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संक्रांति काल - पाषाण युगीन संघर्ष गाथा

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संक्रांति काल - पाषाण युगीन संघर्ष गाथा

लेखक

विशाल"वरुणपाश"

संक्रांति काल - पाषाण युग

परिचय

यह उस काल की कहानी है जब मनुष्य और पशु में

ज्ञान का अंतर नहीं था । अंतर सिर्फ ताकत पर आधारित होता था । कभी भक्षक, भक्ष्य बन जाता तो कभी भक्ष्य भक्षक । पुरुष अपनी शिकार की योग्यता के आधार पर मालिक बनकर रहता था और मादा उसकी भोग्य वस्तु जो उसके लिए माँस पकाती और उस के लिए संतान पैदा

करती थी ।

चूँकि शिकार करने की योग्यता पर पुरुषों का वर्चस्व माना जाता था साथ ही गुफा की सुरक्षा उसी की जिम्मेदारी थी ,इसीलिए एक से अधिक मादा संतानों का पालन पोषण करना व्यर्थ का व्यय माना जाता था। पहली मादा संतान के बाद में उत्पन्न मादा संतानों को देवता के सुपुर्द कर दिया

जाता था । सिर्फ पुरुष संतानों को ही पालन पोषण मिलता था ।

मादा से यही अपेक्षा की जाती थी की वह मजबूत पुरुष संतान उत्पन्न करे और गुफा के सामर्थ्य को बढाए। जिस गुफा में पुरुष कमजोर होते थे या मादाओं की संख्या ज्यादा होती थी ,उस गुफा पर दुसरी गुफा के मजबूत गुफा पुरुष अधिकार कर लेते थे और उसकी मादाओ के मालिक बन जाते थे।

स्त्री और पुरुष का संबंध मालिक और सेविका का ही माना जाता था ।पुरुष स्त्री की रक्षा और पोषण के बदले उसके देह का इस्तेमाल करता था ।

मालिक शिकार करता है मादा को प्रसन्न करने के लिए

वो मादा को अच्छे से अच्छा शिकार लाता है तो बदले में उम्मीद रखता है की वो रात को उसकी नींदों को हसीन

बनाए ,साथ ही उसके अहं को संतुष्टि दे ।

वो थक जाता है शिकार कर के और अगले दिन के शिकार के लिए उसे शक्ति की आवश्यकता होती थी अतः मादा शिकार को पका कर गुफा के सभी पुरुषों के लिए खाना तैयार करती है ।साथ ही पुरुष की कुंठाओं को भी अपने

प्रेम से शांत करती है।
 
अम्बी

वो पहली मादा थी जिसने मादा को नारी की पहचान

दिलाई जिसने विचार करना सीखा जिसने देवता की अनुभूति की और अपने अन्तर्मन में देवता के आदेशों

को समझा। वही पहली मादा थी, जिसने देवता का

विधान बताकर , मानव के जीवन में उन नियमों का प्रति

-पादन किया.. ..जो पुरुष की स्वच्छंदता को बाँधते थे

मर्यादा के घेरे में । पशु और मानव में बुद्धि का फर्क उसी

ने उजागर किया था ।

मादा को भी मानव श्रेणी में डालने का श्रेय उसे ही जाता है उसी ने तो सिद्ध किया की मादा भी स्वयं में क्षमता रखती है , खुद के लिए शिकार भी कर सकती है और अपनी इच्छा से अपना पुरुष चुन सकती है ।

पुरुष के शक्तिप्रदर्शन का इनाम नहीं है मादा वो जीवन रखती है वही जीवन देती है वही पालन भी करती है और वही गुरू बनकर पोषण भी कर सकती है ।

हाँ उसका नाम अम्बी था प्रथम क्रांति की प्रणेता

अम्बी ।

वो विचार करती थी यह उसकी विशेष योग्यता थी , जिसके आधार पर मादा के आत्मसम्मान के सिद्धान्त

को उसने प्रतिपादित किया था ।

उसने अन्तर्मन के इशारों को समझना सीख लिया था।

सभी पुरुष उसके मालिक नहीं बन सकते अम्बी का

अंतर्मन कह रहा था, वही एक उसका मालिक है जिसके

संग से उसने मजबूत पुरुष व सौम्य मादा संतान उत्पन्न

की हैं । जिसके साथ की वजह से गुफा की शक्तियाँ

बहुत उन्नत हो गयी हैं ,जिसके साथ मिलकर ,अम्बी ने

अपने से उत्पन्न संतानों को सम्मान करना सिखाया था

अपने उत्पत्तिकर्ता का और अपने पोषक का , साथ ही सम्मान करना अपनी जननी का ।

उसने अपनी संतानों को सिखा़या की वे सम्मान करें

अपने देवता का और देवता के बनाए नियमों का।

अम्बी के पुत्र और पुत्रियाँ जानते थे की-देवता खुद अम्बी

को नियमों का आदेश देते हैं । देवता सबसे शक्तिशाली

है और उसके नियम तोड़ने पर भारी दंड देता है ।

अम्बी और जादोंग अपने से पोषित उन नौजवानों पाँच नवयोवनाओं के परिवार को देख प्रफुल्लित हैं ।पास ही

सारकी व गौरांग भी बैठे मुस्कुरा रहे हैं । पालन पोषण

का अधिकार भले ही अम्बी ने अपने पास रखा ,परन्तु

उन युवाओं और युवतियों में , उनकी संतति भी तो

सम्मिलित हैं । परंतु उनका चुनाव अपने शारीरिक सुख

की पूर्ति करना था ,जबकि अम्बी ने एक परिवार और

एक समाज बनाने के लिए अपना चुनाव किया ।

निश्चित तौर पर वह पहली मादा थी ,जिसने मानवीय

रिश्तों की स्थापना की और संतानों की परवरिश के

तौर तरीके विकसित किए ,उन्हें श्रेष्ठ बनाने के लिए ।
 
आज ये गुफा मानव एक सामाजिक जीवन जीना

प्रारंभ कर चुके हैं, वह इनके बर्ताव में स्पष्ट नजर आ

रहा है । सम्मान ,मर्यादाएं ,आपसी व्यवहार में प्रेम

व सौहार्द ,ये सब तो कभी कल्पनाओं में भी ना सोचा

था हमारी विचारशील नायिका अम्बी ने । सबसे बड़ी

बात कि ये सम्मान स्त्रियों के प्रति भी स्पष्ट दृष्टिगत हो

रहा था ,जो पहले मात्र तब दिखाई देता था जब पुरुष

अपनी कामेच्छा की पूर्ति के लिए उसके समीप आता

था । वाकई यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन था , वाकई

यह संक्रांति काल था वैचारिक परिवर्तनों का।

उस काल में मादा संतानों का भी पोषण करके अम्बी

ने एक नई परंपरा की शुरुआत की। जिसने मादा को

नारीत्व का सम्मान दिलाया। अभी तक किसी और गुफा

ने इतनी वृद्धि नहीं की पर इस उन्नति की असली वजह

अम्बी की विचार शक्ति है ।
 
◆◆◆◆◆◆【2】◆◆◆◆◆◆

जननी की पीड़ा

अम्बी ने बचपन में ,अपनी जननी के दर्द को ,बहुत गहराई से महसूस किया था । उसे उसकी जननी का अनेक पुरुषों द्वारा शिकार के एवज में नोंचा जाना आज भी खयालों में डराता है !

उसने देखा था पहले सिर्फ राखा (उसका पिता ) उसकी माँ धारा के साथ संसर्ग करता था पर उसके जाने के बाद में उसने अपने भाईयों के अंदर का शिकारी देखा ,जो पहले बड़ा शिकार लाने की होड करते और फिर जो भी सबसे बड़ा शिकार लाता वही धारा को भोगता ।

उस दिन का मंजर याद आते ही अम्बी के रौंगटे खडे हो जाते हैं । सब से बडा कुआंग बड़ा शिकार नहीं ला पाया था ..और ओमांग जो उत्पत्ति के आधार पर चौथे स्थान पर था गर्व प्रदर्शन करता सबके सामने बड़ा शिकार कंधे पर डाले कैसा तनकर आ रहा था । उसके हाव भाव देखकर अम्बी और धारा दोनों ही हंस पड़ी थीं ।

कुआंग को ये अपमान महसूस हुआ , और उसने ओमांग

पर कुल्हाडे़ से वार किया ,एक ही वार में ओमांग ढेर हो गया था।

धारा अपने शरीर के अंश को तड़पता देख कुआंग पर बरस पडी़ और शायद इसे इशारा मान बाकि पाँचों कुआंग पर टूट पड़े थे ,पर एक एक कर कुआंग ने बाकि पाँचों को भी मार दिया ।

धारा को तो समझ ही नहीं आया की ये संसार जो इतने वर्ष लगे थे बसने में ,पुरुष के जरा से आवेश से कैसे ध्वस्त हो गया । टूटे कदमों से धारा और अम्बी ने मिलकर ओमांग समेत बाकि पाँचों को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर देवता

के सुपुर्द किया ।

कुआंग घंटों तक घुटनों में सर डाले बैठा रहा । अम्बी को समझ नहीं आ रहा था की कल तक ये सभी तो धारा को भोगते वक्त इतना दर्द देते थे कई दिनों तक निशान नहीं जाते थे और आज वो नहीं हैं , तो भी धारा उतनी ही पीड़ा में क्यों ?

और कुआंग जो कभी धारा को किसी के साथ सहन नहीं

कर पाता था वो क्यों दुखी है ..? जबकि सारे प्रतिद्वंदी उसने स्वयं अपने हाथों से समाप्त कर दिए थे अब तो

वो धारा पर पूर्ण अधिकार जता सकता था ।

शायद ,कुआंग ने आवेश में अपने भाईयों को मार तो डाला पर अब उनके बिना अकेलापन उसे निगल रहा था !

दो ही दिन में उसका बलिष्ठ शरीर पीला पड़ गया ,धारा ने उसे सम्हालने का यत्न किया पर वो इतनी तकलीफ में था कि धारा का आकर्षण भी उसमें उमंग नहीं भर सका।

अगली सुबह , अपने थके शरीर के साथ ,कुआंग शिकार पर गया फिर वापस नहीं आया !शायद,अपनी टूटी देह को देवता को समर्पित कर दिया था उसने !

अब गुफा में मात्र दो प्राणी रह गए थे धारा और अम्बी ।

धारा चिंता में थी सारा माँस खत्म हो गया था , गुफा

में कोई पुरुष भी नहीं था जो माँस ला सके । भूख का

डर तो था ही ,उससे बड़ा डर था सुरक्षा का , अनजाने

पुरुष चेहरों से सुरक्षा का , भयानक पशुओं से सुरक्षा का।

साथ ही डर था एकमात्र संतान अंबी के भावी जीवन का।

अम्बी जिसके जीवन में ..किसी पुरुष का आगमन

नहीं हुआ था ।
 
धारा बहुत गहरे सोच में थी अम्बी उसकी गोद में सर रखकर लेटी हुई उसके भावों को समझने का ,प्रयास कर

रही थी ।अचानक अम्बी उठकर बैठ गई शायद वो

धारा की निराशा को समझ गई थी,इसलिए बिना उसे

बताए वह कुआंग का अस्त्र लेकर पहाडी के पास के

वन की ओर निकल गई ।

धारा पूरा दिन उसे तलाशती रही ,वही एक तो रह गई थी जिसके साथ वो अपना अकेलापन बाँटती थी। काफी दूर तक भटकने पर भी जब अम्बी का कोई पता ना चला तो ,आखिरकार , थककर गुफा के बाहर आकर बेठ

गई !

गुफा में घुटनों पर अपना चेहरा टिकाए बेठी धारा ने जब

उसे बाहर से आते देख उसके टूटे शरीर में प्राण आ गए ,

और उसने लपककर बाँहो में जकड लिया अंबी को !

अम्बी को आज के उसके स्पर्श में अलग सी ही ,सुखद अनुभूति हो रही थी।शायद ,ममत्व के भावों से वो पहली

ही बार परिचय हुआ था अम्बी का । इससे पहले भी

धारा कभी कभी अपना प्रेम प्रदर्शित करने हेतु उसे सहलाती थी पर आज का स्पर्श परवाह की अति तक व्याख्या

कर रहा था।

उसने आँखों के इशारे से धारा को लाया हुआ शिकार

दिखाया जिसे उसने पका कर तैयार कर दिया था ,खाने

के लिए। धारा देवता को धन्यवाद दे रही थी की अम्बी

पुरुषों की तरह शिकार में माहिर भी है और एक मादा

की तरह माँस भी पकाना जानती है ।
 
◆◆◆◆◆【3】◆◆◆◆◆

सभी पुरुष आपसी अहं की लड़ाई में खत्म हो गए ,

परिणामस्वरूप गुफा में ,अम्बी और उसकी जननी

धारा ,दो ही प्राणी शेष रहे ।

धारा की भूख व सुरक्षा की चिंताओं का निवारण

आंशिक रूप से तब हुआ जब अम्बी ने शिकार

करके और माँस पकाकर उसे आश्वस्त किया कि

वह अपने जीवन का निर्वाह करने मेंं सक्षम है और

पुरुष की तरह अस्त्रों का इस्तेमाल करके शिकार

और अपनी रक्षा दोनों करने में सक्षम है ।

आगे की कहानी

योग्य नायक

अम्बी की योग्यता और सामर्थ्य को देखने के पश्चात अब धारा को उसके भविष्य के प्रति भय नहीं रहा था ।अब तो बस यही एक चिंता थी कि देवता उसके लायक कोई पुरुष और भेज दे जिससे धारा अपनी गुफा उन्हे समर्पित कर देवता के पास जा सके ।

अम्बी शिकार भी करती और उसने खाने योग्य कुछ जडों

को भी खोज निकाला था जो खाने में स्वादिष्ट तो थी हीं साथ ही शरीर का बल भी बढाती थी। अम्बी को शिकार करने से ज्यादा आनन्द वन के भीतरी हिस्सों को खोजने में आता था जहाँ अंधकार की अधिकता के कारण पुरुष जाने से डरते थे। कुछ ऐसे ही फल भी उसने वन के मध्य भाग में जाकर खोजे ,जिन के खाने के बाद शिकार के लिए अतिरिक्त बल का अहसास होता था।

शुरू में धारा को भय लगता था अम्बी के साहस से ,मगर

धीरे धीरे उसे गर्व होने लगा अपनी उत्पत्ति पर ।अब बस वो अम्बी के योग्य पुरुष की तलाश कर रही थी पर शायद अभी तक उनके वन पर दुसरे गुफापुरुषों की नजर नहीं पडी थी ।

अम्बी उस दिन बहुत गह्वर वन में पहुँच गयी थी ,और उसने एक सुअर को मार गिराया था । पर उसे लेकर जाना बहुत कठिन था अम्बी के लिए । भीमकाय सूअर को साबुत ले जाने के लिए चार मजबूत पुरुष भी कम पड़ते ,फिर वह

तो अकेली युवती थी ।

वह उसकी चमड़ी हटाकर काटने का प्रयास कर रही थी

की किसी गुर्राहट से चौंक गई ।वो एक सिंह था,जो अम्बी

को ही देख कर गुर्रा रहा था।शायद उसे अपने क्षेत्र में अम्बी का अनाधिकृत प्रवेश पसंद नहीं आया था ।

अम्बी थक तो गई थी ,पर जीवन की कीमत समझती थी उसने उस दानवाकार सिंह से नजर हटाए बिना ही ,अपने पास रखा शक्तिवर्धक फल खाया और बहुत तीव्रता से सिंह के ऊपर छलाँग मार दी , भारी भरकम सिंह उसके प्रहार को बचा नही पाया और अपनी एक आँख अम्बी के अस्त्र के हवाले कर दी।

दर्द से तिलमिलाता दानव प्रहार को तत्पर हुआ ही था,

कहीं से सनसनाता नोकीला अस्त्र उसके पृष्ठ को चीरता

हुआ सीने के पार निकल गया ! अम्बी को दानव से

भय नहीं लगा था ,पर उस अस्त्र के अचानक प्रहार ,

जिससे दानव एक ही क्षण में ढेर हो गया था ने उसके

पैरों में कंपन ला दिया। उसे किसी अन्य गुफा के शिकारी

का समीप होना बहुत भयदायक लग रहा था ।

अट्टाहास करता ,शिकार का नृत्य करता जादोंग घने वृक्षों के पीछे से प्रकट हुआ । अम्बी ने ऐसा बलिष्ठ और आकर्षक शिकारी इससे पूर्व नहीं देखा था हल्की गुदगुदी का अहसास हुआ अम्बी को जब जादोंग ने चमकती आँखों से उसके चेहरे पर निगाह डाली , और अम्बी को जो भय महसूस हो रहा था पूर्व में वो भी ,पूरी तरह जाता रहा।
 
अम्बी जादोंग की चाहत उसकी आँखों से जान चुकी थी ,

वैसे ही चाहत के भाव अम्बी के अंतर्मन मेें भी उछाल मार

रहे थे ,पर पुरुष को मालिक स्वीकारना उसके स्वभाव में

नहीं था । इसीलिए वो जादोंग से अपनी निगाहें नहीं

मिलाना चाह रही थी। जादोंग अम्बी पर अपनी निगाहें टिकाए मृत सिंह की खाल उतार रहा था ,और अम्बी पुनः अपने शिकार की चमड़ी उधेड़ने में व्यस्त हो गई ..।.

कुछ ही समय में जादोंग अपने शिकार को छील काट

चुका था पर अम्बी अभी तक सूअर की खाल से ही

जूझ रही थी । जादोंग के मन में अम्बी के प्रति करुणा

और स्नेह का भाव उत्पन्न हुआ उत्साहित जादोंग

अपने शिकार को सुखे वृक्ष के खोखले तने में डाल तने

को आंतों से बाँध कर खींच के अम्बी के पास लाया और

अम्बी को उसने कंधे पर हाथ रख पीछे किया।

अम्बी को भी उसके स्पर्श में अपनत्व का अहसास हुआ,

और वो मानों आदेश की पालना करती हुई पीछे हट गई । जादोंग ने अपने पास से खाल उतारने का विशेष औजार निकाला, कुछ ही क्षणों में अम्बी के शिकार को भी उसने तैयार कर दिया पकाए जाने के लिए।

अम्बी उस भारी शिकार को ले जाने में समर्थ नहीं थी ,

शायद जादोंग ने उसकी परेशानी भाँप ली थी ,उसने

अम्बी के शिकार को भी सूखे तने पर डाला आंतों की

रस्सी का एक सिरा स्वयं पकड़ कर दूसरा अम्बी की और बढा दिया ।

अम्बी ने उसके सामर्थ्य को तो देख ही लिया था पर उसकी बुद्धिमत्ता से वो ज्यादा प्रभावित हुई । दोनों आसानी से शिकार को खींचकर ,अम्बी की गुफा तक पहुँच गए ।
 
धारा ने अम्बी को एक पुरुष के साथ आते देखा तो पहले

तो वो आशंकित हुई ! पर शीघ्र ही जादोंग का स्वभाव उसे भी प्रभावित कर चुका था । जादौंग ने दोनों शिकार अम्बी

की गुफा के द्वार पर डाले और उस के गुफाचित्रों को देखने

लगा ।

उन चित्रों में अम्बी के पूर्व की तीन पीढियों का चित्रण

देख कर जादौन जिज्ञासु भाव लिए अम्बी को निहारने

लगा ,अम्बी को जादौन का संग सुखद अहसास दे रहा

था। वह जादौन को भावों द्वारा गुफाचित्रों की कथाएँ

बताने लगी ।

धारा अब प्रसन्न भाव से शिकार को पका रही थी गुफाचित्रों को समझाते हुए अम्बी धारा और राखा के

संसर्ग के चित्र को जब स्पष्ट करने लगी तो जादोंग के

चेहरे पर मुस्कुराहट उसने देख ली, दोनों ने मीठी गुदगुदी

का अहसास किया ।

जादोंग ने अम्बी को स्पर्श करके अपनी चाहत को अभिव्यक्त किया ।अम्बी ने मुस्कुरा कर उसके प्रेमनिमंत्रण को स्वीकार कर लिया ।

अंदर प्रवेश करती हुई धारा की अनुभवी निगाहें उनकी चाहतों को ताड़ चुकी थी , वो खुश थी क्योंकि जादोंग

अम्बी के लिए उपयुक्त पुरुष था।

दोनों के निकट आकर धारा ने उनके कन्धों को स्पर्श किया ,फिर जादोंग की बलिष्ठ देह के विभिन्न अंगों को

स्पर्श कर के फिर यही प्रक्रिया अम्बी की देह पर की ।

इसका कारण यह जाँचना था की दोनों मादा और पुरुष

एक दूसरे के संग के लिए परिपक्व हैं या नहीं।

अम्बी का चेहरा धारा के स्पर्श के साथ लाल हो रहा था ,जिसने उसके यौवन को और आकर्षक कर दिया

था ।

तीनों ने एक साथ भोजन किया और उसके पश्चात पहाडी

पर जाकर अम्बी और जादोंग ने देवता की.अनुमति हेतु

माँस का कच्चा हिस्सा उसे समर्पित किया ।

आसमान से रिमझिम बौछारें पड़ने लगी जो ये संदेश दे

रही थी की देवता प्रसन्न हैं । उल्लसित जोड़ा गुफा की

और एकांतवास को जा रहा था जिन्हे दो निगाहें बडे चाव

से निहार रही थीं।

जोडे की उन्नति की प्रार्थना करने धारा देवता की पहाड़ी

पर चढ रही थी ,स्वयं को अंबी के जीवन की प्रसन्नताओं

के बदले देवता को समर्पित करने के लिए !

अम्बी मे जादौंग को अपना पुरुष चुन लिया था,प्रथम स्वयंवर जिसमें नारी अपने पुरुष का चुनाव अपनी इच्छानुसार करती है । पर अम्बी के जीवन संघर्षों की ये एक शुरुआत मात्र थी !
 
◆◆◆◆◆【4】◆◆◆◆◆

नए मानवीय संवेगों से परिचय

जादौंग और अम्बी दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण अन्य नर व मादा की तरह मात्र देहिक सुख तक सीमित

नहीं था ।देह का मिलन तो इस प्रेम का प्रारम्भ ही था।

दोनों युगल एक साथ ही शिकार पर जाने लगे थे । अम्बी

को जादौंग देव पुरुष लगने लगा था ,उसने कभी अपने भाईयों में और अपने पिता के स्वभाव में इस तरह के

कोमल भावों का दर्शन नहीं किया था ।

उसने तो अपनी जननी धारा को हमेशा पुरुषों द्वारा नोंचे

जाते ही देखा था वो तो यही जानती थी की पुरुष एक ऐसा पशु है ,जो अपनी प्रसन्नता और अपने स्वार्थ के लिए

ही सबकुछ करता है । पुरुष एक स्वकेन्द्रित प्राणी है जिसका हर कार्य व्यवहार स्वयं के भोग मात्र निमित्त है ।

कई बार अम्बी अपने अन्तर्मन के साथ संवाद करती - "जादौंग नहीं वो बिलकुल भी ऐसा नहीं है , वो तो

हर काम में हाथ बँटाता है ।"

जादौंग का आगमन उसके जीवन में कितने सुखद परिवर्तन

लाया है । वो मात्र दो प्राणी हैं गुफा में ,फिर भी,लगता है मानो सारा संसार बसा लिया हो । क्या कभी कोई पुरुष

बडा शिकार लाने के बावजूद अपनी मादा की इच्छा का सम्मान कर सकता है ?कितनी ही बार ऐसा हुआ है की

वो खुद थकी होने के कारण जादौंग को संसर्ग सुख ना दे

पाई पर वो देव पुरुष उग्र नहीं हुआ और मुस्कुरा कर माँस पकाने और गुफा के सार संभाल में मदद कराने लग गया ।"

कभी कभी तो अम्बी को जादौंग में अपनी जननी धारा की छवि भी दिखाई देती थी जब वो अम्बी के सर को अपनी गोदी में रख सहलाया करता था ।

कई बार जादौंग में अम्बी एक शिशु की छवि भी देखती

जब वो जिज्ञासु भाव से अम्बी की देह पर अपनी उंगली

को फिराता मानो उसे पूरी तरह पढ़ लेना चाहता हो ।

एक मीठी गुदगुदी का अहसास करके अम्बी खिलखिला

कर हँस पड़ती , और जादौंग एक बच्चे की तरह झेंपकर

रूठ जाता कितना निश्छल ,कितना मासूम ,अम्बी चाहती

की ऐसे ही उसे देखती रहे ।

जादौंग और अम्बी के रिश्ते की प्रगाढता का कारण शायद यह भी था की वो दोनों ही विचारशील थे । प्रकृति को निहारना और उसके रहस्यों पर देर तक विचारना दोनों को अत्यंत प्रिय था ।
 
परिवार में एक नया सदस्य

आज भी दोनों रात्रि में संसर्ग के पश्चात संतुष्ट भाव से आसमान में चमकते तारों को आपस में बाँट रहे थे तभी

कोई तारा टूटता हुआ दिखता है,अम्बी डर से जादौंग के विशाल वक्ष में अपना मुँह छिपा लेती ।

इस क्रीड़ा में जादौंग को बहुत आनन्द की अनुभूति होती ,

वो अपना हाथ बढ़ाकर मुट्ठी में ,उस तारे को पकड़ने का उपक्रम करता और बंद मुट्ठी को अम्बी के चेहरे के पास ले आता था। अम्बी को सच में लगता की उस टूटते तारे

को जादौंग ने मुट्ठी में बंद कर लिया है वो चकित भाव

से जादौंग की मुट्ठी को छूती और इस जीत पर बहुत खुश होकर खिल खिलाकर ताली बजाती । जादौंग मन्त्र मुग्ध

हो उसे निहारता रहता । पूर्ण चंद्र की चांदनी ने स्वर्गिक

बना दिया था ,अम्बी की गुफा के वातावरण को ।

अचानक एक दर्द भरी गुर्राहट ने उन दोनों के ध्यान को

भंग कर दिया । जादौंग ने लपककर अपना अस्त्र हाथ में उठा लिया और आवाज की दिशा में कदम बढ़ा दिए।

अम्बी भी उसके पीछे ही चल रही थी 9 Full stop!

झाडियों में हलचल का आभास हुआतो दोनों ही सधे कदमों से झाड़ियों तक पहुँचे वो एक भारी शरीर वाला कुत्ता था ,जिसका एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था और जख्म से खून रिस रहा था ।

अम्बी और जादौंग ने कुत्ते को उठाया और उसे गुफा के

द्वार पर ले आये । कुत्ते ने कोई प्रतिरोध नहीं किया बस

दर्द से कराहता हुआ कूँ कूँ करता रहा ।

जादौंग जिस गुफा बस्ती से आया था वहाँ कुत्तों का प्रयोग शिकार व गुफा की रखवाली के लिए करना आम बात थी

पर अम्बी ने अपने जीवन में इस जीव को पहली ही बार

देखा था ।क्योंकि उसकी गुफा के आसपास तो क्या दूर

तक भी कोई दूसरी गुफा बस्ती नहीं थी ।

आमतौर पर जो गुफामानव अधिक संख्या में बस्ती बसा

कर रहते थे वही कुत्तों का उपयोग उसे पालतु बनाकर

अपने कार्यों ,जैसे शिकारादि में करने लग गए थे । जिससे उनकी जीवनचर्या में काफी सुगमता आ गई थी । पशुपालन की प्रारंभिक अवस्था थी अतः सभी कबीलों में यह ज्ञान अभी नहीं पहुंचा था ।

बस कुछ ही समूह कुत्तों का प्रयोग करना जानते थे। प्रभुत्व के संघर्ष में भी कुत्तों का विशेष महत्व रहता था । जिस गुफामानव के पास पालतू कुत्तों का बेड़ा ज्यादा ताकतवर होता अकसर वही विजित रहता ।

जादौंग का अंतर्मन सशंकित हो रहा था ,क्योंकि वह जानता था की कुत्ते की उपस्थिति का अर्थ है की यातो नजदीक ही कोई गुफा बस्ती है जिसका यह कुत्ता है घायल होने पर इसे भी निष्कासित कर दिया है स्वार्थी गुफामानवों ने या फिर कुछ गुफामानवों का दल नए वन व आवास की तलाश में निकला है ।

"वह सोच रहा था की यदि किसी गुफामानवों के समूह ने कुत्तों की टुकड़ी के साथ आकर उसकी गुफा पर अधिकार जताया तो क्या वह दोनों मुकाबला कर सकेंगे ! कहीं वह गुफा के साथ साथ अम्बी को भी "इस खयाल से जादौंग

के शरीर का बाल बाल खड़ा हो गया था, अम्बी ने उसके चेहरे के डर को तो पढ़ लिया पर उसका कारण नहीं समझ पाई थी।

अम्बी ,जादौंग के चेहरे के बदलते भावों को गौर से देख

कर अनुमान लगाने का प्रयास कर रही थी ,कि कुत्ता

फिर से दर्द की अधिकता से गुर्राने लगा । दोनों का ध्यान

एक साथ ही उसके जख्म पर गया चूँकि पूरे चाँद की

रात थी वे स्पष्ट देख पा रहे थे ,पीछे वाले पैर पर काफी

बड़ा घाव था ।

जादौंग किंकर्तव्यविमूढ़ अपने स्थान पर खड़ा बस उसे

देखने के अलावा कुछ और उपाय नहीं सोच पा रहा था ।

पर अम्बी गुफा के भीतर से कुछ पत्तियाँ लेकर आई और उन्हें चबा चबा कर बारीक करके जख्म पर लगा दिया ।

कुत्ते ने धीमी गुर्राहट निकाली पर शांत पड़ा रहा। जादौंग मन्त्र मुग्ध सा अम्बी को देख रहा था और अम्बी बडे ही

ध्यान से जख्म का उपचार करने में मग्न थी ।

जख्मी पैर जो की टूट भी चुका था को अम्बी ने खींच

कर सीधा किया ,कुत्ते का रोना महसूस हुआ जादौंग

को । शिकारी जादौंग उसके रुदन से भावुक हो उठा

और धीरे से कुत्ते के सर पर हाथ फेरने लगा ।

जादौंग ने अपने विकसित कबीले में भी उपचार की यह पद्धति नहीं देखी थी,वहाँ तो जख्म को देवता के सुपुर्द

कर दिया जाता था और यह मान लिया जाता था की

अगर जख्म सही नहीं हो पाया तो वह देवता की इच्छा

है । देवता की इच्छा का सम्मान सभी को करना पड़ता

था ,इसीलिए जख्मी को घाटी के देवता को समर्पित कर

देते थे ।

पर अम्बी ने तो चमत्कार ही कर दिया , कुछ ही समय

में कुत्ता चलने लायक हो गया अब जब अम्बी फलों और जडों को इकट्ठा करने और जादौंग शिकार पर जाते तो

वह गुफा द्वार पर अनधिकृत प्रवेश को रोकने के लिए रखवाली किया करता था ।

कुत्ता अब जादौंग परिवार का ही हिस्सा था ,अम्बी और जादौंग उसे बहुत स्नेह करते थे । दोनों उसे भाँऊ बोलकर बुलाने लगे ,और भाँऊ भी एक ही आवाज पर दौड़कर

आता और अपना स्नेह पैरो पर जीभ फिराकर व्यक्त

करता था ।
 
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