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Adultery अतीत की खोज

अचानक ही वो अलीशान महल, खण्डर में तब्दील हो गया। अब, चारों तरफ़ सिवाय अँधेरे के और कुछ नहीं था। राज आँखें फाड़े उस अँधेरे में उस लड़की को ढूँढता रहा। मगर, उसे कहीं कुछ भी नहीं दिखायी दिया। लेकिन, अगले ही पल वो खंडहर खौफ़नाक आवाज़ों से गूँज उठा। कहीं से लड़कियों के रोने चिल्लाने की आवाज़ें आती तो कहीं से जल्लादों के अट्टहास की। उन आवाज़ों से राज का सर फटने लगा और उसने अपने कानों पर हाथ रख लिया।

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"न...ही...ईईई!" राज चीखते हुए उठा।

हाँफते हुए उसने देखा कि वो तो ब्रिगेडियर के बँगले के गेस्टरूम में था। कमरे की लाइट अब भी जल रही थी। राज ने पानी पीकर खुद को शांत किया। ये डरावना सपना पिछली कई रातों से उसकी रातों की नींद हराम किये हुए था। राज जानता था कि जो सपने बार बार आते हैं उनमें कोई राज़, कोई संदेश ज़रूर छुपा होता है। मगर, वो ये नहीं जानता था कि इस राज़ की तह तक कैसे पहुँचा जाए?

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राज ने ब्रेक दबाया तो उसकी कार एक तेज़ आवाज़ के साथ किले के बाहर रुक गयी। अमावस की रात के सन्नाटे में कार के ब्रेक की आवाज़ दूर तक गूँज उठी। राज ने कार का इंजिन बन्द किया और अपनी कलाई पर बँधी घड़ी को देखा। रात के 12 बज चुके थे। हालाँकि की ब्रिगेडियर साहब चाहते थे कि उनका ड्राइवर राज को किले तक छोड़ दे मगर कामत था कि आधी रात के वक़्त किले के आस पास फटकने से भी कतरा रहा था। इसलिए, राज खुद ही ब्रिगेडियर की कार ड्राइव कर के आ गया।

कार पार्क करने के बाद राज ने हैंडीकैम और शूटिंग की ज़रूरत की दूसरी चीजों से भरा एक बैग लिए कार से बाहर निकला। उसकी चैनल के टेक्निशियंस ने किले में हर तरफ़ सीसीटीवी कैमरा लगवा दिए थे। हाँ, वो अलग बात है कि इसके लिए राज को अपनी शूटिंग एक हफ़्ते के लिए रोकनी पड़ी।

चैनल के डायरेक्टर्स ने शर्त ये रखी थी कि राज अकेला ही रात के वक़्त किले में जायेगा ताकि इस शो को लेकर ऑडियंस में रोमांच बन जाये। राज ने उनकी ये शर्त फ़ौरन मान ली क्योंकि उसकी नज़र में वहाँ ऐसी कोई शक्ति नहीं थी जिससे उसे कोई खतरा हो सकता था। फ़िर भी, ब्रिगेडियर के कहने पर राज ने उनकी पिस्तौल अपने साथ रख ली थी। राज ने बैग को संभालकर थाम लिया और किले के अंदर चल पड़ा।

आज तक राज ने भानुगढ़ के किले को सिर्फ़ तस्वीरों में देखा था। आज पहली बार किले में कदम रखते ही उसे ऐसा लगा जैसे वो न जाने कितनी बार इन राहों से गुज़र चुका है। वक़्त की मार से जूझती उन खण्डहरों की बेजान दीवारें, और उन दीवारों से लिपटी जँगली बेलों के पत्तों की सरसराहट, सब राज को ऐसे लग रहे थे जैसे अपनी ही किसी रहस्यमयी भाषा में उसके कानों में कोई राज़ फुसफुसा रहे हों।

एक पल को राज के बढ़ते कदम रुक गए जैसे वो प्रकृति के इस गुप्त संदेश को सुनने और समझने की कोशिश कर रहा हो। उसे ऐसा लगा जैसे उसके चारों और फैले अँधेरे की चादर में बहुत सी अनदेखी परछाईयाँ मंडरा रही हों। वो उनके कदमों की आहट को महसूस करने लगा। मगर फ़िर उसे अपने काम की याद आयी और हैंडीकैम ऑन किये वो आगे बढ़ गया।

किले के अंदर तरह तरह की इमारतों के खंडहर थे। रात के सन्नाटे में, हर तरफ़ से न जाने कैसी कैसी खौफ़नाक आवाज़ें गूँज रही थीं। जंगली बेलों की पत्तियों से हवा भी सरसराते हुए गुज़रती तो राज चौंक जाता था। उसे ऐसा लगता जैसे कोई अदृश्य परछाई उसका पीछा कर रही है। वो चौंकते हुए पीछे मुड़ता मगर अपने पीछे किसी को नहीं पाता। राज अपना हर कदम सम्भाल कर रखते हुए आगे बढ़ने लगा।

किले के ठीक बीच में एक बड़ी सी इमारत का खंडहर था। राज को लगा यही इमारत किसी ज़माने में महाराज भानुप्रतापदेव का राजमहल रहा होगा। मगर, वो पूरे यकीन के साथ नहीं कह सकता था। मगर, फ़िर राज ने सोचा उसके शो का सम्बंध भानुगढ़ के इतिहास या किले की बनावट से तो नहीं था। वो तो यहाँ किसी पैरानॉर्मल एक्टिविटी की खोज करने आया था। फ़िर वो भानुगढ़ के राजमहल में हो या चौपाटी पर, क्या फ़र्क पड़ता है?

राज उस इमारत के पास पहुँचा और हैंडीकैम उसकी तरफ़ कर के रेकॉर्डिंग शुरु कर दी।

"नमस्कार दोस्तों, ‘सच की खोज’ के पहले एपिसोड में आप सबका स्वागत है," इमारत के सामने खड़े होकर राज हैंडीकैम की तरफ़ देखते हुए बोला। "मैं, आपका होस्ट राज शर्मा, आज देश के सबसे ज़्यादा ख़तरनाक बताए जाने वाले भानुगढ़ के हॉन्टेड किले में, रात के साढ़े बारह बजे एकदम अकेला खड़ा हूँ।"

राज ने हैंडीकैम एक बार फ़िर उस इमारत की तरफ़ कर दिया।

"मेरे ठीक पीछे आप सब एक बड़ी सी इमारत देख रहे हैं जो शायद उस वक़्त के राजा भानुप्रतापदेव का राजमहल है। बताया जाता है कि भानुगढ़ के हॉन्टेड होने की कहानी राजा भानुप्रतापदेव और उनके पड़ोसी राज्य के राजा सुरेंदर प्रताप की आपसी दुश्मनी से शुरू हुई थी।"

हैंडीकैम को अपनी ओर घुमाने के बाद राज ने आगे कहना शुरू किया।

"भानुगढ़ के लोगों का कहना है कि इस राजमहल में एक ऐसी भयानक आग लगी थी जिसमें बहुत लोग मारे गए। उन लोगों की अतृप्त आत्माएँ आज भी यहीं हैं और इसी वजह से किले को हॉन्टेड माना जाता है। तो आईये देखते हैं, लोगों का ये दावा मिथ्या है या सच?"

हैंडीकैम को मज़बूती से पकड़कर राज ने राजमहल के अंदर कदम रखा। उसके कदम जैसे ही उस इमारत के अंदर पड़े, राज की साँसें पल भर के लिए थम गयीं और उसके दिल की धड़कनें अचानक तेज़ हो गयीं। राज समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? उसे ऐसा लगा कि जिस चौखट पर उसने अभी अभी अपना पहला कदम रखा है, वो उसके कदमों की आहट को बहुत अच्छी तरह पहचानती थी।

अचानक उसे ऐसा लगा कई सारी इंसानी आवाज़ें उसके कानों में कुछ फुसफुसा रही है। राज ने हड़बड़ाकर चारों तरफ़ देखा। चारों तरफ़ अँधेरे और सन्नाटे के सिवाय और कुछ नहीं था। राज ने अपना सर झटका और खुद को यकीन दिलाया कि उसे वहम हुआ है। उसके सामने एक बड़ा सा गलियारा था जो शायद कभी राजमहल का मुख्य प्रवेश द्वार हुआ करता था। वो गलियारा आगे चलकर कई सारे गलियारों में बँट जाता था। जहाँ तक नज़र जाती थी सिवाय अँधेरे के कुछ नहीं नज़र आता था। आगे बढ़ने से पहले राज ने हैंडीकैम को एक बार फ़िर अपनी तरफ़ घुमा लिया।

"कल सुबह का सूरज उगने तक मैं इस पूरे किले में घूमकर ये पता लगाने की कोशिश करूँगा कि यहाँ कोई पैरानॉर्मल एक्टिविटी है या नहीं। मेरे पास ऐसे कुछ डिवाइस हैं जो किसी भी तरह की नेगटिव एनर्जी के संपर्क में आते ही सिग्नल देना शुरू कर देंगे। तो चलते हैं, भानुगढ़ के रोमांचक सफ़र पर।"

राज ने हैंडीकैम को एक बार फ़िर गलियारे की तरफ़ घुमा दिया। मगर, इस बार उसे उस बड़े से गलियारे के अंत में एक हल्की सी रोशनी नज़र आयी।

"अरे!" राज को अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ, "वहाँ अचानक रोशनी कैसे नज़र आ रही है? कुछ 2 मिनट पहले तक तो हर तरफ़ बस अँधेरा था। चलो, देखते हैं।"
 
राज उस रोशनी की तरफ़ बढ़ चला। वो जैसे जैसे उस रोशनी के करीब बढ़ता गया उस इमारत में बड़ी अजीब सी तब्दीलियाँ होने लगीं। दीवारों पर पड़ी दरारें अपने आप ग़ायब होने लगीं और उनकी रंगत वापस आने लगी। उन पर लिपटी जँगली बेलें और मकड़ी के जाले हवा हो गए। धूल की अनगिनत परतों के नीचे दबे फ़र्श का संगमरमर, धुले आईने की तरह चमकने लगा।

राज जब गलियारे के अंत में पहुँचा तो देखा कि वहाँ से राजमहल बिल्कुल वैसा ही नज़र आ रहा था जैसा कि वो सैंकड़ो साल पहले, महाराज भानुप्रतापदेव के समय पर लगता था। बेशकीमती कालीन से सजा संगमरमर का फर्श था, दीवारों और मीनारों की नक्काशी बेमिसाल थी, जगह जगह खूबसूरत झूमर लटक रहे थे जिनमें जलते चिरागों की रोशनी रात में भी दिन का एहसास कराती थी।

मगर, उससे भी अजीब बात ये थी कि राज को फ़र्श का वो कालीन, छत पर लगे झूमर ही नहीं, दीवारों पर उकेरी नक्काशी का हर बेल बूटा, हर पत्ता बहुत जाना पहचाना लगता है। उसे ऐसा जान पड़ता था जैसे ये नज़ारे न जाने कितनी बार उसकी आँखों के सामने से गुज़र चुके हों। वो आँखें फाड़े अपने चारों ओर बस देखता ही रह गया। तभी उसे किसी लड़की के चीखने की आवाज़ सुनायी दी और वो चौंक गया।

राज ने इधर उधर नज़रें घुमायी मगर कहीं कोई नज़र न आया। वो ध्यान लगाकर सुनने लगा कि ये आवाज़ कहाँ से आयी थी। मगर, अब वहाँ सिर्फ़ सन्नाटा था। कुछ 5 मिनट बाद, वो सन्नाटा पायलों की आवाज़ से गूँज उठा। हर गुज़रते पल के साथ पायलों की झनकार की आवाज़ तेज़ होती गयी जैसे कोई करीब आ रहा हो। कुछ पलों बाद, पायलों की आवाज़ के साथ ही, बहुत सारे कदमों के एक साथ इसी दिशा में बढ़ने की आवाज़ भी सुनायी दी।

राज भौंचक्का सा होकर अपने चारों ओर उन लोगों को ढूँढता ही रहा जिनके कदमों की आहट उसे सुनायी दे रही थी। मगर उसे कहीं कोई भी नज़र नहीं आया। राज परेशान था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब क्या हो रहा था। तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज़ आयी।

"वीरभद्र!"

राज तुरंत पीछे मुड़ा और उसे रेशमी कपड़ों और बेशकीमती ज़ेवरों से सजी एक खूबसूरत सी लड़की नज़र आयी। राज उसे देखते ही पहचान गया। ये वही लड़की थी जो उसे हर रात अपने सपनों में नज़र आती थी। राज को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान खिल उठी और उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े।

"आप कहाँ चले गए थे, वीरभद्र?" वो लड़की बाँहें पसारे, दौड़ती हुई राज की तरफ़ आयी।

उसे अपनी ओर आते देख राज की बाँहें भी खुद ब खुद फैल गयीं जैसे वो उस लड़की को अपनी आगोश में भरने के लिए बेक़रार हो। राज को अपनी इस हरकत पर बेहद ताज्जुब हुआ। जिस लड़की को वो जानता तक नहीं था उसे गले से लगाने को वो क्यों इतना उतावला हो रहा था?

वो लड़की राज के करीब पहुँची ही थी कि पीछे से एक खूँखार, जल्लाद जैसा आदमी आगे बढ़ा और उस लड़की को अपनी तरफ़ खींच लिया। उस जल्लाद के पीछे कई सारे आदमी सैनिकों की वर्दी पहने खड़े थे। उस जल्लाद ने लड़की का मुँह अपने शैतान के पंजे जैसे दिखने वाले हाथों से बन्द कर दिया। लड़की उसकी क़ैद से खुद को छुड़ाने के लिए मचल रही थी। नाक और मुँह बन्द होने की वजह से वो साँस नहीं ले पा रही थी। धीरे धीरे उसकी पलकें झपकने लगीं और कुछ ही पलों में वो उस जल्लाद की बाहों में बेहोश हो गयी। जल्लाद ने उस लड़की के बेहोश जिस्म को अपने कंधे पर लादा और अँधेरे की ओट में कहीं गयाब हो गया।

"मान्या!"

राज के मुँह से खुद ब खुद ये नाम निकला और कुछ देर तक उस सूनसान गलियारे में गूँजता रहा। मगर, अब उसकी पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। राजमहल फ़िर से खंडहर में तब्दील हो गया और अँधेरे की चादर में समा गया। राज को सर में बड़ा तेज़ दर्द महसूस हुआ। हैंडीकैम उसके हाथों से छूटकर फ़र्श पर गिर गया। राज ने दोनों हाथों से अपने सर को कसकर पकड़ लिया। किले के अंदर फैला अँधेरा राज की आँखों में बस गया और उसकी नज़र धुंधलाने लगी। कुछ ही पलों में राज बेहोश होकर गिर गया ।
 
"आँखें खोलो, यंग मैन!"

ब्रिगेडियर की कड़क आवाज़ कानों में पड़ी तो राज चौंक गया। उसने धीरे से आँखें खोलने की कोशिश की तो एक तेज़ रोशनी उसकी आँखों में पड़ी और उसकी पलकें झपक गयीं। उस रोशनी से बचने के लिए राज ने अपने हाथों से चेहरा छुपा लिया। कुछ देर बाद, उसने चेहरे से हाथों को हटाया और धीरे से आँखें खोलीं। अपने सामने उसे ब्रिगेडियर का रौबीला चेहरा नज़र आया। ब्रिगेडियर के माथे पर शिकन पड़ी थी और भौहें सिकोड़ी हुई थीं।

उन्हें अपने सामने देखकर राज चौंक गया और हड़बड़ाते हुए उठ बैठा। उसने इधर उधर नज़रें दौड़ायी तो समझ आया कि वो ब्रिगेडियर के बँगले के गेस्टरूम में अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ है। दिन चढ़ आया था और राज का कमरा सूरज की तेज़ रोशनी से रोशन था।

"मैं यहाँ कैसे पहुँचा?" राज कभी खुद को देखता तो कभी सामने बैठे ब्रिगेडियर को। "मैं तो भानुगढ़ के किले में था, न?"

"आज सुबह तुम्हें मेरे आदमी यहाँ ले आये।" ब्रिगेडियर बड़े अजीब तरीके से राज से को देखते हुए बोले। "कल रात तुम कह गए थे न कि तड़के ही लौट आओगे। जब तुम नही आये तो मुझे लगा शायद गाड़ी खराब हो गयी होगी। इसलिए, मैंने अपने ड्राइवर कामत को तुम्हें लेने के लिए जाने का हुक्म दिया। मगर, वो बुज़दिल तो किले तक अकेले जाने को राज़ी ही न हुआ। यहाँ के बावर्ची और माली समेत नौकरों की पूरी बटालियन को साथ ले गया, कमबख्त!"

ब्रिगेडियर ने एक गहरी साँस ली और अपने ड्राइवर की बुज़दिली का गुस्सा थूक दिया।

"खैर!" ब्रिगेडियर ने शांत स्वर में कहा, "तुम उन लोगों को किले में बेहोश पड़े मिले और वो सब तुम्हें यहाँ ले आया। वैसे उनका मानना था कि किले के भूतों के साथ हुई मुठभेड़ में तुम्हारी ये हालत हुई। वो तो किसी तांत्रिक को बुलाकर झाड़ फूँक भी करवाना चाहते थे। मगर, मैंने साफ़ साफ़ कह दिया कि ये सब बकवास मेरे घर में नहीं चलेगी। बस! ये सुनने की देर थी कि सारे के सारे नामुरादों ने आधे दिन की छुट्टी ले ली। कोई किसी स्वामी के पास गया है तो कोई किसी पीर बाबा के यहाँ। ब्लडी फूल्स!"

किले का ज़िक्र आते ही कल रात उसके साथ हुए अजीबोगरीब हादसे की कुछ धुँधली तस्वीरें राज की आँखों के सामने नाचने लगीं और उसका ध्यान ब्रिगेडियर की बातों से हट गया।

"वैसे, कल रात तुम्हारे साथ हुआ क्या था, यंग मैन?" ब्रिगेडियर ने राज के कंधे पर हाथ रखा और पूछा, "तुम्हारे सर पर ये चोट कैसे लगी?"

ब्रिगेडियर ने चोट का ज़िक्र किया तो राज ने अपने माथे को टटोला। उसके सर पर पट्टी बँधी थी। अगर ब्रिगेडियर न पूछते तो राज को पता ही न चलता कि उसे चोट भी लगी है। फ़िर उसकी वजह मालूम होने का तो सवाल ही नहीं उठता।

"व...वो...वो..." राज तरह तरह के बहाने सोचने लगा, "दरअसल... काल रात...किले में काफ़ी अँधेरे था.... तो... मैं किसी पत्थर से टकरा कर गिर गया और...सर पर चोट लग गयी...और मैं बेहोश हो गया।"

"ओके, यंग मैन," ब्रिगेडियर ने राज की पीठ थपथपायी और कहा, "कोई बात नहीं, होता है। कम से कम, तुम मेरे नौकरों की तरह बुज़दिल नहीं हो। तुम एक जाँबाज़ इंसान हो। और, तुम्हारी ये खूबी मुझे बहुत पसंद है। चलो, अब जल्दी से हाथ मुँह धो लो, तब तक मैं तुम्हारे लिए कॉफी और टोस्ट बना लाता हूँ। उम्मीद करता हूँ, दोपहर से पहले सारे भगोड़े नौकर लौट आयेंगे। नहीं तो, आज के आज सबका कोर्ट मार्शल कर दूँगा!"

ब्रिगेडियर गुस्से से गुर्राते हुए कमरे से बाहर चले गए। ज़रा एकांत मिला तो राज का मन, फ़िर एक बार किले की उस रहस्यमयी घटना की ओर लौट गया। काल रात उसकी आँखों के सामने से गुज़री हर एक तस्वीर फ़िर जीवित हों उठी। उन अजनबी चेहरों और आवाज़ों ने राज को फ़िर से घेर लिया।

इन सबके बीच, उस जल्लाद की क़ैद से खुद को बचाने की जद्दोजहद में लगी उस लड़की का चेहरा, राज के इतने करीब आ गया जैसे वो राज के लिए बाँहें पसारे इसी कमरे में खड़ी हो। राज चौंक गया और उसकी साँसें हलक में अटक गयीं। उसे पूरा यकीन था कि वो चेहरा उसके लिए अजनबी नहीं था। मगर, अजीब बात ये थी कि उसे बिल्कुल इल्म नहीं था कि वो चेहरा आखिर था किसका?

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"ओके बॉस..." राज फ़ोन पर बोला, "अभी भेजता हूँ... बस थोड़ी एडिटिंग बाकी है...फाइन...गुड़ नाईट, बॉस।"

कॉल कट कर के राज ने एक लंबी आह भरी और अपने बिस्तर पर लेट गया। उसकी नज़र सामने की दीवार पर लगी घड़ी पर पड़ी। रात के 10 बज चुके थे। राज आज पूरे दिन बड़ा ही व्यस्त रहा। सुबह से ही उसे फ़ोन पर फ़ोन आ रहे थे। कभी दोस्त - रिश्तेदारों के तो कभी चैनल में साथ काम करने वालों के । सब के सब इस बात की तसल्ली करना चाहते थे कि वो ज़िंदा है और सही सलामत है।

फ़िर उन सबका अगला सवाल ये होता कि भूतों के खेमे में उसकी रात कैसी कटी? वहाँ क्या हुआ, क्या नहीं हुआ। उन सबके हर सवाल का जवाब, राज कोई न कोई कहानी बनाकर देता और जैसे तैसे अपनी जान छुड़ा लेता। उस रात का सच उसने किसी पर भी ज़ाहिर नहीं होने दिया। मगर सच तो ये था कि वो खुद भी ठीक से नहीं समझ पाया कि उसके साथ हुआ क्या था?

"मेरा हैंडीकैम!" राज फ़ौरन बिस्तर पर उठ बैठा, "उसमें तो सब रिकॉर्ड हुआ होगा न। हाँ, बीती रात का सच हैंडीकैम की रिकॉर्डिंग से ही पता चल सकता है। वैसे भी बॉस मेरे शो का पहला एपिसोड देखने को बड़े उतावले हैं। चलो, वीडियो क्लिप की एडिटिंग का काम ही सबसे पहले निपटा लेते हैं।"

राज उठा और उसने अपने बैग से हैंडीकैम निकाला। उसने हैंडीकैम को ऑन किया और बिस्तर पर बैठकर उसमें रिकॉर्ड हुई वीडियो क्लिप देखने लगा। उसमें वो सारी वीडियो थी जो उसने राजमहल के खण्डर से रिकॉर्ड की थी। वीडियो क्लिप में राज खुद को राजमहल के बड़े से गलियारे की तरफ़ बढ़ते देखता है। गलियारे के आखिर पर पहुँचकर राज वहाँ थोड़ी देर खड़ा रहता है।

कुछ मिनटों बाद, हैंडीकैम नीचे फ़र्श पर जा गिरता है। वीडियो क्लिप में आगे बस फ़र्श के उस हिस्से की रिकॉर्डिंग ही थी जहाँ हैंडीकैम राज के हाथ से छूटने के बाद, रात भर पड़ा रहा। फ़िर कुछ देर बाद, हैंडीकैम की बैटरी खत्म हो गयी और वो बन्द हो गया।

"क्या?" राज परेशान हो उठा, "इसमें तो कुछ भी रिकॉर्ड नहीं हुआ जो मैंने कल रात उस खण्डर में अपनी आँखों से देखा था। वो सैनिक, वो जल्लाद और वो लड़की, वो सब कहाँ हैं?"

राज ने वो क्लिप बार बार चलायी, मगर उसे सिवाय अँधरे में डूबे खण्डरों के और कुछ भी नज़र नहीं आया।

"इसका मतलब, जो कुछ मैंने देखा वो सिर्फ़ मेरी आँखों का धोखा था? मेरा भ्रम था?" सोच में डूबे राज ने अपना माथा खुजलाया।

वो बिस्तर से उठा और हैरान- परेशान सा होकर कमरे में चहल कदमी करने लगा।

"कहीं ऐसा तो नहीं वो सब जान बूझकर मेरी आँखों में धूल झोंकने के मक़सद से मुझे दिखाया गया हो?" राज वापस बिस्तर पर बैठ गया और हैंडीकैम पर नज़र पड़ते ही उसने भौहें सिकोड़ लीं। "कहीं ये हमारे चैनल के सबसे बड़े राइवल 'वीनस' चैनल वालों की कोई साज़िश तो नहीं?

"हो सकता है, ये सब उन्हीं लोगों का किया धरा हो ताकि मैं अपने शो की शूटिंग पूरी न कर पाऊँ। भानुगढ़ के किले से आज तक किसी ने रात के वक़्त शूटिंग नहीं की है। अगर, मेरा शो टेलीकास्ट हो गया तो हमारे चैनल की TRP ज़रूर आसमान छूने लगेगी। और 'वीनस' चैनल कभी नहीं चाहेगा कि ऐसा हो। हो सकता है, मुझे किले से खदेड़ने के लिए उन्होंने ने ही ये सब जान बूझकर किया हो।"

"हॉरर फिल्मों में जैसे भूतों को स्पेशल इफेक्ट्स के ज़रिए भयानक बनाकर दिखाया जाता है। ऐसा ही कुछ कल रात वीनस चैनल वालों ने भी किया हो। ताकि मैं ड़र जाऊँ और अपना शो ही बन्द कर दूँ। ठीक रमण सिंग की तरह जो इतना ड़र गया था कि उसने शो ही नहीं, चैनल भी छोड़ दिया। ये भी हो सकता है कि सालों पहले रमण के साथ जो हुआ वो भी उन्हीं लोगों की कोई सोची समझी चाल हो।"

ख्यालों में डूबा हुआ राज पलंग पर लेट गया। उसकी नज़र सामने दीवार पर लगी घड़ी पर जा रुकी। वो सारे चेहरे जो उसने बीती रात किले में देखे थे एक एक कर उसकी आँखों के सामने ताण्डव करने लगे। आखिर में उस खूबसूरत लड़की का चेहरा नज़र आया जो होंठों पर मुस्कान की मिठास और आँखों में दर्द का सागर लिए हुए थी।

"वीरभद्र!"

कमरे में उस लड़की की आवाज़ गूँजी और राज चौंक गया। वो उठकर पलंग पर बैठ गया और उसकी फैली हुई, हैरान आँखें उस लड़की को कमरे में ढूँढने लगीं। कमरे में सिवाय घड़ी की सूईयों के 'टिक टिक' की आवाज़ के और कुछ सुनायी नहीं दे रहा था। राज ने एक ठंडी आह भरी और बिस्तर से उठकर खिड़की के पास खड़ा हो गया। उसने खिड़की खोली और ठंडी हवा के झोंकें उसके बालों को सहलने लगे।

"नहीं!" राज खुद से बोला, "कल रात, जो मेरे साथ हुआ वो किसी की भी साज़िश नहीं हो सकती। क्योंकि ये सब तो मैं उस दिन से अपने सपनों में देख रहा हूँ जब से मैंने भानुगढ़ के किले पर शो करने की सोची थी। बस, फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि कल ये सब मैंने खुली आँखों से देखा।"

राज ने खिड़की बन्द की और वापस पलंग पर लेट गया।

"ये सब क्यों हो रहा है मेरे साथ?" राज की नजरें कमरे की छत पर सरपट दौड़ते पंखे पर थीं और उसका मन भानुगढ़ के किले में। "और वो लोग कौन हैं जो मुझे हर रात सपनों में नज़र आते हैं? और वो मुझे क्यों नज़र आते हैं? कहीं मुझे फ़िर से hallucination तो नहीं होने लगा है?"

"बचपन में जब मैंने माँ को खो दिया था, तब भी तो मेरे साथ ऐसा ही हुआ करता था। मुझे सोते जागते, हर वक़्त, हर जगह माँ नज़र आया करती थी। मैं माँ से घण्टों बैठकर बातें किया करता था। माँ मेरे साथ खेलती थी, मुझे पढ़ाती थी और रात को लोरियाँ भी सुनाती। मगर, जब डैडी को इस बात का पता चला तो मुझे डॉक्टर दामले के पास ले गए। उन्होंने मुझे समझाया कि जो लोग गुज़र जाते हैं वो कभी वापस लौटकर नहीं आते। मेरा माँ को देखना, बातें करना सब मेरा भ्रम या फ़िर hallucination है। और उनसे इसका इलाज करवाने के बाद मैं ठीक हो गया।"

अपनी स्वर्गीय माँ की याद आते ही राज का दिल भर आया। बचपन में माँ ही राज की सबसे अच्छी दोस्त हुआ करती थी। डैडी को तो अपने बिज़नेस से कभी फुरसत मिलती ही नहीं थी। डैडी को अपने परिवार के दबाव में आकर ज़बरदस्ती माँ से शादी करनी पड़ी थी। शादी के बाद भी डैडी को माँ से कोई लगाव नहीं था।

पति से प्यार न मिलने की वजह से माँ भी राज में ही खुशियाँ ढूँढती थीं। राज 10 साल का था जब माँ उसे छोड़कर चली गयीं। माँ के गुज़रने के कुछ वक़्त बाद ही डैडी ने राज को उसके ननिहाल भेज दिया और दूसरी शादी कर ली। राज को लगा कि उसने माँ के साथ साथ अपने डैडी को भी खो दिया है। अब भी वो उनसे दूरियाँ बनाये हुए है। डैडी हर खास मौके पर राज को अपने घर बुलाते हैं मगर राज उनके करीब जाने से कतराता है।

"अब इतने सालों बाद कहीं मुझे दोबारा hallucination को बीमारी तो नहीं हो गयी?" मन से बचपन की ग़मगीन यादों को भुलाने के लिए राज ने किले के बारे में सोचने लगा। "मगर, कल रात एक बात और हुई जो सबसे ज़्यादा अजीब है।"

पिछली रात की घटना को याद करते ही राज के रोंगटे खड़े हो गए।

"वो जल्लाद जब उस लड़की को खींचकर मुझसे दूर ले जा रहा था तब मैंने उसे "मान्या" कह कर बुलाया। क्या वो उस लड़की का नाम है? अगर है भी तो मुझे कैसे मालूम पड़ा? मैं तो उससे पहले कभी नहीं मिला। क्या ये हो सकता है कि वो लड़की और वो सारे लोग सच में हों | या फ़िर, ये सब सिर्फ़ मेरा भ्रम है?"

राज ने बड़ी बेचैनी के साथ करवट बदली।।

"नहीं, ये सिर्फ़ कोरी कल्पना नहीं हो सकती," भौहें सिकोड़े राज बोला। "मेरे उस सपने का सच से कोई संबंध तो ज़रूर है। और सिर्फ़ सच से ही नहीं बल्कि मुझसे भी, उस सपने में दिखनेवाले सभी लोगों से कोई न कोई सम्बन्ध तो ज़रूर है। वरना, मैं उस लड़की का नाम भला कैसे जान पाता?"

राज ने फ़िर से करवट बदली और उसकी उंगलियाँ बेडशीट पर थिरकने लगीं।

"अब मैं ये पहेली कैसे सुलझाऊँ?" राज ने एक गहरी साँस ली और आँखें बंद कर लीं |

पल भर बाद जब उसने आँखें खोलीं तो उसकी आँखें यूँ चमक उठी जैसे उसे इस पहेली का हल मिल गया हो।

"हाँ! डॉक्टर दामले,” राज ने मुस्कुराते हुए चुटकी बजायी, “वो ही मुझे इस दुविधा से निकाल सकते हैं। मुझे कल ही उनके क्लिनिक जाकर उनसे मिलना होगा।"

राज को लगा कि अब वो इस राज़ की तह से ज़्यादा दूर नहीं है। वो मुस्कुराया और कमरे की लाइट बन्द दी।
 
रात के 8 बजे, तरह तरह की रोशन से जगमगाता शहर बहुत खूबसूरत लग रहा था।

राज खिड़की के पास चुपचाप खड़ा, नीचे सड़कों पर रात की चहल पहल को देख रहा था। दोनों तरफ़ लगे स्ट्रीट लाइट्स की सुनहरी रोशनी में भीगी सड़क पर हज़ारों गाड़ियाँ सरपट दौड़ रही थीं। गाड़ियों के हेडलाइट्स की रोशनी और हॉर्न की आवाज़ सड़क पर रौनक को बरक़रार रखे हुए थे। चौड़ी सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े शॉपिंग मॉल्स और आलीशान होटल्स थे जिनका वैभव काबिल-ए-तारीफ़ था। शहर में पले बढ़े होने के कारण राज के लिए ये नज़ारा कोई नयी बात तो थी नहीं | मगर, आज उसके पास वक़्त काटने का इसके अलावा कोई और ज़रिया था नहीं।

राज, डॉ दामले की क्लिनिक में बैठा था। डॉ दामले अपने केबिन में किसी मरीज़ का मुवायना करने में मसरूफ़ थे। डॉ दामले अक्सर राज को सबसे आखिर में अपॉइंटमेंट देते थे ताकि बाकी सारे मरीजों को चलता करने के बाद राज के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ार सकें। डॉ दामले और राज की बड़ी पुरानी दोस्ती थी। 10 साल की उम्र में राज ने जब अपनी माँ को खो दिया, तब उस सदमे से उबरने में डॉ दामले ने उसकी बहुत मदद की थी। बस, तब से दोनों बड़े अच्छे दोस्त बन गए। राज उन्हें प्यार से ‘डॉक’ बुलाता था और वो राज को ‘चैम्प’ बुलाते थे |

राज के लिए डॉ दामले उसके पिता समान थे। रही बात डॉ दामले की तो अपना कहने को उनके पास राज क अलावा और कोई नहीं था। बड़ी छोटी उम्र में पिता को खो देने के बाद पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उन पर आ पड़ी। छोटे भाई बहनों का घर बसाते बसाते, उन्हें ख्याल ही रहा कि कब उनकी उम्र ढ़ल गयी। उनकी इस भूल का नतीजा ये हुआ कि अब 60 की उम्र में 25 साल के बैचलर की मस्त मौला ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठा रहे हैं, डॉ दामले।

"आप अंदर जा सकते हैं, सर," रिसेप्शन पर बैठी डॉ दामले की कमसिन सेक्रेटरी जूली ने बड़े सेक्सी अंदाज़ में राज को सर से पाँव तक देखा।

राज ने उसके नापाक मंसूबों को नज़रंदाज़ किया और डॉ दामले के केबिन की तरफ़ बढ़ गया।

"क्या मैं अंदर आ सकता हूँ, Doc?" केबिन के दरवाज़े से अंदर झाँकते हुए राज ने पूछा ।

"अरे, आओ, मेरे चैम्प!" डॉ दामले की बूढ़ी आँखें खुशी से झिलमिला उठीं। "आज कल आपके दर्शन तो सिर्फ़ टी वी चैनल पर ही होते हैं। बहुत बड़े सेलेब्रिटी जो बन गए हो। आज इस बूढ़े डॉक्टर की याद कैसे आ गयी?"

"याद तो आपकी हमेशा आती थी, Doc," राज कुर्सी पर बैठ गया और बोला, "मगर, काम में इतना बीज़ी हो गया कि वक़्त ही नहीं निकाल पाता था।"

"तो अब कैसे निकल आया वक़्त?" नाक पर लटकती मोटी ग्लास के चश्मे से डॉ दामले की आँखें राज के मन में झाँकने की कोशिश कर रही थीं।

"कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ अजीब सा हो रहा है," कहते हुए राज का चेहरा उतर गया और उसने नज़रें झुका लीं।

"बात क्या है, चैम्प?" डॉ दामले के माथे पर सिलवटें पड़ी, "बड़े परेशान लग रहे हो।"

राज खुद ही समझ नहीं पा रहा था कि वो डॉ दामले को क्या समझाए? उसके साथ जो हो रहा था उसे कैसे बयाँ करे? कहाँ से शुरू करे और क्या क्या बताए? इसी उधेड़बुन में खोये राज ने बिना कुछ कहे सर झुका लिया।

"देखो, चैम्प," डॉ दामले की आवाज़ में पिता का प्यार झलक रहा था। "तुम खुलकर मुझे सब कुछ बताओगे तो ही मैं तुम्हारी मदद कर पाऊँगा। ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा।"

Doc के दबाव देने पर राज ने अपना सारा हाल के सुनाया।

"हम्म..."

राज की बातें आराम से सुनने के बाद डॉ दामले बोले, "देखो चैम्प, इसमें घबराने या परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। तुम, भानुगढ़ के किले पर शो कर रहे हो और इसके लिए तुमने उस किले पर काफ़ी रिसर्च भी की है। दिन रात बस तुम उस किले और उसके इतिहास के बारे में ही सोचते रहते हो। इसलिए, तुम्हें रात को सपने भी उस किले के ही आते हैं। ये तो नॉर्मल सी बात है।"

"और वो लोग कौन हैं जिन्हें मैं रोज़ सपनों में देखता हूँ?" राज ने भौंहें सिकोड़ते हुए डॉ दामले को देखा। "उनसे मैं ना तो कभी मिला हूँ, न उन्हें कभी देखा है तो फ़िर वो मेरे सपनों में क्यों नज़र आते हैं?"

"देखा तो ज़रूर होगा," डॉ दामले ने आह भरी और कहा, "बस, तुम्हें याद नहीं।"

"ऐसा कैसे हो सकता है, डॉक?" राज ने हैरान होकर पूछा, "मेरी याद्दाश्त इतनी भी बुरी नहीं है। अगर मैंने उन लोगों को कहीं देखा होता तो मैं उन्हें ज़रूर पहचान लेता। हाँ, ये हो सकता है कि मुझे उनके नाम याद न हों मगर इतना ज़रूर याद रहता कि मैं इनसे पहले कहीं न कहीं मिला ज़रूर हूँ।"

“हर रोज़ कितने ही चेहरे हमारी आँखों के सामने से गुज़रते हैं।“

डॉ दामले ने एक गहरी साँस ली और अपने केबिन की खिड़की के पास खड़े होकर बाहर सड़क से गुज़रते ट्रैफिक को देखने लगे ।

"वो चेहरे पल भर के लिए हमारी आँखों के सामने आते हैं और अगले ही पल हमारी यादों से ओझल हो जाते हैं। मगर उनमें से कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो नज़रों से तो ओझल हो जाते हैं पर उनकी छाप, हमारे सबकॉन्शियस माइंड में हमेशा के लिए छूट जाती है। शायद, इसकी कोई ख़ास वजह भी रही होगी जैसे कि कुछ चेहरे जो बेहद खूबसूरत होते हैं या ज़रूरत से ज़्यादा बदसूरत होते हैं या फ़िर शायद कुछ और।"

"जिन चेहरों को तुम अपने सपनों में देखते हो वो भी कभी न कभी, पल भर के लिये ही सही, तुम्हारी आँखों के सामने से गुज़रे ज़रूर होंगे। तुम उन्हें देखकर भूल गए मगर उनकी छाप अब भी तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड में दर्ज है। फ़िर, जब तुमने उस किले के इतिहास के बारे में सुना तो तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड ने उन कहानियों के किरदारों को वो चेहरे दे दिए जिनकी छाप पहले से वहाँ मौजूद थी। अब, तुम्हारी समझ में आयी बात?"

"मगर डॉक," राज की परेशानी और ज़्यादा बढ़ गयी। "मैंने तो उस किले के बारे में बस इतना सुना है कि वहाँ एक भयंकर आग लगी थी जिसमे महल के कई सारे लोग मारे गए। पर मैं जो सपनों में देखता हूँ वो तो कुछ और ही घटना है।"

"सब तुम्हारे दिमाग का खेल है, चैम्प," डॉ दामले, राज के पास आये और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, "हम कितने ही अजीबोगरीब सपने देखते हैं। ये सपने दरअसल हमारे दिमाग की बुनी कल्पना के सिवाय और हैं ही क्या? आजकल तुम्हारा सारा ध्यान उस किले पर लगा है इसलिए तुम्हारे सपने यानी तुम्हारे दिमाग की कल्पनाएं भी उस किले को ही अपना रंगमंच बना रही हैं। यकीन मानो चैम्प, तुम्हें जो सपने आते है वो तुम्हारे दिमाग की बनायी काल्पनिक तस्वीरों के अलावा और कुछ नहीं है। अगर सीधे सीधे शब्दों में कहा जाए तो तुम्हारे सपने सिर्फ़ एक फ़िल्म है, जिसका प्रोड्यूसर और डायरेक्टर तुम्हारा दिमाग है।"

न जाने क्यों राज को डॉ दामले की बातों पर विश्वास कर पाना बड़ा मुश्किल लग रहा था। जो खौफ़नाक मंज़र रोज़ रात को उसकी आँखों के सामने से गुज़रता था क्या वो महज़ उसका वहम हो सकता है? वो, डॉ दामले की बात का कोई जवाब न दे सका और हैरान आँखों से बस उन्हें देखता ही रह गया।

"ठीक है, चैम्प," डॉ दामले ने मुस्कुराते हुए राज की पीठ पर धौल दी और कहा, "तुम्हारे सारे सवालों का जवाब तुम्हें हिप्नोसिस के ज़रिए मिल जाएगा।"

"हीप्नोसिस?" राज चौंक गया, "मगर वो क्यूँ?"

"हिप्नोसिस का नाम सुनकर चौंकने की कोई ज़रूरत नहीं है," डॉ दामले, राज का सहमा हुआ चेहरा देखकर मुस्कुरा उठे। "ये तो बस मेडीटेशन करने जैसा है। हिप्नोसिस के ज़रिए हम, तुम्हारे सुबोध मन यानी कॉन्शियस माइंड को गहरी नींद सुला देंगे ताकि वो तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड पर हावी न हो।"

"उसके बाद तुम्हें पूरा ध्यान सिर्फ़ एक बिंदु पर केंद्रित करना होगा। क्योंकि हमारे सबकॉन्शियस माइंड में भी बहुत सारी यादें दर्ज होती हैं। उन यादों के समंदर में से तुम्हें उन चेहरों को ढूँढना होगा जो तुम्हें सपनों में नज़र आते हैं। देखना तुम्हें सब याद आ जायेगा कि तुमने इन चेहरों को कहाँ देखा? या फ़िर वो लोग कौन हैं? तुम उनसे कब मिले थे वैगरह वगैरह।"

"क्या आप अभी हिप्नोसिस कर सकते हैं?" राज ने फ़ौरन पूछा। "इन सपनों ने मुझे परेशान कर रखा है। और, मैं जल्द से जल्द इनकी हकीकत जानना चाहता हूँ।"

"हाँ, हाँ, ज़रूर," डॉ दामले उठ खड़े हुए और केबिन के कोने में रखे बेड की तरफ़ बढ़े, "यहाँ आओ चैम्प और इस पर आराम से लेट जाओ।"
 
राज अपने बूट्स उतारकर बेड पर लेट गया | डॉ दामले बेड के पास रखी कुर्सी पर बैठ गए | उन्होंने अपनी कोट की जेब से एक लॉकेट निकाला जिसमें नीले रंग का रत्न लगा था | उन्होंने उस लॉकेट को राज की दोनों आँखों के ठीक बीच में हवा में लटका दिया और उसे दायें से बायें घुमाना शुरू कर दिया |

“इस लॉकेट को ध्यान से देखो, चैम्प,” डॉ दमले लॉकेट को घुमाते हुए राज से बोले, “बाकी सारी बातें भूल जाओ और अपना सारा ध्यान इस लॉकेट पर लगाओ | तुम्हें और कुछ नहीं सोचना है | इसलिए जो कुछ भी अब तक तुम्हारे दिमाग में चल रहा था, तुम्हारी सारी चिंताएँ, उलझनें, सबको भुला दो | धीरे धीरे तुम्हें नींद आने लगेगी और तुम्हारा कॉनशीयस माइन्ड सो जाएगा | उसके साथ ही, तुम्हारा सबकॉनशीयस माइन्ड यानि अंतर्मन जागृत हो जाएगा | ऐसा होते ही, तुम्हारे सामने वो सारी तस्वीरें एक - एक कर आने लगेंगी जो तुम्हारे इस सबकॉनशीयस माइन्ड में दर्ज हैं | उन तस्वीरों में से तुम्हें वो चेहरे ढूँढने हैं जो तुम्हें सपनों में नज़र आते हैं |”

राज उस लॉकेट की तरफ़ ध्यान से देखने लगा | वो धीरे धीरे अपने आसपास की पूरी दुनिया से कटने लगा | उसका मन अब बिल्कुल खाली था | न वो कुछ सोच पा रहा था न ही कोई उलझन उसे परेशान कर पा रही थी | ऐसा लग रहा था जैसे उसका दिमाग उसके काबू में ही न रहा गया हो | साथ ही उसे हलकेपन का भी एहसास होने लगा जैसे वो अपने जिस्म के वज़न से आज़ाद हो गया हो | डॉ दामले के कैबिन में शांति छायी हुई थी | कमरे में लगी घड़ी की सुईयों की टिक – टिक के अलावा कहीं कोई आवाज़ नहीं सुनायी दे रही थी | कुछ मिनटों बाद, उस पर खुमारी सी छा गयी | उसकी पलकें बार बार झपकनें लगीं |

“चैम्प,” डॉ दामले बोले, “मैं एक से दस तक उलटी गिनती करूँगा | जब मेरी गिनती पूरी हो जाएगी, तब तक तुम्हारा कॉनशीयस माइन्ड पूरी तरह सो चुका होगा | एक तक की गिनती पूरी करने के बाद मैं चुटकी बजाऊँगा | उसके साथ ही तुम्हारा सबकॉनशीयस माइन्ड जाग जाएगा | तब तुम मुझे बताओगे कि तुम क्या देख रहे हो | वैसे जो कुछ भी तुम इस हालत में देखोगे तुम्हें याद रहेगा | लेकिन अगर कुछ बातें तुम्हें याद न भी रहें तो कोई बात नहीं | हिप्नोसिस के दौरान तुम मुझे जो भी बताओगे, मैं उसे एक टेप - रीकॉर्डर में रिकार्ड कर रहा हूँ | हिप्नोसिस के इस सेशन के खत्म हो जाने के बाद तुम ये टेप सुन सकते हो | अगर तुम कुछ भूल भी जाओ तो इस टेप को सुनते ही तुम्हें सब याद आ जाएगा | तैयार हो न तुम ?”

“हम्म...” राज की आवाज़ में खुमारी थी |

राज के हामी भरते ही डॉ दामले ने दस से एक तक की उलटी गिनती शुरू कर दी | गिनती के खत्म होने तक राज का दिमाग गहरी नींद सो चुका था | वो धीमी रफ़्तार से गहरी साँसें ले रहा था | डॉ दामले ने पहले तो पूरी तसल्ली कर ली कि राज अब पूरी तरह से हीपनोटाइस हो चुका है | फ़िर वे थोड़ा झुककर राज के करीब आए और धीरे से चुटकी बजायी |

“बोलो चैम्प,” डॉ दामले ने धीमी आवाज़ में राज से पूछा, “तुम्हें क्या नज़र आ रहा है ?”

“मैं भानुगढ़ के किले में हूँ | यहाँ चारों तरफ छोटी बड़ी इमारतें और सड़कें हैं जिन पर लोग आ जा रहे हैं| कुछ लोग पैदल चल रहे हैं तो कुछ रथ पर सवार हैं | कुछ ने साधारण से सूती कपड़े पहन रखे हैं तो कुछ ने महँगे रेशमी वस्त्र और सोने चाँदी के आभूषण पहन रखे हैं | मैंरे सर पर सोने का मुकुट है और गले में मोतियों और सोने के हार है | मैंने रेशमी पोशाक पहन रखी है और मैं घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहा हूँ |”

“कुछ देर बाद मैं काले पत्थरों से बनी एक इमारत के सामने घोड़े को रोककर नीचे उतर जाता हूँ | एक सेवक आगे बढ़कर मेरे घोड़े की नाल थाम लेता है और उसे खूँटे से बाँध देता है | मैं लोहे के एक बड़े से द्वार की तरफ़ बढ़ता हूँ | उस द्वार के बाहर दो सैनिक हाथों में तलवार लिए खड़े हैं | मुझे देखते ही उन दोनों ने अपनी अपनी तलवार को वापस म्यान में डाल दिया और सर झुकाकर मुझे प्रणाम किया |

“सेनापति वीरभद्र सेन की जय हो !” उन दोनों ने एक स्वर में कहा और मेरे लिए द्वार खोल दिया |

मैं उस द्वार से होते हुए एक बड़े से मैदान में प्रवेश करता हूँ जहाँ दो लड़कियों के बीच तलवारबाज़ी का मुकाबला चल रहा है | दोनों ने अपने चेहरों को नकाब से छुपा रखा था | उस मैदान के उत्तरी छोर पर एक ऊँचा चबूतरा है जिस पर महाराज भानुप्रतापदेव और पूरा राजपरिवार बैठा हुआ है | उस चबूतरे के पास ही एक और छोटा चबूतरा है जिस पर महाराज के मंत्रीगण, राजपुरोहित, राजवैद्य और दूसरे दरबारी बैठे हुए थे | मैं भी उन सब के बीच जाकर बैठ गया | मैदान के दूसरे छोर पर आम जनता के बैठने का प्रबंध किया गया था | दोनों वीरांगनाओं के बीच घमासान युद्ध हो रहा था |

कुछ देर बाद, उनमें से एक ने दूसरी को हरा दिया और पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा | महाराज भानुप्रतापदेव उठ खड़े हुए और हाथ से अपने सेवक को इशारा किया | सेवक एक बड़ी सी थाली में सोने की तलवार ले आया | महाराज ने थाली से वो तलवार उठा ली |

“शहज़ादी अपराजिता को इस प्रतियोगिता का विजयी घोषित किया जाता है,” महाराज ने घोषणा की | “और इस सोने की तलवार से पुरस्कृत किया जाता है |”
 
शहज़ादी ने चेहरे से नक़ाब हटाया और चबूतरे की तरफ़ बढ़ी | महाराज के पास पहुँचकर उसने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया और उनके हाथों से तलवार लेकर उसे अपने माथे से लगाया | उसके बाद उसने तलवार को म्यान से निकाला और सामने बैठी भानुगढ़ की प्रजा को दिखाया | सूरज की रोशनी में तलवार चमक उठी और उस तेज़ रोशनी से सबकी आँखें चौंधिया उठीं |

जब सब लोग तलवार की रौनक देखकर उस पर मुग्ध हो रहे थे तब शहज़ादी ने सबकी नज़र बचाकर मेरी तरफ देखा | शहज़ादी को हसरत भरी नज़रों से अपनी ओर देखते देख, एक पल को मेरे दिल की धड़कनें रुक सी गयीं | महाराज ने ताली बजाकर दोबारा अपने सेवक को बुलाया और सबका ध्यान उस ओर हो गया | इस बार सेवक एक थाली में हीरों जड़ा सोने का हार ले आया |

“उत्तम रण कौशल का प्रदर्शन करने के लिए छोटी शहज़ादी रम्यसुता को इस अमूल्य हार से पुरस्कृत किया जाता है |” महाराज बिक्रमदेव ने बड़े गर्व के साथ घोषणा की और एक बार फिर मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा |

छोटी शहज़ादी ने अपने पिता के पैर छूए और पुरस्कार ग्रहण किया |

“मैं सदैव परमपिता परमात्मा का आभारी रहूँगा कि उन्होंने मुझे दो इतनी होनहार बेटियाँ दीं,” कहकर महाराज ने अपनी दोनों बेटियों को गले से लगा लिया |

तालियाँ बजाकर वहाँ बैठे सभी लोगों ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की | सबके चेहरे खुशी से दमक रहे थे | इसके तुरंत बाद राजपरिवार वापस राजमहल लौट गया | उनके जाते ही वहाँ मौजूद सभी लोग अपने अपने रास्ते चल पड़े | मैं भी घोड़े पर सवार होकर राजदरबार की तरफ़ चल पड़ा |

राजमहल के मुख्य द्वार से एक बहुत बड़ा गलियारा अंदर राजमहल की तरफ़ जाता था | मुख्य द्वार पर सैनिकों का कड़ा पहरा था | मुझे आते देखते ही उन सबने सर झुकाकर प्रणाम किया और मेरे लिए मुख्य प्रवेश द्वार खोल दिया | मैं मुख्य द्वार से होते हुए गलियारे की तरफ़ बढ़ा | ये गलियारा आगे जाकर कई छोटे छोटे गलियारों में बँट जाता था जो राजमहल के अलग अलग हिस्सों की तरफ़ जाते थे |

मैं दायीं तरफ़ के गलियारे पर चल पड़ा क्यूंकि ये सीधे राजदरबार की तरफ़ जाता था | मैं कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि मुझे सामने से दोनों राजकुमरियाँ और उनकी दासियों का झुंड नज़र आया | वो लोग मेरी तरफ़ ही आ रहे थे | सबकी सब कनखियों से एक दूसरे को इशारा कर मुस्कुरा रही थीं | मुझे देखते ही उन्हें न जाने क्या शरारत सूझी कि सब आपस में काना-फूसी करने लगीं |

“शहज़ादियों को सेवक का प्रणाम,” उन्हें देख, मैंने नजरें नीची की और सर झुका लिया |

“शहज़ादी अपराजिता आपसे बहुत नाराज़ हैं, सेनापति महोदय,” शहज़ादी रम्यसुता ने कहा |

उनके कहने की देर थी कि सारी दासियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं |

“हमें क्षमा करें, शहज़ादी जी,” मेरी बड़ी इच्छा हुई की एक झलक शहज़ादी को देखूँ मगर मैं जानता था कि ये उचित नहीं है | इसलिए मैंने अपनी इच्छाओं को फ़ौरन काबू में कर लिया और नजरें नीची हीं रखी | “कृपया बताने का कष्ट करें कि इस सेवक से क्या अपराध हो गया ताकि हम प्रायश्चित कर सकें |”

“शहज़ादी जी ने इतनी बड़ी प्रतियोगिता जीती जिसमें न जाने कितने राज्यों की शहज़ादियों ने भाग लिया और आपने उन्हें बधाई तक न दी ?” शहज़ादी रम्यसुता ने क्रोधित होने का नाटक किया |

“सेवक की शुभकामनाएँ स्वीकार करें, शहज़ादी जी,” मेरे अंदर तलब उठी की ये बात में शहज़ादी अपराजिता की आँखों में देखकर कहूँ | मगर जानता था कि ये संभव न था |

“सिर्फ़ शुभकामनाओं से काम न चलेगा, सेनापति जी,” शहज़ादी अपराजिता मुँह दबाए हँसी और बोली, “आपको शहज़ादी अपराजिता को कोई पुरस्कार भी देना होगा |”

“अवश्य, शहज़ादी जी,” मैंने बड़े विनम्र स्वर में कहा| “कृपया ये भी बताएँ कि ये सेवक शहज़ादी को क्या भेंट दे ?”

“आज रात चाँदी महल आ जाईये, सेनापति जी,” शहज़ादी अपराजिता की मीठी आवाज़ सुनते ही मेरा रोम रोम पुलकित हो उठा | “आपको इस प्रश्न का उत्तर वहीं मिलेगा |”

“जैसी आपकी आज्ञा शहज़ादी जी,” मैं सर झुकाए खड़ा रहा और दोनों राजकुमारियाँ मेरे पास से होकर गुज़र गयीं |

उनके पीछे उनकी दासियों का झुंड भी ठहाके लगाते हुए चला गया और मैं दरबार की तरफ़ बढ़ गया |
 
पूनम के चाँद की रोशनी में चाँदी महल खूब दमक रहा था। यहाँ की हर चीज़ चाँदी की बनी हुई थी फ़िर चाहे वो महल का फ़ाटक हो या छत पर लगे झूमर | साज सजावट के समान से लेकर थालियाँ और चमचों तक हर चीज़ चाँदी की बनी थी। यहाँ तक कि फ़र्श पर बिछी कालीन और बिस्तर पर बिछी चादरों पर भी कढ़ाई चाँदी की तारों से की गयी थी। ये महल, महाराज भानुप्रतापदेव ने ख़ास अपनी बड़ी बेटी शहज़ादी अपराजिता के लिए बनवाया था।

मैं महल के फ़ाटक पर पहुँचकर घोड़े से उतर गया | और जब मैंने सर उठाकर ऊपर देखा तो शहज़ादी मान्यानन्दिनी को सफ़ेद लहँगा चोली पहने, चाँदी के ज़ेवरों से सज धज कर छत पर मेरी राह ताकते हुए पाया। शहज़ादी के ठीक ऊपर काले आसमान में पूर्णिमा का चाँद अपने यौवन पर था। मगर, चाँदनी की खूबसूरती शहज़ादी के लावण्य के आगे फ़ीकी जान पड़ती थी।

मुझे देखकर वो शर्मा कर मुस्कुरा दी और मैं समझ गया कि वो मुझे ऊपर आने का संकेत दे रहीं हैं। मैं तेज़ी से छत की ओर जाती सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मैं जैसे ही छत पर पहुँचा शहज़ादी ने अपने मेहंदी लगे हाथों को मेरी तरफ़ बढ़ाया और मेरी आँखों में देख कर मुस्कुरा दी।

"लाईये, हमारा पुरस्कार दे दीजिये," शहज़ादी ने एक नटखट मुस्कान के साथ कहा ।

"पर आपने तो बताया ही नहीं कि आपको क्या चाहिए।" मैं सोच में पड़ गया। "इसलिए, मैं तो खाली हाथ आया हूँ।"

"खाली हाथ क्यों?" शहज़ादी की आँखों में शरारत झलक रही थी, "अपनी तलवार नहीं लाये आप?"

"जी, लाया हूँ," मैं हैरान होकर शहज़ादी को देखता ही रह गया। "मगर, आप मेरी तलवार का क्या करेंगी?"

"सुना है, आपको एक गुप्त विद्या आती है जिसे 'अदृश्य तलवार' कहा जाता है।" शहज़ादी मेरे बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गयी और मेरी साँसें थम गयीं।

"क्या आप हमें वो विद्या सिखायेंगे? यही हमारा पुरस्कार होगा।"

"जी, अवश्य," मैंने अपनी तलवार निकाली और शहज़ादी के हाथ में दे दी।

"आप इस तलवार से हमारे साथ युद्ध करेंगी और हम निहत्थे, क्योंकि हमारा हथियार हमारी अदृश्य तलवार होगी।"

"चलिए, देखते हैं," शहज़ादी ने मुझ पर तलवार से वार किया।

मैं फ़ौरन उनके वार से बचने के लिए पीछे हट गया। वो बार बार वार करती रहीं और मैं बचता रहा। फ़िर मैंने मौका देखकर शहज़ादी की कलाई पकड़ ली और उसे मरोड़कर शहज़ादी को अपने करीब खींच लिया। तलवार शहज़ादी के हाथ से छूट गयी।

"वाह! सेनापति महोदय," शहज़ादी अपनी हार स्वीकार करते हुए मुस्कुरायी, "क्या बात है! मान गए आपके शौर्य को।"

"धन्यवाद शहज़ादी जी," मैंने शहज़ादी की कलाई छोड़ दी और कुछ कदम दूर हट गया। "कुछ दिनों तक इस कला का अभ्यास करती रहेंगी तो आप भी सीख जायेंगी। लेकिन फ़िर, हमारी गुरु दक्षिणा देना मत भूलिएगा।"

"गुरु दक्षिणा हम आपको अभी इसी समय देंगे," शहज़ादी ने कहा और मेरा कुर्ता पकड़कर मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया।

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता शहज़ादी ने अपने कोमल होंठो को मेरे होंठों पर रख दिया और मुझे प्यार से चूमने लगी। शहज़ादी के होंठो में न जाने कैसा नशा था कि मैं अपनी सुध बुध ही खो बैठा। मेरी बाँहों ने अपने आप शहज़ादी की नाज़ुक कमर को कस लिया और उन्हें अपने करीब खींच लिया। उनके सीने पर फूलता यौवन जब मेरी छाती पर चुभने लगा तो मेरे तन बदन में आग लग गयी।
 
मैंने शहज़ादी के बदन से उनकी चुनरी खींच ली और उनके रेशमी बालों को खोल दिया। हमारे होंठ, एक दूसरे के होंठो से रिस्ते रस को चूसने में लगे थे। मगर, हमारी प्यास थी कि बढ़ती चली जा रही थी। मेरे हाथ, शहज़ादी के रेशमी बदन पर बेकाबू से होकर फिरने लगे थे। कभी मैं उनके नितंबों को मसलता तो कभी उनकी पीठ सहलाता। फ़िर मैं उनकी नाज़ुक कमर को एक बाँह से कसकर और दूसरी बाँह से जवानी का नशा छलकाते उनके स्तनों को हथेलियों में भरकर निचोड़ने लगा। वो जब भी मेरी पीठ में अपने नाखून चुभोती, मैं वासना की अग्नि में झुलस जाता।

अचानक शहज़ादी के होंठ मेरे होंठो पर से फ़िसलकर अलग हो गए और मेरे होश वापस आ गए। हम अब भी एक दूसरे की बाहों में ही थे।

"वीरभद्र," शहज़ादी मेरी आँखों में देखते हुए बड़ी धीमी आवाज़ में बोली, "हम आपसे प्रेम करते हैं।"

हालाँकि ये बात हमारे बीच कई बार आँखों ही आँखों में कह दी गयी थी । मगर, उस चाँदनी रात में जब शहज़ादी ने यूँ खुलकर अपने प्यार का इज़हार किया तो मैं मारे खुशी के पागल हो गया। अब मेरे लिये खुद को काबू में रखना सम्भव न था।

"हम भी आपसे बेहद प्रेम करते हैं, शहज़ादी जी," मैंने कहा और शहज़ादी का माथा चूमा।

"न..." शहज़ादी ने मेरे सीने पर सर रखा और कहा, "आप हमें शहज़ादी मत बुलाइए, वीरभद्र। हम आपके लिए मान्या हैं...आपकी मान्या।"

मैंने अपनी उँगलियों से मान्या की ठुड्ड़ी को ऊपर उठाया और अपने होंठों को उसके होंठों पर रख दिया। उसने चाँदी की चूड़ियों से भरी अपनी गोरी बाँहें मेरे गले में डाल दी और अपनी आँखें बंद कर लीं। हम एक बार फ़िर एक दूसरे के होंठों से बरसते प्रेम की मदिरा का रस पीने लगे। हम दोनों एक दूसरे में खोए हुए थी कि अचानक बड़ी ज़ोर से बारिश होने लगी।

हमने अपने होंठो को अलग कर लिया और ऊपर आकाश की ओर देखा। मान्या ने अपनी आँखें बंद कर ली और बाँहें फैलाये, अपनी पीठ के बल मेरी बाँह पर झूल गयी। उसकी भीगी चोली, उसकी छाती पर खिली कलियों से चिपक गयी थी। तंग चोली की जकड़, उसके जवान स्तनों के उभार को पूरी तरह से ढँक भी नहीं पा रही थी।

उसके सीने पर फूलती जवानी भी उसी की तरह अल्हड़ और बेबाक थी। उसके स्तनों पर बरसता बारिश का पानी फिसलता हुआ उसकी नग्न नाभि पर उतर आता और उसकी कमसिन कमर पर बंधे लहंगे को भिगा जाता। मेरी बाहों में पड़ी कमसिन कली के हुस्न के जलवों में मैं पूरी तरह खो गया था कि तभी ज़ोर से बिजली कड़की और मैं वासना की दुनिया से बाहर आ गया।

"अंदर चलो, मान्या," मैंने झुककर मान्या के कान में कहा, "इस तरह बारिश में भीगोगी तो ठंड लग जायेगी।"

"हमें ले चलिए, वीरभद्र," मान्या ने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दीं।

मैंने उसे बाँहों में उठाया और नीचे उसके कमरे की तरफ़ चल पड़ा। मेरे गले में बाँहें डाले हुए मान्या ने आँखें बंद कीं और मेरे होंठों पर अपने होंठो को रगड़ने लगी। उसके होंठो की रगड़ से मैं बेकाबू हो गया और उसे पागलों की तरह चूमते हुए उसके कक्ष की ओर ले चला।

हम दोनों छत से नीचे उतरकर महक के अंदर आ गए। मान्या का कमरा महल के ठीक बीचों बीच था। कमरे की खिड़कियाँ बन्द थीं और चिमनी में आग जल रही थी। बाहर की ठंडी तूफ़ानी रात के मुकाबले कमरे के अंदर काफ़ी गर्मी थी। मैं, मान्या को बाँहों में उठाये उसके शयनकक्ष के अंदर आ गया। मान्या की दासियाँ कमरे का दरवाज़ा बन्द कर के बाहर चली गयीं। मैंने मान्या को उसके बिस्तर पर लिटा दिया। मान्या ने आँखें बंद कीं और रेशमी तकिये को कसकर पकड़ लिया।

उसके गीले वस्त्र, उसके भीगे बदन से चिपके हुए थे। चिमनी में जलती आग बुझने लगी थी। मैं उठा और चिमनी में दो चार लकड़ियाँ और रख दीं। आग फ़िर से भभक उठी। मैंने अपना गीला कुर्ता उतार दिया और चिमनी के पास उसे सुखाने के लिए डाल दिया। कुछ पल आग में हाथ सेकने के बाद, मैं बिस्तर पर लेटी मान्या की तरफ़ मुड़ा तो मेरे मुँह से आह निकल पड़ी। मान्या उठकर बिस्तर पर मेरी तरफ़ पीठ कर के बैठी हुई थी। और अपनी गोरी बाहों को पीछे की ओर मोड़कर पीठ पर बँधी अपनी चोली की डोरियाँ खोलने की कोशिश कर रही थी।

"ज़रा मेरी मदद कर देंगे?" बिस्तर पर बैठी मान्या, मेरी तरफ़ पीठ किये बोली।

मैं बिस्तर पर उसके पीछे जाकर बैठ गया और उसकी चोली की डोरियाँ एक एक कर खोलने लगा। जब मान्या की पीठ पर बंधी सारी डोरियाँ खुल गयीं तो मैंने उसके खुले बालों को उसके बायें कँधे पर आगे की तरफ़ कर के डाल दिया। फ़िर मैंने उसके दायें कान पर अपने दांत गड़ा दिए।

"मम्महह...." मान्या ने अपने होंठो को दाँतों से कस लिया और आँखें मीच लीं।

उसके दर्द की दवा के रूप में मैंने उसके दायें कान के नीचे उसकी गर्दन को प्यार से चूमा। मान्या ने अपना चेहरा बायीं तरफ़ फ़ेर लिया मगर आँखें बंद हीं रखीं। उसकी सुराहीदार गर्दन को चूमता हुआ मैं उसके कँधे तक पहुँच गया और हाथ से उसकी चोली को उसके दोनों कँधों से नीचे सरका दिया। उसकी चोली जैसे ही मेरे हाथ आयी, मान्या ने अपने लंबे, खुले बालों से अपने सीने की जवानी को ढ़क लिया और फ़िर लाज के मारे अपना सुर्ख चेहरा तकिये में छुपा लिया।

मैं पागलों की तरह उसकी पीठ को चूमने लगा। मान्या, बिस्तर पर औंधे मुँह लेटी रही और अपनी बाँहों से अपने सीने की नग्नता को छुपाये रही। जब उसकी पीठ के स्पर्श से जी भर गया तो मैंने उसकी बाँहों को खींच कर उसकी पीठ पर कस लिया। बायें हाथ से मैंने उसकी बाँहों को कसकर पकड़ा और अपने दायें हाथ से मान्या के दायें स्तन को दबोच लिया। पहले तो मैंने उसके कोमल स्तन को प्यार से सहलाया फ़िर मसलना शुरू कर दिया।

“आ...आह...म्मम!”

मेरे छूने से मान्या में काम की आग जल उठी और वो बिस्तर पर मचलने लगी। मैंने उसके कँधे को पकड़कर उसे बिस्तर पर फ़ौरन पीठ के बल लिटा दिया। मान्या की साँसें तेज़ थीं। उसकी अधखुली कजरारी आँखें मदहोश थी जैसे उस पर वासना का नशा चढ़ गया हो। उसकी साँसों की रफ़्तार के साथ ही उसकी छाती भी तेज़ी से उठ गिर रही थी। उसके नग्न सीने पर उसके सुड़ौल स्तन, काम के रस से फूलते जा रहे थे। मान्या के सीने के उन नशीले उभारों पर नज़र पड़ते ही मेरा लंड उत्तेजित हो गया।

हम दोनों ने एक दूसरे को कसकर बाँहों में भर लिया। काम की आग दोनों जवान जिस्मों में बराबर लगी थी। मैंने मान्या के स्तनों को हथेलियों में भरा और चुंबन बरसाना शुरू कर दिया। बिस्तर पर मेरे नीचे पड़ी उस कमसिन कली के स्तन इतने रेशमी थे कि मैं कभी तो अपनी जीभ से उनका रस चखता तो कभी उन पर अपने दाँत गड़ा देता। मान्या मचल उठती और तकिये को कस कर पकड़ लेती। मैंने उसके स्तनों को मसला और मुँह में भरकर चूसने लगा।
 
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