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सावित्री की बात सुन कर वागले की मुस्कान गहरी हो गई। उसने गर्दन घुमा कर सावित्री की चूत की तरफ देखा। ब्लैक कलर की पेंटी में उसकी चूत दिख तो नहीं रही थी किन्तु पेंटी के किनारों से चूत के बाल ज़रूर झलक रहे थे। ये देख कर वागले के ज़हन में फ़ौरन ही विक्रम सिंह की डायरी वाली माया का ख़याल उभर आया। विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में लिखा था कि माया कोमल और तबस्सुम तीनों की चूतें एकदम चिकनी थीं और उन पर कहीं कोई दाग़ नहीं था बल्कि हल्की गुलाबी रंगत लिए चमक रहीं थी।
वागले ने सावित्री की पेंटी को दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे खींचा तो सावित्री ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया, किन्तु वागले भला कहां मानने वाला था? उसने ज़ोर दे कर सावित्री की पेंटी को खींचते हुए उसकी टांगों से निकाल कर एक तरफ फेंक दिया। सावित्री को पता था कि इस वक़्त वो एकदम से बेपर्दा हो चुकी है इस लिए वो अपनी चूत को छुपाने के लिए कसमसा रही थी किन्तु वागले को जैसे पहले से पता था कि सावित्री ऐसा करेगी इस लिए उसने सावित्री को अच्छे से पकड़ लिया था। इससे पहले कभी भी सेक्स करते समय सावित्री इस तरह नंगी नहीं हुई थी, बल्कि हमेशा कपड़ों में ही सेक्स हुआ था। वागले का अगर बहुत मन होता था तो वो अपना ब्लाउज उतार देती थी बाकी साड़ी और पेटीकोट को एक साथ ऊपर कर के ही वो वागले के लंड को अपनी चूत में डलवा कर सेक्स करती रही थी।
सावित्री की घने बालों से घिरी चूत को देखने के लिए वागले को जैसे थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा क्योंकि वो साफ़ साफ़ दिख ही नहीं रही थी। ये देख कर वागले के ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर सावित्री ने अपनी चूत के बालों को साफ़ कर रखा होता तो इस वक़्त वो साफ़ साफ़ देख पाता कि वो बिना बालों के कैसी दिखती है।
कुछ देर सावित्री की चूत और उसके चारो तरफ उगे घनघोर जंगल को देखने के बाद वागले खिसक कर ऊपर आया और आँखें बंद किए पड़ी सावित्री को देखते हुए बोला____"सुनो।"
"ह्म्मम्।" सावित्री ने आँखे बंद किए ही हुंकार भरी।
"तुमने अपने वहां पर इतने बाल क्यों ऊगा रखे हैं?" वागले ने ये कहा ही था कि सावित्री हड़बड़ा कर झट से उठ बैठी।
वागले ने देखा सावित्री उसकी इस बात को सुन कर किसी कुंवारी कन्या की तरह शर्माने लगी थी। उसने अपनी चूत को छुपाने के लिए अपनी दोनों टांगों को मोड़ लिया था। चेहरे पर अजीब से भाव लिए वो कभी वागले को देखती तो कभी उससे नज़रें चुराने लगती। उसकी इस हालत को देख कर वागले के मन में ख़याल उभरा कि उसने नाहक में ही ऐसा कह कर सावित्री को शर्मिंदा कर दिया है।
"क्या हुआ मेरी जान।" फिर उसने सावित्री के सुर्ख पड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा_____"तुम इतना शर्मा क्यों रही हो यार? मैंने एक छोटी सी बात ही तो पूछी थी तुमसे, इसमें इतना शर्माने की भला क्या ज़रूरत है?"
"आप ऐसी बात करेंगे तो मुझे शर्म नहीं आएगी क्या?" सावित्री ने उसकी बात सुन कर उसकी तरफ देखते हुए कहा____"आपको मेरे वहां के बाल से मतलब है या उससे जो आप करना चाहते हैं?"
सावित्री की बात सुन कर वागले के होठों पर मुस्कान उभर आई। वैसे नार्मल तरीके से सोचा जाए तो उसने सच ही कहा था किन्तु उसे नहीं पता था कि आज कल उसका पति किस तरह की मनोदशा में है।
"बात तो तुम्हारी ठीक है भाग्यवान।" वागले ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अब से तुम हर जगह की साफ़ सफाई कर के रखोगी। मैं चाहता हूं कि मेरी प्यारी और खूबसूरत बीवी हर जगह से साफ़ और खूबसूरत दिखे। वैसे मैं तो तुम्हें इस बात का ज्ञान दे रहा हूं लेकिन सच तो ये है कि मेरे भी लंड के चारो तरफ तुम्हारी तरह ही घने बालों का जंगल ऊगा हुआ है।"
"हे भगवान! कितने बेशर्म हैं आप।" सावित्री ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा____"पता नहीं कहां से आपके मन में ऐसी बातें भर गईं हैं?"
"ये सब छोड़ो।" वागले ने कहा____"मैं ये कह रहा हूं कि कल हम दोनों ही अपने अपने बाल साफ़ कर लेंगे। उसके बाद ही तसल्ली से काम क्रीड़ा करेंगे। चलो अब सो जाते हैं, क्योंकि रात भी काफी हो गई है।"
वागले की इस बात को सुन कर सावित्री ने गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर राहत के भाव उभर आए थे। शायद वो यही चाहती थी कि वागले ये सब बंद कर के सोने की बात कह दे और क्योंकि वागले ने उसके मन की बात कह दी थी इस लिए उसने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और बेड के एक तरफ लेट गई। वागले के अंदर की गर्मी कदाचित शांत पड़ गई थी या शायद सावित्री की चूत के बालों को देख कर उसका मन ये सब करने से उचट गया था। ख़ैर वागले ने भी अपना पजामा कुर्ता पहना और बेड पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा।
दूसरे दिन वागले अपने निर्धारित वक़्त पर जेल के अपने केबिन में पहुंचा। ब्रीफ़केस को टेबल पर रखने के बाद वो कुछ देर फाइल्स को देखते हुए अपना काम करता रहा उसके बाद वो जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। क़रीब डेढ़ घंटे बाद वो वापस अपने केबिन में आया । कुछ देर जाने वो क्या सोचता रहा उसके बाद उसने अपने ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाली और उसे खोल कर आगे की कहानी पढ़ने लगा।
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वागले ने सावित्री की पेंटी को दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे खींचा तो सावित्री ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया, किन्तु वागले भला कहां मानने वाला था? उसने ज़ोर दे कर सावित्री की पेंटी को खींचते हुए उसकी टांगों से निकाल कर एक तरफ फेंक दिया। सावित्री को पता था कि इस वक़्त वो एकदम से बेपर्दा हो चुकी है इस लिए वो अपनी चूत को छुपाने के लिए कसमसा रही थी किन्तु वागले को जैसे पहले से पता था कि सावित्री ऐसा करेगी इस लिए उसने सावित्री को अच्छे से पकड़ लिया था। इससे पहले कभी भी सेक्स करते समय सावित्री इस तरह नंगी नहीं हुई थी, बल्कि हमेशा कपड़ों में ही सेक्स हुआ था। वागले का अगर बहुत मन होता था तो वो अपना ब्लाउज उतार देती थी बाकी साड़ी और पेटीकोट को एक साथ ऊपर कर के ही वो वागले के लंड को अपनी चूत में डलवा कर सेक्स करती रही थी।
सावित्री की घने बालों से घिरी चूत को देखने के लिए वागले को जैसे थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा क्योंकि वो साफ़ साफ़ दिख ही नहीं रही थी। ये देख कर वागले के ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर सावित्री ने अपनी चूत के बालों को साफ़ कर रखा होता तो इस वक़्त वो साफ़ साफ़ देख पाता कि वो बिना बालों के कैसी दिखती है।
कुछ देर सावित्री की चूत और उसके चारो तरफ उगे घनघोर जंगल को देखने के बाद वागले खिसक कर ऊपर आया और आँखें बंद किए पड़ी सावित्री को देखते हुए बोला____"सुनो।"
"ह्म्मम्।" सावित्री ने आँखे बंद किए ही हुंकार भरी।
"तुमने अपने वहां पर इतने बाल क्यों ऊगा रखे हैं?" वागले ने ये कहा ही था कि सावित्री हड़बड़ा कर झट से उठ बैठी।
वागले ने देखा सावित्री उसकी इस बात को सुन कर किसी कुंवारी कन्या की तरह शर्माने लगी थी। उसने अपनी चूत को छुपाने के लिए अपनी दोनों टांगों को मोड़ लिया था। चेहरे पर अजीब से भाव लिए वो कभी वागले को देखती तो कभी उससे नज़रें चुराने लगती। उसकी इस हालत को देख कर वागले के मन में ख़याल उभरा कि उसने नाहक में ही ऐसा कह कर सावित्री को शर्मिंदा कर दिया है।
"क्या हुआ मेरी जान।" फिर उसने सावित्री के सुर्ख पड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा_____"तुम इतना शर्मा क्यों रही हो यार? मैंने एक छोटी सी बात ही तो पूछी थी तुमसे, इसमें इतना शर्माने की भला क्या ज़रूरत है?"
"आप ऐसी बात करेंगे तो मुझे शर्म नहीं आएगी क्या?" सावित्री ने उसकी बात सुन कर उसकी तरफ देखते हुए कहा____"आपको मेरे वहां के बाल से मतलब है या उससे जो आप करना चाहते हैं?"
सावित्री की बात सुन कर वागले के होठों पर मुस्कान उभर आई। वैसे नार्मल तरीके से सोचा जाए तो उसने सच ही कहा था किन्तु उसे नहीं पता था कि आज कल उसका पति किस तरह की मनोदशा में है।
"बात तो तुम्हारी ठीक है भाग्यवान।" वागले ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अब से तुम हर जगह की साफ़ सफाई कर के रखोगी। मैं चाहता हूं कि मेरी प्यारी और खूबसूरत बीवी हर जगह से साफ़ और खूबसूरत दिखे। वैसे मैं तो तुम्हें इस बात का ज्ञान दे रहा हूं लेकिन सच तो ये है कि मेरे भी लंड के चारो तरफ तुम्हारी तरह ही घने बालों का जंगल ऊगा हुआ है।"
"हे भगवान! कितने बेशर्म हैं आप।" सावित्री ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा____"पता नहीं कहां से आपके मन में ऐसी बातें भर गईं हैं?"
"ये सब छोड़ो।" वागले ने कहा____"मैं ये कह रहा हूं कि कल हम दोनों ही अपने अपने बाल साफ़ कर लेंगे। उसके बाद ही तसल्ली से काम क्रीड़ा करेंगे। चलो अब सो जाते हैं, क्योंकि रात भी काफी हो गई है।"
वागले की इस बात को सुन कर सावित्री ने गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर राहत के भाव उभर आए थे। शायद वो यही चाहती थी कि वागले ये सब बंद कर के सोने की बात कह दे और क्योंकि वागले ने उसके मन की बात कह दी थी इस लिए उसने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और बेड के एक तरफ लेट गई। वागले के अंदर की गर्मी कदाचित शांत पड़ गई थी या शायद सावित्री की चूत के बालों को देख कर उसका मन ये सब करने से उचट गया था। ख़ैर वागले ने भी अपना पजामा कुर्ता पहना और बेड पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा।
दूसरे दिन वागले अपने निर्धारित वक़्त पर जेल के अपने केबिन में पहुंचा। ब्रीफ़केस को टेबल पर रखने के बाद वो कुछ देर फाइल्स को देखते हुए अपना काम करता रहा उसके बाद वो जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। क़रीब डेढ़ घंटे बाद वो वापस अपने केबिन में आया । कुछ देर जाने वो क्या सोचता रहा उसके बाद उसने अपने ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाली और उसे खोल कर आगे की कहानी पढ़ने लगा।
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