बांधी नहीं जा रही थी। जब निर्मला को लगने लगा कि उससे ब्लाउज की डोरी नहीं बांधी जाएगी तब वह शुभम को आवाज लगाते हुए बोली।)
शुभम औ शुभम जरा इधर तो आना..
क्या बात है मम्मी..
अरे इधर तो आ तब मैं तुझे बताती हूं... एक तो देर हो रही है और यह डोरी नहीं बांधी जा रही..(निर्मला अपने आप से ही बोलते हुए फिर से अपने हाथ को पीछे की तरफ ले जाकर आईने में अपने प्रतिबिंब को देखते हुए डोरी बांधने की कोशिश करने लगी लेकिन उसकी कोशिश फिर नाकाम हो गई तब तक दरवाजे पर शुभम पहुंच चुका था और उससे आईने में देखते ही बोली।)
शुभम जरा ले ब्लाउज की डोरी तो बांध देना आज पता नहीं क्यों मुझसे बांधी नहीं जा रही।
(जिस तरह से निर्मला परेशान होते हुए अपने ब्लाउज की डोरी को बांधने की कोशिश कर रही थी उसे देख कर शुभम बंद मन मुस्कुराने लगा और इस समय निर्मला कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही थी बाल अभी भी गीले थे और उसमें से आ रही मादक खुशबू पूरे कमरे को मोहक बना रही थी। शुभम अपनी मां के कमर के नीचे के भरावदार ऊभार को देखते हुए अपने कदम आगे बढ़ाते हुए बोला।)
क्या बात है मम्मी आज तो तुम एकदम कयामत लग रही हो।
आज क्या खास बात है रोज ही तो लगती हूं।
आज तुम्हारी यह कुछ ज्यादा बड़ी बड़ी लग रही है (शुभम अपनी मां की गांड पर चपत लगाते हुए बोला)
आऊचचच.... क्या कर रहा है पागल हो गया है क्या? कितनी जोर से मारा। (निर्मला अपनी गांड सहलाते हुए बोली।)
अच्छा अभी लग रही है मुझे पूरा लंड अंदर डालकर जोर जोर से धक्के लगाता हूं तब तो बोलती हो और जोर से और जोर से....(शुभम साड़ी के ऊपर से अपनी मां की गांड सहलाते हुए बोला।)
तब की बात कुछ और होती है उस समय पूरे बदन में जोश भरा होता है तो उस समय चाहे जितनी जोर जोर से धक्के लगा चपत लगा कुछ भी कर सिर्फ और सिर्फ मजा ही आता है ( निर्मला मुस्कुराते हुए बोली)
मम्मी तुम्हारी बड़ी बड़ी गांड देखकर आज मेरा मन कुछ और कर रहा है। (शुभम जोश के साथ पीछे से अपनी मां को बांहों में भरते हुए और अपने पेंट में बने तंबू को साड़ी के ऊपर से अपनी मां की गांड पर रगड़ते हुए बोला।)
अच्छा तो बता क्या कर रहा है तेरा मन....( निर्मला आईने में अपने बेटे को अपने आप को बाहों में लिए हुए देखते हुए बोली। जो कि इस समय शुभम ब्लाउज के ऊपर से ही अपनी मां की खरबूजे जैसी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया था।)
आज मेरा मन तुम्हारी गांड मारने को कर रहा है।
(इतना सुनते ही निर्मला उछल पड़ी और बोली।)
पागल हो गया क्या ना ना ना ना बिल्कुल नहीं उस बारे में सोचना भी नहीं .. बहुत दर्द होता है और तेरा लंड कोई पतला तो है नहीं कि आराम से चला जाएगा साला है मुशल जैसा.... एकदम हड़कंप मचा देता है।(डोरी ना बदले की वजह से धीमी हो चली ब्लाउज को वह वापस से पीछे की तरफ ले जाते हुए बोली।)
क्या मम्मी तुम्हें भी तो मजा आता है ना।
हां आता है मजा लेकिन दर्द भी बहुत होता है। इसलिए अभी इस बारे में कोई बात नहीं करनी है जब करना होगा तब सोचेंगे अभी तू बस जल्दी से मेरे ब्लाउज की डोरी बांध दे बहुत देर हो रही है स्कुल भी पहुंचना है।(शुभम अभी भी अपनी मां को कस के बाहों में झगड़ा हुआ था जिसकी वजह से उसके पेंट में बना तंबू बराबर गांड के बीचो बीच अपने लिए जगह बना रहा था शुभम को अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड पर अपना लंड रगड़ना में मजा आ रहा था और निर्मला भी अपने बेटे की मस्ती में मस्त हुए जा रही थी लेकिन वह इतना जरूर जानती थी कि अगर वह शुभम को नहीं रोकी तो स्कूल जाने से पहले ही लगता है वह उसकी चुदाई कर देगा और भाई ऐसा नहीं चाहती थी क्योंकि बहुत देर हो चुकी थी।इसलिए वह एक हाथ पीछे की तरफ ले जाकर पेंट में बने तंबू को अपने हाथ से पकड़ कर उसे पीछे की तरफ ठेलते हुए बोली।)
बेटा अपने इस मुसल को पीछे ही रखना... बड़ा बदतमीज है... घुसता ही चला रहा है।
इसका काम ही है घुसना जहां थोड़ी सी जगह देखी नहीं की घुसना शुरू कर देता है।(शुभम वापस अपनी कमर को अपनी मां की गांड पर सटाते हुए बोला।)
तो क्या कहीं भी घुस जाएगा (निर्मला फिर से उसे उसी तरह से पकड़कर पीछे की तरफ ठेलते हुए बोली।)
हां घुस जाएगा क्योंकि इसके घुसने लायक छोटे-छोटे बिल सिर्फ तुम्हारे पास है।
(इस तरह की अश्लील गंदी बातें करके निर्मला को भी मजा आने लगा था लेकिन दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ देखते ही अंदर ही अंदर गुस्सा होने लगी क्योंकि वह भी अपने बेटे की हरकत की वजह से काफी उत्तेजित हो चुकी थी और उसे अपनी पेंटी गीली होती हुई महसूस होने लगी थी वह भी अपने बेटे के पेंट में बने तंबू को अपनी पेंटी के अंदर छुपे खजाने में घुसाना चाहती थी लेकिन समय का अभाव था इसलिए वह मन मारते हुए बोली।)
बहुत बातें करने लगा है चल अब जल्दी से मेरे ब्लाउज की दूरी बांधे बहुत देर हो चुकी है समय पर पहुंचना भी है।
क्या मम्मी ....(शुभम उदास होता हुआ बोला।)
मुझे कुछ नहीं कहना बस जल्दी से आप डोरी बांध दे।
(शुभम भी अच्छी तरह से समझ रहा था कि स्कूल पर उस समय पर पहुंचना बहुत जल्दी है और वास्तव में उन दोनों को बहुत देर हो रही थी इसलिए वह भी अपने मन से अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को बांधने लगा। और इसके बाद दोनों मुस्कुराते हुए कार में बैठकर उसको की तरफ निकल गए । घर में एकांत पाते ही निर्मला अपने बेटे के द्वारा की गई हरकत का पूरा मजा उठाती थी उसे अपने बेटे की इस तरह की गंदी हरकतों में बहुत मजा आने लगा था और उसे मालूम भी रहता था कि जब घर में कोई नहीं होता है तो वह अक्सर उसके साथ इस तरह की छेड़खानी करता रहता है।
और निर्मला भी अपने बेटे की हरकतों का खुलकर मजा लेती थी और उसे पूरी तरह से मजा लूटने देती थी क्योंकि उसकी जिंदगी में जिस तरह का बदलाव आया था और एक तरह से हुआ दूसरा जन्म ली थी वह सिर्फ शुभम के बदौलत थी।इसलिए वह शुभम को किसी भी तरह से नाराज नहीं करना चाहती थी और वैसे भी इसमें नाराजगी की कोई बात नहीं थी बरसों से प्यासी है निर्मला इस तरह की हरकतों को महसूस करने के लिए तरस गई थी अशोक के साथ रहकर उस पर आधार रखकर वह जिंदगी के असली सुख को भूल गई थी घर गृहस्ती मे वह इस कदर डूब गई थी कि औरतों की जिंदगी में उनकी एक अलग दुनिया भी होती है इस बात का एहसास उसे बिल्कुल भी नहीं था और इस बात का एहसास उसे उसके बेटे ने कराया था इसलिए वह अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे पर निछावर कर देना चाहती थी बदले में उससे वही प्यार चाहती थी जो एक प्यार एक प्रेमी और एक पति दे सकता था और शुभम दोनों का फर्ज बखूबी निभा रहा था। और कुल मिलाकर निर्मला अब अपनी जिंदगी से बहुत खुश थी।
शाम ढल चुकी थी अंधेरा होने लगा था। छत पर निर्मला सूखे हुए कपड़ों को इकट्ठा कर रहे थे और बाजू वाली छत पर सरला चाची भी आज सूखे हुए कपड़ों को रस्सी पर से उतार कर उन्हें इकट्ठा कर रही थी। निर्मला की नजर सरला चाची पर पढ़ते ही वह अंदर ही अंदर सिहर उठी क्योंकि अब जब भी निर्मला की नजर सरला चाची पर पड़ती थी तो उसे इस बात का डर रहता था कि... कहीं वह उसके और शुभम के बारे में पूछताछ करना शुरू कर दें इसलिए इस समय भी छत पर सरला चाची को देखकर वह घबरा गई थी और उसकी घबराहट तब और ज्यादा बढ़ गई जब वह उसे पुकारते हुए उसकी तरफ ही बढ़ते चले आ रही थी.... उसे इस बात का डर लग रहा था कि कहीं वह कुछ पूछना ले....
रुको निर्मला ..(निर्मला सरला से बिना कुछ बोले जाने वाली थी कि उसकी बात सुनते ही रुक गई।)
शुभम कहां है कहीं नजर नहीं आ रहा।
इतना सुनते ही निर्मला के पैर वहीं के वहीं जम गए उसे लगने लगा कि लगता है या वह फिर से पूछताछ करेगी।
क्यों क्या हुआ क्या बात है। (निर्मला सरला की तरफ देखते हुए बोली।)
अरे हुआ कुछ नहीं है (एकदम खुश होते हुए निर्मला की तरफ कदम बढ़ाते हुए) आज घर पर कद्दू की सब्जी बनने वाली है इसलिए मैं कह रही थी कि शुभम को बोल देना कि आज वह मेरे घर पर खाना खा ले...
कद्दू की सब्जी ... लेकिन......(निर्मला आश्चर्य के साथ बोली।)
लेकिन वेकिन कुछ नहीं बस उसे इतना कह देना कि आज का खाना मेरे घर पर है और वह समय पर चले आए।
लेकिन सरला कद्दू की सब्जी....( निर्मला फिर से आश्चर्य जताते हुए बोली)
हां हां मैं जानती हूं शुभम को कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है।
शुभम खुद मुझे बताया कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है उस दिन बाजार से लौटते समय वह बाद बाद में मुझे बताया था कि उसे कद्दू की सब्जी बहुत अच्छी लगती है इसलिए मैं कही थी कि जिस दिन बनाऊंगी तुझे अपने घर बुलाऊंगी।... उसे भेज जरूर देना मुझे बहुत काम है मैं जा रही हूं।
( इतना कहकर सरला वापिस चली गई और निर्मला उसे जाते हुए देखती रही उसे समझ में नहीं आ रहा था कि शुभम ने उसे ऐसा क्यों कहा कि कद्दू की सब्जी उसे बहुत पसंद है जबकि कद्दू की सब्जी वह बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था....। अब वह शुभम से इस बारे में बात करना चाहती थी। वो जानती थी कि कुछ ही देर में शुभम घर पर आने वाला था इसलिए वह नीचे चली गई।
सरला चाची के वापस जाते ही निर्मला ने राहत की सांस ली लेकिन सरला चाची की बातों ने निर्मला को कशमकश में डालकर रख दिया था। क्योंकि एक मां होने के नाते निर्मला अच्छी तरह से जानती थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी... लेकिन सरला उसे अभी अभी बता कर गई थी कि उसके बेटे को कद्दू की सब्जी अच्छी लगती है और वह घर पर खाने का उसे आमंत्रण भी दे गई थी.. इसलिए निर्मला को कुछ समझ में नहीं आ रहा था और वह कपड़ों को इकट्ठा करके नीचे कमरे में ले आई.. और शुभम का इंतजार करने लगी..
थोड़ी ही देर में डोर बेल की आवाज सुनते ही निर्मला जल्दी-जल्दी दरवाजा खोलने के लिए गई क्योंकि वह जानती थी कि शुभम वापस आ गया है।
दरवाजा खुलते ही शुभम मुस्कुराते हुए घर के अंदर आया और उसे मुस्कुराता हुआ देखकर जवाब में निर्मला भी मुस्कुरा दी और वह दरवाजा बंद कर दी।
क्या बात है आज बहुत खुश नजर आ रहा है। (निर्मला दरवाजा बंद करके अपने बेटे... की तरफ आगे बढ़ते हुए बोली...)
मैं तो हमेशा खुश रहता हूं मम्मी...
मैं इस खुशी की वजह जान सकती हूं (निर्मला अपने दोनों हाथ को बांधते हुए बोली।)
तुम ......हां तुम मेरी खुशी की वजह हो ..(शुभम आगे बढ़कर अपनी मां के गले में बाहें डालता हुआ बोला)
मैं .....लेकिन मैं कैसे...?
अरे मम्मी इतना भी नहीं जानती मेरी खुशी की वजह तुम हो क्योंकि तुम मुझे कितना खुश रखती हो मेरा इतना ख्याल रखती हो और तो और दूसरे तरीके से भी मेरा कितना ख्याल रखती हो......(शुभम अपनी मां की आंखों में आंखें डालता हुआ बोला)
दूसरे तरीके से मतलब मैं कुछ समझी नहीं....( निर्मला अनजान बनते हुए बोली)
अच्छा अब इतना भी अनजान मत बनो कि मेरे कहने का मतलब ना समझ रही हो मैं सब जानता हूं कि तुम अच्छी तरह से जानती हो कि मैं क्या कहना चाहता हूं।
नहीं मैं बिल्कुल नहीं समझी तू मुझे ठीक से समझ आएगा तब ना मैं समझूंगी कि तू क्या कहना चाहता है ।(नीम्रला जानबूझकर चुटकी लेते हुए बोली)
बताऊ किस तरह से....(शुभम बड़ी गहराई से अपनी मां की आंखों में जागता हुआ बोला निर्मला को अपने बेटे की आंख में कुमारी की चमक साफ नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से समझ रही थी कि वह क्या करना चाह रहा है लेकिन निर्मला को भी अच्छा लग रहा था इसलिए वह भी शरारती अंदाज में बोली.)
बताना ....मैं तो जानना चाहती हूं कि दूसरे तरीके से मैं कैसे तुझे खुश रखती हूं।
रुको अभी बताता हूं....(बातों ही बातों में शुभम काफी उत्तेजित हो चुका था इस तरह से अपनी मां के गले में बाहें डाल कर खड़े रहने की वजह से और एकदम करीब रहने की वजह से निर्मला के बदन से आ रही माता खुशबू उसके बदन में उत्तेजना की लहर बढ़ा रहे थे और ब्लाउज में कैद निर्मला की दोनों बड़ी-बड़ी चूचियां उसके सीने से स्पर्श हो रही थी जिसकी वजह से उसके बदन में गर्माहट बढ़ती जा रही थी.... शुभम अपने होठों को अपनी मां के तपते हुए होठों के करीब ले जाने लगा घर में इस समय दोनों के सिवा तीसरा कोई भी नहीं था इसलिए दोनों जब चाहे तब एक दूसरे से छेड़खानी कर लेते थे और इस पल का भरपूर फायदा उठाते थे शुभम के होठ निर्मला के मदमस्त होठ के करीब होते जा रहे थे....एक बार फिर से निर्मला के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी तन बदन में उत्तेजना की चिंगारी भड़कने लगी थी। जैसे-जैसे शुभम के प्यासे होठ निर्मला के तपते हुए होठों के करीब आ रहे थे वैसे वैसे निर्मला उत्तेजना के मारे सूखे हुए पत्ते की तरह फड़फड़ा रही थी शुभम दोनों हाथों में अपनी मां के चेहरे को इस तरह से ले लिया था मानो गुलाब के फूल को अपनी हथेली में संभाल कर भर लिया हो।
दोनों के चेहरे इतने करीब हो गए थे कि दोनों की नसों में से निकल रही गर्म सांसों की हवा चेहरे पर पड़ते ही वाष्प की तरह घुल जा रही थी।
दोनों बैठक घर में खड़े थे । जबसे निर्मला को इस बात का आभास हुआ है कि उनकी पड़ोस की सरला चाची उन दोनों पर नजर रख रही है तब से वह घर की खिड़कियों के पर्दे हमेशा लगाकर रखते थे ताकि कुछ भी नजर ना आए इसलिए वह निश्चिंत थी। दोनों एक दूसरे की बाहों में थे शुभम धीरे-धीरे अपने होंठ को अपनी मां के होठों के एकदम करीब ले आया वह अपनी मां की खूबसूरत चेहरे को अपने दोनों हथेली से संभाले हुए था और देखते ही देखते शुभम ने अपने होंठ को अपनी मां की गुलाबी होंठ पर रखकर उन्हें पागलों की तरह चूसना शुरू कर दिया अपने बेटे की इस हरकत की वजह से निर्मला काफी उत्तेजित हो गई थी और वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए अपने होठों को खोल दी और उसके होठों को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दी दोनों जितना हो सकता था एक दूसरे के होठों से चासनी चुस लेना चाह रहे थे। दोनों एक दूसरे को किसी इंग्लिश मूवी के हीरो हीरोइन की तरह चुंबन कर रहे थे पल भर में ही दोनों एकदम मदहोश हो गए अपनी मां के मदमस्त होंठों को चूसने से शुभम को ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे वह अपनी मां के होठों को नहीं बल्कि किसी बेहतरीन इंग्लिश दारू की बोतल को मुंह से लगाया हो उसके बदन में नशा की खुमारी छाने लगी आंखों में मदहोशी का आलम इस कदर छाने लगा कि अपने आप ही उसकी आंखें बंद होने लगी और यही हाल निर्मला का भी हो रहा था उसकी भी आंखे मस्ती में बंद होने लगी वह अपनी बाजुओं में अपने बेटे को भरकर चुंबन का मजा ले रही थी और शुभम अपने दोनों हाथों को नीचे की तरफ ले जाकर अपनी मां की कमर के नीचे के उपहार को अपनी हथेली में भर कर दबाना शुरू कर दिया और लगातार अपनी मां के होठों को चूसता चला जा रहा था।
निर्मला चुदवासी होने लगी थी.. उसकी बुर चुदासपन से भरी जा रही थी जिसकी वजह से उसमें से लगातार नमकीन मधुर रस बहने लगा था और उसकी पेंटी उसके मधुर रस से गीली होने लगी थी।
शुभम का लंड पेंट के अंदर गदर मचाया हुआ था जो कि अब खड़क होने के बाद निर्मला की टांगों के बीच साड़ी के ऊपर से ही शिरकत कर रहा था लेकिन उसका कठोरपन इतना ज्यादा मजबूत था कि निर्मला को अपनी कचोरी जैसी फूली हुई बुर पर उसकी दस्तक बराबर महसूस हो रही थी।
दोनों दुनिया को भूल कर एक दूसरे के होठों की चुसाई करने में लगे थे। शुभम का मोटा तगड़ा लंड एक बार फिर से अपनी औकात में आ गया था जोकि पजामे के बाहर निकलने के लिए फड़फड़ा रहा था। शुभम अपनी मां के होठों को ऐसे चूस रहा था जैसे कि उस पर रसमलाई लगी हो वह लगातार अपनी मां के लाल लाल होंठों को चूसता चला जा रहा था। उत्तेजना के मारे निर्मला का खूबसूरत चेहरा सुर्ख हो चुका था उत्तेजना के मारे गला सूख रहा था।निर्मला को अपने बेटे की यही अदा तो बहुत अच्छी लगती है कि कभी भी वह मूड बना देता है और ऐसा अभी भी हो रहा था निर्मला की चुदवासी बुर किसी गुब्बारे के भांति फूल पिचक रही थी। पूरे घर में केवल दोनों के मुख से चुम्मा चाटी और गर्म सिसकारी की आवाज ही आ रही थी।
पल भर में माहौल पूरी तरह से बदल गया था दोनों पर मदहोशी का आलम अपना असर दिखा रहा था।
शुभम का लंड पूरी तरह से तैयार था निर्मला की रसीली बुर के अंदर जाने के लिए बस उसे रास्ता दिखाने की जरूरत थी। जो कि अभी तक साड़ी के ऊपर से ही दोनों टांगों के बीच खुली हुई बुर पर ठोकर मार रहा था। और इस ठोकर को खाकर निर्मला की बुर पेंटी के अंदर होने के बावजूद भी हल्की सी खुल गई थी जो कि उसकी तरफ से लंड को पूरी तरह से स्वीकृति थी कि वह अंदर आ सकता है। और बुर की आत्मसमर्पण को देखकर लंड का हौसला बढ़ने लगा था वह और जोर-जोर से बुर के ऊपर दस्तक दे रहा था ऐसा लग रहा था मानो कि वह निर्मला की बुर पर अपने नाम का सिक्का लगा रहा हो।
निर्मला भी अपने बेटे की मोटी तगड़ी लंड की ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी वह उसे अपनी बुर की गहराई में लेने के लिए मचल रही थी। अपने बेटे के इस तरह के लाजवाब चुंबन का नशा उसके ऊपर पूरी तरह से छा चुका था आंखों में मदहोशी का आलम अपने अंदर समाने को बेकरार कर दिया था।
शुभम होंठों की चुसाई जारी रखते हुए अपना हाथ निर्मला के बदन पर चारों तरफ घुमा रहा था अब उससे बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हुआ जा रहा था वह अपने हाथ नीचे की तरफ ले जाकर अपने दोनों हाथों में साड़ी पकड़ कर ऊपर की तरफ उठाने लगा लेकिन जानबूझकर निर्मला उसे रोकने की कोशिश करते हुए उसके हाथ को पकड़ लिया और अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने लगी लेकिन अत्यधिक उत्तेजना का असर शुभम पर साफ नजर आ रहा था वह जबरदस्ती अपनी मां की साड़ी को ऊपर की तरफ उठा रहा था। निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को नीचे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को ऊपर उठा दे रहा था। इस तरह से दोनों तरफ से जोर-जबर्दस्ती हो रही थी और इस जोर-जबर्दस्ती में निर्मला को मजा आ रहा था। वह जानबूझकर शुभम को रोक रही थी ताकि वह देख सके कि सुभम उसके साथ क्या कर सकता है....हालांकि छेड़खानी में जोर जबरदस्ती में निर्मला को अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी.
होठ चुसाई का लगातार आनंद लेते हुए निर्मला बार-बार अपनी साड़ी को पीछे की तरफ करने की कोशिश कर रही थी और शुभम बार-बार साड़ी को पर उठा दे रहा था। शुभम पूरी तरह से न चुदवासा हो चुका था अपनी मां का इस तरह से रोकना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। वह उतावला हो चुका था अपनी मां की बुर में लंड डालने के लिए ... अपनी मां की हरकत देखकर उसे और कोई रास्ता नजर ना आता देखकर वह दोनों हाथों को अपनी मां की नितंबों के उभार के निचले हिस्से पर रखकर उसे उठा लिया कर जल्दी-जल्दी उसे चार पांच कदम चल कर दीवार से सटा दिया.... निर्मला तो अपने बेटे की भुजाओं की ताकत देखकर हैरान रह गई.. वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि उसका बेटा उसे इस तरह से उठा लेगा जैसे कि कपड़े का गट्ठर हो वह भली भांति जानती थी कि उसका वजन कुछ ज्यादा ही था लेकिन उसके बेटे ने अपनी ताकत दिखाते हुए उसे बड़े आराम से अपनी गोद में उठाकर उसे दीवार से सटा दिया था इस बात का एहसास उसे अंदर तक उत्तेजित कर गया था उसकी बुर से लगातार नमकीन पानी बह रहा था... दीवार से लगाते ही शुभम अपनी मां की साड़ी को कमर तक उठा दिया और एक हाथ से उसकी पेंटी को नीचे की तरफ सरका ते हुए घुटनों तक ला दिया.... रास्ता एकदम साफ था दो टांगों के बीच उसे अपनी मंजिल नजर आ रही थी। वह बिना वक्त गवाएं एक हाथ से अपने पेंट की बटन खोलने लगा दो कि अभी भी निर्मला जानबूझकर अपनी साड़ी को नीचे करने की नाकाम कोशिश कर रही थी। और देखते ही देखते शुभम अपने हाथ में अपने खड़े लंड को पकड़ कर ही नाता हुआ उसे अपनी मां की दोनों टांगों के बीच लगा दिया जो कि इस समय निर्मला के बुर किसी भट्टी की तरह तप रही थी।
निर्मला निर्मला उसे बिना बोले उसे रोकने की कोशिश करती रही और शुभम अपनी मनमानी करते हुए अपने लंड को अपनी मां की बुर के अंदर धीरे-धीरे करके पूरा डाल दिया....
निर्मला अपने बेटे की हरकत की वजह से आनंद से सराबोर हो गई उसे अपने बेटे की जबरदस्ती बहुत अच्छी लग रही थी शुभम का लंड पूरा बुर में समाया हुआ था। जिसे शुभम धीरे धीरे अंदर बाहर करता हुआ चोदना शुरू कर दिया था।
आखिर कब तक निर्मला दिखावे का नाटक करके अपने मजे को किरकिरा कर दी वह भी अपने बेटे का साथ देते हुए उसके कंधे पर हाथ रखकर और अपनी नजर को नीचे की तरफ करके अपने बेटे के खातिर लंड को अपनी बुर की गहराई में अंदर बाहर होता हुआ देखकर चुदाई का मजा लेने लगी। अब दोनों के बीच किसी भी प्रकार का संवाद नहीं हो रहा था क्योंकि अब दोनों के बीच वार्तालाप केवल उनके लंड और बुर कर रहे थे जिसमें से ठाप ठाप की आवाज लगातार गूंज रही थी। शुभम को बहुत मजा आ रहा था वह ब्लाउज के ऊपर से यह अपनी मां की बड़ी-बड़ी चुचियों को दबाता हुआ अपनी कमर को आगे पीछे करके चोद रहा था। निर्मला काफी उत्तेजित हो चुकी थी उसे आज एक नया अनुभव मिला था क्योंकि दोनों के बीच ड्राइंग रूम में ही एक अद्भुत संभोग का दृश्य रचा जा रहा था । जो कि दोनों को उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से दोनों चुदाई का आनंद लूटेंगे। शुभम लगातार किसी मशीन की तरह अपनी कमर को हीला रहा था।
निर्मला अपने बेटे की आंखों में झांकते हुए उसके दमदार लंड की ठोकर को अपनी बुर की गहराई में महसूस कर रही थी उसकी आंखों में साफ नजर आ रहा था कि वह अपने बेटे से कहना चाह रही थी कि और जोर जोर से धक्के लगाए और जैसे शुभम एक अनुभवी मर्द की तरह अपनी मां की आंखों में उसके दिल के जज्बात को पढ़कर जोर जोर से अपनी कमर को हिलाने लगा। पूरे कमरे में निर्मला की सिसकारी की आवाज गुंजने लगी....
शुभम अपनी मां की कमर थामे हुए जोर जोर से धक्के लगा रहा था उसका हर एक प्रहार निर्मला के मुख से आह निकाल दे रही थी लेकिन इस आह में भी सुकून और आनंद छिपा हुआ था। शुभम कुछ देर तक ऐसे ही अपनी मां की चुदाई करता रहा उसकी रफ्तार एक पल के लिए भी कम नहीं हो रही थी वह एक हाथ से चूची दबा रहा था और दूसरे हाथ से कमर पकड़कर उसे मसल रहा था जिससे निर्मला को और ज्यादा मजा आ रहा था।
निर्मला पूरी तरह से भाव विभोर होकर अपने बेटे से चुदने का आनंद लूट रही थी। हालात पूरी तरह से कैसे बदल गए उसे खुद समझ में नहीं आया क्योंकि कुछ देर पहले अपने बेटे से सरला चाची के दिए गए आमंत्रण के बारे में पूछताछ करना चाहती थी लेकिन शुभम के घर में आते ही जिस तरह से एकाएक दोनों के बीच चुंबन की बौछार होने लगी और वह बौछार अब घमासान चुदाई में बदल चुकी थी और निर्मला अपनी बात भूल चुकी थी और जुदाई का आनंद ले रही थी।
निर्मला अपने बेटे की हर तबके के साथ अपनी कमर को पीछे की तरफ कर दे रही थी क्योंकि शुभम कुछ ज्यादा ही जोर लगाकर धक्के मार रहा था और यह बात शुभम को अच्छी तरह से पता चल रही थी लेकिन उसे बहुत मजा आ रहा था लेकिन थोड़ी देर बाद वह अपना लंड पूरी तरह से बाहर निकाल दिया जो कि अभी भी पानी निकला नहीं था जिसका मतलब साफ था कि शुभम का मन भरा नहीं था और ना ही निर्मला का मन कर रहा था कि अपने बेटे के लंड को अपनी बुर से बाहर निकाल ले लेकिन शुभम के मन में कुछ और चल रहा था वह अपनी मां की बुर से लंड बाहर निकाल कर उसके कंधों को पकड़कर घुमाने की कोशिश करने लगा और अपने बेटे का इशारा समझ कर निर्मला अपनी साड़ी को दोनों हाथों से कमर तक उठाए खड़ी होकर अपनी टांगों का सहारा लेकर घुटनों में फंसी पेंटी को पैरों से बाहर निकालने लगी और अगले ही पल उसकी गीली पैंटी फर्श पर पड़ी थी और वह दीवार की तरफ मुंह करके अपनी साड़ी को दोनों हाथों से उठा है अपनी मदमस्त गांड को किसी दुश्मन की तरफ लगाए जाने वाली तोप की तरह ऊपर की तरफ उठा दी.... शुभम को और क्या चाहिए था बिना बोले ही उसकी मां उसका इशारा समझ गई थी ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भूखे के सामने स्वादिष्ट व्यंजन से भरी थाली रख दी गई हो वह अपनी भूख मिटाने के लिए उस थाली पर टूट पड़ा और शुभम अपनी मां की बड़ी बड़ी गांड को पकड़कर एक बार फिर से उसके अंदर समा गया और जोर जोर से धक्के लगाते हुए उसे चोदना शुरु कर दिया पूरे कमरे में गर्म सिसकारी की आवाज किसी मधुर ध्वनि की तरह बज रही थी। तकरीबन 35 मिनट की घमासान चुदाई के बाद दोनों की सिसकारी की आवाज तेज हो गई और दोनों एक साथ झड़ गए।...
निर्मला की सांस इतनी तेज चल रही थी कि मानो जैसे अभी रुक जाएगी... शुभम का भी यही हाल था घर में आने से पहले उसे उम्मीद नहीं थी कि इस वक्त उसे जबरदस्त चुदाई का सुख भोगने को मिलेगा... जिससे अनायास ही मिले इस सुख से वह पूरी तरह से तृप्त हो चुका था....
निर्मला अपने कपड़े व्यवस्थित करके फर्श पर से अपनी पूरी तरह से गिरी हुई पेंटी को उठाकर जाने लगी तो शुभम बोला...
पहनोगी नहीं क्या.....?
(इतना सुनकर वहां रुक गई और अपने बेटे की तरफ मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए उसके करीब आई और अपने दोनों हाथ में पेंटी को फैलाते हुए उसकी आंखों के सामने दिखाते हुए बोली।)
पहनने लायक तूने छोड़ा है क्या...
(शुभम साफ-साफ देख पा रहा था कि उसकी मां की पैंटी पूरी तरह से गीली हो चुकी थी जो कि पहनने लायक बिल्कुल भी नहीं थी वह मुस्कुराता हुआ बोला...)
अब इसमें मेरी क्या गलती है तुम पानी इतना छोड़ती हो....
तुझसे तो भगवान बचाए....( इतना कहकर वो मुस्कुराते हुए जाने लगी लेकिन तभी उसे एकाएक सरला की बात याद आ गई और वह रुक कर बोली)
तुझे कद्दू की सब्जी कब से पसंद आने लगी ..
क्यों क्या हुआ ....?(शुभम अपने पेंट की बटन बंद करता हुआ बोला)
सरला चाची कह रही थी कि तुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और आज तुझे खाने पर बुलाई है।
क्या बात कर रही हो मम्मी सच्ची ...(शुभम चाहते हुए बोला)
बड़ा खुश हो रहा है कुछ और इरादा है क्या... जहां तक मैं जानती हूं कि तुझे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं है तो यह एकाएक तेरी फेवरेट सब्जी कैसे बन गई।
मम्मी इसमें बहुत बड़ा राज है।
राज ......कैसा राज .....
मम्मी तुम ही बता रही थी ना कि पड़ोस वाली सरला चाची को हम दोनों पर थोड़ा थोड़ा शक होने लगा है.... (निर्मला अपने बेटे की बात को बड़े ध्यान से सुन रही थी.. और वह अपने बेटे की बात सुनकर जवाब में हां में सिर हिला दी।)
तो मैं उनके इसी शक को दूर करने के लिए उनके छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा हूं।ऐसे ही उस दिन में बाजार से लौट रहा था तो सरला चाची को दो थैला उठाकर जाते हुए देखा तो उनकी मदद करने के बहाने में उनसे दोनों थे ना अपने हाथ में लेकर उनकी मदद करने लगा और बाती बाद में मुझे पता चला कि उन्होंने कद्दू भी खरीद रखी है और मेरे मुंह से निकल गया कि मुझे कद्दू की सब्जी बहुत पसंद है और मैं अपने संस्कार का ऐसा असरदिखाया कि वह मेरे से पूरी तरह से इंप्रेस हो गई मैं आए दिन उनका छोटे-मोटे काम में मदद करने लगा और वह उस दिन मुझे प्रॉमिस की थी कि जब भी वह कद्दू की सब्जी बनाएगी तो वह मुझे जरूर बनाएंगी....(निर्मला अभी भी अपनी बेटी की बात को गौर से सुन रही थी. और शुभम तो यही चाहता था कि शरदा चाची का ध्यान उन दोनों पर से हट जाए ताकि उन दोनों को किसी बात का डर ना रहे और उसके मन में सरला चाची और उनकी बहू दोनों को भौं डने का ख्याल मन में चल रहा था...और इस बात की भनक हो अपनी मां को नहीं होने देना चाहता था इसलिए अपनी बात को गोल-गोल घुमा कर समझा रहा था क्योंकि अच्छी तरह से जानता था किसी दल को लेकर उसके साथ कैसा बखेड़ा खड़ा हुआ था इसलिए वह नहीं चाहता था कि इन दोनों को लेकर भी उसकी मां का दिल टूटे और जो खिचड़ी उसने सरला चाची और उसकी बहू को लेकर पकाने की सोच रखा है वह कच्ची ही रह जाए।) और जिस तरह से हमें उनकी इज्जत करता हुआ उनके छोटे-मोटे में काम में मदद कर रहा हूं उसका ही नतीजा है कि आज वह मुझे खाने पर बुला रही है।
देखा मम्मी मैं अपनी बातों के जादू में उनको ऐसा फंसा लूंगा कि वह हम दोनों के ऊपर कभी शक भी नहीं कर पाएंगी की मैं उस तरह का लड़का हूं।
अपने बेटे की यह बात सुनकर निर्मला खुश हो गई क्योंकि वह किसी भी तरह से सरला चाची से पीछा छुड़ाना चाहती थी इसलिए अपने बेटे के गाल पर हल्के से हाथ रखते हुए बोली।
तो बहुत समझदार हो गया है बेटा और अब जल्दी से जा कर तैयार हो जा समय पर चले जाना... इतना कहकर निर्मला बाथरूम की तरफ चली गई हो शुभम उसे जाता हुआ देखता रहा और अपने अगले प्लान के बारे में सोचने लगा....
शुभम काफी खुश नजर आ रहा था आखिरकार निमंत्रण जो मिला था सरला चाची की तरफ से हालांकि उसे कद्दू की सब्जी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी लेकिन सरला और उनकी बहू रुचि के करीब रहने का बहाना जो मिल गया था इसलिए अब उसे कद्दू की सब्जी खाने में कोई दिक्कत नहीं थी। .... वैसे भी निमंत्रण भले भोजन का मिला था लेकिन स्वाद उसे सरला चाची और उसकी बहू रुचि के खूबसूरत बदन का चखना था। उसे कद्दू की सब्जी की महकसे नहीं बल्कि दोनों औरतें के बदन से उठने वाली मादक खुशबू से आनंद लेना था उनकी बेहतरीन जवानी जो कि एक की तो ढलने को थी लेकिन फिर भी कसाव भरी जवानी से भरपूर उसके अंग अंग से टपक रहे मधुर रस का स्वाद किसी जवान औरत से कम नहीं था और दूसरी चौकी जवानी की दहलीज लांघ चुकी थी और अपनी बेहतरीन रुबाब पे थी। ... शुभम के लिए इस समय दोनों औरतें बहुत खूबसूरत और मदहोश कर देने वाली जवानी से भरी हुई थी जिसके नशे में वह अपने आप को भुलाना चाहता था।
शुभम इस तरह की पहली मुलाकात में दोनों को अपने आकर्षण में बांध लेना चाहता था अपने बातों के जादू मेंदोनों को सम्मोहित कर लेना चाहता था जिसमें वह किसी भी प्रकार की कसर बाकी रखना नहीं चाहता था इसलिए वह पूरी तैयारी के साथ जाना चाहता था इसलिए वह बाथरूम में जाकर अच्छे से नहा कर फ्रेश हो गया था और अच्छे कपड़े पहन कर... परफ्यूम का छिड़काव करके हुआ है अपने कमरे से निकल गया....
तैयार होते-होते तकरीबन 8:00 बज चुके थे। वह पड़ोस के घर में पहुंचकर डोर बेल बजाने लगा... दो-तीन बार बार जाने के बाद दरवाजा खुला तो सामने रुचि को देखकर उसका अंग-अंग कसरती अंदाज में अंगड़ाई लेने लगा। शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे को देखा तो देखता ही रह गया एक अजीब सा भोलापन और मदहोश कर देने वाला हर एक अदा रुचि के चेहरे में था। रुचि अच्छी तरह से जानती थी कि इस समय सुभम ही आने वाला है... इसलिए तो उसकी सास ने उसे कद्दू की सब्जी बनाने को बोली थी। शुभम एकटक रुचि कोई देखे जा रहा था जोकि रुचि इस तरह से देखे जाने पर शर्मा गई थी... और शरमाते हुए बोली।
ऐसे क्या देख रहा है ऐसे मत देखा कर मुझे शर्म आ रही है...
मैं देख रहा हूं कि आसमान से चांद उतरकर नीचे जमीन पर आ गया है और आया भी तो आया कहा मेरे पड़ोस में..(शुभम आराम से दरवाजे पर ही दीवार का टेका लेते हुए बड़े ही शांत स्वर में बोला..)
धत्त तू ऐसी बातें मत किया कर कोई सुन लेगा तो क्या सोचेगा...(रुचि उसी तरह से शरमाते हुए बोली)
कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा अरे मैं कौन सा तुम्हें भला बुरा कह रहा हूं मैं तो तुम्हारी तारीफ कर रहा हूं।
मैं जानती हूं कि तू मेरी तारीफ कर रहा है लेकिन इस तरह से तारीफ करने का हक हर किसी को नहीं होता।
तो किसे होता है बताओ? (शुभम रुचि के खूबसूरत चेहरे की तरफ देखते हुए बोला... जहां से उसकी नजर सीधे गर्दन के नीचे दोनों चुचियों के बीच बनी गहरी घाटी की तरफ जा रही थी जो कि बहुत ही मनमोहक लग रही थी...)
मुझे नहीं पता....
मुझे नहीं पता अरे अभी तो तुम कह रही थी कि इस तरह की बातें करने का हक सबको नहीं होता तो किसको होता है वही तो पूछ रहा हूं।
मैं नहीं बताऊंगी.....
बता दो ना भाभी.....
मुझे देर हो रही है मुझे खाना बनाना है इसलिए तो तुझे यहां बुलाए हैं और कहींदेर हो गई तो मम्मी जी ने मुझ पर बिगड़ेगी मुझे खाना बनाने दे....
तो मैंने कहा तुम्हें रोका हूं... एक तो घर बुलाकर अंदर आने को भी नहीं कह रही हो और ऊपर से मुझे ही भला बुरा कह रही हो....
(शुभम की बातें सुनकर रुचि को इस बात का अहसास हुआ कि दोनों अभी तक दरवाजे पर ही खड़े थे और वह उसे अंदर आने के लिए बोली भी नहीं थी इसलिए अपनी गलती का एहसास होते ही वह बोली।)
सॉरी ......सॉरी में भूल ही गई तो बातें ही ऐसी करता है कि मैं सब कुछ भूल जाती हूं.... आप जालंधर आजा मुझे दरवाजा बंद करने दे...
(इतना सुनते ही शुभम घर में प्रवेश करने के लिए अंदर कदम बढ़ाया ... और रूचि दरवाजा बंद कर दी....दरवाजा बंद करने के बाद वह उसे बैठने के लिए बोली लेकिन तभी शुभम बोला...)
चाची नजर नहीं आ रही है कहां है?
वह ऊपर अपने कमरे में है मिलना चाहो तो मिल सकते हो....(इतना कहकर रूचि रसोई घर की तरफ जाने लगी और शुभम कुछ पल वहां खड़े होकर रुचि को जाते हुए देखता रहा और उसकी नजर रुचि की मटकती हुई गोल-गोल कांड पर टिकी हुई थी जो कि कसी हुई साड़ी पहनने की वजह से उसके नितंबों का घेराव साफ-साफ साड़ी के ऊपर झलक रहा था जब वह चल रही थी तो उसके दोनों नेता किसी पानी से भरे गुब्बारे की तरह लहरा रहे थे जिसकी वजह से नितंबों में उठने वाली नहर से शुभम के पजामे में तूफान हिलोरे मारने लगा था।