• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ complete

आधे घंटे बाद जीशान अपने रूम में चला जाता है। उसका लण्ड बहुत दर्द कर रहा था। कल रात से वो चूत के अंदर तो कभी गाण्ड के अंदर ही था।

उधर सोफिया अपनी कमर मटकाती हुई नग़मा को तलाश करती हुई उसके रूम में आ जाती है। नग़मा सोफिया को देखकर अपनी नजरें उससे चुरा लेती है।

सोफिया-नग़मा यहाँ क्यों बैठी है?

नग़मा कुछ नहीं कहती ।

सोफिया उसके एकदम पास आकर बैठ जाती है-“बोल ना क्या हुआ? चुप क्यों है?”

नग़मा-“मुझे आपसे बात नहीं करनी आपी। आप और भाई जान बहुत गलत कर रहे हैं, ये अच्छी बात नहीं है। आपकी शादी होने वाली है, और आप भाई जान के साथ?”

सोफिया हँस देती है-“इधर देख मेरी तरफ…” वो नग़मा का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे अपने सीने पर रख देती है।

नग़मा-“ईईई क्या कर रही हैं आप?”

सोफिया फिर से नग़मा का हाथ पकड़कर अपनी चुची पर लगा देती है-“अभी-अभी मैं बाथरूम में जीशान से चुदवाकर आई हूँ , देख कैसे गरम कर दिया हैं तेरे भाईजान ने मेरी चुची दबा-दबा के?”

नग़मा शर्म से पानी-पानी हो जाती है-“आपी आपको जरा भी शर्म नहीं आती मेरे सामने ऐसी गंदी -गंदी बातें करते हुये?”

सोफिया-“प्यार में कुछ गंदा नहीं होता पागल …”

नग़मा-“क्या आप भाईजान से प्यार करती हैं?”

सोफिया-“हाँ बहुत करती हूँ । काश, मैं उससे शादी कर पाती? मगर किस्मत के आगे क्या किया जा सकता है? खुशनसीब है दादी और अम्मी जिन्हें अब्बू का प्यार मिला…”

नग़मा-क्या मतलब?

सोफिया-तुझे नहीं पता?

नग़मा-क्या नहीं पता?

सोफिया अपने माथे पर हाथ मार देती है-“क्या तुझे सच में नहीं पता?”

नग़मा-“नहीं ना… बोलो ना क्या?”

कहते हैं औरत से कोई बात हजम नहीं होती । आखिर सोफिया भी औरत ही थी। जब उसे ये पता चलता है कि नग़मा उस राज से अंजान है, तो वो उसे एक-एक करके सारी बात बताती चली जाती है और हर राज के खुलते ही नग़मा के चेहरे के भाव भी बदलते चले जाते हैं। जब सोफिया अपना मुँह बंद करती है तो नग़मा का हर सुराख जैसे खुल सा जाता है।

नग़मा अपने मुँह पर हाथ रख देती है-“इतनी बड़ी बात मुझे अब तक पता नहीं थी? आपको कैसे पता चली ये बात?”

सोफिया-“जीशान ने बताया मुझे…” सोफिया नग़मा से अमन के बारे में बताना नहीं चाहती थी, इसलिए वो जीशान का नाम लेती है।

नग़मा का हाथ अभी भी सोफिया की चुची पर ही था, मगर अब उसकी पकड़ में तब्दीली आ गई थी। अभी तक सोफिया ने नग़मा के हाथ पर अपना हाथ रख कर उसे अपनी चुची पर दबा रखी थी, मगर अब नग़मा की पकड़ थोड़ी सोफिया की चुची पर बढ़ती जा रही थी, जिसे सोफिया भी महसूस कर रही थी।

सोफिया अपना एक हाथ नग़मा की जाँघ पर रख देती है-“नग़मा, तुझे नहीं पता इस ख़ानदान के बारे में? यहाँ कोई भी रिश्ता सगा नहीं , सबको बस एक चीज चाहिए, वो है प्यार बस…”

नग़मा-“हाँ आपी। मैं भी जब भाईजान को शीबा अम्मी के साथ देखी थी रूम में, वो सब करते हुये तो मुझे बहुत अजीब महसूस हुआ था…”

सोफिया-“क्या जीशान और अम्मी चुदाई कर रहे थे?”

नग़मा अपना सिर ‘हाँ’ में हिला देती है।

सोफिया-“जीशान बहुत कमीना है, उसे बस औरत चाहिए। तू उससे दूर रहना नग़मा, वरना वो तुझे भी नहीं छोड़ेगा…”

नग़मा-“मैं क्यों दूर रहूं? आखिरकार, मैं भी इस घर का एक हिस्सा हूँ । मैं भी अपने अब्बू की सग़ी बेटी हूँ । वाह वाह… आप सब मजे करो और मैं देखती रहूं । नहीं बिल्कुल नहीं …”

सोफिया-“तो क्या तू भी जीशान के साथ?”

नग़मा शरमाकर अपनी नजरें नीचे झुका लेती है। उसके नजरें झुकाते ही सोफिया का दिल बाग-बाग हो जाता है। आखिरकार, मछली खुद चारा खाना चाहती है।

सोफिया अपना हाथ नग़मा की चुची पर रख कर उसे जोर से मसलती है और अपने होंठों को नग़मा के होंठों के करीब ले आती है। नग़मा जैसे ही अपनी गर्दन ऊपर उठाती है सोफिया अपने होंठ नग़मा के होंठों से लगाकर उसे चूम लेती है।

नग़मा सोफिया की बातें सुनकर पूरी तरह गरम हो चुकी थी। वो अपनी आँखें बंद कर लेती है और सोफिया के मुँह में अपनी जीभ छोड़ देती है-गलपप्प-गलपप्प।

सोफिया अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुये उसे नग़मा की कमीज के अंदर डालने लगती है। मगर नग़मा पीछे हटने लगती है, कि तभी वहाँ जीशान भी आ जाता है।

जीशान-“आपी, नग़मा को छोड़ दो और उससे दूर रहो…”

दोनों बहनें जीशान की तरफ देखने लगती हैं। सोफिया कहती है-“क्यों क्या हुआ?”

जीशान-“अम्मी ने साफ कहा है कि नग़मा और लुब से दूर रहना, और उन्हें कुछ मत करना, कुछ मत कहो नग़मा को और लुबना को। वैसे भी नग़मा की शादी होने वाली है…”

नग़मा की आँखों में आँसू आ जाते हैं, और वो उठकर जीशान के पास आ जाती है-“भाईजान, मैं आपकी बहन हूँ , मुझसे ऐसा सौतेलापन क्यों? मैं आपका क्या बिगाड़ी हूँ ?”

जीशान-“देख नग़मा, तेरी शादी होने वाली है। अम्मी का कहना ठीक है। क्या सोचेंगे तेरे ससुराल वाले, जब उन्हें पता चलेगा कि त कुँवारी नहीं है?”

नग़मा-“अम्मी कौन होती हैं ये डिसाइड करने वाली कि मुझे क्या करना है और क्या नहीं ? और आप इतने समझदार कैसे हो गये? जब अम्मी के साथ रात गुजारते थे तब कहाँ गई थी आपकी समझदारियाँ ? और जब मेरी दोस्त रूबी की अम्मी के साथ आपने वो सब किया तब कहाँ गई थी आपकी अकल? मुझे समझाने चले हैं…”

जीशान-“तुझे कैसे पता रूबी की अम्मी के बारे में?”

नग़मा-“मुझे रूबी सब बता चुकी है और उसके साथ आपने समर कैम्प में जो किया वो भी…”

जीशान को तब समझ में आता है की अपने रूम में चुपचाप सी रहने वाली नग़मा कुछ दिनों से बदली - बदली सी क्यों है? आखिरकार, रूबी ने नग़मा को सब कुछ बता दी थी, इसलिए नग़मा की कुँवारी चूत अपने भाई के लण्ड के लिए मचल रही थी।

जीशान नग़मा के बाल पकड़ लेता है।

नग़मा-“आह्ह… भाईजान्न… छोड़िए ना दर्द होता है…”

जीशान-“अच्छा? और जो तू करना चाहती है उससे दर्द नहीं होगा तुझे?

नग़मा-“वो बहन ही क्या जो अपने भाईजान की मोहब्बत को दर्द का नाम दे?” उसकी आँखों में आँसू थे और होंठों पर लरज़िश।

जीशान एक नजर सोफिया की तरफ देखता है। वो उन दोनों को ही देख रही थी। नग़मा जीशान के पैरों के पास बैठी थी।

जीशान-अच्छा तो तू मुझसे मोहब्बत करती है?

नग़मा-हाँ बेपनाह।

जीशान-“झूठ… सरासर झूठ…”

नग़मा-आजमा लो।

जीशान-“मोहब्बत में महबूब जो कहता है, जो करता है करना पड़ता है बीबी…”

नग़मा-मंजूर है।

जीशान अपने पैंट की जिप खोलने लगता है। मगर नग़मा उसके हाथ पर अपने हाथ रख कर उसे रोक देती है और खुद अपना हाथ अंदर डालकर जीशान के लण्ड को बाहर निकाल लेती है। जीशान हैरतजदा सा नग़मा को देखने लगता है।

नग़मा एक नजर भरकर जीशान को देखती है और अगले ही पल जीशान के लण्ड को मुँह में लेकर उसे अपने मुँह के अंदर जैसे छुपा लेती हैं-गलपप्प-गलपप्प।

जीशान-“नग़ ऽऽ आह्ह… तेरे माँ की…”

नग़मा बिना रुके उसे चूसती रहती है और अपनी कुँवारी बहन के मुँह की गर्मी जीशान सह नहीं पाता और 5 मिनट में ही अपना पानी नग़मा के मुँह में गिरा देता है। नग़मा एक-एक कतरा चाटती चली जाती है गलपप्प-गलपप्प।

पीछे से रज़िया उन्हें आवाज़ देती है-“मुँह मीठा हो गया होगा तो फॅक्टरी चले जाओ जीशान , तुम्हारी अम्मी का फोन आया था अभी-अभी।

तीनों चौंकते हुये रज़िया की तरफ देखते हैं, और नग़मा वहाँ से भाग जाती है। उसके जाने के बाद रज़िया के साथ-साथ जीशान और सोफिया के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। जीशान रज़िया और सोफिया को चूमते हुये फॅक्टरी चला जाता है।

 
जीशान की मेहनत से आज फॅक्टरी का काम काफी बढ़ गया था उसके नई-नई आइडियास नई-नई पॉलिसी ने मार्केट में गारमेंट्स के उसके बिजनेस को बुलंदियों के उस मुकाम तक पहुँचा दिया था, जहाँ उसके अब्बू अमन ख़ान हमेशा पहुँचना चाहते थे। अपने लगन के पक्के जीशान को बिजनेस में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं होती थी चाहे फिर वो उसके अपने ही क्यों ना करें?

जब जीशान अपने केबिन में बैठा कुछ काम कर रहा था, तब उसे सामने से अनुम आती दिखाई देती है। अचानक ही उसे कुछ सूझता है और वो अपना सेलफोन उठा लेता है। जब अनुम केबिन में पहुँचती है तो जीशान उसे किसी से बात करता हुआ दिखाई देता है।

जीशान-“हाँ हाँ जी, आपसे बात करने के लिए तो टाइम ह टाइम है। भला आपसे इम्पोर्टेंट कोई हो सकता है? आप जब कहें बंदा हाजिर हो जाएगा आपकी खिदमत में। अच्छा मैं रखता हूँ , थोड़ी देर बाद बात करता हूँ …” ये कहकर जीशान सेल टेबल पर रखने लगता है।

तभी सामने से घूर ते हुये अनुम उसके हाथ में से सेल छीन लेती है।

जीशान-ये क्या अम्मी, लाइए मेरा सेल?

अनुम-किससे बात कर रहे थे तुम?

जीशान-“आपको क्या किसी से भी करूँ?” वो खड़ा होकर अनुम के हाथ से सेल छीनने लगता है।

मगर अनुम उसे परे धकेल देती है, और सेल चेक करने लगती है-“ये तो बंद है?”

जीशान मुस्कुराता हुआ-“जी हाँ बंद है। बैटरी डिस्चार्ज है इसके काफी वक्त से…”

अनुम सेल टेबल पर रख कर वापस जाने लगती है। तभी जीशान उसका हाथ पकड़ लेता है।

अनुम-“छोड़ो मुझे, तुमने कसम खाई है कि तुम मुझे टच नहीं करोगे…”

जीशान अनुम के सामने आ जाता है-“वादा किया ही जाता है तोड़ने के लिए। आपने अपनी कसम तोड़ दिया, फिर मैंने। अपने हिसाब बराबर। वैसे एक बात बताइए? क्या मैं जान सकता हूँ इस तरह शक करने के लिये मैं क्या समझू?”

अनुम-“तुम्हें जो समझना है वो समझ लो, पहले मेरा हाथ छोड़ो…”

जीशान-“नहीं छोड़ूँगा क्या करेंगी आप?”

अनुम-“मैं कहती हूँ , हाथ छोड़ो मेरा…”

जीशान-“पहले मेरे सवाल का जवाब दो मुझे। जब आपको मुझसे कोई मतलब नहीं है तो क्यों चेक कर रही थी आप मेरा सेल?”

अनुम खामोश हो जाती है और उसके पलकें झुक जाती हैं। जीशान उसके हाथ को मजबूती से पकड़कर कलाई मरोड़ देता है।

अनुम-“आह्ह…”

जीशान-“दर्द होता है ना? मुझे भी होता है दिल में, जब आप मुझे वो अपनत्व वो प्यार नहीं देती, जिसका मैं मुस्तहिक हूँ …”

अनुम-“तुम किसी चीज के हकदार नहीं हो। मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं । तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते…”

जीशान-“मेरे जनाजे में तो आएगी ना आप?”

अनुम तड़प के अपना दूसरा हाथ जीशान के मुँह पर रख देती है-“तुझे मेरी कसम… अगर दुबारा ऐसी बात मुँह से निकाला तो?”

जीशान उसके हाथों को अपने मुँह पर पाकर उन्हें चूम लेता है।

अनुम झट से अपना हाथ हटा लेती है-“बस तुम्हारी यही बात मुझे पसंद नहीं है। पता नहीं हर वक्त तुम्हें एक ही बात क्यों सूझती है?”

जीशान-कौन सी बात अम्मी?

अनुम खामोश हो जाती है।

जीशान-बोलिए भी अम्मी जान्न?

अनुम-मुझे दर्द हो रहा है।

जीशान-एक शर्त पर छोड़ूँगा आपका हाथ?

अनुम नजरों से पूछती है-कौन सी शर्त?

जीशान-“शर्त ये है कि आप मुझे रोज एक सुबह और एक शाम में होंठों पर किस दोगी…”

अनुम स्पाट करके जीशान के गाल पर थप्पड़ जड़ देती है-“ये हर वक्त मिल सकते हैं, चाहिए?”

जीशान अनुम की कलाई छोड़ देता है और जैसे ही अनुम वहाँ से जाने लगती है, जीशान उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लेता है, और अनुम के मुँह खोलने से पहले उसके दोनों होंठों को अपने मुँह में ले लेता है।

अनुम जैसे बेहोश सी हो जाती है। उसका दिमाग़ काम करना फौरन बंद कर देता है। वो खुद को बहुत हल्का फूल का सा महसूस करती है, और अगले ही पल जब उसे एहसास होता है कि वो किसी की बाहों में है तो पूरी ताकत से जीशान को धकेल देती है, और एक और थप्पड़ जीशान को जड़ देती है।

जीशान-“मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, आप मुझे कितना ही मारो। मगर हाँ ये वादा रहा आपसे आज के बाद कि जब भी मुझे आपको चूमना होगा, मैं उस वक्त आपको चुमूंगा, चाहे फिर वो आप कहीं भी हों, मैं कुछ नहीं देख दूँगा। उसके बाद आप मुझे कुछ भी करो…”

अनुम उससे कुछ कहने वाली थी, मगर पीछे से लुबना की आवाज़ सुनकर वो खामोश रह जाती है।

लुबना-“भाई वो लेबर आपसे बात करना चाहती है…”

जीशान अनुम को देखता हुआ लुबना के साथ चला जाता है, और अनुम को कुछ सोचने पर मजबूर कर जाता है।

***** *****

इधर अमन विला में सोफिया और नग़मा रूम में बैठे बातें कर रही थी।

नग़मा-आपी एक बात पुच्छू ?

सोफिया-ह्म।

नग़मा-“आपी वो मैं ये पूछना चाहती थी कि की…”

सोफिया-“क्या नग़मा पूछ ना?” वो अपना चेहरा अब पूरी तरह नग़मा की तरफ घुमा लेती है।

नग़मा-“मुझे शर्म आती है आपी…”

सोफिया-“ओयए होये… मेरी शम़ील बहन क्या बात है, जिसे पूछने में तुझे इतनी शर्म आ रही है ?”

नग़मा-आपी मैं ये पूछना चाहती थी को… नहीं जाने दो आप मुझे गंदी कहोगी…”

 
सोफिया नग़मा का हाथ अपने हाथ में लेकर उसे अपने पास खिसका लेती है और अपना एक पैर उसके ऊपर डालकर ठीक उसकी चूत के ऊपर रख देती है-“बोल क्या बात है, तुझे मेरी कसम?”

नग़मा-“आपी मैं ये जानना चाहती थी कि कैसा लगता है जब… जब वो जब…”

सोफिया-जब चूत में लौड़ा जाता है यही ना?

नग़मा-छी आपी कितने गंदी हो गई हो आप?

सोफिया नग़मा के चेहरे को अपनी तरफ घुमाकर उसके लबों पर अपने होंठ रख कर एक डीप किस नग़मा को देती है। जब सोफिया अपने होंठ नग़मा के होंठों से हटाती है तब भी नग़मा उसी तरह आँखें बंद किए बैठी रहती है, जैसे वो कुछ देर और सोफिया के साथ चिपकी रहना चाहती थी।

नग़मा-आपी आपने?

सोफिया-अपनी आँखें बंद कर नग़मा।

नग़मा आँखें बंद कर लेती है।

सोफिया अपने दोनों हाथों में नग़मा का चेहरा पकड़ लेती है, और धीरे से उसके कान में कहती है-“जब तक मेरी चूत तेरी तरह बंद थी, तब तक मुझे भी ऐसे ही शर्म आती थी। मगर जब पहली बार अब्बू ने मेरी चूत का परदा फाड़ा था, उसके बाद सारी शर्म सारा हिजाब निकल गया मेरा। जीशान मुझे ऐसा चोदता है कि अब हर वक्त चूत उन्हें ह याद करती है…”

नग़मा-“आप्पीई ऐसी बातें मत करो ना?”

सोफिया-“अपना मुँह खोल, और अपनी जीभ मेरी मुँह में डाल…”

नग़मा वैसे ही करती है और सोफिया उसे अपने नीचे लेकर उसकी जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसती चली जाती है। जब थोड़ी देर बाद दोनों अलग होते हैं, तब नग़मा की आँखें लाल हो चुकी होती है और उससे कुछ बोला भी नहीं जाता।

सोफिया-अब पता चला मैं इतने गंदी क्यों हूँ ?

नग़मा-“आपी मुझे भी आप जैसा बनना है…”

सोफिया-“ये क्यों नहीं कहती कि तुझे भी उससे…”

नग़मा शरमाकर अपना चेहरा छुपा लेती है-“मगर आपी मुझे डर बहुत लगता है, कहीं कुछ हो गया तो?”

सोफिया-“आज रात तू मेरे रूम में रुक जाना और जब जीशान मुझे चोदेंगे, तब तू भी हमारे साथ आ जाना। अगर तुझे ठीक लगे तो तू भी आज लड़की से औरत बन सकती है। बाकी तेरे मर्ज़ी?”

नग़मा बेड से उठ जाती है और किचेन में जाने लगती है।

सोफिया-“रात 10:00 बजे…”

नग़मा मुश्कुराकर किचेन में काम करने चली जाती है।

रात 7: बजे-

जीशान और अनुम लुबना के साथ अमन विला की तरफ अपने कार में आ रहे थे। कार जीशान ड्राइव कर रहा था। उसके पास में लुबना बैठी थी और बैकसीट पर अनुम।

लुबना-भाई आपने शॉपिंग के बारे में क्या सोचा”

जीशान-कैसी शॉपिंग?

लुबना-“लो जी कर लो बात? अरे भाई घर में दो-दो शादियाँ हैं, और आपको शॉपिंग नहीं पता?”

जीशान-“मुझे शॉपिंग नहीं करनी…”

उसकी बात सुनकर अनुम भी उन दोनों की तरफ देखने लगती है।

लुबना-क्यूँ ?

जीशान-“मुझे अब किसी चीज में दिल नहीं लगता। हर वक्त दिल-ओ-दिमाग़ बेचैन सा रहने लगा है। पता नहीं मेरा क्या होने वाला है?”

अनुम लुबना से पहले बोल पड़ती है-“जीशान तुम्हें समझ नहीं आता, जब देखो मुँह से कुछ भी निकालते हो…”

जीशान-“सारी …” और वो चुपचाप ड्राइव करने लगता है।

उसकी बातों से दोनों को बहुत तकलीफ़ पहुँचती है और सबसे ज्यादा लुबना को। अगर उस वक्त वहाँ अनुम नहीं होती तो लुबना जीशान से लड़ पड़ती इस बात को लेकर। आखिरकार, ऐसे कौन सी बात है जिससे वो इस कदर रूठा-रूठा सा है?”

जब वो तीनों अमन विला पहुँचते हैं तो लुबना जीशान को अपने साथ रूम में ले जाती है और रूम लाक करके उसे लिपट जाती है-“भाई आप ऐसे बात क्यों कर रहे थे कार में?”

जीशान-“मुझे अकेलापन महसूस होने लगा है लुब । दिल नहीं लगता कहीं भी। बस दिल करता है चला जाऊूँ यहाँ से…”

लुबना-“मुझे साथ ले चलो, मैं भी अकेली हूँ भाई…”

जीशान लुबना को अपनी बाहों में लेकर उसे अपनी छाती से चिपका लेता है और उसकी पीठ पीछे मुश्कुराने लगता है। आखिर ये सच बात थी जीशान की, या कोई सोची समझी चाल? ये तो सिर्फ़ जीशान ही जानता था।

जीशान लुबना को अपने में समा लेता है। बहुत कम ही बार ये खुशनसीबी लुबना को मिल पाई थी। अपने दिल की कितनी ह बातें वो जीशान से करना चाहती थी, मगर खामोश रह जाती थी।

लुबना-“आप थक गये होंगे, जाकर फ्रेश हो जाओ। मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ …”

जीशान लुबना के सिर को थोड़ा सा ऊपर उठाकर उसके लबों के करीब अपने होंठों ले जाता है-“बहुत खूबसूरत होती जा रही है दिन-ब-दिन लुब तू …”

लुबना-आपकी मोहब्बत का असर है जी।

जीशान-अच्छा सच्ची?

लुबना-जी मुच्ची।

जीशान लुबना के माथे पर चूम लेता है। हर वक्त किसी अंगारे की तरह जलती रहने वाली उसकी पेशानी पर जैसे किसी ने ठंडी बर्फ रख दिया हो। वो जो कभी प्यार से दो लफ़्ज भी अदा नहीं किया करता था, वो जिसके मुँह से दो अच्छी बातें सुनने को लुबना के कान तरस गये थे, वो जो उसे अपनी जान से ज्यादा मोहब्बत करती थी, आज खुद को उसके पहली में पिघल जाना चाहती थी।

लुबना-“प्लीज़्ज़… मुझे चुमिये ना…”

जीशान-क्या?

लुबना-“मुझे चुमिये जीशान। आप नहीं जानते, आपके चूमने से सहरों में भी बहार आ जाएगी प्लीज़्ज़…”

जीशान लुबना के चेहरे को दोनों हाथों में पकड़कर उसके नाजुक लबों पर अपने होंठ रख देता है।

लुबना-“उन्ह…” दोनों एक दूसरे को चूमने लगते हैं जब कुछ देर बाद जीशान अपने होंठों लुबना के होंठों से अलग करता है तब लुबना अपने भाईजान की आँखों में देखती हुई कहती है-“दिल तो पहले ही नाम कर चुकी थी मैं तेरे, आज रूह पर भी तेरा कब्जा हो गया…”

लुबना की मोहब्बत जीशान नहीं जानता था। वो जो अनुम की बेटी थी, जिसके जज़्बात समुंदर की तरह गहरे थे, जो आसमानों में उड़ना पसंद करती थी, मगर पाँव हमेशा जमीन पर रखती थी। जो जीशान से इतनी गहरी मोहब्बत करती थी कि अगर जीशान उसे मजाक में भी जान देने के लिए कहता तो, एक पल भी गँवाए बिना वो कर जाती। मगर जीशान लुबना का फायेदा उठा रहा था, इस बात से अंजान कि जब उस पागल को असलियत पता चलेगी, तब अमन विला में कोई भी उसके कहर से बच नहीं पाएगा।

 
जीशान लुबना के रूम से बाहर निकलकर अपने रूम में फ्रेश होने चला जाता है, और लुबना अपनी मोहब्बत के दिए हुये तोहफे को याद करती हुई सिहर उठती है।

रात के खाने के वक्त सभी डाइनिंग टेबल पर बैठे हुये थे। नग़मा और सोफिया आँखों-आँखों में एक दूसरे से बातें करने में लगी हुई थीं।

जीशान-“अम्मी और लुब , कल से आप दोनों फॅक्टरी नहीं आएँगी…”

अनुम हैरत से जीशान को देखने लगती है और लुबना पूछ ही लेती है-क्यों?

जीशान-“अम्मी कल से आप सभी को शॉपिंग के लिए ले जाएँगी और सभी अम्मी के साथ रहेंगी। लास्ट टाइम की तरह मैं कोई प्राब्लम नहीं चाहता लुबु?”

लुबना को ईद वाला वो मंज़र याद आ जाता है।

रज़िया-मगर बेटा अभी वक्त बहुत है।

जीशान-नहीं दादी , वक्त गुजरते देर नहीं लगती। खालिद और सोफिया आपी के लिए मैंने एक फ्लेट भी ले लिया है, शादी के बाद वो वहीं रहेंगे।

लुबना-सच्ची? हमें बताया भी नहीं ?

जीशान-मैं आप सभी को सरप्राइज देना चाहता था।

सभी ये बात सुनकर खुश हो जाती हैं। और सोफिया जीशान को लालची नजरों से देखने लगती है। वो जानती थी कि जीशान ने फ्लेट क्यों खरीदा है? जीशान भी सभी से नजरें बचाकर सोफिया को आँख मार देता है

खाना खाने के बाद सभी अपने-अपने रूम में सोने चले जाते हैं। मगर जीशान अपने लपटाप पर कुछ काम करता रहता है।

रज़िया नाइटी पहने उसके पास आती है-सोना नहीं है क्या?

जीशान सिर उठाकर रज़िया की तरफ देखता है, और मुश्कुराते हुये उससे कहता है-“आप जाकर सो जाओ मैं आता हूँ …”

रज़िया-“आता हूँ वरना कल कि तरह नहीं । मैं इंतजार कर रही हूँ …”

जीशान-ठीक है।

रज़िया के जाने के बाद भी कितने ही देर जीशान काम करता रहता है। उसके इंतजार में बैठी हुई सोफिया और नग़मा इंतजार करते-करते सो जाती हैं

घड़ी रात के दो बजा रही थी। अनुम की आँख खुलती हैं, और उठकर हाल में आने लगती है मगर वहाँ जीशान को बैठा देखकर वहीं रुक जाती है। अनुम एकटक जीशान के चेहरे को देखती रहती है। तरह-तरह के ख्यालात उसके दिल में आते और चले जाते हैं। खुद को समझाती हुई अनुम वापस जाकर बेड पर लेट जाती है। वो अपने ख्यालों में गुम ही थी कि कोई उसे रूम की तरफ आता हुआ नजर आता है। वो झट से आँखें बंद कर लेती है।

जीशान अपना काम निपटाकर अनुम के रूम में आया था। अनुम की आँखें बंद थी और जीशान को उसके चेहरे पर इस कदर प्यार आ रहा था कि वो उसके पहली में आकर बैठ जाता है। अनुम अभी भी आँखें बंद किए हुई थी।

जीशान अनुम के ऊपर थोड़ा झुकता है-“अम्मी…”

अनुम आँखें नहीं खोलती

जीशान-“अनुम…”

अनुम फिर भी आँखें नहीं खोलती

जीशान को यकीन हो जाता है कि अनुम गहरी नींद में सोई हुई है-“अनुम आप जैसा हसीन मैंने आज तक नहीं देखा। आप नहीं जानती अनुम कि मैं आपसे कितनी मोहब्बत करता हूँ । आप मुझसे नाराज ना रहा करें, मुझे घुटन सी महसूस होती है। अगर मेरी शरारतें आपको नागवार गुजरें तो आप मुझे मार दिया करें, मगर नाराज ना रहा करें प्लीज़्ज़… एक आप ही हैं मेरी सब कुछ, एक आपके लिए ही मैं जी रहा हूँ , वरना कोई वजह नहीं मेरे जिंदा रहने की। आप मुझसे मोहब्बत करो या ना करो, मगर आपसे मोहब्बत करने से मुझे कोई नहीं रोक सकता। पता नहीं वो कौन सी कशिश है आपमें अनुम कि मैं आपका सगा बेटा होने के बावजूद भी आपसे मोहब्बत कर बैठा। बस आप मेरा हाथ थाम लो अनुम, मैं आपको वो सारी खुशियाँ देना चाहता हूँ जो शायद आपको अब्बू भी नहीं दे पाए…”

अनुम के दिल की धड़कनें इतनी तेज थीं कि अगर जीशान वहाँ कुछ देर और रुकता तो, शायद जीशान को उसके दिल के धढ़कनों की आवाज़ आ जाती।

मगर जीशान वहाँ रुकता नहीं बल्की बाहर चला जाता है।

उसके जाने के बाद अनुम आँखें खोलती है, और उठकर बैठ जाती है। खामोश वो थी और बोल जीशान रहा था, मगर गला अनुम का सूख चुका था। वो सामने रखी हुई बोतल उठाकर पानी पीने लगती है। अपने दिल पर हाथ रख कर वो कितनी ही देर जीशान के कहे हुये लफ़्ज़ों को अपने जेहन से निकालने की कोशिश करती है। मगर उसे ऐसे महसूस होता है जैसे जीशान के कहे गये शब्द उसके दिल पर खुद चुके हैं।

जीशान रज़िया के रूम में देखता है तो इंतजार करते-करते रज़िया गहरी नींद में सो चुकी थी। जीशान अपने कदम खुद के रूम के तरफ मोड़ लेता है। मगर रूम में जाते हुये उसके निगाह सोफिया के रूम के तरफ पड़ती है, और वहाँ की लाइट ओन दिखाई देती है। वो एक नजर वहाँ देखने की नीयत चला जाता है कि आखिरकार, सोफिया इतनी रात कर क्या रही है? जब वो सोफिया के रूम में पहुँचता है तो उसे सोफिया और नग़मा दोनों एक दूसरे के पास सोई हुई दिखाई देती हैं। जीशान रूम के अंदर आ जाता है और दरवाजा लाक कर देता है। लाइट बंद करके वो सोफिया के पास आकर बैठ जाता है।

 
जीशान जैसे ही अपना हाथ सोफिया के माथे पर रखता है, सोफिया आँखें खोल देती है।

सोफिया-“उन्ह… आ गये आप? बड़े देर कर दिये…”

जीशान-“काम ज्यादा था। सो गई थी क्या?”

सोफिया-“उन्ह… हुन्न… आपको पता है ना जब तक आप मुझे नहीं चोदते, मुझे नींद नहीं आती…”

जीशान सोफिया का माथा चूमते हुये-“चोदने ही तो आया हूँ तुझे सोफिया…”

सोफिया अपनी बाहों में जीशान को समेटते हुये-“चोदिये ना… फिर रोका किसने है?”

जीशान अपने होंठों से सोफिया के होंठों को चूमने लगता है और सोफिया भी अपने जीशान के मुँह में जीभ डाल देती है-गलपप्प-गलपप्प

सोफिया-सुनिये।

जीशान-ह्म।

सोफिया-“मुँह में डालिये ना?”

जीशान-नहीं आपी, आज मुझे तुम्हारे चूत चाटनी है।

सोफिया-“उन्ह…”

जीशान एक झटके में सोफिया की नाइटी को जिस्म से अलग कर देता है और पैंटी को कमर से निकालकर अपने होंठ सोफिया की चूत पर रख देता है-“मैंने कहा था ना मुझे चिकनी चाहिए…”

सोफिया-“अज़ज्जई… उन्नह आज नहीं की मैंने उन्ह… आह्ह… कल से आपको एकदम चिकनी मिले गी आह्ह…”

जीशान-“एकदम चिकनी चूत चाहिए मुझे…”

सोफिया-“अह्ह… हाँ एकदम चिकनी चूत रखूँगी ना जी आह्ह…”

अपनी जीभ को सोफिया की चूत के अंदर तक डालकर वो चाटने लगता है।

सोफिया-“मेरे मुँह में डालिये ना जीशान आह्ह…”

मगर जीशान सोफिया को और तड़पाते हुये उसके चूत के अंदर दो उंगलियाँ डालकर चूत को चाटता चला जाता है। सोफिया की चूत से पानी बहने लगता है और ये पानी सोफिया के बदन में सरसराहट पैदा करता चला जाता है।

सोफिया-“जीशान आ जाओ ना मेरे ऊपर उन्ह… डाल दो ना जी अब्बू…”

जीशान नंगा होकर सोफिया के जिस्म के ऊपर चढ़ जाता है। उसका लण्ड सीधा सोफिया की चूत के ऊपर रगड़ रहा था, जिसे हाथ में पकड़कर सोफिया अपनी चूत के दाने पर रगड़ने लगती है। दोनों एक दूसरे के होंठों को छोड़ने वाले नहीं थे।

जीशान-“नग़मा उठ जाएगी ना… चलो मेरे रूम में…”

सोफिया-“नहीं उठेगी आह्ह… यहाँ डालोओ… आऽ अम्मी जी…”

जीशान का लण्ड सोफिया की चूत के अंदर तक चला जाता है और पसीने में दोनों नहा लेते हैं। जिस्म की गर्मी ही इतनी ज्यादा थी कि दोनों के सासों की आवाज़ पूरे रूम में गूँजने लगती है।

और ये आवाज़ नग़मा को और बेचैन करने लगती है। वो अपनी चूत को कम्बल के अंदर सोए-सोए रगड़ने लगती है, और सामने होती जीशान से अपनी बहन को चुदते हुये देखने लगती है।

सोफिया-“मैं जानती हूँ आपने फ्लेट क्यों लिया है, मेरे और खालिद के लिया? आह्ह…”

जीशान-अच्छा क्यों लिया?

सोफिया-“ताकी आप खालिद को फॅक्टरी में रोक के मुझे रोज चोदने आ सकें। है ना? आह्ह…”

जीशान-“बहुत होशियार हो गई हो आपी आप। हाँ इसलिए आह्ह…”

सोफिया के जिस्म में सनसनी सी दौड़ने लगती है कि उसका भाई वो कर रहा है उसके लिए, जो उसके अब्बू भी ना कर सके। वो जो अपने भाई को दिल दे बैठी थी, उसके साथ जिंदगी गुजारने के बारे में सोच भी नहीं रही थी ।

जीशान सोफिया को उल्टा लेटा देता है, दोनों हाथों में कमर को पकड़कर पीछे से सोफिया को चोदने लगता है।

सोफिया-“आह्ह… जीशान रोज करोगे ना मुझे? आह्ह…”

जीशान-“क्या आपी क्या?”

सोफिया-“उन्ह… रोज चोदने आओगे ना मुझे फ्लेट पे आह्ह…”

जीशान-“हाँ आपी रोजाना आऊूँगा आपको चोदने, आपकी गाण्ड मारने, आपके मुँह में अपना लौड़ा डालने आह्ह…” वो सोफिया को पूरी ताकत से चोदता रहा और आखिरकार दोनों कुछ देर के बाद एक दूसरे की बाहों में एक दूसरे को चूमते हुए झड़ने लगते हैं। जीशान को सुबह जल्दी उठकर जाना था, इसलिए वो अपने रूम में सोने चला जाता है।

जीशान के जाने के बाद नग़मा अपनी आँखें खोलकर सोफिया के नंगे जिस्म को देखने लगती है। सोफिया मुश्कुराती हुई नग़मा के ऊपर चढ़ जाती है।

नग़मा-“आह्ह… आपी भाई जान आपसे इतनी मोहब्बत करते हैं…”

सोफिया-“हाँ बहुत करते हैं। तुझसे भी करेंगे, अगर तू अपना सब कुछ अपने भाईजान को दे देगी तब…”

नग़मा-सब कुछ तो उनका ही है।

सोफिया नग़मा के होंठों को चूमते -चूमते उसे भी नंगी कर देती है। सुबह से वो दोनों एक रूम में थी और इस दौरान शर्म के काफी पर्दे गिर चुके थे।

नग़मा-“आपी भाई जान का पानी कैसा है?”

सोफिया-“मेरी चूत में है नग़मा पीकर देख ले…”

नग़मा-“हाँ आपी मुझे पीना है…” ये कहती हुई नग़मा सोफिया की चूत पर अपनी जीभ रख कर उसकी चूत को चाटने लगती है गलपप्प-गलपप्प।

सोफिया-“आह्ह… नग़मा उन्ह…”

दोनों बहनें एक दूसरे से चिपक के रात गुजारने लगती हैं।

सुबह-सुबह जीशान फ्रेश होकर हाल में नाश्ता करने आ जाता है। अभी तक सिवाए अनुम के कोई भी जगा नहीं था। जीशान अनुम को सलाम करके नाश्ता करने बैठ जाता है। अनुम जीशान के सामने नाश्ता रखती है और उसकी तरफ पीठ करके बर्तन साफ करने लगती है।

जीशान-

“वो हमसे खफा हैं हम उनसे खफा हैं, मगर बात करने को जी चाहता है।

बड़ी निष्ठुर हैं ये उनकी अदायें, अदाओ पर मरने को जी चाहता है…”

अनुम-“चुपचाप नाश्ता करो जीशान। मुझे सुबह-सुबह कोई ईस नहीं चाहिए…”

जीशान अनुम का मूड देखकर नाश्ता करने लगता है, मगर उसका दिल नाश्ते में नहीं लगता, और वो उठकर अनुम के पीछे आ जाता है, और अनुम को दोनों हाथों से घुमाकर अपनी तरफ कर लेता है।

अनुम के दोनों हाथों में गंदी प्लेटें थीं, जिन्हें वो धो रही थी-“क्या बदतमीजी है जीशान ? ये छोड़ो मुझे…"

जीशान बिना कुछ बोले जल्दी से अनुम के होंठों को चूम लेता है-“शब्बाखैर…” ये कहकर जीशान वहाँ रुकता नहीं , बल्की अपने रूम में चला जाता है और अनुम उसे देखती रह जाती है।

 
जीशान की हरकतें उसे दिन-ब-दिन बेचैन करने लगी थीं। रात में कही हुई उसकी बातें अब भी अनुम के जेहन को झींझोड़ रही थीं। ना चाहती हुई भी जीशान उसके दिमाग़ से निकल नहीं पा रहा था।

तभी लुबना-क्या हुआ अम्मी, कहाँ खोई हुई हैं आप?

अनुम चौंकती हुई पीछे देखती है-“हाँ, नहीं मैं वो चलो नाश्ता कर लो…” किसी चोर की चोर पकड़े जाने का जो ख़ौफ़ होता है, वही अनुम के चेहरे पर कुछ लम्हों के लिए तर हो गया था।

लुबना नाश्ता करने बैठ जाती है-“अम्मी भाई उठ गये क्या?”

अनुम-“हाँ वो जाने वाला है। क्यूँ ?

लुबना-“नहीं , बस ऐसे ही । वैसे आज का प्रोग्राम क्या है, शॉपिंग के बारे में?”

अनुम-“सब जाग जाए उसके बाद खुद पूछ लेना…”

जीशान तैयार होकर वापस किचेन में आता है-“अम्मी मैं जा रहा हूँ …”

अनुम बिना उसकी तरफ घूमे बस हुम्म… कह देती है।

जीशान-अम्मी इधर देखो ना।

अनुम सिर घुमाकर उसकी तरफ देखती है।

जीशान-“अब दिन अच्छा जाएगा मेरा ओके। कम खाया कर लुब मोटी होती जा रही है…”

लुबना-“होने दो। चलो पहले क्रेडिट कार्ड निकालो, आज शॉपिंग करने जाना है…”

जीशान अपने पाकेट से क्रेडिट कार्ड निकालकर लुबना के बजाए अनुम के हाथ में दे देता है, और वहाँ से चला जाता है। दोनों माँ-बेटी एक दूसरे को देखने लगती है और लुबना अपना ध्यान वापस नाश्ते पर लगा देती है।

फॅक्टरी में पहुँचकर जीशान अपने काम में लग जाता है। काम में वो इतना मसरूफ़ हो जाता है कि उसे लंच टाइम का भी पता नहीं चलता। ठीक 2:00 बजे बजे उसके सेल पर अनुम का काल आता है, और वो लपक के काल रिसीव कर लेता है।

जीशान-जी कहिए।

अनुम-नाश्ता भी ठीक से नहीं किया तुमने, लंच के लिए घर आ रहे हो ना?

जीशान-नहीं , भूक नहीं है।

अनुम-“क्यों तबीयत ठीक नहीं लग रही है क्या, मैं वहाँ आ जाऊूँ?

जीशान-“अरे नहीं नहीं कर लूँगा लंच मैं। आप फिकर ना करें वैसे अभी आप कहाँ हैं?”

अनुम-हुम्म… शॉपिंग माल में हैं।

जीशान-और लंच?

अनुम-घर जाकर करेंगे।

जीशान-ठीक है। मुझे बता देना मैं भी तभी कर लूँगा।

अनुम-“जी नहीं । आप अभी करेंगे लंच जीशान समझे? मेरा मतलब है लंच करो जल्दी से…”

जीशान-अम्मी एक बात कहूँ ?

अनुम-क्या?

जीशान-“आप डाँटती हुई बहुत प्यारी लगती हो, बिल्कुल पत्नी की तरह…”

अनुम काल डिसकनेक्ट कर देती है, और जीशान के चेहरे पर हँसी फैल जाती है।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

“क्या मैं अंदर आ सकती हूँ ?”

दरवाजे पर किसी औरत की आवाज़ सुनकर जीशान उसकी तरफ देखता है-“अरे फुफु आइए आइए अचानक से?”

फ़िज़ा-“हाँ मैं इधर आई हुई थी, डाक्टर सोनिया के यहाँ रूटीन चेकप के लिए। सोची तुमसे मिलती चलूँ…”

जीशान-डाक्टर सोनिया, आप जानती हैं उन्हें?

फ़िज़ा-“हाँ बहुत अच्छे से। तुम्हारे बारे में भी पूछ रही थी। तुम कैसे जानते हो उन्हें?”

जीशान-“जी वो उनके बेटी रूबी मेरे साथ कालेज में पढ़ती थी ना…”

फ़िज़ा-“ओह्ह… फिर तो काफी अच्छी तरह से जान पहचान हुई होगी तुम्हारी और डाक्टर सोनिया की?”

होंठों पर सोखी लिए फ़िज़ा जीशान का मन टटोलने लगती है।

जीशान-“क्या आप भी फुफु? कामरान भाई नहीं आए?”

फ़िज़ा-“नहीं वो अपने अब्बू के साथू कहीं गये हुये हैं…”

जीशान-आपके होंठों को क्या हुआ?

फ़िज़ा का होंठ थोड़ा सा कटा हुआ था-“अरे ये? क्या बताऊँ जीशान , तुम्हारे फोफा भी ना…”

जीशान जोर से हँस पड़ता है-“अच्छा हुआ आप आ गई फुफु। मैं अभी लंच करने के लिए ही जा रहा था।

चलिए आपने भी नहीं किया होगा, किसी रेस्टोरेंट में चलते हैं…”

फ़िज़ा-चलो।

और दोनों कार में बैठकर लंच करने चले जाते हैं। लंच करते-करते फ़िज़ा जीशान से शादी की तैयाररयों के बारे में पूछने लगती है।

जीशान-“अरे बाप रे …”

फ़िज़ा-क्या हुआ?

जीशान-अच्छा हुआ अपने याद दिला दिया। मुझे तो फ्लेट पर भी जाना था।

फ़िज़ा-कौन सा फ्लेट?

जीशान-“जी वो सोफिया आपी और खालिद भाईजान के लिए मैंने एक फ्लेट खरीदा है। शादी के बाद वो वहीं रहेंगे…”

फ़िज़ा-“अरे वाह… ये तो बहुत अच्छी बात है। मुझे नहीं दिखाओगे अपना फ्लेट?”

जीशान-“क्यों नहीं ? पहले लंच तो ख़तम कर लेते हैं…” और दोनों लंच ख़तम करके जीशान के नये फ्लेट पर चले जाते हैं।

फ़िज़ा ने टाइट काले रंग की शलवार कमीज पहन रखी थी। कार में बैठने के बाद फिटिंग की वजह से वो जिस्म से बहुत चिपक सी गई थी। जीशान ड्राइव करते-करते बार-बार फ़िज़ा की तरफ ही देख रहा था, जिसे फ़िज़ा ने भी नोटिस की थी।

फ़िज़ा-अरे जीशान, सामने देखो ना वरना एक्सीडेंट कर दोगे। जो देखना है फ्लेट पर देख लेना।

जीशान घबराते हुये-क्या फुफु?

फ़िज़ा मुश्कुराती हुई-“कुछ नहीं …” बातों-बातों में दोनों फ्लेट पर पहुँच जाते हैं।

जीशान ने एक बहुत ही खूबसूरत फ्लेट खरीदा था सोफिया के लिए, 3 बेडरूम और किचेन बाथरूम से लैस। ये फ्लेट किसी बड़े से घर से कम नहीं था। सभी सामान पहले से लगा हुआ था बस नये कपल के आने भर की देर थी।

फ़िज़ा फ्लेट देखती रह जाती है-“िाआह्ह… ऐसा लग रहा है जैसे यहाँ किसी चेज की कमी नहीं है, बहुत खूबसूरत है…”

जीशान-“है ना फुफु? हर एक ज़रूरत का सामान यहाँ मौजूद है। शादी के बाद सीधा सोफिया आपी और खालिद भाईजान यहाँ शिफ्ट हो जाएँगे…”

फ़िज़ा एक-एक रूम देखने लगती है और बेडरूम में आकर उसके पैर रुक जाते हैं।

बेड एकदम साफ सुथरा था जैसे बस दुल्हन का इंतजार कर रहा हो। फ़िज़ा बेड पर बैठ जाती है-“तो यहाँ होगी सुहागरात सोफिया की?”

जीशान शरमा जाता है।

फ़िज़ा-“अरे भाई, तुम क्यों शरमा रहे हो? तुम्हारा भी नंबर आ जाएगा…”

जीशान-“फुफु आप भी ना…” वो बात बदलने के लिए म्यूजिक सिस्टम ओन कर देता है, और वो ओन होते ह एक रोमांटिक सा म्यूजिक बजने लगता है।

फ़िज़ा जीशान की आँखों में कुछ तलाश करने लगती है।

जीशान अपना हाथ फ़िज़ा की तरफ बढ़ता है-“क्या मैं सबसे हसीन लड़की के साथ डान्स कर सकता हूँ ?”

फ़िज़ा-“लड़की अह्ह…”

जीशान-“जी हाँ मेरे लिए तो आप अभी भी स्वीट-16 ही हो…”

फ़िज़ा अपना हाथ जीशान के हाथ में दे देती है-“बातें अपने अब्बू जैसी करते हो…”

जीशान-“काम भी अब्बू से बेहतर कर लेता हूँ …”

फ़िज़ा-“देखना पड़ेगा फिर तो…”

दोनों एक दूसरे केी कमर में हाथ डाले धीरे-धीरे डान्स करने लगते हैं। फ़िज़ा के जिस्म से आते परफ्यूम की खुश्बू जीशान के दिमाग़ में हलचल सी मचाने लगती है, और वो अपना हाथ थोड़ा नीचे खिसका के कमर के ऊपर रख देता है।

फ़िज़ा-“ऊऔच… बदमाश कहीं के…” फ़िज़ा बुरा नहीं मानती-“जब भी तुम्हें देखती हूँ ना जीशान, तुम्हारे चेहरे में मुझे अमन नजर आते हैं…”

जीशान-“आप बहुत खूबसूरत हो फुफु…”

फ़िज़ा-क्या? मैं क्या कह रही हूँ और तुम क्या कह रहे हो?

जीशान फ़िज़ा की कमर को थोड़ा दबाते हुये अपने करीब कर लेता है। एक हल्की से चीख उसके गले से निकल जाती है-“आप बहुत हसीन हो फुफु…”

फ़िज़ा शरमा जाती है और अपनी पलकें नीचे कर लेती है।

जीशान-क्या मैं आपको किस कर सकता हूँ ?

फ़िज़ा बिना सिर उठाए कहती है-“तुम्हारे अब्बू कभी नहीं पूछते थे…”

जीशान ये सुनते ही फ़िज़ा को अपने से चिपका लेता है, और दोनों के होंठ एक दूसरे में मिल जाते हैं।

फ़िज़ा-“जीशान कब से मैं इस पल के इंतजार में थी मेरे बच्चे… गलपप्प…”

जीशान-“मैं भी आपके लिए बहुत तड़पा हूँ फुफु गलपप्प…”

दोनों इतने जल्दी में थे कि एक दूसरे के कपड़े उतारने में लग जाते हैं, और जब फ़िज़ा जीशान की पैंट उतारने नीचे बैठती है तो एक पल के लिए उसे अमन के साथ गुजारी हुई वो रात याद आ जाती है और वो आँखें बंद करके जीशान की पैंट नीचे उतार देती है। मगर जीशान का अपने अब्बू से बड़ा था।

 
Back
Top