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तेरे प्यार मे....

बाहर आते ही मैं भाभी से टकरा गया . जो थोडा गुस्से में थी .

भाभी-ताला क्यों तोडा चाबी मांग लेते मुझसे

मैं- नया लगा लो

भाभी- किस चीज की तलाश है तुमको

मैं- भैया ने आपको नहीं बताया क्या

भाभी- नहीं तुम ही बता दो

मैं-मैं पल पल मर रहा हूँ भाभी, अपने हिस्से की जिन्दगी तलाश रहा हूँ

भाभी इस से पहले की कुछ और कहती सरला आ गयी रसोई में तो मैं वहां से बाहर निकल गया. बाहर आकर मैंने सरला से कहा की थोडा दूध ले आए मेरे लिए. मैंने पत्तल ली और खाना खाने के लिए बैठ गया . अंजू ने मुझे देखा तो मेरे पास आई.

अंजू- इतने बड़े होकर भी दूध पीते हो .

मैं-पीना तो मैं बहुत कुछ चाहता हूँ पर तुम बुरा मान जाओगी

अंजू- मैं क्यों बुरा मानूंगी बताओ क्या पीना चाहते हो मैं ले आती हूँ

मैं- रहने दे तू

अंजू पास ही बैठ गयी और मेरे साथ ही खाना खाने लगी.

अंजू- पूरा दिन कहा गायब थे .

मैं- तुझे याद आ रही थी क्या मेरी .

अंजू- इतना भी नहीं है तू की मरी जा रही हूँ तेरी याद में

मैं- तो फिर क्यों पूछती है कहीं भी जाऊ मैं

अंजू- तू भी नहीं था अभिमानु भी नहीं था . अकेली का टाइम पास नहीं हो रहा था मेरा.

मैं- तू कहे तो पूरी रात टाइम पास कर सकते है

अंजू- इस से आगे भी दुनिया है तू कब तक इसी में अटका रहेगा.

मैं- जहाँ तक तुझे समझा है , प्रकाश से तेरे सम्बन्ध वैसे नहीं थे जैसे तू बताती है

अंजू- मैंने आज मंगू से बात करने की कोशिश की थी पर वो राय साहब के साथ कहीं चला गया .

मैं- तुझे बुरा नहीं लगा जब तूने देखा की प्रकाश रमा को चोद रहा था तेरे जैसी गदराई साथी होने के बाद भी वो रमा के पास गया अजीब है न

अंजू- कितनी बार कहा है मेरे निजी मामले में मत घुस

मैं- घुसने तो तूने नहीं दिया परकाश को वर्ना वो क्यों जाता रमा के पास

अंजू- मुह तोड़ दूंगी तेरा

मैं- शायद तेरे नसीब ने चुदाई का सूख है ही नहीं

अंजू- तू खुश रह मैं जा रही हूँ

मेरी निगाह चाची पर थी जिसकी मटकती गांड मुझे पागल किये हुए थी. कितने ही दिन बीत गए थे मैंने चाची को नहीं पेला था . कुवे पर चुदाई का रिस्क नहीं ले सकता था मैं निशा अगर आ निकली तो मामला काबू से बाहर हो सकता था . लोगो से भरे घर में कहा चूत मारू खाना खाते हुए मैं ये ही सोच रहा था

जिन्दगी में इतना सब कुछ हो रहा था की मैं करू तो क्या करू कल रात आदमखोर को छत पर देख कर मैं समझ गया था की ये साला भी कुछ न कुछ करने की ताक में है . खैर मैं चाची के पास गया .

मैं- चाची कुछ भी कर आज देनी ही पड़ेगी

चाची- देखती हूँ जगह भी तो नहीं है न

मैं- सुन मेरी बात , बिस्तर सीढियों पर बने छज्जे पर लगा ले. सबके सोने के बाद उधर मिलेंगे सीढियों का दरवाजा बंद कर लेंगे किसी के आने का डर भी नहीं रहेगा.

चाची- चल ठीक है

मैंने मौका देख कर चाची की गांड को सहला दिया. आंच तापते हुए मुझे इंतज़ार था सबके सोने का ताकि चूत का सूख प्राप्त कर सकू . तभी बाप की गाडी आ गयी वो सीधा अपने कमरे में गया और दरवाजा बंद कर लिया. मैं हमेशा सोचता था की ये बंद दरवाजे के पीछे करता क्या होगा. धीरे धीरे करके बत्तिया बुझने लगी.पूरी तरह से सुनिश्चित करने के बाद मैं चाची के घर जा ही रहा था की गली में मूतने के लिए रुक गया. मूत ही रहा था की मैंने राय साहब को पैदल ही घर से बाहर निकलते देखा.

इतनी रात ओके बाप कहाँ जा रहा था एक तरफ चूत थी एक तरफ ये जानने की इच्छा की बाप कहाँ जा रहा था. मैंने तुरंत पीछा करना शुरू किया. थोड़ी दूर पीछा करने के बाद मैं समझ गया था की बाप कहाँ जा रहा था . वो रमा के घर जा रहा था . राय साहब के घर में घुसते ही मैं पीछे वाली खिड़की की तरफ गया और जब वहां पहुंचा तो हैरान रह गया . खिड़की पर अंजू पहले से ही मोजूद थी .

“ये बहन की लौड़ी यहाँ क्या कर रही है ” मैंने खुद से कहा और अंजू से थोड़ी दुरी बना कर खड़ा हो गया. खिड़की से अन्दर दिख रहा था . कमरे में राय साहब थे थोड़ी देर बाद रमा भी कमरे में आई, पूर्ण रूप से नग्न रमा शायद नाहा कर आई थी क्योंकि बदन से पानी टपक रहा था . उनकी चुदाई शुरू हो गयी . अंजू खिड़की से हट गयी और मेरी तरफ आने लगी.

मैं- हट क्यों गयी अपने मामा की रास लीला तो देख ले

अंजू- रमा पर नजर थी मेरी पर यहाँ तो कुछ और ही चल रहा है

अंजू का सीना तेजी से ऊपर निचे हो रहा था .

मैं- मैंने तुझसे कहा था न मेरा बाप वैसा नहीं है जैसा दीखता है

अंजू-चल चलते है यहाँ

मैं- कहाँ चलेंगे

अंजू-घर और कहा

मैं- बात तो सुन

अंजू-घर चल कर करेंगे जो भी बात करनी होगी.

मैं- ऐसा क्यों लगता है की तू कुछ छिपा रही है मुझसे

अंजू- मैं क्या छिपा रही हूँ तू ही बता

मैं- देख अंजू , तेरी जो भी तलाश है रमा उसकी बहुत महत्वपूर्ण कड़ी है . ये औरत उनसब से चुद रही है जिनको हम जानते है

अंजू- जानती हूँ ,

मैं- इतना तो मालूम कर ले इ मेरा बाप क्यों पेल रहा है इसे.

अंजू- करुँगी पता

मैं- तेरा मन करता है क्या चुदाई करने का

अंजू- करेगा तब भी तुजसे नहीं करुँगी ये सब

मैं- क्यों

अंजू- मेरी मर्जी .

घर आते ही अंजू चौबारे मे जाने लगी. मैं चाची के पास जाने को मुड़ा ही था की अंजू ने मुझे आवाज दी.

“अब कहाँ जा रहा है ”

मैं- एक काम याद आ गया निपटा के आता हूँ

अंजू- काम तो चोबारे में भी करना होगा , आजा ऊपर.

मैं- ठीक है .

ऊपर जाने से पहले मैंने सोचा की दरवाजा बंद कर देता हूँ . मैंने दरवाजे को पकड़ा और गीलेपन से मेरा हाथ सन गया......................मैंने तुरंत पीछे मुड कर देखा अंजू सीढियों पर नहीं थी पर गली में दरवाजे के ठीक सामने............
 
गली में दरवाजे के ठीक सामने आदमखोर खून से लथपथ खड़ा था उसकी पीली आँखे मेरी आँखों से मिली . उसने मुझे देख कर गुर्राया . उसके नुकीले दांत जिनसे रक्त टपक रहा था . मैं समझ गया था की आज ये किसी का तो शिकार कर आया है . अत्याप्र्त्याषित रूप से उसने मुझे लात मारी. मैं जरा भी तैयार नहीं था वार के लिए हवा में उड़ता हुआ मैं लोहे के दरवाजे से जा टकराया.

“आईईईई ” बड़ी तेज लगी थी मुझे. बहुत ही मुश्किल से संभल पाया मैं .

“रुक साले , तुझे आज मैं बताता हूँ ” मैं उसकी तरफ लपका पर वो तेज था उसने मुझे छकाया और एक बार फिर से उठा कर पटक दिया. गिरते हुए मैंने एक बात पर गौर किया कभी ये साला हाथ ही नहीं धरने देता कभी ये वार करता नहीं माजरा क्या है ये. किस्मत देखो, ब्याह के कारन पूरी गली की सफाई करवा दी गयी थी तोऐसा कुछ भी नहीं था जो हमले में इस्तेमाल किया जा सके.

तीसरी बार जब उसने मुझे चबूतरे पर पटका तो मेरा सब्र टूट गया.

मैं- ठीक है फिर .

मैंने उसके अगले वार को थाम लिया पर उसके पंजे मेरे कंधो में धंस जाने को बेताब लग रहे थे आज. उसके बदन से आती ताजा रक्त की महक मुझ पर भी असर करने लगी थी. बदन में दौड़ता रक्त सुन्न होने लगा था . दिल अचानक से ही करने लगा की सामने वाले का सीना चीर दू और उसके ताजा खून को अपने होंठो से लगा लू. न जाने मुझे क्या हुआ मैंने उसकी गर्दन पकड कर उसे ऊपर उठा लिया. उसकी पीली आँखों में मैंने हैरानी देक्खी.

अब बारी मेरी थी. मैंने उसके पेट में लात मारी वो सीधा चाची के चबूतरे पर जाकर गिरा. चबूतरे का फर्श एक पल में तड़क गया. पर वो आदमखोर तुरंत ही उठ कर लपका मुझ पर . इस बार मैं सावधान था मैंने उसे हवा में ही लपका और सामने दिवार पर दे मारा. दिवार का कोना झड़ गया. बाहर हो रही उठापटक से लोग भी जाग गए और बाहर आने लगे. चाची दौड़ते हुए बाहर आई , आदमखोर को देखते ही उसकी चीख निकल गयी. आदमखोर चाची की तरफ लपका पर मैंने फुर्ती दिखाते हुए उसका पैर पकड़ लिया और अपनी तरफ खींचा.

“चाची अन्दर जा और किवाड़ बंद कर ले. ” मैं चिल्लाया पर चाची जरा भी नहीं हिली डर के मारे जम ही गयी वो . दो चार लोग और बाहर आये मामला संगीन हो सकता था आदमखोर को यहाँ से हटाना बेहद जरुरी हो सकता था .

मैंने उसे धक्का दिया और गली के बाहर की तरफ भागा. वो मेरे पीछे आया. मैं यही चाहता था . एक दुसरे को छकाते हुए हम लोग गाँव से बाहर आ चुके थे. अब मैदान साफ़ था वो था और मैं था . आज की रात मैं बड़ी शिद्दत से ये किस्सा खत्म कर देना चाहता था .

“बता क्यों नहीं देता तू क्या पहचान है तेरी ” मैंने उसे सड़क से खेत की पगडण्डी पर घसीटते हुए कहा. उसने एक नजर आसमान की तरफ देखा और ऐसा मुक्का मारा मुझे की तारे ही नाच गए मेरी आँखों के सामने, नाक से खून बहने लगा. इम्पैक्ट इतना जोर का था की लगा कहीं नाक ही न टूट गयी हो.

पैने नाखून मेरी जाकेट को उधेड गए एक पल में ही . वो पूरी तरह से छा चूका था . इस से पहले की नाखून छाती में घुस जाये. मैंने पूरा जोर लगा कर उसे अपने से दूर धकेला. आदमखोर के अन्दर मैं नयी उर्जा को महसूस कर रहा था . जिस खेत में हम लड़ रहे थे वहां पर कंक्रीट के छोटे खम्बे लगे थे तारबंदी में मैंने वो खम्बा उखाड़ लिया और उसके सर पर वार किया.

वार सटीक जगह पर हुआ था ,एक पल को वो चकराया और मैंने बिना देर किये दो चार वार उसके सर पर लगातार किये. उसका घुटना निचे हुआ और अगला वार उसके कंधे पर हुआ . वो बुरी तरह से चीखा और फिर उसकी लात मेरे पेट पर पड़ी. दर्द से दोहरा हो गया मैं जब तक मैं संभला वो रफू चक्कर हो गया. इक बार फिर से मैं पकड़ नहीं पाया था उसे. अपने सीने पर हुए जख्म को रगड़ते हुए मैं सडक पर आया और सोचने लगा की किस तरफ गया होगा ये.

अगर वो जंगल की तरफ भागा था तो उसे तलाश कर पाना असंभव था इस रात के समय में . लंगड़ाते हुए मैं वापिस गाँव की तरफ चल दिया. गाँव में घुसा ही था की मैंने अंजू को देखा , खून से लथपथ सर से रिसता खून , पैरो में लचक . मैं हैरान हो गया उसे देख कर मेरा शक कहीं न कहीं यकीन में बदल रहा था की अंजू ही वो आदमखोर है .

“कबीर, तू ठीक है न मैं तुझे ही देखने आ रही थी ” इस से पहले की अंजू और कुछ कहती मैंने उसकी गर्दन पकड़ी और उसे धर लिया.

मैं- बस बहुत हुआ नाटक बंद कर , अब तेरे पास छिपाने को कुछ नहीं बचा. तू ही है वो आदमखोर . तुझे ठीक वहीँ पर चोट लगना जहाँ उस आदमखोर को लगी थी पुष्टि करती है मेरे शक की और फिर तू भी जानती थी की घायल अवस्था में तू जायदा दूर नहीं जा पायेगी तो रूप बदल लिया.

अंजू- दम घुट रहा है मेरा छोड़ मुझे

मैं- अब कोई नाटक नहीं

“कबीर छोड़ दे अंजू को ” ये आवाज भाभी की थी जो चाची और कुछ गाँव वालो के साथ हाथो में लालटेन, लट्ठ लिए हमारी तरफ ही आ रही थी .

मैं- इसे छोड़ दिया तो बहुत नुकसान हो जायेगा भाभी

भाभी- इसे कुछ हो गया तो नुकसान हो जायेगा कबीर

मैं- आप नहीं जानती भाभी

भाभी- जानती हूँ तभी कह रही हु, आदमखोर का हमला इस पर ही हुआ था . पड़ोसियों की दो भैंसों को मारने के बाद आदमखोर ने अंजू पर ही हमला किया था छत से गिरने के कारन ही इसे चोट लगी है . अफरा तफरी में ये घर के बगल में घायल मिली . जब इसे मालूम हुआ की तुम आदमखोर के पीछे हो तो अपनी चोट भूल कर ये इधर ही दौड़ पड़ी.

भाभी की बात सुन कर मैंने अंजू को छोड़ दिया . भाभी ने उसे संभाला पर मेरा मन नहीं मान रहा था .

घर आने के बाद मैंने देखा की सब लोगो में अजीब सी दहशत फैली हुई थी मैंने सबको आश्वस्त किया की घबराने की कोई बात नहीं है. चंपा से मैंने पानी गर्म करने को कहा और अपने जख्मो को देखने लगा. चूँकि अब कोई वैध तो था नहीं , मैने शहर के डाक्टर का दिया डब्बा निकाला और अपने जख्मो पर मरहम लगाने लगा.

यदि अंजू नहीं थी वो आदमखोर तो फिर कौन था , और अंजू पर हमला करने का उसका कोई मकसद था या फिर बस अंजू उसका शिकार थी और लोगो की तरह सर में दर्द होने लगा था . मैंने चाची से थोडा दूध लाने को कहा और वहीँ आँगन में एक गद्दा बिछा कर लेट गया.
 
सुबह उठा तो बदन दर्द से ऐंठा पड़ा था. बड़ी मुश्किल से मैं उठ पाया. मैंने देखा की आँगन में ही राय साहब, चाची, भैया, भाभी और अंजू सब लोग गहरा विचार -विमर्श कर रहे थे. मैंने पहली बार राय साहब के माथे पर चिंता की लकीरे देखि. उठ कर मैंने हाथ -मुह धोये और बाहर निकल आया. पीछे से मैंने भैया की आवाज सुनी पर मैं अभी रुकना नहीं चाहता था .

चाची के यहाँ से मैंने कपडे बदले और अपने खेतो पर आ गया. सुबह की ताजी हवा मुझे सकून दे रही थी . दिमाग में कल रात की ही बात घूम रही थी , अंजू नहीं तो फिर कौन हो सकता था वो आदमखोर,आखिर कौन था वो जिस पर काबू पाया ही नहीं जा रहा था , कहाँ से वो आता था कहाँ वो गायब हो जाता था .

दूसरा मुझे भोसड़ी के चाचा वाली गुत्थी ने उलझाया हुआ था , बहन का लौड़ा न जाने कहाँ गायब था . उसके चक्कर में अलग ही रायता फैला हुआ था . प्रकाश को किस चीज की तलाश थी जो वो चाचा से चाहता था . चाचा के बाद सिर्फ एक चीज गायब थी जो उसकी गाडी थी और गाडी को छुपाने के लिए बड़ी जगह चाहिए थी, पर वो जगह थी कहाँ पर ये सोचने की बात थी . मैंने भैया की गाडी को अपनी तरफ आते देखा. जल्दी ही वो मेरे पास थे.

भैया- छोटे, आगे से चाहे कुछ भी हो जाए आग लगनी है लग जाये तु उस आदमखोर के सामने नहीं आएगा. मैं देखूंगा अब इस मामले को . कल रात तुझे कुछ हो जाता तो

मैं- कुछ हुआ तो नहीं भैया . वैसे भी वो मेरी पकड़ से जायदा दूर नहीं है अगली मुलाकात में मैं उसे जरुर मार दूंगा.

भैया- तूने शायद सुना नहीं मैंने क्या कहा तुझसे.

मैं- भैया, आपने कभी इस बात पर विचार किया की चाचा के साथ साथ उसकी गाडी भी गायब है , और क्या गायब है चाचा का सामान में से

भैया- कबीर तुझे क्या जरुरत है ये सब सोचने की तेरे खेलने -कूदने के दिन है तू मौज कर .

मैं- चाचा हमारे परिवार का सदस्य है , हमारा खून का रिश्ता है उस से . घर की एक दिवार है वो . उसके बिना हम क्या

भैया- समझता हूँ पर हम हर मुमकिन कोशिश करके देख चुके है

मैं- क्या आप जानते हो की चाचा रमा से प्यार करता था .

भैया- रमा एक खिलौना थी बस जिससे चाचा खेलता था .

मैं- हो सकता है , पर चाचा चाहता था उसे

भैया- वो चाचा और रमा के बिच की बात थी . और यदि तुझे ऐसा लगता है तो ये बात तेरे तक ही रखना चाची के सामने मत करना उसको दुःख होगा.

मैं- उसे तो उम्र भर का दुःख हो ही गया है .

भैया- पिताजी ने कहा है की वो जल्दी ही आदमखोर के किस्से को ख़त्म कर देंगे

मैं- उनको फुर्सत आएगी तो सोचेंगे न परिवार, गाँव के बारे में

भैया- ऐसा क्यों कहता है

मैं- आप ही मालूम कर लो आजका कहाँ बीत रहा है उनका समय

भैया- तू कहता है तो मैं देख लूँगा.

दोपहर तक भैया मेरे साथ ही रहे फिर वो चले गए. पर मुझे चैन नहीं था. कुछ तो मुझसे छूट रहा था . एक बार फिर मैं निशा के खंडहर पर गया. वो भुला दिए गए कमरे एक बार फिर मेरे सामने थे. अजीब सी ख़ामोशी चीखना चाहती थी पर शायद मैं नहीं सुन पा रहा था . एक बार फिर मैंने गहन रूप से दुसरे कमरे की तलाशी लेनी शुरू की , दिवालो को फिर देखा की क्या पता कोई और छिपा दरवाजा हो. कौन था वो जो यहाँ पर रंडियों को चोद रहा था .

मान लिया जाये की चाचा यहाँ आता था तो मेरे अनुमान को दो बाते गलत साबित करती थी , रमा-सरला को यहाँ केक बारे में मालूम नहीं था दूसरी बात की गाडी ये ईमारत जिस इलाके में थी गाड़ी का आना मुमकिन नहीं था .

“जरुरी नहीं की जंगल में सिर्फ तुम ही हो जो अपने जिन्दगी जी रहे हो तुमसे पहले न जाने कितने आये कितने गए. कितनो के राज छिपाए है ये जंगल ” भाभी की कही बात मेरे जेहन में गूँज रही थी.

“तुम ख़ामोशी से खड़े नहीं रह सकते तुमने कुछ तो छिपाया है क्या है वो दिखाओ मुझे , ” मैंने दीवारों से कहा और यकीन मानिये उस दिन मैंने जाना की लोग ठीक ही तो कहते है की दीवारों के भी कान होते है . इन दीवारों ने बहुत कुछ देखा था बहुत कुछ सुना था .

पहले वाले कमरे की दीवारों पर जो खरोंचे थी उन खरोंचो में कुछ लिखा गया था , अक्सर लोग पेड़ के तनो पर , पुराणी इमारतों की दीवारों पर नाम लिख देते है. यहाँ भी किसी ने कुछ लिखा था जो लकीरों की वजह से स्पस्ट तो नहीं था पर रौशनी की इतनी किरण बहुत थी मेरे लिए.

“त्रिदेव की कहानी ढूंढो , उनको पा लिया तो सब कुछ पा लिया ” अंजू के कहे शब्द मुझे राह दिखा रहे थे. रुडा-विश्वम्बर दयाल-सुनैना. बेशक ये तीनो नाम त्रिदेव की तरफ इशारा करते थे पर ये मेरी मंजिल नहीं थे. मेरी मंजिल कुछ और था, मेरी मंजिल ये अक्षर थे जिन्हें अजीब तरीके से उकेरा गया था ,

अक्षर मेरी समझ में आ नहीं रहे थे तभी मुझे कुछ सोचा मैंने चिमनी की कालिख उस जगह पर मली और अँधेरे ने जो मुझे दिखाया, मेरा तो दिमाग ही घूम गया. ऐसा लगा की मेरी जान किसी ने निकाल ली हो. हो सकता था की मेरा अनुमान गलत साबित हो जैसे की मैंने पहले भी त्रिदेव को गलत समझ लिया था और अगर अब की बार मैंने सही समझा था तो मामला हद से जायदा संगीन था , हद से ज्यादा उलझ गया था . इन अक्षरों के बारे में सवाल पूछने का समय आ गया था .

वापिस आते हुए मैं कुवे पर गया तो देखा की सरला वहां पर मोजूद थी,

मैं- इस वक्त यहाँ पर तुम्हे तो घर पर होना चाहिए था न

सरला- नंदिनी ठकुराइन के साथ आई हूँ

मैं- कहाँ है भाभी

सरला- यही है , कह कर गयी है की थोड़ी हवा खाकर आती हूँ

मैं- घर में इतना काम है और भाभी यहाँ आई है . किस तरफ गयी है वो

सरला ने आगे की तरफ इशारा किया तो मैं चल दिया. भाभी क्यों आई थी कुवे पर ये सवाल मन में लिए .

मैंने भाभी को देखा जो जमीन के डोले पर बैठी थी .उन्होंने मुझे देखा और बोली- कहाँ गायब थे तुम

मैं- जरुरी काम था , आप यहाँ कैसे

भाभी- मैं जान गयी हूँ की प्रकाश को किसने मारा है

मैं- आपको कैसे मालूम हुआ

भाभी- ये तो पूछ लो की किसने मारा.

मैं- बताओ

भाभी ने जो नाम मुझे बताया मेरा दिल धक् से रह गया.................
 
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