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Adultery अतीत की खोज

मान्या की छाती के नशीले प्यालों से अपनी प्यास बुझाकर मैं उसे चूमते हुए उसकी नाभी तक उतर आया। अपनी जीभ से मैं उसकी नाभि के छल्लों से खेलने लगा। मान्या को गुदगुदी हुई और वो शर्मा कर मुस्कुरायी। इस पर मैंने उसकी पतली कमर से उसका भारी भरकम लहँगा उतार लिया और उसकी लंबी, सुडौल टाँगों से खींचकर लहँगे को नीचे फर्श पर बिछी कालीन पर फेंक दिया।

अब, मेरे सामने बिस्तर पर पड़ी मान्या के जवान जिस्म पर कोई पर्दा नही था। मैंने मान्या को बिस्तर से उठाया और अपनी गोद में बिठाकर बाँहों में कस लिया। उसके अल्हड़ स्तन ज़ोर से मेरी छाती से रंगड़ने लगे। मैने एक हाथ मान्या की कमर पर कस लिया और दूसरे हाथ से उसके नितंबों को मसलने लगा। मान्या ने मेरे गले में बाँहें डाल दीं और हम दोनों प्यार में पागल चकोंरों की तरह एक दूसरे को चूमने लगे। मैंने मान्या को पीठ के बल बिस्तर पर पटक दिया। बिस्तर पर गिरते ही मान्या के नग्न स्तन उसकी छाती पर थिरकने लगे।

मैंने उसकी गोरी टाँगों को एक दूसरे से दूर कर के बिस्तर पर फैला दिया। और फ़िर अपनी धोती उतार कर फेंक दी। मैंने उसके दोनों पैरों के अंगूठों को मुँह में ड़ालकर चूसा। फ़िर उसकी दोनों टाँगों को ऊपर छत की तरफ़ उठा दिया और उसकी ऐड़ियों को चूमते हुए उसकी जाँघों तक पहुँच गया। उसकी फैली टाँगों के बीच, उसकी कुँवारी चूत की नाज़ुक फाँकें अधखुली कली की तरह मोहक लग रहीं थी।

मैंने उसकी चूत की फाकों को प्यार से चूमा। मान्या की चूत से रस बरसने लगा था। मैं सदियों से रेगिस्तान में भटकते प्यासे राहगीर की तरह उसकी चूत से बरसते रस को चूसने लगा। मगर प्यास थी कि बढ़ती ही जाती थी। मैं उस नशीले रस का एक कतरा भी ज़ाया नहीं करना चाहता था। इसलिए मैंने मान्या की चूत की फाकों को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया। मान्या ज़ोर ज़ोर से चीख़ने लगी मगर मेरी जीभ उसकी चूत से खेलती ही रही।

मेरा लंड अब उत्तेजना की सारी हदें पार कर बरसने को तैयार था। मैंने मान्या की चूत की फाकों को उंगलियों से ऊपर उठाया और अपने लंड को धीरे से अंदर प्रवेश करवाया। मान्या की चूत, पुरुष के स्पर्श से अनजान थी इसलिए मान्या को पहला धक्का लगते ही वो कराह उठी। मेरा लंड बरसने को बेकरार था इसलिए मैंने घर्षण की गति बढ़ा दी। हर धक्के के साथ मान्या का दर्द बढ़ जाता और वो और ज़ोर से चीख़ने लगती। उसकी एक आख़िरी चीख़ कमरे में गूँजी और वासना के रस से उसकी चूत भीग गयी।

"आ...आह....हह "

मान्या काम की चरम सीमा के सुख में मदहोश हो गयी। उस कमसिन हसीना का जवान बदन, पहली बार के सम्भोग से थककर इस कदर चूर हो चुका था कि वो कब अपनी सुध बुध खोकर नींद की आगोश में समा गयी उसे खुद भी पता न चला।
 
"द्वार खोलिए, शहज़ादी जी!"

दरवाज़े पर ज़ोर की दस्तक के साथ एक दासी की ड़र से कम्प कम्पाती आवाज़ सुनी तो हम दोनों चौंकते हुए जागे। काम की अगन में तपने के बाद हम दोनों, एक दूसरे की बाँहों में बेसुध से पड़े थे। जागते ही हमें हमारी नग्नता का एहसास हुआ और हमने फ़ौरन कपड़े पहन लिए।

"लगता है कोई मुसीबत आ पड़ी है," मान्या हड़बड़ाती हुई उठी और द्वार खोलने चली गयी।

जाने से पहले मान्या ने मुझे इशारे से कमरे के अंदर ही रहने को कहा। मैं सोच में पड़ गया कि इतनी रात गए भला क्या बात हुई होगी कि दासी इस कदर डरी हुई है? मगर, वो क्यूँ डरी हुई है? और उसे ड़र किससे लग रहा है? चाँदी महल की सारी दासियाँ और दूसरे कर्मचारी मान्या के वफादार थे। मेरे, शहज़ादी के कक्ष में होने की बात वो कभी किसी से नहीं कहेंगे इस बात का पूरा यकीन हम दोनों को था। फ़िर ऐसी क्या आफ़त आ गयी होगी?

"जल्दी द्वार खोलिए, शहज़ादी जी!" दासी की साँसें चढ़ी हुईं थी।

"क्या बात है?" मान्या ने झट से दरवाज़ा खोल दिया।

"महाराज ने आपको अपने कक्ष में बुलाया है," दासी हाँफते हुए बोली।

"इस समय?" हैरानी के मारे मान्या की आँखें फैल गयीं और उसके माथे पर सिलवटें पड़ीं। "इतनी रात गए?"

"महाराज की तबियत बहुत खराब हो गयी है।" दासी ने एक गहरी साँस ली और कहा, "वो आप से इसी समय मिलना चाहते हैं।"

"क्या?" मान्या की आवाज़ में दर्द भी था और ड़र भी।

महाराज के बीमार होने को बात सुनकर मुझसे रहा नहीं गया और मैं, मान्या को संभालने कमरे के द्वार पर आ गया।

"महाराज ने आपको बुलाने के लिए भी अपना दूत भेजा है, सेनापति महोदय," मुझे देखते ही दासी बोली।

"हमें देर नहीं करनी चाहिए, वीरभद्र," मान्या ने मेरी बाँह कसकर पकड़ ली। मैं उसकी उँगलियों की कम्प कँपी महसूस कर पा रहा था।

"ठीक है," मैंने उसका हाथ थाम लिया और दासी से कहा, "शहज़ादी जी की पालकी ले आओ।"

"जो आज्ञा," दासी ने सर झुकाकर हाथ जोड़े और फौरन चली गयी।

"हम अपने घोड़े पर राजमहल की ओर रवाना होंगे," दासी के जाने के बाद मैंने मान्या से कहा। "आप पालकी में बैठकर आ जाईये।"

पिता की बीमारी का सुनकर मान्या की आँखें भर आयी थीं। उसने सर हिलाकर हामी भरी और तैयार होने कमरे की अंदर चली गयी। मैं फौरन चाँदी महल के द्वार पर बँधे अपने घोड़े की तरफ़ चल पड़ा।

• • •

मैं जब राजमहल पहुँचा तो मान्या और उसकी छोटी बहन शहज़ादी रम्यसुता दोनों महाराज के सिरहाने बैठी हुईं थीं। बड़े से कक्ष के ठीक बीच, महाराज भानुप्रतापदेव अपने मखमली बिस्तर पर राजपरिवार के सभी सदस्यों से घिरे, लेटे हुए थे। उन्हें साँस लेने में खासी दिक्कत हो रही थी। पास ही राजवैद्य सर झुकाये खड़े थे। उनके मुरझाए चेहरे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि अब उनके लिए महाराज के मर्ज़ के इलाज कर पाना मुमकिन नही था।

मुझे देखते ही महाराज की अधमरी आँखें चमक उठीं। उन्होनें इशारे से सबको बाहर जाने को कहा। अब कमरे में केवल मैं और दोनों राजकुमारियाँ हीं रह गए थे। महाराज ने हाथ से मुझे उनके पास आने का इशारा किया। मैं फ़ौरन उनके सिरहाने पहुँच गया और मान्या के पास खड़ा हो गया।

"सेनापति वीरभद्र," महाराज बड़ी मुश्किल से बोल पा रहे थे, "मेरे पास अब अधिक समय शेष नहीं है।"

उनकी ये बात सुनते ही उनकी दोनों बेटियाँ सिसकियाँ भरने लगीं।

"ऐसा मत कहिए, महाराज," मैंने उन्हें दिलासा देते हुए कहा, "आप बहुत जल्द स्वस्थ हो जायेंगे।"

"नहीं सेनापति," महाराज की बेजान आँखों में निराशा का अँधेरा झलक रहा था, "राजवैद्य ने स्वयं हमें सूचित किया है। परंतु हमें हमारे प्राण गँवाने का ड़र नहीं है। हमें तो चिंता हमारे राज्य और प्रजा की है, हमारी शहज़ादियों और समस्त राजपरिवार की है। हमारे बाद इनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व कौन उठाएगा?"

"हम अपने प्राणों की आहुति देकर भी इस राज्य की प्रजा और राजपरिवार की रक्षा करेंगें।" मैंने महाराज को वचन दिया।

"हमें आपसे यही उम्मीद थी, सेनापति," महाराज के चेहरे पर ज़रा सी रंगत वापस आ गयी। "आप तो जानते हैं हमारा राज्य कितना सम्पन्न है। आस पड़ोस के राजाओं को हमारे राज्य की इस दिन दूनी, रात चौगुनी प्रगति से ईर्ष्या होती है। हमारे राज्य पर उन सबकी बुरी नज़र है। वो हमारे राज्य को अपने राज्य में मिलना चाहते हैं। अगर, ऐसा हुआ तो घोर अनर्थ हो जाएगा। अपना राजकोष धन से भरने के लिए वो हमारी प्रजा को प्रताड़ित करेंगे। हमारे राज्य की प्रगति रुक जाएगी और यहाँ केवल बर्बादी का तांडव होगा।"

"नहीं महाराज!" भानुगढ़ की बर्बादी की बात सुनते ही मेरा खून खौल उठा। "हमारे रहते ऐसा किसी कीमत पर नहीं होगा।"

"हमें आपके शौर्य पर पूरा विश्वास है, सेनापति।" महाराज के मुख पर चिंता के काले बादल उमड़ आये। "किंतु हमें गुप्तचरों से सूचना मिली है कि हमारे बीमार होने की ख़बर आस पड़ोस के राज्यों तक पहुँच चुकी है। और हमें ड़र है कि वो इस अवसर का लाभ उठाने के लिए हमारे खिलाफ़ कोई षड़यंत्र न रच रहे हों। सेनापति हम चाहते हैं कि आप हमारे राज्य की समस्त सीमाओं पर अपने सैनिकों का पहरा और भी कड़ा कर दें। यदि किसी भी समय हमारे राज्य पर आक्रमण हो तो मुकाबले के लिए हमारी सेना पूरी तरह से तैयार होनी चाहिए। ये उत्तरदायित्व हम आपको सौंपते हैं, सेनापति।"

"जैसी आपकी आज्ञा, महाराज," मैंने सर झुकाकर हाथ जोड़े और कहा, "हम अभी इसी क्षण जाकर सभी सीमाओं का मुवायना कर आते हैं। यदि आवश्यकता हुई तो हम सीमा पर सेना की अतिरिक्त टुकड़ियों को भी भेज देंगे। और कल सुबह का सूरज उगते ही सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश भी जारी कर दिया जाएगा।"

"हमें आपसे यही उम्मीद थी, सेनापति।" महाराज ने राहत की साँस लीं और कहा, "पूरे भानुगढ़ को आप पर अभिमान है, सेनापति वीरभद्र। आपके होते हुए कोई इस राज्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकता।"

"आज्ञा दीजिये, महाराज," हाथ जोड़े हुए मैंने महाराज की बीमार आँखों में देखा और कहा। "हमें इसी समय राज्य की उत्तरी सीमा की ओर निकलना है।"

"विजयी भव, सेनापति वीरभद्र," महाराज की बड़ी मुश्किल से एक गहरी साँस लेते हुए कहा, "कुलदेवी का आशीर्वाद आप पर सदैव बना रहे।"

मैंने एक नज़र महाराज के पास बैठी मान्या को देखा। उसकी कजरारी आँखें आँसुओं से भीगी हुईं थीं। उससे निशब्द विदाई लेकर मैं तेज़ी से महाराज के कक्ष से बाहर निकल आया। कक्ष के बाहर वाले गलियारे में मैंने जैसे ही कदम रखा, मुझे वहाँ किसी का साया नज़र आया जो मेरे आते ही कहीं छुप गया। मुझे शक हुआ कि कोई छुप छुपकर हमारी बातें तो नहीं सुन रहा था? अगर ऐसा है तो उसे जल्द से जल्द मौत के घाट उतार देना चाहिए।

मैंने म्यान से तलवार निकाली और उस दिशा की ओर भागा जहाँ मैंने उस साये को देखा था। मगर, मुझे कहीं कोई नज़र नहीं आया। मैं जल्दी में था इसलिए ज़्यादा तहकीकात करने का वक़्त नहीं था मेरे पास। मैं फ़ौरन राजमहल के मुख्य द्वार की तरफ़ बढ़ा। मैं जैसे ही द्वार पर खड़े अपने घोड़े पर सवार हुआ मुझे किसी कबूतर की गुटर-गूँ और पंख फड़फड़ाने की आवाज़ सुनायी दी। मुझे हैरानी हुई कि इतनी रात गए कोई पक्षी क्यों उड़ रहा है? मगर क्योंकि मैं सीमा पर पहुँचने की जल्दी में था मैंने इस बात को नज़रंदाज़ कर दिया और आगे बढ़ गया।
 
राजमहल से बाहर निकलते ही मैंने अपने घोड़े को बिजली की रफ़्तार से दौड़ाया। मैं पहले तो पक्की सड़कों से होते हुए कच्ची सड़कों पर और फ़िर खेतों के बीच से होते हुए राज्य की उत्तरी सीमा की ओर बढ़ गया। गाँव के बाहर एक दरिया था जिसे मैं पार कर के आगे बढ़ गया। उत्तरी सीमा पर छोटी बड़ी कई सारी पहाड़ियाँ थीं। इन पहाड़ियों को जाने वाला रास्ता घने जंगल से होकर जाता है।

जंगल से होकर गुज़रते वक़्त मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि मैं उस वीराने जंगल में अकेला नहीं हूँ। कोई लगातार मेरा पीछा कर रहा है। एक दो बार मैंने अपने घोड़े को रोककर आस पास देखा भी। मगर, कहीं कोई नहीं था। मैंने उसे अपना वहम मान लिया और आगे बढ़ गया। वैसे भी, इतनी रात गए उस वीरान, खौफ़नाक जंगल में किसी का आना जाना नहीं था।

जंगल पार कर के मैं पहाड़ियाँ चढ़ने लगा। पहाड़ियों पर सड़क गोल गोल घूमकर ऊपर की ओर जाती थी। पहाड़ियों के सबसे ऊपरी छोर पर सेना की कुछ छावनियाँ थी जहाँ भानुगढ़ के सैनिक पहरा दे रहे थे। मुझे उन छावनियों का मुवायना करना था और सैनिकों को चेतावनी देनी थी कि पड़ोसी राज्यों के आक्रमण करने की संभावना है। और ऐसी स्थिति में हमारी सेना युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार रहे। युद्ध की पूरी योजना बनाकर मुझे उन्हें तैयार करना था।

मैं, धीरे धीरे काफ़ी ऊँचाई पर चढ़ गया था। मैं जिस सड़क से गुज़र रहा था वहाँ एक तरफ़ तो पेड़ों के झुरमुट थे और दूसरी तरफ़ कईं फ़ीट गहरी खाई थी। दूर कोहरे में डूबी घटियाँ भी नज़र आ रही थीं। मैं, छावनी से बस थोड़ी ही दूरी पर था। तभी न जाने क्यों मेरे मन में खौफ़ और बेचैनी घर कर गयी। मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा था कि ये अचानक मुझे क्या हो गया है? मैंने अपने घोड़े की रफ़्तार और तेज़ कर दी।

तभी अचानक सड़क के किनारे खड़े पेड़ों के झुरमुट के बीच कोई हरकत हुई। और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, एक तीर सीधे मेरे सीने में आकर लगा। उस तीर ने मेरा दिल चीर दिया और मेरी छाती से खून की नदियाँ बहने लगी। तब जाकर सारा मामला मेरी समझ में आया। दरअसल कोई मेरी हत्या करने का षड़यंत्र रच रहा था। कोई महराज के कक्ष के बाहर छिपकर हमारी बातें सुन रहा था। उसने मालूम किया कि मैं भानुगढ़ की उत्तरी सीमा की ओर जाने वाला हूँ।

फ़िर उस कबूतर की आवाज़ का सुनायी देना, दरअसल इस बात का संकेत था कि कोई किसी को मेरी यात्रा के बारे में बताने के लिए संदेश भेज रहा था। राजमहल से यहाँ तक कोई लगातार मेरा पीछा कर रहा था और सही मौके की ताक में था। उसे मालूम था कि अगर मैं छावनी तक पहुँच गया तो फ़िर वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा। इसलिए उसने इस वीराने में छुप कर मुझ पर हमला किया।

मगर, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वो अपनी साज़िश में कामयाब हो चुका था। तीर लगने की वजह से मेरा संतुलन बिगड़ गया। मेरा घोड़ा बे-लगाम हो गया। घबराये हुए घोड़े ने अपने आगे के दोनों पैर जमीन से ऊपर उठा लिए। उसके पीछे के दो पैर लड़खड़ा गए और वो अपना संतुलन खो बैठा। लड़खड़ाते हुए वो खायी की ओर बढ़ा और हम दोनों हज़ारों फ़ीट गहरी खाई में गिरने लगे। नीचे खाई में नदी बह रही थी जिसका पानी उफ़ान पर था। पानी के तेज़ बहाव से बचकर निकलना असम्भव था। मुझे मेरी आँखों के सामने मौत का तांडव साफ़ नज़र आ रहा था। तभी मेरा सर खाई की किसी चट्टान से जा टकराया और मैं दर्द के मारे कराह उठा।

• • •
 
"न...हही....ई...ईई!"

राज ने चीखते हुए आँखें खोलीं और ज़ोर ज़ोर से हाँफते हुए हैरान आँखों से अपने चारों तरफ़ देखा। उसे एहसास हुआ कि वो डॉ दामले के केबिन में है। उसने एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा हथेलियों में छुपा लिया।

"रिलैक्स चैम्प!" डॉ दामले ने पानी से भरा एक ग्लास राज की तरफ़ बढ़ाया और कहा, "लो पानी पियो।"

राज ने उनसे ग्लास ले लिया और गटागट पी लिया।

"ये सब जो मैंने देखा, वो क्या था, डॉक?" ग्लास डॉ दामले को वापस देते हुए राज ने पूछा। वो अब भी काँप रहा था।

"देखो चैम्प," डॉ दामले ने अपना चश्मा सीधा किया और राज को ग़ौर से देखा, "हमारा शरीर दो तरह का होता है। एक हाँड़ माँस का बना होता है, जिसे हम स्थूल शरीर कहते हैं। इस स्थूल शरीर को हम देख सकते हैं, छूकर महसूस कर सकते हैं। और हमारी मौत के बाद इस शरीर का वजूद खत्म हो जाता है। इस शरीर के अंदर एक शरीर और होता है जिसका कोई रूप नहीं। ये सिर्फ़ ऊर्जा होती है। इसे देखा तो नहीं जा सकता, सिर्फ़ महसूस किया जा सकता। और इसका वजूद कभी नहीं मिटता क्योंकि ऊर्जा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।"

"यही वो ऊर्जा है जो हाँड माँस के बने हमारे इस शरीर में जान डालती है। ये ऊर्जा अगर हमारे शरीर से निकल जाये तो शरीर बेजान हो जाता है। इस ऊर्जा को आत्मा या स्पिरिट वगैरह भी कहा जाता है। कहा जाता है कि एक शरीर जब खत्म हो जाता है तो ये ऊर्जा उस शरीर से निकलकर ब्रह्माण्ड में घूमती रहती है। और फ़िर किसी नए शरीर में जाकर उसमें जान डाल देती है।"

"अब, हमारे अंदर जो ये ऊर्जा रूपी सूक्ष्म शरीर होता है, ये एक हार्ड डिस्क की तरह होता है जिसमें काफ़ी सारी बातें और यादें स्टोर हो जाती हैं। जैसे कि जो घटनाएँ तुम्हारे साथ तुम्हारे किसी पिछले जन्म में हुईं या फ़िर कोई ऐसी विद्या जो तुमने उस समय सीखी हो। ज़्यादातर ये यादें हमारे सबकॉन्शियस माइंड की गहराईयों में दबी रहती हैं। लेकिन, कुछ ख़ास हालातों में ये यादें, हमें फ़िर से याद आ जाती हैं। मुझे लगता है ऐसा ही कुछ तुम्हारे साथ भी हुआ है।"

"आपके कहने का मतलब है कि मैं पिछले जन्म में भानुगढ़ का सेनापति वीरभद्र सेन था?" राज ने बड़ी हैरानी से डॉ दामले को देखते हुए पूछा। "और ये सब मेरी आपबीती है?"

"हालाँकि मेरे पास कोई पुख्ता सबूत तो नहीं है," डॉ दामले ने नज़रें झुका लीं। "इसलिए, कोई दावा नहीं करूँगा। मगर, मुझे लगता है ये सच है।"

"चलिए, मान लेते हैं कि यही सच है," राज के माथे पर सिलवटें पड़ीं और वो गहरी सोच में डूब गया। "मगर, फ़िर भी ये पूरा सच नहीं है। बहुत सारे सवाल और बाकी हैं।"

"जैसे कि?" डॉ दामले की नजरें राज की हैरान आँखों से मिलीं।

"वो जल्लाद जैसे दिखने वाले वहशी दरिंदे कौन हैं जो मुझे सपनों में दिखायी देते हैं?" अपने उस डरावने सपने के बारे में सोचकर राज के रोंगटे खड़े हो गये। "फ़िर, वो सैनिक? वो भानुगढ़ के सैनिक तो नहीं हो सकते क्योंकि उनकी वर्दी भानुगढ़ के सैनिकों से अलग थी। और वो शहज़ादी...वो बहुत तकलीफ़ में लगती है। उसकी आँखों में देखकर लगता है जैसे वो मुझसे कुछ कहने को तड़प रही है। कितना दर्द है उसकी उन खूबसूरत आँखों में।"

"आप तो कहते थे हिप्नोसिस के दौरान मैं उन सभी चेहरों को देख पाऊँगा जिनकी तस्वीर मेरे सबकॉन्शियस माइंड में दर्ज है। अगर उस वहशियों का ताल्लुक उन दोनों शहज़ादियों से है तो ज़रूर मुझसे भी उनका कोई सरोकार ज़रूर होगा। फ़िर मैं हिप्नोसिस के दौरान उन सैनिकों और जल्लादों को क्यों नहीं देख पाया।"

"हो सकता है वो लोग भानुगढ़ की इस कहानी से तुम्हारी मौत के बाद जुड़े हों," कुछ सोचते हुए डॉ दामले बोले | "तुम अपने जीवनकाल में उन लोगों से कभी नहीं मिले। इसलिए तुम्हारे माइंड में उनकी कोई तस्वीर भी नहीं। ख़ैर, अब तो उस कहानी को खत्म हुए सदियाँ बीत गयी हैं। अब भूल जाओ उन सबको।"

"अगर वो कहानी सदियों पहले खत्म हो गयी तो उसकी झलक मुझे इतने सालों बाद अब क्यों दिखायी दे रही है?" राज ने सीधे डॉ दामले की आँखों में देखा तो उन्होनें नज़रें झुका लीं "आप हमेशा कहते हैं न डॉक कि कुछ भी बेवजह नहीं होता। तो फ़िर इसकी भी तो कोई वजह होगी। मुझे नहीं लगता वो कहानी खत्म हो गयी है। मुझे तो लगता है कि वो शहज़ादी अब भी मुझसे कुछ कहना चाहती है। शायद, वो चाहती है कि मैं उसकी मदद करूँ। मगर, मैं उसकी क्या मदद कर सकता हूँ? और कैसे?"

"पागल हो गए हो क्या, चैम्प?" डॉ दामले ने राज के कँधों पर हाथ रखकर उसे ज़ोर से हिलाया जैसे उसे होश में लाने की कोशिश कर रहें हों। "तुम्हें पता भी है तुम क्या बकवास कर रहे हो? तुम्हारे कहने का मतलब है कि वो शहज़ादी इतनी सदियों से भानुगढ़ के किले में तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी कि कब तुम आओ और उसकी मदद करो। वॉट रबिश, चैम्प!"

डॉ दामले ने राज से नज़रें फेर लीं और एक गहरी साँस लेकर खुद को शांत किया। फ़िर वो दोबारा राज से मुखातिब हुए।

"चैम्प, तुम किसी ज़माने में भानुगढ़ के सेनापति वीरभद्र हुआ करते थे," डॉ दामले, राज को बड़े प्यार से समझाते हुए बोले। "मगर, तुम्हारी वो ज़िन्दगी खत्म हो चुकी है। अब, तुम राज शर्मा हो। इसलिए, अपने बीते हुए कल की यादों को अतीत में छोड़कर, अपने आज पर ध्यान दो। देखो, ये शो तुम्हारे करियर के लिये बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये तुम्हारा पहला शो है। अपने दिमाग से सारी बेतुकी बातें निकाल दो और अपना पूरा ध्यान अपने शो पर लगाओ। अच्छा बताओ, वापस भानुगढ़ कब जा रहे हो?"

"कल सुबह की ट्रेन से," राज ने आह भरी और नज़रें झुका लीं।

"तो फ़िर आज तुम मेरे घर चलो," डॉ दामले का चेहरा दमक उठा। "घर जाकर हम दोनों जल्दी से फ्रेश हो जाएंगे और फ़िर तुम्हारा फ़ेवरिट चीज़ पिज़्ज़ा आर्डर करेंगें। उसके बाद जमकर पेग लगायेंगे और रात भर बातें करेंगें। क्या कहते हो चैम्प? हो जाये?"

"आपको न कहने की जुर्रत कैसे कर सकता हूँ, डॉक?"

"ये हुई न बात!" डॉ दामले ने चुटकी बजायी और अपने कोट की जेब से कार की चाबी निकाली और राज को दे दी। "तुम नीचे पार्किंग में जाकर गाड़ी स्टार्ट करो, मैं क्लिनिक बन्द कर के अभी आता हूँ।"

"जैसी आपकी आज्ञा," राज ने अपना सर झुकाया और उसके हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए।

मगर, तभी उसके साथ एक अजीब सी बात हुई | उसे डॉ दामले के चेहरे में, ऐसा कोई चेहरा नज़र आया जिसे उसने हिप्नोसिस के दौरान देखा था। झुर्रिदार चेहरे पर वही मुस्कान, वही आँखें जो वीरभद्र को देखते हीं चमक उठती थीं | मगर, उसे ये याद नहीं आ रहा था कि वो चेहरा था किसका ? राज पल भर के लिए सिहर उठा। लेकिन उसने ये बात डॉ दामले को न बताना ही मुनासिब समझा। उसे ड़र था कहीं वो उस पर पागल होने का इल्ज़ाम न लगा दें। उसने कार की चाबी अपनी जेब में डाली और चुपचाप बेसमेंट की तरफ़ चल पड़ा।

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"हमारी रक्षा कीजिये, वीरभद्र!"

राज के कानों में आँसुओं से भीगी एक आवाज़ गूँजी और उसका सर दर्द से फटने लगा। उसने अपनी आँखें कसकर मीच लीं और कानों पर हाथ रख लिए। मगर, इससे उन चीखों की गूँज शांत नहीं हुई। वो दर्दनाक चीखें उसे बेचैन करने लगीं और वो उसका पूरा बदन पसीने से भीग गया। हर गुज़रते पल के साथ वो चीखें और भी भयानक होती गयीं। राज के दिल के धड़कनों की रफ़्तार भी तेज़ होती गयी। एक पल ऐसा आया कि राज के लिए इसे और ज़्यादा बर्दाश्त कर पाना मुश्किल हो गया। उसे लगा कि उसका दिल फट जाएगा।

"मान्या!" राज चिल्लाते हुए नींद से जागा।

साँसे ज़रा काबू में आयीं तो राज बिस्तर पर उठकर बैठ गया और उसने अपना सर ज़ोर से झटका। जैसे वो उस भयानक सपने को अपने मन से निकाल फेंकना चाहता हो। दिन चढ़ आया था और सूरज की सुनहरी किरणों से कमरा जगमगा रहा था। कल, राज की ट्रेन काफ़ी देर से भानुगढ़ पहुँची थी |

जब वो ब्रिगेडियर के बँगले पहुँचा तो रात हो चुकी थी। रात के खाने के बाद दोनों ने देर रात तक बैठकर खूब बातचीत की। अपनी इस बातचीत के दौरान वो दोनों शराब के कितने पेग गटक गए, उन्हें खुद भी इल्म नहीं था। सफ़र की थकान और रात को देर से सोने के कारण राज सुबह देर तक सोता रह गया। शराब की खुमारी का असर सो अलग।

'ये सपना मुझे बार बार क्यों आता है?' एक गहरी साँस लेते हुए राज ने सोचा। 'डॉक कहते हैं कि से सब मेरे दिमाग का फितूर है। मगर, मैं उनकी बात का यकीन क्यों नहीं कर पाता? क्यों मैं इन सबको अतीत की परछाई समझ कर नहीं भूल पाता? क्यों मुझे लगता है कि वो कहानी अब भी खत्म नहीं हुई है?'

'क्यूँ मुझे ऐसा लगता है कि उन खंडरों में अब भी कुछ बाकी है। जैसे आज भी वहाँ कोई मेरा इंतज़ार कर रहा है। क्या ये सिर्फ़, हर वक़्त उस किले के बारे में सोचने का नतीजा है? जैसा कि डॉक कहते हैं। दिमाग तो चाहता है कि उनकी बात पर यकीन के लूँ । मगर, मन किसी भी कीमत पर इसे स्वीकारने को तैयार नहीं। अब, सच्चाई का पता लगाऊँ तो कैसे?'

'भानुगढ़ के लोग तो न जाने कैसी कैसी मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाते हैं। जितने मुँह, उतनी बातें। हर कोई उस भूतिया किले को लेकर अपनी एक नयी कहानी बना ड़ालता है। सारणीया राजवंश के साथ जो हुआ, उसका सच कौन जानता होगा? इतने सालों पहले जो हुआ उसकी कहानी बयान करने वाला आज कौन बचा होगा? हे भगवान ! अब आप ही कोई रास्ता दिखाओ ताकि मैं इन सारी कहानियों के पीछे छुपी सच्चाई जान सकूँ।'

तभी कमरे का दरवाज़ा खुलता है और ब्रिगेडियर का नौकर हरिया एक ट्रे में चाय की प्याली लिए कमरे में दाखिल हो जाता है।

"राम राम बाबू जी," हरिया ने अपने तम्बाकू सने दाँतों का प्रदर्शन करते हुए कहा। "रात को नींद तो ठीक से आती है ना आपको?"

"ह...हाँ बिल्कुल आती है," राज ने उससे नज़रे चुराते हुए कहा।

"हम सबको आपकी बड़ी चिंता सताती है," हरिया अफ़सोस जताते हुए बोला।

"वो क्यों?" भौहें सिकोड़े राज ने नौकर को सर से पाँव तक घूरा।

"आप उस भूतिया किले में जो हो आये हो," हरिया ने दबी आवाज़ में कहा। "कहते हैं, उस किले में जो भी गया वो या तो पगला गया या जान से हाथ धो बैठा। आप तो ठाकुरजी का सुक्रिया अदा करो कि बहाँ से सही सलामत बापस आ गए।"

"आपसे पहले भी एक बाबू आये थे सेहर से जो टी वी में काम करते थे। सारा भानुगढ़ जानता है क्या दुर्दसा हुई थी उनकी। और हो भी क्यों न? उस किले में ऐसे भयानक भूत हैं जो हैं। बड़ी ही मनहूस जगह है, बाबू जी। आप पर भी उस किले का काला साया पड़ चुका है। मेरी मानो तो आप सिद्धेस्वर बाबा के यहाँ हो आओ। वो आपकी सारी तकलीफ़ दूर भगा देंगे।"

"कौन? बाबा अमरेश्वर?" राज को याद आया कि इस बाबा का ज़िक्र उससे रमण ने भी किया था।

"जी," हरिया ने सर हिलाया, "कईं सारी सिद्धियाँ हैं बाबा के पास। बाबा ऐसा इलाज करेंगे कि जिंदगी भर कोई भूत हिम्मत न कर पायेगा आपके आस पास फटकने की। अरे! तौबा तौबा।"

"क्या हुआ ?" हरिया को हड़बड़ाते हुए कमरे के दरवाज़े की तरफ़ भागते हुए देखकर राज ने पूछा।

"कहीं ब्रिगेडियर साहब ने हमारी बातें सुन लीं तो हमारा अभी के अभी कोरट मार्सल कर देंगे। फ़िर तो गयी हमारी नौकरी!"

दरवाज़े के पास पहुँच कर हरिया ठिठककर रुक गया और मुड़कर बिस्तर पर बैठे राज को देखा।

"अगर जान प्यारी है ना बाबू तो हमारी बात अनसुनी करने की गलती मत कीजियेगा। बाबाजी से जरूर मिल आईए।"

इतना कहकर हरिया वहाँ से फ़ौरन रफूचक्कर हो गया।

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"मोरे मन में बसे हो रा...आ..म

दिन रैन जपूँ मैं तेरो ना...आ..म |"

बाबा अमरेश्वर की मोहक आवाज़ में भजन सुनकर, राज को अपने मन पर रखा बोझ कुछ हल्का सा लगने लगा। ढलती शाम के वक़्त, ईश्वर की मूर्ति के सामने जलते घी के दियों और अगरबत्तियों की महक से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया था। राज, हमेशा से ही इन साधु सन्यासियों को पाखण्डी ही समझता आया था। वो, बाबा सिद्धेश्वर के आश्रम आने से हिचकिचा भी रहा था। मगर वो करता भी तो क्या? उसके पास और कोई रास्ता भी तो नहीं था।

भानुगढ़ की शहज़ादी क्यों हर रात उसके सपनों में उसे मदद के लिए पुकारती है, ये जानना उसके लिए बहुत ज़रूरी हो गया था। उस खौफ़नाक सपने ने उसकी रात की नींद उड़ा रखी थी। न जाने कितनी रातों से वो ठीक से सोया नहीं था। और वो अच्छी तरह से जानता था कि जब तक वो इस राज़ की गुत्थी को सुलझा नहीं लेता वो चैन से सो पायेगा भी नहीं। अब, बाबा अमरेश्वर ही उसकी आखिरी उम्मीद थे।

बाबा ने भजन खत्म किया और संध्या –आरती का प्रसाद भक्तों में बाँटना शुरू किया। सारे भक्त, उनके आगे एक लंबी कतार बनाकर खड़े हो गए। सब एक एक कर के आगे आते और बाबा के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते। बाबा, भक्तों के सर पर हाथ रख उन्हें आशीष देते और हाथ में प्रसाद देकर उन्हें चलता कर देते। जब राज की बारी आयी तो उसने बाबा के चरणों में अपना सर झुकाया। बाबा ने उसके सर पर हाथ रखकर आर्शीवाद दिया।

"मुझे आप से भानुगढ़ के किले के बारे में कुछ बात करनी है," राज ने सर उठाकर बाबा की आँखों में देखा।

"मुझे पता था कि एक न एक दिन तुम मेरे पास ज़रूर आओगे, राज," बाबा ने मुस्कुराते हुए कहा।

"आप मेरा नाम कैसे जानते हैं ?" राज चौंक गया।

"चौंकने की आवश्यकता नहीं है,” राज को प्रसाद देते हुए बाबा ने कहा। "तुम्हारे बारे में मुझे रमण ने बताया था। तुम भी उसकी तरह भानुगढ़ के किले पर शो करने आये हो न?"

"जी," राज ने सर झुका लिया।

"सदानन्द!" बाबा ने पास खड़े अपने चेले को पुकारा, "इन्हें हमारे आश्रम के अतिथि गृह ले जाओ।"

"जी गुरुदेव," सदानन्द आगे आया और राज की बगल में खड़ा हो गया।

"तुम, सदानन्द के साथ जाओ और अतिथि गृह में हमारी प्रतीक्षा करो," बाबा ने राज से कहा। "हम भक्तों में प्रसाद बाँटकर अभी आते हैं।"

"आईये श्रीमान," सदानन्द ने कहा और राज उसके पीछे पीछे चल पड़ा।

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एक छोटे से गलियारे से होते हुए सदानन्द आगे बढ़ा और उस गलियारे के आखिर में एक कमरे का दरवाज़ा खोल दिया।

"आप यहाँ बैठिये," कमरे में रखी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए सदानंद बोला, "गुरुदेव कुछ ही पलों में आप से भेंट करेंगे।"

"थैंक्स...मेरा मतलब है...धन्यवाद," राज मुस्कुराया।

सदानन्द ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े और वहाँ से चला गया।।

राज कुर्सी पर बैठ गया और बाबा के आने का इंतज़ार करने लगा | वक़्त काटने के लिए राज कमरे का मुवायना करने लगा।

आश्रम का अतिथि गृह एक छोटा सा कमरा था जिसमें कहीं कोई साज सजावट नहीं थी। फ़र्श पर गोबर का लेप लगा था और दीवारों पर मिट्टी से पुताई की गयी थी। कमरे का दरवाज़ा लकड़ी का था और कमरे में न लाइट थी, न पंखा। मगर, कमरा था बड़ा साफ़ सुथरा। रोशनी के लिए कमरे में कुछ दिए जलाकर रख दिए गए थे। पश्चिम की तरफ़ एक खिड़की थी जिस पर पर्दा लगा था जो बाहर से आती ठंडी हवा में फड़फड़ा रहा था। कमरे के एक तरफ़ एक चारपाई पड़ी थी और उसके पास एक कुर्सी थी जिस पर राज बैठा था।

"जय श्रीराम!"

बाबा कमरे के दरवाज़े पर हाथ जोड़े खड़े नजर आये तो राज का ध्यान कमरे की चीज़ों से हटकर उनकी ओर ही गया।

"जय श्रीराम बाबा," राज फ़ौरन कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया।

"बैठो राज," बाबा मुस्कुराते हुए चारपाई पर बैठ गए और बोले, "बोलो तुम्हें क्या कष्ट है।"

राज ने वो सब बाबा को कह सुनाया जो उसे अपने उस भयानक सपने में दिखायी देता था। और ये भी कहा कि उस रात किले में शूटिंग करते वक़्त, वही सब उसने अपनी खुली आँखों से भी देखा था।

“ऐसा हम किसी को पहली बार कहते सुन रहे हैं कि उसे राजकुमारियाँ दिखायी दीं," राज की बात सुनने के बाद बाबा ने कहा।

"अक्सर रात के समय किले के खण्डरों के आस पास से होकर गुजरने वाले लोगों के साथ अनहोनी घटनाएँ होती हैं। कुछ लोगों ने कुछ डरावने, काले साये भी देखें हैं वहाँ। मगर, शहज़ादियों का ज़िक्र किसी ने नहीं किया । अगर वो राजकुमारियाँ तुम्हारे सामने प्रकट हुईं हैं तो हो सकता है वो तुम्हें कोई सन्देश देना चाहती हों।"

"संदेश?" भौंहें सिकोड़े राज, बाबा को देखने लगा। "कैसा सन्देश, बाबा?"

"ये तो हम नहीं जानते मगर इतना ज़रूर जानते हैं कि राजकुमारियाँ किसी न किसी मकसद से ही तुम्हारे सामने प्रकट हुई हैं।"

हैरान राज बाबा की बातों में छुपे अर्थ को समझने की कोशिश करने लगा।

"उस किले के भूतिया होने के पीछे की वजह को लेकर बहुत सारी कहानियाँ प्रचार में हैं।" बाबा ने एक गहरी साँस ली और कहा, "कुछ लोग कहते हैं जिस ज़मीन पर भानुगढ़ का किला बना है वो शापित है और वहाँ पहले से भूतों का वास है। कुछ लोग कहते हैं कि राजपरिवार का कोई सदस्य तंत्र मंत्र की साधना किया करता था जिसकी वजह से भूतों ने उस किले में डेरा डालकर उसे तबाह कर दिया।"

"मगर, ज़्यादातर लोग मानते हैं कि राजमहल में एक रात भीषण आग लगी थी जिसमें जलकर मरे लोगों की अतृप्त आत्मा किले में आज भी भटक रही है। मगर, ये सब सच नहीं है। सच तो ये है कि उस किले में, उन दोनों शहज़ादियों की आत्माओं को आज भी क़ैद कर के रखा हुआ है। कुछ आसुरी शक्तियाँ हैं जो शहज़ादियों की आत्मा को मुक्त होने से रोक रही हैं। और यही शक्तियाँ रात को किले के आस पास से गुजरने वालों पर कहर बनकर बरसती हैं ।"

"क्या आप सारणीया राजवंश के इतिहास के बारे में कुछ बता सकते हैं, बाबा?" राज ने पूछा।

"सारणीया राजवंश के बारे में हम से बेहतर और कौन बता सकता है?" बाबा मुस्कुराये। "हमारे पूर्वज पीढ़ी दर पीढ़ी सारणीया राजवंश के राजपुरोहित हुआ करते थे। ये घटना उस समय की है जब हमारे पूर्वज श्री जातुकर्णअमरेश्वर, महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया के राजपुरोहित थे।"

पुरानी बातें याद करते हुए बाबा ने एक ठंडी आह भरी।

"महाराज भानुप्रतापदेव बड़े ही दयालु और कर्त्तव्यनिष्ठ राजा थे। उनकी दो बेटियाँ थीं। बड़ी शहज़ादी मान्यानन्दिनी 20 वर्ष की थी और छोटी बेटी रम्यसुता 18 वर्ष की। राजमहल में एक बड़ी चालबाज़ और मक्कार औरत भी रहती थी जिसका नाम अजितेश्वरी देवी था। वो महाराज भानुप्रतापदेव की बड़ी खास थी। लोग कहते थे कि उसने महाराज पर काला जादू कर के उन्हें फाँस रखा था। एक तरह से वो महराज की रखैल थी।"

"उसकी एक बेटी थी जिसका नाम आर्द्रपाणिनी था। वो देखने में काली और बदसूरत थी मगर नृत्य ठीक ठाक कर लेती थी।

अजितेश्वरी के कहने पर महराज ने उसकी बेटी को राजनर्तकी बना दिया और वो दोनों महल में ही रहने लगीं। महाराज भानुप्रतापदेव अपने सारे फैसले, अजितेश्वरी की सलाह से ही लिया करते थे।"

"उन दिनों, भानुगढ़ बाद सम्पन्न राज्य हुआ करता था इसलिए आस पास के राजा भानुगढ़ पर नज़रें गड़ाये बैठे थे। मगर, भानुगढ़ को सबसे ज़्यादा खतरा समरपुर के महाराज सुरेंदर प्रताप से था। वो बड़ा ही ज़ालिम राजा था। दुश्मनों से भानुगढ़ की रक्षा की ज़िम्मेदारी, महाराज भानुप्रतापदेव अपने सेनापति वीरभद्र सेन को सौंप कर निश्चिंत हो गए थे। वीरभद्र, बहादुर भी था और महाराज का विश्वस्त भी। महाराज उस पर आँख मूँदकर भरोसा किया करते थे।"

"मगर, एक रात न जाने वो कहाँ गयाब हो गया। वीरभद्र के चले जाने के बाद जैसे महाराज की हिम्मत ही टूट गयी। उन्हें हर पल महाराज सुरेंदर प्रताप का खौफ सताने लगा। इस मौके का फायदा उठाकर अजितेश्वरी ने महाराज के कान में ये बात डाल दी कि वो महाराज सुरेंदर प्रताप के साथ समझौता कर लें। क्योंकि अगर युद्ध हुआ तो उनकी हार और भानुगढ़ की बर्बादी निश्चित है।"

"महाराज भानुप्रतापदेव ने ऐसा ही किया और महाराज सुरेंदर प्रताप ने अपने बड़े बेटे और कुछ मंत्रियों को भानुगढ़ भेज दिया।

हालाँकि दोनों राजाओं के बीच समझौता इस शर्त पर हुआ था कि महाराज सुरेंदर को हर माह एक निश्चित धनराशि दी जाएगी जिसके बदले उन्हें भानुगढ़ पर हमला न करने का वादा देना होगा। मगर भानुगढ़ की जनता समझ बैठी कि महाराज भानुप्रतापदेव ने अपना राज्य ही महाराज सुरेंदर को सौंप दिया। लोगों ने आव देखा न ताव और राजमहल को ही आग लगा दी।"

"उस आग में जलकर काफ़ी लोगों ने अपनी जाम गंवा दी थी | मगर फ़िर भी कुछ लोग वहाँ से बच निकलने में कामयाब हो गए थे । महाराज भानुप्रतापदेव ने राजमहल में लगी आग से बचने के बाद, अपनी मुंहबोली बहन रानी गायत्री देवी के राज्य में शरण ले ली। लम्बी बीमारी के चलते कई सालों बाद उनकी मृत्यु हो गयी। उस रात की आग से बच निकालने का बाद, अजितेश्वरी अपनी बेटी के साथ समरपुर चली गयी। फ़िर वो महाराज सुरेंदर प्रताप की रखैल बन गयी और उसकी बेटी, महाराज के छोटे राजकुमार की।"
 
"कहते हैं समरपुर का बड़ा राजकुमार, जो उस रात भानुगढ़ में मौजूद था वो आग से बचकर मिस्र भाग गया और वहाँ की शहज़ादी से विवाह कर के वहीं बस गया। राजपुरोहित जातुकर्ण भी अपने परिवार के साथ, आग की लपटों में घिरे राजमहल से बच निकले और उन्होनें इस आश्रम की स्थापना की। तब से हमारा परिवार यहीं रहता है। मगर, उस रात भानुगढ़ का किला पूरी तरह तबाह हो गया। भानुगढ़ के लोगों के साथ अनहोनी घटनाएँ होने लगी और सबने मान लिया कि किला भूतिया है।"

"बहुत सारे निवासी अपना सब कुछ छोड-छाडकर यहाँ से भाग खड़े हुए। भूतों से रक्षा के लिए बाकी बचे भानुगढ़ निवासी, श्री जातुकर्णअमरेश्वर की शरण में आये। उन्होंने अपनी सिद्धियों के बल पर ये पता लगाया कि किसी आसुरी शक्ति ने शहज़ादीयों की आत्माओं को किले में कैद कर रखा है। मगर वो ये न पता कर सके कि आखिर उस रात शहज़ादियों के साथ हुआ क्या था? और ये सब किसका किया धरा है? जब इस राज़ पर से पर्दा हटेगा, तभी ये पता चल पाएगा कि शहज़ादियों को मुक्ति कैसे दिलायी जाए?"

"इस बात का पता कैसे लगाया जा सकता है, बाबा?" राज ने बड़ी कौतुकता के साथ पूछा।

"इसका केवल एक ही रास्ता है।" बाबा ने ग़ौर से राज की आँखों में देखा और कहा, "किसी को अपना शरीर वर्तमान में छोड़कर, अपनी आत्मा को उस समय में वापस भेजना होगा जिस रात ये घटना हुई थी।"

"समय में वापस जाना!" राज के माथे पर शिकन पड़ी। "ये कैसे मुमकिन है, बाबा? जो वक़्त बीत गया उसे वापस कैसे लाया जा सकता है?"

"वक़्त को वापस नहीं लाया जा सकता," बाबा राज को हैरान होते देख मुस्काये और बोले, "मगर हम बीते वक़्त में जा सकते हैं।"

"लेकिन कैसे?" राज की हैरानी बढ़ती ही जा रही थी। "बीते वक़्त का तो वजूद मिट चुका है। और जो है ही नहीं, वहाँ कैसे जाया जा सकता है?"

"राज," बाबा ने बड़े प्यार से राज को देखा और मुस्कुरा दिए, "समय की धारा का प्रवाह अनंत है। जैसे कि एक बहती हुई नदी। मान लो तुम नदी के किनारे बैठे हो और तुमने सामने बहती नदी की धारा पर एक कागज़ की नाव बनाकर डाल दी। वो नाव, बहती नदी की धारा के साथ आगे बढ़ती है और आँखों से ओझल हो जाती है। ओझल होने का मतलब ये तो नहीं कि उसका वजूद मिट गया। वो कहीं न कहीं अब भी है।"

"हमारा शरीर सिर्फ़ वर्तमान में ही रह सकता है। मगर, हमारी आत्मा किसी भी काल में आ जा सकती है। यदि तुम्हें भानुगढ़ का सच जानना है तो तुम्हारी आत्मा को भूतकाल में जाना होगा।"

"लेकिन बाबा," राज घबरा गया, "अगर आत्मा को शरीर से अलग कर दें तो क्या इंसान की मौत हो नहीं हो जायेगी?"

"नहीं, नहीं," बाबा फ़िर से मुस्कुराये, "योग साधना द्वारा आत्मा को शरीर से निकालकर कहीं भी भेजा जा सकता है। आत्मा और शरीर एक अदृश्य बंधन के द्वारा एक दूसरे से जुड़े रहेंगे और आत्मा किसी भी समय अपने शरीर में वापस आ सकती है। लेकिन अगर किसी कारण से ये अदृश्य बंधन टूट जाये तो आत्मा शरीर से हमेशा के लिए अलग हो जायेगी और फ़िर कभी वापस नहीं आ सकेगी। यदि तुम ऐसी साधना कर रहे हो तो ध्यान रहे कि तुम्हारे शरीर और आत्मा को जोड़े रखने वाला बंधन कभी टूटे नहीं। वरना अनर्थ हो जाएगा।"

"अगर ऐसा है तो मुझे बीते वक़्त में वापस भेज दीजिये, बाबा।" राज ने हाथ जोड़े और कहा। "मैं जानना चाहता हूँ भानुगढ़ की शहज़ादियों के साथ क्या हुआ था। और मैं उनकी मदद कैसे कर सकता हूँ?"

"लेकिन हम तुम्हें चेतावनी देते हैं," बाबा की मुस्कान गायब हो गयी और उनका चेहरा गम्भीर हो गया, "कि ये सब इतना आसान नहीं है, राज। इसमें जान का खतरा है।"

"कोई बात नहीं बाबा," राज ने आह भरी और नज़रें झुका लीं। "वैसे भी, उन शहज़ादियों की चीख पुकार मुझे चैन से जीने नहीं देती। जब तक ये ना जान जाऊँ कि ये सारा मांजरा क्या है, मैं सुकून की नींद न सो पाऊँगा।"

"ठीक है," बाबा चारपाई से उठ खड़े हुए, "आज पूर्णिमा की रात है। आज का मुहूरत भी शुभ है। हम आज रात ही ये क्रिया करेंगे। तुम हमारे साथ, हमारे ध्यान कक्ष चलो।"

"जी," राज ने बाबा को प्रणाम किया और उनके पीछे चल पड़ा

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बाबा अमरेश्वर का ध्यान कक्ष, एक बड़ा सा हॉल था जो हर तरफ़ से दियों की रोशनी से झिलमिला रहा था। बाबा के कुछ चेले फ़र्श पर बैठे मन्त्र जप रहे थे। दूसरे कमरों की तरह इस कमरे की फ़र्श पर भी गोबर से लेप लगाया गया था और दीवारों पर मिट्टी से पुताई की गयी थी। बस फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि इस कमरे में कोई खिड़की नहीं थी।

कमरे के ठीक बीच में एक हवन कुंड था जिसके पास ही एक चटाई बिछी हुई थी। बाबा को देखते ही सभी चेलों ने मन्त्रों का जाप बन्द कर दिया और खड़े होकर अपने गुरु को प्रणाम किया। बाबा ने उन्हें हाथ के इशारे से बैठने के लिए कहा और स्वयं जाकर हवन कुंड के पास बैठ गए।

"अंदर आओ, राज। दरवाज़े पर खड़े राज से बाबा ने कहा, "आकर इस चटाई पर लेट जाओ।"

राज फौरन अंदर आया और चटाई पर लेट गया। ध्यान कक्ष के अंदर आते ही उसे एक अजीब सी राहत का एहसास हो रहा था जैसे मानो वो अपने सारे दुखों और परेशानियों से आज़ाद होकर उस दिव्य शक्ति की शरण में आ गया हो जिसे ईश्वर कहते हैं। बाबा ने अग्नि कुंड में आग जलायी और मंत्रों के जाप के साथ पहली आहुति दी। बाबा जो भी मन्त्र पढ़ते, उनके चेले उन मन्त्रों को दोहराते।

"सब कुछ भूलकर केवल इन मंत्रों पर ध्यान दो, राज।" बाबा ने कहा, "मन में ईश्वर का ध्यान कर अपनी आँखें बंद कर लो।"

राज ने आँखें बंद कर लीं और बाबा और उनके चेलों ने मन्त्र पढ़ने शुरू कर दिए। हर मन्त्र के साथ बाबा, हवन कुंड में आहुति देते जाते। धीरे धीरे राज अपने आस पास की दुनिया से बिल्कुल बेख़बर हो गया। मन्त्रों की आवाज़ भी उसे ऐसी लगने लगी जैसे कोसों दूर से आ रही हो। राज को अपने शरीर के वज़न का एहसास होना बंद हो गया और हल्कापन महसूस होने लगा। ऐसा लगा वो हवा में तैरने लगा है। कमरे की छत उसे अपने बहुत करीब नज़र आ रही थी।

अचानक उसे अपनी दोनों आंखों के बीच एक सफेद रंग की रोशनी के होने का एहसास होने लगा । बाबा जैसे जैसे मन्त्र पढ़ते जाते वो रोशनी राज के जिस्म पर फैलने लगी। धीरे धीरे उस सफ़ेद रोशनी ने राज के जिस्म के हर एक हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया।

राज के जिस्म पर पूरी तरह से फैलने के बाद वो रोशनी कमरे में फैलने लगी। अब राज को उस कमरे में न बाबा नज़र आये, न उनके चेले। मन्त्रों की आवाज़ भी अब उसके कानों में नहीं पड़ रही थी। उसे अपनी बंद आँखों से कुछ नज़र आ रहा था तो वो थी बस वो सफ़ेद रोशनी जो अब पूरी तरह से कमरे में फैल चुकी थी।

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राज आँखें फाड़े इधर उधर देखने की कोशिश करने लगा। मगर, उसे कुछ नज़र न आया। कुछ देर बाद जब वो रोशनी छटी तो उसने खुद को भानुगढ़ के चाँदी महल के अंदर खड़े पाया। तभी किसी के कदमों की आहट सुनकर राज चौंक गया। उसकी नजरें उस तरफ़ घूम गयीं जहाँ से आवाज़ आ रही थी। अगले ही पल दो सैनिक, हाथों में भाला लिए उसकी तरफ़ बढ़े। राज घबरा गया। उसे डर लगा कि अगर सैनिकों ने उसे देख लिया तो उसे मार डालेंगे।

राज उनकी नज़रों से छुप जाना चाहता था। हड़बड़ाते हुए उसने इधर उधर नज़र घुमायी। मगर वहाँ छुपने लायक कोई जगह नज़र नहीं आयी। अब तक सैनिक उसके काफ़ी करीब आ चुके थे। ड़र के मारे राज का गला सूख गया और उसकी साँसें तेज़ हो गयी। मगर वो सैनिक उसके करीब से ऐसे गुज़र गए जैसे राज उन्हें नज़र ही न आ रहा हो।

तभी उसे बाबा अमरेश्वर की कही बात याद आयी। बीते वक़्त में सिर्फ़ राज की आत्मा आयी है। उसका शरीर तो अब भी बाबा के आश्रम में ही पड़ा है। इसी वजह से वो सैनिक राज को देख नहीं पाए। ये जानकर राज को बड़ी राहत मिली कि भानुगढ़ में कोई भी उसे देख नहीं पायेगा। उसने ईश्वर का धन्यवाद किया और एक गहरी साँस ली।

"आप चिंता न करें शहज़ादी, सब ठीक हो जाएगा।"

पास के कमरे से किसी स्त्री की आवाज़ सुनते ही राज उस तरफ़ चल पड़ा। वो कमरा शहज़ादी मान्या का था। शहज़ादी अपनी छोटी बहन के साथ पलंग पर बैठी हुई थी। उन दोनों के पास ही कुछ दासियाँ नीचे फ़र्श पर बैठी हुईं थी। वो सब बहुत परेशान लग रहीं थीं और सबके चेहरों पर उदासी छायी हुई थी।

"इतने दिन हो गए और उनका कोई पता नहीं चल पाया है," कहते हुए मान्या का गला भर आया। "ऐसे अचानक जाने कहाँ चले गए, वीरभद्र? जाने किस हाल में होंगे वो? ईश्वर करे वो सही सलामत हों और जल्दी से भानुगढ़ लौट आएँ। क्या गुप्तचरों को कोई जानकारी मिली, रम्या?"

"नहीं, अब तक तक तो नहीं," शहज़ादी रम्यसुता का चेहरा लटक गया। "ये भी तो हो सकता है कि पिताश्री ने उन्हें किसी गुप्त अभियान पर भेजा हो।"

"नहीं, रम्या," मान्या ने हाथ हिलाकर मना किया और कहा, "हमने स्वयं पिताश्री से बात की है। वे भी वीरभद्र के बारे में कुछ नहीं जानते। पिताश्री हमसे कुछ नहीं छुपाते। यदि उन्होंने वीरभद्र को किसी गुप्त अभियान पर भेजा होता तो हमें अवश्य बताते।"

"आप तो यूँ ही परेशान हो रहीं हैं, शहज़ादी जी," फ़र्श पर बैठी एक दासी बोली| "वीरभद्र जी कोई बच्चे थोड़े न हैं जो रास्ता भटक जायेंगे। उनके जैसे बलवान पुरुष का कोई बाल तक बाँका नहीं कर सकता।"

"मुझे तो लगता है," दूसरी दासी एक शरारती मुस्कान के साथ बोली, "वो आपके साथ आँख मिचौली का खेल, खेल रहें हैं। कहीं छुपकर बैठे, आपके प्रेम की परीक्षा ले रहे होंगे।"

"वही तो," तीसरी दासी चहकते हुए बोली, "आप देखिएगा शहज़ादी जी, कुछ ही दिनों में आप के लिए ढेर सारे उपहार लेकर प्रकट हो जायेंगे, सेनापति जी।"

कमरे में बैठी सभी औरतें खिलखिलाकर हँस दीं। उनकी खुशी देखकर, मान्या भी अपना दुख भूलकर मुस्कुरा दी। तभी कुछ सेवक हाथों में रेशमी कपड़े से ढँकी बड़ी बड़ी थालियाँ लेकर कमरे के अंदर आ गए। उन्होंने थालियों को पलंग पर रख दिया।

"अरे! ये सब क्या है?" शहज़ादी रम्या ने थालियों पर पड़ा कपड़ा हटा दिया।

किसी थाली में रेशम की महँगी साड़ियाँ थीं तो किसी में हीरे, जवाहरातों से बने बेशकीमती गहने। किसी थाली में खूबसूरत फूलों के गुलदस्ते थे तो किसी में तरह तरह के खुशबूदार इत्र की शीशियाँ। वो सब देखकर वहाँ बैठी सभी औरतों की आँखें चौंधिया गयीं।

"मैं न कहती थी," एक दासी शहज़ादी मान्या के कानों में फुसफुसायी, "वीरभद्र जी, आपके लिए ढ़ेर सारे उपहार लेकर शीघ्र लौट आयेंगे।"

मान्या को शर्म आ गयी और उसने मुस्कुराते हुए अपना चेहरा अपनी हथेलियों से ढँक लिया।

"सावधान!" कमरे के दरवाज़े पर पहरा दे रहे एक दास ने ऐलान किया, "समरपुर के राजकुमार विजयेंद्र प्रताप और राजकुमार उदयभान प्रताप पधार रहें हैं।"

ये सुनते ही मान्या का खूबसूरत चेहरे पर सिलवटें पड़ी और उसने अपनी भौहें सिकोड़ लीं।

"हुस्न की मलिका को उनके इस दास का प्रणाम," एक ऊँचे कद और तगड़े शरीर वाला बदसूरत आदमी कमरे के अंदर आ गया।

"हम आशा करते हैं कि आप दोनों शहज़ादियों को हमारे और राजकुमार उदय के भेजे तोहफ़े पसंद आये होंगे।"

उस आदमी के पास एक और आदमी भी आकर खड़ा हो गया जो कद काठी में उसी की तरह था मगर देखने में उससे भी बदसूरत था। वो रम्या के बदन को हवस भरी निगाहों से घूरने लगा।
 
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