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उस वक़्त रात के क़रीब एक बज रहे थे जब मैं अपने घर के दरवाज़े पर खड़ा डोर बेल बजा रहा था। मेरी उम्मीद के विपरीत दरवाज़ा जल्दी ही खुला और दरवाज़े के उस पार मेरी माता श्री नज़र आईं। मुझ पर नज़र पड़ते ही उन्होंने ब्याकुल भाव से झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया।
"कहां चला गया था तू?" फिर उन्होंने दुखी भाव से मुझे अपने गले से लगाए हुए ही कहा_____"मैं और तेरे पापा तेरे लिए कितना परेशान थे। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे कि जाने तेरे साथ क्या हुआ होगा जिसकी वजह से तू वापस घर नहीं लौटा।"
"मैं एकदम ठीक हूं मां।" मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"और हां माफ़ कर दीजिए, मुझे आने में काफी देर हो गई। असल में मैं मोटर साइकिल से गिर गया था जिसकी वजह से मेरे पैर के घुटने में चोंट लग गई थी।"
"क्या कहा???" मेरी बात सुनते ही माँ ने ब्याकुल हो कर कहा_____"तू मोटर साइकिल से कैसे गिर गया था? कहीं तू मुझसे झूठ तो नहीं बोल रहा? सच सच बता कैसे लगी तुझे ये चोट?" कहने के साथ ही माँ ने झट से मेरे पैंट को ऊपर सरका कर चोंट पर लगी पट्टी को देखा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"कहीं तेरा एक्सीडेंट वग़ैरा तो नहीं हो गया था और ये तेरे घुटने पर पट्टी कैसे लगी हुई है?"
"वो मैं हॉस्पिटल चला गया था न।" मैंने बहाना बनाते हुए कहा____"वहीं पर मैंने मरहम पट्टी करवाई है। इसी सब में इतनी देर हो गई। वैसे ये तो बताइए कि पापा मुझ पर गुस्सा तो नहीं हैं ना?"
"पहले तो वो गुस्सा ही हुए थे।" माँ दरवाज़े से एक तरफ हटते हुए बोलीं जिससे मैं दरवाज़े के अंदर दाखिल हुआ____"उसके बाद जब तू इतना समय गुज़र जाने पर भी घर नहीं आया तो उन्हें तेरी चिंता होने लगी थी। उसके बाद वो एक एक कर के तेरे दोस्तों के घर वालों को फ़ोन किया और तेरे बारे में पूछा लेकिन तेरे दोस्तों ने उन्हें यही बताया कि तू उन लोगों के साथ ही चौराहे तक आया था। उस वक़्त तक तू ठीक ही था। उसके बाद का उन्हें कुछ पता नहीं था।"
"हां वो चौराहे के बाद ही मैं मोटर साइकिल से गिरा था।" मैंने कहा____"कोहरे की धुंध में मुझे सड़क पर मौजूद स्पीड ब्रेकर दिखा ही नहीं था। जिसकी वजह से मोटर साइकिल के हैंडल से मेरे हाथों की पकड़ छूट गई थी और मैं उछल कर सड़क पर गिर गया था।"
"चल कोई बात नहीं।" माँ ने दरवाज़ा बंद कर के मुझे अंदर की तरफ ले जाते हुए कहा_____"शुकर है कि ईश्वर की दया से तुझे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। हम दोनों तो तेरे लिए बहुत ही ज़्यादा चिंतित और परेशान हो गए थे।"
मैं माँ के साथ अंदर आया तो देखा ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर पापा बैठे थे। मुझे देखते ही वो उठे और झट से मुझे अपने गले से लगा लिया। उसके बाद उन्होंने भी मुझसे वही सब पूछा जो इसके पहले माँ मुझसे पूछ चुकीं थी और मैंने भी उन्हें वही सब बताया जो माँ को बताया था। ख़ैर माँ ने मुझे खाना खिलाया। खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया।
जैसा कि मैंने शुरू में ही बताया था कि मैं अमीर फैमिली से ताल्लुक रखता था। मेरे पापा का बहुत बड़ा बिज़नेस था और मेरे माता पिता दोनों ही उस बिज़नेस को सम्हालते थे। पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने भी उनसे ज्वाइन करने के लिए कहा था लेकिन पापा ने मुझे ये कह कर मना कर दिया था कि अभी कुछ समय लाइफ़ को एन्जॉय करो। उसके बाद तो बिज़नेस ही सम्हालना है। मैंने भी सोचा कि चलो कुछ समय के लिए मुझे इस झंझट से दूर ही रहना चाहिए।
मेरा घर, घर क्या था बल्कि एक बड़ा सा बंगला था जिसमें हर तरह की सुख सुविधाएं थी। बंगले में कई सारे नौकर चाकर थे। मैं भले ही अपने माता पिता की इकलौती औलाद था लेकिन मुझ में अपने अमीर माता पिता का बेटा होने का कोई घमंड नहीं था और ना ही मेरा ऐसा स्वभाव था कि मैं उनके पैसों को फ़ालतू में इधर उधर उड़ाता फिरुं। मैं दिखने में और पढ़ने लिखने में बहुत ही अच्छा था। मेरी बॉडी पर्सनालिटी भी ठीक ठाक थी लेकिन मुझ में सिर्फ एक ही ख़राबी थी कि मेरा स्वभाव औरतों के मामले में कुछ ज़्यादा ही शर्मीला था।
अपने कमरे में आ कर मैं बेड पर लेट गया था और कुछ समय पहले जो कुछ भी मेरे साथ हुआ था उसके बारे में सोचने लगा था। मेरे ज़हन में उस रहस्यमयी शख़्स की एक एक बातें शुरू से ले कर आख़िर तक की गूंजने लगीं थी। उन सब बातों को याद कर के मैं सोचने लगा कि क्या सच में ऐसा हो सकता है? क्या सच में ऐसी कोई संस्था हो सकती है जिसमें इस तरह के एजेंट्स होंगे जो औरतों और मर्दों को सेक्स की सर्विस देते हैं? क्या सच में बाहर के मर्द और औरतें ऐसी किसी संस्था के एजेंट्स द्वारा अपनी सेक्स की भूंख को शांत करते होंगे? क्या ऐसा करने से किसी को भी इसका पता नहीं चलता होगा? मर्दों का तो चलो मान लेते हैं कि वो ये सब आसानी से कर ही लेते होंगे लेकिन औरतें कैसे किसी ऐसे आदमी के साथ सेक्स कर लेती होंगी जो उनके लिए निहायत ही अजनबी होता है? क्या इसके लिए पहले से कोई ऐसा प्रोसेस होता है जिसके बाद औरतों के लिए किसी दूसरे मर्द के साथ सेक्स करना आसान हो जाता होगा?
इस बारे में मैं जितना सोचता जा रहा था उतना ही मेरे ज़हन में और भी सवाल उभरते जा रहे थे। किसी किसी पल मैं ये भी सोचने लगता कि कहीं ये कोई ख़तरनाक जाल तो नहीं है जिसमें वो रहस्यमयी शख़्स मुझे फ़साना चाहता है? मेरे माता पिता दोनों ही बिज़नेस वाले थे और ज़ाहिर है कि इस क्षेत्र में उनका कोई न कोई दुश्मन भी होगा जो उन्हें इस तरह से भी नुक्सान पहुंचाने का सोच सकता है। ये ख़याल ऐसा था जिसके बारे में सोचते ही मेरे ज़हन में ये बात आ जाती थी कि मुझे इस तरह के किसी भी लफड़े में नहीं फंसना चाहिए। क्या हुआ अगर मुझे किसी लड़की को भोगने का सुख प्राप्त नहीं हो रहा? कम से कम इससे मेरे माता पिता पर किसी तरह की कोई आंच तो नहीं आ रही। अब ऐसा तो है नहीं कि मुझे अपनी लाइफ़ में कभी कोई लड़की मिलेगी ही नहीं। मैं उस लड़की के साथ भी तो सेक्स ही करुंगा जिससे मेरी शादी होगी?
बेड पर लेटा मैं बेचैनी से करवटें बदल रहा था। मेरा मन बिलकुल ही अशांत था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस मामले में मुझे क्या फ़ैसला लेना चाहिए। एक तरफ मैं ये भी चाहता था कि मेरे किसी भी काम की वजह से मेरे माता पिता पर कोई बात न आए वहीं एक तरफ मैं ये भी चाहता था कि किसी सुन्दर सी लड़की के साथ मैं भी उसी तरह मज़े करूं जिस तरह मेरे जैसे जवान लड़के मज़े करते हैं। शादी तो यकीनन एक दिन होगी ही और जिस लड़की से मेरी शादी होगी उससे जीवन भर मज़ा करने का मुझे लाइसेंस भी मिल जाएगा लेकिन उससे क्या मुझे तसल्ली मिलेगी? शादी के बाद तो मैं बस एक का ही बन के रह जाऊंगा और संभव है कि फिर किसी दूसरी लड़की या औरत के साथ मज़ा करने का मुझे कभी मौका ही न मिले। शादी के बाद क्या मैं कभी ये देख पाऊंगा कि दूसरी लड़कियों या औरतों के जिस्म कैसे होते हैं? उनके जिस्म का कौन सा अंग किस तरह का होता है?
ये सब सोचते हुए मैं बुरी तरह से उलझ गया था। मेरी तृष्णा और बेचैनी शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जा रही थी। मेरा मन अलग अलग लड़कियों को भोगने की लालसा ही बनाता जा रहा था। रह रह कर मेरे ज़हन में उस रहस्यमयी शख़्स की बातें गूँज उठती थीं और मैं सोचने लगता था कि अगर सच में ही वो रहस्यमयी शख़्स ऐसी किसी संस्था का आदमी है तो उसकी संस्था से जुड़ने में भला मुझे क्या परेशानी हो सकती है? उस संस्था से जुड़ने के बाद तो उल्टा मेरे मज़े ही हो जाने हैं। हर रोज़ एक नई औरत को भोगने का मौका मिलेगा मुझे और मैं जैसे चाहूंगा औरतों के जिस्मों के साथ खेलते हुए उनसे मज़े करुंगा। उस शख़्स के अनुसार ये सब काम गुप्त तरीके से होते हैं, इसका मतलब किसी को इस सबके बारे में पता भी नहीं चलेगा। कम से कम एक बार मुझे इस संस्था से जुड़ कर चेक तो करना ही चाहिए।
ये सब सोचते हुए मैंने एक गहरी सांस ली कि तभी मुझे उस शख़्स की एक बात याद आई कि संस्था से जुड़ने के बाद मैं उस संस्था को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता। इस बात के याद आते ही मैं एक बार फिर से गहरी सोच में डूब गया। तभी मुझे उसकी ये बात भी याद आई कि संस्था से जुड़ने के बाद मैं अपनी फैमिली के बीच रहते हुए भी आसानी से संस्था के काम कर सकता हूं। यानि फैमिली के बीच रह कर मैं अपने बाकी के काम भी कर सकता हूं। संस्था के नियम कानून तो ये हैं कि मैं उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ संस्था का कोई काम नहीं करुंगा और ना ही अपना भेद किसी पर ज़ाहिर करुंगा। ज़ाहिर है कि संस्था में जो भी एजेंट्स हैं वो सब संस्था के बॉस के आर्डर पर ही सर्विस देने जाते होंगे।
मेरे ज़हन में ये ख़याल उभरे तो मैंने सोच लिया कि इस बारे में मैं एक बार फिर उस रहस्यमयी आदमी से पूछूंगा। अगर उसकी बातों से या उसके नियम कानून में मुझे कहीं पर भी अपने लिए कोई परेशानी न नज़र आई तो मैं उसकी संस्था से जुड़ने के बारे में सोचूंगा।
रात पता नहीं कब मेरी पलकें झपक गईं और मुझे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया। ख़ैर ऐसे ही दो दिन गुज़र गए। उस रहस्यमयी आदमी ने मुझे सोचने के लिए दो दिन का वक़्त दिया था और दो दिन गुज़र गए थे।
"कहां चला गया था तू?" फिर उन्होंने दुखी भाव से मुझे अपने गले से लगाए हुए ही कहा_____"मैं और तेरे पापा तेरे लिए कितना परेशान थे। मन में तरह तरह के ख़याल उभर रहे थे कि जाने तेरे साथ क्या हुआ होगा जिसकी वजह से तू वापस घर नहीं लौटा।"
"मैं एकदम ठीक हूं मां।" मैंने उन्हें खुद से अलग करते हुए कहा____"और हां माफ़ कर दीजिए, मुझे आने में काफी देर हो गई। असल में मैं मोटर साइकिल से गिर गया था जिसकी वजह से मेरे पैर के घुटने में चोंट लग गई थी।"
"क्या कहा???" मेरी बात सुनते ही माँ ने ब्याकुल हो कर कहा_____"तू मोटर साइकिल से कैसे गिर गया था? कहीं तू मुझसे झूठ तो नहीं बोल रहा? सच सच बता कैसे लगी तुझे ये चोट?" कहने के साथ ही माँ ने झट से मेरे पैंट को ऊपर सरका कर चोंट पर लगी पट्टी को देखा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"कहीं तेरा एक्सीडेंट वग़ैरा तो नहीं हो गया था और ये तेरे घुटने पर पट्टी कैसे लगी हुई है?"
"वो मैं हॉस्पिटल चला गया था न।" मैंने बहाना बनाते हुए कहा____"वहीं पर मैंने मरहम पट्टी करवाई है। इसी सब में इतनी देर हो गई। वैसे ये तो बताइए कि पापा मुझ पर गुस्सा तो नहीं हैं ना?"
"पहले तो वो गुस्सा ही हुए थे।" माँ दरवाज़े से एक तरफ हटते हुए बोलीं जिससे मैं दरवाज़े के अंदर दाखिल हुआ____"उसके बाद जब तू इतना समय गुज़र जाने पर भी घर नहीं आया तो उन्हें तेरी चिंता होने लगी थी। उसके बाद वो एक एक कर के तेरे दोस्तों के घर वालों को फ़ोन किया और तेरे बारे में पूछा लेकिन तेरे दोस्तों ने उन्हें यही बताया कि तू उन लोगों के साथ ही चौराहे तक आया था। उस वक़्त तक तू ठीक ही था। उसके बाद का उन्हें कुछ पता नहीं था।"
"हां वो चौराहे के बाद ही मैं मोटर साइकिल से गिरा था।" मैंने कहा____"कोहरे की धुंध में मुझे सड़क पर मौजूद स्पीड ब्रेकर दिखा ही नहीं था। जिसकी वजह से मोटर साइकिल के हैंडल से मेरे हाथों की पकड़ छूट गई थी और मैं उछल कर सड़क पर गिर गया था।"
"चल कोई बात नहीं।" माँ ने दरवाज़ा बंद कर के मुझे अंदर की तरफ ले जाते हुए कहा_____"शुकर है कि ईश्वर की दया से तुझे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। हम दोनों तो तेरे लिए बहुत ही ज़्यादा चिंतित और परेशान हो गए थे।"
मैं माँ के साथ अंदर आया तो देखा ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर पापा बैठे थे। मुझे देखते ही वो उठे और झट से मुझे अपने गले से लगा लिया। उसके बाद उन्होंने भी मुझसे वही सब पूछा जो इसके पहले माँ मुझसे पूछ चुकीं थी और मैंने भी उन्हें वही सब बताया जो माँ को बताया था। ख़ैर माँ ने मुझे खाना खिलाया। खाने के बाद मैं अपने कमरे में चला गया।
जैसा कि मैंने शुरू में ही बताया था कि मैं अमीर फैमिली से ताल्लुक रखता था। मेरे पापा का बहुत बड़ा बिज़नेस था और मेरे माता पिता दोनों ही उस बिज़नेस को सम्हालते थे। पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने भी उनसे ज्वाइन करने के लिए कहा था लेकिन पापा ने मुझे ये कह कर मना कर दिया था कि अभी कुछ समय लाइफ़ को एन्जॉय करो। उसके बाद तो बिज़नेस ही सम्हालना है। मैंने भी सोचा कि चलो कुछ समय के लिए मुझे इस झंझट से दूर ही रहना चाहिए।
मेरा घर, घर क्या था बल्कि एक बड़ा सा बंगला था जिसमें हर तरह की सुख सुविधाएं थी। बंगले में कई सारे नौकर चाकर थे। मैं भले ही अपने माता पिता की इकलौती औलाद था लेकिन मुझ में अपने अमीर माता पिता का बेटा होने का कोई घमंड नहीं था और ना ही मेरा ऐसा स्वभाव था कि मैं उनके पैसों को फ़ालतू में इधर उधर उड़ाता फिरुं। मैं दिखने में और पढ़ने लिखने में बहुत ही अच्छा था। मेरी बॉडी पर्सनालिटी भी ठीक ठाक थी लेकिन मुझ में सिर्फ एक ही ख़राबी थी कि मेरा स्वभाव औरतों के मामले में कुछ ज़्यादा ही शर्मीला था।
अपने कमरे में आ कर मैं बेड पर लेट गया था और कुछ समय पहले जो कुछ भी मेरे साथ हुआ था उसके बारे में सोचने लगा था। मेरे ज़हन में उस रहस्यमयी शख़्स की एक एक बातें शुरू से ले कर आख़िर तक की गूंजने लगीं थी। उन सब बातों को याद कर के मैं सोचने लगा कि क्या सच में ऐसा हो सकता है? क्या सच में ऐसी कोई संस्था हो सकती है जिसमें इस तरह के एजेंट्स होंगे जो औरतों और मर्दों को सेक्स की सर्विस देते हैं? क्या सच में बाहर के मर्द और औरतें ऐसी किसी संस्था के एजेंट्स द्वारा अपनी सेक्स की भूंख को शांत करते होंगे? क्या ऐसा करने से किसी को भी इसका पता नहीं चलता होगा? मर्दों का तो चलो मान लेते हैं कि वो ये सब आसानी से कर ही लेते होंगे लेकिन औरतें कैसे किसी ऐसे आदमी के साथ सेक्स कर लेती होंगी जो उनके लिए निहायत ही अजनबी होता है? क्या इसके लिए पहले से कोई ऐसा प्रोसेस होता है जिसके बाद औरतों के लिए किसी दूसरे मर्द के साथ सेक्स करना आसान हो जाता होगा?
इस बारे में मैं जितना सोचता जा रहा था उतना ही मेरे ज़हन में और भी सवाल उभरते जा रहे थे। किसी किसी पल मैं ये भी सोचने लगता कि कहीं ये कोई ख़तरनाक जाल तो नहीं है जिसमें वो रहस्यमयी शख़्स मुझे फ़साना चाहता है? मेरे माता पिता दोनों ही बिज़नेस वाले थे और ज़ाहिर है कि इस क्षेत्र में उनका कोई न कोई दुश्मन भी होगा जो उन्हें इस तरह से भी नुक्सान पहुंचाने का सोच सकता है। ये ख़याल ऐसा था जिसके बारे में सोचते ही मेरे ज़हन में ये बात आ जाती थी कि मुझे इस तरह के किसी भी लफड़े में नहीं फंसना चाहिए। क्या हुआ अगर मुझे किसी लड़की को भोगने का सुख प्राप्त नहीं हो रहा? कम से कम इससे मेरे माता पिता पर किसी तरह की कोई आंच तो नहीं आ रही। अब ऐसा तो है नहीं कि मुझे अपनी लाइफ़ में कभी कोई लड़की मिलेगी ही नहीं। मैं उस लड़की के साथ भी तो सेक्स ही करुंगा जिससे मेरी शादी होगी?
बेड पर लेटा मैं बेचैनी से करवटें बदल रहा था। मेरा मन बिलकुल ही अशांत था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि इस मामले में मुझे क्या फ़ैसला लेना चाहिए। एक तरफ मैं ये भी चाहता था कि मेरे किसी भी काम की वजह से मेरे माता पिता पर कोई बात न आए वहीं एक तरफ मैं ये भी चाहता था कि किसी सुन्दर सी लड़की के साथ मैं भी उसी तरह मज़े करूं जिस तरह मेरे जैसे जवान लड़के मज़े करते हैं। शादी तो यकीनन एक दिन होगी ही और जिस लड़की से मेरी शादी होगी उससे जीवन भर मज़ा करने का मुझे लाइसेंस भी मिल जाएगा लेकिन उससे क्या मुझे तसल्ली मिलेगी? शादी के बाद तो मैं बस एक का ही बन के रह जाऊंगा और संभव है कि फिर किसी दूसरी लड़की या औरत के साथ मज़ा करने का मुझे कभी मौका ही न मिले। शादी के बाद क्या मैं कभी ये देख पाऊंगा कि दूसरी लड़कियों या औरतों के जिस्म कैसे होते हैं? उनके जिस्म का कौन सा अंग किस तरह का होता है?
ये सब सोचते हुए मैं बुरी तरह से उलझ गया था। मेरी तृष्णा और बेचैनी शांत होने की बजाय और भी बढ़ती जा रही थी। मेरा मन अलग अलग लड़कियों को भोगने की लालसा ही बनाता जा रहा था। रह रह कर मेरे ज़हन में उस रहस्यमयी शख़्स की बातें गूँज उठती थीं और मैं सोचने लगता था कि अगर सच में ही वो रहस्यमयी शख़्स ऐसी किसी संस्था का आदमी है तो उसकी संस्था से जुड़ने में भला मुझे क्या परेशानी हो सकती है? उस संस्था से जुड़ने के बाद तो उल्टा मेरे मज़े ही हो जाने हैं। हर रोज़ एक नई औरत को भोगने का मौका मिलेगा मुझे और मैं जैसे चाहूंगा औरतों के जिस्मों के साथ खेलते हुए उनसे मज़े करुंगा। उस शख़्स के अनुसार ये सब काम गुप्त तरीके से होते हैं, इसका मतलब किसी को इस सबके बारे में पता भी नहीं चलेगा। कम से कम एक बार मुझे इस संस्था से जुड़ कर चेक तो करना ही चाहिए।
ये सब सोचते हुए मैंने एक गहरी सांस ली कि तभी मुझे उस शख़्स की एक बात याद आई कि संस्था से जुड़ने के बाद मैं उस संस्था को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकता। इस बात के याद आते ही मैं एक बार फिर से गहरी सोच में डूब गया। तभी मुझे उसकी ये बात भी याद आई कि संस्था से जुड़ने के बाद मैं अपनी फैमिली के बीच रहते हुए भी आसानी से संस्था के काम कर सकता हूं। यानि फैमिली के बीच रह कर मैं अपने बाकी के काम भी कर सकता हूं। संस्था के नियम कानून तो ये हैं कि मैं उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ संस्था का कोई काम नहीं करुंगा और ना ही अपना भेद किसी पर ज़ाहिर करुंगा। ज़ाहिर है कि संस्था में जो भी एजेंट्स हैं वो सब संस्था के बॉस के आर्डर पर ही सर्विस देने जाते होंगे।
मेरे ज़हन में ये ख़याल उभरे तो मैंने सोच लिया कि इस बारे में मैं एक बार फिर उस रहस्यमयी आदमी से पूछूंगा। अगर उसकी बातों से या उसके नियम कानून में मुझे कहीं पर भी अपने लिए कोई परेशानी न नज़र आई तो मैं उसकी संस्था से जुड़ने के बारे में सोचूंगा।
रात पता नहीं कब मेरी पलकें झपक गईं और मुझे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया। ख़ैर ऐसे ही दो दिन गुज़र गए। उस रहस्यमयी आदमी ने मुझे सोचने के लिए दो दिन का वक़्त दिया था और दो दिन गुज़र गए थे।