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जब कुछ देर बाद जीशान अपनी आँखें खोलकर रज़िया को देखता है, तो उसे रज़िया के चेहरे पर महताब सी रोशनी नजर आती है, वो चमक, वो खुशी जो एक औरत अपने मर्द से अपने शौहर से जी भरकर चोदने के बाद महसूस करती है।
जीशान रज़िया से-तुम खुश तो हो ना?
रज़िया-“बेहद खुश हूँ मैं जीशान , और ये खुशी सिर्फ़ तुम मुझे दे सकते थे। सच में अगर आज अमन भी जिंदा होते तो मैं उनके पास भी इतनी खुशी महसूस नहीं करती, जितनी आज मुझे तुम्हारी बाहों में महसूस हो रही है…”
जीशान अपनी रज़िया को अपने ऊपर खींच लेता है और दो जिस्म फिर से अपनी लगाई हुई आग में जलने लगते है। रात भर जीशान अपनी दादी के जिस्म के ऊपर कभी नीचे होता रहा, ना वो खुद सोया और ना उसने रज़िया की आँख लगने दी ।
सबसे ख़तरनाक बात ये हुई कि उन दोनों की चुदाई की वजह से सोफिया भी सो नहीं पाई, उसकी चूत उंगलियों से घिसती रही और रोती रही ।
सुबह होने से पहले जीशान कपड़े पहनकर अपने रूम में चला जाता है और रज़िया नाइटी पहनकर कुछ देर सो जाती है।
मगर सोफिया की आँखों से नींद नदारद हो चुकी थी। उसकी आँखों में बस एक चीज थी जीशान।
सुबह 7:00 एएम बजे, अमन विला
जीशान अपने रूम में गहरी नींद में सोया हुआ था। रात अपनी होने वाली बेगम के साथ गुजरने के बाद उसका जिस्म काफी रिलेक्स था।
मगर आज सुबह से घर में शोर-ओ-गुल था। जब जीशान फ्रेश होकर हाल में आता है तो उसे रज़िया और अनुम बातें करती हुई मिलती हैं। वो भी आकर अनुम के बगल में बैठ जाता है।
जहाँ अनुम जीशान को देखकर मुश्कुरा देती है, वहीं रज़िया किसी नई-नवेली दुल्हन की तरह अपने महबूब को देखकर शरमा जाती है। जीशान की सारी हरकतें, उसकी रात में किये हुई वो मोहब्बत के वादे, सभी एक पल में रज़िया को याद आ जाते हैं।
जीशान रज़िया को देखकर आँख मार देता है-“क्या बात है घर में इतना शोर-ओ-गुल क्यों है?”
अनुम-“खालिद और उनके परिवार वाले आ रहे हैं लंच पे…”
जीशान-क्यूँ ?
अनुम-“उफफ्फ़हो… जीशान , तुम भी ना… फ़िज़ा और कामरान घर पर हैं, हमने सोचा कि खालिद और उनके परिवार को भी इन्वाइट करके अगले महीने की शादी की डेट फ़िक्स कर देते हैं।
जीशान-“किससे पूछकर आप सभी ने ये फैसला लिया? मुझसे तो किसी ने कुछ पूछा भी नहीं …” वो थोड़ा गरज के बोला था। उसकी आवाज़ बिल्कुल हुक्मरानो वाली थी।
अनुम और रज़िया दोनों सहम जाते हैं, और फटी-फटी नजरों से जीशान के चेहरे को देखने लगते हैं।
जीशान-“मैं घर का मालिक हूँ , मुझसे किसी ने क्यों नहीं पूछा ?”
रज़िया-जीशान , वो हम ने सोचा कि…
जीशान-“अच्छा अब तुम सब सोचने भी लगी हो? बहुत खूब…”
कुछ देर वहाँ खामोशी छा जाती है, कोई कुछ नहीं कहता। अनुम और रज़िया को एहसास होता है कि उन्होंने जीशान से ना पूछकर जो प्रोग्राम बनाया है, उसे लेकर जीशान सख़्त नाराज है। मगर अचानक से जीशान के हँसने की आवाज़ से दोनों औरतें और माहौल थोड़ा खुशनुमा हो जाता है।
जीशान-“आह्ह… अरे मैं तो मजाक कर रहा था…”
अनुम हल्की सी थपकी जीशान की मुन्डी पर मारती है-“तुम भी ना जीशान , हमें डरा ही दिया तुमने…”
जीशान थोड़ा कड़क आवाज़ में कहता है-“अभी मजाक कर रहा था। मगर इसका मतलब ये नहीं कि तुम सब आइन्दा ऐसी हरकत करो। अगर आइन्दा मुझसे बिना पूछे कोई भी प्रोग्राम तय किया गया तो?” वो दोनों की आँखों में देखकर बोल रहा था।
उस वक्त रज़िया के साथ-साथ अनुम को ये एहसास हुआ था कि जीशान अपने खालिद की तरह है, जो मोहब्बत में सब कुछ लुटा देता है मगर उसकी ना-फरमानी करने से वो खफा भी बहुत हो जाता है। हर औरत ये चाहती है कि उसका एक मर्द हो, जो उसपर हुकूमत करे, उसे कुचले, उसे अपने कंट्रोल में रखे, इसी में वो औरत खुद को महफूज समझती है। अगर घर में मर्द ना हो तो वो औरत खुद को असुरक्षित महसूस करती है।
जीशान की बात से रज़िया और अनुम का दिल बाग-बाग हो गया था, और दोनों अपने घर के एकलौते मर्द की शेर जैसी दहाड़ से घबराई नहीं थीं, बल्की उन्हें उसकी बातों पर आज फख्र महसूस हो रहा था।
अनुम-“आइन्दा ऐसे गलती नहीं होगी जीशान …” और अनुम उठकर किचेन में चली जाती है।
और जीशान की नजरें उसकी कमर को देखती रहती हैं। किस कदर खूबसूरत थी अनुम, उसके हुश्न की कदर अमन भी ना कर सका था। जिस हुश्न की मलिका के साथ रात दिन मोहब्बत करना चाहिए था उससे बेमहसूस रहता था अमन ख़ान।
मगर असली हीरे की परख जीशान को थी और उस हीरे को पाने के लिए जीशान कुछ भी करने को तैयार था।
रज़िया जीशान को खामोश देखकर खंखारती है।
जीशान रज़िया की तरफ देखते हुये कहता है-“नींद अच्छे से आई थी मेरी जान को?”
रज़िया कुछ नहीं कहती, बस झुकी हुई नजरें सारा दिल का हाल बयान कर देती हैं।
सोफिया दूर से उन दोनों को देख रही थी। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो उन दोनों के सामने जाए, ख़ास तौर पे जीशान के सामने। रात उसने जोश के आलम में सोफिया को उस जगह छुआ था जहाँ तक सिर्फ़ अब तक एक शख्स पहुँच पाया था मगर उस छुवन से सोफिया के कितने ही सोए हुये ख्वाब जाग गये थे। जीशान की मर्दाना शख्सियत में सोफिया को अपना मुस्तकबिल नजर आने लगा था। जो कसमें वादे किसी वक्त सोफिया ने अमन के साथ किये थी और जिसके टूट जाने से उसके दिल के भी हजार टुकड़े हो चुके थे, उन सारे रेजा-रेजा ख्वाबों को पूरा करता दिखाई दे रहा था जीशान।
जीशान रज़िया से-तुम खुश तो हो ना?
रज़िया-“बेहद खुश हूँ मैं जीशान , और ये खुशी सिर्फ़ तुम मुझे दे सकते थे। सच में अगर आज अमन भी जिंदा होते तो मैं उनके पास भी इतनी खुशी महसूस नहीं करती, जितनी आज मुझे तुम्हारी बाहों में महसूस हो रही है…”
जीशान अपनी रज़िया को अपने ऊपर खींच लेता है और दो जिस्म फिर से अपनी लगाई हुई आग में जलने लगते है। रात भर जीशान अपनी दादी के जिस्म के ऊपर कभी नीचे होता रहा, ना वो खुद सोया और ना उसने रज़िया की आँख लगने दी ।
सबसे ख़तरनाक बात ये हुई कि उन दोनों की चुदाई की वजह से सोफिया भी सो नहीं पाई, उसकी चूत उंगलियों से घिसती रही और रोती रही ।
सुबह होने से पहले जीशान कपड़े पहनकर अपने रूम में चला जाता है और रज़िया नाइटी पहनकर कुछ देर सो जाती है।
मगर सोफिया की आँखों से नींद नदारद हो चुकी थी। उसकी आँखों में बस एक चीज थी जीशान।
सुबह 7:00 एएम बजे, अमन विला
जीशान अपने रूम में गहरी नींद में सोया हुआ था। रात अपनी होने वाली बेगम के साथ गुजरने के बाद उसका जिस्म काफी रिलेक्स था।
मगर आज सुबह से घर में शोर-ओ-गुल था। जब जीशान फ्रेश होकर हाल में आता है तो उसे रज़िया और अनुम बातें करती हुई मिलती हैं। वो भी आकर अनुम के बगल में बैठ जाता है।
जहाँ अनुम जीशान को देखकर मुश्कुरा देती है, वहीं रज़िया किसी नई-नवेली दुल्हन की तरह अपने महबूब को देखकर शरमा जाती है। जीशान की सारी हरकतें, उसकी रात में किये हुई वो मोहब्बत के वादे, सभी एक पल में रज़िया को याद आ जाते हैं।
जीशान रज़िया को देखकर आँख मार देता है-“क्या बात है घर में इतना शोर-ओ-गुल क्यों है?”
अनुम-“खालिद और उनके परिवार वाले आ रहे हैं लंच पे…”
जीशान-क्यूँ ?
अनुम-“उफफ्फ़हो… जीशान , तुम भी ना… फ़िज़ा और कामरान घर पर हैं, हमने सोचा कि खालिद और उनके परिवार को भी इन्वाइट करके अगले महीने की शादी की डेट फ़िक्स कर देते हैं।
जीशान-“किससे पूछकर आप सभी ने ये फैसला लिया? मुझसे तो किसी ने कुछ पूछा भी नहीं …” वो थोड़ा गरज के बोला था। उसकी आवाज़ बिल्कुल हुक्मरानो वाली थी।
अनुम और रज़िया दोनों सहम जाते हैं, और फटी-फटी नजरों से जीशान के चेहरे को देखने लगते हैं।
जीशान-“मैं घर का मालिक हूँ , मुझसे किसी ने क्यों नहीं पूछा ?”
रज़िया-जीशान , वो हम ने सोचा कि…
जीशान-“अच्छा अब तुम सब सोचने भी लगी हो? बहुत खूब…”
कुछ देर वहाँ खामोशी छा जाती है, कोई कुछ नहीं कहता। अनुम और रज़िया को एहसास होता है कि उन्होंने जीशान से ना पूछकर जो प्रोग्राम बनाया है, उसे लेकर जीशान सख़्त नाराज है। मगर अचानक से जीशान के हँसने की आवाज़ से दोनों औरतें और माहौल थोड़ा खुशनुमा हो जाता है।
जीशान-“आह्ह… अरे मैं तो मजाक कर रहा था…”
अनुम हल्की सी थपकी जीशान की मुन्डी पर मारती है-“तुम भी ना जीशान , हमें डरा ही दिया तुमने…”
जीशान थोड़ा कड़क आवाज़ में कहता है-“अभी मजाक कर रहा था। मगर इसका मतलब ये नहीं कि तुम सब आइन्दा ऐसी हरकत करो। अगर आइन्दा मुझसे बिना पूछे कोई भी प्रोग्राम तय किया गया तो?” वो दोनों की आँखों में देखकर बोल रहा था।
उस वक्त रज़िया के साथ-साथ अनुम को ये एहसास हुआ था कि जीशान अपने खालिद की तरह है, जो मोहब्बत में सब कुछ लुटा देता है मगर उसकी ना-फरमानी करने से वो खफा भी बहुत हो जाता है। हर औरत ये चाहती है कि उसका एक मर्द हो, जो उसपर हुकूमत करे, उसे कुचले, उसे अपने कंट्रोल में रखे, इसी में वो औरत खुद को महफूज समझती है। अगर घर में मर्द ना हो तो वो औरत खुद को असुरक्षित महसूस करती है।
जीशान की बात से रज़िया और अनुम का दिल बाग-बाग हो गया था, और दोनों अपने घर के एकलौते मर्द की शेर जैसी दहाड़ से घबराई नहीं थीं, बल्की उन्हें उसकी बातों पर आज फख्र महसूस हो रहा था।
अनुम-“आइन्दा ऐसे गलती नहीं होगी जीशान …” और अनुम उठकर किचेन में चली जाती है।
और जीशान की नजरें उसकी कमर को देखती रहती हैं। किस कदर खूबसूरत थी अनुम, उसके हुश्न की कदर अमन भी ना कर सका था। जिस हुश्न की मलिका के साथ रात दिन मोहब्बत करना चाहिए था उससे बेमहसूस रहता था अमन ख़ान।
मगर असली हीरे की परख जीशान को थी और उस हीरे को पाने के लिए जीशान कुछ भी करने को तैयार था।
रज़िया जीशान को खामोश देखकर खंखारती है।
जीशान रज़िया की तरफ देखते हुये कहता है-“नींद अच्छे से आई थी मेरी जान को?”
रज़िया कुछ नहीं कहती, बस झुकी हुई नजरें सारा दिल का हाल बयान कर देती हैं।
सोफिया दूर से उन दोनों को देख रही थी। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो उन दोनों के सामने जाए, ख़ास तौर पे जीशान के सामने। रात उसने जोश के आलम में सोफिया को उस जगह छुआ था जहाँ तक सिर्फ़ अब तक एक शख्स पहुँच पाया था मगर उस छुवन से सोफिया के कितने ही सोए हुये ख्वाब जाग गये थे। जीशान की मर्दाना शख्सियत में सोफिया को अपना मुस्तकबिल नजर आने लगा था। जो कसमें वादे किसी वक्त सोफिया ने अमन के साथ किये थी और जिसके टूट जाने से उसके दिल के भी हजार टुकड़े हो चुके थे, उन सारे रेजा-रेजा ख्वाबों को पूरा करता दिखाई दे रहा था जीशान।