• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

रसिक के जाते ही मौसी ने दरवाजा बंद किया और बिस्तर को ठीक करने लगी.. मौसी का हाथ अनायास ही उनकी गांड पर चला गया.. अभी भी दर्द हो रहा था.. मौसी बिस्तर पर लेट गई.. सुबह के छह बजे थे.. रोज जल्दी जागकर घर के काम निपटाने वाली मौसी का जिस्म आज सुस्त था.. थोड़ी देर तक सो कर अपनी थकान उतारी और फिर वो घर चली गई..

घर के अंदर प्रवेश करते हुए.. सामने बैठे चिमनलाल से नजरें नहीं मिला पा रही थी मौसी.. उनके लिए चाय बनाकर वो वापिस घर के कामों में व्यस्त हो गई.. चाय नाश्ता करके चिमनलाल बाहर चले गए.. फिर पीयूष भी ऑफिस चला गया.. अब कविता और मौसी दोनों घर पर अकेले थे

कविता आज बहोत खुश दिख रही थी.. ये देखकर मौसी के दिल को चैन मिला.. चलो अच्छा हुआ जो पति-पत्नी में सुलह हो गई.. अनुमौसी भी आज रोज के मुकाबले काफी फ्रेश लग रही थी.. रसिक से चुदवाकर उनके जिस्म की आग ठंडी जो हो गई थी.. वो नहाने के लिए बाथरूम मे गई तब अपने भोसड़े को सहलाते हुए उन्हें रसिक का मूसल याद आ गया.. फिर उनकी चूत ने संतुष्टि का डकार लिया.. उसे सहलाकर मौसी ने शांत किया और तैयार होकर बाहर निकली

शाम को जब पीयूष आया तब कविता ने उसे कहा की उसके पापा का फोन आया था.. पंद्रह दिनों में ही मौसम की शादी होनी थी.. तरुण को बेंगलोर की एक बड़ी कंपनी में जॉब मिल गई थी.. बहोत अच्छी तनख्वाह मिलने वाली थी.. इसलिए उनकी इच्छा थी की तरुण के बेंगलोर जाने से पहले ही शादी निपटा ली जाए..

सुनकर पीयूष बेहद निराश हो गया.. सिर्फ पंद्रह दिन??

"अरे.. इतने दिनों में कैसे सारी तैयारियां होंगी? कपड़े, साड़ियाँ, जेवर और बहोत सारी चीजें लेनी होगी.. हॉल बुक करना पड़ेगा.. और भी ढेर सारी तैयारियां करनी होगी.. कैसे होगा सब??"

कविता: "पापा कह रहे थे की शॉपिंग में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.. जेवर खरीदना भी सिर्फ एक दिन का काम है.. पर सब से जरूरी है मौसम को इस के लिए मनाना.. मम्मी पापा तो तैयार है.. वो कह रहे थे की सब को थोड़ी सी दौड़-भाग होगी पर इतना अच्छा लड़का हाथ से चला जाएँ उससे तो अच्छा है की हम सब इस बात के लिए राजी हो जाए.. "

पीयूष: "मैं समझ गया कविता, लेकिन.... !!!"

कविता: "लेकिन-वेकीन कुछ नहीं.. हम सब है ना पापा मम्मी की मदद के लिए.. सब साथ मिलकर जुट जाएंगे तो हो जाएगा.. कोई बड़ी बात नहीं है"

पीयूष उदास हो गया.. इतने काम वक्त में तैयारियां तो हो जाएगी.. पर उसका और मौसम को मिलने का वक्त मिलना अब असंभव था

रात के खाने के बाद, कविता और पीयूष छत पर अंधेरे में बैठे हुए थे.. कविता ने पीयूष की शॉर्ट्स में हाथ डालकर उसके लंड को मसाज देते हुए ये चर्चा छेड़ी थी.. कविता के हाथों का स्पर्श और उसके सुंदर स्तनों का शरीर पर दबाव महसूस करते ही पीयूष का जवान लंड सरसराने लगा.. रोज तो कविता के छूते ही खड़ा हो जाने वाला लंड अभी भी अर्ध-जागृत अवस्था में था.. कविता का हाथ पीयूष के लंड को नरम नहीं होने दे रहा था और मौसम की याद उसे ठीक से सख्त नहीं होने दे रही थी..


shaking-dick2

मौसम के प्रति पीयूष के आकर्षण से बेखबर कविता बेचारी अपने पापा के दृष्टिकोण से सोचकर बातें कीये जा रही थी.. और पीयूष का दिमाग बातों में कम और मौसम के विचारों में ज्यादा उलझा हुआ था.. मौसम की जल्द शादी होने की बात से उसे गहरा सदमा पहुंचा था.. अगर इस बारे में पहले पता चला होता तो वो मौसम से फोन पर बात करता.. उस बेचारी ने तो आज तीन बार फोन कीये थे.. पर काम में व्यस्त होने के कारण वो बात नहीं कर पाया था.. और जब फ्री होकर पीयूष ने फोन किया तब मौसम ने कट कर दिया था.. शायद उसने इसी बात के लिए फोन किया होगा.. वरना मौसम उसे ऑफिस के टाइम पर कॉल नहीं करती थी

ये सब क्या हो गया अचानक?? पीयूष को अपनी किस्मत पर गुस्सा आ रहा था.. पीयूष के लंड को सहलाते हुए कविता मौसम को मनाने के तरीके सोच रही थी.. पर न कोई उपाय मिला और ना ही पीयूष का लंड सख्त हुआ.. आखिर थककर दोनों बेडरूम में आकर सो गए.. कविता बार बार पीयूष के शरीर को छेड़ती रही.. पर पीयूष के दिल के शेयर की किंमतें इतनी गिर चुकी थी की कितनी कोशिशों के बावजूद उसके लंड का सेंसेक्स ऊपर नहीं आया..


flac

आखिर कविता भी थककर दुसरें विचारों में खो गई.. और इसी विचारों में ही तो कविता की सब से बड़ी दौलत छुपी हुई थी.. पिंटू को मिलने का बड़ा मन कर रहा था कविता को.. माउंट आबू से लौटने के बाद एक बार भी बात नहीं हुई थी पिंटू से.. पहले तो जब कविता का मन करता वो पिंटू से बात कर लेती..पर अब पिंटू को काम की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गई थी.. और जब वो फ्री होता तब पीयूष उसके साथ होता.. इसलिए बात करना मुश्किल हो जाता.. पिंटू जब ऑफिस से निकलता तब कविता घर के काम में बिजी हो जाती और फिर पीयूष के घर आ जाने के बाद सब कुछ ब्लॉक.. !!

कविता सोच रही थी की मौसम की शादी के बहाने जब वो मायके जाएगी तब पिंटू से मिलने का मौका जरूर मिल जाएगा.. इस विचार मात्र से उसकी जांघें भीड़ गई.. उसकी बगल में पीयूष ऐसे निश्चेतन होकर पड़ा था जैसे उसकी सारी दुनिया लूट चुकी हो.. पर कविता का जिस्म हवस की आग में तपने लगा था.. ये ऐसी हवस थी जिसमे केवल जिस्म की भूख ही नहीं पर अपने प्रेमी से मिलने की तड़प भी शामिल थी..

कविता का हाथ उसकी चूत पर पहुँच गया.. एक हाथ से नाइटड्रेस से उसने अपना स्तन बाहर निकाला.. और पिंटू को याद करते हुए दबाने लगी..


mas2mas1

मज़ा तो आया पर जितना आना चाहिए था उतना नहीं आया.. प्रेमी के हाथ से स्तन दबने पर जो मज़ा आता है वो तो अभी आना मुमकिन नहीं था.. और वो ये नहीं चाहती थी की इस वक्त पीयूष का हाथ उसके जिस्म को छूए.. फिलहाल वो अपने सपनों की दुनिया में.. अपने प्रेमी के संग मस्त थी.. ऐसी दुनिया जहां समाज का डर नहीं था.. ज़िम्मेदारियाँ नहीं थी.. कोई रोक-टॉक नहीं थी.. सिर्फ वो और पिंटू दोनों थे.. जैसे कविता की अपनी सपनों की अनोखी दुनिया थी.. वैसी ही अपनी दुनिया पीयूष की भी थी ही.. !! ये बात ओर थी की फिलहाल वो मौसम के बारे में रोमेन्टीक विचार करने की स्थिति में नहीं था.. अभी कुछ दिनों पहले ही वो मौसम के प्यार में सराबोर था और कविता पिंटू के नजदीक होते हुए भी दूर थी.. और दुखी भी.. कविता के लिए माउंट आबू की यात्रा एक दुःखद याद बनकर रह गई थी.. लेकिन पीयूष के लिए माउंट आबू की यादें अनमोल थी.. ऐसी याद जो भुलाएं नहीं भूलती थी.. आबू में ही तो उसे मौसम के जबरदस्त आकर्षक कच्चे कुँवारे उरोजों को दबाने का मौका मिला था.. उसके गुलाबी अधरों को चूमने का अहोभाग्य भी प्राप्त हुआ था.. पर अभी वो यादें उसके किसी काम की नहीं थी..

पर कविता आज फूल-फॉर्म में थी.. अपने स्तनों को दबाते हुए वो पिंटू को याद करने लगी.. उसका मन अब लंड चूसने का कर रहा था.. कविता की इच्छा इतनी तीव्र थी की अगर उसे पंख होते तो अभी उड़कर पिंटू के पास चली जाती.. कुछ भी हो जाए.. बस एक बार.. पिंटू के साथ मन भरकर ज़िंदगी जी लेनी है.. मौसम की शादी के बहाने कम से कम एक हफ्ते के लिए मायके जाना होगा.. उस समय का भरपूर लाभ उठाने का मन बना लिया कविता ने.. मिलना तो हो जाएगा.. पर पिंटू के साथ वक्त बिताऊँ कहाँ? कोई घर तो होना चाहिए अकेले मिलने के लिए.. !! पर किसी के घर पिंटू से मिलना खतरे से खाली नहीं था.. कुछ तो सेटिंग करना पड़ेगा

कविता के हाथ लगातार उसके शरीर पर चल रहे थे.. वो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे पिंटू उसके जिस्म को मसल रहा हो.. एक साथ दो उँगलियाँ उसने अंदर डाल दी थी.. आगे पीछे करते हुए वो झड़कर ठंडी हो गई.. और दो मिनट में गहरी नींद सो गई


mas3

अनुमौसी की किस्मत चमक गई थी.. चिमनलाल अपने दोस्त की बेटी की शादी में शहर से बाहर गए थे.. कविता और पीयूष को बताकर मौसी शीला के घर सोने चली गई.. जैसे ही शीला के घर का दरवाजा बंद किया.. उन्हें रसिक के लंड की याद सताने लगी.. एकांत कितना भयानक होता है.. !! सज्जन से सज्जन आदमी अकेला होते ही विचारों में बह जाता है.. हकीकत में चारित्रवान उसे ही कहा जा सकता है जो अकेले में मौका होने के बावजूद भी ईमानदार रह सके.. बाकी ५० की उम्र में ड़ायाबिटिस के कारण लंड खड़ा ही न होता हो.. वैसे लोग अगर चारित्रवान होने का दावा करें तो उसका कोई अर्थ नहीं होता.. वो तो मजबूरी के मारे धारण की हुई सज्जनता कहलाएगी.. जिसका लंड दिन में दस बार टाइट होता हो.. वो इंसान अकेले में किसी सुंदर स्त्री को भोगने के बजाए उसे अपनी बहन मान सके.. वही सच्चा सज्जन.. !!

मौसी ने टीवी चालू किया.. खाना तो वो घर से खाकर आई थी.. बैठे बैठे वो "अनुपमा" के जीवन की समस्याओं को देख रही थी.. तभी लेंडलाइन की घंटी बजी.. मौसी ने फोन उठाया.. शीला का कॉल था

"कैसी हो मौसी? सब ठीक ठाक??"

मौसी: "हाँ शीला.. सब ठीक है.. तू कैसी है? वहाँ सब ठीक है? तुम्हारे समधी की अंतिम विधि हो गई? "

शीला: "हाँ मौसी.. अंतिम विधि तो हो गई.. अब बाकी सारी विधियाँ चल रही है.. वैशाली का प्रश्न बार बार परेशान कर रहा है.. समझ में नहीं आता की क्या करें.. कोई हाल सूझ नहीं रहा था तो सोचा आपसे बात करूँ और आपकी राय ले लूँ.. !!"

"क्यों? अब क्या हुआ वैशाली को?"

शीला: "होना क्या था मौसी.. मेरी वैशाली को वो नालायक बहोत परेशान कर रहा है.. उसके बाप की मौत हुई है.. ऐसे गंभीर वातावरण में भी घर में झगड़े कर रहा है.. "

अनुमौसी: "क्या बात कर रही है.. !! ये तो एक नंबर का कमीना निकला.. !!"

शीला: "हम यहाँ पहुंचे तब वैशाली उसके पापा के गले लगकर इतना रोई की क्या बताऊँ.. मेरा तो दिल ही बैठ गया.. मैंने बेटी को ससुराल भेजा है या कसाई के पास.. यही पता नहीं चल रहा.. !!"

अनुमौसी: "देख शीला.. अगर वैशाली को वहाँ नहीं रहना हो तो सारी विधि खतम होने के बाद उसे यहाँ वापिस ले आओ.. जो होगा देखा जाएगा..बेटी को ऐसी हालत में उस दरिंदे के पास छोड़ना ठीक नहीं.. "

शीला: "पर उनकी तेरहवीं को तो अभी बहोत दिन बाकी है.. तब तक हम यहाँ क्या करें?? यहाँ तो एक दिन रहना भी मुश्किल है.. मदन तो कब से वापिस जाने के लिए उतावला हो रहा है.. यहाँ संजय तो अपने बाप को जलाकर कहाँ गायब हो गया पता नहीं.. कौन जाने कहाँ भटक रहा होगा साला!!"

अनुमौसी: "गया होगा अपने लफंगे दोस्तों के साथ या फिर कहीं रंगरेलियाँ मनाने.. कुछ भी हो जाए तुम लोग वैशाली को वहाँ उस हेवान के साथ अकेला मत छोड़ना.. तुम एक काम करो.. मदन चाहे वापिस लौट जाएँ.. तुम वैशाली के साथ ही रहो.. तेरहवीं खतम होने के बाद मदन वहाँ आएगा और तुम दोनों को साथ लेकर वापिस.. "

मौसी का ये सुझाव शीला के गले उतर गया.. वो इस बारे में सोचेगी.. ऐसा कहकर फोन काट दिया.. फोन रखकर मौसी भी वैशाली के बारे में सोच में पड़ गई थी.. चेनल बदलते बदलते एक अंग्रेजी सेक्सी सीन पर आकर वो रुक गई.. वैशाली के सारे विचार दिमाग से निकल गए.. आधे नंगे कपड़ों में एक अंग्रेज लड़की उसके बॉयफ्रेंड के होंठों पर किस कर रही थी.. उसके मस्त स्तनों को देखकर मौसी को ईर्ष्या होने लगी.. अपने ब्लाउस के बटन खोलकर.. लटके हुए स्तनों को दोनों हाथों से जोड़कर अपने जवानी के दिनों को याद करने लगी मौसी..


bl

यही स्तन.. जवानी में कितने सख्त और मस्त थे!! ब्याह कर ससुराल आई तब वो कुंवारी थी.. उसके अक्षत कौमार्य को चिमनलाल ने भंग किया था और फिर बड़े मजे से उसके जिस्म का आनंद लिया था.. पर चिमनलाल सेक्स के मामले में काफी ठंडे थे.. जिस आक्रामकता की उम्मीद मौसी को थी वो कभी दिखा नहीं पाए.. जो आखिरकार मौसी को रसिक से मिली.. शादी के शुरुआती सालों में चिमनलाल ने मौसी की भरपूर चुदाई की थी.. और तब वह संतुष्ट भी थी.. पर आज जो ताकत रसिक ने दिखाई थी वो तो चिमनलाल में कभी नहीं थी.. जब चिमनलल से बेहतर कुछ मिला तब उसे ज्ञात हुआ की अब तक जिस तरह का सेक्स उन्होंने किया वो तो कुछ भी नहीं था.. आज जाकर उन्हें पता चला की जिस अभाव से अबतक वो झुझ रही थी.. वो कमी थी आक्रामक सेक्स की.. कभी कभी औरतों की ऐसी इच्छा होती है की मर्द उन्हें बेरहमी से भोगें.. गालियां बकते हुए.. उनके जिस्म को रौंदते हुए.. उसके जिस्म के साथ ऐसे ऐसे खिलवाड़ हो जो उसकी कल्पना के परे हो.. एक कुंवारी लड़की का.. और एक परिपक्व अनुभवी ढलती उम्र वाली स्त्री का.. रोमांस का खयाल अलग अलग होता है.. उम्र के साथ साथ अपेक्षा और व्याख्या बदलती रहती है..

नई नवेली दुल्हन की रोमांस की व्याख्या कुछ ऐसी होती है.. की उसका पति ऑफिस के टाइम पर उसे फोन करे.. घर पर मेहमान आए हो तब कैसे भी साथ सोने का सेटिंग करे.. सब की मौजूदगी में उसे छेड़े.. एक कोल्डड्रिंक में दो स्ट्रॉ डालकर साथ पियें.. आस पास कोई न हो तब चुपके से उसके स्तन दबा दे.. बस यही अपेक्षा और उम्मीद रहती है.. पर उम्र के अनुभवी मकाम पर पहुंची हुई औरतों के लिए रोमांस का मतलब होता है.. साहचर्य, विचारों का तालमेल और आक्रामक सेक्स.. ऐसा सेक्स जो उनके हड्डियों को झकझोर कर रख दे.. और उनके ढीले भोसड़े को सख्त लंड से चोदकर छील दे.. चुदाई के दौरान बेहद कामुक होकर नए नए आसन करे.. ऐसा सेक्स करे की दो दिन तक उसकी थकान महसूस हो.. ये सारी बातें एक वयस्क स्त्री की रोमांस की व्याख्या हो सकती है..

अनुमौसी को खुद की किस्मत पर गर्व हो रहा था क्योंकि आज उनके मन में छुपी हुई उस गहरी इच्छा को बाहर लाकर रसिक ने संतुष्ट किया था..

एकांत.. टीवी पर चल रहा रोमेन्टीक द्रश्य.. और सुबह के संभोग का सुरूर.. ये सब मिल जाएँ तो नतीजा क्या हो सकता है? देखते ही देखते अनुमौसी के सारे कपड़े उतर गए.. भोसड़े में चार उँगलियाँ एक साथ डालकर ऐसे आगे पीछे कर रही थी जैसे गीले गड्ढे से मिट्टी खोद रही हो.. उँगलियाँ डाल डालकर वो रसिक का दिया हुआ ऑर्गजम ढूंढ रही थी.. ढीले भोसड़े को उंगलियों से ठंडा करना संभव नहीं था.. थोड़ी देर कोशिश करने के बाद वो थक गई.. हारकर वो खड़ी हो गई.. और यहाँ वहाँ देखने लगी.. उनकी नजर किसी ऐसी वस्तु की खोज कर रही थी जो आसानी से उपलब्ध नहीं थी.. भोसड़े में आग लगी हुई थी.. रसिक तो दूसरे दिन सुबह आने वाला था.. बीच में पड़ी इस पूरी रात को इस सुलगते हुए बदन के साथ गुजारना उनके लिए नामुमकिन था..

मौसी की नजर सब जगह दौड़ने लगी.. वो कुछ ऐसा ढूंढ रही थी जो उनके भोसड़े में फिट बैठे और रसिक के मोटे लोड़े की कमी पूरी कर सके.. पर उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला.. आखिर वो वापिस बिस्तर पर लेट गई.. और गोल तकिये को अपनी दोनों जांघों के बीच दबाकर पड़ी रही.. भड़कते भोसड़े को थोड़ी राहत जरूर मिली पर सिर्फ ऊपर ऊपर से.. अंदर जो ज्वालामुखी सक्रिय हो चुका था उसका क्या करें???


pil

अनजाने में ही वो कमर हिलाने लगी और सिसकियाँ भरते हुए रसिक के कसरती मजबूत बदन को याद करते हुए तकिये पर जोर-जबरदस्ती करने लगी.. जैसे जैसे वो तकिये से भोस रगड़ती गई वैसे वैसे परिस्थिति बद से बदतर होने लगी.. एक समय तो ऐसा आया की हताश होकर उन्होंने तकिये को उठाकर दूर फेंक दिया.. निर्जीव तकिया बेचारा दीवार से टकराकर फर्श पर गिर गया..

अब अनुमौसी ने टीवी का रिमोट ही अपने भोसड़े में घुसेड़ दिया.. और अंदर तक घुसाकर फिर बाहर खींचा.. और वैसे ही अंदर बाहर करती रही.. रिमोट पर लगे खुरदरे प्लास्टिक के घर्षण से उनके भोसड़े में बहार आ गई.. रिमोट के बटनों को अपनी क्लिटोरिस पर रगड़ते ही उन्हें यकीन हो गया की यही उनकी आग बुझाएगा.. उन्होंने अंदर बाहर करने की गति ओर तेज कर दी.. उनका हाथ इस परिश्रम से थक चुका था पर उस थकान की परवाह किए बिना.. वो इस चरमोत्कर्ष प्राप्त करने के आंदोलन में डटी रही.. आखिर घिसते रगड़ते उनके भोसड़े का कल्याण हो गया.. बेहद थक चुकी थी मौसी.. उनका सारा बदन कांप रहा था.. रिमोट को भोसड़े से निकालने तक का होश नहीं रहा और उनकी आँख लग गई..


remote

करीब दो बजे उनकी आँख खुली.. आँखें मलते हुए उन्हों ने अपने नग्न शरीर को देखा और शर्मा गई.. लाइट भी चालू थी और टीवी भी.. टीवी बंद करने के लिए यहाँ वहाँ रिमोट ढूंढती रही पर आसपास कहीं नहीं दिखा.. ढूँढने के लिए वो खड़ी होने लगी तो एकदम से भोसड़े में रिमोट घुसे होने का एहसास हुआ.. मौसी बहोत ही शर्मा गई.. उन्हों ने रिमोट बाहर निकाला.. रिमोट पर चूत के सफेद रस का लेमिनेशन हो चुका था

अरे बाप रे.. इतनी देर तक ये अंदर ही था.. !! सोचते हुए उन्होंने टीवी बंद करने के लिए लाल बटन दबाया पर बंद नहीं हुआ.. रिमोट को किसी काम का नहीं छोड़ा था मौसी ने.. मन ही मन हंसने लगी मौसी.. ये चूत चीज ही ऐसी है.. अंदर जो भी जाता है.. बाहर निकलने के बाद किसी काम का नहीं रहता.. फिर वो रिमोट हो या लोडा.. रिमोट को टेबल पर रखते हुए टीवी की स्विच बंद कर दी और कपड़े पहन लिए.. लाइट ऑफ करके वो फिर से बिस्तर पर लेट गई

थोड़ी ही देर में उन्हें फिर से नींद आ गई.. कहते है की नींद आने की पूर्वशर्त होती है थकान.. और आज मौसी पूरी तरह से थक चुकी थी.. बूढ़ी घोड़ी जब रेस जीत जाए तब कितनी थक जाती है.. !!

रोज की तरह आज भी सुबह पाँच बजे डोरबेल बजी.. चीते की फुर्ती से अनुमौसी बिस्तर से भागकर गई और दरवाजा खोला.. रसिक को देखते ही वो सहम गई.. नई दुल्हन की तरह.. पर रसिक ने काजू की गैरमौजूदगी में मूंगफली से काम चला लेने का मन बना लिया था.. वो सीधे घर में घुस गया और दरवाजा बंद कर मौसी के होंठों को चूसने लग गया.. उनके गालों पर काटते हुए रसिक जंगली बन गया.. और जैसे वो दूध बेचने के लिए नहीं पर मौसी को छोड़ने आया हो उतना उतावला हो गया.. मौसी रसिक की इसी अदा की तो दीवानी थी.. चिमनलाल की लोकल ट्रेन उन्हें मंजिल पर बहोत देर से पहुंचाती थी.. और कभी कभी तो बीच रास्ते ही खराब हो जाती और मौसी को खुद के बलबूते पर ही मंजिल तक जाना पड़ता.. लेकिन रसिक के साथ ये प्रॉब्लेम नहीं थी.. वो तो बुलेट ट्रेन की गति से ऐसे शुरू हो जाता.. की एक ही सफर में मौसी तीन तीन मंज़िलें हासिल कर लेती..

रसिक के लोड़े को तुरंत पकड़ लिया मौसी ने.. पाजामे के बाहर निकालते हुए वो ऐसे हिलाने लगी जैसे थन से दूध दुह रही हो.. लंड से खेलने के लिए वो इतनी उतावली हो गई थी की प्राकृतिक रूप से लंड को खड़ा होने में जितना वक्त लगता है तब तक भी उनसे इंतज़ार नहीं हो रहा था.. चेहरे पर बेसब्री साफ झलक रही थी


dick-suck6

"मौसी, आपको इतना पसंद है मेरा??" जवान घोड़ी की तरह उछल रही मौसी के ढीले स्तनों को ब्लाउस के ऊपर से दबाते हुए रसिक ने पूछा

"रसिक, मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसे सुख का अनुभव नहीं किया है.. पीयूष के पापा इस मामले में शून्य बंटा सन्नाटा जैसे है.. अगर तू मुझे मेरी जवानी में मिल गया होता तो क्या बात होती.. तेरा ये बड़ा ही मस्त है रसिक.. एक बार तेरे नीचे लेटी हुई औरत तुझे कभी भूल नहीं सकती.. आह्ह!!"

अपने लंड की तारीफ सुनते ही रसिक का लंड कडक हो गया बल्कि होना चाहिए उससे भी ज्यादा सख्त हो गया.. हवस और अहंकार दोनों की सहायता से.. मौसी की शादी जिस समय हुई थी उस समय स्त्रीयां लज्जा का अतिरेक करती थी.. वो समय ऐसा था जब पत्नी अपने पति का नाम भी नहीं लेती थी.. ऐसे में वो कैसे भला अपने पति से कह पाती की मेरी चूत चाटिए.. !! पुरुष को जैसे आता वैसे चोदकर अपना पानी छोड़कर बगल में खर्राटे भरने लगता था.. और औरत भी समझती थी की.. बस यही था, जो था.. !! औरतों का जीवन बस यही था की जब उसका पति कहे तब घाघरा उठा कर लंड लेने के लिए तैयार रहना.. और पति बस इतना ही समझता था की रोज रात होते ही अपनी पत्नी की चूत में लंड डालकर धक्के लगाना और जब पानी निकल जाए तब सो जाना..

शायद वात्स्यायन ने ऐसे पुरुषों के लिए ही संभोग पर पूरा ग्रंथ लिखना पड़ा.. उन्हें स्त्रीयों की इस दशा पर रहम आ गया होगा.. उन्हों ने सोचा होगा की अगर मैं इन तोतों को नहीं सिखाऊँगा तो कोयलें बेचारी कुंजना भूल जाएगी.. उनकी ज़िंदगी की जीवंतता कहीं खो जाएगी और वो पूरे जीवन में एक बार भी चरमोत्कर्ष को प्राप्त नहीं कर पाएगी.. हँसते हुए अपने मर्द की सारी इच्छाओं को पूरी करती रहेगी..

भला हो उस क्रांतिकारी वात्स्यायन का.. जिसने मानवजात को इस अनमोल ग्रंथ की भेंट दी.. और चोदना सिखाया.. ये भी सिखाया की संभोग के दौरान पहले स्त्री को उसकी चरमसीमा तक पहुंचाना चाहिए और उसके पश्चात ही पुरुष को झड़ना चाहिए.. नहीं तो आज भी पुरुष स्त्री को केवल भोगने का और बच्चे पैदा करने का साधन ही मान रहा होता.. चूत के थोड़े से ऊपर दो सुंदर स्तन होते है.. और उस स्तनों के पीछे एक नाजुक ह्रदय होता है.. और उस ह्रदय में कोमल भावनाएं बसी होती है.. जिन्हें समझना पुरुष के लिए बेहद जरूरी होता है.. शर्मीली प्रकृति वाली स्त्री उसे कभी खुद जाहीर नहीं कर पाती

आज के मुक्त समाज में किसी भी धर्म या संलग्न व्यक्ति को सेक्स की बात करते हुए देख समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता.. तो सोचिए की इतनी सदियों पहले, एक महात्मा ने सेक्स के बारे में इतना विस्तृत ग्रंथ लिखा तब समाज ने उसे कैसे स्वीकार किया होगा.. !! कितनी आलोचना सहनी पड़ी होगी?? फिर भी उस ग्रंथ की रचना हुई और वो अब तक यथार्थ है इसका मतलब तो यही होता है की आज के मुकाबले उस समय का समाज ज्यादा मुक्त विचारों वाला था..

मौसी सोच रही थी की काश उनकी शादी रसिक से हुई होती तो कितना अच्छा होता.. !!! गरीबी में जीना पड़ता.. कपड़े धोने पड़ते.. दूध दुहना पड़ता.. पर जीवन के इस सर्वोच्च आनंद से वो वंचित तो न रहती.. !!! रसिक भी हिंसक होकर मौसी के विविध अंगों को मसलने मरोड़ने लगा था..

मौसी की निप्पलों को खींचते हुए रसिक ने कहा "चलिए मौसी.. जल्दी कीजिए.. फिर दूध देने भी जाना है"


npull

रसिक के लोड़े को तैयार देखकर मौसी खुश हो गई.. नीचे झुककर उन्हों ने टोपे को चूम लिया और बोली "कितना मस्त है.. मन तो करता है की टांगें फैलाकर पूरी रात डलवाती रहूँ"


ball-suck
रसिक ने सोचा.. मौसी इतनी बूढ़ी है फिर भी मेरा लंड उन्हें खुश कर देता है.. तो मेरी रूखी को क्यों ये लंड छोटा पड़ता है? साली जब देखो तब ताने मारती रहती है की और धक्के लगाओ.. मज़ा नहीं आ रहा.. क्या नामर्दों की तरह चोद रहे हो.. !!! उससे तो शीला भाभी अच्छी.. कभी मेरे लंड से नाखुश नहीं होती.. जब से रूखी ने नामर्द कहा है तब से उसे रांड को छूने का मन ही नहीं करता.. पर ये कमबख्त लोडा मेरा.. रूखी के बबलों को देखते ही डोलने लगता है.. शीला भाभी मिल गई उसके बाद तो मैंने रूखी की तरफ देखा ही कहाँ है.. !! पर शीला भाभी के साथ सब बंद होने के बाद वापिस उस रूखी की शरण में जाना पड़ा.. हरामजादी को इससे बड़ा कैसा लंड चाहिए?? इतना मोटा और लंबा घुसाता हूँ फिर भी उसे कम पड़ता है.. कम ही पड़ेगा ना.. उसके वो यार जीवा का तगड़ा लंड लेने की आदत जो पड़ गई है उसे.. माँ चुदाने जाए रूखी.. अब तो यहाँ मौसी भी तैयार हो गई है.. शीला भाभी या तो मौसी.. दोनों में से एक तो जब चाहे मिल ही जाएगी मुझे.. पर जब तक शीला भाभी मिल रही हो तब तक मौसी को देखने का मतलब नहीं.. शीला भाभी के बॉल भी रूखी जैसे है.. बड़े बड़े.. और भाभी कितना मस्त चूसती है.. !! उस मामले में रूखी को कुछ नहीं आता.. साली को बस अपने भोसड़ा चटवाकर चुदवाना ही आता है.. शीला भाभी का पति और दो साल विदेश रुक गया होता तो कितना अच्छा होता..

"आह्ह रसिक.. तेरी याद में मुझे पूरी रात ठीक से नींद भी नहीं आई.. " मौसी पर अब हवस का बुखार चढ़ चुका था..

"मौसी, आज आपकी चाटूँ या सीधा घुसा दूँ?"

"चाटनी तो पड़ेगी बेटा.. वही तो सबसे बड़ा सुख है.. ले मेरी.. और आजा.. चाट चाटकर लाल कर दे मेरी.. आह रसिक.. मुझे तो तेरे साथ करवाने पर पता चला की यहाँ भी चाटते है.. मुझे सब से ज्यादा मज़ा उसी में आता है.. !!"

फर्श पर दोनों जांघें फैलाकर जितनी हो सके चौड़ी कर, मौसी ने अपनी झांटों वाले भोसड़े का नजारा दिखाया.. इस घनघोर जंगल में भोसड़े का प्रवेशद्वार ढूँढना मतलब समंदर में घुसकर मोती ढूँढने जैसा कठिन काम था.. रसिक ने डुबकी लगाई और मौसी के भोसड़े में खो गया.. जैसे ही उसकी जीभ मौसी की क्लिटोरिस पर जा टकराई.. मौसी का शरीर तंग हो गया..


fhfh2

"आह्ह रसिक.. बस वहीं पर.. ओह्ह.. चाट वहाँ पर.. बहोत मज़ा आ रहा है मुझे" पैर ऊपर उठाते हुए भोसड़े को पूर्णतः चौड़ा कर वो कराहने लगी

मौसी की चूत के अंदर अपनी जीभ की कारीगरी दिखाते हुए रसिक ने उन्हें इतना नचाया.. इतना नचाया.. की अनुमौसी "ओह्ह--उहह--आह्ह" करते हुए झड़ गए.. उनका पानी रिस गया था और वो बेहद आनंदित थी.. उनको एक बार ठंडा करने के बाद भी रसिक ने चाटना नहीं छोड़ा.. और मौसी ने भी उसे रोका नहीं.. अब वो भोस के साथ जांघों को और क्लिटोरिस को चाट रहा था.. पर जब रसिक की जीभ भोसड़े की सरहद लांघ कर गांड के छेद पर जा पहुंची तब अनुमौसी की चूत नए सिरे से पानी बहाने लगी.. मौसी को ये क्रिया बेहद घिनौनी लग रही थी पर पुरुषों की अमर्याद कामुक क्रियाएं ही आखिर औरतों को तेजी से ऑर्गजम प्रदान करती है..

जितनी बार रसिक की जीभ अति उत्तेजना ने मौसी की गांड के छेद पर पहुँचती उतनी बार उनकी चूत संकुचित होकर रस छोड़ती.. पाँच से छह बार मौसी गरम होकर झड़ गई.. तब जाकर रसिक ने उनकी जांघों के बीच से अपना मुंह हटाया.. मौसी के चिपचिपे अमृतरस से लिप्त रसिक का मुंह ऐसा लग रहा था जैसे जंगल का राजा शेर, अभी शिकार को खाकर बैठा हो..

"मौसी, आपको तो मैंने खुश कर दिया.. अब आप मेरी एक इच्छा पूरी करेगी?" रसिक ने मौसी के बबले दबाते हुए कहा

"पहले तेरे इस मूसल की इच्छा पूरी कर रसिक.. देख कैसा तड़प रहा है.. मैं तो पाँच-छह बार ठंडी हो गई.. बता.. कौनसे छेद में डालेगा?? उस हिसाब से मैं तैयार रहूँ.. !!"

"आपकी भोस तो चाटकर तृप्त कर दिया आपको.. अब मेरी बारी है.. अब आप मेरा मुंह में लेकर चुसिए.. आज आपके मुंह में पानी निकालने का मन कर रहा है.. निकालने दोगे ना.. ??"

"छी छी.. ऐसा गंदा गंदा कोई करता है भला?? मुझे तो उलटी आ जाएगी.. मैं मुंह में तो नहीं निकालने दूँगी.. हाँ तेरा चूस सकती हूँ" कहते हुए मौसी पूरी तन्मयता और समर्पण के भाव से घुटनों के बल बैठ गई और चूसने लगी.. उन्हें चूसते हुए देख रसिक सोच रहा था.. दो ही दिन में मौसी लंड चूसने में एक्सपर्ट हो गई.. रसिक को मज़ा तो आ रहा था पर एक ही तकलीफ हो रही थी.. जब भी वो मौसी के मुंह में धक्का लगाता और उनके कंठ तक लंड घुसेड़ने की कोशिश करता.. तब मौसी अपना सर पीछे खींच लेती और रसिक का मूड ऑफ हो जाता..


dick-suck-huge3

इसलिए रसिक ने अब दोनों हाथों से मौसी का सर जकड़ लिया.. और धक्के लगाने लगा.. अब मौसी हिल भी नहीं पा रही थी और उसे जबरदस्त मज़ा आना शुरू हो गया था.. जब वह अपने उत्तेजित लंड को पूरी ताकत से अंदर धकेलता तब मौसी के गले तक लंड उतर जाता..मौसी का दम घुटने लगा.. वो बिलबिलाने लगी.. वो रसिक की पकड़ से छूटने के लिए जोर लगाती रही.. पर कसरती शरीर वाले रसिक के आगे भला मौसी का जोर कैसे चलता.. !! रसिक दोनों हाथों से उनके बालों को पकड़ कर धमाधम धक्के लगा रही था और उसके आँड मौसी की ठुड्डी से टकरा रहे थे.. मौसी का नाक रसिक के झांटों के बीच आक्सिजन तलाश रहा था.. और तभी उन्हें एहसास हुआ की कुछ गरम तरल प्रवाही उनके कंठ से होते हुए पेट तक जाने लगा..

cum-in-mouth4

अब तक जिस प्रवाही की गंध भी उन्होंने नहीं परखी थी वो चीज सीधे उनके मुंह के अंदर होते हुए पेट में जा रही थी.. मौसी को उलटी आ रही थी.. वो रसिक की पकड़ से छूटने के लिए मचल रही थी.. पर उत्तेजित मर्द को स्खलन की आखिरी पलों में अंकुश में करना बड़ा मुश्किल होता है..

मौसी की छटपटाहट की परवाह किए बिना रसिक अपने वीर्य के फव्वारे उनके गले के अंदर मारे जा रहा था.. जैसे विरोध पक्ष विरोध करते रहते है और शासक पक्ष विधेयक पास करवा लेते है.. वैसे ही अपना सारा लोड मौसी के हलक के नीचे उतार दिया और तब तक उन्हें नहीं छोड़ा जब तक उसके लंड की आखिरी बूंद अंदर उतर नहीं गई..

रसिक की पकड़ से छूटते ही मौसी अपना सर झटकते हुए मुंह के वीर्य के स्वाद को हटाने की व्यर्थ कोशिशें करती रही.. उनकी सांस फूल गई और वो वहीं फर्श पर ढल पड़ी.. देखकर रसिक घबरा गया.. कहीं बुढ़िया टपक तो नहीं गई.. !! बाप रे.. !! वो लेटी हुई मौसी के शरीर के आजूबाजू पैर रखकर खड़ा हो गया.. नंगी निश्चेतन मौसी उसकी दोनों टांगों के बीच लाश की तरह पड़ी हुई थी.. उसके लटकते हुए लंड से कुछ आखिरी बूंदें मौसी के स्तनों पर टपक पड़ी.. छाती पर गरम गरम एहसास होते ही मौसी ने अपनी आँखें खोली और नज़रों के सामने रसिक के विकराल लंड को ठुमकते हुए देखती रही.. घबराकर उन्होंने फिर से आँखें बंद कर ली..

थोड़ी देर बाद होश आते ही वो बैठ गई और रसिक पर गुस्सा करने लगी.. "नालायक.. ऐसे भी कोई करता है क्या?? अभी मेरी जान निकल जाती.. जा.. अब मुझे तेरे साथ नहीं करवाना.. " कहते हुए वो करवट बदल कर सो गई.. बात को बिगड़ता देख चिंतित रसिक उनकी जंघाओं को चौड़ी कर लेट गया और फिरसे मौसी की चूत चाटने लगा.. उन्हें रिझाने के लिए..

"छोड़ दे रसिक.. मुझे नहीं चटवानी.. तू जा यहाँ से.. " पर रसिक ने मौसी को रिझाने के प्रयास जारी रखें.. जैसे जैसे रसिक की जीभ मौसी की चूत की परतों को चाटती गई.. वैसे वैसे मौसी का गुस्सा, उत्तेजना में परिवर्तित होने लगा.. पर नाराज तो वो अब भी थी.. "मेरा हो चुका है.. अब मुझे कुछ नहीं करवाना तुझसे.. छोड़ मुझे.. और जा यहाँ से.. !!"

रसिक ने एक न सुनी.. और चाटता ही गया.. अब मौसी के दिमाग पर सुरूर छाने लगा था "आह्ह रसिक.. छोड़ दे.. पर चले मत जाना.. तू चला जाएगा तो फिर मैं क्या करूंगी? जो शुरू किया है वो पहले खतम कर.. !!" सारांश सिर्फ इतना था की मौसी फिर से उत्तेजित हो गई थी "साले फिर से क्यों ये सब शुरू किया? मैं ठंडी हो गई थी और तेरा भी निकल चुका था.. अब वापिस मुझे गरम कर दिया.. अब ये आग कौन बुझाएगा?? चल चाट अब इसे " उत्तेजित होकर मौसी अब खूंखार स्वरूप धारण करने लगी थी.. लेटे हुए रसिक की छाती पर सवार होकर वो हिंसक रूप से रसिक के होंठों पर अपनी भोस रगड़ने लगी..


rid

मौसी के भोसड़े के भीतर तक जीभ डालते हुए रसिक चाटता रहा और थोड़ी ही देर में मौसी फिर से झड़ गई.. जैसी जबरदस्ती रसिक ने उनके साथ की वैसा ही कुछ उन्होंने भी रसिक के साथ किया.. इस एहसास ने उनका गुस्सा कम कर दिया.. हिसाब बराबर हो चुका था.. मुसकुराते हुए मौसी ने रसिक से कहा "देखा कैसा होता है जब कोई जबरदस्ती कुछ करता है तब"

मौसी की दोनों निप्पलों को खींचते हुए रसिक ने कहा "मुझे तो इसमे भी बहोत मज़ा आया.. आपको भी मज़ा आया.. बेकार में हंगामा कर दिया उस वक्त आपने "

मौसी: "अरे कमीने, उस वक्त तो ऐसा लग रहा था की जैसे मेरे प्राण ही निकल जाएंगे.. तू इसी इच्छा की बात कर रहा था ?"

रसिक: "हाँ मौसी.. आपके मुंह में पानी गिराने में तो बहोत मज़ा आया.. पर मेरा मन कर रहा है किसी जवान छातियों को दबाने का.. बहोत समय से इच्छा है.. पर कीसे कहूँ? आपके ध्यान में अगर कोई इसी जवान चूत हो तो मुझे बताना.. "

मौसी: "मर जा मुएं बेशर्म.. अब मैं तेरे दबाने के लिए जवान छातियाँ ढूँढने बैठूँ.. !! ये शीला के तो रोज दबाता है तू.. मैं सब जानती हूँ.. मेरे मुकाबले तो वो काफी जवान है.. और सख्त भी.. और रूखी भी उससे बढ़कर है.. एक एक स्तन दो लीटर दूध समा सकें उतने बड़े है उसके.. फिर तू क्यों बाहर ढूँढता रहता है? इससे बेहतर और कौनसी छातियाँ चाहिए तुझे? घर पर रूखी के दबाता है और यहाँ शीला के.. मन नहीं भरता क्या?"

रसिक: "उस हरामजादी रूखी का नाम मत लो मेरे सामने.. मादरचोद ने मुझे नामर्द कहा था.. "

मौसी चोंक उठी "क्या बात कर रहा है? इतना बड़ा अजगर जैसा लंड है तेरा और फिर भी उसने तुझे नामर्द कहा??"

रसिक: "ये लंड आपको अजगर जैसा लगता है.. पर उसे तो ये भी छोटा पड़ता है.. और कहती है की मुझे ठीक से धक्के लगाना नहीं आता.. अब आप ही बताइए.. दो दिन से आपको चोद रहा हूँ.. आप को कोई कमी महसूस हुई क्या??"

मौसी: 'क्या बात कर रहा है, रसिक!! तेरे लंड के धक्के तो मुझे छातियों तक महसूस होते है.. मैं बूढ़ी हूँ फिर भी मेरी चीखें निकल जाती है.. कोई छोटी उम्र वाली की तो तू जान ही निकाल दे.. !!"

रसिक: 'और उस कमीनी को ये छोटा पड़ता है.. इसलिए साली किसी और का लंड लेती है"

अनुमौसी की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई.. रूखी को किसी गैर-मर्द के गधे जैसे लंड से चुदते हुए देखने की कल्पना करते हुए..

मौसी: "मुझे पता है वो किसका डलवाती है.. वो जिस से चुदवाती है उसका तुझसे भी बड़ा है रसिक.. पर तेरा भी कुछ कम नहीं है.. पीयूष के पापा से तो बड़ा ही है.. "

रसिक सुनता रहा.. वैसे उसे रूखी और जीवा के छक्का के बारे में मालूम ही था.. पर आश्चर्य इस बात से था की अनुमौसी को इस बारे में कैसे पता चला.. !!

"कौन है वो, मौसी?"

"रूखी के मायके का दोस्त है.. जीवा.. मैं और शीला, दोनों उसको जानते है" अनुमौसी ने अपने साथ साथ शीला का पेपर भी लीक कर दिया

"पर मौसी, आप को कैसे पता चला की उसका मुझसे भी बड़ा और मोटा है? इसका मतलब ये हुआ की आपने उसका देखा है"

मौसी ने बात टालने की कोशिश तो की पर अब रसिक को पता चल ही चुका था तो छुपाने का कोई मतलब नहीं था..और वो रसिक को अपने राज की बातें बता कर.. अपनी ओर खींचना चाहती थी.. इसलिए उन्होंने बता दिया

मौसी की नंगी भोस में रसिक ने दो उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए कहा "सच सच बता दो मौसी.. आप ने उस मादरचोद जीवा का सिर्फ देखा है या फिर अंदर लिया भी है? वो हरामखोर जब घर आता है तब तो रूखी उसे "मेरा भाई मेरा भाई" कहकर बुलाती है"


fing


"देख बेटा.. अब जमाना बदल गया है.. बहन बहन कहकर लॉग भांजे पैदा कर देते है.. आज कल के मर्द और औरत.. अपना पाप छुपाने के लिए मुंह बोली बहन या भाई का रिश्ता बनाकर इस पवित्र संबंध का दुरुपयोग करते है.. मैंने और शीला ने जीवा के साथ सब कुछ किया हुआ है.. तेरी बीवी ही उसे यहाँ लेकर आई थी.. जीवा उसके मायके का यार है और वो कुंवारी थी तब से उन दोनों का चक्कर चल रहा है.. रूखी को तो उसका लिए बिना चलता ही नहीं है.. तू शहर से बाहर था तब रूखी, जीवा का लंड लेने के लिए तरस रही थी.. घर पर तो तेरे माँ बाप रहते है इसलिए वहाँ तो बात बन न पाई.. आखिर रूखी ने शीला को बताया.. फिर शीला ने उन दोनों के मिलने का सेटिंग यहीं करवा दिया.. इसी बिस्तर पर जीवा ने तेरी बीवी की टांगें चौड़ी कर अपने गधे जैसे लंड से चोद दीया था.. मैंने और शीला ने जब जीवा का तगड़ा लंड देखा तब हम से भी रहा नहीं गया.. इसलिए मैंने और शीला ने जीवा और उसके दोस्त रघु से करवाया था.. बोल, और कुछ जानना है तुझे?"

"और तो कुछ नहीं जानना मौसी.. पर जैसे आप जीवा का लंड देखकर खुद को रोक नहीं पाई.. वैसे ही जवान छोटी छोटी छातियाँ देखकर मुझसे भी रहा नहीं जाता.. एक बार मुझे जवान बबलों की सेटिंग करवा दीजिए मौसी.. बदले में.. मैं सारी ज़िंदगी आपकी सेवा करूंगा.. !!"

अनुमौसी: "पर मैं कहाँ ढूँढने जाऊ तेरे लिए जवान छातियाँ?"

रसिक: 'कहीं ढूँढने जाने की जरूरत नहीं है.. आप के घर पर ही तो है.. कविता.. आपकी बहु.. !!"

अनुमौसी: "चुप हो जा कमीने.. कुछ पता भी है तू क्या बक रहा है?? सास होकर क्या मैं अपनी बहु से कहूँ की किसी अनजान मर्द के सामने अपनी छातियाँ खोल दे.. ?? वो क्या सोचेगी मेरे बारे में.. ??"

रसिक: "आप समझ नहीं रही है मौसी.. मैंने ये कब कहा की आप कविता से इस बारे में कहिए.. आपको तो बस मुझे आशीर्वाद देना है.. और बीच में टांग नहीं अड़ानी है.. बाकी सब मैं देख लूँगा.. आप देखकर अनदेखा तो कर सकती हो ना.. !!"

अनुमौसी: "अरे पर पीयूष को पता चल गया तो गजब हो जाएगा.. मैं माँ होकर अपने बेटे की ज़िंदगी में जहर नहीं घोल सकती.. ऐसा तो मैं होने नहीं दूँगी.. तू मुझे आज के बात कभी नहीं करेगा तो भी मुझे चलेगा.. पर फिर कभी ऐसी बात की ना तो तेरी खैर नहीं.. याद रखना तू.. !! हाँ अगर कोई बिन-ब्याही या विधवा होगी तो उसके साथ मैं तेरा सेटिंग करवा दूँगी.. ठीक है.. !!"

रसिक ने उदास होकर कहा "ठीक है मौसी.. चलो मैं अब चलता हूँ.. बहोत देर हो गई आज तो.. " मुंह फुलाकर नाराज होते हुए रसिक खड़ा हुआ.. मौसी सोच रही थी की जाते जाते रसिक उन्हें बाहों में भरकर चूमेगा.. पर रसिक ने ऐसा कुछ नहीं किया और गुस्से में चला गया.. मौसी का भी मूड ऑफ हो गया.. रसिक के जाने के बाद मौसी ने सोचा.. शीला का खाली घर अभी कुछ दिनों तक उनके कब्जे में थे.. रसिक को झूठ-मूठ की आशा देकर मना लेती तो तीन-चार दिन तक चुदाई का भरपूर लाभ मिल जाता.. बेकार में रसिक को नाराज कर दिया.. शीला होती तो यही करती.. मुझ में और शीला में यही तो फरक है.. शीला ने कलकत्ता बैठे बैठे मेरी यहाँ सेटिंग कर दी.. और मैं यहाँ रहते हुई भी उसे संभाल नहीं पाई.. अपने आप पर गुस्सा आ रहा था.. निराश होकर वह उठी और कपड़े पहन कर घर जाने लगी..

दरवाजा खोलते ही उन्हों ने देखा की उनके घर के बाहर रसिक कविता को दूध दे रहा था.. दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे.. इतनी सुबह सुबह कविता क्या बात कर रही होगी इस दूधवाले से.. !! और ऐसा तो क्या कहा होगा रसिक ने जो कविता इतना हंस रही थी.. ?? रोज के मुकाबले रसिक आज कुछ ज्यादा ही समय ले रहा था दूध देने में.. मौसी के दिमाग में हजार खयाल आने लगे.. मौसी को यकीन हो गया की रसिक कविता को दाने डालकर पटाने की कोशिश कर रहा होगा..
 
दरवाजा खोलते ही उन्हों ने देखा की उनके घर के बाहर रसिक कविता को दूध दे रहा था.. दोनों हंस हंस कर बातें कर रहे थे.. इतनी सुबह सुबह कविता क्या बात कर रही होगी इस दूधवाले से.. !! और ऐसा तो क्या कहा होगा रसिक ने जो कविता इतना हंस रही थी.. ?? रोज के मुकाबले रसिक आज कुछ ज्यादा ही समय ले रहा था दूध देने में.. मौसी के दिमाग में हजार खयाल आने लगे.. मौसी को यकीन हो गया की रसिक कविता को दाने डालकर पटाने की कोशिश कर रहा होगा..

वैसे तो उन्हें इस परिस्थिति में तुरंत घर पहुंचकर दोनों को अलग करना चाहिए था.. पर पता नहीं उन्हें क्या हुआ की वो दरवाजा बंद कर अंदर गई.. और शीला के किचन की खिड़की से दोनों को देखने लगी.. रसिक दूध देकर चला गया और कविता शरमाते हुए घर के अंदर चली गई.. उसके बाद अनुमौसी ने शीला के घर को ताला लगाया और अपने घर पहुंची.. कविता को इतना खुश देखकर उन्हें पक्का संदेह हुआ की जरूर रसिक ने कुछ कहा होगा कविता से.. पर पूछती कैसे??"

हकीकत में कविता ने सिर्फ निर्दोष बातचीत ही की थी रसिक से.. उस बेचारी को क्या दिलचस्पी होगी एक मामूली से दूधवाले में.. ?? वैसे रसिक का ये सौभाग्य था की उसके धंधे में सारी ग्राहक औरतें और भाभीयां ही थी.. सुबह सुबह बिना मेकअप के अस्तव्यस्त कपड़ों में.. ज्यादातर बिना ब्रा के सिर्फ गाउन पहने औरतें मिलती थी.. रोज नई नई साइज़ और आकार के स्तनों को प्राकृतिक अवस्था में देखने का मौका मिलता.. हाँ उन स्तनों को नंगे देखने की ख्वाहिश सिर्फ मन में ही रह जाती.. और इसीलिए उन औरतों के पीछे रसिक भागता नहीं था.. हाँ, उसका मन जरूर करता की ऐसी मॉडर्न फेशनेबल भाभियों और लड़कियों के मस्त स्तनों को एक बार रगड़ने का मौका मिल जाएँ..

रसिक साइकिल लेकर घूमता तब एक्टिवा पर लटक-मटक तैयार होकर.. टाइट टीशर्ट और जीन्स पहनकर आती जाती लड़कियों को देखकर उसका दिल डोल जाता.. जैसे कोई गरीब आदमी, मर्सिडीज के शोरूम के बाहर खड़ा रहकर अहोभाव से महंगी गाड़ियों को देखता है.. वैसे ही रसिक देखता रहता.. और सोचता की ये लड़कियां नंगी हो तब कैसी दिखती होगी!! कितनी गोरी और सुंदर है.. टाइट जीन्स से साफ दिखते कूल्हों वाली इन लड़कियों की चूत कितनी टाइट होगी.. !! उस बेचारे को एहसास भी नहीं था की असली सुंदरता तो उसके घर पर बैठे बैठे उसके बेटे को अपने तड़बुच जैसे स्तनों से दूध पीला रही थी.. रूखी के पाँच लीटर वाले मदमस्त स्तन थे.. पेड़ के तने जैसी मस्त मोटी चिकनी जांघें थी.. गदराई गांड थी.. और चेहरे के नक्शा भी काफी सुंदर था.. सही अर्थ में वह पूर्ण रूपसुन्दरी थी.. और उसका देसी स्टाइल उस रूप में चार चाँद लगा देता था.. पर इंसान का स्वभाव ही ऐसा है.. घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है..


rukhi44

बड़े बड़े स्तनों वाली और थोड़े भारी भरकम शरीर वाली.. रूखी या शीला जैसी पत्नियों के पतिदेवों को.. नोरा फतेही जैसी ज़ीरो फिगर वाली लड़कियों में स्वर्ग नजर आता है.. वो अपनी गदराई पत्नियों को ताने मारते है.. कितनी मोटी है तू.. ऊपर चढ़ती है तब वज़न लगता है.. हर वक्त तेरे बदन पर पसीना रहता है.. तेरा पेट कितना बाहर आ गया है.. चूत तक लंड पहुंचाने के लिए मुझे एक्सटेंशन लगाना पड़ेगा.. वगैरह वगैरह.. और जिसकी पत्नी एकदम पतली होती है उनके पति की ये शिकायतें होती है की.. यार तुझसे ज्यादा बड़े बॉल तो मेरे है.. कितने छोटे है तेरे.. कुछ हाथ में ही नहीं आता.. तेरे ऊपर चढ़कर शॉट लगाता हूँ तब हड्डियाँ टकराती है मेरे शरीर से.. तेरा तो शरीर है या चलता फिरता कंकाल.. !! पतली पत्नियों के चूतिये पति.. गदराई औरतों को देखकर आहें भरते है.. और भारी शरीर वाली पत्नियों के पति.. जीरो फिगर को देखकर भद्दे शरीर वाली अपनी बीवी को मन ही मन कोसते है.. सब को दूसरे का माल ही बेहतर लगता है..

जब कविता रसिक से दूध ले रही थी.. तब उसके पतले नाइट ड्रेस से दिख रहे अद्भुत बिना ब्रा के स्तनों को देखकर रसिक स्तब्ध रह गया..


kav

सोच रहा था.. काश एक बार दबाने मिल जाएँ!! कितने मस्त है.. मेरी एक हथेली से मैं इसके दोनों स्तन साथ में दबा दूँ.. रूखी का तो एक स्तन मेरी दोनों हथेलियों में भी नहीं समाता.. उसका तो सब कुछ बड़ा बड़ा ही है.. छातियाँ बड़ी.. गांड बड़ी.. जांघें भी बड़ी.. इसलिए साली को लोडा भी बड़ा चाहिए.. जिस तरह शीला भाभी ने मुझे करने दिया.. उस तरह क्या इसे भी पता लूँ तो मज़ा आ जाए.. कितनी नाजुक है!! आह्ह.. इसे तो मेरे लंड पर बिठाकर गली गली घूमता फिरूँ फिर भी मुझे इसका वज़न न लगे.. और इसकी चूत कैसी होगी.. छोटी सी.. टाइट टाइट.. मोगरे के ताजे खिले हुए फूल जैसी.. पर क्या उसके अंदर मेरा जाएगा??

जैसे जैसे रसिक, कविता के कमसिन जोबन के बारे में सोचता गया वैसे वैसे उसकी बेसब्री बढ़ती गई.. आज रसिक ने काफी घरों में दूध दिया और हर दूध लेने वाली स्त्री में वो कविता को खोज रहा था.. अनुमौसी के साथ वो जानबूझकर नाराज होकर निकला था.. वो जानता था की उसे नाराज देखकर मौसी बेचैन हो जाएगी.. और मेरे लिए कुछ न कुछ जरूर करेगी.. कविता की चूत तक पहुँचने के लिए मौसी की गटर में लंड डालना ही होगा.. मौसी को भी मेरे जैसा लंड कहाँ मिलेगा!! वो मुझे छोड़ तो पाएगी नहीं.. मुझे मनाने आएगी तब मैं अपनी मनमानी करूंगा..
-----------------------------------------------------------------------------------------------------
जब से कविता ने मौसम की शादी की बात सुनी थी तब से वो हवा में उड़ने लगी थी.. शादी में वो क्या पहनेगी.. मौसम को क्या गिफ्ट देगी.. संगीत संध्या में कौनसे रंग की चोली पहनेगी.. !! किचन में चाय बनाने गेस पर रखकर.. बिना नहाए धोए कविता चाय उबलने का इंतज़ार कर रही थी.. तभी उसने अपनी सास को घर में आते देखा.. मम्मीजी इस उम्र में भी कितनी फिट है.. !! वैसे कहने को दोनों सास-बहु थे पर दोनों में बहोत प्यार था.. अनुमौसी ने हमेशा से कविता को अपनी बेटी समान माना था.. वो कभी उसपर गुस्सा नहीं करती थी और गलती करने पर भी प्यार से समझाती थी..

"कैसी है बेटा? नींद आई थी ठीक से?" कविता को पूछकर.. उसके उत्तर का इंतेज़ार कीये बिना ही मौसी बाथरूम में घुस गई.. तभी पीयूष नींद से जागकर आँखें मलते हुए बाहर निकला.. रोज की तरह सब से पहले उसकी नजर शीला के घर की तरफ गई.. दरवाजा पर ताला देखकर उसका मुंह उतर गया.. वरना रोज सुबह शीला भाभी का चाँद जैसा चेहरा देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो जाता.. आखिर उसने कविता को पीछे से पकड़ लिया और उसके गोलमटोल स्तनों को दबाते हुए कहा "गुड मॉर्निंग डार्लिंग.. !!"

"छोड़ नालायक.. मम्मीजी बाथरूम में है.. कभी भी बाहर आ जाएंगे.. " कविता ने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करते हुए कहा.. कविता की गर्दन को चूमते हुए पीयूष उससे अपनी मतलब की बात जानने के लिए पूछने लगा "मदन भैया के बगैर कितना सूना सुना लग रहा है.. कब लौटने वाले है वो लोग?"

कविता ने भी मौका देखकर चौका लगा दिया "मदन भैया के बगैर सूना सुना लग रहा है या शीला भाभी के बगैर? या फिर वैशाली की याद आ रही है?"

पीयूष ने स्तनों को जोर से दबाते हुए कहा "अब इसमें शीला भाभी और वैशाली कहाँ से आ गई बीच में.. ये तो मदन भैया की कंपनी में मज़ा आ रहा था इसलिए पूछा.. भाभी और वैशाली का नाम लेकर तू कहना क्या चाहती है?" कविता की निप्पल मरोड़ दी गुस्से में पीयूष ने

"छोड़ दे.. वरना में चीख दूँगी.. और मम्मी नहाते नहाते बाहर आ जाएगी.. छोड़ साले" दोनों के बीच मज़ाक मस्ती चल रही थी तभी मौसी बाथरूम से बाहर आए.. और पीयूष ने कविता को छोड़ दिया.. और टॉइलेट में घुस गया..

चाय पीते पीते कविता ने मौसम की जल्द होने वाली शादी के बारे में अनुमौसी को बताया

अनुमौसी: "देख बेटा.. तेरे पापा को भागदौड़ तो होगी.. पर सब साथ मिलकर करेंगे तो सब कुछ हो जाएगा.. पापा से कहना की वो चिंता न करें.. हम सब मिलकर मौसम की शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे"

वॉश-बेज़ीन पर ब्रश कर रहा पीयूष बड़े ध्यान से सास-बहु की बातचीत को सुन रहा था.. जिस बात को वो भूलने की कोशिश कर रहा था उसका जिक्र सुबह सुबह ही हो गया.. उसका मूड खराब हो गया.. मौसम के साथ आज बात करनी ही होगी.. ऐसा सोचते हुए वो जैसे तैसे नहाकर, बिना नाश्ता कीये.. ऑफिस के लिए निकल गया..

घर से बाहर निकलते ही पीयूष ने मौसम को फोन किया..

मौसम: "हैलो जीजू.. पापा अभी यहीं है.. वो बस ऑफिस जा रहे है.. उनके जाते ही पाँच मिनट में कॉल करती हूँ.. ठीक है!!"

पीयूष: "ओके.. पर जल्दी करना.. एक बार ऑफिस पहुँच गया फिर बात करना मुश्किल हो जाएगा"

मौसम: "हाँ जीजू.. तुरंत करूंगी.. "

पीयूष: "लव यू मौसम"

मौसम: "ठीक है, रखती हूँ"

मौसम ने उसके "लव यू" का जवाब नहीं दिया इस बात का बुरा लगा पीयूष को.. पर फिर उसने अपने मन को मनाया.. हो सकता है की पापा आजूबाजू ही हो.. इसलिए बेचारी मौसम चाह कर भी बोल न पाई हो.. अपनी नादानी पर हँसते हुए वो बाइक चलाते हुए मुख्य सड़क पर आ गया.. आगे जाकर उसने बाइक रोक दी और मौसम के फोन की राह देखने लगा.. आधा घंटा बीत गया पर मौसम का फोन नहीं आया.. आखिर पीयूष थक कर ऑफिस की ओर निकल गया.. ऑफिस के दरवाजे पर पहुँचने पर भी फोन नहीं आया.. जैसे ही उसने अंदर प्रवेश किया.. मौसम का फोन आ गया.. पीयूष को बड़ा गुस्सा आया.. पाँच मिनट का बोलकर एक घंटे बाद फोन किया मौसम ने.. उसने सोचा की फोन कट कर दूँ.. पर फिर फोन उठा ही लिया..

मौसम: "हाँ जीजू.. "

पीयूष: "यार, तेरे फोन का इंतज़ार करते करते मैं ऑफिस पहुँच गया.. कितनी देर लगा दी तूने?? जल्दी बात कर.. मुझे अंदर जाना होगा.. सब देख रहे है मुझे"

मौसम: "सॉरी जीजू.. पर मैं क्या करती? पापा ऑफिस गए और तरुण का फोन आ गया.. उसी से अब तक बात कर रही थी इसलिए देर हो गई.. बताइए क्यों फोन किया था?"

तरुण का नाम सुनते ही पीयूष का खून घोलने लगा.. तरुण का फोन आ गया इसलिए मौसम ने मुझे होल्ड पर रख दिया.. !! प्रेमियों को नजरंदाजी बिल्कुल पसंद नहीं होती.. खासकर अपने साथी से.. कभी कभी तो वो अपने साथी की मजबूरी को भी उपेक्षा मानकर रूठ जाते है..गुस्से से पीयूष ने फोन काट दिया.. मौसम को लगा की नेटवर्क प्रॉब्लेम के कारण फोन कट गया.. मौसम ने फिर से फोन किया

गुस्से से पीयूष स्क्रीन पर मौसम का नाम देखकर कांप रहा था..

"क्यों भाई?? क्या हुआ? किस टेंशन में है??" पीछे से कंधे पर हाथ रखते हुए पिंटू ने कहा

"कुछ नहीं यार.. ऐसे ही थोड़ा सा टेंशन चल रहा है"

"घर पर कुछ हुआ? या राजेश सर ने कुछ बोल दिया?" पिंटू को ये जानना था की कहीं पीयूष और कविता के बीच तो कुछ नहीं हुआ ना.. !! पीयूष का जो होना हो सो हो.. पर कविता डिस्टर्ब नहीं होनी चाहिए.. पीयूष के टेंशन का कारण जानने के लिए पिंटू बेसब्र हो गया

पर पीयूष की समस्या ये थी की वो असली कारण पिंटू को बता नहीं पाएगा.. बात टालने के लिए उसने कहा "यार वही कविता के साथ का प्रॉब्लेम.. अभी सॉल्व कहाँ हुआ है.. !! बहोत तंग करती है वो मुझे.. जो मन में आए वो बोलती है.. सुबह सुबह मम्मी के साथ झगड़ पड़ी.. इसलिए टेंशन में था" पीयूष ने अपनी बात छुपाने के लिए कविता को बलि चढ़ा दिया

सुनकर पिंटू सोच में पड़ गया.. मेरी कविता ऐसा तो नहीं कर सकती.. जरूर पीयूष ने ही कुछ किया होगा पर बता नहीं रहा.. कविता को पिंटू इतना चाहता था की हर वक्त उसकी फिक्र लगी रहती.. पीयूष से बात करके वो बाहर निकल गया.. पीयूष ने भी चैन की सांस ली.. वो थोड़ी देर अकेला रहना चाहता था..

उदास होकर पीयूष कुर्सी पर बैठ गया.. चपरासी ने पानी का ग्लास उसके टेबल पर रखा और चला गया..

पिंटू ने बाहर जाकर कविता को फोन किया और उससे पूछा.. कविता का जवाब सुनकर वो चकित रह गया.. कविता ने कहा की उसके और पीयूष के बीच सब सही चल रहा था.. और घर पर आज कोई झगड़ा भी नहीं हुआ था.. फिर पीयूष झूठ क्यों बोला? शातिर दिमाग वाले पिंटू को ये शक होने लगा की पीयूष जरूर कोई ऐसे कारणवश परेशान था जो अनैतिक या असामाजिक हो.. पर आखिर कारण होगा क्या? पिंटू उसके ऑफिस का साथी और दोस्त भी था.. पर जब तक पीयूष असली कारण नहीं बताता उसकी मदद कर पाना मुमकिन नहीं था.. पिंटू ऑफिस में अपने काम में व्यस्त हो गया..

मौसम से बात करने के बाद बहोत उदास था पीयूष.. उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था.. दोपहर के बाद उसने राजेश सर से आधे दिन की छुट्टी मांग ली और ऑफिस से निकल गया..

ऑफिस के बाहर निकल तो गया पर कहाँ जाए ये तय नहीं कर पा रहा था.. बाइक को ऑफिस पर ही छोड़कर वो सड़क पर चलता गया.. घर तो जाना नहीं था.. क्या करता इतनी जल्दी जाकर?? मौसम के खयालों में खोया हुआ वो चलता जा रहा था और उसे पता भी नहीं चला की कब रेणुका की गाड़ी उसके करीब से होकर गुजर गई..

गाड़ी थोड़ी सी आगे जाने पर रेणुका ने रिवर्स ली और पीयूष को रोकते हुए कहा "हाई हेंडसम.. कहाँ भटक रहा है मजनू की तरह?? "

पीयूष चोंक गया "अरे मैडम आप? मैंने आज ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ली है.. थोड़ा सा काम था इसलिए.. वैसे आप यहाँ कैसे?"

"बातें बंद कर और गाड़ी में बैठ जा.. फिर मैं बताती हूँ की कहाँ जा रही हूँ.. कार में बैठकर भी तो बात हो सकती है"

पीयूष थोड़े संकोच के साथ रेणुका की गाड़ी में बैठ गया.. जैसे ही वो बगल में बैठ रेणुका ने पीयूष की जांघ पर हाथ रखते हुए कहा "दरअसल में ऐसे ही सैर-सपाटे के लिए निकली हूँ.. घर पर बैठे बोर हो रही थी.. तू मानेगा नहीं.. मैंने आज ही तुझे याद किया था"

"क्या बात है.. !! चलो अच्छा हुआ.. कोई तो है जो मुझे याद कर रहा है.. वैसे याद क्यों आई थी मेरी?" पीयूष के दिमाग में अभी भी मौसम को लेकर कड़वाहट थी..

रेणुका ने पीयूष की जांघ को सहलाते हुए कहा "अरे यार.. दोपहर बैठे बैठे इतनी बोर हो गई थी.. तभी मुझे विचार आया की जैसे उस दिन राजेश ने तुझे पैसे लेने घर भेजा था वैसा ही कुछ आज भी हो जाए तो मज़ा आ जाए"

पीयूष हंसने लगा "अच्छा अच्छा.. उस दिन आपके घर पचास हजार लेने आया तब जो हुआ था उसकी बात कर रही है आप"

धीरे धीरे रेणुका ने पीयूष की जांघ को दबाना शुरू कर दिया.. कार के ए.सी. की ठंडी हवा.. और साथ में रेणुका के जिस्म से आ रही परफ्यूम की मादक खुशबू.. पीयूष एक ही पल में मौसम को भूल गया

"बोल.. गाड़ी किस तरफ घुमाऊ?? कहाँ जाना है तुझे? तूने अभी कहा ना की किसी काम के लिए निकला है!!" निर्दोष भाव से रेणुका ने पूछा.. रेणुका को पता नहीं था की पीयूष ऐसे ही भटक रहा था और उसे कहीं जाना नहीं था.. दोनों बिना मंजिल के मुसाफिर थे.. अजीब बात यह थी की ऐसे दो मुसाफिरों के मिलने से अब उनकी मंजिल तय हो रही थी

"अब बोल भी दे.. कहाँ जाना है तुझे?" रेणुका रोमांचित हो गई थी.. पीयूष की कंपनी यूं अचानक मिल जाने से.. शरारती अंदाज मे रेणुका ने अपना पल्लू थोड़ा सा हटा दिया.. इस तरह हटाया की साइड से पीयूष को उसके स्तनों की गोलाई नजर आ सके..

"दरअसल मुझे कोई काम नहीं था.. ऑफिस में बोर हो रहा था तो बाहर टहलने निकल गया.. आपको गाड़ी जहां लेनी हो ले जाइए"

"ये आप-आप क्या लगा रखा है?? याद है ना.. उस दिन जब तू पैसे लेने घर आया तब हम कितने करीब आ गए थे!! जब हम अकेले हो तब मुझे "तू" कहकर ही पुकारा कर.. आप-आप कहता है तो ऐसा लगता है जैसे मैं कोई बूढ़ी हूँ.. " रेणुका ने पीयूष को रिझाना शुरू कर दिया.

पीयूष रास्ते से गुजर रही गाड़ियों को देख रहा था.. उसने रेणुका की बात का कोई जवाब नहीं दिया..

रास्ते पर इधर उधर देख रहे पीयूष की जांघ पर चिमटी काटते हुए रेणुका ने कहा "कहाँ देख रहा है तू? पहले कभी गाड़ियां देखी नहीं है क्या? यहाँ तेरे बगल में, मैं बैठी हूँ और तू मुझे देख नहीं रहा.. !! देख.. तेरी पसंदीदा चीज दिखाने के लिए मैंने पल्लू भी सरका दिया है.. "

पीयूष ने रेणुका के स्तनों की तरफ देखा.. ब्लाउस में कैद उन अद्भुत गोलाइयों को वो देखता ही रह गया.. उसके चेहरे पर अब शैतानी मुस्कुराहट आ गई..

"याद है वो दिन.. तेरे घर के पीछे.. जब तू मेरे स्तन को चूसने के लिए गिड़गिड़ा रहा था.. " रेणुका ये सब बातें करते हुए पीयूष को उत्तेजित करना चाहती थी.. "अब आज मैं सामने से तुझे कह रही हूँ तो इंतज़ार क्यों कर रहा है!! अभी हम दोनों अकेले है.. चल आज गाड़ी में ही दोपहर को रंगीन बना देते है" खुला आमंत्रण दे दिया रेणुका ने.. पीयूष की जांघ पर घूमते हुए उसके हाथ ने उसका लंड पकड़ लिया..

शीला भाभी की सहेली होने के नाते पीयूष से पहचान हुई थी.. तब से लेकर बेडरूम तक का सफर पीयूष याद करने लगा.. मौसम के नाम की उदासी मन से हटाते हुए उसने रेणुका पर अपना सारा ध्यान केंद्रित किया.. अपने लंड पर रेणुका के हाथ को पीयूष ने दबा दिया.. लंड का टोपा हाथ में आते ही गाड़ी ड्राइव कर रही रेणुका ने पीयूष को तिरछी नज़रों से देखा.. "वाह.. इसे कहते है असली हथियार.. !! जो एक बार छूते ही तैयार हो जाए.. !!" हँसते हुए रेणुका ने वापिस ड्राइविंग पर अपना ध्यान केंद्रित किया..

गाड़ी धीरे धीरे सरकती हुई शहर से बाहर निकलकर हाइवे पर आ पहुंची.. दोपहर का समय था.. इक्का-दुक्का ट्रक के सिवा.. रोड पर कोई नजर नहीं आ रहा था.. पीयूष ने चैन खोलकर अपना लंड बाहर निकाला..और रेणुका के हाथों में उसे थमाते हुए.. ब्लाउस के ऊपर से उसके गोल स्तनों को मींजने लगा..


crcr2

"आह्ह.. बेशर्म.. इसे अंदर रख.. भरी दोपहर में.. खुली सड़क पर बाहर निकाल कर बैठा है.. गाड़ी को बेडरूम समझ रखा है क्या?? और छाती से हाथ हटा.. " औरतों की ये बड़ी तकलीफ है.. जब से उन्हें पता चल गया है की सेक्स की दौरान उनकी आनाकानी करना मर्दों को बेहद पसंद है.. तब से वो हर ऐसे मौके पर झूठी झिझक का प्रदर्शन करती रहती है.. पैसों के लिए अपनी चूत फड़वाती रंडियाँ भी लंड चूसने के नाम पर पहले तो मना ही करती है.. फिर थोड़ी सी आनाकानी के बाद लोलिपोप की तरह चुसेगी भी और गांड भी मरवाएगी.. नखरे करना स्त्री जाती का जन्मसिद्ध हक होता है.. वेश्या का तो सिर्फ उदाहरण दिया है.. ये बात सब पर लागू होती है..

चौड़े हाइवे पर नकली शर्म का झण्डा पकड़कर रेणुका ने पीयूष को धमका तो दिया पर हाथ से उसका लंड नहीं छोड़ा.. सख्त लकड़े जैसा हो गया था पीयूष का लंड.. जैसे जैसे उसकी कोमल हथेली उसके साथ खेलती गई.. वैसे वैसे पीयूष का लंड इस्तेमाल के लिए तैयार होने लगा.. रास्ते पर एक सुमसान जगह पर रेणुका ने पेड़ की छाँव में गाड़ी रोक दी..

गाड़ी को रोककर रेणुका ने पीयूष को गिरहबान से पकड़कर चूम लिया.. और फिर नीचे झुककर उसके लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी..डर डर कर ये सब करने में मज़ा नहीं आया.. वो बोली "ओह्ह पीयूष.. देख तो यार.. ये तेरा डंडा.. इसे देखकर मुझे नीचे मीठी खुजली होने लगी है.. यहाँ और कुछ तो हो नहीं सकता.. क्या करें? मेरे घर चलें?"


cr3cr4

पीयूष: "मैं ऑफिस से बहाना बनाकर निकला हूँ.. आपके घर कोई देख लेगा तो प्रॉब्लेम हो जाएगा.. कहीं और चलें?"

रेणुका: "और तो कहाँ जा सकते है? गेस्टहाउस में जाने से मुझे डर लगता है.. कहीं पुलिस की रेड पड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे.. मेरे घर जैसी सेफ जगह और कोई नहीं है"

थोड़ा सोचने के बाद पीयूष मान गया "ठीक है.. चलो तुम्हारे घर ही चलते है.. मुझसे भी अब रहा नहीं जाता"

रेणुका ने तुरंत यु-टर्न लिया और घर के तरफ गाड़ी घुमाई.. शहर के अंदर गाड़ी घुसते ही दोनों संभल संभलकर एक दूसरे को छेद रहे थे.. पर जैसे ही ट्राफिक बढ़ा.. दोनों शरीफ बनकर चुपचाप बैठ गए..

गाड़ी रेणुका के घर के पास पहुँच ही गई थी की तब..

रेणुका: "मर गए.. !! राजेश की गाड़ी घर पर.. !!! इस वक्त.. !!" दोनों की उत्तेजना एक ही पल में हवा बन कर उड़ गई

"पीयूष, तू यहीं उतर जा.. मैं तुझे फोन करूँ उसके बाद ही घर आना.. आधे घंटे में अगर मेरा फोन न आए तो घर चले जाना.. किसी और दिन करेंगे" कहते हुए रेणुका ने पीयूष को घर से थोड़े दूर ड्रॉप किया

अपने घर के पार्किंग में गाड़ी लगाकर रेणुका ने सब से पहले साड़ी और ब्लाउस को ठीक किया.. मिरर में देखकर ये तसल्ली कर ली की सब ठीक था या नहीं.. पीयूष से किस करने के कारण खराब हो चुकी लिपस्टिक को फिर से लगा दिया..

पल्लू को ठीक करते हुए जब वो घर के अंदर पहुंची तब राजेश बैठकर पैसे गिन रहा था..

"अरे राजेश तू यहाँ? इस वक्त? सब ठीक तो है ना..!! मैं अकेले बोर हो रही थी तो थोड़ी देर के लिए घूमने चली गई थी"

"हाँ यार.. मुझे एक पार्टी को पेमेंट करना था.. और पैसे थोड़े कम पड़ रहे थे.. आज पीयूष भी छुट्टी पर है इसलिए मुझे आना पड़ा.. "

रेणुका को अपनी किस्मत पर गुस्सा आ रहा था.. पीयूष ने अगर छुट्टी न ली होती तो राजेश उसे ही पैसे लेने भेजता और वो आराम से अपनी आग बुझा पाती.. चलो.. जो हुआ सो हुआ

"तू आराम से पैसे गिन.. मैं चाय बनाकर लाती हूँ" कहते हुए रेणुका किचन में चली गई

किचन में आते ही उसने पीयूष को फोन किया.. और कहा की वो उनके घर से थोड़ा दूर चला जाए.. ताकि ऑफिस जाते वक्त राजेश की नजर न पड़े.. उसके जाने के बाद.. ग्रीन सिग्नल मिलते ही वो घर आ जाए

पर पीयूष ने ये कहते हुए इनकार कर दिया की काफी देर हो चुकी थी इसलिए वो वापिस जा रहा था.. उसे अभी ऑफिस से बाइक भी लेनी थी..

एक मस्त सेटिंग होते होते रह गया.. इस अफसोस के साथ पीयूष ऑटो में ऑफिस की ओर निकल गया.. असल में.. अकेले पड़ते ही उसे फिर से मौसम की यादों ने घेर लिया था.. और फिर उसका मूड ऑफ हो गया इसलिए उसने रेणुका को मना कर दिया था.. अपनी बेकार किस्मत को कोसते हुए वो बाइक लेकर घर पहुंचा.. घर आकर मोबाइल को चार्जिंग में रखते हुए उसने देखा की मौसम के दस मिसकॉल आ चुके थे.. अरे बाप रे.. ये रेणुका के चक्कर में फोन साइलेंट किया था तो पता ही नहीं चला.. !! मौसम क्या सोच रही होगी?? मेसेज करूँ की नहीं? उसे मेसेज करते हुए कविता ने देख लिया तो?? तभी सामने से कविता को पानी का ग्लास लेकर आता हुआ देख.. पीयूष ने मोबाइल से मौसम के सारे कॉल डिलीट कर दीये..

पानी का ग्लास पीयूष को देते हुए कविता ने कहा "मौसम का फोन था.. कह रही थी की जीजू को बहोत बार फोन लगाए पर उन्होंने रिसीव नहीं कीये.. उससे कुछ बात करनी थी.. कुछ काम था तेरा.. "

"अरे हाँ यार,.. मैं मीटिंग में बिजी था इसलिए फोन उठा नहीं पाया.. " झूठ बोल रहा था पीयूष.. किस प्रकार की मीटिंग थी वो तो सिर्फ वो जानता था या रेणुका..

तभी अनुमौसी बाहर आए "बेटा.. शीला को फोन तो कर.. पूछ उसे की कब आ रही है? वहाँ की क्या खबर है? वैशाली बेचारी उसके पति से तंग आ गई है..बात कर और बता"

"हाँ मम्मी.. कपड़े बदलकर फ्रेश हो जाऊँ.. फिर फोन करता हूँ"

कपड़े बदलकर वो फोन लेकर मौसी के रूम मे गया जहां वो बैठे बैठे भजन सुन रही थी.. पीयूष ने शीला को फोन लगाया पर उसने उठाया नहीं.. फिर उसने मदन को लगाया.. पर उसका फोन आउट ऑफ कवरेज था.. अब क्या करूँ? वैशाली को फोन लगाऊँ??

मौसी: "हाँ वैशाली को लगा.. पता तो चलें.. कुछ उल्टा सीधा तो नहीं हुआ वहाँ.. कोई फोन लग क्यों नहीं रहा?"

पीयूष ने वैशाली को फोन लगाया तो किसी पुलिस वाले ने उठाया.. बात करने के बजाए वो पुलिस वाला पीयूष को धमकाने लगा.. अब बंगाली भाषा में वो क्या पूछ रहा था, पीयूष की कुछ समझ में नहीं आ रहा था.. फिर पीयूष के कहने पर उसने हिन्दी में बात की.. सुनकर स्तब्ध हो गया पीयूष.. काफी देर तक फोन चला.. अनुमौसी और कविता भी टेंशन में आ गए.. दोनों को शक था की कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ हुई थी वहाँ.. अनुमौसी का शक सही निकला..

"ओके ओके सर.. !!" कहते हुए पीयूष ने फोन काट दिया.. उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी..

"क्या हुआ ये तो बता?? कौन था फोन पर? तू इतना घबराया हुआ क्यों है? बता न पीयूष? कुछ बोल क्यों नहीं रहा.. वैशाली को कुछ हुआ क्या? या शीला भाभी को?" मौसी और कविता ने प्रश्नों की लाइन लगा दी

आखिर पीयूष ने कहा "मम्मी, संजयकुमार और मदन भैया का जबरदस्त झगड़ा हुआ था.. और संजय ने शीला भाभी और मदन भैया को शिकायत दर्ज कर जैल में बंद करवा दिया है.. वैशाली ने खुदकुशी करने की कोशिश की थी.. और फिलहाल वो अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है.. !!"

"अरे बाप रे.. !!" सुनकर अनुमौसी थरथर कांपने लगी.. और कविता तो वैशाली के बारे में सुन कर रोने लग गई..

"शीला का दामाद है ही एक नंबर का कमीना.. बेचारी फूल सी वैशाली का जीवन बर्बाद कर दिया उसने.. " मौसी ने कहा

"पीयूष.. मुझे वैशाली से बात करनी है" कविता ने जिद पकड़ ली..

इस गंभीर चर्चा के दौरान, मौसम का कॉल आया.. पीयूष फोन पर बात करने की स्थिति में नहीं था.. इसलिए मौसी ने फोन उठाया और थोड़ा बहोत बता कर फोन काट दिया..

कविता को विचार आया "पीयूष.. यहाँ के पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर, मदन भैया के दोस्त है.. तू उनसे जाकर मिल.. वो इस बारे में जरूर कुछ मदद करेंगे" वैशाली ने जाने से पहले.. कविता को सब बातें बताई थी इसलिए कविता को इस बारे में मालूम था.. कविता ने वो सारी बात बताई और ये भी बताया की उन्होंने ही संजय को जैल में बंद किया था

"अरे पर उस इंस्पेक्टर का नंबर मैं लाऊँ कहाँ से? मुझे तो पुलिस के नाम से ही डर लगता है.. !!" पीयूष ने कहा.. उसकी बात भी सही था.. सीधा साधा आदमी पुलिस स्टेशन में जाने से पहले सौ बार सोचेगा.. निर्दोष होने के बावजूद एक विचित्र सा डर लगता है पुलिस से..

पर बात आखिर वैशाली की थी.. और शीला भाभी की भी. बड़े एहसान थे शीला के पीयूष पर.. जो सिर्फ वो दोनों ही जानते थे.. शीला भाभी और वैशाली के लिए अब साहस करना पड़ेगा.. ये सोचकर पीयूष तैयार हो गया

कविता: "तू डर मत पीयूष.. मैं भी चलूँगी तेरे साथ पुलिस स्टेशन.. अगर अकेले जाने में तुझे डर लग रहा हो तो.. कुछ भी हो जाए.. इस स्थिति में हमें शीला भाभी, मदन भैया और वैशाली की मदद तो करनी ही चाहिए.. वैशाली वहाँ मौत के सामने झुझ रही हो और हम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठ कैसे सकते है.. !!" जबरदस्त हिम्मत दिखाते हुए कविता ने कहा

अनुमौसी: "कविता.. आज पीयूष के पापा लौटने वाले है तो मैं घर पर ही रहूँगी.. तुम दोनों आज शीला के घर सो जाना.. "

कविता: "ठीक है मम्मी जी.. चल पीयूष.. हम शीला भाभी के घर ढूंढते है.. हो सकता है डायरी से उस इंस्पेक्टर का नंबर मिल जाएँ.. !!"

"ठीक कह रही हो तुम.. " पीयूष ने हामी भरी और दोनों शीला के घर जा पहुंचे..

यहाँ-वहाँ ढूँढने के बाद पीयूष को टीवी के पास फोन-डायरी दिखाई दी और उसकी आँखों में चमक आ गई.. पर काफी ढूँढने के बाद भी इंस्पेक्टर का नंबर नहीं मिला..

तभी पीयूष के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मेसेज आया.. किसने भेजा होगा? और ये किसका नंबर है?

कागजों के बीच नंबर ढूंढ रही कविता को अपना फोन दिखाते हुए पीयूष ने कहा "कविता, ये देख.. मेरे मोबाइल पर किसी अनजान व्यक्ति ने एक नंबर भेजा है.. क्या करूँ?"

"अरे सोच मत.. और फोन लगा.. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा.. !! रोंग नंबर कहकर फोन काट देगा.. !! तू लगा फोन" कविता ने कहा

काफी विचार करने के बाद पीयूष ने वो नंबर लगाया.. चार पाँच रिंग के बाद किसी ने फोन उठाया और कडक आवाज में कहा

"हैलो.. इंस्पेक्टर तपन देसाई स्पीकिंग.. !!"

"स..स.. सर.. मैं पीयूष बोल रहा हूँ" बोलते हुए भी पीयूष की फट रही थी

"कौन पीयूष? मैं किसी पीयूष को नहीं जानता.. टू ध पॉइंट बात करो.. क्या काम है??" एकदम खुरदरे टोन में इंस्पेक्टर ने कहा

"सर.. मैं आपके दोस्त मदन भैया का पड़ोसी हूँ"

"आपको कैसे पता की मैं मदन का दोस्त हूँ?" पुलिस वालों की फितरत होती है.. किसी बात को सीधे स्वीकार ही नहीं करते

"सर मेरी वाइफ कविता और मदन भैया के बेटी वैशाली दोनों अच्छी सहेलियाँ है.. और मुझे वैशाली के बारे में अर्जन्ट बात करनी थी.. फोन पर करू या वहाँ आकर आप से मिलूँ? दरअसल मदन भैया और शीला भाभी बहोत बड़ी मुसीबत में है.. और आप चाहें तो उनकी हेल्प कर सकते है"

"हम्ममम.. तुम वहीं रुको.. मैं मदन के घर आता हूँ.. पंद्रह मिनट में.. !!"

"ओके ओके सर.. थेंक यू सर.. " पीयूष ने राहत की सांस ली और सोफ़े पर बैठ गया

"बात हो गई कविता.. वो यहाँ आ रहे है.. तू उनके लिए चाय बना.. और हाँ.. उनके सामने कुछ भी मत बोलना.. सारी बातें मैं ही करूंगा.. कहीं कुछ उल्टा सीधा मुंह से निकल गया तो प्रॉब्लेम हो जाएगा.. पुलिस वालों से सब बातें संभल कर करनी चाहिए.. एक बात के सौ मतलब निकालते है वो लोग.. और सुन.. दुपट्टा डाल ले.. वो पुलिसवाला तेरे बबले देखने नहीं आ रहा.. समझी.. अगर उसकी नजर पड़ गई तो किसी भी गुनाह के सिलसिले में तुझे थाने ले जाएगा और पूरी रात चूसता रहेगा!!"

"हट बदमाश.. !!" अपने स्तनों पर हाथ फेर रहे पीयूष का हाथ झटकाकर कविता ने भी सुना दी "अच्छा होगा ऐसा हुआ तो.. पूरी रात तक चूस सके ऐसा मर्द तो मिल जाएगा मुझे.. फिर मेरे भी शीला भाभी जीतने बड़े हो जाएंगे.. और तुझे पड़ोस में नजर मारनी नहीं पड़ेगी" वातावरण को नॉर्मल रखने के लिए दोनों हंसी-मज़ाक कर रहे थे..

तभी डोरबेल बजने की आवाज आई और दोनों सतर्क हो गए.. कविता दरवाजा खोलने जा ही रही थी तब पीयूष ने उसे इशारे से रोकते हुए खुद ही दरवाजा खोला.. ६ फिट की हाइट वाला एक तगड़ा पुलिस वाला घर में दाखिल हुआ.. पीयूष ने हाथ मिलाना चाहा पर इंस्पेक्टर ने कहा "जो भी बात हो जल्दी बताओ.. मैं एक दूसरे केस की तहकीकात के लिए निकला हूँ.. ज्यादा वक्त नहीं है मेरे पास"

पीयूष ने सारी बात इन्स्पेक्टर को बता दी.. कविता किचन में थी इस बात का पता इन्स्पेक्टर को नहीं था.. सुनते ही इंस्पेक्टर का पारा चढ़ गया

"एक नंबर का मादरचोद है मदन का दामाद.. भेनचोद को मैंने दया खाकर छोड़ दिया वो बड़ी गलती कर दी.. उसकी तो बहन को चोदूँ.. ऐसा केस बनाऊँगा की उसकी साथ पुश्तें जैल की चक्की पिसेगी.. !!"

इंस्पेक्टर की भाषा सुनकर कविता किचन में शर्म से लाल हो गई.. ये पुलिस वाले कितनी गंदी भाषा बोलते है.. !! बिना गाली के क्या बात नहीं हो सकती?? मन ही मन पुलिसवालों के प्रति तिरस्कार के भाव से वो चाय उबालने लगी.. चाय तैयार होते ही दो कप में भरकर वो ड्रॉइंग रूम मे आई

इंस्पेक्टर कविता को देखकर ही सहम गया.. वैसे उनकी कोई गलती नहीं थी.. उन्हें कहाँ पता था की कविता अंदर थी.. !! और जो गालियां उसने दी थी वो संजय को दी थी.. इसलिए वो निश्चिंत थे..

"आई एम सॉरी मैडम.. लगता है आप इनकी वाइफ हो.. माफ करना.. बेवजह आपको मेरी गालियां सुननी पड़ी..पर क्या करें.. !! हमारा काम है ही ऐसा.. दिन रात गुनहगारों से पाला पड़ता है.. और वो सब यहीं भाषा समझते है.. इसलिए आदत हो चुकी है.. मेरी वाइफ भी अक्सर टोका करती है की घर पर मैं सभ्य भाषा में बात करूँ.. पर आदत से मजबूर हूँ.. छोड़िए वो सब.. पर आपने ये सब मुझे बताकर अच्छा किया.. अब आप चिंता मत कीजिए और घर जाइए.. बाकी सब मुझ पर छोड़ दीजिए.. मैं संभाल लूँगा"

कविता: "सर.. वैशाली मेरी खास सहेली है.. उसने खुदकुशी करने की कोशिश की है.. अभी उसकी हालत कैसी है ये जाने बगैर मुझे चैन नहीं पड़ेगा.. आप जरा पूछिए ना.. हमें तो कोई जवाब ही नहीं देगा.. !!"

"ओके.. रुकिए एक मिनट.. !!" कहते ही इन्स्पेक्टर ने किसी को फोन लगाया और सारी बात की "थोड़ी देर में सब पता चल जाएगा.. मैं आप को फोन करके बता दूंगा.. क्या नाम बताया था आपने.. मिस्टर पीयूष.. आपका नंबर तो है ही मेरे पास.. मुझे एक दूसरे जरूरी काम से जाना होगा फिलहाल" कहते हुए वो निकल गए..

पीयूष और कविता के दिल से बड़ा बोझ उतर गया.. मामला अब पुलिस के हाथ में था इसलिए उन्हें अब चिंता नहीं थी.. अपनी जिम्मेदारी निभाने का संतोष भी हुआ

पीयूष: "वैशाली को कुछ न हुआ हो तो अच्छा है.. बेचारी की ज़िंदगी हराम हो गई है"

कविता: "एक नंबर की पागल है वो.. खुदकुशी करने की क्या जरूरत थी.. !! उस भड़वे को ही खतम कर देती.. !!"

पीयूष: "कहना आसान है कविता.. पर घर से हजारों किलोमीटर दूर अकेली लड़की पर जब गुजरती है ना तब ऐसी हिम्मत नहीं होती.. "

इन्स्पेक्टर बिना चाय पियें चले गए.. इसलिए पीयूष और कविता ने मिलकर चाय खत्म की.. तभी लेंडलाइन की रिंग बजी.. उत्सुकतावश पीयूष ने फोन उठाया.. अनुमौसी का फोन था.. यहाँ का हाल जानने के लिए फोन किया था.. पीयूष ने सारी बात बताई तब मौसी के दिल को ठंडक मिली

पीयूष को एक ही विचार बार बार सता रहा था.. अगर वैशाली को कुछ हो गया.. तो मदन भैया संजय का खून कर देंगे.. और उन्हों ने ऐसा कुछ कर दिया तो शीला भाभी का जीवन नष्ट हो जाएगा.. मदन का गुस्सा बड़ा ही खराब था इस बात का पीयूष को पता था.. गुस्से में आदमी का दिमाग काम नहीं करता और वो सही और गलत की परख भूल जाता है.. और बात जब अपनी संतान की हो तो किसी भी बाप को गुस्सा आना लाज़मी था..

कविता और पीयूष एक दूसरे से लिपटकर शीला के बिस्तर पर सो गए.. आधी रात को लगभग तीन बजे पीयूष के मोबाइल की रिंग बजी.. वैशाली के बारे में कोई कॉल आया होगा सोचकर पीयूष ने फोन उठाया.. सामने से कोई अंग्रेजी में बात कर रहा था

"यस सर.. ओके सर.. आई सी.. " पीयूष का चेहरा गंभीर हो रहा था.. सामने से फोन कट हो गया.. पीयूष स्तब्ध होकर दीवार पर टंगी वैशाली की तस्वीर को देखता ही रहा.. फ़ोटो में वैशाली मुस्कुराकर पीयूष को छेड रही हो ऐसा एहसास हो रहा था पीयूष को.. आँखों में आँसू आ गए पीयूष के.. बचपन से लेकर आज तक की सारी बातें याद आ गई.. वो सारे पल जो उन्हों ने साथ बिताए थे.. उस खंडहर में रेत के ढेर पर किया हुआ संभोग भी.. हाथ जोड़कर उसने मन ही मन प्रार्थना की.. "हे भगवान.. वैशाली की रक्षा करना.. बचा लेना उसे.. !!"

कविता तो नींद में थी.. पीयूष फोन पर बात कर रहा था फिर भी वो गहरी नींद सोती रही..

पीयूष ने कविता के कंधे पर हाथ रखकर उसे जगाने की कोशिश की.. आधी नींद से जागते हुए कविता ने पूछा "क्या हुआ पीयूष?"

"कलकत्ता से किसी का फोन आया था.. वैशाली ने खुदकुशी की कोशईह नींद की गोलियां खाकर की थी.. अभी फिलहाल वो होश में नहीं है और डॉक्टर उसकी जान बचाने की कोशिश कर रहे है"

"पर पीयूष.. तेरा नंबर उनके पास कैसे आया?" कविता ने पूछा

"पता नहीं.. हो सकता है वो इंस्पेक्टर ने दिया हो.. और तो ज्यादा कुछ नहीं बताया उन्हों ने.. अब तो वो इंस्पेक्टर से पता चलेगी आगे की सब बात..!! और हाँ ये भी बताया की मदन भैया और शीला भाभी जैल से छूट गए है और संजय फरार है.. पुलिस उसे ढूंढ रही है.. "

"तो तू मदन भैया का फोन ट्राय कर.. शायद लग जाए"

"हाँ.. ये भी सही है.. " कहते हुए पीयूष ने मदन को फोन लगाया.. एक ही रिंग में मदन ने फोन उठाया

"हैलो मदन भैया.. मैं पीयूष बोल रहा हूँ.. आप कैसे है? क्या हालात हैं वहाँ? वैशाली के बारे में सुनकर हम सब चोंक गए"

मदन: "यहाँ के हालात बिल्कुल ठीक नहीं है यार.. सब लोग बकवास है हाँ.. मैं यहाँ अकेला पड़ गया हूँ पीयूष.. ये तो अच्छा हुआ की इंस्पेक्टर तपन की पहचान से हम जैल से बाहर आ पाए.. पर यहाँ के लोगों ने तेरी भाभी के साथ बहोत बुरा बर्ताव किया.. सब कुछ वहाँ आकर बताऊँगा तुझे.. अब मैं यहाँ एक पल भी रुकना नहीं चाहता.. और वैशाली को भी यहाँ रहने नहीं दूंगा.. उसकी हालत बहोत नाजुक है.. " कहते हुए मदन की आवाज भारी हो गई.. वो आगे बात न कर सका "ले शीला से बात कर.. !!" कहते हुए उसने शीला को फोन थमा दिया..

कविता ने पीयूष के हाथ से फोन छीन लिया..

शीला: "हैलो? कविता.. मेरी वैशाली.. हे भगवान.. !!" कहते हुए शीला फुटफुट कर रोने लगी.. "हम बड़ी मुसीबत में फंस गए है कविता.. भगवान जाने क्या होगा हमारा.. !!"

कविता को पता नहीं चल रहा था की कैसे बात करें.. किस तरह शीला भाभी को सांत्वना दें.. अपने से बड़ी उम्र की व्यक्ति को दिलासा देना बड़ा ही कठिन होता है..

कविता: "भाभी.. आपने वैशाली को देखा?"

शीला: "अब तक नहीं देखा.. हम जैल से अभी अभी बाहर आए.. उस कमीने ने झूठी कंप्लेन करके हमे बंद करवा दिया था.. बड़ी मुश्किल से बाहर निकले.. हमें तो जैल में पता चला की वैशाली ने ऐसा किया था.. अब अस्पताल जा रहे है.. पता नहीं जिंदा भी या नहीं.. मेरी फूल जैसी बच्ची की ज़िंदगी नरक बन गई.. ये तो अच्छा हुआ की इंस्पेक्टर ने फोन किया.. वरना पता नहीं जैल में हमारा क्या होता.. !!"

कविता: "आप चिंता मत कीजिए भाभी.. वैशाली ठीक हो जाएगी.. मैंने मन्नत मांग ली है.. मुझे विश्वास है की उसे कुछ नहीं होगा.. "

शीला: "हाँ कविता.. ईश्वर करें की ऐसा ही हो.. मैं फोन रखती हूँ अब.. !!"

कविता: "ठीक है भाभी.. और आप चिंता मत कीजिए.. इंस्पेक्टर के जरिए हमें सारे समाचार मिलते रहेंगे.. "

शीला: "हाँ कविता.. भला हो उस इंस्पेक्टर का जिसकी बदौलत हम छूट गए.. जैल में इन हरामजादों ने हमारे साथ क्या क्या किया.. वो सब वहाँ आकर बताऊँगी तुझे.. "

पीयूष को बहोत दुख हो रहा था.. सुख के समय वो हमेशा शीला भाभी के साथ थी.. अब तकलीफ के वक्त वो उनके साथ नहीं था उस बात का उसे बेहद अफसोस हो रहा था.. सीधी-साधी औरतों के लिए पुलिस स्टेशन में रहना.. और वो भी लॉकअप में.. उन पर क्या बीती होगी.. सोचकर ही पीयूष के रोंगटे खड़े हो रहे थे..

फोन रखकर कविता रोने लगी.. बड़ी ही मुश्किल से पीयूष ने उसे शांत किया.. आखिर दोनों थककर सो गए.. उन्हें सोये हुए एकाध घंटा हुआ होगा तभी डोरबेल बजी.. जागकर पीयूष ने दरवाजा खोला.. आज रसिक के बदले रूखी दूध देने आई थी..


RUKHI6

रूखी का अद्भुत सौन्दर्य देखकर पीयूष की सारी नींद उड़ गई.. एक पल के लिए उसे लगा की वो सपना देख रहा था और उसी सपने में ये अप्सरा आ गई.. रूखी के भव्य जोबन से पीयूष की नजर ही नहीं हट रही थी.. साढ़े पाँच बजे हर मर्द नींद में होता है पर उसका हथियार जागा हुआ होता है.. पीयूष का भी यही हाल था जब वो जागा..

पीयूष की शॉर्ट्स में उसका लंड उभार बनाते हुए रूखी को छूने की कोशिश कर रहा था.. जिसे बड़ी मुश्किल से पीयूष ने संभाले रखा था.. रूखी इस बात से अनजान थी.. उसने चुपचाप दूध दिया.. पर पीयूष की नजर उसके स्तनों पर थी इस बात से रूखी बेखबर तो नहीं थी.. अपने पल्लू को ठीक करते हुए वो खड़ी हो गई.. पर पतले से पल्लू के पीछे इतने बड़े स्तन भला कैसे छुपते?? उसकी ज्यादातर गोलाइयाँ आराम से नजर आ रही थी.. छोटी से चोली में दबाए हुए उस स्तनों का ५० प्रतिशत हिस्सा तो ऊपर से नजर आ रहा था.. पीयूष ने अंदाजा लगाया.. रूखी के दोनों स्तनों के बीच की लकीर कम से कम दस इंच लंबी थी.. बाप रे.. !! पीयूष का रोम रोम उत्तेजित हो गया ये देखकर..

पीयूष की नज़रों से रूखी शरमा गई.. शीला भाभी के घर इस नए चेहरे को देखकर वो अचंभित थी.. एक बार के लिए उसने सोचा की भाभी के पट्टी होंगे जो विदेश से लौटे थे.. पर पीयूष की उम्र देखकर वो खयाल भी रिजेक्ट हो गया.. ये था कौन? शीला भाभी का बेटा? पर उन्हें तो सिर्फ एक बेटी ही है.. !! तो ये कौन होगा? जरूर कोई मेहमान होगा.. सोचते सोचते रूखी वापिस लौट रही थी..

रूखी के हर कदम के साथ लयबद्ध तरीके से मटकते कूल्हों को और लचकती कमर को.. पीछे से देखता ही रहा पीयूष.. ऐसा रूप उसने जीवन में पहले कभी देखा नहीं था.. वाह.. !! ये तो शीला भाभी से भी बढ़कर है.. इतना सौन्दर्य? इन सब बातों से अनजान रूखी लटक-मटक चलते हुए निकल गई.. उसके जाने के बाद भी पीयूष मूर्ति की तरह दरवाजे पर खड़ा रहा.. उसके पैर फर्श पर जैसे चिपक गए थे.. रूखी के रूप से प्रभावित होकर वो दूध रखने किचन में गया तब कविता जाग गई.. और वो अपने घर चली गई.. सुबह के काम निपटाने.. पीछे पीछे पीयूष भी ताला लगाकर अपने घर गया..
 
रूखी के हर कदम के साथ लयबद्ध तरीके से मटकते कूल्हों को और लचकती कमर को.. पीछे से देखता ही रहा पीयूष.. ऐसा रूप उसने जीवन में पहले कभी देखा नहीं था.. वाह.. !! ये तो शीला भाभी से भी बढ़कर है.. इतना सौन्दर्य? इन सब बातों से अनजान रूखी लटक-मटक चलते हुए निकल गई.. उसके जाने के बाद भी पीयूष मूर्ति की तरह दरवाजे पर खड़ा रहा.. उसके पैर फर्श पर जैसे चिपक गए थे.. रूखी के रूप से प्रभावित होकर वो दूध रखने किचन में गया तब कविता जाग गई.. और वो अपने घर चली गई.. सुबह के काम निपटाने.. पीछे पीछे पीयूष भी ताला लगाकर अपने घर गया..

एक ही दिन में कितनी सारी घटनाएं घट गई थी.. !! ऑफिस जाते जाते पीयूष सोच रही थी.. वैशाली के समाचार से उसका पूरा परिवार व्यथित था.. खासकर पीयूष और कविता को काफी सदमा पहुंचा था क्योंकि वो दोनों शीला भाभी और वैशाली के करीब थे.. और पीयूष तो माँ और बेटी दोनों को भोग चुका था.. कविता ने भी शीला भाभी के जिस्म की गर्माहट का लाभ उठाया था.. इसलिए पीयूष और कविता दोनों इस बात को लेकर काफी दुखी थे..

पीयूष के मन में बस एक ही विचार था.. यहाँ बैठे बैठे वो किस तरह शीला भाभी और मदन भैया की मदद करें.. उनके मन की स्थिति कैसी होगी? मदन भैया तो फिर भी अपने आप को संभाल लेंगे.. पर शीला भाभी का पुलिस स्टेशन में क्या हाल हुआ होगा?? उन्हें पुलिस की गंदी गालियां सुननी पड़ी होगी.. किसी ने उन्हें छेड़ा होगा तो.. !! शीला भाभी थी ही इतनी खूबसूरत की देखने वाले को एक पल में उत्तेजित कर दे.. भाभी से किसी ने ज्यादती तो नहीं की होगी?? विचारों में वो कब ऑफिस पहुँच गया उसे पता ही नहीं चला..

ऑफिस में जाते ही वह राजेश सर की केबिन में गया और उन्हें वैशाली के बारे में बताया.. राजेश सर को जबरदस्त धक्का लगा.. माउंट आबू की उस आखिरी मुलाकात के दौरान.. बियर के नशे में वैशाली ने उसे सब कुछ बताया तो था.. पर हालात इतने गंभीर होंगे उसका उसे अंदाजा नहीं लगा था तब.. राजेश ने तुरंत फोन करके रेणुका को ये समाचार दीये..

देखते ही देखते.. पूरी ऑफिस में ये बात फैल गई.. माउंट आबू की ट्रिप के कारण, ऑफिस के सभी कर्मचारी, वैशाली को जानते थे.. सब को इस बात का दुख हुआ.. राजेश सर भी बेहद अपसेट थे.. आबू में जिस तरह उनका कॉलर पकड़कर टॉइलेट के अंदर खींच लिया था.. उस नटखट चंचल वैशाली का चेहरा उनकी आँखों के सामने से हट ही नहीं रहा था.. इतनी अच्छी लड़की के साथ कुदरत ने ऐसा क्यों किया होगा? पति बेकार था इसमें वैशाली का क्या दोष? राजेश के स्टाफ के कर्मचारिओ ने वैशाली की दीर्घायु के लिए प्रार्थना की और फिर काम पर लग गए..

पूरा दिन पीयूष का मन काम में नहीं लगा.. उदास होकर वो शाम को जब घर पहुंचा तब अनुमौसी ने खुशखबरी दी "वैशाली को होश आ गया है और अब उसकी तबीयत काफी बेहतर है.. मदन और शीला उसे लेकर फ्लाइट से आ रहे है.. बाकी का ट्रीटमेंट यहीं किसी अस्पताल में करवाएंगे.. वहाँ उसे अकेली छोड़ना खतरे से खाली नहीं था.. वो इंस्पेक्टर दोस्त ने सारी जिम्मेदारी ली है और कहा है की पुलिस का सारा मैटर वो संभाल लेंगे.. "

अठारह घंटे के तनाव के बाद पीयूष के दिल को शांति मिली.. उसने तुरंत वैशाली को फोन किया.. वैशाली ज्यादा बात करने की स्थिति में तो नहीं थी.. पर वो ठीक है इतना कहकर उसने फोन रख दिया.. पीयूष से बात कर वैशाली को भी बहोत अच्छा लगा..

रात को शीला भाभी के घर सोने के लिए पीयूष और कविता गए.. मौसी का मन तो बहोत था जाने का पर चिमनलाल की उपस्थिति के कारण वो जा न पाई.. ऐसा मौका हाथ से जाने पर मौसी दुखी थी.. कल तो शीला वापिस आ जाने वाली थी.. आज की रात आखिरी थी.. पर क्या करती?? बिना बैटरी के मोबाइल जैसे चिमनलाल के साथ ही रात गुजारना उनके नसीब में था..

कविता और पीयूष शीला के घर सोने के लिए आए तो थे.. पर अब वैशाली का टेंशन खतम हो जाने से दोनों काफी हल्का महसूस कर रहे थे.. तनाव खतम होते ही कविता का जिस्म लंड लेने के लिए बिलबिलाने लगा.. रात के साढ़े ग्यारह का समय था.. कविता ने पीयूष के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी थी..


df

पीयूष: "क्या है यार?? बहोत खुजली हो रही है तुझे? इतनी रात को परेशान कर रही है.. !!"

कविता: "अरे जानु.. इतनी सुंदर पत्नी बगल में सो रही हो तब तो तुझे ऐसा सोचना चाहिए की काश.. ये रात खतम ही न हो.. !!"

पीयूष: "बात तो तेरी सही है जानु.. पर ये हमारा बेडरूम नहीं है.. शीला भाभी का है.. तेरी चूत के रस से उनकी चादर खराब करने का हमें कोई हक नहीं है"

कविता: "तो क्या हुआ..!! क्या मदन भैया और शीला भाभी कुछ करते नहीं होंगे?? और चादर को क्या पता की धब्बे शीला भाभी के है या मेरे?"

पीयूष: "अरे पगली.. मदन भैया कितने शौकीन है ये तुझे क्या पता.. घर का ऐसा कोई कोना नहीं होगा जहां उन्हों ने शीला भाभी को चोदा न हो.. पति पत्नी जब अकेले हो तब क्या क्या नहीं करते.. !! ऊपर से जब पत्नी शीला भाभी जैसी रंगीन हो तब तो और मज़ा आता है.. !!"

कविता: "तो क्या मैं रंगीन नहीं हूँ?? शीला भाभी के तारीफ़ों के पूल बांध रहा है.. कभी मेरी भी तारीफ किया कर.. " शीला भाभी की तारीफ सुनकर कविता के मन में ईर्ष्या के भाव जागृत हो गए.. बगल में खुद की बीवी नंगी सोई हो तब मर्द अगर दूसरी औरत की तारीफ करें तो जाहीर सी बात है की उसे बुरा लगेगा.. पर फिलहाल कविता की चूत को पीयूष के लंड का बेसब्री से इंतज़ार था इसलिए उसने ज्यादा नखरे नहीं किए.. अभी नखरे करती तो उसकी चूत भूखी मर जाती.. इसलिए कविता ने पीयूष को.. गिरफ्तार न करते हुए सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया..

पीयूष: "अरे मेरी जान.. तू तो रंगीन है ही.. मैं कहाँ मना कर रहा हूँ.. !! तेरी इस नशीली जवानी के जादू को बयान करने के लिए तो शब्द कम पड़ जाते है.. मेरी रानी.. !!" पुरुष सहज बुद्धि का प्रयोग कर पीयूष ने स्थिति को बिगड़ने से रोक लिया

कविता पीयूष की बातों से और गरम होकर उसकी छाती पर हाथ फेरने लगी.. पतले कपड़े से बने गुलाबी नाइट ड्रेस से झलकता हुआ जोबन.. कटोरी के बीचोंबीच उभरी हुई निप्पल.. और पतली सुंदर जांघों के बीच महक रही चूत.. पीयूष के लंड को नीलाम करने के लिए काफी थे..


bof

कविता: "मदन भैया इतने सेक्सी है क्या.. !! लगते तो बड़े सीधे है.." पीयूष के लंड को पकड़कर उत्तेजना पूर्वक मसलते हुए कविता ने पूछा

अचानक पीयूष की नजर कोने के टेबल पर पड़े लैपटॉप पर गई.. "कोई भी पुरुष कितना सीधा है.. ये अगर जानना हो तो उसका लैपटॉप चेक करना चाहिए..अभी मदन भैया की कुंडली देखकर बताता हूँ"

कविता: "हाँ हाँ.. चेक कर.. देखें तो सही.. भाभी और मदन भैया क्या गुल खिलाते है.. !!" कहते हुए कविता ने पीयूष का लंड छोड़ दिया ताकि वो लैपटॉप तक जा सके

छलांग लगाते हुए पीयूष खड़ा हुआ और लैपटॉप लेकर बेड पर आ गया.. ऑन करते ही लैपटॉप ने पासवर्ड मांगा.. अब क्या करें??

पीयूष लैपटॉप की बेग के अंदर ढूँढने लगा.. एक कार्ड पर नंबर लिखा था 13754.. ये नंबर डालते ही लैपटॉप खुल गया.. !!!

कंप्यूटर को चलाने में पीयूष एक्सपर्ट था.. यहाँ वहाँ ढूँढने से पहले.. उसने "My recent" का फ़ोल्डर ओपन करते ही उसकी आँखों में चमक आ गई.. वहाँ से उन्हों ने एक फ़ोल्डर खोला जिसमे कई देसी व विदेशी नग्न मोडेलों की तस्वीर और अश्लील वीडियोज़ की भरमार थी.. ये सारी फाइल्स को देखते हुए पीयूष की नजर एक फ़ोल्डर पर पड़ी जिसका नाम था "My Videos"..!!

वो फ़ोल्डर खोलते ही पीयूष और कविता दोनों अचरज में डूब गए.. काफी सारी विडिओ क्लिप थी.. एक क्लिप को ओपन करके देखा तो वो मदन की रियल क्लिप थी.. वो किसी फिरंगी औरत के स्तनों से दूध चूस रहा था.. स्तनों को दबा दबाकर उसका दूध अपने लंड पर लगा रहा था.. देखकर कविता के आश्चर्य और उत्तेजना की कोई सीमा न रही.. उसकी चूत में ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. मदन का खड़ा हथियार देखकर "आह्ह" कहते हुए वो सिसकने लगी..


stmstm2stm3

"ओ माँ.. बाप रे.. !!" कविता मदन को लंड हिलाता देख शर्म से पानी पानी हो गई.. उसकी नजर मदन के लंड से हट ही नहीं रही थी.. गला सूखने लगा था उसका.. पीयूष को पता चल गया की कविता की हालत ऐसी क्यों हो रही थी.. क्यों की जब शीला भाभी ने उसका लंड पकड़कर चूसा था तब उसकी भी हालत कुछ ऐसी ही हो गई थी..

उस गोरी अंग्रेज औरत और मदन दोनों विडिओ में नंगे थे.. पीयूष ने ढेर सारी ब्लू फिल्मों में विदेशी लड़कियों और औरतों को देखा था.. और जानता था की वे सब प्रोफेशनल और प्रशिक्षित होती है.. और उनके जिस्म के अंगों में सच्चाई कम और सिलिकॉन ज्यादा होता है.. पहली दफा वास्तविक बने विडिओ में अंग्रेज स्त्री के शरीर को देख रहा था.. तो दूसरी तरफ कविता मदन के जानदार लंड को टकटकी लगाकर देख रही थी.. वो अंग्रेज औरत इंग्लिश में कुछ बोल रही थी.. पर धीमी आवाज के कारण कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.. ये औरत कौन होगी यह पीयूष सोचता रहा और उसकी नजाकत, अंगभंगिमा और गदराया सौन्दर्य देख रहा था..

"आह्ह पीयूष.. बहुत हुआ.. अब कुछ कर.. मुझसे तो रहा ही नहीं जाता.. ये सब देखकर मेरी हालत खराब हो रही है.. " अपनी चूत की गर्मी सहन न होने पर कविता ने विनती की..


rup

"मुझे भी लगता है की विडिओ देखकर ही झड़ जाएगा.. कविता.. प्लीज यार.. मुंह में लेकर चूस दे एक बार.. देख ना.. ये औरत भी मदन भैया का कैसे चूस रही है.. !!" विडिओ में वो अंग्रेज औरत मदन का लंड पूरी तन्मयता और उत्तेजना से चूस रही थी.. साथ ही अपनी चूत में दो उँगलियाँ डालकर अंदर बाहर कर रही थी.. ये देखकर पीयूष ने कविता के दोनों बॉल दबाते हुए कहा "यह फिरंगी लोग अपनी हवस शांत करने के लिए कितने प्रयत्नशील होते है.. और यहाँ की औरतें.. शर्म का चोला उतारती ही नहीं.. और फिर जीवन भर तड़पती रहती है"

"तू अपना उपदेश बाद में देना.. " पीयूष की गोद से लैपटॉप हटाकर कविता खुद बैठ गई.. हाथ से पीयूष का लोडा पकड़कर अपनी चूत के मध्य में सेट करते हुए उसने अपना सारा वज़न रख दिया.. पहले से द्रवित हो चुकी बुर ने एक ही पल में पूरा लोडा गटक लिया.. लंड के घर्षण से कविता की चूत में खलबली मच गई.. और अपना द्रव्य छोड़ने लगी.. उस अमृत रस को पीकर पीयूष का लोंडा भी तरोताजा हो गया



pr1

दोनों उसी अवस्था में अपने गुप्तांगों के घर्षण का आनंद ले रहे थे तभी उनकी नजर बगल में पड़े लैपटॉप के स्क्रीन पर गई.. मदन उस फिरंगी औरत की चूत की परतों को अपनी उंगलियों से चौड़ा कर चाट रहा था.. क्लीन शेव गुलाबी गोरी चूत पर झांट का एक बाल न था.. देखते ही चाटने का मन करें ऐसी लुभावनी चूत थी.. और बीच का गुलाबी छेद.. आहाहाहा.. देखकर पीयूष और कविता की उत्तेजना दोगुनी हो गई.. हल्के हल्के पतवार मारते हुए कविता अपने स्तनों को पीयूष की छाती से रगड़ रही थी.. और साथ ही उसके गाल और होंठों को चूम रही थी

rd

धीरे धीरे अपनी नाव चलाते हुए वह बोली "पीयूष, ये औरत कौन होगी? जिसके साथ मदन भैया इतने मशरूफ़ होकर सेक्स कर रहे है? देखकर तो लगता है की ये कोई रांड तो नहीं है.. और दोनों एक दूसरे को अच्छे से जानते है.. माहोल भी किसी घर का ही लग रहा है.. " कविता ने पूछा.. पर इसका जवाब तो पीयूष के पास भी नहीं था

कविता के दोनों उरोजों को हल्के हल्के प्यार से मसाज करते हुए उसकी निप्पल खींचकर पीयूष ने कहा "क्या पता.. मैं भी वही सोच रहा था.. मदन भैया जिस तरह उसे भोग रहे है.. दोनों में जान पहचान तो होगी ही.. "

कविता: "पीयूष, तूने देखा?? उस औरत की छाती से तो दूध भी निकल रहा है.. मतलब उसे बच्चा होगा.. और डिलीवरी को भी ज्यादा समय नहीं हुआ होगा.. मतलब उसका पति भी होगा.. कहीं मदन भैया ने वहाँ जाकर दूसरी शादी तो नहीं कर ली इसके साथ?? और हो सकता है की वो बच्चा मदन भैया का ही हो.. !!" उस संभावना को सोचकर ही कविता कांप उठी

एक स्त्री कितना कुछ सोच सकती है.. !! कौन कहता है की औरतों की अक्ल उनके घुटनों पर होती है.. !! मर्दों से तो कई ज्यादा बुद्धि होती है औरतों में.. पर पुरुषों को इसका ज्ञान नहीं होता..

कविता की बात सुनकर पीयूष भी सोच में पड़ गया.. कविता की बात में दम था.. बड़ी तथ्यपूर्ण बात की थी उसने.. जरूर ऐसा हो सकता था

"नहीं यार.. ऐसा नहीं होगा.. मदन भैया दो सालों के लिए ही तो गए थे वहाँ.. इस दौरान इतना सब कुछ कैसे हो सकता है.. !! हो सकता है की दोनों के बीच नाजायज संबंध हो.. इतने लंबे समय तक बिना सेक्स के रहना तो असंभव सा है.. मदन भैया की भी जरूरतें होंगी.. और कविता.. तुम औरतों जितना धैर्य और सहनशक्ति मर्दों की नहीं होती.. अपनी बीवी को वफादार पति भी सुंदर लड़की देखकर पसीज जाता है.. अब तू ही सोच.. दो सालों तक मदन भैया बिना सेक्स के गुजार रहे हो.. तभी कोई स्लीवलेस टाइट टॉप पहनकर.. बड़े बड़े स्तन दिखाते हुए उनके सामने आ जाएँ.. तो वो बेचारे कैसे अपने आप को रोक पाएं.. !! और वैसे भी विदेश में सेक्स को लेकर काफी मुक्त विचारधारा होती है.. हो सकता है की वो स्त्री विधवा हो..या फिर तलाकशुदा.. विदेश में तो सिंगल मधर का भी काफी चलन है.. अगर हकीकत में मदन भैया ने उससे शादी कर ली होती तो क्या वो उन्हें भारत लौटने देती?" पीयूष ने अपना तर्क प्रस्तुत किया

अपनी कमर को हिलाते हुए पीयूष के लंड पर सवारी करती कविता ध्यान से पीयूष की बात सुन रही थी..


pat

दोनों चोद रहे थे और बातें कर रहे थे.. पर ध्यान तो लैपटॉप की स्क्रीन पर ही था.. तभी पीयूष ने अपना मोबाइल उठाया और मदन के लैपटॉप का पासवर्ड सेव कर लिया..

स्क्रीन पर मदन और वो औरत हंसकर बातें कर रहे थे और एक दूसरे के अंगों से खेल रहे थे.. वो स्त्री कुछ बोल रही थी.. लगभग पाँच मिनट तक दोनों की बातें चलती रही.. उस दौरान मदन ने उस औरत के स्तनों के बीच अपने लंड को दबाकर उन्हें चोदना शुरू कर दिया..


tf

पीयूष: "कविता.. यार ये विडिओ मेरे मोबाइल में सेव कर ले तो कैसा रहेगा.. !! फिर घर जाकर.. इयरफोन लगाकर हम इनकी बातें सुन पाएंगे.. हो सकता है की इनकी बातें सुनकर.. इनके संबंधों के बारे में कुछ पता चल जाए.. " पीयूष का ध्यान अब कविता को चोदने में काम और स्क्रीन पर ज्यादा था..

कविता ने थोड़ी सी नाराजगी के साथ कहा "ऐसा भी हो सकता है की उस फिरंगी औरत का पति चोदने में कम और कंप्यूटर पर क्लिप्स देखने में ज्यादा ध्यान देता होगा.. तभी वो मदन भैया के साथ ये सब कर रही होगी" पीयूष कविता की बात का कटाक्ष समझ गया.. और वैसे भी.. क्लिप को मोबाइल में ट्रांसफ़र करने के लिए केबल नहीं था.. इसलिए उसने लैपटॉप से ध्यान हटाकर कविता को ऑर्गजम देने पर ध्यान केंद्रित किया..

कविता तो पहले से ही गरमाई हुई थी.. मदन के लंड को देखकर वो और ज्यादा उत्तेजित हो चुकी थी.. मदन उस औरत के जिस्म से अपने मर्दाना शरीर को कामुकता पूर्वक रगड़ रहा था.. स्तनों के बीच से लंड हटाकर अब उसने अपना लाल सुपाडा उस फिरंगी के भोसड़े में डालकर धक्के लगाने शुरू कर दीये थे.. उस औरत का चेहरा उत्तेजना से लाल हो गया था.. और साथ ही कविता ने भी लंड पर कूदने की गति बढ़ा दी थी..


pff

उसकी हर उछाल के साथ स्तन भी उछल रहे थे.. पीयूष के लंड को कविता की चूत की मांसपेशियों ने इतनी मजबूती से जकड़ रखा था.. की शीला के बेडरूम में एक साथ चार चार ऑर्गजम हो गए.. कविता और पीयूष के साथ साथ.. स्क्रीन पर मदन और वो औरत भी झड़ चुके थे.. साथ ही लैपटॉप की बैटरी भी डिस्चार्ज होने से स्क्रीन भी बंद हो चुका था.. कविता के स्तन पीयूष की छाती से दबकर चपटे हो गए.. कविता को बाहों में भरते हुए पीयूष अपनी साँसों को नॉर्मल होने का इंतज़ार करने लगा.. उसका लंड अभी भी कविता की चूत में फंसा हुआ था.. आधे घंटे तक उसी अवस्था में पड़े रहने के बाद.. कविता धीरे से पीयूष के ऊपर से उतरी और बगल में लेट गई.. पिचक कर पीयूष का लंड बाहर निकल गया.. वीर्य और चूत रस से लसलसित लोडा उसके आँड पर मृत होकर गिर गया..

इतनी थकान के बाद पीयूष को नींद आ जानी चाहिए थी.. पर बगल में पड़ा लैपटॉप.. और उसके अंदर की स्फोटक सामग्री ने उसकी नींद उड़ा रखी थी.. पर मदन भैया और उनका परिवार कभी आ सकते थे.. ऐसी स्थिति में ज्यादा पड़ताल करने में खतरा था.. पीयूष बेड से उठा.. लैपटॉप को टेबल पर रखकर उसका चार्जर लगाया.. फिर शट डाउन करने से पहले उसने ध्यान से देख लिया की वो क्लिप कहाँ पर सेव थी.. लैपटॉप को ज्यों का त्यों रखकर वो सो गया..
 
इतनी थकान के बाद पीयूष को नींद आ जानी चाहिए थी.. पर बगल में पड़ा लैपटॉप.. और उसके अंदर की स्फोटक सामग्री ने उसकी नींद उड़ा दी थी.. पर मदन भैया और उनका परिवार कभी भी आ सकते थे.. ऐसी स्थिति में ज्यादा पड़ताल करने में खतरा था.. पीयूष बेड से उठा.. लैपटॉप को टेबल पर रखकर उसका चार्जर लगाया.. फिर शट डाउन करने से पहले उसने ध्यान से देख लिया की वो क्लिप कहाँ पर सेव थी.. लैपटॉप को ज्यों का त्यों रखकर वो सो गया..

सुबह रोज के मुकाबले आज कविता की नींद काफी जल्दी उड़ गई.. पाँच भी नहीं बजे थे और दूध भी नहीं आया था.. वो उठकर उसी अवस्था में बाथरूम जाकर आई.. अभी थोड़ी देर में रसिक आएगा.. वापिस सो गई तो जागने में कठिनाई होगी.. इससे अच्छा तो घर की थोड़ी सफाई कर लूँ.. और पीने का पानी भी भर लूँ.. आज तो वो लोग आ ही जाएंगे..

नग्न अवस्था में कविता किचन गई और झाड़ू लगाने लगी.. उसके दिमाग मे अब भी कल रात वाली क्लिप चल रही थी.. मदन भैया का उस स्त्री के साथ क्या संबंध होगा?? क्या मस्त चोद रहे थे भैया.. इतने जबरदस्त धक्के तो पीयूष ने भी कभी नहीं लगाए.. मदन भैया की उम्र भले ही बड़ी हो.. पर जोर बहोत है.. लंड भी कितना मस्त है.. !! उस औरत को चुदने में कितना मज़ा आ रहा था.. !! झुककर झाड़ू लगा रही कविता के लटक रहे बबलों के हिलने से उसे गुदगुदी सी हो रही थी.. आज पहली बार वो नंगे बदन झाड़ू लगा रही थी..

तभी उसने रसिक की साइकिल की घंटी सुनी.. और वो समझ गई की वो दूध लेकर आया था.. वो जल्दी से बेडरूम में गई और गाउन पहनकर बाहर आई.. पीयूष की नींद खराब न हो इसलिए वो डोरबेल बजने से पहले ही दरवाजा खोलकर खड़ी हो गई.. पर रसिक बाहर नजर ही नहीं आया.. !! सोच में पड़ गई कविता.. जो घंटी उसने सुनी वो रसिक की साइकिल की ही थी.. वो रोज सुनती थी इसलिए उसे पक्का यकीन था.. फिर ये रसिक गया कहाँ??

दरवाजे से बाहर बरामदे में आकर वो रसिक को ढूँढने लगी.. बाहर घनघोर अंधेरा था.. स्ट्रीट लाइट की रोशनी सिर्फ सड़क पर पड़ रही थी.. बरामदे में थोड़ा सा ही आगे आते ही उसे रसिक नजर आया.. वो उसे आवाज देने ही वाली थी की तभी.. उसकी आँखों ने धुंधली रोशनी में जो देखा.. वो अचंभित हो गई.. ये मैं क्या देख रही हूँ?? मम्मी जी और रसिक?? अरे बाप रे.. !! अंधेरे में साफ साफ तो दिख नहीं रहा था पर जीतने करीब वो दोनों खड़े थे.. सामान्यतः कोई भी औरत किसी अनजान के इतने करीब नहीं खड़ी रहती..

कविता ने सब से पहले तो दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि पीयूष के बाहर आने का रिस्क न हो.. फिर वो झुककर.. धीरे धीरे दुबक कर चलते हुए.. शीला भाभी और उनके घर के बीच की दीवार तक पहुँच गई.. दीवार की उस तरफ मौसी और रसिक बात कर रहे थे.. कविता झुकी हुई थी इसलिए वो उनके बेहद करीब होने के बावजूद उन्हें नजर नहीं आ रही थी..

मौसी ने धीमी आवाज में कहा "जरा धीरे बोल.. मेरा पति अंदर सो रहा है.. "

कविता को पता चल गया की कुछ खास बातें हो रही थी.. वरना इतनी सुबह सुबह मम्मी जी रसिक को आहिस्ता बोलने के लिए क्यों कहेगी.. !!

कविता दुबककर दीवार के पीछे छुपकर बैठी हुई थी.. कविता और उन दोनों के बीच अब ४ फिट से ज्यादा अंतर नहीं था..

मौसी: "पकड़ने तो दे रसिक.. !! बाहर निकाल.. और कुछ नहीं कर सकती पर देख तो सकती हूँ ना.. !! थोड़ा सहला लेने दे मुझे.. मदन के लौट आने के बाद शीला भी तो ऐसे ही करती थी ना तेरे साथ.. !!"

रसिक: "नहीं मौसी.. आज मेरा मन नहीं है.. !!"

मौसी: "मैं सब समझती हूँ की क्यों तेरा आज मन नहीं है.. मैंने कल कविता को लेकर मना किया इसलिए तू बुरा मान गया है.. पर तू सोच जरा.. सास होकर मैं अपनी बहु को ऐसी बात के लिए कैसे तैयार करूँ? मुझे तो बात करने की भी हिम्मत नहीं होती.. तू भी कमाल है रसिक..एक तो मुझे इसकी आदत लगा दी.. और अब मुंह फेर रहा है.. ये ठीक नहीं है.. मुझ पर थोड़ा सा तो तरस खा.. !!"

रसिक: "आप की सारी बात समझता हूँ.. पर आप भी समझिए.. जब से आपकी बहु दो देखा है, मेरा मन डॉल गया है.. आप ने तो सीधे मुंह मना कर दिया.. बुरा तो मुझे लगता है.. और वैसे आपकी बहुरानी भी कोई सती सावित्री नहीं है.. ससुराल में आकर भी अपने मायके के दोस्तों को बुलाती है.. मुझे और कुछ नहीं बस सिर्फ उसकी छातियाँ ही दबानी है.. उसको चोदना भी नहीं है.. सिर्फ हाथ भी फेरने नहीं देगी? इतना तो आप कर सकती हो मेरे लिए.. "

मौसी सोच में पड़ गई.. ये क्या बोल गया रसिक? कविता सती सावित्री नहीं है.. मतलब? क्या उसका कोई राज रसिक को पता है?? या फिर उसे लपेटने के लिए झूठ बोल रहा है.. !! कविता को देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता की वो कुछ उल्टा सीधा कर सकती है..

मौसी: "सुन रसिक.. कविता के लिए उल्टा सीधा बोलेगा तो मैं सुनूँगी नहीं तेरी.. तुझे मेरे साथ न करना हो तो मत कर.. पर मेरी फूल जैसी बहु को बदनाम करेगा तो छोड़ूँगी नहीं तुझे"

रसिक: "आपकी उस फूल जैसी बहु को मैंने पिछली गली में.. खंभे के पास घाघरा उठाकर खड़ा हुआ देखा था.. और पीछे से एक भँवरा उसका रस चूस रहा था.. ये तो आप से जान पहचान है इसलिए आज तक मैं कुछ बोला नहीं.. आप को तो मालूम है मौसी.. मुझे बस किसी जवान मॉडर्न लड़की की छातियाँ दबानी है बस.. एक बार खोलकर देखनी है की कैसी होती है.. अगर एक बार आप अपनी बहु की छातियाँ देख लेने देंगे तो मैं आप के लिए सब कुछ करने के लिए राजी हूँ.." सुनते ही कविता की पैरों तले से धरती खिसक गई..!! बाप रे.. उस रात जब गली के पिछवाड़े पिंटू से चुदवा रही थी तब रसिक ने देख लिया था.. !!

अनुमौसी सोच में पड़ गई.. रसिक के तंदूरस्त शरीर को देखते ही उनकी दबी हुई इच्छा स्प्रिंग की तरह उछलकर जाग गई थी.. उसके पाजामे पर रखा हुआ उनका हाथ.. रसिक के हथियार को पकड़ने के लिए बेकरार था.. पर जब तक वो रसिक की मांग का स्वीकार न करें तब तक रसिक उसका लंड बाहर नहीं निकालने वाला था.. लंड के उभार को छूने के बाद अनुमौसी बेचैन हो गए थे उसे पकड़ने के लिए.. छूने के लिए.. उसकी सख्ती को अनुभवित करने के लिए..

मौसी: "तू क्यों जिद कर रहा है रसिक.. !! अब देख.. तू कविता को अपने हिसाब से पटाने की कोशिश कर.. मैं बीच में नहीं आऊँगी.. बस?"

रसिक को ये आधी जीत मंजूर नहीं थी.. वो तो चाहता था की मौसी खुद कविता को मनाएं.. पर इसके लिए मौसी को तगड़ी रिश्वत देने की जरूरत थी.. ऐसी रिश्वत की जिसको देखते ही अनुमौसी कविता को खोलकर उसके सामने पेश कर दे..

रसिक ने मौसी को अपनी ओर खींचकर बाहों में जकड़ कर जो कहा वो सुनकर कविता को ४४० वॉल्ट का झटका लगा..

"ओह्ह मौसी.. आप एक बार कविता को मना तो लीजिए.. बाकी सब मैं संभाल लूँगा.. अगर आपकी बहु भी हमारे खेल में शामिल हो जाती है.. तो ये बात राज ही रहेगी.. " मौसी के स्तनों को उत्तेजना पूर्वक मसलते हुए रसिक ने कहा.. रोज सुबह कविता की पतली लचकदार कमर को देखकर रसिक सोचता.. इसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़कर इसकी संकरी चूत के अंदर पूरा लंड घुसा दूँ तो कितना मज़ा आएगा.. !! उसका लंड चूत को चीरते हुए अंदर घुस जाएगा.. कविता तो चीख चीख कर मर जाएगी.. इतनी नाजुक है.. मेरे एक धक्के में तो लोडा उसके गले तक पहुँच जाएगा..

मौसी के घाघरे में हाथ डालकर उनकी क्लिटोरिस को मसलते हुए उन्हें जवानी के दिनों की याद दिला दी..

मौसी: "आह्ह रसिक.. कविता के साथ तुझे जो करना है कर.. उहह!!"

"अरे मौसी, आप की मदद के बगैर मैं कैसे उस तक पहुँच पाऊँगा?? आपकी बहु तो मुझे हाथ भी नहीं लगाने देगी.. आप एक बार उस कविता को तैयार कर दो बस.. फिर देखो मेरा जलवा.. आप दोनों के मर्द तो काम पर चले जाते है.. पूरा दिन सास-बहु घर पर अकेले रहती हो.. दोनों को बराबर मज़ा दूंगा.. जरा सोचिए मौसी, ऐसे अंधेरे में करने में क्या मज़ा?? उससे अच्छा तो मैं आपको दिन के उजाले में.. बिस्तर पर लेटाकर.. आपकी टांगें उठाकर धनाधन चोदूँगा तो कितना मज़ा आएगा.. !! रोज आकर चोदूँगा.. "

अपनी सास को ऐसी बातें करते हुए सुनकर कविता के अचरज का कोई ठिकाना न रहा.. पूरा दिन भजन गाती उसकी सास का ये नया स्वरूप देखकर कविता को आश्चर्य भी हुआ और दुख भी.. उसकी सास एक मामूली से दूधवाले से उसका सौदा कर रही थी??? एक पल के लिए उसे इतना गुस्सा आया की अभी बाहर निकले और झाड़ू से रसिक को धो डाले.. नफरत हो गई उसे रसिक से.. वो अब धीरे से वहाँ से सरक ही रही थी की तब उसने सुना..

मौसी: "हाय रसिक.. कितना मोटा है रे तेरा.. एकदम मूसल जैसा.. बल्कि उससे भी बड़ा है ये तो.. अगर कविता के साथ तेरी सेटिंग हो जाए तो तेल लगाकर डालना.. वरना बेचारी की लहूलुहान हो जाएगी.. मुझ जैसी अनुभवी को भी पेट में दर्द होने लगा था..इतना बड़ा है तेरा.. हाय, कब इसे फिर से अंदर डलवाने का मौका मिलेगा.. !! अभी मेरे पति अंदर सोये न होते तो मस्त मौका था.. कविता और पीयूष तो मदन के घर सो रहे है.. "



huge-dick-in-underwear


"उनकी जगह आप सोने गई होती तो अभी सेटिंग हो जाता ना.. " मौसी की हवस को हवा देते हुए रसिक उनकी भोस में चार चार उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए बोला


ff

अपने शरीर का पूरा भार रसिक के कंधों पर डालकर.. फिंगर-फकिंग का मज़ा लेते हुए रसिक का लंड दबा रही थी "आह्ह रसिक.. बाहर तो निकाल.. एक बार देखने तो दे.. !!"

"आप ही हाथ डालकर बाहर निकाल लो.. मेरी उँगलियाँ तो आपके अंदर घुसी हुई है.. मैं निकालने जाऊंगा तो आपका मज़ा किरकिरा हो जाएगा"

"सही कहा तूने.. तू अपना काम जारी रख.. मैं खुद ही बाहर निकाल लेती हूँ.. " रसिक भोसड़े से उँगलियाँ बाहर निकाल ले ये मौसी को गँवारा नहीं था.. उसकी खुरदरी उँगलियाँ लंड का काम कर रही थी.. मौसी ने थोड़ी सी मेहनत करके बड़ी मुश्किल से रसिक का लंड बाहर निकाला.. लंड से खेलते हुए वो सिसकियाँ भरने लगी..


kissing-dick

"मौसी, आपकी सिसकियों की आवाज जरा कम कीजिए.. कहीं आपके पति जाग गए तो इस उम्र में तलाक दे देंगे आपको"

"वो क्या मुझे तलाक देंगे? मैं खुद ही उनसे अलग हो जाऊँगी रसिक.. जो मज़ा तूने मुझे दिया है.. इतने सालों में वो नहीं दे पाए है.. मेरी जवानी धरी की धरी रह गई.. कितने अरमान थे मेरे.. सब अधूरे रह गए.. अच्छा हुआ जो तू मुझे मिल गया.. वरना मेरी ज़िंदगी तो ऐसे ही पूरी हो जाती.. "

मौसी को और मजबूर करने के लिए रसिक नीचे घुटनों के बल बैठ गया और मौसी के घाघरे के अंदर घुस कर.. मौसे के भोसड़े पर सीधा प्रहार करने लगा.. ये एक ऐसी हरकत थी.. जिससे मौसी ही नहीं.. पर कोई भी औरत अपना अंकुश खो बैठती.. मौसी ने अपने घाघरे से रसिक को अंदर छुपा दिया.. और रसिक का सिर पकड़कर अपनी भोस से दबा दिया.. रसिक की जीभ मौसी की भोस पर फिरती रही और अनुमौसी कराहती रही..


pl

कविता को कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था.. पर देखने की जरूरत भी क्या थी?? बातचीत और सिसकियों को सुनकर साफ पता चल रहा था की दीवार की उस ओर क्या चल रहा होगा.. !! कविता का पूरा शरीर गुस्से, नफरत और घृणा के कारण तपने लगा था

इस तरफ मौसी को अद्भुत सुख मिल रहा था.. चाट चाटकर रसिक ने मौसी के भोसड़े का रस निकाल दिया.. और उन्हें शांत कर दिया.. झड़ते ही मौसी रसिक को लेकर बेहद जज्बाती हो गई.. जिस युद्ध को जीतने में चिमनलाल शस्त्र के साथ भी कामयाब नहीं हो पाए थे.. उस युद्ध को बिना हथियार के ही रसिक ने जीत लिया था.. भोसड़े की आग शांत होते ही मौसी का पूरा शरीर ढीला होकर रसिक के कंधों पर झुक गया.. रसिक तुरंत घाघरे के नीचे से बाहर निकल गया.. और मौसी को अपनी मजबूत भुजाओं में दबा दिया.. रसिक की चौड़ी छाती मौसी को बेहद आरामदायक लग रही थी.. उसकी छाती को अनायास ही चूम लिया मौसी ने

"मौसी.. अब मेरे इस सख्त लोड़े का कुछ कीजिए.. ये नरम हो जाए तो मैं दूध बांटने निकलूँ.. "

अब मौसी रसिक की बाहों से अलग होकर उसके सख्त लोड़े को मुठियाने लगी.. रसिक के लंड का वर्णन सुनकर कविता का हाथ अनायास ही उसकी चूत तक पहुँच गया.. कविता जैसे जैसे रसिक और मौसी की बातें सुनती गई.. वैसे वैसे उसकी वासना का पारा चढ़ता गया..

अनुमौसी को रसिक ने जोरदार प्लान बताया.. कविता को पटाने के लिए.. रसिक के प्लान को सारे दृष्टिकोण से जाँचने लगी मौसी.. इस प्लान के तहत.. मौसी को कहीं भी कविता का प्रत्यक्ष सामना नहीं करना था.. ऐसा जबरदस्त प्लान बनाया था रसिक ने.. मौसी सोचने लगी.. कविता को कभी पता नहीं चलेगा की मैंने ही रसिक के साथ मिलकर ये प्लान बनाया है.. फिर क्या प्रॉब्लेम? मुझे जो बुढ़ापे में जाकर नसीब हुआ वो उस बेचारी को जवानी में ही मिल जाएँ तो क्या बुराई है.. और वैसे भी कविता दूध की धुली तो है नहीं.. मेरी जानकारी के बाहर न जाने क्या क्या करती होगी.. !!

घर में सती सावित्री जैसी पवित्र होने का ढोंग करती औरतें क्या क्या गुल खिलाती है.. !! स्त्री के चेहरे को देखकर ऐसा कोई नहीं कह सकता की उसका चरित्र कैसा होगा.. रात के साढ़े नौ बजे प्रेमी से चुदवाकर आई स्त्री.. दस बजे अपने पति के बगल में आराम से सो जाती है.. पति को घंटा भी पता नहीं चलता की उसकी पत्नी की चूत प्रेमी के वीर्य से सराबोर है.. और गलती से अगर पति को इस चिपचिपाहट का पता लग भी जाएँ तो चालाक औरतें बड़ी ही सफाई से उसे उत्तेजना के कारण गिलेपन का नाम दे देती है.. पति बेचारा खुश हो जाता है की वो अब भी अपनी पत्नी को इतना उत्तेजित कर सकता है की जिससे उसकी चूत इतनी चिपचिपी हो जाए..

"रसिक, तू जो भी करना.. बहोत ही सोच समझकर.. और संभालकर करना.. मैं कविता की नज़रों से गिर जाऊँ ऐसा न हो.. " रसिक के लंड की चमड़ी को आगे पीछे करते हुए.. उसके टमाटर जैसे सुपाड़े को अहोभाव से देखते हुए मौसी सोच रही थी.. रसिक के लंड का वज़न कितना होगा!!

"आप टेंशन मत लीजिए मौसी, आपका नाम कहीं नहीं आएगा.. और अगर कुछ हुआ भी तो मेरे पास उसका इलाज है.. चिंता मत कीजिए.. कविता आप से कुछ नहीं कहेगी.. इस बात की मेरी गारंटी है.. !!"

"रसिक, अब तो तू मुझे रोज मिलेगा ना.. !! जब जब बुलाऊँ तब आएगा न तू.. !!"

"हाँ हाँ मौसी.. पर आप भी भूलना मत.. जैसा मैंने कहा है सब याद रखना.. शनिवार को फायनल समजिए.. अब थोड़ा सा मुंह में ले लीजिए तो मेरा छुटकारा हो.. ये तो बैठ ही नहीं रहा.. मुठ्ठी हिलाने से इसका भला नहीं होने वाला" कहते हुए रसिक ने मौसी के गाल को काटते हुए उनकी निप्पल खींच ली.. एक एक हरकत में मौसी को मज़ा आ रहा था

"ठीक है रसिक.. पर मुझे डर लग रहा है.. कोई देख लेगा तो"

"अरे कुछ नहीं होगा मौसी.. भरोसा रखिए.. और मुंह में ले लीजिए.. "

"बाप रे रसिक.. ये गधे जैसा लंड तूने मेरी अंदर घुसेड़ दिया था.. इतना बड़ा मुँह में कैसे लूँ?"

"ले लीजिए.. चला जाएगा.. भोसड़े में घुस गया था तो मुंह में तो घुसेगा ही ही.. उस दिन लिया तो था मुंह में.. !!"

"वो तो तूने जबरदस्ती डाल दिया था.. फिर मेरी क्या हालत हुई थी, भूल गया? आज ऐसे जबरदस्ती मत करना.. जान निकल जाती है मेरी"

"नहीं करूंगा.. अब आप बातें बंद कीजिए और मुंह में लीजिए फटाफट.. !!"

"आह मौसी.. मज़ा आ रहा है" अनुमौसी ने नीचे बैठकर लंड को चूमा.. जिसकी आवाज कविता को साफ सुनाई दी.. उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया.. मेरी सास एक लफंगे दूधवाले का लंड चूस रही है.. !!


kissing-dickmouth-fuck2



"ओह्ह मौसीईईईईई.. आह्ह कविताआआआआआ.. " उत्तेजित रसिक कराहते हुए बोला.. रसिक के मुंह से अपना नाम सुनकर घबरा गई कविता.. अब उसका बचना असंभव था.. रसिक के वीर्य स्त्राव होने की आखिरी क्षणों में मौसी भी कविता का नाम सुनकर चोंक गई.. और कविता को सदमा सा लग गया.. उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसकी सास के मुंह में नहीं पर अपने मुंह में रसिक ने लंड दे रखा हो.. वहाँ से चुपचाप सरक गई कविता.. अब खड़ा रहने का कोई अर्थ नहीं था.. वो चुपके से घर के अंदर आकर बेड पर सो गई.. जैसे ही वो लेटी.. पीयूष ने करवट बदलते हुए उसे बाहों में भर लिया और फिर से खर्राटे लेने लगा.. इस तरह सोने की पीयूष की आदत थी.. शादी की पहली रात से ही पीयूष ऐसे सोता था.. उसके उरोज पीयूष की छाती से दब जाते और पीयूष का लंड उसे "गुड मॉर्निंग" कहता..

पीयूष तो निश्चिंत होकर खर्राटे ले रहा था पर कविता की आँखों से नींद गायब थी.. उसका दिमाग खराब हुआ पड़ा था.. रसिक ने मुझे पिंटू के साथ कैसे देख लिया?? उस रात जब वो पिंटू से गली के छोर पर मिली तब वहाँ कितना अंधेरा था और आसपास कोई था भी नहीं.. !! हे भगवान.. अब मैं क्या करूँ?

तभी घर की डोरबेल बजी.. वो यंत्रवत खड़ी हुई और दरवाजा खोलने लगी.. उसे पता था की रसिक ही होगा.. दरवाजा खुलते ही रसिक प्रकट हुआ.. उसके विकराल शरीर ने आधे से ज्यादा दरवाजे को रोक रखा था.. न चाहते हुए भी कविता की नजर रसिक के.. कविता का मन कर रहा था की वो भागकर अंदर चली जाए

"कैसी हो भाभी? कल मौसी यहाँ थी और आज आपकी बारी आ गई?" रसिक निर्दोष होने का नाटक कर रहा था

कविता ने मुंह बिगाड़ते हुए पतीली आगे कर दी.. गुस्सा तो इतना आ रहा था उसे की अभी उसकी पोल खोल दे.. वो जो कुछ भी उसकी सास के साथ कर आया था उस बारे में.. पर वो चुप ही रही

कविता को इस बात की फिक्र थी की कहीं रसिक उसका राज और लोगों के सामने न खोल दे.. रसिक से संबंध अच्छे रखना जरूरी था

"आज बड़ी देर कर दी आपने आने में.. !! साइकिल की घंटी तो मैंने आधे घंटे पहले ही सुनी थी.. तब से जाग रही हूँ.. " कहते हुए कविता ने अंगड़ाई ली.. उसके पतले वस्त्रों से छातियाँ उभरकर बाहर आ गई.. पतीली में दूध डाल रहे रसिक देखता ही रह गया.. रसिक के नजर कविता के स्तनों पर थी.. कब पतीली भर गई और दूध बाहर गिरने लगा उसका उसे पता ही नहीं चला


kav2

"अरे अरे.. क्या कर रहे हो रसिक? दूध गिरा दिया.. "

"कोई बात नहीं.. आप हो ही ऐसी.. देखते देखते दूध छलक गया.. " अपनी तारीफ सुनकर कविता को अच्छा लगा

"ठीक है.. पर काम करते वक्त ध्यान वहाँ होना चाहिए.. आसपास नजरें जरा कम मारनी चाहिए"

"अरे भाभी.. दूध तो और मिल जाएगा.. पर आसपास नजरें मारने पर जो नज़ारे देखने को मिलते है.. क्या बताऊँ आपको.. !!"

रसिक के काले विकराल बदन को देखकर कविता सोच रही थी.. इससे तो बात करने में भी घिन आ रही है.. अगर ये मुझे छु ले तो क्या होगा!!!

"आज इतनी देर क्यों लग गई तुम्हें?" रसिक क्या बहाना बनाता है वो देखना चाहती थी कविता

"पहले आपके घर दूध देने गया था.. "

"क्यों पहले मेरे घर?? रोज तो आप शीला भाभी को पहले दूध देते है ना.. !!"

"आपकी सास से मुझे थोड़ा काम था ई सलिए वहाँ पहले गया था.. !!"

"अच्छा.. तो काम हो गया क्या?? ऐसा क्या काम था सुबह सुबह?"

"वो मैं आपको नहीं बता सकता भाभी.. फिर कभी बताऊँगा.. वैसे शीला भाभी कब आने वाली है? काफी दिन गुजर गए उनको गए हुए.. " रसिक ने चालाकी से बात को टाल दिया

अब कविता और पूछताछ करती तो रसिक को शक हो जाता.. ईसलिए वो चुप हो गई.. वो सोच रही थी.. मम्मी जी और रसिक ने शनिवार का प्लान बनाया है ना.. क्यों न शनिवार को मैं पीयूष को लेकर पापा के घर चली जाऊँ.. !!

नीचे गिरा दूध साफ कर रसिक ने कविता की तरफ देखा.. पर कविता ने नजर फेर ली.. पर जिस तरह रसिक के लंड ने अभी भी उभार बना रखा था.. देखकर ही लग रहा था की उसका घोडा बड़ा ही शरारती है.. मम्मी जी की सिसकियाँ और लंड की साइज़ को लेकर जो बातें की थी वो याद आते ही कविता की नजर उस उभार पर चली गई.. रसिक पतीला कविता के हाथ में देने गया पर कविता की नजर उसके लोड़े को नाप रही थी.. ईसलिए पतीली फिर से छलक गई और दूध फिर से नीचे गिरा..

"भाभी.. अभी आप ही कह रही थी की काम में ध्यान रखना चाहिए.. अब आप का ध्यान कहाँ था?" लंड को देख रही कविता.. अपनी चोरी पकड़ी जाने पर शर्म से पानी पानी हो गई.. रसिक के हाथ से पतीला लेकर वो किचन में घुस गई.. और रसिक भी हँसते हँसते चला गया..

कविता को अपने आप पर गुस्सा आ रहा था.. साला वो दो कौड़ी का दूधवाला मुझे सुना गया.. क्या जरूरत थी उसके लंड को देखने की?? रसिक के हाथों रंगेहाथ पकड़े जाने की शर्म ज्यादा हो रही थी उसे.. खुली सड़क पर मुझे अपने प्रेमी से चुदते हुए देखकर ही रसिक को मेरे बारे में ऐसा विचार आया होगा.. अब जो हो गया सो हो गया.. अगली बार से ध्यान रखना पड़ेगा.. अपनी सास और रसिक के शनिवार के प्लान को निष्फल बनाने की योजना में जुट गई कविता.. उसे पूरा भरोसा था की वो उन दोनों की जाल से बच जाएगी

दूध गरम कर फ्रिज में रखकर कविता ने पीयूष को जगाया.. दोनों ने थोड़ी बातें की और शीला का घर बंद कर अपने घर चले गए..

अब कविता का अपनी सास के प्रति दृष्टिकोण बदल चुका था.. अब तक मम्मी जी मम्मी जी कहते हुए वो थकती नहीं थी.. पर आज उसका दिल ही नहीं किया उन्हें बुलाने का.. पर पुरुषों के मुकाबले.. औरतें अपने मन के भाव को छुपाने में एक्सपर्ट होती है.. स्त्री सिर्फ भय या डर का भाव छुपा नहीं सकती.. बाकी सारे जज़्बातों को वो अपने अंदर कैद रख सकती है.. कविता ने बड़ी कोशिश करके अपनी सास के प्रति घृणा को छुपाते हुए रोजमर्रा के कामों को निपटाने लगी.. पीयूष भी तैयार होकर ऑफिस चला गया..

सुबह के साढ़े दस बज रहे थे.. कविता अभी भी गहन विचार में डूबी हुई थी.. अंदर के कमरे में बैठी अनुमौसी भी सोच रही थी.. रसिक के प्लान के मुताबिक कविता को किस तरह बात करूँ?? उसने मना कर दिया तो?

आखिर हिम्मत करते हुए मौसी ने कहा "कविता, शनिवार को हम दोनों आदिपुर चलें? बड़े दिन हो गए वहाँ गए हुए.. दोपहर को बस से चले जाएंगे और रात वहीं रहेंगे.. फिर दूसरे दिन रविवार को वापिस"

कविता ने जैसा सोचा था बिल्कुल वैसा ही हुआ.. सासुमाँ ने ऐसा मास्टर-स्ट्रोक लगाया था की उसके पास मना करने का कोई कारण ही नहीं था.. मौसी और रसिक ने सोच समझकर इस दूर जगह का सोचा था की जहां से चिमनलाल या पीयूष.. कविता के विरोध को और मौसी की सिसकियों को सुन न सके

कविता के मन में भी प्लान पहले से तैयार था "मम्मी जी.. शनिवार को तो मैं और पीयूष मेरे पापा के घर जाने वाले है.. मौसम की शादी की तैयारी भी तो करनी है.. पापा और मम्मी को हम दोनों की जरूरत पड़ेगी.. ऐसा करते है.. हम इस शनिवार को नहीं पर उसके बाद वाले शनिवार को जाएंगे"

सुनकर मौसी का मुंह लटक गया.. कविता ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ.. बिना पीयूष से पूछे.. जवाब दे दिया..

मौसी को और कुछ सुझा नहीं और जल्दबाजी में बोल दिया "ठीक है, उसके बाद वाले शनिवार को चले जाएंगे"

मन ही मन मौसी खुश हो गई.. सोचने लगी.. चलो.. इस शनिवार को नहीं पर अगले शनिवार का प्रोग्राम तो सेट हो गया.. मुझे तो डर था कहीं कविता मना न कर दे.. रसिक को बता दूँगी.. की अब प्लान अगले शनिवार को होगा.. वो मना नहीं करेगा.. जो भी होता है अच्छे के लिए ही होता है.. पीयूष के पापा भी अगले शनिवार बाहर जाने वाले है.. इसलिए खाना पकाने की चिंता भी नहीं है.. पीयूष तो कहीं बाहर होटल में खा लेगा.. और तब तक तो शीला भी वापिस आ चुकी होगी.. फिर तो कोई प्रॉब्लेम ही नहीं.. !!

अनुमौसी के मन मे लड्डू फूटने लगे.. जो काम उन्हें बड़ा ही मुश्किल लगता था वो आसानी से निपट गया और उनके सर से एक बड़ा बोझ उतर गया.. वो अपने कमरे में गई और कविता आसपास न हो तब रसिक को कॉल करने का इंतज़ार करने लगी.. वैसे पूरा दिन पड़ा था रसिक को बताने के लिए इसलिए वह निश्चिंत थी.. अभी कॉल नहीं कर पाई तो शाम को मंदिर जाते वक्त फोन कर सकती थी.. मन ही मन खुश होते हुए अनुमौसी अपने कमरे में बैठकर कपड़ों को इस्तरी करने लगी..

किचन में सब्जियां काटते हुए कविता ये सोच रही थी की पीयूष को अभी के अभी कॉल करके मायके जाने के लिए मनाना होगा.. उसे कैसे मनाए.. !! वो छत पर सूख रहे कपड़े लेने के बहाने ऊपर गई और पीयूष को कॉल किया

पीयूष: "हैलो मेरी जान.. " रोमेन्टीक स्वर में पीयूष ने कहा

कविता: "पूरा दिन जान जान कहता रहता है.. पर कभी ये नहीं पूछता की तेरी जान को क्या चाहिए?"

पीयूष: "आप हुक्म कीजिए महारानी.. बंदा अपनी जान हाजिर कर देगा" नाटकीय अंदाज में पीयूष ने कहा

कविता: "कुछ नहीं यार.. मेरी इच्छा थी की इस शनिवार को हम पापा के घर चले.. मौसम की शादी की तैयारी में मम्मी की मदद के लिए.. वो बेचारी अकेली क्या क्या करेगी?"

मौसम.. !!! ये नाम सुनते ही पीयूष का रोम रोम पुलकित हो गया.. मौसम से उस खास मुलाकात करने का ये अच्छा मौका था.. छोड़ना नहीं चाहिए.. सामने से कुदरत ने ऐसे संजोग खड़े कर दीये थे..

पीयूष: 'बस इतनी सी बात.. !! हम कल सुबह तेरे घर जाने निकलेंगे.. अब खुश.. !! इतनी सी बात के लिए तू अपना सुंदर मुखड़ा लटकाकर बैठी थी.. !! सुन कविता.. अभी मैं थोड़ा बीजी हूँ.. इसलिए फोन रखता हूँ.. हम कल सुबह निकलेंगे ये तय रहा.. पर हाँ.. किसी भी हाल में हमें रविवार रात तक वापिस लौटना होगा.. सोमवार को मेरी एक इम्पॉर्टन्ट मीटिंग है.. तू सामान पेक कर.. ओके.. बाय!!"

कविता: 'बाय डार्लिंग.. जल्दी आना.. देर मत करना.. आज तूने मुझे खुश किया है.. इसलिए रात को मैं तुझे खुश कर दूँगी.. ऐसा मज़ा कराऊँगी की तू याद रखेगा"

पीयूष इतनी आसानी से मान जाएगा ये कविता ने सोचा न था.. खुश होते हुए वो सूखे कपड़े लेकर सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी तब उसने देखा की अनुमौसी किसी के साथ चुपके से फोन पर बात कर रही थी.. और कविता को देखते ही उन्हों ने फोन काट दिया.. उसे शक तो हुआ पर अब वो खुद ही शहर से बाहर जाने वाली थी.. इसलिए उसे कोई चिंता न थी.. अपनी सास को नजरंदाज करते हुए वो किचन में चली गई

बाकी का दिन बिना किसी खास गतिविधियों को बीत गया

कविता अपने हिसाब से खुश थी और अनुमौसी अपनी तरह से..

मौसम से मिलने के ख्वाब देखते हुए खुश हो रहा पीयूष.. किसी गीत की धुन गुनगुनाते हुए काम कर रहा था.. नए प्रेमी जैसी चमक थी उसके चेहरे पर.. कविता का फोन खतम होते ही पीयूष ने तुरंत मौसम को फोन किया.. और बताया की वो लॉग वहाँ आ रहे थे.. और उसे उसके प्रोमिस की भी याद दिलाई.. तब मौसम ने कहा

मौसम: "मुझे सब याद है जीजू.. पापा दो दिन के लिए शहर से बाहर जाने वाले है.. हम उनकी ऑफिस पर मिलेंगे.. आप निश्चिंत होकर आइए"

ये सुनकर पीयूष इतना जोश में आ गया.. की दो दिन का काम उसने आधे दिन में खतम कर दिया

शाम को वो घर पहुंचा तब कविता बहोत खुश थी.. सब ने मिलकर खाना खाया.. और फिर कविता और पीयूष.. छत पर जाकर बैठ गए.. रोज की तरह.. रात के नौ बज रहे थे और काफी अंधेरा था.. दोनों बातें कर रहे थे तभी.. पीयूष के मोबाइल पर एक मेसेज आया.. जिसे देखकर पीयूष की तो नैया डूब गई.. ये क्या हो गया यार?? उसे अपना सर पीटने का मन कर रहा था पर कविता के रहते ये मुमकिन न था..

मौसम का मेसेज था "जीजू, मेरी तबीयत खराब हो गई है.. आप अभी आएंगे तो हम मिल नहीं पाएंगे.. इसलिए अब तीन चार दिनों के बाद ही आना.. "

कविता बातें कर रही थी पर पीयूष की ध्यान उन बातों पर नहीं था.. उसे पता नहीं चल रहा था की वो क्या करें.. !! कल सुबह तो निकलना था तब ये प्रॉब्लेम आ खड़ी हुई.. !! अगर अब उसने केन्सल करने की बात की तो कविता उसकी जान ले लेगी.. ये मौसम भी न यार.. एन मौके पर इतना खतरनाक मेसेज कर दिया..!! कुछ तरकीब निकालनी पड़ेगी..

पीयूष ने पहले तो अपना मोबाइल साइलेंट मोड पर कर दिया.. और जैसे फोन पर बात कर रहा हो वैसे थोड़ा सा दूर जाकर बात करने का अभिनय करने लगा.. वो इतना करीब तो था ही की कविता उसकी बातें सुन सके

"ओके ओके सर.. समझ गया.. ये तो बहोत अच्छी बात है की आप ऑर्डर हमारी कंपनी को दे रहे है.. पर इसके बारे में हम सोमवार को ही बात कर सकते है.. नहीं नहीं सर.. कल पोसीबल नहीं होगा.. मैं छुट्टी पर हूँ और एक सोशीयल काम से बाहर जा रहा हूँ.. सर.. मैं समझ सकता हूँ की ये बहोत इम्पॉर्टन्ट है.. पर मैं भी मजबूर हूँ"

कविता समझ गई की कोई जरूरी काम आ गया है और उसकी वजह से जाना केन्सल होने वाला है.. वो गुस्से से तिलमिलाने लगी.. बस पीयूष का फोन खतम होने की देर थी.. बाघिन की तरह झपट कर फाड़ देने वाली थी पीयूष को.. कविता का क्रोधित चेहरे को देखकर पीयूष भी हिल गया था

"समझने की कोशिश कीजिए सर.. आप हमारे खास कस्टमर है ये मैं भी समझता हूँ.. नहीं सर.. आप चाहे तो राजेश सर से बात कर सकते है.. इस बात के लिए मैं नौकरी छोड़ने को तैयार हूँ.. पर मैं अपनी छुट्टी केन्सल नहीं करने वाला.. आखिर मेरी भी पर्सनल लाइफ है.. !!" पीयूष जबरदस्त खेल खेल रहा था

नौकरी छोड़ने की बात सुनकर कविता घबरा गई.. बाप रे.. !! मेरी मायके जाने की जिद पूरी करने के लिए पीयूष नौकरी को ठोकर मारने के लिए तैयार हो गया.. !! कितनी मुश्किल से मिली थी ये नौकरी.. और तनख्वाह भी अच्छी थी.. पीयूष अच्छी तरह सेट भी हो गया था.. मायके थोड़े दिन बाद चले जाएंगे.. कौन सी बड़ी बात थी.. !!

कविता ने पीयूष का हाथ खींचकर उसे चुपके से कहा "हम कल नहीं जाएंगे.. तू अपने कस्टमर से मिल ले.. इतनी छोटी सी बात के लिए कोई नौकरी छोड़ता है भला.. ??"

पीयूष ने कविता की बात सुनते ही फोन पर कह दिया.. "ओके सर.. मेरी वाइफ मान गई है.. इसलिए मैं अपना प्रोग्राम केन्सल कर रहा हूँ.. हम कल ऑफिस में मिलते है.. जी सर.. नहीं सर.. पर मेरी भी हालत आप समझिए.. ये तो अच्छा है की मेरी वाइफ काफी समझदार है इसलिए मान गई.. जी सर.. कल मिलते है" कहते हुए उसने फोन काटने का नाटक किया

"थेंक यू कविता.. आई एम प्राउड ऑफ यू.. मुझे तो लगा मैं फंस गया इस बार.. पर तेरी समझदारी की कारण आज मैं बच गया.. वरना आज तो मैं नौकरी छोड़ देने के मूड में था.. पर तुझे मैं नाराज नहीं होने देता" पीयूष के ये कहते ही कविता उसके गले लग गई..

दोनों छत से नीचे उतरे और बेडरूम में चले गए.. बिस्तर पर लैटते ही कविता को खयाल आया.. हे भगवान.. ये प्रोग्राम तो मैंने सासु माँ और रसिक के प्रोग्राम को फ्लॉप करने के लिए बनाया था.. अब तो हमारा जाना ही केन्सल हो गया.. अब मैं क्या करूँ?? अब क्या सासु माँ के साथ आदिपुर जाना पड़ेगा?? रसिक का काला विकराल शरीर याद आते ही कविता को घिन आ गई.. पीयूष तो आराम से सो गया पर कविता की नींद हराम हो गई..

इस तरफ अनुमौसी ने रसिक को सारी बात कर दी थी.. बता दिया था की अब वो अगले रविवार को जाएंगे क्योंकी इस रविवार को कविता अपने मायके जाने वाली थी.. आज अनुमौसी ने शीला के घर सोने का सेटिंग कर दिया.. सिर्फ औपचारिकता के लिए उसने चिमनलाल को साथ चलने के लिए कहा.. पर उन्होंने मना कर दिया.. जब बेटिंग करनी ही न हो तब पिच पर जाकर क्या फायदा.. !! मौसी को उससे कोई फरक नहीं पड़ा.. वो तो उल्टा खुश हो गई.. अब आराम से वो रसिक के साथ अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकती थी.. वैसे अगर चिमनलाल साथ आए होते तो भी उसे दिक्कत नहीं थी.. वो जानती थी की चिमनलाल की नींद इतनी गहरी थी की अगर वो उनके बगल में लेट कर रसिक से चुदवा भी लेती तो भी उन्हेंं पता न चलता..

रसिक के लिए सुबह जल्दी उठना था इसलिए मौसी निश्चिंत होकर सो गई..
 
इस तरफ अनुमौसी ने रसिक को सारी बात कर दी थी.. बता दिया था की अब वो अगले रविवार को जाएंगे क्योंकी इस रविवार को कविता अपने मायके जाने वाली है.. आज अनुमौसी ने शीला के घर सोने का सेटिंग कर दिया.. सिर्फ औपचारिकता के लिए उसने चिमनलाल को साथ चलने के लिए कहा.. पर उन्होंने मना कर दिया.. जब बेटिंग करनी ही न हो तब पिच पर जाकर क्या फायदा.. !!

मौसी को उससे कोई फरक नहीं पड़ा.. वो तो उल्टा खुश हो गई.. अब आराम से वो रसिक के साथ अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकती थी.. वैसे अगर चिमनलाल साथ आए होते तो भी उसे दिक्कत नहीं थी.. वो जानती थी की चिमनलाल की नींद इतनी गहरी थी की अगर वो उनके बगल में लेट कर रसिक से चुदवा लेती तो भी उन्हें पता नहीं चलता..

रसिक के लिए सुबह जल्दी उठना था इसलिए मौसी निश्चिंत होकर सो गई..

दूसरी सुबह रसिक ने मौसी को, कविता के साथ सेटिंग हो जाने की आशा से, ज्यादा मजे से रौंदा.. और कुछ नई हकतें कर उन्हें हवस से पागल कर दिया.. रसिक जैसे जैसे अनुमौसी के भूखे शरीर को नए नए तरीकों से चोदता गया.. वैसे वैसे अनुमौसी रसिक को पाने के लिए ज्यादा रिस्क लेने के लिए ओर भी तत्पर हो रही थी.. मौसी को रसिक के साथ संभोग से जो आनंद मिल रहा था, जीवन का एक ऐसा नया अनुभव था.. जो आज तक उन्हें कभी नसीब नहीं हुआ था.. उसमें भी रसिक जिस तरह की कामुक बातें करते हुए उन्हें चोदता.. आहाहाहाहा.. उन्हें तो मज़ा ही आ जाता..!!

मौसी को धक्के लगाते हुए रसिक ने कहा "मौसी, मेरा तो मन कर रहा है की एक पूरा दिन आपकी टांगों के बीच ही बिताऊँ.. ये सारे झांटें साफ करके आपकी चूत की एकदम चिकनी चमेली बना दूँ.. और फिर चाटता रहूँ" ऐसी ऐसी बातें कर वो मौसी का मन लुभाता


चिमनलाल ने कभी ऐसा कुछ भी मौसी के साथ नहीं किया था.. करने की तो बात दूर.. कभी ऐसा कहा भी नहीं था.. चालीस सालों में मौसी ने कभी चिमनलाल को गाली देते हुए नहीं सुना था.. जब की रसिक तो खुलेआम भेनचोद-मादरचोद जैसे शब्द बोलता रहता.. उनकी उत्तेजना को बढ़ाने में रसिक की गालियां चाट-मसाले का काम करती.. रसिक ने उन्हें ऐसे अलग अलग तरीकों से मज़ा दिया था जो वो कभी भूलने नहीं वाली थी.. पसंद आ गया था रसिक उन्हें.. उसका मजबूत मोटा लंड.. उसका कसरती शरीर.. और उसकी चाटने की कला.. मौसी तो जैसे उसकी कायल हो चुकी थी

कहते है ना.. दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज है.. !!

मौसी ने तय कर लिया था.. अब वो रसिक को किसी भी चीज के लिए मना नहीं करेगी..

कोई कुछ भी कहें.. सेक्स हमेशा से मानवजात के लिए रोमांच, उत्तेजना, आनंद और जीवन-मरण का विषय रहा है.. अच्छे से अच्छे लॉग.. कितने भी संस्कारी और खानदानी क्यों न हो.. इसके असर से बच नहीं पाए है.. ये स्प्रिंग तो ऐसी है जिसे जितना दबाओ उतना ही ज्यादा उछलती है.. सब से उत्तम रास्ता है की सेक्स को संतुलित मात्रा में भोगकर संतोष करना चाहिए.. "युक्तआहार विहारस्य" मतलब सब कुछ कंट्रोल में होना चाहिए.. और मर्यादा में.. सेक्स की भावनाओ को जितना साहजीकता से स्वीकार कर ले उतना वो काम परेशान करती है..

रसिक अपनी लीला करके मौसी को तृप्त करने के बाद.. दूध देकर चला गया उसके बाद मौसी को पता चला की कविता और पीयूष का प्रोग्राम तो केन्सल हो चुका है.. वो अपना सर पकड़कर बैठ गई.. इसका मतलब तो ये हुआ की अब कविता अगले रविवार को जाएगी.. !! फिर तो हमें प्रोग्राम इसी शनि-रवि को सेट करना होगा.. पर मैंने तो इस हफ्ते के लिए रसिक को पहले से मना कर रखा है.. अब क्या करूँ? रसिक को फोन करूँ?

मौसी ने रसिक को फोन लगाया और रसिक को प्रोग्राम चेंज करने के लिए कहा.. पर रसिक ने बताया की मौसी ने इस रविवार के लिए मना किया इसलिए उसने शहर से बाहर जाने का तय किया था.. अब तो इस शनि-रवि को उसका आना मुमकिन नहीं था.. !! मौसी निराश हो गई.. लाख मनाने पर भी रसिक नहीं माना.. रसिक ने कहा की वो सिर्फ आज का दिन शहर में था.. अगर शीला भाभी के घर कुछ सेट हो सके तो करें.. बाकी वो कल सुबह से बाहर निकल जाने वाला था..

मौसी का दिमाग काम नहीं कर रहा था.. इतनी अच्छी योजना पर पानी फिर गया था.. रसिक को बाद में फोन करने की बात कहकर वो शीला के घर से अपने घर चली गई.. जब वो घर के अंदर आई तब कविता किचन में खाना बना रही थी.. मौसी बाहर बरामदे में झूले पर बैठ गई.. वो झूला झूल रही थी तभी रसिक का फोन आया.. बाहर तेज धूप थी इसलिए स्क्रीन पर रसिक का नाम उन्हें दिखाई नहीं दिया.. उन्होंने सीधा फोन उठा लिया.. रसिक की आवाज सुनते ही उन्हों ने उसे होल्ड करने को कहा.. और उससे बात करने के लिए छत पर चली गई

किचन से कविता अपनी सास की सारी हरकतें देख रही थी.. अचानक ऐसा क्या हुआ जो वो झूले से उठकर छत पर चली गई? वो भी इस वक्त? जरूर रसिक का फोन होगा.. अब वो दोनों क्या खिचड़ी पका रहे है ये जानना बेहद आवश्यक था कविता के लिए.. क्यों की वो लॉग जो भी प्लान कर रहे थे वो उसके बारे में ही तो था

मौसी सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते सोच रही थी.. चिमनलाल दुकान के काम से बाहर थे और कल आने वाले थे.. पीयूष भी सुबह बताकर गया था की आज उसे देर होगी ऑफिस में.. मौसी के मन मे खयाल आया की क्यों न यहीं घर पर ही प्लान को अंजाम दिया जाए.. !! उनके घर पर कोई नहीं होगा कविता के अलावा और शीला का घर भी खाली था.. आदिपुर जाकर जो करना था वो तो अब यहीं हो सकता था..

इस बारे में वो रसिक के साथ चर्चा करने लगी.. सीढ़ियों पर छुपकर खड़ी कविता अपनी सास की बातें सुनने का प्रयत्न कर रही थी.. ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था पर इतना तो समझ गई की दोनों ने नए सिरे से कुछ योजना बनाई थी.. आखिर में उसने अनुमौसी को आइसक्रीम के बारे में बात करते हुए सुना.. कविता भी सोच में पड़ गई.. की वो किस बारे में बात कर रही थी और आइसक्रीम का जिक्र क्यों किया?? कहीं मम्मी जी ने मुझे फँसाने का प्लान तो नहीं बनाया?? इस वक्त तो शीला भाभी उसकी मदद के लिए नहीं थी.. और पीयूष भी आज देर रात तक या फिर कल सुबह तक नहीं आने वाला था.. कविता अब अकेली पड़ गई थी..

जैसे जैसे शाम ढलती गई.. कविता की घबराहट बढ़ती गई.. शाम का खाना भी उसने ठीक से नहीं खाया.. मौसी ने भी तबीयत का बहाना बनाकर ज्यादा नहीं खाया.. रात के आठ बजे थे और सास-बहु दोनों टीवी पर सीरीअल देख रही थी.. दोनों में से किसी का भी ध्यान टीवी में नहीं था..

घड़ी में नौ बजते ही.. मौसी अचानक उठी.. और घर के बाहर चली गई.. थोड़ी देर बाद जब वो वापिस लौटी तब उनके हाथ में आइसक्रीम के दो कप थे..

"मैंने कहा था ना तुझे की तबीयत ठीक नहीं है मेरी.. सुबह से ऐसीडीटी हो गई है.. छाती में जल रहा था मुझे.. तो बगल वाली दुकान से आइसक्रीम ले आई.. ले बेटा.. एक आइसक्रीम तू खा ले.. " कहते हुए मौसी ने एक कप कविता को थमाकर दूसरे कप से आइसक्रीम खाना शुरू कर दिया

आइसक्रीम को देखते ही कविता चौकन्नी हो गई.. कहीं ये दोनों मुझे आइसक्रीम में कुछ मिलाकर तो नहीं दे रहे? हे भगवान, अब.. !! मुझे बेहोश करके मेरे साथ कोई गंदी हरकत करने का तो नहीं सोचा होगा ना.. !! कविता पढ़ी लिखी और चालाक थी.. वो आइसक्रीम का कप लेकर किचन में गई.. और बर्तन माँजते हुए आइसक्रीम के कप को सिंक में खाली कर दिया.. बाहर आकर उसने ऐसा ही जताया की बर्तन माँजते माँजते उसने आइसक्रीम खा लिया था..

ये सुनते ही मौसी के चेहरे पर चमक आ गई.. सब कुछ उनके और रसिक के प्लान के मुताबिक चल रहा था.. उन्हों ने एक दो बार कविता को पूछा भी.. "बेटा, तुझे अगर नींद आ रही हो तो सो जा.. !!" अब कविता को यकीन हो गया.. मम्मी जी बार बार उसे सो जाने के लिए क्यों कह रही थी.. उसे विचार आया.. की झूठ मूठ सो जाती हूँ.. फिर देखती हूँ की क्या होता है!!

कविता बेडरूम में सोने के लिए गई तो मौसी भी उसके पीछे पीछे चली आई.. "मुझे भी नींद आ रही है.. आज तू अकेली है तो मैं भी तेरे साथ सो जाती हूँ.. " उन्हें मना करने का कविता के पास कोई कारण नहीं था..

सास और बहु एक ही बिस्तर पर लेटे हुए बातें करने लगे..

मौसी: "कविता बेटा.. अब पीयूष और तेरे बीच कोई तकलीफ तो नहीं है ना.. !! सब ठीक चल रहा है?"

कविता: "हाँ मम्मी जी.. सब ठीक चल रहा है.. वो तो हमारे बीच थोड़ी गलतफहमी थी जो दूर हो गई.. अब कोई प्रॉब्लेम नहीं है"

अनुमौसी: "चलो अच्छा हुआ.. अब तो यही आशा है की जल्दी से तेरी गोद भर जाएँ.. और हमें खेलने के लिए एक खिलौना मिल जाएँ.. बूढ़े माँ बाप को और क्या चाहिए.. !!"

सुनकर कविता शरमा गई.. मम्मी जी की बात तो सही थी पर अभी इस बारे में उसने या पीयूष ने सोचा नहीं था..

थोड़ी देर तक यहाँ वहाँ की बातें कर कविता ऐसे अभिनय करने लगी जैसे वो सो रही हो.. उसने अनुमौसी की बातों का जवाब देना ही बंद कर दिया ताकि उन्हें यकीन हो जाए की वो गहरी नींद सो गई थी..

कविता को सोता हुआ देख मौसी का चेहरा आनंद से खिल उठा.. तसल्ली करने के लिए उसने दो-तीन बार कविता को कुछ पूछा पर कविता ने जवाब नहीं दिया.. एक बार उसे कंधे से हिलाकर भी देखा पर कविता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. वो सोने का नाटक करती रही

मौसी बिस्तर से उठी और चुपके से दरवाजा खोलकर बाहर निकली.. वो घर के बाहर बरामदे में जाकर फोन पर बात करने लगी.. उनके पीछे पीछे कविता भी गई और चुपके से उनकी बातें सुनने लगी..

"हाँ.. सब हो चुका है प्लान के मुताबिक.. मैंने दरवाजा खुला ही छोड़ रखा है.. अब तू आजा.. !! आइसक्रीम खाते ही वो सो गई.. तू आकर अपना काम कर ले और जल्दी निकल जाना.. वैसे कविता कब तक बेहोश रहेगी??" सुनकर कांप उठी कविता.. !! अब क्या होगा?? उसका दिल किया की घर से भाग जाएँ.. !! पर इतनी रात को वो जाए तो जाए कहाँ.. अब रसिक के हाथों से उसे कोई बचाने वाला नहीं था..

कविता चुपचाप बेड पर आकर सो गई.. और मौसी के आने से पहले खर्राटे मरने लगी.. मौसी ने आकर कविता को एक बार फिर जगाने की कोशिश की.. पर अब वो कहाँ जागने वाली थी?? उसने तो अपना अभिनय जारी रखा

कविता को बेहोश देखकर मौसी के चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गई.. मौसी ने अपनी साड़ी उतार दी.. कविता ने हल्के से आँख खोलकर उन्हें देखा.. लटका हुआ बेढंग पेट.. और घाघरे के अंदर लटक रहे बूढ़े कूल्हें.. ब्लाउस और घाघरे में तो कविता ने मौसी को काफी बार देखा था.. पर जैसे ही मौसी ने अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दीये.. उनके बिना ब्रा के निराधार स्तन लटकने लगे.. देखकर कविता शरमा गई.. कविता सोच रही थी की मम्मी जी घाघरा ना उतारें तो अच्छा वरना मैं सच में बेहोश हो जाऊँगी..!!

अचानक घर का दरवाजा बंद होने की आवाज आई.. कविता के दिल की धड़कनें तेज हो गई.. उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. पर आँख बंद कर लेने से वास्तविकता से वो कहाँ बचने वाली थी?? रसिक कमरे मे आया और मौसी के साथ बात करने लगा

"सब कुछ ठीक ठाक है ना मौसी? कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है ना??"

"हाँ हाँ सब ठीक है.. तू खुद चेक कर ले.. बेहोश पड़ी हुई है.. "

रसिक ने कविता की ओर देखा और उसके कोमल गोरे गालों को सहलाने लगा.. रसिक के स्पर्श से कविता सहम गई.. खुरदरी उंगलियों की रगड़ उसे बेहद घिनौनी लग रही थी..

अपनी मर्जी से किसी भी पुरुष के साथ.. फिर चाहे वो उसका पति ना भी हो.. औरत निःसंकोच पैर चौड़े कर सकती है.. पर उसकी मर्जी के खिलाफ अगर कोई उसे छु भी ले तो वो बर्दाश्त नहीं करती..

"आह्ह मौसी.. कितनी नाजुक और कोमल है आपकी बहु रानी.. !! गोरी गोरी.. अब तो अगर ये होश में आ भी गई तो भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा.. कितने दिनों से इसे देखकर तड़प रहा हूँ"

रसिक के लंड की हालत देखकर मौसी समझ गई की कविता के कमसिन जवान बदन का जादू उस पर छाने लगा था.. वरना मौसी को नंगा देखने के बावजूद भी इतना कडा कभी नहीं हुआ था रसिक का..

"जल्दबाजी मत करना रसिक.. कुछ ऊपर नीचे हो गया तो तेरे हाथ कुछ नहीं लगेगा..और मेरी भी इज्जत की धज्जियां उड़ जाएगी "

"अरे मौसी.. ऐसे छातियाँ खोलकर रात को दस बजे अपने बेटे की जोरू को.. मुझ जैसे गंवार के लिए तैयार रखे हुए हो.. और इज्जत की बात कर रही हो??" कहते हुए रसिक ने हँसते हँसते अनुमौसी को सुना दी..

अपना लंड खोलकर मौसी को थमाते हुए रसिक बोला "ये लीजिए मौसी.. जितना दिल करे खेल लीजिए आज तो.. तब तक मैं आपकी बहु को आराम से.. अपने तरीके से देख लूँ"



रसिक ने झुककर कविता के गालों को चूम लिया.. कविता का दिल धक धक कर रहा था..

रसिक का लंड मुठ्ठी में दबाकर आगे पीछे हिलाते हुए वासना में अंध सास ने अपनी जवान बहु को इस कसाई के हाथों बलि चढ़ा दिया था..



कविता मन ही मन प्रार्थना कर रही थी की ये समय जल्दी से जल्दी बीत जाए.. पर समय तो अपनी गति से ही चलने वाला था..

करवट लेकर सोई कविता को रसिक ने पकड़कर सीधा कर दिया.. सब से पहले तो उसने ड्रेस के ऊपर से ही कविता के बबलों को पकड़कर मसल दिया.. रसिक के विकराल हाथों तले कविता की चूचियाँ ऐसे दबी जैसे हाथी के पैरों तले गुलाब के फूल दब गए हो.. और स्तन होते भी बड़े नाजुक है..



कविता के सुंदर स्तनों का स्पर्श होते ही रसिक का लंड डंडे जैसा सख्त हो गया..

"हाय.. कितना कडक हो गया है तेरा आज तो.. डाल दे मेरे अंदर.. तो थोड़ा सा नरम हो जाएँ.. वरना ये तेरी नसें फट जाएगी" पर रसिक को आज अनुमौसी में कोई दिलचस्पी नहीं थी.. जब इंग्लिश शराब सामने पड़ी हो तब भला देसी ठर्रा कौन पिएगा?? एकटक वो कविता की छातियों को साँसों के साथ ऊपर नीचे होते हुए देखता रहा.. कभी वो अपनी पूरी हथेली से स्तनों को नापता.. तो कभी उसकी गोलाइयों पर हाथ फेरता.. रसिक जैसे कविता के जिस्म के जादू में खो सा गया था..

आँखें बंद कर पड़ी हुई कविता प्रार्थना कर रही थी की कोई मुझे बचा लो.. !!

अनुमौसी को तो रसिक का लंड मिल गया.. इसलिए उनका सारा ध्यान उससे खेलने में ही था.. उन्हें कोई परवाह नहीं थी की रसिक कविता के साथ क्या कर रहा था.. कभी वो अपनी निप्पलों से लंड को रगड़ती.. कभी चमड़ी को पीछे धकेलकर उसके टमाटर जैसे सुपाड़े को चूम लेती.. तो कभी उसके अंडकोशों को सहलाती.. जैसे जैसे वो लंड के साथ खेलती गई.. वैसे वैसे उत्तेजना के कारण उनकी सांसें और भारी होती गई..

रसिक ने कविता की छाती से दुपट्टा हटा दिया.. "आहहाहाहाहा.. " उसका दिल बाग बाग हो गया.. रोज सुबह.. जिन स्तनों को नाइट ड्रेस के पीछे छुपा हुआ देखकर आहें भरता था.. आज वही स्तन उसके सामने थे.. नजदीक से तो और सुंदर लग रहे थे.. वो जल्दबाजी करना नहीं चाहता था.. आराम से इन सुंदर स्तनों का लुत्फ उठाना चाहता था..

कविता सोच रही थी की अगर मैं होश में होती तो मजाल थी रसिक की जो मेरे सामने आँख उठाकर भी देखता.. !! ये तो मेरे घर के बुजुर्ग ने ही मेरी इज्जत नीलाम कर दी.. अपनी सास को मन ही मन कोसने लगी वो.. घर को लगा दी आग.. घर के ही चिरागों ने.. !!

ड्रेस का पहला हुक खुलते ही कविता रोने जैसी हो गई.. मौसी ने लाइट भी चालू रखी थी.. क्यों की रसिक ने ऐसा करने को कहा था.. वैसे मौसी तो लाइट को बंद करना चाहती थी पर रसिक तो उजाले में ही कविता के स्तनों के जलवे देखना चाहता था.. हमेशा देहाती बबलों से ही खेलता रहा रसिक.. आज शहरी मॉडर्न स्तनों को खोलकर देखने वाला था..

कविता ने बिल्कुल हल्की सी आँख खोल रखी थी.. उसे सिर्फ दो साये नजर आए.. मौसी घुटनों के बल बैठी हुई थी और रसिक का लंड निगल चुकी थी.. उसे रसिक का लंड देखना था पर वो तो अभी उसकी सास के मुंह के अंदर था.. !! बड़े ही मजे से अनुमौसी रसिक का लंड चूस रही थी.. कविता की तरफ अब रसिक की पीठ थी.. जो पसीने से तर हो चुकी थी.. कविता सोच रही थी की ज्यादा गर्मी तो थी नहीं तो फिर रसिक को इतना पसीना क्यों आ रहा था??

"रसिक, तू सारे कपड़े उतार दे.. तुझे नंगा देखना चाहती हूँ" रसिक का लंड मुंह से निकालकर मौसी ने कहा

"आप भी अपना घाघरा उतार दीजिए मौसी.. दोनों नंगे हो जाते है.. " रसिक ने फटाफट अपने कपड़े उतार फेंके.. दोनों जांघों के बीच झूल रहे उस शानदार लंड को और उसके तगड़े सुपाड़े को देखकर मौसी की सिसकियाँ निकलने लगी.. "कितना बड़ा है रे तेरा!! रूखी भी पागल है.. इतना मस्त लोडा छोड़कर दूसरों के लेने जाती है.. !!"

"मौसी, मैं कविता को भी नंगी देखना चाहता हूँ.. कुछ कीजिए ना.. " मौसी को आगोश में दबाते हुए उसका लंड भोसड़े पर रगड़ते हुए रसिक ने कहा.. उसके स्पर्श से मौसी की वासना चौगुनी हो गई.. रसिक की पीठ पर हाथ फेरते हुए.. उसके कंधों पर लगे पसीने को चाटकर.. अपने भोसड़े के द्वार पर दस्तक देते गरम लंड को घिसते हुए.. कुछ कहा नहीं.. वो सोच रही थी.. बेहोशी की इस हालत में कविता को नंगी कैसे कर दूँ?? अगर उसे होश आ गया तो?? शायद दवाई के असर के कारण वो होश में न भी आए.. पर अपने बेटे की पत्नी को अपनी नजरों के सामने नंगा होते देखूँ?? कविता ने मेरे सामने कभी अपनी छाती से पल्लू भी नहीं हटने दिया.. खैर.. अभी तो वो बेहोश है.. उसे कहाँ पता चलेगा की मैं ही उसके साथ ये सब कर रही हूँ.. !! आज बढ़िया मौका मिला है.. रसिक को हमेशा के लिए अपना बनाने का.. रसिक को बेहोश कविता के साथ जो मर्जी कर लेने देती हूँ.. इतना साहस करते हुए यहाँ तक आ ही गए है.. तो ये भी हो जाने देती हूँ.. किसी को कहाँ कुछ पता चलने वाला है.. !!

मौसी ने रसिक को इस तरह खड़ा कर दिया की उसका लंड बिल्कुल कविता के मुंह के सामने आ गया.. बस एक फुट का अंतर होगा.. हल्की सी आँख खोलकर ये सब चुपके से देख रही कविता की आँख थोड़ी सी ज्यादा खुल गई.. और रसिक के खूंखार लंड को एकदम निकट से देख सकी.. ये एक ऐसा नजारा था जो कविता देखना तो नहीं चाहती थी.. पर एक बार रसिक के तगड़े लंड को देखकर नजरें हटाना मुश्किल था.. इतना विकराल और मोटा लंड था.. पीयूष का लंड तो उसके आगे बाँसुरी बराबर था.. कविता सोच रही थी की ऐसा लंड जब अंदर जाएगा तो क्या हाल होता होगा.. !! अनुमौसी ने पकड़कर रसिक के लंड को नीचे की तरफ दबाया तो वो वापिस स्प्रिंग की तरह उछलकर ऊपर आ गया.. देखते ही कविता के जिस्म में एक मीठी से सुरसुरी चलने लगी..

मौसी ने फिर से रसिक के सुपाड़े को चूम लिया.. "ओह रसिक.. बड़ा जालिम है तेरा ये मूसल.. आह्ह" कहते हुए वो पूरे लंड को चाटने लगी.. रसिक का लंड अब मौसी की लार से सन चुका था.. गीला होकर वो काले नाग जैसा दिख रहा था.. पूरा दिन भजन गाती रहती अपनी सास को.. इस देहाती गंवार का लंड बेशर्मी से चाटते हुए देखकर कविता को कुछ कुछ होने लगा.. अपनी सासुमाँ का नया स्वरूप देखने मिला उसे.. बेशर्म और विकृत.. !!

कविता को पसीने छूटने लगे.. सासुमाँ की लार से सना हुआ रसिक का लंड.. ट्यूबलाइट की रोशनी में चमक रहा था.. कविता की कलाई से भी मोटा लंड जब अनुमौसी ने मुंह में लिया तब ये देखकर कविता की चूत पसीज गई.. पेन्टी का जो हिस्सा उसकी चूत की लकीर से चिपका हुआ था.. वो चिपचिपा और गीला हो गया.. उत्तेजना किसी की ग़ुलाम नहीं होती..

एक के बाद एक कविता के ड्रेस के हुक खोलने कलगा रसिक.. उस दौरान मौसी पागलों की तरह रसिक के सोंटे को चूस रही थी.. ड्रेस खुलते ही अंदर से सफेद जाली वाली ब्रा.. और बीचोंबीच नजर आती गुलाबी निप्पल.. देखते ही रसिक के लंड ने मौसी के मुंह में वीर्य की पिचकारी छोड़ दी.. मौसी को ताज्जुब हुआ.. खाँसते हुए उन्हों ने लंड मुंह से बाहर निकाला.. मौसी को खाँसता हुआ सुनकर कविता समझ गई की क्या हो गया था.. !!


मुंह में पिचकारी मारने की पुरुषों की आदत से कविता को सख्त नफरत थी.. जब कभी पीयूष ने ऐसा किया तब कविता उसे धमका देती.. ब्लू फिल्मों में देखकर जब पीयूष वहीं हरकत कविता के साथ करने की जिद करता तब वो साफ मना कर देती और कहती "तेरा लंड अगर इस ब्लू फिल्म के अंग्रेज की तरह गोरा-गुलाबी होता तो शायद मैं मान भी जाती.. ऐसे काले लंड को चूस लेती हूँ..वही बहोत है.. "

अनुमौसी का भोसड़ा भूख से तड़प रहा था.. और रसिक की पिचकारी निकल गई.. पर अभी उस पर गुस्सा करने का वक्त नहीं था.. मुंह फेरकर उन्होंने पास पड़े कविता के दुपट्टे से रसिक का वीर्य पोंछ दिया और अपनी भोस खुजाते हुए रसिक के लोड़े को प्यार करने लगी.. अभी तक स्खलन के नशे से रसिक का लंड उभरा नहीं था.. रह रहकर डिस्चार्ज के झटके खा रहा था..

मौसी इतनी गरम हो चुकी थी की उनका ध्यान केवल रसिक के लोड़े को फिर से जागृत करने में लग गया था.. रसिक कविता के बदन में ऐसा खो चुका था के आसपास के वातावरण को भूलकर.. सफेद रंग की ब्रा के ऊपर से कविता के अमरूद जैसे स्तनों को अपने खुरदरे हाथों से मसल रहा था.. उसके स्तनों की साइज़ और सख्ती देखकर रसिक सांड की तरह गुर्राने लगा.. अभी डिस्चार्ज होने के बावजूद वो उत्तेजित हो गया..

थोड़ी सी आँख खोलकर कविता, सासुमाँ और रसिक की कामुक हरकतों को देख रही थी.. इसका पता न मौसी को था और न ही रसिक को.. मौसी का सारा ध्यान रसिक के लंड पर था और रसिक का सारा ध्यान कविता की चूचियों पर.. रसिक अब कविता की चिकनी कमर.. हंस जैसी गर्दन और गोरे चमकीले गालों पर चूम रहा था.. कविता की नाभि में बार बार अपनी जीभ घुसेड़ रहा था.. इन चुंबनों से और पूरे बदन पर स्पर्श से कविता उत्तेजित हो रही थी.. चूत से तरल पदार्थ की धाराएं निकल रही थी.. रसिक के आगे पीछे हिलने के कारण.. एक दो बार उसका लंड कविता का स्पर्श कर गया और उस स्पर्श ने उसे झकझोर कर रख दिया..

"मुझे बाथरूम जाना है.. मैं अभी आई.. ध्यान रखना रसिक.. कहीं इसे होश न आ जाए" कहते हुए मौसी कविता के बेडरूम में बने अटैच टॉइलेट में घुस गई.. रसिक ने अब कविता की कमर उचककर उसकी सलवार उतार दी.. पेन्टी के ऊपर से स्पष्ट दिख रही चूत की लकीर को हल्के से छूने लगा.. यह पल रसिक के लिए अविस्मरणीय थी.. नाजुक सुंदर कविता.. पतली कमर और सख्त रसीले स्तनों वाली.. जिसे देखना भी रसिक के लिए भाग्य की बात थी.. पर आज तो वो उसकी चूत तक पहुँच गया था.. इस निजी अवयव पर रसिक हाथ फेरकर रगड़ता रहा..

बिना झांट की टाइट गोरी सुंदर चूत को देखकर रसिक को मौसी के झांटेंदार भोसड़े पर हंसी आ गई.. मौसी भी जवान रही होगी तब उनकी भी चूत ऐसी ही चिकनी होगी.. पर अब ये ऐसी क्यों हो गई?? आकर भी बदल गई.. चौड़ाई भी बढ़ गई.. और स्वच्छता के नाम पर शून्य.. अपने पति को जिस हिसाब से वो कोसती है.. लगता नहीं था की उन्होंने मौसी के भोसड़े का ये हाल किया होगा.. या हो सकता है की मुझ से पहले.. मौसी का खेत कोई ओर जोत चुका हो.. !! क्या पता.. !!

कविता की पेन्टी को एक तरफ करते हुए वो चूत के दर्शन कर धन्य हो गया.. कविता की हालत खराब हो रही थी.. वह उत्तेजित थी और कुछ कर भी नहीं पा रही थी.. उसकी चूत से खेल रहे रसिक का लंड उसे साफ नजर आ रहा था.. उसका कद और मोटाई देखकर उसे हैरत हो रही थी..


तभी अनुमौसी बाथरूम से निकले.. रसिक उनकी बहु के नंगे शरीर से जिस तरह खिलवाड़ कर रहा था वो उन्हों ने एक नजर देखा.. उनके चेहरे पर हवस का खुमार छा चुका था..क्यों की अब तक वो संतुष्ट नहीं हो पाई थी.. कविता की चूत पर हाथ सहला रहे रसिक का हाथ हटाकर उन्होंने अपनी भोस पर रख दिया.. रसिक ने तुरंत तीन उँगलियाँ उनकी गुफा में डाल दी.. रसिक की खुरदरी उंगलियों का घर्षण महसूस होते हुए मौसी के मुंह से "आह्ह" निकल गई.. रसिक के उंगलियों में.. चिमनलाल के लंड से सौ गुना ज्यादा मज़ा आ रहा था.. मौसी के ढीले भोसड़े को अपनी उंगलियों से पूरा भर दिया रसिक ने.. अब मौसी खुद ही कमर हिलाते हुए रसिक की उंगलियों को चोदने लगी..

रसिक के लंड को डिस्चार्ज हुए बीस मिनट का समय हो चुका था.. और अब वो नए सिरे से उत्तेजित होकर झूम रहा था.. इस बार तो वो पहले से ज्यादा कडक हो गया था.. और अब तो उसे जल्दी झड़ने का डर भी नहीं था क्योंकि थोड़ी देर पहले ही डिस्चार्ज हुआ था.. कविता के नंगे जिस्म का आनंद वो बड़े आराम से लेना चाहता था.. उसकी पेन्टी को घुटनों तक सरकाकर वो एकटक उसके संगेमरमरी बदन को देख रहा था.. गोरी चिकनी मस्त जांघें.. और बीच में गुलाबी चूत.. रसिक सोच रहा था की क्या सारी शहरी लड़कियां अंदर से ऐसी ही गोरी और नाजुक होगी?? क्या उनके स्तन भी कविता की तरह सख्त और टाइट होंगे?

उसकी जांघों को सहलाते हुए रसिक के लंड ने झटका खाया.. कविता अधखुली आँख से एकटक रसिक के लोड़े को देख रही थी.. वो उत्तेजित होने के बावजूद कुछ कर नहीं सकती थी.. उसमे भी जब रसिक के भूखे होंठों का कविता की चूत की लकीर से मिलन हुआ तब कविता ने बड़ी मुसीबत से अपने शरीर को स्थिर रखा.. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे एक साथ हजारों चींटियाँ उसकी चूत में रेंगने लगी हो.. वो बेहद उत्तेजित हो गई..

पर ऐसा भी नहीं था की रसिक के चाटने से उसे मज़ा आ रहा था.. रसिक के करीब होने से भी उसे घिन आ रही थी.. पर वो क्या करती? एक तरफ उसका तंदूरस्त लंड झूल रहा था जो किसी भी स्त्री को ललचा दे.. खास कर उसका कद और मोटाई.. उस लंड को देखकर उसे डर तो लग ही रहा था पर अपनी सास का उसके प्रति आकर्षण देखकर उसे यकीन हो गया था की एक मादा को जो कुछ भी चाहिए.. वो सब कुछ था उस लंड में..

रसिक का हाथ कविता के कूल्हों तक पहुँच गया.. मजबूती से रसिक ने नीचे से कूल्हों को पकड़कर कविता की कमर को ऊपर की तरफ उठा लिया.. ऊपर उठते ही कविता की चूत फैल गई.. और अंदर का लाल गुलाबी हिस्सा दिखाई देने लगा.. रसिक ने झुककर अपना चेहरे से चूत का स्पर्श किया.. कामरस से लथबथ कविता की चूत ऐसे रस रही थी जैसे पके हुए आम को काटने पर रस टपकता है.. गुलाबी बिना झांटों वाली चूत.. एकदम टाइट.. गोरी और चिकनी.. ऊपर नजर आ रहा गुलाबी सा दाना.. और बीच में लसलसित लकीर.. देखकर ही रसिक अपने आप को रोक न पाया और उसने हल्के से चूत को काट लिया.. दर्द के कारण कविता सहम गई पर बेचारी कोई प्रतिक्रिया न दे पाई.. रसिक कविता की चूत की फाँकें चाटता रहा और कविता पानी बहाती रही..

देखते ही देखते कविता झड़ गई.. उसकी चूत खाली हो गई.. शरीर अकड़ कर ढीला हो गया..

मौसी को अपनी उंगलियों से ही स्खलित कर दिया रसिक ने.. वो जानता था की एक बार तो उसका लंड स्खलित हो चुका था.. दूसरी बार अगर वो मौसी को ठंडा करने में झड़ गया तो तीसरी बार तुरंत लंड खड़ा होना मुश्किल था.. और उतना समय भी नहीं था.. इस बार की उत्तेजना उसने कविता को चोदने के लिए आरक्षित रखी हुई थी.. उसकी उंगलियों ने मौसी का पानी निकाल दिया था इसलिए मौसी शांत थी..


अब रसिक कविता की जांघें फैलाकर बीच में बैठ गया.. उसकी इस हरकत से कविता इतनी डर गई की पूछो मत.. ऊपर से जब मौसी ने कहा "थोड़ा तेल लगा दे.. ऐसे सूखा तो अंदर नहीं जाएगा" तब कविता को यकीन हो गया की उसे अब कोई नहीं बचा सकता.. कविता विरोध करना चाहती तो भी रसिक अब ऐसे पड़ाव पर पहुँच चुका था की उसे चोदे बगैर छोड़ता नहीं ये कविता को भी पता था.. कविता जैसी फूल से लड़की.. रसिक के सांड जैसे शरीर से रौंदे जाने वाली थी..

अपनी चूत पर गरम अंगारे जैसा स्पर्श महसूस होते ही कविता समझ गई की रसिक का सुपाड़ा उसकी छोटी सी चूत पर दस्तक दे रहा था.. चूत के वर्टिकल होंठों को टाइट करते हुए कविता अपनी बर्बादी के लिए तैयार हो रही थी तभी..

तभी.. किसी ने दरवाजा खटखटाया.. रात के साढ़े ग्यारह बजे कौन होगा?? मौसी और रसिक दोनों ही डर गए.. रसिक भी कविता की जांघों के बीच से खड़ा हो गया.. उसका खतरनाक लंड चूत के सामने से हटा लिया.. कविता को ऐसा लगा.. मानों किसी देवदूत ने आकर उसकी इज्जत बचा ली हो..
 
अपनी चूत पर गरम अंगारे जैसा स्पर्श महसूस होते ही कविता समझ गई की रसिक का सुपाड़ा उसकी छोटी सी चूत पर दस्तक दे रहा था.. चूत के वर्टिकल होंठों को टाइट करते हुए कविता अपनी बर्बादी के लिए तैयार हो रही थी तभी..

तभी.. किसी ने दरवाजा खटखटाया.. रात के साढ़े ग्यारह बजे कौन होगा?? मौसी और रसिक दोनों ही डर गए.. रसिक भी कविता की जांघों के बीच से खड़ा हो गया.. उसका खतरनाक लंड चूत के सामने से हटा लिया.. कविता को ऐसा लगा.. मानों किसी देवदूत ने आकर उसकी इज्जत बचा ली हो..

छलांग मारकर रसिक ने अपने कपड़े उठाए और जल्दी जल्दी पहन लिए.. एक पल पहले उसका थिरक रहा लंड अभी एकदम नरम हो गया था.. अनुमौसी और रसिक दोनों ही सकते में थे.. कविता के दिल को थोड़ा सा चैन मिला पर अभी भी उसे पक्का यकीन नहीं था की वो बच गई थी या नहीं..

"कौन होगा मौसी?" रसिक ने घबराते हुए कहा.. थरथर कांप रही मौसी के गले से आवाज ही नहीं निकली

"क्या पता.. रसिक!! अब इसका क्या करें? इसे कपड़े कैसे पहनाएंगे इतनी जल्दी? मैं मना कर रही थी इसे पूरा नंगा मत कर.. तुझे बड़ा शौक था इसे नंगी करने का.. !!"

"अरे मौसी.. अभी ये सब बातों का वक्त नहीं है.. पहले ये सोचो को कविता को छुपाएंगे कैसे?" रसिक के ये कहते ही मौसी ने एक चादर डाल दी कविता के नंगे जिस्म पर

कविता को अब चैन मिला था.. अधखुली आँखों से वो घबराए हुए रसिक और सासुमाँ को देखकर खुश हो रही थी.. मौसी की उत्तेजना और रसिक के लंड की सख्ती.. कब की गायब हो चुकी थी.. डर और सेक्स एक साथ होना असंभव सा है.. इस वक्त कौन होगा दरवाजे पर? पीयूष तो सुबह के तीन बजे से पहले नहीं आने वाला था और चिमनलाल को आने में और एक दिन का वक्त था.. कहीं कोई चोर या लुटेरा तो नहीं होगा.. !! पर चोर थोड़े ही दरवाजा खटखटाकर आएगा??

"मौसी, आप दरवाजा खोलिए.. फिर जो भी हो देख लेंगे" रसिक बहोत डरा हुआ था.. उसे डरा हुआ देखकर मौसी की भी फट गई..

"रसिक, तू खटिया की नीचे छुप जा.. यहाँ कोई नहीं आएगा.. " फटाफट कपड़े पहनकर उन्हों ने दरवाजा खोला

दरवाजे खुलते ही उसने देखा.. सामने शीला, मदन और वैशाली खड़े थे.. वैशाली तो मौसी को देखते ही उनके गले लग गई और रोने लगी.. उत्तेजना से अचानक उदासी के भाव धारण करना मौसी के लिए थोड़ा सा कठिन था.. पूरा माहोल ही बदल चुका था.. अंदर बिस्तर पर चादर ओढ़े लेटी कविता को.. शीला भाभी और वैशाली की आवाज सुनकर इतनी खुशी हो रही थी.. शीला भाभी ने आज मेरी लाज बचा ली.. वो चाहकर भी उठ न पाई क्योंकि उसके बिस्तर के नीचे ही रसिक छुपा हुआ था

तीनों मौसी के घर अंदर आकर सोफ़े पर बैठ गए.. मौसी जबरदस्त टेंशन में थी.. अब ये लोग कब उठेंगे क्या पता? इनके जाने से पहले रसिक को भी बाहर निकालना मुमकिन नहीं था.. उससे पहले कहीं उसे होश आ गया और अपने आप को नंगा देख लिया तो??? वो जरूर चिल्लाएगी.. मदन को पता चल गया तो? शीला को तो चलो वो समझा देगी.. पर मदन और वैशाली को क्या बताती??

रो रही वैशाली को देखकर मौसी को भी बहोत दुख हुआ.. पर वो फिलहाल अपना दुख व्यक्त करने की स्थिति में न थी.. उनका सम्पूर्ण ध्यान कविता के बेडरूम पर ही था.. शीला ने संक्षिप्त में कलकत्ता में घटी घटनाओं के बारे में बताया.. और फिर खड़े होते हुए बोली

"ठीक है मौसी.. चलते है.. फिर आराम से बात करेंगे.. ये तो चाबी लेनी थी इसलिए आपको जगाया.. हम भी थके हुए है.. घर जाकर सो जाएंगे.. फिर कल मिलकर आराम से बात करेंगे.. !!"

मौसी ने औपचारिकता दर्शाते हुए कहा "अरे शीला.. तुम लोग बैठो.. मैं चाय बनाती हूँ.. "

"कविता कहाँ है, मौसी?" वैशाली की आँखें अपनी सहेली को ढूंढ रही थी

घबराते हुए मौसी ने कहा "उसकी तबीयत ठीक नहीं है.. इसलिए आज जल्दी सो गई.. अपने कमरे में सो रही है.. " बात चल रही थी तभी कांच टूटने की आवाज आई.. सब के कान खड़े हो गए..

"लगता है बाहर से आवाज आई" मौसी ने सबका ध्यान भटकाने के इरादे से कहा

अनुमौसी, मदन और शीला के साथ बातों में व्यस्त थी तब वैशाली कब उठकर कविता के कमरे के तरफ चली गई.. मौसी को पता भी नहीं चला.. वैशाली को कविता के बेडरूम से बाहर निकलते हुए देख मौसी को डर के कारण चक्कर आने लगी.. मर गए.. !! वैशाली ने देख लिया सब.. अब क्या होगा?? मौसी बेचैन हो रही थी.. वैशाली से नजरें नहीं मिला पा रही थी.. पर वैशाली ने कुछ कहा नहीं..

शीला, मदन और वैशाली चले गए और दरवाजा लॉक करते हुए मौसी कविता के बेडरूम की ओर भागी.. उनके आश्चर्य के बीच देखा.. कविता आँखें मलते हुए अपने बालों में क्लिप लगा रही थी.. और सुस्ती भारी आवाज में बोली "क्या हुआ मम्मी जी, आप अब तक जाग रहे हो? कोई आया था क्या हमारे घर? मैंने आवाज सुनी इसलिए जाग गई.. पता नहीं आज इतनी नींद क्यों आ रही है मुझे.. मम्मी जी, आपको भी आइसक्रीम खाने के बाद ऐसा कुछ महसूस हुआ था क्या?"

"नहीं बेटा.. मैं तो कब से जाग रही हूँ.. मुझे तो ऐसा कुछ नहीं हुआ.. तू शायद पूरे दिन काम करके थक गई होगी इसलिए नींद आ रही होगी.. कोई बात नहीं.. वैशाली, शीला और मदन आए थे.. वो कलकत्ता से वापिस आ गए.. घर की चाबी लेने आए थे.. " मौसी की नजर बार बार कविता के दुपट्टे पर जा रही थी.. जिस पर वीर्य के धब्बे लगे हुए थे.. उन्हों ने ही रसिक का वीर्य दुपट्टे से पोंछा था..

"आप सो जाइए मम्मी जी.. मैं बाथरूम जाकर आती हूँ" कविता बाथरूम में घुसी और मौसी ने मुड़कर बेड के नीचे देखा.. पर रसिक वहाँ नहीं था.. गया कहाँ वो कमीना?? कहीं बाथरूम में तो नहीं छुपा होगा? बाप रे.. तब तो कविता को जरूर पता चल जाएगा.. !!

तभी कविता बाथरूम से निकलते हुए बोली "अरे मम्मी जी.. बाथरूम की खिड़की का कांच किसने तोड़ा?? लगता है बिल्ली ने तोड़ा होगा.. कांच के टुकड़े पड़े है बाथरूम में.. " सुनकर मौसी के दिल को चैन मिला.. जरूर रसिक कांच तोड़कर भाग गया होगा..

"बेटा कांच टूटना तो अच्छा शगुन माना जाता है.. तू चिंता मत कर और आराम से सो जा.. " कहते हुए मौसी अपने कमरे में चली गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया.. कविता का ओर सामना करने की उनमें हिम्मत नहीं थी..रह रहकर एक ही सवाल उन्हें परेशान कर रहा था की कविता को कपड़े किसने पहनाये ?? क्या वैशाली ने पहनाए होंगे? वैशाली ने कमरे में कविता को नंगी पड़ी देखकर क्या सोचा होगा? या फिर शायद रसिक ने जाने से पहले कपड़े पहना दीये हो? रसिक को कांच तोड़ते हुए या फिर भागते हुए कविता ने देख तो नहीं लिया होगा?

ढेर सारे सवाल थे और जवाब एक भी नहीं था.. मौसी अपना सर पकड़कर सो गई..

इस तरफ कविता शीला भाभी के लिए मन से आभार प्रकाट कर रही थी.. सोच रही थी की आज तो उनके कारण इज्जत बच गई.. वरना आज तो रसिक का गधे जैसा लंड उसकी कोमल चूत के परखच्चे उड़ा ही देता.. कविता को उतना तो पता था की रसिक ने अपना सुपाड़ा चूत के अंदर डाल दिया था जब दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी थी.. वो याद आते ही वह अपनी चूत पर हाथ फेरकर मुआयना करने लगी.. कहीं कोई नुकसान तो नहीं हुआ था.. !! हाथ फेरकर उसने तसल्ली कर ली.. सब कुछ ठीक था.. शरीर को तो नुकसान नहीं हुआ था.. पर उसका मन घायल हो चुका था उसका क्या?? अपनी चूत को सहलाते हुए वो सो गई.. और दूसरे दिन काफी देर से जागी.. जब वो उठी तब घड़ी में आठ बज रहे थे.. रोज ६ बजे जागने वाली कविता को आज उठने में देर हो गई.. शायद आसक्रीम में मिलाई दवा का असर था..

उठकर फटाफट किचन में गई.. मम्मी जी के लिए चाय बनानी थी.. पर किचन में जाते ही उसे पता चला की उसकी सास तो कब की चाय बना चुकी थी.. वो तुरंत बाथरूम में गई.. ब्रश किया और नहा कर फटाफट कपड़े पहने.. जल्दबाजी में आज वो ब्रा पहनना भूल गई थी.. उसने बाथरूम के कोने में देखा.. टूटे हुए कांच के टुकड़े मम्मी जी ने साइड में कर रखे थे.. और कांच के ढेर के बीच एक काला धागा था.. वही धागा उसने रसिक की कलाई पर अनगिनत बार देखा था..

कविता के मन में कल रात की घटनाएं फिर से ताज़ा हो गई.. चुपचाप वो कांच के ढेर को इकठ्ठा कर डस्टबिन में डालने गई तब एक कांच का टुकड़ा उसकी उंगली में घुस गया.. और खून टपकने लगा.. दर्द के मारे वो कराहने लगी.. खून टपकती उंगली को लेकर वो किचन में आई.. और घाव पर हल्दी लगाकर पट्टी बांध दी.. मन ही मन मम्मी जी को कोसते हुए कविता गुस्से से घर के काम में उलझ गई.. पीयूष का मेसेज था.. वो अब शाम को वापिस आने वाला था.. अनुमौसी कहीं बाहर गई हुई थी..

घर के काम निपटाकर वो दस बजे शीला भाभी के घर गई.. कविता को देखते ही वैशाली उसके गले लग गई और खूब रोई.. शीला भाभी ने भी उसे रोने दिया.. रोने से मन हल्का हो जाता है..

"मदन भैया कहीं नजर नहीं आ रहे??" कविता ने मदन को न देखकर शीला से पूछा

शीला: "मदन पुलिस स्टेशन गया है.. इंस्पेक्टर तपन से मिलने.. अब संजय से छुटकारा पाने के लिए कुछ तो कार्यवाही करनी पड़ेगी ना.. साले उस हरामजादे ने मेरी बेटी की ज़िंदगी तबाह कर दी.. पहली बार मुझे पुलिस स्टेशन की चौखट पर पैर रखने पड़े.. और कितना कुछ सहना पड़ा.. सब उस कमीने के कारण.. उस नालायक को तो अब मदन और इन्स्पेक्टर तपन ही सीधा करेंगे.. !!"

वैशाली: "कीड़े पड़ेंगे कीड़े.. उस हरामी को.. मैं तो वापिस जाने के लिए तैयार ही नहीं थी.. मुझे पता था की मैं वहाँ एक पल भी जी नहीं पाऊँगी.. इतना अच्छे से जानती हूँ मई उस नालायक को.. मुझे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी उसने.. तू मानेगी नहीं कविता.. वो आदमी इतना हलकट है.. सारा दिन उसे अलग अलग औरतों के साथ बिस्तर पर पड़े रहने के अलावा और कुछ नहीं सूझता.. जब देखों तब सेक्स ही सेक्स.. चवन्नी की कमाई नहीं और पूरा दिन बस बिस्तर पर काटना होता है उसे.. अब तू ही बता.. ऐसे आदमी के साथ कैसे जीवन गुजारें?? उसकी जेब से प्रेमिकाओं की तस्वीरें तो अक्सर हाथ लगती.. बेग में जब देखों तब ढेर सारे कोंडम के पैकेट लेकर घूमता रहता है.. और कुछ पूछूँ तो उल्टा मुझ पर ही गुस्सा करता था.. बिजनेस ट्रिप के लिए शहर से बाहर जा रहा हूँ.. ये कहकर शहर की ही किसी होटल में किसी रांड को लेकर पड़ा रहता था.. और मैं घर पर उसका इंतज़ार करते हुए उसके बूढ़े माँ बाप की सेवा करती थी.. ये सब मम्मी को बताती तो उन्हें दुख होता.. कभी न कभी संजय सुधर जाएगा इस आशा में अब तक जीती रही.. पर ऐसा कब तक चलता.. !!" वैशाली की व्यथा आंसुओं के संग बह रही थी.. नॉन-स्टॉप.. !!

कविता: "एकदम सही बात है तेरी वैशाली.. ऐसी लोगों को तो जैल में ही बंद कर देना चाहिए.. वो मदन भैया के इंस्पेक्टर दोस्त है ना.. बराबर ट्रीटमेंट देंगे संजय को.. तू चिंता मत कर.. अब तू हम सब के बीच है.. एकदम सलामत.. जो भी हुआ.. बुरा सपना समझकर भूल जा.. और एक नई ज़िंदगी की शुरुआत कर.. !!"

वैशाली को कविता की बात सुनकर बहोत अच्छा लगा.. तभी मदन घर आ पहुंचा.. कविता से हाय-हैलो कहकर वो अपने कमरे मे चला गया.. कविता को भी ये महसूस हुआ की वो सब अपनी निजी बातें करना चाहते होंगे.. इसलिए निकल जाना ही बेहतर होगा.. वो उठकर घर चली आई.. दोपहर का खाना खाकर सास और बहु अपने अपने कमरे में आराम करने लगे..

शाम को दोनों जाग गए और बरामदे में बैठे हुए थे.. मौसी झूला झूल रही थी और कविता बैठे बैठे सब्जियां काट रही थी.. तभी कविता पर उसकी मम्मी का फोन आया.. और उन्होंने बताया की मौसम बहोत बीमार हो गई थी.. और अस्पताल में थी.. इसलिए रमिला बहन चाहती थी की कविता थोड़े दिनों के लिए वहाँ आ जाए तो घर के काम में.. और शादी की तैयार में उनकी मदद कर सकें.. सारी बातें मौसी की उपस्थिति में हुई थी इसलिए उन्हें बताने की कोई जरूरत नहीं थी.. कविता ने कहा की वो दोनों आज आने ही वाले थे पर पीयूष को ऑफिस में अर्जन्ट काम आ जाने के कारण नहीं आ पाए.. और ये भी कहा की शाम को पीयूष के आते ही.. उससे चर्चा करने के बाद तय करेंगे..

मम्मी का फोन काटते ही कविता ने मौसम को फोन लगाया.. मौसम ने भी कहा की उसकी तबीयत अब ठीक थी.. और वो जल्दबाजी न करें.. आराम से आए..

कविता की जान अब अपने मायके में अटक चुकी थी.. उसे मौसम की चिंता सताने लगी.. शाम को पीयूष घर आया.. खाना खाया.. फिर कविता ने उसे सारी बात बताई.. लेकिन पीयूष को मौसम ने पहले ही मना कर रखा था इसलिए वो जाना नहीं चाहता था.. उसने ऑफिस के काम का बहाना बनाते हुए कविता से कहा "तू सुबह ६ बजे की बस में निकल जाना.. "

कविता ने तुरंत अपनी पेकिंग शुरू कर दी.. रात को बेडरूम के दरवाजे बंद होते ही.. पीयूष ने आज जबरदस्त चुदाई की कविता के साथ.. वैसे कविता सेक्स के लिए उतनी उत्सुक नहीं लगी उसे.. वरना रोज तो वो भूखे भेड़िये की तरह पीयूष पर टूट पड़ती.. पर जैसे पीयूष के हाथ उसके जिस्म पर फिरने लगे.. उसे रसिक के स्पर्श की याद आ जाती और वो सहम जाती.. पीयूष ने सोचा की शायद कविता उसके मायके की चिंता के कारण ठीक से सहयोग नहीं कर पा रही है.. इसलिए उसने कुछ पूछा नहीं.. कविता इस टेंशन में थी की कहीं पीयूष की कल की घटना के बारे में कुछ पता न चल जाए.. वैसे रसिक ने कुछ किया तो नहीं था.. पर उसकी छाती पर और चूत पर काटने के निशान थे.. कहीं पीयूष ने देख लिए तो??


unin

जब पीयूष धक्के लगाकर.. उसकी चूत में वीर्य छोड़कर शांत होकर बगल में लेट गया.. तब जाकर कविता के मन को शांति मिली..

सुबह पाँच बजे कविता जाग गई.. और तैयार होकर उसने पीयूष को जगाया.. पीयूष उसे बस-अड्डे पर छोड़ आया.. कविता को तुरंत बस मिल गई.. सीट पर बैठकर.. टिकट को पर्स में रखकर उसने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर डायल किया.. डायल करते हुए कविता के चेहरे की मुस्कान देखने लायक थी.. ये नंबर ऐसा था जो उसने मोबाइल पर सेव नहीं किया था.. जरूरत भी नहीं थी.. उसके दिल में छपा हुआ था ये नंबर..

उसने पिंटू को फोन लगाया

सुबह साढ़े छह बजे कविता का नाम स्क्रीन पर देखकर पिंटू चोंक गया.. इतनी सुबह कविता ने क्यों फोन किया होगा? कहीं पीयूष से फिर से कोई झगड़ा तो नहीं हुआ??

"हैलो.. "

"गुड मॉर्निंग मेरी जान" कविता के मुंह से ये शब्द सुनकर पिंटू के चेहरे पर मुस्कान आ गई..

"क्या बात है कविता.. !! आज सुबह सुबह मुझे फोन करने का टाइम मिल गया तुझे? तेरे शोहर के लिए टिफिन तैयार नहीं करना क्या?"

"मुझे बोलने भी देगा या तू ही बकता रहेगा??" कविता इतनी जोर से बोली की सारे पेसेन्जर उसकी तरफ देखने लगे.. कविता शरमा गई..

"तू कहाँ है? इस शहर में या हमारे शहर में?" कविता ने पूछा.. पिंटू और कविता एक शहर में रहते थे.. कविता की शादी इस शहर में हुई और पिंटू की नौकरी भी इस शहर में थी..

"मैं हमारे शहर अपने घर पर ही हूँ.. बता.. कुछ प्रॉब्लेम हुई है क्या?"

"प्रॉब्लेम तो कुछ नहीं है.. मौसम की तबीयत ठीक नहीं है.. मम्मी को हेल्प करने में घर आ रही हूँ.. तू वहीं हो तो हम मिलेंगे.. मुझे तेरे साथ ढेर सारी बातें करनी है.. मैं लगभग बारह बजे बस स्टेशन पहुँच जाऊँगी.. हम दोनों दो-तीन घंटे साथ रहेंगे.. उसके बाद मैं घर जाऊँगी.. मम्मी को बोल दूँगी की बस रास्ते में खराब हो गई थी इसलिए देर हो गई.. वो मान जाएगी.. तू जगह का बंदोबस्त कर.. बहोत दिन हो गए यार.. !!"

"क्या बात है कविता.. मैं भी तुझे बहोत मिस करता हूँ.. आजा जल्दी.. बस के शहर में घुसते ही तू मुझे कॉल कर देना.. मैं तुझे लेने आ जाऊंगा.. "

"ओके जानु.. मैं तुझे पहुंचकर कॉल करती हूँ.. आई लव यू"

"आई लव यू टू, कविता"

पिंटू रोमांचित हो गया.. काफी दिनों के बाद कविता से अकेले मी मिलने का मौका मिलने वाला था.. पिंटू बस पहुँचने के दो घंटे पहले ही बस-अड्डे के बाहर बैठ गया.. बार बार घड़ी में देख रहा था.. कब कविता आए और कब उसे लेकर जाऊँ .. तभी कविता का कॉल आया

"बस अब पाँच मिनट में पहुँच जाएगी.. तू कहाँ है?"

"मैं तो कब से यहीं हूँ बस स्टेशन पर.. तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ"

कविता जैसे ही बस से उतरी.. पिंटू ने उसका बेग हाथ से ले लिया.. दोनों बाइक की तरफ पहुंचे.. और कविता उसके पीछे बैठ गई.. उसे शादी से पहले के दिन याद आ गए.. तब भी वो पिंटू की बाइक की पीछे ऐसे ही घूमती थी.. फूल स्पीड में चल रही बाइक पर अपने स्तनों को पिंटू की पीठ पर दबाकर कविता खुद भी मजे ले रही थी और पिंटू को भी दे रही थी..

"इतनी चुप क्यों है तू? डर लग रहा है क्या? पीयूष से ज्यादा तेज चला रहा हूँ बाइक इसलिए?"

कविता: "पिंटू, आज मुझे किसी चीज का कोई डर नहीं है.. मन कर रहा है की बस पूरी ज़िंदगी यूं ही तेरे पीछे बैठी रहूँ"

पिंटू का बाइक अम्बर सिनेमा हॉल के बाहर पार्क करने के बाद पिंटू ने फटाफट टिकट ले ली.. मूवी शुरू हो चुका था.. दिन का समय था और फ्लॉप मूवी थी इसलिए अंदर आठ-दस लोग ही थे.. ज्यादातर कपल्स ही थे जो एकांत के लिए आए हुए थे..

कविता का हाथ पकड़कर अंधेरे में पिंटू उसे कॉर्नर सीट की तरफ ले गया.. और जो काम करने आए थे उसमे व्यस्त हो गए..

पिंटू ने कविता का हाथ अपने हाथ में लिया और उसे चूम लिया.. ये वही हथेली थी जिस पर कविता ने अनगिनत बार अपना नाम लिखका था.. कविता की ये आदत थी.. वे दोनों जब भी मिलते तब वो पिंटू की हथेली पर अपना नाम लिख देती.. अपना अधिकार भाव जताने के लिए.. पिंटू तो जैसे कविता की हथेली को पाकर तृप्त हो गया हो वैसे उसे पकड़कर काफी देर तक बैठा ही रहा..

आखिर कविता ने खुद उसका हाथ अपने मुलायम स्तनों से दबा दिया.. स्तनों का स्पर्श होते ही पिंटू के अंदर का पुरुष जाग उठा.. और उसने थोड़ा और दबाव बनाकर स्तनों को दबा दिया.. दो दिन पहले ही रसिक के काटने से कविता को स्तनों में थोड़ा दर्द हो रहा था.. पर फिर भी वह कुछ न बोली.. वो दर्द सहने को तैयार थी पर अपने प्रेमी को रोकना नहीं चाहती थी..

पिंटू ने अब दोनों हाथों से उसके स्तनों को जोर से दबाया.. दर्द के कारण कविता कराह उठी.. पिंटू ने तुरंत हाथ खींच लिए.. पर कविता ने उसके हाथ पकड़कर फिर से अपने स्तनों पर लगा दीये

कविता: "तू मेरी फिक्र मत कर.. इनका तो काम ही है दबना.. तेरे हाथों से दबना तो इनका सौभाग्य है.. मन से तो मैं अपना शरीर तेरे नाम कर चुकी हूँ पिंटू.. समाज भले ही मुझे पीयूष की पत्नी के रूप में जानता हो.. पर मेरा दिल तो तुझे ही अपना स्वामी मान चुका है.. तू घबरा मत.. जैसे मन करे दबा दे.. मसलकर रख दे इन्हें.. तेरा अधिकार है इन दोनों पर.. "


bf

उस रात की घटना ने कविता को धक्का पहुंचाया था.. जब वो दो कौड़ी का दूधवाला उसकी मर्जी दे खिलाफ मेरे जिस्म को रौंद गया.. तू मैं भला मेरे मनपसंद पिंटू को क्यों रोकूँ? वो तो मेरा अपना है.. कमबख्त मेरी सास ने.. अपनी हवस बुझाने के चक्कर में.. मेरे शरीर को अपवित्र कर दिया

जैसे जैसे कविता उस रात की घटना के बारे में सोचती गई.. उसका क्रोध और बढ़ता गया.. और वो पिंटू के हाथों को अपने स्तनों पर और मजबूती से दबाती गई.. दर्द इतना होने लगा की उसकी आँखों से आँसू निकल गए.. जो पिंटू को अंधेरे में नजर नहीं आए..

पिंटू आसानी से स्तनों को मज़ा ले सकें इसलिए कविता ने दो हुक खोलकर अपना एक स्तन बाहर खींच निकाला.. ए.सी. की ठंडक स्तन पर महसूस होते ही कविता को इतना अच्छा लगा की उसने जरूरत न होते हुए भी तीसरा हुक खोल दिया और दूसरा स्तन भी बाहर निकाल दिया.. साड़ी के पल्लू से स्तनों को ढँककर पिंटू का हाथ पल्लू के अंदर डाल दिया..


ob

जैसे जैसे पिंटू का हाथ उसके नग्न मांस के गोलों पर घूमने लगा.. कविता को बहोत मज़ा आने लगा.. पिंटू का स्पर्श उसे पागल बना रहा था.. पिंटू का लंड भी उसकी पतलून में उछलने लगा था.. कविता ने अधिकारपूर्वक पेंट के ऊपर से उसका लंड पकड़ लिया.. और पिंटू के कंधे पर सिर रख दिया.. लंड को पकड़ते ही कविता ने पिंटू के कान में कहा

dm

"यार किसी गेस्टहाउस का बंदोबस्त किया होता तो इसे आराम से अंदर ले पाती.. कितना सख्त हो गया है.. !! सिर्फ पकड़कर मैं क्या करूँ?" कविता की इस बात का कोई जवाब नहीं था पिंटू के पास.. वो मुसकुराता रहा और हॉल के अंधेरे में.. कविता के स्तनों को दबाता रहा..

कविता ने धीरे से पिंटू के पेंट की चैन खोल दी.. अन्डरवेर के ऊपर से भी उसे पिंटू के लंड की गर्मी और सख्ती का एहसास हो रहा था.. वस्त्र की एक परत कम होने से कविता और पीयूष दोनों की उत्तेजना बढ़ती गई.. एक दूसरे को नग्न कर भोगने की इच्छा तीव्रता से सताने लगी..

पीयूष के कंधे से सर हटाकर कविता ने उसके होंठों को चूम लिया.. पिंटू के गुलाबी होंठ कविता को बहोत पसंद थे.. कविता के स्तनों को मसलते हुए अपने होंठ उसे सौंपकर पिंटू आराम से मजे ले रहा था.. कविता कभी उसके होंठों को चूमती.. कभी चाटती और कभी मस्ती से काट भी लेती थी.. कविता का हाथ अब पिंटू की अन्डरवेर के अंदर घुस गया और मुठ्ठी में उस सुंदर लिंग को पकड़ लिया.. बेशक उनकी हरकतें ऐसी थी की आसपास के लोगों को पता चल जाए.. पर बाकी सारे कपल्स भी ऐसी ही मस्ती में लीन थे..

पिंटू का लंड हिलाते हुए कविता को अनायास ही रसिक के लंड की याद आ गई.. बाप रे.. कितना खतरनाक था रसिक का लंड..!! ऊपर चढ़कर पूरा डाल दिया होता तो मर ही जाती मैं.. अंदर उछल रहे लंड को अपनी कोमल हथेली से महसूस करते हुए कविता की चूत से कामरस बहने लगा.. सिनेमा हॉल के अंधेरे में कई कपल्स उत्तेजक हरकतें कर रहे थे.. कई लोगों की सिसकियाँ भी सुनाई पड़ रही थी.. कविता और पीयूष के आगे बैठा हुआ कपल तो सारी सीमाएं लांघ चुका था.. उस पुरुष की गोद में सर रखकर जिस तरह वो औरत ऊपर नीचे कर रही थी उससे साफ प्रतीत हो रहा था की वो लंड चूस रही थी..

ये देखते ही कविता ने पिंटू की और देखकर एक शरारती मुस्कान दी.. दोनों की नजरें चार हुई.. इशारों इशारों में पिंटू ने पेशकश कर दी और कविता ने स्वीकार भी कर लिया.. उसने अपने खुले हुए बाल रबरबैंड से बांध दीये.. और पिंटू की गोद में सर डालकर बैठ गई.. एक ही पल में लंड बाहर निकालकर कविता लोलिपोप की तरह चूसने लगी..


cb

पिंटू को आश्चर्य हुआ.. जब जब वो और कविता मिलते तब वो कितने मिन्नतें करता तब जाकर कविता उसका मुंह में लेती.. आज एक ही इशारे में मान गई.. कविता की इस हरकत से पिंटू बेहद उत्तेजित हो गया.. कविता अपने प्रेमी को महत्तम सुख देने के इरादे से पागलों की तरह लंड चूसने लगी.. गजब का करंट लग रहा था पिंटू को.. कविता के चूसने से.. थोड़ी ही देर मे वो कमर उठाकर.. कविता के सर को दोनों हाथों से पकड़ कर.. उसके मुंह में धक्के लगाने लगा.. और उसी के साथ ही उसके लंड ने कविता के मुख में उत्तेजना की बारिश कर दी.. कविता का मुंह पूरा वीर्य से भर गया..


cum-in-mouth2

वैसे कविता को ये बिल्कुल ही पसंद नहीं था.. पर वो पिंटू को जरा भी नाराज करना नहीं चाहती थी.. उसे उलटी आ रही थी पर फिर भी उसने अपने आप को संभालें रखा.. और तब तक चूसती रही जब तक पिंटू शांत न हो गया..

संभालकर पिंटू का लंड मुंह से बाहर निकालकर कविता ने सारा वीर्य सीट के नीचे थूक दिया.. और रुमाल से अपना मुंह साफ कर दिया.. अब कविता अपनी सीट पर बैठ गई.. पिंटू ने अपना लंड अंदर रख दिया.. अब दूसरी मंजिल के लिए दोनों तैयार हुए.. और वो था कविता का ऑर्गजम..

कविता के गालों पर चूमते हुए उसने उसके घाघरे के अंदर हाथ डाल दिया.. उसकी चिकनी जांघों से होते हुए पिंटू की उँगलियाँ कविता की चूत तक जा पहुंची.. पिंटू आराम से अपनी उंगलियों का योनि प्रवेश कर सके इसलिए कविता ने अपना घाघरा ऊपर तक उठा दिया.. अब पिंटू का हाथ बड़ी आसानी से अंदर पहुँच रहा था.. साड़ी का पल्लू हटाकर अपने दोनों उरोजों को बाहर खुला छोड़ दिया कविता ने.. पिंटू कविता के गाल, गर्दन और होंठों पर पागलों की तरह चूमने लगा.. उसका एक हाथ कविता के स्तनों को मसल रहा था जबकी दूसरे हाथ की दो उँगलियाँ कविता की चूत में अंदर बाहर हो रही थी.. कविता के तो मजे मजे हो गए थे.. पिंटू का साथ उसे इतना पसंद था की उसने अपना पूरा बदन सीट पर ढीला छोड़कर उसे समर्पित कर दीया था..


cf0cf

अत्यंत आवेश में आकर पिंटू ने फिंगरिंग की गति बढ़ा दी.. तेजी से उंगलियों को अंदर बाहर करते हुए कविता की भूख को शांत कर दिया.. कविता की चूत अपना अमृत रस सीट पर टपका रही थी..

cf2

उसी अवस्था में थोड़ी देर तक कविता पड़ी रही.. ना ही उसने खुले स्तनों को ढंका और ना ही अपना घाघरा नीचे किया.. वैसे ही बैठे बैठे उसने पिंटू की चूत रस लगी उंगलियों को चूसना शुरु कर दिया..

अब जुदाई करीब थी.. दोनों जान गए थे की अब बिछड़ने का वक्त आ चुका था.. बार बार पिंटू की हथेली को चूम रही कविता के आँसू पिंटू के हाथ पर टपक रहे थे..

"उदास क्यों हो रही है? इतना मज़ा करने के बाद रो रही है तू?" पिंटू ने कहा.. जिसका कविता ने कोई उत्तर नहीं दिया.. वो तो बस पिंटू की हथेली को अपने होंठों से दबाकर बस चूमती रही.. काफी देर तक उसने हाथ पकड़े रखा

"अब चलें कविता.. ?? डेढ़ घंटा तो बीत चुका है.. अब तुम्हें घर चले जाना चाहिए वरना तेरी मम्मी चिंता करेगी" कविता बस पिंटू को देखती रही.. कितनी फिक्र है इस लड़के को मेरी..

अपने आंसुओं को पोंछ कर कविता सीट से खड़ी हो गई.. खड़े होने के बाद उसे याद आया.. दोनों स्तन तो अभी भी बाहर खुले लटक रहे थे.. !! उन्हें ब्लाउस में डालना तो भूल ही गई.. वो तुरंत बैठ गई और स्तनों को दोनों कटोरियों में बंद कर दिया.. सामने बैठे कापल ने कविता के स्तनों को देख लिया था.. पर वो दोनों खुद ही अधनंगी अवस्था में बैठे हुए थे.. कविता ने देखा.. कपल में जो युवती थी उसने अपने बॉयफ्रेंड का लंड हाथ में पकड़ रखा था.. उसके सामने देखकर कविता मुस्कुराई..

पिंटू और कविता खड़े हो गए और बाहर निकल गए.. कविता को ऑटो में बिठाकर पिंटू भी उदास मन से अपना बाइक लेकर निकल गया..
 
कविता घर पहुंची.. घर पर कोई नहीं था.. मम्मी अस्पताल गई हुई थी और पापा ऑफिस थे.. उसने पड़ोसी से चाबी मांगकर घर खोला..

अंदर कमरे में जाकर सब से पहले अपनी साड़ी उतारी.. और सिर्फ ब्लाउस और पेटीकोट में, आईने के सामने खड़ी हो गई.. उभरी हुई छाती को देखकर उसे पिंटू का हाथ याद आ गया.. एक के बाद एक उसने ब्लाउस के सारे हुक खोल दीये.. और पेटीकोट का नाड़ा भी खींच लिया.. मायके आकर लड़कियां पहला काम साड़ी बदलकर किसी आरामदायक वस्त्र को पहनने का करती है.. सिर्फ ब्रा और पेन्टी में अपने जिस्म को आईने में निहार रही थी कविता..


पेन्टी पर चूत वाले हिस्से पर चिपचिपे प्रवाही का सूखा हुआ धब्बा था.. उस हिस्से को छूकर कविता ने धीरे से दबाया.. सिनेमा हॉल में हुए ऑर्गजम की निशानी थी वो.. क्लिटोरिस को दबाते ही उसकी चूत में फिर से हरकत होने लगी.. कविता को अपनी चूत से खेलने की इच्छा होने लगी..



आदर्श वातावरण था.. घर पर कोई नहीं था.. आधे घंटे पहले ही अपने प्रेमी संग बिताएं पलों की ढेर सारी यादें थी.. और क्या चाहिए?? कविता ने पेन्टी उतारकर फेंक दी.. और हाथ पीछे ले जाकर ब्रा की क्लिप भी खोल दी.. उसके दूध जैसे गोरे स्तन खुल गए.. कविता को अपने स्तनों पर लाल निशान नजर आए.. जो रसिक के काटने के कारण बने थे.. साले ने कितनी क्रूरता से काटा था.. ये तो अच्छा हुआ की उस रात पीयूष के संग चुदाई और आज पिंटू के संग चुसाई.. अंधेरे में हुई थी.. इसलिए उसके पति या प्रेमी ने ये निशान नहीं देखें.. पिंटू को तो वो फिर भी समझा देती की ये पीयूष की हरकत है.. पर पीयूष को कैसे समझाती??

कविता ने अपनी एक उंगली को मुंह में डालकर चूसा और ठीक से गीला कर अपनी चूत के अंदर बाहर करने लगी.. पिंटू के संग गुजारें उन हसीन पलों को याद करते हुए वो एक हाथ से अपने जिस्म के विविध अंग सहला रही थी.. और दूसरी उंगली से अपने गुप्तांग को रगड़ रही थी..



इस बार का ऑर्गजम जबरदस्त और जोरदार था.. कविता की चूत ने इतना रस बहाया.. की उसे पोंछने के लिए उसे कपड़ा ढूँढना पड़ा.. आखिर उसने अपने पर्स से रुमाल निकाला.. वही रुमाल जिससे उसने पिंटू का वीर्य पोंछा था सिनेमा हॉल में.. चूत साफ करना भूलकर कविता उस वीर्य से सने रुमाल को सूंघने लगी.. और फिर उस रुमाल को चूमकर गले लगा दिया.. और फिर अपनी चूत पर लगा दिया..

काफी देर तक यूं ही नंगी पड़ी रहने के बाद वो खड़ी हुई.. बेग से निकालकर उसने बेहद टाइट केप्री.. और टाइट स्लीवलेस टीशर्ट पहन लिया.. टीशर्ट के नीचे उसने पैडिड ब्रा पहन ली.. जिससे उसके उभारों की साइज़ डबल दिख रही थी.. अपने कपड़ों के ऊपर से स्तनों को एड़जस्ट करते हुए वो मौसम की स्कूटी की चाबी लेकर बाहर आई..

स्कूटी लेकर वो अस्पताल की ओर जाने लगी.. सोसायटी के नुक्कड़ पर चाय की टपरी पर तीन चार लड़के खड़े हुए थे.. कविता की मादक जवानी और टाइट उभारों को वो लोग देखते ही रह गए.. उनकी तरफ देखे बगैर ही कविता तेज गति से निकल गई.. हालांकि उसे पता था की सब की नजर उसपर ही चिपकी हुई थी..

अस्पताल पहुंचते ही वो मौसम के कमरे में गई.. बिस्तर पर लेटी हुई मौसम के हाथ पर सुई लगाई हुई थी और ग्लूकोज का बोतल चढ़ाया जा रहा था.. मौसम को इस हाल में देखकर कविता की आँखें भर आई.. दोनों बहने भावुक हो गई.. मौसम का चेहरा सूख चुका था.. माउंट आबू वाली सारी चंचलता गायब हो चुकी थी.. बहोत ही अस्वस्थ लग रही थी.. बीमारी अच्छे अच्छों की हालत खराब कर देती है..

कविता को देखते ही मौसम खुश हो गई.. वो ज्यादा खुश इस आशा से थी की दीदी के साथ जीजू भी आए होंगे.. उसकी आँखें पीयूष को ढूंढ रही थी पर अफसोस.. उदास हो गई मौसम.. पर कविता को भनक न लगे इसलिए अपने चेहरे के भाव छुपाकर रखें उसने.. कविता ने अपनी मम्मी, रमिला बहन के साथ मौसम की तबीयत को लेकर विस्तृत चर्चा की.. फिर वो जाकर डॉक्टर से भी मिल आई.. डॉक्टर ने कहा की मौसम को मेलेरिया हुआ था.. और अब उसकी हालत स्थिर थी.. एक दो दिन में अस्पताल से डिस्चार्ज दे देंगे.. सुनकर कविता ने चैन की सांस ली.. वापिस मौसम के कमरे में आकर उसने रमिला बहन को घर जाने के लिए कहा.. अब वो जो आ गई थी..

रमिला बहन के जाते ही दोनों बहने बातें करने में व्यस्त हो गई.. कविता ने उसे वैशाली के साथ जो हुआ उसके बारे मी बताया.. फिर कविता ने तरुण को फोन लगाया.. मौसम के मना करने के बावजूद, कविता ने तरुण को अस्पताल बुलाया.. वो जानती थी की तन की बीमारी तो दवाइयों से ठीक हो जाएगा.. मौसम के उदास मन को प्रफुल्लित करने के लिए ही उसने तरुण को बुला लिया था.. वो चाहती थी की दोनों मिलें.. एक दूसरे से प्यार भरी बातें करें.. तो मौसम को अच्छा लगेगा और वो जल्दी ठीक हो जाएगी.. तरुण ने कविता से आज ही वहाँ आ जाने का वादा किया..

वैसे रमिला बहन ने काफी बार मौसम को कहा था की वो तरुण को फोन करें.. पर मौसम ने ही मना कर रखा था.. उसका कहना था की उसकी तबीयत की बात सुनकर, तरुण दौड़ा चला आएगा.. फिर मम्मी को उसकी खातिरदारी करनी पड़ेगी.. बेचारी वैसे ही अस्पताल की दौड़-भाग से परेशान थी.. क्योंकी पापा तो ऑफिस में बिजी थे.. वैसे मौसम के पापा, सुबोधकान्त हररोज शाम को मौसम से मिलने जरूर आते..

मौसम ने एक बात नोटिस की थी.. शाम के टाइम जब फाल्गुनी उसे मिलने आती थी.. तभी पापा भी आ जाते थे.. उसका कारण भी मौसम से अनजान नहीं था.. फाल्गुनी और उसके पापा के संबंधों की याद आते ही.. मौसम शरमा गई.. खास कर वो बात याद आई जब वो वैशाली के साथ पापा के ऑफिस पहुंची थी.. और छुपकर सारा सीन देखा था.. फाल्गुनी घोड़ी बनी हुई थी और पापा पीछे से शॉट लगा रहे थे.. फाल्गुनी के स्तन झूल रहे थे.. और पापा का कडक लोंडा अंदर बाहर हो रहा था.. याद आते ही मौसम ने शर्म से आँखें बंद कर दी..

फाल्गुनी और सुबोधकान्त का अब भी यही मानना था की उनके संबंधों के बारे में मौसम कुछ भी नहीं जानती.. जब सुबोधकांत मौसम से मिलने आते तब.. फाल्गुनी की मौजूदगी में.. उनकी आँखों की शरारत और हवस.. दोनों ही साफ नजर आती मौसम को.. पापा की नजर फाल्गुनी के स्तनों पर ही चिपकी रहती.. पिछले तीन दिनों के मुकाबले मौसम को आज कुछ अच्छा लग रहा था.. वो और कविता अकेले थे इसलिए बातें भी आराम से हो सकती थी..

मौसम: "दीदी.. मैं पिछले तीन दिनों से देख रही हूँ.. यहाँ एक डॉक्टर है.. उम्र पचास के करीब होगी.. उनका चक्कर यहाँ की एक जवान पच्चीस साल की नर्स के साथ चल रहा है.. उम्र में इतना फाँसला होने के बावजूद.. वो लड़की.. अपने से दोगुनी उम्र के मर्द के प्रति कैसी आकर्षित हो गई?" मौसम ने मनघडन्त कहानी सुनाई.. जवान लड़की और बुजुर्ग के बीच संबंधों के बारे में वो अपनी अनुभवी दीदी के विचार जानना चाहती थी.. अब फाल्गुनी और पापा का नाम वो कैसे लेती भला.. !! इसलिए डॉक्टर और नर्स की कहानी सुनाकर फाल्गुनी और पापा के चक्कर का पोस्टमॉर्टम शुरू किया मौसम ने

कविता: "हाँ ये मुमकिन है.. हम सीरीअलों में देखते ही है ना.. कई बार काम उम्र की लड़कियां.. अपने से कई ज्यादा बड़े मर्द के प्यार में पड़ जाती है.. उसका कोई एक ठोस कारण नहीं है.. बहोत से कारण होते है.. !!"

मौसम: "बहोत से कारण?? जैसे की..!!"

कविता: "जैसे की.. सिक्योरिटी.. ज्यादा उम्र के आदमी अक्सर अनुभवी और परिपक्व होते है.. इसलिए उनके आसपास लड़कियों को सलामती महसूस होती है.. कभी कभी मजबूरी इसका कारण होती है.. कुछ लड़कियों को ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उन्हें समझे.. जवान मर्दों में ये गुण अक्सर कम ही देखने को मिलता है.. जब की प्रौढ़ उम्र के अनुभवी मर्दों की समझदारी लड़कियों को आकर्षित करती है.. !!"

कविता ने बड़े प्रेम से समझाया.. उसका आशय यह भी था की भविष्य में मौसम को ये सारी सीख काम आएगी.. कविता से बात करके मौसम को ऐसा लगा मानों उसकी आधी बीमारी दूर हो गई हो.. कई दिनों बाद वो किसी से खुलकर बात कर पा रही थी.. वैसे फाल्गुनी रोज मिलने आती थी.. पर उस वक्त या तो पापा या मम्मी की मौजूदगी के कारण वो ज्यादा बात कर नहीं पाते थे..

फाल्गुनी ने पहले तो मौसम को ये भ्रम में रखा था की उसे सेक्स से बेहद डर लगता है.. पर उस दिन पापा की ऑफ़िस में उसे जिस तरह उछल उछलकर चुदते देखा.. उसके बाद मौसम का ये भ्रम टूट गया.. उससे पहले मौसम यही सोचती थी की पापा ने ही बेचारी फाल्गुनी को अपनी जाल में फँसाया था.. अगर मौसम ने उस दिन सब अपनी आँखों से देखा न होता तो वो हमेशा यही समझती रहती की फाल्गुनी निर्दोष थी और पापा ही हवसखोर थे.. वो सब तो ठीक था.. पर मौसम को ये ताज्जुब हो रहा था की फाल्गुनी और पापा के बीच वैशाली ने कितने आराम से एंट्री कर ली थी.. !! दूसरा.. अगर पापा ने फाल्गुनी को नहीं पटाया था तो क्या फाल्गुनी खुद चलकर उनके पास गई होगी?? नहीं नहीं.. फाल्गुनी इतनी हिम्मत तो नहीं कर सकती.. इस मामले में फाल्गुनी पहले से अनाड़ी थी.. तो इसका मतलब ये हुआ की जरूर पापा ने ही फाल्गुनी को मजबूर किया होगा.. आखिर ये सब शुरू हुआ कैसे होगा? पापा ने जब पहली बार फाल्गुनी को बाहों में लिया होगा तब फाल्गुनी को कैसा महसूस हुआ होगा? उसने विरोध किया होगा या समर्पण? या फिर पापा ने जबरदस्ती की होगी?? जानना तो पड़ेगा.. जानना जरूरी है.. पर किस्से पूछें? फाल्गुनी या पापा से तो पूछ नहीं सकती.. हाँ वैशाली के जरिए जानकारी प्राप्त की जा सकती थी.. वैशाली को ही फोन करती हूँ.. पर उस बेचारी की खुद की हालत अभी ठीक नहीं है.. पर मुझे उसकी तबीयत पूछने के लिए.. और सहानुभूति व्यक्त करने के लिए फोन करना ही चाहिए..

कविता मौसम को विचारों में खोया हुआ देखकर सोच में पड़ गई.. मौसम आज ऐसे सवाल क्यों पूछ रही है? कहीं उसे तो किसी बड़ी उम्र के मर्द के साथ प्यार नहीं हो गया होगा?? हो सकता है.. तरुण से सगाई और अपने प्रेम के बीच की खींचतान के कारण ही तो वो बीमार नहीं हो गई ना.. ??

सोचते सोचते मौसम की आँखें बंद हो गई.. मौसम डिस्टर्ब न हो इसलिए कविता खड़ी होकर बालकनी में गई और उसने पीयूष को फोन किया.. पीयूष ने फोन उठाया और शुरू हो गया

पीयूष: "मायके जाकर तू तो मुझे जैसे भूल ही गई.. कितने फोन किए तुझे? तू ठीकठाक पहुंची या नहीं ये जानने के लिए मैं फोन कर रहा था.. कितनी चिंता हो रही थी मुझे.. !! घर पर किसी ने फोन नहीं उठाया.. तेरा पापा को मोबाइल ट्राय किया तो उन्होंने भी नहीं उठाया.. और तूने भी जवाब नहीं दिया.. मेरे इतने सारे मिसकॉल भी नहीं नजर आए तुझे??"

कविता मन ही मन मुस्कुरा रही थी.. क्या जवाब देती वो पीयूष के सवाल का? ये तो कह नहीं सकती की मैं पिंटू के साथ सिनेमा हॉल में थी इसलिए फोन नहीं उठाया..

कविता: "शांत हो जा जानु.. मैं सारे जवाब दूँगी तुझे.. घर आकर.. बिस्तर पर लेटे लेटे.. चलेगा ना.. !! लव यू.. टाइम पर खाना खा लेना.. शीला भाभी और वैशाली का ध्यान रखना" शरारती अंदाज में जवाब देकर.. पीयूष की बोलती बंद कर दी कविता ने.. और वो भी.. किसी भी सवाल के जवाब दीये बगैर

पीयूष: "हाँ हाँ.. अब मुझे मत सीखा.. और सुन.. तू वक्त रहते घर नहीं लौटी.. तो मैं शीला भाभी के घर रहने चला जाऊंगा.. "

कविता: "हाँ तो चला जा.. वैसे भी मदन भैया को एक सेक्स पार्टनर की जरूरत है.. शीला भाभी तो पूरा दिन वैशाली को संभालने में व्यस्त रहती होगी.. इसलिए बेचारे मदन भैया अकेले पड़ गए होंगे.. तू चला जा उनकों कंपनी देने.. हा हा हा हा हा हा.. !!"

पीयूष: "मुझे क्या खुसरा समझ रखा है तूने? जो मदन भैया के पास गांड मरवाने जाऊंगा.. !! मैं उनके घर गया तो शीला भाभी और वैशाली.. दोनों का गेम बजाकर आऊँगा.. याद रखना तू.. " गुस्से से फोन कट कर दिया पीयूष ने

कविता ने हँसते हँसते फोन पर्स में रख दिया.. स्त्री को एक ऑर्गजम मिल जाए तो उसका नशा दो-तीन दिनों तक रहता है.. चेहरे पर चमक सी रहती है.. और ये तो अपने प्रेमी से प्राप्त हुआ ऑर्गजम था.. उसकी तो बात ही निराली होती है..

एक दिन पहले वो कितनी तनाव में थी !! निःसहाय और बेबस.. जब वो अनुमौसी और रसिक के सिकंजे में फंस गई थी.. पर आज कविता बेहद खुश थी.. बालकनी में खड़े हुए वो मुख्य सड़क पर आते जाते वाहनों को देख रही थी

तीसरे माले की बालकनी से कविता ने देखा.. सड़क के किनारे पापा की गाड़ी आकर खड़ी रही.. और अंदर से फाल्गुनी उतरी.. कविता को इसमें कुछ भी असामान्य नहीं लगा.. फाल्गुनी उनके घर के सदस्य जैसी थी और पापा अक्सर उसे अपनी गाड़ी में घर या कॉलेज छोड़ने जाते थे..

कविता अंदर कमरे में आई.. उनकी कोई पड़ोसी महिला मौसम की तबीयत पूछने आई थी.. कविता उनसे बातें करने में मशरूफ़ हो गई.. तभी सुबोधकांत कमरे में आए.. उनको देखते ही कविता ने उनके पैर छु लिए.. कविता को आशीर्वाद देते हुए उन्हों ने ससुराल के सारे सदस्यों के बारे मेंन साहजीक पूछताछ की.. और बगल में पड़े स्टूल पर बैठ गए

कविता को ताज्जुब हो रहा था की पापा आ गए.. पर फाल्गुनी क्यों नहीं आई अब तक?? पापा से तो उसे पहले आ जाना चाहिए था.. !! वो तो कब की उतर चुकी थी.. सीधे ऊपर आ सकती थी.. पापा को तो गाड़ी पार्क करनी थी.. पता नहीं कहाँ रह गई.. गई होगी कहीं काम से.. कविता अपने पापा से फाल्गुनी के बारे में पूछना चाहती थी पर उस पड़ोसी महिला की हाजरी में पूछना नहीं चाहती थी..

तभी फाल्गुनी ने कमरे में प्रवेश किया.. कविता को देखकर वो खुश हो गई.. "अरे दीदी.. आप कब आए? कितनी सुंदर लग रही हो आप इन कपड़ों में?"

टाइट टीशर्ट और पैडिड ब्रा की वजह से कविता के स्तन कुछ ज्यादा ही उभरकर बाहर दिख रहे थे.. कविता जान गई की फाल्गुनी का इशारा किस ओर था.. वैसे तो उसने तारीफ ही की थी.. पर पापा की मौजूदगी के कारण वो शरमा गई..



अनजान मौसम ने सवाल किया "कैसे आई तू फाल्गुनी? ऑटो से आई? या पिछली बार की तरह सिटी-बस में?"

"नहीं यार.. सिटी-बस में ही आई.. ऑटो वाला तो पचास से कम में राजी ही नहीं हुआ.. " फाल्गुनी का जवाब सुनकर कविता चोंक गई.. !! उसने अपनी सगी आँखों से फाल्गुनी को पापा की गाड़ी से उतरते हुए देखा था.. हो सकता है की वो सिटी-बस से आई हो.. और पापा ने उसे बस-स्टैन्ड से पीक-अप किया हो.. पर उस रोड पर तो गाड़ी खड़ी रख पाना नामुमकिन है.. ट्राफिक पुलिस वाले किसी को भी वहाँ गाड़ी रोकने नहीं देते..

"आप ऑफिस से सीधे यहाँ आए पापा?" कविता ने सुबोधकांत को ही प्रश्न पूछा

"हाँ बेटा.. आजकल काम का बोझ बहोत ज्यादा है.. अकेले थक जाता हूँ सब कुछ संभालते संभालते.. तू पीयूष कुमार को यहाँ क्यों नहीं भेज देती? वो मेरे साथ हो तो मैं बिजनेस को बहोत आगे तक ले जा सकता हूँ" सुबोधकांत ने उत्तर दिया

पापा ने तो फाल्गुनी को कार में बिठाने के बारे में कुछ कहा ही नहीं और अपनी बिजनेस की बातें लेकर बैठ गए..

"आप बिजनेस में.. मौसम और फाल्गुनी की मदद क्यों नहीं लेते? दोनों पढ़ी लिखी और होनहार है.. जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती तब तक तो वो आप की मदद कर ही सकते है.. !!" कविता की ये बात सुनकर फाल्गुनी की आँखों में चमक और मौसम की आँखों में चिंता के भाव आ गए.. मौसम सोच रही थी की.. दीदी ने अनजाने में ये बोलकर कितनी बड़ी गलती कर दी ये वो नहीं जानती.. उन्हें तो पता भी नहीं है फाल्गुनी और पापा के बारे में.. अगर उन्हें पता चला तो क्या गुजरेगी उन पर?? पर मौसम अभी कुछ भी बॉल पाने की स्थिति में नहीं थी.. वो चुप रही

थोड़ी देर बैठकर सुबोधकांत काम का बहाना बनाकर निकल गए.. और वो पड़ोसी महिला भी चली गई थी.. अब फाल्गुनी, कविता और मौसम.. कमरे में अकेले थे.. कविता को खास ध्यान नहीं गया पर मौसम ने ये नोटिस किया की पापा के जाते ही फाल्गुनी भी उठ खड़ी हुई.. और बालकनी के पास जाकर खड़ी हो गई.. थोड़ी ही देर में वो वापिस आकर अपनी जगह पर बैठ गई..

फाल्गुनी के आते ही.. कविता ने उससे कहा "तू मौसम का ध्यान रख.. और हाँ तुझे जल्दी घर जाना हो तो मुझे फोन कर देना.. मैं आ जाऊँगी.. " कहते हुए कविता निकल गई.. और बाहर अस्पताल के वैटिंग रूम में बैठकर पिंटू से फोन पर चिपक गई..

इस तरफ मौसम ने तकिये के नीचे से फोन निकालकर वैशाली को कॉल किया.. वैशाली ने तुरंत फोन उठाया.. मौसम बीमार है ये बात वैशाली को अनुमौसी से जानने मिली थी.. दोनों ने काफी बातें की.. वैशाली ने शीला से भी मौसम की बात करवाई.. फिर मौसम ने फाल्गुनी को फोन दिया और उसने भी वैशाली के हालचाल पूछें..

शाम ढलने को थी.. फाल्गुनी को घर जाना था.. इसलिए उसने कविता को फोन कर बुला लिया और वो निकल गई..

उस रात अस्पताल मे मौसम के साथ, कविता और सुबोधकांत रुकें थे.. और फाल्गुनी को घर पर रमिला बहन के साथ रहने को कहा था.. रात को कविता और उसके पापा के बीच मौसम की शादी और सगाई को लेकर काफी चर्चा हुई.. देर तक दोनों बाप और बेटी बातें करते रहे.. सुबोधकांत को इस बात की चिंता थी.. की लड़के वाले पंद्रह दिन में सगाइ और एक महीने बाद शादी निपटाना चाहते थे.. पर मौसम की बीमारी के कारण सारा प्लैनिंग बिगड़ गया..

दूसरी सुबह मौसम के रिपोर्ट्स देखकर डॉक्टर ने कहा की उसकी तबीयत अब सुधर रही थी और उसे शाम को डिस्चार्ज किया जाएगा..

एकाध घंटे के बाद तरुण और उसकी माँ अस्पताल आ पहुंचे.. कविता ने उनका बड़े अच्छे से स्वागत किया.. और फिर तरुण की मम्मी को लेकर वो अपने घर की ओर निकल गई ताकि मौसम और तरुण को थोड़ा वक्त अकेले गुजारने के लिए मिलें..

तरुण ने मौसम के सर पर हाथ फेरते हुए कहा "अब कैसी है तबीयत?"

मौसम ने शरमाते हुए कहा "ठीक है.. !!"

तरुण का हाथ मौसम के सर को सहलाता रहा और मौसम के शरीर में शक्ति का संचार होने लगा.. तरुण के स्पर्श से मौसम को बहोत अच्छा लगने लगा.. तभी मौसम के मोबाइल पर पीयूष का फोन आया.. मौसम फोन उठाती उससे पहले ही तरुण ने फोन उठा लिया..

"हैलो" तरुण की आवाज को पीयूष पहचान नहीं सका

"हैलो, मैं मौसम का जीजू बोल रहा हूँ.. जरा मौसम को फोन दीजिए प्लीज.. मुझे उसकी तबीयत के बारे में पूछना है.. "

"ओह.. पीयूष भैया.. मैं तरुण बोल रहा हूँ.. मौसम अभी काफी कमजोर है.. वो बाद में बात करेगी आप से.. ठीक है ना.. !!"

"हाँ हाँ.. कोई बात नहीं.. मौसम को कहना की टाइम मिलें तब मुझे फोन करें.. मुझे तो सिर्फ उसकी तबीयत का हाल पूछना था.. " पीयूष ने फोन रख दिया

रूम के एकांत में पीयूष जीजू की आवाज स्पष्ट सुनाई दी मौसम को.. जीजू के आवाज में जो दर्द छुपा था वो भी पहचान लिया उसने.. पर वो बेचारी क्या कर सकती थी? उसके शरीर और मन पर अब तरुण का सम्पूर्ण अधिकार था.. जीजू के प्रति उसे खिंचाव तो बहोत था.. पर तरुण को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करने के बाद उसका हाल सेंडविच जैसा हो गया था.. आँखें बंद कर मौसम अफसोस करती रही और तरुण ने ये समझा की उसके सहलाने के कारण मौसम सो गई..

इस तरफ पीयूष को बहोत गुस्सा आ रहा था.. फोन काटते ही उसने उठाकर फेंक दिया.. अच्छा हुआ की उस वक्त ऑफिस में ओर कोई नजदीक नहीं था.. उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मौसम उसे इग्नोर कर रही थी.. पुरुष सब कुछ सह लेगा.. पर अपने प्रिय पात्र की अवहेलना बर्दाश्त नहीं करेगा.. हताश होकर उसने मोबाइल और उसकी निकली हुई बैटरी उठाई.. टूटे हुए मोबाइल के हिस्से तो इकठ्ठा कर लिए.. पर इस टूटे हुए दिल का क्या किया जाएँ?? मौसम ने तोड़ कर रख दिया था उसका दिल.. !!

बीमार मौसम.. बिस्तर पर लेटे हुए भी अपने जीजू की तड़प को महसूस कर रही थी.. उसे पता चल गया की जीजू को बहोत बुरा लगा था

"तरुण, मुझे ऑरेंज ज्यूस पीना है.. बाहर से लेकर आ न मेरे लिए प्लीज.. !!"

"तुम बस हुक्म करो.. तेरी सेवा करने के लिए तो इतनी दूर से आया हूँ मैं.. अभी लेकर आया"

जैसे ही तरुण ज्यूस लेने के लिए गया.. मौसम ने पीयूष को फोन किया

पर उसका फोन कहाँ लगने वाला था.. !!! फोन फेंकने के बाद, बैटरी और सिम-कार्ड अलग हो गए थे.. पीयूष का फोन आउट ऑफ कवरेज बता रहा था.. बहोत बार कोशिश करने पर भी जब फोन नहीं लगा तब मौसम ने वोइस मेसेज छोड़ दिया "जीजू, मेरी तबीयत अब अच्छी है.. मैंने आपको फोन ट्राय किया था पर नहीं लगा.. आप मेरी चिंता मत करना.. लव यू.. और हाँ जीजू.. मुझे मेरा वादा याद है.. और वो मैं पूरा करूंगी"

तरुण के आने से पहले उसने मोबाइल से सारे मेसेज डिलीट कर दीये.. और तरुण का इंतज़ार करने लगी.. अब उसे राहत हुई..

थोड़ी ही देर में तरुण ज्यूस के दो ग्लास लेकर लौटा.. एक ग्लास खुद के लिए और दूसरा मौसम के लिए.. ज्यूस पीते पीते तरुण अपने अभ्यास और केरियर के बारे में बता रहा था और मौसम पीयूष की यादों में खोई हुई थी.. मौसम तरुण की बातों से बोर हो रही थी.. वो चाहती थी की तरुण कोई ओर बात करें..

माउंट आबू में जीजू के संग जो पल बिताएं थे.. उसकी याद अब भी मौसम के दिल को झकझोर कर रख देती थी.. और वही यादें उसे बार बार जीजू की ओर आकर्षित कर रही थी.. उसका दिल और जिस्म दोनों पीयूष जीजू के लिए तड़प रहे थे.. मौसम के चेहरे पर ये सोचकर मुस्कान आ गई.. की अगर ऐसा एकांत उसे तरुण के बजाए जीजू के साथ मिल गया होता तो वो क्या करते? लीप किस करते.. स्तन दबाते.. उंगली डालते.. और उनका लंड भी पकड़ने को मिल जाता.. जीजू को वादा निभाने का प्रोमिस तो कर दिया था.. पर उसे निभाएगी कैसे?? कहाँ मिलेंगे वो दोनों? जैसे जैसे तरुण उसके करीब आता गया.. मौसम का अपराधभाव और तीव्र होता गया.. सगाई और शादी के बीच मुश्किल से २० दिनों का अंतर रहने वाला था.. जब जब मम्मी-पापा शादी के मुहूरत को लेकर चर्चा करते.. मौसम अपने जीजू से मिलने के मौके के बारे में मनोमंथन करने लगती.. वो जानती थी की ऐसा करने से वो तरुण और दीदी दोनों का विश्वास तोड़ रही है.. पर जीजू की हरकतें याद आते ही वो इस गुनाह के लिए भी तैयार हो जाती

शाम को सुबोधकांत और फाल्गुनी गाड़ी लेकर आए.. और मौसम को अस्पताल से घर ले जाने के लिए.. फाल्गुनी और सुबोधकांत आगे बैठे थे.. मौसम तरुण के साथ पीछे की सीट पर.. मौसम के ये राज नहीं आया.. फाल्गुनी क्यों पहले ही आगे बैठ गई? उसे पीछे मेरे साथ बैठना था और तरुण को आगे पापा के साथ बैठने देना चाहिए था.. !!

घर आकर मौसम अपने कमरे में जाकर लेट गई.. और बाकी लोग खाना खाने बैठे.. उस वक्त मौसम ने फिर से जीजू को कॉल किया लेकिन अब भी वो नोट रिचेबल बता रहा था.. जीजू ने कहीं कोई गलत कदम तो नहीं उठा लिया?? मौसम ये सोचकर ही डर गई.. इतने लंबे समय तक जीजू का फोन बंद क्यों आ रहा था? अब जीजू से कॉन्टेक्ट कैसे करूँ?

खाना खाने के बाद तरुण और सुबोधकांत बाहर गए.. कविता मौसम के पास आकर बैठ गई

"जीजू का फोन ही नहीं आया अब तक.. एक बार भी उन्हों ने मेरी तबीयत के बारे में नहीं पूछा.. किसी बात से नाराज है क्या? कहीं तुम दोनों के बीच फिर से कोई झगड़ा तो नहीं हो गया?" मौसम ने कविता से पूछा

"तू पीयूष की बात छोड़.. मायके में आने के बाद मुझे ससुराल का कोई टेंशन नहीं चाहिए.. मैं हूँ ना यहाँ तेरे पास.. फिर तुझे और किसकी जरूरत है?" पिंटू के साथ मेसेज पर चेट करते हुए कविता ने कहा.. अब इसके आगे मौसम क्या बोलती?? निराश हो गई मौसम

आखिर उसने फाल्गुनी को फोन किया.. फाल्गुनी अभी अभी अपने घर पहुंची थी और मौसम का फोन देखकर चिंतित हो गई..

"क्या हुआ मौसम?"

मौसम: "यार एक काम कर.. तू जीजू को फोन लगा न.. मैं कब से ट्राय कर रही हूँ पर उनका फोन लग ही नहीं रहा.. !! मोबाइल न लगे तो लेंडलाइन पर फोन कर और जीजू मिलें तो उन्हें बताना की आप से बात न हो पाई इसलिए मौसम नाराज है.. और उन्हें कहना की मुझे फोन करें"

फाल्गुनी: "ठीक है.. खाना खाकर फोन करती हूँ"

मौसम: "कोई बात नहीं.. आराम से करना.. और फिर मुझे बताना"

अब मौसम के दिल को चैन मिला.. उसे यकीन था की लेंडलाइन पर तो जीजू मिल ही जाएंगे.. पर लेंडलाइन पर मैं भी तो कॉल कर सकती हूँ.. मौसम ने तुरंत फोन लगाया.. फोन अनुमौसी ने उठाया.. यहाँ वहाँ की थोड़ी बातें करने के बाद उसने जीजू के बारे में पूछा

"रुक.. मैं उसे फोन देती हूँ"

"ठीक है आंटी.. !!"

थोड़ी देर बाद मौसी ने ही फोन पर बात की "बेटा.. वो लैपटॉप पर अपनी कंपनी का काम करने में व्यस्त है.. पर उसने कहा है की वो थोड़ी देर बाद तुझे फोन करेगा.. तू अपनी तबीयत का ध्यान रखना.. ठीक है.. !!"

मौसम को गुस्सा आया.. वो यहाँ जीजू के लिए तड़प रही थी और जीजू उसे बात करने के लिए भी नहीं आए.. पीयूष जीजू की नाराजगी का एहसास हो गया उसे.. अब क्या करूँ? देखती हूँ वो फाल्गुनी का फोन उठाते है या नहीं

थोड़ी देर बाद फाल्गुनी का फोन आया उसने कहा की अंकल ने फोन उठाया था.. और उन्हों ने कहा की जीजू सो गए थे.. मोबाइल नहीं लगा उनका

मौसम को फिर से कमजोरी महसूस होने लगी.. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.. तरुण से भी वो ज्यादा बात नहीं कर रही थी.. तरुण को लगा की बीमारी के कारण मौसम ऐसा कर रही होगी..

दूसरी सुबह तरुण अपनी मम्मी के साथ वापिस लौट गए.. तरुण मौसम की तबीयत को लेकर चिंतित था..

इस तरफ कविता ने भी पीयूष को फोन करने की बहोत कोशिश की.. पर लगा नहीं.. आखिर घर पर फोन करने पर पता चला की पीयूष का मोबाइल गिरने की वजह से टूट गया था..

कविता मन ही मन पीयूष को गालियां देने लगी.. ऐसे कैसे गिरा दिया फोन? छोटा बच्चा है क्या? एक फोन को नहीं संभाल पाया.. !! अभी ४ महीने पहले ही खरीदा था तीस हजार का फोन.. !! कर दिया नुकसान!! किसी चीज को ठीक से संभालकर रखना आता ही नहीं पीयूष को.. !! बड़बड़ाते हुए कविता घर के अंदर आई.. उसका गुस्से से तमतमाया हुआ चेहरा देखकर मौसम ने पूछा

"क्या हुआ दीदी? क्यों इतना तिलमिला रही हो?"

"अरे यार.. उस बेवकूफ ने फोन तोड़ दिया.. इसलिए बात नहीं हो पा रही है.. !!"

सुनकर मौसम के दिल को सुकून मिला.. चलो असली कारण तो जानने मिला.. शायद जीजू उससे नाराज नहीं थे पर फोन खराब होने की वजह से बात नहीं हो पा रही थी

मौसम: "तो दीदी.. तुम ऑफिस पर फोन क्यों नहीं करती? वहाँ तो बात हो पाएगी"

कविता: "ऐसी भी कोई ईमर्जन्सी नहीं है.. और ऑफिस के नंबर पर फोन करूंगी तो वो भड़केगा मुझ पर.. !!" वैसे कविता का मन तो कर रहा था ऑफिस पर फोन करने का.. शायद पिंटू फोन उठा लें.. !!

पीयूष के कानों में रह रहकर तरुण की आवाज गूंज रही थी.. मौसम को खुद से दूर करने वाला तरुण ही था.. वरना मौसम उससे बात जरूर करती.. अभी तो सगाई भी नहीं हुई और मौसम का मालिक बनकर बैठ गया कमीना.. तरुण के प्रति जबरदस्त नफरत हो गई पीयूष को.. गुस्से में वो ऑफिस से घर के लिए निकल गया.. उसको मन की शांति चाहिए थी.. और इस वक्त मौसम से मिलन के अलावा कोई भी चीज उसे शांत नहीं कर सकती थी

सोसायटी की गली से अंदर जाते ही अपने घर से पहले.. उसने शीला भाभी को घर के बरामदे में झाड़ू मारते हुए देखा.. झुककर झाड़ू लगा रही शीला के दोनों गजब के बड़े स्तन.. और मांसल कमर को देखकर अगर किसी पुरुष की नजर न जाएँ तो उसे अवश्य अपना मेडिकल चेकअप करवा लेना चाहिए..



पीयूष ने सोचा की चलो शीला भाभी से थोड़ी बात-चीत की जाएँ.. मौसम से ध्यान भी बँटेगा.. और दिमाग फ्रेश हो जाएगा.. अगर मदन भैया घर पर नहीं होते तो वो शीला की गोद में सर रखकर अपने सारे दुख उन्हें सुनाता और जी हल्का कर लेता.. मौसम के विचारों से मुक्त होने के लिए पीयूष को शीला भाभी के रूप में जैसे तारणहार मिल गई थी

"अरे पीयूष.. !! कैसे हो?" शीला भाभी ने पीयूष को देखते ही कहा

"ठीक हूँ भाभी, आप कैसे हो?"

"कुछ ठीक नहीं है पीयूष.. वैशाली का हाल देखा नहीं जाता.. बेचारी की पूरी ज़िंदगी तबाह हो गई" व्यथित होकर शीला ने कहा

शीला भाभी को यूं दुखी देखकर पीयूष के कदम अपने आप ही उनके घर की तरफ खींचे चले गए.. वो शीला के घर के बरामदे में गया और झूले पर बैठ गया.. तभी वैशाली घर से बाहर आई.. "ओह पीयूष.. कैसा है तू?" कहते हुए वो सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. वैशाली के चेहरे से चमक गायब थी.. ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर में खून है ही नहीं.. एकदम फीकी फीकी सी.. चेहरे पर उदासी के बादल छाए हुए थे

शीला ने अचानक झाड़ू लगाना छोड़ दिया, घर के अंदर गई.. और पीयूष को आवाज लगाई.. सुनते ही पीयूष अंदर शीला के पास गया

"हाँ कहिए भाभी.. " शीला की छातियों को देखते हुए पीयूष ने कहा

"वैशाली को इस सदमे से बाहर कैसे निकालूँ? देख उसकी हालत.. मुझ से तो देखा नहीं जाता.. तू कुछ कर ना जिससे की वो वापिस मूड में आ जाएँ.. !!" उदास शीला ने कहा

ये सुनकर मन ही मन पीयूष सोच रहा था.. शीला भाभी मेरी मदद मांग रही है वैशाली को सहारा देने के लिए.. पर उन्हें कहाँ पता है की फिलहाल मैं खुद ही सहारे की तलाश में हूँ.. !!

"जी जरूर.. आप ही बताइए.. कैसे मदद करूँ? आप जो कहोगे मैं करने के लिए तैयार हूँ"

"उसे कहीं गार्डन या रेस्टोरेंट में ले जा.. थोड़ा बाहर घूमेगी तो उसे अच्छा लगेगा और अपने सदमे से उभर पाएगी.. हम तो उसके माँ बाप है.. सलाह और सुझाव देने के अलावा ज्यादा कुछ कर नहीं सकते.. उसे जरूरत है दोस्त की.. कविता अभी मायके गई हुई है इसीलिए मुझे तेरी मदद लेनी पड़ रही है.. "

"ठीक है भाभी.. मैं कुछ करता हूँ" कहते हुए पीयूष घर के बाहर निकला

वैशाली कुर्सी पर गुमशुम बैठी हुई थी.. विचारों में खोई हुई सी..

"अरे वैशाली.. मुझे एक दोस्त के घर लैपटॉप देने जाना है.. लैपटॉप बेग का बेल्ट टूट गया है तो मैं उसे बाइक पर अकेले ले नहीं जा सकता.. तू मेरे साथ चलेगी? सिर्फ पीछे बैठना है बेग पकड़कर.. कविता घर पर ही नहीं इसलिए तुझे बोल रहा हूँ.. प्लीज.. !!"

वैशाली का जरा भी मन नहीं था जाने का.. वो मना करना चाहती थी पर बोल न पाई.. उसके पीयूष से संबंध ही कुछ ऐसे थे की वो मना नहीं कर पाई.. हाँ अगर वो किसी काम में व्यस्त होती तो अलग बात थी.. पर फिलहाल वो फ्री थी..

"ठीक है पीयूष.. चलते है.. वैसे भी घर पर बैठे बैठे बोर हो रही हूँ" वैशाली ने कहा "तू घर पहुँच.. मैं थोड़ी देर में ड्रेस चेंज कर के आती हूँ"

उनके इस संवाद को सुन रही शीला खुश हो गई.. मन ही मन वो पीयूष का आभार प्रकट करने लगी.. कितनी आसानी से मना लिया वैशाली को उसने.. !!

वैशाली कपड़े बदलकर बाहर आई.. और शीला को बताया कर पीयूष के घर चली गई.. अनुमौसी के साथ थोड़ी बातचीत करने के बाद वो पीयूष के पीछे लैपटॉप का बेग लेकर बैठ गई

"ठीक से पकड़ना.. अभी मेरी किस्मत थोड़ी ठीक नहीं चल रही.. अभी अभी मेरा मोबाइल टूट चुका है.. !!" फिर से मौसम का खयाल.. हवा के झोंके की तरह.. पीयूष के मन में आ ही गया

"अरे वो कोई छोटी बच्ची है क्या?? जो तू उसे ये सब समझा रहा है!! मोबाइल टूटा होगा तो तेरी गलती से.. उसमें इस बेचारी को क्यों सुना रहा है?? " अनुमौसी ने पीयूष को धमकाया.. वैशाली ये सुनकर हंस पड़ी.. कलकत्ता से लौटने के बाद.. शायद पहली बार उसके चेहरे पर मुस्कान आई थी.. अनुमौसी ने उसका पक्ष लिया ये देखकर उसे बहोत अच्छा महसूस हुआ.. सदमे से गुजर रहे किसी भी इंसान को अच्छा लगेगा..

पीयूष ने बाइक स्टार्ट की.. वैशाली पीछे बैठ गई..

पीयूष ने मन में सोचा.. वैशाली से पूछूँ की किसी अन्डर-कन्स्ट्रक्शन साइट की तरफ बाइक ले लूँ?? पर वैशाली को देखकर लग रहा था की वो शायद अभी मज़ाक के मूड में नहीं थी..

बारिश के कारण गड्ढे से भरे रास्ते पर पीयूष ने तेजी से बाइक को दौड़ा दिया.. देखकर शीला ने चैन की सांस ली.. चलो अच्छा हुआ.. ये घर के बाहर तो निकली.. !!

शीला ने घर के अंदर जाकर देखा.. मदन अपने लैपटॉप पर कुछ कर रहा था..

"क्या कब से लैपटॉप पर चिपका हुआ है तू? अच्छा सुन.. वैशाली को मैंने पीयूष के साथ बाहर भेजा है.. इसलिए अब कॉम्प्युटर से नजरें हटा और जरा मेरी तरफ भी देख.. अभी घर पर कोई नहीं है.. रात को खाने में क्या बनाउ?" साड़ी का पल्लू हटाकर अपने टाइट बबलों को दिखाते हुए कामुक अंदाज में उसने कहा.. वो बार बार मदन को ये इशारा दे रही थी की घर पर कोई नहीं है.. वो मदन को उत्तेजित कर रही थी..



मदन: "तेरे जो दिल में आए बना दे.. मैं खा लूँगा.. वैसे कुछ ज्यादा भूख नहीं है.. "

शीला मदन के पीछे इस तरह बैठ गई की उसके स्तनों का स्पर्श मदन के कंधों से हो.. और मदन लैपटॉप में क्या कर रहा था वो देखने लगी..

"उस मेरी से चैट कर रहा हूँ" शीला पूछती उससे पहले ही मदन ने बता दिया

"अच्छा.. !!! तभी कब से इस कॉम्प्युटर से चिपका बैठा है.. अब वो अंग्रेज रांड क्या तुझे कॉम्प्युटर स्क्रीन से दूध पिलाएगी?"

"दूध तो तू भी नहीं पीला सकती.. तेरे लिए तो अब ये मुमकिन ही नहीं है"

"वैशाली के जन्म के बाद तूने कहाँ कोई कमी छोड़ी थी मेरा दूध चूसने में.. !!! और अब तो तू दूध के बदले मेरा खून चूसता है वो कम है क्या? और दूध पीला नहीं सकती.. पर तेरा दूध और मलाई निकलवा तो सकती हूँ मैं.. " मदन के लंड पर हाथ रखते हुए बड़े ही कामुक अंदाज में शीला ने कहा



मदन: "शीला.. वैशाली के साथ जो कुछ भी हुआ उसके टेंशन की वजह से.. सेक्स को तो मैं भूल ही गया था.. कितने दिनों से कुछ मन ही नहीं कर रहा.. आज तू कुछ ऐसा कर की मेरी मरी हुई इच्छाएं फिर से जागृत हो जाएँ"

शीला: "ऐसा तो मैं क्या करूँ.. !!! मर्द तो तू है.. जो भी करना है तुझे ही करना होगा"

मदन: "मन तो मेरा बहोत कर रहा है.. पर अभी के हालात देखते हुए मैं सोच रहा था की मेरी ऐसी इच्छा प्रकट करूंगा तो तुझे अच्छा नहीं लगेगा.. और शायद मेरे बारे में तू क्या सोचेगी.. यही सोचकर मैं खामोश हूँ"

शीला: "मैं समझ सकती हूँ.. पर वैशाली के साथ ऐसा होने के कारां हमने खाना-पीना तो नहीं छोड़ दिया ना.. वैसे ही ये भी एक प्राकृतिक जरूरत ही है.. वैसा समझकर ही हमें स्वाभाविक होकर इसे स्वीकार करना ही होगा.. और किसी बात को लेकर तेरी कोई इच्छा थी तो मुझे बताना चाहिए था ना.. मैं तुझे कैसे भी संतुष्ट करने का प्रयत्न करती.. और तू मुझे एक बार छु लें.. बाद में मेरी इच्छा हो ही जाती है"

मदन: "मेरी कह रही है की वो मेरा लंड चूसना चाहती है.. और बदले में मुझे अपना दूध पिलाना चाहती है" तीरछी नज़रों से शीला की ओर देखते हुए मदन ने कहा और अपना लंड सहलाता रहा

शीला: "हाँ तो फिर डाल दे इस कॉम्प्युटर की स्क्रीन में अपना लंड.. " मदन को ताना मारते हुए उसने कहा "यहाँ तेरी पत्नी बिना लंड के तड़प रही है.. और तुझे उस मेरी की पड़ी है??" गुस्से में शीला ने लैपटॉप की पावर स्विच दबाकर बंद कर दिया

मदन: "अरे यार, क्या कर रही है तू? ऐसे बंद नहीं करते कभी.. विंडोज़ करप्ट हो जाएगा तो फिर से इंस्टॉल करना पड़ेगा मुझे " नाराज होते हुए उसने कहा

शीला: "अगर तू मेरे साथ अभी कुछ नहीं करेगा तो मैं भी करप्ट हो जाऊँगी.. इतना सेक्सी माल तेरे सामने चुदने के लिए बेकरार खड़ा है और तू कब से इस डिब्बे के साथ चिपका हुआ है.. !!"

मदन: "तू बेकार गुस्सा कर रही है.. बहोत दिन हो गए थे इसलिए चैटिंग करते हुए ठंडा होना चाहता था.. मुझे कहाँ पता था की तू टपक पड़ेगी बीच में.. !! और लैपटॉप का सत्यानाश कर देगी.. !!"

शीला: "और मेरे बदन और उसकी इच्छाओं का सत्यानाश हो रहा है उसका क्या?? तू तो कंप्यूटर में लंड डालकर मेरी को मुंह में देकर झड़ जाएगा.. पर मैं कहाँ जाऊँ? लगता है मुझे भी किसी सब्जीवाले या दूधवाले को ढूँढना ही पड़ेगा.. !!" छाती से पल्लू हटाते हुए मादक स्टाइल से मदन को ललचाते हुए कहा.. पिछले एक घंटे से मेरी के साथ चैट कर रहे मदन का लंड तो तैयार ही था..

अब लैपटॉप को रिस्टार्ट करने में बहोत वक्त लग जाता.. इसलिए मदन ने उसे साइड में रख दिया और शीला को बाहों में भर लिया.. दोनों काफी दिनों से भूखे थे..

"मेरी के साथ जो कुछ भी कर रहा था.. वो सब कुछ मेरे साथ भी कर.. देख.. मेरे बबले भी कितने भारी हो गए है.. तुझे पता है.. जब काफी दिनों तक इन्हें दबाया न जाए.. तब ऐसे ही सख्त और भारी लगते है.. मुझे वज़न लगता है इन छातियों का.. " ब्लाउस के तमाम हुक खोल दीये शीला ने..


ब्रा खुलते ही.. मदमस्त खरबूजों जैसे स्तन बाहर लटकने लगे.. एक इंच लंबी निप्पलें मदन का अभिवादन कर रही थी.. मदन ने शीला के दोनों स्तनों को मसलते हुए कहा

"ओह्ह शीला मेरी जान.. अगर वैशाली के आ जाने का डर नहीं होता तो आज मैं तुझे मेरी के साथ विडिओ-चैट करते हुए चोदता.. यहाँ मैं तेरे बबले मसलता और वहाँ मेरी के थनों से दूध निकलता.. !!"

मदन की जांघ पर बैठते हुए शीला ने कहा "मदन, तुझे दूध से भरे बबले बहोत पसंद है ना.. !! इसीलिए उस अंग्रेज मेरी के पीछे पागल हुआ पड़ा है.. पर वो यहाँ आकर तुझे दूध थोड़े ही पीला पाएगी??"

"आह्ह शीला.. तुझे क्या कहूँ यार.. !! सब पता होने के बावजूद मैं अपने आप पर कंट्रोल ही नहीं कर पाता.. दूध टपकती निप्पलें देखकर मैं होश खो बैठता हूँ.. !!" मेरी की दूध से भरी थैलियों को याद करते हुए मदन शीला की काँखों के नीचे से हाथ डालते हुए उसके स्तनों को दबाता रहा..

बहोत दिनों से भूखी थी शीला.. मदन के स्पर्श ने बेकाबू बना दिया उसे.. मदन के समक्ष अब वो निःसंकोच अपनी इच्छाएं व्यक्त कर रही थी

"ओह्ह मदन.. अब रहा नहीं जाता मुझसे.. तू जल्दी ही कुछ कर.. अभी वैशाली आ जाएगी तो सारा मज़ा खराब हो जाएगा.."

सुनते ही मदन ने शीला को धक्का देकर बेड पर लिटा दिया.. शीला की जांघें अपने आप चौड़ी हो गई.. जैसे छोटे बच्चे के आगे निवाला रखते ही उसका मुंह खुल जाता है.. बिल्कुल वैसे ही

नीचे झुककर शीला की भोस को चूमते हुए शीला मचल उठी.. "आह्ह मदन.. !!"



शीला की रग रग से वाकिफ मदन ने चाट चाटकर भोसड़े को गीला कर दिया.. और फिर उसके चूतड़ों के नीचे तकिया सटाकर रख दिया.. शीला का भोसड़ा ऐसे उभर गया जैसे दुनिया के सारे लंड एक साथ लेना चाहता हो.. शीला के भोसड़े का विश्वरूप दर्शन देखकर मदन भी बेचैन हो गया.. दोनों उंगलियों से शीला की भोस के वर्टिकल होंठों को चौड़ा कर अंदर के गुलाबी भाग को देखता ही रहा.. जैसे चेक कर रहा हो की उसकी नामौजूदगी में अंदर कितने लंड गए थे?? अपनी उंगलियों को गीली करते हुए मदन ने दो उंगलियों को शीला के गरम तंदूर जैसे छेद में डाल दी.. सिहर उठी शीला




शीला और मदन की सेक्स लाइफ इतनी उत्कृष्ट होने का एक कारण यह भी था की चुदाई के दौरान वो दोनों खुलकर बातें करते थे.. ऐसी नंगी बातों से दोनों को एक जबरदस्त किक मिलती थी.. और दोनों जंगलियों की तरह एक दूसरे को भोगते थे.. अपनी विकृतियों को जीवनसाथी के सामने निःसंकोच व्यक्त कर पाना.. हर किसी के नसीब में नहीं होता.. मदन ने भी काफी मेहनत के बाद शीला को इस तरह तैयार किया था.. वरना भारतीय स्त्री के मन में क्या क्या विकृत इच्छाएं है ये ९९% पतियों को पता ही नहीं होता.. !!

जैसे मर्दों की कई अदम्य इच्छाएं होती है.. वैसे औरतों के मन में भी कई ऐसी गुप्त कामेच्छाएं दबी पड़ी होती है.. जो अगर वो अपने पति को बताएं तो वो सुनकर ही बेहोश हो जाएँ.. मदन ने ये साहस किया था.. उसने अपनी पत्नी को पूर्णतः समझा था.. अपनी पत्नी की विकृत इच्छाओं का उसने स्वीकार किया था.. उसके चारित्र के बारे में गलत सोचें बगैर.. हर किसी के बस की बात नहीं है.. अगर पत्नी ग्रुप सेक्स की बात करें तो सुनकर पति को कैसा सदमा लगेगा? या फिर पार्टनर चेंज करने की बात अपनी पत्नी के मुंह से सुनकर कौन सा पति नहीं चौंकेगा?

रास्ते से गुजरते वक्त.. राह पर खड़े गधे के काले विकराल लंड को लटकता हुआ अहोभाव से देखने के बाद पत्नी जब रात को चुदाई के दौरान उस घटना का उल्लेख करें तब ज्यादातर मूर्ख पति यही सोचते है की उसकी पत्नी को लंबा और तगड़ा लंड लेने की ख्वाहिश है और वो उसके लंड से संतुष्ट नहीं है.. जब की मदन ये सोचता था की मेरी पत्नी कितनी हॉट है जो किसी प्राणी के अवयव के बारे में बात करते हुए सेक्स के दौरान एक्साइट हो रही है.. !! इसीलिए तो वो दोनों बेखौफ होकर अपनी विचित्र से विचित्र और विकृत से विकृत इच्छाओं को प्रकट करने से हिचकिचाते नहीं थे.. पति पत्नी के बीच पारदर्शिता का ये सब से उत्कृष्ट उदाहरण है.. शीला चुदाई करते हुए ऐसे ऐसे विचार प्रकट करती की सुनकर ही मदन का लाँड़ दोगुना सख्त हो जाता.. मदन भी सोचता की जब ये सब सुनकर मुझे इतना आनंद आ रहा है तो क्यों बेवजह पत्नी पर शक करके अपना मज़ा खराब करूँ??

शीला और मदन जब अकेले होते थे तब सेक्स से संलग्न किसी भी तरह की बात करने में शर्म महसूस नहीं करते थे.. किसी भी व्यक्ति को ईर्ष्या हो जाएँ ऐसा सुंदर सहजीवन व्यतीत कर रहे थे दोनों.. उत्कृष्ट सहजीवन जीने के लिए सुंदर पात्र की जरूरत नहीं होती.. बल्कि विकृत इच्छाओं की.. और उसे व्यक्त करने की आजादी होने की जरूरत होती है.. पत्नी कितनी भी सुंदर क्यों न हो.. अगर वो बेडरूम में भी वस्त्र उतारने से कतराती हो.. या फिर जब उसके हाथ में लंड हो तब.. सब्जियों के बढ़े हुए दाम.. और कल दूध टाइम पर आएगा या नहीं.. ऐसी बातें करती हो.. तब पात्र की सुंदरता निरर्थक बन जाती है.. भावनात्मक जुड़ाव के लिए सुंदरता मायने नहीं रखती..

पता नहीं क्यों.. पर मैंने ये अनुभव किया है की अति-सुंदर औरतों में कामुकता बहोत ही कम होती है.. स्त्री इतनी सुंदर हो की देखते ही लंड खड़ा हो जाए पर वो मुंह में लंड लेना नहीं चाहती.. चूत में डालो तो भी बार बार कहेगी की मुझे दर्द हो रहा है.. उससे तो अच्छा कम सौन्दर्य वाली स्त्री हो पर काम-कर्म में अपने मर्द को योग्य साथ दें.. ऐसी स्त्री लाख गुना बेहतर होती है.. पुस्तक दिखने में कितना सुंदर है ये मायने नहीं रखता.. अंदर लिखी कहानी कितनी रोचक है.. ये ज्यादा महत्वपूर्ण होता है.. !!

"मदन.. चल हम कहीं अकेले घूमने चलते है.. किसी मस्त जगह.. मुझे मुक्त मन से ज़िंदगी जीना है.. बिंदास होकर.. "उसका भोसड़ा चाट रहे मदन के सर के बाल पकड़कर खींचते हुए शीला ने कहा "आह्ह.. ये समाज और सोसायटी के नखरों से तंग आ गई हूँ मैं.. कहीं ऐसी जगह ले चल की जहां हमें कोई जानता न हो.. और हम बिना किसी शर्म या बंधन के जीवन जी सकें.. आह्ह मदन.. !!"

मदन को पता था की जब जब शीला दिन में चुदवाती तब बेकाबू होकर अनाब-शनाब बकने लगती थी.. कभी कभी शीला की ये सब व्यभिचारी बकवास सुनकर मदन को धक्का भी लगता.. पर वो ये सोचकर अपने आप को मनाता की पुरानी गाड़ी में दो पेसेन्जर ज्यादा बैठ भी गए तो क्या फरक पड़ता है!! मैंने भी तो वहाँ विदेश में मेरी के संग गुल खिलाए है.. !! और शीला मुझे सुख देने में कभी पीछे नहीं हटती.. यह सोचकर मदन शीला की बातों का बुरा न मानता.. और उसे सहकार भी देता..

"हाँ शीला.. मैं भी तुझे ऐसी किसी जगह ले जाना चाहता हूँ.. जहां हमें कोई न जानता हो.. मैं तो तुझे रंडी बनाकर बीच बाजार खड़ा करूंगा.. तू धंधा करें और मैं बैठकर पैसे गिनूँ.. ओह्ह.. !!" शीला को खुश करने के लिए मदन ने भी अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ा दीये

"ओह्ह मदन.. मैं तेरी रंडी ही तो हूँ.. मुझे एक साथ आठ-दस लोगों से चुदवाने की बहोत इच्छा है.. आह्ह जल्दी जल्दी चाट मदन.. अब रहा नहीं जाता.. घुसेड़ दे अपना लोडा अंदर.. और चोद दे मुझे.. आह्ह.. ला उससे पहले तेरा लंड चूस लूँ.. कितने दिन हो गए इसे मुंह में लिए हुए!! " शीला उठी और मदन को धक्का देकर बेड पर गिराते हुए उसके लंड पर कब्जा कर लिया.. अद्भुत उत्तेजना के साथ शीला ने मदन को मुख-मैथुन का आनंद देने की शुरुआत की.. शीला की इन गरम हरकतों को देखकर मदन सोच रहा था.. शीला की गर्मी के आगे मेरी का तो कोई मुकाबला नहीं है.. मेरी लंड चूसने में इतनी ऐक्टिव कभी नहीं थी..

मदन का पूरा लंड निगलकर उसके आँड़ों को मुठ्ठी में पकड़कर इतने जोर से शीला ने दबाया की मदन दर्द से कराह उठा.. वो सोच रहा था की शीला की हवस एक दिन उसकी जान ले लेगी..



"आह्ह.. जरा धीरे से कर, शीला.. " शीला को रोकते हुए मदन ने कहा..

शीला ने लंड मुंह से निकाला और छलांग लगाकर मदन पर सवार हो गई.. लंड का चूत के अंदर सरक जाना तो तय ही था.. पूरा लंड एक धक्के में अपने भोसड़े में ग्रहण करते हुए शीला कूदने लगी.. "आह्ह आह्ह.. ओह्ह ओह्ह" की सिसकियाँ कमरे में गूंजने लगी.. इन बदहवास धक्कों से मदन के लंड ने कुछ ही देर में पानी छोड़कर शीला के भोसड़े को पावन कर दिया.. पर जब तक शीला की आग नहीं बुझती वो मदन को छोड़ने वाली नहीं थी.. मदन के स्खलित होने के बाद भी करीब पाँच मिनट तक वो लंड पर उछलती रही.. जब तक उसके भोसड़े ने अपनी सारी खुजली, चिपचिपे प्रवाही के रूप में बाहर बहा न दी तब तक वो रुकी नहीं..



"ओह्ह चोद मुझे.. साले ढीले लंड.. इतनी जल्दी झड़ गया.. आह्ह.. ओह्ह.. आह्ह.. मैं भी गईईईईई........!!!!" कहते हुए वो निढाल होकर मदन की छाती पर गिर गई.. एक सुंदर ऑर्गजम प्राप्त कर शीला बेहद खुश हो गई थी..
 
वैशाली और पीयूष बाइक पर जा रहे थे.. पीयूष बातें कर रहा था पर वैशाली जवाब नहीं दे रही थी.. वो चुपचाप पीछे की सीट पर बैठी रही.. पीयूष कैसे भी वैशाली से संवाद स्थापित करना चाहता था पर वो कुछ बोल ही नहीं रही.. उसकी खामोशी को तोड़ने के लिए उसने मज़ाक भी किया और उसे गुस्सा भी दिलाया.. पर वो मौन ही रही..

आखिर पीयूष का रफ ड्राइविंग देखकर उसने अपना मौन तोड़ा..

"ओर थोड़ा फास्ट चला.. कम से कम इस ज़िंदगी से तो छुटकारा मिलें.. " निराश वैशाली ने कहा

पीयूष: "अरे यार.. कैसी अशुभ बातें कर रही थी.. तुझे अभी मारना थोड़े ही है.. अगर तेरी किस्मत में मौत लिखी होती तो आत्महत्या की कोशिश के बाद तू कैसे बच जाती?? मैं तो इसलिए ऐसे चला रहा हूँ क्यों की मुझे मरना है" मज़ाक करते हुए पीयूष ने कहा.. वैशाली को बोलते हुए देख वो खुश हुआ..

बेफिक्री से बाइक को तेज चलाते हुए वो तेजी से ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर जा रहा था.. अचानक धड़ाम से बाइक एक खड्डे में गिरा पर पीयूष ने कंट्रोल कर लिया इसलिए वे दोनों गिरे नहीं.. वैशाली ने पीयूष का कंधा पकड़ लिया वरना वो जरूर गिर पड़ती..

"क्या कर रहा है तू? कैसे बाइक चला रहा है यार.. !! अभी हम दोनों मर जाते.. !!" वैशाली ने परेशान होते हुए कहा

पीयूष: "ऑफ कोर्स तुझे मारने के लिए.. अभी अभी तो तूने कहा.. की ज़िंदगी से छुटकारा चाहिए तुझे.. अब फट गई तेरी??"

वैशाली: "डर नहीं रही.. पर चिंता तो होगी ना.. !!"

पीयूष: "ओह.. क्या बात है.. !! मतलब मेरी चिंता करने वाला भी दुनिया में कोई है.. !!"

वैशाली: "ज्यादा रोमियोगिरी मत कर.. और सीधे सीधे बाइक चला.. " पीयूष को धमकाते हुए उसने कहा.. हम-उम्र दोस्त कितनी आसानी से एक दूसरे को किसी भी सदमे से उभरने में मदद कर सकते है.. !!

एक कॉफी शॉप के पास पीयूष ने बाइक रोक दी.. वैशाली चुपचाप उतर गई.. दोनों अंदर गए.. और एक टेबल पर बैठ गए..

एक वेटर ने आकर कहा "सर, वहाँ कॉर्नर सीट भी खाली है.. और कपल रूम भी अवेलेबल है.. सिर्फ 300 रुपये एक्स्ट्रा"

"ओके ओके.. थेंक्स.. पर हम कपल नहीं है" पीयूष ने हँसते हँसते कहा

"शरमाइए मत सर.. एकदम सैफ है.. और यहाँ आने वाले ज्यादातर कपल होते भी नहीं है.. " वेटर ने पीयूष को आँख मारते हुए कहा

"बहुत हुआ.. अब मुंह बंद कर.. और चलता बन.. एक बार मना किया ना तुझे?" पीयूष ने गुस्से से कहा

"ओके ओके.. सॉरी सर.. " वेटर चला गया

"साले, कैसे कैसे मार्केटिंग करते है!! भाई बहन को भी कपल समझ ले, ये लोग..!!" पीयूष ने कहा

"हम दोनों भाई बहन है क्या?" वैशाली ने सवाल किया

"अरे यार.. मैंने तो बस उदाहरण के रूप में कहा.."

"तो फिर ऐसा कहना चाहिए था की पड़ोसी को कपल बना दिया"

"तुझे जैसा ठीक लगे.. तू बचपन से ऐसी ही है.. हमेशा अपनी बात को सच साबित करना चाहती है.. " बचपन की बात सुनते ही वैशाली थोड़ी सी जज्बाती हो गई पर उसे अच्छा लगा

पीयूष: "अब मैं जो भी कह रहा हूँ वो ध्यान से सुन.. मैं तुझे वयस्क बुजुर्ग लोगों की तरह सलाह नहीं दूंगा.. पर एक दोस्त होने के नाते बता रहा हूँ.. तेरे साथ जो कुछ भी हुआ वो ठीक नहीं हुआ.. पर अब जो हो गया सो हो गया.. तू कितनी भी उदास होकर रहेगी.. उससे तेरा भूतकाल बदलने वाला नहीं है.. और ना ही उस चूतिये को इससे कोई फरक पड़ेगा.. वो साला तो उस रोजी की बाहों में पड़े पड़े बिस्तर गरम कर रहा होगा.. फिर तू क्यों उसे याद करके अपनी ज़िंदगी खराब कर रही है.. !!"

कॉफी के घूंट लगाते हुए पीयूष ने कहा और फिर बात आगे बढ़ाई.. "तू यहाँ से गई तब कितनी सुंदर और खुश लग रही थी.. तेरा चेहरा खिले हुए गुलाब जैसा था.. और अब देख अपना चेहरा आईने में?? मैं ये नहीं कह रहा की जो हुआ उसका तुझे दुख नहीं हुआ होगा.. बोलना आसान है पर जिस पर गुजरती है वही असलियत जानता है.. ये मैं समझता हूँ.. पर अगर मेरी बातों पर गौर करेगी तो तुझे समझ में आएगा.. तू अपने मन, शरीर और अपने माता-पिता को क्यों दुखी कर रही है?? ये तेरी जवानी के सामने.. एक नहीं हजार संजय तेरे कदमों में गिरने के लिए तैयार हो जाएंगे.. ऐसा कातिल हुस्न है तेरा.. " कहते कहते पीयूष ने वैशाली का हाथ पकड़ लिया.. वैशाली ने उसे रोका नहीं

वो वेटर फिर से टेबल के पास आकर बोला "सर, आपको अगर प्राइवसी चाहिए तो 300 रुपये खर्च कर दीजिए.. पर ऐसे टेबल पर ही शुरू मत हो जाइए.. यहाँ ओर कस्टमर भी है आस पास.. जरा ध्यान रखिए"

"ओके ओके.. आई एम सॉरी" सज्जनता पूर्वक पीयूष ने माफी मांगी..

वैशाली ने उस वेटर से पूछा "कपल रूम कहाँ है?" सुनते ही पीयूष चोंक उठा

"आइए मैडम.. मैं आपको दिखाता हूँ.. सर से तो ज्यादा आप फॉरवर्ड हो" वैशाली की तारीफ करते हुए वो वेटर उन्हें एक कमरे तक ले गया.. एक छोटी सी चेम्बर थी.. वैशाली अंदर गई और पीयूष भी उसके पीछे पीछे अंदर गया..

"अच्छा सुनो.. आधे घंटे बाद दो प्लेट समोसे ले कर आना.. और तब तक हमें डिस्टर्ब मत करना.. " वैशाली ने वेटर से कहा

"चिंता मत कीजिए मैडम.. आप को कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा.. बस जाते जाते मुझे टिप जरूर दीजिएगा.. !!" कहते हुए वेटर खुश होकर चला गया..

पीयूष और वैशाली दोनों बेड पर बैठ गए..

पीयूष ने अपनी बात आगे बढ़ाई "क्या तुझे नहीं लगता की संजय को भूलकर तुझे आगे बढ़ना चाहिए? कब तक बीती हुई बातों को याद करके रोती रहेगी? जो हो गया उसे भूल कर.. अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर.. कहीं जॉब जॉइन कर ले.. अच्छा लड़का ढूंढ.. ऐसा लड़का जो ना सिर्फ तेरे जिस्म को बल्कि तेरे दिल को भी चाहें.. ऐसा लड़का मिलते ही बिना वक्त गँवाए उसे आई लव यू बोल दे.. और ये सुनिश्चित कर की वो तुझे खुश रखें.. खुश रहने के लिए खुश होने का इरादा भी जरूरी होता है.. तेरी इस जवानी का उपयोग कर.. तेरी सुंदरता से पुरुषों को अपनी उंगलियों पर नचा..ज्यादातर मर्द इसी लायक होते है.. अगर तूने ऐसा नहीं किया तो फिर से कोई संजय आकर तुझे बर्बाद कर देगा.. तुझे इस्तेमाल करके फेंक देगा.. तुझे क्यों नींद की गोलियां खानी पड़ीं?? तूने ऐसा क्यों कुछ नहीं किया की संजय को खुद गोलियाँ खानी पड़ें??" एक सांस में बहोत कुछ बोल गया पीयूष

ये सुनकर वैशाली के चेहरे की रेखाएं बदलने लगी.. जैसे जैसे पीयूष की बातें उसके दिमाग में उतरती गई वैसे वैसे उसके चेहरे पर चमक आने लगी..

थोड़ी देर के लिए चेम्बर में सन्नाटा छाया रहा.. विचारों में डूब गई वैशाली.. वैशाली ने सामने रखे ग्लास से पानी पिया.. चेहरे पर उदासी अब भी बरकरार थी पर पानी पीने से गीले हो चुके होंठ बहोत ही सुंदर लग रहे थे..

काफी देर तक जब वैशाली ने कुछ नहीं कहा तब पीयूष बोला "मेरी बातों का बुरा मान गई क्या?" पीयूष ने फिर से वैशाली का हाथ पकड़ लिया.. शायद वैशाली को ये पसंद न आयें.. ये सोचकर उसने हाथ छोड़ दिया.. उसकी आँखों में आँखें डालकर अपना खोया हुआ आत्मविश्वास ढूंढ रहा था पीयूष.. वैशाली की आँखों में दृढ़ निश्चय के भाव देखकर पीयूष की आँखों में चमक सी आ गई

वैशाली जैसे मन ही मन में तय कर लिया था की.. बस, अब बहोत हुआ.. अब तक की ज़िंदगी तो संजय ने तबाह कर दी थी.. पर अब आगे के जीवन को मैं बर्बाद नहीं होने दूँगी.. वैशाली के भावों में आ रहे सकारात्मक बदलाव को पीयूष आश्चर्यसह देखता ही रहा

वैशाली का दिमाग तेजी से चल रहा था,. वो सोच रही थी.. मैंने संजय को अपना सब कुछ समर्पित कर दिया और फिर भी उसने मुझे धोखा दिया.. !! वो चूतिया रोजी को चोदकर आता था.. और उस कमीनी रोजी की चूत के पानी से गीला लंड, साला मेरे मुंह में डालता था.. !! छी.. मादरचोद साला.. वैशाली के चेहरे पर क्रोध की रेखाओं को देखकर पीयूष समझ गया की वो संजय को याद कर रही थी

अब वैशाली ने सामने से पीयूष का हाथ पकड़ लिया.. निःसंकोच होकर.. और उसकी हथेली को चूम लिया.. चेम्बर के अंदर जल रहे लाल रंग के बल्ब की हल्की रोशनी में चमक रहे पीयूष के हेंडसम चेहरे को देखते हुए वैशाली ने कहा "तेरी बात सौ फीसदी सच है.. जो हो गया है उसे याद करके मैं और दुखी होना नहीं चाहती हूँ.. पर क्या करूँ यार!! पुरानी यादें दिमाग से हटती ही नहीं है.. चाहे कितनी भी कोशिश कर लूँ.. अब तू ही मुझे इन यादों से मुक्त होने में मदद कर.. !!"

वैशाली ने अभी भी पीयूष की हथेली को पकड़ रखा था.. पीयूष खड़ा हुआ और वैशाली के पीछे आया.. उसके कंधों को हल्के हल्के मसाज करता रहा.. उसका स्पर्श वैशाली को बहोत अच्छा लगा.. गर्दन झुकाते हुए उसने पीयूष के हाथ पर अपना सर रख दिया.. और फिर विचारों में खो गई.. पीयूष समझ गया की वैशाली वापिस अपने भूतकाल की यादों में खोने लगी थी.. इसलिए अब उसने ऐसी बातें करना शुरू कर दिया जो वैशाली को उन बुरी यादों से दूर रख सकें..

"याद है वैशाली.. उस दिन हमें जब वो ऑटो वाला उसके मकान पर ले गया था.. जो अभी बन रहा था.. वहाँ उस रेत के ढेर में हमने कितने मजे किए थे.. !! कितनी मस्ती कर रही थी तू उस दिन.. !! मैं तो तेरी हरकतों से पागल सा हो गया था.. जब हम छोटे थे तब तू मुझे लाइन मारती थी पर जब मैं तेरे बॉल की तरफ देखता था तब तू उन्हें दुपट्टे से ढँक लेती थी.. तुझे याद होगा.. ट्यूशन में जब हम साथ बैठते थे.. तब में अपनी कुहनी तेरे बबलों पर मारता रहता था.. और तू कितना गुस्सा करती थी!!" खराब भूतकाल को भूलने की सब से बेहतरीन जड़ीबूटी है अच्छे भूतकाल को याद करना..!!

स्कूल के वो दिन और किशोरावस्था का वो अदम्य विजातीय आकर्षण याद आते ही वैशाली को ऐसा महसूस हुआ जैसे वो फिर से सोलह साल की हो गई हो.. वो चुपचाप पीयूष की बातें सुनती रही.. जब हफ्तों तक स्त्री को किसी पुरुष का प्रेमभरा स्पर्श न मिला हो.. और लंबे अवकाश के बाद जब कोई मर्द उसे छु लेता है.. तब शरीर में अजीब सी हलचल होने लगती है.. शर्म और चारित्र के खोखले बक्से में बंद वासना रूपी शेर को कंट्रोल करने में उसे कितनी तकलीफ हुई होगी.. ये किसी ने नहीं सोचा था.. !! पीयूष के हाथ वैशाली के कंधों से सरककर उसके ड्रेस के अंदर घुस गए.. और उसने वैशाली की चूचियों को मजबूती से निचोड़ दिया.. स्तब्ध हो गई वैशाली.. और उसकी आँखों से आँसू बरसने लगे.. वो कैसा महसूस कर रही थी वो खुद तय नहीं कर पा रही थी.. मित्र भाव था या प्रेम.. या वासना या फिर संजय के प्रति नफरत..!!

लंबे अरसे से पुरुष के स्पर्श और संसर्ग के बिना सुषुप्त अवस्था में आ चुकी कामेच्छा को, जैसे पीयूष ने झकझोर कर जागा दिया था.. दोनों हाथों से उसके भव्य स्तनों को दबा रहे पीयूष ने उसकी निप्पलों को मरोड़ना शुरू कर दिया.. और इतने जोर से दबाया की वैशाली दर्द से कराह उठी..



"आह्ह.. पीयूष.. दर्द हो रहा है.. जरा धीरे धीरे कर.. बट डॉन्ट स्टॉप.. आई लाइक इट.. !!"

अब पीयूष निश्चिंत होकर वैशाली के स्तनों को अधिकार से दबाता रहा.. वैशाली के मदमस्त बबलों को दबाते हुए वो उत्तेजित हो रहा था..

"सेक्स करने का मन कर रहा है ना तुझे, वैशाली?? तू खुद को उंगली तो करती है ना.. !! या सब भूल गई.. इसलिए तेरी जवानी मुरझाए हुए फूल जैसी हो गई है.. फूल हो या चूत.. उसे समय समय पर पानी न पिलाया जाएँ तो वो मुरझा ही जाते है.. !!"

"ओह्ह पीयूष.. अब जोर से दबा.. आह्ह.. ओर जोर से मसल.. इशशशश.. " वैशाली अब सम्पूर्ण तौर पर कामदेव के प्रभाव तले आ चुकी थी.. "आह्ह पीयूष.. अब कंट्रोल नहीं होता" बेरहमी से स्तनों को मसल रहे पीयूष के हाथों को उसने अपने ड्रेस से बाहर निकाला.. और कुर्सी से खड़ी हो गई.. और पीयूष को अपनी बाहों में भरकर चूमने लगी.. काफी देर तक ये लीप किस चलती रही.. जब वेटर ने दरवाजे पर दस्तक दी तब दोनों का वास्तविकता का ज्ञान हुआ और फिर से नॉर्मल हो गए..

पीयूष ने दरवाजा खोला.. वैशाली को बहोत संकोच हो रहा था.. वो उत्तेजना के कारण थरथर कांप रही थी.. वेटर ने टेबल पर समोसे की प्लेट रख दी और चला गया.. पीयूष ने दरवाजा बंद कर दिया..

"आई एम सॉरी पीयूष.. बहोत दिन हो गए इसलिए मैं अपना कंट्रोल खो बैठी.. मुझे अभी भी कुछ कुछ हो रहा है..आई फ़ील सो हॉट.. प्लीज चल यहाँ से चले जाते है.. वरना मुझ से कोई गलती हो जाएगी.. मुझे अभी घर जाकर मास्टरबेट करना पड़ेगा.. !!"

वैशाली को इतना उत्तेजित देखकर पीयूष समझ गया की ये लड़की हवस और सदमे दोनों को साथ में संभालते हुए थक गई थी.. जिस्मानी जरूरतें गुर्रा रहे सांड की तरह बेकाबू हो रही थी.. और इस कपल रूम में कुछ भी करना खतरे से खाली नहीं था..

वैशाली को सांत्वना देते हुए उसने कहा "थोड़ी देर के लिए अपने आप को संभाल लें.. हम घर जाकर.. मेरे रूम में ही करेंगे.. मैं जब बुलाऊँ तब तू आ जाना.. और हाँ.. ये लैपटॉप की बैटरी अपने पास रख.. उसे देने के बहाने चली आना.. मैं जब फोन करूँ तब तू शीला भाभी से कहना की तू ये बैटरी देना भूल गई थी और मुझे देने आ रही है.. किसी को शक नहीं होगा.. मेरा भी बहोत मन कर रहा है वैशाली.. कविता से मुझे कोई शिकायत नहीं है यार पर ये तेरी बड़ी बड़ी छातियाँ देखकर.. उफ्फ़.. मुझ से रहा नहीं जाता.. !!"

"बड़ा तो मुझे भी पसंद है.. अब यहाँ बातें करके ही मुझे झड़वा देगा क्या?? कितनी प्यारी बातें करता है तू.. कोई कैसे तुझे मना कर पाएगा.. !!"

"चल अब फटाफट समोसे खा ले.. और तेरे इन विराट बबलों को दुपट्टे से ढँक ले जरा.. मेरा लंड इन्हें देखकर अंदर उछल रहा है.. तेरे बबलों के बीच की ये रेखा.. हाय.. कितने जबरदस्त चुचे है तेरे वैशाली.. !!" लंड को हाथ से दबाते हुए सामने की कुर्सी पर बैठी वैशाली के अर्धनग्न स्तनों के बीच की खाई को छूते हुए बोला पीयूष..

आँखें बंद कर सिसकें लगी वैशाली.. "आह्ह पीयूष.. ऐसा मत कर.. मुझे कुछ कुछ हो रहा है.. चल अब चलते है.. तेरे दोस्त के घर लैपटॉप देने भी तो जाना है"

"अरे मुझे किसी दोस्त के घर लैपटॉप नहीं देना था.. कंपनी का लैपटॉप है.. चिमनलाल की जागीर नहीं.. ये तो तेरी उदासी छटाने के लिए तेरी अति-सुंदर मम्मी ने मुझे रीक्वेस्ट की थी इसलिए बहाना बनाया था मैंने.. और मैं खुश हूँ की मैं ऐसा करने में सफल रहा.. शीला भाभी भी तुझे हँसता हुआ देखकर खुश हो जाएगी.. वैशाली.. अपने जज़्बातों को उन्हीं लोगों के लिए आरक्षित रखना चाहिए जिन्हें हमारी कदर हो.. संजय जैसे नालायक के लिए क्यों आँसू बहाना?? चल अब टाइम वेस्ट मत कर.. और समोसे खाना शुरू कर.. " कहते हुए एक समोसा वैशाली को देकर दूसरा खुद खाने लगा पीयूष

वैशाली गदगद हो गई.. इतने लंबे अरसे के दुख भरे दिनों के बाद.. आज वो खुश हुई थी.. दोनों ने फटाफट समोसे खतम कीये और खुशी खुशी कॉफी शॉप के बाहर निकलने लगे.. वो वेटर तभी आ टपका.. "सर, आशा है की आपको और मैडम को मज़ा आया होगा.. मुसकुराते हुए वो वैशाली के अस्तव्यस्त कपड़े और शर्म से लाल चेहरे को देख रहा था.. सारे वेटर वैशाली के मदमस्त उरोजों को तांकते हुए पीयूष की ओर ईर्ष्या के भाव से देख रहे थे.. उनकी भूखी नज़रों को अपने स्तनों पर महसूस करते हुए वैशाली को बड़ा अजीब लग रहा था.. पर वो क्या करती? अपने गदराए स्तनों को कैसे उनकी नज़रों से छुपाती??

पीयूष ने पेमेंट और टिप चुकाई तब तक सारे वेटर तसल्ली से वैशाली के स्तनों का चक्षु-चोदन करते रहे..

वैशाली पीयूष के पीछे बाइक पर बैठ गई.. और पीयूष ने तेजी से बाइक को घर की तरफ दौड़ा दी.. ऐसा लग रहा था जैसे बाइक को पीयूष नहीं.. पर उसका उत्तेजित लंड चला रहा था.. आते वक्त तो वैशाली ने उसे तेज बाइक चलाने से टोका था.. पर अब वो खुद चाह रही थी की पीयूष और तेज बाइक चलाएं और जल्दी से जल्दी घर पहुंचा दे.. अपने विशाल स्तनों को पीयूष की पीठ पर टेककर.. उसको दोनों कंधों से पकड़े रखा था.. स्त्री हो या स्तन.. टिकने के लिए उन्हें आधार की जरूरत तो पड़ती ही है..

तेजी से चलाते हुए थोड़ी ही मिनटों में दोनों शीला के घर के बाहर आ गए.. वैशाली को वहाँ छोड़कर वो अपने घर पहुँच गया..

वैशाली ने अपनी चाबी से घर खोला.. यहाँ वहाँ देखने पर भी मम्मी कहीं नजर नहीं आई.. उसने धीरे से उनके बेडरूम का दरवाजा खोला.. शीला घोड़ी बनी हुई थी और मदन पीछे से उसे पेल रहा था.. दोनों ही मादरजात नंगे थे..





स्तब्ध हो गई वैशाली.. सेक्स की आखिरी पलों में मगन मम्मी और पापा को देखकर उसने चुपके से दरवाजा बंद कर दिया.. गनीमत थी की मदन और शीला की पीठ दरवाजे के तरफ थी.. इसलिए वो देख्न न पाएं.. सामने भी होते तो वो दोनों चुदाई में इतने डूब चुके थे की वैशाली की मौजूदगी का एहसास भी न होता दोनों को..

वैशाली घर से बाहर निकली और पीयूष के घर की तरफ चल दी.. थोड़ी क्षणों पहले जो द्रश्य उसने देखा था वो नज़रों के सामने से हट नहीं रहा था.. पापा मम्मी को घोड़ी बनाकर कैसे चोद रहे थे.. !! इस उम्र में भी दोनों कितने ऐक्टिव है.. !! आज उसे मम्मी के सौन्दर्य का राज पता चला.. जब इतनी मजबूत ठुकाई नियमित रूप से मिलती हो.. तब किसी भी औरत का चेहरा सुंदर और खिला हुआ रहेगा..

पहले से ही उत्तेजित वैशाली.. अपने माँ-बाप की चुदाई को देखकर और व्यग्र हो गई.. उसका शरीर थरथर कांप रहा था.. एक तो वो कपल रूम में पीयूष ने बबले दबाकर चूत को पहले से ही गीला कर रखा था.. ऊपर से मम्मी-पापा को मस्ती से छोड़ते हुए देखकर.. पेन्टी में बाढ़ आ चुकी थी.. चलते हुए भी वैशाली को चिपचिपाहट का एहसास हो रहा था.. अब वैशाली का शरीर और मन दोनों.. मर्द के संसर्ग के लिए बेबस हो चुका था

वो पीयूष के घर के दरवाजे पर ही थी तभी पीयूष का फोन आया उसके मोबाइल पर..

"अरे, तू पहुँच भी गई.. !! बहोत मस्ती चढ़ी है तुझे ऐसा लगता है.. रहा नहीं जाता ना.. !! चल जल्दी.. मेरे लंड की हालत भी कुछ ऐसी ही है.. " हाथ पकड़कर लगभग घसीटते हुए वैशाली को अपने घर के अंदर ले गया पीयूष.. और लात मारकर दरवाजा बंद कर दिया..

"घर पर कोई नहीं है क्या?" वैशाली ने पूछा

"मम्मी मंदिर गई है.. एक घंटे से पहले नहीं आने वाली.. और पापा दुकान पर है.. रात को लौटेंगे"

मौसम के कुँवारे उरोजों को जितनी उत्कटता से वो पाना चाह रहा था उतनी ही उन्हें पाने की संभावना कम होती जा रही थी.. मौसम के गोरे मासूम स्तनों को माउंट आबू में देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था.. दोनों तरफ आग बराबर जल रही थी पर हालातों ने आगे कुछ होना मुमकिन न होने दिया.. अब वो सारी भड़ास वैशाली पर निकाल रहा था पीयूष.. वैशाली के ड्रेस पर से उसके बेमिसाल उरोजों को पूरी ताकत से दबा दिया पीयूष ने.. वैशाली ने एक ऊँह तक नहीं की.. कितने दिनों के बाद आज ठीक से स्तन दबे थे उसके.. !! वो खुद ही चाहती थी की कोई उसके स्तन दबाएं, मसल दे.. कुचल कर रख दें.. पीयूष को उसने रोका नहीं.. बल्कि पीयूष की इस क्रिया में मदद करने लगी..


पीयूष ने जब उसके स्तनों से हाथ हटाकर उसकी कमर को सहलाना शुरू किया तब वैशाली का मन अब तक स्तन-मर्दन से भरा नहीं था..

"मेरी निप्पल को पकड़ कर दबा और खींच उन्हें.. मेरे बॉल चूस यार.. जल्दी.. "बेशर्म होकर वैशाली ने कहा.. इसलिए कहा की पीयूष उसे जल्दी से जल्दी नंगी कर दें..

उसने पीयूष के लंड को पेंट को ऊपर से दबाकर देखा.. लंड के उभार को देखकर उससे रहा नहीं गया.. उसने तुरंत चैन खोली और अन्डरवेर के अंदर हाथ डालकर उसे पकड़ लिया.. जबरदस्त सख्त हो गया था पीयूष का लंड.. !! पीयूष को खुद ताज्जुब हो रहा था की कविता के संग सेक्स करते हुए कभी इतना कडक नहीं हुआ था.. अरे कविता के चूसने पर भी कभी इतना सख्त नहीं हुआ था पहले.. ये सब अनधिकृत सेक्स का कमाल था..

"आह्ह पीयूष.. मस्त कडक हो गया है तेरा.. " लंड को बाहर निकाल कर मुठ्ठी में भरते हुए वैशाली ने उत्तेजित होकर कहा.. काफी समय के बाद वो पीयूष के लंड को देख रही थी.. पीयूष ने वैशाली को घुमा कर उल्टा कर दिया.. और उसके ड्रेस की चैन उतार दी.. अपनी पीठ पर पीयूष के हाथों के स्पर्श से सिहर उठी वैशाली..

पीयूष का नंगा लंड आइफेल टावर की तरह झूल रहा था.. और वैशाली की गांड की दरार के संग प्रेम-क्रीडा कर रहा था.. अपने मांसल चूतड़ों पर सुपाड़े का गरमागरम स्पर्श महसूस होते ही वैशाली उत्तेजना के शिखर पर पहुँच गई.. दोनों हाथ पीछे ले जाकर उसने पीयूष की गर्दन को पकड़कर अपना चेहरा ऊपर किया..

दोनों ने फ्रेंच किस करते हुए एक दूसरे के वस्त्रों को उतारना जारी रखा.. वैशाली ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर दीये.. और पीयूष ने उसका ड्रेस निकाल दिया.. उसका गोरा नंगा बदन देखकर पीयूष हतप्रभ हो गया.. वाकई अपनी माँ पर ही गई थी वैशाली.. !! शीला भाभी का बदन भी ऐसा ही गोरा और गदराया था.. पिंक कलर की ब्रा से आधे बाहर झांक रहे स्तनों को ललचाई नज़रों से देख रहा था पीयूष.. जैसे उसके स्तन पीयूष को आमंत्रित कर रहे थे.. लेकिन पीयूष को ये ब्रा का आवरण मंजूर नहीं था.. ब्रा की क्लिप निकालकर उसने उस खजाने को खोल दिया.. स्प्रिंग की तरह उछलकर दोनों स्तन मुक्त हो गए..


पीयूष ने वैशाली की पीठ को चाटना शुरू कर दीया.. पीठ से लेकर कमर पर होते हुए उसकी जीभ चूतड़ों की दरार तक पहुँच गई..

"ओह्ह पीयूष, प्लीज.. !!" कहते हुए वैशाली पीयूष की तरफ मुड़ गई.. उसके सुंदर दुधमल थनों को देखकर पीयूष अपने होश गंवा बैठा.. उसके लंड ने अभूतपूर्व सख्ती हाँसील कर ली थी.. वासना की आग में जल रही वैशाली ने पीयूष को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया..

पीयूष ने वैशाली के तमाम वस्त्र उतारकर उसे अनावृत कर दिया.. और अपनी पतलून उतारते हुए कमर के नीचे से खुद भी नंगा हो गया.. देखकर वैशाली शरमा गई.. उसे अपनी खुद की नग्नता से शर्म नहीं आ रही थी.. पर पीयूष को नंगा देखकर वो लाल हो गई.. दोनों जांघों के बीच में झूलता हुआ उसका लंड इतना आकर्षक लग रहा था की वैशाली तुरंत ही घुटनों के बल बैठ गई और लंड को पकड़ते हुए, ब्ल्यू फिल्मों की हीरोइन की तरह चूसने लगी.. उसके शरीर और गर्दन की हलचल से ये साफ प्रतीत हो रहा था की वो कितनी गरम हो चुकी थी..

दोनों इस काम-करम में इतने व्यस्त हो गए थे की अनुमौसी ने तीसरी बार दरवाजे पर दस्तक दी तब उन्हें सुनाई दिया.. दोनों ने तुरंत ही कपड़े पहन लिए.. और वैशाली पीयूष के लैपटॉप के सामने बैठ गई.. जैसे अंदर कुछ देख रही हो.. पतलून की चैन बंद करते हुए पीयूष ने दरवाजा खोला

"क्या कर रहा था? कितनी देर से खटखटा रही हूँ? कान की दुकान बंद है क्या?" मौसी ने गुस्से से कहा.. मंदिर से चलकर आ रही मौसी हांफ रही थी.. वो इतनी थकी हुई थी की आगे कोई तहकीकात करने जितनी ऊर्जा ही नहीं बची थी..

तभी रसिक दूध के पैसे लेने आ गया.. रसिक एक नंबर का हरामी था.. उसने देखा की ड्रॉइंग रूम में बैठे पीयूष और वैशाली का ध्यान उसकी और नहीं था.. मौसी को हिसाब समझाते हुए अपने पाजामे से नरम लोडा बाहर निकालकर मौसी को दिखाकर हंसने लगा.. उसका सोया हुआ काला नाग देखकर मौसी एकदम डर गई.. वैसे तो वो रसिक के लंड की आशिक थी.. पर यहाँ खुले में.. पीयूष और वैशाली की मौजूदगी में उसका खुला लंड देखकर मौसी घबरा गई..



"नालायक.. अक्ल नाम की कोई चीज है की नहीं तेरे पास?? अगल-बगल की परवाह कीये बगैर लंड खोलकर खड़ा हो गया? शर्म कर साले.. किसी ने देख लिया तो हम दोनों मरेंगे.. " मौसी तुरंत किचन में चली गई.. जैसे वो नाग उठकर उन्हें डंस लेगा.. मुसकुराते हुए रसिक ने लंड पाजामे में वापिस डाल दिया..

हँसते हँसते रसिक बरामदे से बाहर निकला और अपनी साइकिल पर बैठा तभी उसने मौसी को किचन की खिड़की से झाँकते हुए देखा और बोला "चलता हूँ मौसी.. अब तो शीला भाभी भी वापिस आ गई है" आँख मारते हुए उसने मौसी को गुस्सा दिलाया

मौसी ने दूर से चिल्लाकर कहा "पैसे कल ले जाना.. और दूध में पानी मिलाना कम कर" मौसी को इतना गुस्सा आ रहा था की उनका बस चलता तो बाहर निकलकर रसिक की गांड पर लात मारकर भागा देती.. एक तो खुले में लंड निकालकर खड़ा हो गया.. और जाते जाते शीला के नाम की हूल देकर गया.. रसिक अपनी साइकिल लेकर तेजी से निकल गया..

मौसी किचन से बाहर आई.. तभी वैशाली उठकर जा रही थी

"अरे बैठ ना बेटा.. !! इतनी जल्दी जा रही है.. !!! तेरा कंप्यूटर का काम हो गया क्या?"

"नहीं मौसी, काम तो अभी भी बाकी है.. कल आकर खत्म कर लूँगी.. अभी बहोत देर हो गई इसलिए जा रही हूँ" वैशाली ने जो भी कहा सच ही कहा.. काम कहाँ पूरा हुआ ही था?? बस होने ही वाला था की मौसी टपक पड़ी.. अपनी भूखी चूत को लेकर वैशाली घर गई..

घर पहुंचते ही उसने देखा.. शीला किचन में खाना बना रही थी.. और मदन टीवी पर न्यूज़ देख रहा था.. घर में वापीस आते ही वैशाली को उदासी ने फिर से घेर लिया.. जब तक वो बाहर थी तब तक उसका मूड ठीक था.. घर पर आते ही सारे विचारों ने फिर से उसके मन पर हमला कर दिया.. सामाजिक दीवारों से अक्सर इंसानों का दम घूँटने लगता है.. जब आदिमानव गुफाओं में रहता था तब शायद आज से ज्यादा सुखी होगा..

वैशाली सीधे अपने कमरे में गई.. दरवाजा अंदर से बंद किया.. और बेड पर बैठ गई.. उसने अपनी सलवार उतारी.. और तेजी से अपनी चूत को कुरेदने लगी..


आज दो बार उसका ऑर्गजम होते होते रह गया.. एक बार कपल रूम में और दूसरी दफा पीयूष के घर में.. सारा गुस्सा उसने अपनी चूत पर निकाल दिया.. उत्तेजना, क्रोध और असंतोष के कारण वो जैसे तैसे स्खलित हो गई.. पर झड़ने के बाद उसका मन शांत हो गया.. हाथ मुंह धोकर उसने नाइटड्रेस पहन लिया और किचन में शीला की मदद करने गई..
 
वैशाली सीधे अपने कमरे में गई.. दरवाजा अंदर से बंद किया.. और बेड पर बैठ गई.. उसने अपनी सलवार उतारी.. और तेजी से अपनी चूत को कुरेदने लगी.. आज दो बार उसका ऑर्गजम होते होते रह गया.. एक बार कपल रूम में और दूसरी दफा पीयूष के घर में.. सारा गुस्सा उसने अपनी चूत पर निकाल दिया.. उत्तेजना, क्रोध और असंतोष के कारण वो जैसे तैसे स्खलित हो गई.. पर झड़ने के बाद उसका मन शांत हो गया.. हाथ मुंह धोकर उसने नाइटड्रेस पहन लिया और किचन में शीला की मदद करने गई..

डिनर करने के बाद सब सो गए पर वैशाली के दिल को चैन नहीं था.. पीयूष ने ऐसी आग लगा दी थी जो सिर्फ वो ही बुझा सकता था.. दस बज रहे थे और तभी मोबाइल पर पीयूष का मेसेज आया.. खोलकर पढ़ने के बाद वैशाली के चेहरे पर मुस्कान आ गई

पीयूष का मेसेज: 'यार, तेरे बबलों की बहोत याद आ रही है" पढ़कर वैशाली शरमा गई पर उसे बहोत अच्छा लगा..

वैशाली ने रिप्लाय किया: "याद तो मुझे भी आ रही है.. पर किसी ओर चीज की"

पीयूष का मेसेज: "आई वॉन्ट टू फक यू.. मेरा लोडा अभी बम्बू की तरह खड़ा हो गया है" वैशाली की चूत में झटके लगने लगे.. अपनी चूत पर हाथ फेरते हुए वो पीयूष से चैट करने लगी..

वैशाली का मेसेज: "हम्म तो अब तू क्या करेगा? अभी तो कविता भी नही है तेरे साथ.. एक काम कर.. यहाँ आजा.. मैं तेरे बम्बू को शांत कर देती हूँ"

पीयूष का मेसेज: "मैं तो अभी आ जाऊँ.. पर तेरे मम्मी पापा का क्या करें?"

वैशाली का मेसेज: "हट साले डरपोक.. इतना ही डर लग रहा है तू खुद ही हिला ले अपना बम्बू.. दिमाग लगा और कुछ तरकीब ढूंढ"

पीयूष की मर्दानगी जाग उठी.. एक तरफ वैशाली का वासना से सुलग रहा बदन उसे बुला रहा था.. दूसरी तरफ वो अकेले बैठे बैठे मौसम का गम भुलाने की कोशिश कर रहा था.. ऊपर से कविता की गैर-मौजूदगी.. उसका नटखट मन बंदर की तरह उछलने लगा.. वो सोचने लगा.. ऐसा क्या करूँ जिससे वैशाली की चूत तक पहुँचने का कोई रास्ता मिल जाएँ...

वैशाली का मेसेज: "चुप क्यों हो गया? हिलाने बैठ गया क्या?"

पीयूष का मेसेज: "नहीं यार.. सोच रहा हूँ.. की कैसे तेरे बेडरूम तक पहुँच जाऊँ!! मैं छत पर जा रहा हूँ.. देखता हूँ कोई रास्ता मिल जाए.. "

वैशाली का मेसेज: "कोई देख लेगा तो? मुझे तो बहोत डर लग रहा है"

पीयूष का मेसेज: "तो फिर मैं नहीं आ रहा" पीयूष ने हथियार डाल दीये

यहाँ वैशाली की चूत में ऐसी आग लगी थी.. लंड लेने के लिए वो तड़प रही थी..

वैशाली का मेसेज: "यार कुछ तो कर.. मुझसे अब रहा नहीं जाता.. सब तेरी गलती है.. एक तो आज दोपहर में उस कपल रूम के अंदर तूने मेरी आग भड़का दी.. तब से मैं बेचैन हो रही हूँ.. और शाम को तेरी मम्मी ने सारा खेल बिगाड़ दिया.. अब तो मुझसे कंट्रोल नहीं होता.. !!"




पीयूष का मेसेज: "यार.. तो अब मैं क्या करूँ?"

वैशाली का मेसेज: "मुझे क्या पता??"

थोड़ी देर तक पीयूष का मेसेज नहीं आया

वैशाली का मेसेज: "क्या हुआ? तेरा नरम हो गया क्या?? हा हा हा हा.. " वैशाली को सेक्स-चैट करने में मज़ा आ रहा था.. वो चैट करते करते अपनी चूत में उंगली कर रही थी..



पीयूष का मेसेज: "नरम तो ये तभी होगा जब तेरी चूत फाड़ देगा.. !!"

वैशाली का मेसेज: "आह्ह.. !!"

पीयूष का मेसेज: "क्या हुआ??"

वैशाली का मेसेज: "तेरे मेसेज पढ़कर मुझे नीचे कुछ कुछ हो रहा है"

पीयूष का मेसेज: "तुझे नीचे मेरा लंड लेने की जरूरत है.. मन कर रहा है की तेरे दोनों बबलों के बीच में लंड घुसाकर शॉट मारूँ.. तेरी चूत के अंदर जीभ डालकर सारा रस पी जाऊँ.. ओह्ह.. मेरा लोडा तेरे मुंह में डाल दूँ"

वैशाली का रिप्लाय नहीं आया

पीयूष का मेसेज: "सो गई क्या साली रंडी? या उंगली डाल रही है?" वैशाली के मेसेज आने बंद हो गए इसलिए पीयूष ने अनाब-शनाब लिखना शुरू कर दिया

पीयूष का मेसेज: "भेनचोद कहाँ मर गई? कहीं अपने बाप का लोडा लेने तो नहीं चली गई?"

अभी कुछ घंटों पहले ही वैशाली ने अपने पापा को चुदाई करते हुए देखा था.. ऊपर से पीयूष ने उनके लंड का जिक्र कर उसे और पागल बना दिया

वैशाली का मेसेज: "ओह पीयूष.. अब मुझसे नहीं रहा जाता.. तू जल्दी कुछ कर.. वरना मैं वहाँ आ जाऊँगी.. प्लीज यार"

पीयूष का मेसेज: "मुझे एक रास्ता सूझ रहा है"

वैशाली का मेसेज: "क्या??"

पीयूष का मेसेज: "अभी आधे घंटे में सोसायटी के सारे लोग सो गए होंगे.. कोई बाहर नहीं होगा.. तेरे घर के बाहर अब्बास भाई का ट्रक पड़ा हुआ है.. चुपके से उसके नीचे घुस जाते है.. किसी को पता नहीं चलेगा.. ट्रक के नीचे घुसकर कोई नहीं देखेगा.. !!"

वैशाली का मेसेज: "पागल हो गया है क्या?? तुझे सब ऐसी जगह ही दिमाग में आती है.. !! उस दिन रेत में और आज मिट्टी में??"

पीयूष का मेसेज: "जरा शांत दिमाग से सोच.. उस जगह किसी का ध्यान नहीं जाएगा.. हाँ कपड़े थोड़े से खराब होंगे.. पर उतना तो चलता है यार"

वैशाली का मेसेज: "नहीं यार.. वहाँ नहीं.. कुछ और सोच.. !!"

पीयूष का मेसेज: "फिलहाल वही जगह सब से सैफ है.. और कहीं तो पकड़े जाने का डर लगा रहेगा.. आजा न वैशाली.. मुझसे रहा नहीं जाता.. अब तुझे चोदना ही है"

स्क्रीन पर ये पढ़कर वैशाली की मुनिया फुदकने लगी..



वैशाली का मेसेज: "अरे यार.. तुझसे कहीं ज्यादा चूल मेरे नीचे मची हुई है.. पर यार वो जगह थोड़ी विचित्र लगती है मुझे"

पीयूष का मेसेज: "तू पहले बाहर तो निकल.. फिर कुछ सोचते है"

वैशाली का मेसेज: "ठीक है.. मैं बाहर निकलकर कॉल करूँ या मेसेज?"

पीयूष का मेसेज: "कॉल ही करना.. मेरा फोन साइलेंट है पर पता चल जाएगा मुझे"

वैशाली ने भी फोन को वाइब्रेट मोड पर रख दिया.. और खड़ी हो गई.. चुपके से उसने अपने बेडरूम का दरवाजा खोला.. पौने ग्यारह बज रहे थे.. शीला और मदन अपने बेडरूम में सो रहे थे.. वैशाली को मैन डोर खोलकर जाने में डर लग रहा था.. इसलिए वो किचन से होकर पीछे के रास्ते से बाहर निकली.. और सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर चली गई.. सामने पीयूष भी अपने घर की छत पर खड़ा था.. पीयूष ने तुरंत वैशाली को फोन लगाया

पीयूष: "मेरी बात ध्यान से सुन.. नीचे उतर.. बरामदे से बाहर निकल.. ट्रक और दीवार के बीच छुपकर खड़ी रहना.. मैं अभी वहाँ आता हूँ"

वैशाली ने फोन चालू रखा.. सीढ़ियाँ उतरकर वो कंपाउंड से बाहर आई.. ट्रक और दीवार के बीच की संकरी जगह में छुपकर खड़ी हो गई.. पूरी गली में सन्नाटा था.. अंधेरे के कारण किसी के भी देखने का डर नहीं था.. थोड़ी ही देर में पीयूष वहाँ आ पहुंचा.. और आते ही वो वैशाली से लिपट गया.. बिना ब्रा के नाइटड्रेस पहने खड़ी वैशाली के दोनों स्तनों को मजबूती से दबा दिया.. वैशाली का पूरा जिस्म सिहर उठा.. पीयूष के आक्रामक प्रहारों से वैशाली के पूरे शरीर में उत्तेजना की गर्मी फैल गई.. और लंड की भूख से उसकी चूत फड़फड़ाने लगी.. उसकी पुच्ची में इतनी खुजली हो रही थी की वो खुद ही अपनी जांघें आपस में रगड़ने लगी थी.. बड़ी मुश्किल से मिले इस मौके का दोनों पूरा लाभ उठाना चाहते थे..

वैशाली ने तुरंत ही पीयूष की शॉर्ट्स में हाथ डालकर उसका लंड पकड़कर बाहर निकाला.. ऐसा लग रहा था मानों लोहे का गरम सरिया हाथ में पकड़ रखा हो.. हथेली में इतना गर्म लग रहा था.. लंड की त्वचा को पीछे सरकाते हुए सुपाड़े को खुला कर दिया.. और साथ ही पीयूष के होंठों को चूमने लगी..



बहोत दिनों से भूखी वैशाली आज पीयूष से कई ज्यादा उत्तेजित थी.. उसकी कराहों और सिसकियों से पीयूष को अंदाजा लग चुका था की वैशाली कितनी गरम हो चुकी थी.. उसे डर था की कहीं वो अभी झड़ गई.. और हवस का भूत दिमाग से उतर गया तो डरकर तुरंत वापस भाग जाएगी.. उत्तेजना के अंधेरे में कुछ भी नजर नहीं आता.. एक बार डिस्चार्ज हो जाने के बाद ही सारे जोखिम नजर आने लगते है..

बिना समय गँवाए उसने वैशाली को उल्टा मोडकर झुका दिया.. और उसके ट्रैक-पेंट को घुटनों तक उतार दिया.. अंधेरे में भी वैशाली के गोरे विशाल चूतड़ चमक रहे थे.. पीयूष ने झुककर वैशाली के कूल्हों पर और चूत पर अपनी जीभ फेर दी..



वैशाली को बहोत मज़ा आ रहा था पर फिर भी पीयूष को रोकते हुए कहा "यार ये सब करने बैठेगा तो मैन काम रह जाएगा.. " वैशाली की बात में तथ्य था..

पीयूष खड़ा हो गया.. और अपने सुपाड़े पर थोड़ा सा थूक लगाकर.. वैशाली के सुराख पर टीका दिया.. और धीरे धीरे अंदर दबाने लगा.. जैसे जैसे लंड की मोटाई वैशाली की चूत की दीवारों से घिसते हुए अंदर जाने लगी.. वैशाली की सिसकियाँ शुरू हो गई..


पूरा लंड अंदर घुसते ही पीयूष ने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरू कर दीये.. और हाथ आगे ले जाकर वैशाली के लटक रहे स्तनों को दबोचने लगा..



दोनों इस काम-क्रीडा में मगन थे तभी एक आदमी ट्रक के आगे के हिस्से के सामने आकर खड़ा हो गया.. अंधेरे में उस आदमी को इतने करीब खड़ा देखकर दोनों की सीट्टी-पीट्टी गुम हो गई.. ये तो अच्छा था की उस आदमी की नजर इन दोनों के तरफ नहीं थी.. वो जरा सा मुड़कर देखता तो इस चोद रहे जोड़ें को आसानी से देख लेता.. वैशाली और पीयूष दोनों डर के मारे कांप रहे थे.. वो आदमी ट्रक का क्लीनर था जो पेशाब करने के लिए नीचे उतरा था.. कोने में खड़े रहकर वो मूतने लगा.. रात के सन्नाटे में पीयूष और वैशाली को उसकी पेशाब की धार की आवाज स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी.. पेशाब की दुर्गंध से वैशाली परेशान हो गई.. उस मूत रहे क्लीनर का नरम लंड अंधेरे में भी साफ नजर आ रहा था..

बिना हिले-डुले दोनों चुपचाप अपनी जगह पर ही मूर्ति बनकर खड़े थे.. थका हुआ क्लीनर आधी नींद में था.. वो वापिस ट्रक में जाकर सो गया.. वैशाली अब बहोत डर गई थी

"मुझे अब नहीं करना है.. डर लग रहा है.. मैं जा रही हूँ पीयूष.. सॉरी" पीयूष के जवाब का इंतज़ार कीये बगैर ही उसने एक ही पल में अपना ट्रैक-पेंट पहन लिया और अपने घर की दीवार फांदकर कंपाउंड में चली गई.. जिस रास्ते वो बाहर आई थी उसी किचन के रास्ते घर में घुस गई.. अपने बेडरूम में पहुंचकर ही उसके तेजी से धडक रहे दिल को चैन मिला.. बाप रे.. बच गई.. !! वरना आज तो तमाशा हो जाता.. अच्छा हुआ उस आदमी ने देखा नहीं.. कहीं उसने चिल्लाकर लोगों को इकठ्ठा कर दिया होता तो मैं सब को क्या मुंह दिखाती.. !!

अभी भी डर के कारण कांप रही वैशाली को नींद नहीं आ रही थी.. पीयूष ने उसे दो बार कॉल कीये पर उसने उठाए नहीं.. ढेर सारे मेसेज भी भेजे पर वैशाली ने एक का भी जवाब नहीं दिया.. पीयूष को पता चल गया की वैशाली नाराज हो गई थी.. वो और उसका लंड पूरी रात सो नहीं पाए..

सुबह ६ बजे उठकर जब वो घर की छत पर गया तब उसने बरामदे में खड़ी वैशाली को ब्रश करते देखा.. उसने हाथ हिलाकर पीयूष को हाई कहा.. तब पीयूष के दिल को कुछ तसल्ली हुई की वैशाली नाराज तो नहीं थी..

ब्रश करते हुए वैशाली घर के अंदर गई तब शीला ने वैशाली की घड़ी देते हुए कहा "अरे वैशाली.. देख तो.. !! ये तेरी ही घड़ी है ना.. !! बाहर कचरा फेंकने गई तब उस ट्रक के पास पड़ी मिली.."

शीला के हाथ से लगभग छीनते हुए वैशाली ने कहा "हाँ मम्मी.. ये तो मेरी ही घड़ी है.. वहाँ कैसे पहुँच गई?"

"मुझे क्या पता? तेरी घड़ी है तो तुझे पता होना चाहिए.. तू उस तरफ गई थी क्या? अब्बास भाई की ट्रक के पास??" शीला ने पूछा

"नहीं, मैं तो नहीं गई.. मैं क्यों जाऊँ वहाँ??" वैशाली ने ऊटपटाँग जवाब दिया.. पर उसके दिमाग में तुरंत ही बत्ती जली.. मम्मी बड़ी ही शातिर है.. उसे बेवकूफ बनाना आसान नहीं है.. अगर मैंने बहाना नहीं बनाया तो मुझे पकड़ने में उसे देर नहीं लगेगी..

"अरे हाँ मम्मी.. याद आया.. शाम को जब अनुमौसी के घर से लौट रही थी तब पता नहीं कहाँ से एक कुत्ता भोंकते हुए पीछे पड़ गया.. मैं डरकर उस ट्रक के पीछे छुप गई थी.. शायद तभी गिर गई होगी"

शीला के मन को वैशाली की बात से संतोष हुआ "अच्छा हुआ ना मेरी नजर पड़ गई.. !! वरना कोई ओर उठाकर ले जाता.. ये तो इंपोर्टेड घड़ी है.. जो तेरे पापा विदेश से तेरे लिए लाए थे.. "

उनकी बातें सुनकर मदन बाहर आया "वैशाली, मैं जहां पेइंग गेस्ट बनकर रहता था उस मकान की मालकिन ने गिफ्ट दी थी ये घड़ी.. तेरे लिए.. " शीला के सामने देखकर आँख मारते हुए मदन ने कहा

शीला: "ओह्ह अच्छा तो ये मेरी ने गिफ्ट की थी.. और तुमने क्या दिया था उसे गिफ्ट के बदले?" शीला भी कम नहीं थी..

दोनों की बातें सुनकर वैशाली समझ गई की इशारा कहीं ओर था.. शीला-मदन को अकेले बातें करता छोड़कर वो ड्रॉइंगरूम में चली आई और टीवी चालू कर दिया.. टीवी की आवाज के बावजूद उसे मम्मी पापा की बातें सुनाई दे रही थी..

वैशाली सुन नहीं रही है ये सोचकर शीला ने मदन का कान पकड़कर खींचा.. "मेरी की कितनी बार चाटी थी तूने इस गिफ्ट के बदले?? सच सच बता"

मदन: "अरे यार.. हम दोनों के बीच सब कुछ शुरू हुआ उससे पहले ये गिफ्ट दी थी उसने.. "

शीला: "अच्छा.. मतलब उसने तुझे एक घड़ी क्या गिफ्ट दे दी.. तूने तो अपना सब कुछ लूटा दिया उसके पीछे!! यहाँ मैं बिस्तर में पड़ी पड़ी करवटें बदल रही थी और वहाँ तुम दोनों हरामी..!!" शीला ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया

मदन ने अपना कान छुड़ाकर हँसते हुए कहा "तूने कहा होता तो मैं अपना लंड यहाँ छोड़कर जाता.. !!"

शीला: "मैं लंड के लिए नहीं मर रही थी.. लंड तो एक नहीं एक हजार मिल जाते.. मुझे तो जरूरत तेरी थी.. तेरे लंड की नहीं"

मदन: "वो सब बातें छोड़.. ये बता.. सुबह जो दूध देने आई थी वो कौन थी?? जबरदस्त माल थी यार.. !!"

शीला: "मुझे पता है की तुझे उसमें क्या जबरदस्त लगा.. !!! उसका नाम रूखी है.. रसिक की पत्नी.. आज रसिक कहीं बाहर गया हुआ था इसलिए वो दूध देने आई थी.. अब कल से मैं रसिक को भी ध्यान से देखूँगी.. मुझे भी शायद उसमे कुछ जबरदस्त दिख जाएँ.. !!"

मदन: "मज़ाक कर रहा था डार्लिंग.. खूबसूरत थी, इसलिए पूछ लिया.. इतना क्यों भड़क रही है?"

शीला: "हाँ हाँ.. मैं क्यों भड़कूँ?? तुम कभी मेरी के बबले चूसो तो कभी उसकी चूत.. !!" अचानक वो बोलते बोलते रुक गई.. उसे एहसास हुआ की घर पर वो अकेले नहीं थे.. वैशाली भी मौजूद थी.. और जब तक वो सेटल नहीं हो जाती तब तक यहीं रहेगी.. लंबे समय तक अकेले रहकर शीला की जुबान से कंट्रोल चला गया था

पापा मम्मी की बातें सुनकर वैशाली हंस पड़ी..

मदन: "पागल जरा धीरे से बोल.. वैशाली सुन लेगी"

शीला: "अरे हाँ.. मुझे अभी खयाल आया.. और हाँ मदन.. वैसे तो तुझे देखकर पता चल ही गया होगा पर फिर भी मैं तुझे बता देती हूँ.. रूखी को अभी कुछ महीनों पहले ही बच्चा हुआ है.. मैं उसके घर भी जा चुकी हूँ.. बहोत ही अच्छी है रूखी.. तेरी गैर-मौजूदगी में उसने मेरा बहोत ध्यान भी रखा था"

मदन: "तो जरा मेरी भी पहचान करा दे.. मैं भी तो देखूँ.. जितनी तू तारीफ कर रही है उतनी अच्छी है भी या नहीं" शीला के गाल खींचकर मदन बाथरूम में घुस गया

मन ही मन शीला सोच रही थी.. वो तो अच्छी है ही.. पर उससे भी अच्छा है उसका पति.. इस बात की गँवाही तो अनुमौसी भी दे सकती है

बाथरूम में नहाते हुए मदन सोच रहा था.. क्या जालिम जवानी थी उस रूखी की..

गाँव की औरतों की खूबसूरती की बात ही निराली होती है.. आह्ह रूखी.. !! मदन के दिलोदिमाग पर रूखी ने कब्जा कर लिया था.. नहाते हुए उसका लंड एकदम कडक हो गया रूखी को याद करते हुए.. काश मेरा कुछ सेटिंग हो जाएँ उससे तो मज़ा आ जाए.. उसके मदमस्त मटके जैसे बबलों से दूध पीना नसीब हो जाए.. आह्ह.. मदन को तभी मूठ लगाकर अपने लंड की मलाई बाहर निकालनी पड़ी..


वो नहाकर बाहर निकला तब उसने देखा की पीयूष घर पर आया था और शीला तथा वैशाली के साथ बातें कर रहा था..

"कितनी देर लगा दी पापा आप ने?? मैं कब से नहाने जाने के लिए वैट कर रही हूँ.. !! पीयूष, मैं दो मिनट में नहाकर आई.. " कहते हुए वैशाली बाथरूम में घुस गई.. वैशाली के जाने के बाद, शीला और मदन, पीयूष के साथ बातें करने लगे..

"गुड मॉर्निंग मदन भैया.. कैसे है आप?? कलकत्ता की थकान उतरी या नहीं??"

"ठीक हूँ पीयूष.. यार मैं कलकत्ता को तो याद भी करना नहीं चाहता.. तू बता.. कैसे आना हुआ?" सोफ़े पर बैठते हुए मदन ने पूछा

"मैं आपको न्योता देने आया हूँ.. अगले हफ्ते मौसम की सगाई है.. तो आप तीनों को आना होगा.. !!"

मदन: "अरे वाह.. ये तो बहोत अच्छी बात है.. !! हम सब जरूर आएंगे.. वैशाली को भी अच्छा लगेगा.. हैं ना बेटा.. ??" बाथरूम से बाहर निकलकर अपने बालों को झटकाकर सूखा रही वैशाली से मदन ने कहा.. पिंक ड्रेस में उभर रहे यौवन की मल्लिका वैशाली.. अपने लंबे बालों से विशाल स्तनों को ढँककर कंगी कर रही थी.. उसक कंगी बालों से गुजरते वक्त स्तनों को दबा दे रही थी.. पीयूष बस उस द्रश्य को अभिभूत होकर देखता ही रहा.. ताज़ा ताज़ा नहाकर आई स्त्री जब बाल सूखा रही हो, यह द्रश्य देखने में ही बड़ा मनोहर होता है.. वैसे भी औरत का अर्ध-अनावृत रूप नग्नता से ज्यादा सुंदर लगता है..

वैशाली: "हाँ पापा.. मौसम तो मेरी बहोत अच्छी सहेली है.. और वैसे भी.. अब मैं अपने भूतकाल को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना चाहती हूँ.. कल पीयूष ने मेरी आँखें खोल दी (आँखों के साथ साथ और भी काफी कुछ खोल दिया था).. अब मै ज़िंदगी को अपने तरीके से जीना चाहती हूँ.. बिना किसी दुख या मलाल के.. मैं घर पर बहोत बोर हो रही हूँ.. अगर तुझे ऐतराज न हो तो क्या मैं कुछ दिनों के लिए तेरी कंपनी में आ सकती हूँ?? मुझे अपना दिमाग बिजी रखना है.. ताकि पुरानी बातें परेशान न करें मुझे.. !!"

पीयूष: "अरे यार तू बिंदास चल.. कोई प्रॉब्लेम नहीं है.. मेरे बॉस राजेश सर से तो तेरी अच्छी जान पहचान हो ही चुकी है.. पिंटू और रेणुका मैडम को भी तू जानती है.. इन फेक्ट ऑफिस के सारे लोग तुझे जानते है.. तेरे आने से सब को अच्छा लगेगा.. और तू भी ज्यादातर लोगों को जानती है इसलिए तुझे भी अटपटा नहीं लगेगा.. "

शीला: "हाँ पीयूष.. वैशाली को ले जा अपने ऑफिस.. उसे बाहर निकलने की सख्त जरूरत है.. !!"

मदन: "हाँ गुड़िया.. मम्मी ने ठीक कहा.. तू पास्ट को भूल जा.. लाइफ को इन्जॉय कर.. पर जो भी करना संभल कर करना"

वैशाली: "डॉन्ट वरी पापा.. मैं ध्यान रखूंगी"

मदन और वैशाली दोनों ही इस सलाह की अहेमीयत जानते थे.. मदन ने सिर्फ इशारा किया.. की जो कुछ भी करना.. खानदान की इज्जत को ध्यान में रखकर करना.. और वैशाली ने भी एक जिम्मेदार बेटी की तरह संतोषजनक उत्तर दिया..

पीयूष ने वैशाली को अपनी बाइक पर बैठा दिया.. और दोनों ऑफिस की तरफ निकल गए.. रास्ते मे वैशाली ने जी भरकर अपने स्तनों को पीयूष की पीठ से दबाएं रखा..

वैशाली को ऑफिस में देखकर सारा स्टाफ खुश हो गया.. राजेश सर ने तो फोन करके रेणुका को भी बुला लिया.. और वैशाली का इतना गर्मजोशी से स्वागत किया की उसकी आँखें भर आई..

पिंटू तीन दिन की छुट्टी के बाद आज ही ऑफिस आया था.. कविता जो थी मायके में.. इसलिए वो छुट्टी पर ही था.. कविता और पिंटू दोनों घंटों फोन पर बातें करते.. मेसेज पर चैट करते.. दिन में दो बार तो पीयूष, कविता के घर की पास वाली दुकान पर आ जाता.. पर दोनों को अपनी जिस्मानी भूख मिटाने का मौका नहीं मिला था.. पर कविता तो पिंटू को दिन में एक बार देखकर भी खुश थी.. जब कविता ने पिंटू से कहा की वो अब मौसम की सगाई होने तक मायके में ही रहने वाली थी.. तब पिंटू ने वापिस ऑफिस शुरू करने का फैसला किया.. तीन दिन बाद आज वो ऑफिस आया था..

वैशाली भी पिंटू को ठीक-ठाक जानती थी.. माउंट आबू की ट्रिप के दौरान उसका ध्यान कई बार इस हेंडसम लड़के पर गया था..बहोत कम बोलने वाला.. और जब भी बोलता तब नाप-तोलकर बोलता.. खास कर औरतों के साथ और स्टाफ की अन्य युवतीओं के साथ.. इतने सलीके से बात करता.. इसी कारण रेणुका सहित ऑफिस का सारा महिला स्टाफ उससे बेहद प्रभावित था..

दोपहर केंटीन में लंच करते हुए राजेश सर, वैशाली, पीयूष और पिंटू ने बहोत सारी बातें की.. पिंटू के आध्यात्मिक और तात्विक ज्ञान से भरी बातें सुनकर पीयूष भी सुनता ही रह गया.. पिंटू की तरफ देखने के उसका नजरिया बदलने लगा.. पर वैशाली को पिंटू की बातों से कुछ अधिक फरक नहीं पड़ा.. उसके पति संजय की बेवफाई का जहर पूरे शरीर में ऐसे फैल चुका था की उसे पूरी मर्द जात से डर सा लगने लगा था.. हाँ, पीयूष उसके बचपन का साथी था इसलिए उसके साथ वो काफी स्वाभाविक रह पाती थी.. राजेश सर ने माउंट आबू की उस रात जिस तरह उसके साथ सेक्स किया था और साथ ही साथ सन्माननीय तरीके से पेश आए थे.. इसलिए उनकी छवि भी वैशाली के मन में बहोत अच्छी थी.. बाकी अन्य मर्दों से उसे डर और घिन दोनों का एहसास होता था.. उनसे ज्यादा बात करना भी पसंद नहीं करती थी.. संजय ने उसके मम्मी-पापा के साथ जो बेहूदा बर्ताव किया था उसका वैशाली के दिल-ओ-दिमाग पर बड़ा ही गहरा असर हुआ था

शाम को साढ़े पाँच बी ऑफिस से छूटते ही पिंटू ने कविता को फोन लगाया.. कविता भी स्कूटी लेकर मार्केट जाने के बहाने निकल गई और दोनों सात बजे तक फोन पर लगे रहे.. दोनों प्रेमियों ने डेढ़ घंटे तक ढेर सारी बातें की.. पिंटू ने कविता को वैशाली के ऑफिस आने की बारे में बताया.. सुनकर कविता भी खुश हो गई.. कविता ने पिंटू को वैशाली की मानसिक स्थिति के बारे में बताया और अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हुए कहा की वो बहोत ही अच्छी लड़की है.. पर उसकी किस्मत खराब चल रही है.. कविता ने ये भी बताया की वो लोग मौसम की सगाई में राजेश सर, रेणुका मैडम और पिंटू को न्योता देने वाले थे.. शादी पर सारे स्टाफ को शरीक होने के लिए बुलाएंगे..

पिंटू ने खुश होकर फोन रख दिया.. चलो.. इसी बहाने कविता के साथ रहने का मौका तो मिलेगा.. !!

मौसम अपनी दीदी और पिंटू के संबंधों से हल्का हल्का वाकिफ थी इसीलिए उसने पिंटू को आमंत्रित करने की सोची थी.. साथ ही साथ उसके मन में और भी एक बात चल रही थी.. जो वक्त आने पर पता चल जाएगी..

दूसरे दिन जब वैशाली ऑफिस पहुंची तब कल के मुकाबले ज्यादा फ्रेश और खुश लग रही थी.. स्टाफ के बाकी लोगों से अब जान पहचान भी हो रही थी और वो अधिक आसानी से सब के साथ घुल-मिल रही थी..पीयूष और पिंटू वैशाली को अच्छी कंपनी दे रहे थे.. बातों बातों में पीयूष ने वैशाली और पिंटू को मौसम की सगाई के बारे में बताया था.. वैशाली तो ये पहले से ही जानती थी.. और पिंटू भी.. पर वो किस मुंह से पीयूष को बताता की कविता ने पहले ही इस बारे में बता दिया था.. !! वो चुपचाप सुनता रहा..

दोपहर के लगभग तीन बजे रेणुका ऑफिस आई.. और जिद करके वैशाली को अपने साथ घर ले गई.. जाते जाते वैशाली ने पीयूष को कहा की वो साढ़े पाँच बजे तक लौट आएगी.. और पीयूष के साथ ही घर जाएगी.. तो वो उसका इंतज़ार करें और अकेला घर न चला जाएँ

रेणुका के साथ कार में बैठे बैठे बातें करके वैशाली को बहोत अच्छा लगा.. ऑफिस से रेणुका के घर का रास्ता काटने में लगभग दस से पंद्रह मिनट लगती थी.. वैशाली को खुश करने के तमाम प्रयत्न कर रही थी रेणुका.. राजेश ने ही उसे इस काम पर लगाया था

दोनों घर पहुंचे.. वैशाली को आराम से सोफ़े पर बिठाकर रेणुका ने पूछा

"बोल वैशाली.. क्या लेगी? चाय, कॉफी, मिल्कशेक, शर्बत, बियर या वाइन??"

वैशाली: "मैं जो पीना चाहती हूँ उसका तो आपने पूछा ही नहीं?"

याद करते हुए रेणुका ने कहा "यार, जितना याद आया सब पूछ लिया.. तेरी कोई स्पेशल फरमाइश हो तो बता दे"

वैशाली: "जहर.. !!"

रेणुका: "चुप हो जा.. आइंदा कभी ऐसी बात बोली तो ज़बान खींच लूँगी तेरी.. "

वैशाली: "रेणुकाजी, आप नहीं जानते की उस नालायक ने मेरी क्या हालत बना दी है.. मेरी और साथ साथ में मम्मी पापा की भी" संजय की याद आते ही एक भयानक कड़वाहट वैशाली के रोम-रोम में फैल गई.. ग्लानि और दुख से भरी उसकी आँखों में पानी आ गया.. उसकी आँखों में उभर रहे आंसुओं को देखकर रेणुका ने वैशाली को गले से लगा दिया.. वैशाली ने उसके कंधे पर सर रखकर खूब आँसू बहायें.. रेणुका बड़े ही प्यार से उसे सहलाते हुए दिलासा दिया.. काफी देर तक वो दोनों उसी स्थिति में खड़े रहे..

फिर रेणुका सोफ़े पर बैठ गई और वैशाली उसकी गोद में सर रखकर लेट गई.. वैशाली के गालों पर लगे आंसुओं को रेणुका ने पोंछा.. गोद में सो रही वैशाली की नजर अचानक रेणुका के पल्लू से दिख रहे उभारों पर जा टिकी.. ब्लाउस की कटोरियों की नोक वैशाली के कपाल को छु रही थी.. और इस बात से रेणुका बेखबर थी.. पर पिछले दो दिनों से.. ऑर्गजम की कगार पर पहुंचकर भी स्खलित होने का मौका न मिलने पर निराश हो रही वैशाली को एक अजीब सी झुंझुनाहट महसूस होने लगी..

माउंट आबू में होटल के रूम के अंदर.. मौसम और फाल्गुनी के साथ किया लेस्बियन सेक्स याद आ गया वैशाली को.. सामने दीवार पर टंगे हुए राजेश के हँसते क्लोज-अप की तस्वीर देखकर.. उस रात टॉइलेट में की हुई घनघोर चुदाई की यादें भी वैशाली को उकसा रही थी.. एकांत.. और पिछले दो दिनों से किनारें तक पहुँचने पर भी मंजिल को न पा सक्ने की निराशा.. जिस्म की आग.. ये सब आज एक साथ मिलकर वैशाली को बेहद परेशान करने लगे.. अपने आप को कंट्रोल में रखने की बहोत कोशिश की उसने.. पर रेणुका के आकर्षक उभारों की गोलाई और गदरायापन देखकर वो बहोत ही गरम हो रही थी.. दो दिन तक तड़पने के बाद वैशाली अपना संयम खो बैठी.. वो भी गलत जगह और गलत इंसान के साथ.. वैशाली ने धीरे से रेणुका के स्तन की कटोरी को दबा दिया


रेणुका ने चोंककर वैशाली की तरफ देखा.. शर्म से लाल वैशाली ने अपनी आँखें बंद कर ली.. अपने आप को मन ही मन कोसने लगी वैशाली.. ऐसा न किया होता तो अच्छा होता.. रेणुका तो मुझे उम्र में भी काफी बड़ी है.. वो क्या सोचेगी? मौसम और फाल्गुनी की बात अलग थी.. तीनों सहेलियों ने आपस में एक दूसरे की रजामंदी से सब कुछ किया था.. रेणुका तो कम से कम दस साल बड़ी थी.. !! शर्म और संकोच से वैशाली सिकुड़े हुए पड़ी रही


"आई एम सॉरी, रेणुका जी" वैशाली ने अपनी गलती सुधारने की कोशिश की..

जिस तरह के हालत से वैशाली गुजर रही थी.. उसको देखकर ही ये अनुमान लगाया जा सकता था की वो काफी समय से अछूती रही होगी.. रेणुका सब कुछ समझ गई.. आखिर वो भी एक महिला थी.. !! रोज रात को राजेश के लंड से जी भरकर खेलती थी वो.. और वो कितना सुखदायी था ये बराबर जानती थी रेणुका.. उसी आनंद को मिस कर रही थी वैशाली.. वो जवान थी और अभी तो संभोग करने के बेहतरीन सालों से गुजर रही थी.. ऐसी स्थिति में.. जब स्त्री का जिस्म.. काफी लंबे अरसे तक भोगा न जाएँ.. तब ऐसा होना काफी सामान्य था..

वैशाली की ओर प्रेम से देखते हुए.. आँखों में आँखें डालकर रेणुका ने कहा "कोई बात नहीं वैशाली.. रीलैक्स.. चिंता मत कर.. आई लाइक लेस्बियन लव.. " पिछली रात को ही राजेश ने रेणुका की दोनों टांगों को कंधे पर लेकर, धनाधन चोद कर ठंडा किया था.. इसलिए रेणुका को ज्यादा इच्छा तो नहीं थी.. पर वैशाली की शर्मिंदगी कम करने के लिए उसने ये कहा.. गोद में सो रही वैशाली के गालों को सहलाते हुए उसकी उँगलियाँ उसके लाल होंठों तक पहुँच गई.. काफी देर तक वो उन होंठों को उंगलियों से रगड़ती रही.. वैशाली ने रेणुका का हाथ पकड़कर अपने गाल और गर्दन के बीच दबा दिया.. ऐसा करने से रेणुका की उँगलियाँ अब ज्यादा नजदीक से वैशाली के अधरों को छूने लगी.. उसने रेणुका की पहली दो उँगलियाँ मुंह में भर ली और धीरे धीरे चूसने लगी.. और थोड़ी ही देर में वो ऐसी तेजी से चूसने लगी जैसे लंड को चूस रही हो..

रेणुका समझ गई.. निश्चित रूप से वैशाली लंड की चुसाई को मिस कर रही थी.. उसकी इस भूख को देखकर रेणुका को अचानक कुछ याद आया और उसकी आँखों में एक अनोखी सी चमक आ गई..

"मैं अभी आई वैशाली.. तेरे लिए एक सप्राइज़ लेकर.. " वैशाली का सर अपनी गोद से हटाते हुए रेणुका ने खड़ी होकर कहा और अपने बेडरूम में चली गई

कुछ मिनटों बाद जब वो लौटी तो वैशाली उसे देखकर दंग रह गई.. राजेश का पेंट और शर्ट पहनकर खड़ी हुई रेणुका कमाल की लग रही थी.. उसने जान बूझकर शर्ट के ऊपरी दो बटन खुले छोड़ दीये थे.. और स्तनों के बीच की गहरी खाई को उजागर करते हुए खड़ी थी..

"कैसी लग रही हूँ मैं??" मुसकुराते हुए अपने कमर पर दोनों हाथ रखे बोली रेणुका

"जबरदस्त लग रही हो रेणुका जी.. एकदम हॉट.. साइज़ क्या है आपकी? ३८ की तो होगी ही.. " वैशाली ने पूछा

"३८ से थोड़ी सी ज्यादा.. तुम्हारा साइज़ ४० का है ये तो मैं बिना छुए ही बता सकती हूँ"

"हाँ सही कहा आपने.. ४० की साइज़ है मेरी"

रेणुका सोफ़े पर बैठ गई और वैशाली का सर वापिस अपनी गोदी में रख दिया.. पहली जिस स्थिति में बैठे थे उसी स्थिति में फिर से आ गए.. रिधम टूट जाने से वैशाली फिर से थोड़ी शरमा रही थी.. पर अब जब रेणुका ने ही पहल कर दी थी.. तब और झिझकने का कोई मतलब नहीं था.. रेणुका ने मर्दों की तरह उसने वैशाली के गर्दन के पीछे के हिस्से को मजबूती से पकड़ा और झुककर वैशाली के होंठों को चूम लिया.. शर्ट के खुले हुए बटनों से रेणुका के गदराए स्तनों की मांसल झलक देखते हुए वैशाली उन गोलाइयों को छूने लगी.. रेणुका को कॉलर से पकड़कर उसके चेहरे को अपने चेहरे से दबाते हुए वो भी उस चुंबन का जवाब देने लगी.. चूमते हुए दोनों की नजरें एक हो गई

"बहोत ही खूबसूरत है तू, वैशाली.." रेणुका के स्तन अब वैशाली के गालों से पूर्णतः दब रहे थे.. अपनी गर्दन के पिछले हिस्से पर वैशाली को कुछ चुभ सा रहा था.. पर उसने उस बारे में ज्यादा सोचा नहीं..

"मेरे बूब्स चुसेगी तू, वैशाली??"

"ओह्ह स्योर, रेणुकाजी.. !!"

रेणुका ने अपने शर्ट के बटन खोल दीये और अंदर पहनी बनियान के पीछे से अपने मदमस्त कातिल स्तनों को हाथ से बाहर निकालकर वैशाली को दिखाएं.. मर्दों के कपड़ों में रेणुका को देखकर वैशाली काफी उत्तेजित हो रही थी.. लो-नेक बनियान के बाहर लटक रहे दोनों भव्य स्तनों में एक जबरदस्त सेक्स अपील थी.. और उसकी एक इंच लंबी निप्पलों को देखकर वैशाली की चूत की फांक से रस चुने लगा था.. बड़े ही आराम से वैशाली ने रेणुका की निप्पलों को छु कर देखा.. स्पर्श स्त्री का हो या पुरुष का.. आनंद तो देता ही है.. वैशाली के इस स्पर्श से रेणुका सिहर उठी


रेणुका की गोलाइयों पर अब वैशाली अपनी जीभ फेरते हुए चाटने लगी.. अपने स्तनों को वैशाली को सौंपकर.. रेणुका बड़े आराम से सोफ़े पर पीठ टीकाकर बैठी रही.. वो मन ही मन वैशाली के विशाल उभारों को देखकर सोच रही थी.. जैसी माँ वैसी बेटी.. बिल्कुल शीला जैसे ही है.. बड़े बड़े.. पास पड़े मोबाइल को उठाकर उसने वैशाली की छातियों की तस्वीरें खींच ली.. वैशाली ने भी कोई एतराज नहीं जताया.. बल्कि उसने तो अपने ड्रेस के अंदर हाथ डालकर.. अपने स्तनों को और उभारकर बाहर निकाल दिया.. उन उभरे हुए स्तनों की रेणुका ने फिर से दो-तीन तस्वीर खींच ली..


वैशाली ने अब रेणुका की बनियान को ऊपर कर दिया और दोनों स्तनों को बिल्कुल खोल कर रख दिया.. ब्राउन रंग की निप्पलों को ध्यान से देखते हुए जो करना था वो शुरू कर दिया.. बारी बारी से दोनों निप्पलों को चूस लिया उसने.. स्तनों को और झुकाकर रेणुका ने वैशाली के मुंह में अपनी निप्पल ठूंस दी..

अब वैशाली ने पास पड़ा मोबाइल उठाया.. और उसका विडिओ ऑन करते हुए फोन रेणुका के हाथों में थमा दिया.. रेणुका समझ गई.. और उसने पास पड़े टेबल पर मोबाइल को ऐसे सेट कर दिया ताकि सारा सीन आराम से रिकार्ड हो सके.

वैशाली ने रेणुका की निप्पलों को चूसते हुए एक हाथ से अपने स्तन को दबाना शरू कर दिया.. ये देखते ही रेणुका की चूत में एक चिनगारी सी हो गई.. वैशाली के जिस्म का नरम स्पर्श और निप्पल की चुसाई.. उसे बहोत आनंद दे रही थी.. उसकी उत्तेजना अब बुरी तरह भड़क चुकी थी..


वैशाली को अपनी गोद से हटाते हुए रेणुका खड़ी हुई.. शर्ट और बनियान उतारकर वो टॉप-लेस हो गई.. वैशाली के सामने खड़ी होकर उसने उसका चेहरा अपनी चूत वाले हिस्से पर दबा दिया.. वैशाली को रेणुका के पेंट के अंदर कुछ कडक चीज महसूस हुई.. वो आश्चर्य से रेणुका की ओर देखने लगी.. अपने उस हिस्से पर वैशाली का चेहरा रगड़ते हुए रेणुका ने कहा

"जिस चीज के लिए तू तड़प रही है.. वो मेरे पास है.. ये देख.. !!" कहते हुए रेणुका ने अपने पेंट की चैन खोल दी.. और उसे नीचे सरका दिया.. ये नजारा देखकर वैशाली दंग रह गई.. क्रीम कलर का रबर से बना हुआ लंड.. रेणुका के दोनों पैरों के बीच लटक रहा था.. काले पट्टों से उस लंड को कमर पर बांध रखा था रेणुका ने..

वैशाली उस लंड के विकराल आकार को अभिभूत होकर देखती ही रही.. साधारण लंड की तुलना में ये कई ज्यादा मोटा और लंबा भी था.. रेणुका ने अपना पेंट घुटनों तक उतार दिया.. देखने पर ऐसा ही लग रहा था जैसे रेणुका का ही लंड था.. वैशाली उस अंग को घूरते हुए देखती रही.. फिर उसने रेणुका की तरफ देखा.. मुसकुराते हुए रेणुका ने कहा


"मुंह में लेकर चूस इसे.. मज़ा आएगा.. आज ये मैंने ये तेरे लिए ही पहना है.. राजेश लाया था ये मेरे लिए" रेणुका ने वैशाली के मुंह से इस रबर के लंड को दबाते ही वैशाली के होंठ खुल गए.. रेणुका ने हल्के से एक धक्का दिया.. चार इंच जितना लंड वैशाली के मुंह में चला गया.. रेणुका भी किसी मर्द की अदा से वैशाली के मुंह को चोदने लगी.. एकदम अलग सा.. नया सा अनुभव था ये वैशाली के लिए.. पर लंड की मोटाई इतनी ज्यादा थी की थोड़ी देर तक चूसने पर ही उसका जबड़ा दर्द करने लग गया.. और उसने लंड मुंह से बाहर निकाल दिया.. और बोली "बहोत मोटा है ये तो.. थोड़ा सा पतला होता तो चूसने में आसानी रहती"

"डॉन्ट वरी वैशाली.. वैसे भी ये मुंह में डालने से ज्यादा नीचे डालने के लिए ही इस्तेमाल करना है हमें.. और नीचे का तो तुम्हें पता ही है.. जितना ज्यादा मोटा उतना ही ज्यादा मज़ा आता है.. !!"

वैशाली: "बाप रे.. इतना मोटा मैं तो नहीं ले पाऊँगी.. फट जाएगी मेरी.. " कुतूहल मिश्रित उत्तेजना और डर से वैशाली उस रबर के लंड से खेलते हुए बोली

रेणुका: "मुझे तो ऐसी मोटी-तगड़ी साइज़ वाला ही पसंद है.. पतले वाले भी होते है.. पर वैसा लंड तो हम रोज घर पर देखते ही है.. जब कुछ अलग करने का मन हो तब कुछ अलग चीज ही चाहिए.. चल अब जल्दी जल्दी कपड़े उतार.. टाइम खराब मत कर.. कहीं कोई आ टपका तो मुझे इन कपड़ों में देखकर डर जाएगा.. और ये सब उतारने में भी बहोत वक्त लगता है.. ये तो मैं कभी कभी इस्तेमाल करती हूँ.. राजेश जब शहर से बाहर हो तब.. पर आज तेरी भूख को देखकर मुझे दया आ गई.. तुझे लंड के लिए तड़पता देखकर सोचा की तुझे इससे ही ठंडी कर दूँ.. "

इन बातों के दौरान दोनों ने अपने वस्त्र उतार दीये और संपूर्णतः नग्न हो गई.. रेणुका ने वैशाली के मदमस्त स्तनों को बड़े मजे से दबाएं और निप्पलों को मसल मसल कर चूस लिया.. वैशाली की चूत उत्तेजना से पानी पानी हो गई.. दो दिनों से चूत की खुजली से परेशान थी वो.. आज वही खुजली फिर से मचल पड़ी थी..

वैशाली ने रेणुका को फर्श पर लिटा दिया और अपनी फड़कती चूत को रेणुका के होंठों पर रख दिया.. वैशाली की सारी शर्म और हया.. अब हवा हो चुकी थी.. वो बिंदास रेणुका के होंठों से अपनी चूत को रगड़ते हुए उसके नंगे स्तनों को दबाने लगी..


रेणुका और वैशाली दोनों अब अपना आपा खो चुकी थी.. वैशाली ने अपनी पोजीशन बदली पर रेणुका के मुंह से चूत न हटाना पड़े इस लिए वो सिर्फ पलट गई.. रेणुका ने पहना हुआ रबर का लंबा विशाल लंड.. छत की तरफ तांक रहा था.. वैशाली ने उसे मुठ्ठी में पकड़कर हिलाया.. जिज्ञासावश वो इस रबर के लंड की बनावट को देख रही थी.. सहलाने में इतना मज़ा आ रहा था.. उसने दबाकर भी देखा.. दबाने में नरम और फिर भी सख्त.. वाह.. !! अद्भुत बनावट थी.. काफी बढ़िया कवॉलिटी का था वो औज़ार.. वैशाली को बहोत पसंद आ गया ये कृत्रिम लंड.. बनाने वाली कंपनी ने महिलाओं की उत्तेजना और जरूरतों का कितना ध्यान रखते हुए उसे बनाया था.. !!! पर इतना मोटा और लंबा क्यों बनाया होगा?? इंसान से ज्यादा गधे के लंड लग रहा था.. ये लंड को इस्तेमाल करने के बाद आनंद के बजाए कहीं दर्द न होने लगे.. ये डर लग रहा था वैशाली को

मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए वैशाली ने झुककर उस लंड के टोपे को चूम लिया.. दूसरी तरह रेणुका ने वैशाली की चूत को ऐसे चाटा.. ऐसे चाटा की वैशाली जबरदस्त गरम हो गई और उसकी धड़कती हुई चूत रेणुका के होंठों से घिसते हुए.. उसके स्तनों से होती हुई.. उस लंड तक जा पहुंची.. कुआं खुद चलकर प्यासे के पास आ गया.. उस रबर के निर्जीव अवयव में.. वैशाली ने अपनी वासनायुक्त हरकतों से जैसे जान फूँक दी थी.. वैशाली अपनी चूत को सुपाड़े पर रगड़ने लगी.. उस घर्षण से ऊपर ऊपर की खुजली तो थोड़ी शांत जरूर हुई.. पर चूत की गहराइयों में जो तूफान मचा हुआ था.. वो अब भी शांत होने की उम्मीद लगाए बैठा था..

वैशाली के चेहरे के भाव देखने के लिए उसने उसकी कमर पर हाथ फेरते हुए उसे अपनी तरफ मोड़ा.. अब दोनों के शरीर एक दूसरे के बिल्कुल सामने आ चुके थे.. वैशाली के मस्त स्तनों को रेणुका ने सोते सोते ही दबाया और उसकी निप्पल को अपनी चुटकियों में भरकर मसल दिया.. आग में पेट्रोल डालने का काम किया था रेणुका ने.. अब वैशाली इतनी ज्यादा गरम हो गई थी.. की अब न उसे लंड की मोटाई का डर रहा और ना ही उसकी लंबाई का..

अपनी तंदूर जैसी गरम चूत के सुराख के बिल्कुल मध्य में लंड को टिकाते हुए वैशाली ने अपने जिस्म का वज़न रखते हुए दबाया.. आज तक इतनी मोटी कोई चीज उसकी चूत के अंदर गई नहीं थी.. पर आज की इस हवस का नशा कुछ ऐसा था की दर्द की परवाह किए बगैर ही उसने अपने जिस्म का सारा वज़न उस लंड पर रख दिया.. चूत को चीरते हुए वह रबर का लंड अंदर घुसने लगा.. और जब वैशाली की सहने की शक्ति खतम हुई तब जाकर रुकी.. रेणुका समझ गई.. ये लंड तो उसके और शीला के साइज़ के भोसड़ों के लिए बनी थी.. जवान वैशाली बेचारी कैसे उसे ले पाती.. ??

वैशाली की कमर को पकड़ते हुए.. रेणुका नीचे से अपनी कमर उठाकर हौले हौले धक्के लगाने लगी.. ये सुनिश्चित करते हुए की लंड का उतना ही हिस्सा वैशाली की चूत के अंदर जाए.. जितना की वो बर्दाश्त कर सकें.. लंड अब अंदर बाहर होने लगा.. कभी कभी जब रेणुका से थोड़ा मजबूत धक्का लग जाता और लंड का अधिक हिस्सा अंदर घुस जाता तब वैशाली दर्द से कराह उठती..



"आह्ह.. रेणुकाजी.. ऊई माँ.. बहोत मज़ा आ रहा है.. ओह्ह.. ऐसे ही धक्के लगाते रहिए.. ओह माय गॉड.. मर गई.. आह्ह.. आह्ह.." वैशाली के हाव भाव और हरकत देखकर ही पता लग रहा था की उसे कितना मज़ा आ रहा था.. रेणुका ने वैशाली को अपने बगल में फर्श पर लिटा दिया और टेढ़ी होकर वैशाली को चोदने लगी.. थोड़ी देर तक ऐसे ही चोदते रहने के बाद.. उसने वैशाली को घोड़ी बना दिया.. और पीछे से चूत में डालकर जबरदस्त चोद दिया.. उस दौरान वैशाली तीन बार झड़ चुकी थी.. उसके आनंद का कोई ठिकाना न रहा.. बिना मर्द के भी लंड से मज़ा करने के बाद उसने रेणुका से कहा



"रेणुका जी, ये आपका औज़ार तो सच में बड़ा ही जबरदस्त है.. आप के पास तो राजेश सर है इसलिए इसकी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती होगी.. पर मुझ जैसी लड़कियों के लिए तो ये किसी आशीर्वाद से कम नहीं है.. क्या मुझे भी ऐसा एक मिल सकता है?? मतलब मैं भी ऐसा एक खरीदना चाहती हूँ.. क्यों की अब तो मुझे इसकी बहोत जरूरत पड़ने वाली है.. जब तक कोई साथ तलाश न लूँ"

"बिल्कुल सही कहा तूने.. जिस्म की आग बुझाने के लिए परेशान होते रहने से.. और अपनी इज्जत को दांव पर लगाने के डर के बगैर.. ये हथियार काफी काम आएगा तुझे.. तू लेकर जा.. और जब तुझे अपना कोई साथी मिल जाए तब लौटा देना.. ठीक है.. !!" वैशाली के स्तनों को मसलते हुए रेणुका ने कहा

"क्या सच में मैं इसे ले जा सकती हूँ?? पिछले कई दिनों से मैं तड़प रही थी.. पर अपनी ये समस्या किससे कहती? कविता भी मायके गई हुई है.. वरना उसके साथ भी थोड़ी बातचीत हो जाती और जी हल्का हो जाता.. अच्छा हुआ जो आप मुझे यहाँ ले आए.. वरना पता नहीं मैं क्या कर बैठती.. !!"

"चिंता मत कर.. ये ले जा और मजे कर.. अपने शरीर की भूख मिटाते हुए हमें तो अपनी इज्जत और आबरू का भी खयाल रखना पड़ता है.. जल्दबाजी में किसी भी मर्द को मत पकड़ लेना.. वरना फिर से कोई हरामी तेरी ज़िंदगी से खिलवाड़ करेगा.. कुछ हलकट मर्द ऐसे भी होते है.. जिन्हें सब कुछ मिलता रहे तब तक वो खुश और चुप रहते है.. पर किसी कारणवश अगर हम उनकी जरूरतों को कभी पूरा न कर पाएं.. तो हमारी इज्जत को सरेआम नीलाम करते हुए हिचकिचाते नहीं है.. ऐसे मर्दों से बचकर रहना.. और आराम से अपना जीवन व्यतीत कर.. ये डिल्डो मेरी तरफ से गिफ्ट समझ कर ले जा.. और मजे कर.. तेरी साइज़ के हिसाब से थोड़ा मोटा और लंबा जरूर है.. पर मैं राजेश से कहकर तेरी साइज़ का मँगवा दूँगी.. सेक्स लाइफ जब बोरिंग हो जाती है तब बदलाव के लिए ये उत्तम साधन है.. कभी कभी तो मैं और राजेश इसे साथ में इस्तेमाल करते है.. मज़ा आता है.. !! अच्छा सुन.. तेरे लिए दूसरा डिल्डो कौन से कलर का मँगवाऊँ?"

वैशाली शरमा गई.. अभी भी रेणुका की कमर पर वो एनाकोंडा बांधे रखा था..

"मतलब इसमे अलग अलग रंग भी होते है क्या??" वैशाली ने आश्चर्य से पूछा.. वैसे उसने इस तरह के डिल्डो ब्ल्यू-फिल्मों में देख रखे थे.. पर उसे ज्यादा जानकारी नहीं थी..

"अलग अलग कलर.. अलग अलज साइज़.. सब मिलता है.. जैसे ब्रा में अलग अलग साइज़ होती है.. बिल्कुल वैसे ही.. " रेणुका उस लंड को लटकाते हुए किचन में गई और फ्रिज से पानी की बोतल और दो ग्लास लेकर बाहर आई.. उसके चलने से.. रबर का लंड ऐसे झूल रहा था.. देखकर वैशाली की हंसी छूट गई..

"एकदम मर्द जैसे लग रहे हो आप.. बस ये छातियाँ निकलवा दीजिए" हँसते हँसते वैशाली ने कहा

"ये छातियाँ तो मर्दों को रिझाने का हथियार है.. उसे भला क्यों निकलवा दूँ?? छातियों से मर्द खुश और जब जरूरत पड़े तब ये नकली लंड लगाकर तेरे जैसी महिला भी खुश.. " रेणुका ने हँसते हुए कहा.. फिर उसने बात आगे बढ़ाई "राजेश ने कहा था की इसमे कई अलग अलग प्रकार और रंग आते है.. कुछ तो इलेक्ट्रॉनिक भी होते है.. बटन दबाते ही बिल्कुल वीर्य जैसी पिचकारी छोड़ें ऐसे डिल्डो भी होते है.."

"वाऊ.. ऐसे डिल्डो में तो कितना मज़ा आएगा.. !! ऐसे ही नए नए डिल्डो मार्केट में आते गए तो हम औरतों को मर्दों की जरूरत ही नहीं रहेगी.. !!" वैशाली ने कहा

रेणुका: "वैशाली.. ये नकली डिल्डो सिर्फ विकल्प के तौर पर ठीक है.. पर ये कभी भी असली हथियार का मुकाबला नहीं कर सकता.. असली लंड चाहे कितना भी छोटा या पतला न हो.. उसका आनंद ही अलग होता है.. "

वैशाली: "हाँ, वो बात तो है.. पर असली लंड लेने में रिस्क बहोत है.. "

रेणुका: "सही कहा तूने.. पता है.. राजेश मेरे लिए इतना मोटा लंड क्यों ले कर आया?? जब जब हम सेक्स करते और अपनी कल्पनाओ के बारे में चर्चा करते.. तब अक्सर मैं मोटे लंड का जिक्र करती.. ब्ल्यू-फिल्मों मे कल्लुओं को अपना बारह इंच का हथियार.. भोसड़े में डालकर खोदते हुए देखती.. तब मैं डर जाती.. ऊपर से वो उस खूँटे जैसे लंड को गांड में डालते तब देखकर मेरी रूह कांपने लगती.. हमेशा सोचती रहती की मोटा लंड अंदर लेने पर कैसा महसूस होता होगा.. !!"

वैशाली: "हाँ मैंने भी देखा है ब्ल्यू-फिल्मों में.. बाप रे.. मेरी तो देखकर ही फट जाती है.. !!"

रेणुका: "पर फिर भी जब उन औरतों को खुशी खुशी बारह इंच का लंड लेटे हुए देखती तब मुझे ताज्जुब होता.. मुझे जीवन में एक बार ऐसे किसी तगड़े लंड वाले से चुदवाना है.. पर यहाँ तो ऐसे मर्द मिलने से रहे.. !! इसलिए राजेश ये मोटा डिल्डो मेरे लिए लेकर आए थे.. मेरी उस इच्छा को संतुष्ट करने के लिए"

रेणुका ने डिल्डो को वॉश-बेज़ीन में पानी से धो लिया और पोंछकर बॉक्स में पैक कर दिया.. एक काली पन्नी में उस बॉक्स को डालकर उसने वैशाली को डे दिया.. वैशाली को टेंशन हो गया.. वापिस जाते वक्त कहीं पीयूष ने पूछ लिया की अंदर क्या है.. तो मैं क्या जवाब दूँगी??

दोनों ने कपड़े पहने.. मेकअप ठीक करके दोनों गाड़ी में निकल पड़ी.. वैशाली की चूत में अब भी जलन हो रही थी.. वो समझ गई की अपने मुंह से बड़ा लड्डू खाने की कोशिश करने की वजह से ये जलन हो रही थी..

वैशाली: "वैसे मज़ा बहोत आया रेणुका जी.. अचानक से कितना कुछ हो गया हमारे बीच.. !!"

रेणुका: "वैशाली.. मैं अक्सर घर पर अकेली होती हूँ.. अगर तुझे कोई साथी मिल जाएँ.. और मजे करने का मन हो तो बिंदास उसे लेकर मेरे घर चली आना.. बेकार में किसी गेस्टहाउस में जाकर खतरा मत उठाना.. वहाँ तो कभी भी पुलिस की रैड पड़ जाती है.. तू घर पर ही चली आना.. राजेश को मैं समझा दूँगी.. वो बहोत प्रेक्टिकल है.. समझ जाएगा.. और हाँ.. अगर कोई पार्टनर न मिलें तो भी चली आना.. पार्टनर का बंदोबस्त भी हो जाएगा"

वैशाली: 'साथी की जरूरत तो है.. पर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा?? मेरी उम्र में जो भी मिलेगा वो शादीशुदा ही होगा.. और अगर कोई कुंवारा मिल भी गया तो मेरे जैसी से अब कौन शादी करेगा? किसी शादीशुदा मर्द से एकाद बार सेक्स करने तक ठीक है.. पर हमेशा के लिए ऐसा करना ठीक नहीं.. फिर मेरे और उस रोजी में क्या अंतर?? मैं किसी और औरत के साथ ऐसी नाइंसाफी नहीं कर सकती.. एकाद बाद करना ठीक है"

रेणुका ने गाड़ी ऑफिस के बाहर रोक दी.. घड़ी में पौने छह का वक्त दिखा रहा था.. पिछली पंद्रह मिनट से पीयूष वैशाली का इंतज़ार कर रहा था.. पीयूष को देखते ही रेणुका के मन में माउंट आबू की यादें ताज़ा हो गई.. एक नजर उसकी तरफ देखकर रेणुका ने नजरें फेर ली.. डिल्डो वाला बॉक्स उठाकर वैशाली को देते हुए उसने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा.. ताकि पीयूष भी सुन सकें "अरे वैशाली, ये बॉक्स तो तू लेना भूल ही गई.. तेरी मम्मी की साड़ी है.. कितने दिनों पहले मैंने उनसे ली थी.. पर वापिस करना भूल जाती थी.. शीला को तो याद भी नहीं होगा.. !!"

रेणुका की इस समझदारी ने वैशाली की समस्या हल कर दी.. वरना पीयूष इस बॉक्स के बारे में जरूर पूछता.. वैशाली पीयूष के पीछे अपने बॉल चिपकाकर बैठ गई.. स्तन छूते ही पीयूष की आह्ह निकल गई..

"चुपचाप बाइक चला.. नखरे मत कर नालायक.. !!" हँसते हुए वैशाली ने कहा.. पीयूष ने बाइक चला दी.. रास्ते में पीयूष सोचता रहा की कल की तरह आज भी कुछ सेटिंग हो जाएँ तो कितना अच्छा होगा.. !! कल रात उस मादरचोद क्लीनर ने सारा मूड खराब कर दिया.. वैशाली उसके लंड को कैसे तांक रही थी!! ये लड़कियां वैसे तो शर्म की बड़ी बड़ी बातें करती रहती है.. पर जब लंड देखने का मौका मिलें तब चुकती भी नहीं है.. दोनों ने हिम्मत की और घर से बाहर निकलें.. पर कुछ हो नहीं पाया.. किस्मत.. और क्या.. !! पर अब तो वैशाली किसी भी सूरत में रात को बाहर नहीं निकलेगी.. पीयूष मन ही मन कोई और योजना सोचने लगा.. कविता भी घर पर नहीं थी इसलिए पूरी आजादी थी.. पर कुछ भी सेट नहीं हो पा रहा था.. उस तरफ मौसम कुछ कर नहीं रही थी.. और इस तरफ वैशाली के साथ कुछ हो नहीं पा रहा था.. वैसे वैशाली ने हिम्मत तो बहोत की थी.. वरना आधी रात को घरवालों से छुपकर चुदवाने के लिए बाहर निकलना बड़ी हिम्मत का काम है.. इसलिए जो कुछ भी हुआ था उसमें वैशाली की कोई गलती नहीं थी.. मौसम की याद आते ही फिर से पीयूष का मूड खराब हो गया.. तरुण ने उस दिन कैसे अपमानित किया था फोन पर.. !!

बाइक पर बैठी वैशाली अपने स्तनों को दबाते हुए पीयूष की जांघ सहला रही थी.. घर नजदीक आते ही उसने पीयूष से थोड़ी दूरी बना ली.. पूरे रास्ते दोनों के बीच कुछ खास बातचीत नहीं हुई.. क्योंकि पीयूष के दिमाग पर मौसम के खयाल हावी हो चुके थे.. वैशाली ये सोच रही थी की मम्मी पापा की नज़रों से बचाकर इस बॉक्स को अंदर कैसे ले जाया सकें??

वैशाली को शीला के घर के बाहर उतारकर पीयूष अपने घर चला गया.. मुसकुराते हुए वैशाली ने घर में प्रवेश किया.. सोफ़े पर बैठे शीला और मदन के सामने स्माइल देकर वो बिना कुछ कहें अपने कमरे में चली गई.. उसने सब से पहला काम उस बॉक्स को छुपाने का किया..

शीला ने आज वैशाली की पसंद की सब्जी बनाई थी.. डाइनिंग टेबल पर खाना खाते हुए तीनों ने ढेर सारी बातें की.. वैशाली को खुश देखकर मदन के दिल को ठंडक मिली.. शीला भी खुश थी पर उसे एक चिंता खाए जा रही थी.. पीयूष के साथ वैशाली खुश थी.. पर क्या कविता के आने के बाद ये सब मुमकिन हो पाएगा?? कौन सी पत्नी अपने जवान पति के पीछे पराई लड़की को रोज ऑफिस जाते देख पाएगी??

खाना खाने के बाद वैशाली और मदन वॉक लेने के लिए गए.. बाप बेटी के बीच बहोत सारी बातें हुई.. दोनों दस बजे लौटे.. हाथ मुंह धोकर वैशाली बेड पर पड़ी और पूरे दिन की दिनचर्या याद करने लगी.. आज पूरा दिन जिस किसी से भी बातें हुई थी वो सब याद आने लगी.. लंच करते वक्त पिंटू की कही आध्यात्मिक बातें भी याद आ गई.. वो सोच रही थी.. कितने स्पष्ट विचार है पिंटू के?? आदमी भी एकदम साफ दिल का लगता है.. काफी बातें सीखने जैसी थी पिंटू से.. अच्छे विचार वाले और सिद्धांतवादी इंसान सब को आकर्षित करते है.. पीयूष और पिंटू दोनों के अलग अलग व्यक्तित्व थे पर वैशाली दोनों के साथ काफी कम्फर्ट महसूस करती थी.. संजय के साथ हुए कड़वाहट भरे अनुभवों के कारण वो न चाहते हुए भी पिंटू का बातों बातों मे अपमान कर बैठी थी इस बात का उसे पछतावा हो रहा था..

अपनी इस गलती को सुधारने के लिए और उसे सॉरी बोलने के लिए वैशाली ने पिंटू को फोन लगाया.. और कहा की मानसिक तौर पर डिस्टर्ब होने की वजह से वो उसका अपमान कर बैठी थी.. जो उसका मकसद नहीं था.. और वो इस बात को लेकर कोई कड़वाहट मन में न रखे

पिंटू: "मैं समझ सकता हूँ वैशाली जी.. और मुझे इस बारे में आपसे कोई शिकायत नहीं है.. आप चिंता मत कीजिए.. और हाँ.. आपके साथ जो कुछ भी हुआ उसका मुझे दुख है.. इस सदमे से उभरने के लिए आपको किसी भी चीज की जरूरत हो तो मुझे बेझिझक बताइएगा.. वैसे भी मुझे अच्छे मित्रों की तलाश है.. गुड नाइट.. !!"

पिंटू के बात करने के तरीके से वैशाली काफी इंप्रेस हुई.. वो सोच रही थी.. आज पीयूष का कोई मेसेज क्यों नहीं आया?? कल रात को बड़ा बंदर बना फुदक रहा था.. आज कौन सा सांप सूंघ गया उसे? पता नहीं.. इंस्टाग्राम की रील्स देखते हुए उसकी आँख कब लग गई पता ही नहीं चला
 
पिंटू के बात करने के तरीके से वैशाली काफी इंप्रेस हुई.. वो सोच रही थी.. आज पीयूष का कोई मेसेज क्यों नहीं आया?? कल रात को बड़ा बंदर बना फुदक रहा था.. आज कौन सा सांप सूंघ गया उसे? पता नहीं.. इंस्टाग्राम पर रील्स देखते हुए उसकी आँख कब लग गई पता ही नहीं चला

आधी रात के बाद अचानक वैशाली के फोन की रिंग बजी.. आँखें मलते हुए वैशाली ने फोन उठाया

"खिड़की खोल.. मैं बाहर खड़ा हूँ" फोन पर पीयूष था..

फोन कट करके उसने खिड़की खोली.. दूसरी तरफ पीयूष खड़ा था.. खिड़की पर लगी लोहे की ग्रील से हाथ डालकर पीयूष ने वैशाली के स्तन दबा दीये..

"क्या कर रहा है पागल.. !!" वैशाली को मज़ा तो बहोत आया पर उसे डर लग रहा था..

"कुछ नहीं होगा.. तू एक काम कर.. कमरे की लाइट ऑफ कर दे.. किसी को पता नहीं चलेगा.." पीयूष ने कहा.. ये आइडिया तो वैशाली को भी पसंद आ गया.. उसने लाइट बंद कर दी और अपनी टीशर्ट उतारकर टॉप-लेस हो गई..


rev

वो अब खिड़की से एकदम सटकर खड़ी हो गई.. इतने करीब, की खिड़की के सरियों के बीच से उसके स्तन पीयूष की तरफ बाहर निकल गए.. पीयूष पागलों की तरह उसकी निप्पलों को चूसने लगा.. और स्तनों की गोलाइयों को चाटने लगा.. वैशाली और पीयूष के शरीरों के बीच ये लोहे के सरिये विलन बनकर खड़े हुए थे.. पीयूष जमीन पर खड़ा था.. उसकी कमर के ऊपर का हिस्सा ही नजर आ रहा था.. इस अवस्था में उसके लंड तक पहुँच पाना वैशाली के लिए मुमकिन नहीं था.. और पीयूष अपने आप को और ऊंचा कर नहीं सकता था.. काफी देर तक.. बिना लंड या चूत की सह-भागिता के बिना ही फोरप्ले चलता रहा..

वैशाली के नग्न स्तनों के साथ खेलकर पीयूष इतना उत्तेजित हो गया था की उसका लंड सख्त होकर दीवार के खुरदरे प्लास्टर से रगड़ खा रहा था.. अद्भुत द्रश्य था.. वैशाली ने अपना हाथ लंबा कर पीयूष के लंड को पकड़ना चाहा पर पहुँच न पाई.. अति उत्तेजित होकर पीयूष खिड़की पर खड़ा हो गया और उसने अपना लंड सरियों के बीच से वैशाली के सामने रख दिया.. बेहद गरम हो चुकी वैशाली ने पहले तो लंड को मन भरकर चूसा.. कडक लोड़े को चूसने में मज़ा आ गया उसे..



sd

अब वैशाली भी बिस्तर पर खड़ी हो गई.. ताकि उसका और पीयूष का शरीर सीधी रेखा में आ जाए.. वो उस तरह खड़ी थी की उसकी गीली चूत पीयूष के लंड तक पहुँच सके.. सुपाड़े का स्पर्श अपनी पुच्ची पर होते ही वैशाली की आह्ह निकल गई.. वो उस सुपाड़े को अपनी चूत के होंठों पर और क्लिटोरिस पर रगड़ने लगी..

rub

वैशाली की चूत में इतनी खाज हो रही थी की उससे रहा नहीं गया.. उसने पीयूष का लंड अपनी तरफ खींचा.. और ऐसा खींचा की पीयूष के गले से हल्की सी चीख निकल गई.. पर वैशाली उसके दर्द की फिकर करती तो उसकी चूत कैसे शांत होती.. !! पीयूष की अवहेलना करते हुए उसने लंड को खींचकर.. अपनी चूत के अंदर तीन इंच जितना अंदर डाल दिया.. !! पीयूष दर्द से कराह रहा था.. पर वैशाली अपनी मनमानी करती रही.. उसकी चूत को तो ६ इंच से ज्यादा लंबे लंड की अपेक्षा थी.. पर फिलहाल मजबूरी के मारे.. तीन इंच से अपना काम चला रही थी..


jui

पीयूष के होंठों पर होंठ रखकर चूसते हुए वो बड़ी मस्ती से लंड को हाथ में लेकर अपनी चूत के अंदर बाहर करती रही.. पीयूष की पीड़ा और वैशाली के आनंद के बीच.. लंड और चूत के घर्षण के दौरान.. वैशाली के स्तन फूलगोभी जैसे कडक बन चुके थे.. जीवंत लंड से चुदने की उसकी हफ्तों पुरानी ख्वाहिश आज पूरी हो रही थी.. ऑर्गजम के उस सफर के दौरान.. वैशाली ने अनगिनत बार पीयूष को चूमा.. और अपनी क्लिटोरिस पर लंड की रगड़ खाते हुए.. थरथराते हुए झड़ गई.. स्खलित होते ही वो शरमाकर खिड़की से उतर गई..

पर पीयूष तो अभी भी मझधार में था..उसका लंड झटके मार रहा था.. और शांत होने के बिल्कुल मूड में नहीं था.. वैशाली पीयूष की इस समस्या को समझ गई.. इसलिए वो फिर से खड़ी हो गई.. और पीयूष के लंड को मुठियाने लगी.. पीयूष वैशाली के गोलमटोल स्तनों को दबाते हुए कांपता हुआ झड़ गया.. उसके लंड ने अंधेरे में तीन-चार जबरदस्त पिचकारियाँ छोड़ दी.. अंधेरे में वो पिचकारी कहाँ जाकर गिरी उसका दोनों में से किसी को पता नहीं चला..

एक बार ठंडे होने पर दोनों अंधेरे में बैठकर एक दूसरे के अंगों से खेलते रहे.. रात के दो बजे शुरू हुआ उनका प्रोग्राम साढ़े तीन बजे तक चला.. सेक्स तो आधे घंटे में ही निपट गया था पर बाकी का एक घंटा दोनों ने प्यार भरी बातों में गुजार दिया..

"अब मैं चलूँ??" वैशाली के गोरे गालों को चूमकर पीयूष ने कहा

"बैठ न यार थोड़ी देर.. ऐसा मौका बार बार कहाँ मिलता है.. कविता के वापिस लौटने के बाद ऐसे मिलना भी मुमकिन नहीं होगा.. तू उसकी बाहों में पड़ा होगा और मैं यहाँ बैठे बैठे तड़पती रहूँगी.. " एकदम धीमी आवाज में वैशाली ने कहा

पीयूष: "यार, मैं अब खड़े खड़े थक चुका हूँ.. चार बजे तो सोसायटी में चहल पहल शुरू हो जाएगी.. तेरा तो ठीक है की तू अपने घर के अंदर है.. मुझे बाहर भटकता देखकर कोई पूछेगा तो क्या जवाब दूंगा.. !! और वैसे भी.. अपना काम तो हो चुका है.. "

वैशाली ने अपनी उंगली से नापकर दिखाते हुए कहा "सिर्फ इत्ता सा अंदर गया था तेरा.. वो भी बड़ी मुश्किल से.. तू ऊपर चढ़कर धनाधन शॉट लगाए उसे सेक्स कहते है.. ये तो उंगली करने बराबर था.. "

बातें खतम ही नहीं हो रही थी.. आखिर में पीयूष ने जबरदाती वैशाली से हाथ छुड़ाया और अपने घर की ओर भाग गया.. वैशाली अभी भी टॉप-लेस थी.. सुबह के चार बज रहे थे.. वो बाथरूम जाकर आई और टीशर्ट पहन कर सो गई.. सुबह साढ़े सात बजे जब शीला ने उसे जगाया तब उसकी आँख खुली..

शीला ने फोन थमाते हुए वैशाली से कहा "ले, कविता का फोन है.. उसके मायके से.. कुछ बात करना चाहती है तुझसे.."

वैशाली सोच में पड़ गई.. कविता ने इतनी सुबह सुबह क्यों फोन किया होगा??

बात करते हुए वैशाली ने कहा "हैलो.. !!"

"हाई वैशाली.. गुड मॉर्निंग.. कैसी है तू?"

"मैं ठीक हूँ.. यार तू तो दो दिन का बोलकर वापिस लौटी ही नहीं.. पाँच दिन हो गए.. क्या बात है.. ससुराल लौटने का इरादा है भी या नहीं??" वैशाली ने कहा.. शीला फोन देकर किचन में चली गई..

कविता: "अरे यार.. मैं आई थी तो दो दिन के लिए.. फिर रोज कोई न कोई काम निकल आता है.. वरना इतने दिनों तक ससुराल से कौन दूर रह पाएगा.. !! अंडा और डंडा दोनों ससुराल में ही है.. अंडा तो चलो पापा के घर खाने मिल जाएगा.. पर बिना डंडे के मैं क्या करूँ??"

वैशाली: "वैसे आज कल की लड़कियों का मायके में कोई न कोई ए.टी.एम जरूर होता है.. जब भी मायके आती है तब आराम से इस्तेमाल कर लेती है.. वैसे तेरा भी कोई न कोई तो होगा न उधर.. जो तुझे डंडे की कमी न खलने दे.. हा हा हा हा हा हा.. !! वो सब छोड़ और जल्दी वापिस आने के बारे में सोच.. पीयूष तेरे बगैर मर रहा है यहाँ.. तुझे उसकी याद नहीं आती है क्या??"

कविता: "अरे यार.. सब कुछ याद आता है.. पर क्या करें.. मजबूरी का दूसरा नाम मास्टरबेशन.. हा हा हा हा.. !!"

वैशाली: "नई नई कहावतें बनाना छोड़ और ये बता की वापिस कब आ रही है.. !! मैं भी अकेली पड़ गई हूँ यार.. एक तेरी ही तो कंपनी थी.. और तू भी चली गई.. चल छोड़ वो सब.. ये बता, तेरी मम्मी की तबीयत कैसी है?"

कविता: "वैसे ठीक है.. थोड़ी सी कमजोरी है.. थोड़ा वक्त लगेगा.. शायद मुझे और रुकना पड़ें.. और मैं वहाँ आऊँ उससे पहले तो आप लोगों को यहाँ आना पड़ेगा.. गुरुवार को तो सगाई है.. पूरा दिन काम ही काम लगा रहता है.. तीन ही तो दिन बचे है.. वैसे आप लोग कब आने वाले हो?"

वैशाली: "सगाई वाले दिन ही आएंगे.. "

कविता: "ओके.. सुबह नौ बजे का मुहूरत है.. आप लोगों को जल्दी निकलना पड़ेगा.. उससे अच्छा तो ये होगा की आप सब बुधवार शाम को ही यहाँ आ जाएँ.. "

वैशाली: "अरे यार.. सब कुछ मुझे थोड़े ही तय करना है.. !! मम्मी पापा भी तो मानने चाहिए ना.. !! ले तू पापा से बात कर" कहते हुए वैशाली ने मदन को फोन थमा दिया.. फोन पर कविता ने बड़े प्यार से न्योता दिया और आग्रह किया इसलिए मदन बुधवार शाम तक आने के लिए राजी हो गया..

वैशाली को थोड़ी शॉपिंग करनी थी.. खुद के लिए नई ब्रा और पेन्टी खरीदनी थी.. उसने सोचा की ऑफिस के दौरान वो एक घंटा बीच में निकल जाएगी और खरीद लेगी.. उसने शीला को इशारे से बुलाया

वैशाली: "मम्मी.. पापा को कहिए ना की मुझे थोड़े पैसे चाहिए.. "

शीला: "अरे, तू खुद ही मांग लें"

वैशाली: "नहीं मम्मी.. मुझे पापा से पैसे मांगने में शर्म आती है.. अब जल्दी ही मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूँ.. अच्छा नहीं लगता मांगना"

शीला: "अरे मदन.. जरा वैशाली को दो हजार रुपये देना"

मदन: "किस बात के लिए चाहिए भाई.. ??"

शीला: "तुम्हें जानकर क्या काम है?? होगी उसे जरूरत.. तुम बस पैसे देने से मतलब रखो.. "

मदन: "अरे.. बच्चों को पैसे देने से पहले पूछना भी तो जरूरी है की किस बात के लिए चाहिए.. !!"

शीला: "क्यों? तुम्हें वैशाली पर भरोसा नहीं है?"

वैशाली: "पापा ठीक कह रहे है मम्मी.. बात भरोसे की नहीं है.. पर जानना जरूरी है.. और हिसाब मांगना भी जरूरी है"

मदन: "देखा.. !! कितनी समझदार है मेरी बेटी.. !!"

शीला: "हे भगवान.. दो हजार रुपयों के लिए दो हजार बातें सुनाएगा ये आदमी.. ये ले बेटा.. " मदन के वॉलेट से पैसे निकालकर वैशाली को देते हुए कहा शीला ने

वैशाली: "थेंक यू पापा.. थेंक यू मम्मी.. " पर्स में पैसे रखकर वो नहाने चली गई..

तैयार होते ही.. पीयूष हाजिर हो गया.. और वैशाली उसके साथ ऑफिस चली गई

उन्हें जाते हुए देख शीला सोच रही थी.. कितनी अच्छी बनती है दोनों के बीच.. !!

सिर्फ चार दिनों में ही वैशाली और पीयूष की मित्रता और गाढ़ी हो चुकी थी.. पीयूष मौसम की यादों को वैशाली के सहारे भूलना चाहता था.. पर रोज घर में मौसम के नाम का जिक्र होता.. और भूलने के बजाए.. मौसम की यादें अधिक तीव्रता से परेशान करने लगती.. दो दिन बाद तो उसकी सगाई में जाना था..

पिछली रात की खिड़की-चुदाई के बाद.. वैशाली अपनी बातों में थोड़ी ज्यादा फ्री हो गई थी.. आजाद परिंदों की तरह बाइक पर जाते हुए दोनों एक दूसरे से ऐसे चिपके हुए थे जैसे दीवार पर छिपकली चिपकी हुई हो.. एक जगह बाइक की गति थोड़ी सी धीमी होने पर वैशाली ने पीयूष के कान में कहा

वैशाली: "हमें ऐसे डर डर कर ही मिलना होगा या फिर कभी शांति से करने का मौका भी मिलेगा?"

पीयूष: "यार.. मैं ठहरा शादी-शुदा आदमी.. इसलिए हमें डर डर कर ही करना होगा.. हाँ संयोग से कोई जबरदस्त चांस मिल जाएँ तो अलग बात है"

वैशाली: "पर ऐसे तो जरा भी मज़ा नहीं आता मुझे, पीयूष.. मुझे आराम से.. बिना किसी डर के करवाना है.. कुछ सेटिंग कर न यार.. ऐसे डर डर कर चोर की तरह सब कुछ करना.. ये भी कोई बात हुई!! सच कहूँ तो डरते डरते या जल्दबाजी में करने का कोई मतलब ही नहीं है.. इस क्रिया को तो आराम से ही करना चाहिए.. विशाल बेड पर.. नंगे होकर चुदाई करने में जो मज़ा है ना.. !! वो खिड़की पर लटककर करने में कैसे मिलेगा.. !!"

असंतोष का गेस जलते ही पीयूष के दिल की भांप, कुकर की सिटी की तरह ऊपर चढ़ी और बाहर निकलने लगी

ऑफिस करीब आते ही दोनों नॉर्मल लोगों की तरह बैठ गए.. गेट पर ही पिंटू मिल गया.. वो फोन पर लगा हुआ था.. जाहीर सी बात थी की वो कविता से ही बात कर रहा था.. पीयूष को देखते ही उसने फोन काट दिया और मुसकुराते हुए "गुड मॉर्निंग" कहा.. और अपनी कैबिन में घुस गया.. उसने फिर से कविता को फोन लगाया

पिंटू: "यार एकदम से पीयूष और वैशाली सामने मिल गए.. इसलिए फोन काटना पड़ा.. सॉरी.. अरे नहीं नहीं.. किसी ने हमारी बातें नहीं सुनी.. तू टेंशन मत ले यार.. "

वैशाली पिंटू की कैबिन का दरवाजा खोलने ही वाली थी की तब उसने आखिरी दो वाक्य सुन लिए.. वो सोचने लगी.. ऐसी तो क्या बात होगी जो पिंटू को इतना ध्यान रखना पड़ता है?? खैर, होगी कोई उसकी पर्सनल बात.. मुझे क्या.. !!

वैशाली ने कैबिन के बंद दरवाजे पर दस्तक दी.. और दरवाजा खोलकर अंदर झाँकते हुए बड़े ही प्यार से कहा "मे आई कम इन?"

पिंटू: "यू आर ऑलवेज वेलकम.. " अंदर से आवाज आई..

वैशाली ने हँसते हुए कैबिन में प्रवेश किया.. और पिंटू के सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. पिंटू के टेबल पर फ़ाइलों का ढेर लगा था.. इसलिए उसने निःसंकोच वैशाली को बोल दिया

"सॉरी, आज मैं आपको कंपनी नहीं दे पाऊँगा.. आज वर्कलोड कुछ ज्यादा ही है"

वैशाली: "ओह.. नो प्रॉब्लेम पिंटू..वैसे काम का बोझ ज्यादा हो तो फोन पर कम बात किया करो और फटाफट काम पर लग जाओ.. मुझे भी मार्केट जाना है.. थोड़ा सा काम है.. मौसम को देने के लिए कोई गिफ्ट भी तो लेनी होगी.. !!"

पिंटू: "अरे हाँ यार.. ये तो मैं भूल ही गया.. मुझे भी न्योता मिला है.. प्लीज मेरा एक काम करोगी? आप जो भी गिफ्ट खरीदों.. उसमे मेरी भी हिस्सेदारी रखना.. इफ यू डॉन्ट माइंड.. !!"

वैशाली: "भला मैं क्यों माइंड करूंगी?? हाँ अगर आपने आपका हिस्सा नहीं दिया तो जरूर माइंड करूंगी.. हा हा हा.. वैसे.. कितना बजेट है आपका गिफ्ट के लिए?"

पिंटू: "एक हजार.. थोड़ा बहोत ऊपर नीचे होगा तो चलेगा.. "

वैशाली: "ठीक है.. इस बजेट में मुझे कुछ मिल जाएगा तो मैं फोन करूंगी.. अब मैं निकलती हूँ.. बाय"

पिंटू: "बाय.. एंड थेंकस"

वैशाली पिंटू की केबिन से निकल गई.. बाहर निकलकर उसने राजेश सर से इजाजत मांगी.. राजेश सर ने चपरासी को बुलाकर.. ऑफिस स्टाफ में से किसी का एक्टिवा दिलवा दिया वैशाली को.. जिसे लेकर वैशाली मार्केट की ओर निकल गई।

एक डेढ़ घंटा बीत गया पर वैशाली को अपनी पसंद की गिफ्ट ही नहीं मिल रही थी.. सस्ती वाली ठीक नहीं लग रही थी और जो पसंद आती वो बजेट के बाहर होती.. मुसीबत यह थी की वो घर से सिर्फ दो हजार लेकर ही निकली थी.. क्यों की मौसम की गिफ्ट के बारे में तो उसे ऑफिस आकर ही खयाल आया था..

आखिर उसे २२०० रुपये का एक पेंटिंग पसंद आ गया.. वैशाली ने तुरंत पिंटू को फोन किया.. पीयूष और पिंटू तब साथ ही बैठे थे..

पिंटू: "अरे कोई बात नहीं.. आपको पसंद है उतना ही काफी है..आप पैक करवा ही लीजिए"

वैशाली ने दुकानदार से थोड़ी सी नोक-झोंक के बाद आखिर २००० में सौदा तय किया.. गिफ्ट-पेक करवा कर वो ऑफिस आई.. और पीयूष की मौजूदगी में ही गिफ्ट पिंटू को दिखाई.. वैसे पेक हुई गिफ्ट पिंटू को नजर तो नहीं आने वाली थी.. पर फिर भी.. उसने मार्कर पेन से उस पर अपना और पिंटू दोनों का नाम लिखा.. पिंटू ने तुरंत वॉलेट खोलकर अपने हिस्से के एक हजार रुपये वैशाली को दे दीये..

शाम को पीयूष के साथ घर लौटते वक्त वैशाली ने एक लेडिज गारमेंट की शॉप के बाहर बाइक खड़ा रखने के लिए कहा.. बाहर डिस्प्ले में ब्रा और पेन्टीज लटक रही थी.. पीयूष समझ गया

वैशाली: "यार मुझे थोड़ी सी शॉपिंग करनी है.. फिर कल तो हमें जाने के लिए निकलना होगा.. दोपहर के बाद"

पीयूष: "यार ये बड़ा मस्त धंधा है.. कितने कस्टमरों के बॉल रोज नज़रों से नापने मिलेंगे"

वैशाली: "उससे अच्छा तू एक काम कर.. मर्दों के कच्छे बेचना शुरू कर दें.. देखने भी मिलेगा और कोई शौकीन कस्टमर हुआ तो छूने भी देगा.. बेवकूफ.. यहाँ रुकना जब तक मैं लौटूँ नहीं तब तक.. और यहाँ वहाँ नजरें मत मारना.. वरना बीच बाजार जूतों से पिटाई होगी"

पीयूष बाहर बाइक पर बैठा रहा.. थोड़ी देर में दुकानदार का हेल्पर बाहर आया और उसने कहा "साहब आप भी अंदर आइए और मैडम को मदद कीजिए.. क्या है की आप ऐसे बाहर बैठे रहेंगे तो और कस्टमर को आने में झिझक होगी.. हमारी सारी कस्टमर महिलायें ही होती है, इसलिए"

"ओह आई एम सॉरी.. आप सही कह रहे है.. " वैसे भी पीयूष अंदर जाना ही चाहता था.. बाइक पार्क करने के बाद वो अंदर आया और वैशाली के करीब ऐसे खड़ा हो गया जैसे उसका पति हो.. उसने हाथ इस तरह काउन्टर पर रख दिया था की उसकी कुहनी वैशाली के स्तनों की गोलाई को छु रही थी..

अलग अलग डिजाइन और रंगों वाली.. पुरुषों के मन को लुभाने वाली ब्रा और पेन्टीज की ढेरों वराइइटी थी..

एक लड़के ने नेट वाली ब्रा दिखाते हुए कहा "मैडम, ये आप पर अच्छी जँचेगी.. दिखने में भी अच्छी है और आप के साइज़ की भी है.. आप चाहें तो इसे ट्राय कर सकते है.. चैन्जिंग रूम वहाँ है" इशारे से कोने में बने छोटे कैबिन को दिखाते हुए उसने कहा

पीयूष मन ही मन सोच रहा था.. साले चूतिये.. तुझे कैसे पता की वैशाली को ये ब्रा बहोत जँचेगी??.. जैसे पीयूष के विचारों को समझ गया हो वैसे वो लड़का वहाँ से हट गया और उसकी जगह सेल्सगर्ल आ गई..

वैशाली चार ब्रा लेकर ट्रायल रूम में गई.. और पीयूष शोकेस में लटक रही.. एक से बढ़कर एक ब्रांड की ब्रा और पेंटियों को देखता रहा.. प्लास्टिक के उत्तेजक पुतलों पर चढ़ाई हुई ब्रा और पेन्टी.. पुतले के उभार इतने उत्तेजक थे की देखकर ही कोई भी मर्द लार टपकाने लगे.. अचानक पीयूष को विचार आया.. मौसम के लिए भी एक ब्रा खरीद लेता हूँ.. उसे गिफ्ट देने के लिए.. अब ये काम वैशाली के लौटने से पहले कर लेना जरूरी था

उसने जल्दी जल्दी वहाँ खड़ी सेल्सगर्ल से कहा "मैडम, आप से एक रीक्वेस्ट है"

सेल्सगर्ल ने कातिल मुस्कान देते हुए कहा "हाँ हाँ कहिए सर.. !!"

पीयूष: "मुझे अपनी गर्लफ्रेंड के लिए ब्रा खरीदनी है मगर.. !!"

सेल्सगर्ल: "शरमाइए मत सर.. मैं समझ गई.. आपकी वाइफ के आने से पहले आप खरीद लेना चाहते है.. हैं ना.. !! कोई बात नहीं.. आप सिर्फ आपकी गर्लफ्रेंड की साइज़ बताइए.. मैं अभी पेक कर देती हूँ"

"साइज़?? साइज़ का तो पता नहीं.. !!" पीयूष का दिमाग चकरा गया

"सर सिर्फ अंदाजे से बता दीजिए.. उसके अलावा तो और कोई ऑप्शन नहीं है.. " नखरीले अंदाज में मुसकुराते हुए उस लड़की ने कहा

अब पीयूष उलझ गया.. वो फ़ोटो में लगी मोडेलों को देखकर.. मौसम के बराबर चूचियों वाली तस्वीर ढूँढने लगा.. ताकि साइज़ का पता चलें.. पर दिक्कत ये थी की आजकल की सारी ब्रांडस.. बड़ी बड़ी चूचियों वाली ही मॉडेल्स पसंद करते है.. उसमे से एक की भी चूचियाँ मौसम के साइज़ की नहीं थी.. यहाँ वहाँ नजर मार रहे पीयूष की आँखें तब चमक गई.. जब उस सेल्सगर्ल ने अपना दुपट्टा ठीक करने के लिए थोड़ा सा हटाया.. और पीयूष को मौसम की साइज़ की बराबरी का कुछ दिख गया.. उस सेल्सगर्ल के संतरें देखकर पीयूष ने अंदाजा लगा लिया था.. बिल्कुल मौसम जीतने ही थे.. साइज़ और सख्ती दोनों में.. शायद उन्नीस बीस का फर्क होगा पर उतना तो चलता है.. अब दिक्कत यह थी की उस लड़की को कैसे पूछें की उसकी साइज़ क्या है?? कहीं उसने हंगामा कर दिया तो?? दुकान वाला मारते मारते घर तक छोड़ने आएगा

"हम्ममम.. " गहरी सोच का नाटक करने लगा पीयूष

"सर जल्दी बताइए.. अगर मैडम आ गई तो आपकी इच्छा अधूरी रह जाएगी" उस लड़की ने फिर से अपना दुपट्टा ठीक करते हुए पीयूष को ललचाया

वैशाली अब कभी भी बाहर आ सकती थी.. एक एक पल किंमती था..

पीयूष काउन्टर पर झुककर उस सेल्सगर्ल के थोड़े करीब आया और चुपके से बोला "मैडम, प्लीज डॉन्ट माइंड.. मेरी गर्लफ्रेंड की कदकाठी आप के बराबर ही है.. !!"

चालक सेल्सगर्ल तुरंत बोली: "समझ गई सर.. मेरी साइज़ की दो ब्रा पैक कर देती हूँ"

"वैसे कितने की होगी एक ब्रा की कीमत?" पीयूष ने पूछा

"सर बारह सौ पचास की एक" सेल्सगर्ल ने बताया..

"फिर एक काम कीजिए.. सिर्फ एक ही पीस पैक करना" पीयूष ने कहा.. उसे ताज्जुब हो रहा था.. भेनचोद.. इत्ती सी ब्रा के इतने सारे पैसे?? वैसे मौसम के अनमोल स्तनों के सामने पैसा का कोई मोल नहीं था.. वैशाली के आने से पहले पीयूष ने पेमेंट कर दिया और ब्रा का पैकेट अपनी जेब में रख दिया..

तभी वैशाली ट्रायल रूम से बाहर आई.. उसने दो ब्रा पसंद की थी.. किंमत के बारे में उस सेल्सगर्ल से तोल-मोल के बाद आखिर उसने सात सौ रुपये में दोनों ब्रा खरीद ले.. ये देखकर ही पीयूष ने अपना माथा पीट लिया.. मर्द युद्ध लड़ने में काबिल जरूर हो सकते है.. लेकिन शॉपिंग के क्षेत्र में महिलाओं की बराबरी कभी नहीं कर सकते.. उनके बस की ही नहीं होती.. मर्द जब भी कुछ खरीदने जाता है तो यह तय होता है की वो उल्लू बनकर ही लौटेगा.. फिर वो साड़ी खरीदने जाए या तरकारी..

"थेंक यू.. " कहकर वैशाली पीयूष का हाथ पकड़कर दुकान के बाहर चली गई.. अचानक उसे कुछ याद आया और वो पीछे मुड़ी..

सेल्सगर्ल: "जी मैडम बताइए.. !!"

वैशाली उसके करीब गई और कुछ बात की.. फिर पीयूष की ओर मुड़कर बोली "जरा आठ सौ रुपये देना तो मुझे.. !!"

पीयूष को आश्चर्य हुआ.. अभी भी मौसम की ब्रा के लिए १२५० का चुना लग चुका था.. अब और आठ सौ?? भेनचोद इससे अच्छा तो वो मूठ मार लेता..

"हाँ हाँ.. ये ले" कहते हुए उसने वैशाली को पैसे दीये..

अब दोनों बाहर निकले और बाइक पर बैठकर निकल गए..

वैशाली: "बाहर बैठे बैठे कितनी लड़कियों के बबले नाप लिए? सच सच बता"

पीयूष: "अरे यार किसी के नहीं देखें.. आँख बंदकर बैठा था.. वैसे तूने वो आठ सौ रुपये का क्या लिया लास्ट में?"

वैशाली: "कविता के लिए भी एक ब्रा खरीद ली.. उसे पसंद आएगी"

पीयूष: "यार फालतू में खर्चा कर दिया.. उसके पास बहोत सारी ब्रा है"

वैशाली: "अब तो खरीद भी ली.. एक काम कर.. तू पहन लेना.. हा हा हा हा.. !!"

पीयूष: "एक बात कहूँ वैशाली.. !! तेरे बबले तो बिना ब्रा के ही अच्छे लगते है मुझे.. फिजूल में इन मस्त कबूतरों के ब्रा के अंदर कैद कर लेती है तू.. "

वैशाली: "अपनी होशियार अपने पास ही रख.. बिना ब्रा के बाहर निकलूँगी तो तेरे जैसे लफंगे नज़रों से ही चूस लेंगे मेरे बॉल"

पीयूष: "लड़के देखते है तो तुम्हें भी तो मज़ा आता है ना.. !! कोई तेरे बबले देखे तो कितना गर्व महसूस होता होगा.. !! अगर कोई ना देखें तब तो तुम लोग दुपट्टा ठीक करने के बहाने दिखा दिखा कर ललचाती हो.. !!"

वैशाली: "ऐसा कुछ नहीं होता.. कोई एक-दो लड़कियां ऐसा करती होगी.. तू सब को एक तराजू में मत तोल"

पीयूष: "अब तू ही सोच.. अभी तू बिना ब्रा पहने मेरे पीछे चिपक कर बैठी होती.. तो मुझे और तेरे बबलों दोनों की कितना मज़ा आता.. !!"

वैशाली: "हाँ.. और लोग भी देख देखकर मजे लेंगे उसका क्या?? ब्रा पहनी हो तब भी ऐसे घूर घूर कर देखते है सब.. जवान तो जवान.. साले ठरकी बूढ़े भी देखते रहते है.. "

दोनों बातें करते करते घर पहुँच गए.. वैशाली अपने घर गई और पीयूष अपने घर..

दूसरे दिन मौसम के घर जाने के लिए सब साथ निकलने वाले थे.. खाना खाने के बाद वैशाली, मदन और शीला बाहर झूले पर बैठे थे.. अनुमौसी और पीयूष भी साथ बैठे थे.. पीयूष ने पिंटू को फोन किया और बताया की वो भी साथ ही चलें..

वैशाली घर के अंदर गई और वहीं से पीयूष की आवाज लगाई.. "पीयूष, जरा मुझे मदद करना.. ये अटैची मुझसे खुल नहीं रही.. "

जैसे ही पीयूष घर के अंदर गया.. वैशाली ने उसे बाहों में जकड़ लिया और पागलों की तरह चूमती रही..

पीयूष: "अरे अरे अरे.. क्या कर रही है?? पागल हो गई है क्या?"

पीयूष के लंड पर हाथ फेरते हुए वैशाली ने कहा "हाँ पीयूष.. पागल हो गई हूँ.. अब कल से ये सब बंद हो जाएगा.. इसलिए एक आखिरी बार सेलिब्रेशन करना चाहती हूँ.. ये तेरा लंड कविता रोज डलवाती होगी.. साली किस्मत वाली है.. मुझे रोज मिलता तो कितना अच्छा होता.. !!"

वैशाली के स्पर्श का जादू पीयूष के लंड पर हावी हो रहा था.. पेंट के अंदर ९० डिग्री का कोण बनाकर खड़ा हो गया था.. ऐसी सूरत में भला पीयूष वैशाली के स्तनों को कैसे भूल जाता.. वैशाली का टीशर्ट ऊपर कर उसने दोनों उरोजों को चूस लिया.. और वैशाली ने पीयूष का लंड मुठ्ठी में पकड़कर मसल दिया.. यह सारी क्रिया मुश्किल से दो मिनट तक चली होगी.. पीयूष ने अपने होंठ साफ कर लिए और लंड को ठीक से अन्डरवेर के अंदर दबा दिया.. वैशाली ने भी अपनी ब्रा और टीशर्ट ठीक कर लिए.. पीयूष बाहर चला गया.. वैशाली की इच्छा धरी की धरी रह गई.. कविता के आने से पहले आखिरी बार चुदना चाहती थी वो.. पर क्या करती.. !!

पीयूष बाहर आकर कुर्सी पर झूले के सामने बैठ गया

पीयूष: "मदन भैया.. मैं अपने दोस्त की गाड़ी लेने जा रहा हूँ.. आप चलोगे?"

मदन: "नहीं यार.. मैं आज थोड़ा थका हुआ हूँ.. "

पीयूष: "अरे ज्यादा टाइम नहीं लगेगा.. यहाँ सब्जी मार्केट के पीछे ही जाना है.. आधे घंटे में तो लौट आएंगे.. मुझे भी कंपनी मिल जाएगी.. अकेले जाने में बोर हो जाऊंगा"

शीला: "एक मिनट पीयूष.. तू मार्केट के पीछे जाने वाला है?"

पीयूष: "हाँ भाभी"

शीला: "मदन, हम दोनों साथ चलते है.. कल कविता के घर जा रहे है तो मैंने सोचा.. मौसम इतने दिनों से बीमार थी तो उसके लिए कुछ फ्रूट्स ले चलें.. सामने ही रसिक का घर है.. आज सुबह ही वो कह रहा था की उसकी बीवी रूखी ने रबड़ी बनाई है.. भैया को पसंद हो तो शाम को ले जाना.. चल तुझे मैं आज रूखी की रबड़ी खिलाती हूँ.. " कहते हुए शीला ने मदन के पैर का अंगूठा अपने पैरों से दबा दिया.. शीला ने इशारों इशारों में मदन को ललचाया..

मदन ने शीला के कान में धीरे से कहा.. " क्या सच में रूखी की रबड़ी चखने मिलेगी?? तो मैं चलूँ.." शीला घूरती हुई उसके सामने देखने लगी और मदन हंस पड़ा

"ठीक है मैडम, आपका हुक्म सर-आँखों पर.. वैशाली को भी साथ ले चलते है" मदन ने कहा

शीला: "फिर हम चार लोग हो जाएंगे.. दो ऑटो करनी पड़ेगी.. "

वैशाली: "नहीं मम्मी.. आप लोग हो आइए.. मैं यहीं बैठी हूँ.. मौसी से बातें करूंगी.. हम सब चले जाएंगे तो वो अकेली पड़ जाएगी.. !!"

शीला: "ठीक है बेटा.. तू अनु मौसी से बातें कर.. हम एकाध घंटे में लौट आएंगे.. "

पीयूष, मदन और शीला चलते चलते गली के नाके तक आए और ऑटो से पीयूष के दोस्त के घर पहुँच गए.. वापिस आते वक्त रसिक के घर के पास रुक गए.. पुरानी शैली से बना हुआ मकान था रसिक का.. पर सजावट अच्छी थी.. मदन और शीला को देखकर रसिक खुश हो गया.. रसिक के माँ-बाप ने भी बड़े प्यार से उनका स्वागत किया

रसिक: "अरे भाभी, आपने फोन कर दिया होता तो अच्छा होता.. अभी तो रबड़ी बन रही है.. थोड़ी देर लगेगी.. आप बैठिए.. फिर गरम गरम रबड़ी खाने में मज़ा आएगा.. " रसिक की बातें सुनते हुए मदन की आँखें रूखी को तलाश रही थी

मदन को यहाँ वहाँ कुछ ढूंढते हुए देखकर शीला समझ गई..

शीला: "रूखी कहीं दिखाई नहीं दे रही?"

रसिक: "वो अंदर के कमरे में है.. लल्ला को दूध पीला रही है.. चार दिन बाद आज ठीक से दूध पी रहा है मेरा बेटा.. जुकाम और बुखार की वजह से पिछले कई दिनों से ठीक से दूध नहीं पी पा रहा था..चार दिनों से माँ और बेटा दोनों परेशान हो गए थे "

ये सुनते ही मदन की दिल की धड़कन थम सी गई.. ओह्ह हो.. चार दिन से बच्चे ने दूध नहीं पिया था.. और माँ परेशान हो रही थी.. बेटा पी नहीं पा रहा था इसलिए परेशान थी या छातियों में दूध भर जाने की वजह से.. !! यार.. दो दिन पहले यहाँ आया होता तो अच्छा होता


RUKHI5

तभी रूखी बाहर आई.. आह्ह.. रूखी का रूप देखकर.. मदन और पीयूष के साथ साथ शीला भी देखती रह गई..

रूखी ने शीला की आवाज सुनी इसलीये उसने सोचा की सिर्फ वही अकेली आई होगी.. इसलिए बिना चुनरी के वो बाहर आ गई.. बाहर आने के बाद उसने मदन और पीयूष को देखा.. रूखी ने चुनरी ओढ़ रखी होती तो भी वो उसके विशाल स्तन प्रदेश को ढंकने के लिए काफी नहीं थी.. और वो अभी अभी दूध पिलाकर खड़ी हुई थी.. इसलिए ब्लाउस के नीचे के दो हुक भी खुले हुए थे.. और स्तनों की गोलाई का निचला हिस्सा.. ब्लाउस के नीचे से नजर भी आ रहा था.. ब्लाउस की कटोरी के बीच का निप्पल वाला हिस्सा.. दूध टपकने से गीला हो रखा था.. देखते ही मदन के दिल-ओ-दिमाग में हाहाकार मच गया.. बहोत मुश्किल से उसने अपने आप पर कंट्रोल रखा

रूखी: "आइए आइए साहब.. आइए पीयूष भैया.. कैसे हो भाभी?? आप सब ने तो आज इस गरीब की कुटिया पावन कर दी"

रूखी के बड़े बड़े खरबूजों जैसे उभारों को ललचाई नज़रों से देखते हुए मदन ने कहा "अरे किसने कहा की आप गरीब है.. !!"

शीला ने मदन के पैर पर हल्के से लात मारकर उसे कंट्रोल में रहने की हिदायत देते हुए बात बदल दी "अरे रूखी.. क्या अमीर क्या गरीब.. हम सब एक जैसे ही तो है.. आप लोग दूध देते हो तभी तो हम चाय पी पाते है.. " शीला ने दांत भींचते हुए मदन की ओर गुस्से से देखते हुए उसे इशारों से कहा की अपनी नज़रों से रूखी के बबला चूसना बंद कर.. उसका पति तुझे देख रहा है.. !!

शीला: "हमारे घर तो कभी रबड़ी नहीं बनती.. इसलिए तुम्हारे घर आना पड़ा.. अब बताओ गरीब हम हुए या आप?? अब बाकी बातें छोडोन और साहब को रबड़ी चखाओ.. तेरी रबड़ी खाने के लिए ही उन्हें साथ लेकर आई हूँ.. " हर एक शब्द से रूखी और मदन को झटके लग रहे थे.. इन सारी बातों से पीयूष अनजान था.. उसकी नजर तो शीला भाभी के अद्भुत सौन्दर्य पर ही टिकी हुई थी.. आखिरी बार उस सिनेमा हॉल में भाभी के भरपूर स्तनों का आनंद नसीब हुआ था.. काश एक रात के लिए भाभी अकेले मिल जाए.. मैं और भाभी.. एक कमरे में बंद.. आहाहाहा..

शीला: "मदन, तू यहीं बैठ इन सब के साथ.. मैं और पीयूष सामने मार्केट से कुछ फ्रूट्स लेकर आते है.. तब तक तू रबड़ी का मज़ा लें और रसिक भैया से बातें कर.. तब तक हम लौट आएंगे.. " शीला ने जैसे पीयूष के मनोभावों को पढ़ लिया था..

रूखी: "हाँ हाँ भाभी.. आप हो आइए.. तब तक मैं साहब को रबड़ी खिलाती हूँ"

शीला और पीयूष दोनों बाहर निकले.. रोड की दूसरी तरफ काफी रेहड़ियाँ खड़ी थी फ्रूट्स की.. पर बीच में डिवाइडर पर रैलिंग लगी हुई थी.. इसलिए आगे जाकर यू-टर्न लेकर जाना पड़े ऐसी स्थिति थी..

शीला: "पीयूष, तू गाड़ी निकाल.. हम उस तरफ जाकर आते है"

पीयूष तुरंत गाड़ी लेकर आया.. और शीला बैठ गई.. ट्राफिक कुछ ज्यादा नहीं था.. और काफी अंधेरा था.. कुछ जगह स्ट्रीट-लाइट बंद थी इसलिए वहाँ काफी अंधेरा लग रहा था.. उस अंधेरी जगह से जब गाड़ी गुजर रही थी तब शीला ने पीयूष का हाथ गियर से हटाते हुए अपने दायें स्तन पर रख दिया और अपना हाथ उसके लंड पर.. और बोली "ये गियर तो ठीक से काम कर रहा है ना.. !!"


df

पीयूष एक पल के लिए सकपका गया और शीला की तरफ देखता ही रहा

शीला: "उस दिन मूवी देखकर लौटें और तू चाबी देने आया था.. उसके बाद तो तू जैसे खो ही गया.. पहले तो रोज छत से मेरे बबलों को तांकता रहता था.. अब तो वो भी बंद कर दिया"

पीयूष बेचारा हतप्रभ हो गया.. शीला भाभी के इस आक्रामक हमले को देखकर.. सिर्फ पाँच मिनट जितना ही वक्त था दोनों के पास.. उसमे भी शीला भाभी ने पंचवर्षीय योजना जितना निवेश कर दिया.. लंड पर भाभी का हाथ फिरते ही उनके स्तनों पर पीयूष की पकड़ दोगुनी हो गई..

"भाभी, आप को तो रोज सपने में चोदता हूँ.. आपका खयाल आते ही मेरा उस्ताद टाइट हो जाता है.. आप तो जीती-जागती वायग्रा की गोली हो.. पर पहले आप अकेली थी.. अब तो मदन भैया और वैशाली दोनों है.. इसलिए मैं क्या करूँ?? मन तो बहोत करता है मेरा.. !!"

शीला: "अरे पागल.. मौका ढूँढना पड़ता है.. वो ऐसे तेरी गोद में पके हुए फल की तरह नहीं आ टपकेगा.. देख.. मैंने कैसे अभी मौका बना लिया.. !! मदन को रूखी की छाती से लटकाकर.. !! हा हा हा हा.. !!"

"भाभी.. ब्लाउस से एक तो बाहर निकालो... तो थोड़ा चूस लूँ.. अब तो रहा नहीं जाता" स्तनों को मजबूती से मसलते हुए पीयूष ने कहा

"आह्ह.. ये ले.. जल्दी करना.. कोई देख न ले.. " शीला ने अपनी एक कटोरी से स्तन को बाहर खींच निकाला.. पीयूष ने तुरंत गाड़ी को साइड में रोक लिया.. अंधेरे में हजार वॉल्ट के बल्ब की तरह शीला की चुची जगमगाने लगी.. पीयूष ने झुककर शीला की निप्पल को मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया.. चटकारे लेते हुए.. और कहा "भाभी.. इसे खुला ही छोड़ दो.. जब तक हम वापिस न लौटें.. तब तक मैं इसे देखते रहना चाहता हूँ.. कितना मस्त है यार.. !!"


fondsuck

शीला: "आह्ह पीयूष.. मदन के आने के बाद अपने बीच सब कुछ बंद हो गया.. मुझे भी सारी पुरानी बातें बड़ी याद आती है.. तू कुछ सेटिंग कर तो हम दोनों बाहर कहीं मिलें.. !!"

पीयूष: "वो तो बहोत मुश्किल है भाभी.. पर फिर भी मैं कुछ कोशिश करता हूँ"

शीला का एक स्तन बाहर ही लटक रहा था जिसे उसने अपने पल्लू से ढँक दिया था..इस तरह की साइड से पीयूष उसे देख सकें.. पीयूष अब बड़े ही आराम से और धीमी गति से गाड़ी चला रहा था.. थोड़े थोड़े अंतराल पर वो भाभी के इस अर्ध-आवृत गोलाई को नजर भर कर देख लेता और खुद ही अपने लंड को भी मसल लेता..

लंबा राउन्ड लगाकर उसने यू-टर्न लिया और कार के सेब वाले की रेहड़ी के पास रोक दी.. शीला ने अपनी खुली हुई चुची को ब्लाउस के अंदर डाल दिया.. ब्लाउस के हुक बंद किए और उतरकर दो किलो सेब खरीदें.. वो वापिस गाड़ी में बैठ गई.. जिस लंबे रास्ते आए थे उसी रास्ते पर पीयूष ने गाड़ी को फिर से मोड लिया.. और उस दौरान.. शीला ने जिद करके पीयूष का लंड बाहर निकलवाया और ड्राइव करते पीयूष का लंड झुककर चूस भी लिया.. रसिक का घर नजदीक आते ही शीला ठीक से बैठ गई.. गाड़ी पार्क करते ही पीयूष ने पहले तो अपना लंड पेंट के अंदर डालकर चैन बंद कर ली और फिर हॉर्न बजाकर मदन को बाहर बुलाया..

मदन बाहर आता उससे पहले शीला आगे की सीट से उठकर पीछे बैठ गई.. ताकि मदन को किसी भी तरह का कोई शक होने की गुंजाइश न रहे

मदन बाहर आया और पीयूष के बगल की सीट पर बैठते हुए बोला "वाह.. मज़ा आ गया.. कितने सालों के बाद रबड़ी का स्वाद मिला.. वहाँ अमेरिका में भी पेक-टीन में रबड़ी मिलती थी.. पर स्वाद बिल्कुल भी नहीं.. आज तो दिल खुश हो गया मेरा शीला.. "

शीला: "टीन की रबड़ी क्यों खाता था तू?? वो मेरी बनाकर नहीं खिलाती थी तुझे रबड़ी??"

पीयूष: "ये मेरी कौन है मदन भैया??" स्वाभाविक होकर पूछे सवाल के बाद अचानक पीयूष को उस रात मदन के लैपटॉप में देखे हुए वीडियोज़ याद आ गये..

मदन: "अरे कोई नहीं है यार.. ये तेरी भाभी फालतू में मुझ पर शक करती है.. दरअसल जहां मैं पेइंग गेस्ट बनकर रहता था उसकी मालकिन थी वो.. हम दोनों अच्छे दोस्त थे.. इसलिए शीला मुझे ताने मारती रहती है.. "

शीला: "हाँ पीयूष.. मदन और मेरी के बीच तो रबड़ी खिलाने वाले संबंध नहीं थे.. वैसे मेरा ये मानना है की एक जवान पुरुष और औरत कभी सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते.. वो या तो प्रेमी हो सकते है या अपरिचित.. जवान जोड़ों के बीच अगर कोई सामाजिक संबंध न हो तो सिर्फ एक ही संबंध होने की संभावना होती है.. !!"

मदन: "यार तू पागलों जैसी बात मत कर.. अब पहले जैसा नहीं है.. मर्द और औरत सिर्फ दोस्त भी तो हो सकते है.. अरे विदेश में तो कपल्स बिना शादी किए मैत्री-समझौता कर साथ में खुशी खुशी रहते भी है और सेट ना हो तो अलग भी बड़े आराम से हो जाते है.. "

शीला: "तो तुझे क्या लगता है.. उस दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध नहीं बनते होंगे??"

शीला: "अरे भाभी.. मैत्री-समझौते में तो सब कुछ होता है.. सेक्स भी"

शीला: "अच्छा.. !! मतलब दोस्ती यारी में सेक्स की इजाजत भी होती है.. !! दो लोग अपनी सहमति से सेक्स करें उसे आप लोग मैत्री का नाम देते हो.. तो फिर उसमें और शादी में क्या अंतर?"

मदन: "तू समझ ही नहीं रही.. अब तुझे कैसे समझाऊँ.. !!"

शीला: "कुछ समझना नहीं है मुझे.. सब समझ आता है मुझे.. मैंने भी ये बाल धूप में सफेद नहीं किए है.. "

पति पत्नी की इस नोंक-झोंक को सुनते हुए पीयूष गाड़ी चला रहा था.. वैसे शीला की बात से वो सहमत था.. दुनिया को उल्लू बनाने के लिए स्त्री और पुरुष उनके गुलछर्रों को मित्रता का नाम दे देते है.. !!

मज़ाक-मस्ती और हल्की-फुलकी बातें करते हुए तीनों घर पहुँच गए..

उस रात.. खरीदी हुई ब्रा ट्राय करते वक्त वैशाली ने पीयूष को बहोत याद किया.. काफी सारे हॉट मेसेज भेजें चैट पर.. सुबह जल्दी उठना था इसलिए दोनों ने एक दूसरे को गुड नाइट विश किया और सो गए..
 
Back
Top