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स्वाँग

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स्वाँग

मुख्य पात्रों के बारे में

परी : एक कुरूप लड़की जो कई लोगों के हत्या के जुर्म में कारगार में कैद थी और जिसे अदालत में पेश किया गया। न्यायधीश के आदेश पर जो अपनी कहानी अदालत में सुनाती है।

नीलिमा : ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली एक महिला और परी की माँ जिसे एक पुत्री को जन्म देने के अपराध में निरंतर ही प्रताड़ित किया जाता था।

राघव : परी के पिता जो पेशे से एक मजदूर और बहुत ही गरीब किसान है। बिहार राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले इस मजदूर की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी।

सुलेखा : परी की बड़ी बहन जो उसकी सबसे अच्छी मित्र भी थी और जिंदगी की कठिनाईयों को दोनों ने साथ में लड़ी।

कविता : परी और सुलेखा की पड़ोसी मित्र जिसके परिवार वालों ने ही उसकी हत्या कर दी थी क्योंकि वह किसी दूसरे जाति वाले लड़के से प्रेम करने लगी थी।

परी की दादी : एक बहुत ही पुराने ख्यालात वाली वृद्ध औरत जिन्हें वंस बढ़ाने के लिए एक पोते ही लालसा थी। लेकिन उनकी यह लालसा पूरी नहीं होने की वजह से उन्होंने अपनी बहू को बहुत प्रताड़ित किया।
 
अध्याय एक

नीलिमा गर्भवती है और आज उसका प्रसव है। गाँव के कुछ लोग राघव को सहानुभूति देने के लिए दरवाजे के बाहर ही चबूतरे पर बैठे है, और राघव की बड़ी बेटी सुलेखा जो अभी मात्र दो ही वर्ष की है, बिना किसी टेंसन के अपने खिलौनों के साथ खेलने में मग्न है। उसे ज्ञात है कि उसके घर में एक नन्हा सा मेहमान आने वाला है। एक राजकुमार ऐसा उसे बताया गया है। अपने भाई के साथ खेलने की उत्सुकता, और प्रसवपीड़ा से चीखती नीलिमा।

पिछली बार की तरह, इस बार भी प्रसव के लिए नीलिमा को उसके मायके वाले अपने साथ ले जाने का प्रस्ताव राघव के माता और पिता के सामने रखे थे, लेकिन उन्होंने यह कहकर इनकार कर दिया कि आपके घर की अशुभ छाया में कहीं लड़की न जन्म ले ले।

पिछली बार गई थी नीलिमा, और प्रसव भी वहीं हुआ था। परंतु जब सुलेखा का जन्म हुआ तो राघव के परिवार वालों की तरफ से रिश्तों की डोर में गांठ आ गई। उसके बाद से अब तक राघव एक बार भी ससुराल नहीं गया और न ही नीलिमा को मायके जाने को मिला।

बड़े संतान में एक पुत्र की ख्वाइश उस वक़्त तो अधूरी रह गई थी लेकिन इस बार तो लड़का होने की संभावना पूर्ण थी। बुजुर्गों द्वारा बताए गए व्यवहार और झाड़-फूंक करने वाले साधुओं और भिक्षुओं के द्वारा बताए गए हर एक टोटके को उसने अच्छी तरह से किया था। और इस बार लड़की होने की कोई गुंजाइश नहीं थी।

"अरे अब बैठ भी जा। क्यों इधर-उधर चक्कर काट रहा है टेंसन में? आ बैठ। बिना पजामे वाले बाबा का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने कहा है ना तुझे कि बेटा होगा! तो बेटा ही होगा! आ बैठ!" चबूतरे पर बैठे उन सात-आठ लोगों में से एक ने राघव का हाथ पकड़ कर तसल्ली दिलाते हुए उसे अपने पास चबूतरे पर बैठाया। और उसके कंधे पर हाथ रखा।

"वो तो ठीक है। लेकिन अभी मुझे नीलिमा की चिंता हो रही है। इस बार शायद उसे ज्यादा प्रसव पीड़ा सहना पड़ रहा है।" बोलते हुए वह फिर से उठ खड़ा हुआ और परिसर में चक्कर लगाने लगा।

धूम्रपान कर रहे एक वयस्क ने राघव से कहा कि तू इतनी चिंता क्यों कर रहा है? अन्दर है ना उसकी देख रेख करने वाले। बिल्कुल औरतों के जैसे बात-बात पर तू ऐसा टेंसन लेने लगता है। —और वह हंसने लगा।

इस बार वास्तव में नीलिमा को सामान्य से ज्यादा ही प्रसव पीड़ा का सामना करना पड़ रहा था। उसकी ख्वाइश थी किसी अच्छे अस्पताल में जाने की। क्योंकि गाँव के कुछ औरतें जिनका प्रसव अस्पताल में हुआ था, नीलिमा को बताया करती थी कि अस्पताल में प्रसव होने से माँ और बच्चा दोनों ही सुरक्षित होते है, और प्रसव पीड़ा भी कम होता है। क्योंकि वह अपने बच्चे के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी, अस्पताल जाने का प्रस्ताव उसने राघव के समक्ष रक्खी तो थी लेकिन उसकी सास का कहना था कि पुत्र प्राप्ति के लिए स्वामी जी ने कहा है कि प्रसव, घर पर ही हो, तो बेहतर होगा। और पुत्र की आयु भी लम्बी होगी। और अस्पताल में खर्चे भी तो बहुत होते है? इतना पैसा कहाँ से लाएगी? दहेज के नाम पर तो उसके मायके वालों ने बस पाँच हजार रूपए और एक साइकिल ही दिया है।

"तू तो बस मिठाई का डिब्बा ले आ। खुशखबरी आती ही होगी।" दूसरे ने कहा।

राघव के पिता जी एक ओर निश्चिंत बैठे थे क्योंकि स्वामी की बातों ने उन्हें पूर्ण विश्वास दिलाया था कि इस बार पुत्र ही होगा। उन्होंने भी राघव को शांत होकर बैठ जाने को कहा लेकिन लगातार बढ़ती हुई नीलिमा की चीखें उसे व्याकुल कर रही थी। अपनी माँ की चींखें सुनकर दो वर्ष की बच्ची सारे खिलौनों को फेंक कर अन्दर जाने के लिए दरवाजे की ओर भागी। वैसे तो दरवाजा अंदर से बंद था लेकिन फिर भी राघव ने भाग कर उसे पकड़ा और गोद में ले लिया। वह अबोध भी रोने लगी।

आखिरकार वह वक़्त आ ही गया जब नीलिमा ने एक बच्ची को जन्म दिया। हां, इस बार भी लड़की को ही जन्म दिया नीलिमा ने। प्रसव कराने वाली एक औरत दरवाजा खोल कर बच्ची को गोद में लिए राघव के पास आई। उसकी मायूस चेहरे ने सबको बता दिया कि संतान के रूप में एक पुत्र की उनकी ख्वाइश इस बार भी पूरी नहीं हुई। इस बार भी लड़की ही हुई।

"लड़की है।" इतना बोलकर वह इस उम्मीद से खड़ी रही कि राघव उसे गोद में लेगा और अपनी पुत्री की खूबसूरत शक्ल का दीदार सबसे पहले करेगा। और सुलेखा को गोद से उतार कर वह बच्ची को गोद लेने के लिए अभी बढ़ने ही वाला था कि उसकी माँ ने उसे रोक लिया।

"वापस रख आ इसे इसके माँ के पास। कोई नहीं देखेगा इस मनहूस की शक्ल को।" लड़की होने की वजह से सबका चेहरा वैसे तो पहले से ही उतरा हुए था, और वहाँ उपस्थित किसी भी शख्स को एक लब्ज बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी क्योंकि हर किसी ने अपने-अपने ज्ञान के अनुसार राघव को पुत्र प्राप्ति के लिए उपाय बताए थे। जिसकी निष्फलता निसंदेह सबके सामने था। ऐसे कटु वचन को अनदेखा करके राघव अपनी पुत्री को गोद में लेगा इस उम्मीद से वो कुछ देर तक खड़ी रही।

"मैंने क्या कहा सुना नहीं तुमने?" राघव की माँ जोर से उस औरत पर चिल्लाई। उसकी तीक्ष्ण शब्दों ने उसके हृदय में भय उत्पन्न कर दिया और भागते हुए बच्ची को नीलिमा के पास रखने के लिए वो अन्दर चली गई।

"याद रखना कोई भी उस मनहूस की शक्ल नहीं देखेगा।" चेतावनी देते हुए वह भी अन्दर चली गई। स्त्री ने अभी बच्ची को नीलिमा के समीप सुलाई ही थी कि वह भी वहाँ पहुँची और नीलिमा के पास गई। क्योंकि नीलिमा उसके उम्मीदों पर इस बार भी खरी नहीं उतरी थी, उनके हृदय में क्रोध और चिढ़ की भावना अत्यंत तीव्र थी। लेकिन इसमें नीलिमा की तो कोई गलती थी ही नहीं।

राघव की माँ नीलिमा से बोली,'देखो इस महारानी को। बेटी पैदा करती है बेटी। और यह भी नहीं जानती कि वंश बेटी नहीं बल्कि बेटा बढ़ाता है। ये तो सिर्फ बोझ होती है। एक ऐसी पूंजी जिसका कोई लाभ नहीं।'

उसकी यह शब्द स्पष्ट करते थे कि पुत्री के जन्म से उसकी शादी तक के किए जाने वाली सारी इन्वेस्टमेंट व्यर्थ है। क्योंकि वह ससुराल चली जाती है। पुत्र और पुत्री के बीच तुलना करने के लिए उसकी सांस ने जिस पगडंडी का उपयोग किया था क्या वह सही है? —कुछ सेकेंड तक नीलिमा भी विचार करती रही। क्या वास्तव में लड़की को पालना लाभकारी नहीं है? लेकिन लाभ और हानि के बारे में विचार करना तो व्यापार है? और मैं कोई व्यापारी नहीं हूं। अच्छा मान लिया कि बेटी को पालना लाभकारी नहीं होता लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि पुत्र आगे चल कर बुढ़ापे की लाठी बनेगा? गाँव और समाज में आएदिन यह सुनने को मिलता है कि वृद्घ होने पर फलाने के बेटे-बहुओं ने उन्हें बेघर कर दिया। ऐसे में क्या सही है और क्या ग़लत इसका फैसला राघव की माँ लाभ और हानि की इस पगडंडी के माध्यम से नहीं कर सकती।

"माफ़ करना माँ जी। पर आप भी तो एक बेटी ही हो।" सीमित शब्द संख्या में बने इस शब्द ने राघव की माँ के तथ्यों का न सिर्फ मुंह तोड़ जवाब दिया था बल्कि यह भी साबित कर दिया था कि संतान के रूप में बेटी होना किसी व्यापार की तरह लाभ या हानि का तथ्य नहीं है। और उसे इस बात की बहुत खुशी है कि इस बार भी उसने एक बेटी को जन्म दिया।

एक लड़की का जीवन ही संघर्ष से आरंभ होता है। और इस लड़की की किस्मत में तो शायद सिर्फ संघर्ष ही संघर्ष लिखा है। नीलिमा की ये शब्द राघव के माँ के हृदय को भेद गई। उसे निशब्द कर गई क्योंकि वह भी तो एक बेटी ही थी। लेकिन इस तथ्य ने उन्हें सिर्फ निरुत्तर किया था संतान के रूप में बेटी को पाकर संतुष्ट नहीं। मुंह फुला कर वहाँ से चली गई।

अपनी माँ के वक्ष के समीप सोई उस लड़की की बदकिस्मती तो देखिए कि उसकी जन्म लेने की खुशी किसी को भी नहीं हुई। लेकिन इस बात से शायद उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि इन सब रीतियों और तर्कों से अज्ञात थी। नीलिमा उसकी ओर देखी। कुछ ही घंटे तो हुए थे उसे इस दुनियां में आए हुए और इतनी जल्दी ही वो मुस्कुराना भी सीख गई थी या शायद उसकी शक्ल ही कुछ ऐसी थी। बहुत ही प्यारी शक्ल पर खूबसूरत हंसी, दुनियां और दुनियां के विचारों से अज्ञात — शायद इसीलिए मुस्कुरा रही थी कि उसने सबसे बुद्धिमान प्राणी इंसान के रूप में जन्म लिया है। उसकी खूबसूरत आँखें बहुत ही चमकीली और सम्मोहक थी, कि क्रोधित भी देखकर सम्मोहित हो जाय; पर यह नीलिमा के सास और अपनी दादी को मोहित करने में नाकाम रही। नीलिमा उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली कि कोई बात नहीं बेटी, जो क्या हुआ कि तुम्हारे इस दुनियां में आने की खुशी किसी को नहीं हुई? तुम तो मेरी परी हो।

किस्मत क्या लिखी थी उस बेकसूर की ईश्वर ने कि जन्म के बाद उसके पिता ने उसका चेहरा देखने से भी इंकार कर दिया। बात यह नहीं था कि वह उसकी शक्ल देखना नहीं चाहता था बल्कि उसकी माँ और बाप ने वचन के बेड़ियों में कैद कर दिया था। राघव पेशे से एक किसान था। अपनी खेती तो नहीं थी उसके पास लेकिन वह फिर भी खेती ही करता था। कुछ जानवरों को भी पाल रक्खा था जिसके दूध को कभी बेच देता तो कभी खुद भी उपयोग करता। भारत का एक राज्य बिहार और इस राज्य के एक छोटे से गाँव में निवास करने वाला राघव अक्सर ही आर्थिक समस्याओं से तंग रहता था। इस दौर में अब तक बिजली तो गाँव में आ गया था लेकिन कनेक्सन लेने का विचार उसने नहीं किया था। कुछ ही रूपए तो कमाता था और उसमें भी हर महीने बिल जमा करना; यह तो चादर से ज्यादा पांव पसारने वाली बात थी।

गाँव के सन्नाटे में न सिर्फ आज का दिन दफन हो गया था बल्कि परी के जन्म लेने की खुशी भी। ग्रामीण रिवाजों की तरह एक दीया घर के मुख्य दरवाजे पर जला दिया गया था और एक आंगन में लगे तुलसी के पौधे के पास। इस सन्नाटे से प्रतीत हो रहा था कि घर का हर एक सदस्य भोजन करके सो गया है। नीलिमा अब भी उसी कमरे में उसी बिस्तर पर सोई हुई है और परी उसके वक्ष के पास में। कुछ कदमों की आहट से प्रतीत हो रहा था कि इस घर का एक सदस्य अभी भी जाग रहा है और छुपते-छुपाते घर के ही किसी स्थान पर जा रहा है।
 
राघव की माँ और पिता जी तो गहरे नींद में सोए हुए थे और नीलिमा भी अपने कमरे में। राघव को अपनी पुत्री को देखने की उत्सुकता ही था जो शायद उसे सोने नहीं दे रहा था। वह बिस्तर पर से उठा। उसकी बड़ी पुत्री जो उसके साथ ही में सो रही थी कि मासूम शक्ल को कुछ देर तक देखता ही रहा और सोचता रहा कि मैंने इसे किस बात की सजा दे दिया है? कितनी बेचैन थी वो अपनी माँ और छोटी बहन को देखने के लिए। लेकिन किसी ने भी उसे नीलिमा के पास जाने नहीं दिया था। बड़ी ही सावधानी से वह बिस्तर पर से उठा ताकि सुलेखा की आँख न खुल जाय। बहुत जतन करने पर तो वह कुछ देर पहले ही सोई है और अगर जाग गई तो फिर नीलिमा के पास जाने की जिद्द करने लगेगी। यह पुष्टि करने के लिए कि उसके माता और पिता सो रहे है या नहीं राघव उनके कमरे के पास गया और खिड़की से झांक कर देखा। उसके पिता जी की खर्राटें स्पष्ट कर रही थी कि वे गहरी नींद में सो रहे हैं।

रात के अंधियारे में कहीं वो किसी वस्तु से न टकरा जाय; बड़ी ही सावधानी से वह उस कमरे के पास गया जहाँ नीलिमा सो रही थी। कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो कर अन्दर जाने की हिम्मत जुटाने लगा लेकिन उसकी माँ के द्वारा दिए गए वो वचन उसके हिम्मत को तोड़ रहा था। भावुक हो कर आंसू उसके आँखों से झलक पड़ा और बिना किसी बंधन के यह किसी नदी के धार की तरह मुहाने की दिशा में बहने लगा। एक संघर्ष चल रहा था उसके भीतर और अंततः उसने अपनी दिल की बात सुनी। एक बेटी के जन्म के प्रति सामाजिक सोच और अपनी माँ के दिए गए वचन को अनदेखा करके उसने वही करने का फैसला किया जिसने उसे यहाँ तक खींच लाया था। उसने नीलिमा को देखा। प्रतीत हुआ कि वो गहरी नींद में सो रही है। राघव आगे बढ़ा और नीलिमा के पास गया। अपनी छोटी पुत्री को देखा जो उसके आने की आहट सुनकर जाग गई थी और खिलखिला रही थी। कुछ सेकेंड तक लगातार मौन खड़ा रहने के उपरांत उसने बड़ी ही सावधानी से परी को गोद में उठाया और चांदनी सी चमकती उसकी नूरानी चेहरे को देखा। उसकी होंठों पर सजी बेहद ही खूबसूरत मुस्कान ने उसके हृदय में उमड़ रहे सारे संशय को समाप्त कर दिया। और उसके होंठों पर भी मुस्कान की एक लहर दौड़ पड़ी। राघव की आँखों से आंसू बहते ही जा रहे थे लेकिन इसका उसे जरा सा भी आभास नहीं था।

"माफ़ करना मेरी बेटी। मेरी नन्ही परी। ये मत समझना कि तेरे आने से तेरा ये बाप नाराज है; लेकिन देखो न तेरा ये बाप कितना बदनसीब है कि तेरी स्वागत में मुस्कुरा भी नहीं सका। लेकिन अब मैं जी भर कर मुस्कुराऊंगा। मेरी आँखों में आंसू देख कर यह मत समझ लेना कि तेरे आने से मै दुःखी हूं। यह आंसू तो मेरे आँखों में इसलिए है कि मै कितना बदनसीब हूं। लेकिन क्या करता मै? मजबूर हूं। जकड़ा हुआ हूं सामाजिक रीतियों से। जहाँ वंश बेटियां नहीं बेटे बढ़ाते हैं। मेरी खूबसूरत परी हो तुम और मैंने तो सोच लिया है कि मैं तो तुम्हें परी कह कर ही बुलाऊंगा। परी।"

राघव ने अपनी छोटी पुत्री का नामाकारण कर दिया। उसके आँखों से बहते आंसू से तो यह स्पष्ट ही नहीं हो रहा था कि यह खुशी के है या खुद पर अफ़सोस करने के लिए। परी। बहुत ही खूबसूरत नाम रक्खा था उसने अपनी छोटी पुत्री की और थी भी वह बिल्कुल परी के जैसी। कुछ देर तक वह गीली आँखों से उसकी चमकीली आँखों को देखता रहा और फिर उसे वापस से नीलिमा के पास सुला दिया। और चला गया। उसके जाने के बाद नीलिमा ने आँखे खोली। वह सोई हुई तो थी लेकिन नींद से नहीं और राघव के आगमन की आहट सुनकर ही वो भी जाग गई थी लेकिन आँखे बंद किए बिना गतिविधि किए लेटी रही। और जब वह कमरे से बाहर चला गया तो उसने अपनी आँखें खोली। और स्नेह से परी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,' परी, बहुत ही अच्छा नाम रक्खा है तेरी, तेरी बापू ने।"
 
अध्याय दो

सेंट्रल जेल के एक अंधेरे कमरे में जहाँ दीवार पर बना एक छोटा सा छेद ही माध्यम था प्रकाश के अंदर आने का। उस छेद से होकर आती हुई सूर्य की रोशनी एक मैले कुचैले कम्बल ओढ़े सोई लड़की पर पड़ रही थी।

कोने में सोई वह लड़की सर को कम्बल में ढक कर सोई हुई थी लेकिन उसकी हथेली और दूसरे हाथ की कुछ उंगलियां ही बाहर दिख रही थी। यह जला हुआ था और इसे देखकर ऐसा लग रहा था कि तेज़ाब ने शायद उसकी त्वचा को बिल्कुल ही नष्ट कर दिया था।

छोटे से छेद से अन्दर आती सूर्य की थोड़ी सी रौशनी से वक़्त का अंदाजा लगा पाना तो संभव नहीं था लेकिन शायद यह सुबह का ही समय था। चार - पाँच पुलिसवाले वहाँ आएं। एक इंस्पेक्टर और बाकी सब हवलदार थे शायद।

एक ने कारागार की सलाखें खोली और फिर एक - एक करके सब अन्दर प्रवेश किए। उस लड़की से कुछ कदम पीछे ही सब खड़े हो गए। सलाखों के खुलने की आवाजें और उनके कदमों की आहट की ध्वनि के बाबजूद भी वह बिना कोई हरकत किए वैसे ही सोई हुई रही। एक हवलदार कुछ दूर पीछे से ही अपने डंडे से उसके बदन को हिलाते हुए उसे जगाने की कोशिश करने लगा।

"उठ। ऐ लड़की उठ। उठ।" उसने उसके बदन को हिलाते हुए उसे जगाया और डंडा वापस पीछे खींच लिया।

सबसे पहले उस लड़की ने अपना चेहरा कम्बल से बाहर निकाली। उसके बिखरे मैले बाल और आँखें एकदम लाल जैसे उसकी पुतलियों में रक्त उमड़ आया हो।और पूरे चेहरे पर लाल-लाल घाव भरे पड़े थे। बिल्कुल ही कुरूप थी वह। उसकी बदसूरत शक्ल को देखकर वहाँ उपस्थित पुलिसवालों को घिन्न आ गया। इंस्पेक्टर ने एक ओर थूकते हुए कहा,' कैसे - कैसे लोग बनाता है भगवान? और बनाता भी है तो यहाँ क्यों भेज दिया? छिः इसे देखकर घिन्न आ रही है। कोई इतना बदसूरत कैसे हो सकता है?'

हालाकि उसकी शक्ल को देखकर उसकी उम्र का अंदाजा लगाना तो संभव नहीं था लेकिन उसकी उम्र करीब तेईस वर्ष होगा। वो उठ बैठी। हाथों एवं पैरों में चूड़ियों और पायल के बजाय बेड़ियां थी जो किसी भी तरह से श्रृंगार का प्रसाधन नहीं था। अपनी गर्दन झुकाए वो खामोश बैठी रही और उसके लंबे बालों ने उसके बैठने के तुरंत बाद ही उसके चेहरे और जिस्म को ढक लिया। लेकिन अब भी वो अपने पैरों को कम्बल से ढके हुए ही थी।

"विश्व सुंदरी जी, कृपया आप हमारे साथ चलने का कष्ट करेंगी? आज आपका अदालत में पेशी है।" इंस्पेक्टर ने उस कुरूप लड़की से उसकी सुंदरता का उलाहना देते हुए कहा।

अपने हाथों का सहारा लेते हुए वो उठ खड़ी हुई और लड़खड़ाते हुए कारागार से बाहर निकली। उसके पीछे सभी पुलिसवाले भी कारागार से बाहर निकलें। जेल के बाहर आते ही उसकी आँखें चकाचौंध हो गई। न जाने कितने दिनों से वो उस अंधेरे कारागार में कैद थी। हालाकि अब भी बेड़ियों ने उसके हाथों और पैरों को जकड़ रक्खा था। धूप की चिलमिलाती रौशनी जब उसकी आँखों पर पड़ी तो उसकी पलकों को बंद होने के लिए बेबस होना पड़ा। इस तेज रौशनी से आँखों को बचाने के लिए उसने अपनी हथेलियों से आँखों को ढक लिया। कुछ देर बाद जब उसे लगा कि अब वह सूर्य की किरणों की चमक को झेल सकती है; धीरे - धीरे आँखें खोलकर सूर्य से नज़रे मिलाई। मई के महीने में सुबह आठ बजे भी इतनी कड़ाके की धूप होती है। उसे यहाँ से अदालत ले जाने के लिए एक गाड़ी उसका इंतजार कर रही थी। वो उस गाड़ी पर जाकर बैठ गई। उसके बैठने के उपरांत महिला पुलिस की एक टीम भी गाड़ी पर बैठी। और गाड़ी अदालत को रवाना हुई।

उसकी इस बदसूरत छवि को देखकर कोई कुंठित न हो जाय इसलिए उसे एक बुर्का जैसा काले रंग का लिवास पहना दिया गया था। हर न्यूज चैनल की ब्रेकिंग न्यूज पर बस एक ही सुर्खी छाई थी। उस लड़की को जेल से अदालत के जाने की घटना। आखिर उसने ऐसा क्या गुनाह कर दिया था? जेल से अदालत जाने तक की हर एक घड़ी को सभी न्यूज चैनल पर लाइव प्रसारित किया जा रहा था और टीवी के सामने लोगों की भीड़ भी उमड़ी पड़ी थी।

जब वह गाड़ी पर बैठी थी तो कुछ रिपोर्ट दूर से ही उसकी तस्वीर को कैमरे में कैद करके अपने चैनल पर प्रसारित कर रहे थे। लेकिन इन सब का प्रभाव न ही उस कुरूप लड़की पर पड़ा और ना ही उसके साथ खड़े पुलिस वालों को।

"... तो गाड़ी यहाँ से खुल चुकी है और गुनेहगार को अदालत ले जाने के लिए पुलिस की गाड़ी अदालत को रवाना हो गई है।.." एक रिपोर्टर टीवी स्क्रीन पर बोलता हुआ दिखा और उसके पीछे पुलिस की वो गाड़ी खुली।

पता नहीं किस सोच में मग्न थी वो? रक्त से लाल आँखों में कुछ क्षण के लिए जैसे स्नेह उमड़ पड़ा था और शायद अपनी खूबसूरती की छवि की कल्पना करने लगी थी लेकिन अचानक से ही उसे अपनी वास्तविकता का आभास हो गया। हाथ से ज्यादा लम्बाई वाले बुरके से अपनी कलाई को थोड़ा बाहर निकाली और कुछ क्षण तक लगातार देखती रही। हृदय में उमड़ रहे वेदनाओं और भावों को स्पष्ट कर पाना तो मुश्किल था क्योंकि दिल की बात कहने वाली आँखें रक्त की तरह लाल थी और भाव को स्पष्ट करने वाली चेहरे की त्वचा झुल्सी, काले नकाब के पीछे कैद थी। लेकिन इतना तो यकीन से कहा जा सकता है कि अपनी छवि की वास्तविकता उसकी हृदय को सुकून तो दे नहीं सकता था।

पास ही में बैठे एक पुलिस ने वक़्त व्यतीत करने के लिए अपना मोबाइल निकाल कर उसमे टिक- टॉक देखने लगे। एक दो वीडियो देखने के बाद जब उन्होंने स्वाइप अप किया तो मोबाइल स्क्रीन पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की की छवि दिखाई पड़ी। कई मिलियन फॉलोअर्स वाली उस लड़की को वो देख ही रही थी कि उस पुलिसवाले ने उसकी ओर देखा। मोबाइल स्क्रीन पर दिख रही उस लड़की और उसके पास ही में बैठी उस कुरूप अपराधी की तुलना करते हुए अपने मन ही मन में कहने लगा कि कहाँ ये और कहाँ तुम! इसकी खूबसूरती की तुलना तुमसे करना ही बेवकूफी होगी। किसी को भी दीवाना बनाने वाली उसकी आँखें और तुम? तुम पर तो थूकने का मन करता है।

उसके हृदय में उमड़ रहे अपने प्रति विचारों को स्पष्ट समझ गई थी लेकिन इससे पहले कि वो मोबाइल स्क्रीन से नजर हटाती उसने मोबाइल बंद करके वापस से जेब में रख लिया।

आज भीड़ भी बहुत थी अदालत में। कुछ इस केस की स्टडी करने वाले थे, कुछ वकील, कुछ मुजरिम और कुछ उन्हें छुड़ाने और सजा दिलाने के लिए। न्याय का मंदिर कुछ लोगों के लिए व्यापार का दुकान सा था कि जब चाहे गुनाह करके माफ़ी खरीद आएं। कुछ पैसों के बल पर न्याय खरीदते हैं तो कुछ लालची माफ़ी बेचते हैं। इसी वजह से गुनाह के दलदल से गुनेहगार गुनाह करके आजाद घूमता है और एक बेकसूर सजा काटता है। यहाँ का वातावरण कुछ ऐसा ही था या कुछ और, यह तो एक रहस्य है।

अदालत के बाहर बहुत सारी स्त्रियां खड़ी नारे लगाए जा रही थी,' We want justice..! हमें न्याय चाहिए..! औरतों को न्याय दो। उनको उनका अधिकार दो।"

कोरे कागज की तख्ती पर कुछ काले अक्षरों में यही सारे नारे लिखे थे जिसे यहाँ उपस्थित सारी औरतें लगातार दुहराए जा रही थी। भीड़ इतनी बड़ी थी कि परिसर क्षेत्र का फैलाव सिमटा हुआ प्रतीत हो रहा था। आखिर क्या वजह है कि ये औरतें न्यायालय के बाहर क्रांतिकारियों की तरह प्रदर्शन कर रही है? और किस चीज के लिए न्याय माँग रही है? कैसा अधिकार चाहिए था उन्हें? हर चीज की आजादी तो है; पढ़ने की, लिखने की, स्वतंत्र घूमने–फिरने की, अपने दम पर खड़ा होने के लिए, रोजगार करने के लिए और नौकरी करने के लिए।

वास्तव में सिक्के की दूसरी पहलू की तरह ही इस घटना की एक पहलू भी अभी नज़रों से ओझल है।

एक रिपोर्टर उन औरतों के पास गया और सबसे आगे खड़ी एक औरत से पूछा कि आपको क्या लगता है कि कौन गुनेहगार है? कुछ कहना चाहती है आप?

"वो स्वाभिमानी थी और स्वाभिमान थी हम औरतों की। वो प्रेरणा थी हमारी। हमारे समाज के खोखले रीति रिवाजों को आज बदलना होगा। हम भारत की स्वतंत्र महिलाएं हैं। हमें न्याय चाहिए। हमें अपना स्वाभिमान चाहिए। औरतों को उनका पहचान चाहिए।" और वह फिर से नारा लगाने लगी। *We want justice..! We want justice..!"

यह मामला भी शायद उसी कुरूप लड़की से संबंधित था जिसे अभी अदालत में लाया जा रहा था। एक ओर किनारे में आ कर रिपोर्टर कैमरा की ओर देखते हुए बोलने लगा।

"जैसा कि आप देख रहे हैं कि आज औरतें अपनी स्वाभिमान, अपनी पहचान पाने के लिए लड़ रही है। इनकी यह क्रांति क्या रंग लाएगी? और आज पेश किया जा रहा है उस अनजान कुरूप महिला को अदालत में जो इस क्रांति कि सबसे बड़ी वजह है।" और अचानक से उसकी नजर उस गाड़ी पर पड़ी जिसपर से उस लड़की को यहाँ पर लाया जा रहा था। उसने तुरंत कैमरामैन को उस गाड़ी की ओर फोकस करने का संकेत दिया और बोलने लगा।

"और वो देखिए। जेल से गाड़ी आ गई।" इतना बोलने के बाद रिपोर्टर गाड़ी की ओर भागा ताकि उन पुलिसवालों से और उस कुरूप लड़की से दो बातें पुछ सके। लेकिन इस दौड़ में वह अकेला प्रतिभागी नहीं था। गाड़ी को रुकने से पहले ही रिपोर्टरों और कैमरामैन ने और समाचार पत्रों के कुछ पत्रकारों ने गाड़ी को घेर लिया।

क्रांतिकारी महिलाओं की भीड़ उस गाड़ी को देखकर आक्रमक होते दिखाई पड़ी लेकिन वह नारे लगाती रही। क्योंकि अभी उन्हें न्यायाधीश के फैसले का इंतजार था। अन्यथा एक अकेली स्त्री को रौंदने के लिए यह भीड़ सिर्फ पर्याप्त ही नहीं था बल्कि उससे कहीं ज्यादा था।

एक दुकान में टीवी पर इस घटना को देखने वाले लोगों की भीड़ उमड़ी हुई थी और घरों में लोग काम छोड़कर समाचार सुन रहे थे। बॉलीवुड के थ्रिलर फिल्मों की तरह ही यह मामला पेचीदा था और बहुत सारे लोगों के दिलों में कई तरह के प्रश्न उमड़ रहे थे। टीवी पर उन्होंने देखा कि गाड़ी रुकी और सबसे पहले कुछ पुलिसवाले उतरे और फिर वो कुरूप लड़की।

भीड़ को हटाते हुए पुलिस उस लड़की को अदालत के भीतर ले गए। रिपोर्टरों और पत्रकारों की भीड़ के प्रश्न का बिना कोई उत्तर दिए। क्योंकि शायद उन्हें भी इस घटना के बारे में जानकारी पूरी नहीं थी।

अदालत में, लोग आपस में चर्चा कर रहे थे और इस मामले को अच्छी तरह से समझने की कोशिश कर रहे थे। वहाँ उपस्थित कई वकील इस केस से संबंधित कागज़ों को बार - बार पढ़ रहे थे ताकि न्यायमूर्ति न्यायधीश के समक्ष इसे अच्छी तरह से पेश कर सकें। न्यायधीश के प्रवेश करते ही सभी खड़े हो गए। आसन ग्रहण करने के पश्चात न्यायधीश ने सभी को बैठने के लिए कहा और सभी बैठ गए। उसके बाद फिर कुछ समय के लिए पूरे अदालत में खामोशी का ही माहौल रहा।

"अदालत की कार्यवाही शुरू कीजिए।" न्यायधीश ने अगले कुछ सेकेंड के बाद कहा।

उस कुरूप लड़की को कटघरे में खड़ा किया गया था। न्यायधीश के आदेश के बाद एक वकील उठे और बोलने लगें।

"Your Honor... हमारा कानून और संविधान हमेशा से ही औरतों और मर्दों को एक समान माना है। केवल आज ही के समय में नहीं बल्कि इतिहास में भी कई नारियों ने ऐसी कृतियां पाई है जिसने भारत देश का सर गर्व से ऊँचा कर दिया । झांसी की रानी जैसी बहादुर वीरांगनाओं की जननी है हमारा देश भारत। लेकिन कुछ औरतें समाज के लिए रोग होती हैं। कहते है लोग कि औरतों का दिल कोमल होता है लेकिन.., शायद इसके पास तो दिल है ही नहीं। जिसने कई लोगों का बेरहमी से कत्ल किया। आईपीसी के धारा 300, 302, 350 इसकी गुनाहों की बखान करने के लिए काफी नहीं होगा। इसने एक प्रतिष्ठत महिला परी का कत्ल किया। पुलिसवालों की हत्या की। नेताओं को भी नहीं छोड़ा और फिर यहाँ तक की अपने परिवार वालों को जिंदा जला दिया। इसके अलावा कई निर्दोष लोगों की जान ली है इसने। परी, जिसकी कातिल आज कटघरे में खड़ी है। और यही वजह है कि समाज की सारी स्त्रियां आज क्रांति पर उतर आई हैं। कई सबूत है इसके खिलाफ।"

फिर वकील ने न्यायधीश की अनुमति से अदालत में एक लैपटप मंगवाया और उसमे एक वीडियो जो कि सीसीटीवी रिकॉर्डिंग था, प्ले करके उन्हें दिखाया।

"ये सीसीटीवी रिकॉर्डिंग है जिसमें ये परी का कत्ल कर रही है और उसके बाद उसके चेहरे और शरीर को तेजाब से जला दिया।" वकील ने वीडियो प्ले करने के दौरान कहा।

बिल्कुल उनके कथन के अनुसार ही चित्रित दृश्य लैपटॉप स्क्रीन पर दिख रहा था। पहले तो उस कुरूप लड़की ने परी की गर्दन रेत दी और अगले ही क्षण उसी छुरे को उसके सीने में घोंप दी। और उसे आहिस्ता - आहिस्ता घूमाने लगी ताकि वो दर्द से तड़पे। और जब वो मर गई तो तेजाब को उसके चेहरे और पूरे शरीर पर डाल दिया। उसे लग रहा था कि उस लड़की का कत्ल करते हुए उसे किसी ने नहीं देखा लेकिन उसकी सारी करतूतों को एक गुप्त कैमरा कैद कर रहा था। तेजाब का बोतल वहीं पास में ही फोड़ दी और भाग गई। अपनी कुरूपता को ढकने के लिए जिस रंग का दुपट्टा वो ओढ़े हुए थी उस वीडियो में परी का कत्ल करके भागने वाली लड़की ने बिल्कुल वैसा ही दुपट्टा बिल्कुल उसी अंदाज में अपने चेहरे के ऊपर बाँध रखी थी।

"जाहिर है My Lord कि कत्ल करने की इसकी एक मात्र वजह थी उसकी खूबसूरती। ये कुरूप जो ठहरी। इससे लोगों की सुंदरता देखी नहीं जाती और न जाने इसने परी जैसे कितनी निर्दोष लड़कियों की हत्या की है।"

वकील की दलीलें स्पष्ट कर रही थी उसकी गुनाहों को और अब इंतजार था तो बस जज साहब के फैसले का। कुछ देर तक वो उस लड़की को देखते रहे। शायद इस लिए कि अगर उसने अपनी बचाव के लिए कोई वकील को नियुक्त किया हो तो उसे अदालत में दलील पेश करने को कहे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। अपनी बचाव में उसने कोई वकील नियुक्त नहीं किया था और अभी वो स्तंभित कटघरे में खड़े न्यायधीश के फैसले का इंतजार कर रही थी। उसकी इस व्यवहार ने जज के हृदय में उसके बारे में जानने की उत्सुकता जगा दिया। उन्होंने इस केस के कागजों पर एक नजर डाल कर शायद उसका नाम ढूंढने की कोशिश की लेकिन किसी भी दस्तावेज़ में उसका नाम अंकित था ही नहीं। ये कैसा मुकदमा है कि गुनेहगार का नाम ही ज्ञात नहीं है? और पहली ही सुनवाई में फैसले की घड़ी आ गई?

"नाम क्या है इसका?" उन्होंने उस वकील की ओर देखते हुए पूछा।

"ये कोई नहीं जानता कि ये कौन है और इसका नाम क्या है। और ये कहाँ से आई है। क्योंकि ये किसी को अपने बारे में कुछ भी नहीं बताती। नाम भी नहीं।" यह तथ्य थोड़ा चौंकाने वाला था। यहाँ उपस्थित वो लड़की जो कटघरे में खड़ी थी उसके बारे में किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था। यहाँ तक की नाम भी नहीं।

"कौन हो तुम?" जज साहब ने उस लड़की से पूछा।

बिना उत्तर दिए वो खामोश रही। भले ही कोई कितना ही कुरूप और निराशावादी क्यों न हो लेकिन अपनी जिंदगी से प्रेम तो हर किसी को होता है। लेकिन ये लड़की अपने बचाव में कुछ कहने के बजाय बिल्कुल शांत किसी मूर्ति की भांति खड़ी थी।

"नाम क्या है तुम्हारा?" कुछ सेकेंड के इंतजार के बाद भी जब उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने गुस्से से चिल्लाते हुए उससे पूछा।

"मै, औरत हूं। संस्तरण हूं मर्दों की। बिछावन हूं समाज की। कैदी हूं रिवाजों की। आजादी के सत्तर साल के बाद भी गुलाम हूं मर्दों की। और बंधी हूं समाज की बेड़ियों में।" बिना किसी तरह के भाव को प्रकट किए किसी मूर्ति के समान कटघरे में खड़ी उस लड़की ने उत्तर दिया।

"नाम क्या है तुम्हारा?"

"कितने बताऊं? कई नाम दिए हैं लोगों ने मुझे। कसबिन, कुलटा, और वैश्या।"

"तुम गुनेहगार हो?"

"हुन्न..!"

"क्या गुनाह किया है तुमने?"

"एक औरत के रूप में जन्म लेने की। अपने स्वाभिमान को पाने की। अपनी पहचान पाने की कोशिश किया है मैंने।"

जटिल भाव थे उसकी चेहरे पर। ऐसा लग रहा था कि एक प्रसिद्ध शिप्लपकर के द्वारा बनाई गई मूर्ति वेदनापूर्ण शब्दों में न्यायधीश के प्रश्नों का उत्तर दे रही है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मूर्ति किसी भी तरह के भाव को प्रकट नहीं कर सकती उसकी लाल आँखें भावहीन थे। लेकिन उसके शब्द में छिपी वेदनाएं यहाँ उपस्थित हर किसी के हृदय को टटोलने लगा था और जल्दी ही उन्हें आंसू बहाने पर विवश करने वाला था। क्या थी उसकी कहानी? क्यों थी वो इतनी कुरूप? उसने आगे जो शब्द कहें उसने हर किसी के चेहरे का भाव ही बदल दिया। वो बोली।

"मोहब्बत..! मोहब्बत की थी मैंने। मोहब्बत..!"

एक बार फिर अगले कुछ सेकेंड के लिए अदालत में खामोशी छा गया। उसकी जिंदगी के शब्दकोश में भी मोहब्बत नाम का शब्द अंकित होगा ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। पर ये तो गुनेहगार थी और कुरूप इतनी कि इसे देखने वाला बस इससे घृणा ही करेगा। मोहब्बत नहीं।

"अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती हो?" जज साहब ने प्रश्न किया।

"नहीं..!" कुछ सेकेंड के चुप्पी के बाद उसने उत्तर दिया।

न्यायधीश के इतने प्रश्नों के बाद भी उसके बारे में सबकुछ अज्ञात था और उनका प्रश्न अब भी प्रश्न था। भले ही कोई कितना ही बड़ा गुनेहगार क्यों न हो, उसकी कामना यही होती है कि उसे उस गुनाह की सजा न मिले। वह अपना हर एक संभव प्रयास लगाता है अपना बचाव करने के लिए। लेकिन इस लड़की की फितरत हर किसी को उसके बारे में जानने की उत्सुकता उत्पन्न कर रहा था।

"तुम्हारे दिल में बहुत ही गहरा राज दफन है। तुम्हारे हृदय में वेदनाओ की बस्ती सजी है जो तुम्हारे शब्दों से स्पष्ट हो रहा है। गुनेहगार हो तुम। लेकिन कोई जन्म से ही गुनेहगार नहीं होता। तुम्हें न्याय मिलता।"

"कैसा न्याय?" वो न्यायधीश की बात काटते हुए बोली। "इतना घाव दिया है इस न्याय शब्द ने मुझे कि अब मै तड़प भी नहीं सकती। और अब जरूरत नहीं है मुझे इसकी। मै गुनेहगार हूं। और हर एक इल्ज़ाम कुबूल करती हूं। आप न्यायधीश हो। फैसला करो और मुझे सजा-ए-मौत दो।"

एक अपराधी जिसे न्याय की कामना ही नहीं था और खुद के लिए सजा में मौत माँग रहा था। अजीब था ना? उसके बातों ने जज की ऐसी-तैसी कर दी। वे विचार में पड़ गए कि आखिर ये चीज क्या है? उन्होंने चश्मा उतारा और रुमाल से साफ करके अपनी आँखें पोंछी। फिर चश्मा वापस पहन लिया। उसके गुनाहों से सजा वो दस्तावेज उनके सामने रक्खा था और उसकी गुनाहों को साबित करने वाला सबूत भी। लेकिन कुछ तो ऐसा था जो उन्हें फैसला सुनाने से रोक रहा था।

"मैं मानता हूं कि अदालत सबूत को मानता है जज़्बात को नहीं। हां मैं थोड़ा सा जज्बाती हो रहा हूं क्योंकि तुम्हारी बातों ने मुझे विवश कर दिया है। सारे सबूत भी है और तुमने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया है। लेकिन अपना फैसला सुनाने से पहले मै तुम्हारी कहानी सुनना चाहता हूं। प्लीज मुझे बताओ कि कौन हो तुम?" उन्होंने कहा।

"हक़ीक़त। और कहानी। हक़ीक़त ऐसी है कि किसी को यकीन नहीं होगा और कहानी, कहानी लगेगा। आपने तो बिल्कुल सही कहा कि कोई जन्म से ही गुनेहगार नहीं होता। लेकिन मै थी। मै तो बदनसीबी के साथ पैदा हुई हूं और किस्मत का खेल तो देखिए कि आज मै अपनी ही कत्ल की सजा पाने के लिए कटघरे में खड़ी हूं।"

उसकी ये बात सबके जहन में उथल-पुथल मचा गई। यह किसी फिल्म के कहानी की तरह बनावटी लग रही थी जिसपर विश्वास कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है लेकिन शायद यही सत्य था।

"वाह..! क्या दिमाग पाया है तुमने।" वकील ने ताली बजाते हुए कहा "जैसे कि यह कोई फिल्म की कहानी हो।"

"कहानी..!" वो हंसी और अपने चेहरे पर से दुपट्टा हटाई। "आज तो यही कहानी है। एक कुरूप लड़की की कथा जो केवल मनोरंजन का एक साधन थी लेकिन कोई कल्पना नहीं.., फिल्मों की तरह। परी, परी रक्खा था मेरे पिता ने नाम मेरा। उनकी लाड़ली थी। पर, उन्होंने जताया नहीं।"

"इसीलिए तुमने अपने पिता को मार डाला क्योंकि एक बेटी के रूप में तुम्हे वो स्नेह नहीं मिला जो तुम उनसे पाना चाहती थी। कुरूप हो ना? कैसे जताते अपना स्नेह?" वकील के तीखे सवालों से बेशक उसका कलेजा छलनी होने लगा था। लेकिन इसका प्रभाव उसकी आँखों में व्यक्त नहीं हो रहा था क्योंकि पहले से ही उसके दिल में अनगिनत छेद थें।

"एक लड़की होने का गुनाह और उसकी सजा थी वो। एक स्त्री होने की गुनाह में मैंने जो पाया है ईश्वर किसी को वो नाम न दे। कितनी उलझी सी है कहानी मेरी! जिंदगी की हर खुशी, हर चाहत खो दी मैंने। अपनी स्वाभिमान पाने की कोशिश में मैंने अपनी पहचान खो दी। इतना नोंचा है मेरे जिस्म को उन दरिंदों ने कि जख्म सिर्फ मेरे जिस्म पर नहीं, रूह पर भी गहरे हैं।" इतना बोलने के बाद उसने उस कम्बल को अपने जिस्म से हटा दिया जो वो ओढ़े हुई थी।

उसके हाथों पर और पीठ पर ऐसे घाव थे मानों किसी ने उसके जिस्म से चमड़ों को नोंच डाला हो।

"ईश्वर की रचना बहुत ही खूबसूरत है। अद्भुत है। लेकिन मेरी इस रूप को उस ईश्वर ने नहीं रचा। एक-एक करके मैंने इतना खोया है कि कुछ और बचा नहीं खोने को। इतना दर्द है मेरे दिल में, मेरी रूह में, कि आंसू बचा नहीं रोने को। मैं छोटी थी और मेरी बड़ी बहन सुलेखा मुझे बहुत प्रेम करती थी। हमारे गाँव में जो सरकारी मिडिल स्कूल है, जिसमें हम दोनों पढ़ने जाते थे। उस वक़्त मै चौथी में पढ़ती थी और वो छठी में।" उसने बोलना जारी रक्खा।
 
अध्याय तीन

गर्मी का मौसम और मई-जून का महीना। गर्मी की वजह से स्कूल का टाइम मॉर्निंग हो गया था। सुबह छः बजे से ग्यारह बजे तक ही विद्यालय चलता था।

आज सुबह नीलिमा व्यस्त थी। घर के अन्य कार्यों को छोड़कर सबसे पहले उसने नाश्ता बना दिया ताकि सुलेखा और परी भोजन करके जल्दी से स्कूल चली जाएगी। उसने दोनों के लिए भोजन परोसा और थाली लेकर आंगन में गई।

"सुलेखा! परी! बेटा आओ और खाना खा लो।" थाली को नीचे रखते उसने उन दोनों को बुलाया। और चापाकल से पानी भरने लगी।

"आईं माँ ।" परी ने उत्तर दिया।

एक कमरे में परी एक आईना लिए बैठी थी और खुद को उस आइने में देख रही थी। क्योंकि उसकी बड़ी बहन सुलेखा उसकी चोटी बना रही थी। उसके बालों को बालों संग पिरोया और फिर अंततः एक रबड़ लगा दी ताकि चोटी खुल न जाय।

"लो हो गया। चलो जल्दी। अगर लेट हुई ना तो मास्टर जी के डंडे खाने पड़ेंगे।" बोलते हुए सुलेखा उठी और बिस्तर पर से अपना बैग उठा ली।

परी ने एक बार अपना चेहरा आइने में अच्छी तरह से देखी और पुष्टि की कि चोटी अच्छी तरह से बनी है या नहीं। लेकिन यह बिल्कुल ठीक था। उसकी खुद की छवि ने उसका ध्यान आकर्षित कर लिया और अगले कुछ सेकेंड तक अपनी छवि को आइने में निहारते रही।

"चल ना। आज तो तू पक्का पिटवाएगी।" सुलेखा बोली।

सुलेखा के कहने के बाद उसने आइने को बिस्तर पर रख दिया और उसने भी अपना बैग उठा लिया। शायद यह थोड़ा सा भारी था लेकिन उसने इसे बहुत ही आसानी से उठा लिया। अपने - अपने बैग उठा कर दोनो आंगन की ओर भागी। वक़्त से पहले विद्यालय पहुँचने की जल्दी में वह बिना आंगन में रुके मुख्य दरवाजे की ओर भागी। नीलिमा ने उन्हें रोका।

"अरे रुको। खाना खा कर जाओ।"

"माँ लेट हो जाएगा।" सुलेखा बोली।

"और मास्टर जी मारेंगे।" परी ने वाक्य को पूरा किया।

"तो किसने कहा पाँच मिनट और सोने को? पाँच मिनट कह कर एक घंटा सोई रही।" नीलिमा बोली।

"माँ ..!"

"मैं कुछ नहीं जानती। चलो आओ और खाना खाओ।" नीलिमा ने स्पष्ट कह दिया ।

अब उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। और गलती तो दोनों की ही थी। नीलिमा ने तो उसे वक़्त पर जगाया था लेकिन पाँच मिनट और सोने की आलस में एक घंटा तक सोते रह गई दोनों बहनें। काम में व्यस्त होने की वजह से नीलिमा दुबारा दोनों को जगा भी नहीं पायी। दोनों खाना खाने के लिए बैठी। जल्दी - जल्दी खाना खाई और स्कूल को भागी।

गर्मी के मौसम में भी खेत लहरा रहे थे मक्के की फसल की हरियाली से। विद्यालय जाने का मार्ग उन्हीं खेतों से होकर जाता था और यह उसकी घर से करीब आधे किलोमीटर ही दूर था। एक दूसरे का हाथ थामे दोनों बहने विद्यालय को भागे जा रही थी। बड़ी होने की वजह से सुलेखा थोड़ी और तीव्र गति में दौड़ सकती थी लेकिन ऐसा करने से उसकी छोटी बहन अकेली पड़ जाती। और अगर वह वक़्त पर विद्यालय पहुँच गई और कहीं परी लेट हो गई तो संभव था कि मास्टर जी उसे दण्डित करते। ऐसा वो बिल्कुल नहीं चाहती थी। क्योंकि अपनी छोटी बहन से वह इतना प्रेम करती थी कि इसकी व्याख्या करने के लिए शब्दकोश के सारे शब्द भी कम पड़ जाएंगे।

भले ही थोड़ी देर हो जाए लेकिन दोनों बहनें एक साथ विद्यालय जाती थी और जब मास्टर जी वजह पूछते थे तो सुलेखा विलंब से पहुँचने का सारा आरोप खुद पर लेकर परी को पीटने से बचा लेती थी।

विद्यालय गाँव के अंत छोर पर स्थित था जो ग्रामीणों के घरों से लगभग कुछ ही मीटर की दूरी पर था। एक छोटी सी उपनदी के समीप स्थित विद्यालय में आसपास के पाँच से छह गाँव के विद्यार्थी अध्ययन करने आया करते थे। हालाकि यह कोई नदी नहीं था क्योंकि इसमें केवल बरसात के दिनों में ही वर्षा की पानी ही इकठ्ठी रहती थी उसके अलावा यह हमेशा सूखी ही रहती थी। अतः इसे हम सिर्फ एक जलाशय भी कह सकते है लेकिन सब इसे नदी ही कहते थे।

जब वे विद्यालय पहुँची तो प्रार्थना करने के लिए सारे विद्यार्थी परिसर में कतारबद्ध खड़ा ही हो रहे थे। अभी ज्यादा विलंब नहीं हुआ था। फुर्ती से भागते हुए दोनों ने अपने - अपने बैग को क्लासरूम में रख दिया और बिना विलंब किए कतार में शामिल हो गए।

"बच गई आज।" परी अपने मन ही में बोली।

विद्यालय के बहुत बड़े परिसर में उस विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे सैकड़ों विद्यार्थी सुबह की प्रार्थना करने के लिए कतारबद्ध खड़े थे। क्योंकि आज शनिवार था इसलिए रूटीन के अनुसार प्रार्थना का आरंभ गायत्री मंत्र से किया गया।

ॐ भूर् भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्…

अर्थ:- उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप, परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।

गायत्री मंत्र के उच्चारण के बाद फिर सरस्वती वंदना किया गया।

हे शारदे माँ , हे शारदे माँ

अज्ञानता से हमें तार दे माँ ..

प्रार्थना समाप्त होने के बाद सभी विद्यार्थी अपने - अपने कक्षा में जाकर बैठें। परी जो अपने वर्ग में दूसरे बेंच पर बैठा करती थी हर दिन की तरह वहीं बैठी। सुलेखा भी अपने वर्ग में थी। अब वक़्त हो गया था मास्टर जी के वर्ग में आगमन का। दिखने में तो वो इतने खडूस नहीं थे जितने वास्तव में वे थे। विद्यार्थियों को दण्डित करने में तो शायद उन्हें आंनद मिलता था तभी तो वो हर किसी को दण्डित करने के लिए बहाने ढूंढ़ते रहते थे। अंग्रेजी का विषय कौन पढ़ना चाहता है? अगर एक विद्यार्थी से पूछें तो उसकी रुचि किसी भी विषय के अध्ययन में नहीं होता। उन्हें तो बस आजादी चाहिए होता है ताकि अपने मित्रों के साथ वे पूरा दिन खेल सकें। लेकिन यह तो बस एक ख्वाइश है।

उन्होंने पिछले क्लास में कुछ मीनिंग्स दिए थे याद करने के लिए और कुछ और होमवर्क भी। वैसे तो क्लास में आने के बाद सब विद्यार्थी एक दूसरे के साथ तब तक मस्ती करते हैं जब तक की टीचर क्लास में न आ जाएं। लेकिन इस क्लास की ना बात ही कुछ और थी। अंग्रेजी के वर्ड्स को याद करना तो ठीक था, कुछ देर तक रटने के बाद याद हो जाते थे लेकिन जैसी ही मास्टर जी के सामने जाते थे सब स्वाहा हो जाता। लेकिन परी के साथ ऐसा नहीं था। वो तो बहुत ही तेज स्टूडेंट थी। और मास्टर जी के दिए गए वर्क से ज्यादा ही कर देती थी। और यही वजह था कि आज तक किसी भी टीचर ने उसे कभी दण्डित नहीं किए थे।

लेकिन सुलेखा बिल्कुल ऐसी ही थी। पढ़ने में उसका मन जरा सा भी नहीं लगता था और अगर उसका बस चलता ना तो वो कभी स्कूल आती ही नहीं। ये तो राघव का भय था और क्लास के कुछ दोस्त कि उसे स्कूल आना पड़ता था। लेकिन स्कूल आने की उसकी सबसे बड़ी वजह थी उसकी छोटी बहन परी।

क्योंकि अभी सत्र का आरंभिक दौर ही था टीचर्स स्टूडेंट्स को होमवर्क देने का कोई कसर नहीं छोड़ते। परी ने तो सारे वर्ड मीनिंग फटाफट सुना दी।

लेकिन सुलेखा की हालत खराब हो गई थी। विज्ञान का विषय था और मास्टर जी ने कुछ प्रश्नों के उत्तर याद करने के लिए दिए थे सब को। शायद यह उसकी बदकिस्मती ही थी कि मास्टर जी ने सबसे पहले उन प्रश्नों का उत्तर पूछने के लिए उसे ही खड़ा किया।

मास्टर जी :- अच्छा, तुम बताओ कि प्रकाश संश्लेषण क्या होता है?

पूरे क्लासरूम में बिल्कुल ही सन्नाटा छाया हुआ था। मास्टर जी थोड़े सख्त थे इसलिए बिना उनकी अनुमति के किसी भी विद्यार्थी को उनके सामने एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं होती थी। कल रात ही में तो पढ़ी थी उसने इस प्रश्न और इसके उत्तर को। उस वक़्त तो उसने परी को बेझिझक उत्तर बता दिया थे लेकिन अब जब मास्टर जी पूछ रहें है तो पता नहीं उत्तर याद क्यों नहीं आ रहा है।

अगले कुछ सेकेंड तक वह चुपचाप प्रश्न का उत्तर सोचती रही।

"याद नहीं है क्या?" मास्टर जी पूछें।

"किया था। अभी बताती हूं।" सुलेखा भयभीत शब्दों में उत्तर दी। प्रश्न का उत्तर नहीं देने पर मास्टर जी पीटेंगे और गलत उत्तर देने पर तो अवश्य पीटेंगे।

पढ़ाई में तो सुलेखा का तनिक भी मन नहीं लगता था लेकिन जो भी होमवर्क मास्टर जी देते थे, परी उसे बना देती थी। यह उसकी प्रबल स्मरण शक्ति का ही कमाल था कि चौथी कक्षा में होने के बावजूद वो अपनी बड़ी बहन जो छठी में थी, की होमवर्क बड़ी ही आसानी से कर देती थी।

वह अभी प्रश्नों का उत्तर सोच ही रही थी कि मास्टर जी ने प्रश्न किया कि तुमने होमवर्क तो कंप्लीट किया है ना?

"हनन..!" वह हां बोलकर उत्तर देना चाहती थी लेकिन भयभीत होने की वजह से शब्द उसके होंठों से जाहिर नहीं हुए। इसलिए उसने सिर्फ हां में सर हिलाया।

"दिखाओ।" उन्होंने कॉपी माँगी।

बस्ते से होमवर्क वाली कॉपी निकाल कर सुलेखा ने कॉपी मास्टर जी के हाथों में दिया। उन्होंने प्रश्नों का उत्तर ध्यान से जांचा। सारे बिल्कुल सही थे। उन्होंने उसकी ओर देखा। वो अब भी उसी प्रश्न का उत्तर याद करने की कोशिश कर रही थी लेकिन याद नहीं कर पा रही थी।

"अच्छा रहने दो। दूसरा प्रश्न है। तुम इसका उत्तर दे दो।" मास्टर जी बोलें।

मूर्ति की तरह खड़ी सुलेखा डर से कांपने लगी थी लेकिन वह इसे जाहिर होने नहीं देना चाहती थी। हां में सर हिलाकर उसने अपनी स्वीकृति दी। उन्होंने कॉपी का पन्ना उल्टा और एक प्रश्न का चुनाव करते हुए सुलेखा से अगला प्रश्न किया।

"अच्छा तो तुम ये बताओ कि तुम पदार्थ के बारे में पढ़ा है?" उन्होंने पूछा।

"जी।" उसने उत्तर दिया।

"याद है?"

"जी हां।"

"चलो बताओ कि पदार्थ किसे कहते है?"

"वह पदार्थ जो स्थान..." सुलेखा उत्तर देने लगी कि मास्टर जी ने टोका।

"पदार्थ..?"

"नहीं।"

"तो?"

उसे इस प्रश्न का भी उत्तर ठीक से याद नहीं था। इसलिए वह सोचती रह गई। एक भी प्रश्नों का सही उत्तर नहीं देने के कारण मास्टर जी डंडे मारकर उसकी हथेलियां लाल कर दी। वो रोने लगी। रोते देख मास्टर जी ने पीटना छोड़ दिया।

"बैठो और कल याद करके आना।" उन्होंने कहा।

लंच में सारे स्टूडेंट विद्यालय के परिसर में खेलने के लिए निकले लेकिन सुलेखा कक्षा में अकेली बैठी किताब खोलकर रोते हुए उन्ही प्रश्नों का उत्तर याद कर रही थी जिसकी वजह मास्टर जी ने उसकी हथेलियों को लाल कर दिया था।

लंच में अक्सर परी सुलेखा का इंतजार पीपल के जड़ के पास बैठ कर करती थी और जब वो आती तो वहीं पर बैठ कर दोनों साथ ही में लंच करती। लेकिन आज जब बहुत देर इंतजार करने के बाद भी सुलेखा बाहर नहीं आईं। परी ने विद्यालय के परिसर में उसकी क्लास की छात्र एवं छात्राओं को घूमते हुए देखा। तब उसने फैसला किया कि अब वो उसकी क्लास में जाएगी उसे देखने के लिए।

वो उसकी क्लासरूम में भागते हुए प्रवेश की और फुर्ती से उसके पास में बैठ गई। उसकी नजर उस किताब पर पड़ी जिससे सुलेखा प्रश्नों का उत्तर याद करने की कोशिश कर रही थी।

"दीदी, ये तो तुम्हें याद था ना?" उन प्रश्नों पर एक नजर फेरते हुए परी बोली जिसे वह याद करने का प्रयास कर रही थी।

बिना उत्तर दिए सुलेखा किताब पर छपे काले शब्दों को देखती रही। पीड़ा के कारण वह किताब को ठीक से पकड़ भी नहीं पा रही थी और अगले ही पल आंसू की धार उसकी आँखों से उमड़ पड़ी। वह रो रही थी और उसकी दोनों हाथ थर-थर कांप रहे है जैसे कि ठंड के मौसम में वह बिना स्वेटर पहने ही स्कूल चली आई है।

उसकी हाथ से किताब लेकर डेस्क पर रख दी और उसकी मुठ्ठी को खोली। उसकी हथेली बिल्कुल ही लाल थी और डंडे के निशान स्पष्ट छपे दिख रहे थे।

"मास्टर जी बहुत बुरे हैं। पर दीदी तुम्हें तो सब याद था ना? रात को तो तुम सारे प्रश्नों का जवाब बिल्कुल सही सही दे रही थी। तो क्यों मारा तुम्हें मास्टर जी ने?" परी पूछी।

"भूल गई थी। मुझे बहुत डर लगता है उनसे।" सुलेखा उत्तर दी।

छुट्टी के बाद दोनों घर पर थी। डंडे की चोट लगने की वजह से सुलेखा के हाथ में सूजन आ गया था और अब उससे घर का कोई काम भी नहीं किया जा रहा था। ऊपर से मास्टर ने साफ कह दिया था कि कल फिर से वे सारे प्रश्नों का उत्तर पूछेंगे और यदि कल फिर वो उत्तर नहीं सुना पाई तो आज से ज्यादा पीटेंगे।

स्कूल से घर जाते समय वह पूरे रास्ते रो रही थी और ऊपर से उसकी कुछ सहेलियां जो इस बात को लेकर उसका मजाक बना रही थी। पढ़ाई करना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं था लेकिन स्कूल जाना और मास्टर जी से मार खाना ही शायद उसकी किस्मत थी।

पानी में नीम के कुछ पत्तियों को उबाल कर नीलिमा चोट वाले अंग पर वाष्प की गर्माहट दे रही थी ताकि यह जल्दी ठीक हो जाय। वह उसका उदास चेहरा बिल्कुल भी नहीं देख सकती थी और परी को देखकर तो ऐसा लग रहा कि भले ही चोट सुलेखा के हाथों पर थी लेकिन दर्द उसे हो रहा हो।

"लेकिन दीदी को सबकुछ याद तो था फिर कैसे भूल गई? रात में तो तुमने मुझे सारे प्रश्नों के उत्तर फटा-फट बता दी थी?" परी सुलेखा को प्रश्न भरे नज़रों से देखते हुए पूछी।

शाम होने को था और राघव खेत के कुछ काम निपटा कर अभी घर पर आया कि उसने देखा कि सुलेखा रो रही है और नीलिमा उसके हथेलियों पर मरहम का लेप लगा रही है।

"आज क्या हुआ इसे? गिर गई थी क्या कहीं पर?" राघव भीतर प्रवेश करते हुए पूछा।

"नहीं बापू। मास्टर जी ने आज फिर से पीटा है दीदी को।" परी ने उनकी ओर देखते हुए उनके प्रश्न का उत्तर दिया।

राघव घर में प्रवेश करते ही सीधा आंगन में चपाकल के पास गया और हाथ-मुंह धोने लगा। "क्यों मारा आज?" बाल्टी से पानी निकालकर अपने चेहरे पर छिड़कते हुए उसने पूछा।

"बापू, मुझे सब याद था.. लेकिन मास्टर जी के सामने सबकुछ भूल गई। आप कहो तो मैं अभी सबकुछ सुना दूं।" सुलेखा बोली। "बापू। मुझे नहीं जाना है स्कूल पढ़ने के लिए।" डरते हुए उसने अपना निर्णय अपने पिता के सामने रख दिया।

यह बोलने के बाद वह सोचने लगी कि कहीं अब बापू उसकी पिटाई न कर दें। वह उसे शिक्षित बनाना चाहते थे और उसके पिता तो सबसे अलग थें। बहुत सारे लोग तो यह कहते हैं कि बेटी को पढ़ाने की क्या आवश्यकता है? लेकिन फिर भी लोगों की बातों और फिजूल की सलाहों को अनदेखा करते हुए वह उसे पढ़ाना चाहते हैं, क्योंकि शायद वह अशिक्षित होने के दुर्भाग्य से पीड़ित थे और अपने संतानों को इस पीड़ा में बिल्कुल भी देखना नहीं चाहते थे। लेकिन सुलेखा का मन पढ़ाई में नहीं बल्कि सिलाई - कढ़ाई में लगता था।और इस तरह के कलाओं को वह अतिशीघ्र सीख जाती थी। और चित्रकारी में तो उसके मुकाबले का कोई था ही नहीं। बस कुछ सी समय में वह वस्तुओं की स्पष्ट चित्र बना देती थी और जिसे देखकर ऐसा लगता था कि यह कैमरे से खींची गई है।

डरते हुए उसने तो अपना निर्णय बापू को बता दिया। जिसपर राघव का प्रतिक्रिया अजीब थी। शायद वह जो चाहता था वह संभव नहीं था लेकिन अपनी कामना पूरी करने के लिए वह अपनी ही बेटी पर दबाव डाले: हालाकि यह ख्याल उसके जहन में आ रहा था और वह उसे उसकी इस उद्दंडता के लिए डांटना और पीटना भी चाहता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और बिना कुछ बोले ही अपने कमरे में चला गया।

कुछ शब्दों से निर्मित सुलेखा के एक वाक्य ने राघव को नाराज कर दिया था लेकिन उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि इस बात के लिए वह उनके पास जाकर उनसे माफी माँ गे। अब क्या होने वाला था और अब राघव की प्रतिक्रिया कैसी होने वाली थी, कोई नहीं जानता था लेकिन सुलेखा सोचने लगी कि उसके पिता कमरे के भीतर से छड़ी लाने गए हैं ताकि वह उसकी इस दुस्साहस के लिए उसे दण्डित कर सकें। और यह ख्याल उसकी धड़कन की गति को बढ़ाने लगा।

नीलिमा उठी और राघव के कमरे में गई ताकि वह राघव के गुस्से को शांत कर सके। राघव कमरे में बैठा हुआ था और गुस्से का भाव उसके चेहरे पर स्पष्ट था। शायद उसके जहन में विचारों के मध्य घमासान युद्ध चल रहा था कि सुलेखा की इस उद्दंडता भरे निर्णय को सुनकर वह क्या निर्णय ले जो सभी के लिए बेहतर होगा। तभी नीलिमा भी कमरे में चली आई। उसके कंधे पर हाथ रखते हुए उसके समीप बैठ गई और बोली कि मैं रोज अपनी बेटी को रोते हुए नहीं देख सकती।

नीलिमा की बात सुनकर राघव ने उसकी ओर देखा। वह भावुक थी और उसका तर्क सुलेखा की निर्णय को समर्थित कर रहा था।

"मैं भी। और इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि इस बारे में मैं एक बार मास्टर जी से बात करूंगा।"

"उनसे क्या बात करेंगे आप?" उसके इस निर्णय के अर्थ को वह ठीक से समझ नहीं पाई और अचंभित होते हुए उससे पूछी।

उसी दिन सूर्यास्त से बस कुछ देर पहले ही राघव मास्टर जी के घर पर उनसे मिलने गया। अपने निर्णय के अनुसार एक बार उनसे बातचीत करने आया था। मास्टर स्कूल में पढ़ाने के साथ ही कुछ बच्चों को विशेष रूप से पढ़ाते भी थें लेकिन राघव के आने से पहले ही उन्होंने सभी विद्यार्थियों को छुट्टी दे दिए थे।

"प्रणाम मास्टर जी।" बोलते हुए वह उनके ओर कुछ और कदम बढ़ा।

"प्रणाम। प्रणाम। आओ राघव। बोलो कैसे आना हुआ?" मास्टर जी और राघव के मध्य बहुत समय से लगाव था। मास्टर जी के बहुत सारे खेतों में राघव एक मजदूर के रूप में कार्य किया करता था और साथ ही साथ घर पर भी कोई ऐसा काम राघव के लिए होता था तब वह उसे बुलाते थे और समय पर मजदूरी भी देते थे।

वैसे तो उस विद्यालय में पढ़ाने वाले अन्य सभी शिक्षक क्षेत्र के अन्य हिस्सों से प्रतिदिन आते थे लेकिन विज्ञान पढ़ाने वाले ये मास्टर जी इसी गाँव के निवासी थें जिन्होंने सुलेखा को पीटा था। अचानक से राघव के आने की वजह तो उन्हें ज्ञात नहीं था और उन्हें अच्छी तरह से यह याद था कि उन्होंने राघव को नहीं बुलाया था। ना ही अभी उनके पास उसके लिए कोई काम है और उसकी जो भी मजदूरी बनती थी उन्होंने उसकी भरपाई भी कर दी थी, तब यह अचानक से यहाँ पर क्यों आया है? - वे मन ही मन विचार कर रहे थे।

राघव उनके पास गया लेकिन उनके कुछ कदम पीछे ही खड़ा रहा।

"वो मास्टर जी.. मेरी बेटी सुलेखा..." राघव ने अभी अपना वाक्य पूरा नहीं किया था कि मास्टर जी उसके बात को काटते हुए बीच में बोल पड़ें।

"थोड़ा ध्यान दिया करो उसपर... पढ़ने में एकदम कमजोर है। जो होमवर्क देता हूं वो तो सही - सही बना लेती है लेकिन जब कुछ पूछता हूं तो कुछ नहीं बताती।" उन्होंने सुलेखा की स्थिति राघव के सामने स्पष्ट कर दी।

"जी मास्टर जी। लेकिन आजकल बेटियों को कौन पढ़ाता है? लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि थोड़ी बहुत पढ़ लेगी और उसके बाद फिर एक अच्छा लड़का देखकर उसकी शादी करा दूंगा। कोई मेरी बेटी को अंगूठा छाप तो नहीं कहेगा। लेकिन..." कहते हुए वह संकोच करने लगा। क्योंकि परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि उसकी बेटी स्वयं पढ़ने के लिए इच्छुक नहीं थी बल्कि वह कढ़ाई - बुनाई जैसी चीजें सीखना चाहती थी। हां, इसमें कोई बुराई नहीं था लेकिन राघव चाहता था कि आठवीं के बाद वह ये सब सीखे।

"ये बात तो तुमने सौ फीसदी सही कही राघव। बेटियों को पढ़ाना बहुत ही अनिवार्य है। बेटियां तो चिराग होती है, जो अगर शिक्षित हो तो आने वाली कई पीढियों को रौशन कर देती है। लेकिन समस्या यह है कि लोग बेटियों को पढ़ाना ही नहीं चाहते। लेकिन मुझे तुम पर गर्व है राघव। तुम अपनी दोनों बेटियों को खूब पढ़ाना और उन्हें शिक्षित बनाना।" उन्होंने कहा।

"वो तो है मास्टर जी। लेकिन मेरी बड़ी बेटी सुलेखा आज मुझसे कह रही थी कि वो पढ़ना नहीं चाहती। वो कह रही थी कि मैं उसका पढ़ाई छुड़ा दूं और स्कूल से नाम कटा दूं।"

"लेकिन क्यों राघव?" मास्टर जी ने आश्चर्य से पूछा।

"वो आपसे बहुत डरती है। मैं आपसे विनती करने आया था कि कृपया कर उसे पिटिएगा मत। मैं चाहता हूं कि वह कम से कम आंठवी तक पढ़ ले। लेकिन जिस तरह से आप याद न करने पर पीटते हैं, शायद इसी कारण से वह पढ़ने से इंकार कर रही है।" राघव ने स्पष्ट किया। "अब वो बड़ी हो गई है और मै सोच रहा हूं कि अगले वर्ष उसका विवाह कर दूं। लेकिन तब तक वह स्कूल में कुछ ना कुछ पढ़ने के लिए सीख ही जाएगी।" उसने बात पूरा किया।

उसके बात पर मास्टर जी कुछ देर तक मन ही मन में कुछ विचार करने लगें।

"अच्छा ठीक है राघव। जैसा तुम कहो। अब मै उसे कभी नहीं पीटूंगा बल्कि प्यार से समझाऊंगा। मुझे विश्वास है कि फिर उसका मन पढ़ाई में लगने लगेगा। आखिर वह भी तो मेरी बेटी जैसी ही है।" हंसते हुए उन्होंने बात पूरा किया।

राघव के जहन में जो आया उसने वो कर दिया। संभव था कि अब सुलेखा की रुचि पढ़ाई में जाग जाए। वैसे तो अब वह बारह की हो गई थी लेकिन उस समय में इस उम्र में ही लगभग सभी लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। खास करके इन ग्रामीण क्षेत्रों में। राघव अभी से तैयारी में जुट गया था। समय से ज्यादा काम करना ताकि मजदूरी के रूप में कुछ ज्यादा धन अर्जित हो जाय। किस्मत में गरीबी के कैद में ही संघर्ष करना लिखा हुआ था, तभी तो वह बचपन से ही जानवरों की तरह कठिन परिश्रम करता आया था। और अभी उसे और ज्यादा ही मेहनत करना था।

रविवार होने की वजह से स्कूल में तो छुट्टी था लेकिन घर पर बहुत ज्यादा काम। सुबह से सभी सदस्य बिल्कुल ही व्यस्त थे। राघव अपने पिता के साथ सूर्योदय से पहले ही खेत चला गया था और दोनों बहनों को दलान में रहने वाले दोनों गायों को अच्छी तरह से धोने का और उन्हें भोजन कराने का कार्य सौंपा गया था। नीलिमा अपनी सास के साथ घर के कार्यों में व्यस्त थी।

कुएं से पानी खींचकर सुलेखा बछड़े के पास गई। उन्होंने अब तक एक गाय को अच्छी तरह से धो दिया था और उसे चारा भी दे दिया था और वो भोजन करने में व्यस्त थी। अब बारी थी उस बछड़े को धोने की जो सिर्फ दस दिन का ही था। बहुत ही प्यारा, काले - भूरे रंग का।

"दीदी, मुझे लगता है कि हमें इसका एक अच्छा सा नाम रखना चाहिए।" बछड़े के कंधे पर हाथ सहलाते हुए परी बोली।

"लेकिन क्या?" सुलेखा उसकी बात पर सहमत थी लेकिन उसके पास बछड़े को पुकारने के लिए कोई बेहतर नाम का सुझाव नहीं था।

परी विचार करने लगी। और सुलेखा बछड़े की पीठ पर पानी डालकर उसे धोने लगी। लेकिन इससे पहले कि परी के जहन में उस बछड़े के लिए नाम का कोई बेहतर सुझाव आता नीलिमा ने उसे बुलाया।

"आ रही हूं माँ ..!" बोलते हुए वह घर की ओर भागी जो दलान के बिल्कुल ही पास में था। सूर्य की रौशनी तेज थी और दिन थोड़ा गर्म। हालाँकि अभी दोपहर तो नहीं हुआ था लेकिन नीलिमा ने परी को राघव और उसके पिता के लिए भोजन लेकर जाने के लिए बुलाया था।

एक पोटली में कुछ गर्म रोटियां और सब्जी बाँध कर नीलिमा ने सुलेखा की ओर बढ़ाते हुए बोली कि अच्छे से ले जाना। और पानी भरा हुआ एक बर्तन परी को दे दी। दोनों बहनें भोजन और पानी लेकर खेत की ओर ही जा रही थी। खेत थोड़ा दूर था और धूप तेज, लेकिन दोनों कहीं रुक भी नहीं सकते थे क्योंकि वे जानते थे कि देर से पहुँचने पर दादा जी बहुत क्रोधित होंगें।

खेतों में हरियाली थी क्योंकि इनमें मक्के जैसे कई फसल लगाए गए थे। कुछ किसान सिंचाई में व्यस्त थे तो कुछ फसल की निगरानी करने में। तो कुछ खेत के किनारे पर बैठ कर भोजन कर रहे थे।

जब दोनों दादा जी के पास पहुँची तो देखी कि वे सो रहें है और राघव नहीं है। खेत के पास ही एक बहुत बड़ा पीपल का वृक्ष था उसी के नीचे। मक्के का फसल लहलहा रहे थे। दोनों दादा जी के पास गई।

"दादा जी.." परी उन्हें बस एक ही बार पुकारा कि वो उठ बैठे। उसने उन्हें पानी दिया और सुलेखा भोजन परोसने लगी। हाथ - मुंह धोने के बाद वे बैठ गए और सुलेखा ने थाली उनके सामने रख दिया। वो अब भी अपने बाबा को ढूंढ रही थी।

"वो बाजार गया है। वहीं खा लेगा।" दादा जी ने राघव के बारे में बताया ताकि वो उसे ढूंढना बंद कर दे।

मक्के के पौधों में फल निलक आए थे और परी का मन भुट्टा खाने का करने लगा। इसलिए उसने अपने दादा जी से भुट्टा खाने की इच्छा जाहिर करी।

दादाजी अभी निवाला बना कर खाने ही वाले थे कि परी बोली कि दादाजी मुझे भुट्टे खाने है। हालाँकि परी के जन्म को आज लगभग दस वर्ष हो गए थे लेकिन कड़वाहट अब भी उनके ह्रदय में था। वंश को बढ़ाने के लिए और बुढ़ापे की लाठी के लिए उन्हें जिस सहारे की चाहत थी वह पूरी नहीं हुई थी और उसके बाद ना ही नीलिमा को कोई और बच्चा हुआ। घर में दूसरी बार भी पुत्री के जन्म लेने की वजह से कड़वाहट अब ना ही सिर्फ उनके जुबान का स्वाद बन गया था बल्कि उनके शरीर में रक्त दौड़ने लगा था। जो निवाला वह खाने वाले थे, गुस्से से उन्होंने उसे थाली में पटक दिया और थाली को दूर फेंकते हुए झल्लाते हुए बोलें कि जा खा ले। जैसे कि तेरी बाप का हो।

उनका कहने का तात्पर्य था कि जिस जमीन पर उन्होंने मक्के की खेती की थी वह उनका अपना नहीं था। और इसलिए मुनाफे का कुछ हिस्सा उन्हें खेत के मालिक को भी देना पड़ेगा। ऊपर से लागत और मेहनत भी इन्हीं की थी। इस अनुसार वह घाटे में जा रहे थे लेकिन अब जब उन्होंने खेती कर ही ली थी तो उनके पास कोई शेष विकल्प भी तो नहीं था। ऐसे में परी का चेहरा तो उन्हें जरा सा भी नहीं भाता था। उन्हें पोते की ख्वाहिश थी लेकिन भगवान ने उनकी झोली में एक नहीं बल्कि दो दो पोतियां दे दिया।

एक लड़की के रूप में जन्म लेने की सजा में परी और उसकी बड़ी बहन को घर में किसी से भी स्नेह नहीं मिलता था। बस उसकी माँ ही थी क्योंकि वह बेटी और बेटे में भेदभाव नहीं करती थी। एक राघव था जो उन्हें स्नेह करना चाहता तो था लेकिन अपने माता और पिता के जिद्द के सामने विवश हो जाता लेकिन जब कभी भी उसे मौका मिलता वह उन दोनों को स्नेह करता था।

बचपना यादगार होने का एक और कारण दादा और दादी के किस्से सुनना भी होता है। लेकिन वो दोनो इस सुख से बंचित थे। लेकिन राघव की माता और पिता पर संतान के रूप में पुत्र की लालसा इतनी थी कि जिसका कोई वर्णन ही नहीं था और इसीलिए तो वह पड़ोस के छोटे बच्चों को अपने पोतियों से ज्यादा स्नेह करते थे। पड़ोस के लड़कों को बहुत प्यार करते थे और कुछ को तो वह खिलौने खरीदने के लिए पैसे भी देते थे लेकिन जब सुलेखा और परी उनसे कुछ माँ गती तब दोनों को बस उनका डांट ही मिलता था।

इस तरह से दादाजी के व्यवहार करने की वजह से परी रो पड़ी थी। सुलेखा ने बर्तनों को समेट लिया और परी को लेकर वापस घर चली आई। जब वह घर पहुँची तब नीलिमा आंगन में बैठी गेंहू से कंकड़ छांट रही थी। पहली नजर में ही उनसे परी का मायूस चेहरा पढ़ लिया और अनुमान लगा ली कि संभवतः हर बार की तरह इस बार भी दादाजी ने ही परी को डांटा होगा। लेकिन फिर भी अपने अनुमान की पुष्टि करने के लिए वह परी से पूछी।

"क्या हुआ मेरी गुड़िया को? मेरी परी रो क्यों रही है?"

सुलेखा बर्तन को चपाकल के पास रखने चली गई और परी नीलिमा के पास जाकर उससे लिपट गई। "माँ , अब से मैं नहीं जाऊंगी दादाजी को भोजन देने।" वह बोली।

"क्या हुआ परी?" नीलिमा ने परी से वजह पूछी लेकिन वह उत्तर देने के बजाय रोटी रही तब उसने सुलेखा से पूछा। "क्या हुआ सुलेखा? दादाजी ने डांटा क्या?"

"हां माँ, उतना बड़ा खेत है। एक दो भुट्टे हम खा लेते तो क्या नुकसान हो जाता? वो बहुत बुरे हैं। हमसे कोई प्यार नहीं करता... सिवाय आपके। मैं भी नहीं जाऊंगी उनके पास।" नीलिमा के प्रश्न का उत्तर देते हुए वह उसके पास आ बैठी।

"वो तो हैं ही खडूस। लेकिन हमें क्यों उदास हो? मैं तुम्हारे बाबू को बुलूंगी भुट्टे लाने के लिए और साथ ने आम भी। फिर खा लेना। चलो अब हंसो। इतनी सी बात पर कौन उदास होता है?" नीलिमा ने दोनों को तसल्ली दी और हंसने को बोली। लेकिन उसकी बात मानी जाएगी या नहीं यह उसे भी नहीं पता था।

"खडूस दादाजी।" बोलते हुए परी खिलखिला उठी। सम्मोहित करने वाला उसका वो मासूम चेहरा जिसपर खिलखिलाती हुई हंसी की लहर दौड़ पड़ी, ने नीलिमा और सुलेखा को भी हंसने पर मजबुर कर दिया।।
 
अध्याय चार

आम का जिक्र करके नीलिमा ने ठीक नहीं किया। क्योंकि भुट्टे खाने की इच्छुक परी के लिए अब रसीले आम का इंतजार करना मुश्किल होने लगा था। दोपहर समाप्त होने के पहले ही दोनों ने निर्णय लिया कि गाँव के बगीचे से जाकर आम चुराएगी और छिपकर खाएगी। लेकिन यह आसान नहीं था क्योंकि एक मोटे शरीर वाला आदमी बगीचे की रखवाली करता था जिसकी बहुत बड़ी-बड़ी मूंछें थी। और जिसके वजह से वह डरावना भी लगता था लेकिन उससे ज्यादा डरावना वह तब लगता था जब उसके हाथ में उसकी वो मोटी लाठी होती थी। लेकिन शरारती स्वभाव वाली परी के लिए उनकी निगरानी करने के बावजूद भी आम तोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती थी।

प्लान के अनुसार उन्होंने आम तोड़ लिया और उस पहरेदार की नजर से खुद को बचाते हुए दोनों बहनें बगीचे से दूर निकल आयी थी। दोनों बहुत खुश थी क्योंकि उन्होंने पर्याप्त फल तोड़ लिया था और पहरेदार को इसका आभास भी नहीं हुआ था। नदी के किनारे स्थित उस नीम के वृक्ष के नीचे बैठ कर दोनों बहने रसीले आम के स्वाद का आंनद ले रही थी। इस दौरान उन्हें समय का बिल्कुल भी आभास नहीं हुआ था। सूर्यास्त होने में बस कुछ ही मिनट बाकि था और इस समय उन्हें गाय को चारा देना होता था। यह बात अचानक से परी को स्मरण आई। वह डर गई क्योंकि वह जानती थी कि अगर समय पर गाय को चारा नहीं मिला तो दादी दोनों को बहुत खरी खोटी सुनाएंगी। लेकिन अभी थोड़ा वक्त शेष था और घर ज्यादा दूर भी नहीं था; लगभग आधा किलोमीटर या उससे कुछ ज्यादा।

"अरे नहीं..!" परी चौंकते हुए बोली। उसके स्वर में दादी का भय था।

"क्या हुआ परी?" लेकिन सुलेखा अब भी रसीले आम को बहुत ही चाव से खा रही थी और वह यह बिल्कुल ही भूल गई थी कि इस समय में उसे गाय को चारा देने का काम सौंपा गया था, जिसे न करने पर दादी के तरफ से सजा मिलना तो तय था।

"गाय को चारा देने का समय हो गया है। कुछ देर बाद दादाजी गाय दुधने आयेंगे।" बोलते हुए परी उठ खड़ी हुई और नदी में ढलान की ओर तेजीसे भागी और फटाफट हाथ धोने लगी।

"परी उससे हाथ मत धो, बीमार पड़ जाएगी। चल घर पर वहीं पर धो लेना।" सुलेखा ने सलाह दिया। लेकिन इसका परिणाम क्या होगा उसने उसकी कल्पना भी नहीं की।

"नहीं दीदी। अगर उन्हें पता चलेगा कि हमने आम चुराया है तो बहुत पीटेंगे।" परी बोली।

दादा और दादी के नफ़रत का सामना करने से तो बेहतर था गड्ढे में जमे हुए उस थोड़े से जल से हाथ धो लेना। और सुलेखा के पास निर्णय लेने का समय भी तो नहीं था क्योंकि गाय को चारा समय पर नहीं पड़ने से वैसे भी उसे दादा और दादी के नफ़रत का सामना करना ही था। लेकिन आम की चोरी की बात उनका गुस्सा बढ़ा सकता था। वैसे भी वे लोग तो बस बहाने ढूंढ़ते रहते हैं उसे और परी को डांटने के लिए।

"क्या सोच रही हो दीदी? जल्दी करो। गाय को चारा भी देना है। नहीं तो दादाजी पीटेंगे। वैसे भी वो हमसे प्यार नहीं करते, दादी भी।" सुलेखा परी के बात पर सहमत थी। बिना वक़्त गवाए उसने भी उसी दूषित जल से हाथ धो लिया और तुरंत घर की ओर भागी।

अपनी क्षमता से ज्यादा तेज भागने की कोशिश करने के बावजूद भी दोनों समय पर घर नहीं पहुँच पाई। सूर्यास्त हो गया था और दलान में बैठी नीलिमा की सास बिना रुके परी और सुलेखा को डांटने के लिए बुलाए जा रही थी। लेकिन दोनों में से किसी के तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं पा कर वह क्रोधित हो रही थी। जब दोनों दलान के समीप पहुँची तो सुनी दादी दोनों को पुकार रही है।

"आई दादी।" दोनों ने एक साथ एक स्वर में दादी को उत्तर दिया। बहुत तेज रफ्तार में भागने की वजह से दोनों हांफ रही थी। लेकिन गहरी सांस लेने के लिए रुकने का समय नहीं था। पता नहीं दादी दोनों को कब से बुला रही थी।

"आज तो पीटना तय है। पहले दादाजी को नाराज किया और अब दादी को।" सुलेखा डरते हुए बोली।

"कोई बात नहीं।" परी के बात में हौसला था और हर तरह की परिस्थिति से लड़ने की शक्ति भी। और शायद वह इसका सामना करने के लिए बिल्कुल तैयार थी। वह दलान के भीतर गई। उसने तय कर लिया था कि आज वह दादी से बिल्कुल भी नहीं डरेगी और उनके सभी प्रश्नों का उत्तर बहुत ही बहादुरी से देगी। सुलेखा उसके पीछे थी।

"क्यों महारानी कहाँ थी? कब से बुला रही हूं तुम दोनों को। क्या करती रहती हो?" दलान में दादी एक खटोले पर बैठी थी और परी को देखते ही उसपर चिल्लाने लगी। हालाँकि परी ने उनके प्रश्नों का जवाब डटकर देने का निर्णय की थी लेकिन इस बार हार गई।

"दादी... वो..." वह कोई अच्छा सा बहाना ढूंढ़ने लगी।

"क्या काम करने को कहा गया था तुम दोनों बहनों को? सूर्यास्त होने से पहले गाय को चारा देना। लेकिन तुम दोनों... जा वहाँ से घास लेजाकर गाय को दे आ। तेरे दादाजी आते ही होंगे।" दादी बोली।

परिस्थिति के अनुसार दोनों ने दादी के जिस स्वरूप की कल्पना की थी, उनका प्रतिक्रिया बिल्कुल ही उसके विपरीत था। शायद चमत्कार था या दोनों कोई स्वप्न देख रही थी। परी दौड़ते हुए घास के ढेर के पास गई और सुलेखा उसके पीछे। सुलेखा ने तुरंत टोकरी को घास से भर दिया और उसे उठा कर गाय के पास चली गई। टोकरी भर घास गाय के नाद में डाल दी और उसे अच्छे से हिलाने लगी।

चारा मिलते ही गाय भोजन करने में व्यस्त हो गई लेकिन जैसे ही उसे बछड़े के आने का आभास हुआ वह राँभाने लगी। हालाँकि बछड़ा अभी दलान से दूर था फिर भी वह अपनी माँ से मिलने के लिए बेचैन था और बिना रुके राँभाये जा रहा था जिसे शायद गाय को बछड़े से मिलने की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। शायद उसका बछड़ा भूखा था। सुलेखा अभी चारा को अच्छी तरह से मिला ही रही थी, गाय ने बछड़े से मिलने की उत्सुकता से रस्सी को झटके से खींचा। फलस्वरूप रस्सी खूंटे सहित खुल गई। क्योंकि अब गाय बिल्कुल आजाद हो गई थी और अब उसे बछड़े के पास जाने से रोकने के लिए कोई बंधक नहीं था वह बहुत तेजी से बाहर की ओर भागी। लेकिन शायद यह सुलेखा का दुर्भाग्य था कि खूंटे से बंधा हुआ गाय का रस्सी उसके पैर से फंस गया और वह गिर पड़ी। ईंट पर अचानक गिरने की वजह से उसका सर फट गया लेकिन गाय को इसका जरा सा भी आभास नहीं था। लेकिन परी जोर से चीख पड़ी "दीदी..!"

सुलेखा भी गाय के साथ घिसटने लगी लेकिन दलान से बाहर निकलने के पहले ही रस्सी उसके पांव से खुल गया था। वह रोने लगी थी। उसे बहुत गहरी चोट आई थी।

गाय को बाहर भागता देखकर दादी उठी और गाय को पकड़ने के लिए वह उसके पीछे भागी। उन्होंने सुलेखा की ओर एक बार भी ध्यान नहीं दिया – जैसे कि सुलेखा यहाँ पर थी ही नहीं।

एक इंसान किसी वस्तु को पाने की ख्वाईश करता है, उसके साथ उसकी भावनाएं इस हद तक जुड़ जाती है कि अगर वह वस्तु उसने न मिले तो संसार की समस्त चीजें उसे व्यर्थ लगने लगती है। वह इतना निराश हो जाता है, वह बेचैन हो जाता है। सत्य ही कहते हैं कि इंसान के समस्त दुखों की वजह चाहत ही होता है। अगर वह इस वस्तु को पाने की चाहत न करता तो उसे उससे मोहब्बत ही नही होती। न ही उसकी उम्मीद टूटती और न ही वह निराश होता। फिर निराशा के दलदल से निकल जाना इतना आसान भी तो नही होता है। उस व्यक्ति या वस्तु की छवि आँखों के सामने चलचित्र की तरह घूमते रहता है। तो फिर वह कैसे उसे भूल सकता है! ऐसी ही निराशा और बुरी सोच के कैद मे जकड़ी हुई थी परी की दादी जिन्हे सुलेखा की चीखें तो सुनाई नही पड़ी लेकिन उन्हे इस बात का भय कहीं ज्यादा ही था कि गाय सारा दूध बछड़े को न पीला दे। इसलिए वह गाय के पीछे दौड़ी। लेकिन अपने मकसद मे नाकाम रही। उन्होने देखा कि गाय बछड़े को दूध पीला रही है और स्नेह से उसके शरीर के कई हिस्सों को चाट रही है।

इस बात पर उन्हें बहुत क्रोध आया। राघव के पिता जी भी कुछ नही कर पाये थे क्योंकि आवेग मे भागते हुए गाय को रोकने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता था। दादी को एक और अवसर मिल गया था अपनी पोतियों को भला बुरा कहने का। सुलेखा जख्मी हो गयी है इसका उन्हे ख्याल भी नही था और यह जानने के बाद भी उनका व्यवहार नही बदला।

जब वह गाय और बछड़े को लेकर दलान वापस पहुँची तो देखी कि सुलेखा का सर फटा हुआ है और नीलिमा जख्म को साफ कर रही है। सुलेखा रो रही है। यह दृश्य देखने के पश्चात राघव की माँ के हृदय में तो जैसे अनगिनत काँटे चुभने लगे। माँ-बेटी के बीच का स्नेह उनसे देखा बर्दाश्त नही होता था। गाय को उसके स्थान पर बाँधने के बाद वह सुलेखा के नजदीक गयी और अपने हृदय में चुभे एक-एक काँटे को निकालकर शब्द रूपी बाण से सुलेखा, परी और नीलिमा पर प्रहार करने लगी।

“और लगा दो मरहम। थोड़ा सा सर क्या फूटा माँ-बेटी का नाटक शुरू हो गया। अच्छी तरह से लगा दो दवाई ताकि घाव के साथ-साथ दिमाग भी ठीक हो जाय इसका। थोड़ा अक्ल आ जाय इसे। काम करते समय न जाने क्या सोचते रहती है? नुकसान कर दिया आज तुम्हारी लाड़ली ने।“

सुलेखा का सर फट गया था। वो जख्मी हो गयी थी लेकिन अब भी उन्हे सिर्फ फायदे और नुकसान की ही पड़ी थी। न जाने कब वो इस पगडंडी का प्रयोग छोड़ कर एक औरत की तरह, एक सास की तरह, एक दादी की तरह सोचेंगी? इस जन्म में तो शायद संभव नही।

“माँ जी, इसे चोट लगी है। खून बह रहा है।“ नीलिमा चाहती थी कि कम से कम इस समय तो वह ऐसा व्यवहार न करे।

“ये मर जाती तो अच्छा होता। कम से कम एक बोझ तो हल्का हो जाता हमारे सर से।“

इतना कठोर। कल्पना करिए यही अगर उनके पोते के साथ हुआ होता। सुलेखा लड़की नही बल्कि लड़का होती। तब नीलिमा की सास का व्यवहार कैसा होता?

दरअसल गाय से प्राप्त होने वाले दूध को बेचकर वे कुछ धन अर्जित कर लेते थे। बछड़े ने तो बस इस शाम का ही दूध तो पिया था इसमें कितना बड़ा नुकसान हो गया लेकिन इतनी छोटी सी बात के लिए उनका गुस्सा आसमान पर था। अगर उनके वश में होता तो शायद वह उन दोनों की हत्या भी कर देतीं। और ऐसा करने का अवसर उन्हे मिले तो उन्हे संकोच करने का प्रश्न नही उठता।

यह रोज का नियम बन गया था और अपनी दोनों पोतियों पर गुस्सा करना उनकी आदत बन गयी थी। जिस दिन वह ऐसा नहीं करती उनका दिन न शुरू होता और न ही खत्म। सुलेखा ने मास्टर जी के यहाँ पर ट्यूशन जाना आरंभ कर दिया था। विधालय से छुट्टी होने के बाद शाम में दो घंटे तक मास्टर जी बच्चों को पढ़ाते थे। परी को ट्यूशन की आवश्यकता नही पड़ती। सुबह जल्दी जागना। फिर स्कूल भागना। दिनभर स्कूल में पढ़ाई करना और फिर घर का काम करना और फिर ट्यूशन जाना। ट्यूशन से आकार रात को पढ़ाई करना और पाठ याद करना। इतने मे ही दोनों का दिनचर्या सिमट गया था।

आज रविवार का दिन है। दोनों बहने सुबह देर तक सो रही थी जोकि दादी से बर्दाश्त नही हो रहा था।

“हाय राम! मेरी तो किस्मत ही फूटी है। भगवान तेरा क्या जाता जो एक पोता दे देता मुझे लेकिन एक नही दो-दो बोझ कंधों पर दे डाला। खुद को महारानी समझती है। आलसी है। काम करने कहो तो नानी मरती है। देखो ना सूर्योदय कबका हो गया है और यह महारानियाँ अभी तक सो रही है। हाय ! क्या करूँ मैं? कोई जानेगा इनके बारे में तो क्या कहेगा? ताने ही देगा हमें और क्या?”

दादी के तीखे शब्दों को सुनकर न चाहते हुए भी दोनों को जागना पड़ा। कल रात को ज्यादा देर तक पढ़ाई करने की वजह से अभी उन्हे नींद आ रही थी लेकिन दादी को तो बस गुस्सा करने का कोई न कोई बहाना चाहिए था।

जब दोनों बिस्तर पर से उठी तो उनकी नजर गन्ने और आम पर पड़ी। जिसे देखकर दोनों बहुत खुश हो गयी और बिना वक़्त बर्बाद किए उसपर टूट पड़ी।

राघव ने कभी भी बेटे और बेटी मे भेदभाव नही किया था। अभी जितना वह अपनी बेटियों के लिए कर रहा था, बेटों के लिए भी इतना ही करता।

शिक्षित और अदर्शवान बनाता जिसके असुलों में संसार और सांसरिक सोच को बदलने की शक्ति होती। जो उसे इस गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालता और जो उसके बुढ़ापे की लाठी बनता । लेकिन एक पुत्र ही आपके इन सपनों को पूरा कर सकता है ऐसी विचारधारा क्यो? इस तथ्य को वह बहुत जल्दी ही समझ गया था।

वह समझ गया था कि समाज के द्वारा निर्मित यह विचारधारा न सिर्फ गलत है बल्कि स्त्रियों की आजादी को कैद करने का एक साधन है। इस प्रकार के सोच की नींव रखने वाले लोगों को शायद इस बात का भय था कि ये स्त्रियाँ कहीं उनसे ज्यादा प्रतिभाशाली न हो जाय।

स्त्रियाँ, जिसकी किस्मत में घर के चार दीवारों के भीतर ही कैद होना लिखा ताकि इनकी प्रतिभा इन्ही के भीतर दफन हो जाय। शासन क्षेत्र या कोई अन्य क्षेत्र जिससे स्त्रियों को दूर रखा गया क्योंकि शायद उन्हे इस बात का भय था कि कहीं ये बेहतर शासक न बन जाय।

बिस्तर पर लेटे-लेटे राघव इन्ही तथ्यों पर विचार कर रहा था। क्यों हमेशा से यही नियम रहा है कि स्त्रियों को लज्जा का कफन ओढ़े घर के चारों दीवारों के भीतर ही कैद रहना धर्म है और संसार के सामने अपने हुनर का प्रदर्शन करना अधर्म !

और आखिर क्या वजह रही होगी उन औरतों की जिन्होंने इस नियम को स्वीकार करके मरने से पहले ही घर के दीवारों मे दफन होने को तैयार हो गयी? क्या उन्होने अपने आने वाली पीढ़ियों के बारे में एक क्षण भी विचार नही किया? क्यों उन्होने अपने आपको घूँघट के पीछे कैद कर लिया? स्वतंत्र हँसने पर पाबंदी। पिता और पति की गुलामी। कुछ इस तरह कि कोई बकरी को पालकर इसलिए बड़ा करता है कि कसाई एक दिन उसे नोंचकर उसके गोश्त को बाजार मे बेच दे। क्या वजह थी कि उन्होने इस बंधन को स्वीकार कर लिया? इतने बड़े समयावधि में किसी ने विद्रोह क्यों नही किया? प्रश्न अनंत थे लेकिन उत्तर एक भी नहीं। और इन प्रश्नो का उत्तर उन्हे कौन देता?

पोती से चिढ़ने वाले उनके माता-पिता या विभिन्न तरह के नियम बताने वाले वरिष्ठ गाँव वाले? किसका दोष है? कौन अपराधी है? और इन नियमों को किसने पारित किया? धर्म ग्रंथ लिखने वाले कौन थे और धर्म और अधर्म के मध्य भेदभाव करने के लिए उन्होने किस पगडंडी का उपयोग किया? सीता की अग्नि परीक्षा से लेकर आज के युग तक जहाँ हर घर में एक सीता है और हर सीता से अग्नि परीक्षा लेने वाले राम भी। इनकी कहानी में रावण का होना या न होना कोई तर्क नही।

पड़ोस में रहने वाली कविता जो सुलेखा से करीब एक वर्ष ही बड़ी थी। चंचल और शांत स्वभाव का उचित मिश्रण जो अपने आपको एक आजाद पंछी की तरह खुले आसमान में उड़ते हुए देखना चाहती थी।

इतिहास के पन्नों पर अपने नाम को अंकित करने की इच्छुक उम्मीदवारों में उसका नाम भी सम्मिलित था। उसके तीन बड़े भाई थे और वह तीनों की ही लाड़ली थी। लेकिन उसके सपनों की कहानी का आरंभ तब हुआ जब उसके दो बड़े भाई दिल्ली गए थे कमाने के लिए और इस बार उन्होने एक टीवी खरीद लिया। टीवी आई तो घर में बिजली भी आई।

जिस घर में दीपक की मंद रौशनी रात्री के अंधकार से पूरी रात संघर्ष करती थी अब तेज बल्ब की रौशनी अंधेरे को रौब दिखाने लगी थी।

टीवी का शोर पूरे गली में गूँजता था और रामायण और महाभारत देखने के लिए उनके घर पर सिनेमाघरों की तरह भीड़ उमड़ी रहती थी। कोई न कोई टीवी देखने के लिए घरपर तैनात रहता था।

शुरुआत में तो अपनी इस तरक्की का प्रदर्शन उन्होने बहुत किया लेकिन जल्दी ही लोगों को टीवी देखने घरपर आना उन्हे खटकने लगा। सीधे मुँह किसी को बोल तो नही सकते थे कि भई तुम टीवी देखने हमारे घर पर मत आया करो लेकिन उनकी बातों की कड़वाहट सबकुछ कह देती थी। खुशी कब अभिमान का रूप धारण कर लेता है इसका आभास ही नहीं होता। उनकी छोटी सी कामयाबी की खुशी ने अभिमान का रूप धरण कर लिया था और वे लोगों को उनकी औकात बताने लगते। लेकिन परी और सुलेखा की बात ही अलग थी।

कविता उन्हे न सिर्फ अपना मित्र मानती थी बल्कि उनके बीच बहनों के जैसा प्रेम था। जब भी वक़्त मिलता वे साथ में बैठकर टीवी देखती। कविता के घर में बिजली होने की वजह से रात में सुलेखा और परी उसके घर में ही पढ़ाई करती और कभी-कभी तो तीनों साथ ही सो जाती।

कविता को टीवी पर आने वाले रोमाँटिक फिल्में बहुत पसंद आती और हिन्दी गानों को सुनते ही उसके पैर थिरकने लगते थे। घरवालों की नजर उसपर न पड़े इसलिए वह कमरे को भीतर से बंद कर लेती और डांस करने की इच्छा को पूरा कर लेती। परी भी फिल्म के दृश्यों को देखकर किरदारों की नकल करती। उन्हे लगता था कि टीवी पर दिखाई देने वाली दुनियाँ कितना अलग होती है, कितना खूबसूरत और रंगीन है, कितनी आजादी है और कितना प्रेम है। आरंभ और अंत के मध्य समस्याओं की बारीश होती है ये बात अलग है, लेकिन अंत तो अत्यंत सुखदाई होता है।

लेकिन उनकी ज़िंदगी किसी मशीन की तरह ही थी। आदेशों का इंतजार और उनकी पूर्ति करना उनका लक्ष्य था, आजतक उन्हे यही तो सिखाया गया था। न दिखने वाली रस्सी का फंदा उनके गले से बाँध दिया गया था और इस फंदे की परिधि जितना क्षेत्र ही उनकी दुनिया थी।

लंबी छुट्टी मनाने के बाद कविता के भाई वापस दिल्ली चले गए थे। लेकिन इस बार उनके चले जाने के बाद वह स्वयं को अकेली नही महसूस कर रही थी। मनोरंजन के लिए साधन घर में था लेकिन उसपर भी उसका नियंत्रण नही था। आरंभ में तो कोई रोकने वाला नही था, न ही कोई पाबन्दियाँ थी लेकिन वक़्त हमेशा एक सा नही रहता। टीवी का दुष्प्रभाव यह पड़ा कि इस लड़की के आँखों मे सपने के बीज उमड़ने लगें। वह भी फिल्मों में काम करने का सपना देखने लगी। बड़े-बड़े फिल्मी सितारों के साथ शूटिंग करने लगी। उस समय वह नींद में होती थी ये बात अलग है।

सपने देखने की स्वतन्त्रता कोई किसी से छिन नही सकता और वह भी स्वतंत्र थी। लेकिन ये दायरे उसकी इस आजादी को भी छिनने लगते। एक लड़की जो सपने देखना तो जानती थी लेकिन उसे पूरा करने की कल्पना भी नही कर सकती थी। एक छोटी सी इच्छा भी वह अपने पिता के सामने स्पष्ट नही कर पाती तो परिंदों की तरह आसमान मे उड़ाने की ख्वाईश कैसे कहती?

कविता और सुलेखा एक ही क्लास में थी और पढ़ने में दोनों एक समान ही थी। जिस तरह से काले अक्षरों को देखकर सुलेखा का सर घूमने लगता था, कविता का भी वही हाल था। कुछ दिन बीत गए और सबकुछ सामान्य सा था। वही दिन, वही सुबह, वही विधालाय और वही दिनचर्या, वही कैद और वही सपने।

आज शाम को जब सुलेखा मास्टर जी के पास ट्यूशन पढ़ने पहुँची तो देखी कि साथ पढ़ने वाले सभी लड़के अपने घर वापस जा रहे हैं। उसे लगा कि मास्टर जी को कोई आवश्यक काम होगा इसलिए उन्होने सबको छुट्टी दे दी है। लेकिन ऐसा बिलकुल भी नही था। मास्टर जी के डांट से बचने के लिए वह अंदर गयी। वह यह पुष्टि करना चाहती थी कि वास्तव मे उन्होने छुट्टी दे दी है या यह उन लड़को का मज़ाक है। तब मास्टर जी ने बताया कि उन्होने सभी लड़कों को सुबह के समय में बुलाया है लेकिन उसे इसी समय में आना है। क्योंकि वह पढ़ने में बहुत ज्यादा कमजोर है इसलिए वह उसे स्पेसल पढ़ाएंगे। उनके फैसले के ऊपर तर्क-वितर्क करना उसकी सीमा क्षेत्र से परे था। वह नीचे फर्श पर बैठने लगी तभी मास्टर जी ने उसे ऊपर बिस्तर पर बैठने को कहा।

वह उनके मंसूबों से अज्ञात थी लेकिन उसे घबराहट हो रही थी। अब भी वह उनसे बहुत डरती थी। हालाँकि मास्टर जी अब उससे बहुत ही नम्रता से बात करते थे, फिर भी। वह खड़ी हुई और बिस्तर पर चढ़कर बैठ गयी। किताब निकालकर पढ़ने लगी।
 
सबसे कठिन कार्य होता है इंसान के विचार को सझना। किस समय वह क्या सोच रहा है और किसी के प्रति उसका क्या विचार है, यह जान पाना। मास्टर जी का भी हाल कुछ ऐसा ही था। सुलेखा अभी जिस उम्र से गुजर रही थी और अब वह बच्ची नही रही थी।

उसका बाल अवस्था लगभग समाप्त हो गया था और अब वह जबान हो रही थी। इसका एहसास मास्टर जी को तब हुआ था जब राघव ने उनसे सुलेखा की शादी की बात कही थी। तब से उनके आँखों पर धीरे-धीरे वासना का परत चढ़ने लगा था। सुलेखा जो बिस्तर पर बैठकर किताब के पन्नों को उलट-पलट कर देख रही थी, मास्टर जी लगातार उसे ही देखे जा रहे थे। जैसे कि आज से पहले उन्होने उसे देखा ही नही था।

उसकी मासूम चेहरे पर भय और उसके हाथ भी काँप रहे थे। मास्टर जी ने बहुत प्रयास किया था कि सुलेखा उनसे डरने के बजाय उनसे अपनी मित्र की तरह बात करे। उन्हे अपने हवस की अग्नि को ठंडा जो करना था। हर दिन उनके जहन में यही विचार चलता रहता कि अपनी इस वासना की भूख को मिटाने के लिए क्या करे। उनकी सोच दिनों-दिन गंदी होती चली जा रही थी और आज उन्होने अपने लिए एक अवसर बना ही लिया।

“क्या हुआ सुलेखा? सिर्फ पन्ने ही पलटोगी या कुछ पढ़ोगी भी?” उनके होंठों पर वासना से लथपथ मुस्कान लिपटी थी, जो सुलेखा के भय पर विजय पाने में असमर्थ साबित हो रही थी।

अगले कुछ मिनटों तक वातावरण बिलकुल शांत रहा।

सुलेखा पुस्तक में लिखे प्रश्नों को हल करने के प्रयास में थी लेकिन आज उसका हृदय कुछ ज्यादा ही विचलित हो रहा था। वह अपने भय पर नियंत्रण पाकर पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रही थी। शायद उसे मास्टर जी के हृदय में उमड़ रहे अश्लील विचारों का आभास हो गया था। मास्टर जी ने अपने कार्य को अंजाम देने की सोची।

उन्होने उसे अपने पास बुलाया और उसकी कॉपी उसके हाथ से ले ली। एक नजर उन प्रश्नों पर डाली और हँसते हुए बोले कि ये सब तो बिलकुल ही आसान है। और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

सुलेखा का हृदय भय के मारे अत्यंत तीव्र वेग से धड़कने लगा। उसके लगा कि अब मास्टर जी उसे पिटेंगे। इसलिए उसने आँखें बंद कर ली। लेकिन मास्टर जी पीटने के बजाय उसके कंधे को सहलाने लगे। और जैसे ही उसे इसका आभास हुआ वह दो कदम पीछे हट गयी। अब मास्टर जी का वास्तविक चेहरा उसके सामने स्पष्ट था और वो समझ गयी थी कि मास्टर जी क्या चाहते हैं। लेकिन वह अकेली थी। छोटी थी। कमजोर थी। चाहकर भी कुछ नही कर सकती थी।

“देखो, डरो मत। क्यों डर रही हो मुझसे.. हाँ? देखो न तुम कितनी बड़ी हो गायी हो। बहादुर बनो सुलेखा। बहादुर।“ बोलते हुए मास्टर जी ने एक नजर उसे सर से पाँव तक देखा।

उसकी जवानी उसके सौन्दर्य को निखार रही थी। गोरा रंग और लंबे केश। और भय के बादल के पीछे छुपा हुआ बहुत ही मासूम चेहरा।

“इतनी सी थी तुम और मैंने तुम्हें अपनी गोद में खेलाया था। और देखते-देखते तुम कब बड़ी हो गयी, पता ही नही चला। सुलेखा, सच में तुम अब बड़ी हो गयी हो।“

मास्टर जी के बातों का उसके पास कोई जबाब नही था। लेकिन उसका हृदय बगावत करने को कह रहा था। अपनी दुर्बलता का त्याग कर नायक की तरह बहदुरी से इस परिस्थिति का सामना करने को कह रहा था। फिल्मों में उसने ऐसी कई परिस्थियों का दृश्य देखा था, एक के बाद एक उसके सामने आने लगा था। एक नायक कैसे अकेले ही विजय होने तक लड़ता है। एक नायिका जो कभी हार नही मानती। वह अपनी इस कहानी की नायक और नायिका दोनों ही थी और उनके सामने खलनायक के रूप मे मास्टर जी बैठे थे।

वह उन्ही फिल्मों में दिखाई जाने वाली उन स्त्रियों की तरह इस परिस्थिति का सामना करना चाहती थी लेकिन उसका भय उसे और भी दुर्बल बनाते जा रहा था।

“खूबसूरत बहुत हो तुम सुलेखा। लेकिन तुम्हारे चेहरे पर ये डर बिलकुल भी अच्छा नही लगता। एक बात जानती हो सुलेखा? जब तुम अपने सहेलियों के साथ होती और जो खूब हँसती हो, तो तुम और भी ज्यादा खूबसूरत लगती हो। देखो सुलेखा, अब तुम मुझसे डरोगी तो कैसे काम चलेगा? मैं कोई राक्षस थोड़ी न हूँ और न ही मेरे सिर पर दो बड़े सींग है।“

अपनी ही बात पर उनकी हंसी छुट पड़ी लेकिन सुलेखा पर इसका कोई प्रभाव नही पड़ा।

“मैं तो तुम्हारा दोस्त बनना चाहता हूँ सुलेखा और तुम मुझसे डरती हो। ये अच्छी बात नहीं है। बताओ सुलेखा... मेरी दोस्त बनोगी?”

सुलेखा ने हाँ मे सिर हिलाया क्योंकि इसके अलावा उसके पास कोई और विकल्प भी तो नही था।

“चलो ये हुई न बात।“ जैसे की उन्हे कोई बड़ा खजाना मिल गया हो, वो इतने खुश हुए। “चलो अब इस नए दोस्ती की खुशी मे थोड़ा सा मुस्कुरा भी दो।“

सुलेखा ने मुस्कुराने का नाटक किया। कोशिश करने के बाद भी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर नही आयी।

“हाथ नही मिलाओगी मुझसे, दोस्त? मैंने सुना है कि जब नई दोस्ती होती है तो एक दूसरे के साथ मिलाया जाता है?” उन्होने सुलेखा की ओर हाथ बढ़ते हुए कहा।

सुलेखा ने डरते हुए उनसे साथ भी मिला ली। उसके पास और कोई विकल्प भी तो नही था।

“अच्छा। अब जब हम दोनों दोस्त हैं तो एक सीक्रेट बताऊँ तुम्हें? लेकिन वादा करो कि तुम मेरा ये सीक्रेट किसी को नहीं बताओगी।“

सुलेखा ने सिर्फ सिर हिलाया।

मास्टर जी को लगा कि सुलेखा उसके झांसे में आ रही है और जल्दी वो अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे। उनसे सुलेखा का हाथ पकड़ समीप खींच लिया और तुरंत ही उसके कमर को कसकर पकड़ लिया। वह अपने आपको उनके चंगुल से छुड़ाने का प्रयास कर रही थी लेकिन उसकी उँगलियों में उतना बल नही था।

“क्या हुआ सुलेखा? कुछ नही करूंगा मैं तुम्हें। सीक्रेट है ना? इसलिए कान में बता रहा हूँ ताकि कोई और न सुन ले।“ मास्टर जी अपने होंठ को उसके कान के समीप ले गए। उसके बालों की खुशबू को लंबी सांस लेकर सूंघा। उनका मन तो उसके कोमल गालों को चूम लेने को कर रहा था लेकिन उन्होने ऐसा नही किया।

“ये बात मैं सिर्फ तुम्हें ही बता रहा हूँ कि मुझे ना लड़कियों के स्तन बहुत पसंद है। उभरे हुए स्तन। बड़े से। और तुमहे?”

आखिर वो अश्लीलता पर उतर ही आए। इससे पहले कि वह कुछ और कहते या करते सुलेखा ने अपना पूरा ज़ोर लगाया और खुद को वासना के उस बेड़ियों की कैद से बाहर निकलने का पहला प्रयास किया जो मास्टर ने उसके जिस्म से लपेट दिया था। वह कुछ कदम पीछे आई। लेकिन भय ने इस बार फिर से उसे प्रहाश्त कर दिया। काश इस वक़्त परी उसके साथ होती तो वह जरा सा भी नही डरती। और ना हारती। ना जाने ये हवसी मास्टर उसके साथ क्या करेगा अब? परी होती तो वह उसे इस समस्या से जरूर निकाल लेती।

“शर्माओ मत सुलेखा। मैं भी किसी को कुछ नही बताऊंगा। मुझे तुमने अपना दोस्त बनाया है ना? अपने दोस्त के गले नहीं लगोगी? कविता और पुजा की तरह? अगर वो यह पुछती तो तुम उसे बताती ना?”

“वो दोनों नही पुछती ये सब।“

“तो क्या हुआ? हम तो तुम्हारे खास दोस्त हैं ना? आओ गले लगो अपने इस नए दोस्त के।“

सुलेखा पूरी तरह से काँपने लगी थी। ऐसा लग रहा था कि भय ने उसके शरीर को बिलकुलही दुर्बल कर दिया है। अब वह बस एक निष्प्राण मूर्ति की भांति थी जिसमें बस थोड़ा सा ही प्राण शेष था।

“उस दिन एक हवसी मास्टर के वासना की भूख से मेरी बहन बच गयी। शायद उसकी किस्मत अच्छी थी। मास्टर ने उसके साथ जबर्दस्ती नही किया क्योंकि उसे यकीन था कि अब वह अपने मसूबों में कामयाब हो ही जाएगा। उस रात वह बिलकुल खामोश थी और भय उसकी आँखों में मुझे बिलकुल साफ दिखाई पड़ रहा था। भले ही मैं उससे छोटी थी लेकिन अपने बहन के हृदय को पढ़ सकती थी। उसके जहन में मास्टर का वह दृश्य पत्थर की लकीर की तरह अंकित हो गया था, अगर इसे जल्दी नही मिटाया जाता तो वह पागल हो जाती।“ परी जज साहब की ओर देखते हुए बोली।

अचानक से आए कहानी मे ट्विस्ट ने सबको विवश कर दिया आगे की कहानी बिलकुल ध्यान से सुनने को।

“तो फिर तुमने क्या किया?” जज साहब ने उससे पूछा।

“उस रात मुझे मेरी बहन सुलेखा नही मिल रही थी। मेरी बहन जो अपना पूरा दिनचर्या मेरे साथ शेयर करती, मुझे हँसाने के लिए बनाबटी कहानियाँ सुनाती, उस दिन बिलकुल ही खामोश थी। बनाबटी किस्सों की नायिका, मेरी बहादुर बहन उस रात कमरे के एक कोने में दुबकी हुई थी। मानों काल्पनिक कहानियों वाला राक्षस वास्तविक दुनियाँ में आ गया हो और उसके पीछे पड़ा हो।“ कटघरे में खड़ी वो कुरूप लड़की अपने वस्त्रों को व्यवस्थित करते हुए बोली।

“फिर क्या हुआ?”

“कुछ खास नहीं।“ उस कहानी के अंजाम को स्मरण करते हुए वह मुस्कुरायी और फिर बोली।“मास्टर की कहानी का अंत”

“मुझे बिलकुल ठीक नही लग रहा था क्योंकि मेरी बड़ी बहन न जाने क्यों ऐसी खामोश और डरी हुई थी। किसी ने तंग तो नहीं किया तुम्हें? – मैं उससे पुछना चाहती थी और उसका नाम भी। क्योंकि मैंने उसे सजा देने की ठान ली थी। दीदी ने डरते हुए बताया उस हवसी मास्टर की सारी हरकतें जो उसने उसके साथ किया था। बोली उस समय उसे गुस्सा आ रहा था और अपनी कहानी की नायक बनकर उसे सजा भी देना चाहती थी। उसका मन कर रहा था कि ईंट मारकर उसका सर फोड़ दे जो उससे ऐसी अश्लील बाते और हरकतें कर रहा है। वो अब वहाँ पर पढ़ने कभी नही जाएगी लेकिन फिर बाबा को ये बात कैसे बताएगी? मास्टर उसे स्कूल में भी तंग करेगा इसलिए वह स्कूल नही जाना चाहती।“

“तो क्या हुआ दीदी? उसका सिर ही फोड़ना है न? चलो अब फोड़ देते हैं।“ मैं बोली। मैं अपनी बहन को उसकी कहानी की नायिका के रूप में देखना चाहती थी जो अपने लिए खुद संघर्ष करे, गुनहगारों को सजा दे। लेकिन इसके लिए मुझे उसका ताकत बनना था।

“लेकिन कैसे?” दीदी पुछी।

“चलो।“ मैं मुस्कुरायी।

करीब रात के एक बजे होंगे। पूरा गाँव गहरी नींद में सो गया था तब हम दोनों बहने उस मास्टर को सजा देने निकले। गर्मी के मौसम होने की वजह से लोग ज़्यादातर या तो घर के छत पर सोये हुए थे या तो बाहर गलियारों में। अगर किसी की भी नजर हम पर पड़ जाती तो सारा प्लान चौपट हो जाता। इसलिए हम दोनों बिलकुल ही चौकन्ने थे। इतनी गर्मी में चादर ओढ़ कर निकलना थोड़ा अजीब था लेकिन उस समय मुझे वही सही लगा। हम दोनों मास्टर के घर के बाहर पहुँचे। बिजली चली गई थी और मास्टर अपने कमरे मे गर्मी से बेहाल होकर सो रहा था। हमने ज़ोर से दरवाजा खटखटाया और छिप गए। मैंने एक मोटा डांडा ले लिया था जिसके एक ही प्रहार से मास्टर की हड्डियाँ टूटने वाली थी।

“आधी रात को कौन हो सकता है? कौन है?” आधी नींद में मास्टर चिल्लाया। बिस्तर पर से उठा और बड़बड़ाते हुए दरवाजा खोला। लेकिन दरवाजे पर उसे कोई नही दिखा।

जैसे ही मास्टर दुबारा बिस्तर पर सोने के लिए लेटा मैंने फिर से दरवाजा खटखटाया। मास्टर फिर से चिल्लाते हुए आया और दरवाजा खोला। जब उसे फिर से दरवाजे पर कोई नही दिखा तब वह फिर से बड़बड़ाते हुए अंदर गया। अंदर जाकर वह लेटने ही वाला था कि फिर से मैंने दरवाजा खटखटाया । बार-बार उसे इसी तरह से हमने उसकी नींद खराब कर दी। तंग आकार वह दरवाजे के बीच में बैठ गया और वैसे ही सो गया। मैंने दीदी को कहा कि ईंट उठा ले और मौका अच्छा है मास्टर को मजा चखा दे।

दीदी ने ईंट उठाया और उसके ऊपर फेंक दिया। ईंट मास्टर के सर से लगा और वह ज़ोर से चिल्लाया। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता मैंने चादर से उसे ढक दिया और डंडे बरसने शुरू कर दिया। अफसोस अभी तक उसका सर नही फूटा था। उसकी पीठ और बाजुओं की हड्डियाँ तो टूट गयी थी ये बात अलग है, लेकिन अश्लील विचार को जन्म देने वाले उसके सिर को मुझे फूटते हुए देखना था, वो भी दीदी के हाथों।

“क्या दीदी कैसे मारती हो? इसका सर तो फूटा ही नही। एक और बार कोशिश करो। और डरो मत कुछ नही होगा। ये हमारा और मास्टर जी का सीक्रेट है। मास्टर जी भी इसे सीक्रेट ही रखेगे।“ बोलते हुए मैंने उसके ऊपर से चादर हटा दिया और उसके सामने आकार खड़ी हो गयी। इतनी पिटाई के बाद वह सिर्फ दर्द से चीख सकता था, उठकर हमें पीटने या हमारे पीछे भागने की हिम्मत नही बची थी उसमें।

“क्यो चीख रहे हो मास्टर जी? आधी रात है। लोग जग जाएंगे। फिर उन्हे आपका सीक्रेट पाता चल जाएगा। हमें तो बस आपका सर फोड़ना है। प्यार से आपका सिर फोड़ेंगे फिर चले जाएंगे। गाँव वाले पता नही आपके साथ क्या-क्या करेंगे। बुलाऊँ उन्हे?” मैं मास्टर को आँखे दिखाते हुए बोली।

“यह तुमने ठीक नही किया।“ वह अपनी आबाज धीमी करते हुए चिल्लाया।

“दीदी, जल्दी करो ना... मुझे नींद आ रही है। सुबह जल्दी जागना है। स्कूल भागना है। देर होगी तो मास्टर जी पिटेंगे। तुम्हें भी पिटेंगे। जल्दी से फोड़ो सर का सिर और चलो।“ मास्टर की बातों को इगनोर करते हुए, अपनी बहन की हिम्मत बढाते हुए मैंने कहा। मैं देख सकती थी कि अब उसके हृदय मे भय बिलकुल भी नही था। और आज वह अपने अपराधी को दंडित करने के लिए निर्भय होकर खड़ी थी। बिलकुल नायिका की तरह।

मेरी आँखों मे जीत और होंठों पर विजय भरी हंसी देखकर दीदी का भय बिलकुलही खत्म हो गया। जिस मास्टर के सामने जाने की सोच से ही वह थर-थर काँपने लगती थी, जिसने उसके साथ अश्लीलता का व्यवहार किया था, आज उसके सामने अपराधी बनकर खड़ा था। दीदी ने फिर से ईंट उठायी और मास्टर की ओर बढ़ी।

“इस बार इनका सिर फूटना चाहिए। नही तो मैं तुमसे बात नही करूंगी।“

दीदी मास्टर की ओर उसका सर फोड़ने बढ़ी। मास्टर को सामने से यमराज का आगमन दिखाई पड रहा था। वह सुलेखा को समझाने का प्रयास कर रहा था। वह मुझे भी बहलाने का प्रयास कर रहा था। कह रहा था कि हम ऐसा नही करे। उसका सिर नही फोड़ें। वो हमें मिठाइयाँ देगा। चॉकलेट देगा। और भी बहुत कुछ। लेकिन दीदी को तो बस उसका सिर ही फोड़ना था। मास्टर का सारा प्रयास व्यर्थ गया। न हम बदलें न वह अपने सिर को फूटने से बचा पाया। दीदी उसके नजदीक गयी और पूरी ताकत लगाकर दे मारी उसके सर पर। वह दर्द सह नही सका और ज़ोर से चिल्लाया। उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर दीदी मुस्कुरायी और उसे मुसकुराता देखकर मै भी।

गाँववाले चीखने की आबाज सुनकर जाग गए थे और इधर ही आ रहे थे।

“चलो दीदी।“ दीदी ने ईंट वहीं फेंका। मैंने चादर लिया और हम दोनों वहाँ से भागे। अपने कमरे में जाकर सो गए।

“क्या मैंने गलत किया था? क्या उस मास्टर का सिर फोड़ना गलत था या उस मास्टर का वो अश्लील हरकत सही था?” परी ने जज साहब को प्रश्न भरी निगाहों से देखा।

वह निशब्द थे। क्योंकि अभी इतनी जल्दी वह इसका फैसला नही करना चाहते थे। परी की कहानी अजीब थी क्योंकि जज साहब ने उससे उसकी कहानी कहने को कहा था लेकिन उसकी इस कहानी का संबंध तो इस मामले से बिल्कुल ही नही था।
 
अध्याय पाँच

एक लंबी खामोशी के बाद जब जज साहब ने कुछ नही कहा परी आगे की कहानी सुनाने लगी।

उस घटना के बाद मेरी बहन सुलेखा को स्कूल से आजादी मिल गई। पिताजी ने उसके लिए लड़का ढूंढना आरंभ कर दिया और कुछ ही महीनों के बाद उसकी शादी तय कर दी गई। वह बहुत खुश थी। क्योंकि कुछ ही महीनों के बाद उसे उसका जीवनसाथी जो मिलने वाला था। हालाँकि शादी में अभी समय था लेकिन इसकी तैयारी कई महीने पहले से ही शुरू कर दिया गया था।

सुलेखा की शादी तय हो जाने के बाद राघव पहले से ज्यादा ही व्यस्त हो गया था। पहले से ज्यादा समय तक मजदूरी करता ताकि कुछ रुपया ज्यादा कमाए। न ठीक से सो पाता न ही उसे चैन ही मिलती। हर घड़ी बस एक ही बात की फिक्र उसे सताते रहती कि सुलेखा के विवाह में कोई कमी न रह जाए।

क्योंकि सुलेखा को पता था कि शादी के बाद उसे माँ बाप से दूर जाना होगा। सबसे बड़ी बात अपनी प्यारी बहन परी से दूर जाना होगा इसलिए इन बचे समय में वह जितना ज्यादा हो सके सभी के साथ गुजारना चाहती थी। दादी की कड़वी बोली में भी स्नेह ढूंढ लेती और उनके गुस्से में प्यार।

वक्त रेत की तरह जैसे किसी पात्र से देखते ही देखते फिसल गया। समय आ गया जब शादी से पहले की विधियों का आरम्भ हुआ। उधर उसकी सहेली कविता को भी एक लड़के से प्यार हो गया था। पास ही के गाँव का एक लड़का जो उसके साथ ही में स्कूल में पढ़ता था। प्यारी बातें करके उसे हंसाता, अमिताभ बच्चन की नकल करता और उनके फिल्मों के गानों को बेसुरे अंदाज में गाता। सुलेखा तो स्कूल नहीं जाती थी लेकिन कविता जब उस लड़के से मिलने जाया करती तो वह उसके साथ जाती।

शादी का दिन आ गया था। राघव की बेचैनी असमान पर थी। अपनी ओर से वह कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहता था। कोई ऐसी बात जो बारातियों को अच्छी न लगे या किसी को किसी तरह की असुविधा न हो।

आज सुबह भागते हुए कविता सुलेखा के पास आई थी। क्योंकि आज वह फिर से उस लड़के से मिलने जा रही थी और उसके पास कोई खास कपड़े भी नहीं थे। सुलेखा को बहुत सारे नए कपड़े मिले थे इसलिए कविता ने उसका एक ड्रेस बस दो घंटों के लिए उधार माँगी।

सुलेखा उसे रोक लेना चाहती तो थी लेकिन उसकी बेचैनी बहुत अच्छे से समझती थी। और बस दो ही घंटों की ही तो बात थी, फिर उसकी सहेली विदाई तक उसके साथ ही में रहने वाली थी। लेकिन शादी के इस दिन को, जब कुछ घंटों के बाद जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने को था, वह अपनी सहेली के साथ बातें करना चाहती थी। लेकिन उसपर तो इश्क का बुखार जो चढ़ा था। समझाने से थोड़ी समझती और न रोकने से रुकती। उसे मिले रंग बिरंगे कपड़ों में से एक खूबसूरत ड्रेस का चयन सुलेखा ने कविता के लिए किया। हालाँकि दुल्हन सुलेखा बनने वाली थी लेकिन सजाई कविता जा रही थी।

कविता खूब सजी और सुलेखा को यह बोलकर चली गया कि बस एक घंटे में चली आएगी। घर में व्यस्तता बढ़ने लगी। गाँव की औरतें आंगन में बैठ गीत गा रही थी। सुलेखा को सजाया जा रहा था। परी तो साथ ही में थी लेकिन कुछ मिनट के अंतराल में किसी न किसी वजह से उसे कोई न कोई बुला लेता।

एक घंटा तो कब का समाप्त हो गया था लेकिन कविता लौट कर नहीं आई थी अब तक। कोई हंस रहा था, कोई हँसा रहा था। घर में शादी का माहौल जो था। गीत और संगीत न सिर्फ घर में गूंज रही थी बल्कि सुलेखा की शादी की रौनक पूरे गाँव में थी। ऐसे में बेचैन सुलेखा की नजरें उस कमरे के दरवाजे पर ही टिकी थी जिससे कविता आने वाली थी। यह दुल्हन का जोड़ा और ये गहनें जिसे वह हमेशा से पहनना चाहती थी, आज उसकी इस बेचैनी को दूर करने में नाकाम साबित हो रही थी।

"कब आएगी ये लड़की? एक घंटा बोल कर गई थी, दोपहर समाप्त होने को है अभी तक नहीं आई। पहले तो खूब कहा करती थी कि शादी का दिन आने दो। मैं ये करूंगी। मैं वो करूंगी। लेकिन आज? आने दो उसे।" सुलेखा मन ही मन कविता को डांट रही थी। तभी किसी के आगमन का आभास हुआ उसे। झट से वह दरवाजे की ओर मुड़ी तो देखी कि नीलिमा खड़ी है। आँखों में आंसुओं की गंगा है, वह रो भी रही है और मुस्कुरा भी रही है।

अपने माँ को ऐसे देख कर उसका दिल भारी हो गया। उसे लगा की रो पड़ूं लेकिन अगर ऐसा वो करती तो उसकी माँ का क्या हाल होता जिसके आँखों में पहले से ही आंसू थे! लेकिन वो पत्थर तो नहीं थी जिसमे भावनाएं नहीं होती। तो वह कैसे न रोती?

नीलिमा जब अंदर आई तब वह उठ कर उसके सीने से लिपट गई थी।

इतने में परी भी आ गई थी। भावुक होकर वह भी दोनो से लिपट गई।

बच्चे गली में शोर मचा रहे थे। ठोल के धुन के साथ कोई कमर हिला रहे थे तो कोई फिल्मी अदाकारों की तरह अभिनय करने के प्रयास में उछल कूद रहा था। पकवान की खुशबू हवाओं में घुल रही थी और साथ में शाम भी ढल रही थी। लेकिन कविता का अभी तक कोई पता नहीं था। न वो लौट कर घर आई थी। सुलेखा तब से तीन बार कविता को ढूंढने उसके घर गई थी लेकिन वो कहाँ गई किसी को नहीं मालूम था। उसकी माँ आंगन में उन औरतों के साथ बैठ गीत गाए जा रही थी। भाई और पिता राघव के साथ अन्य कामों में व्यस्त थे।

सुलेखा का दिल घबरा रहा था। लगभग आठ घंटों से कविता गायब थी। उसे जब लगा कि इस बारे में परी से बात करना चाहिए तब तक बारात आ गई थी।

ठोल और झाल के धुन में भी बाराती झूम कर नाचे जा रहे थे। पठाकों की शोर ने उनके आगमन का संदेशा दिया था। फिर राघव ने उनका स्वागत किया। शादी की सारी विधियां अच्छे से हो गई। मंडप पर बैठी सुलेखा अवसर पाकर चारों ओर नजरें दौड़ाती लेकिन जब कविता को नहीं देखती तो निराश हो जाती।

शादी की सारी विधियां समाप्त हो गया। अब सुलेखा पराई हो गई थी। विदाई के समय रोना तो अनिवार्य था। विदाई के बाद जब वह चली गई घर सन्नाटे से भर गया।

सबकुछ अच्छे से हो जाने की संतुष्टि थी। राघव को खुशी थी कि सुलेखा ससुराल चली गई लेकिन दिल खाली भी हो गया था क्योंकि इसमें रहने वाली उसकी प्यारी सी गुड़िया को कोई अपने देश ले गया था।

परी एक कोने में खामोश बैठी थी। उसे ये सन्नाटा बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा था। सुलेखा के साथ बिताए हुए वो पल कानों में गूंज रहा था। लेकिन वह विवश थी। यही नियम, धर्म और प्रथा था। जिस तरह से आज सुलेखा पराई हुई एक दिन उसे भी इस आंगन से दूर जाना था। फिर ये मोह के मजबूत धागे टूट जाना था। नए लोगो के साथ नए रिश्ते बनेंगे। हालाँकि वह उनके लिए भी पराई ही रहेगी लेकिन उसके आगे की पूरी बची जिंदगी उन्ही अजनबियों के साथ ही तो बिताना होगा।

कैसी बंदिश है ये और इस बंदिश में सुलेखा कैसी महसूस कर रही होगी? आज वह एक अनजान जगह गई है। जहाँ न उसे कोई जानता है और न ये किसी को। लोगों के होंठों पर मुस्कान तो होगी लेकिन खुशी झूठी होगी या सच्ची ये कौन जानता होगा। हां, उस घर का माहौल इस घर से बिल्कुल ही अलग होगा। लेकिन कल्पनाओं में उस वास्तविक को वह किस हद तक चित्रित कर सकती थी।

ऐसा लगता कि अगले सेकेंड सुलेखा भागते हुए आएगी और अपने सबसे प्यारी सहेली और बहन परी से लिपट जायेगी।

शाम होते होते बेचैनी की सीमा चरम पर थी। परी बेचैन मन को शांत करने के लिए खेतों की ओर निकल पड़ी। मन विचलित हुआ जा रहा था। सुलेखा और कविता एक के बाद एक नजरों के सामने प्रकट होती फिर गायब होती। मृगतृष्णा सा, दोनों का आभासी तस्वीर अचानक से सामने आ जाती। और जब वह भावुक होकर सुलेखा को गले लगाने भागती तो वह सजीव चित्र रेत बनकर हवाओं में घुल जाती। आज उसे आभास हो रहा था कि वह सुलेखा से कितना प्रेम करती थी। सैकड़ों लोगों की भीड़ लेकर आया वो नौजवान न सिर्फ सुलेखा को ले गया था बल्कि उसके साथ परी का हृदय भी था।

अजीब तरह के धुन बादलों से बह रही थी। उदासी मानों आज हवा बन गई हो। जो सभी सजीव और निर्जीव के हृदय में प्राण की तरह बस गया हो। फिर अचानक से कविता उसे दिखाई पड़ी। खेत के किनारे वाले पेड़ के नीचे बैठ बस रोए जा रही थी। उसे देखकर परी का मन कुछ शांत हुआ लेकिन उसके इस व्यवहार के लिए उसपर गुस्सा भी बहुत आया उसे। उसकी खबर लेने के लिए उसके पास भागी। इससे पहले की कविता से कुछ पूछती कविता भी गायब हो गई। यह भी बस उसके मस्तिष्क का छलावा था, वास्तविकता नहीं। उसका मस्तिष्क उसके साथ खेल रहा था।

परी रो पड़ी। जिस बेचैनी को शांत करने वह अकेली इधर आई थी, इन आभासी तस्वीरों ने इसे कई गुना बढ़ा दिया था। नजर घुमाकर जब चारो ओर देखी तो अंधेरे के दलदल में डूबते बादलों के अलावा बस बहुत सारे पंक्षियों का ही शोर था।

इसके आगे जाने की अब इच्छा न थी। वह मुड़ी और वापस लौटने लगी लेकिन ऐसा लगा जैसे कि किसीने ने उसके कंधे पर हाथ रखा हो। अपने मस्तिष्क के छलावे को वह अच्छी तरह से जान गई थी। और यह भी बस एक छलावा है, वह जानती थी। बिना पीछे देखे वह दो कदम आगे बढ़ी। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कि पैर से भारी पत्थर बाँध दिया गया है। कोई विवश कर रहा हो वापस न लौटने को। एक अजीब सी अनुभूति जैसे कोई साथ में खड़ा किसी विशेष स्थान पर अपने साथ ले जाने की जिद्द कर रहा हो। कुछ क्षणों तक पत्थर की मूर्ति की तरह वैसे ही खड़ी रही। इन मानसिक यातनाओं को चक्रव्यूह की तरह भेदना असंभव सा था। मन से हार गई और पीछे मुड़ी। इसके आगे अक्सर वह कभी नहीं जाती थी। लेकिन आज कोई विवश कर रहा था इस सीमा को पार करने को। वह आगे बढ़ी। तेज हवाएं उस दिशा में उसके साथ चलने लगी।

आगे कुछ दूर पर कविता का एक खेत था। जब वह इस खेत के पास पहुँची तो उसके कदम से कदम मिलाकर चलती हवाएं शांत हो गई। वह इस पहेली को समझ नहीं पा रही थी कि उसकी नजर कुत्तों के एक झुंड पर पड़ी जो उसे देखकर भौंकने लगे थे।

दस से ज्यादा कुत्ते खेत के एक विशेष हिस्से को घेरे ऐसे बैठे थे जैसे वह उस स्थान की रखवाली कर रहे हों। यह आश्चर्यजनक था। सभी कुत्ते वृताकार घेरा बनाए उस विशेष स्थान को घेरे थे और दो कुत्ते लगातार जमीन को खोदे जा रहे थे।

परी कुत्तों के इस हरकत को अनदेखा कर मुड़ने ही वाली थी कि उसकी नजर मिट्टी से दबे कपड़े पर पड़ा। यह उसी कपड़े का अंश था जिसे सुलेखा ने कविता को शादी के दिन दिया था। यह पहेली जैसी थी। पहेली सुलझ भी गई थी लेकिन परी उलझने लगी। उसकी व्याकुलता शांत कैसे रहती? यह कविता तो नहीं? ये कुत्ते यहाँ क्यों घात लगाए बैठे हैं? यह तो बिलकुल उसी ड्रेस की तरह दिख रहा है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? नहीं। मैं.. मेरा दिमाग खराब हो गया है..! ये फिजूल के ख्याल.. हृदय में उमड़ा भय काल्पनिक दृश्यों का रूप ले मुझे सताने नजरों के सामने आ रहा है। ऐसे सैकड़ों विचार उसके जहन में दौड़ने लगें।

परी मूर्ति की भांति खड़ी वास्तविकता नकारती रही। कुत्तों ने शायद उसके चेहरे का भाव पढ़ लिया था। उन्हें लगा होगा कि जमीन के नीचे दफन उस वस्तु को परी से कोई नुकसान नहीं है। कुत्तों ने जमीन खोदना बंद कर दिया।

माहौल कुछ क्षण के लिए थम गया। सिर्फ तेज़ चलती हवाओं के शोर के अलावा कुछ और नहीं था। परी के पैर पर्वत हो गए थे। लेकिन आगे जाना ही था।

मिट्टी में दफन वह अज्ञात शक्ति उसे अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। सभी कुत्ते परी को टकटकी लगाए देखे ही जा रहे थे। हवाओं का वेग बढ़ता ही जा रहा था। आसमान पर काले बादल कब्जा करने लगे थे। अभी दिन ढलने में वक्त था लेकिन अंधेरा दामन फ़ैलाने लगा था।

परी उस कपड़े के पास पहुँची। उसके ऊपर पड़ा बड़ा सा मिट्टी का चट्टान हटाई। चट्टान हटाते ही जो दृश्य नजरों के सामने था उसे देखने की हिम्मत न थी उसके पास। वह निर्बल हो पीछे की ओर गिर पड़ी। मिट्टी के नीचे सिर्फ कपड़ा नहीं बल्कि एक इंसान का मृत शव दफ़न था। इन कुत्तों को इसका आभास था।

अगले कुछ मिनटों तक परी अचेत पड़ी रही। उसने जो देखा अकल्पनीय था। काले बादलों ने बारिश का रूप लेना शुरू किया और तेज हवाओं ने आंधी की। जल की दो चार बूंदों ने परी को जगाया।

जब वो जागी तब बारिश तेज हो गई थी। स्वयं को हिम्मत दिला मिट्टी खोदने लगी। उसे पता था कि कब्र के नीचे कौन दफन है लेकिन नजरों के सामने पड़ी इस वास्तविकता को वह मिथ्या साबित करना चाहती थी। यह कविता नहीं हो सकती, स्वयं को समझा दोनो हाथों से मिट्टी खोदते जा रही थी। बारिश मिट्टी की जटिलता को तोड़ सरल बना रहा था क्योंकि कब्र खोदने के लिए परी के पास अभी कोई औजार नहीं था। परी को मिट्टी खोदता देख कुत्तों ने भी मिट्टी खोदना आरंभ कर दिया।

परी पूरी क्षमता से मिट्टी हटाए जा रही थी। उसकी आँखे बंद थी फिर भी कब्र का चित्र स्पष्ट था। चाहते हुए भी वह इससे नजरें फेर नहीं सकती थी। आँखे इसलिए बंद थी कि अगले कुछ मिनटों के दौरान घटित होने वाली घटनाओं को देखने की हिम्मत उसमें नहीं थी। अचानक से उसका हाथ रुक गया। यह कब्र में सोए इंसान का चेहरा था जो परी के हाथ को स्पर्श किए था। इस चेहरे से वह भलीभांति परिचित थी। परी टटोलती रही। आँखें खोल सत्य को मिथ्या साबित करने का प्रयास करती रही। यह वही चेहरा था।

अचानक से बिजली कड़की। आवाज गूंज उठा। परी ने खुद को हौसला बंधाया और आँखें खोली। बारिश तेज हो गई थी। परी कविता के शव के ऊपर बैठी उसके गालों को टटोल रही थी। कड़कती बिजली की रौशनी कविता की धुंधली छवि को स्पष्ट चित्रित किया।

परी तो जैसे निष्प्राण हो गई थी। ऐसी परिस्थिति में उसे कैसे रिएक्ट करना चाहिए था, नहीं जानती थी। वह उठी। घर की दिशा में मुड़ी और अपनी पूरी रफ्तार से भागी। भागती रही। बारिश के साथ साथ उसके आँखों से आंसू भी बरसता रहा। घर पहुँचने तक उसके पैर कहीं नहीं रुके।

घर पर नीलिमा सुलेखा की यादों में खोई थी। दादा और दादी दालान में थे। राघव किसी काम से बाजार गया था। अभी तक नहीं लौटा था। परी नीलिमा के सामने जा खड़ी हो गई। हांफती रही। नीलिमा उससे वजह पूछती रही। ऐसा लग रहा था कि अब एक शब्द बोल पाना भी कठिन है। कविता का मृत चेहरा अभी सामने है। माँ अचानक से इतने प्रश्न पूछ रही है तो उसे कैसे बताए कि कविता कब्र में गहरी नींद सोई है। बताना तो था ही।

नीलिमा भी कविता की मृत्यु की खबर सुन खुद को संभाल नहीं पाई। कुछ देर बाद उसने फैसला किया कविता की मृत्यु की खबर बताने उसके घर जाने को। कविता की माँ न जाने किस हाल में होगी? पिता और भाई हर ओर उसे ढूंढ निराश लौटे होंगे। जब अपनी लाडली बेटी की मृत्यु की खबर सुनेंगे तो क्या होगा? कैसे झेल सकेंगे इस बात को कि किसी ने उनकी लड़की की हत्या कर उनके ही खेत में दफन कर दिया है।

"फिर मैं और माँ कविता के घर गए। उसकी हत्या के बारे में उसके पिता और भाई को बताने।" परी जज साहब की ओर देखते हुए बोली।

"तो फिर क्या हुआ? अचानक से कविता की हत्या? उसे उसके ही खेत में दफ़न होने की खबर सुन तो उसके घरवाले टूट गए होंगे?" जज साहब ने पूछा।

"कुछ नहीं। उस दिन इंसान की शक्ल में दानवों को मैंने देखा। कविता का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उसके अपने दोनों भाई और पिता ही थे।"

जब परी और नीलिमा कविता के घर गई। उसके पिता के सामने कविता का नाम ली तब वे बोल पड़े।

"वह तो मौत की नींद सो रही है। हमने ही तो उसे सुलाया है।" और हंसने लगें।

"भाई अपने ही बहन का हत्यारा बना और पिता पुत्री का कातिल। वजह था कमबख्त इश्क। इश्क। बस इश्क।" परी के झुलसे चेहरे पर उभरा मुस्कान महसूस किया जा सकता था।
 
अध्याय छह

इतना निर्दय तो दानव भी नहीं होते। इनकी तुलना न इंसानों से करना ठीक होता और न दानवों से। क्योंकि इन्होंने अपनी बहन और पुत्री की हत्या की और घर पर शांत ऐसे बैठे थे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। कविता जब उस लड़के से मिलने गई थी। यह उसका दुर्भाग्य था कि उसके पिता ने उसे देख लिया था।

प्रेम की क्या परिभाषा हो सकती है? उन्होंने कविता और उस लड़के के प्रेम का परिणाम का आंकलन करने के लिए जिन तर्कों का सहारा लिया क्या वह प्रेम की परिभाषा हो सकती थी।

किसी अन्य जाति के लड़के के साथ प्रेम करना, इस तरह से मिलना जुलना, अगर इनके संबंधों के बारे में किसी एक को भी खबर लगा तो आग की तरह यह पूरे क्षेत्र में फैल जायेगा।

बदनामी इतनी होगी कि किसी से नजरें मिलाने के काबिल न होंगे। समाज उनका उपहास करेगा। बिना अपराध किए ही लोग हीन भावना से देखेंगे। अभी जो लोग आदर और सम्मान देते है, मुंह पर थूकने को तैयार रहेंगे। भविष्य की हल्की झांकी ने कविता के पिता के हृदय में खौफ के वृक्ष बो दिए। ऐसी परिस्थिति में क्या करना उचित होगा? उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया।

ज्यादा विचार किए बिना ही उन्होंने निर्णय कर लिया था। कविता के ऊपर प्यार का भूत सवार है। समझाने का प्रयास व्यर्थ होगा। इसका परिमाण यह भी हो सकता है कि वह उस लड़के के साथ भाग जाय। इस परिस्थिति में भी बदनामी निश्चित था।

"और वहाँ तुम्हे सिर्फ एक शव ही मिला..?" कविता के पिता ने हंसते हुए परी से पूछा।

उस कब्र में अकेली कविता नहीं थी बल्कि वो लड़का भी था। उन्होंने उन दोनों को मारकर दफना दिया था।

"यह दुनियां प्रेम को समझने के काबिल नहीं है। उन्हें प्रेम के सफर पर चलता देख उनके हर कदम पर काटें बिछाते मिलते ये लोग। इसलिए मैंने उन दोनों को हमेशा के लिए एक कर दिया। अब उनकी प्रेम कहानी अमर है।" उनके स्वर में पश्चाताप के बजाय अभिमान और गर्व था।

कविता की माँ एक कोने में मौन बैठी थी। चाह कर भी वह कुछ नहीं कर सकी थी।

नीलिमा और परी खेत की ओर भागे। गाँव के बाहर दो लाशें दफ़न थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी और उनके हत्यारे सुकून की सांस ले रहे थे। नीलिमा और परी खेत पहुँचे। कुत्ते अब भी इस क्षेत्र की रखवाली कर रहे थे। कविता का मृत शव तो सामने था लेकिन वो लड़का? उन्होंने फिर से कब्र खोदना आरंभ कर दिया। हालाकि इन दृश्यों को देखने की हिम्मत उनमें नहीं थी लेकिन सत्य उनके सहारे ही सामने आना चाहता था।

नीलिमा के जाते ही कविता के पिता को गलती का बोध हुआ। नीलिमा ने तो सिर्फ कविता का नाम लिया था और उन्होंने अपने जुर्म के सारे पन्ने खोल दिए। इतनी बड़ी गलती। वह कितने मूर्ख है। अब नीलिमा खेत जाकर उन दोनों के शव को ढूंढ लेगी। लोगों को सब कुछ पता चल जायेगा। जिस बदनामी के भय से उन्होंने अपने हाथ गंदे किए वह तो होगा ही, कत्ल के अपराध में उन्हें कड़ी सजा भी भुगतना पड़ेगा। इतनी बड़ी मूर्खता..! उन्हें इस गलती को भी सुधारना था।

तेज बारिश थमने का नाम नहीं ले रहा था। कविता के घर से सीधे दोनों खेत की ओर आई है, वे जानते थे।

थोड़ा और कब्र खोदने के पश्चात उन्हे उस लड़के का भी शव मिला। दोनों एक दूसरे के हाथ थामें मौत की गहरी नींद सो रहे थे। अभी नीलिमा खड़ी ही हुई थी कि एक गोली उसके सीने को पार कर गई। वह मुंह के बल गिर पड़ी।

दनादन गोलियां बरसाते कविता के पिता और भाई इसी ओर आ रहे थे। उनके द्वारा बरसाए एक गोली ने अपना कार्य कर दिया था। अपनी माँ को मृत गिरता देख परी सदमें में चली गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थी। भावनाएं चेहरे पर उमड़ नहीं पा रहे थे। अचानक से उसकी माँ मौत को गले लगा बैठी थी। वह खड़ी थी। लेकिन निष्प्राण।

बंदूकों की आवाज सुन सभी कुत्ते भाग गए थे। भागते हुए आए और कविता के भाइयों ने परी को दोनो तरफ से घेर लिया। दोनों बंदूक ताने बेरहम हो खड़े थे। इतनी लाशें बिछाने के बाबजूद भी उनमें अपराधी होने का भाव दिखाई नहीं पड़ रहा था। तेज हवाएं, कड़कती बिजली, सब बस तमाशा देखने आए दर्शक की तरह थे।

"अरे..! अरे..! हैवानों.. रुको..! देखो इसे। इतनी प्यारी शक्ल देख तुम्हें इसपर दया नहीं आता? कैसे चला पाओगे बंदूक इसपर? हाथ नहीं कांपगें तुम्हारे?" कविता के पिता परी के नजदीक आए।

वो दोनो अब भी बंदूक ताने वैसे ही खड़े थे।

"बंदूक नीचे करो। सुना नहीं। इस पर गोलियां चलते तो मुझसे देखा न जायेगा।" अपनी ही पुत्री के खून से हाथ रंगने के बाद वो अभिनय अच्छा कर रहे थे दयावान होने का।

दोनों ने बंदूक की पकड़ ढीली कर दी। लेकिन निशाना अब भी परी का सीना और सर था।

कविता के पिता ने इधर उधर देखा। उन्हें वो लकड़ी का मोटा टुकड़ा दिखा जिससे उन्होंने कविता का सर फोड़ा था। उसे जब दफनाया जा रहा था, वो जीवित थी। परी का भी ये वही हाल करना चाहते थे।

उन्होंने लकड़ी उठाया और अगले ही क्षण दे मारा परी के सिर पर। माँ को मरता देख पहले से ही निष्प्राण हो चुकी परी धम्म से गिर पड़ी। खेत बारिश की पानी से भर चुका था। इसमें तीन लाशें तैर रही थी। कविता की, उसके प्रेमी की और नीलिमा की। तीनों बेकसूर थे। तीनों का कातिल एक ही थे। चौथा कत्ल होने को था।

वे आगे बढ़े। परी मुंह के बल गिरी थी। पानी ज्यादा होने की वजह से उसका सिर पूरी तरह से डूब गया था। कविता के पिता ने उसके सिर पर लात रख मिट्टी की ओर दबाया। परी सांस नहीं ले पा रही थी। दर्द मौत की राह पर ले जा रहा था। बस कुछ ही क्षण और। मौत उसे गले लगाने ही वाला था।

अचानक से मौसम बिगड़ जाने की वजह से राघव बाजार में फंस गया था। बारिश थम जाने का इंतजार करता रहा लेकिन यह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। आखिर उसे घर तो वापस आना ही था। भले ही क्यों अब भींगना पड़े। जब वह घर आया तो पूरी तरह से भींग चुका था। परी को पुकारते घर के भीतर गया। लेकिन दोनों में कोई वहाँ पर थी ही नहीं।

अंधेरे हो गया था। इस वक्त दोनों ही घर से बाहर है। वह बेचैन होने लगा। जब अपने पिता से दोनो के बारे में पूछा तो उत्तर मिला कि मर जाएं दोनो तो दिल को सुकून मिले।

राघव ने उनके बातों को अनदेखा कर दिया। लेकिन वो यह नहीं जानता था कि आज नीलिमा की सास और ससुर दोनों की ख्वाइश पूरी कर दी गई है। राघव ने दोनो को पड़ोस के घरों में ढूंढा। स्कूल की ओर भी देखा। जब दोनों में से कोई कहीं नहीं मिले तब वह खेतों की ओर भागा।

खेतों में काफी पानी जम गया था। झींगुर बस सोर मचाए जा रहे थे। मेढकों की आवाजें बेचैनी बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। राघव इधर उधर भागता ही जा रहा था। परी को पुकारते कभी मुंह के बल भी गिर पड़ता। गुजरते समय के साथ राघव का भय आकार लेता जाता। ईश्वर से हर सेकेंड प्रार्थना करता उनकी सलामती की और झाड़ियों, तालाबों, और अन्य स्थानों पर ढूंढता।

राघव की आवाज सुनकर कविता के पिता सतर्क हो गए। उन्होंने ने देखा कि परी ने छटपटाना बंद कर दिया है। शायद यह अब मर गई है। इससे पहले कि राघव यहाँ आए उन्हे यहाँ से जाना चाहिए। अगले ही क्षण उनके दिमाग में एक और कुराफात ने जन्म ले लिया।

"जल्दी भाग यहाँ से।" वे चिल्लाए और भागे। कविता के दोनों भाई उनके पीछे ही थे। इस बार सतर्क थें। इसलिए कि कहीं यह खूनी खेल लंबा न हो जाय।

राघव भागते हुए इसी ओर आ रहा था। उसकी नजरें बेसब्री से नीलिमा और परी की छवि को तलाश रहा था। जैसे ही वह खेत में पहुँचा एक बार फिर मुंह के बल गिर पड़ा। उसकी तेज सांसे जबतक धीमी नहीं हुई वह उठने की हिम्मत न जुटा सका। खेत में बारिश का पानी और पानी में तैरते तीन शव। कीचड़ संग लिपट उनके जिस्म से बहता खून साम्राज्य बढ़ाता ही जा रहा था। यह साम्राज्य राघव की नजरों को आकर्षित न करता ऐसा हो सकता है क्या? फिर वही भय का आतंक। वही मनोनस्थिति। हृदय और मस्तिष्क के मध्य जंग। नजरों के सामने पड़े दृश्य को झुठलाने का प्रयास। यह समझना कि कुछ नहीं बस यह एक बुरा सपना है।

राघव अभी घुटनों के बल ही था, सामने उसकी पत्नी, बेटी, कविता और पड़ोस गाँव का युवक मौत की नींद सोया था। एक साथ चार लाशें। किसकी मृत्यु का शोक सबसे पहले मनाता..! उसकी अवस्था मूर्छा से भी गंभीर थी। आंसू बारिश के बूंदों में घुलती जाती। हवाएं कानों में पराजय गीत गाती। वक्त के कहर पर बादल की हंसी, इन चार लोगों की मृत्यु पर कड़कती बिजली की खुशी। यह बिजली राघव को भी जला दे तो कहानी खत्म। पर ऐसा नहीं होता। कभी नहीं होता। प्रकृति इंसान को हंसाती और रुलाती भी है।

क्या हुआ अचानक से ये सबकुछ? कुछ समझ आता कि उसकी नजर आहट आती दिशा पर पड़ी। इन लाशों के शहर में कुछ अंतिम सांसे गिनती परी करबट बदल जल्दी जल्दी सांसे लेने लगी। जैसे कोई उसके शरीर से आहिस्ता आहिस्ता प्राण निकाल रहा हो। गहरे जख्मों से रक्तस्राव होता ही जा रहा था। यह कीचड़ के रंग में रंग भी रहा था। क्या मौत इतनी दर्दनाक होती है!

राघव उसकी ओर लपका। उसे गोद में उठाया। अपने वस्त्रों को फाड़ रक्तस्राव होने वाले अंगों पर लगाया। यह पहली बार था जब उसने बिना सामाजिक उलाहनों की परवाह किए अपने बेटी को सीने लगाया था। फूट फूट कर रोया भी था। परी मौत और जिंदगी के मध्य खड़ी थी। अपने लिए पिता के आँखों में उमड़े तूफान कैसे देखती, उसकी आँखें जो बंद थी।

वह अपनी पत्नी की मृत्यु और पुत्री के इस अवस्था का विलाप कर ही रहा था कि अचानक से उसे गाँव के लोगों की चीख सुनाई पड़ी। शब्द स्पष्ट तो नहीं था लेकिन ऐसा लगा जैसे कि गाँव में किसी के घर में आग लग गया है। राघव ने गाँव की ओर देखा। घर उसका ही जलाया गया था। आग की लपटें आसमान छूने को बेताब थी। हालाँकि वह गाँव से दूर था लेकिन आग उसके घर को जला रही थी यहाँ से स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था।

कविता के पिता और भाइयों ने अपने अपराध को छिपाने के लिए खेत से वापस लौटते ही राघव के घर में आग लगा डाले। परी के दादा और दादी उसी आग का आहार बन गए। ग्रामीणों ने पूरी कोशिश करी आग बुझाने की लेकिन असफलता के अलावा और क्या हाथ लगता।

"पहले उन्होंने मेरा घर बिखेरा, फिर आग लगाई, लेकिन अभी भी उन्हें संतुष्टि नहीं थी। न जाने किस अपराध का बदला वो हमसे लेना चाहते थे..!"

अदालत का माहौल बिल्कुल शांत हो गया था। सबकी नजरें परी के मुखमंडल पर ही टिकी थी। कहानी शायद रोचक होता जा रहा था तभी तो एक सेकेंड की चुप्पी भी अदालत में असहजता का माहौल गढ़ देता।

"आग उन्होनें ही लगाई थी..!" वकील साहब भी आश्चर्य में थे। कहानी सीधी नहीं थी। साधारण रफ्तार से बढ़ती कहानी में आया अचानक से ट्विस्ट सबको कहानी सुनते रहने में रुचि बढ़ाती रही। प्रकाश के लिए पर्याप्त ईंधन की तरह, जब तक जलेगी, रौशनी भी मिलेगी।

"हां... आग सिर्फ उन्होंने मेरे घर में ही नहीं लगाई थी बल्कि गाँव के लोगों के दिलों में लगाई थी। मेरा चरित्र भी उनकी सातिर बुद्धि के द्वारा गढ़ा गया था। उन्होंने लोगों को कहानी तो सच्ची सुनाई लेकिन किरदार बदल दिए। मुझे चरित्र हीन बताया। मुझे मेरी दोस्त कविता का कातिल बताया। मेरे पिता को उस अपराध का भागीदार बताया। उन्होंने कोशिश की थी मेरे और बाबा के बढ़ते अपराधी कदम में बेड़ियां डालने की लेकिन नाकाम रहे.. क्या करते मेरे पिता के हाथों में बंदूक था... जिसकी गोली ने मेरी माँ का प्राण लिया था। जिस दृश्य के वे साक्षी थे... उनकी झूठी कहानी लंबी थी। उनकी कहानी में अपराधी हम थे और हम ही ने अपने घर को जलाया था। मेरी दादा दादी का मेरे प्रति रूखा स्वभाव उनका अभेद हथियार बना। और ग्रामीणों को उनकी बातों का यकीन करना ही पड़ा।" परी बोलती रही।

कविता के पिता के द्वारा फेंका गया राघव के खिलाफ़ पासा उनके हित में था। उनकी झूठी कहानी सुनते ही ग्रामीण क्रोध में लाल हो गए। फैसला किया उन्हें तत्काल दंडित करने का। अपने गाँव में चरित्रहीन लड़की का होना और अपने ही पुत्री के कातिल का होना उचित नहीं था। इस भीषण अपराध का दंड भी भीषण होना चाहिए।

"राघव घर को आग लगा उधर खेतों की ओर भागा है... मैंने देखा था।" कविता का बड़ा भाई आक्रमक ग्रामीणों के सामने खड़ा हो खेतों की दिशा में इंगित करते हुए चीखा। उसके चीखते ही ग्रामीण खेतों की ओर ऐसे भागें जैसे कि वे लोग महीनों से भूखें हों और किसी ने उन्हें भोजन का पता बताया हो।

"मार डालेंगे उस पापी को... उसने हमारे गाँव का नाम खराब किया... वह अपराधी है और उसे दंडित करना गुनाह नहीं होगा... मार डालेंगे उस पापी को..." सभी भागते हुए चीख रहे थे।

उनके क्रोध की कोई सीमा नहीं थी। अगर इस समय राघव सामने होता तो उसका क्या हाल किया जाता कल्पना किया जा सकता है।

राघव को अपनी ओर आती आक्रमक भीड़ की चीखें सुनाई पड़ी। वह उनके मकसद को समझ गया था। अभी कुछ सोचने का समय नहीं था। किसी भी तरह बस परी को और खुद को बचाना था। लेकिन वह कुछ और देर अपनी पत्नी नीलिमा से लिपट कर खूब रोना चाहता था। आखिरी बार गले लगा। खून उसके वस्त्रों से लिपट गया। बारिश तो बहुत पहले ही रुक गया था। गीला घर भी सुखी फूस की तरह धधक रहा था। उसने परी को गोद में उठाया और बिना रास्ते और मंजिल की परवाह किए पूरी रफ्तार से भागा।

परी के बदन से रक्त के धब्बे बह जमीन पर गिरती और इतने समय अंतराल में वह कई मीटर की दूरी तय कर लेता। उसे रास्तों की परवाह नहीं थी। खुरदुरे मिट्टी की नोंक सुई की तरह पैरों में चुभते, पत्थर ठोकर मार बीच रास्ते में ही गिरा उसे नाकाम करने आते, कंटीली झाड़ियां राघव के जिस्म के कई हिस्से को चीर गई। बाप और बेटी दोनों ही एक दूसरे के खून से रंगे थे। एक अंतिम सांसे गिन रहा था तो दूसरा उसे बचाने जी जान लगा कर भाग रहा था।

ग्रामीण जब वहाँ पहुँचे तो उन्हें खेत में तैरते तीन लाशें मिली।

जब जिंदगी और मौत के मध्य प्रतिस्पर्धा होती है, तो जिंदगी चाहने वाला भी जीत जाता है, कई मामलों में हारता भी है। मौत चीज़ ही ऐसी है। राघव ग्रामीणों की नजरों में आने से पहले ही ओझल हो गया था। अब जितनी जल्दी हो सके परी को अच्छे अस्पताल में दाखिल करना अनिवार्य था, अन्यथा अनहोनी निश्चित थी।

वह हाईवे पर आया ही था कि उसकी नजर सड़क किनारे खड़े उस ट्रक पर पड़ी। बिना विचार किए वह उसपर चढ़ गया। उसकी तेज सांसे, आंसुओं की बारिश, अब तो एक शब्द बोल पाना भी कठिन था।

लंबी दूरी तक लगातार भागते रहने और घायल हो जाने की वजह से राघव बुरी तरह से थक गया था। परी को गोद में लिए, उसे अपने सीने से लिपटाए कब सो गया पता नहीं। ट्रक ड्राइवर घड़ी पर चढ़ा और म्यूजिक प्ले किया। गाने के धुन में लिरिक्स गुनगुनाते हुए ट्रक स्टार्ट किया और इस तरह परी, सुलेखा और राघव की जिंदगी का एक नया सफर शुरू हुआ।

अदालत में लगे पेंडुलम घड़ी अचानक से बज पड़ी। किसी को भी समय होश न था। धीरे धीरे सभी कहानी में खोने लगें थे, यह सच था या झूठ इसका निर्णय करना जज साहब का काम था। परी अपराधी थी या नहीं इसका फैसला भी उन्हें ही करना था।

"अदालत का समय समाप्त हो गया... कोट स्थगित किया जाता है और अगले दिन की तारीख तय की जाती है।" जज साहब को समय समाप्त होने का अफसोस हो रहा था। काश थोड़ा और वक्त होता। अब आगे की कहानी जानने के लिए अगले तारीख तक का इंतजार करना था।
 
अध्याय सात

माहौल में कुछ खास परिवर्तन नहीं हुआ था। अब भी क्रांतिकारी महिलाएं नारे लगाए जा रही थी। मीडिया की भीड़, परी के अदालत से बाहर आते ही उसकी तस्वीरें कैद करने दौड़ी। पुलिस भीड़ को हटाने में व्यस्त रही। अब परी को वापस उसी अंधेरी कोठरी में ले जाया रहा था।

कैमरे के फ्लैश लाइट से चकाचौंध होता माहौल मोहक तो नहीं था। इसमें सनसनी थी। क्रांति थी। आग सुलग रही थी उस भीड़ में जो उस कुरूप लड़की की झलक पाते ही इनसांफ दो के नारे लगा चिल्लाए जा रही थी। अगर इन्हें इंसाफ करने का एक अवसर मिलता तो यकीनन अगले कुछ सेकेंड के पश्चात उस कुरूप लड़की का शव अदालत के परिसर में कुचला हुआ मिलता। क्योंकि वही अपराधी है और अपराध उसी ने किया था, ऐसा ही विश्वास था उन्हें।

न्यूज चैनलों पर आग लगाती यह सुलगती सनसनी। एक खूबसूरत लड़की की छोटी तस्वीर और दूसरे तरफ उस कुरूप कातिल की और बहस जारी था। तर्क और तथ्य अपराधी के अपराध को साबित करते, और वजह की कल्पनाएं भी। कई तरह के विचार अफवाह का रूप लेने लगें। कुरूप लड़की के द्वारा सुनाया गया अधूरा दास्तां टीवी चैनलों की टीआरपी बटोरती रही।

आग की तरह फैला यह मुद्दा पूरे देश को जलाने को बेताब था और इधर बंद सलाखों के पीछे अंधेरे की गोद में बैठी उस लड़की की सिसकने की ध्वनि तक सुनने वाला कोई नहीं था। सत्य और इंसाफ के तराजू में तौल सब की नजरों में अपराधी साबित हुई लड़की का अपराध करने की वजह पूछने वाले उतने नहीं थे जितने उस अपराध की सजा देने के लिए थे। लेकिन अतीत की अंधेरी गुमनाम दुनियां में जाते ही सिर्फ और सिर्फ तूफान आने लगे थे। ह्रदय में भावनाओं की ज्वालामुखी अचानक ही फट पड़ा था। कौन संभाले इस टूटे भवन को, न अब इसमें दीवारें न ईंटें शेष है।

बचपन से अब तक घटित हुआ हर एक घटना चलचित्र की तरह आँखों के चारों ओर परिक्रमा पूरी रात करता रहा। जेल की सन्नाटे में पत्थर की मूर्ति दिखने वाली लड़की अतीत के आंचल में बैठ पूरी रात रोती रही। कोई कहता कि पत्थर रोया नहीं करते तो उसे एक झलक इसे अवश्य देखना चाहिए था। अब तक मजबूत दिखने वाली किसी शिल्पकार द्वारा शिल्पित मूर्ति की भी आँखे गीली थी।

अथाह अंधकार को चीरते हुए प्रकाश की अत्यंत तीव्र रौशनी अचानक से आँखों पर आ पड़ी। जब यह सामान्य हुआ तब नन्ही परी अपने घर के आंगन में नंगे पांव भागते नजर आई। छोटे छोटे पग में बंधे पायल का शोर कानों में गूंजता रहा। राघव उसे इस तरह से भागता देख आनंदित हो तो रहा था लेकिन नजरंदाज करने का असफल दिखावा कर रहा था। उस नन्ही परी के पीछे भागती सुलेखा। हंसने का शोर। खुशी। बचपन।

अचानक से वह दृश्य गायब हो गया। अब वह उसी खेत में खड़ी थी। उसकी सहेली और उसके प्रेमी की लाशें कीचड़ में तैर रही थी। तभी पूरी रफ्तार से गति करता बंदूक की गोली नीलिमा के शरीर में घुस गई। वह इस दृश्य को बिलकुल भी नहीं देखना चाहती थी। रेत पर लिखे अक्षरों की तरह ही इस दृश्य को जितनी जल्दी हो मिटा देना चाहती थी। लेकिन यह क्षण युग जैसे सहस्त्र वर्षों का हो गया हो।

फिर सुलेखा का हाथ थामे खेतों में भागते, बस भागते ही जा रही थी। और अचानक से यह दिन रात में तब्दील हो गया। उसने स्वयं को मोटे बेड़ियों में जकड़ा हुआ पाया और सामने सुलेखा लहूलुहान पड़ी थी। होश में ही थी, चीखती जा रही थी। एक हैवान आरी से उसकी टांगे काट रहा था। लहू की नदी बहती उसके पैरों के पास आ रही थी। रक्त की छींटे परी के चेहरे और वस्त्रों को रंग रहा था।

इस दृश्य ने उसे पूरी तरह से बेचैन कर डाला। ऐसा लगा कि हृदय अचानक से रुक गया है। नशों में दौड़ता रक्त पानी हो गया है। शरीर की प्रत्येक कोशिका नष्ट होती जा रही है। अथाह तड़प, बेशुमार दर्द। सिर्फ दर्द ही दर्द।

वह उठ बैठी। तेजी से हवाओं को फेफड़ों में भरने लगी। खुद को संभालने का प्रयत्न करती रही लेकिन अगले कुछ ही सेकंड के बाद सब्र टूट गया। रोना, व्यर्थ की माया है। रोने से क्या वास्तव में हृदय हल्का हो जाता है! अगर यह कथन सत्य होता तो परी और रोती और उसका दर्द समाप्त हो जाता। वह रोती रही।
 
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