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वीर के मुँह से न सुनकर बहुत अजीब लगा।ऐसा लग जैसे जो भी मैं खुद के लिए सोच रही हूं वो गलत है।मैंने शायद खुद को बहुत ही सर्वश्रेष्ठ मान लिया था।मुझे कोई मना कर ही नही सकता का भरम वीर ने तोड़ दिया था।प्यार में शक्ति होती है बहुत।
"आप किसी और को चाहते हैं?"
"हाँ निशी, लेकिन वही जात-पात आड़े आ रहा है।"
"फिर क्या करेंगे?"
"इंतजार।"
"कब तक?"
"जब तक सही समय न आ जाए।"
"आपको यकीन है कि समय आएगा?"
"भगवान है मानती हो न?"
"हम्म।"
"तो वो आज नही तो कल मेरी बात सुनेगा।"
"ऑल द बेस्ट वीर।"
"थैंक्यू निशी।वी कैन बी फ्रेंड्स, इफ यू डोंट माइंड।"
"शुयर वीर।"
हम दोनों को हाथ मिलाते देख बुआ और माँ की आँखे चमक रही थीं।मैं भी उन्हें कुछ अभी बताना नही चाहती थी वरना अभी के अभी दूसरा रिश्ता खोज लेंगी मेरे लिए।
सगाई में जीजा जी के फूफा जी ने मुझे अलग से बुलवाया।मिले और बात चीत की।
"जबलपुर में हमारा भी भतीजा है,इंजीनियरिंग कर रहा है।"
"जी फूफा जी बहुत से कॉलेज हैं जबलपुर में।"
"आपसे मिल कर अच्छा लगा डॉक्टर निशी।"
"सिर्फ निशी फूफा जी।मैं जाऊं?"
"जी बिल्कुल।"
मैं वंहा से निकल कर अब जया दी और जीजू को छेड़ने पहुच चुकी थी। मेरे पीछे एक और रिश्ता पापा जी और फूफा जी ने जोड़ दिया था। एक डॉक्टर, एक इंजीनियर।
चुनने की जिम्मेदारी मेरी होगी।डॉक्टर की तो खुद ही न है पर अब ये इंजीनियर को देखना होगा।
सगाई के बाद सभी चले गए हम सब भी मेंहदी में व्यस्त हो गए।अभ्युदय जी से बात नही हुई।रिया पंकज से भी कोई बात नही हो पाई थी।
बुआ जी और माँ आपस मे खुस पूस कर रही थीं।जया दी मुझे छेड़ने के मूड में थीं।पर जब जान गई कि डॉ वीर इंटरेस्टेड नहीं हैं तो कुछ नही बोलीं।
मैंने माँ को जाकर खुद ही बता दिया कि वीर ने मना कर दिया है।दुखी दिखना और जल्द ही आंसू बहाना इन माओ की आदत होती है या स्वभाव नही जानती।पर माँ तो ऐसे उदास थी जैसे किसी ने शादी कर मुझे छोड़ दिया हो।
पापा जी के समझाने पर माँ का मूड ठीक हुआ।अब बारी थी इंजीनियर की।जिससे मुझे कल मिलवाया जाएगा।
माँ का मन बहुत विचलित था समझ रही थी मैं।
"माँ मैं शादी न करूं तो आप मुझे घर पर नही रखेंगी?"
"निशु,बेटी को पराया बोला जाता है जबकि सबसे सगी बेटी ही होती है।समाज के सामने झुकना ही होता है बेटा।वरना कौन चाहेगा कि जिसे इतने दिनों तक अपने जिगर का टुकड़ा कहा उसे किसी अनजान को सौंप दिया।"
"माँ आप भी तो ऐसे ही किसी अनजान के पास आईं थीं।"
"तुम्हारे पापा का स्वभाव बहुत अलग था निशु।मुझे डर लगता था कि इतने गुस्से में रहने वाले व्यक्ति के साथ कैसे जीवन कटेगा पर देखो अब।समय के साथ सब ठीक हो जाता है।"
"हम्म।तो आप शादी करवा कर ही मानेंगी मेरी।"
"हाँ। तुम्हें कोई पसन्द है क्या?"
"होगा तो उस से करवा देंगी शादी?"
शायद माँ जानती हैं मेरे प्यार को,इसलिए ही अजीब सा जवाब दिया माँ ने।
"निशु प्यार से दुनिया नही चलती।बहुत कुछ सोचना-समझना जरूरी होता है।हर पहलू पर ठीक से सोचना।जिंदगी है ऐसे ही फ़िल्म की तरह नही कटती।सोच-समझकर अगर निर्णय लोगी तो मैं साथ रहूंगी हमेशा।"
"थैंक्यू माँ।चलो आप भी मेंहदी लगवा लो।फिर कल एक और लड़के से मिलना है।इंजीनियर बाबू।"
देखते हैं अब आगे क्या होता है।
"आप किसी और को चाहते हैं?"
"हाँ निशी, लेकिन वही जात-पात आड़े आ रहा है।"
"फिर क्या करेंगे?"
"इंतजार।"
"कब तक?"
"जब तक सही समय न आ जाए।"
"आपको यकीन है कि समय आएगा?"
"भगवान है मानती हो न?"
"हम्म।"
"तो वो आज नही तो कल मेरी बात सुनेगा।"
"ऑल द बेस्ट वीर।"
"थैंक्यू निशी।वी कैन बी फ्रेंड्स, इफ यू डोंट माइंड।"
"शुयर वीर।"
हम दोनों को हाथ मिलाते देख बुआ और माँ की आँखे चमक रही थीं।मैं भी उन्हें कुछ अभी बताना नही चाहती थी वरना अभी के अभी दूसरा रिश्ता खोज लेंगी मेरे लिए।
सगाई में जीजा जी के फूफा जी ने मुझे अलग से बुलवाया।मिले और बात चीत की।
"जबलपुर में हमारा भी भतीजा है,इंजीनियरिंग कर रहा है।"
"जी फूफा जी बहुत से कॉलेज हैं जबलपुर में।"
"आपसे मिल कर अच्छा लगा डॉक्टर निशी।"
"सिर्फ निशी फूफा जी।मैं जाऊं?"
"जी बिल्कुल।"
मैं वंहा से निकल कर अब जया दी और जीजू को छेड़ने पहुच चुकी थी। मेरे पीछे एक और रिश्ता पापा जी और फूफा जी ने जोड़ दिया था। एक डॉक्टर, एक इंजीनियर।
चुनने की जिम्मेदारी मेरी होगी।डॉक्टर की तो खुद ही न है पर अब ये इंजीनियर को देखना होगा।
सगाई के बाद सभी चले गए हम सब भी मेंहदी में व्यस्त हो गए।अभ्युदय जी से बात नही हुई।रिया पंकज से भी कोई बात नही हो पाई थी।
बुआ जी और माँ आपस मे खुस पूस कर रही थीं।जया दी मुझे छेड़ने के मूड में थीं।पर जब जान गई कि डॉ वीर इंटरेस्टेड नहीं हैं तो कुछ नही बोलीं।
मैंने माँ को जाकर खुद ही बता दिया कि वीर ने मना कर दिया है।दुखी दिखना और जल्द ही आंसू बहाना इन माओ की आदत होती है या स्वभाव नही जानती।पर माँ तो ऐसे उदास थी जैसे किसी ने शादी कर मुझे छोड़ दिया हो।
पापा जी के समझाने पर माँ का मूड ठीक हुआ।अब बारी थी इंजीनियर की।जिससे मुझे कल मिलवाया जाएगा।
माँ का मन बहुत विचलित था समझ रही थी मैं।
"माँ मैं शादी न करूं तो आप मुझे घर पर नही रखेंगी?"
"निशु,बेटी को पराया बोला जाता है जबकि सबसे सगी बेटी ही होती है।समाज के सामने झुकना ही होता है बेटा।वरना कौन चाहेगा कि जिसे इतने दिनों तक अपने जिगर का टुकड़ा कहा उसे किसी अनजान को सौंप दिया।"
"माँ आप भी तो ऐसे ही किसी अनजान के पास आईं थीं।"
"तुम्हारे पापा का स्वभाव बहुत अलग था निशु।मुझे डर लगता था कि इतने गुस्से में रहने वाले व्यक्ति के साथ कैसे जीवन कटेगा पर देखो अब।समय के साथ सब ठीक हो जाता है।"
"हम्म।तो आप शादी करवा कर ही मानेंगी मेरी।"
"हाँ। तुम्हें कोई पसन्द है क्या?"
"होगा तो उस से करवा देंगी शादी?"
शायद माँ जानती हैं मेरे प्यार को,इसलिए ही अजीब सा जवाब दिया माँ ने।
"निशु प्यार से दुनिया नही चलती।बहुत कुछ सोचना-समझना जरूरी होता है।हर पहलू पर ठीक से सोचना।जिंदगी है ऐसे ही फ़िल्म की तरह नही कटती।सोच-समझकर अगर निर्णय लोगी तो मैं साथ रहूंगी हमेशा।"
"थैंक्यू माँ।चलो आप भी मेंहदी लगवा लो।फिर कल एक और लड़के से मिलना है।इंजीनियर बाबू।"
देखते हैं अब आगे क्या होता है।