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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। कहानी में मौजूद किसी भी पात्र का तथा घटनाओं का किसी के भी वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। संपूर्ण कहानी सिर्फ और सिर्फ लेखक की अपनी कल्पना है, जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने प्रिय पाठकों का मनोरंजन करना ही है।

सी. एम. एस. नाम की एक सीक्रेट सर्विस थी। जिसका पूरा नाम था चूत मार सर्विस चूत मार सर्विस एक ऐसी संस्था का नाम था जो मर्दों और औरतों की सेक्स नीड को पूरा करने के लिए पार्टनर प्रोवाइड करती थी। ये एक ऐसी संस्था थी जिसके बारे में कोई ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था लेकिन इस संस्था के एजेंट्स गुप्त रूप से मर्दों और औरतों को सेक्स की सेवाएं प्रदान करते थे।

विक्रम सिंह नाम का एक बहुत ही शर्मीला लड़का था जिसकी सबसे बड़ी चाहत थी सुन्दर सुन्दर लड़कियों के खूबसूरत अंगों को अपनी मर्ज़ी से मसल मसल कर उनका रस पान करना और फिर उन लड़कियों के साथ मनचाहा सेक्स करना। इत्तेफ़ाक़ से उसकी मुलाक़ात सी. एम. एस. नाम की सीक्रेट सर्विस के चीफ़ ट्रिपल एक्स से हो गई और उस चीफ़ ने विक्रम सिंह को सीक्रेट सर्विस जैसी संस्था का एजेंट बना दिया। एजेंट के रूप में विक्रम सिंह ने अपनी सबसे बड़ी चाहत को पूरा करते हुए जाने कितनी ही लड़कियों और औरतों के साथ सेक्स का मज़ा लिया लेकिन उसे नहीं पता था कि ऊपर बैठा हुआ विधाता एक दिन उसके सिर पर एक ऐसे संगीन जुर्म का इल्ज़ाम रख देगा जिसकी वजह से उसे उम्र क़ैद की सज़ा हो जाएगी।
 
जेलर शिवकांत वागले के ऑफिस में एक ऐसे शख़्स ने क़दम रखा जिसके चेहरे पर बड़ी बड़ी दाढ़ी मूंछें थी और सिर पर लम्बे लम्बे किन्तु उलझे हुए बाल थे। उस शख़्स के जिस्म पर इस वक़्त अगर अच्छे कपड़े न होते तो उसे देख कर हर कोई यही कहता कि वो कोई पागल ही है। चेहरे पर अजीब से भाव लिए जब वो जेलर के सामने रखी टेबल के पार आ कर खड़ा हुआ तो कुर्सी पर बैठे किन्तु कहीं खोए हुए जेलर का ध्यान भंग हुआ और उसने सिर उठा कर उस शख़्स की तरफ देखा।

"अ..अरे! आओ विक्रम सिंह?" जेलर शिवकांत ने उस शख़्स की तरफ देखते हुए नरम लहजे में कहा____"हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे। पिछले पांच सालों से हम तुमसे जो सवाल पूछते आ रहे हैं उसका जवाब आज तो ज़रूर दोगे न तुम? आज तुम बीस साल बाद इस जेल से रिहा हो कर जा रहे हो इस लिए हम चाहते हैं कि तुम हमारे उस सवाल का जवाब ज़रूर दे कर जाओ। यकीन मानो कि इन पांच सालों में ऐसा कोई दिन नहीं गया जब हमने तुम्हारे बारे में सोचा न हो। सवाल तो बहुत सारे हैं लेकिन हमें सिर्फ उसी सवाल का जवाब चाहिए तुमसे।"

जेलर शिवकांत की बातें सुन कर विक्रम सिंह नाम के उस शख़्स ने कुछ पलों तक उसे देखा और फिर ख़ामोशी से अपने कंधे पर टंगे एक कपड़े वाले थैले को निकाला और उस थैले के अंदर हाथ डाल कर उससे एक मोटी सी किताब निकाली। उस मोटी सी किताब को हाथ में लिए पहले तो वो कुछ पलों तक उस किताब को देखता रहा और फिर जेलर शिवकांत वागले की तरफ देखते हुए उसने उस किताब को उसकी तरफ बढ़ा दिया।

"जेलर साहब।" फिर उसने अपनी भारी आवाज़ में कहा____"ये किताब रख लीजिए। इस किताब को आप मेरी पर्सनल डायरी समझिए। इसमें आपके सभी सवालों के जवाब मौजूद हैं और साथ ही वो सब भी मौजूद है जिससे आपको मेरे बारे में पता चल सके।"

"तो क्या तुमने इसी लिए हमसे ये डायरी मंगवाई थी कि तुम इसमें अपना सब कुछ लिख सको?" जेलर ने थोड़े हैरानी भरे भाव से पूछा____"अगर ऐसी ही बात है तो फिर तो हमारे मन में ये जानने की और भी ज़्यादा जिज्ञासा जाग उठी है कि आख़िर इस किताब में तुमने अपने बारे में क्या क्या लिखा होगा?"

"इस डायरी को पढ़ने के बाद।" विक्रम सिंह ने सपाट लहजे में कहा____"आप ये भी समझ जाएंगे कि मैंने आपके बार बार पूछने पर भी आपके सवालों के जवाब क्यों नहीं दिए थे? ख़ैर, चलते चलते आपसे बस एक ही गुज़ारिश है कि चाहे जैसी भी परिस्थितियां आ जाएं किन्तु आप मुझे खोजने की कोशिश नहीं करेंगे।"

"ऐसा क्यों कह रहे हो विक्रम सिंह?" जेलर ने चौंकते हुए कहा____"एक तुम ही तो थे जिसने इन पांच सालों में हमें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था। हम हमेशा सोचते थे कि बीस साल पहले जिन इल्ज़ामों के तहत तुम यहाँ पर आए थे तो क्या वो सच रहे होंगे? इन पांच सालों में हमने कभी भी तुम्हें ऐसा वैसा कुछ भी करते हुए नहीं देखा जिससे ये लगे कि तुम जैसे इंसान ने ऐसा संगीन जुर्म किया रहा होगा।"

"ये दुनियां एक मायाजाल है जेलर साहब।" विक्रम सिंह ने फीकी मुस्कान के साथ कहा____"यहां पर आँखों देखा और कानों सुना भी सच नहीं होता। ख़ैर, अब जाने की इजाज़त दीजिए मुझे।"

जेलर शिवकांत को तुरंत कुछ समझ न आया कि वो क्या कहे, अलबत्ता विक्रम सिंह के अंतिम वाक्य को सुन कर वो अपनी कुर्सी से उठ कर ज़रूर खड़ा हो गया था। उधर विक्रम सिंह ने जेलर को देखते हुए नमस्कार करने के लिए अपने दोनों हाथ जोड़े और ऑफिस के दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।

विक्रम सिंह के जाने के बाद भी जेलर शिवकांत वागले काफी देर तक किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा दरवाज़े की तरफ देखता रहा था। फिर जैसे उसकी तन्द्रा टूटी तो उसने एक लम्बी सांस ली और वापस कुर्सी पर बैठ गया। नज़र सामने टेबल पर रखी उस डायरी पर पड़ी जिसे विक्रम सिंह उसे दे गया था।

विक्रम सिंह बीस साल पहले इस जेल में क़ैदी बन कर आया था। अपने माता पिता की हत्या का संगीन इल्ज़ाम लगा था उस पर। पुलिस ने उसे घटना स्थल पर रंगे हाथ पकड़ा था। मामला अदालत पर पहुंचा और फिर न्यायाधीश ने उसे उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी थी। उस सज़ा के बाद विक्रम सिंह ने बीस साल इस जेल में गुज़ारे। इन बीस सालों में उसने हर वो यातनाएं सहीं जो जेल में ख़तरनाक अपराधियों के बीच रह कर सहनी पड़ती हैं और साथ ही उसने हर वो काम भी किया जो जेल में रहते हुए करना पड़ता है। गुज़रते वक़्त के साथ हर कोई ये समझ गया था कि विक्रम सिंह नाम का ये शख़्स ज़िंदा रहते हुए भी एक बेजान लाश की तरह है जिस पर किसी भी चीज़ का प्रभाव नहीं पड़ता।

जेलर शिवकांत वागले पांच साल पहले इस जगह पर तबादले के रूप में आया था। विक्रम सिंह के बारे में उसे भी पता चला था और उसके मन में विक्रम सिंह के बारे में जानने की जिज्ञासा भी पैदा हुई थी किन्तु उसके पूछने पर हर बार विक्रम सिंह ने उससे बस यही कहा था कि उसके पास उसके किसी भी सवाल का जवाब नहीं है। अदालत में भी विक्रम सिंह ने न्यायाधीश को ये नहीं बताया था कि क्यों उसने अपने ही माता पिता की हत्या की थी?

विक्रम सिंह के अच्छे वर्ताव के चलते अदालत ने उसकी बाकी की सज़ा को माफ़ कर दिया था। हालांकि अदालत के इस फ़ैसले से विक्रम सिंह ज़रा भी खुश नहीं था। उसका कहना था कि अब ये जेल ही उसकी दुनियां है और इसी दुनियां में एक दिन उसे फ़ना हो जाना है। इस दुनियां से बाहर वो जाना ही नहीं चाहता किन्तु अदालत ने उसकी इस इच्छा के विरुद्ध उसे रिहा कर दिया था।

एक महीने पहले विक्रम सिंह ने जेलर शिवकांत वागले से एक डायरी की मांग की थी। जेलर के पूछने पर उसने यही बताया था कि रात के समय उसे नींद नहीं आती इस लिए समय काटने के लिए उसे एक ऐसी डायरी चाहिए जिसमें वो अपनी स्वेच्छा से जो चाहे लिख सके। विक्रम सिंह ने क्योंकि पहली बार ऐसी किसी चीज़ की मांग की थी इस लिए वागले ने फ़ौरन ही उसके लिए एक डायरी मंगवा दी थी।
 
सामने टेबल पर रखी उसी डायरी को देखते हुए जेलर सोच रहा था कि विक्रम सिंह ने आख़िर इसमें ऐसी कौन सी इबारत लिखी होगी जो उसके बारे में उसे बताने वाली है? जेलर का मन किया कि वो फ़ौरन ही डायरी को खोल कर देखे कि उसमें क्या लिखा है किन्तु फिर ये सोच कर उसने अपना इरादा बदल दिया कि वो फुर्सत के समय इस डायरी को खोलेगा और देखेगा कि उस विक्रम सिंह ने इसमें क्या लिखा है।

☆☆☆

शिवकांत वागले अपनी ड्यूटी से फ़ारिग हो कर अपने सरकारी आवास पर पहुंचा। उसके परिवार में उसकी पत्नी सावित्री और दो बच्चे थे। उसके दोनों बच्चों में एक लड़का था और एक लड़की। लड़की कॉलेज में लास्ट ईयर की छात्रा थी और लड़के ने इसी साल कॉलेज ज्वाइन किया था। रात में डिनर करने के बाद शिवकांत वागले विक्रम सिंह की डायरी ले कर अपने स्टडी रूम में चला गया था।

स्टडी रूम में कुर्सी पर बैठा वागले सिगरेट जला कर उसके कश ले रहा था और टेबल पर रखी डायरी को देखता भी जा रहा था। उसके दिल की धड़कनें सामान्य से थोड़ा तेज़ चल रहीं थी। कदाचित इस एहसास से कि जाने इस डायरी में क्या लिखा होगा विक्रम सिंह ने? कुछ देर तक सिगरेट के कश लेने के बाद शिवकांत वागले ने सिगरेट को टेबल पर ही एक कोने में रखी ऐसट्रे में बुझाया और फिर एक गहरी सांस ले कर उसने उस डायरी की तरफ अपने हाथ बढ़ाए।

डायरी का मोटा कवर पलटाते ही शिवकांत वागले को उसमें एक तह किया हुआ कागज़ नज़र आया। वागले ने उसे हाथ में लिया और उसे खोल कर देखा। तह किए हुए उस कागज़ में कोई लम्बा सा मजमून लिखा हुआ था जिसे वागले ने मन ही मन पढ़ना शुरू किया।

आदर्णीय जेलर साहब,

पिछले पांच सालों से आप मेरे बारे में और मेरे उस अपराध के बारे में पूछते रहे जिसकी वजह से मैं आपकी जेल में मुजरिम बन कर आया था किन्तु मैंने कभी भी आपके सवालों के जवाब नहीं दिए। असल में मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि मैं जवाब के रूप में आपसे क्या कहूं और किस तरह से कहूं? इस दुनियां में ऐसी बहुत सी चीज़ें देखने सुनने को मिलती हैं जिनके बारे में हम इंसान कभी कल्पना भी नहीं किए होते। इंसान अपनी ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसे दोराहे पर भी आ जाता है जहां पर वो सही ग़लत का फैसला नहीं कर पाता। ऐसे दोराहे पर खड़े इंसान का अगर ज़रा सा भी विवेक काम कर जाए तो समझो अनर्थ होने से बच गया वरना तो सारी ज़िन्दगी पछताने के सिवा दूसरा कोई चारा ही नहीं रहता।

जेलर साहब जब एक महीने पहले आपने मुझे बताया कि अदालत ने मेरी बाकी की सज़ा माफ़ कर दी है और मुझे रिहा करने का फ़ैसला सुना दिया है तो यकीन मानिए मुझे अदालत के उस फैसले से ज़रा भी ख़ुशी नहीं हुई। मैं उस दुनियां में अब वापस नहीं जाना चाहता था जहां पर मेरा सब कुछ ख़त्म हो चुका था। ख़ैर शायद मेरे नसीब में सुकून जैसी चीज़ लिखी ही नहीं थी तभी तो मुझे यहाँ से रिहा कर के निकाल देने का फ़ैसला किया अदालत ने। आपके द्वारा मिली इस सूचना के बाद रात में मैंने बहुत सोचा और फिर ये फ़ैसला किया कि जाते जाते आपको वो सब बता कर ही जाऊं जिसके बारे में आप मुझसे पिछले पांच सालों से पूछते आ रहे थे लेकिन आपके सामने अपने मुख से वो सब बताने की ना तो पहले मुझ में हिम्मत थी और ना ही आगे कभी हो सकती थी इस लिए मैंने कागज़ और कलम का सहारा लेने का फ़ैसला किया। मैंने आपसे एक डायरी की मांग की और आपने मुझे एक डायरी ला कर दी।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं इस डायरी में आपके किन किन सवालों के जवाब लिखूं? मैंने बहुत सोचा और फिर मैंने बहुत सोच समझ कर ये फ़ैसला किया कि मैं अपने बारे में वो सब कुछ लिखूंगा जिसे पढ़ने के बाद आप ख़ुद इस बात का फ़ैसला कर सकें कि मैंने अपनी ज़िन्दगी में जो कुछ भी किया वो सही था या ग़लत? अगर मैं सही था तो कहां तक सही था और अगर मैं ग़लत था तो कहां तक ग़लत था?

इस डायरी में अपना इतिहास लिखते हुए मेरे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे और मेरी धड़कनें थम सी गईं थी। मैं इस कल्पना से ही बेहद लाचार और बेबस सा महसूस करने लगा था कि सब कुछ पढ़़ लेने के बाद आपकी नज़र में मेरी क्या औकात बन जाएगी और आप मेरे बारे में किस तरह का नज़रिया बना लेंगे किन्तु फिर ये सोच कर मेरे होठों पर फीकी सी मुस्कान उभर आई कि भला अब किसी बात से मुझे कैसे कोई फ़र्क पड़ सकता है? जिसका मुकम्मल वजूद ही एक मज़ाक बन के रह गया हो उसके लिए किसी बात का आख़िर क्या महत्व रह जाता है? यही सब सोच कर मैंने इस डायरी पर अपनी कलम को चलाना शुरू कर दिया था।

अन्त में आपसे बस इतना ही कहूंगा कि इस डायरी में मैंने जो कुछ भी लिखा है और जिस तरीके से भी लिखा है उसे आप आख़िर तक ज़रूर पढ़िएगा। मैं जानता हूं कि इस डायरी में लिखी बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें पढ़ना आपके लिए संभव नहीं हो सकेगा लेकिन मेरी गुज़ारिश का ख़याल रखते हुए ज़रूर पढ़िएगा। आख़िर में एक विनती भी है आपसे और वो ये कि इस डायरी में लिखी मेरी दास्तान पढ़ने के बाद चाहे जैसी भी परिस्थितियां बनें किन्तु आप मुझे खोजने की कोशिश मत कीजिएगा। अच्छा अब अलविदा.....नमस्कार!

_____विक्रम सिंह
 
लम्बे चौड़े इस मजमून को पढ़ने के बाद शिवकांत वागले ने एक गहरी सांस ली। कुछ देर तक वो उस कागज़ को और कागज़ में लिखे मजमून को देखता रहा उसके बाद उसने उस कागज़ को तह करके एक तरफ रख दिया। कागज़ को एक तरफ रखने के बाद वागले ने जब डायरी के प्रथम पेज़ को देखा तो उस पेज़ पर लिखे अक्षरों को पढ़ते ही उसके चेहरे पर चौंकने के भाव उभर आए।

डायरी के पहले ही पेज पर उसे बड़े बड़े किन्तु अंग्रेजी के अक्षरों में सी. एम. एस. लिखा नज़र आया था और साथ ही सी. एम. एस. के नीचे बिलकुल छोटे अक्षरों में उसे जो कुछ लिखा नज़र आया था उसे पढ़ते ही शिवकांत वागले के चेहरे पर हैरानी के साथ साथ चौंकने के भी भाव उभर आए थे। अंग्रेजी के छोटे अक्षरों में ही लिखा था____'चूत मार सर्विस'।

शिवकांत वागले चूत मार सर्विस पढ़ कर बुरी तरह अचंभित हुआ। उसे लगा कि उससे उन शब्दों को पढ़ने में कहीं कोई ग़लती तो नहीं हो गई है इस लिए उसने उन्हें आँखें फाड़ फाड़ कर बार बार पढ़ा किन्तु हर बार उसे वही लिखा नज़र आया जो उसके लिए बड़े ही आश्चर्य की बात थी। वो समझ नहीं पाया कि विक्रम सिंह ने इस डायरी में ये क्या बकवास लिख दिया है? अपलक उन शब्दों को देखते हुए शिवकांत के ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर विक्रम सिंह ने ऐसा लिखा है तो ज़रूर इसके पीछे कोई ख़ास वजह ही होगी किन्तु सबसे ज़्यादा सोचने वाली बात तो ये थी कि आख़िर ये चूत मार सर्विस का मतलब क्या है?

शिवकांत वागले का दिमाग़ एकदम से भन्ना सा गया था। उसे ख़्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि विक्रम सिंह जैसा शख़्स ऐसी वाहियात बात लिख सकता है। उसने डायरी के कवर को झटके से बंद किया और हल्के गुस्से में उसने उस डायरी को उठा कर टेबल की ड्रावर में रख दिया। कुछ देर खुद के जज़्बातों को शांत करने के बाद वो कुर्सी से उठ कर स्टडी रूम से बाहर निकला और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

कमरे में आ कर शिवकांत बेड पर अपनी पत्नी सावित्री के बगल पर लेट गया। उसकी पत्नी सावित्री को जल्दी ही सो जाने की आदत थी इस लिए वो सो गई थी जबकि वागले बेड पर करवट के बल लेटा गहरी सोच में डूबा नज़र आने लगा था। उसके ज़हन में अभी भी विक्रम सिंह द्वारा लिखे गए वो शब्द गूंज से रहे थे_____'चूत मार सर्विस।'

वागले को समझ नहीं आ रहा था कि इस सब का आख़िर क्या मतलब हो सकता है? क्या विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में अपने गुज़रे हुए कल को लिखा है और अगर उसने अपने गुज़रे हुए कल को ही लिखा है तो क्या उसका गुज़रा हुआ कल डायरी में लिखे गए उन शब्दों से ही सम्बंधित है, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? शिवकांत ने बहुत सोचा किन्तु वो किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। अंत में उसने यही फ़ैसला किया कि कल वो उस डायरी को अपने साथ ऑफिस ले जाएगा और वहीं पर तसल्ली से उसमें लिखी हुई बातों को पढ़ेगा। ये सब सोच कर वागले ने अपनी आँखे बंद कर ली। कुछ ही देर में उसे नींद आ गई और वो नींद की वादियों में खोता चला गया।

दूसरे दिन शिवकांत वागले जेलर की वर्दी पहन कर जेल पहुंचा। अपने केबिन में पहुंच कर उसने कुछ देर ज़रूरी फाइल्स को चेक किया और फिर पूरी जेल का चक्कर लगाते हुए निरीक्षण किया। सब कुछ ठीक ठाक देख कर वो वापस अपने केबिन में आ गया। एक सिगरेट सुलगाने के बाद उसे विक्रम सिंह की डायरी का ख़याल आया। विक्रम सिंह की डायरी वो अपने साथ ही ले कर आया था।

अपने छोटे से ब्रीफ़केस से डायरी निकाल कर वागले ने उसे टेबल पर रखा और सिगरेट के कश लेते हुए उसे घूरने लगा। धड़कते दिल के साथ उसने डायरी के कवर को पलटा। नज़र फिर से पहले पेज पर अंग्रेजी के अक्षरों में लिखे सी. एम. एस. पर पड़ी और उसी के नीचे अंग्रेजी में ही लेकिन छोटे अक्षरों में लिखे चूत मार सर्विस पर पड़ी। शिवकांत वागले के ज़हन में बिजली की स्पीड से ये ख़याल उभरा कि सी. एम. एस. अंग्रेजी में लिखे छोटे अक्षरों का शार्ट नाम है जबकि चूत मार सर्विस उसका फुल फॉर्म है। कुछ देर शार्ट और फुल दोनों नाम के फॉर्मों को देखने के बाद वागले ने उस पेज को पलटाया। उस पेज के बाद बाकी के कुछ पेजेस पर भारत देश और उसके कई राज्यों के नक़्शे बने हुए थे और अलग अलग देशों के कोड्स लिखे हुए थे। शिवकांत वागले इस तरह के सभी पेजेस को एक ही बार में पलट दिया। उन पेजेस के बाद जो पहला पेज दिखा उसमें वागले की निगाह ठहर गई।

उस पहले पेज पर लिखे मजमून को पढ़ने के बाद शिवकांत वागले को ये समझ आया कि इस डायरी में विक्रम सिंह ने शायद अपने अतीत के बारे में ही लिखा है। ख़ैर वागले ने डायरी में लिखे विक्रम सिंह के अतीत को पढ़ना शुरू किया।

☆☆☆
 
अब तक,,,,

उस पहले पेज पर लिखे मजमून को पढ़ने के बाद शिवकांत वागले को ये समझ आया कि इस डायरी में विक्रम सिंह ने शायद अपने अतीत के बारे में ही लिखा है। ख़ैर वागले ने डायरी में लिखे विक्रम सिंह के अतीत को पढ़ना शुरू किया।

अब आगे,,,,

20 दिसंबर 1998..

इस तारीख़ को मैं कभी नहीं भूल सकता। इस तारीख़ ने मेरी ज़िन्दगी को मुकम्मल तौर पर बदल दिया था। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी सबसे बड़ी चाहत किसी चमत्कार के जैसे पूरी हो जाएगी। वैसे तो हर इंसान किसी न किसी चीज़ की चाहत रखता है और जीवन भर इसी कोशिश में लगा रहता है कि जिस चीज़ की वो चाहत किए बैठा है वो पूरी हो जाए। जब किसी इंसान की चाहत पूरी हो जाती है तो यकीनन उसे स्वर्ग मिल जाने जितनी ख़ुशी महसूस होने लगती है। इंसान अपनी उस ख़ुशी को अलग अलग तरीके से दुनियां वालों के सामने ज़ाहिर भी करता है।

ये खुशियां और ये चाहतों का पूरा होना हर किसी के नसीब में नहीं होता। कभी कभी तो इंसान अपनी ख़ुशियों और चाहतों के पूरा होने के इंतज़ार में सारी उम्र गुज़ार देता है और एक दिन वो इस दुनियां से चला भी जाता है। हालांकि इंसान की ख़्वाहिशें और चाहतें जीवन भर किसी न किसी चीज़ की बनी ही रहती हैं लेकिन कुछ ख़ास ख़्वाहिशें ऐसी होती हैं जिनको पाने की इंसान के दिल में एक अलग ही ललक रहती है। इंसान अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए जाने कैसे कैसे जतन करता है जिसमें उसका अपना भाग्य और नसीब भी जुड़ा होता है। अगर नसीब में नहीं लिखा तो सारी उम्र हमारी चाहत पूरी नहीं हो पाती और अगर नसीबों में है तो एक दिन ज़रूर हमारी चाहत पूरी हो जाती है। ख़ैर हर किसी की तरह मेरे भी दिल में एक चाहत थी और मैं हमेशा इसी कोशिश में लगा रहता था कि किसी तरह मेरी वो चाहत पूरी हो जाए लेकिन मेरी चाहत के पूरा होने के कभी कोई आसार नज़र नहीं आए। अपनी उस चाहत के पूरा न होने की वजह से मैं एकदम से निराश सा हो गया था। मेरे ही जैसे ख़राब नसीब वाले मेरे दोस्त भी थे। वो भी मेरी तरह अपनी चाहत के पूरा होने के लिए ललक रहे थे।

कहते हैं कि हम जो सोचते हैं या हम जो चाहते हैं वो अक्सर नहीं होता बल्कि आपके लिए ईश्वर ने जो सोचा होता है वही होता है। क्योंकि इस संसार में सब कुछ उसी की मर्ज़ी से होता है। लोग तो ये भी कहते हैं कि ईश्वर हमारे लिए जो भी करता है वो अच्छे के लिए ही करता है लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है ये बात इस संसार का हर ब्यक्ति जानता है।

20 दिसंबर की शाम मैं अपने दोस्तों के साथ क्लब गया था। क्लब में हम सबने थोड़ी बहुत बियर पी और हमेशा की तरह उन लड़कियों को ताड़ने लगे जो बाकी लड़कों के साथ डांस फ्लोर पर डांस कर रहीं थी। छोटे छोटे कपड़ों में वो सुन्दर लड़कियां गज़ब ढा रहीं थी और जब गाने और ताल के रिदम पर उनकी कमर लचकती तो ऐसा लगता जैसे दिल पर बिजली गिरने लगी हो। उस वक़्त तो हालत ही ख़राब हो जाती थी जब उन लड़कियों के ब्वाय फ्रेंड उनकी गोल गोल गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर ज़ोर से भींचने लगते थे। एक दूसरा लड़का अपनी गर्ल फ्रेंड की चूचियों को मुट्ठी में भर कर मसलता नज़र आता तो कोई तीसरा अपनी गर्ल फ्रेंड के होठों को अपने मुँह में ऐसे भर लेता था जैसे वो खा ही जाएगा। ये मंज़र देख कर बियर का तो घंटा कोई नशा नहीं होता था लेकिन उस गरम मंज़र को देख कर मेरे साथ साथ मेरे सभी दोस्तों के लंड ज़रूर औकात से बाहर होने लगते थे। उसके बाद हम सब क्लब के बाहर अँधेरे में एक तरफ जाते और मुट्ठ मार कर अपने अपने लंड को शांत कर लेते।

ऐसा नहीं था कि हम लोग दिखने में सुन्दर नहीं थे या हमारी पर्सनालिटी अच्छी नहीं थी, बल्कि वो तो अच्छी खासी थी। हम ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखते थे जिन्हें हाई क्लास तो नहीं पर अमीर परिवारों में ज़रूर गिना जाता था। मेरे जैसे अमीर घर के लड़के हर रोज़ एक नई लड़की को रगड़ रगड़ कर चोद सकते थे किन्तु इस मामले में हमारी किस्मत बेहद ख़राब थी। किस्मत ख़राब का मतलब ये है कि हम सब बेहद शर्मीले स्वभाव के थे। दूर से किसी लड़की को देख कर हम आपस में चाहे जितनी ही गन्दी बातें करते रहें लेकिन किसी लड़की से खुल कर इस मामले में बात करने में हम लोगों की फट के हाथ में आ जाती थी। स्कूल और कॉलेज लाइफ में बड़ी मुश्किल से एक दो लड़कियों से हमारी दोस्ती हुई थी लेकिन मामला दोस्ती तक ही रहा। हालांकि उन लड़कियों से दोस्ती का वो रिश्ता भी ज़्यादा समय तक का नहीं रह पाया था क्योंकि हमारे स्वभाव की वजह से कुछ ही समय में इन लड़कियों ने हमसे किनारा कर लिया था।

हम सभी दोस्त एक साथ बैठ कर इस बारे में बातें करते और यही फ़ैसला करते कि अब से हम शर्माएंगे नहीं बल्कि हर लड़की को लाइन मरेंगे लेकिन जब इस फ़ैसले के तहत ऐसा करने की बारी आती तो हम लोगों की फिर से गांड फट जाती थी। अपने इस शर्मीले स्वभाव की वजह से हम लोग अपने आपसे बेहद गुस्सा रहते लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे। स्कूल कॉलेज के बाकी लड़के हमारा मज़ाक उड़ाते थे। ईश्वर की दया से पढ़ाई लिखाई पूरी हुई और हम लोग अपने अपने घर आ गए। हमारे माता पिता भी जानते थे कि उनके बच्चों का स्वभाव कैसा है और इसके लिए वो हमें समझाते भी थे लेकिन इसके बावजूद हमारा ऐसा स्वभाव हमारा पीछा नहीं छोड़ता था।

उस रात क्लब से हम सभी दोस्त गर्म हो कर बाहर निकले और अँधेरे में एक जगह जा कर हमने मुट्ठ मार कर अपने अपने लंड को शांत किया। अंदर की गर्मी लंड के रास्ते निकाल कर हम लोग घर की तरफ चल दिए। मेरे तीनों दोस्तों के पास अपनी अपनी मोटर साइकिल थी और उस रात भी हम अपनी अपनी मोटर साइकिल में ही क्लब से आए थे। कुछ दूर साथ साथ आने के बाद मेरे बाकी दोस्त अपने अपने घरों की तरफ मुड़ गए और मैं अपने घर की तरफ चल दिया।

ठंड का महीना और ऊपर से कोहरे की हल्की धुंध में मोटर साइकिल की रफ़्तार ज़्यादा तेज़ नहीं थी। क्लब से मेरे घर की दूरी मुश्किल से दो किलो मीटर थी। मैं मोटर साइकिल चलाते हुए यही सोच रहा था कि काश क्लब की वो सारी सुन्दर लड़कियां इस वक़्त मेरे सामने आ जाएं और अपने जिस्म के बाकी बचे हुए कपड़े उतार कर मुझसे कहें कि____'आओ विक्रम, हमारे जिस्म को जैसे चाहो भोग लो।'

बार बार आँखों के सामने उन लड़कियों की मटकती गांड और उछलती चूचियां नज़र आ रहीं थी। अभी मैं इन सब में खोया ही हुआ था कि तभी मुझे ज़ोर का झटका लगा और मैं मोटर साइकिल के साथ ही सड़क पर गिर गया। सड़क में शायद कहीं पर स्पीड ब्रेकर था जिस पर मैंने ध्यान नहीं दिया था और जैसे ही स्पीड ब्रेकर पर मोटर साइकिल का अगला पहिया चढ़ा तो मुझे ज़ोर का झटका लगा जिससे हैंडल से मेरे हाथ छूट गए और फिर मैं कुछ न कर सका। ये तो शुक्र था कि मोटर साइकिल की रफ़्तार ज़्यादा नहीं थी वरना गहरी चोंट लग जाती मुझे। फिर भी एक घुटना छिल ही गया था और बायां कन्धा पक्की सड़क पर ज़ोर से लगने की वजह से दर्द करने लगा था।

उस वक़्त सड़क पर कोई नहीं था, और आस पास भी कोहरे की वजह से कुछ दिख नहीं रहा था। हालांकि कोहरे में दूर दूर कहीं हल्की रौशनी का आभास ज़रूर हो रहा था। ख़ैर मैं किसी तरह उठा और चलने की कोशिश की तो घुटने में तेज़ दर्द हुआ जिससे मेरे हलक से कराह निकल गई। मैं फ़ौरन ही सड़क पर बैठ गया और आस पास देखने लगा। कोहरे की वजह से मुझे इस बात का भी डर लगने लगा था कि सड़क पर किसी तरफ से अचानक कोई वाहन न आ जाए और मुझे कुचल दे इस लिए मैं फिर से उठा और दर्द को सहते हुए सड़क के किनारे पर आ कर बैठ गया।

सड़क के किनारे बैठे हुए अभी मुझे कुछ ही देर हुई थी कि तभी मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मेरे पीछे कोई खड़ा है। इस एहसास के साथ ही मेरे जिस्म का रोयां रोयां कांप गया और मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मैंने हिम्मत कर के अपनी गर्दन को पीछे की तरफ घुमाया तो जिस शख़्स पर मेरी नज़र पड़ी उसे देखते ही मैं बुरी तरह उछल पड़ा और साथ ही मेरे मुख से चीख निकलते निकलते रह गई। मेरे पीछे एक ऐसा शख़्स खड़ा था जिसका समूचा बदन काले कपड़ों से ढंका हुआ था, यहाँ तक कि उसका चेहरा भी काले नक़ाब में छुपा हुआ था। सिर पर गोलाकार काली टोपी थी जो उसके अग्रिम ललाट की तरफ काफी ज़्यादा झुकी हुई थी।

"क..क..कौन हो तुम?" मारे दहशत के मैंने उससे पूछने की हिम्मत दिखाई तो उसने अजीब सी आवाज़ में कहा____"मैं वो हूं जो तुम्हारी हर इच्छा को पूरी कर सकता है।"

"क्..क्या मतलब??" मैं उसकी बात सुन कर चकरा सा गया था।

"मतलब समझाने के लिए ये सही जगह नहीं है।" उस रहस्यमयी शख़्स ने अपनी बहुत ही अजीब आवाज़ में कहा____"उसके लिए तुम्हें मेरे साथ एक ख़ास जगह पर चलना होगा।"

उसकी बात सुन कर अभी मैं कुछ कहने ही वाला था कि तभी जैसे क़यामत आ गई। उस रहस्यमयी शख़्स का एक हाथ बिजली की तरह मेरी तरफ लपका और मेरे हलक से घुटी घुटी सी चीख निकल गई। मेरी कनपटी के किसी ख़ास हिस्से पर उसने ऐसा वार किया था कि मुझे बेहोश होने में ज़रा भी देरी नहीं हुई।

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जब मेरी आँखें खुलीं तो मैंने अपने आपको एक ऐसी जगह पर पाया जो मेरे लिए निहायत ही अजनबी थी। मैं एक आलीशान कमरे में एक आलीशान बेड पर पड़ा हुआ था। मेरे जिस्म में जो कपड़े थे वो अब नहीं थे बल्कि उन कपड़ों की जगह दूसरे कपड़े थे। ये सब देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गया। मुझे समझ में नहीं आया कि मैं एकदम से यहाँ कैसे आ गया? तभी मुझे ख़याल आया कि मुझे एक रहस्यमयी शख़्स ने बेहोश किया था। इस बात के याद आते ही मेरे अंदर घबराहट उभर आई। मैं सोचने लगा कि वो रहस्यमयी शख़्स कौन था और मैं यहाँ कैसे पहुंचा? मुझे एकदम से ख़याल आया कि कहीं मैं कोई सपना तो नहीं देख रहा? मैंने अपनी आँखों को मल मल कर बार बार चारों तरफ देखा किन्तु सच्चाई यही थी कि मैं एक आलीशान जगह पर था। मेरे ज़हन में सवालों की जैसे बाढ़ सी आ गई। उस आलीशान कमरे में मेरे अलावा दूसरा कोई नहीं था। कमरे का दरवाज़ा बंद था। ये देख कर मैं एक झटके से उठा और बेड से नीचे उतर आया। नीचे उतरते ही मैं बुरी तरह चौंका, क्योंकि एकदम से मुझे याद आया कि बेहोश होने से पहले मैं अपनी मोटर साइकिल से गिर गया था और मेरा एक घुटना छिल गया था जिसकी वजह से मुझसे चला नहीं जा रहा था किन्तु इस वक़्त मुझे ज़रा भी दर्द नहीं हो रहा था। मैंने फ़ौरन ही झुक कर अपने पैंट को पकड़ कर ऊपर सरकाया तो देखा मेरे घुटने पर दवा के साथ साथ पट्टी लगी हुई थी। इसका मतलब यहाँ लाने के बाद मेरे ज़ख्म पर मरहम पट्टी की गई थी किन्तु सवाल ये था कि ऐसा किसने किया होगा, क्या उस रहस्यमयी शख़्स ने? आख़िर वो मुझसे चाहता क्या है और यहाँ क्यों ले कर आया है मुझे?

मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और एक ऐसा शख़्स कमरे में दाखिल हुआ जिसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था, यहाँ तक कि उसका चेहरा भी सफ़ेद रंग के नक़ाब में ढंका हुआ था। नक़ाब के अंदर से सिर्फ उसकी आँखें ही झलक रहीं थी। मैं उस सफ़ेदपोश को देख कर एक बार फिर से बुरी तरह हैरान रह गया था। आख़िर ये चक्कर क्या था कि एक बार काले कपड़े वाला मिलता है और अब ये सफ़ेद कपड़े में एक शख़्स आ गया है?

"अब तुम कौन हो भाई?" मैंने उस शख़्स को घूरते हुए पूछा तो उसने अपनी सामान्य आवाज़ में कहा____"एक ऐसा शख़्स जिसके बारे में जानना तुम्हारे लिए ज़रूरी नहीं है।" उस सफ़ेदपोश ने अजीब भाव से कहा____"तुम्हें इसी वक़्त मेरे साथ चलना होगा।"

"लेकिन कहां?" मैं उसकी बात सुन कर उलझ सा गया।

"उन्हीं के पास।" सफ़ेद कपड़े वाले ने कहा____"जो तुम्हें यहाँ पर ले कर आए हैं? क्या तुम जानना नहीं चाहोगे कि तुम्हें यहाँ किस लिए लाया गया है?"

सफ़ेदपोश ने एकदम सही कहा था। मैं यही तो जानना चाहता था कि मुझे यहाँ किस लिए लाया गया है? मैंने उस सफ़ेदपोश की बात पर हां में सिर हिलाया और उसकी तरफ बढ़ चला। मुझे अपनी तरफ आता देख वो शख़्स वापस पलटा और दरवाज़े के बाहर निकल गया।

उस सफ़ेदपोश के पीछे पीछे चलते हुए मैं कुछ ही देर में एक ऐसी जगह पहुंचा जहां पर बल्ब की रोशनी बहुत ही कम थी। हर तरफ मौत की तरह सन्नाटा फैला हुआ था। मैं हर तरफ देखता हुआ आया था किन्तु कहीं पर भी दूसरा आदमी नज़र नहीं आया था। पता नहीं ये कौन सी जगह थी लेकिन इतना ज़रूर था कि ये जगह थी बड़ी कमाल की और बेहद हसीन भी।

वो एक लम्बा चौड़ा हाल था जिसमें नीम अँधेरा था और उसी नीम अँधेरे में हाल के दूसरे छोर पर वो रहस्यमयी शख़्स एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठा हुआ था जो मुझे पहले मिला था और जिसने मुझे बेहोश किया था। इस वक़्त भी उसका समूचा जिस्म काले कपड़ों में ढंका हुआ था और चेहरे पर काला नक़ाब था।

"हमारा ख़याल है कि तुम्हें यहाँ तक चल कर आने में ज़रा भी तक़लीफ नहीं हुई होगी।" उस रहस्यमयी शख़्स की बहुत ही अजीब सी आवाज़ हाल में गूंजी____"और हां, हमें इस बात के लिए माफ़ करना कि हम तुम्हें इस तरह से यहाँ ले कर आए।"

"मुझे ये बताओ कि तुम हो कौन?" मैं अंदर से डरा हुआ तो था किन्तु फिर भी हिम्मत कर के पूछ ही बैठा था____"और ये भी बताओ कि मुझे यहाँ क्यों ले कर आए हो? तुम शायद जानते नहीं हो कि मैं किसका बेटा हूं? अगर जानते तो मुझे इस तरह यहाँ लाने की हिमाक़त नहीं करते।"

"हमें तुम्हारे बारे में सब कुछ पता है लड़के।" उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"संक्षेप में तुम ये समझ लो कि हमसे किसी के भी बारे में कुछ भी छुपा नहीं है। तुम्हारी जानकारी के लिए हम तुम्हें ये भी बता देते हैं कि हम किसी का भी कुछ भी बिगाड़ सकते हैं लेकिन हमारा कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।"

"पर मुझे इस तरह यहाँ लाने का क्या मतलब है?" उसकी बात सुनकर मेरे जिस्म में डर की वजह से झुरझुरी सी हुई थी, किन्तु फिर मैंने ख़ुद को सम्हालते हुए कहा____"मैंने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिसके लिए कोई मुझे इस तरह से यहाँ ले आए।"

"तो हमने कब कहा कि तुमने कुछ किया है?" उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"जैसा कि हमने तुम्हें उस वक़्त भी बताया था कि हम वो हैं जो तुम्हारी हर इच्छा को पूरी कर सकते हैं, इस लिए अब तुम बताओ कि क्या तुम अपनी हर इच्छा को पूरा करना चाहोगे?"

"क्या तुम कोई भगवान हो?" मैंने उसकी तरफ घूरते हुए हिम्मत करके कहा____"जो मेरी हर इच्छा को पूरा कर सकते हो?"

"ऐसा ही समझ लो।" कुर्सी पर बैठे उस रहस्यमयी शख़्स ने अपनी अजीब आवाज़ में कहा____"हम एक तरह के भगवान ही हैं जो किसी की भी इच्छा को पूरी कर सकते हैं।"

"पर तुम मेरी इच्छाओं को क्यों पूरा करना चाहते हो?" मैंने कहा____"मैंने तो तुमसे या किसी से भी नहीं कहा कि मेरी इच्छाओं को पूरा कर दो।"

"तुमने मुख से भले ही नहीं कहा।" उस शख़्स ने कहा____"किन्तु हर पल तो तुम यही सोचते रहते हो न कि काश तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो जाए?"

"तु...तुम्हें ये कैसे पता?" मैं उसकी बात सुन कर बुरी तरह चौंका था।

"हमने बताया न कि हम सबके बारे में सब कुछ जानते हैं।" उसने कहा_____"ख़ैर तुम बताओ कि क्या तुम अपनी सबसे बड़ी इच्छा को पूरा करना चाहोगे?"

मैं उस रहस्यमयी शख़्स की बातें सुन कर चकित तो था ही किन्तु मन ही मन ये भी सोचने लगा था कि क्या ये सच में मेरी सबसे बड़ी इच्छा को पूरा कर देगा? यानी क्या ये मेरी इस इच्छा को पूरा कर सकता है कि मैं किसी सुन्दर लड़की को अपनी मर्ज़ी से जैसे चाहूं भोग सकूं? ये सब सोचते हुए जहां एक तरफ मेरे मन के किसी कोने में ख़ुशी के लड्डू फूटने लगे थे वहीं एक तरफ मैं ये भी सोचने लगा कि आख़िर ये शख़्स मेरी सबसे बड़ी इच्छा को बिना किसी स्वार्थ के कैसे पूरा कर सकता है? मतलब मेरे लिए ऐसा करने के पीछे ज़रूर इसका भी कोई न कोई मकसद या फ़ायदा होगा लेकिन क्या????

"क्या हुआ?" मुझे ख़ामोशी से कुछ सोचता देख उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"क्या सोचने लगे?"

"म..मैं सोच रहा हूं कि तुम मेरे लिए ऐसा क्यों करना चाहते हो?" मैंने हड़बड़ा कर कहा____"इतना तो मैं भी जानता हूं कि इस दुनियां में कोई भी इंसान बिना किसी स्वार्थ के किसी के लिए कुछ भी नहीं करता। फिर तुम मेरे लिए ऐसा क्यों करोगे भला? मतलब साफ़ है कि मेरे लिए ऐसा करने के पीछे तुम्हारा भी अपना कोई स्वार्थ है या फिर कोई मकसद है।"
 
"बिल्कुल ठीक कहा तुमने।" उस शख़्स ने कहा_____"इस दुनियां में कोई भी इंसान बिना किसी मतलब के किसी के लिए कुछ भी नहीं करता। अगर हम तुम्हारे लिए ऐसा करेंगे तो ज़ाहिर है कि इसके पीछे कहीं न कहीं हमारा भी कोई न कोई स्वार्थ ही होगा।"

"क्या मैं जान सकता हूं कि ऐसा करने के पीछे तुम्हारा क्या स्वार्थ है?" मैंने हिम्मत कर के पूछा_____"कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम मुझे किसी ऐसे संकट में फंसा देना चाहते हो जिससे मेरी लाइफ़ ही बर्बाद हो जाए?"

"तुम्हारा ऐसा सोचना बिलकुल जायज़ है लड़के।" उस शख़्स ने कहा_____"लेकिन यकीन मानो हमारा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं है। तुम किसी भी तरह के संकट में नहीं फंसोगे और ना ही इससे तुम्हारी लाइफ़ बर्बाद होगी। बल्कि ऐसा करने से तुम्हें मज़ा ही आएगा और तुम्हारी लाइफ़ भी ऐशो आराम वाली हो जाएगी।"

"बड़ी अजीब बात है।" मैंने कहा____"क्या दुनियां में ऐसा भी कहीं होता है?"

"दुनियां की बात मत करो लड़के।" उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा_____"अभी तुमने दुनियां देखी ही कहां है? तुम्हें तो अंदाज़ा भी नहीं है कि इस दुनियां में क्या क्या होता है। तुम जिन चीज़ों की कल्पना भी नहीं कर सकते वो सब चीज़ें इस दुनियां में कहीं न कहीं होती हैं। ख़ैर छोड़ो इस बात को और अच्छी तरह सोच कर बताओ कि क्या तुम अपनी सबसे बड़ी इच्छा को पूरा करते हुए अपनी लाइफ़ को ऐशो आराम वाली बनाना चाहोगे?"

"भला इस दुनियां में ऐसा कौन होगा जो अपनी लाइफ़ को ऐशो आराम वाली न बनाना चाहे?" मैंने कहा____"लेकिन मैं तुम पर भरोसा क्यों करूं? कल को अगर कोई लफड़ा हो गया तो मैं तो कहीं का नहीं रहूंगा? मेरे माता पिता का क्या होगा? मैं उनकी इकलौती औलाद हूं? ऐसे काम की वजह से अगर उनका सिर नीचा हो गया तो मैं कैसे उन्हें अपना चेहरा दिखा पाऊंगा?"

"तुम इस बात से बेफिक्र रहो विक्रम।" रहस्यमयी शख़्स ने मेरा नाम लेते हुए कहा_____"तुम्हारे ऐसे काम की वजह से तुम्हारी फैमिली पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अभी तुम ये जानते ही नहीं हो कि हम कौन हैं और हम किस तरह की संस्था चलाते हैं।"

"क्या मतलब???" मेरे माथे पर बल पड़ा____"संस्था चलाने से क्या मतलब है तुम्हारा?"

"हम एक ऐसी संस्था चलाते हैं।" उस शख़्स ने कहा_____"जो औरतों और मर्दों की सेक्स नीड को पूरा करती है। दुनियां के किसी भी कोने में चले जाओ, हर जगह औरत और मर्द की ढेर सारी समस्याओं में से एक समस्या सेक्स भी है। कोई मर्द अपनी पत्नी से खुश नहीं है तो कोई पत्नी अपने पति से खुश नहीं है। इससे होता ये है कि हर औरत और मर्द अपनी सेक्स नीड को पूरा करने के लिए घर से बाहर अपने लिए पार्टनर ढूंढ़ते हैं। हालांकि औरतों और मर्दों के ऐसा करने से अक्सर उनकी मैरिड लाइफ़ ख़तरे में पड़ जाती है लेकिन इंसान करे भी तो क्या करे? ख़ैर, हमारी संस्था गुप्त रूप से औरतों और मर्दों की सेक्स नीड को पूरा करने के लिए पार्टनर प्रोवाइड करती है। हमारी संस्था के एजेंट्स गुप्त रूप से ऐसे लोगों के पास उनकी सेक्स नीड को पूरा करने के लिए जाते हैं जिन्हें इसकी ज़रूरत पड़ती है।"

"ये तो बड़ी ही अजीब बात है।" मैंने चकित भाव से कहा_____"लेकिन एक सवाल है मेरे मन में और वो कि जिनको अपनी सेक्स नीड को पूरा करने के लिए पार्टनर की ज़रूरत होती है वो लोग इस संस्था से सम्बन्ध कैसे बनाते हैं? क्योंकि तुम्हारे अनुसार तो ये संस्था गुप्त ही है न, जिसके बारे में बाहरी दुनियां को पता ही नहीं है कि ऐसी कोई संस्था भी है।"

"सवाल अच्छा है।" रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"किन्तु इसका जवाब ये है कि इसके लिए हमारी संस्था के एजेंट्स गुप्त रूप से ऐसे लोगों का पता लगाते रहते हैं जिन्हें अपने लिए पार्टनर की ज़रूरत होती है। दुनियां में बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो अपना टेस्ट बदलने के लिए दूसरी औरतों या दूसरे मर्दों से सेक्स करने की चाह रखते हैं। हमारी संस्था में ऐसे लोगों के बारे में पता लगाने का काम दूसरे एजेंट्स करते हैं, जबकि सेक्स की सर्विस देने वाले एजेंट्स दूसरे होते हैं।"

"ओह! तो इसका मतलब ये हुआ कि तुम्हें तुम्हारे एजेंट्स के द्वारा ही मेरे बारे में पता चला है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा तो उस शख़्स ने कहा____"ज़ाहिर सी बात है। जैसा कि हमने अभी तुम्हें बताया कि ऐसे लोगों का पता लगाने के लिए हमारी संस्था के दूसरे एजेंट्स होते हैं। उन्हीं एजेंट्स के पता करने का नतीजा ये हुआ है कि इस वक़्त तुम यहाँ पर हो।"

"अगर मैं इसके लिए मना कर दूं तो?" मैंने कुछ सोचते हुए ये कहा तो उस शख़्स ने कहा____"वो तुम्हारी मर्ज़ी की बात है। इसके लिए तुम्हें मजबूर नहीं किया जाएगा लेकिन हां अगर तुम अपनी मर्ज़ी से एक बार हमारी इस संस्था से जुड़ कर इसके एजेंट बन गए तो फिर तुम इस संस्था को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकते।"

"ऐसा क्यों?" मैंने न समझने वाले भाव से कहा।

"दुनियां में हर चीज़ के अपने नियम कानून होते हैं।" उस शख़्स ने कहा____"उसी तरह हमारी इस संस्था के भी कुछ नियम कानून हैं जिनका पालन करना संस्था के हर एजेंट का फ़र्ज़ है। संस्था के नियम कानून तोड़ने पर शख़्त से शख़्त सज़ा भी दी जाती है। हालांकि आज तक कभी ऐसा हुआ नहीं है कि हमारी संस्था के किसी एजेंट ने कोई नियम कानून तोड़ा हो या अपनी मर्ज़ी से ऐसा कुछ किया हो जो संस्था के नियम कानून के खिलाफ़ रहा हो।"

"इसका मतलब ये हुआ कि इस संस्था से जुड़ने के बाद इंसान अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं कर सकता?" मैंने ये कहा तो रहस्यमयी शख़्स ने कहा_____"नियम कानून इस लिए बनाए जाते हैं ताकि इंसान किसी चीज़ का नाजायज़ फायदा न उठाए और अनुशासित ढंग से अपना हर काम करे। ये नियम कानून हर जगह और हर क्षेत्र में बने होते हैं। बिना नियम कानून के कोई भी क्षेत्र हो वो बहुत जल्द ही गर्त में डूब जाता है।"

रहसयमयी शख़्स की बातें सुन कर इस बार मैं कुछ न बोला। ये अलग बात है कि बार बार मेरे ज़हन में यही ख़याल उभर रहा था कि मुझे इस शख़्स के कहने पर इस संस्था से जुड़ जाना चाहिए। ऐसा इस लिए क्योंकि इस संस्था से जुड़ने के बाद मेरी सबसे बड़ी चाहत पूरी हो जाएगी। यानी एजेंट के रूप में मैं किसी न किसी लड़की या औरत की सेक्स नीड को पूरा करने के लिए जाऊंगा और फिर जैसे चाहूंगा वैसे उन्हें भोगूंगा। इस ख़याल के साथ ही मेरा मन बल्लियों उछलने लगा था। साला कहां आज तक मेरी किसी लड़की से बात करने में भी गांड फट के हाथ में आ जाती थी और कहां अब इस संस्था से जुड़ने के बाद मैं बिना किसी बाधा के किसी लड़की या औरत को सहज ही भोग सकता था। मुझे कहीं से भी इस काम में अपने लिए कोई लफड़ा नज़र नहीं आ रहा था बल्कि मेरे लिए तो हर बार एक नई और अलग चूत मारने को मिलने वाली थी। हालांकि मेरे लिए अभी भी एक समस्या ये थी कि मैं स्वभाव से शर्मीला था जिसकी वजह से मैं लड़की ज़ात से खुल कर बात नहीं कर पाता था किन्तु मैं जानता था कि इस संस्था से जुड़ने के बाद मेरी ये समस्या भी दूर हो जाएगी।

"तुम चाहो तो इसके बारे में सोचने के लिए समय ले सकते हो।" मुझे चुप देख उस शख़्स ने कहा_____"तुम्हें इस काम के लिए किसी भी तरह से मजबूर नहीं किया जाएगा। इस संस्था से जुड़ने का फ़ैसला सिर्फ तुम्हारा ही होगा, लेकिन संस्था से जुड़ने के बाद फिर तुम इस संस्था को छोड़ने के बारे में सोचोगे भी नहीं और ना ही संस्था के नियम कानून के खिलाफ़ जा कर अपनी मर्ज़ी से कुछ करोगे।"

"ठीक है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मुझे इस बारे में सोचने के लिए दो दिन का समय चाहिए। वैसे, इस संस्था से जुड़ने के बाद ऐसा भी तो हो सकता है कि अपने परिवार के बीच रहते हुए मुझे संस्था के लिए काम करने में समस्या होने लगे। उस सूरत में मैं क्या करुंगा?"

"इस तरह की समस्या हमारे बाकी एजेंट्स को भी थी।" रहस्यमयी शख़्स ने कहा_____"लेकिन ये भी सच है कि आज तक उन्हें ऐसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा है। क्योंकि हमारी संस्था का काम गुप्त रूप से करने का है और संस्था के नियम कानून के अनुसार संस्था का कोई भी एजेंट्स न तो अपने बारे में किसी को पता चलने देता है और ना ही उसे ऐसी किसी सिचुएशन में फंसने दिया जाता है जिसके चलते एजेंट के साथ साथ हमारी संस्था को भी कोई नुकसान पहुंच सके। इस संस्था की गोपनीयता का सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि संस्था का कोई भी एजेंट संस्था के दूसरे एजेंट्स के बारे में कुछ नहीं जानता। एक तरह से तुम ये समझो कि ये एक सीक्रेट सर्विस है, यानि कि एक गुप्त नौकरी। जिसके बारे में किसी को भी पता नहीं होता और ना ही किसी को पता चलने दिया जाता है। संस्था के साथ साथ संस्था के हर एजेंट्स की गोपनीयता का सबसे पहले ख़याल रखा जाता है।"
 
"वैसे इस संस्था का नाम क्या है?" मैंने जिज्ञासावश पूछा तो कुछ पल रुकने के बाद रहस्यमयी शख़्स ने कहा_____"संस्था के नाम के बारे में तुम्हें तभी बताया जाएगा जब तुम इस संस्था का एजेंट बनने के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाओगे। ख़ैर तुमने सोचने के लिए दो दिन का वक़्त मांगा है इस लिए जाओ और आराम से सोचो इस बारे में।"

"तो क्या अब मैं अपने घर जा सकता हूं?" मैंने पूछा तो उस शख़्स की आवाज़ आई____"बेशक, तुम अपने घर ही जाओगे किन्तु उसी हालत में जिस हालत में तुम्हें यहाँ पर लाया गया था।"

"यहां से जाने के बाद।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा_____"अगर मैंने लोगों को इस संस्था के बारे में बता दिया तो?"

"शौक से बता देना।" उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा_____"लेकिन किसी को भी बताने से पहले एक बार ज़रा खुद भी सोचना कि तुम्हारी बात का यकीन कौन करेगा?"

उस रहस्यमयी शख़्स की ये बात सुन कर मुझे भी एहसास हुआ कि यकीनन मेरी इस बात पर भला कौन यकीन करेगा कि इस दुनियां में ऐसी कोई संस्था भी हो सकती है। एक तरह से इस बारे में लोगों को बता कर मैं अपना ही मज़ाक उड़ाऊंगा। ख़ैर अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मुझे मेरे पीछे से किसी के आने की आहट हुई तो मैंने पलट कर पीछे देखना चाहा लेकिन उसी पल जैसे क़यामत टूट पड़ी मुझ पर। एक बार फिर से मुझे बड़ी ही सफाई से बेहोश कर दिया गया था।

जब मुझे होश आया तो मैं उसी सड़क के किनारे पड़ा हुआ था जहां पर मैं पहली बार बेहोश हुआ था। मेरे बदन पर इस बार मेरे ही कपड़े थे। ये देख कर मैं एक बार फिर से चकित रह गया। मेरी नज़र कुछ ही दूरी पर खड़ी मेरी मोटर साइकिल पर पड़ी। मोटर साइकिल को किसी ने सड़क से हटा कर ऐसी जगह पर खड़ा कर दिया था जहां पर आसानी से किसी की नज़र नहीं पड़ सकती थी। कुछ पलों के लिए तो मुझे ऐसा लगा जैसे अभी तक मैं कोई ख़्वाब देख रहा था और जब आँख खुली तो मैं हक़ीक़त की दुनिया में आ गया हूं। आस पास पहले की ही भाँति कोहरे की हल्की धुंध थी और अब मुझे ठण्ड भी प्रतीत हो रही थी। कुछ देर मैं बेहोश होने से पूर्व की घटना के बारे में याद कर के सोचता रहा, उसके बाद उठा और अपनी मोटर साइकिल में बैठ कर घर की तरफ बढ़ गया।

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अब तक,,,,,

जब मुझे होश आया तो मैं उसी सड़क के किनारे पड़ा हुआ था जहां पर मैं पहली बार बेहोश हुआ था। मेरे बदन पर इस बार मेरे ही कपड़े थे। ये देख कर मैं एक बार फिर से चकित रह गया। मेरी नज़र कुछ ही दूरी पर खड़ी मेरी मोटर साइकिल पर पड़ी। मोटर साइकिल को किसी ने सड़क से हटा कर ऐसी जगह पर खड़ा कर दिया था जहां पर आसानी से किसी की नज़र नहीं पड़ सकती थी। कुछ पलों के लिए तो मुझे ऐसा लगा जैसे अभी तक मैं कोई ख़्वाब देख रहा था और जब आँख खुली तो मैं हक़ीक़त की दुनिया में आ गया हूं। आस पास पहले की ही भाँति कोहरे की हल्की धुंध थी और अब मुझे ठण्ड भी प्रतीत हो रही थी। कुछ देर मैं बेहोश होने से पूर्व की घटना के बारे में याद कर के सोचता रहा, उसके बाद उठा और अपनी मोटर साइकिल में बैठ कर घर की तरफ बढ़ गया।

अब आगे,,,,,

"साहब लंच का टाईम हो गया है।" डायरी पढ़ रहे जेलर शिवकांत वागले के कानों में जब ये वाक्य पड़ा तो उसका ध्यान टूटा और उसने चेहरा उठा कर सामने की तरफ देखा। जेल का ही एक सिपाही उसके सामने टेबल के उस पार खड़ा था। उसे देख कर वागले की आँखों में सवालिया भाव उभरे।

"वो साहब जी।" सिपाही ने झिझकते हुए कहा_____"लंच का टाईम हो गया है। मैं घर से आपके लिए खाने का टिफिन ले आया हूं।"

"ओह! हां हां।" सिपाही की बात सुन कर वागले को जैसे समय का आभास हुआ और उसने गहरी सांस लेते हुए कहा____"अच्छा किया तुमने जो मुझे बता दिया। वैसे खाने में आज क्या भिजवाया है तुम्हारी मैडम ने?"

"मैंने टिफिन खोल कर तो नहीं देखा साहब जी।" सिपाही ने चापलूसी वाले अंदाज़ से अपनी खीसें निपोरते हुए कहा____"लेकिन टिफिन के अंदर से बहुत ही बढ़िया खुशबू आ रही है। इसका यही मतलब हुआ कि मैडम ने आज बहुत ही लजीज़ खाना आपके लिए मेरे हाथों भिजवाया है।"

"अच्छा ऐसी बात है क्या।" शिवकांत वागले ने मुस्कुरा कर कहा____"चलो अच्छी बात है। तुम भी जा कर अपना लंच कर लो।"

"अच्छा साहब जी।" सिपाही ने कहा और सिर को नवा कर केबिन से बाहर चला गया।

सिपाही के जाने के बाद वागले ने ये सोच कर एक गहरी सांस ली कि विक्रम सिंह की डायरी पढ़ने में वो इतना खो गया था कि उसे वक़्त के गुज़र जाने का ज़रा भी पता नहीं चला था। ख़ैर उसने डायरी को बंद किया और उसे अपने ब्रीफ़केस में रख दिया।

लंच करने के बाद जेलर शिवकांत वागले ने कुछ देर कुर्सी में ही बैठ कर आराम किया और फिर जेल का चक्कर लगाने निकल पड़ा। उसके ज़हन में डायरी में लिखी हुई बातें ही चल रही थी। वो खुद भी गहराई से सोचता जा रहा था कि क्या सच में ऐसी कोई संस्था हो सकती है जिसके बारे में विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में ज़िक्र किया है? वागले सोच रहा था कि इस दुनियां में कैसे कैसे लोग हैं और कैसी कैसी चीज़ें हैं जिनके बारे में सोच कर ही बड़ा अजीब सा लगता है। विक्रम सिंह की डायरी के अनुसार सी. एम. एस. यानी की चूत मार सर्विस एक ऐसे आर्गेनाइजेशन का नाम है जो गुप्त रूप से औरतों और मर्दों की सेक्स नीड को पूरा करती है। शिवकांत वागले को यकीन नहीं हो रहा था कि दुनियां में इस नाम की ऐसी कोई संस्था भी हो सकती है किन्तु वो ये भी सोच रहा था कि विक्रम सिंह जैसा शख़्स भला अपनी डायरी में ये सब झूठ मूठ का क्यों लिखेगा? अगर विक्रम सिंह का लिखा हुआ एक एक शब्द सच है तो ज़ाहिर है कि दुनियां में इस नाम की ऐसी कोई संस्था ज़रूर होगी जो औरतों और मर्दों की सेक्स नीड को पूरा करती होगी।

डायरी के अनुसार किसी रहस्यमयी नक़ाबपोश ने विक्रम सिंह को ऐसे नाम की संस्था से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया था। अब सवाल ये है कि क्या विक्रम सिंह सच में ऐसी किसी संस्था से जुड़ा हुआ था और वो औरतों और मर्दों की सेक्स नीड को पूरा करता था? हालांकि शिवकांत वागले ने डायरी में इसके आगे का कुछ नहीं पढ़ा था किन्तु ज़हन में ऐसे ख़्यालों का उभरना स्वाभाविक ही था। वागले के मन में इसके आगे जानने की तीव्र उत्सुकता जाग उठी थी।

शाम तक शिवकांत वागले ब्यस्त ही रहा, उसके बाद वो अपने सरकारी आवास पर चला गया था। घर आया तो उसकी नज़र अपनी पचास वर्षीया पत्नी सावित्री पर पड़ी। सावित्री को देखते ही वागले के ज़हन में जाने क्यों ये ख़याल उभर आया कि क्या उसकी पत्नी के मन में अभी भी सेक्स करने की हसरत होगी या फिर दो बड़े बड़े बच्चे हो जाने के बाद उसके अंदर से सेक्स की चाहत ख़त्म हो गई होगी? सावित्री दिखने में अभी भी सुन्दर थी और उसका गोरा बदन अभी भी ऐसा था जो किसी भी नौजवान को उसकी तरफ आकर्षित होने पर मजबूर कर सकता था।

शिवकांत वागले खुद भी सेक्स का बहुत बड़ा भक्त नहीं था। बच्चों के बड़ा हो जाने पर अब वो सेक्स के बारे में ज़्यादा नहीं सोचता था और लगभग यही हाल सावित्री का भी था। हालांकि कभी कभी रात में दोनों ही एक दूसरे के अंगों से छेड़ छाड़ कर लेते थे और अगर बहुत ही मन हुआ तो सेक्स कर लेते थे। शिवकांत को कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ जैसे कि उसकी पत्नी सेक्स के लिए ज़रा भी पागल हो। सावित्री को अपलक देखते हुए शिवकांत वागले को बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं हुआ कि इस मामले में उसकी पत्नी को सेक्स की ज़रूरत है कि नहीं।

वागले जानता था कि भारत देश की नारी चाहे भले ही कितना खुली हुई हो लेकिन सेक्स के मामले में सबसे पहले पहल मर्द को ही करनी पड़ती है। आज से पहले शिवकांत वागले ने ये कभी नहीं सोचा था कि दो बच्चों का पिता हो जाने के बाद उसका अपनी पत्नी सावित्री के साथ सेक्स करना ज़रूरी है कि नहीं या फिर उसकी पत्नी को इसकी ज़रूरत पड़ती होगी या नहीं, किन्तु आज विक्रम सिंह की डायरी में ये सब पढ़ने के बाद वो थोड़ा सोच में पड़ गया था कि हर औरत मर्द अपनी सेक्स की नीड को पूरा करने के लिए या अपना टेस्ट बदलने के लिए कोई दूसरा साथी खोजती या खोजते हैं। हालांकि वो ये समझता था कि अपने देश की नारी अभी इस हद तक नहीं गई है जिससे कि वो अपने पति के अलावा किसी दूसरे मर्द के बारे में सोचे किन्तु वो ये भी समझ रहा था कि अक्सर मर्दों के सम्बन्ध किसी न किसी औरत से होते हैं तो ज़ाहिर है कि यही हाल औरतों का भी है। सीधी सी बात है कि जो मर्द किसी दूसरी औरत से सम्बन्ध रखता है तो वो उस औरत के लिए दूसरा मर्द ही तो कहलाया। शिवकांत को अचानक से ख़याल आया कि वो बेकार में ही इन सब बातों के बारे में इतना सोच रहा है, जबकि हमारे देश में अभी इस तरह का परिवेश नहीं बना है। हां ये ज़रूर है कि कुछ औरतों और मर्दों के सम्बन्ध अलग अलग औरतों और मर्दों से होते हैं लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो लोग ऐसी किसी संस्था के द्वारा ये सब करते हैं। ज़ाहिर है कि विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में जो कुछ भी इस बारे में लिखा है वो सब झूठ है, कोरी बकवास है।

शिवकांत वागले ने अपने ज़हन से इन सारी बातों को झटक दिया और रात में खाना पीना करने के बाद वो अपने कमरे में सोने के लिए आ गया था। बेड पर लेटने के बाद फिर से वो विक्रम सिंह और उसकी डायरी के बारे में सोचने लगा था। इससे पहले उसने आँख बंद कर के सोने की कोशिश की थी किन्तु उसकी आँखों से नींद कोशों दूर थी। ज़ाहिर है कि जब तक मन अशांत रहेगा तब तक किसी भी इंसान को चैन की नींद नहीं आ सकती। वागले ने बेचैनी से करवट बदली और अपना चेहरा अपनी बीवी सावित्री की तरफ कर लिया। उसकी बीवी सावित्री पहले से ही उसकी तरफ करवट लिए सो चुकी थी। सावित्री को चैन से सोते देख शिवकांत के ज़हन में कई तरह के ख़याल उभरने लगे।

सावित्री इस उम्र में भी बेहद सुन्दर थी और उसका बदन घर के सभी काम करने की वजह से सुगठित था। उसके बदन पर मोटापा जैसी कोई बात नहीं थी। शिवकांत ने देखा कि सावित्री की नाईटी का गला उसके करवट लेने की वजह से काफी खुला हुआ था जिससे उसकी बड़ी बड़ी छातियों की गोलाइयाँ साफ़ दिख रहीं थी। उसकी बाएं तरफ वाली छाती के हल्का नीचे की तरफ होने से उसकी दाएं तरफ वाली छाती बिल्कुल नीचे दब गई थी। ये मंज़र देख कर शिवकांत के जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी हुई और उसने एक गहरी सांस ली। उसे अचानक से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सावित्री के सुर्ख होंठ उसे चूम लेने का आमंत्रण दे रहे हों। शिवकांत अपने इस ख़याल से ये सोच कर थोड़ा हैरान हुआ कि ये कैसा एहसास है? आज से पहले तो किसी दिन उसे ऐसा प्रतीत नहीं होता था, जबकि वो अपनी पत्नी के साथ हर रोज़ ही बेड पर सोता है।

शिवकांत वागले ने एक बार फिर से अपने ज़हन में उभर आए इन बेकार के ख़यालों को झटका और एक गहरी सांस ले कर अपनी आँखें बंद कर ली। उसे महसूस हुआ कि इस वक़्त उसके दिल की धड़कनें सामान्य से थोड़ा बढ़ी हुई हैं और बंद पलकों में बार बार सावित्री की वो बड़ी बड़ी छातियां और उसके सुर्ख होंठ दिख रहे हैं। वागले एकदम से परेशान सा हो गया। उसने एक झटके से अपनी आँखें खोली और सावित्री की तरफ एक बार गौर से देखने के बाद बेड से नीचे उतरा। उसके बाद वो कमरे से बाहर निकल गया।

किचेन में जा कर वागले ने फ्रिज से पानी की एक बोतल निकाल कर पानी पिया और फिर बोतल का ढक्कन बंद कर के उसे फ्रिज में वापस रख दिया। सारा घर सन्नाटे में डूबा हुआ था। उसके दोनों बच्चे अपने अपने कमरे में सो रहे थे। वागले पानी पीने के बाद वापस अपने कमरे में आया और बेड पर सावित्री के बगल से लेट गया।

काफी देर चुपचाप लेटे रहने के बाद वागले के मन में जाने क्या आया कि उसने फिर से सावित्री की तरफ करवट ली और थोड़ा खिसक कर सावित्री के क़रीब पहुंच गया। उसने अपने बाएं हाथ की कुहनी को तकिए पर टिका कर अपनी कनपटी को बाएं हाथ की हथेली पर रखा जिससे उसका सिर तकिए से ऊपर उठ गया। इस पोजीशन में वो सावित्री को और भी बेहतर तरीके से देख सकता था। उसकी नज़र सावित्री के गोरे चेहरे पर पड़ी। सावित्री दुनियां जहान से बेख़बर सो रही थी। उसे ज़रा भी भान नहीं था कि उसका पति इस वक़्त किस तरह के ख़यालों का शिकार है जिसकी वजह से वो थोड़ा परेशान भी है और थोड़ा बेचैन भी।

सावित्री के चेहरे से नज़र हटा कर वागले ने फिर से सावित्री की बड़ी बड़ी चूचियों की तरफ देखा। इतने क़रीब से सावित्री की चूचियां देखने पर शिवकांत को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसकी बीवी की चूचियां आज से पहले इतनी खूबसूरत नहीं थी। वो बड़ी बड़ी और गोरी गोरी चूचियों को अपलक देखने लगा था जैसे सावित्री की चूचियों ने उसे सम्मोहन में डाल दिया हो। वागले अभी अपलक सावित्री की चूचियों को देख ही रहा था कि तभी सावित्री के जिस्म में हलचल हुई जिससे शिवकांत वागले सम्मोहन से निकल कर धरातल में आ गया। उधर सावित्री थोड़ा सा कुनमुनाई और फिर से वो शान्ति से सोने लगी।

शिवकांत के ज़हन में ख़याल उभरा कि क्यों न सावित्री के साथ थोड़ा छेड़ छाड़ की जाए। हालांकि वो जानता था कि उसके ऐसा करने पर सावित्री नाराज़ होगी और उसे चुपचाप सो जाने को कहेगी लेकिन वागले ने इसके बावजूद सावित्री को छेड़ने का सोचा। वागले की धड़कनें थोड़ा और तेज़ हो गईं थी। आज पहली बार उसे अपनी ही पत्नी को छेड़ने के ख़याल से घबराहट होने लगी थी, जबकि इसके पहले भी वो अपनी पत्नी को इस तरह छेड़ता था किन्तु तब उसके अंदर इस तरह की घबराहट नहीं होती थी।
 
शिवकांत वागले ने गहरी नींद में सोई पड़ी अपनी पत्नी के चेहरे को एक बार गौर से देखा और फिर अपने दाहिने हाथ को उसकी नाईटी से झाँक रही बड़ी बड़ी चूचियों की तरफ बढ़ाया। उसका हाथ कांप रहा था और उसकी साँसें भी थोड़ा भारी हो गईं थी। वागले ने कुछ ही पलों में अपने दाहिने हाथ को सावित्री की दाहिनी छाती पर हल्के से रख दिया। उसे अपनी हथेली पर हल्का गर्म और बेहद मुलायम सा एहसास हुआ जिसके साथ ही उसके जिस्म का रोयां रोयां एक सुखद रोमांच से भरता चला गया। वागले ने एक बार फिर से अपनी पत्नी के चेहरे पर नज़र डाली और फिर हल्के से सावित्री की उस छाती को पकड़ कर दबाया। वागले ने महसूस किया कि ऐसा करने पर उसे थोड़ा मज़ा आया था, ये सोच कर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। उधर सावित्री को आभास ही नहीं हुआ कि उसकी चूची के साथ इस वक़्त क्या हुआ था।

वागले ने सावित्री की उस छाती को हल्के हल्के दबाना शुरू कर दिया जिसकी वजह से अचानक ही सावित्री के जिस्म में हलचल हुई जिसे देख कर शिवकांत वागले ने झट से अपना हाथ सावित्री की छाती से हटा लिया। उसकी धड़कनें तेज़ी से दौड़ने लगीं थी। एकाएक ही उसके ज़हन में ख़याल उभरा कि वो इतना डर क्यों रहा है? सावित्री उसकी बीवी ही तो है और बीवी के साथ ये सब करना ग़लत तो नहीं है? इस ख़याल के तहत वागले ने पहले तो एक गहरी सांस ली और इस बार पूरे आत्मविश्वास के साथ अपना हाथ बढ़ा कर सावित्री की छाती को पकड़ लिया। पहले तो वागले ने हल्के हाथों से ही सावित्री की चूची को दबाना शुरू किया था किन्तु जब उसने मज़े की तरंग में आ कर सावित्री की छाती को थोड़ा ज़ोर से दबा दिया तो सावित्री के जिस्म को झटका सा लगा। ऐसा लगा जैसे सावित्री को दर्द हुआ था जिसकी वजह से वो ज़ोर से हिली थी। इधर सावित्री के हिलने पर वागले रुका नहीं बल्कि उसकी छाती को दबाता ही रहा। जिसका परिणाम ये निकला कि कुछ ही पलों में सावित्री की नींद टूट गई और उसने आँखें खोल कर देखा।

सावित्री ये देख कर बुरी तरह चौंकी कि उसका पति इस वक़्त उसकी चूची को दबाए जा रहा है। कमरे में लाइट जल रही थी क्योंकि सावित्री को अँधेरे में सोने की आदत नहीं थी। अपने चेहरे पर हैरानी के भाव लिए सावित्री ने वागले की तरफ देखा और फिर अपने एक हाथ से वागले के उस हाथ को पकड़ कर हटा दिया जो हाथ उसकी चूची को दबा रहा था।

"ये क्या कर रहे हैं आप?" फिर सावित्री ने थोड़ा नाराज़ लहजे में कहा____"रात के इस वक़्त सोने की बजाय आप ये सब कर रहे हैं?"

"अरे! तो क्या हुआ भाग्यवान?" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा_____"अपनी प्यारी सी बीवी को प्यार ही तो कर रहा हूं।"

"बातें मत बनाइए।" सावित्री ने उखड़े भाव से कहा_____"और चुपचाप सो जाइए। "

"अब भला ये क्या बात हुई मेरी जान?" वागले ने कहा____"अपनी प्यारी सी बीवी को प्यार करने का मन किया तो प्यार करने लगा। मैं तो कहता हूं कि तुम भी इस प्यार में मेरा साथ दो। हम जवानी के दिनों की तरह अंधाधुंध प्यार करेंगे, क्या कहती हो?"

"आपका दिमाग़ तो ठिकाने पर है ना?" सावित्री ने हैरानी भरे भाव से कहा____"घर में दो दो जवान बच्चे हैं और आपको जवानी के दिनों की तरह प्यार करने का भूत सवार हो गया है।"

"अरे! तो इसमें क्या समस्या है भाग्यवान?" वागले ने बेचैन भाव से कहा____"बच्चों के जवान हो जाने से क्या हम एक दूसरे से प्यार ही नहीं कर सकते? भला ये कहां का नियम है?"

"मैं कुछ नहीं सुनना चाहती।" सावित्री ने खीझते हुए कहा____"अब परेशान मत कीजिएगा मुझे। दिन भर घर के काम करते करते बुरी तरह थक जाती हूं मैं। कम से कम रात में तो चैन से सो लेने दीजिए।"

सावित्री ये कह कर दूसरी तरफ घूम गई, जबकि वागले मायूस और ठगा सा उसे देखता रह गया। सहसा उसके ज़हन में ख़याल उभरा कि सावित्री का ऐसा बर्ताव ये दर्शाता है कि उसके अंदर सेक्स के प्रति ऐसी कोई भी बात नहीं है जिसके लिए उसे अपने पति के अलावा किसी दूसरे मर्द के बारे में सोचना भी पड़े और वैसे भी कोई औरत दूसरे मर्द के बारे में तभी सोचती है जब वो अपने मर्द से खुश नहीं होती या फिर उसका पति उसकी सेक्स की भूख को शांत नहीं कर पाता। शिवकांत वागले ये सब सोच कर खुश हो गया और फिर उसने दूसरी तरफ करवट ले कर अपनी आँखें बंद कर ली।

दूसरे दिन शिवकांत वागले अपने निर्धारित समय पर जेल के अपने केबिन में पहुंचा। ज़रूरी कामों से फुर्सत होने के बाद उसने ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाली और एक सिगरेट सुलगा कर डायरी के पन्ने पलटने लगा। वागले डायरी के पन्ने पलटते हुए उस पेज पर रुका जिस पेज़ पर वो कल पढ़ रहा था। सिगरेट के दो चार लम्बे लम्बे कश लेने के बाद उसने सिगरेट को ऐशट्रे में बुझाया और डायरी पर विक्रम सिंह द्वारा लिखी गई इबारत को आगे पढ़ना शुरू किया।

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