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"महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया!"
हैरानी के मारे अपने गालों पर हाथ रखे पिंकी बोली। बाबा अमरेश्वर के आश्रम से वापस आकर, राज ने सेनापति वीरभद्र के कत्ल की साज़िश के बारे में जो कुछ बताया था, उस पर विश्वास करना पिंकी को मुश्किल लग रहा था।
"मैंने तो सबको यही कहते सुना है कि महाराज बड़े नेकदिल इंसान थे।" पिंकी ने पास बैठे राज को देखा, "वो ऐसा कर सकते हैं, मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती।"
"स्वार्थ इंसान से क्या क्या नहीं करवाता, पिंकी दीदी," राज ने आह भरी।
"बिल्कुल सच कहा आपने," कहकर पिंकी थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी। और फ़िर बोली, "मगर राज बाबू, इसे बीती बात समझकर भुलाया नहीं जा सकता। परेशानी की बात तो ये है कि महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म हुआ है। और वो आज भी आपके पास ही कहीं मौजूद हैं। और सिर्फ़ इतना ही नहीं, वो हरगिज़ आपकी शादी शहज़ादी अपराजिता से होने नहीं देंगे। मैं अगर अपनी जान देकर शहज़ादी को फ़िर से जिंदा कर भी दूँ तो भी आप दोनों का मिलन नही हो पायेगा।"
पिंकी ने सोच में डूबे राज को ग़ौर से देखा। वो ज़रा हिचकिचायी मगर फ़िर उसने अपनी बात कह देना ही ठीक समझा।
"राज बाबू," पिंकी ने ज़रा धीमी आवाज़ में कहा, "क्या आपके क़रीबियों में कोई ऐसा इंसान है, जो महाराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता हो?"
"मैं आपका मतलब नहीं समझा?" राज ने सर उठाकर पिंकी को देखा।
"देखिए, राज बाबू," पिंकी की नज़रें थोड़ी देर के लिए ईधर उधर गयीं फ़िर राज की ओर लौट गयीं। "हमारे लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है कि महराज भानुप्रतापदेव का पुर्नजन्म किस के रूप में हुआ है। इस वक़्त हम सिर्फ़ इतना ही जानते हैं कि वो आपके करीबियों में से ही कोई है। इसलिए आप अपने सभी करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों के चेहरों को अपने मन में याद कीजिए। क्या आपको उनमें से कोई भी महराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता है?"
"नहीं," राज सोच में डूब गया और उसके माथे पर शिकन पड़ी। "उनमें से कोई भी महाराज भानुप्रतापदेव जैसा तो नहीं है।"
"वैसे भी, कोई ज़रूरी नहीं है कि हमें हर जन्म में वही शरीर मिले," कहते हुए पिंकी ने आह भरी।
"तो फ़िर हम महाराज भानुप्रतापदेव को कैसे पहचानेंगे?" राज परेशान हो उठा।
"चलिए, वो सब छोड़िए," पिंकी को एक नया तरीका सूझा और उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। "ये बताइए कि अगर आप शहज़ादी से शादी करना चाहें तो कौन ऐसा है आपके क़रीबियों में से जो इस फैसले से नाखुश होगा? जो इसका विरोध करेगा?"
"हाँ, मेरे डैडी ज़रूर इसके खिलाफ़ होंगे।" राज ने कुछ सोचते हुए पिंकी को देखा और कहा, "वो मेरी शादी अपनी दूसरी पत्नी के भाई की बेटी से करना चाहते थे। मैंने इस शादी से इनकार कर दिया था। मगर, वो फ़िर भी मुझ पर दबाव डालते ही रहे। अब, अगर मैं अपनी पसन्द की लड़की से शादी करना चाहूँ तो ज़ाहिर है वो उसका विरोध करेंगे।"
राज कुछ दो मिनट चुप चाप बैठा सोचता रहा जैसे वो कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।
"और वैसे भी," भौहें सिकोड़ते हुए राज ने कहा, "उन्होंने कभी मुझे पिता का प्यार दिया ही नहीं। जब माँ थी, तब भी वो हम दोनों से कटे कटे ही रहते थे। माँ के साथ अक्सर झगड़ा किया करते थे। माँ के गुज़र जाने के बाद उन्होंने मुझे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया और खुद दूसरी शादी कर के घर बसा लिया। कभी मुझसे बोर्डिंग स्कूल में मिलने तक नहीं आये।"
"मैं, उन्हें फूटी आँख नहीं भाता। ठीक वैसे ही जैसे पिछ्ले जन्म में महराज भानुप्रतापदेव मुझसे नफ़रत किया करते थे। अब, और किसी सबूत की क्या ज़रूरत है, पिंकी दीदी? साफ़ ज़ाहिर है कि मेरे डैडी हीं पिछले जन्म में महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया थे।"
राज के मुँह से ये शब्द निकलने की देर थी कि ज़ोर से आँधी चली और पिंकी के घर की सारी चीज़ें ऐसे काँपने लगीं जैसे भूकम्प आया हो। राज ने चौंकते हुए चारों तरफ़ देखा और फ़िर उसकी नज़र पिंकी पर जा रुकी। वो बिल्कुल शांत बैठी थी।
"ये अचानक तूफान कैसे आ गया?" राज की हैरानी पिंकी के शान्त चेहरे को देखकर और ज़्यादा बढ़ गयी। "अब तक तो सब शांत था। फ़िर ये सब एकदम से..."
"कोई आत्मा मुझसे बात करना चाहती है, राज बाबू," पिंकी के चेहरे पर खौफ़ ज़रा भी नहीं दिख रहा था।
"क्या?" राज ने चौंकते हुए फ़र्श पर बैठी पिंकी को देखा।
कमरे की चीज़ों के साथ ही पिंकी का बदन भी ऐसे काँपने लगा जैसे उसे दौरे पड़ रहे हों। वो ज़ोर ज़ोर से अपना सर झटकने लगी। उसका जूड़ा खुल गया और उसके लंबे रेशमी बालों ने उसके चेहरे को ढँक दिया। पिंकी फ़िर भी सर झटकती ही रही। उसके बदन का काँपना और ज़्यादा बढ़ गया। उसका बदन पसीने से भीग गया। अचानक, कमरे में तेज़ रोशनी फ़ैली जिसने राज और पिंकी के बीच एक दीवार सी खड़ी कर दी। राज की आँखें चौंधिया गयीं और उसने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया।
कुछ देर बाद, सब शांत हो गया। तेज़ हवा का बहाव भी रुक गया। राज ने चेहरे से हथेलियाँ हटा लीं और देखा कि वो तेज़ रोशनी का चुकी है। पिंकी भी पहले कि तरह शांत बैठी थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। उसकी आँखें बंद थीं और वो गहरी गहरी साँसें ले रही थी। राज कुछ देर तक तो उसे देखता रहा। राज की हिम्मत नहीं हो रही थी पिंकी से बात करने की। जब कुछ और वक़्त बीत गया तो राज ने किसी तरह हिम्मत की और पिंकी के करीब, फ़र्श पर जाकर बैठ गया।
"पिंकी दीदी," राज ने धीरे से पिंकी के कँधे पर हाथ रखा और पूछा, "आप ठीक तो हैं?"
"राज बाबू," पिंकी ने एकदम से आँखें खोलीं और राज को देखा, "आपकी माँ की आत्मा ने आपके लिए एक सन्देश दिया है। उन्होंने कहा कि जो शक़्स महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म है, उसी ने आपकी माँ की हत्या की है।"
"नहीं, पिंकी दीदी," रोहित ने हाथ हिलाकर इनकार किया, "आप ग़लत समझ रही हैं। मेरी माँ की हत्या नहीं हुई थी | उनकी मौत तो एक हादसे में हुई थी।"
"सब उसे हादसा मानते हैं मगर उस हादसे का सच कोई नहीं जानता," पिंकी ने एक साँस लीं और उसकी आँखें खिड़की के बाहर दूर किसी बिंदु पर जा टिकीं। "असल में आपकी माँ का कत्ल हुआ था। और ये बात आपको बताने के लिए आपकी माँ, अपनी मौत के बाद भी आपसे मिलने आया करती थीं।"
"हाँ, ये तो सच है," राज को अपने बचपन के वो दिन याद आए और उसने सर हिलाकर हामी भरी | "माँ के गुज़र जाने के बाद भी मुझे ऐसा लगता था कि वो मेरे आस पास ही हैं। मुझे माँ की आवाज़ सुनायी देती थी। वो मेरी बातों का जवाब दिया करती थीं। मगर, कुछ दिनों बाद वो सब बन्द हो गया। और मैंने इस घटना को अपना वहम मानकर भुला दिया।"
"वो इसलिए कि जिस शख्स ने आपकी माँ का कत्ल किया उसने आपके शरीर पर ऐसा कुछ बाँध दिया जिससे आपकी माँ की आत्मा आपसे सम्पर्क नहीं कर पाए। कोई ऐसी चीज़ जैसे कि..." पिंकी पल भर के रुक गयी और फ़िर बोली, "कोई ताबीज़!"
"ताबीज़?" राज हैरान हो गया। "मगर, मेरे शरीर पर तो कोई ताबीज़ नहीं है। अगर होती तो क्या मुझे नहीं पता चलता?"
"अभी पता चल जाएगा," पिंकी उठी और पूजाघर चली गयी।
उसने ईश्वर की मूर्ति के पास रखा कलश उठाया और राज के पास आकर खड़ी हो गयी।
"राज बाबू," कलश की ओर इशारा करते हुए पिंकी बोली, "इस कलश में मन्त्रों से सिद्ध तेल है। इसे मैं आप पर उड़ेल दूँगी तो आपका पूरा शरीर नीले रंग में रंग जाएगा। यदि आपके शरीर पर कोई ताबीज़ है तो सिर्फ़ उसका रंग नीला नहीं होगा।"
पिंकी ने राज के शरीर पर कलश में भरा तेल उड़ेल दिया। तेल राज के सर से होता हुआ उसके पूरे बदन पर फ़ैल गया। उसके बाल, उसका चेहरा, उसका बदन का हर अंग, ही नहीं उसके कपड़े, जूते, घड़ी, अँगूठी, सब नीले रंग में रंग गए। सिवाय उसके गले में पड़ी सोने की चैन के।
"ये चैन आपको किसने दी?" पिंकी ने चैन को ग़ौर से देखते हुए पूछा।
"मेरे डैडी ने," राज ने चैन के लॉकेट को देखते हुए कहा, "ये हमारी खानदानी चैन है। ऐसी चैन तो हमारे परिवार में सभी मर्दों के गले में है। पर ये चैन तो मेरे गले में मेरी माँ की मौत से पहले से है। मेरे जन्म के कुछ दिनों बाद ही ये चैन मुझे पहना दी गयी थी। और जहाँ तक मुझे याद है, उसके बाद मैंने इसे कभी अपने गले से नहीं उतारा।"
"ज़रा अपनी चैन उतारकर मुझे दीजिये," पिंकी ने हाथ आगे बढ़ाया।
राज ने अपने गले से चैन उतारकर पिंकी की हथेली में रख दिया। पिंकी ने पहले तो हथेलियों में रखकर चैन को उलट पलटकर देखा। फ़िर उसकी नज़र चैन के लॉकेट पर आकर रुक गयी। पिंकी ने अपना पूरा ज़ोर लगाकर उस लॉकेट को खोला। उस लॉकेट के अंदर एक ताबीज़ थी।
"ये ताबीज़ क्या इस लॉकेट के अंदर पहले से थी?" पिंकी ने ताबीज़ दिखाते हुए राज से पूछा।
"मुझे तो ये भी नहीं मालूम था कि ये लॉकेट खुलता भी है?" राज हैरान था। “फिर इसके अंदर किसी ताबीज़ के होने या न होने का पता मुझे कैसे लग सकता है ?”
"मैं जानती हूँ ऐसी ताबीज़ें कौन बनाता है?" ताबीज़ को ग़ौर से देखते हुए पिंकी बोली, "आप तांत्रिक कालेश्वर के पास चले जाइए और उनसे पूछिये ये ताबीज़ किसने और कब बनावायी थी? और उनसे कहिए कि वो इस ताबीज़ को नष्ट कर दें।"
"इस ताबीज़ का असर खत्म होते ही आपकी माँ की आत्मा आपसे बात कर सकेगी। उन्हें आपको बहुत कुछ बताना है, राज बाबू । वो आपको कई सारे ऐसे राज़ बताना चाहती हैं जो आप नहीं जानते। या फ़िर शायद उनके अलावा कोई भी नहीं जानता।”
हैरानी के मारे अपने गालों पर हाथ रखे पिंकी बोली। बाबा अमरेश्वर के आश्रम से वापस आकर, राज ने सेनापति वीरभद्र के कत्ल की साज़िश के बारे में जो कुछ बताया था, उस पर विश्वास करना पिंकी को मुश्किल लग रहा था।
"मैंने तो सबको यही कहते सुना है कि महाराज बड़े नेकदिल इंसान थे।" पिंकी ने पास बैठे राज को देखा, "वो ऐसा कर सकते हैं, मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती।"
"स्वार्थ इंसान से क्या क्या नहीं करवाता, पिंकी दीदी," राज ने आह भरी।
"बिल्कुल सच कहा आपने," कहकर पिंकी थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी। और फ़िर बोली, "मगर राज बाबू, इसे बीती बात समझकर भुलाया नहीं जा सकता। परेशानी की बात तो ये है कि महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म हुआ है। और वो आज भी आपके पास ही कहीं मौजूद हैं। और सिर्फ़ इतना ही नहीं, वो हरगिज़ आपकी शादी शहज़ादी अपराजिता से होने नहीं देंगे। मैं अगर अपनी जान देकर शहज़ादी को फ़िर से जिंदा कर भी दूँ तो भी आप दोनों का मिलन नही हो पायेगा।"
पिंकी ने सोच में डूबे राज को ग़ौर से देखा। वो ज़रा हिचकिचायी मगर फ़िर उसने अपनी बात कह देना ही ठीक समझा।
"राज बाबू," पिंकी ने ज़रा धीमी आवाज़ में कहा, "क्या आपके क़रीबियों में कोई ऐसा इंसान है, जो महाराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता हो?"
"मैं आपका मतलब नहीं समझा?" राज ने सर उठाकर पिंकी को देखा।
"देखिए, राज बाबू," पिंकी की नज़रें थोड़ी देर के लिए ईधर उधर गयीं फ़िर राज की ओर लौट गयीं। "हमारे लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है कि महराज भानुप्रतापदेव का पुर्नजन्म किस के रूप में हुआ है। इस वक़्त हम सिर्फ़ इतना ही जानते हैं कि वो आपके करीबियों में से ही कोई है। इसलिए आप अपने सभी करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों के चेहरों को अपने मन में याद कीजिए। क्या आपको उनमें से कोई भी महराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता है?"
"नहीं," राज सोच में डूब गया और उसके माथे पर शिकन पड़ी। "उनमें से कोई भी महाराज भानुप्रतापदेव जैसा तो नहीं है।"
"वैसे भी, कोई ज़रूरी नहीं है कि हमें हर जन्म में वही शरीर मिले," कहते हुए पिंकी ने आह भरी।
"तो फ़िर हम महाराज भानुप्रतापदेव को कैसे पहचानेंगे?" राज परेशान हो उठा।
"चलिए, वो सब छोड़िए," पिंकी को एक नया तरीका सूझा और उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। "ये बताइए कि अगर आप शहज़ादी से शादी करना चाहें तो कौन ऐसा है आपके क़रीबियों में से जो इस फैसले से नाखुश होगा? जो इसका विरोध करेगा?"
"हाँ, मेरे डैडी ज़रूर इसके खिलाफ़ होंगे।" राज ने कुछ सोचते हुए पिंकी को देखा और कहा, "वो मेरी शादी अपनी दूसरी पत्नी के भाई की बेटी से करना चाहते थे। मैंने इस शादी से इनकार कर दिया था। मगर, वो फ़िर भी मुझ पर दबाव डालते ही रहे। अब, अगर मैं अपनी पसन्द की लड़की से शादी करना चाहूँ तो ज़ाहिर है वो उसका विरोध करेंगे।"
राज कुछ दो मिनट चुप चाप बैठा सोचता रहा जैसे वो कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।
"और वैसे भी," भौहें सिकोड़ते हुए राज ने कहा, "उन्होंने कभी मुझे पिता का प्यार दिया ही नहीं। जब माँ थी, तब भी वो हम दोनों से कटे कटे ही रहते थे। माँ के साथ अक्सर झगड़ा किया करते थे। माँ के गुज़र जाने के बाद उन्होंने मुझे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया और खुद दूसरी शादी कर के घर बसा लिया। कभी मुझसे बोर्डिंग स्कूल में मिलने तक नहीं आये।"
"मैं, उन्हें फूटी आँख नहीं भाता। ठीक वैसे ही जैसे पिछ्ले जन्म में महराज भानुप्रतापदेव मुझसे नफ़रत किया करते थे। अब, और किसी सबूत की क्या ज़रूरत है, पिंकी दीदी? साफ़ ज़ाहिर है कि मेरे डैडी हीं पिछले जन्म में महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया थे।"
राज के मुँह से ये शब्द निकलने की देर थी कि ज़ोर से आँधी चली और पिंकी के घर की सारी चीज़ें ऐसे काँपने लगीं जैसे भूकम्प आया हो। राज ने चौंकते हुए चारों तरफ़ देखा और फ़िर उसकी नज़र पिंकी पर जा रुकी। वो बिल्कुल शांत बैठी थी।
"ये अचानक तूफान कैसे आ गया?" राज की हैरानी पिंकी के शान्त चेहरे को देखकर और ज़्यादा बढ़ गयी। "अब तक तो सब शांत था। फ़िर ये सब एकदम से..."
"कोई आत्मा मुझसे बात करना चाहती है, राज बाबू," पिंकी के चेहरे पर खौफ़ ज़रा भी नहीं दिख रहा था।
"क्या?" राज ने चौंकते हुए फ़र्श पर बैठी पिंकी को देखा।
कमरे की चीज़ों के साथ ही पिंकी का बदन भी ऐसे काँपने लगा जैसे उसे दौरे पड़ रहे हों। वो ज़ोर ज़ोर से अपना सर झटकने लगी। उसका जूड़ा खुल गया और उसके लंबे रेशमी बालों ने उसके चेहरे को ढँक दिया। पिंकी फ़िर भी सर झटकती ही रही। उसके बदन का काँपना और ज़्यादा बढ़ गया। उसका बदन पसीने से भीग गया। अचानक, कमरे में तेज़ रोशनी फ़ैली जिसने राज और पिंकी के बीच एक दीवार सी खड़ी कर दी। राज की आँखें चौंधिया गयीं और उसने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया।
कुछ देर बाद, सब शांत हो गया। तेज़ हवा का बहाव भी रुक गया। राज ने चेहरे से हथेलियाँ हटा लीं और देखा कि वो तेज़ रोशनी का चुकी है। पिंकी भी पहले कि तरह शांत बैठी थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। उसकी आँखें बंद थीं और वो गहरी गहरी साँसें ले रही थी। राज कुछ देर तक तो उसे देखता रहा। राज की हिम्मत नहीं हो रही थी पिंकी से बात करने की। जब कुछ और वक़्त बीत गया तो राज ने किसी तरह हिम्मत की और पिंकी के करीब, फ़र्श पर जाकर बैठ गया।
"पिंकी दीदी," राज ने धीरे से पिंकी के कँधे पर हाथ रखा और पूछा, "आप ठीक तो हैं?"
"राज बाबू," पिंकी ने एकदम से आँखें खोलीं और राज को देखा, "आपकी माँ की आत्मा ने आपके लिए एक सन्देश दिया है। उन्होंने कहा कि जो शक़्स महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म है, उसी ने आपकी माँ की हत्या की है।"
"नहीं, पिंकी दीदी," रोहित ने हाथ हिलाकर इनकार किया, "आप ग़लत समझ रही हैं। मेरी माँ की हत्या नहीं हुई थी | उनकी मौत तो एक हादसे में हुई थी।"
"सब उसे हादसा मानते हैं मगर उस हादसे का सच कोई नहीं जानता," पिंकी ने एक साँस लीं और उसकी आँखें खिड़की के बाहर दूर किसी बिंदु पर जा टिकीं। "असल में आपकी माँ का कत्ल हुआ था। और ये बात आपको बताने के लिए आपकी माँ, अपनी मौत के बाद भी आपसे मिलने आया करती थीं।"
"हाँ, ये तो सच है," राज को अपने बचपन के वो दिन याद आए और उसने सर हिलाकर हामी भरी | "माँ के गुज़र जाने के बाद भी मुझे ऐसा लगता था कि वो मेरे आस पास ही हैं। मुझे माँ की आवाज़ सुनायी देती थी। वो मेरी बातों का जवाब दिया करती थीं। मगर, कुछ दिनों बाद वो सब बन्द हो गया। और मैंने इस घटना को अपना वहम मानकर भुला दिया।"
"वो इसलिए कि जिस शख्स ने आपकी माँ का कत्ल किया उसने आपके शरीर पर ऐसा कुछ बाँध दिया जिससे आपकी माँ की आत्मा आपसे सम्पर्क नहीं कर पाए। कोई ऐसी चीज़ जैसे कि..." पिंकी पल भर के रुक गयी और फ़िर बोली, "कोई ताबीज़!"
"ताबीज़?" राज हैरान हो गया। "मगर, मेरे शरीर पर तो कोई ताबीज़ नहीं है। अगर होती तो क्या मुझे नहीं पता चलता?"
"अभी पता चल जाएगा," पिंकी उठी और पूजाघर चली गयी।
उसने ईश्वर की मूर्ति के पास रखा कलश उठाया और राज के पास आकर खड़ी हो गयी।
"राज बाबू," कलश की ओर इशारा करते हुए पिंकी बोली, "इस कलश में मन्त्रों से सिद्ध तेल है। इसे मैं आप पर उड़ेल दूँगी तो आपका पूरा शरीर नीले रंग में रंग जाएगा। यदि आपके शरीर पर कोई ताबीज़ है तो सिर्फ़ उसका रंग नीला नहीं होगा।"
पिंकी ने राज के शरीर पर कलश में भरा तेल उड़ेल दिया। तेल राज के सर से होता हुआ उसके पूरे बदन पर फ़ैल गया। उसके बाल, उसका चेहरा, उसका बदन का हर अंग, ही नहीं उसके कपड़े, जूते, घड़ी, अँगूठी, सब नीले रंग में रंग गए। सिवाय उसके गले में पड़ी सोने की चैन के।
"ये चैन आपको किसने दी?" पिंकी ने चैन को ग़ौर से देखते हुए पूछा।
"मेरे डैडी ने," राज ने चैन के लॉकेट को देखते हुए कहा, "ये हमारी खानदानी चैन है। ऐसी चैन तो हमारे परिवार में सभी मर्दों के गले में है। पर ये चैन तो मेरे गले में मेरी माँ की मौत से पहले से है। मेरे जन्म के कुछ दिनों बाद ही ये चैन मुझे पहना दी गयी थी। और जहाँ तक मुझे याद है, उसके बाद मैंने इसे कभी अपने गले से नहीं उतारा।"
"ज़रा अपनी चैन उतारकर मुझे दीजिये," पिंकी ने हाथ आगे बढ़ाया।
राज ने अपने गले से चैन उतारकर पिंकी की हथेली में रख दिया। पिंकी ने पहले तो हथेलियों में रखकर चैन को उलट पलटकर देखा। फ़िर उसकी नज़र चैन के लॉकेट पर आकर रुक गयी। पिंकी ने अपना पूरा ज़ोर लगाकर उस लॉकेट को खोला। उस लॉकेट के अंदर एक ताबीज़ थी।
"ये ताबीज़ क्या इस लॉकेट के अंदर पहले से थी?" पिंकी ने ताबीज़ दिखाते हुए राज से पूछा।
"मुझे तो ये भी नहीं मालूम था कि ये लॉकेट खुलता भी है?" राज हैरान था। “फिर इसके अंदर किसी ताबीज़ के होने या न होने का पता मुझे कैसे लग सकता है ?”
"मैं जानती हूँ ऐसी ताबीज़ें कौन बनाता है?" ताबीज़ को ग़ौर से देखते हुए पिंकी बोली, "आप तांत्रिक कालेश्वर के पास चले जाइए और उनसे पूछिये ये ताबीज़ किसने और कब बनावायी थी? और उनसे कहिए कि वो इस ताबीज़ को नष्ट कर दें।"
"इस ताबीज़ का असर खत्म होते ही आपकी माँ की आत्मा आपसे बात कर सकेगी। उन्हें आपको बहुत कुछ बताना है, राज बाबू । वो आपको कई सारे ऐसे राज़ बताना चाहती हैं जो आप नहीं जानते। या फ़िर शायद उनके अलावा कोई भी नहीं जानता।”