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Adultery अतीत की खोज

"हम अतिथियों से केवल अतिथि गृह में भेंट करते हैं," गुस्से से तिलमिलाते हुए मान्या बोली। "आपको हमारे शयनकक्ष में आने की अनुमति है, राजकुमार विजयेंद्र प्रताप।"

"कुछ दिनों बाद, आपकी कमसिन जवानी और इस हसीन जिस्म को हमारे शयनकक्ष की शोभा ही तो बनना है, शहज़ादी अपराजिता," राजकुमार विजयेंद्र की आँखों में एक हवसी मुस्कान थी।

"क्या कहा आपने?" मान्या के होंठ गुस्से से फड़कने लगे।

"हमारे कहने का अर्थ है," राजकुमार विजयेंद्र ने फौरन पैंतरा बदला और बड़े अदब से कहा, "हम आपके लिए और हमारे चचेरे भाई राजकुमार उदयभान, आपकी छोटी बहन शहज़ादी रम्यसुता के लिये विवाह का प्रस्ताव लेकर आये हैं।"

"ऐसा कभी नहीं होगा," मान्या का गुस्सा ज्वालामुखी की फुट पड़ा। "क्या हम जानते नहीं हैं आप दोनों भाईयों ने क्या क्या पाप किये हैं? अपनी प्रजा पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढाये हैं, आपने। लगान न दे पाने वाले गरीब किसानों को आप जीवित ही शेर चीतों को खिला देते हैं। आपके सैनिक उनकी जवान बेटियों को उठाकर आपके राजमहल ले आते हैं और आप उनके शरीर से अपनी वासना की प्यास बुझाते हैं। और जब मन भर जाता है तो उन्हें ज़िंदा जला देते हैं।"

"राजा का फर्ज़ होता है अपने प्रजा की देखभाल करना। मगर प्रजा के कल्याण की चिंता छोड़कर आप दोनों दिन भर मदिरा में डूबे रहते हैं और जुआ खेलते रहते हैं। उसके बाद आप शिकार पर निकलते हैं, मगर स्त्री के शरीर का। जिस पर आपकी बुरी नज़र पड़ती है, आप उसे उठवा कर अपने शयन कक्ष की रौनक बना लेते हैं। विवाह की बात करने से पहले आप दोनों स्त्री का सम्मान करना सीखिए। धिक्कार है आप दोनों पर!"

मान्या पाँव पटकती हुई कमरे से बाहर जाने लगी तो राजकुमार विजयेंद्र ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।

"अब जवानी के दिनों में ऐसी हसीन गलतियाँ कौन नहीं करता?" राजकुमार की नजरें मान्या के उभरे सीने पर जा रुकीं।

मान्या के सीने से चुनरी खिसक गई थी जिसकी वजह से उसकी तंग चोली से उसके बूब्स के उभार की झलक दिख रही थी। गुस्से में होने की वजह से मान्या की साँसें चढ़ गई थी और उसकी छाती ज़ोर ज़ोर से उठ गिर रही थी।

"और जो ऐसी गलती न करे उसकी जवानी भला किस काम की?" विजयेंद्र ने मान्या को अपने करीब खींच लिया और इतना कसकर बाँहों में भर लिया कि मान्या के कोमल बूब्स उसकी चट्टान जैसी मज़बूत छाती में धंस गए।

"शर्म नहीं आती तुझे, खुद को मर्द कहते हुए?" मान्या ने विजयेंद्र को धक्का देकर पीछे धकेल दिया और उसके मुँह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। "अब किसी औरत को हाथ लगाने से पहले हमारा दिया ये उपहार याद कर लेना।"

मान्या ने विजयेंद्र को एक आखिरी बार गुस्से से घूरा और कमरे से बाहर चली गयी। रम्या और उसकी दासियाँ भी दोनों राजकुमारों को गुस्से से घूरते हुए वहाँ से चली गईं।

"हमारे इस अपमान की सज़ा तुझे अपने बदन से चुकानी होगी मान्या," विजयेंद्र घायल शेर की तरह गुर्राने लगा। "तेरी उफ़नती जवानी को अपने बिस्तर पर रौंद कर हमेशा के लिए ख़ामोश न कर दिया तो हम भी राजकुमार विजयेंद्र प्रताप नहीं।"

"आपकी इस इच्छा को पूरा करने में मैं आपकी मदद करूँगी, राजकुमार।"

एक औरत की आवाज़ सुनकर राजकुमार विजयेंद्र पीछे मुड़ा। उसके पीछे एक 50 - 55 साल की औरत खड़ी थी जो रेशम की साड़ी पहने हुए थी और सोने के ज़ेवरों से लदी हुई थी। उसकी आँखें काजल से भरी, होंठ पान के कत्थे से सुर्ख थे और बालों में गजरा सजा था। मगर, उसकी आँखों में हैवानियत भरी थी।

"प्रणाम राजकुमार," वो औरत बड़ी मीठी सी मुस्कान के साथ आगे आयी और बड़े अदब से सर झुकाकर बोली। "मेरा नाम अजितेश्वरी देवी है। मैं भानुगढ़ की राजनर्तकी कुमारी आर्द्रपाणिनी की माँ हूँ।"

"आप हमारी मदद क्यों करना चाहती हैं?" राजकुमार ने शक की नज़रों से उस औरत को तोला।

"मैं, महाराज भानुप्रतापदेव की शुभचिंतक हूँ," अजितेश्वरी ने अपने पाखंड पर पर्दा डालने के लिए गदगद होने का नाटक किया।

"महाराज के बहुत उपकार हैं, मेरे परिवार पर। जब हम मुश्किल वक़्त से गुज़र रहे थे तब महाराज ने ही हमें सहारा दिया था। महराज की बेटियाँ, मेरी अपनी बेटियों जैसी ही हैं।"

"उनकी शादी आप दोनों जैसे शूरवीर राजकुमारों से हो जाए तो मेरे लिए इससे अधिक खुशी की बात और क्या होगी? यदि यहाँ की शहज़ादियों का विवाह, समरपुर के राजकुमारों से हो जाता है तो दोनों पड़ोसी राज्यों में जो अनबन और तनाव है वो भी दूर हो जाएगा। हर तरह से ये रिश्ता शहज़ादियों के लिए उत्तम है।"

"मगर, शहज़ादियों को तो हम दोनों फूटी आँख नहीं भाते," विजयेंद्र ने खीजते हुए कहा। "फ़िर वो कैसे हम से विवाह करने के लिए राज़ी होंगी?"

"अरे! वो तो नादान बच्चियाँ हैं," अजितेश्वरी बड़े प्यार से मुस्कायी। "उन्हें अच्छे बुरे की समझ कहाँ? जवानी के जोश में अपने होश खो बैठी हैं। उनको आपकी बाँहों तक पहुँचाने का ज़िम्मा मैं लेती हूँ, राजकुमार।"

"हम आपके कहने का अर्थ नहीं समझे," विजयेन्द्र भौहें सिकोड़े अजितेश्वरी को घूरने लगा।

"जवानी का नशा होता ही ऐसा है कि किसी के भी होश छीन ले," अजितेश्वरी की मक्कारी उसकी आँखों में झलक रही थी। "और नशे में अपने होश गवांकर आपकी बाँहों में ही आ गिरेंगी दोनों। तब आप उन्हें हमेशा के लिए अपना बना लेना।"

"आप ये क्या पहेलियाँ बुझा रहीं हैं," विजयेंद्र झल्लाने लगा। "हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा।"

"आप आज रात शहज़ादी मान्या के शयनकक्ष आ जाईये," अजितेश्वरी का कमीनापन उसकी आँखों से उसके होंठों की मुस्कान में उतर आया। "बाकी हम सम्भाल लेंगे।"

"जिस शहज़ादी ने हमें बेइज़्ज़त कर के निकाल दिया," विजयेंद्र ने बड़ी हैरानी से अजितेश्वरी को देखते हुए कहा, "क्या आपको लगता है वो रात के समय हमें अपने शयन कक्ष में आने देगी।"

"आप आज की पूरी रात शहज़ादी के साथ उनके शयनकक्ष में ही बिताएंगे," अजितेश्वरी ने पूरे विश्वास के साथ कहा। "और शहज़ादी कोई ऐतराज़ नहीं जतायेगीं। मेरा विश्वास कीजिये राजकुमार, कल के सूरज के उगते ही वो आपसे विवाह करने को राजी हो जाएगी।"

इतना कहकर अजितेश्वरी वापस जाने को मुड़ी और एक ज़ालिम मुस्कान के साथ खुद से बोली, "और रास्ता भी क्या रह जायेगा बेचारी के पास!”

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आर्द्रपाणिनि शीशे के सामने बैठी अपने चेहरे पर हल्दी का लेप लगा रही थी। वो हर सम्भव कोशिश करती थी कि उसका काला रंग रातों रात गोरा हो जाये। न जाने उसने कितनी जड़ीबूटियों का लेप लगाया और न जाने कितनी दवाएँ लीं। मगर, उसका ये रंग इतना पक्का था कि उतरता ही नहीं था।

"ले, ये ले जा," अजितेश्वरी एक थाली में दो ग्लास लिए आ गयी।

"नहीं माँ," आर्द्रापाणिनि ने चिढ़ते हुए कहा, "अब मैं कोई भी जड़ी बूटियों वाला काढ़ा नहीं पियूंगी। मेरा ये रंग नहीं छूटने वाला। इस जन्म में तो गोरी होने से रही।"

"ये तेरे लिए नहीं है," अजितेश्वरी ने मुँह बनाते हुए कहा। "मेरी बेटी तो लाखों में एक है। रंग थोड़ा साँवला हो भी गया तो क्या? ये ढूध तू जाकर उन शहज़ादियों को दे आ।"

"मैं उनकी दासी हूँ क्या जो उनके लिए ढूध ले जाऊँ?" आर्द्रपाणिनि को शहज़ादियों के नाम से तक चिढ़ थी।

"जैसा बोला है वैसा कर, समझी?" थाली आर्द्रपाणिनि के हाथों में पकड़ाते हुए अजितेश्वरी ने आँखे निकाली।

आर्द्रपाणिनी उदास मन से शहज़ादियों के कमरे की तरफ़ चल पड़ी। मन ही मन वो शहज़ादियों से बहुत जलती थी। मगर, बाहर से वो उनसे ऐसे पेश आती थी जैसे उनकी सबसे अच्छी सहेली हो। आखिर, थी तो वो भी अपनी पाखंडी माँ की कमिनी औलाद और महराज भानुप्रतापदेव की नाजायज़ संतान।

"अरे! आप दोनों अभी तक सोयी नहीं?" शहज़ादियों को देखते ही आर्द्रपाणिनि के चेहरे पर एक बड़ी प्यारी मगर बनावटी मुस्कान खिल उठी। "मैं आप दोनों के लिए दूध लायी हूँ।"

"तुम्हें कष्ट करने की क्या ज़रूरत थी किसी दासी के हाथ भिजवा देती।" मान्या ने दूध का ग्लास उठाते हुए कहा।

"आप दोनों को मैं अपनी बड़ी बहनों जैसा मानती हूँ," रम्या को दूध का ग्लास देते हुए आर्द्रपाणिनि बड़े प्यार से बोली। "आपकी सेवा कर के मुझे जो खुशी मिलती है उसका आप अंदाजा नहीं लगा सकती।"

"तुम भी हमारी छोटी बहन ही तो हो," मान्या ने ढूध पीकर ग्लास थाली में वापस रख दिया।

"रात बहुत हो गयी है, अब सो जाते हैं," रम्या ने कहा और आर्द्रपाणिनि के साथ मान्या के कमरे से चली गयी।

उनके जाते ही मान्या अपने बिस्तर पर लेट गयी। वीरभद्र की याद आते ही उसका मन उदास हो गया। वीरभद्र के साथ बिताए उन खूबसूरत लम्हों को याद करते करते उसे कब नींद आ गयी पता ही न चला।

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"हम्म..."

अपने बदन पर कुछ खुरदुरी उँगलियों की खरोंच से मान्या की नींद टूटी। उसने आँखे खोलने की कोशिश की मगर उसकी पलकें बार बार झपक जाती। उसका सर भी चकरा रहा था। बहुत कोशिशों के बाद उसने किसी तरह आँखें खोलीं तो पाया कि उसकी चोली के अंदर से दो हाथ उसकी छाती को सहला रहे थे।

"आ...आह!" आँखें पूरी तरह से खुली तो मान्या के मुँह से चीख़ निकल पड़ी।

विजयेंद्र पलंग पर बेसुध सी लेटी मान्या की चोली के अंदर हाथ डाले उसके बूब्स को मसल रहा था।

"न...ही...ई...ईईई!" मान्या चीखते हुए दूर हट गयी |

विजयेंद्र ने मान्या की साड़ी पकड़ कर खींची तो मान्या पलंग से नीचे गिर गयी और उसकी साड़ी विजयेंद्र के हाथों में रह गयी।

उसकी चोली भी जगह जगह से फट चुकी थी।मगर फ़िर भी वो चोली किसी तरह मान्या के सीने के उभार को पर्दे में रखे हुए थी। मान्या ने अपने हाथों से अपने जवान सीने की नग्नता को छुपाया और कमरे से बाहर भागने लगी। विजयेंद्र ने पीछे से आकर उसकी कमर को दबोच लिया। उसने विजयेंद्र को लात मारी और भाग गयी।

"सैनिकों!" विजयेंद्र ने अपने साथ समरपुर से आये सैनिकों को आवाज़ दी और कहा, "पकड़ो उसे।"

हाथ में तलवार लिए विजयेंद्र और सैनिक, महल के गलियारों से होकर भागती मान्या के पीछे भागे। मान्या ने गलियारे की दीवार पर लगी तलवार निकाल ली और विजयेंद्र से युद्ध करने लगी। कुछ दो मिनटों बाद मान्या का सर चकरा गया और उसके हाथ से तलवार छूट गयी। विजयेंद्र ने आगे बढ़कर लड़खड़ाती मान्या को अपनी बाँहों में भर लिया।

अगले ही पल मान्या विजयेंद्र की बाँहों में बेहोश होकर गिर पड़ी। विजयेंद्र की आँखों में एक वहशी मुस्कान आ गयी। उसने हाथ के इशारे से अपने सैनिकों को जाने को कहा। जब एकांत हुआ तो उसकी नज़र उसने बाँहों में बेसुध पड़ी मान्या के जवान, सुड़ौल जिस्म पर पड़ी। उसने अपनी तलवार से मान्या के जिस्म के हर एक कपड़े को तार तार कर दिया।

अब मान्या के नशीले बदन पर कोई पर्दा नहीं था। वो मान्या की नग्न छाती पर टूट पड़ा और हथेलियों में भरकर मान्या के बूब्स को मसलने लगा। उसकी हथेलियों की छुवन से बेहोश मान्या के कमसिन बूब्स फूलने लगे। जैसे जैसे मान्या के बूब्स फूलते गए, विजयेंद्र का लंड भी उत्तेजित होने लगा।

विजयेंद्र ने मान्या को कमर के बल अपनी दाहिनी बाँह पर लिटा दिया। मान्या का नाज़ुक बदन, विजयेंद्र की मज़बूत बाँह पर धनुष की तरह आधा इस तरफ़ और आधा उस तरफ झूल गया। विजयेंद्र ने मान्या की टाँगों के बीच हाथ डाला और उसकी चूत की फाकों को रंगड़ने लगा। कुछ पलों में मान्या की चूत से रस बरसने लगा।

"अब आपका कमसिन शरीर संभोग के लिए बिल्कुल तैयार है, शहज़ादी अपराजिता!" कहते हुए विजयेंद्र ने गहरी बेहोश की हालत में पड़ी मान्या के जवान जिस्म को बाँहों में उठा लिया। "अब आप हमारी हैं, सिर्फ राजकुमार विजयेंद्र प्रताप की।"

"छोड़े दो शहज़ादी को नहीं तो अपनी जान से हाथ धो बैठोगे!"

राजकुमार को पीछे से एक लड़की की आवाज़ सुनायी दी और साथ ही अपनी गर्दन पर एक तलवार की ठंडी छुवन भी। वो आवाज़ सुनते ही पहचान गया कि वो शहज़ादी रम्यसुता है। राजकुमार विजयेंद्र ने पीछे मुड़े बिना ही मान्या के बेहोश जिस्म को नीचे फ़र्श पर लिटा दिया। रम्या ने एक कदम आगे बढ़ाया ही था कि किसी ने पीछे से उसकी गर्दन पर तलवार रख दी।

"अपनी बहन को तो तब बचा पाओगी न, जब तुम खुद होश में रहोगी," राजकुमार उदयभान ने कहा।

"क्या मतलब?" रम्या फौरन पलटी और अपनी तलवार को उदयभान की तलवार से भिड़ा दिया।

"तुम्हें जो दूध पिलाया गया है उसमें बेहोशी की दवा मिली थी। कुछ ही पलों में तुम बेहोश हो जाओगी और फ़िर तेरा ये जवान जिस्म हमारे बिस्तर पर बेबस पड़ा, हमारी हवस की प्यास बुझायेगा।"

उदयभान की बात सुनकर रम्या सुन्न सी हो गयी। उदयभान ने मौके का फायदा उठाया और उसकी तलवार छीन ली। उसके निहत्था देख, उदयभान ने उसे तुरंत अपनी बाँहों में कस लिया। रम्या ने खुद को संभाला और अपनी दाहिनी टाँग से उदयभान की टाँगों के बीच एक ज़ोरदार वार किया। उदयभान दर्द से तड़प उठा और रम्या ने उसे फ़र्श पर धकेल दिया। वो चारों खाने चित होकर गिर पड़ा। मौका देखकर रम्या फ़र्श पर पड़ी अपनी तलवार उठाने के लिए लपकी।

तलवार हाथ में आते ही रम्या की जान में जान आ गयी। मगर, किस्मत को ये मंज़ूर नहीं था। फ़र्श से तलवार उठाकर वो खड़ी हुई थी कि उसका सर चकराने लगा। उस पर एक अजीब सी खुमारी छा गयी और उसकी नज़र धुंधलाने लगी। तलवार उसके हाथ से छूट गयी और उसके पैर लड़खड़ाने लगे। रम्या को बेहोशी की आगोश में जाते देख उदयभान की आँखें खुशी से चमक उठीं। फ़र्श पर पड़ा उदयभान अपनी सारी तकलीफ़ भूल गया और फ़ौरन उठकर खड़ा हो गया।

उसने लड़खड़ाती हुई रम्या को कमर से दबोच लिया। रम्या ने अपनी झपकती पलकों के बीच से उदयभान का धुँधला चेहरा देखा जिसमें उसकी इज़्ज़त लूटने की प्यास थी। रम्या खुद को छुड़ाने के लिए हाथ पाँव मारने लगी मगर उदयभान ने अपनी फ़ौलादी बाँहों में उसे जकड़े रखा। कुछ ही देर में रम्या की बग़ावत ठंडी पड़ गयी और उदयभान ने उसे खामोश कर दिया। उदयभान ने अपनी तलवार उठायी और रम्या की चोली को बीच से काट दिया।

उसने रम्या के उभरे बूब्स को सहलाया और उसका लहँगा भी तलवार से काट दिया। उसका लंड, रम्या के जवान बदन की नग्नता का भोग लगाने को उत्तेजित हो गया। दोनों राजकुमारों ने अपनी जीत का जश्न, ठहाके लगाकर मनाया। उन दोनों ने बेहोश पड़ी शहज़ादियों को उठाया और उनके नग्न शरीर को अपने कँधे पर लादकर उन्हें उनके कमरों में ले चले

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"न...ईई...मम्मह...छोड़ दो"

मान्या अपना सर दायें बायें हिलाती और आँखें खोलने की भरसक कोशिश करती। मगर, उस पर नशे की खुमारी हावी हो जाती जिसकी वजह से उसकी पलकें बार बार झपक जातीं। बहुत कोशिशों के बाद मान्या की आँखें खुलीं तो उसे अपना सर भारी सा लग रहा था। फ़िर भी उसने जैसे तैसे, खूब जतन कर के उसने अपनी आँखें खोल हीं लीं।

उसकी नज़र धुंधलाई हुई थी और उसे कुछ याद नही आ रहा था कि वो कहाँ है और उसके साथ क्या हुआ। दिमाग पर ज़ोर डाला तो उसे याद बस इतना याद आया कि वो राजकुमार विजयेंद्र से खुद को छुड़ाने की कोशिश करते करते बेहोश हो गयी थी। नज़रों के सामने से अँधेरा ज़रा छटा तो उसे एहसास हुआ कि वो अपने कमरे में थी। मगर उसे याद नहीं आया कि वो यहां कैसे पहुँची? उसे लगा कि शायद उसे बेहोशी की हालत में राजकुमार यहाँ ले आये होंगे।

धीरे धीरे, मान्या पर से खुमारी छटने लगी तो उसे सर में बहुत तेज़ दर्द होने का एहसास हुआ। उसकी नज़र भी अब साफ़ हो चुकी थी। उसने देखा कि सामने राजकुमार विजयेंद्र खड़े शराब पी रहे थे। फ़िर मान्या की नज़र अपने जिस्म पर पड़ी। उसे गुलाब की पँखुड़ियों से सजे बिस्तर पर लिटाया गया था जैसे कि वो सुहागरात की सेज हो। उसके दोनों हाथों को बिस्तर की दोनों तरफ़ उसी के दुपट्टे से बांधा गया था। उसके दोनों पैरों को भी फ़ैलाकर बिस्तर के पायों से बांधा गया। और उसके बदन पर कोई कपड़ा नहीं था।

"आ...आ...आआह!"

मान्या की मुँह से ज़ोरदार चीख निकल पड़ी। अब वो पूरी तरह होश में आ चुकी थी। उसे एहसास हो गया था कि उसका जवान जिस्म एक ग़ैर मर्द के सामने बिल्कुल बेबस और पूरी तरह से नग्न पड़ा हुआ है। वो किसी तरह अपने हाथों को बंधन से आज़ाद करने के लिए मचलने लगी ताकि अपने सीने पर उभरी जवानी की नग्नता को छुपा सके।

अपना पूरा जोर लगाकर बिस्तर पर फैली अपनी दोनों टाँगो को एक दूसरे के करीब खींचने की कोशिश करने लगी ताकि अपनी कुँवारी चूत को राजकुमार की हवसी नज़रों से बच सके। राजकुमार, बिस्तर पर बेबस पड़ी हसीना का मज़ाक उड़ाते हुए हँसा और शराब का प्याला हाथ में लिए मान्या के बिस्तर की तरफ़ बढ़ा।

"हमारे साथ ऐसा मत कीजिये, राजकुमार," मान्या हाथ पाँव मारती हुई गिड़गिड़ायी। "हमें छोड़ दीजिए, हमें जाने दीजिए!"

"अपने अपमान की सज़ा तुझे दिए बिना हम तुझे कैसे जाने दें, मान्या ?" राजकुमार ने मान्या के बाल पकड़कर खींचा और शराब से भरा आया उसके मुँह में उड़ेल दिया।

मान्या खाँसने लगी और उसने शराब थूक दी। शराब, मान्या के मुँह से फ़िसलकर उसकी छाती पर उतर आयी और उसके बूब्स को भिगो गयी। राजकुमार ने शराब से भीगे मान्या के बूब्स को मसला और उनके हाथों की छुवन से मान्या के निप्पल्स तनकर खड़े हो गए। विजयेंद्र, मान्या के बूब्स को अपने मुँह में भरकर चूसने लगा।

"आआ...हह...न..ही..ईई!"

मान्या चीखती रही मगर विजयेंद्र मान्या के बूब्स से रिस्ते जवानी के नशे में इस कदर खो गए थे कि उन्हें मान्या की चीखें सुनायी ही नहीं दे रहीं थी। वो भूखे शेर की तरह बिस्तर पर लाचार पड़े मान्या के बदन की जवानी को लूटने में लग गए। उनके हाथ मान्या के मांस को बुरी तरह नोच रहे थे और उनकी जीभ मान्या के बदन को लार से लेप रही रही। गले से लेकर नाभि तक वो मान्या के अंग अंग को कभी चूमते, कभी चूसते तो कभी दाँतों से काट लेते।

अपनी रक्षा करने में असमर्थ, मान्या का चीख चीख कर बेहाल हो गयी। उसके हाथ पैर बेजान से हो गए थे और मान्या अपने होश खोने की कगार पर थी। राजकुमार समझ गए कि मान्या अब उनसे बग़ावत करने की हालत में नहीं है। उन्होंने मान्या के पैरों की रस्सी खोल दी। उसके लंबे, सुड़ौल पैरों को ऊपर की तरफ़ उठा दिया और उसके पैरों के अंगूठों को मुँह में डालकर चूसने लगे।

आधी बेहोशी की हालत में पड़ी मान्या के होंठो से हल्की सी आह फूट पड़ी।

उसकी गोरी टाँगों पर अपनी लार बरसाते हुए राजकुमार उसकी चूत के बीच पहुंच गए। उन्होंने मान्या के पैरों को फैलाया और उसकी कुँवारी चूत की फाकों को चाटने लगे। मान्या ज़ोर से चीखी और बिस्तर पर पैर मारने लगी। राजकुमार ने उसकी टाँगों को कसकर पकड़ लिया और उसकी चूत को चाटते रहे। कुछ पलों में ही मान्या की टाँगें बिस्तर पर बेजान सी फैल गयी और उसकी चूत की फाँकें राजकुमार के सामने खुल गईं।

टाँगो के बीच तेज़ दर्द के साथ एक ज़ोरदार धक्का लगा तो मान्या को होश आया और वो ज़ोर से चीखी। उसने देखा कि राजकुमार का लंड उसकी चूत में घुसकर उसके कुंवारेपन को नष्ट कर चुका था। एक और ज़ोरदार धक्का लगा तो मान्या ज़ोर से चीखी और रोने बिलखने लगी। मगर, मान्या को धक्के लगते ही रहे और जल्द ही उसकी चूत राजकुमार की हवस के रस से भर गयी।

एक अनजाना सा ड़र मान्या के दिल में बैठ गया। उसे ड़र लगा कि कहीं वो अपने साथ हुए इस वहशी बलात्कार के कारण गर्भवती न हो जाये। यदि राजकुमार का पाप, उसकी कोख में पलने लगा तो राजकुमार से विवाह के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं रहेगा। राजकुमार विजयेंद्र की पटरानी बनने के ख्याल से ही मान्या को इतना गहरा सदमा लगा कि वो अगले ही पल फूलों से सजे सेज पर बेहोश हो गयी।
 
बेहोशी की दवा का असर ज़रा कम हुआ तो रम्या की मदहोश आँखों ने खुद को हवा में झूलते हुए पाया। उसके पैर बंधे थे और वो फ़र्श से कुछ फ़ीट ऊपर हवा में लटक रही थी । रम्या के हाथों को कपड़े की रस्सी की मदद से ऊपर कमरे की छत से बांधा गया था। ये कपड़ा एक चरखी से होता हुआ पलंग के एक पाए से बाँध दिया गया था। ये चरखी जैसे ही ऊपर नीचे होती, रम्या का नग्न शरीर भी हवा में ऊपर नीचे होता रहता। पलंग पर लेटे राजकुमार उदयभान, कपड़े को खींचकर चरखी को घुमाते और रम्या का बेहोश बदन हवा में झूलने लगता।

"आआह...नहीं!" होश में आते ही रम्या चीखी।

"मुझे चीखना चिल्लाना बिल्कुल पसंद नहीं," राजकुमार पलंग से उठे और हवा में लटकती रम्या के मुँह में कपड़ा ठूस दिया।

रम्या ने खुद को छुड़ाने के लिए हाथ पैर मारे। उसका बदन हवा में ज़ोर ज़ोर से झूलने लगा और उसकी छाती पर उसके बूब्स थिरकने लगे। उसके बूब्स को यूँ मचकते देख उदयभान का लंड उत्तेजना से फूलने लगा। उसने आगे बढ़कर रम्या के नग्न बूब्स को हथेलियों में जकड़ लिया।

"ऊं...ऊं...मम्म..."

उदयभान के हाथों के स्पर्श ने रम्या के कुँवारे बदन को झुलसा दिया। उसके निजी अङ्गों को आज तक किसी पुरुष ने नहीं छुआ था। उसे बिल्कुल इल्म नहीं था कि उसके बूब्स को कोई अनजान मर्द छुए तो वो यूँ मचल उठेगी। रम्या को ऐसा लगा जैसे उसे बिजली के झटके लग रहे हों | मगर मुँह में कपड़ा ठूसा होने की वजह से वो ठीक से चीख भी नहीं पा रही थी।

उदयभान उसके बूब्स मसलता रहा तो रम्या ने महसूस किया कि उसके बूब्स में कुछ ऐसी तब्दीकियाँ होने लगीं जैसा उसने आज तक कभी महसूस नहीं किया था। उदयभान के हर स्पर्श के साथ रम्या के बूब्स फूलते जाते थे और उसके निपल्स कड़क होते जा रहे थे। और सिर्फ़ बूब्स ही नहीं उसका पूरा बदन जलने लगा था। जैसे जैसे बूब्स से खिलवाड़ की जाती, रम्या की चूत में भी वासना की तरंगें उठ रहीं थीं। रम्या को दर्द, तड़प और सुकून तीनों का एहसास एक साथ होने लगा और वो मचल उठी |

रम्या को अपने बेदाग बदन पर पहली बार किसी पुरुष के हाथों की छुवन से ऐसा लगता था वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठेगी और पागल हो जाएगी। रम्या धीरे धीरे अपने होश खोने लगी और उसका सर दायीं तरफ़ लटक गया। अब उदयभान ने रम्या के बूब्स को मुँह में डालकर चूसना शुरू कर दिया था। अपने जवान जिस्म पर उदयभान के होंठों और दाँतों का स्पर्श रम्या को पागल कर रहा था। उदयभान के हाथ रम्या के नग्न जिस्म पर बेधड़क घूम रहे थे।

फ़िर वो हवा में लटकती रम्या के बदन के पास घुटनों के बल बैठ गया और उसकी नग्न चूत को सहलाने लगा। उसके हाथ ही नहीं उसके होंठ भी रम्या की कुँवारी चूत की नाज़ुक फाकों से खेलने लगे।

"ऊं... मम्म...मम्म"

रम्या की घुटी चीखों ने उदयभान के स्पर्श का विरोध किया। मगर, उदयभान उसकी परवाह किये बिना रम्या की चूत की फाकों को चूसने लगा। रम्या की चूत से रस बरसने लगा और उसके मुँह से घुटी हुई आह निकल पड़ी। मगर जैसे ही उदयभान ने उन फाकों को चाटना शुरू किया रम्या फिर से तड़प उठी और अपने बंधे पैरों से उदयभान को धक्का देकर फ़र्श पर गिरा दिया।

उदयभान को गुस्सा आया और उसने रम्या के मुँह पर ज़ोरदार थप्पड़ मारने शुरू कर दिए। रम्या चिल्लाने लगी मगर उदयभान रम्या को मारता ही रहा। कुछ देर बाद, रम्या के होंठ लहूलुहान हो गए और वो बेहोश हो गयी। उदयभान ने बेहोश पड़ी रम्या की टाँगों को फैलाकर खंबे से बांध दिया। वो उसके नीचे लेट गए और रम्या के हाथ जिस रस्सी से बंधे थे उसे खींचने लगे। चरखे से होती हुई रस्सी जब खिंचती तो रम्या ऊपर उठ जाती और जब ढ़ीली छोड़ दी जाती तो रम्या की खुली चूत में उदयभान का खड़ा लंड समा जाता।

ऐसा वो तब तक करते रहे जब तक उनका वीर्य रम्या की चूत में बरस न जाये गया। उसके बाद उन्होंने रम्या के हाथों और पैरों की रस्सी अपनी तलवार से काट दी। रम्या का नग्न, बेहोश बदन उदयभान के बदन के ऊपर आकर गिर पड़ा। उदयभान ने रम्या को नीचे फ़र्श पर लिटा दिया और उसे बाँहों में भरकर उसके बूब्स मसलते हुए बड़ी दरिंदगी से उस कमसिन हसीना के होंठो को चूमने लगे।
 
"राजकुमार जी, दरवाज़ा खोलिए!"

घबरायी हुई आवाज़ में किसी को ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा पीटते हुए सुनकर दोनों राजकुमारों की नींद खुली। शहज़ादियों के जिस्म के साथ हवस का घिनौना खेल खलने के बाद और बहुत सारी शराब पीकर दोनों करीब करीब बेसुध से पड़े हुए थे। उनकी कामक्रीड़ा के वहशीपन का शिकार बनने के सदमे की वजह से दोनों राजकुमारियाँ पिछले कईं घण्टों से बेहोश थी।

वक़्त आधी रात से ऊपर का हो चुका था। दोनों राजकुमार लड़खड़ाते हुए उठे और कमरे का दरवाज़ा खोल दिया। सामने अजितेश्वरी और उसकी बेटी आर्द्रपाणिनि खड़ी थीं। दोनों के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और उनकी आँखों में खौफ़ का तांडव था।

"क्या बात है?" विजयेंद्र ने पूछा, "आप दोनों इतनी घबरायी हुई क्यों हैं?"

"राजकुमार, भानुगढ़ की प्रजा, महाराज के खिलाफ़ विद्रोह पर उतर आयी है," ड़र के मारे काँपते हुए अजितेश्वरी ने कहा। "विद्रोहियों को आप दोनों के यहाँ होने का पता लग चुका है। उनका मानना है कि आप हमारा राज्य हथियाने के इरादे से यहाँ आये हैं। जनता आपकी खून की प्यासी है। उन्होंने भानुगढ़ के किले में आग लगा दी है। राजमहल जलकर ख़ाक हो गया है। आग की लपटों ने इस चाँदी महल को भी घेर लिया है। आप दोनों, जल्दी से खुफिया रास्ते से निकल जाईये। वरना वो लोग आपको मार डालेंगे।"

ये बात सुनकर दोनों राजकुमार सकते में आ गए। चाँदी महल के चारों और विद्रोहियों की नारेबाज़ी सुनायी दे रही थी। उनकी लगायी आग ने चाँदी महल के अंदर त्राहि मचा दी थी। सब अपनी अपनी जान बचाने के लिए चीखते – चिल्लाते हुए इधर उधर भाग रहे थे।

"महल से निकलने का खुफिया रास्ता कहाँ से है?" विजयेंद्र ने पूछा।

"वो रास्ता नीचे तहखाने से शुरू होकर भानुगढ़ की सीमा पर जो जंगल हैं वहाँ को जाता है," अजितेश्वरी ने कहा। "यदि आप सुरक्षित जंगल तक पहुँच गए तो फ़िर आपको कोई खतरा नहीं है।"

विजयेंद्र ने फ़ौरन बिस्तर पर पड़ी मान्या को देखा। मान्या इस आफ़त से बिल्कुल बेखर, गहरी बेहोशी की हालत में थी।

"उदय, आप शहज़ादी रम्या को उठा लीजिए," विजयेंद्र ने कहा, "हमें इन लड़कियों के साथ यहाँ से फ़ौरन निकलना होगा।"

"जी," उदयभान फ़ौरन रम्या की तरफ़ लपका।

विजयेंद्र ने बिस्तर पर बेसुध पड़े मान्या के नग्न शरीर को कम्बल में लपेटा, उसे अपने कँधे पर लादा और फौरन कमरे से बाहर की तरफ़ भागा। तब तक उदयभान भी आ गया। रम्या उसके कँधे पर बेहोश पड़ी हुई थी। वो सब जल्दी से नीचे तहखाने की तरफ़ बढ़े। जैसे ही सब तहखाने पहुँचे एक घबरायी हुई दासी दौड़ते हुए उनके पास आ गयी।

"अजितेश्वरी देवी," दासी हाँफते हुए बोली, "ये रास्ता अब राजकुमारों के लिए सुरक्षित नहीं है। विद्रोहियों के एक जत्थे को इस रास्ते की भनक पड़ गयी है। वो जंगल में आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

"कोई बात नहीं," अजितेश्वरी ने हौसला देते हुए कहा, "जंगल में तो बस कुछ ही विद्रोही हैं। उनसे आप लोग आराम से निपट सकते हैं। मगर, चाँदी महल को घेरने वाले विद्रोही तो सैंकड़ों की तादाद में हैं | इसलिए हमें महल से फ़ौरन निकलना होगा।"

"नहीं, अजितेश्वरी देवी," विजयेंद्र ने कहा, "हम जब तक जंगल पहुँचेंगे तब तक सारे विद्रोहीयों को खबर मिल जाएगी। और वो सब वहाँ हम से पहले पहुँच चुके होंगे।"

"पर राजकुमार जी," अजितेश्वरी बौखला गयी, "यही एक रास्ता है महल से बाहर निकलने का। विद्रोही बहुत जल्द महल में दाखिल होने वाले हैं।"

"आपने इन बदतमीज़ शहज़ादियों से हमारे अपमान का बदला लेने के लिए हमारी बहुत मदद की है," विजयेंद्र बड़े भारी मन से बोला।

"एक आखिरी उपकार और कर दीजिये हम पर ।"

"आज्ञा दीजिये, राजकुमार," अजितेश्वरी ने बड़े अदब से विजयेंद्र को देखते हुए कहा।

"आप तो तंत्र मंत्र जानती हैं ना," विजयेंद्र की आँखों में हैवानियत थी। "आप तंत्र विद्या के सहारे कुछ ऐसा कर दीजिये कि ये राजकुमारियाँ हमेशा के लिए हमारे वश में हो जाएं। और हम हर रात इन घमंडी शहज़ादीयों के जिस्म पर अपनी हवस का कोड़े बरसाते रहें।"

"जैसी आपकी इच्छा, राजकुमार," अजितेश्वरी ने अपनी बेटी को हाथ से इशारा किया।

आर्द्रपाणिनि दौड़ती हुई गयी और कुछ सेवकों को अपने साथ ले आयी। सब के हाथों में तंत्र मन्त्र का सामान था। अजितेश्वरी और उसकी बेटी ने तहखाने की फ़र्श पर सफ़ेद रंग से एक घेरा बनाया और राजकुमारों को, शहज़ादियों का हाथ थामे उसके अंदर लेट जाने को कहा।

राजकुमारों ने कन्धे पर बेहोश पड़ी लड़कियों को नीचे फ़र्श पर लिटा दिया और खुद उनके पास लेट गए। इतने में सेवक चार बड़े बड़े लोहे के संदूक ले आये । आर्द्रपाणिनि ने उनमें जड़ी बूटियों से बना तैल भर दिया। अजितेश्वरी ने इशारा किया और कुछ सेवक चार बड़े आईने ले आये और संदूकों के चारों तरफ़ उन्हें खड़ा कर दिया। ये चारों आईने एक दूसरे के आमने सामने थे।

"आपको तलवार से गले की नस काटकर दोनों शहज़ादियों और अपनी बलि देनी होगी," अजितेश्वरी ने राजकुमारों से कहा।

"आपके शरीरों को इन संदूकों में बन्द कर दिया जाएगा। इन संदूकों में ऐसा तैल है जो आपके शरीर को कभी सड़ने गलने नहीं देगा। चाहे कितनी भी सदियाँ क्यों न बीत जाये, आप चारों के शरीर वैसे ही रहेंगे जैसे अब हैं। उसके बाद, मैं मन्त्रों की मदद से आप चारों की आत्माओं को इन आईनों में कैद कर लूँगी।"

"हर रात ठीक इसी समय, आप लोगों की आत्माएँ अपने शरीर में प्रवेश कर लेंगी। फ़िर आप अगले दिन का सूरज उगने तक शहज़ादियों को अपनी हवस का शिकार बना सकते हैं। और ऐसा तब तक चलेगा जब तक कोई मेरे बुने इस तंत्र मंत्र के जाल को तोड़ न दे। और ऐसा कभी नहीं हो सकता क्योंकि तंत्र के इस जाल को काटने की विद्या सिर्फ़ मुझे आती है।"

"हम तैयार हैं," विजयेंद्र ने कहा। "आप बस इतना बताये कि अपनी और शहज़ादियों की जान कब लेनी है।"

“सही समय आने पर मैं आपको इशारा कर दूँगी,’ कहकर अजितेश्वरी ने अपनी आँखें मूँद लीं |

अजितेश्वरी ने मन्त्र पढ़ने शुरू किए। जैसे जैसे मन्त्रों की शक्ति बढ़ती गयी, पूरा तहखाना काँपने लगा। एक आखिरी मन्त्र पढ़कर अजितेश्वरी ने हाथ से इशारा किया। दोनों राजकुमारों ने पहले शहज़ादियों की जान ली और फ़िर अपनी। सेवकों ने उनके शवों को उठाकर संदूकों में डाल दिया।

अजितेश्वरी ने फ़िर से मन्त्र पढ़ने शुरू किए। बन्द सन्दूकों से सफ़ेद, चमचमाती रोशनी निकली और कमरे में फैलने लगी। उस रोशनी से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। मगर, अजितेश्वरी मन्त्र पढ़ती ही रही। आखिर, वो रोशनी चार आईनों के भीतर क़ैद हो गयी। तंत्र क्रिया के खत्म होते ही तहखाने में मौजूद सारे सेवक, अजितेश्वरी और उसकी बेटी के साथ ख़ुफ़िया रास्ते से होकर भाग गए।

वहाँ खड़ी राज की आत्मा ने, आईने के अंदर क़ैद मान्या और रम्या की आत्माओं को आज़ाद होने के लिए झटपटाते देखा। उनका दुख राज से देखा न गया | मान्या की दर्दनाक चीखें राज के कानों में गूँजने लगीं और उसका सर दर्द से फटने लगा | राज को लगा वो दर्द उसकी जान ले लेगा | जब दर्द बर्दाश्त करना उसके लिए दुश्वार हो गया तो वो ज़ोर से चीखा।

"मान्या..."

राज चीखते हुए जागा। उसने देखा कि वो बाबा सिध्देश्वरअमरेश्वर के आश्रम में है। बाबा और उनके चेले उसके आस पास बैठे हुए हैं।

"बाबा..." घबराया हुआ राज ज़ोर ज़ोर से हाँफने लगा, "बाबा, उस वहशी दरिंदे से मान्या को बचा लीजिए।"

"तुम बहुत थक गए हो, राज," बाबा ने राज के सर पर हाथ रखा और अपनी आँखें बंद कर लीं। "अब तुम्हें सो जाना चाहिए।"

सर पर बाबा का हाथ पड़ते ही राज की पलकें झपकने लगीं। वो सारी दुनिया से बेखबर होकर नींद की आगोश में चला गया।

• • •
 
बाबा अमरेश्वर के भजन की आवाज़ कानों में पड़ी तो राज ने आँखें खोली और अपने आस पास देखा। वो ध्यान कक्ष में बिछी उसी चटाई पर लेटा हुआ था। और अब सुबह हो चुकी थी। कल रात उसने भानुगढ़ का जो भयानक अतीत देखा था, वो सब एक बार फ़िर उसकी आँखों के आगे नाचने लगा। भानुगढ़ के किले में लगी भयंकर आग और खौफ़ की उस रात को याद करते ही राज काँप गया।

वो फ़ौरन चटाई से उठा और कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल आया। बहार सदानन्द पौधों को पानी दे रहा था।

"मुझे बाबा से मिलना है," राज ने सदानन्द से कहा। "उनसे कुछ ज़रूरी बात करनी है। वो कहाँ मिलेंगे?"

"बाबा मंदिर में हैं," सदानन्द ने मुस्कुराते हुए कहा, "आप हाथ मुँह धो लीजिए। स्नानघर उस तरफ़ है। फ़िर, अतिथि गृह में आकर बैठ जाइए। सुबह की आरती के बाद, बाबा आपसे वहीं मिलेंगे।"

"अच्छा, ठीक है," राज स्नानघर की तरफ़ बढ़ गया।

हाथ मुँह धोकर राज अतिथि गृह में जाकर बैठ गया। कुछ दो मिनट बाद, सदानन्द हाथ में एक ग्लास लिए आ गया।

"ये गुड़ का पानी है, पी लीजिए," ग्लास, राज को देते हुए सदानन्द ने कहा। "वैसे मैं जानता हूँ, आपको हर सुबह चाय या कॉफ़ी पीने की आदत होगी। मगर, हमारे आश्रम में अतिथियों का सत्कार गुड़ के पानी से ही किया जाता है। यही यहाँ की रीत है |"

"कोई बात नहीं," राज ने ग्लास सदानन्द से ले लिया और कहा, "थैंक यू सदानन्द...ओह... मेरा मतलब है, धन्यवाद।"

"इतनी अंग्रेज़ी तो मैं भी जानता हूँ," सदानन्द मुस्कुराया । "इंग्लिश मीडियम स्कूल में जो पढ़ा हूँ। कभी मेरा नाम अमित हुआ करता था। और इंजीनियरिंग फाइनल ईयर का स्टूडेंट था, मैं।"

"फ़िर तुम यहाँ कैसे पहुँचे?" राज ने हैरान होकर पूछा।

"एक सब्जेक्ट में फेल क्या हो गया, अपनी जान लेने पर उतर आया। घरवालों ने वक़्त रहते आकर किसी तरह मुझे बचाया और अस्पताल पहुँचाया | वहाँ से डिस्चार्ज होने के बाद मैं बुरी तरह से टूट चुका था | मेरे परिवारवाले मुझे यहाँ, बाबा के आश्रम ले आए । बाबा से मिलकर मैंने जाना कि जीवन कितना अनमोल है। मैंने बाबा के साथ मिलकर दीन दुखियारों की मदद के लिए अपना जीवन समर्पित करने की ठान ली।" सदानन्द ने आह भरी और कहा, "बस तब से यहीं हूँ।"

"ये तो बड़ी अच्छी बात है, सदानन्द।" राज ने गुड़ का पानी पीकर ग्लास उसे वापस कर दिया।

तभी बाबा कमरे के अंदर आ गए। सदानन्द उन्हें प्रणाम कर के कमरे से चला गया। बाबा को देखकर राज उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। बाबा ने हाथ से इशारा कर उसे बैठने को कहा और खुद भी चारपाई पर बैठ गए।

"बाबा, मैं भानुगढ़ के राज़ जान गया हूँ," राज ने नज़रें झुका लीं। "दरअसल, चांदी महल के तेहख़ाने में शहज़ादियों की आत्माओं को काले जादू की मदद से कैद कर के रखा गया है।"

"मगर उन शहज़ादियों की किसी से क्या दुश्मनी थी?" बाबा हैरान हो गए।

राज ने बाबा को वो सब बताया जो उसने बीते वक़्त में जाकर देखा था। साथ ही उन्हें ये भी बताया कि डॉ दामले ने उसकी हिप्नोसिस थेरेपी की थी। और हिप्नोसिस के दौरान उसे ये पता चला कि वो पिछले जन्म में भानुगढ़ का सेनापति वीरभद्र सेन था।

"हमें शहज़ादियों की आत्माओं को आज़ाद करवाना होगा, तभी उन्हें इस दर्द से मुक्ति मिल सकती है," राज ने बड़ी उदासी से कहा।

"मगर उस काले जादू का तोड़ कोई नहीं जानता। जिसने वो कला जादू किया, वो तो अब इस दुनिया में नहीं रहीं। अब तो शहज़ादियों को मुक्ति दिलाना नामुमकिन लग रहा है, बाबा।"

"एक रास्ता है," बाबा ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा, "समरपुर में एक औरत रहती है जिसका नाम पिंकी है। वो वहाँ के लोगों को भूत प्रेतों से मुक्ति दिलाने का काम करती है। वहाँ के लोग मानते हैं कि वो आत्माओं से बात कर सकती है। वो अजितेश्वरी देवी की ही वंशज है और उसका नाम पिंकी है | हो सकता है कि पिंकी इस काले जादू का तोड़ जानती हो। तुम स्मरपुर जाकर उससे मिल लो, शायद वो तुम्हारी मदद कर सके।"

"ठीक है, बाबा," राज खड़ा हो गया और हाथ जोड़ते हुए बोला, "मैं अभी समरपुर को रवाना हो जाता हूँ।"

"जय श्रीराम," बाबा ने राज के सर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद दिया।

• • •
 
"लो आ गयी आपकी मंज़िल, बाबू जी," एक झोंपड़े के सामने रिक्शा रोककर रिक्शावाले ने राज से कहा।

"ये लो," राज ने उसे कुछ रुपए दिए और झोंपड़े की तरफ़ बढ़ गया।

"पहले तो सिर्फ़ रात में आते थे, अब तो दिन में भी आने लगे हैं," रिक्शावाला खुद से बोला और रिक्शा लेकर आगे निकल गया।

"लगता है, पिंकी का धंधा बहुत बढ़ गया है।"

राज ने झोंपड़े का दरवाज़ा खटखटाया। लगभग 30 -32 साल की लगनेवाली एक खूबसूरत औरत ने दरवाज़ा खोला। उसका बदन छरहरा था और रंग गोरा मगर वो एक फ़टी पुरानी साड़ी पहने हुए थी।

"जी नमस्ते, मेरा नाम राज शर्मा है," राज ने अपने हाथ जोड़ते हुए कहा। "मैं एक रिपोर्टर हूँ और भानुगढ़ के किले के बारे में..."

"अंदर आईये," पिंकी ने राज की बात बीच में ही काट दी।

राज के अंदर कदम रखते ही पिंकी ने दरवाज़ा बन्द कर दिया।

"बैठिये," खाट की तरफ़ इशारा करते हुए पिंकी बोली, "पानी लेंगे, आप?"

"जी नहीं, शुक्रिया," राज ने फ़र्श पर खेलती बच्ची की ओर देखा। राज को लगा शायद वो पिंकी की बेटी है।

"क्या कह रहे थे, आप?" पिंकी ने राज को सर से पाँव तक देखते हुए पूछा।

"जी, मैं मवेटगढ़ के किले पर एक टेलीविशन शो कर रहा हूँ। और उसके लिये मैंने किले पर कुछ रिसर्च की है। मेरी रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि भानुगढ़ की शहज़ादियों की आत्माओं को किले में क़ैद कर के रखा गया है। और ऐसा काले जादू की मदद से आपकी पूर्वज, अजितेश्वरी देवी ने किया है।"

"मैं जानती हूँ," पिंकी ने आह भरी और फ़र्श पर बैठ गयी, "ये सब मेरे पूर्वजों का ही किया धरा है। और उनके बुरे कर्मों की सज़ा आज हम भुगत रहे हैं। हमारे खानदान की किसी औरत को प्यार और परिवार का सुख तो कभी मिला ही नहीं। हम सब तो बस वेश्याएं बनकर रह गयीं हैं। सबको बस हमारे बदन की प्यास है। कोई हमें ज़बरदस्ती उठा ले जाता है और अपने बिस्तर पर पटककर रौंद देता है। तो कोई प्यार का झाँसा देकर हमारे बदन के साथ खिलवाड़ करता है।

अपने परिवार पर लगे शाप को मैंने भी भुगता है। कच्ची उम्र में मैं एक शहरी बाबू से प्यार कर बैठी। बाद में पता चला वो कमीना तो पहले से ही शादीशुदा है। पर तक बहुत देर हो गयी और मैं पेट से हो चुकी थी। मैं बिल्कुल अकेली और बेसहारा थी | अपना और अपनी बच्ची का पेट पालने के लिए मैं ठाकुर के खेतों में काम करने लगी। मगर, एक रात ठाकुर के आदमी ज़बरदस्ती मेरे घर घुस आए।

मैं उस वक़्त 19 साल की थी और घर पर अकेली थी। मैं मदद के लिए चिल्लायी तो उन सबने मेरे हाथ पैर जकड़ लिए और मुझे नशीली दवा सुँघाकर बेहोश कर दिया। जब होश आया तो देखा कि मैं ठाकुर के बिस्तर पर पड़ी हुई थी। मैंने वहाँ से भागने की कोशिश की तो ठाकुर ने मेरी बाँह में नशे की दवा से भरी सुई घुसा दी। फ़िर सारी रात, ठाकुर और उसके लोग मेरे बेहोश बदन के साथ अपनी हवस को भूख मिटाते रहे। जब भी मैं होश में आती और चिल्लाने और बगावत करने लगती वो मुझे नशे की दवा से भीगा रूमाल सुँघाकर फ़िर से बेहोश कर देते।

अगली सुबह जब वो सब पीकर नशे में धुत्त पड़े थे तो मैं वहाँ से भाग आयी। मगर पूरे गाँव मे ये बात फ़ैलते देर न लगी कि ठाकुर और उसके लोगों ने मेरा बलात्कार किया है। उस रात से मेरे घर पर लोग मेरा जिस्म नोचने आने लगे। मैं मना करती तो वो मुझे ज़बरदस्ती उठाकर ले जाते। मैं गाँव में बदनाम हो चुकी थी। मुझे गाँववालों ने काम देना भी बन्द कर दिया। अब अपना बदन बेचने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। इस तरह मैं भी वेश्या बन गयी।

मुझ में आत्माओं के साथ बात करने की एक दिव्य शक्ति बचपन से ही है। इस शक्ति के बल पर मैंने गाँव कुछ लोगों की भूत प्रेतों के प्रकोप से रक्षा की है। अगर, मैं आपके किसी काम आ सकूँ तो मुझे बहुत खुशी होगी।"

"क्या आप उन दोनों शहज़ादियों की आत्माओं को काले जादू के उस जाल से आज़ाद करवा सकती हैं?"

"इसके लिए मुझे आप एक रात का वक़्त दे दीजिए," पिंकी ने अपने आँसू पोछते हुए कहा। "आज अमावस की रात है। अपने बुरे कर्मों की वजह से जिन आत्माओं को मुक्ति नहीं मिलती वो श्मशान में भटकती रहती हैं। आज रात मैं श्मशान जाऊँगी और साधना के ज़रिए अजितेश्वरी माँ की आत्मा से सम्पर्क कर के ये पता लगाऊंगी कि इस काले जादू के जाल का तोड़ क्या है। उन शहज़ादियों को मुक्ति मिल जाये तो ही हमारा परिवार अपने कुकर्मों की सज़ा से मुक्त होगा। और अजितेश्वरी माँ की आत्मा को भी मुक्ति मिलेगी।"

“ठीक है, पिंकी जी,” राज खाट से उठकर खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर बोला, “अब मुझे इजाज़त दीजिए | जब तक आप कोई तोड़ नहीं निकाल लेतीं, मैं यहाँ समरपुर में ही रहकर इंतज़ार करूँगा |”
 
राज, बाबा अमरेश्वर के आश्रम के अतिथि गृह में बैठा उनके आने की राह देख रहा था। सदानन्द ने उन्हें बताया कि वो मंदिर में संध्या आरती कर रहे हैं। पिंकी से मिलने के बाद राज ऊटी चला गया था और आज सुबह ही भानुगढ़ आया था। भानुगढ़ पहुँचते ही वो सीधे बाबा से मिलने उनके आश्रम चला आया। वो जब भी आश्रम में आता था उसे यहाँ एक अनोखे सुख का एहसास होता था। शायद यहाँ सचमुच कुछ ऐसा है जो बहुत पवित्र और दिव्य है।

लेकिन इस बार, आश्रम का पावन वातावरण भी राज को राहत नहीं पहुँचा पा रहा था। वो एक ऐसी उलझन में जो फँस गया था। पिंकी की कही बातें याद आते ही राज के माथे पर शिकन पड़ीं। पिंकी से मिलने के बाद, राज समरपुर के एक छोटे से होटल में ठहरा गया जहाँ सुविधाएं न के बराबर थीं। उसे पिंकी के जवाब का इंतज़ार था। राज को वो रात याद आ गयी, जिस रात पिंकी उससे मिलने उसके होटल आयी थी |

• • •

उस रात, राज रात का खाना खाने के बाद सोने की तैयारी कर ही रहा था कि उसे होटल के रिसेप्शन से फ़ोन आया।

"साहिब, हम होटल के रिसेप्सन से किसनलाल बोल रहे हैं। आपकी आइटम आ गयी है," रिसेप्शन पर बैठा आदमी फ़ोन पर फुसफुसाया। "उसे आपके कमरे में भेज दूँ?"

"आइटम ?" राज चौंक गया। "कौन आइटम? ये क्या बकवास कर रहे हो?"

"अरे, वही साहिब," किशनलाल ने आवाज़ धीमी की और कहा, "वो तवायफ़ पिंकी आयी है। भेज दूँ क्या कमरे में?"

"नहीं," राज नहीं चाहता था कि होटल में कोई भी कुछ गलत मतलब निकाले। "उन्हें वहीं बिठाओ। मैं अभी आता हूँ।"

राज ने अपनी जैकेट पहनी और सीढ़ियाँ उतरकर रिसेप्शन की तरफ़ बढ़ा।

"नमस्ते पिंकी जी," राज मुस्कुराया और कहा, "आईये बाहर बगीचे में बैठते हैं।"

"जी," पिंकी ने अपना घूँघट संभाला और राज के साथ चल दी।

रिसेप्शन के पास से गुज़रती पिंकी को किशनलाल हवस भरी नजरों से घूरने लगा। पिंकी उसे नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ गयी।

"इस बेंच पर बैठ जाते हैं," राज ने होटल के बगीचे में रखी एक बेंच की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

राज जानबूझ कर उस बेंच पर बैठा जहाँ से सब लोग ये देख सकें कि वो दोनों कोई ग़लत काम नहीं कर रहें हैं।

"बताइए, पिंकी जी," राज ने हौले से कहा, "आपको उस काले जादू का तोड़ मिला।"

"जी," पिंकी ने मुस्कुराते हुए सर हिलाया। "मैंने अजितेश्वरी माँ की आत्मा से सम्पर्क किया और उनसे तोड़ जान लिया है। अब बहुत जल्द मैं उन दोनों राजकुमारों और शहज़ादियों की आत्माओं को मुक्ति दिला दूँगी। अजितेश्वरी माँ ने मुझे एक बात और बतायी थी। उन्होनें कहा कि आप पिछले जन्म में सेनापति वीरभद्र थे और शहज़ादी अपराजिता से बहुत प्रेम करते थे। अजितेश्वरी माँ ने मुझसे कहा कि इस जन्म में आप दोनों का मिलन मैं करवाऊँ।"

"मगर, ये कैसे मुमकिन है?" राज चौंक गया।

"मुमकिन है, राज बाबू," पिंकी मुस्कुरायी और फ़िर उसने राज से नज़रें फ़ेर लीं। "मगर, उसके लिए किसी को अपने जीवन की बलि देंनी होगी। अगर ऐसा हो तो शहज़ादी की आत्मा फ़िर से उनके शरीर में वापस आ सकती है और वो जी उठेंगी।"

"लेकिन, हम किसी की हत्या तो नहीं कर सकते, न?" राज को पिंकी की बातें बड़ी अजीब लग रहीं थी। उसकी बातों पर राज विश्वास नहीं कर पा रहा था।

"उसकी कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी।" पिंकी ने मुस्कुराते हुए राज की आँखों में देखा और कहा, "आप दोनों का मिलन करवाने के लिए मैं अपने जीवन की बलि दूँगी। बदले में आपको बस मेरा एक काम करना होगा।"

"पिंकी जी, ये आप क्या कह रही हैं!" राज चौंक गया। "आप अपनी जान क्यों देना चाहती हैं।"

"शहज़ादियों के साथ हमारे पूर्वजों ने जो पाप किया उसकी सज़ा हम सबने भुगती है," कहते हुए पिंकी की आँखें भर आयीं। "मैं इस ज़िल्लत की ज़िंदगी से तंग आ गयी हूँ। मुझे इस ज़िन्दगी से मुक्ति चाहिए। आपका मिलन शहज़ादी से करवा सकूँ तो मैं समझूँगी मेरा जीवन सफ़ल हो गया।"

"बस आप मेरे लिए इतना कर दीजिए कि मेरी बेटी गौरी का दाखिला यहाँ से बहुत दूर, किसी अच्छे स्कूल में करवा दीजिये। ताकि वो इस गंदगी से बाहर निकल सके, खूब पढ़े लिखे और इज़्ज़त की ज़िंदगी जिये। कुछ सालों में गौरी जवान हो जाएगी | और तब यहाँ के वहशी भेड़िये उस मासूम को भी न छोड़ेंगे। वो सब सोचते ही मेरा जी घबरा जाता है | अगर आप चाहें तो गौरी को वासना के इस दलदल से बचा सकते हैं | आप पैसों की चिंता बिल्कुल मत कीजिये। मैंने गौरी की पढ़ाई के लिए कुछ पैसे बैंक में जमा कर रखे हैं।"

"आप गौरी की चिंता न करें, पिंकी दीदी," राज ने पिंकी के आँसू पोछते हुए कहा। "मैं उसका दाखिला ऊटी के उसी बॉडिंग स्कूल में कर दूँगा जहाँ कभी मैं पढ़ता था । और उसकी आगे की पढ़ाई का पूरा खर्च भी मैं ही उठाऊंगा। आप निश्चित होकर घर जाईये।"

पिंकी ने हाथ जोड़े और अपने पल्लू से आँसू पोछती हुई वहाँ से जाने लगी। वो कुछ कदम आगे बढ़ी और फ़िर रुक गयी जैसे उसे कुछ याद आया हो। पिंकी मुड़ी और तेज़ी से चलकर राज के पास आयी।

"एक बात तो बताना मैं भूल ही गयी," पिंकी की मुस्कुराहट वापस आ गयी थी। "अजितेश्वरी माँ की आत्मा ने मुझे ये भी बताया था कि कोई है जो नहीं चाहता कि आपका मिलन शहज़ादी से हो। और ये वही है जिसने पिछले जनम में आपकी हत्या की साज़िश रची थी। वो आपके इस जनम में भी मौजूद है और आपका कोई करीबी ही है।"

"वो कौन है, ये जानने के लिए आपको अपने पिछले जन्म में जाना होगा और ये पता लगाने की कोशिश करनी होगी कि आपकी हत्या का षडयंत्र किसने रचा था। और इस काम में बाबा सिद्धेश्वर ही आपकी मदद कर सकते हैं।”
 
दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी तो राज अपने ख़यालों की दुनिया से बाहर आया। बाबा अपने चेलों के साथ अंदर आ गए। उन्हें देखते ही राज उठा और आगे बढ़कर उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

"चिरंजीवी भव!" बाबा ने राज के सर पर हाथ रखकर कहा।

"बाबा मुझे क्षमा करें आपको दोबारा कष्ट दे रहा हूँ," राज ने हाथ जोड़े। "मुझे अपने अतीत से जुड़ा एक ऐसा राज़ जानना है जिससे मैं अब तक अनजान हूँ। और इसके लिए मुझे आपकी मदद की ज़रूरत है।"

"इसमें कष्ट कैसा, राज?" बाबा ने बड़े प्यार से राज के कँधे पर हाथ रखा। "लोगों की मदद करना तो मेरा फ़र्ज़ है। आओ, ध्यान कक्ष में चलते हैं।"

"जी," राज बाबा के साथ चल पड़ा।

ध्यान कक्ष में सारी तैयारियां पहले से ही कर दी गयीं थीं जैसे मानो बाबा को पहले से पता था राज उनसे मिलने आने वाला है। बाबा के सभी चेले अपनी अपनी जगह मन्त्र पढ़ने के लिए तैयार बैठे थे। पूजा का सारा सामान भी लाकर रख दिया गया था। हवनकुंड भी बिल्कुल तैयार था।

हाथ के इशारे से राज को चटाई पर लेटने के लिए कहकर बाबा ने अग्निकुंड में आग जलायी। फ़िर मन्त्रों का जाप शुरू हो गया साथ ही हवनकुण्ड में आहुति भी पड़ने लगी। मन्त्रों की शक्ति से राज आसपास की दुनिया से दूर होने लगा। उसकी पलकें झपकने की देर थी कि सफ़ेद रोशनी ने उसकी नज़रों को ढँक दिया।

इस बार, आँखों के आगे से सफ़ेद रोशनी का पर्दा हटा तो राज ने सेनापति वीरभद्र को चाँदी महल के सामने खड़ा देखा। चाँदी महल की छत पर शहज़ादी अपराजिता उसका इंतज़ार कर रही थी। वीरभद्र तेज़ी से शहज़ादी की ओर बढ़ा। राज ने देखा कि चाँदी महल के ठीक सामने राजमहल की छत से कोई छुपकर उन दोनों प्रेमियों को देख रहा था।

राज राजमहल की छत पर पहुँच गया। पास पहुँचा तो पता चला वो अजितेश्वरी है जो एक काला कम्बल ओढ़े उन दोनों प्रेमियों पर नज़र रख रही थी। वीरभद्र, शहज़ादी को अपनी बाहों में उठाकर महल के अंदर ले गया तो अजितेश्वरी छत से नीचे उतरी और राजमहल के अंदर चली गयी। राज उसका पीछा करने लगा। एक लंबे से गलियारे से होती हुई वो महराज भानुप्रतापदेव के कमरे में पहुँची।

"इस दासी का प्रणाम स्वीकार करें, महाराज," अजितेश्वरी ने बड़े विनीत स्वर में कहा।

"हम बस अभी आपको ही याद कर रहे थे," अजितेश्वरी को देखते ही महाराज का चेहरा खिल उठा। हम बहुत अकेलापन महसूस कर रहे थे। आप बिलकुल ठीक समय पर आयीं हैं। चलिए बताइए, आज हमें कौन सा गीत सुनायेंगी?"

"आज आपको मैं एक बहुत ज़रूरी सूचना देने आयी हूँ, महाराज," अजितेश्वरी ने महाराज भानुप्रतापदेव के करीब आकर बड़ी धीमी आवाज़ में कहा।

"कैसी सूचना?" महाराज ने भौहें सिकोड़ते हुए अजितेश्वरी को देखा। "क्या कहना चाहती हैं, आप?"

"आपकी सुपुत्री शहज़ादी अपराजिता को प्रेम का रोग लग गया है," प्याले में शराब डालकर महाराज को देते हुए अजितेश्वरी बोली।

"अच्छा! ये तो बड़ी अच्छी बात है," महाराज के झुर्रिदार चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान आ गयी। "हम शहज़ादी के विवाह के बारे में सोच ही रहे थे। अच्छा हुआ शहज़ादी ने अपने लिए वर स्वयं ही चुन लिया। कौन है वो राजकुमार जो हमारी पुत्री के मन में बस गया है?"

“यही तो दुख की बात है, महाराज," अजितेश्वरी ने आह भरी, "कि वो किसी साम्राज्य का राजकुमार नहीं है |”

"राजकुमार नहीं है?" महाराज के चेहरे पर हँसी की जगह क्रोध ने ली। "तो कौन है वो?"

"सेनापति वीरभद्र सेन," अजितेश्वरी की आँखों में एक शैतानी मुस्कान थी।

"क्या?" महाराज गुस्से से तिलमिला उठे। "उसकी इतनी हिम्मत की वो हमारी बेटी पर बुरी नज़र डाल रहा है? हमने आज तक उसे अपने पुत्र के समान स्नेह दिया और उसने हमारी पीठ पर ही छुरा घोंप दिया।"

"वही तो," अजितेश्वरी ने मुँह बनाया। "मेरी सलाह तो ये है कि आप दोनों शहज़ादियों का विवाह समरपुर के राजकुमारों से कर दीजिए।"

"पर हमने तो सुना है समरपुर के राजकुमार बड़े ही क्रूर, अधम और चरित्रहीन हैं।"

"ओह! महाराज आप भी न," अजितेश्वरी ने महाराज का खाली प्याला फिर से शराब से भर दिया। "जवानी के जोश में राजकुमारों ने थोड़ी बहुत शरारत कर भी तो क्या हुआ? समरपुर जैसे शक्तिशाली और सम्पन्न राज्य के वारिस हैं। आपकी पुत्रियों का जीवन सफ़ल हो जाएगा। और वैसे भी अगर समरपुर और भानुगढ़ के बीच युद्ध हुआ तो भानुगढ़ तबाह हो जाएगा।

इस युद्ध को टालने का एकमात्र रास्ता यही है कि आप अपनी पुत्रियों का विवाह समरपुर के महाराज सुरेंदर प्रताप के बेटों से कर दे। फ़िर तो वो हमारे परिवार के सदस्य बन जायेंगे। अपनों के साथ भी कोई युद्ध करता है भला? मेरी मानिए महाराज, इसी में सबका भला है।"

"आप ठीक कहती हैं," महाराज को अपनी समस्या का समाधान नज़र आया। "हम कल ही समरपुर जाएंगे और महाराज सुरेंदर से भेंट करेंगे।"

"किन्तु महाराज, पहले अपनी पुत्री के सर से उस सेनापति के प्रेम का भूत तो उतारिए।" अजितेश्वरी ने ताना मारते हुए कहा। “नहीं तो वो किसी और से विवाह करने को कभी राज़ी नहीं होंगी |”

"वो नीच वीरभद्र, शहज़ादी को प्रेम के जाल में फाँसकर हमारा सिंहासन हासिल करना चाहता है," महराज की आँखों से अंगारे बरसने लगे। "हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे। हमने वीरभद्र नाम के काँटे को रास्ते से हटाने की एक योजना बनायी है। और इसमें आपको हमारी सहायता करनी होगी।"

"आज्ञा दें, महाराज," अजितेश्वरी का चेहरा खुशी से खिल उठा।

"हम बीमार होने का नाटक करेंगे," कहते हुए महराज की आँखों में वीरभद्र के लिए नफ़रत नज़र आ रही थी, "और वीरभद्र को बुलाकर ये कहेंगे कि हमें पड़ोसी देश के आक्रमण का डर सता रहा है। वो राज्य की सभी सीमाओं पर सुरक्षा का मुवायना करने जायें। आप धनुर्धारी मेघजित को सन्देश भिजवा दीजिये कि वो वीरभद्र का पीछा करें और मौका देखकर अपने विष लगे तीर से उन्हें खत्म कर दें।"

"वाह, महाराज मान गए आपकी बुद्धि को," अजितेश्वरी ने तालियाँ बजाते हुए कहा।

महाराज और अजितेश्वरी एक सुर में ठहाके लगाने लगे जिसकी आवाज़ से पूरा कमरा गूँज उठा।
 
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