"पिंटू यहाँ पहुंचे तब मुझे फोन कर देना.. और मैं जब कहूँ तभी तू आना.. ठीक है!!"
"ओके भाभी.. पर भाभी.. मुझे डर लग रहा है.. ऐसे ससुराल में अपने प्रेमी को मिलने बुलाना.. कितना रिस्की है!!" कविता थोड़ी सी सहमी हुई थी
"अरे तू फिकर मत कर.. मजे करने हो.. प्रेमी से चुदवाना हो तो थोड़ा जोखिम तो उठाना ही पड़ेगा.." कहते हुए शीला अपने घर की ओर निकल गई
पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था.. अभी भी देसी दारू की बदबू आ रही थी.. शीला ने तुरंत ही अगरबत्ती जलाई.. जन्नत-ए-फ़िरदौस का इत्र छिड़का.. पूरा कमरा सुगंधित हो गया..
किचन में जीवा और रघु के कारनामों की निशानी हर जगह दिख रही थी.. शीला ने सफाई करके सब ठीक-ठाक कर दिया.. मेहमानों के लिए नाश्ता भी तैयार कर दिया.. और सब कुछ फिर से चेक कर लिया.. कल रात की कोई निशानी कहीं छूट न गई हो!!
अब तक कविता का फोन क्यों नही आया? शीला सोच रही थी.. काफी देर लगा दी पिंटू ने आने में.. पता नही वो चूतिया कहाँ गांड मरवा रहा होगा? ऐसा मौका जब हाथ लगने वाला हो तब कौन बेवकूफ देर करता है!! लोग कब समय का महत्व समझेंगे!! शीला मन ही मन पिंटू को गालियां दे रही थी..
तभी फोन बजा.. कविता का ही फोन था..
"भाभी, पिंटू आ गया.. में उसे सीधे आपके घर ही भेज रही हूँ" कविता की आवाज में घबराहट थी
"तू चिंता मत कर.. भेज दे उसे.. मैं हूँ ना.. कुछ नही होगा" शीला ने ढाढ़स बांधते हुए कविता से कहा
थोड़ी ही देर में.. एक अठारह उन्नीस साल का.. हल्की हल्की मुछ वाला जवान लड़का, शीला के घर की डोरबेल बजाकर खड़ा रहा.. शीला ने अपने बड़े बोबलों को साड़ी से ठीक से ढंका और दरवाजा खोला.. उसे डर था की कहीं पिंटू ने उसकी शॉपिंग मॉल जैसी उन्नत चूचियाँ देख ली तो कविता के छोटे स्तन उसे रास्ते की रेहड़ी जैसे लगेंगे..
"आ जाओ.. तुम ही हो ना पिंटू?" जानते हुए भी अनजान बन रही थी शीला
"जी हाँ.. मैं ही हूँ पिंटू" शरमाते हुए उस लड़के ने कहा.. वह अंदर आकर सोफ़े के कोने पर बैठ गया
शीला उसके लिए पानी लेकर आई.. थोड़ा सा पानी पीकर उसने ग्लास वापिस दिया.. शरारती शीला ने ग्लास लेटे वक्त पिंटू का हाथ पकड़कर दबा दिया..
"इतना शरमा क्यों रहा है? जरा आराम से बैठ.. मैंने बिस्तर भी सजा दिया है.. तुम दोनों के लिए" अनुभवी रंडी की अदा से साड़ी के पल्लू को छाती में दबाते हुए शीला ने कहा.. सफेद रंग के ब्लाउस के अंदर उसने ब्रा नही पहनी थी.. अरवल्ली की पर्वत शृंखला के दो पहाड़ों जैसे स्तनों को पिंटू हतप्रभ होकर देखता ही रह गया.. उसका गला सूखने लगा
"तू आराम से बैठ.. अपना ही घर समझ इसे.. " कातिल मुस्कान के साथ, भारी कूल्हे मटकाती हुई शीला किचन की ओर चली गई। उसके नितंबों की लचक देखकर पिंटू के होश उड़ गए
किचन में ग्लास रखकर शीला वापिस आई और सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई.. उसने अपने हाथों को इस तरह जोड़ रखा था की उसके दोनों स्तन उभरकर बाहर झांक रहे थे..
"आज से पहले तूने कभी ये किया है पिंटू?" शीला ने पूछा
गर्दन घुमाकर पिंटू ने "नही" का इशारा किया
तभी कविता आ गई.. शीला को बात अधूरी छोड़नी पड़ी यह उसे अच्छा नही लगा.. कविता अगर थोड़ी देर से आती तो वह इस शर्मीले लड़के के साथ कुछ गरमागरम बातें कर पाती
कविता और पिंटू को एकांत देने के हेतु से शीला घर के बाहर निकल गई। दूध या सब्जी कुछ लेना तो था नही.. सिर्फ कुछ लेने के बहाने वह घर से बाहर निकल गई.. अब क्या करूँ?? कहाँ जाऊँ? कैसे टाइम पास करूँ?? शीला सोच रही थी... तभी उसके करीब से कोई गुजरा और शीला की कमर पर चिमटी काटते हुए कहा
"किसके खयालों में यहाँ रास्ते के बीच खड़ी हुई है!! मदन भैया के बारे में ज्यादा मत सोच.. वो तो विदेश में किसी गोरी के साथ मजे कर रहे होंगे"
शीला ने चोंककर पीछे देखा.. वह चेतना थी.. उसकी पुरानी पड़ोसन
"अरे चेतना तू ?? कितने साल हो गए तुझे देखे हुए.. कितनी मोटी हो गई है तू.. लगता है तेरा पति बड़ा अच्छे से रोज इंजेक्शन दे रहा है"
चेतन ने हँसते हुए कहा "हाँ.. इंजेक्शन का ही कमाल है ... पर तू बिना इंजेक्शन की इतनी खुश कैसे लग रही है!! कहीं किसी पराये इंजेक्शन का सहारा तो नही ले रही हो ना!! कमीनी हरामखोर.. मैं सालों से जानती हूँ तुझे.. तू इतने लंबे समय तक बिना कुछ किए रह ही नही सकती.. सच सच बता मुझे"
चेतना और शीला पुरानी सहेलियाँ थी.. दोनों बहुत अच्छी मित्रता थी.. उन दोनों के पति भी दोस्त थे.. शीला और चेतन एक दूसरे के साथ बीपी की सी.डी. की लेन-देन भी चलती रहती थी.. और जब दोनों के पति ऑफिस जाते थे तब दोनों एक दूसरे के साथ खूब मस्ती भी किया करती थी। कुछ समय बाद चेतना और उसका पति, नए घर में शिफ्ट हो गए.. फिर मिलना बहुत काम हो गया.. आज काफी सालों के बाद दोनों मिलकर खुश हो गए
चेतना: "अब मुझे यहीं बीच रास्ते खड़ा ही रखेगी या घर ले जाकर चाय भी पिलाएगी!!"
शीला अब फंस गई.. घर में तो कविता और पिंटू.. ना जाने क्या कर रहे होंगे.. पर शीला और चेतना के संबंध काफी घनिष्ठ थे.. शीला उसे कोने में ले गई और कहा
"यार चेतना.. अभी मेरे घर नहीं जा सकते"
चेतना: "क्यों? कीसे घुसाकर रखा है घर पर?"
शीला ने हँसते हँसते कहा "घुसाकर तो रखा है.. पर मेरे लिए नही.. मेरे पड़ोस में एक नवविवाहित लड़की रहती है.. कविता.. उसका प्रेमी उसे मिलने आया है.. वो दोनों बैठकर बातें कर रहे है मेरे घर पर"
चेतना: "साली बहनचोद.. तू अब दल्ली भी बन गई?"
शीला: "नही यार.. अब हालात ही ऐसे थे की मुझे मदद करनी पड़ी"
चेतना: "हम्म.. तब तो जरूर तेरा कोई राज जान लिया होगा उस लड़की ने.. सच सच बता !!"
शीला: "तू थोड़ा इत्मीनान रख.. सब बताती हूँ तुझे"
शीला ने शुरुआत से लेकर अंत तक.. रूखी, जीवा, रघु औ रसिक की सारी कहानी चेतना को विस्तारपूर्वक बताई..
बातें करते करते अचानक शीला की नजर उनकी गली के नाके पर गई.. और उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई
"बाप रे.. ये लोग अभी कहाँ से टपक पड़े??!!" सामने से कविता का पति पीयूष और उसके सास ससुर आते दिखाई दिए..
"मुझे अभी के अभी उस कविता को खबर करनी पड़ेगी..वरना लोड़े लग जाएंगे.. चेतना, तू घर चल.. फिर आराम से बाकी की बातें करते है.. "
दोनों सहेलियाँ दौड़कर शीला के घर पहुंची.. अपनी चाबी से लेच-लोक खोलकर शीला ने दरवाजा खोल दिया..
इन दोनों को देखकर, कविता और पीयूष चोंक पड़े.. कविता नंग-धड़ंग पिंटू की गोद में बैठकर ऊपर नीचे करते हुए सोफ़े पर ही चुदवा रही थी। पिंटू की पतलून घुटनों तक उतरी हुई थी.. और कविता के ब्लाउस से उसके सफेद कबूतर जैसे गोरे स्तन बाहर निकले हुए थे।
कविता को शीला भाभी के सामने नग्न होने में कोई शर्म नही थी.. पर पिंटू की हालत खराब हो गई.. वह बिचारा दो अनजान औरतों के सामने नंगे चुदाई करते हुए देख लिया गया था। एक ही पल में उसका लंड मुरझाकर पिचक गया..
शीला ने कविता की तरफ देखकर कहा "तेरे सास ससुर और पीयूष घर पहुँच रहे है.. तू भाग यहाँ से.. जल्दी घर जा"
"अरे बाप रे!! इतनी देर में वापिस भी आ गए!!" कविता ने अपने कपड़े ठीक किए और पीछे के रास्ते बाहर भागी.. पिंटू उल्टा घूम गया और अपनी पतलून पहनने लगा..
शर्मसार होते हुए पिंटू ने कहा "सॉरी भाभी.. आप लोग ऐसे अचानक आ जाएंगे इसका मुझे अंदाजा नही था"
"हम नही.. वो लोग अचानक आ टपके.. इसमें कोई क्या कर सकता है?? कोई बात नही.. तू आराम से बैठ और ये बता.. मज़ा आया की नही?"
"अरे भाभी.. क्या कहूँ आप से!! मेरे लिए तो ये पहली बार था.. और कविता मुझे कुछ सिखाती ही नहीं की कैसे करना है..!! मैं कुंवारा हूँ.. पर वो तो शादीशुदा है ना!! उसे तो मुझे सिखाना चाहिए ना!!"
शीला: "मतलब? तुम लोगों ने ज्यादा कुछ नही किया??"
चेतना: "शीला, बेचारा नादान है.. अभी तो.. उसका छोटा सा है.. नून्नी जैसा.." अपनी उंगली से पिंटू के लंड की साइज़ का इशारा करते हुए चेतन ने कहा
शीला: "तूने देख भी लिया इतनी देर में? मैं ही देख नही पाई.. पिंटू.. तू चिंता मत कर.. मैं तुझे सब सीखा दूँगी.. बता.. सीखेगा मुझसे??"
चेतना: "मैं भी मदद करूंगी सिखाने में.. "
चेतना के स्तन देखकर पिंटू ललचा गया..
शीला: "देख पिंटू.. कविता तुझसे चुदवाने आई.. तो क्या वह अपने पति को बता कर आई थी क्या!! नहीं ना!! बस वैसे ही तू भी कविता को मत बताना.. की तू हमसे सिख रहा है"
पिंटू के चेहरे पर अब भी झिझक थी..
चेतना: "अबे चूतिये.. इतनी दूर से आया है.. और बिना चोदे वापिस लौट जाएगा?? ना तुझे चोदना आता है.. और ना ही तेरी छोटी सी पूपली में कोई दम.. बेटा.. इतनी छोटी नून्नी से किसी लड़की को कैसे खुश कर पाएगा!!"
पिंटू शर्म से लाल लाल हो गया.. उस बेचारे नादान लड़के को ऐसी अभद्र भाषा सुनकर बुरा लग गया.. आँख से आँसू टपकने लगे..
शीला: "चेतना बेवकूफ.. तुझे बात करने का तरीका नही आता क्या!! पिंटू का लंड छोटा है तो क्या हुआ??"
शीला पिंटू के पास आकर बैठ गई.. उसकी जांघ पर हाथ फेरते हुए उसने पिंटू का हाथ अपने गुंबज जैसे स्तनों पर रख दिया और बोली
"चिंता मत कर पिंटू.. चेतना तो पागल है.. देख.. छोटी उम्र में सब के अंग छोटे छोटे ही होते है.. तू कविता के स्तन के मुकाबले मेरे स्तन देख.. कितना फरक है!! ये तो होता ही है.. इसमे चिंता करने लायक कोई बात नही है"
सुनकर पिंटू को थोड़ा अच्छा लगा.. उसने शीला की छातियों से अपना हाथ हटा लिया..
"भाभी, मैं आपसे ये सब सीखूँगा तो कविता बुरा मान जाएगी.. "
पिंटू की दूसरी तरफ चेतना आकर बैठ गई.. और शीला का अनुकरण करते हुए वह भी पिंटू की दूसरी जांघ को सहलाने लगी.. धीरे से उसने अपने ब्लाउस की एक तरफ की कटोरी खोल दी.. पिंटू बेचारा हक्का बक्का रह गया.. !!
शीला: "अरे पिंटू, तुझे कहाँ कुछ गलत करना है.. तुझे तो बस सीखना है.. है ना!! और तू यहाँ कविता की लेने आया है.. तो क्या ये कविता के पति को पसंद आएगा!! नहीं ना!!"
पिंटू: "पर भाभी, कविता के पति को ये कहाँ पता चलने वाला है??"
शीला: "वही तो कह रही हूँ.. तू हम दोनों के पास ट्यूशन ले रहा है.. ये बात कविता को कहाँ पता चलने वाली है!! देख बेटा.. हर कोई ऐसे ही सीखता है.. अगर तुझे भी सीखना हो तो बताया.. हमारी कोई जबरदस्ती नहीं है तुझ पर.."
शीला और पिंटू के बीच इस संवाद के दौरान चेतना ने अपने ब्लाउस के दो हुक खोल दिए.. और अपने स्तनों को बाहर निकाल दिया.. पिंटू तो चेतना के बड़ी निप्पलों वाले स्तन देखकर उत्तेजित हो गया.. और उसके अंदर का किशोर विद्यार्थी जाग उठा..उसकी छोटी सी नुन्नी में जान आने लगी।
चेतना ने पिंटू के लंड पर हाथ सहलाते हुए शीला से कहा "ये तो मस्त हो गया शीला.. देख तो जरा.. पतला है तो क्या हुआ!!"
शीला ने भी पिंटू का लंड हाथ में लेकर दबाकर देखा
"आह आहह भाभी.." कहते हुए पिंटू चेतना के नग्न स्तनों को पकड़कर मसलने लगा.. शीला ने पिंटू की आधी उतरी पतलून को पूरी उतार दी.. और पिंटू का लंड पकड़कर हिलाने लगी.. पिंटू सिसकियाँ भरता गया और चेतना के स्तनों को दबाता गया.. शीला ने भी अपने ब्लाउस के बटन खोल दिए और अपनी गुलाबी निप्पल को पिंटू के मुंह में देते हुए कहा
"थोड़ा चूस ले बेटा.. तो चोदने की ताकत आ जाएगी"
पिंटू छोटे बच्चे की तरह शीला की निप्पल चूसने लगा.. "बच बच" की आवाज करते हुए कभी वह शीला की निप्पल चूसता तो कभी चेतना की.. चेतना ने अपनी निप्पल छुड़वाई.. और उसका लंड चूसना शुरू कर दिया
शीला: "अबे चूतिये.. तुझे चोदना तो नहीं आता.. लेकिन चूसना भी नहीं आता क्या!! चूसते हुए ऐसे काट रहा है जैसे पपीता खा रहा हो.. ठीक से चूस"
पिंटू बेचारा.. नादान था.. ज्यादा देर अखाड़े में इन दोनों पहलवानों के सामने टीक पाने की उसकी हैसियत नहीं थी.. चेतना के मुंह में ही उसका लंड वीर्य-स्त्राव कर बैठा.. चेतना बड़ी मस्ती से.. अनुभवी रांड की तरह.. पिंटू के लंड को चाट चाट कर साफ करने लगी। पिंटू तो शीला के मदमस्त खरबूजे जैसे स्तनों में खो सा गया था.. कविता के छोटे छोटे कबूतर जैसे स्तनों के मुकाबले शीला के उभारों ने उसका दिल जीत लिया था।
चेतना: "छोकरा नादान है.. पर तैयार हो जाएगा.. थोड़ा सा ट्रेन करना पड़ेगा"
शीला: "कितना माल निकला उसके लंड से?"
चेतना: "एक चम्मच जितना.. पर मेरे पति के वीर्य के मुकाबले स्वाद में बड़ा ही रसीला था" अपनी उँगलियाँ चाटते हुए चेतना ने कहा
शीला: "हम्म.. बच्चा बोर्नवीटा पीता होगा तभी उसका माल इतना स्वादिष्ट है!!" कहते हुए शीला हंस दी.. "लंड पतला जरूर है.. पर है मजबूत.. अंबुजा सीमेंट जैसा.. देख देख.. झड़ने के बाद भी पूरी तरह से नरम भी नहीं हुआ"
चेतन ने झुककर पिंटू के अर्ध जागृत लंड की पप्पी ले ली..
"अरे पिंटू, तूने कविता की चुत चाटी है कभी?" अपना घाघरा उतारते हुए शीला ने पिंटू से पूछा.. शीला की गोरी गोरी मदमस्त जांघों को देखकर पिंटू का लंड उछलने लगा..
पिंटू: "एकाध बार किस किया है.. पर अंदर से चाटकर नहीं देखा कभी"
शीला: "देख पिंटू, अगर औरत को खुश करना है तो सब से पहला पाठ यह सिख ले.. चुत को चौड़ी करके अंदर तक जीभ डालते हुए चाटना सीखना पड़ेगा.. "
पिंटू बड़े ही अहोभाव से इन दोनों मादरजात नंगी स्त्रीओं को देखता रहा.. जैसे स्कूल के मैडम से अभ्यास की बातें सिख रहा हो.. शीला और चेतना पिंटू को प्रेम, कामवासना, चुदाई, मुख मैथुन वगैरह के पाठ पढ़ाने लगे.. तीनों एक दूसरे के सामने पूरी तरह नंगी अवस्था में थे.. उत्तेजित होकर शीला और चेतना, पिंटू के जिस्म को जगह जगह पर चूमते हुए उसके शरीर से खेलने लगे। पिंटू का लंड अब सख्त होकर झूलने लगा..
शीला: "देख ले ठीक से पिंटू.. इस तरह चुत को चाटते है" कहते हुए शीला ने चेतना को लिटा दिया और उसकी चुत पर अपनी जीभ फेरने लगी
चेतना: "ओह्ह शीला.. बहोत मज़ा आ रहा है यार.. "
चेतना की निप्पल उत्तेजना के मारे सख्त कंकर जैसी हो गई थी। पिंटू एकटक शीला और चेतना की इन हरकतों को देख रहा था।
चेतना: "ठीक से देख ले पिंटू.. आह्ह.. बिल्कुल इसी तरह कविता की पुच्ची को चाटना.. नहीं तो तेरी कविता किसी और से सेटिंग करके अपनी चटवा लेगी"
काफी देर तक शीला ने चेतना के भोसड़े के हर हिस्से को चाटा.. अब उसने एक साथ चार उँगलियाँ अंदर घुसेड़ दी और चाटती रही
चेतना ने थोड़े गुस्से से कहा "बहनचोद.. क्या देख रहा है!! कम से कम मेरी चूचियाँ तो मसल दे.. ऐसे ही निठल्ले की तरह बैठा रहेगा तो कुछ नहीं होगा तेरा.. !!"
सुनते ही पिंटू ने तुरंत चेतना के स्तनों को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया.. शीला की चुत चटाई से आनंदित होते हुए.. अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर चेतना झड गई.. पिंटू सब कुछ बड़े ही ध्यान से देख रहा था।
चेतना की चुत से मुंह हटाते हुए शीला ने कहा "देखा पिंटू!! लंड छोटा हो या बड़ा.. पतला हो या मोटा.. कुछ फरक नहीं पड़ता.. अगर अच्छे से चुत चाटने की कला सिख ली..तो अपनी पत्नी या गर्लफ्रेंड को खुश रख पाएगा"
पिंटू: "पर भाभी.. लड़की को असली मज़ा तो तब ही आता है ना अगर लंड लंबा और मोटा हो!!" बड़ी ही निर्दोषता से पिंटू ने पूछा
चेतना: "बात तो तेरी सही है बेटा.. मुझे यह बता.. की तुझे ५ रुपये वाली कुल्फी पसंद है या १० रुपये वाली?"
पिंटू: "जाहीर सी बात है.. १० रुपये वाली"
शीला: "बिल्कुल वैसे ही.. हम औरतों को भी १० रुपये वाली कुल्फी ज्यादा पसंद है.. पर उसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है की हमें ५ रुपये वाली कुल्फी से मज़ा नहीं आता.. कुल्फी छोटी हो तो उसे धीरे धीरे चूसकर मज़ा लेना भी आता है.. और कई बिनअनुभवी औरतों को १० रुपये वाली कुल्फी भी ठीक से खाना नहीं आता.. पिघलाकर नीचे गिरा देती है"
पिंटू: "पर भाभी.. अगर मुझे अपना लंड मोटा और तगड़ा बनाना हो तो क्या करू?"
इतना समझाने के बावजूद पिंटू घूम फिर कर वहीं आ गया.. शीला ने अपना सिर पीट लिया..
शीला: "अबे लोडुचंद.. जैसे जैसे तू बड़ा होगा वैसे वैसे तेरा वो भी बड़ा हो जाएगा.. चिंता मत कर.. देख.. अब जिस तरह मैंने चेतना की चुत चाटी थी वैसे ही तू मेरी चाटकर दिखा.. देखूँ तो सही तूने कितना सिख लिया.. समज ले की यह तेरी परीक्षा है.. अगर ठीक से नहीं चाटी तो मैं कविता को सबकुछ बताया दूँगी"
कविता का नाम सुनते ही पिंटू भड़क गया.. और शीला की जांघें चौड़ी करके बीच में बैठ गया.. शीला का फैला हुआ भोसड़ा देखकर पिंटू सोच रहा था.. कहाँ मेरी कविता की मोगरे के फूल जैसी नाजुक चुत.. और कहाँ ये धतूरे के फूल जैसा शीला भाभी का भोसड़ा !!
शीला: "यही सोच रहा है ना की कविता के मुकाबले कितनी बड़ी है मेरी!! जब मैं कविता की उम्र की थी तब मेरी भी कविता की तरह मस्त संकरी सी थी.. पर मेरे पति ने ठोक ठोक कर ऐसे रानीबाई की बावरी जैसा बना दिया.. वो तो कविता की चुत भी उसका पति चोद चोद कर चौड़ी कर ही देगा.. तू चाटना शुरू कर.. जल्दी कर बहनचोद.. इतना गुस्सा आ रहा है की तेरी गांड पर एक लात मारकर तुझे गली के नुक्कड़ पर फेंक दूँ.. " कहते हुए शीला ने अपने गुफा जैसे भोसड़े पर पिंटू को मुंह दबा दिया..
पिंटू भी शीला को खुश करने के इरादे से.. चुत चटाई की नेट-प्रेक्टिस करते हुए.. चब चब चाटने लगा.. शीला के तानों ने अपना काम कर दिया.. पिंटू कोई कसर छोड़ना नहीं चाहता था.. अपनी जीभ को अंदर तक घुसेड़कर उसने शीला के भोसड़े को धन्य कर दिया.. कराहते हुए शीला अपनी गदराई जांघों को आपस में घिसने लगी..
बगल में बैठी चेतना अपने स्तनों को शीला के बबलों से रगड़ने लगी.. और शीला ने उसे खींचकर अपने होंठ चेतना के होंठों पर रखते हुए चूम लिया..
शीला ने अपनी दोनों विशाल जांघों के बीच पिंटू को दबोच लिया.. अपना स्खलन हासिल करने के बाद ही उसने पिंटू को जांघों की मजबूत पकड़ से मुक्त किया.. शीला की पकड़ से छूटते ही पिंटू दूर खड़ा होकर हांफने लगा.. बाप रे!! ये तो औरत है या फांसी का फंदा.. जान निकल जाती अभी.. पिंटू कोने में जाकर बैठ गया..
उसे बैठा हुआ देखकर चेतना उसके पास आई.. और उसे कंधे से पकड़कर खड़ा किया
चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"
चेतना: "बेटा.. डरने की जरूरत नहीं है.. देख कितनी मस्त गीली हो गई है शीला की चुत!! जा.. उसके छेद में अपना लंड पेल दे.. और धीरे धीरे अंदर बाहर करना शुरू कर.. और सुन.. पूरा जोर लगाना.. ठीक है.. तुझे बस ऐसा सोचना है की ट्यूशन पहुँचने में देर हो गई है और तू तेज गति से साइकिल के पेडल लगा रहा है.. जा जल्दी कर"
चेतना की बात सुनकर पिंटू खड़ा हुआ.. और शीला के दो पैरों के बीच सटकर.. लंड घुसाते हुए अंदर बाहर करने लगा.. शीला को पिंटू के चोदने से कोई फरक नहीं पड़ा.. उसकी चुत में अब तक काफी लोग निवेश कर चुके थे.. और ये तो अग्रीमन्ट भी घबराते हुए कर रहा था.. बिना हिले डुले लाश की तरह पड़ी रही शीला.. और पिंटू उस पर कूदता रहा.. जैसे बिना हवा के पतंग उड़ाने का प्रयत्न कर रहा हो!!
दो तीन मिनट तक ऐसे ही बेजान धक्के लगाकर.. वह बेचारा छोकरा थक गया.. चेतन कमरे के कोने में नंगी बैठी हुई चुत में उंगली कर रही थी.. शीला बिस्तर पर नंगी पड़ी थी.. और नंगा पिंटू झड़कर शीला के जिस्म के ऊपर गिरा हुआ था.. तीनों स्खलित होकर तंद्रावस्था में पहुँच गए थे..
तीनों नंगे थे.. तेजी से कपड़े पहनने लगे.. शीला ने भागकर दरवाजा खोल दिया.. दरवाजे पर अनुमौसी थी.. कविता की सास..
अनुमौसी: "इतनी देर क्यों लगा दी दरवाजा खोलने में?" शक की निगाह से देखते हुए वह बोली
शीला: "अरे मौसी.. मेरी सहेली आई है.. हम दोनों बातों में ऐसी उलझ गई थी की डोरबेल की आवाज ही नहीं सुनी मैंने.. आइए ना अंदर"
अनुमौसी अंदर आ गई.. "दूध फट गया था.. थोड़ा सा मिलेगा तेरे पास?"
शीला ने फ्रिज से पतीली निकाली और अनुमौसी को दूध दिया.. अनुमौसी से उनके बीमार भाई की तबीयत के बारे में भी पूछा.. थोड़ी देर यहाँ वहाँ की बातें करने के बाद अनुमौसी निकल गई.. पर सोफ़े पर कुशन के पीछे पड़ी हुई गीली पेन्टी.. उनकी नज़रों से बच ना सकी.. वह कुछ बोली नहीं.. और चुपचाप वहाँ से चली गई..
पिछले ६० सालों में मौसी ने भी की खेल खेले थे.. वह इतनी नादान तो थी नहीं की चुत के स्खलन की और पुरुष के वीर्य की गंध को पहचान ना सके.. शीला के घर में जरूर कुछ पक रहा था.. पर अनुभवी मौसी फिलहाल बिना कुछ कहे दूध लेकर चली गई.. डोरबेल बजते ही चेतना और पिंटू बाथरूम में छुप गए थे.. जब तक अनुमौसी शीला से बातें कर रही थी.. तब तक वह दोनों चुपचाप अंदर खड़े रहे..
चेतना ने इस मौके का फायदा उठाया.. पिंटू को बाहों में लेकर अपने स्तनों को उसकी छाती पर रगड़कर.. उस नादान लड़के को उत्तेजित कर दिया.. पिंटू भी चेतना की छातियाँ दबाते हुए उसके होंठ चूस रहा था.. चेतना ने पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड मसलना शुरू किया.. पिंटू भी चेतना के पेटीकोट में हाथ डालकर उसकी गरम चुत में उंगली अंदर बाहर करने लगा.. कामरस से गीली हो रखी चुत में बड़े ही आराम से उंगली जा रही थी।
शीला ने बाथरूम को दरवाजा खटखटाकर खोलने के लिए हरी झंडी दिखाई.. चेतना ने पिंटू को चूमते हुए दरवाजे की कुंडी खोल दी.. इन दोनों को लिपटे हुए देखकर शीला ने कहा
शीला: "क्या बात है!! तुम दोनों तो बाथरूम में ही शुरू हो गए!! बड़ी जल्दी सिख गया तू पिंटू.. औरत को खुश रखने का दूसरा नियम जान ले.. जहां और जब मौका मिले.. चोद देना.. "
चेतना: "देख शीला.. तूने अभी अभी चटवा ली है.. और झड भी चुकी है.. अब मुझे अपनी चटवाने दे.. फिर मैं घर के लिए निकलूँ.. मुझे देर हो रही है"
शीला: "अरे, पर मेरा अभी भी बाकी है.. उसका क्या?? तेरे घर तो तेरा पति भी है.. मेरे वाला तो चार महीने बाद आने वाला है"
चेतना: "वो सब मैं नहीं जानती.. पिंटू अब मेरी चुत चाटेगा.. बस.. !! बड़ी लालची है तू शीला.. एक बार पानी निकलवा लिया फिर भी तसल्ली नहीं हुई तुझे.."
पिंटू के छोटे से लंड के लिए दोनों झगड़ने लगी..
चेतना: "क्या बताऊँ तुझे शीला!! मेरे पति को डायाबीटीस है.. काफी समय हो गया.. वो बेचारे अब पहले की तरह.. नहीं कर पाते है"
शीला: "मतलब? उनका खड़ा नहीं होता क्या?"
चेतना: "बड़ी मुश्किल से खड़ा होता है.. वो भी काफी देर तक चूसने के बाद.. अब क्या करू मैं.. किससे कहूँ? रोज मुझे बाहों में भरकर चूम चूम कर गरम कर देते है.. पर उनका लोंडा साथ ही नहीं देता.. इसलिए करवट बदलकर सो जाते है बेचारे.. प्लीज.. अभी मुझे चटवा लेने दे" कहकर चेतना ने बाथरूम में ही अपना घाघरा ऊपर कर लिया.. और अपने एक पैर को कमोड पर रख दिया.. अपनी चुत खुजाते हुए उसने पिंटू को गिरहबान से पकड़कर खींचा और नीचे बैठा दिया.. पिंटू पालतू कुत्ते की तरह चेतना की बुर की फाँकें चाटने लगा.. शीला ने चेतना के बाहर लटक रहे पपीते जैसे स्तनों को मसलते हुए.. उसकी बादामी रंग की निप्पल को दांतों के बीच दबाते हुए काट लिया..
दर्द से कराह उठी चेतना.. फिर भी शीला और पिंटू ने अपना काम जारी रखा.. शीला अपने दूसरे हाथ से अपनी बुर खुजाने लगी.. पिंटू ने भी शीला की गुफा को सहला दिया.. "आह्ह.. शाबाश पिंटू मेरे लाल.. बिना कहे ही समझ गया तू मेरे बेटे.. सहला और सहला वहाँ.. आह्ह.. "
शीला भी अपनी चुत खुजाते हुए आनंद के महासागर में गोते खाने लगी.. और डूब गई.. शीला ने चेतना के होंठों पर कामुक चुंबन जड़ दिया.. चेतना भी वासना के सागर में अपनी पतवार चलाते हुए किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई.. पिंटू को अपनी दोनों जांघों के बीच दबोच कर.. शीला के चुचे दबाते हुए.. जोर से हांफने लगी.. पिंटू का पूरा मुंह.. चेतना के चिपचिपे चुत-रस से भर गया। उस छोटे लड़के ने अपने छोटे लंड के उपयोग के बिना ही चेतना को ठंडी कर दिया..
स्खलित हुई चेतना की सांसें बड़ी ही तेज चल रही थी.. उसकी हांफती हुई बड़ी बड़ी छाती.. और बिखरे हुए बाल.. बड़े ही सुंदर लग रहे थे। उसका काम निपट गया था.. उसने अपने कपड़े उठाए और बाथरूम के बाहर निकली तब शीला.. कोने में पड़ी कपड़े धोने की थप्पी का मोटा हेंडल तेजी से अपनी चुत में घुसेड़कर मूठ मार रही थी।
पिंटू बड़े ही आश्चर्य से शीला के भोसड़े में उस मोटे डंडे को अंदर बाहर होते हुए देखता रहा.. इतना मोटा डंडा भी बड़े आराम से अंदर ले रही शीला को देखकर पिंटू को अपने छोटे से औज़ार की मर्यादा का एहसास हुआ.. फिर भी बिना निराश हुए.. उसने शीला के हाथ से उस थप्पी को खींचकर बगल में रख दिया.. शीला को पलटा कर झुका दिया.. शीला कमोड पर हाथ टिकाते हुए झुक गई.. उसके नरम गोल बड़े बड़े उरोज बड़ी सुंदरता से लटक रहे थे.. जैसे खुद के स्तनों का ही भार लग रहा हो.. शीला ने अपने एक स्तन को हाथों में पकड़ लिया और फ्लश टँक पर हाथ टेक कर अपने चूतड़ उठाकर खड़ी हो गई।
अब पिंटू.. उकड़ूँ होकर नीचे बैठ गया.. शीला के भव्य कूल्हों को दोनों हाथों से अलग करते ही.. उसे शीला का गुलाबी रंग का गांड का छेद दिखने लगा.. शीला को खुश करने के लिए पिंटू के पास उस थप्पी के हेंडल जैसा मोटा हथियार तो नहीं था.. उसे अपने छोटे से मर्यादित कद के हथियार से ही युद्ध लड़ना था.. और जीतना भी था.. हालांकि.. इस युद्ध मैं पिंटू की दशा.. अमरीका के सामने बांग्लादेश जैसी थी..
बिना एक पल का विलंब किए.. पिंटू ने शीला की गांड के छेद को उत्तेजना से चूम लिया.. और अपनी जीभ की नोक उस छेद पर फेर दी.. फिर उसने थोड़ा सा नीचे जाकर.. शीला की लसलसित चुत की लकीर पर आक्रमण शुरू किया.. उस दौरान उसने शीला के दोनों चूतड़ों को फैलाकर पकड़ रखा था.. जैसे किसी मोटे ग्रंथ की किताब को खोलकर पढ़ रहा हो..
चुत की लकीर चौड़ी होते ही.. अंदर का लाल गुलाबी विश्व द्रश्यमान होने लगा.. देखते ही पिंटू की सांसें फूल गई.. पिंटू चुत पर जीभ फेरने लगा और शीला तड़पने लगी.. और वासना से बेबस हो गई.. उत्तेजना के कारण शीला के पैर कांप रहे थे.. और वह बड़ी हिंसक तरीके से अपने स्तन मसल रही थी.. निप्पल तो ऐसे खींच रही थी मानों उसे अपने स्तन से अलग कर देना चाहती हो..
तीन घंटे पहले.. शीला के घर आया ये नादान छोकरा.. अब किसी अनुभवी मर्द की अदा से शीला की रसभरी.. स्ट्रॉबेरी जैसी चुत को चाट रहा था। शीला के स्तन उत्तेजना के कारण कठोर हो गए थे.. और निप्पल सख्त होकर बेर जैसी हो गई थी.. पिंटू को इतना तो पता चल गया की उसकी छिपकली जैसी लोड़ी से शीला के किले को फतह कर पाना नामुमकिन सा था.. इसी लिए वो उसे चाट चाटकर शांत करने का प्रयास कर रहा था।
वो कहावत तो सुनी ही होगी "काम ही काम को सिखाता है" बस उसी तर्ज पर.. पिंटू के दिमाग में कुछ आया.. और उसने शीला की गांड में अपनी उंगली घुसा दी.. शीला को अपनी गांड में जबरदस्त खुजली हो रही थी.. बिना सिखाए की गई इस हरकत से शीला खुश हो गई.. और खुद ही अपनी गांड को आगे पीछे करते हुए पिंटू की उंगली को चोदने लगी..
"आह्ह.. ओह्ह.. ओह्ह.. चाट पिंटू.. अंदर तक जीभ डाल दे.. ऊईई..मर गई.. मज़ा आ रहा है.. उईई माँ.. तेज तेज डाल.. जीभ फेर जल्दी.. मैं झड़नेवाली हूँ.. आह्ह आह्ह आह्ह.. मैं गईईईईईई......!!!!!!!!" कहते ही शीला का शरीर ऐसे कांपने लगा जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो.. उसका पूरा शरीर खींचकर तन गया.. और दूसरे ही पल एकदम ढीला हो गया.. शीला वहीं फर्श पर ढेर होकर गिर गई.. पिंटू भी चाट चाट कर थक गया था.. शीला के अनुभवी भोसड़े को शांत करना मतलब.. शातिर गुनेहगार से अपने जुर्म का इकरार करवाने जितना कठिन काम था.. पर पिंटू की महेनत रंग लाई.. शीला और चेतना.. दोनों को मज़ा आया..
चेतना तो कपड़े पहनकर कब से ड्रॉइंगरूम में इन दोनों का इंतज़ार कर रही थी.. उसकी चुत मस्त ठंडी हो चुकी थी.. वह जानती थी की शीला तब तक बाहर नहीं निकलेगी जब तक की उसके भोसड़े को ठंडक नहीं मिल जाती!!
"पिंटू.. मेरे हुक बंद कर दे.. मुझे ओर भी काम है बेटा.. " कहते हुए शीला घूम गई.. पिंटू उनकी संगेमरमर जैसी पीठ को देखतय ही रह गया.. उस चिकनी पीठ पर हाथ फेरते हुए उसने ब्रा के दोनों छोर को पकड़कर खींचा ताकि हुक बंद कर सकें.. ब्रा के पट्टों को खींचकर करीब लाते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे रस्साकशी का खेल चल रहा हो!! पिंटू को हंसी आ गई.. आईने में पिंटू को देख रही शीला ने पूछा..
"क्यों रे छोकरे? हंस क्यों रहा है?"
"भाभी, मैं ये सोचकर हंस रहा था की इतनी छोटी सी ब्रा में इतने बड़े बड़े गोले कैसे समाएंगे भला??"
शीला: "भोसडी के..मादरचोद.. उसमें हसने वाली क्या बात है!!"
पिंटू: "भाभी.. ऐसे ही बड़े बड़े बबलों ने मुझे हिन्दी की परीक्षा में १५ मार्क दिलवाए थे.. "
शीला (आश्चर्य से): "वो कैसे?"
पिंटू: "बोर्ड की परीक्षा में हिन्दी के पेपर में एक निबंध पूछा गया था "बढ़ती हुई आबादी से होते नुकसान".. क्या लिखूँ कुछ सूझ ही नहीं रहा था.. इतने में मेरी नजर सुपरवाइज़र मैडम पर पड़ी.. उनके स्तन भी आपकी तरह बड़े बड़े थे और ब्लाउस मैं संभल नहीं रहे थे.. उन्हे देखकर मैंने निबंध लिखना शुरू कर दिया.. आबादी के बढ़ने से लोगों को होती परेशानियाँ.. दो तीन वाक्य लिखने के बाद.. मैंने दूसरा अनुच्छेद छोटे से घर में ज्यादा लोगों को रहने पर पड़ती तकलीफ की ऊपर लिख दिया.. और उपसंहार आबादी के चलते जरूरत की चीजों की किल्लत पर लिख दिया.. सब कुछ उस सुपरवाइज़र मैडम के मम्मों की प्रेरणा की वजह से.. वो बात याद आ गई.. इसलिए हंसी आई.. वो बात छोड़िए.. आप ये बताइए की अब ब्रा के हुक को बंद कैसे करू? ज्यादा खिचूँगा तो टूट जाएंगे.."
पिंटू की बकवास सुनकर बोर हो चुकी शीला ने अपनी दोनों कटोरियों में से स्तनों को निकाल दिया.. उसके उरोज ब्रा के नीचे झूलने लगे.. स्टेशन आते ही जैसे लोकल ट्रेन में जगह हो जाती है वैसे ही अब जगह हो गई और हुक आसानी से बंद हो गए.. शीला के स्तन अभी भी ब्रा के बाहर झूल रहे थे।
शीला: "चल पिंटू.. अब इन दोनों को अंदर डाल दे.. "
पिंटू ने शीला का दोनों स्तनों को पकड़कर पहले तो थोड़ी देर दबाया.. शीला आँखें बंद करके स्तन मर्दन का आनद लेने लगी
शीला: "जरा जोर से मसल.. आह्ह!!"
पिंटू ने शीला को अपनी ओर खींच लिया.. और उसके गालों को चूम कर अपने होंठों को शीला के कान के करीब ले गया और फुसफुसाते हुए बोला
पिंटू: "आप का तो हो गया भाभी.. पर मेरा अभी बाकी है.. मेरा पानी निकलवाने का भी कोई जुगाड़ लगाइए.."
शीला अपना हाथ नीचे ले गई और पिंटू का लंड पकड़कर बोली " सच कहूँ पिंटू?? तू मेरे बच्चों से भी छोटा है.. तेरी नुन्नी से छेड़खानी करते हुए भी मुझे शर्म आ रही है.. पर क्या करती? ये सब इतना अचानक हो गया की.. वरना तेरे ये सीटी जैसे लंड से मेरा क्या भला होगा!! अभी देखा था ना तूने.. उस थप्पी का हेंडल कैसे अंदर समा गया था!! अब तू ही बता.. तेरी छोटी सी लोड़ी से मुझे कैसे संतोष मिलेगा??"
पिंटू: "पर उसमें मेरी क्या गलती है? मैंने आपको और चेतना भाभी को.. मुझे जितना आता था वह सब कर के दिया ना!! और ठंडा भी कर दिया!!"
शीला: "तेरी बात सही है पिंटू.. पर तेरा छोटा सा लंड पकड़ने में मुझे शर्म आती है.. तू खुद ही इसे हिला ले.. क्यों की अगर मैं गरम हो गई.. तो फिर तुझे चूस लूँगी पूरा.. इससे अच्छा तो तू मेरे स्तनों को चूसते हुए अपना लंड हिलाते हुए पानी गिरा दे" कहते ही शीला ने अपना एक स्तन पिंटू के मुंह में दे दिया.. बेचारा पिंटू!! शीला की निप्पल चूसते हुए अपना लंड हिलाए जा रहा था..
शीला: "जल्दी जल्दी कर.. मेरी चुत में फिर से खाज होनी शुरू हो गई है"
"उहह भाभी.. आह्ह.. ओह्ह.. " पिंटू स्खलित हो गया.. शीला बड़े ताज्जुब से देखती रही.. इतने छोटे लंड की पिचकारी दो फुट दूर जाकर गिरी!! उस फेविकोल जैसे वीर्य को देखकर शीला की चुत में झटका लगा.. अंदर दलवाया होता तो मज़ा आता.. कितने फोर्स से पिचकारी लगाई इसने!! अंदर बच्चेदानी तक जाकर लगती.. मज़ा आ जाता.. पर उसके ये सिगरेट जैसे लंड से वह कहाँ ठंडी होने वाली थी!! चलो, जो हुआ अच्छा ही हुआ!!
शीला और पिंटू कपड़े पहनकर ड्रॉइंगरूम में आए.. चेतना सोफ़े पर बैठे बैठे आराम से अखबार पढ़ रही थी..
शीला: "आप दोनों बातें करो.. मैं अभी कुछ नाश्ता बना कर लाती हूँ.. बेचारे पिंटू को भूख लगी होगी"
पिंटू: "नहीं नहीं.. मुझे भूख नहीं लगी.. मैं अब निकलता हूँ.. घर पहुँचने में देर होगी तो मम्मी डाँटेगी.. "
शीला: "अब आधे घंटे में कोई देरी नहीं हो जाने वाली.. आराम से बैठ.. नाश्ता कर के ही जा.. आज तो तुझे पूरा निचोड़ दिया हमने!!"
चेतना जिस अखबार को पढ़ रही थी उसमें एक इश्तिहार छपा हुआ था.. जिसमें एक मॉडल छोटी सी ब्रा पहने अपने बड़े बड़े उभार दिखा रही थी..
चेतना: "ये अखबार वाले भी कैसी कैसी अधनंगी एडवर्टाइज़मेंट छापते है!! फिर खुद ही बीभत्सता के खिलाफ लंबे लंबे आर्टिकल लिखते है.. और इन मॉडलों को तो देखो.. कैसे अपने बबले दिखाकर फ़ोटो खिंचवाई है!! इन्हे देखकर तो मर्दों के लंड पतलून फाड़कर बाहर निकल जाते होंगे!! खुद ही आधे कपड़ों में घूमेगी.. फिर कुछ उंच-नीच हो जाए तो चिल्लाएगी.. "
पिंटू आराम से सुनता रहा.. अखबार पढ़ रही चेतना का पल्लू नीचे गिर गया था.. उसकी ओर इशारा करते हुए उसने कहा
पिंटू: "भाभी.. पहले तो आप अपनी दोनों हेडलाइट को ढँक लो.. कहीं मैं ही कुछ कर बैठा तो यहीं पर उंच-नीच हो जाएगी और आप चिल्लाएगी"
चेतना: "तुझे जो मन में आए वो कर इनके साथ... मैं कहाँ मना कर रही हूँ!!" कहते हुए चेतना ने पिंटू की जांघ को सहलाया और उसके करीब आ गई.. अपने आप को थोड़ा सा ऊपर किया.. और अपनी छाती से पल्लू गिरा दिया.. कमर के ऊपर अब केवल ब्लाउस के अंदर कैद स्तनों का उभार देखकर कोई भी बेकाबू बन जाता.. चेतना ने बड़ी ही कातिल अदा से अंगड़ाई ली.. और मदहोश कामुक नज़रों से.. अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाया,. होंठों पर अपनी जीभ फेर ली.. और अपने स्लीवलेसस ब्लाउस में से पसीनेदार काँखों को दिखाकर.. पिंटू की मर्दानगी को.. एक ही पल में नीलाम कर दीया।
अखबार को सोफ़े पर फेंककर चेतना पिंटू की जांघों पर सवार हो गई.. और उसके बिल्कुल सामने की तरफ हो गई। पिंटू के मासूम चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में भरते हुए उसके गालों को सहलाने लगी और बड़ी ही कामुक अदा से बोली
चेतना: "हाय रे पिंटू.. कितना चिकना है रे तू!! तुझे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा है मेरा" कहते हुए चेतना ने पिंटू के होंठों को चूम लिया.. चिंटू ने अपने दोनों हाथों से चेतना के कूल्हें पकड़ लिए.. और उन्हे सहलाने लगा..
चेतना ने पिंटू के पतलून की चैन खोली और उसके सख्त लंड को बाहर निकाला.. बिना वक्त गँवाए उसने अपना घाघरा उठाया और अपनी रसीली चुत की दरार पर पिंटू के सुपाड़े को सेट करते हुए अपने जिस्म का वज़न पिंटू की जांघों पर रख दिया.. पिंटू का लंड चेतना की चुत में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सर से सिंग!!
शीला एक प्लेट में गरमागरम पकोड़े लेकर बाहर आई तब इन दोनों को चुदाई करते हुए देखकर हंस पड़ी.. और मन ही मन बोली.. साली ये चेतना भी.. इस बेचारे बच्चे की जान ही ले लेगी आज.. शीला ने एक गरम पकोड़ा लिया और चेतना के खुले नितंब पर दबा दिया
चेतना: "उईई माँ.. क्या कर रही है हरामी साली!!!" बोलते हुए चेतन उछल पड़ी.. उसके उछलते ही पिंटू का लंड उसकी चुत से बाहर निकल गया.. वह उत्तेजना से थर-थर कांप रही थी.. पिंटू का लंड भी झूल रहा था..
शीला ने पकोड़े की डिश को टेबल पर रखा और पिंटू के लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी.. शीला के मुंह की गर्मी.. पिंटू और बर्दाश्त न कर सका.. और बस दस सेकंड में उसके लंड ने इस्तीफा दे दिया.. पिंटू का वीर्य मुंह में भरकर शीला किचन में चली गई। चेतन से अब और रहा न गया.. अपना घाघरा ऊपर करते हुए वह क्लिटोरिस को रगड़ने लगी.. अपनी चुत की आग को बुझाने की भरसक कोशिश कारणे लगी.. पर उसकी चुत झड़ने का नाम ही नहीं ले रही थी।
आखिरकार उसने पिंटू को सोफ़े पर लिटा दिया और उसके मुंह पर सवार हो गई.. और इससे पहले की पिंटू कुछ कर पाता.. वह उसके मुंह पर अपनी चुत रगड़ने लगी.. करीब पाँच मिनट तक असहाय पिंटू के मुंह पर चुत रगड़ते रहने के बाद.. उसकी चुत का फव्वारा निकल गया.. बेचारा पिंटू.. चेतना के इस अचानक हमले से हतप्रभ सा रह गया..
थोड़ी देर यूं ही लेते रहने के बाद वह उठा और कपड़े ठीक किए.. उसकी हालत खराब हो गई थी.. वह बुरी तरह थक चुका था.. अपने लंड को पेंट में डालकर उसने चैन बंद की और बिना कुछ कहे वह दरवाजा खोलकार चला गया.. नाश्ता करने भी नहीं रुका.. इन दोनों भूखे भोसड़ों की कामवासना ने उसे डरा दिया था... वह दुम दबाकर भाग गया
शीला और चेतना ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की.. क्यों करती!! उनका काम तो हो गया था.. अनमोल ऑर्गैज़म प्राप्त कर दोनों सहेलियाँ पकोड़े खाते हुए बातों में मशरूफ़ हो गई।
चेतना: "मस्त पकोड़े बनाए है तूने" खाते हुए बोली
शीला: "चेतना.. क्या सच में तेरे पति का खड़ा नहीं होता?"
चेतना: "इतना निकम्मा भी नहीं हुआ है अब तक.. पर हाँ.. पहले की तरह जल्दी सख्त नहीं होता.. और होता भी है तो एकाध मिनट में बैठ जाता है"
कहते हुए चेतना उदास हो गई.. शीला ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.. "मैं समझ सकती हूँ की तुझ पर क्या बीत रही होगी.. मैंने भी मदन की गैरमौजूदगी में दो साल बिताए है.. तू अब से मेरे घर आया कर.. तुझे तड़पना नहीं पड़ेगा.. "
चेतना: "इसी लिए तो मैं घर पर आकर बात करने के लिए बोल रही थी.. ऐसी बातें बाहर खुले में करना ठीक नहीं"
शीला: "सच कहा तूने चेतना.. इस उम्र में जब जिस्म की भूख सताती है तब ऐसी स्थिति होती है की ना सहा जाता है और ना कहा जाता है"
चेतना: "एक बात पूछूँ शीला? सच सच बताना.. मदन भाई दो साल से गए हुए.. इतने समय तू बिना कुछ किए रह पाई यह बात मैं मान नहीं सकती"
शीला: "सच कह रही है तू.. मैंने तो अपने दूधवाले को जुगाड़ लिया है.. रोज सुबह सुबह तगड़ा लंड मिल जाता है"
चेतना: "मेरा भी उसके साथ कुछ चक्कर चला दे शीला.. " विनती करते हुए चेतना ने कहा.. तगड़े लंड का नाम सुनकर उसके दो पैरों के बीच के तंदूर से धुआँ निकलने लगा
शीला: "अरे तू भी ना.. ऐसे कैसे सेटिंग करवा दूँ.. मैंने भी अभी अभी शुरू किया है उसके साथ!!"
थोड़ी देर के लिए दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला
चेतना एकदम धीमी आवाज में बोली "बेटे से तो बाप अच्छा है"
"मतलब??" शीला समझ नहीं पाई
"कुछ नहीं.. जाने दे यार.. चलती हूँ.. वरना मेरी सास फिर से चिल्लाएगी... जैसे मैं किसी के साथ भाग जाने वाली हूँ" चेतना ने एक भारी सांस छोड़कर कहा
"तो बोल दे अपनी सास को.. की अपने बेटे से कहे की तुझे ठीक से चोदे.. वरना सचमुच भाग जाऊँगी.. एक औरत बिना आटे के जीवन गुजार लेगी पर बिना खूँटे के तो एक पल नहीं चलेगा" शीला ने कहा
"बिना खूँटे के तो मेरी सास को भी नहीं चलता.. दिन में दो दो बार अपनी चुत चटवाती है मेरे ससुर से.. "
"बाप रे!! क्या बात कर रही है तू!! तुझे कैसे पता चला?" शीला आश्चर्यसह चेतन की ओर देखती रही
"कई बार रात को उनके कमरे में चल रही गुसपुस सुनती हूँ.. मेरा ससुर भी कुछ काम नहीं है.. खड़े हुए ऊंट की गांड मार ले ऐसा वाला हरामी है कुत्ता.. साला" चेतना ने कहा
"कमाल है यार!! इस उम्र में भी!! तेरा ससुर रंगीला तो था ही.. याद है.. तेरे देवर की शादी में मेरे बूब्स को कैसे घूर घूर कर देख रहा था" शीला ने कहा
"हाँ यार.. चल अब मैं चलती हूँ.. बहोत देर हो गई.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे मेरा.. "
"ठीक है.. पर आती रहना.. "
"तू बुलाएगी तो जरूर आऊँगी.. और ऐसा कुछ भी मौका मिले तो मुझे याद करना.. अकेली अकेली मजे करती रहेगी तो एड्स से मर जाएगी.. मिल बांटकर खाने में ही मज़ा है.. मेरी चुत का भला करेगी तो उपरवाला तेरा भी ध्यान रखेगा" हँसते हुए चेतना ने कहा और चली गई
शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही
शीला फिर से अकेली हो गई.. उसे चेतना पर बहोत दया आ रही थी.. बेचारी.. कैसे मदद करू चेतना की?? शीला सोचती रही
शीला का शातिर तेज दिमाग दौड़ने लगा.. उसका दिमाग हर तरह के हलकट विचार करने के लिए सक्षम था.. और जब वह अपने दिमाग और चुत, दोनों का उपयोग कर सोचती.. तब उसे कोई न कोई तरकीब सूझ ही जाती।
उस रात को शीला ने पिंटू को फोन लगाया और उससे गरमागरम बातें करते हुए अपनी चुत में उंगली घिसकर उसे शांत कर दिया।
रसिक अब हर रोज थोड़ा जल्दी आ जाता और पंद्रह मिनट में शीला को चोदकर दूध देने निकल जाता.. पर शीला को इस जल्दबाजी वाली ठुकाई में ज्यादा मज़ा नहीं आता था। पर बिना सेक्स के रहने से तो ये अच्छा ही था..कम से कम खेलने, चूसने और चुदवाने के लिए एक तगड़ा लंड तो मिला.. यही सोचकर वह समय व्यतीत कर रही थी।
एक दिन सवेरे सवेरे मंदिर जाते हुए उसे अनुमौसी मिल गई। शीला को देखते ही उससे बातें करने रुक गई।
अनुमौसी: "अगले रविवार को हमारा महिला मण्डल यात्रा पर जा रहा है... तुझे चलना है?"
शीला: "हाँ मौसी.. मेरा नाम भी लिखवा देना.. मैं जरूर चलूँगी"
अनुमौसी: "ठीक है.. सुबह सात बजे निकलना है.. तू तैयार रहना.. फिर से वो दूधवाले के साथ उलझ मत जाना.. वरना देर हो जाएगी तो बस छूट जाएगी"
रसिक का जिक्र होते ही शीला के कान चार हो गए.. जिस तरह सवार की एडी लगते ही घोड़े के कान चौकन्ने हो जाते है.. बिल्कुल उसी तरह
शीला: "अरे नहीं नहीं मौसी.. मैं आपसे पहले तैयार हो जाऊँगी.. आप देखना!!"
अनुमौसी: "कितना बोलती है रे तू!! ठीक है.. तू तैयार हो जाएँ फिर हम साथ में निकलेंगे" कहते हुए अनुमौसी मंदिर की ओर चल दी
शीला पूरे दिन सोचती रही.. मौसी ने रसिक का जिक्र क्यों किया!!! कुछ तो राज था.. वरना अनुमौसी ऐसे ही उसका नाम नहीं लेती.. कल रसिक को पूछती हूँ इसके बारे में
जैसे तैसे शीला ने दोपहर तक का समय निकाल ही दिया.. पर फिर उससे रहा नहीं गया.. दोपहर के तीन बजे उसने रसिक को फोन किया.. पर उस चूतिये ने फोन उठाया ही नहीं। पक्का खेत में किसी मज़दूरन की टांगें चौड़ी कर उसकी चुत को पावन कर रहा होगा!!
शीला ने रूखी को फोन मिलाया..
रूखी: "अरे भाभी आप?? कैसे है? आप तो मुझे भूल ही गए!!"
शीला: "नहीं भूली हूँ तुझे.. पर लगता है तू मुझे भूल गई है शायद.. जीवा का डंडा क्या मिल गया तू तो मुझे याद ही नहीं करती!!"
रूखी: "सच कहूँ तो भाभी मैं आपको ही याद कर रही थी.. आप अभी फ्री हो?"
शीला: "हाँ बता.. कुछ खास काम था क्या?"
रूखी: "हाँ भाभी.. आपको एक चीज दिखानी थी.. पर उसके लिए आपको यहाँ मेरे घर पर आना पड़ेगा"
शीला: "तेरे घर?? पर किस बहाने आऊँ तेरे घर रूखी??"
रूखी: "आप एक काम कीजिए.. साथ में एक पतीली लेकर आइए.. कोई पूछे तो कहना की दूध लेने आई हो"
शीला: "ठीक है फिर"
रूखी: "कितनी देर में आओगी भाभी?"
शीला: "१५-२० मिनट में पहुँचती हूँ"
रूखी: "ठीक है.. पर जल्दी आना"
शीला मोबाइल कट करते हुए सोचने लगी.. ऐसा क्या होगा जो रूखी मुझे दिखाना चाहती है!! और जल्दी आने के लिए क्यों कहा!! क्या पता!! जाकर देखती हूँ तब सब पता चल जाएगा..
शीला झटपट तैयार हो गई.. और हात में पतीली लेकर निकल पड़ी.. वैसे तो अगर चल कर जाएंग तो २५-३० मिनट में रूखी के घर पहुँच सकती थी पर शीला ने ऑटो बुला ली.. कमीना ऑटो वाला मिरर सेट करके उसके स्तनों को अपनी नज़रो से ही चूस रहा था.. इस उम्र में भी उसके स्तन पुरुषों का ध्यान आकर्षित कर रहे थे ये देखकर शीला को अच्छा लगा.. उसने जानबूझकर अपना पल्लू गिरा दिया.. और विंध्य पर्वतों के बीच जैसी खाई होती है वैसी अपने स्तनों के बीच की खाई को उजागर कर दिया..
स्त्री के स्तनों को देखकर मर्द लोग सदियों से उत्तेजित होते आए है.. स्त्री कितनी भी भद्दी क्यों न हो.. उसके उरोज हमेशा आकर्षक होते है। और हर स्त्री को यह पता होता है की इस अमोघ शस्त्र का उपयोग कर कैसे अपने काम निकलवाए जा सकते है
रिक्शा वाला भी सीटी बजाते हुए शीला के दोनों गुंबजों को ताक रहा था.. जान बूझकर वो रिक्शा को धीमी गति पर चला रहा था ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक शीला के स्तनों को देख सकें.. जानबूझकर खड्डे वाले रास्ते पर ऑटो चलाता था ताकि उन स्तनों को उछलते हुए देख सकें। अब वह गीत भी गुनगुनाने लगा था "चोली के पीछे क्या है.. चुनरी के नीचे"
शीला समझ गई की वह क्या देखकर गाना गा रहा था.. १० मिनट के रास्ते में भी कमीने ने २० मिनट लगा दिए.. पहुंचकर जब शीला ने भाड़ा देने के लिए अपने ब्लाउस से पर्स निकाला तब रिक्शा वाले ने पैसे लेने से माना क्या और कहा "मैडम, आपके जैसे ग्राहक मिल जाएँ तो पूरा दिन अच्छा जाता है" आँख मारते हुए वह रिक्शा लेकर चला गया..
शीला रूखी के घर पहुंची.. और दरवाजा खटखटाया.. रूखी ने दरवाजा खोलकर शीला को हाथ से खींचकर अंदर लिया और दरवाजा बंद कर लिया।
"इतनी देर क्यों लगा दी भाभी?" प्यार से शीला के उभारों पर चिमटी काटते हुए रूखी ने कहा
"अरी जल्दी आने के लिए मैंने ऑटो ली थी.. पर वह हरामी रिक्शा वाला मेरे ये दूध के कनस्तर देखकर पागल हो गया.. और जानबूझकर ऑटो आराम से चला रहा था.. क्या करती!! भाड़ा भी नहीं लिया उसने.. सोच तू.. कितना पागल हो गया होगा इन्हे देखकर!!"
रूखी: "बेचारे की बीवी के छोटे छोटे होंगे.. तभी इन्हे देखकर पागल हो गया.. आपके तो पैसे बच गए ना!! वो सब छोड़िए.. भाभी, अब आप उस कोने में छुपकर खड़े हो जाइए.. अभी आपको बढ़िया वाला पिक्चर दिखाती हूँ.. अभी शुरू होगा.. देखकर आप मुझे बताना की मुझे क्या करना चाहिए"
शीला रूखी के दूध भरे स्तनों को देखकर उत्तेजित हो गई.. उसने रूखी से कहा "तेरा दूध पिए कितने दिन हो गए यार.. पहले थोड़ा सा दूध पी लेने दे मुझे.. "
रूखी: " भाभी.. वो रसिक भी मुझे कितने दिनों से हाथ नहीं लगाता.. मेरा भी बड़ा मन कर रहा है.. पर क्या करू!!"
शीला ने रूखी का हाथ पकड़कर अपने करीब खींच लिया और कोने में ले जाकर पूछा "फिर कैसा रहा उस रात रघु और जीवा के साथ??"
जवाब देने से पहली रूखी ने अपनी तंग चोली के दो हुक खोल दिए और नारियल जैसी चूचियों में से एक बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दी..
रूखी: "जीवा की तो क्या ही बात करू मैं भाभी.. पूरी रात चोदा था मुझे.. और रघु भी कुछ कम नहीं था.. वो भी मुआ पीछे से उंगली करता रहा"
रूखी की चुची को मसलते हुए शीला ने कहा "तेरे बोबे तो वाकई जबरदस्त है रूखी.." शीला रूखी की निप्पल से खेलते हुए बोली
रूखी ने शीला का सर पकड़कर अपनी निप्पल के करीब खींचा और बोली "जो भी करना है जल्दी करो भाभी.. अभी पिक्चर बस शुरू होने ही वाला है.. फिर मौका हाथ से निकल जाएगा.. फटाफट चूस लो जितना चाहिए.. फिर घर पर आऊँगी तब इत्मीनान से पीना मेरा दूध.. "
शीला ने रूखी के स्तन को पकड़कर उठाने की कोशिश की.. कम से कम ढाई किलो का वज़न था एक स्तन का!!
"जल्दी कीजिए भाभी.. इसे बाद में नाप लेना.. " रूखी ने बेसब्री से कहा
"रूखी मुझे ये तो बता की आखिर तूने मुझे यहाँ पर किस लिए बुलाया है??"
"सब बताऊँगी भाभी.. थोड़ी शांति रखिए.. आप खुद ही देख पाओगी.. मुझे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी" कहते हुए रूखी ने शीला को अपनी बाहो में भर लिया..
शीला ने रूखी की निप्पल को दबाकर दूध की एक चुस्की लगाई.. और फिर भागकर पिलर के पीछे छुप गई.. और पीछे से देखने लगी की आखिर वो क्या था जो रूखी उसे दिखाना चाहती थी।
थोड़ी देर के बाद.. ६० साल का एक बूढ़ा घर के अंदर आया.. उम्र भले ही ज्यादा था पर दिलडोल काफी चुस्त और तंदूरस्त था.. उसकी खुली छाती पर घुँघराले सफेद बाल नजर आ रहे थे और कमर के नीचे उसने धोती बांध रखी थी..
पास में रूखी खटिया पर बैठे हुए अपने बच्चे को दूध पीला रही थी
"बहु, क्या कर रहा है मेरा लल्ला?? तुझे तंग तो नहीं करता है ना!! " कहते हुए वह बूढ़ा रूखी के करीब जा पहुंचा और झुककर उस दूध पीते बच्चे के गाल को सहलाने लगा.. रूखी का एक स्तन बाहर लटक रहा था.. यह पूरा द्रश्य शीला पिलर के पीछे छुपकर देख रही थी.. उसे सबकुछ साफ साफ दिखाई दे रहा था.. रूखी के स्तन से बस आधे फुट की दूरी पर था वो बूढ़ा..
शीला समझ गई की वह बूढ़ा.. रूखी का ससुर था..
"तेरी सास जब मंदिर जाती है.. तभी में शांति से इसे देख पाता हूँ.. " कहते हुए वह बूढ़ा खटिया पर रूखी के बगल में बैठ गया
"बहु, मुझे हमारा लल्ला बहोत प्यारा है.. वो कहते है ना.. पूंजी से ज्यादा ब्याज की किंमत होती है.. बस वैसे ही.. " कहते हुए वह रूखी के बेहद आकर्षक दूध टपकाते स्तन को घूरने लगा.. उस बूढ़े की आँखों में बालक की भूख और मर्द की हवस का जलद मिश्रण था..
रूखी: "बापू, अभी माँ लौट आएगी और ऐसे देखेगी तो उन्हे गलतफहमी हो जाएगी.. आप अपने कमरे में चले जाइए.. लल्ला का पेट भर जाए बाद में उसे आप को सौंप दूँगी.. जितना मर्जी खेल लेना फिर"
रूखी का एक स्तन बाहर और एक चोली के अंदर था.. उस १००० वॉल्ट के एलईडी बल्ब जैसे स्तन को देखकर रूखी का ससुर पागल सा हो रहा था.. उस छोटे बच्चे के सिर के बालों को सहलाने के बहाने वो बार बार रूखी के स्तन को छु रहा था.. तभी उस दूध पीते बच्चे के मुंह से निप्पल छूट गई.. वह पीते पीते सो गया था.. रूखी की गुलाबी निप्पल से दूध की तीन चार बूंदें बच्चे के गाल पर गिर गई.. और आखिरी बूंद निप्पल पर अभी भी चिपकी हुई थी..
"अरे अरे बहु.. ऐसे तो कपड़े खराब हो जाएंगे.. साथ में एक रुमाल रखा करो तुम.. " ससुर ने रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रख दी
रूखी के पूरी शरीर में झुनजूनाहट होने लगी.. अपनी सख्त निप्पल पर ससुर के हाथ का स्पर्श होती ही उसका दूसरा स्तन कठोर होकर चोली को फाड़कर बाहर निकलने की धमकी देने लगा.. जो स्तन पहले से बाहर था वो भी सख्त हो गया.. मानों बम की तरह फटने वाला हो
रूखी की निप्पल के नीचे उंगली रखकर ससुर ने दूध की उस बूंद को उंगली पर ले लिया और फिर उसे रूखी के चेहरे के पास लेजकर बोला
"लल्ला को तो रोज दूध पिलाती हो.. कभी खुद भी चखकर देखा है क्या??"
रूखी शर्म से पानी पानी हो गई
"मुझे भला क्या जरूरत है इसे चखने की.. " रूखी ने सिर झुकाकर जवाब दिया
"अरे बेटा.. तुम्हें रोज सबसे पहली बूंद खुद ही चख लेनी चाहिए.. उसके बाद ही लल्ला को पिलाना चाहिए.. क्या पता हमें कोई बीमारी हो और दूध खराब हो गया हो तो लल्ला बेचारा बीमार हो सकता है.. ये ले.. चख कर देख" कहते हुए ससुर ने उस दूध वाली उंगली का स्पर्श रूखी के होंठों से करवाया। रूखी ने अपना मुंह खोला.. ससुर ने अपनी उंगली अंदर डाल दी और थोड़ी देर तक वैसे ही रहने दी.. उंगली को चूसते हुए रूखी की आँखें बंद हो गई.. वह गहरी सांसें लेने लगी.. हर सांस के साथ उसके मादक उन्नत उरोज ऊपर नीचे होने लगे..
अनजाने में रूखी ने अपने ससुर की उंगली को ऐसे चूस लिया जैसे जीवा के लंड को चूस रही हो.. अपने ससुर को उंगली को उसने चाट चाट कर साफ किया.. अब उस बुढ़ऊ ने अपनी दूसरी उंगली भी रूखी के मुंह के अंदर डाली और अंदर बाहर करने लगा.. जैसे अपने लंड को रूखी के मुंह में दे रहा हो.. रूखी की आँखें अभी भी बंद थी..
रूखी: "बापू.. फिर से दूध की बूंदें टपकने की तैयारी में है.. जल्दी से अपनी उंगली से पोंछ लीजिए वरना मेरे कपड़े गीले हो जाएंगे" रूखी ने अपने ससुर को सेक्स के शतरंज में अप्रत्यक्ष रूप से आमंत्रित कर ही दिया
रूखी ने नजर झुकाकर देखा तो उसके ससुर का लंड धोती के अंदर खड़ा हो चुका था.. भला हो उसकी लंगोट का जिसने उस थिरकते हुए घोड़े जैसे लंड को बांध कर रखा था..
बूढ़े ने आगे बढ़ने का फैसला किया.. और निप्पल को हल्के से दबाकर अपनी उंगली पर दूध लेकर खुद के मुंह तक ले गया और बोला
"बहु.. मैं चखकर देखूँ एक बार???"
रूखी का यह नया रूप देखकर शीला अचंभित रह गई.. खटिया पर बैठी रूखी का बदन इतना सुंदर लग रहा था.. कुछ ही महीनों पहले हुई डिलीवरी के कारण उसका मांसल शरीर और गदरा गया था..
बूढ़े ससुर ने खुद की उंगली चूसकर रूखी का दूध चख लिया... रूखी शर्म से लाल लाल हो गई..
"बापू.. आपने तो पहले चखा ही होगा ना!! अम्मा का दूध.. जब लल्ला के पापा का जनम हुआ तब.. " रूखी ने धीरे से कहा
"बेटा.. क्या बताऊँ तुझे.. जब रसिक पैदा हुआ था तब तेरी सास के बोब्बे भी तेरी ही तरह सुंदर और रसीले थे.. रसिक ज्यादा दूध नहीं पी पाता था.. इसलिए तेरी सास की छाती दूध से भर जाती.. रात को जब उसकी छाती दर्द करने लगती.. तब वो मुझे आधी रात को जगा देती.. मैं चूस चूस कर उसके बबले खाली कर देता तब जाकर बेचारी को नींद आती थी..
"बापू, लल्ला के पापा तो अब भी ज्यादा नहीं पी पाते.. मुझे भी कभी कभी रात को दर्द होने लगता है.. पर वो पीते ही नहीं है.. पूरी रात मैं दर्द के मारे तड़पती रहती हूँ.. और क्या कर सकती हूँ मैं.. तड़पने के अलावा.. " रूखी ने अपने पत्ते बिछाने शुरू कर दिए
"अरे बहु.. अब मैं मेरे बेटे से ये तो नहीं कह सकता ना.. की अपनी बीवी का दूध चूस दे.. पर हाँ.. एक काम हो सकता है.. रात को जब दूध से तेरी छाती फटने लगे तब मुझे जगा देना.. मैं सारा दूध चूसकर तेरा दर्द कम कर दूंगा.. ठीक है!!"
"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "
"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"
"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा
"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"
"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए
रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे
"आप कितने अच्छे है.. बापू!! देखिए ना.. मेरी छाती दूध से फटी जा रही है.. और लल्ला भी थोड़ा सा ही पीकर सो गया.. अब पता नहीं ये कब जागेगा और दूध पिएगा.. "
"अरे बेटा.. क्यों चिंता कर रही हो!! मैं हूँ ना.. ला मैं तेरा दूध चूसकर तेरी छातियाँ हल्की कर देता हूँ"
"पर बापू.. मुझे बड़ी लाज आती है.. " शरमाते हुए रूखी ने कहा
"अब शर्म करोगी तो फिर दर्द भुगतना पड़ेगा.. और तो मैं कुछ नहीं कर सकता!!"
"नहीं नहीं बापू.. ये लीजिए.. चूस लीजिए.. बहोत दर्द हो रहा है.. " रूखी ने तोप के नाले जैसे दोनों स्तन खोलकर अपने ससुर के सामने पेश कर दिए
रूखी के मदमस्त स्तनों को देखकर उसका ससुर पानी पानी हो गया.. यौवन के कलश जैसे बेहद सुंदर चरबीदार बोब्बे.. बड़े सुंदर लग रहे थे
बूढ़े ससुर ने दोनों स्तनों को पकड़कर दबाया
"आह्ह.. दुख रहा है बापू.. " कामातुर रूखी ने कहा
"अपनी भेस के थन जैसे है तेरे चुचे.. " ससुर लार टपकाते हुए बोला.. रूखी ने अपने चेहरे को घूँघट से ढँक लिया.. देखिए इस नारी का चरित्र.. स्तन खुले हुए है और चेहरा ढँक रही है..!! संस्कारी होने का दिखावा करती रूखी का अगर घाघरा उठाया जाएँ.. तो उसकी बिना पेन्टी वाली चुत से.. कल रात जीवा और रघु के साथ हुई चुदाई के अवशेष मिल जाते..
जरा सा ही दबाने पर.. रूखी की निप्पलों से दूध की धार बरसने लगी.. रूखी का दूध उसकी गोद में ही गिरने लगा..
"बेटा.. एक काम करो.. लल्ला को पालने में सुला दो.. नहीं तो हलचल से वो जाग जाएगा.. " ससुर ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा
अपने ब्लाउस से लटक रही दो खुली चूचियों के साथ रूखी खटिया से खड़ी हुई.. और बच्चे को उठाकर बगल के कमरे में पालने के अंदर सुला दिया.. वापिस लौटते वक्त उसकी नजर पिलर के पीछे खड़ी शीला पर गई.. दोनों की नजरे मिली और चेहरे पर शैतानी मुस्कान आ गई..
चलकर आ रही रूखी का अर्धनग्न सौन्दर्य देखकर बूढ़े ससुर का जबड़ा लटक गया.. क्या अद्भुत सौन्दर्य था रूखी का!! पूनम के चाँद जैसे गोरे गोरे दो स्तन देखकर शीला के भोसड़े में भी आग लग गई.. रूखी चलते चलते खटिया तक आई और ससुर के सामने जाकर खड़ी हो गई।
रूखी को देखकर उस बूढ़े की जवानी फूटने लगी.. बिना अपना घूँघट हटाए रूखी ने अपना दाया स्तन ऊपर किया.. उसका ससुर उस स्तन को देखता ही रह गया..
"जल्दी कीजिए बापू.. अम्मा कभी भी वापिस आ जाएगी.. " कहते हुए रूखी ने अपने ससुर का सिर पकड़कर उनके मुंह में अपनी निप्पल दे दी
"ओह बहुरानी.. अमम.. " ६० साल के बूढ़े का लंड धोती के अंदर फुँकारने लगा.. अपने बेटे की जवान बीवी के स्तनों से दूध चूसने की समाजसेवा शुरू कर दी बूढ़े ने....
"आह्ह.. बापू.. आप तो कैसे चूस रहे है.. ऊईई.. ओह्ह" रूखी ने अपनी निप्पल को ससुर के मुंह में दबा दिया.. वो बूढ़ा भी ऐसे चूस रहा था जैसे दुनिया का सबसे बढ़िया हेल्थ ड्रिंक पी रहा हो.. थोड़ी देर तक चूसने के बाद वह बोला
"बेटा.. गाय के थन जैसी छाती है तेरी.. थोड़ा सा ही चूसने पर पूरा मुंह दूध से भर गया मेरा.. बेचारा लल्ला इतना सारा दूध कहाँ से पी पाएगा!! इतना दूध है की पूरे घर के लिए काफी है.. काश हमारे खेत भी तेरी इन छातियों जीतने उपजाऊ होते"
"ओह्ह बापू.. क्या कर दिया आपने!! मुझे तो कुछ कुछ हो रहा है.. आह्ह.. " रूखी का पूरा जिस्म हवस की आग में झुलसने लगा था। उसका एक हाथ ससुर के सिर पर था और दूसरे हाथ से उसने अपनी भोस सहलाना शुरू कर दिया..
"आह्ह बापू.. धीरे धीरे.. काटिए मत.. ऊईई माँ.. बस बस बहुत हो गया.. थोड़ा सा लल्ला के लिए भी छोड़ दीजिए.. अभी वो जाग गया तो उसे क्या पिलाऊँगी.. " रूखी और उसके ससुर का यह कामुक मिलन देखते हुए.. शीला ने अपने दोनों स्तन ब्लाउस से बाहर निकाल लिए थे और पागलों की तरह अपनी निप्पलों को मसल रही थी। शीला ने पास पड़े हँसिये को उठाकर उसके लकड़े से बने हेंडल को अपनी चुत पर रगड़ना शुरू कर दिया था। उन दोनों का खेल देखकर शीला का मन कर रहा था की वो भी उस खटिया में जाकर उस बूढ़े से लिपट पड़े.. पर फिलहाल ऐसा करना मुमकिन नहीं था
"तेरी छातियाँ तो रसिक की अम्मा से भी बड़ी बड़ी है.. " आखिर ससुर ने रूखी की निप्पलों को छोड़ दिया
"आपने तो सारा दूध खतम कर दिया बापू" उस बूढ़े के पीठ पर हाथ पसारते हुए रूखी ने कहा.. वह अपने ससुर को ऐसे सहला रही थी जैसे कसाई हलाल करने से पहले बकरे को सहलाता है..
ससुर ने रूखी की लचकदार चर्बी वाली कमर पर अपना खुरदरा हाथ फेरा.. रूखी के भोसड़े से कामरस की धारा बह रही थी.. बूढ़े ने रूखी के घाघरे में हाथ डालकर उसके गोल मटके जैसे दोनों कूल्हों को पकड़ लिया..
रूखी को बहोत गुस्सा आ रहा था.. ये बहनचोद हर जगह हाथ फेर रहा है पर मेरी चुत को क्यों नहीं छु रहा!! कैसे कहूँ.. शर्म आ रही है.. और अभी वो बुढ़िया भी आ टपकेगी..
रूखी ने बूढ़े को अपनी छातियों से दूर कर दिया..
"क्या हुआ बहु?" ससुर आश्चर्य से रूखी को देखने लगा
"अब दूसरे वाले की बारी.. दोनों तरफ एक सा वजन होना चाहिए ना.. " कहते हुए रूखी ने अनुभवी रंडी की अदा से अपना दूसरा भारी स्तन ससुर के हाथों में थमा दिया
"बहु.. इतनी भारी छातियों का वज़न नहीं लगता तुझे.. ?? कम से कम ३-४ किलो का होगा एक.. "
बिना जवाब दिए रूखी खटिया पर लेट गई.. और अपने ससुर को बगल में लिटा दिया.. अपना बाँया उरोज मुंह में देते हुए बोली
"बातें बाद में करेंगे.. पहले जो काम करने बैठे है उसे तो खतम कर लो.. कब से बस बोलें ही जा रहे हो..!!" रूखी ने अपने पैर को घुटने से मोड़ा और ऐसी स्थिति में लेकर आई की उसका घुटना सीधा बूढ़े के लंड से जा टकराए..
ससुर की लंगोट.. मधुमक्खी के छत्ते की तरह उभर गई थी.. रूखी के भोसड़े में आग लग गई थी.. उसने ससुर के लंड को अपने घुटने से छूते हुए उसे अपने पास खींचा
"ये क्या कर रही हो बेटा.. नहीं नहीं.. ये ठीक नहीं है"
रूखी ने अपने घुटनों से एक जोरदार धक्का लगा दिया ससुर के लंड पर.. बूढ़े की चीख निकल गई..
"अब चुपचाप जो कहती हूँ वो करो.. दूध तो पी लिया है मेरा.. अब वसूल भी तो करने दो मुझे.. खबरदार जो किसी को एक शब्द भी बताया है तो" अपने ससुर को बाहों में दबाते हुए रूखी ने कहा.. गुस्साई शेरनी जैसी रूखी उस बूढ़े पर टूट पड़ी.. ससुर को नीचे लिटाकर वह उसके ऊपर चढ़ गई.. दोनों के वज़न से खटिया का एक पैर टूट गया.. खटिया के टूटते ही दोनों फर्श पर आ गिरे.. ऐसे गिरे जैसे बुमराह के बाउन्सर के सामने झिम्बाब्वे का बेट्समेन गिर जाता है.. दोनों को मुंह से एक साथ चीख निकल गई.. ससुर इसलिए चीखा की उसकी पीठ नीचे फर्श पर टकराई और रूखी का पूरा वज़न उस पर गया.. रूखी इसलिए चिल्लाई क्योंकी नीचे गिरने के कारण उसकी निप्पलें बूढ़े के मुंह के साथ बड़े जोर से दब गई।
रूखी के वज़न तले लाचार ससुर ऐसे दबा था जैसे महंगाई के बोज तले प्रजा दबी हुई है.. दोनों के जिस्म एक दूसरे में उलझे हुए थे तभी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज आई.. मर गए.. जिसका डर था वही हुआ.. बुढ़िया आ गई!!
"अरे.. इतनी देर में रसिक की अम्मा वापिस भी आ गई.. !! उसे तो मंदिर में भी चैन नहीं है" कहते हुए ससुर रूखी को अपने शरीर के ऊपर से हटाते हुए खड़ा हुआ और भागकर अपने कमरे में चला गया
रूखी उठकर शीला के पास आई.. शीला हँसिये के हेंडल को अपनी चुत में घुसेड़कर खड़ी खड़ी मुस्कुरा रही थी।
"कमिनी.. तूने तो अपने ससुर को ही सेट कर लिया" रूखी की कमर पर चिमटी काटते हुए शीला ने कहा
"भाभी.. मुझे शक है की मेरे ससुर ने मुझे जीवा के साथ देख लिया है.. जिस रात रघु और जीवा मुझे चोद कर गए थे.. तब से इस बूढ़े ने मुझे सताना शुरू कर दिया था.. मेरे साथ रोज अश्लील बातें करता है और छातियों को घूरता रहता है"
"अच्छा.. तो ये बात है!!" शीला ने कहा
रूखी: "हाँ भाभी.. पर बूढ़ा है बड़े काम की चीज.. छाती तो ऐसे चूस रहा था.. मेरे छेद में से नलके की तरह पानी बहने लगा था.. सब गीला गीला हो गया"
शीला: "साली, एक नंबर की हरामी है तू ..."
रूखी ने शीला के ब्लाउस के बटन बंद करते हुए कहा "इसीलिए तो मुझे हँसिये को अंदर डालने की जरूरत नहीं पड़ती है भाभी" कहते हुए उसने शीला की चुत से हँसिये को खींचकर बाहर निकाला..
तभी शीला के मोबाइल पर कविता का फोन आया.. शीला ने उसके साथ कुछ बात की और फोन रख दिया
रूखी की सास.. कमरे में अंदर आई.. और बोली "अरे रूखी.. शीला बहन को ताज़ा मक्खन जरूर देना"
"हाँ अम्मा.. बस निकालने ही जा रही थी.. "
"और बताइए शीला बहन.. हालचाल ठीक है सब? भैया कैसे है?" शीला के ब्लाउस के दो खुले बटनों को देखते हुए रूखी के सास ने बड़े विचित्र ढंग से पूछा
शीला: "सब ठीक ही है माजी.. विदेश में भला क्या तकलीफ़ होगी उन्हे!! सारी तकलीफ तो हमे यहाँ ही उठानी पड़ती है"
रूखी की सास भी आखिर एक स्त्री थी.. शीला की आवाज का दर्द और छुपा अर्थ वह समझ सकती थी.. इतने सालों का अनुभव जो था.. रूखी को भी वह बड़े अच्छे से रखती थी.. सास-बहु वाली कोई कड़वाहट नहीं थी। वैसे भी हर सास अपनी बहु का थोड़ा बहुत ऊपर नीचे चला ही लेती है। क्योंकी सास भी कभी बहु थी..
शीला और रूखी के सामने रहस्यमयी मुस्कान के साथ वह कमरे में चली गई। '
शीला: "तेरी सास भी बड़ी खिलाड़ी लगती है मुझे"
रूखी ने हँसकर कहा "सबकुछ आराम से बताऊँगी कभी.. मेरी सास का इतिहास भी बड़ा ही रसीला है"
"ठीक है रूखी, मैं चलती हूँ" रूखी के हाथ से मक्खन का डिब्बा लेते हुए शीला ने कहा
"मैं शाम को आऊँगी भाभी.. फिर आराम से बातें करेंगे"
जाते जाते शीला ने रूखी के ससुर के कमरे के दरवाजे को हल्का सा खोलकर एक नजर डाली.. अंदर का द्रश्य देखकर वह चोंक गई.. वह तुरंत भागकर वापिस आई.. और रूखी को खींचकर ससुर के कमरे के दरवाजे पर ले आई.. दोनों ने छुपकर देखा.. उसका ससुर धोती से लंड निकालकर हिंसक तरीके से हिला रहा था.. देखकर शीला और रूखी दोनों पानी पानी हो गए..
"मेरी सास कहाँ है ?" रूखी ने पूछा.. अर्धखुले दरवाजे से कमरे का पूरा द्रश्य नहीं दिख रहा था रूखी को
"तेरी सास भी अंदर ही है" शीला ने कहा
"तब तो आज पक्का चुदाई का प्रोग्राम होगा अंदर.. मेरा ससुर खिलाड़ी है.. मेरी सास को रंडी बनाकर पेलेगा.. रुको थोड़ी देर.. देखकर जाओ.. मज़ा आएगा" रूखी ने कहा
शीला उत्तेजित हो गई.. उसके लिए ये नया अनुभव था.. उसने पहले कभी किसी अन्य जोड़े को इस तरह चोदते हुए नहीं देखा था.. शीला की मुनिया कामरस से एकदम गीली हो गई.. रूखी के सास और ससुर बातें कर रहे थे.. अपना लंड ढीला न पड़ जाए इसलिए वह बूढ़ा उसे हिलाए जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद रूखी की सास अपने पति के बगल में लेट गई.. और रूखी के ससुर को अपने ऊपर खींच लिया..
"अरे वो दोनों बातें करने में लगी हुई है.. अभी कोई नहीं आएगा.. तुम शांति से करो.. काफी दिन हो गए है किए हुए.. पर आज दिन के समय ये तुम्हारा डंडा कैसे खड़ा हो गया आज?? कहीं वो शीला बहन को देखकर तो.. !!! अभी मैं उससे मिली तब उसके ब्लाउस के दो हुक खुले हुए थी.. तुमने कुछ छेड़खानी तो नहीं की ना उसके साथ.. !! वैसे भी वो दो सालों से बिना पति के तरस रही है.. कहीं तुमने तो उसे पानी पिलाने की कोशिश नहीं की है ना?? " रूखी के सास ने अपने पति से पूछा
"पागल हो गई है क्या तू?? मैंने ऐसा वैसा कुछ नहीं किया.. " ससुर ने अपना बचाव करते हुए कहा
"कुछ भी कहो.. आज तुम्हारा लंड कुछ ज्यादा ही सख्त लग रहा था.. इतना सख्त तो हमारी सुहागरात पर भी नहीं हुआ था... " रूखी के सास ने अपने पति का लाई डिटेकटर टेस्ट जारी रखा
"हे ईश्वर.. इन औरतों को कभी भी अपने पति की बात का विश्वास क्यों नहीं होता!! जब देखो तब एक ही बात.. !! चल.. अब मुंह में लेकर चूस.. और इसे एकदम सख्त कर.. फिर से नरम होने लगा... " ससुर ने अपने पत्नी के बाउन्सर के सामने झुककर अपना सिर बचा लिया
"अब इतना कडक तो हो गया है.. और कितना सख्त करना है तुम्हें..!! चोदना है या दीवार में छेद करना है!! चलो.. अब जल्दी से डाल दो.. तुम्हारे ये देखकर मुझे भी कुछ कुछ हो रहा है.. "
रूखी का ससुर तुरंत ऊपर चढ़ गया.. और अपनी पत्नी के ढीले-ढाले भोसड़े को ठोंकने लगा..
"आह्ह.. जरा धीरे से.. दर्द होता है अंदर.. आहह आह्ह.. !!" सिसकारते हुए रूखी की सास भी ताव में आकर चुदने लगी और उसने भी इस काम-उत्सव में अपना नामांकन करवा दिया
"बाप रे भाभी.. !! देखो तो सही.. इस उम्र में भी ये बूढ़ा कितना जोर लगा रहा है... !! सच ही कहते है.. मर्द और घोडा कभी बूढ़ा नहीं होता!!" रूखी ने शीला से कहा
शीला रूखी के पीछे खड़ी थी.. उसने अपने दोनों हाथों से रूखी की गदराई कमर को सहलाना शुरू कर दिया.. और शीला के मुलायम तकिये जैसे स्तन रूखी की पीठ पर दब रहे थे। दोनों की आँखों के सामने रूखी के सास और ससुर की घमासान चुदाई चल रही थी।
शीला ने रूखी के चेहरे को पीछे की तरफ खींचा और उसके होंठों को एक गरमागरम चुंबन रसीद कर दिया.. रूखी भी घूमकर शीला के सामने आ गई और दोनों पागल प्रेमियों की तरह एक दूसरे से लिपट गए.. सास-ससुर का कामुक वृद्ध सेक्स देखकर दोनों सखियों की पूत्तियाँ कामरस टपकाने लगी.. शीला ने रूखी की चोली में हाथ डालकर उसके भरावदार स्तनों को मसलन शुरू किया जबकि उसके दूसरे हाथ ने रूखी के घाघरे में घुसकर उसकी चुत का हवाला संभाल लिया था..
अपने ससुर का मस्त खूंटा देखकर उकसाई हुई रूखी अपनी बेकाबू वासना को शांत करने के लिए शीला के होंठों को चूसने लगी.. कभी शीला रूखी के होंठ चूमती तो कभी रूखी शीला की जीभ को रसगुल्ले की तरह चूसती.. उनकी नज़रों के सामने ही रूखी के सास-ससुर कामक्रीड़ा में इतने मशरूफ़ थे की उन्हे आसपास का कोई ज्ञान न था.. वह दोनों केवल अपनी हवस शांत करने की कोशिश कर रहे थे
शीला और रूखी.. एक दूसरे के अंगों को सहलाकर.. मसलकर.. बिना लंड के अपनी चूतों की आग को शांत करने के निरर्थक प्रयत्न कर रहे थे। रूखी के भोंसड़े में चार उँगलियाँ अंदर बाहर करते हुए शीला ने कमरे में अंदर नजर डाली.. रूखी की सास.. अपने पति के लंड पर सवार होकर कूद रही थी.. ससुर ने उसकी कमर पकड़कर उसे संतुलित कर रखा था.. और सास गांड उछाल उछाल कर जबरदस्त धक्के लगा रही थी.. काफी जद्दोजहत के आड़ चारों झड़ने में कामयाब हो गए।
जैसे ही वह बूढ़ी सास अपना रस झड़वाकर लंड से नीचे उतरी.. शीला और रूखी दोनों को जबड़े आश्चर्य से लटक गए.. बाप रे!! ससुर का विकराल लोडा वीर्य से लसलसित होकर अपनी बीवी की चुत से निकलकर ऐसे झटके खा रहा था जैसे को योद्धा युद्ध लड़ने के बाद हांफ रहा हो!!
"चल रूखी.. मैं अब निकलती हूँ.. अभी तेरी सास बाहर आएगी.. "
"ठीक है भाभी.. आप जाइए.. मैं बाद में आती हूँ आपके घर.. "रूखी ने कहा
शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।
शीला अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए निकल गई.. इस बार वह चलते चलते अपने घर पहुंची।
शीला सोच रही थी.. क्या काम होगा कविता को? तभी कविता खुद उसके घर पर आ पहुंची.. बहोत खुश लग रही थी कविता.. शीला जानती थी की बिना लंड से झटके खाए.. किसी स्त्री के चेहरे पर ऐसी मुस्कान खिल ही नहीं सकती..
"सच सच बता कविता.. कल पीयूष ने बराबार चोदा है ना तुझे?" शीला ने पूछा
"पीयूष ने नहीं.. मेरे प्यारे पिंटू ने.. ये सब मेरे पिंटू का ही कमाल है" कहते हुए कविता शीला से लिपट पड़ी
"अच्छा.. !! ये भला कब हुआ?? वो तो कल चला गया था मेरे घर से.. तुम दोनों मिले कब??" शीला ने आश्चर्यसह पूछा
"कल रात पीयूष अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने गया था.. मैंने पिंटू को फोन करके बुला तो लिया.. पर सवाल ये था की हम दोनों मिले कैसे!! रात को दस बजे पीयूष हमारी सोसायटी में आ चुका था.. उसने मुझे पीछे वाली गली में मिलने के लिए बुलाया.. पर कमबख्त मेरी सास.. देर तक जागती रहती है.. टीवी पर बकवास सीरियलों ने दिमाग खराब कर रखा है उनका.. बुढ़िया बस टीवी से चिपकी रहती है.. कैसे निकलती बाहर!!"
कविता सारा घटनाक्रम बता रही थी उस दौरान शीला ने उसे बेड पर बिठाया और उसका स्कर्ट घुटनों तक ऊपर करते हुए.. हाथ डालकर उसकी पेन्टी खींच निकाली.. कविता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और वह बोलती ही रही.. शीला की हरकतों से उसके पतले गोरे बदन में सुरसुरी सी होने लगी.. शीला ने कविता को हल्के से धक्का दिया और उसकी पीठ दीवार के साथ सट गई.. और दीवार के सहारे वह आधी लेटी हुई पोजीशन में आ गई.. शीला ने उसके घुटने मोड़कर पैर चौड़े किए.. कविता की बिना झांटों वाली चिकनी पूत्ती देखकर शीला एक पल के लिए ईर्ष्या से जल उठी.. सफाचट नाजुक मोगरे की कली जैसी कविता की जवान चुत के दोनों होंठ फड़फड़ाने लगे..
शीला ने झुककर कविता की पुच्ची की चूम लिया..
"आह्हहह भाभी.. " कविता कराह उठी
"तू बोलना जारी रख.. फिर किस तरह निकली घर से और कैसे मिले तेरे पिंटू से.. ?"
"ओह्ह भाभी.. क्या कहूँ!! मुझे आपकी याद आ गई.. मैं आपके घर आने के बहाने, छाता लेकर बाहर निकली.. और आपके घर के पीछे जो सुमसान गली है ना.. वहाँ पिंटू को बुला लिया.. हल्की हल्की बारिश हो रही थी.. और उस गली में घर के बाहर को नहीं था.. काफी अंधेरा भी था.. वहीं बिजली के खंभे के पास पिंटू ने मुझे खड़े खड़े पीछे से चोद दिया..पर भाभी.. पिंटू अब पहले के मुकाबले काफी कुछ सीख चुका है.. पहले तो उस अनाड़ी को मेरे छेद के अंदर घुसाना भी ठीक से नहीं आता था.. पर पता नहीं कैसे.. कल रात को उसने किसी अनुभवी मर्द की तरह मेरी ठुकाई की.. पहले पहले तो उसे चुत चाटना भी नहीं आता था..और चुदाई भी ठीक से नहीं कर पाता था.. पर कल रात को उसने मुझे जो चोदा है.. आहाहाहा.. मेरी चुत में दर्द होने लगा तब तक धक्के लगाए उसने.. और जमीन पर बैठकर मेरी चुत भी चाटी.. कुछ समझ में नहीं आ रहा.. मेरा अनाड़ी पिंटू ऑलराउंडर कैसे बन गया?? कहीं किसी बाजारू औरत के पास तो नहीं गया होगा ना!! कुछ तो गड़बड़ है!!"
शीला ने कविता की बात का कोई जवाब नहीं दिया और मुसकुराते हुए कविता की टाइट चुत पर अपना मुंह चिपका दिया.. कविता ने "ओह्ह.. ओह्ह" सिसकते हुए अपने चूतड़ ऊपर उठा दिए और शीला के सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ लिया.. उसकी उत्तेजित चुत में शीला ने दो उँगलियाँ घुसेड़ कर अंदर बाहर करते हुए चाटना शुरू कर दिया.. इस दोहरे हमले के आगे कविता निसहाय थी.. उसे याद आया की पिंटू ने भी पिछली रात बिल्कुल इसी तरह किया था.. पर शीला ने कविता के दिमाग को ज्यादा सोचने की स्थिति में ही नहीं रहने दिया.. अद्भुत, कामुक और शृंगारिक तरीके से हो रही चुत चटाई ने कविता के दिमाग पर ताला लगा दिया..
अपने अमूल्य खजाने को शीला के हाथों में सौंपकर कविता अपने नागपुरी संतरों जैसे उरोजों को मसलकर अपनी आग को बुझाने के निरर्थक प्रयत्न करने लगी.. पर शीला की उंगलियों में असली लंड जैसा मज़ा कहाँ से मिलता !!! कल रात को पिंटू ने बिजली का खंभा पकड़ाकर जिस तरह उसे पीछे से धमाधम शॉट मारे थे उसके झटके कविता की चुत में अब तक लग रहे थे।
"आह्हह भाभी.. अब ओर नहीं रहा जाता मुझसे.. कुछ कीजिए प्लीज.. " शीला ने कविता की पूत्ती को चाटते हुए अपनी उंगलियों को तेजी से अंदर बाहर करना शुरू किया.. कविता के सुंदर स्तनों को देखकर शीला भी गरमा गई.. उसने कविता की चुत से अपनी उँगलियाँ निकाली.. और अपने सारे कपड़े उतार दिए.. कविता तो इस नग्न रूप के ताजमहल की सुंदरता देखकर चकाचौंध हो गई..
"हाय भाभी.. कितना गदराया शरीर है आपका !! ये गोरी गोरी चिकनी मांसल जांघें.. और मदमस्त मोटी गांड.. में लड़की होकर भी ललचा गई देखके.. तो मर्दों की क्या हालत होती होगी.. !!" कहते हुए कविता ने शीला के खरबूजों जैसे स्तनों के साथ खेलना शुरू कर दिया..
शीला ने कविता का मुंह अपने बबलों पर दबा दिया.. गुलाबी रंग की निप्पल को थोड़ी देर चूसते रहने के बाद कविता ने कहा "अगर इसमें दूध आता होता तो कितना मज़ा आता!!! पीयूष कई बार मुझसे कहता है.. उसे दूध भरे मम्मे चूसने की बड़ी इच्छा है.. और हाँ भाभी.. आपसे एक और बात भी पुछनी है"
शीला: "हाँ पूछ ना"
कविता: "कैसे कहूँ.. अमममम.. मेरे पति पीयूष को एक बार आपके बॉल दबाने है.. उसे बहोत पसंद है आपके.. रोज रात को मेरी छाती दबाते हुए वो आपका ही नाम लेता है.. "
सुनते ही शीला के भोसड़े में दस्तक सी लगने लगी.. एक नए लंड की संभावना नजर आते ही उसकी चुत छटपटाने लगी..
"बेशरम.. कैसी गंदी गंदी बातें कर रही है तू कविता.. !! बोलने से पहले सोचती भी नहीं तू.. कुछ भी बोल रही है.. पीयूष को तो में कितने आदर की नजर से देखती हूँ.. वो कभी ऐसी बात नहीं कर सकता!!"
"सच बोल रही हूँ भाभी..मेरे तो छोटे छोटे है.. पीयूष को बड़े बबले पसंद है.. जब देखों तब बड़ी छातियों वाली औरतों की तारीफ करता रहता है.. और जब मौका मिले तब उन्हे ताड़ता रहता है.. "
सुनते ही शीला का भोसड़ा पानी पानी हो गया.. उसने कविता को अपनी बाहों में भर लिया और उसके रसभरे होंठों को एक लंबा चुंबान किया
"अगर तेरा पति मेरे बबले दबाएगा तो तुझे कोई एतराज नहीं होगा ना?? बोलने तक तो बात ठीक है पर कोई भी पत्नी ये बर्दाश्त नहीं कर पाती.. पर तू ध्यान रखना कविता.. कहीं तेरा पति पीयूष किसी गदराई छाती वाली के साथ उलझ ना जाएँ.. नहीं तो तेरा सुखी संसार तहस नहस हो जाएगा.. इन मर्दों का और उनके लोडों का कोई भरोसा नहीं.." शीला ने कहा
ये सुनकर कविता बॉखला गई..
शीला की चुत में शकुनि का दिमाग था.. नई संभावना जागृत होते ही उसकी चुत और दिमाग दोनों पासे फेंकने लगे
कविता की क्लिटोरिस को अपने अंगूठे और उंगली के बीच पकड़कर शीला ने ऐसा दबाया की कविता अपनी कमर उठाते हुए उछल पड़ी.. और बिस्तर पर पटक गई..
"हाईईई भाभी.. मर गई.. आहहहह.. निकल गया मेरा.. !! क्या किया आपने.. कहाँ छु लिया था.. !! मुझे तो मज़ा आ गया भाभी.. ईशशश"
शीला दो घड़ी के लिए थम गई.. जब तक की कविता की सांसें नियंत्रित न हो गई फिर उसने कविता से पूछा
"वैसे पीयूष देखने में तो बड़ा हेंडसम है.. !!"
"हाँ, वो तो है.. " कविता ने जवाब दिया
शीला: "तो तुझे पिंटू से चुदवाना ज्यादा पसंद है या अपने पति पीयूष से??"
कविता: "सच कहूँ भाभी.. तो मुझे पिंटू से चुदना ज्यादा पसंद है.. पिंटू एकदम मस्त है.. और मेरा बचपन का प्रेमी है.. इसलिए उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है मुझे.. "
शीला: "ठीक है.. में तुझे एक रास्ता दिखाती हूँ.. तुझे बिल्कुल वैसे ही करना है.. देख.. वैसे मुझे पीयूष से अपने बबले दबवाने का कोई शौक नहीं है.. पर बड़ी छातियों के चक्कर में कहीं वो किसी रंडी से ना उलझ जाएँ ये भी हमें देखना पड़ेगा.. नहीं तो तेरा संसार तबाह हो जाएगा.. समझी!!"
कविता: "ठीक है भाभी.. आप जैसा कहेंगी वैसा ही में करूंगी.. "
शीला: "एक काम कर.. आज गुरुवार है.. कल शुक्रवार को कोई न कोई नया मूवी आएगा.. पीयूष को मूवी देखना पसंद है क्या?"
कविता: "अरे भाभी.. अभी दो दिन पहले ही वो कह रहा था.. की कोई नई मूवी देखने चलते है"
शीला: "वाह.. फिर तो हमारा काम आसान हो गया.. आज रात को तू पीयूष को बोलना की शीला भाभी को मूवी देखने जाना है पर किसी की कंपनी ढूंढ रही है.. तो क्या हम साथ चलें उनके साथ मूवी देखने के लिए..!! और कहना की मुझे शीला भाभी को जल्दी जवाब देना है" कविता को कुछ समझ में नहीं आया पर वह सुनती रही
शीला: "अगर वो आनाकानी करे तो उसे कहना की शायद भीड़ में उसे शीला भाभी के स्तनों को छूने का मौका मिल जाएँ.. ऐसे लालच देगी तो वो तुरंत तैयार हो जाएगा.. समझी..!! में मूवी की चार टिकट बुक करवा देती हूँ.. रात के शो की.. !!"
कविता: "चार टिकट क्यों भाभी??" हम तो सिर्फ तीन ही है ना!!"
शीला: "अरे पगली.. जब पीयूष मेरे मम्मे मसल रहा होगा तब तेरे इन संतरों का रस चुसनेवाला भी कोई चाहिए ना !! तू फोन करके पिंटू को बुलाया लेना.. वहाँ मल्टीप्लेक्स पर हम पीयूष की नजर बचाकर, पिंटू को टिकट थमा देंगे.. और बता देंगे की हॉल में जब पूरा अंधेरा हो तब वो चुपके से आकार तेरे बगल की सीट पर बैठ जाएँ.. तू अपने यार के संग मजे मारना तब तक में तेरे पति का खयाल रखूंगी.. "
शीला की यह योजना सुनकर कविता उछल पड़ी.. प्रेमी को मिलने के लिए वो अपने पति को शीला के पास गिरवी रखने को तैयार थी.. उसकी आँखों में ऐसी चमक आ गई जैसे अभी अभी पिंटू से चुदकर आई हो..
"पर भाभी.. पीयूष को पता चल गया तो?? वो पिंटू को मेरे बॉल मसलते देख लेगा तो क्या करेंगे??" कवर के ऊपर से शॉट खेलने का प्रयास करती शीला के सामने कविता ने एल.बी.डब्ल्यू की अपील की..
जवाब में शीला ने अपने दोनों मस्त स्तनों को आपस में दबा दिया.. और उन दोनों के बीच की दरार दिखाते हुए बोली
"कविता.. इस खाई में आजतक जो भी गिरा है ना.. वो कभी वापिस नहीं लौटा.. तेरे पीयूष को भी इस खाई में ऐसे धकेल दूँगी.. की मूवी के तीन घंटों के दौरान पीयूष ये भी भूल जाएगा की वो शादीशुदा है.. तू चिंता मत कर.. और देख.. प्रेमी के संग रंगरेलियाँ मनानी हो तो रिस्क लेना पड़ेगा.. हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी तो प्रेमी और पति, दोनों को गंवा बैठेगी.. "
कप्तान द्वारा टीम से निकाले जाने की धमकी मिलने के बाद प्लेयर की जो हालत होती है.. वही हालत कविता की हो गई..
कविता ने मन में ठान ली.. "कुछ भी हो जाए भाभी.. इस योजना को हम सफल बनाके ही रहेंगे.. आप बस टिकट का बंदोबस्त कीजिए.. बाकी काम काम मुझपर छोड़ दीजिए"
शीला: "तू टिकट की चिंता मत कर.. पहेले पीयूष को राजी कर.. और पिंटू को मेसेज पर पूरा प्लान बता देना.. और उस चोदू को बोलना की मोबाइल हाथ में ही रखे.. आज कल के लौंडे जीन्स की पिछली पॉकेट में फोन रखकर भूल जाते है.. मल्टीप्लेक्स पर ऐसा कुछ हुआ तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा.. उसे कहना की लेडिज टॉइलेट के पास हमारा इंतज़ार करें.. समझ गई ना तू??"
कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझ दूँगी.. और पीयूष को भी माना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..
शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था
कविता: "हाँ भाभी.. में पिंटू को सब कुछ समझा दूँगी.. और पीयूष को भी मना लूँगी" अपने टॉप के बटन बंद करते हुए कविता ने इस शैतानी प्लान पर अपनी महोर लगा दी.. और अपने घर चली गई..
शीला ने मुसकुराते हुए अपनी चुत को थपथपाया.. जैसे उसे शाबासी दे रही हो.. अब पीयूष नाम के बकरे को हलाल करने का वक्त आ चुका था
सुबह ४:४५ को रसिक दूध देने आया.. शीला ने दरवाजा खोला और आजूबाजू नजर डालकर देखा.. चारों तरफ घोर अंधकार था..
शीला ने रसिक की धोती के लंगोट के ऊपर से ही उसके लंड को सहलाते हुए पूछा
"मुझसे नाराज है क्या रसिक??"
"नहीं नहीं भाभी.. " कहते हुए रसिक ने अपनी लंगोट को हटाकर काले अजगर जैसा अर्ध जागृत लंड बाहर निकालकर शीला के हाथ में थमा दिया
"बाप रे बाप.. कितना बड़ा है ये रसिक.. " कहते हुए शीला उसके काले लंड को ऐसे आगे पीछे करने लगी जैसे भेस के काले थन को दुह रही हो.. काफी भारी था रसिक का लंड!! दरवाजे पर खड़े खड़े ही शीला ने उसे बड़े ही उत्तेजक ढंग से सहलाया.. परीकथा के राजकुमार की तरह रसिक का लंड पलक झपकाते है बड़ा हो गया..
रसिक ने गाउन के ऊपर से ही शीला के थनों को मसलते हुए उसे अपनी ओर खींच लिया.. शीला रसिक से ऐसे चिपक गई जैसे चुंबक से लोहा चिपक जाता है.. अपने कोमल हाथों से रसिक के सम्पूर्ण उत्तेजित.. मर्दानगी से भरपूर लोड़े की चमड़ी को थोड़ा सा पीछे करते ही.. लाल एल.ई.डी बल्ब की तरह रसिक का टमाटर जैसा बड़ा सुपाड़ा टिमटिमा उठा..
"आह रसिक.. भोसड़ी के.. कितना मोटा है तेरा ये.. " कहते ही शीला घुटनों के बल बैठ गई.. और लावारस से भरपूर उस विकराल लंड को थोड़ा थोड़ा करके पूरा मुंह में ले लिया.. रसिक ऐसे स्थिर हो गया जैसे समाधि में खड़ा हो.. उसका पूरा शरीर तंबूरे के तार की तरह तंग हो गया.. शीला रसिक के लोड़े पर इस तरह टूट पड़ी जैसे वो उससे आखिरी बार मिल रही हो.. !! सबक-सबक की आवाज़ें करते हुए वह रसिक का लंड चूसने लगी.. पूरा लंड मुंह से बाहर निकालकर जब वापिस अपने मुंह मे अंदर लेती तब बेबस रसिक अपनी कमर से हल्का सा धक्का देकर शीला को जवाब देने की निरर्थक कोशिश करता..
लस्सेदार वीर्य से भरे हुए बड़े बड़े अंडकोशों को सहलाते हुए शीला ने मुख-मैथुन जारी रखा.. उसने अंदाजा लगाया की रसिक के टट्टों में कम से कम आधे कप जितना वीर्य भरा होगा.. रसिक के अमरूद जीतने बड़े आँड़ों को हथेली में भरते हुए शीला उनका वज़न नाप रही थी.. रसिक अब छटपटाने लगा था..
"ओह्ह भाभी.. !!" शीला ने एक पल के लिए उसका लंड मुंह से बाहर निकाला.. थोड़ी देर के लिए रुकी.. और एक गहरी सांस लेकर रसिक की बालों वाली जांघों को चाटने लगी.. अपनी लार से उसने रसिक की दायें ओर की जांघ को गीला कर दिया.. उस दौरान शीला की मुठ्ठी रसिक के लंड पर लगातार चल रही थी.. इस हलचल से शीला के दोनों अमृतकुंभ रसिक के घुटनों से ऐसे टकरा रहे थे जैसे समंदर की लहरें किनारे पर पड़े पत्थर से टकरा रही हो..
थोड़ा सा और झुककर शीला ने रसिक को अंडकोशों को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू किया.. शीला की इस हरकत ने रसिक को अचंभित कर दिया.. शीला उसके आँड ऐसे चूस रही थी जैसे बर्फ का गोला चूस रही हो.. शीला के मुख की गर्मी से रसिक का लंड और सख्त हो गया.. शीला अपनी जीभ से रसिक की पिंग-पोंग गेंदों को हल्के से दबा रही थी.. जैसे अंदर भरे वीर्य को बाहर आने के लिए उकसा रही हो.. शीला के हाथ रसिक के पीछे पहुँच गए और उसके मर्दाना कूल्हों को सहलाने लगी..
थोड़ी देर रसिक के गोटों को चूसने के बाद शीला ने उन्हे जमानत पर छोड़ दिया और उसके लंड को फिरसे अपने मुंह की हिरासत में ले लिया.. लंड की सख्ती का स्पर्श अपने मुंह में होते ही शीला ज्यादा उत्तेजित हो कर रसिक के कूल्हों से खेलने लगी.. जब स्त्री पुरुष के कूल्हों से खिलवाड़ करती है तब मर्द को बड़ा अच्छा लगता है.. और फिर वह उत्तेजित मर्द, उस स्त्री के सारे अरमान पूरे कर देता है!!
रसिक का लंड शीला के मुंह में ऐसे ठुमकने लगा जैसे मुजरा कर रहा हो.. दो तीन ऐसे ही ठुमके लगाकर उसके सुपाड़े के छेद से गरम गरम वीर्य की पिचकारी निकल गई.. शीला के लिए वीर्य का स्वाद नया नहीं था.. उसने काफी बार अपने पति मदन के लंड का रस चखा हुआ था.. बिना किसी हिचकिचाहट के शीला ने रसिक के उपजाऊ रस की आखिरी बूंद तक चूस ली.. इतना ही नहीं.. रसिक के आँड का सारा माल निगल लेने के बाद भी शीला उसके लंड के लाल सुपाड़े को मुंह में दबाकर ऐसे चूस रही थी जैसे स्ट्रॉ से लस्सी पी रही हो.. बड़ी ही धीरज से वो तब तक चूसती रही जब तक की रसिक के लंड का दिवाला नहीं निकल गया..
इस अद्भुत मुख-मैथुन के बाद अपने होंठों को पोंछते हुए शीला खड़ी हुई.. बिखरे हुए बालों में उत्तेजित शीला को देखकर एक पल के लिए रसिक डर सा गया.. कामातुर स्त्री कभी कभी शृंगारिक होने के साथ साथ आक्रामक भी बन जाती है.. शीला ने रसिक के बालों को मजबूती से पकड़कर नीचे बैठा दिया.. और अपना एक पैर रसिक के कंधे पर रख दिया.. हवस के कारण शीला ने अब थोड़ा सा हिंसक रूप धारण कर लिया था.. दूसरी तरफ बेचारे रसिक का तो काम तमाम हो चुका था इसलिए शीला की हरकतों का विरोध करने की उसमे ताकत ही नहीं बची थी.. पर फिर भी वो समझ गया की शीला उससे क्या करवाना चाहती थी..
शीला ने अपना गाउन ऊपर किया.. और उसके कामातुर शरीर में हो रहे भूकंप का केंद्र ढूंढ निकाला.. और भूकंप के कारणों का अभ्यास करने लगी..
उसी दौरान बगल के घर (बगल का घर मतलब.. अनुमौसी का घर) का दरवाजा खुलने की आवाज आई.. शीला ने तुरंत अपना गाउन नीचे किया और रसिक को उसके अंदर छुपा दिया.. दरवाजे खुलते ही अनुमौसी बाहर निकली.. दोनों के बीच ४ फिट की दीवार थी और काफी अंधेरा भी था इसलिए शीला के नीचे का द्रश्य अनुमौसी को नजर नहीं आ रहा था.. पर ये अनुमौसी भी पक्की खिलाड़ी थी.. वह दरवाजे से चलते चलते शीला के घर की दीवार की ओर आई .. जिसकी दूसरी तरफ शीला अपने गाउन के अंदर रसिक को छुपाकर खड़ी थी..
"कैसी हो शीला?? " अनुमौसी की आवाज ने शीला को झकझोर दिया
"एकदम बढ़िया हूँ मौसी" शीला ने भी अपने झूठ का व्यापार चलने दिया
"अभी तक वो कमबख्त रसिक नहीं आया दूध लेकर.. दूध देर से आता है तो चाय भी देर से ही पीने मिलती है.. और चाय टाइम पर न मिले तो पूरा दिन खराब हो जाता है" अनुमौसी ने रसिक की शिकायत करते हुए कहा
"हाँ मौसी.. दिन ब दिन रसिक बिगड़ता ही जा रहा है.. अब तो दूध भी पहले जैसा नहीं देता.. मुझे तो लगता है की कमीना पानी मिलाता होगा.. " कहते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच रसिक को दबा दिया
अपने बारे में चल रही इस बातचीत को सुनकर रसिक को बड़ा गुस्सा आया.. उसने शीला की क्लिटोरिस पर हल्के से काट लिया
"ऊईई माँ.. "शीला चीख पड़ी..
अनुमौसी: "क्या हुआ तुझे शीला?? तू ठीक तो है ना?"
"कुछ नहीं मौसी.. कुछ दिन से पौधों में चींटियाँ बढ़ गई है.. लगता है चींटी ने ही काट लिया.. मौसी। में भी रसिक का इंतज़ार करते हुए खड़ी हूँ.. अब आता ही होगा.. " अनुमौसी का पीछा छुड़ाने के लिए शीला ने कहा
अनुमौसी और शीला की बातें चल रही थी उस दौरान रसिक ने शीला की चुत की फांक को फैलाकर उसमें जीभ फेरना शुरू कर दिया था। शीला ने अपने गाउन के अंदर रसिक को ऐसे छुपाकर रखा था मानों खुले में स्तनपान करवा रही कोई स्त्री पल्लू में अपनी गरिमा को छुपाये बैठी हो।
"ये कमबख्त मौसी जाएँ तो में रसिक को गाउन से बाहर निकालूँ.. " शीला फंस गई थी.. और रसिक चटखारे लगाते हुए उसके भोसड़े को चाट रहा था.. मौसी से बात करते हुए शीला गाउन के ऊपर से ही रसिक का सिर सहला रही थी..
"ओह.. मैंने पानी गरम करने के लिए रखा.. और गैस चालू करना तो भूल ही गई.. " कहते हुए अनुमौसी अपने दरवाजे के अंदर गई.. और तभी शीला ने रसिक के बालों को खींचकर अपने गाउन से बाहर निकाला.. और उसे बाहों में लेकर चूम लिया..
शीला रसिक के कानों में फुसफुसाई.. "जल्दी भाग रसिक.. कहीं वो बुढ़िया फिर से टपक पड़ी तो मेरी इज्जत की नीलामी कर देगी.. और तेरा भी सोसायटी में घुसना बंद करवा देगी" रसिक तुरंत अपना मुंह पूछकर धोती ठीक करने लगा.. और कंपाउंड का दरवाजा खोलकर चलते चलते गली के नुक्कड़ पर पहुँच गया जहां पर उसकी साइकल रखी हुई थी.. शीला भी घर के अंदर चली गई..
इस सारे द्रश्य को किचन की खिड़की से छुपकर देखकर अनुमौसी मुस्कुरा रही थी..
शीला ड्रॉइंग रूम में सोफ़े पर आकार बैठी ही थी की तभी उसे अनुमौसी की आवाज सुनाई दी.. "अरे शीला.. रसिक आ गया है दूध लेकर.. !!"
"अभी आई मौसी.. " शीला पतीली लेकर बाहर आई और दूध लेकर तुरंत अंदर चली गई.. उसने मस्त मसालेदार चाय बनाई और नाश्ते के साथ चाय की चुस्की लगाते हुए अपनी चुत को सहलाने लगी.. रसिक ने आज जबरदस्त चटाई करते हुए उसकी चुत को शांत कर दिया था.. शीला बहुत खुश थी आज..
नहाकर उसने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी अपने बरामदे में लगे झूले पर बैठकर सब्जी काटने लगी.. लगभग ११ बजे के आसपास कविता उसके घर के कंपाउंड में झाड़ू लगाने आई.. पतली सी कविता के शरीर में काफी चपलता थी,.. उसकी स्फूर्ति को देखकर शीला सोचने लगी... "कितनी नाजुक और छुईमुई सी है कविता.. " उकड़ूँ बैठकर झाड़ू लगा रही कविता का स्कर्ट घुटनों के ऊपर तक चढ़ गया था.. और उसकी दूध जैसी गोरी जांघें बेहद आकर्षक लग रही थी.. कविता की पतली कमर देखकर शीला की आहह निकल गई.. वाकई में पीयूष को कविता के रूप में जेकपोट मिल गया था.. वैसे पीयूष भी काफी हेंडसम था.. ज्यादा गोरा तो नहीं था अपर ठीकठाक दिखता था.. हाँ उसके कंधे थोड़े और चौड़े होते तो ज्यादा आकर्षक लगता.. मर्द के कंधे ऐसे चौड़े होने चाहिए की जब वो स्त्री को आगोश में भरे तब उस स्त्री को कंधों पर सिर रखकर जनम जनम तक उसी अवस्था में रहने की इच्छा हो .. जीवा और रसिक के कंधों जैसे..
रसिक की तो छाती भी एकदम चौड़ी थी.. गाँव के रहन-सहन और शुद्ध आहार के कारण वो दोनों ऐसे मजबूत थे.. इन शहरी जवानों में वो वाली बात नजर ही नहीं आती.. जीवा का तो जिस्म भी ऐसा भारी था की ऊपर चढ़कर जब शॉट लगाएं तो नीचे लेटी औरत को पूरे ब्रह्मांड के दर्शन एक ही पल में हो जाएँ.. गजब का था जीवा.. उस रात उसने जिस तरह चुदाई की थी वह बड़ी ही यादगार थी.. उसके विकराल लंड के भयानक धक्कों से शीला की बच्चेदानी तक हिल गई थी.. और फिर रघु ने जिस तरह उसकी गांड मारी थी.. आहहाहाहाहा.. मज़ा ही आ गया था.. शीला के दिमाग में ये सारे फितूर चल रहे थे
झुककर झाड़ू लगाती हुई कविता के टॉप से उसके दोनों संतरे नजर आ रहे थे शीला को.. सुबह का वक्त था इसलिए उसने ब्रा नहीं पहनी हुई थी.. कविता के गुलाबी चूचुक इतने प्यारे लग रहे थे की उन्हे देखने में शीला सब्जी काटना भी भूल गई.. झुकी हुई कविता के स्तन के बीच की दरार देखने में इतनी सुंदर लग रही थी की क्या कहें!!! कविता के बिखरे हुए बाल.. झुकने के कारण पीछे से ऊपर चढ़ जाते टॉप के कारण दिख रही उसकी गोरी खुली कमर.. अपने हुस्न के जलवे बिखेर कर घर के अंदर चली गई कविता!! और इसी के साथ शीला की समाधि भी टूट गई..
शीला घर के अंदर आई और सब्जी को कढ़ाई में डालकर तड़का लगाया.. और रोटी के लिए आटा गूँदने लगी.. आटा गूँदते गूँदते उसे रूखी के दूधभरे खरबूजों की याद आ गई.. रूखी और उसके ससुर के बीच जो कुछ भी हुआ था.. शीला की आँखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगा.. अच्छा हुआ ये रसिक हाथ लग गया.. वरना अभी भी चुत खुजाते हुए तड़प रही होती!! एक मर्द के स्पर्श और उसके सख्त लंड के लिए वो कितना तड़प रही थी!! जिस तरह मैं अपने पति की गैरमौजूदगी में.. मर्द के स्पर्श, उसके लिंग और उसकी गर्माहट के लिए तड़प रही थी.. वैसे ही कई मर्द अपनी पत्नी की गैरहाजरी में चूचियाँ और चुत के लिए तड़प रहे होंगे.. शीला के दिमाग में ये सारे विचार अविरत चल रहे थे
आटा गूँदकर तैयार हो गया था.. शीला ने रोटी बनाई और प्लेट में खाना लेकर टीवी के सामने बैठ गई.. टीवी पर कोई बाबाजी प्रवचन दे रहे थे.. और सारी महिलायें उन्हे एकटक होकर सुन रही थी.. शीला को मज़ा नहीं आया.. उसने चैनल बदलकर देखा.. एक चैनल पर ठीकठाक अंग्रेजी पिक्चर चल रही थी.. देखते देखते उसने खाना खतम किया और बिस्तर पर लेट गई।
चुदाई के सुकून और काम की थकान के बाद हमेशा अच्छी नींद आती है.. यही सोचते हुए शीला ने अपनी दोनों जांघों के बीच तकिया दबाया.. और सोने का प्रयास करने लगी। जब तक तकिये को अपने भोसड़े से सटाकर ना रखे.. तब तक उसे नींद ही नहीं आती थी। जैसे छोटे बच्चों को अंगूठा चूसते हुए सोने की आदत होती है वैसे ही शीला को चुत के पास तकिये के दबाव से ही नींद आती थी।
सोते सोते कब शाम के पाँच बज गए.. पता ही नहीं चला.. कविता ने जब दरवाजा खटखटाया तब शीला की नींद खुली
कविता: "भाभी.. पाँच बज गए.. आप अब तक तैयार नहीं हुई? ६ बजे पहुंचना है.. पीयूष तो तैयार भी हो गया.. जल्दी कीजिए"
शीला: "मेरी चिंता मत कर.. मुझे तैयार होने में देर नहीं लगेगी.. और मेरी बात ध्यान से सुन" कविता का हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर खींच लिया शीला ने "देख.. आज तू ब्रा या पेन्टी मत पहनना.. और अपने ढीले इलास्टिक वाली स्कर्ट पहनना.. " कविता को ज्ञान देते हुए शीला ने कहा
"क्यों भाभी??" कविता को समझ में नहीं आया
शीला: "बिल्कुल अनाड़ी है तू कविता.. मूवी के दौरान पिंटू जब तेरे टॉप में हाथ डाले तब सीधे तेरी चुची हाथ में आनी चाहिए.. ब्रा के चक्कर में मज़ा किरकिरा हो जाएगा उसका.. और स्कर्ट में हाथ डालेगा तब पेन्टी बीच में आएगी तो कैसे मज़ा आएगा!! बेचारे को ऐसा लगेगा की किला फतेह कर लिया पर खजाने की चाबी नहीं मिली.. "
कविता: "वाह भाभी.. आपका दिमाग तो बड़ा ही तेज चलता है.." कविता ने ब्लाउस के ऊपर से ही शीला के खजाने को मसलते हुए कहा "मैं चलती हूँ भाभी.. और हाँ.. आप भी ब्रा-पेन्टी मत पहनना.. वरना पीयूष को मज़ा नहीं आएगा" आँख मारते हुए कविता ने कहा और चली गई
चंचल, खिलखिलाती, सुंदर झरने जैसी कविता जब जा रहे थे तब उसके मटकते कूल्हे तक लटक रही चोटी को देखती रही शीला!!!
शीला ने अलमारी खोली और सोचने लगी की क्या पहनूँ !! काफी सारे कपड़े रिजेक्ट करने के बाद उसने मदन की भिजवाई हुई सिल्क की साड़ी और ब्लाउस पहन लिया.. आईने में अपने स्तनों को थोड़ा सा एडजस्ट करते हुए सोचने लगी.. कुदरत ने क्या जादू छुपाया है उसके स्तनों में!! सारे मर्द देखते ही रहते है हमेशा.. ब्लाउस के हुक को ऊपर से बंद किया तो उसके स्तन नीचे से बाहर निकल गए.. बड़ी मुश्किल से उन दोनों लफंगों को ब्लाउस के अंदर दबाकर उसने हुक बंद किए.. सिल्क के ब्लाउस और साड़ी में शीला किसी अप्सरा जितनी सुंदर लग रही थी..
कविता का फिरसे फोन आ गया था। शीला घर को ताला लगा रही थी तभी उसे पीयूष की आवाज सुनाई दी "क्या लग रही है??" शीला समझ गई की पीयूष कविता से उसके बारे में ही कह रहा था
पीयूष नुक्कड़ से ऑटो ले आया.. और तीनों रिक्शा में बैठ गए.. ट्राफिक को चीरते हुए, गड्ढों पर कूदते फाँदते रिक्शा आगे बढ़ने लगी.. शीला और पीयूष के बीच में कविता बैठी हुई थी। कविता की जांघ से अपनी जांघ दबते ही शीला रोमांचित हो गई.. कविता को एक तरफ शीला और दूसरी तरफ पीयूष का स्पर्श मिलते ही वह भी सिहर उठी.. मरून कलर के टॉप और काले स्कर्ट में कविता बेहद सुंदर लग रही थी। शीला तिरछी निगाहों से पीयूष को देखती रही और आगे की योजना बनाने में जुट गई।
लगभग २० मिनट के सफर के बाद वह तीनों मल्टीप्लेक्स पर पहुँच गए.. पीयूष ऑटो वाले को पैसे दे रहा था तब तक शीला ने बुकिंग काउन्टर से एडवांस बुकिंग करवाई हुई चार टिकट ले ली.. शीला ने कविता को वहीं काउन्टर पर रुकने को कहा और खुद लेडिज टॉइलेट की ओर चली गई.. पिंटू कहीं नजार नहीं आ रहा था.. शीला को गुस्सा आया.. वह समय की बड़ी पाबंद थी.. कोई देर से आए और उससे इंतज़ार करवाए वह उसे बिल्कुल पसंद नहीं था..
"कहाँ मर गया ये हरामखोर!! में यहाँ कितने सेटिंग कर रही हूँ और इसे तो कुछ पड़ी ही नहीं है!! साला चोदने और मजे मारने भी जो वक्त पर ना पहुँच पाएं उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है!!" शीला का पारा चढ़ता जा रहा था
"कैसी हो शीला भाभी?" पीछे से पिंटू की आवाज आई
"कब से तेरा इंतज़ार कर रही हूँ.. कहाँ मरवा रहा था तू? " शीला बरस पड़ी
"मैं तो टाइम पर ही आया हूँ.. आप ही जल्दी आ गए तो मैं क्या करू!!.." पिंटू ने सफाई देते हुए कहा
"ठीक है.. ठीक है.. ज्यादा होशियारी मत कर.. ये पकड़ टिकट.. और मूवी शुरू हो जाए उसके बाद अंधेरा होने पर ही अंदर आना... समझा..!!"
"भाभी.. आज तो आप बड़ी कातिल लग रही हो.. लगे हाथों आपके भी दबा दूँ तो दिक्कत तो नहीं होगी ना!!"
"मैं सेटिंग करती हूँ उसका भी.. मैं चलती हु अब.. वो दोनों मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे"
"ठीक है भाभी"
शीला तेजी से चलते हुए कविता और पीयूष के पास जा पहुंची।
"चलो कुछ खाते है" कविता ने कहा
"हाँ.. अभी कुछ खा लेते है.. बाद में भीड़ हो जाएगी" तीनों मल्टीप्लेक्स के अंदर बने रेस्टोरेंट में पहुँच गए। शो शुरू होने में अभी देर थी..
पीयूष तो शीला के गुंबज जैसे स्तन देखकर पागल सो हो गया था.. पीयूष को यूं घूरते हुए देखकर शीला ने मुस्कुराकर अपने पल्लू को इस तरह एडजस्ट किया की जिससे उनके उभार आसानी से नजर आ सके.. पीयूष गरम गरम सांसें छोड़ रहा था
रेस्टोरेंट में खाने का ऑर्डर देने के बाद तीनों बातें करने लगे..
शीला: "पीयूष, कैसा चल रहा है तेरा काम?"
पीयूष: "ठीक ही चल रहा है भाभी.. वैसे कविता आपसे काफी घुलमिल गई है.. बहोत तारीफ करती है आपकी"
कविता: "मैं नहीं भाभी.. ये पीयूष ही हर वक्त आपकी तारीफ करता रहता है.." कहते हुए कविता पीयूष के सामने देखकर हंसने लगी
पीयूष बेचारा शर्म से लाल हो गया
शीला: "मेरी तारीफ?? किस बात की तारीफ करते हो पीयूष.. जरा मुझे भी तो कहो"
पीयूष: "वो.. कुछ नहीं भाभी.. ये कविता भी ऐसे ही मज़ाक कर रही है"
कविता: "अच्छा बच्चू.. उस दिन तो बोल रहे थे की शीला भाभी बहोत सुंदर है.. कितने मस्त लगते है.. झूठ क्यों बोल रहे हो!!"
पीयूष ने जवाब नहीं दिया और अपनी नजरें झुका ली
शीला: "पीयूष.. ऐसा तो क्या पसंद आ गया मुझ में??"
कविता के सामने कुछ भी बोलने से शर्मा रहा था पीयूष..
पीयूष: "अरे भाभी.. आप हो ही ऐसी.. आप भला किसे पसंद नहीं आएगी.. !!!"
इसी तरह की शरारती बातों में तीनों उलझे रहे.. खाना आ गया और तीनों ने खा भी लिया.. पीयूष बिल देने के लिए रुक तब तक शीला और कविता रेस्टोरेंट के बाहर निकल गए.. शीला कविता को और एक-दो बातें समझा रही थी तभी पीयूष उनके पास आया.. और तीनों चलते हुए हॉल के बाहर बेंच पर बैठ गए।
नया मूवी था इसलिए काफी भीड़ थी.. एक १९-२० साल की लड़की, ब्लू जीन्स और सफेद टाइट टीशर्ट में घूम रही थी.. स्किन टाइट टीशर्ट से नजर आ रहे उसके मध्यम कद के गोल मटोल स्तनों को पीयूष घूर रहा था.. हाईहिल के सेंडल पहन वह लड़की मटकते हुए.. अपने स्तनों को उछलते हुए वहाँ से चली गई
शीला ने धीमी आवाज में कहा "मस्त लग रही है ना.. !!"
पीयूष: "हाँ भाभी.. एकदम धांसू लड़की थी"
शीला: "कविता, तू टीशर्ट क्यों नहीं पहनती?? कितनी सुंदर लगेगी तू टीशर्ट में?"
कविता: "मेरी सास को पसंद नहीं है भाभी.. इसलिए नहीं पहनती.. मेरे मायके में तो मैं रोज टीशर्ट ही पहनती थी.. पर शादी के बाद सब छूट गया"
पीयूष: "फिगर भरा भरा हो तो ही टाइट टीशर्ट जचती है..!!" इशारा उसके छोटे कद के स्तनों पर था ये समझ गई कविता
कविता: "अब कुदरत ने जिसे जैसा फिगर दिया उसमें थोड़े ही कोई बदलाव किया जा सकता है!!" पीयूष की कही बात से कविता अपमानित महसूस करने लगी।
शीला ने बात को घुमाने के इरादे से कहा "पीयूष, फिगर बड़ा हो या पतला.. सुंदरता तो देखने वाले की आँखों में होनी चाहिए"
शीला के अति-विकसित स्तनों की तरफ देखते हुए पीयूष ने कहा "फिर भी भाभी.. फरक तो पड़ता ही है" पीयूष की आँखों में शीला के स्तनों को दबाने की इच्छा साफ झलक रही थी। जिस लाचारी से भूखा भिखारी हलवाई की दुकान में पड़े गुलाबजामुन को देखता है.. बिल्कुल वही दशा पीयूष की भी थी..
शीला: "जैसे जैसे स्त्री की उम्र बढ़ती है.. वैसे वैसे ही जिस्मानी बदलाव होते रहते है.. मैं जब कविता की उम्र की थी तब मेरा फिगर भी कविता जैसा ही था" पीयूष को दिलासा देते हुए शीला ने कहा
आग बुझाने के बजाए उसमें पेट्रोल डाल रही थी शीला.. !!
शीला: "कविता, तू एक बार टीशर्ट पहन कर तो देख.. बहोत जाचेगा तुझ पर.. और तेरा फिगर इतना छोटा भी नहीं है.. ३६ की साइज़ तो होगी ही तेरी.. !!"
कविता: "३४ की साइज़ है मेरी, भाभी"
कविता का मन अब पिंटू को मिलने व्याकुल हो रहा था इसलिए पीयूष का ध्यान शीला की ओर आकर्षित करने के लिए उसने कहा "आपकी साइज़ क्या है भाभी??"
शीला: "४२ की साइज़ है मेरी"
ये सुनते ही पीयूष ने गहरी सांस ली.. शीला झुककर अपना सेंडल ठीक करने लगी.. और उसके ब्लाउस के ऊपर से दिख रहे नज़ारे से पीयूष को पसीना आने लगा..
शीला: "पीयूष, तुझे कैसा फिगर पसंद है? पतला या मोटा?"
पीयूष शरमाते हुए नीचे देखने लगा.. शीला और कविता हंस पड़े..
कविता: "पीयूष को तो सब बड़ा बड़ा ही अच्छा लगता है भाभी.. इसे तो मेरी फिगर पसंद ही नहीं है" रूठने का अभिनय करते हुए कविता ने कहा
अभिनय का गुण स्त्रीओं में जन्मजात होता है.. पर पीयूष इसे परख नहीं पाया.. और सकपका गया
पीयूष: "अरे कविता.. किसने कहा तू मुझे पसंद नहीं है!! बहोत पसंद है तू मुझे"
कविता: "लेकिन अगर मेरा फिगर शीला भाभी जैसा होता तो ज्यादा पसंद आता.. हैं ना!!"
शीला के सिखाने के अनुसार कविता बहुत बढ़िया तरीके से आगे बढ़ रही थी.. शीला भी बड़ी शांति से पति-पत्नी की इस मीठी नोक-झोंक को सुन रही थी
कविता: "आप से एक बात करनी थी.. आप बुरा मत मानना"
शीला: "बोल ना.. क्या बात है?"
कविता: "ऐसे नहीं.. पहले आप मुझे वचन दीजिए की आप बुरा नहीं मानोगी.. और मेरे बारे में बुरा नहीं सोचोगी"
शीला: "प्रोमिस.. अब बता मुझे.. "
कविता: "कैसे कहूँ.. मुझे तो शर्म आती है"
पीयूष: "अब पूछ भी ले.. एकता कपूर की तरह सस्पेंस खड़ा मत कर!!"
शीला हंस पड़ी..
कविता: "अभी नहीं भाभी.. अंदर हॉल में मूवी शुरू होने के बाद में कहूँगी"
पीयूष: "क्यों? पिक्चर शुरू हो जाने के बाद पूछने में शर्म नहीं आएगी तुझे?"
कविता: "ऐसा नहीं है पीयूष.. हॉल में अंधेरा होगा तो पूछने में शर्म नहीं आएगी.. चेहरा ही नहीं दिखेगा फिर शर्म कैसी!!"
शीला: "अंधेरे में तो बहोत कुछ हो सकता है.. जो कुछ भी उजाले में नहीं हो सकता वो सब कुछ अंधेरे में हो सकता है"
ये सुनते ही पीयूष की आँखों में चमक आ गई
कविता: "पीयूष, अभी वो सफेद टीशर्ट वाली लड़की की सीट, गलती से तेरी बगल में आ गई तो तू उसका फिगर दबाने में.. बड़े फिगर का मज़ा लेना मत भूल जाना"
पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"
शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "
कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..
पीयूष: "और अगर फिगर दबाने के चक्कर में सर पर जूते पड़ेंगे तो!!"
शीला: "तेरे सर पर जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है.. "
कविता और शीला दोनों हंस पड़े.. तभी शो का टाइम हो गया और हॉल का गेट खुल गया.. ऑडियंस अंदर जाने लगी..
पीयूष: "चलिए भाभी.. चलते है अंदर"
तीनों अंदर जाने के लाइन में खड़े हो गए.. सब से आगे कविता.. पीछे पीयूष.. और उसके पीछे शीला.. भीड़ की धक्कामुक्की की आड़ में शीला ने जान बूझकर अपने बम्पर पीयूष के पीठ पर दबा दिए..
शीला भाभी के इस प्रथम हमले से ही पीयूष पिघल गया..
टिकट का नंबर देखकर अपनी लाइन में घुसते हुए पहले शीला भाभी, फिर उसकी बगल में कविता और अंत में पीयूष.. इस तरह बैठ गए। शीला और कविता के पसीने छूट गए.. अब पिंटू को कैसे कविता के साथ सेट करेंगे!! अब पिंटू के साथ पिक्चर देखने की और मजे करने की इच्छा मन में ही रह जाएगी, ये सोचकर कविता का दिल बैठ गया..
शीला का दिमाग काम पर लग गया.. अब क्या करू?? कविता ने शीला की कमर पर अपनी कुहनी मारकर इशारे से पूछा.. अब क्या करेंगे?
पीयूष तो मस्ती से स्क्रीन पर चल रही ऐड्वर्टाइज़्मन्ट की मॉडलों को ताड़ रहा था
शीला को यकीन था की इतना उत्तेजित करने के बाद पीयूष उसके बगल में ही बैठेगा.. और मौका मिलते ही पिंटू और कविता साथ में अपना कार्यक्रम कर पाएंगे.. पर ये तो सब उलटा हो गया!! कविता बार बार कुहनी मारकर शीला से पूछ रही थी की अब क्या किया जाएँ!!
शीला ने फुसफुसाकर कविता के कान में कहा "अब सिर्फ पिक्चर ही देखेंगे.. और तो कुछ हो नहीं सकता"
"भाभी प्लीज.. कुछ कीजिए ना!!" कविता की शक्ल रोने जैसी हो गई.. उसने देखा की पिंटू कब से उनकी सीटों की लाइन के इर्दगिर्द चक्कर काट रहा था
शीला और कविता दोनों निराश होकर अपनी सीट पर बैठे रहे.. कविता की नजर, कोने में खड़े पिंटू पर थी.. वो भी इशारे के इंतज़ार में था। शीला का दिमाग और भोसड़ा, इस समस्या का निराकरण ढूँढने के काम पर लगे हुए थे.. तभी शीला के दिमाग में चिंगारी हुई और उसकी चुत में ४४० वॉल्ट का झटका लगा.. वो एकदम से खड़ी हो गई..
"बाप रे.. कितनी गर्मी लग रही है.. मैं यहाँ कोने में नहीं बैठूँगी.. पीयूष, तू इस तरफ बैठ जा.. "
पीयूष: "कोई बात नहीं भाभी.. आप यहाँ आ जाइए.. मैं वहाँ चला जाता हूँ" कहते ही पीयूष खड़ा हो गया और शीला की सीट पर बैठ गया..
कविता की जान में जान आई। पीयूष अब शीला और कविता के बीच में बैठ गया.. शीला का इशारा मिलते ही, पिंटू कविता की बगल वाली सीट पर चुपके से बैठ गया
जल बिन मछली की तरह तड़प रही कविता को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे वापिस पानी में डाल दिया गया हो.. उसका चेहरा खिल उठा
स्क्रीन पर पिक्चर शुरू हो गया.. पूरे हॉल में अंधेरा छा गया.. शीला ने धीर से अपने पैर से पीयूष के पैरों का स्पर्श किया.. पर पीयूष ने तुरंत अपना पैर हटा लिया.. पीयूष की इस सज्जनता पर शीला को बड़ा गुस्सा आया..
दोनों सीटों के बीच के हेंडल पर जहां पीयूष ने अपना हाथ रखा था.. वहीं पर शीला ने अपना हाथ रख दिया.. लेकिन पीयूष ने अपना हाथ दूर ले लिया।
पिक्चर शुरू हुए आधा घंटा बीत चुका था.. कविता और पिंटू की छेड़खानियाँ शुरू हो गई थी.. पर शीला और पीयूष के बीच कुछ नहीं हो पा रहा था.. शीला के क्रोध का पारा चढ़ रहा था.. बहेनचोद समझता क्या है ये अपने आप को!! बड़ा आया सीधा साहूकार.. !! लगता है अब मुझे अपने ब्रह्मास्त्र का उपयोग करना ही पड़ेगा.. शीला ने घुटने मोड़कर अपने दोनों पैर सीट के ऊपर ले लिए.. अब पीयूष की जांघ पर शीला का घुटना छु रहा था.. और पीयूष इस स्पर्श से अपने आप को दूर कर पाने की स्थिति में नहीं थी। समस्या ये हुई की शीला के दूसरी तरफ बैठे पुरुष की जांघ पर भी शीला का दूसरा घुटना छुने लगा.. वो आदमी अपनी उँगलियाँ शीला के घुटने पर फेरने लग गया.. हालांकि शीला का सर ध्यान पीयूष पर ही था.. वो देखना चाहती थी की पीयूष के लंड पर उसके स्पर्श का कोई असर हो रहा था या नहीं!! वो तो शीला नहीं जान पाई.. पर शीला के बगल में बैठे आदमी का टावर खड़ा हो गया..
शीला का लक्ष्य था पीयूष का लंड.. और पाँच मिनट बीत गई.. पर पीयूष ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.. शीला की जांघों पर वो बगल में बैठा हरामी हाथ फेरने लगा.. पर शीला को इस बात की परवाह नहीं थी.. और वो आदमी इस बात का पूरा फायदा उठा रहा था.. करीब ४५-४६ की उम्र के उस आदमी को तिरछी नजर से एक बार देख लिया..
शीला ने देखा की पीयूष तो कविता के बबलों पर हाथ फेर रहा था.. शीला को अपने स्तनों का अपमान होता दिखा.. रत्नागिरी आम मिल रहे है और ये बेवकूफ कच्चे आम के पीछे पड़ा था.. कुछ करना पड़ेगा
शीला ने अपने घाघरे के अंदर हाथ डाला और तीन उँगलियाँ अपनी भोस में डालकर अंदर बाहर करते ही अंदर से पानी का झरना फुट पड़ा.. अपनी गीली उंगलियों को उसने अपने खुले घुटने पर रगड़ दी.. गरम भोसड़े की खुशबू पूरे वातावरण में फैलने लगी..
चुत चाटने के अनुभवी पुरुष.. इस खुशबू को बखूबी पहचानते है.. पानी पी रहे चीते को शिकार की खुशबू आते ही जिस तरह वो गर्दन उठाकर आजू बाजू देखने लगता है वैसे ही.. आगे पीछे की सीट पर बैठे मर्द.. चारों तरफ देखते हुए इस खुशबू के स्त्रोत को ढूँढने लगे.. साथ ही साथ सोचने लगे की कही हॉल के अंदर ही किसी ने चुदाई तो शुरू नहीं कर दी!! थोड़ी देर यहाँ वहाँ देखने के बाद वापिस वो सारे मूवी देखने में व्यस्त हो गए।
दूसरी तरफ शीला की इस हरकत का असर.. तीन सीट छोड़कर बैठे पिंटू के लंड पर तुरंत होने लगी.. चुत की गंध परखने के लिए वो यहाँ वहाँ देखने लगा.. पीयूष कविता के अपने तरफ वाले स्तन को मसल रहा था.. शीला को अपनी चुत की गंध का थोड़ा सा असर होता दिखा.. अब उसने फिर से अपनी चुत में तीन उँगलियाँ डाली और गीली उंगलियों को अपनी काँखों के नीचे रगड़ दिया.. और वहीं हाथ उसने पीयूष के कंधे पर इस तरह रख दिया जैसे दो दोस्त रखते है.. इस तरह शीला की चुत-रस लगी काँख, पीयूष के चेहरे के बिल्कुल करीब आ गई.. और शीला का एक स्तन की गोलाई पीयूष की कोहनी से रगड़ खाने लगी..
इस दोहरे हमले के आगे पीयूष ने घुटने टेक दिए.. अपने पसंदीदा बड़े बड़े स्तनों का स्पर्श मिलते ही वो जैसे स्वर्ग की सैर पर निकल गया.. उसे शीला भाभी के कहे शब्द याद आ गए "जूते नहीं पड़ेंगे.. मेरी गारंटी है".. पीयूष को अपनी मूर्खता का अब एहसास हुआ.. शीला भाभी का इशारा वो तब समझ नहीं पाया था.. अपने स्तन दबाने के लिए वो उसे परोक्ष आमंत्रण दे रही थी..
पीयूष ने अपना हाथ कविता के स्तन से हटा लिया और अपना रुख शीला की ओर किया.. अपने हाथ मोड़कर वो चुपके से शीला के स्तनों को छुने लगा.. और तिरछी नजर से शीला भाभी की प्रतिक्रिया देखने लगा..
शीला से अब रहा नहीं गया.. अपना चेहरा पीयूष कान के पास ले जाकर वो धीरे से बोली "आधा पिक्चर खतम हो गया.. थोड़ी देर में इन्टरवल हो जाएगा.. और तू अभी तक ट्रैलर पर ही अटका पड़ा है!! अगर मन कर रहा है तो दबा ले.. शरमाता क्यों है?? इतना अंधेरा है, किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा"
पीयूष की सांसें तेज हो गई.. आज अगर कविता साथ नहीं होती.. तो दोनों हाथों से भाभी के चुचे रगड़ लेता..
दूसरी तरफ पिंटू के पेंट में हाथ डालकर उसका लंड हिला रही कविता सोच रही थी की आज पीयूष साथ नहीं होता तो झुककर पिंटू का लंड चूस लेती..
शीला ने ब्लाउस के तीन हुक खोल दिए और अपना दायाँ उरोज बाहर निकाल दिया.. जैसे तकिये को कवर से निकाल रही हो बिल्कुल वैसे ही!! और पीयूष के हाथों में ही थमा दिया.. और बोली "कविता को पता नहीं चलेगा.. अंधेरे में तुझे जो करना है कर ले.. जितना मज़ा करना हो मेरी तरफ से पूरी छूट है"
शीला की बात सुनकर पीयूष में हिम्मत आ गई.. इतना मूर्ख तो वो था नहीं की हाथ में नंगा स्तन हो और वो दबाए ना!! शीला के ढाई किलो वज़न वाला चुचा हाथ में पड़ते ही पीयूष के तनबदन में आग लग गई.
"ओहह भाभी.. गजब के है ये तो.. माय गॉड!! इन स्तनों को छुने के लिए मैं कितना बेचैन था.. आज तो किस्मत खुल गई मेरी" अपने नसीब को शाबाशी देने लगा पीयूष.. और उसके बगल में उसकी पत्नी अपने प्रेमी से स्तन दबवा रही थी
"मज़ा आ रहा है ना तुझे? दबा ले जितना मन करे.. "बड़े ही कामुक अंदाज से शीला ने कहा और पीयूष की जांघ पर हाथ फेरते फेरते उसके लंड तक पहुँच गई और पतलून के ऊपर से ही दबाने लगी। शीला का स्पर्श अपने लंड पर होते ही पीयूष अधिक उत्तेजित हो गया.. और उसने जोर से शीला के स्तन को मसल दिया..
"आह्ह.. जरा धीरे से कर पीयूष.. दर्द हो रहा है" शीला कराह उठी
"रहा नहीं जाता भाभी.. क्या करू!!"
"नहीं रहा जाता तो बाहर निकाल.. पत्थर जैसा सख्त हो गया है"
"भाभी मुझे कविता का टेंशन है.. कहीं उसने देख लिया तो मुसीबत आ जाएगी" डरते हुए पीयूष ने कहा
पर उतनी देर में तो शीला के अनुभवी हाथों ने पीयूष के पेंट की चैन उतारकर अपना हाथ अंदर सरका दिया और कच्छे के ऊपर से ही लंड को पकड़ लिया।
"ओहह भाभी.. पर.. पर.. कविता.... " पीयूष के शब्द बाहर ही निकले क्योंकी शीला ने उसका कच्छा सरकाकर उसका लंड बाहर निकाल लिया था। फॉलो-ओन होने के बाद दूसरी इनिंगस में भी जब ज़ीरो पर तीन विकेट गिर जाए.. और बेट्समेन निसहाय अवस्था में देखते ही रह जाए.. बिल्कुल वैसे ही पीयूष भी शीला के बाउन्सर के सामने निसहाय था.. शीला ने झुककर पीयूष के कडक लोड़े के टोपे पर किस किया.. जितना हो सकता था अपने मुंह में ले लिया.. और चूसने लगी..
शीला के मुंह की गर्मी और लार का स्पर्श.. पीयूष को उसका गुलाम बनाने के लिए काफी था... तिरछी नज़रों से अपने पति का लंड चूस रही शीला को कविता देख रही थी.. और ये देखकर ज्यादा उत्तेजित होकर वह पिंटू का लंड मसल रही थी। शीला भाभी की सलाह अनुसार उसने ब्रा-पेन्टी नहीं पहनी थी.. और पिंटू इस सुवर्ण अवसर को गंवाना नहीं चाहता था.. उसने कविता के स्कर्ट में हाथ डाल दिया और अपनी दो उंगली चुत में डालकर दस पंद्रह बार फक-फक की आवाज के साथ फुल स्पीड के साथ अंदर बाहर करते ही कविता की चुत झड़ गई.. और साथ में ही पिंटू की पिचकारी से गरम वीर्य रिसकर कविता के हाथों के सौन्दर्य को ओर बढ़ाने लगा..
शीला की बायीं ओर बैठा वो अनजान आदमी शीला के मादक जिस्म के साथ छेड़खानी कर रहा था और उसके कामुक स्पर्श से शीला के भोसड़े का रस झरना फिर से शुरू हो गया था.. पीयूष शीला के स्तनों को अपने हिसाब से मसलते हुए पूरे मजे ले रहा था तो दूसरी तरफ शीला ने उस आदमी के लंड को सहला सहलाकर उसे पिक्चर से ज्यादा मज़ा देने लगी थी। शीला जैसी अनुभवी स्त्री के हाथों में लंड आने के बाद कोई कसर कैसे रह जाती भला.. !!
पीयूष से ओर रहा नहीं गया.. उसने शीला के कान में कहा.. "भाभी, कविता को भी सीखा दो ना आपकी तरह चूसना??"
शीला ने पीयूष के अहंकारी मुर्गे जैसे लंड के साथ अपनी जांघ रगड़ते हुए कहा "चिंता मत कर पीयूष.. कविता को में लंड चुसाई में एम.बी.ए करवा दूँगी.. मैं भी मदन के बगैर बहोत तकलीफ महसूस कर रही हूँ"
पीयूष: "आप कहें तो मैं कविता को कुछ दिनों के लिए मायके भेज दूँ??"
शीला: "और फिर??"
पीयूष: "फिर.. फिर मैं आपको..........!!"
शीला ने पीयूष के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर उत्तेजनावश मसल दिया.. सिसकियाँ भरते हुए वो बोली.. "मुझसे तो अभी ही इसके बगैर रहा नहीं जा रहा.. आज रात का कुछ सेटिंग कर ना तू!!"
पीयूष: "आज रात का सेटिंग कैसे करू!! कविता को पता चल गया तो वो मेरी जान ले लेगी.. "
शीला: "कल तो मुझे तेरी माँ के साथ यात्रा पर जाना है.. आज का ही कुछ प्लान बना.. कुछ भी कर तू.. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा"
शीला वास्तव में पीयूष के पतले लंड को सहलाते हुए उत्तेजित हो गई थी.. और शीला जब उत्तेजित हो जाती है तब वह सारे नियम और बंधन तोड़कर अपनी हवस बुजाने के काम में लग जाती है.. अच्छे बुरे का भेद भूल जाती है और अनाब-शनाब हरकतें करने लगती है..
शीला ने अपनी दोनों जांघों को भींचकर अपनी चुत की जलती आग को शांत करने की कोशिश की पर मामूली आग हो तो बुझेगी ना.. ये तो जंगल में लगी आग जैसी भीषण आग थी.. कैसे बुझती भला!!!
शीला और पीयूष एक दूसरे के जिस्मों से खेलने में मशरूफ़ थे तभी इंटरवल हुआ और हॉल में अचानक लाइट चालू हो गई.. घबराई हुई शीला ने फटाफट अपने स्तन को ब्लाउस के अंदर डाल और पीयूष ने तुरंत अपने लंड को पेंट में ठूस दिया.. चैन बंद करने का भी समय नहीं मिला.. उसने अपने शर्ट से पेंट के लंड वाले हिस्से को ढँक लिया.. और एकदम सामान्य होकर बैठ गया.. शीला ने देखा तो उसके बगल वाला पुरुष समय रहते अपने लंड को अंदर नहीं डाल पाया था.. उसने अपने लंड को रुमाल से ढँक लिया था.. शीला को ये देखकर हंसी आ गई.. लंड के ठुमके.. ऊपर रखे रुमाल से भी दिखाई दे रहे थे..
लंड ढीला होते ही पीयूष उठकर बाथरूम की तरफ गया.. पिंटू तो इन्टरवल के पहले ही छु-मंतर हो गया था.. कविता और शीला अब अकेली थी.. कविता उठकर शीला की बगल वाली सीट पर आकार बैठ गई.. ताकि उससे बात कर सकें
कविता: "भाभी.. आपने मेरी बरसों की तमन्ना पूरी कर दी.. आपका ये एहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी.. "
शीला: "कौन सी इच्छा??"
कविता: "पिंटू के साथ मूवी देखते हुए मजे करने की.. "
शीला: "हम्म.. तो फिर मजे किए की नहीं!! क्या क्या किया.. बता मुझे.. अच्छा हुआ ना जो तूने ब्रा और पेन्टी नहीं पहनी.. पहनी होती तो कितनी तकलीफ होती तुम दोनों को.. !! "
कविता: "हाँ भाभी.. आपकी सलाह मुझे बड़े काम आई.. पिंटू ने अंदर तक उंगली डाल दी थी.. इतना मज़ा आया की क्या बताऊँ!! और दोनों बॉल मसलते हुए मेरी निप्पलों को ऐसा कुरेद दिया है की अब तक जलन हो रही है!!"
शीला: "घर जाकर पीयूष से अपनी निप्पल चुसवा लेना.. जलन कम हो जाएगी.. तूने पिंटू का पकड़ा था क्या?"
कविता: "पकड़ा तो था.. पर चूस नहीं पाई.. मेरा बहोत दिल कर रहा था उसका चूसने का.. "
शीला: "तुझे पसंद है लंड चूसना?? पीयूष तो कह रहा था की मैं तुझे लंड चूसना सिखाऊँ.. और तू उसका मुंह में ही नहीं लेती..."
कविता: "आप तो जानती हो ना भाभी.. घर की मुर्गी दाल बराबर.. प्रेमी का लंड चूसना मुझे पसंद है.. पति का लंड मुंह में लेने में वो मज़ा कहाँ.. !! और इन पतियों का एक बार चूस लो तो हररोज लंड निकालकर मुंह के सामने रख देंगे.. "
शीला और कविता बातें कर रहे थे उतने में पीयूष पॉपकॉर्न ले कर आ गया.. कविता वापिस अपनी सीट पर जाकर बैठ गई और पीयूष उन दोनों के बीच में बैठ गया
शीला ने धीमे से पीयूष के कान में कहा "पॉपकॉर्न वाली उंगली कविता की चुत में मत घुसाना.. वरना जलने लगेगा उसे"
पीयूष: " कुछ भी कहो भाभी.. आप बड़ा मस्त चूसती हो!!"
शीला: "अरे मेरे राजा.. तू एक रात के लिए मुझे मिल.. दो घंटे तक तेरा लंड मुंह से नहीं निकालूँगी"
पीयूष: "आप तो जबरदस्त हो भाभी.. "
कविता: "ये तुम दोनों कब से क्या गुसपुस कर रहे हो? पीयूष तू मेरे साथ मूवी देखने आया है या भाभी के साथ? कब से उनके साथ चिपका हुआ है!"
पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी बोल रही है तू.. भाभी अकेले है तो वो बोर न हो जाएँ इसलिए कंपनी दे रहा था उन्हे"
कविता: "हाँ तो सिर्फ कंपनी ही देना.. कुछ और नहीं.. समझा!!"
हॉल में फिर से अंधेरा छा गया.. और उस अनजान शख्स ने अपने लंड से रुमाल हटा दिया.. जैसे चमकती बिजली में सांप नजर आता है वैसे ही पिक्चर की रोशनी में उसका लंड चमक रहा था.. लाल लाल सुपाड़े की नोक पर वीर्य की एक बूंद उभर आई थी.. शीला भूखी नज़रों से उसे तांक रही थी.. काफी तगड़ा मोटा लंड था.. पर उस अनजान शख्स का साथ उलझने में उसे डर लग रहा था.. इसलिए शीला ने अपने आप को रोक रखा.. पर दो घड़ी के लिए उसका भोसड़ा लालच में तो आ ही गया था.. शीला के चुपचाप बैठने के बावजूद उस आदमी ने अपना लंड उसके दर्शन के लिए खुला ही छोड़ दिया.. उसे आशा थी की लंड को देखकर कहीं शीला का मन कर जाएँ..
दो तीन मिनट के बाद, पिंटू वापिस कविता के पास आकार बैठ गया.. दूसरी तरफ पीयूष अपने हाथों से शीला के गदराए जोबन पर नेट-प्रेक्टिस कर रहा था.. पिंटू ने भी वही हरकत कविता के स्तनों के साथ शुरू कर दी
शीला ने अब अपने ब्लाउस के सारे हुक खोल दिए.. एक स्तन को पीयूष मसल रहा था और दूसरे स्तन पर उसने उस अनजान आदमी का हाथ पकड़कर रख दिया.. उस आदमी को दौड़ना था और स्लोप मिल गया.. वह बेरहमी से शीला के एक स्तन को मरोड़ने मसलने लग गया..
दो स्तन.. दो अलग अलग आदमी से एक साथ मसलवा रही साहसी शीला ने हिम्मत करके उस अनजान आदमी का लंड अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और हिलाने लग गई.. उसके दूसरे हाथ में पीयूष का लंड था.. दो हाथ में दो लंड.. और फिर भी उसकी भोस खाली.. ये कैसी विडंबना!!! शीला को अपने भोसड़े के लिए सहानुभूति हो रही थी.. उस शख्स के लंड की साइज़ देखकर शीला फिदा हो गई.. और उसे जीवा और रघु के दमदार लंड की याद भी आ गई।
शीला की निप्पल से खेलते हुए पीयूष ने उनके कान में कहा "भाभी ये क्या कर रही हो आप? कौन है ये आदमी?"
शीला: "किसकी बात कर रहा है तू?"
पीयूष: "उस आदमी की.. जिसका आपने पकड़ रखा है और जो आपके दूसरे स्तन को मसल रहा है.. अभी मेरा हाथ उसके हाथ से टकरा गया"
शीला: "पीयूष.. तुझे मेरे साथ छेड़खानी करते देख.. इन्टरवल में वो मुझे ब्लेकमेल करने लगा.. की अगर मैं उसे नहीं दबाने दूँगी तो वो कविता को जाकर सबकुछ बता देगा.. अब तेरे भले के लिए मुझे एक अनजान आदमी को मेरे शरीर के साथ खेलने की छूट देनी पड़ी.. क्या करती!!"
सुनकर पीयूष चुप हो गया..
पिक्चर खतम होने की थी.. और हर कोई आखिरी पड़ाव पर था.. आखिरी ओवर में २० रन बनाने हो और जिस तरह बेट्समेन चारों तरफ अंधाधुन शॉट लगाता है.. बिल्कुल उसी तरह.. उस पूरी लाइन में धड़ल्ले से स्तन मर्दन पूरे जोश के साथ चल रहा था..
दो दो पुरुषों के साथ एक साथ बबले दबवाते हुए शीला ने एक विचित्र हरकत कर दी
पीयूष के कान में उसने कहा "ये आदमी मुझे मुंह में लेने के लिए कह रहा है.. पर मैं नहीं लेने वाली.. कुछ भी हो जाएँ.. मुझे ये सब नहीं पसंद.. ये तो तेरे भले के लिए मैं अपने बॉल दबवाने के लिए राजी हुई.. अब कंधा दिया तो वो कान में मूतने की बात कर रहा है"
पीयूष: "मत लेना मुंह में भाभी.. पिक्चर अब १० मिनट में खतम हो जाएगा.. तब तक कैसे भी कर के उसे टाल दो.. "
एक दो मिनट के लिए शांत रहकर शीला ने अपना घातक यॉर्कर फेंका..
"पीयूष.. वो मुझे धमकी दे रहा है की अभी के अभी वो कविता को सब बताया देगा.. क्या करू मैं? वो बता देगा तो गजब हो जाएगा"
पीयूष की गांड फट कर फ्लावर हो गई..
"अच्छा.. ब्लैकमेल कर रहा है आपको??"
"हाँ.. अब जल्दी बोल.. क्या करू मैं? अगर ये बता देगा तो कविता तेरी माँ चोद देगी" शीला अब रोहित शर्मा की तरह फटके लगा रही थी
"अब चूस लो भाभी.. और क्या कर सकते है" पीयूष अपनी गांड बचाने में लग गया..
पीयूष का लंड हिलाते हिलाते शीला दूसरी तरफ झुक गई और उस शख्स के फुँकारते लंड को एक पल में मुंह में भर लिया.. वो आदमी तो भोंचक्का रह गया.. और शीला के सिर पर हाथ फेरता रहा.. शीला ने अपने मुंह में उसके लंड को इतना टाइट पकड़ रखा था जैसे मदारी के चिमटे में जहरीला सांप फंसा हो..
सात आठ बार शीला ने लंड को पूरा बाहर निकालकर अपने कंठ तक अंदर घुसा दिया.. और ऐसा चूसा.. ऐसा चूसा की उसके लंड का सारा जहर शीला के मुंह में ही निकल गया.. और उसी के साथ हॉल में रोशनी चालू हो गई.. शीला ने तुरंत उसका लंड मुंह से निकाला और खड़ी हो गई.. अपने बाल ठीक करने लगी.. मुंह में भरे हुए वीर्य को थूकने का मौका नहीं मिल इसलिए वो उस अनजान पुरुष का सारा माल निगल गई.. पीयूष स्तब्ध होकर इस कामुक देवी और उसकी हरकतों को देखता ही रह गया.. शीला को अपने ब्लाउस के हुक बंद करने का समय नहीं मिल इसलिए उसने अपने स्तनों को पल्लू से ढँक दिया था.. शीला ने देखा की पीछे की लाइन में बैठी हुई स्त्री अपने ब्लाउस के हुक बंद कर रही थी.. उसकी नजर शीला से मिली और शीला ने मुस्कुरा दिया.. जैसे उसके राज को पकड़ लिया हो.. उस स्त्री ने अपने होंठ पर उंगली रखकर शीला को इशारा किया.. शीला ने तुरंत अपने होंठ पर चिपके वीर्य को पोंछ लिया.. और उस शरमाते हुए उस स्त्री की तरफ आभार प्रकट करते हुए आगे निकल गई..
रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?
रात के १२:३० बज चुके थे.. तीनों रिक्शा में बैठकर घर पहुंचे.. रिक्शा में भी पीयूष, शीला और कविता के बीच में बैठा था.. शीला के स्तन दबाते दबाते कब घर आ गया ये पता ही नहीं चला.. कविता सब देख रही थी.. पर वो क्यों कुछ बोलती?
शीला अपने घर के बरामदे में पहुंचकर बोली "पीयूष, मेरे घर की चाबी तेरे घर पर रखी हुई है.. जरा आकर मुझे दे जाना.. "
कविता और पीयूष अपने घर के अंदर दाखिल हुए.. और पीयूष शीला भाभी के घर की चाबी ढूँढने लगा..
कविता मन में सोच रही थी.. आज शीला भाभी पीयूष को पूरा निचोड़ लेगी.. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचने वाला..
पीयूष के लंड पर हाथ सहलाते हुए कविता ने पीयूष को कहा "जा.. भाभी को चाबी देकर आ.. ताला भी खोल देना उनका.. लगता है शीला भाभी को तेरी चाबी पसंद आ गई है"
पीयूष: "क्या यार कविता!! कुछ भी.... !!" कहते हुए पीयूष खुशी खुशी कंपाउंड की दीवार फांद कर शीला के बरामदे में पहुँच गया।
कविता घर के अंदर चली गई थी इसलिए पीयूष ने राहत की सांस ली.. और शीला को चाबी देते हुए कहा "भाभी.. खोल दूँ??"
शीला ने अपना पल्लू हटा दिया.. और अपने पपीते जैसे मदमस्त स्तनों के दर्शन करवाती हुई कामुक आवाज में बोली "हाँ खोल दे पीयूष.. "
कविता अंदर थी पर पीयूष को यह डर था की कहीं वो बाहर न आ जाए.. इसलिए वो अपने दरवाजे पर नजर रखे हुए शीला के घर का ताला खोलने लगा.. उसी वक्त शीला घुटनों के बल झुक गई और पीयूष के लंड को उसके पतलून से बाहर निकाल दिया.. और उसके टोप्पे पर चूमकर बोली
"क्या हुआ पीयूष? इतना वक्त क्यों लग रहा है तुझे खोलने में? छेद नहीं मिल रहा क्या तुझे?"
"अरे भाभी.. आप मुझे मरवा दोगी.. वो कविता अभी बाहर निकलेगी तो अभी के अभी मुझे तलाक दे देगी.. "
कविता किचन की खिड़की से और अनुमौसी बेडरूम से.. शीला और पीयूष के इस मिलन को देख रहे थे.. अनुमौसी ने अपने बेटे के लंड को देखने की बहोत कोशिश की.. पर अंधेरे के कारण नहीं दिखा... सख्त कड़े उत्तेजित लंड को देखे अरसा बीत गया था.. मौसी ने एक निराशा भरी नजर अपने पति चिमनलाल पर डाली.. मोटी तोंद और कमजोर लंड वाला चिमनलाल खर्राटे लेकर सो रहा था.. उसके पूपली जैसे लंड को मौसी ने हाथ से हिलाकर देखा.. मरी हुई छिपकली जैसे लंड ने कोई हरकत नहीं की.. अनुमौसी ने एक गहरी सांस छोड़ी.. और कमर हिला रहे अपने बेटे को देखकर उत्तेजित होकर.. चिमनलाल के मोबाइल को अपने भोसड़े में घुसेड़ दिया.. कविता भी खिड़की से अपने पति का लंड चूस रही शीला को देखते हुए.. और पिंटू को याद करते हुए.. अपनी नेलपोलिश लगी उंगलियों से क्लिटोरिस को कुरेदने लगी..
सास और बहु खिड़की से कमर हिला रहे पीयूष को देखते हुए सोच रहे थे.. ये चोद रहा है या मुंह में दिया हुआ है!!??
शीला ने पीयूष का पूरा लंड मुंह में लेकर इतना चूसा की पीयूष के होश उड़ गए.. पीयूष ताला खोल रहा था उतनी देर में तो शीला ने उसके लंड को झड़वा दिया.. कविता पिंटू के याद में अपनी चुत खुजाते हुए सो गई.. उसे मालूम था की शीला भाभी की पकड़ से छूटने के बाद.. पीयूष के पास उसे देने लायक सख्त लंड बचा ही नहीं होगा.. और फिलहाल उसे जरूरत भी नहीं थी। अनुमौसी भी अपने पति के मोबाइल से मूठ लगाकर.. अपनी बूढ़ी चुत को सहलाते हुए.. उल्टा लेटकर सो गई।
शीला ने मस्ती से पीयूष के लंड को चूस चूस कर खाली कर दिया....
अपने लंड को पेंट के अंदर रखकर चैन बंद करते हुए पीयूष ने कहा "मैं अब चलता हूँ भाभी... ऐसे ही मौके देते रहना.. भूल मत जाना"
शीला: "तेरी जब मर्जी करे चले आना.. मना नहीं करूंगी.. "
पीयूष जाते जाते शीला के दोनों स्तनों को मसलकर गया.. शीला के होंठों पर चमक रही वीर्य की बूंद को देखकर वो मुसकुराते हुए निकल गया।
काश मेरी कविता भी इसी तरह लंड मुंह में लेकर मेरा वीर्य चूसती तो कितना अच्छा होता!! शीला भाभी को अब हाथ में रखना पड़ेगा.. एक बार धड़ल्ले से टांगें फैलाकर चोदना है भाभी को.. भोसड़ा भी मस्त होगा साली का.. और छातियाँ उसकी ये बड़ी बड़ी.. चौबीसों घंटे गरमाई हुई रहती है... बस एक मौका मिल जाएँ.. पीयूष ये सब सोचते सोचते घर में घुस गया.. शीला भी बिस्तर पर गिरते ही सो गई.. और तब उठी जब अनुमौसी का फोन आया..
"अरे बाप रे.. देर हो गई.. आज तो महिला मण्डल के साथ यात्रा पर जाना है" बड़बड़ाते हुए वो झटपट बाथरूम में घुसी और फटाफट जैसे तैसे नहाकर तैयार हो गई.. बाहर निकली तो अनुमौसी के घर के पास एक मिनीबस खड़ी थी.. और अंदर करीब २५ औरतों का झुंड था.. अनुमौसी बस के बाहर शीला का इंतज़ार करते हुए खड़ी थी.. शीला तुरंत अंदर चढ़ गई.. और अनुमौसी को हाथ पकड़कर अंदर चढ़ने में मदद की
अनुमौसी: "तेरे अंदर तो बहोत जोर है शीला.. हम तो अब बूढ़े हो गए!!"
तभी आगे की रो में बैठी एक जवान औरत ने कहा "अरे मौसी, वो तो उनका पति घर पर नहीं है इसलिए सारा जोर बचाकर रखा हुआ है.. अगर पति साथ होते तो उनका सारा जोर निचोड़ लिया होता अब तक.. क्यों ठीक कहा ना भाभी??" शीला उस उँजान औरत के सामने देखकर मुस्कुराई पर कुछ बोली नहीं.. सब अनजान थे इसलिए शीला थोड़ा सा शरमा रही थी
थोड़ी देर बाद.. अनुमौसी शीला की बगल वाली सीट पर आकर बैठ गई.. और उस तरह बैठी की उनके स्तन शीला के कंधों से रगड़कर जाए
अब शीला ये सब हथकंडों से कहाँ अनजान थी!! उसने मौसी से कहा "मौसी, आपकी कविता तो बड़ी ही होशियार है..!!"
अनुमौसी: "अच्छा.. !! ऐसा क्यों लगा तुझे शीला? वैसे तो मेरा पीयूष भी कम होशियार नहीं है.. "
अनुमौसी ने पीयूष का नाम लेकर बड़े ही विचित्र ढंग से शीला की आँखों में देखा.. शीला को एक पल के लिए शक हुआ.. कहीं ये बुढ़िया ने रात को मेरे और पीयूष के बीच के खेल को देख तो नहीं लिया.. !! चलो.. जो भी होगा देखा जाएगा.. चिंता करके कोई फायदा नहीं है
अनुमौसी भजन गाने लगी.. और सारी औरतें उनका साथ देने लगी.. थोड़ी ही देर में वो मिनीबस नजदीक के एक छोटे से शहर पहुंची.. वहाँ के मंदिर में दर्शन करने के बाद सारी औरतें बाजार में शॉपिंग करने निकल पड़ी..
शीला और अनुमौसी साथ में घूम रहे थे.. चलते चलते वो एक दुकान पर पहुंचे जहां बेलन और चकला मिलता था
अनुमौसी ने एक पतला बेलन हाथ में लिया.. और चेक कर वापिस रख दिया.. "ये वाला ठीक नहीं लगता.. मुझे तो मोटा बेलन ही पसंद है"
दुकान वाला शीला के उन्नत स्तनों के बीच की दरार को देखते हुए मुस्कुराकर बोला " हाँ मौसी.. मेरी पत्नी को भी मोटा बेलन ही भाता है.. मेरे घर तो पतला बेलन भी है.. पर वो हमेशा मोटे वाले से ही रोटियाँ बेलती है.. "
इन द्विअर्थी संवाद को सुनते ही शीला की चुत का वो हाल हुआ.. जो गरम तेल में पानी डालने पर होता है.. छम्म छम्म छम्म होने लगा.. अपने आप दोनों जांघें एक दूसरे सट गई.. अपनी चुत को खुजाते हुए शीला ने अनु मौसी से कहा "मुझे भी मोटा बेलन ही पसंद है मौसी.. आप ये मोटा वाला खरीद लीजिए.. ये बढ़िया है.. मोटा और चिकना.. "
अनुमौसी ने बेलन लेकर थैली में रख दिया.. और अपने ब्लाउस में हाथ डालकर पर्स निकाला और ५० का नोट दुकानवाले को देते हुए बोली "आप बड़ा महंगा बेचते हो.. बेलन मोटा है तो इतना भाव थोड़ी होता है!!"
दुकानदार: "मौसी.. बेलन पतला हो या मोटा.. तैयार करने में मेहनत तो लगती है ना!! और मैं बिल्कुल वाजिब दाम में बेचता हूँ.. आप एक बार मेरा बेलन इस्तेमाल करके तो देखिए.. मुझे रोज याद करोगी.. जीतने भी ग्राहक बेलन लेकर जाते है वो फिर से मेरी दुकान जरूर आते है.. मेरा बेलन है ही कमाल का!!"
शीला: "भैया हमे तो जो भी बेलन मिल जाता है उसी से काम चला लेते है" शीला ने मोटे बेलन की नोक पर ऐसे उँगलियाँ फेरी जैसे लंड पकड़ कर मूठ मार रही हो.. दुकानवाले के पसीने छूट गए ये देखकर.. शीला के इस कातिल यॉर्कर से दुकानवाले के स्टम्प उखड़ गए.. अनुमौसी शीला की इस हरकत को देखकर शर्मा गई और हँसते हँसते शीला का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोली "अब चल भी.. यहीं रोटियाँ बेलने बैठेगी क्या तू? बड़ी नालायक है तू शीला.. !!"
शीला हँसते हुए दुकान से बाहर निकली और दोनों चलते हुए बस तक पहुंचे.. सब अंदर बैठ गए पर ड्राइवर कहीं नजर नहीं आ रहा था.. सब औरतों को शीला बेलन दिखाते हुए उसपर ऐसे हाथ घुमा रही थी जैसे लंड को सहला रही हो.. शीला का पल्लू हटकर नीचे गिर गया और उसकी उत्तुंग पहाड़ियों को सारी महिलायें देखती ही रह गई.. सारी औरतें ही थी इसलिए शर्म की कोई बात नहीं थी.. शीला भी बेफिक्र होकर जीव के मूसल लंड को याद करते हुए बेलन से खेल रही थी..
एक बूढ़ी औरत ने शीला और अनुमौसी से पूछा " अच्छा.. तो तुम दोनों ऐसा मोटा बेलन ढूँढने गई थी बाजार में.. "
अनुमौसी: "क्या चम्पा बहन आप भी!! मोटे बेलन की जरूरत तो सब को पड़ती है.. आप तो ऐसे बोल रही है जैसे आपको मोटा पसंद ही नहीं है"
चम्पा मौसी: "मेरे घर तो कपड़े धोने की बढ़िया सी मोटी थप्पी है इसलिए मुझे तो बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शरारती मुस्कान के साथ उस बुढ़िया ने कहा
तभी एक जवान औरत ने कहा "हमारे घर तो हमारे पतिदेव ही काफी है.. इसलिए थप्पी या बेलन की जरूरत ही नहीं पड़ती" शीला ने तुरंत उस औरत का नाम पूछ लिया
उस औरत ने शीला के स्तनों को तांकते हुए बड़े कामुक स्वर में अपना नाम बताया "रेणुका.. "
वापिस आते हुए रास्ते में शीला ने रेणुका के साथ दोस्ती कर ली और उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया.. रेणुका करीब ३२ की उम्र की गोरी चीट्टी दो बच्चों की माँ थी.. शीला ने बाकी औरतों पर नजर घुमाई.. पर एक भी उसे अपने लायक नहीं लगी..
शहर से बाहर बस पहुंची.. एक पीपल के पेड़ की छाँव के नीचे ड्राइवर ने बस रोक दी.. सारी महिलायें नीचे उतरी.. और चटाई बिछाकर खाना खाने बैठ गई.. सब ने मिलकर घर से लाए भोजन को बाँट के खाया.. और तृप्त होकर वहीं चटाई पर लेट गई.. औरतों को दोपहर की नींद, रात के सेक्स जितनी ही पसंद होती है.. कुछ औरतें तो दोपहर को इसलिए सो जाती है ताकि रात को देर तक जागकर चुदवा सकें..
एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..
एक घंटा सोने के बाद सब जाग गए.. पास ही की एक टपरी पर सबने मसालेदार चाय का लुत्फ उठाया.. तभी रोड के किनारे पर बहते झरने को देखकर.. कुछ जवान औरतों का मन कर गया की पानी में थोड़ी से छब छब की जाएँ.. शीला, रेणुका और उनके साथ कुछ औरतें झरने के किनारे पर जा पहुंची.. नहाने के लिए अलग से कपड़े तो थे नहीं.. और आजूबाजू कोई नजर नहीं आ रहा था.. इसलिए वो औरतें अपनी साड़ी उतारकर.. ब्लाउस और पेटीकोट में ही घुटनों तक गहरे पानी में कूदने के लिए तैयार होने लगी..
रेणुका ने साड़ी का पल्लू हटाकर सबसे पहले अपनी अद्भुत जवानी की झलक दिखाई.. मध्यम उम्र का जिस्म.. गदराए गोरे स्तन और ब्रा की पट्टी ब्लाउस से नजर आ रहे थे.. उन स्तनों को देखते ही शीला आकर्षित हो गई.. रेणुका की सख्त निप्पल थोड़ी सी लंबी थी.. उसकी गहरी नाभि देखकर शीला की चुत में झटके लगने शुरू हो गए.. हल्की चर्बी वाला गोरा गोरा पेट और कमर.. चेतना से करीब ५ साल छोटी थी रेणुका.. पर बेहद आकर्षक थी.. रेणुका के जिस्म के पूरे भूगोल का मुआयना करने के बाद शीला ने कहा
"दो बच्चों के बावजूद आपने बॉडी को अच्छा मैन्टैन किया हुआ है.. " रेणुका हंसने लगी पर कुछ बोली नहीं
चम्पा मौसी: "उसने मैन्टैन नहीं किया.. पर उसके पति ने करवाया है.. बहोत खयाल रखता हो वो रेणुका का.. क्यों ठीक कहा ना मैंने??"
रेणुका ने चम्पा मौसी के कूल्हों पर हल्की सी चपेट लगाते हुए कहा "अब चुप भी करो मौसी.. नहीं तो मैं आपका भी वस्त्राहरण कर दूँगी.. " कहकर वो दुशासन की तरह चम्पा मौसी की साड़ी खींचने लगी..
सारी औरतें मस्ती करते हुए पानी में उतरने लगी.. पानी को देखते ही हर कोई बच्चा बन जाता है.. रेणुका का घाघरा गीला होकर उसकी गांड की दरार में घुस गया था.. गहरे पानी में कमर तक उतर चुकी शीला ने रेणुका के चूतड़ों का आकार देखकर.. पानी के अंदर ही अपने भोसड़े के बेर को घिसकर ठंडा करने की कोशिश की.. सिसकियाँ भरते हुए वो रसिक, जीवा और रघु के लंड को याद करने लगी ताकि उसके भोसड़े का जल्दी छुटकारा हो.. आखिर उसकी चुत ने झरने के पानी को पवित्र कर ही दिया..
नहाते हुए पानी उछालते रेणुका शीला के करीब आई.. शीला के भीगे हुए पतले कॉटन ब्लाउस में दोनों स्तन एकदम तंग थे.. वो भी बिना ब्रा के.. रेणुका बस देखती ही रह गई.. शीला ने रेणुका के मुँह पर पानी उछालकर उसकी समाधि भंग की "क्या देख रही है यार!!"
रेणुका शर्मा गई.. फिर हिम्मत करते हुए वो शीला के करीब आई और धीमे से उसके कान में फुसफुसाई.. "बड़ी कातिल लग रही हो तुम शीला"
शीला के लिए अपनी तारीफ सुनना कोई नई बात नहीं थी.. पर फिर भी उसे सुनकर अच्छा लगा.. उसने रेणुका के चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए कहा
"तू भी कुछ कम नहीं है रेणुका.. " दोनों कमर तक पानी के अंदर थी.. इसलिए उनकी हरकत सबकी आँखों से छुपी हुई थी.. सब अपनी मस्ती में मस्त थी.. शीला अभी भी रेणुका के कूल्हों से खेल रही थी.. और रेणुका भी मजे लेकर शीला के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा करने में जुट गई।
दिन के उजाले में.. भरी दोपहर में.. शीला रेणुका के चूतड़ों के दरार में उंगली फेरते हुए अपने पासे फेंक रही थी
शीला: "ये बता रेणुका.. मेरे घर कब आओगी?"
रेणुका: "जब तुम बुलाओ.. मेरे वो ऑफिस के लिए निकले उसके बाद मैं फ्री होती हूँ.. तुम आ जाओ मेरे घर पर"
शीला: "जरूर आऊँगी.. पर पहले तुम मेरे घर आओ.. "
रेणुका: "अब बस भी करो शीला.. तुम्हारा हाथ जरूरत से कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ गया है"
शीला की उँगलियाँ दरार से आगे निकल कर रेणुका की गांड के छेद तक पहुँच गई थी।
शीला: "क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?"
रेणुका: "अच्छा क्यों नहीं लगेगा भला.. !! पर आजू बाजू देखो तो सही.. सब यहाँ मौजूद है.. हम अकेले थोड़ी है"
शीला: "हाँ वो तो मैं भूल ही गई.. एक बात कहूँ.. तुम बहोत सुंदर हो रेणुका"
रेणुका: "जिसे कदर होनी चाहिए वो ही तारीफ ना करे तो ये सुंदरता किस काम की!!"
शीला: "ऐसा क्यों बोल रही है? तेरे पति तुझे प्यार नहीं करते क्या?"
रेणुका: "उन्हे टाइम ही कहाँ मिलता है.।!! बिजनेस से फुरसत मिले तो मुझे प्यार करे ना!! रात को देर से आकर टीवी देखते देखते सो जाते है.. कभी उनका मूड हो तब मैं थकी हुई रहती हूँ, इसलिए कुछ नहीं हो पाता.. अपने ही घर में हमारी जरूरतों को ही नजर अंदाज किया जा रहा है"
पीछे खड़ी अनुमौसी इन दोनों के संवाद को बड़े चाव से सुन रही थी.. उनसे रहा नहीं गया और बोल पड़ी
अनुमौसी: "शुरू शुरू में ये मर्द हमे सब कुछ सीखा सीखा कर बिगाड़ते है.. और फिर वही सब हम करना चाहे तो कहते है "कैसी गंदी गंदी चीजें करने को कह रही हो" अब बोलो.. क्या करें इनका.. "
रेणुका: "बिल्कुल सच कह रही हो मौसी.. मुझसे तो कहा भी नहीं जाता और सहा भी नहीं जाता.. बुरी फंसी हूँ मैं.. "
शीला: "मौसी मेरे पास इन सारी समस्याओं का हल है.. पर आप मेरे बारे में गलत सोचेगी ये सोचकर कुछ बोलती नहीं मैं"
अनुमौसी: "अरे शीला.. मैं क्यों तेरे बारे में गलत सोचूँगी.. !! तू भी मदन के बिना २ सालों से तड़प रही है.. मैं समझ सकती हूँ"
रेणुका: "क्या बात कर रही हो!! २ साल से अकेली है तू शीला?? बाप रे!! मुझे तो एक हफ्ता बीत जाएँ तो ऐसा लगता है जैसे सालों हो गयें..तुम तुम्हारी रातें अकेले कैसे बिताती हो??"
शीला: "ये सब बातें करके मेरा दिमाग खराब मत करो तुम सब.. चलो.. बहोत देर हो गई है.. कब तक नहाते रहेंगे!!"
रेणुका: "घर जाकर भी क्या करना है!! वहीं सब झाड़ू-पोंछा, सफाई, खाना पकाना.. और पति का इंतज़ार करना.. इससे अच्छा यहीं पानी में पड़े रहते है.. कम से कम नीचे ठंडक तो मिल रही है.. घर में तो दिमाग खराब हो जाता है मेरा!!"
रेणुका की आवाज का दर्द शीला महसूस कर सकती थी.. कमर तक डूबी हुई रेणुका का हाथ पकड़ लिया उसने.. पानी के अंदर किसी को ये नजर नहीं आ रहा था.. रेणुका का हाथ खींचकर शीला ने घाघरे के नीचे अपनी भोस पर रख दिया.. चुत का स्पर्श होते ही रेणुका स्तब्ध रह गई
रेणुका: "ये क्या कर रही हो शीला?? कुछ तो शर्म करो.. !!"
शीला: "मैं तुम्हें ये बताना चाहती हूँ की पानी में रहने से ये ठंडी नहीं होती.. देखो.. कैसे तप रही है!!"
शीला: "इसमें मैंने क्या गलत क्या मौसी? ये रेणुका बोल रही थी की पानी में रहने से नीचे ठंडक मिलती है.. कुछ ठंडक नहीं मिलती.. ठंडक के लिए कुछ जुगाड़ लगाना पड़ता है.. सिर्फ उँगलियाँ अंदर डालने से बच्चे पैदा नहीं होते.. जहां जिस चीज की जरूरत हो वहाँ वो ही चीज काम करती है.. समझे!!" तीनों एक दूसरे के करीब खड़े गुसपुस कर रही थी.. और साथ ही अपने जीवन के सबसे जटिल प्रश्न का हल ढूँढने का प्रयत्न कर रही थी
ड्राइवर के बार बार हॉर्न बजाने पर सारी औरतें बाहर निकली.. पेड़ के तने के पीछे जाकर कपड़े निचोड़कर सुखाए.. और फिर मज़ाक मस्ती करते हुए बस में बैठ गए.. अनुमौसी, रेणुका और शीला एक साथ बैठे थे। अनुमौसी कुछ कहना चाहती थी पर हिचक रही थी.. ऐसा लगा शीला को.. पर वो कुछ बोली नहीं.. रेणुका शीला के साथ अपनी दोस्ती को ओर घनिष्ठ करने लगी.. शीला भी रेणुका से करीब होती चली..
जब बस अनुमौसी के घर के बाहर आकर रुकी तब तक रेणुका और शीला अच्छी सहेलियाँ बन चुकी थी.. घर जाने से पहले रेणुका शीला के गले लगी और बोली "कल फोन करना मुझे.. भूल मत जाना.. " रेणुका के जिस्म की भूख शीला अच्छी तरह से महसूस कर पा रही थी
रात के ९ बज रहे थे..
अनुमौसी: "अब इतनी रात को तू अपने लिए कहाँ खाना बनाने बैठेगी!! आजा मेरे घर.. कविता ने खाना तैयार रखा हुआ है.. मेरे घर ही खा लेना.. "
शीला को थोड़ा सा संकोच जरूर हुआ पर वो अनुमौसी को मना नहीं कर पाई.. शीला को लेकर अनुमौसी अपने घर के अंदर पहुंची
"आइए शीला जी" गोल बिस्तर जैसे शरीर वाले, अनुमौसी के पति, चिमनलाल ने शीला का स्वागत किया.. टीवी देखते हुए वो खैनी चबा रहे थे
शीला के सुंदर शरीर ने जैसे ही घर में प्रवेश किया.. अनुमौसी का पूरा घर जगमगा उठा.. उस गदराए जिस्म को ताड़ते हुए चिमनलाल बाहर खैनी थूकने चले गए..
"ओहहों भाभी.. आप!! आइए आइए " पीयूष ने शीला के जिस्म को अपनी आँखों से ही सहलाते हुए कहा.. उसका बस चलता तो शीला को वहीं दबोचकर ऊपर से नीचे तक चूम लेता.. पीयूष के सामने देखकर शीला ऐसे मुस्कुराई के पीयूष के घुटने कमजोर हो गए.. रात का सीन याद आ गया उसे..
अनुमौसी बाथरूम में गए और कविता किचन में खाना तैयार करने में व्यस्त थी.. शीला ने दरवाजे के बाहर देखा तो चिमनलाल कहीं नजर नहीं आए.. ड्रॉइंगरूम में शीला और पीयूष अकेले ही थी.. एक ही पल में शीला ने पीयूष को अपनी तरफ खींचा और कस के चूम लिया.. शीला के इस अचानक आक्रमण से पीयूष के पसीने छूट गए.. शीला ने पेंट के ऊपर से पीयूष के लंड को मुठ्ठी में लेकर दबा दिया.. और पीयूष के डेटाबेज़ में अपना अकाउंट रीन्यू कर लिया.. पीयूष को तब होश आया जब कविता ने उसे किचन से आवाज दी.. घबराया हुआ पीयूष अपने आप को शीला की पकड़ से छुड़ाते हुए दौड़ कर अंदर चला गया
शीला मुसकुराते हुए अनुमौसी का इंतज़ार करते टीवी देखने लगी.. तभी अनुमौसी बाथरूम से आए..
थोड़ी देर में कविता ने किचन से आवाज लगाई "शीला भाभी.. कैसी हैं आप?"
शीला: "ठीक हूँ कविता.. पर तेरे जैसी ठीक तो नहीं हूँ.. तुम जवान लोगों के मजे है.. तकलीफ तो हम जैसे लोगों को ही है"
अनुमौसी ये सुनकर हंसने लगी..
दो थालियों में खाना परोसकर पीयूष बाहर लेकर आया.. और शीला की आँखों में देखते हुए थाली रखकर बोला "खाना खा लीजिए भाभी"
दोनों की आँखें आपस में नैन-मटक्का कर रही थी.. सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनकर अनुमौसी इस द्रश्य का मज़ा ले रही थी
अंदर किचन में रोटियाँ बेलते हुए कविता.. पिंटू के संग मल्टीप्लेक्स में उड़ाएं गुलछर्रे याद कर रही थी.. शीला ने जिस तरह दो दो लंड एक साथ पकड़कर हिलाए थे वो सीन याद करते हुए पीयूष भी उत्तेजित हो रहा था और शीला उस अनजान आदमी के लंड को याद करते हुए अपनी चुत खुजा रही थी..
तभी कविता किचन से थालियाँ और बाकी का खाना ले कर आई.. पीयूष शीला की बगल में बैठ गया.. कविता ने टेबल पर थाली रखने से पहले अपने पल्लू को छाती पर ठीक से दबाकर रखा.. वरना उसके झुकते ही जो द्रश्य दिखता उससे शीला की चुत व्याकुल हो जाती..
यहाँ वहाँ की बातें करते हुए सब खाना खाने लगे.. २० मिनट में सबने खा लिया था.. शीला गप्पे लड़ाते हुए थोड़ी देर बैठी रही.. और फिर उठते हुए बोली "मैं अब चलती हूँ मौसी.. पूरे दिन की थकान है.. नींद आ रही है मुझे"
अनुमौसी: "ठीक है शीला.. आते रहना.. "
पीयूष के सामने अपनी आँखें नचाते हुए शीला निकलने लगी.. किचन से कविता ने भी हाथ हिलाकर उन्हें "बाय" कहा.. घर से बाहर निकलते.. दरवाजे पर, अनुमौसी के पति चिमनलाल अंदर आ रहे थे.. शीला और चिमनलाल दोनों एक साथ टकरा गए.. शीला के बड़े बड़े भोंपू चिमनलाल की रुक्ष छाती से टकरा गए.. शीला शर्मा गए और वहाँ से भाग निकली.. चिमनलाल का लंड, शीला की मादक खुशबू सूंघते ही.. अंगड़ाई लेकर उठने लगा.. जैसे ५ साल के बाद कुंभकर्ण की निंद्रा टूटी हो!!
"साली.. मेरी वाली भी इसके जैसी करारी होती.. तो मज़ा ही आ जाता.. ये अनु तो कुछ करती ही नहीं है.. उसे देखकर तो उठा हुआ लंड भी लटक जाएँ" चिमनलाल सोचते सोचते घर के अंदर पहुंचे
चिमनलाल अपने बेडरूम के अंदर गए और बिस्तर पर लेट गए.. उनके पीछे पीछे अनुमौसी भी अंदर आई और बेडरूम का दरवाजा बंद कर लिया। जैसे ही उन्होंने अपने ब्लाउस के हुक खोले, उनके दोनों ढीले स्तन लटकने लगे.. देखकर चिमनलाल ने गहरी सांस छोड़ी.. एक तरफ वो शीला के बॉल.. और उसके मुकाबले ये अनु के दो पिचके हुए थन.. आह्ह शीला ने तो आज मुझे जवानी की याद दिला दी.. एक बार मिल जाएँ तो आज भी उसे पूरी रात चोदने की ताकत रखता हूँ.. पर इस अनु को तो देखकर ही मेरी सारी इच्छाएं खतम हो जाती है.. ८० के दशक का पुराना बजाज.. जो २५ बार किक मारने पर भी चालू न हो.. वैसा ही हाल है अनु का.. और बजाज को तो झुकाकर भी चालू कर सकते है.. पर इसका क्या करें?? अब जैसी मेरी किस्मत.. चिमनलाल सोचता रहा
शीला अपने घर पहुंचकर बिस्तर पर लेट गई "वो चिमनलाल जानबूझकर मुझसे टकराया था क्या!! रास्ता तो काफी चौड़ा था.. मेरा ध्यान नहीं था पर उन्हे तो नजर आ रहा था.. वो चाहता तो ये भिड़ंत नहीं होती.. लगता है बूढ़ा जानबूझकर ही टकराया था.. और उसके मुंह से खैनी की कितनी गंदी बदबू आ रही थी.. छीईईई.. "
सिनेमा हॉल में पीयूष के साथ बिताया समय याद करने लगी शीला "कितना हेंडसम है पीयूष!! उसके होंठ भी लाल लाल है.. मस्त चिकना है.. उसका लंड थोड़ा सा दमदार होता तो ओर मज़ा आ जाता" आगे एक विचार ये भी आया "तगड़े लंड की कमी पूरी करने के लिए रसिक और जीवा तो है ही.. "
जीवा के लंड की याद आते ही शीला सिहर उठी.. ये पीयूष का लंड तो जीवा के मुकाबले पतली सी पुंगी जैसा ही है.. हाय.. आज का पूरा दिन बिना चुदाई के ही बीत गया.. शीला ने अपनी भोस पर हाथ फेरा.. लंड तो तरह तरह के देखे.. पर जीवा और रघु जैसा लंड आजतक नहीं देखा था.. अपने गाउन की ऊपर की चैन खोलकर अपने एक स्तन बाहर निकाला शीला ने.. निप्पल पर थूक वाली उंगली लगाकर वो कल्पना करने लगी की जैसे पीयूष उसकी निप्पल को चूस रहा हो.. चूचक गीला होते ही शीला के दोनों स्तन कठोर होने लगे.. आज उसे अनुमौसी और रेणुका के नए स्वरूप के दर्शन हो गए यात्रा के दौरान.. अनुमौसी ने जब साड़ी उतारी.. तब उनके पेट की चर्बी क्या मस्त लटक रही थी.. और वो चम्पा मौसी की जांघें.. आहहाहहहहा.. रेणुका के चूतड़.. ईशशशश.. अपनी चुत को सहला रही शीला के चेहरे पर मुस्कान आ गई.. आज रेणुका की गांड के छेद तक हाथ पहुँच ही गया था.. उसने माना न किया होता तो बेशक गांड में उंगली घुसा देती शीला.. एक बार उस रेणुका की मदमस्त गांड पर चुत रगड़नी है.. आहहह.. ४४० वॉल्ट का झटका लगा शीला के भोसड़े में.. कुछ भी नया कामुक विचार दिमाग में आते ही उसकी चुत में आग लग जाती थी..
शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..
शीला की नजर घर में चारों तरफ घूमने लगी.. क्या करू? बिना लंड के अब रहा नहीं जाता.. उसने अपने कूल्हों के नीचे गोल तकिया रख दिया.. गाउन ऊपर किया.. और अपनी चिकनी खंभे जैसी जांघों पर हाथ फेरने लगी.. अभी कोई मर्द हाथ लगे तो उसे कच्चा चबा जाने का मन कर रहा था शीला का.. क्लिटोरिस पर हाथ थपथपाते वो दूसरे हाथ से अपनी चूचियाँ मसलने लगी..
तभी शीला के मोबाइल की रिंगटोन बजी ..भीगे होंठ तेरे.. प्यासा दिल मेरा..
शीला के रंग में भंग पड़ा.. उसने फोन का स्पीकर ओन करके बाजू में रख दिया.. और अपनी भोस को रगड़ते हुए बोली
"हैलो.. !!"
"शीला.. मैं रेणुका बोल रही हूँ"
"अरे.. कैसी हो रेणुका!! इतनी रात को कॉल किया?? कुछ काम था क्या?"
रेणुका: "बिस्तर पर अकेली पड़ी थी.. सोचा सब सहेलियाँ तो अपने पति की बाहों में होगी.. एक तुम ही अकेली हो तो सोचा तुम्हें फोन करू.. गलत टाइम पर तो फोन नहीं किया ना मैंने?"
शीला: "नहीं नहीं.. मैं भी बिस्तर पर ही थी.. अकेले रहकर जो काम करना पड़ता है वहीं कर रही थी.. " शीला ने इशारे से बता दिया की वह मूठ मार रही थी
"मैं भी वही कर रही हूँ" सिसकी भरते हुए रेणुका ने कहा
शीला: "क्या बात है.. तुम यहाँ क्यों नहीं आ जाती!! दोनों साथ में करते है.. तू आटा गूँदना और मैं रोटियाँ बनाऊँगी.. तुझे आज पानी में भीगी हुई देखने के बाद मुझे कब से कुछ कुछ हो रहा है.. " शीला ने गुगली बॉल फेंका "आज पानी में बहुत मज़ा आया.. है ना.. !!"
रेणुका: "हाँ यार.. सच में मज़ा आ गया आज तो.. उफ्फ़ शीला.. अभी मैं नजदीक होती तो जरूर तेरे घर पहुँच जाती.. पर क्या करू!! एक काम करती हूँ.. कल आती हूँ तेरे घर.. ऐसे ही निठल्ली बैठी रहती हूँ पूरा दिन घर पर.. मेरे पति काम के सिलसिले में कलकत्ता गए हुए है.. एक हफ्ते बाद लौटेंगे.."
शीला: "अच्छा ये बात है.. !! तो तू एक काम कर.. अपने २-३ जोड़ी कपड़े साथ लेकर ही आना.. हाय रेणुका.. तू जल्दी आ जा.. ऐसे मजे करेंगे की तू अपने पति को भी भूल जाएगी.. "
रेणुका: "क्या सच में शीला?? फिर तो मैं कल पक्का तेरे घर आ जाऊँगी.. वैसे भी मैं इस ज़िंदगी से ऊब चुकी हूँ.. चल रखती हूँ.. कल मिलते है"
रेणुका ने फोन कट कर दिया
शीला को पता चल गया.. रेणुका भी उसकी तरह अकेलेपन से झुँझ रही थी.. रात के ११:३० बजे दो दो भूखे भोसड़े अपने घर में तड़प रहे थे.. पर उनके अलावा दो और चूतें भी थी जो फड़फड़ा रही थी.. रूखी और चम्पा मौसी की
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अनुमौसी कपड़े बदलकर चिमनलाल की बगल में लेट गई.. चिमनलाल ने अनुमौसी को खींचकर अपने ऊपर लेकर दबा दिया.. अनुमौसी चौंक गई.. इनको क्या हो गया आज अचानक!! कहीं आज बिन बादल बरसात तो नहीं होनेवाली??
चिमनलाल ने अनुमौसी को उत्तेजना से मसल दिया.. ऐसा मसला की अनुमौसी का बूढ़ा ढीला भोसड़ा भी पानी पानी हो गया.. मौसी ने चिमनलाल के पाजामे के अंदर हाथ डालकर उनके लंड का मुआयना किया.. कमीना ऐसे ही मिसकॉल तो नहीं मार रहा है ना!! खाते में बेलेन्स है भी या बिना रिचार्ज के लगा हुआ है!! अरे बाप रे.. ये क्या.. आज इनका लंड खड़ा कैसे हो गया.. ?? क्या कारण होगा?
बिना एक भी पल गँवाए.. अनुमौसी ने चिमनलाल के ग्राउन्ड-फ्लोर पर कब्जा कर लिया.. और बहोत सालों के बाद सख्त हुए चिमनलाल के लंड को चूसना शुरू कर दिया.. चिमनलाल भी अनुमौसी के विशाल चूतड़ों पर हाथ फेरते हुए गांड और भोस दोनों के छेदों को कुरेदने लगा.. जैसे पहली बारिश में मोर पंख फैलाकर नाचता है.. वैसे ही अनुमौसी की चुत नाचने लग गई.. और डबल जोर से चिमनलाल की ह्विसल को चूसने लगी..
चिमनलाल: "अरे यार.. खा जाएगी क्या? तू तो ऐसे टूट पड़ी जैसे पहली बार लंड देखा हो.. जरा धीरे धीरे.. !!"
पर अनुमौसी फूलफॉर्म में थी.. और चिमनलाल की बात सुनने के मूड में नहीं थी.. भूखी शेरनी की तरह वो चिमनलाल के लंड पर टूट पड़ी थी.. और लंड के साथ उनके आँड भी चूस रही थी.. चिमनलाल ने भी एक साथ चार चार उँगलियाँ मौसी के भोसडे में दे दी.. और अंदर बाहर करने लगे..
बेचारा चिमनलाल.. मौसी के आक्रमण के आगे और टीक नहीं पाया.. और उनके मुंह में ही झड गया..
चिमनलाल: "बस अब छोड़ भी दे.. दर्द हो रहा है मुझे.. तेरी भूख अब भी शांत नहीं हुई क्या?"
अनुमौसी: "आप हमेशा ऐसा ही करते हो.. जब मुझे ठंडा करने की ताकत नहीं है तो गांड मराने गरम करते हो मुझे!! अब मैं कहाँ जाऊ?? इसे ठंडा कौन करेगा.. तुम्हारा बाप??" अपने भोसड़े की ओर इशारा करते हुए मौसी बोली.. हवस की गर्मी बर्दाश्त ना होने के कारण अनाब शनाब बकने लगी थी वो..
चिमनलाल ने एक शब्द भी नहीं कहा और करवट बदलकर सो गया.. मौसी को इतना गुसा आया.. उनका मन कर रहा था की अभी चिमनलाल का गला घोंट दे.. मौसी गाउन पहनकर खड़ी हुई.. किचन में गई और नया खरीदा हुआ मोटा बेलन वहीं खड़े खड़े अपनी भोस में अंदर बाहर करने लगी..
अंधेरे में खड़ी हुई मौसी की आँखें तब चौंधिया गई जब किसी ने अचानक किचन की लाइट चालू कर दी.. वो कविता थी.. एकदम नंगी.. किचन में पानी पीने आई थी.. उसे अंदाजा नहीं था की इस वक्त किचन में कोई होगा.. अपनी सास को खड़ी देख वो शरमाकर अपने बेडरूम में भागकर चली गई.. फटाफट गाउन पहना और वापिस आई.. वो शर्म से पानी पानी हुई जा रही थी.. ये क्या हो गया मुझसे!! सासुमाँ ने मुझे नंगा देख लिया.. वो क्या सोच रही होगी मेरे बारे में.. ये कमबख्त पीयूष रोज रात को मुझे नंगी ही सुलाने की जिद करता है.. !!
अनुमौसी भी सहम गई.. अच्छा हुआ की उन्होंने गाउन पहना हुआ था और जब कविता अंदर आई तब उनकी पीठ उसकी तरफ थी.. वरना वो क्या सोचती?? कविता गाउन पहनकर वापिस आई तब तक मौसी आँखें झुकाकर अपने कमरे में चली गई..
अपनी सास के जाने के बाद, कविता ने पानी पिया.. तभी उसकी नजर प्लेटफ़ॉर्म पर पड़े बेलन पर गई.. ये बेलन कहाँ से आया?? सारे बर्तन तो धोकर अंदर रखे थे.. बेलन हाथ में लेते ही कविता को पता चल गया की सासुमाँ क्या कर रही थी.. वो पानी पीकर हँसते हँसते बेलन लेकर अपने कमरे में आई.. और सो रहे पीयूष के नाक के आगे उस बेलन को पकड़ रखा.. पीयूष नींद में था.. पर चुत के क्रीम की विशेष गंध अच्छे अच्छों को उत्तेजित कर देती है.. फिर वो सांड हो या हाथी.. इस गंध को परखकर पीयूष जाग गया... और आँखें खोलकर देखने लगा..
"ये क्या कर रही है तू कविता?"
कविता: "ये देख पीयूष.. तेरी माँ के कारनामे!!"
पीयूष: "क्यों.. क्या हुआ??"
कविता: "अभी मैं पानी पीने रसोई में गई तब अंधेरे में मम्मीजी इससे मूठ मार रहे थे.. बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.. इस उम्र में भी उन्हे ये सब सूझता है!!"
पीयूष ने कविता को अपनी बाहों में जकड़ लिया.. और उसके छोटे छोटे उरोजों को दबाते हुए उसे चूमकर.. बेलन हाथ में ले लिया.. और उसे कविता के चूतड़ों को थपथपाने लगा.. जैसे सवार घोड़े को चाबुक लगा रहा हो.. कविता ने टांगें फैलाई.. और अपनी चुत के होंठों पर पीयूष का लाल सुपाड़ा रख दिया.. पीयूष ने बेलन का एक फटका और लगाया.. और कविता घोड़ी की तरह हिनहिना कर लंड पर उछलने लगी.. पहले धीरे धीरे और फिर तेज गति से वो लंड पर कूद रही थी.. सारी दुनिया से बेखबर ये पति-पत्नी का जोड़ा मदमस्त चुदाई में व्यस्त था..
बेलन के जिस छोर पर अपनी माँ की चुत की गंध आ रही थी.. उस छोर को पीयूष ने कविता के मुंह में दे दिया.. अपनी सास के कामरस को चाटते हुए कविता.. पीयूष के लंड से चुदवा रही थी.. कविता के अमरूद जैसे स्तनों को मसलते हुए पीयूष अपनी गांड उछाल उछालकर कविता को चोद रहा था
"ओह्ह.. पूरा अंदर तक चला गया है पीयूष.. बहोत मज़ा आ रहा है.. उफ्फ़.. आहह.. आज तो बहोत गरम हो गया है तू!!"
अपने कामुक शब्दों से वो पीयूष को ओर उत्तेजित करने लगी.. उसने पीयूष के हाथों से बेलन छिन लिया.. बिखरे हुए बाल और लाल आँखों वाली कविता बेहद सेक्सी लग रही थी.. हर उछाल के साथ उसके स्तन लयबद्ध तरीके से ऊपर नीचे हो रहे थे.. पीयूष ने हाथ पीछे ले जाकर उसके कूल्हों को पकड़ लिया.. और दोनों हाथों से चूतड़ों को चौड़ा कर.. कविता के लाल रंग के गांड के छिद्र को दबाया..
"उईई.. माँ.. क्या कर रहा है यार.. मुझे दर्द हो रहा है... ओह्ह!!" कविता पसीने से तरबतर हो गई थी.. उसकी सांसें अनियंत्रित हो गई थी.. १५ मिनट हो गए पर पीयूष झड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था.. उसने कविता को अपनी छाती से दबा दिया.. और उसके होंठों को चूमते हुए.. गांड के अंदर उगनली डाल दी.. कविता दर्द से कराहने लगी.. पर पीयूष ने उसके होंठ इतनी मजबूती से पकड़ रखे थे की वह बेचारी बोल नहीं पा रही थी
बरसों से तैयार ओवरब्रिज.. जिसका किसी बड़े नेता के हाथों उद्घाटन होना था.. वो किसी मामूली मजदूर के हाथों खोल दिया जाएँ.. ऐसा हाल हुआ.. कविता अपनी कच्ची कुंवारी गांड का पिंटू के लंड से कौमार्यभंग करवाना चाहती थी.. पर पीयूष की उंगली ज्यादा किस्मत वाली थी.. पीयूष बेहद उत्तेजित हो गया.. और कविता के कामरस का झरना अब तूफ़ानी समंदर का रूप धारण कर चुका था.. दोनों एक दूसरे के अंगों को मसल रहे थे.. मरोड़ रहे थे.. कुरेद रहे थे.. कविता बड़े ही हिंसक तरीके से अपने चूतड़ों को पीयूष के लंड पर पटके जा रही थी..
अपनी कमर को तब तक उठाती जब तक सुपाड़े तक लंड बाहर न आ जाता.. फिर एक झटके में जिस्म का सर वज़न लंड पर दे देती.. थप थप थप थप की आवाज़ें आ रही थी.. दोनों बेकाबू होकर इस काम-युद्ध को लड़ रहे थे.. कविता की चुत से रस की धाराएं.. पीयूष के आँड़ों को भिगोते हुए बिस्तर की चादर को गीली कर रही थी। उसके स्तन पत्थर जैसे कठोर हो गए थे.. गुलाबी निप्पल बंदूक की नली की तरह तनी हुई थी.. पीयूष के लंड से चुद चुद कर कविता की चुत का कचूमर निकल गया था.. पीयूष शीला को याद करते हुए कविता के कामुक जवान बदन को बेरहमी से चोद रहा था.. उसके हरेक धक्के से कविता के मुंह से "आहह आह्ह" की आवाज़ें निकल रही थी..
कविता की आँखें बंद होती देख पीयूष समझ गया.. गति को एकदम तेज करने का वक्त आ गया था.. कविता झड़ने के कगार पर थी.. उसने कविता की कमर को मजबूती से पकड़कर और जोर से धक्के लगाना शुरू कर दिया.. कविता की चुत पीयूष के लंड को निगलते हुए अपनी लार गिरा रही थी..
अपनी पत्नी की पूत्ती की ऐसी मजबूत पकड़ अपने लंड पर महसूस करते हुए पीयूष से ओर रहा नहीं गया.. उसके लंड ने वीर्य से भरपूर पिचकारी छोड़ दी.. कविता भी अपने चुत के होंठों से पीयूष के कठोर लंड को आलिंगन देते हुए झड़ गई.. और पस्त होकर पीयूष की छाती पर ढेर हो गई.. जैसे हजारों किलोमीटर की यात्रा तय करके लौटा विमान.. रनवे पर अकेले पड़े पड़े अपनी थकान उतारता है.. बिल्कुल वैसे ही कविता पीयूष के शरीर पर पड़ी रही.. पीयूष के जिस्म पर जगह जगह कविता के नाखूनों की खरोंचे दिख रही थी.. इस जबरदस्त चुदाई से तृप्त होकर दोनों बातें करने लगे.. कविता अब भी पीयूष की छाती पर पड़ी थी.. और पीयूष का लंड अब भी कविता की चुत में था.. थोड़ा सा मुरझाया हुआ.. कविता की चुत की मांसपेशियाँ अब भी उसे दुह रही थी
कविता के सूडोल स्तनों से खेलते हुए पीयूष को शीला के स्तनों की याद आ गई.. कविता की कोमल निप्पल को छेड़ते हुए वह मल्टीप्लेक्स में शीला के स्तनों के साथ किए खेल को याद करता हुआ उत्तेजित होने लगा.. कविता के चुत के सेंसर को पीयूष की उत्तेजना की भनक लग गई.. अभी अभी झड़ा हुआ लंड फिर से सख्त कैसे हो गया!!!
कविता को अचानक पिंटू की याद आ गई.. आह्ह.. पीयूष के मुकाबले पिंटू का लंड ज्यादा तगड़ा है.. सिनेमा हॉल में पिंटू का लंड चूसने की ख्वाहिश अधूरी रह गई थी.. पर पिंटू ने उसके स्कर्ट में हाथ डालकर जिस तरह दो उँगलियाँ घुसा दी थी.. आह्हहह.. और उसका लंड भी कितना सख्त हो गया था!! मैं तो डर गई थी.. की ये अब कैसे शांत होगा!!
कविता जैसे जैसे पिंटू के खयालों में खोने लगी.. उसकी बुझी हुई चुत में फिर से हरकत होने लगी.. नए सिरे से चुत का गरम गीलापन महसूस होते ही पीयूष सोच में पद गया.. पक्की रंडी हो गई है ये कविता.. चुदाई खतम हुए पाँच मिनट नहीं हुई और इसकी चुत फिरसे रिसने लगी.. शीला भाभी के बबले याद करते हुए पीयूष नीचे से अपनी गांड हिलाने लगा.. और कविता पिंटू को याद करते हुए अपनी कमर हिलाने लगी.. जिस तरह ट्रेन का इंजन धीरे धीरे स्पीड पकड़ता है.. वैसे ही दोनों के बीच ठुकाई शुरू हो गई.. अभी थोड़ी देर पहले ही खतम हुए जबरदस्त चुदाई के बाद.. दोनों में वैसी वाली ऊर्जा या उत्तेजना नहीं थी.. पर फिर भी.. अपने प्रिया पात्रों की याद और कल्पना करते हुए दोनों ने बड़े ही आनंद पूर्वक बाकी की रात गुजार दी..
अचानक कविता को ऐसा प्रतीत हुआ की उनके बेडरूम के दरवाजे की नीचे की दरार से उसने एक परछाई को गुजरते देखा.. कहीं वो सासुमाँ तो नहीं थी?? और कौन हो सकता है.. शायद रात को उनका मूठ लगाना अधूरा रह गया था.. इसलिए बेलन घुसेड़ने वापिस जागी होगी.. अरे बाप रे!! बेलन तो मैं यहाँ ले आई.. अब वो क्या सोचेगी मेरे बारे में!! पास पड़े बेलन को अपनी मुठ्ठी में दबाते हुए कविता सोच रही थी.. काफी तगड़ा मोटा बेलन है.. कैसे घुसाती होगी वो अंदर!! ऐसा डंडा अंदर घुसे तो कितना दर्द होता होगा!! या फिर मज़ा आता होगा.. !! किसे पता.. सुहागरात को पीयूष का लंड लिया था तब कितना दर्द हुआ था.. हालांकि उस रात से पहले ऐसी कोई मोटी चीज उसने चुत में डाली ही नहीं थी
कविता को अपने पुराने दिन याद आने लगे.. पहली बार उसने अपनी चुत में पेन डालकर देखा था.. और हाँ एक बार मोमबत्ती से अपनी चुत को गुदगुदाया था.. शादी के बाद पहली बार जब पीयूष का लंड देखा तब वो डर गई थी.. वैसे पिंटू के साथ हुए अनुभव से भी काफी मदद मिली थी.. सच में.. पिंटू ही मेरा सच्चा प्रेमी है.. मैंने कितनी दफा जबरदस्ती उसका लंड चुत में लेने के लिए रगड़ा था.. पर वो नहीं पिघला कभी भी.. इसी लिए तो वो कमीना इतना पसंद है मुझे.. आई लव यू पिंटू.. आखिरी चार शब्द दिमाग के बदले होंठों से निकाल गए
"क्या बोली तू?" पीयूष ने सुन लिया
"मैंने कहा.. आई लव यू पीयूष.. तुम तो कभी कहते नहीं.. पर मैं हमेशा तुम्हारे नाम की माला जपती रहती हूँ" कविता ने चालाकी से बात को मोड लिया। पिंटू खुश होकर सो गया
जान बच गई.. आज तो भंडाफोड़ हो जाता.. अगर उसने बात को घुमाया न होता..
पीयूष आँख बंद कर सोच रहा था.. कितनी भोली है मेरी कविता.. कहीं शीला भाभी के बारे में सोचकर मैं उसे धोखा तो नहीं दे रहा!! हे भगवान.. घूम फिरकर दिमाग में शीला भाभी आ ही जाते है.. ये औरत मेरा घर बर्बाद करवाकर मानेगी.. मेरे दिल और दिमाग पर कब्जा कर लिया है शीला भाभी ने.. किसी दिन चोदने का चांस मिल जाए तो अच्छा.. कुछ भी करके उसे पटाना तो पड़ेगा ही
कविता और पीयूष के बेडरूम के दरवाजे के उस तरफ.. अपने बेटे और बहु की कामुक आवाज़ें सुनकर निराश अनुमौसी गरम गरम सांसें छोड़ रही थी.. क्या करू? कहाँ जाऊ? किससे कहू? कौन समझेगा मेरे इस दर्द को??
अनुमौसी को कविता का नंगा बदन याद आ गया.. मेरी बहु कितनी नाजुक और कोमल है.. पीयूष के साथ उसका मन-मिलाप भी अच्छा है.. कितनी सुंदर जोड़ी है दोनों की.. और मेरा भी कितना खयाल रखती ही.. छोटी से छोटी बात मुझसे पूछकर ही करती है.. उस रात को शीला के घर जाना था तब भी मुझसे पूछ कर गई थी.. शीला बड़ी चालू चीज है.. कहीं मेरी कविता उसकी संगत में बिगड़ न जाए.. मौसी के मन में डर पैदा हो गया.. शीला हरामी उस रसिक के साथ पक्का गुलछर्रे उड़ाती है.. नहीं तो इतनी सुबह सुबह हररोज क्यों दरवाजे पर खड़ी रह जाती है!! कहीं मदन की गैरहाज़री में.. !! हे भगवान.. नहीं नहीं.. शीला ऐसा गंदा काम नहीं कर सकती.. तो फिर उस रात को उसके घर से आवाज़ें क्यों आ रही थी??? मुझे पक्का यकीन है की उसके घर से मर्दों की आवाज आ रही थी.. और वो एक से ज्यादा थे.. बाहर चप्पल भी दो लोगों के पड़े हुए थे.. तो क्या उन दोनों के साथ शीला.. बाप रे.. ऐसा कैसे कर सकती है वो?? दो दो मर्दों के साथ?? यहाँ एक लंड नसीब नहीं हो रहा और वो दो दो से चुदवा रही है!! कुछ भी हो जाएँ.. उन दोनों में से एक लंड का जुगाड़ मुझे कैसे भी करना ही है.. जाकर शीला को बोल दूँगी.. एक लंड मुझे दे दे.. मैं बहोत तड़प रही हूँ शीला.. मेरे लिए भी कुछ कर.. अनुमौसी मन ही मन गिड़गिड़ाने लगी.. और जैसे उनकी प्रार्थना.. शीला के दिमाग तक पहुँच गई..
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दूसरी सुबह सात बजे.. शीला के घर के बाहर एक रिक्शा आकर खड़ी हुई.. और उसमें से रेणुका बाहर आई.. भोसड़े की भूख कितनी खतरनाक होती है..!! शीला का आमंत्रण मिलते ही रेणुका सुबह सुबह पहुँच गई..
रेणुका शीला के दरवाजे तक पहुँचती उससे पहले ही ब्रश करते हुए अनुमौसी अपने घर से बाहर निकली..
ये रेणुका हरामजादी इतनी सुबह यहाँ क्या कर रही है!! क्यों आई होगी? अभी कल ही तो उसकी शीला से पहचान हुई थी.. और इतनी देर में दोस्ती भी हो गई?? जानना पड़ेगा.. कल भी वो दोनों पानी के अंदर कुछ गुसपुस कर रही थी.. जरूर दाल में कुछ काला था.. शायद उन दोनों मर्दों में से किसी एक को शीला ने रेणुका के लिए जुगाड़ा हो सकता है.. हम्म.. पर यहाँ पुरानी पड़ोसन को छोड़कर नई दोस्त के लिए जुगाड़!! ये कैसा अन्याय है!! ये रेणुका भी पक्की रांड है.. अपने एरिया में भी करवाकर आई होगी और अब मेरे इलाके में हिस्सा झपटने आ गई.. कुछ शर्म भी नहीं आती कमिनी को!!
गुस्से में अनुमौसी बाथरूम में जाकर.. जैसे तैसे नहाकर बाहर निकली.. और पहुच गई शीला के घर.. चुत की भूख अच्छी अच्छी को पागल बना देती है..
"अरे.. तू इतनी सुबह सुबह यहाँ क्या कर रही है? "शीला के घर में घुसते ही अनुमौसी ने रेणुका से पूछा
"आइए मौसी.. चाय पीजिए.. " अपना कप मौसी को थमाते हुए शीला बोली
इधर उधर की बातें करते हुए रेणुका ने बताया की वो दो दिन के लिए रुकने वाली थी.. शीला ने झटपट घर का काम निपटा दिया और थोड़ा सा नाश्ता बना दिया.. रेणुका की पारदर्शी साड़ी से नजर आ रही उसके स्तनों की बीच की जालिम खाई को देखकर शीला को कुछ कुछ होने लगा था.. वो इस इंतज़ार में थी की कब अनुमौसी जाएँ.. और वो रेणुका के साथ अपने खेल का आरंभ करें
अनुमौसी बुजुर्ग थी.. उनकी हाजरी में कुछ भी आड़ा-टेढ़ा करने या बोलने में शीला को शर्म आ रही थी.. उसका शैतानी दिमाग काम पर लग गया.. इस बुढ़िया को किसी भी तरह जल्दी भगाना पड़ेगा यहाँ से.. दूसरी तरफ रेणुका, कल रात के बाद इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की उसने द्विअर्थी बातें शुरू कर दी.. अनुमौसी को निशाना बना कर
"मौसी, आपकी आँखें देखकर लगता है कल रात को ठीक से सोई नहीं है.. क्या किया पूरी रात??" रेणुका ने पूछा
वैसे भी कल रात कविता के आ जाने से मुठ लगाना अधूरा छोड़ना पड़ा उस बात का गुस्सा था मौसी को.. रेणुका की बात सुनकर उनका गुस्सा उखड़ पड़ा..
"तुझे क्या जानना है ये जानकर की मैंने रात को क्या क्या किया?? तू कभी मुझे कुछ बताती है क्या??" सारा गुस्सा रेणुका पर उतार दिया मौसी ने
रेणुका: "क्या जानना है आपको? की मैंने रात को क्या किया?? तो सुनिए.. पूरी रात तकिये को रगड़ रगड़ कर काटी है मैंने"
अनुमौसी: "इसलिए सुबह सुबह दौड़कर यहाँ आ गई तू?"
शीला: "क्या अनुमौसी आप भी!! तेल-पानी लेकर चढ़ गई आप तो.. बेचारी अपना दुख हल्का करने आई है यहाँ.. पति की गैरमौजूदगी में वक्त कैसे कटता है.. ये आप हम दोनों अभागनों से पूछिए.. आपको तो चिमनलाल का सहारा है.. पर हमारा क्या!!"
चिमनलाल का नाम सुनते ही अनुमौसी का मुंह कड़वा हो गया.. "उस रंडवे का नाम मत ले मेरे सामने शीला.. उसका होना या न होना सब एक बराबर है.. पूरी रात तड़पाया है उसने मुझे.. "
शीला: "अरे, ऐसा क्या हो गया मौसी?? कहीं चिमनलाल को स्टार्टिंग ट्रबल तो नहीं है ना!!
अनुमौसी: "गाड़ी स्टार्ट तो होती है.. पर माइलेज नहीं देती.. क्या कहूँ अब तुमसे.. !!"
शीला: "समझ गई मौसी.. आप भी हिचकिचाहट छोड़कर निःसंकोच बात करोगी तो मज़ा आएगा.. मैंने और रेणुका ने रात भर ऐसी ऐसी बातें की थी फोन पर.. क्यों ठीक कहा ना मैंने रेणुका??"
रेणुका: "मुझसे तो अब रहा ही नहीं जाता शीला.. आधी रात न हो चुकी होती तो में तब के तब यहाँ तेरे पास आ जाती.. कितना सहती रहूँ? हफ्ते बाद लौटूँगा कहकर वो तो निकल पड़े.. पर पूरा हफ्ता मैं कैसे निकालूँ?? कितनी तकलीफ होती है हम बीवियों को.. मर्दों को इसका अंदाजा तक नहीं है"
रेणुका के शब्दों में अपने दर्द की झलक नजर आई अनुमौसी को.. शीला अब सही मौके के इंतज़ार में थी.. पर वो हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी.. ताकि कोई गड़बड़ न हो.. अपने मन में वो सेक्स की शतरंज बिछा रही थी..
अनुमौसी: "अरे शीला.. आज रसिक नहीं आया दूध देने.. तेरे घर आया था क्या?"
तभी शीला को ये एहसास हुआ की आज रसिक नजर ही नहीं आया..