अध्याय दो
सेंट्रल जेल के एक अंधेरे कमरे में जहाँ दीवार पर बना एक छोटा सा छेद ही माध्यम था प्रकाश के अंदर आने का। उस छेद से होकर आती हुई सूर्य की रोशनी एक मैले कुचैले कम्बल ओढ़े सोई लड़की पर पड़ रही थी।
कोने में सोई वह लड़की सर को कम्बल में ढक कर सोई हुई थी लेकिन उसकी हथेली और दूसरे हाथ की कुछ उंगलियां ही बाहर दिख रही थी। यह जला हुआ था और इसे देखकर ऐसा लग रहा था कि तेज़ाब ने शायद उसकी त्वचा को बिल्कुल ही नष्ट कर दिया था।
छोटे से छेद से अन्दर आती सूर्य की थोड़ी सी रौशनी से वक़्त का अंदाजा लगा पाना तो संभव नहीं था लेकिन शायद यह सुबह का ही समय था। चार - पाँच पुलिसवाले वहाँ आएं। एक इंस्पेक्टर और बाकी सब हवलदार थे शायद।
एक ने कारागार की सलाखें खोली और फिर एक - एक करके सब अन्दर प्रवेश किए। उस लड़की से कुछ कदम पीछे ही सब खड़े हो गए। सलाखों के खुलने की आवाजें और उनके कदमों की आहट की ध्वनि के बाबजूद भी वह बिना कोई हरकत किए वैसे ही सोई हुई रही। एक हवलदार कुछ दूर पीछे से ही अपने डंडे से उसके बदन को हिलाते हुए उसे जगाने की कोशिश करने लगा।
"उठ। ऐ लड़की उठ। उठ।" उसने उसके बदन को हिलाते हुए उसे जगाया और डंडा वापस पीछे खींच लिया।
सबसे पहले उस लड़की ने अपना चेहरा कम्बल से बाहर निकाली। उसके बिखरे मैले बाल और आँखें एकदम लाल जैसे उसकी पुतलियों में रक्त उमड़ आया हो।और पूरे चेहरे पर लाल-लाल घाव भरे पड़े थे। बिल्कुल ही कुरूप थी वह। उसकी बदसूरत शक्ल को देखकर वहाँ उपस्थित पुलिसवालों को घिन्न आ गया। इंस्पेक्टर ने एक ओर थूकते हुए कहा,' कैसे - कैसे लोग बनाता है भगवान? और बनाता भी है तो यहाँ क्यों भेज दिया? छिः इसे देखकर घिन्न आ रही है। कोई इतना बदसूरत कैसे हो सकता है?'
हालाकि उसकी शक्ल को देखकर उसकी उम्र का अंदाजा लगाना तो संभव नहीं था लेकिन उसकी उम्र करीब तेईस वर्ष होगा। वो उठ बैठी। हाथों एवं पैरों में चूड़ियों और पायल के बजाय बेड़ियां थी जो किसी भी तरह से श्रृंगार का प्रसाधन नहीं था। अपनी गर्दन झुकाए वो खामोश बैठी रही और उसके लंबे बालों ने उसके बैठने के तुरंत बाद ही उसके चेहरे और जिस्म को ढक लिया। लेकिन अब भी वो अपने पैरों को कम्बल से ढके हुए ही थी।
"विश्व सुंदरी जी, कृपया आप हमारे साथ चलने का कष्ट करेंगी? आज आपका अदालत में पेशी है।" इंस्पेक्टर ने उस कुरूप लड़की से उसकी सुंदरता का उलाहना देते हुए कहा।
अपने हाथों का सहारा लेते हुए वो उठ खड़ी हुई और लड़खड़ाते हुए कारागार से बाहर निकली। उसके पीछे सभी पुलिसवाले भी कारागार से बाहर निकलें। जेल के बाहर आते ही उसकी आँखें चकाचौंध हो गई। न जाने कितने दिनों से वो उस अंधेरे कारागार में कैद थी। हालाकि अब भी बेड़ियों ने उसके हाथों और पैरों को जकड़ रक्खा था। धूप की चिलमिलाती रौशनी जब उसकी आँखों पर पड़ी तो उसकी पलकों को बंद होने के लिए बेबस होना पड़ा। इस तेज रौशनी से आँखों को बचाने के लिए उसने अपनी हथेलियों से आँखों को ढक लिया। कुछ देर बाद जब उसे लगा कि अब वह सूर्य की किरणों की चमक को झेल सकती है; धीरे - धीरे आँखें खोलकर सूर्य से नज़रे मिलाई। मई के महीने में सुबह आठ बजे भी इतनी कड़ाके की धूप होती है। उसे यहाँ से अदालत ले जाने के लिए एक गाड़ी उसका इंतजार कर रही थी। वो उस गाड़ी पर जाकर बैठ गई। उसके बैठने के उपरांत महिला पुलिस की एक टीम भी गाड़ी पर बैठी। और गाड़ी अदालत को रवाना हुई।
उसकी इस बदसूरत छवि को देखकर कोई कुंठित न हो जाय इसलिए उसे एक बुर्का जैसा काले रंग का लिवास पहना दिया गया था। हर न्यूज चैनल की ब्रेकिंग न्यूज पर बस एक ही सुर्खी छाई थी। उस लड़की को जेल से अदालत के जाने की घटना। आखिर उसने ऐसा क्या गुनाह कर दिया था? जेल से अदालत जाने तक की हर एक घड़ी को सभी न्यूज चैनल पर लाइव प्रसारित किया जा रहा था और टीवी के सामने लोगों की भीड़ भी उमड़ी पड़ी थी।
जब वह गाड़ी पर बैठी थी तो कुछ रिपोर्ट दूर से ही उसकी तस्वीर को कैमरे में कैद करके अपने चैनल पर प्रसारित कर रहे थे। लेकिन इन सब का प्रभाव न ही उस कुरूप लड़की पर पड़ा और ना ही उसके साथ खड़े पुलिस वालों को।
"... तो गाड़ी यहाँ से खुल चुकी है और गुनेहगार को अदालत ले जाने के लिए पुलिस की गाड़ी अदालत को रवाना हो गई है।.." एक रिपोर्टर टीवी स्क्रीन पर बोलता हुआ दिखा और उसके पीछे पुलिस की वो गाड़ी खुली।
पता नहीं किस सोच में मग्न थी वो? रक्त से लाल आँखों में कुछ क्षण के लिए जैसे स्नेह उमड़ पड़ा था और शायद अपनी खूबसूरती की छवि की कल्पना करने लगी थी लेकिन अचानक से ही उसे अपनी वास्तविकता का आभास हो गया। हाथ से ज्यादा लम्बाई वाले बुरके से अपनी कलाई को थोड़ा बाहर निकाली और कुछ क्षण तक लगातार देखती रही। हृदय में उमड़ रहे वेदनाओं और भावों को स्पष्ट कर पाना तो मुश्किल था क्योंकि दिल की बात कहने वाली आँखें रक्त की तरह लाल थी और भाव को स्पष्ट करने वाली चेहरे की त्वचा झुल्सी, काले नकाब के पीछे कैद थी। लेकिन इतना तो यकीन से कहा जा सकता है कि अपनी छवि की वास्तविकता उसकी हृदय को सुकून तो दे नहीं सकता था।
पास ही में बैठे एक पुलिस ने वक़्त व्यतीत करने के लिए अपना मोबाइल निकाल कर उसमे टिक- टॉक देखने लगे। एक दो वीडियो देखने के बाद जब उन्होंने स्वाइप अप किया तो मोबाइल स्क्रीन पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की की छवि दिखाई पड़ी। कई मिलियन फॉलोअर्स वाली उस लड़की को वो देख ही रही थी कि उस पुलिसवाले ने उसकी ओर देखा। मोबाइल स्क्रीन पर दिख रही उस लड़की और उसके पास ही में बैठी उस कुरूप अपराधी की तुलना करते हुए अपने मन ही मन में कहने लगा कि कहाँ ये और कहाँ तुम! इसकी खूबसूरती की तुलना तुमसे करना ही बेवकूफी होगी। किसी को भी दीवाना बनाने वाली उसकी आँखें और तुम? तुम पर तो थूकने का मन करता है।
उसके हृदय में उमड़ रहे अपने प्रति विचारों को स्पष्ट समझ गई थी लेकिन इससे पहले कि वो मोबाइल स्क्रीन से नजर हटाती उसने मोबाइल बंद करके वापस से जेब में रख लिया।
आज भीड़ भी बहुत थी अदालत में। कुछ इस केस की स्टडी करने वाले थे, कुछ वकील, कुछ मुजरिम और कुछ उन्हें छुड़ाने और सजा दिलाने के लिए। न्याय का मंदिर कुछ लोगों के लिए व्यापार का दुकान सा था कि जब चाहे गुनाह करके माफ़ी खरीद आएं। कुछ पैसों के बल पर न्याय खरीदते हैं तो कुछ लालची माफ़ी बेचते हैं। इसी वजह से गुनाह के दलदल से गुनेहगार गुनाह करके आजाद घूमता है और एक बेकसूर सजा काटता है। यहाँ का वातावरण कुछ ऐसा ही था या कुछ और, यह तो एक रहस्य है।
अदालत के बाहर बहुत सारी स्त्रियां खड़ी नारे लगाए जा रही थी,' We want justice..! हमें न्याय चाहिए..! औरतों को न्याय दो। उनको उनका अधिकार दो।"
कोरे कागज की तख्ती पर कुछ काले अक्षरों में यही सारे नारे लिखे थे जिसे यहाँ उपस्थित सारी औरतें लगातार दुहराए जा रही थी। भीड़ इतनी बड़ी थी कि परिसर क्षेत्र का फैलाव सिमटा हुआ प्रतीत हो रहा था। आखिर क्या वजह है कि ये औरतें न्यायालय के बाहर क्रांतिकारियों की तरह प्रदर्शन कर रही है? और किस चीज के लिए न्याय माँग रही है? कैसा अधिकार चाहिए था उन्हें? हर चीज की आजादी तो है; पढ़ने की, लिखने की, स्वतंत्र घूमने–फिरने की, अपने दम पर खड़ा होने के लिए, रोजगार करने के लिए और नौकरी करने के लिए।
वास्तव में सिक्के की दूसरी पहलू की तरह ही इस घटना की एक पहलू भी अभी नज़रों से ओझल है।
एक रिपोर्टर उन औरतों के पास गया और सबसे आगे खड़ी एक औरत से पूछा कि आपको क्या लगता है कि कौन गुनेहगार है? कुछ कहना चाहती है आप?
"वो स्वाभिमानी थी और स्वाभिमान थी हम औरतों की। वो प्रेरणा थी हमारी। हमारे समाज के खोखले रीति रिवाजों को आज बदलना होगा। हम भारत की स्वतंत्र महिलाएं हैं। हमें न्याय चाहिए। हमें अपना स्वाभिमान चाहिए। औरतों को उनका पहचान चाहिए।" और वह फिर से नारा लगाने लगी। *We want justice..! We want justice..!"
यह मामला भी शायद उसी कुरूप लड़की से संबंधित था जिसे अभी अदालत में लाया जा रहा था। एक ओर किनारे में आ कर रिपोर्टर कैमरा की ओर देखते हुए बोलने लगा।
"जैसा कि आप देख रहे हैं कि आज औरतें अपनी स्वाभिमान, अपनी पहचान पाने के लिए लड़ रही है। इनकी यह क्रांति क्या रंग लाएगी? और आज पेश किया जा रहा है उस अनजान कुरूप महिला को अदालत में जो इस क्रांति कि सबसे बड़ी वजह है।" और अचानक से उसकी नजर उस गाड़ी पर पड़ी जिसपर से उस लड़की को यहाँ पर लाया जा रहा था। उसने तुरंत कैमरामैन को उस गाड़ी की ओर फोकस करने का संकेत दिया और बोलने लगा।
"और वो देखिए। जेल से गाड़ी आ गई।" इतना बोलने के बाद रिपोर्टर गाड़ी की ओर भागा ताकि उन पुलिसवालों से और उस कुरूप लड़की से दो बातें पुछ सके। लेकिन इस दौड़ में वह अकेला प्रतिभागी नहीं था। गाड़ी को रुकने से पहले ही रिपोर्टरों और कैमरामैन ने और समाचार पत्रों के कुछ पत्रकारों ने गाड़ी को घेर लिया।
क्रांतिकारी महिलाओं की भीड़ उस गाड़ी को देखकर आक्रमक होते दिखाई पड़ी लेकिन वह नारे लगाती रही। क्योंकि अभी उन्हें न्यायाधीश के फैसले का इंतजार था। अन्यथा एक अकेली स्त्री को रौंदने के लिए यह भीड़ सिर्फ पर्याप्त ही नहीं था बल्कि उससे कहीं ज्यादा था।
एक दुकान में टीवी पर इस घटना को देखने वाले लोगों की भीड़ उमड़ी हुई थी और घरों में लोग काम छोड़कर समाचार सुन रहे थे। बॉलीवुड के थ्रिलर फिल्मों की तरह ही यह मामला पेचीदा था और बहुत सारे लोगों के दिलों में कई तरह के प्रश्न उमड़ रहे थे। टीवी पर उन्होंने देखा कि गाड़ी रुकी और सबसे पहले कुछ पुलिसवाले उतरे और फिर वो कुरूप लड़की।
भीड़ को हटाते हुए पुलिस उस लड़की को अदालत के भीतर ले गए। रिपोर्टरों और पत्रकारों की भीड़ के प्रश्न का बिना कोई उत्तर दिए। क्योंकि शायद उन्हें भी इस घटना के बारे में जानकारी पूरी नहीं थी।
अदालत में, लोग आपस में चर्चा कर रहे थे और इस मामले को अच्छी तरह से समझने की कोशिश कर रहे थे। वहाँ उपस्थित कई वकील इस केस से संबंधित कागज़ों को बार - बार पढ़ रहे थे ताकि न्यायमूर्ति न्यायधीश के समक्ष इसे अच्छी तरह से पेश कर सकें। न्यायधीश के प्रवेश करते ही सभी खड़े हो गए। आसन ग्रहण करने के पश्चात न्यायधीश ने सभी को बैठने के लिए कहा और सभी बैठ गए। उसके बाद फिर कुछ समय के लिए पूरे अदालत में खामोशी का ही माहौल रहा।
"अदालत की कार्यवाही शुरू कीजिए।" न्यायधीश ने अगले कुछ सेकेंड के बाद कहा।
उस कुरूप लड़की को कटघरे में खड़ा किया गया था। न्यायधीश के आदेश के बाद एक वकील उठे और बोलने लगें।
"Your Honor... हमारा कानून और संविधान हमेशा से ही औरतों और मर्दों को एक समान माना है। केवल आज ही के समय में नहीं बल्कि इतिहास में भी कई नारियों ने ऐसी कृतियां पाई है जिसने भारत देश का सर गर्व से ऊँचा कर दिया । झांसी की रानी जैसी बहादुर वीरांगनाओं की जननी है हमारा देश भारत। लेकिन कुछ औरतें समाज के लिए रोग होती हैं। कहते है लोग कि औरतों का दिल कोमल होता है लेकिन.., शायद इसके पास तो दिल है ही नहीं। जिसने कई लोगों का बेरहमी से कत्ल किया। आईपीसी के धारा 300, 302, 350 इसकी गुनाहों की बखान करने के लिए काफी नहीं होगा। इसने एक प्रतिष्ठत महिला परी का कत्ल किया। पुलिसवालों की हत्या की। नेताओं को भी नहीं छोड़ा और फिर यहाँ तक की अपने परिवार वालों को जिंदा जला दिया। इसके अलावा कई निर्दोष लोगों की जान ली है इसने। परी, जिसकी कातिल आज कटघरे में खड़ी है। और यही वजह है कि समाज की सारी स्त्रियां आज क्रांति पर उतर आई हैं। कई सबूत है इसके खिलाफ।"
फिर वकील ने न्यायधीश की अनुमति से अदालत में एक लैपटप मंगवाया और उसमे एक वीडियो जो कि सीसीटीवी रिकॉर्डिंग था, प्ले करके उन्हें दिखाया।
"ये सीसीटीवी रिकॉर्डिंग है जिसमें ये परी का कत्ल कर रही है और उसके बाद उसके चेहरे और शरीर को तेजाब से जला दिया।" वकील ने वीडियो प्ले करने के दौरान कहा।
बिल्कुल उनके कथन के अनुसार ही चित्रित दृश्य लैपटॉप स्क्रीन पर दिख रहा था। पहले तो उस कुरूप लड़की ने परी की गर्दन रेत दी और अगले ही क्षण उसी छुरे को उसके सीने में घोंप दी। और उसे आहिस्ता - आहिस्ता घूमाने लगी ताकि वो दर्द से तड़पे। और जब वो मर गई तो तेजाब को उसके चेहरे और पूरे शरीर पर डाल दिया। उसे लग रहा था कि उस लड़की का कत्ल करते हुए उसे किसी ने नहीं देखा लेकिन उसकी सारी करतूतों को एक गुप्त कैमरा कैद कर रहा था। तेजाब का बोतल वहीं पास में ही फोड़ दी और भाग गई। अपनी कुरूपता को ढकने के लिए जिस रंग का दुपट्टा वो ओढ़े हुए थी उस वीडियो में परी का कत्ल करके भागने वाली लड़की ने बिल्कुल वैसा ही दुपट्टा बिल्कुल उसी अंदाज में अपने चेहरे के ऊपर बाँध रखी थी।
"जाहिर है My Lord कि कत्ल करने की इसकी एक मात्र वजह थी उसकी खूबसूरती। ये कुरूप जो ठहरी। इससे लोगों की सुंदरता देखी नहीं जाती और न जाने इसने परी जैसे कितनी निर्दोष लड़कियों की हत्या की है।"
वकील की दलीलें स्पष्ट कर रही थी उसकी गुनाहों को और अब इंतजार था तो बस जज साहब के फैसले का। कुछ देर तक वो उस लड़की को देखते रहे। शायद इस लिए कि अगर उसने अपनी बचाव के लिए कोई वकील को नियुक्त किया हो तो उसे अदालत में दलील पेश करने को कहे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। अपनी बचाव में उसने कोई वकील नियुक्त नहीं किया था और अभी वो स्तंभित कटघरे में खड़े न्यायधीश के फैसले का इंतजार कर रही थी। उसकी इस व्यवहार ने जज के हृदय में उसके बारे में जानने की उत्सुकता जगा दिया। उन्होंने इस केस के कागजों पर एक नजर डाल कर शायद उसका नाम ढूंढने की कोशिश की लेकिन किसी भी दस्तावेज़ में उसका नाम अंकित था ही नहीं। ये कैसा मुकदमा है कि गुनेहगार का नाम ही ज्ञात नहीं है? और पहली ही सुनवाई में फैसले की घड़ी आ गई?
"नाम क्या है इसका?" उन्होंने उस वकील की ओर देखते हुए पूछा।
"ये कोई नहीं जानता कि ये कौन है और इसका नाम क्या है। और ये कहाँ से आई है। क्योंकि ये किसी को अपने बारे में कुछ भी नहीं बताती। नाम भी नहीं।" यह तथ्य थोड़ा चौंकाने वाला था। यहाँ उपस्थित वो लड़की जो कटघरे में खड़ी थी उसके बारे में किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं था। यहाँ तक की नाम भी नहीं।
"कौन हो तुम?" जज साहब ने उस लड़की से पूछा।
बिना उत्तर दिए वो खामोश रही। भले ही कोई कितना ही कुरूप और निराशावादी क्यों न हो लेकिन अपनी जिंदगी से प्रेम तो हर किसी को होता है। लेकिन ये लड़की अपने बचाव में कुछ कहने के बजाय बिल्कुल शांत किसी मूर्ति की भांति खड़ी थी।
"नाम क्या है तुम्हारा?" कुछ सेकेंड के इंतजार के बाद भी जब उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने गुस्से से चिल्लाते हुए उससे पूछा।
"मै, औरत हूं। संस्तरण हूं मर्दों की। बिछावन हूं समाज की। कैदी हूं रिवाजों की। आजादी के सत्तर साल के बाद भी गुलाम हूं मर्दों की। और बंधी हूं समाज की बेड़ियों में।" बिना किसी तरह के भाव को प्रकट किए किसी मूर्ति के समान कटघरे में खड़ी उस लड़की ने उत्तर दिया।
"नाम क्या है तुम्हारा?"
"कितने बताऊं? कई नाम दिए हैं लोगों ने मुझे। कसबिन, कुलटा, और वैश्या।"
"तुम गुनेहगार हो?"
"हुन्न..!"
"क्या गुनाह किया है तुमने?"
"एक औरत के रूप में जन्म लेने की। अपने स्वाभिमान को पाने की। अपनी पहचान पाने की कोशिश किया है मैंने।"
जटिल भाव थे उसकी चेहरे पर। ऐसा लग रहा था कि एक प्रसिद्ध शिप्लपकर के द्वारा बनाई गई मूर्ति वेदनापूर्ण शब्दों में न्यायधीश के प्रश्नों का उत्तर दे रही है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मूर्ति किसी भी तरह के भाव को प्रकट नहीं कर सकती उसकी लाल आँखें भावहीन थे। लेकिन उसके शब्द में छिपी वेदनाएं यहाँ उपस्थित हर किसी के हृदय को टटोलने लगा था और जल्दी ही उन्हें आंसू बहाने पर विवश करने वाला था। क्या थी उसकी कहानी? क्यों थी वो इतनी कुरूप? उसने आगे जो शब्द कहें उसने हर किसी के चेहरे का भाव ही बदल दिया। वो बोली।
"मोहब्बत..! मोहब्बत की थी मैंने। मोहब्बत..!"
एक बार फिर अगले कुछ सेकेंड के लिए अदालत में खामोशी छा गया। उसकी जिंदगी के शब्दकोश में भी मोहब्बत नाम का शब्द अंकित होगा ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। पर ये तो गुनेहगार थी और कुरूप इतनी कि इसे देखने वाला बस इससे घृणा ही करेगा। मोहब्बत नहीं।
"अपनी सफाई में कुछ कहना चाहती हो?" जज साहब ने प्रश्न किया।
"नहीं..!" कुछ सेकेंड के चुप्पी के बाद उसने उत्तर दिया।
न्यायधीश के इतने प्रश्नों के बाद भी उसके बारे में सबकुछ अज्ञात था और उनका प्रश्न अब भी प्रश्न था। भले ही कोई कितना ही बड़ा गुनेहगार क्यों न हो, उसकी कामना यही होती है कि उसे उस गुनाह की सजा न मिले। वह अपना हर एक संभव प्रयास लगाता है अपना बचाव करने के लिए। लेकिन इस लड़की की फितरत हर किसी को उसके बारे में जानने की उत्सुकता उत्पन्न कर रहा था।
"तुम्हारे दिल में बहुत ही गहरा राज दफन है। तुम्हारे हृदय में वेदनाओ की बस्ती सजी है जो तुम्हारे शब्दों से स्पष्ट हो रहा है। गुनेहगार हो तुम। लेकिन कोई जन्म से ही गुनेहगार नहीं होता। तुम्हें न्याय मिलता।"
"कैसा न्याय?" वो न्यायधीश की बात काटते हुए बोली। "इतना घाव दिया है इस न्याय शब्द ने मुझे कि अब मै तड़प भी नहीं सकती। और अब जरूरत नहीं है मुझे इसकी। मै गुनेहगार हूं। और हर एक इल्ज़ाम कुबूल करती हूं। आप न्यायधीश हो। फैसला करो और मुझे सजा-ए-मौत दो।"
एक अपराधी जिसे न्याय की कामना ही नहीं था और खुद के लिए सजा में मौत माँग रहा था। अजीब था ना? उसके बातों ने जज की ऐसी-तैसी कर दी। वे विचार में पड़ गए कि आखिर ये चीज क्या है? उन्होंने चश्मा उतारा और रुमाल से साफ करके अपनी आँखें पोंछी। फिर चश्मा वापस पहन लिया। उसके गुनाहों से सजा वो दस्तावेज उनके सामने रक्खा था और उसकी गुनाहों को साबित करने वाला सबूत भी। लेकिन कुछ तो ऐसा था जो उन्हें फैसला सुनाने से रोक रहा था।
"मैं मानता हूं कि अदालत सबूत को मानता है जज़्बात को नहीं। हां मैं थोड़ा सा जज्बाती हो रहा हूं क्योंकि तुम्हारी बातों ने मुझे विवश कर दिया है। सारे सबूत भी है और तुमने अपना गुनाह कबूल भी कर लिया है। लेकिन अपना फैसला सुनाने से पहले मै तुम्हारी कहानी सुनना चाहता हूं। प्लीज मुझे बताओ कि कौन हो तुम?" उन्होंने कहा।
"हक़ीक़त। और कहानी। हक़ीक़त ऐसी है कि किसी को यकीन नहीं होगा और कहानी, कहानी लगेगा। आपने तो बिल्कुल सही कहा कि कोई जन्म से ही गुनेहगार नहीं होता। लेकिन मै थी। मै तो बदनसीबी के साथ पैदा हुई हूं और किस्मत का खेल तो देखिए कि आज मै अपनी ही कत्ल की सजा पाने के लिए कटघरे में खड़ी हूं।"
उसकी ये बात सबके जहन में उथल-पुथल मचा गई। यह किसी फिल्म के कहानी की तरह बनावटी लग रही थी जिसपर विश्वास कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है लेकिन शायद यही सत्य था।
"वाह..! क्या दिमाग पाया है तुमने।" वकील ने ताली बजाते हुए कहा "जैसे कि यह कोई फिल्म की कहानी हो।"
"कहानी..!" वो हंसी और अपने चेहरे पर से दुपट्टा हटाई। "आज तो यही कहानी है। एक कुरूप लड़की की कथा जो केवल मनोरंजन का एक साधन थी लेकिन कोई कल्पना नहीं.., फिल्मों की तरह। परी, परी रक्खा था मेरे पिता ने नाम मेरा। उनकी लाड़ली थी। पर, उन्होंने जताया नहीं।"
"इसीलिए तुमने अपने पिता को मार डाला क्योंकि एक बेटी के रूप में तुम्हे वो स्नेह नहीं मिला जो तुम उनसे पाना चाहती थी। कुरूप हो ना? कैसे जताते अपना स्नेह?" वकील के तीखे सवालों से बेशक उसका कलेजा छलनी होने लगा था। लेकिन इसका प्रभाव उसकी आँखों में व्यक्त नहीं हो रहा था क्योंकि पहले से ही उसके दिल में अनगिनत छेद थें।
"एक लड़की होने का गुनाह और उसकी सजा थी वो। एक स्त्री होने की गुनाह में मैंने जो पाया है ईश्वर किसी को वो नाम न दे। कितनी उलझी सी है कहानी मेरी! जिंदगी की हर खुशी, हर चाहत खो दी मैंने। अपनी स्वाभिमान पाने की कोशिश में मैंने अपनी पहचान खो दी। इतना नोंचा है मेरे जिस्म को उन दरिंदों ने कि जख्म सिर्फ मेरे जिस्म पर नहीं, रूह पर भी गहरे हैं।" इतना बोलने के बाद उसने उस कम्बल को अपने जिस्म से हटा दिया जो वो ओढ़े हुई थी।
उसके हाथों पर और पीठ पर ऐसे घाव थे मानों किसी ने उसके जिस्म से चमड़ों को नोंच डाला हो।
"ईश्वर की रचना बहुत ही खूबसूरत है। अद्भुत है। लेकिन मेरी इस रूप को उस ईश्वर ने नहीं रचा। एक-एक करके मैंने इतना खोया है कि कुछ और बचा नहीं खोने को। इतना दर्द है मेरे दिल में, मेरी रूह में, कि आंसू बचा नहीं रोने को। मैं छोटी थी और मेरी बड़ी बहन सुलेखा मुझे बहुत प्रेम करती थी। हमारे गाँव में जो सरकारी मिडिल स्कूल है, जिसमें हम दोनों पढ़ने जाते थे। उस वक़्त मै चौथी में पढ़ती थी और वो छठी में।" उसने बोलना जारी रक्खा।