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अधूरी ख़्वाहिश

वीर के मुँह से न सुनकर बहुत अजीब लगा।ऐसा लग जैसे जो भी मैं खुद के लिए सोच रही हूं वो गलत है।मैंने शायद खुद को बहुत ही सर्वश्रेष्ठ मान लिया था।मुझे कोई मना कर ही नही सकता का भरम वीर ने तोड़ दिया था।प्यार में शक्ति होती है बहुत।

"आप किसी और को चाहते हैं?"

"हाँ निशी, लेकिन वही जात-पात आड़े आ रहा है।"

"फिर क्या करेंगे?"

"इंतजार।"

"कब तक?"

"जब तक सही समय न आ जाए।"

"आपको यकीन है कि समय आएगा?"

"भगवान है मानती हो न?"

"हम्म।"

"तो वो आज नही तो कल मेरी बात सुनेगा।"

"ऑल द बेस्ट वीर।"

"थैंक्यू निशी।वी कैन बी फ्रेंड्स, इफ यू डोंट माइंड।"

"शुयर वीर।"

हम दोनों को हाथ मिलाते देख बुआ और माँ की आँखे चमक रही थीं।मैं भी उन्हें कुछ अभी बताना नही चाहती थी वरना अभी के अभी दूसरा रिश्ता खोज लेंगी मेरे लिए।

सगाई में जीजा जी के फूफा जी ने मुझे अलग से बुलवाया।मिले और बात चीत की।

"जबलपुर में हमारा भी भतीजा है,इंजीनियरिंग कर रहा है।"

"जी फूफा जी बहुत से कॉलेज हैं जबलपुर में।"

"आपसे मिल कर अच्छा लगा डॉक्टर निशी।"

"सिर्फ निशी फूफा जी।मैं जाऊं?"

"जी बिल्कुल।"

मैं वंहा से निकल कर अब जया दी और जीजू को छेड़ने पहुच चुकी थी। मेरे पीछे एक और रिश्ता पापा जी और फूफा जी ने जोड़ दिया था। एक डॉक्टर, एक इंजीनियर।

चुनने की जिम्मेदारी मेरी होगी।डॉक्टर की तो खुद ही न है पर अब ये इंजीनियर को देखना होगा।

सगाई के बाद सभी चले गए हम सब भी मेंहदी में व्यस्त हो गए।अभ्युदय जी से बात नही हुई।रिया पंकज से भी कोई बात नही हो पाई थी।

बुआ जी और माँ आपस मे खुस पूस कर रही थीं।जया दी मुझे छेड़ने के मूड में थीं।पर जब जान गई कि डॉ वीर इंटरेस्टेड नहीं हैं तो कुछ नही बोलीं।

मैंने माँ को जाकर खुद ही बता दिया कि वीर ने मना कर दिया है।दुखी दिखना और जल्द ही आंसू बहाना इन माओ की आदत होती है या स्वभाव नही जानती।पर माँ तो ऐसे उदास थी जैसे किसी ने शादी कर मुझे छोड़ दिया हो।

पापा जी के समझाने पर माँ का मूड ठीक हुआ।अब बारी थी इंजीनियर की।जिससे मुझे कल मिलवाया जाएगा।

माँ का मन बहुत विचलित था समझ रही थी मैं।

"माँ मैं शादी न करूं तो आप मुझे घर पर नही रखेंगी?"

"निशु,बेटी को पराया बोला जाता है जबकि सबसे सगी बेटी ही होती है।समाज के सामने झुकना ही होता है बेटा।वरना कौन चाहेगा कि जिसे इतने दिनों तक अपने जिगर का टुकड़ा कहा उसे किसी अनजान को सौंप दिया।"

"माँ आप भी तो ऐसे ही किसी अनजान के पास आईं थीं।"

"तुम्हारे पापा का स्वभाव बहुत अलग था निशु।मुझे डर लगता था कि इतने गुस्से में रहने वाले व्यक्ति के साथ कैसे जीवन कटेगा पर देखो अब।समय के साथ सब ठीक हो जाता है।"

"हम्म।तो आप शादी करवा कर ही मानेंगी मेरी।"

"हाँ। तुम्हें कोई पसन्द है क्या?"

"होगा तो उस से करवा देंगी शादी?"

शायद माँ जानती हैं मेरे प्यार को,इसलिए ही अजीब सा जवाब दिया माँ ने।

"निशु प्यार से दुनिया नही चलती।बहुत कुछ सोचना-समझना जरूरी होता है।हर पहलू पर ठीक से सोचना।जिंदगी है ऐसे ही फ़िल्म की तरह नही कटती।सोच-समझकर अगर निर्णय लोगी तो मैं साथ रहूंगी हमेशा।"

"थैंक्यू माँ।चलो आप भी मेंहदी लगवा लो।फिर कल एक और लड़के से मिलना है।इंजीनियर बाबू।"

देखते हैं अब आगे क्या होता है।
 
सुबह से बहुत से कार्यक्रम शुरू थे।

चीकट, हल्दी और भी न जाने क्या-क्या।समय तेजी से दौड़ता सा लग रहा था।हल्दी में सभी ने मुझ पर ऐसा धावा बोला कि गुस्सा आ रहा था। हर कोई आकर हल्दी लगा जाता कहकर की अगली बारी तुम्हारी है। मैं खिसक कर जया दी कि पास गई जो मंडप पर बैठी थीं चुपचाप।

"एक बात बताओ दी।"

"पूछ।"

"आपको इतनी हल्दी नही लग रही जितनी मुझे,ऐसा क्यों?"

"हा हा पार्लर वाली ने मना किया है और मेंहदी का कलर भी नही आएगा ईसलिये।तू मजे कर ऐसा ही होता।"

"क्या दी।आपकीं शादी आपको लगे तो समंझ आता।मुझे पीला भूत बना दिया है सबने।"

"निशु प्यारी लग रही है तू।यंहा आ जरा।"

मेरे आंख की पलकों पर हल्दी थी जो जया दी ने अपने हाथों से अलग कर दी।फोटोग्राफर ने इस पल को हमेशा के लिए कैद कर लिया।अलग-अलग पोज़ में बहुत सी फोटुएं खिंचवाई।

दिन का खाना खाकर दी को सोने को कहा गया।दी आराम कर रही थीं।मुझे रात में उनकी पहनने वाली सारी चीज़ों को एक साथ करना था।लेनहगे का सेट,ज्वेलरी,गजरा, कंगन,चूड़ियां सभी एक जगह रख कर फिर पियरी वाली साड़ी का समान एक जगह रखा।

दी कि शादी के लिए जो लेंहगा था व्व बहुत प्यारा था।वाइन कलर में गोल्डन जरी का काम और सुंदर चुनरी।मैं छू कर देख रही थी कि माँ आ गईं।

"अच्छा है न?"

"हम्म बहुत सुंदर।"

"मेरी लाडो भी ऐसे ही चली जायेगी किसी दिन।"

"माँ प्लीज् अभी नहीं।नो रोना प्लीज।"

"हम्म नही रो रही हूँ।"माँ ने आते ऑंसूयो को पोछते हुए कहा।

"तुम भी सो जाओ रात भर जागना है न?"

"मेरी शादी थोड़े न है माँ।नींद आई तो सो जाऊंगी।"

"जया दी कि साथ किसी को तो रहना ही होगा न?जाओ रेस्ट करो एक घण्टे में फिर पार्लर निकलना है।अपना सामान रख लिया?"

"जी माँ रख लिया। रेड लेंहगा ही पहनूँगी।"

"हम्म ठीक है।सो जाओ अब।"

नींद आनी कंहा थी,एक कशमकश चल रही थी कि अब ये इंजीनियर का भी ऐसा ही कुछ हो तो बढ़िया है।वो भी खुद ही मना कर जौए।

सोई ही थी कि जया दी ने जगा दिया।

"निशु चलो।टाइम हो गया।"

"कितने बज गए?"

"उठो चलो।6.30 हो गया है।"

हम उठकर चाय नाश्ता करके निकल गए।गांव हो या शहर आजकल पार्लर की सेवा हर जगह उपलब्ध है।

जया दी को दुल्हन जैसे सजने में 3 घंटे लगे।पार्लर वाली ने बताया कि उसने शहनाज़ का कोर्स किया है दिल्ली से।

कोर्स कंही से भी किया हो उसने दी को ऐसे सजाया की वो बला की खूबसूरत लग रही थीं।मेरी तो नज़र ही हटने को नहीं थी उनसे।पर मुझे तैयार करने वाली बार-बार मेरे बालों को खींच रही थी।

"रोल कर रही हो आप या जला रही हो?"

"आप सीधे बैठिए न।दो मिनटों की बात और है।"

करीब-करीब 8.45 हो चुके थे और घर से फोन पर फोन आ रहे थे।दी के फोन पर मेरा फोन तो पिछले दो दिनों से नीरस पड़ा था।

हमें लेने गाड़ी आ गई।मैं और दी घर पहुच कर एक कमरे में बैठे ही थे कि बुआ जी आईं।हम दोनों को देखकर हमें कान के पीछे काजल लगाया।

"नज़र न लगे मेरी राजकुमारियों को।"

"हमें नज़र नही लगेगी।"

"निशी बाहर आओ।कुछ लोगों से मिलवाना है।"

"जी बुआ जी।वो इंजीनियर?"

"हम्म।"

"आती हूँ दी।"

मैं दी को छोड़कर निकल आई बाहर।माँ पा के पास बहुत से लोग जमा थे जिनमें शायद वो इंजीनियर के माँ पापा भी होंगे यही सोचते हुए आगे बढ़ी।

"नमस्ते।"

सभी को एक साथ नमस्ते कर मैं खड़ी हो गई माँ के पास।

"बहुत सुंदर है आपकीं बेटी।"

उन लोगों में खड़ी एके आंटी बोलीं।

"जाओ आप हमारे बेटे से मिल लो।वो रहा वंहा।"

ऑन्टी ने इशारे से बताया।कोट पहने एक लड़का जिसकी हाइट अच्छी थी।पीछे से तो स्मार्ट समंझ आ रहा था।आते ही देखो कैसे खाने पर टूट पड़ा है।

मैं और भैय्यू पास पहुँचे तो भैय्यू ने कहा

"एक्सक्यूज़ मि।"

वो लड़का पीछे मुड़ा और बोला

"हाय।"

"पंकज तू?"

"निशी ???"

"शिट"

हम दोनों एक साथ, बोले।
 
"तू तो मेरा जिंदगी भर इंतजार करने वाला था न?फिर लड़की देखने कैसे आ गया?"

"तेरा इंतजार करूँगा कहा था,जिंदगी भर लड़की नहीं देखूंगा ये तो नही कहा था न?"

"पंकज,तू..तू जानता है सब।"

"हाँ मैं जानता हूँ सब।पर ये नही जानता था कि यंहा भी तू मिल जाएगी।मेरी किस्मत मेरे सामने तुझे ही क्यों लेकर आती है?"

"मतलब?"

"मतलब ये की माँ को सब पता है कि मैं शादी नही करूँगा।लेकिन उन्होंने पहली बार जिद की,कि आ जा लड़की देख लेना फिर भले मना कर देना।ताकि पापा को लगे कि कोई गड़बड़ नही है।"

"तो?अब क्या हुआ?अब भी मना कर सकता है तू।"

"मेरी माँ और तेरी माँ, अब मानेंगी?"

"ये तो सोचा ही नही मैंने।पर मैं मना लूँगी पापा जी को।तू टेंशन न ले।"

"टेंशन तू ले।मेरी तो शादी भी हो गई तो गम नहीं।"

"बकवास न कर पंकज।"

"तूने वो लेटर पढ़ा?जो मैंने तुझे ट्रेन में दिया था?"

"नहीं।बिल्कुल भी याद नही रहा।घर पर ही है जाकर देखूंगी।क्या था कुछ स्पेशल?"

"नहीं।अब मत पढ़ना।तू जो कहेगी मैं उसमे तेरे साथ हूँ।तू भाग कर भी शादी करना चाहेगी तब भी।मैं तुझे परेशान या उदास नही देख सकता।अभी नार्मल हो जा।तेरा ही चेहरा देख रहे हैं सभी।"

"पंकज तू जानता है ना कि..?"

"निशी, तेरी शादी मैं करवाऊंगा अभ्युदय जी से।ठीक है?"

"पकक्का न?"

"हाँ बस वो मान जाएं।"

पंकज ने मज़ाक किया और मैंने एक चपत लगा दी पंकज की पीठ पर।

"क्या कर रही है?सब देख रहे हैं।"

मैंने जब नजर उठाई तो सभी हमारी तरफ बढ़ रहे थे।माँ ने पास आकर कहा

"चलो निशु बारात आ चुकी,द्वारचार भी हो गया है।दीदी को लाओ थोड़ा चावल फेंक कर जाएंगी।"

"जी माँ।"

"पंकज,अब तो तुम्हें दामाद बना कर ही मानेंगे हम।चाहे कितना भी मना कर लो तुम।"

माँ की इस बात पर गुस्से से लाल थी मैं और सभी इसे मेरे और पंकज की हाँ समझ रहे थे।

दी के साथ चावल डलवा कर जीजा जी के ऊपर मैं अंदर जा ही रही थी कि विनय मिला।

"जिज्जी।ये हैं अपना के ऊँ?"

"नहीं।अब कुछ और नही पूछना।बाद में बताऊंगी सब।"

विनय के पास अभ्युदय जी का फोन आया और न जाने विनय ने क्या खिचड़ी पकाई।

जयमाला, चढ़ाव शादी के चक्कर में मैं भी भूल ही गई अभ्युदय जी को फोन करना।शादी के चलते मेरी औऱ पंकज की नोक-झोंक भी चालू थी।सभी बहुत खुश थे हमें साथ हंसते-लड़ते देखकर।

सुबह विदाई के बाद जब फ्री हुई तो पापा जी भी जाने को तैयार थे।

"माँ मैं भी जा रही हूँ।"

"नहीं निशु हम 2 दिन बाद चलेंगे।"

"नहीं माँ।ना फोन चलता है न नेटवर्क आता है।मैं जाऊंगी।"

बुआ जी ने जब सुना तो पास आईं।

"निशी तुम्हें पंकज पसन्द आया?"

"बुआ जी मैं उसे जानती हूँ, पहले से ही।"

"अरे,वीर को भी जानती थी ते लड़की,अब पंकज को भी?"

"हाँ बुआ जी।पंकज मुझसे शादी नहीं करेगा।"

"क्यों नहीं करेगा?"

"मैं जानती हूँ उसे,इसलिए ही बता रही हूँ।"

"उसकी माँ रिश्ता पक्का कर के गईं हैं।तुम्हारा एम पी टी में सिलेक्शन हुआ और शादी।"

"लेकिन..?"

"लेकिन वेकिन कुछ नहीं।बस कह दिया न,लो इसमे से एक साड़ी लो अपने पसन्द की।"

"जब शादी के लिए लड़का पसन्द करने की आजादी नहीं तो साड़ी भी अपनी पसन्द की ही दे दीजिए।मुझे नहीं पसन्द करनी।"

"निशु ये क्या है बेटा?सॉरी कहो बुआ जी को।"

"नमस्ते बुआ जी।"

मैं बाहर निकल आई और जाकर कार में बैठ गई।विनय आया और पास आकर बोला।

"जिज्जी जिनकी आवाज अच्छी है न उनसे ही शादी करना।ये पंकज भी ठीक था पर अजीब भी था बहुत।"

"मतलब?"

"जिज्जी रात को जब छत पर गये थे तो उन्हा बैठ की किसी की फोटू देख कर मोबाइल पर बात कर रहा था ओ रो भी रहा था।"

"रो रहा था?"

"हाँ जिज्जी।"

"अच्छा।बुआ जी को भी बता देना विनय।"

"माँ मानेंगी नहीं जिज्जी।"

"वो बाद में देखेंगे।बता जरूर देना।ठीक है?"

"ठीक है जिज्जी,बता देंगे।जाइये अब बाय।याद करेंगे आपको औऱ अपना के उन से तो बात करते रहेंगे।"

चेहरे पर मुस्कान आ गई।माँ एक दिन के लिए रुक गईं।बहुत मनाने पर भी जब मैं नहीं रुकी तो हमारी कार चल पड़ी।रात भर न सोने के कारण मैं गाड़ी चलते ही सो गई।
 
फोन की घण्टी बजी।

"हेलो अभ्युदय जी।"

"तुम शादी कर रही हो निशी?"

"न नहीं अभ्युदय जी।"

"अब झूठ भी बोलोगी?"

"अभ्युदय जी पहले सुन तो लीजिये।"

"क्या?शादी की डेट?"

"अरे! नहीं ssss।सुनिए तो?"

"क्या सुनूं?लड़के का नाम?जानता हूँ वो।"

"अभ्युदय जी आप समझ नहीं रहे हैं।सुन तो लीजिये प्लीज।"

"निशी तुम बहुत मतलबी लड़की हो।जानता नहीं था कि तुम ऐसी निकलोगी।सब ढोंग था अच्छे पन का।पंकज को भी आगाह करना होगा।बर्बाद हो जाएगा तुम्हारे साथ।"

"आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?बिना सुने,बिन कुछ जाने इतनी बातें सुना रहे हैं।"

"और क्या उम्मीद करती हो फिर?इंतजार करूँ?तुम्हारी झूठी बकवास सुनूँ?सब जानता हूँ,पंकज से ही शादी करना चाहती थीं न तुम?ये मेरे साथ सब खिलवाड़ चल रहा था न?"

"अभ्युदय जी बस।बहुत हो गया।"

"क्यों?क्या हुआ, निशी?

क्याssssss हुआssssss निशीsssss?"

मेरी आँख खुल गई और सामने देखा तो पापा जी मुझे जगा कर पूछ रहे थे, क्या हुआ निशी।

बच गई निशी, लेकिन अब डर भी है अंदर कि कैसे बिहेव करेंगे अभ्युदय जी।

फोन की घंटी बजी।अभ्युदय जी का ही फोन था।हम शायद नेटवर्क वाले एरिए में थे अब।पर बैटरी बिल्कुल खत्म थी।9 परसेंट बैटरी पर फोन उठाना क्या ठीक होगा?ये सोच कर फोन बंद होने का ही इंतजार करती रही और फोन के साथ काल भी बंद हो गया।
 
घर पहुँच कर सबके लिए खाने की तैयारी करना था।बस उसमे ही समय निकल गया।फोन चार्जिंग पर था,पापा जी और भैय्यू नहाने में व्यस्त थे।दाल-चावल और भिंडी की सब्जी का डेडली कॉम्बिनेशन बना कर मैं खुश थी। फोन बजा।

"हेलो अभ्युदय जी।कैसे हैं?एक्सरसाइज की?रिया आ रही है न मशीन लगाने?"

मैं शायद डर या हड़बड़ाहट में उन्हें कुछ पूछने का मौका नही देना चाहती थी।

"पुच्चू।मैं ठीक हूँ।"

पुच्चू, अभ्युदय जी ने पुच्चू कहा मतलब वो नाराज नहीं हैं।मुझे बताना होगा लेकिन।

"अभ्युदय जी।आपसे बहुत जरूरी बात करनी है।"

"बोलो।मैं सुन रहा हूँ।"

भैय्यू बाथरूम से आकर चिल्लाया "दी खाना।"

"अभ्युदय जी बस 1 घंटे बाद।मैं फोन करती हूं आपको।"

"मैं इंतजार कर रहा हूँ।बाय"

"बाय।"

मैं खाना खिलवा कर और खुद भी खाकर बैठी ही थी कि काकी माँ आ गईं।काकी माँ ने नारियल के लड्डू बनाये थे मेरे लिए।कच्चे नारियल के लड्डू में उनके हाथों का प्यार इतना ज्यादा होता है कि वो लड्डू बहुत मीठे होते हैं।

काकी माँ बंगाली हैं और काका बाबू नही हैं।बेटे और बहू ने उन्हें घर से निकाल दिया था बस तबसे यंही रहती हैं।इस बिल्डिंग की जिम्मेदारी और 500 रुपये का किराया।हर रोज मंगल नगर के काली बाड़ी मंदिर में काली मां का पूजन करने जाती हैं।

सभी बच्चों के लिए प्यार भरा है उनके मन में।जब भी जो भी कह दो बन कर रेडी होता है।कभी भी घर जाकर बस एक बार कहने की देर होती हैं और नाश्ते की प्लेट सज जाती है।

काकी माँ से बात करते पता भी नहीं चला कि कितनी देर हो गई।वो तो उनका फोन आया तब वो उठ कर गईं और मैंने अपना फोन उठाया।

एक मैसेज था जिसमें लिखा था

"एक घंटा हो चुका पुच्चू, मैं अब भी इंतजार कर रहा हूँ।"

मैंने अभ्युदय जी को फोन मिलाया।उन्होंने फोन नहीं उठाया।सो गए होंगे सोचकर मैंने भी फोन दुबारा नहीं लगाया।

आंखे बंद की ही थीं कि फोन बज उठा।

"जी अभ्युदय जी।"

"कहो निशी मैं सुन रहा हूँ।"

"तो सुनिए दो रिश्ते आये हैं मेरे लिए। एक को तो मैं पसन्द नही पर दूसरे वाले को प्यार है मुझसे।घर वालों को भी पसंद है वो बहुत।तो सोच रही हूँ इस ठंड में शादी कर ली जाए।"

"अच्छा विचार है।खाने में सफेद रसगुल्ला जरूर बनवाना मुझे पसन्द है।"

"आपको मिठाई में भी सफेद रसगुल्ले पसन्द हैं?पसन्द हो तो ऐसी मिठाई भी सफेद ही पसन्द है।"

"मजाक उड़ा रही हो?"

"आपको ऐसा लगा?सॉरी।"

"नहीं कोई बात नहीं।मैं जो बोलता हूँ सीधा बोलता हूँ।माँ को भी बोला है मैंने की मेरे मरने पर सफेद रसगुल्ले का दान करना,आत्मा तृप्त रहेगी मेरी।"

"ये कैसी बातें कर रहे हैं अभ्युदय जी।आइंदा कभी भी ऐसी बात की तो मैं बात ही नही करूँगी।"

"सॉरी।"

"सुनिए।"

"हम्म कहो।सुन ही रहा हूँ।"

"वो दूसरा रिश्ता किसी और का नहीं पंकज का आया है।"

"जानता हूँ निशी।वो ही है जो पागल है तुम्हारे लिए।तुम दोनों की जोड़ी भी अच्छी लगेगी।"

"क्या? क्या फालतू की बात कह रहे हैं आप?"

"मैं तुमसे बहुत बड़ा हूँ।तुम और पंकज हम उम्र हो।गलत क्या कहा है मैंने?"

"अभ्युदय जी बाद में बात करूँगी।बाय।"

मैंने गुस्से में फोन कट कर दिया।मैं ये नही सुन ना चाहती थी।मैं चाहती थी वो गुस्सा करें।थोड़ा नाराज़गी दिखाएं।पर वो तो ऐसे कह रहे हैं जैसे उन्हें कोई फर्क ही नही पड़ता।मुझे बात ही नहीं करनी किसीसे।मैं सो गई।सोते हुए कब शाम के 6 बज गए पता भी नही चला।

पापा जी ने चाय बना कर आवाज दी तब नींद खुली।

"निशुssss आजाओ।चाय बन गई।"

"जी आई।"

मैंने उठकर पहले फोन देखा कि शायद अभ्युदय जी ने फोन किया हो।पर नहीं कोई मिस्ड काल नही बस एक मैसेज।

"तुम जानती हो मुझे,

पर समझना नही चाहती हो।

चाहती तो हो मुझको बहुत,

पर मेरी कमज़ोरी से आँखे चुराती हो।

मानोगी एक दिन कि मैं ही हूँ सही,

पर तुम तो हो नादान गलतियां कर के ही पछताती हो।

पर मैं भी तो हूँ तुमसे जुड़ा

खुद से खफ़ा पर,तुम से बड़ा

तुम करोगी गर गलती कोई,

सामने रहूंगा मैं भी अड़ा।"

"वाह,अब कविता,शायरी सूझ रही है इन्हें।हुह।"

मैं फोन लेकर बाहर आ गई।चाय और बिस्कुट खाते वक्त पापा जी ने बात छेड़ी।

"पंकज को कितने समय से जानती हो निशु?"

"अभ्युदय जी के मिलने के बाद मिली थी पापा जी।"

"कैसा लड़का है?"

"अभ्युदय जी कहते हैं अच्छा लड़का है,पर मेरी मानिए तो बहुत बड़ा नौटंकी है।"

"ऐसे नहीं कहते बेटा।"

"सॉरी।"

"तुम्हें पसन्द है पंकज?"

"मुझे अभ्युदय, जी पसन्द हैं पापा जी।मैं अभ्युदय जी से शादी करना चाहती हूँ।वो भी ठाकुर ही हैं।घर और फैमिली से आप मिल ही चुके हैं।"

"लेकिन बेटा व्व बड़े हैं तुमसे।"

"आप भी तो माँ से 7 साल बड़े हैं ना?"

"बेटा तब की बात और थी पर अब.."

"पापा जी।मुझे जानते हैं न आप?मैं नही जानती कैसे,कब क्या हुआ पर मैं अभ्युदय जी से ही शादी करना चाहती हूँ।"

"मैं मिलना चाहता हूँ अभ्युदय से।"

"कब पापा जी?"

"तुम्हें जबलपुर छोड़ने मैं चलूंगा तब।"

"ओके।लव यू।"

पापा जी ने चाय के घूंट को एक बार मे खत्म करके कप रखा और सैर करने के लिए निकल गए।

मैं खुश थी अब।माँ के न होने का फायदा उठाना इसे ही कहते हैं।माँ के सामने तो कुछ निकलता ही नही मुँह से।

मैंने रिमोट उठाकर टीवी देखना शुरू कर दिया।
 
शाम के खाने की तैयारी कर छत पर आ गई।देखा तो रिज़वान भी टहल रहा था।उसने हाथ दिखा कर हेलो किया,मैंने भी वैसे ही उसे हेलो कर दिया।रिज़वान नीचे चला गया।मैं कुछ देर तो तारों को निहारती रही फिर फोन अभ्युदय जी को मिलाया।

अजीब बात थी आज उनका फोन बंद था।शायद बैटरी नहीं होगी सोचकर मैंने रिया को फोन मिलाया।लेकिन रवीश के जाने के बाद मैडम का फोन पूरे टाइम बिजी ही रहता है।पंकज से बात करने का मेरा मन ही नही था।फोन वापिस रखा ही था कि फोन बजा।

मैंने अपनी आंखें बंद की और सोचा अभ्युदय जी, और अगर उनका नही तो रिया, और रिया का भी नहीं तो माँ।आंखे खोली तो देखा पंकज।

"ये क्यों फोन कर रहा है?मुझे बात नहीं करनी।"

फोन बज-बज कर कट गया।लेकिन थोड़ी ही देर में फिर बजा मैंने बिना सोचे किसका होगा फोन काट दिया।

लेकिन अब फोन रिया ने किया था।हे भगवान लड़की ने खुद फोन किया और मैंने काट दिया अब तो बस गालियां ही सुनने मिलेंगी।सोचते हुए फोन मिलाया पर रिया का फोन फिर बिजी हो चुका था।

"क्या बातें करते हैं ये दोनों दिन रात?हुह आज मुहूर्त ही नही किसी से बात करने का।" बड़बड़ाती मैं नीचे चली आई।अभ्युदय जी को खुशखबरी देने का मूड ही खत्म हो गया था।रात को खाना खाकर जब रूम पर आई तो फोन लगाया पर अब भी फोन बंद था।घबराहट होना लाज़मी था पर आंटी का नम्बर है मेरे पास।

रिंग जाती रही पर फोन नही उठा।अब ज्यादा घबराहट होने लगी थी।मैं पीछे के दरवाजे से छत पर निकल गई और लगातार 5 से 6 बार काल मिलाया।लेकिन जब नही उठा फोन तो सिंह सर को फोन लगाने का सोच ही लिया।

आंखे बंद करके बस उनके नम्बर पर कॉल का बटन दबाना बहुत मुश्किल काम है।लेकिन मैंने एक गहरी सांस ली और फोन मिला ही दिया।

"हेलो।"

ये फोन उठना जरूरी था क्या?सोचकर मैंने भी सर को हेलो कहा।

"गुड इवनिंग सर,निशी दिस साइड।"

"हाऊ कम यू आर कालिंग सो लैट निशी?एवरीथिंग आल राइट?"

"यस सर।नीड टू टॉक टू अभ्युदय जी।हिज नम्बर इस ऑफ।"

"ओह ओके।एम इन मुम्बई निशी।यू कैन काल टू हिज मदर्स नम्बर।"

"शी इस आल्सो नॉट पिककिंग काल।"

"लेट मी चेक एंड आई एम कनेक्टिंग यू।"

"थैंक्यू सर।"

मैंने फोन रखकर गहरी सांस ली।सिंह सर से बात करना जैसे किसी खतरनाक शेर के सामने जाना।

मुझे डर लग रहा था।

"कंही कुछ? नहीं, नहीं, नहीं निशी। कुछ भी नहीं सोचना।"

फोन बजा।

"यस सर।"

"दे आर इन अ पार्टी निशी।शी विल काल यू सून।"

"सर डीड शी पिकड योर काल?"

"नो।शी डीड नॉट।आई कॉल्ड ड्राइवर।"

"ओह ओके।"

मैं फोन लेकर नीचे आ गई और सो गई।करीब एक बजे फोन के बजने पर नींद खुली।

"हेलो।"

"सो गई थी पुच्चू?"

"आप,कंहा गायब थे?किसकी पार्टी?"

"बस यूँही एक शादी में जाना पड़ा।तुम तो बड़ी खतरनाक होती जा रही हो।"

"मतलब?"

"पापा को फोन लगा लिया तुमने?"

"जी हाँ।परेशान हो रही थी।शाम से फोन कर रही हूँ, पर नहीं।एक मैसेज भी नही भेजा जाता न आपसे?"

"सॉरी पुच्चू।आज फोन में बैटरी ही नही थी।"

"आपको कुछ बताना था।"

"बताओ।"

"आपसे पापा जी मिलना चाहते हैं।"

"क्यों?"

"मैंने बता दिया है कि मुझे आपसे शादी करनी है।"

"क्या?"

"हाँ।मैंने कहा दिया कि मुझे अभ्युदय जी से शादी करनी है और बस पापा जी मान गए।"

"क्या कहा उन्होंने?"

"यही की जबलपुर छोडने आएंगे मुझे तब आपसे मिलना चाहते हैं।"

"ठीक है।"

"बस ठीक है?"

"अभी रखता हूँ सो जाओ।"

"क्या हुआ अभ्यु?"

"कल बताता हूँ।सो जाओ पुच्चू।गुड नाईट।"

"आप नाराज़ हो?"

"नहीं बाबा।बस कुछ सोच में हूँ, तुम सो कल बात करते हैं।बुआ जी के घर से माँ कब आ रही हैं?"

"कल आ जाएंगी लेकिन शाम तक।"

"ठीक है।गुड़ नाईट।"

"गुड नाईट।"

मैं सो गई और सोते ही सपनों में भी खो गई।

सुबह 7 बजे माँ ने उठाया।

"निशु,उठ जाओ।"

"माँ, आप कब आईं?"

"बस अभी।सोचा दो दिन अपनी परी के पास भी तो रह लूं।"

"थैंक्यू माँ।थोड़ी देर और सो लूं?बस आधे घंटे।"

"हम्म एक घण्टे सो लो।लेकिन फिर दिन भर बातें।"

"पकक्का माँ।आपको कुछ बताना भी है।"

"सो जाओ।"

माँ चली गईं और मैं फिर सो गई।

एक से कब 2 घंटे हुए नही जानती पर अच्छी बात ये थी कि माँ नाराज नही थीं।

फोन पर 2 मिस्ड कॉल और एक मैसेज था।

"पापा जी का नम्बर भेजो।"

"ये अभ्युदय जी को पापा जी का नम्बर क्यों चाहिए?" समझ से परे था पर नम्बर भेज दिया।शायद अभ्युदय जी टेंशन में आ रहे हैं पापा जी की कही बातों से।

"माँ अपने उठाया नही न?"

"उठ गई हो न अपने आप।जाओ ब्रश करो चाय बनाती हूँ।"

"जी।"

माँ के हाथ की चाय और पोहे से बेहतर कुछ भी नही इस दुनिया मे।

"माँ, पापा जी कंहा हैं?"

"बाजार गए हैं।"

"इस टाइम?क्यों?आज ऑफिस नही जाना है?"

"नही आज कोई मेहमान आ रहे हैं जरूरी।खाना भी बनाने को कहा है।"

"आपको भी नही पता कि कौन आ रहा?"

"जानती हो ना अपने पापा को?नहीं बताया बस कह दिया सब निशु की पसन्द का बना लो।"

"मेरी पसन्द का?ऐसा कौन है जिसे मेरी पसन्द का सब पसन्द है?"

"अब ये तो तुम और तुम्हारे पापा जी ही जाने।लो नाश्ता करो और चाय पीकर मेरी मदद करो किचिन में।"

"जी माँ।"

मेरा दिल जो बात कह रहा था उसे मानने को मेरा दिमाग राजी नही था।

"अभ्युदय जी? न न न न हो ही नही सकता।लेकिन नम्बर भी तो लिया है उन्होंने?हम्म कुछ तो है,जानना होगा।"

मैंने फोन मिलाया अभ्युदय जी को।पर उनका नम्बर फिर बन्द था।अब मैं जानती थी कि जो मेरा दिल कह रहा है वही सही है।लेकिन पूरी तरह पता कर लेने में बुराई ही क्या है।

मैंने आंटी के नम्बर पर कॉल किया।

"हेलो।"

"हेलो पुच्चू।जानता था मेरा नम्बर बन्द होगा तो माँ के नम्बर पर काल करोगी तो फोन ही ले आया माँ का।"

"कंहा हो आप?"

"बाल बहुत बढ़ गए हैं तो हेयर कट करवा लिया जाए सोचकर निकला हूँ घर से।"

"ओह।ओके।मुझे लगा कि कटनी।"

"कटनी?आना है तुम्हें लेने?"

"नहीं-नहीं।बस वो ऐसे ही।आप करवाइए कट अपने हेयर्स मैं माँ की मदद कर दूं।कुछ मेहमान आने हैं आज।"

"ठीक है।बात करना फ्री होकर।"

"जी।"

"अगर अभ्युदय जी आ रहे होते तो फिर फोन करने क्यों कहते?

उफ़्फ़ क्या दिमाग का दही हो रहा है।चुपचाप काम करवाती हूँ।आ जाये जिसे आना हो।हुह"

मैं माँ के पास आ गई।
 
पापा जी आज जरूरत से ज्यादा नाश्ता और खर्चा करके आये थे।माँ पा की बहस होना तो लाजमी था।वही चल रही थी।

"जरूरत क्या थी इतने खर्चे की?कौन आ रहा है?बताते भी नही हैं।कौन खाता है ड्राई फ्रूट्स व्व भी इतने मेंहगे?काजू बादाम किशमिश तो समंझ आता है मुझे पर ये देखो निशु, सूखे आम,पपीते और इसे क्या कहते हैं?"

"कीवी।"

"क्या?"

"ये हरे फल को माँ, कीवी कहते हैं।"

"हाँ वही कीवी।कौन खाता ये सब?आपको ना दिखावे की आदत हो गई है।दीदी के घर है पैसा तो उन्हें दिखाने दीजिये।पर पैर उतने ही पसारिये जितनी चादर है।"

"निशु, माँ को कहो अब बस भी करें।"

"मैं क्या कहूँ पापा जी?बात तो सही है माँ की।"

"अच्छा अब तुम भी माँ के साथ मिल जाओ।"

"आ कौन रहा है पापा जी?बताइये तो?"

"पंकज के घर से आ रहे हैं उसके पेरेंट्स औऱ पंकज भी।"

"क्या?लेकिन क्यों?मैंने कल ही आपसे कहा कि"

"निशु।शांत हो जाओ।उनका फोन आया मिलने के लिए।मैं ऐसे नही मना कर सकता।कोई कारण भी तो हो न मिलने का?"

"कल जो मैंने आपसे कहा व्व क्या कुछ मायने नही रखता पापा जी?"

पापा जी का फोन बजा।बिना मेरी तरफ देखे हुए पापा जी फोन उठा कर चले गए।जब लौटे तो माँ को आवाज दी।

"सुनती हो?तीन लोगों का खाना एक्स्ट्रा बनाना।"

"जी।बन जायेगा।"

माँ भी न,क्यों नहीं पूछा कि क्यों तीन लोग और क्यों?बारात ला रहे हैं क्या?मेरे मन मे चल रही बातों का कोई अंत नही था।सोचा माँ को कुछ तो पता ही होगा।

"माँ इतने लोग क्यों आ रहे हैं?"

"नहीं जानती निशु,अभी बात करना बंद कर काम में हाथ बटाओ।"

"माँ आप पूछिये न पापा जी से।"

"तुम चाहती हो अभी लड़ाई हो जाये?"

"मतलब?"

"मतलब अभी लड़ाई करूँ पापा जी से?"

"नहीं।लेकिन।"

"तो बस चुपचाप काम करवा लो।मेरा दिमाग अभी वैसे ही खराब है उनके बिना मतलब के खर्चों को देखकर।"

"ओके माँ।"

मैं चुपचाप अब काम करवा रही थी और दिमाग में चल रही चीज़ों को भी विराम देने की कोशिश कर रही थी।

पंकज ने अब तक न क्यों नही किया?क्या आज शादी फिक्स करने आ रहे हैं?कंही आज ही सगाई या ओली जैसा कोई कार्यक्रम तो नही कर देंगे?

"नहीं बस कर निशी, कुछ नही होगा ऐसा।"

मेरे जोर से ऐसा बोलने पर माँ पास आईं।

"सबकी शादी होती है निशु।तुम्हे नही करनी?"

"करनी है माँ पर.."

"पर क्या?"

"पर पंकज से नहीं।"

"फिर?अभ्युदय से?"

मैं माँ की तरफ देखना चाहती थी पर जिस गुस्से से माँ ने अभ्युदय जी का नाम लिया था मैं अपने सिर को हिला भी न पाई।

"माँ।"

"बोल न निशु?अभ्युदय से शादी करनी है?तुम जानती हो बेटियां माँ पा को कितनी प्यारी होती है,फिर भी इस समाज के नियमों के चलते हरकोई अपनी बेटी किसी अनजान को सौंप देता है।निशु ये समाज के आगे सब झुकते हैं।अगर न झुकना पड़े तो शायद फिर भी मैं मान ने की कोशिश करूँ पर बेटा जिसके साथ जीवन बिताना है,उसकी इस हालत को जानते हम ये फैसला नही ले सकते।"

"पर माँ।"

"निशु,माँ हूँ न।जानती हूँ क्या चल रहा है तुम्हारे मन मे।पर हम भी तुम्हारे माँ पा हैं कभी गलत नहीं सोचेंगे या करेंगे।"

"पर माँ।"

"जो पापा जी कहेंगे वही होगा बेटा।ये प्यार-व्यार का चक्कर छोड़ दो।"

मैं उठकर आ गई बाहर।पापा जी को काम करते देख रही थी।आज घर को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे थे वो।

लगभग 12 बजे तक सब तैयार था।नहा कर हम सब भी तैयार ही थे।12.10 पर पंकज और उसके माँ पापा आ चुके थे।पंकज के पापा शक्ल से ही खड़ूस ठाकुर दिखते हैं।

खतरनाक रौबीली मूछें,होठं पान से रचे हुए।गले मे मोटी सोने की चैन।सीधे हाथ पर भी एक सोने का कड़ा सा पहने थे।कपड़े तो सफेद कुर्ता पजामा था, पर इतना सफेद जैसे अभी लेकर बस पहन कर आये हों नया।

पंकज की माँ बेहद खूबसूरत और बिल्कुल सफेद दूध सी हैं।गुलाबी साड़ी में उनका रंग और भी ज्यादा खूबसूरत दिख रहा है।मैं न चाहते हुए भी उनके पैर छूने झुक गई।

जब माँ के पैर छुए तो पापा के भी तो छूने होंगे।तो उनके पैर भी छू लिए।बैठकर चाय नाश्ते के दौर शुरू हो गया।

पंकज की तरफ मैंने देखा ही नही।पता नही किस मिट्टी का बना है,बात समझता ही नही है।कितनी बार बता दिया,कितनी बार समझा दिया पर नहीं।

टेबल पर कांच की प्लेट्स बढ़ती गईं।नाश्ते को सजा देख पंकज के पापा बोले।

"चौहान साहब इतने सब की क्या जरूरत थी।हमने तो कहा था कि बच्चों को आपस में बात करने के लिए ला रहे हैं और आपका घर देखने भी।"

"जी लेकिन अब जो नियम हैं वो तो ऐसे ही चलते रहेंगे।लीजिये न आपने तो कुछ लिया ही नहीं।"

ऐसे कौन बात करता है आपस मे?और इस पंकज को बात करवाने के लिए मतलब?क्या हो रहा है समंझ नही आ रहा।

"निशी बेटा हमारे पास आकर बैठिए।"

पंकज की माँ ने मुझे अपने पास बुलाया।

"जी।"

"आपकीं पढ़ाई पूरी हो गई?"

"जी इंटर्न खत्म हो ही जानी है इस मन्थ।फिर मास्टर्स के लिए एग्जाम देने हैं।"

"कंहा के कॉलेज का सोचा है आपने?"

"अभी दिल्ली,पुणे, बंगलोर,जयपुर और मुम्बई के फॉर्म भरे हैं।बाकी लोकल तो बिना एग्जाम के ही एडमिशन हो जाता है।"

"अच्छा।पढ़ाई कर रही हो न आप?"

"जी बस अब जाते ही वापिस पढ़ाई पर लगना है।"

घण्टी बजी।पापा जी दरवाजा खोलने गए।

"आइये।आइये।"

अंदर आने वाले और कोई नहीं अभ्युदय जी, सिंह सर और ऑन्टी थीं।

मैं बस अपनी आंखें खोल कर देखती रह गई कि चल क्या रहा है पापा जी के दिमाग मे?
 
उनके आकर बैठने पर माँ भी थोड़ी आश्चर्यचकित थीं।मैं खुद भी कुछ समंझ नही पा रही थी कि ये क्या झोल है।एक ही दिन पंकज और अभ्युदय जी को घर बुलाना वो भी उनके पेरेंट्स के साथ।बहुत अजीब है,बहुत-बहुत अजीब है। कल पापा जी को बताने के बाद अगर ये फैसला है तो समझ से परे है।उफ़्फ़ प्रभु क्या चाहते हो आप?

पंकज और अभ्युदय जी एक दूसरे को देख कर अचंभित थे या नही समझना मुश्किल था।

लेकिन पंकज का अभ्युदय जी से उठकर मिलना मुझे अच्छा लगा।

मैं नही जानती थी आगे क्या होना है क्या नही, बस चाहती थी कि मेरी मर्जी का ही हो सब।

पापा जी ने पंकज के पापा को सिंह सर से मिलवाया और दोनों ऑन्टीयों को भी।

माँ चाय को बढ़ाने किचिन में जा चुकी थीं।

मैंने सर को और आंटी को भी पैर छूकर ही नमस्ते किया। अभ्युदय जी को देखकर बस इतना ही कह पाई।

"बता नही सकते थे आप?"

"बताता तो तुम्हें ऐसे कैसे देख पाता?"

इतनी भीड़ में इतनी बातें ही हो सकती थीं।

चाय नाश्ते पर किसी तरह की शादी की कोई बात नहीं हुई।मैं मन ही मन बस भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि शादी की बातें अभी न ही छिड़े तो बेहतर।लेकिन मैं जो चाहूं वो आसानी से मिल जाए ऐसा होता नही है।

बस हो गया शुरू शादी का बिगुल।

"तो चौहान साहब,हम चाहते हैं बच्चे आपस में बातें कर लें।"

"जी इसलिए ही तो बच्चों को मिलवाया जा रहा है। पर आपको बता दूं पहले की यंहा दो बच्चे हैं और दोनों ही मेरी बेटी को पसन्द करते हैं।मैं नही चाहता कि मेरी बेटी कल को कहे कि मेरी मर्जी नही पूछी गई।"

पंकज के पापा को शायद ये बात पसन्द नही आई।

"ये क्या बात हुई चौहान साहब?एक ही दिन दो लड़कों को साथ ही मिलवाना कंहा की समझदारी है?"

"आप नाराज ना हो ठाकुर साब।चौहान जी ने अच्छा ही किया है।शादी वैसे भी परिवारों का भी मेल है।ऐसे में दो लोगों के साथ फैमिली भी मिले तो अच्छा ही है न?"

सिंह सर की बात मुझे अच्छी लगी।लेकिन दो लड़कों की फैमिली का एक साथ मिलना?

"देखिये मैं आप सभी को बता कर सब करना चाहता हूँ।नहीं जानता कि सही कर रहा हूँ या गलत पर आप खुद ही समझ जाएंगे।"

"क्या समझाना चाहते हैं आप चौहान साहब?समझाइए जरा।हमने आज तक बहुत रिश्ते करवाये हैं किये हैं पर ऐसा न कभी सुना न देखा।शायद हमें ही कुछ नया सीखने मिल जाये।"

"मैं आप सभी को बता दूँ कि ये तीनों एक दूसरे को जानते हैं।अभ्युदय, निशी और पंकज।"

अब चौकने वाली बात पंकज के पापा के लिए थी।क्योंकि आंटी तो जानती थी ये बात पर अंकल के लिए ये चौकने वाली बात होनी ही थी।

"कैसे जानते हैं?जानते हो पंकज इनको?लड़की को भी जानते हो?"

पंकज तो सूख कर सफेद पड़ चुका था।उसके मुँह में ही शब्द अटक गए थे।मैंने पानी उठा कर उसे दिया ताकि वो पानी पीकर कुछ कहने की स्तिथि में आए।

"जी पापा वो जबलपुर में.."

"मतलब जानते हो?तुम भी जानती थीं ये बात?"

अंकल ने आंटी की तरफ देखते हुए पूछा।

"निशी से उस दिन ही मिले थे,शादी में लेकिन पंकज ने हमें नही बताया वरना हम आपको क्यों नहीं बताते।"

"आप बताइए चौहान साहब।आप क्या कह रहे थे?"

"देखिये आप अब जान गए हैं कि ये तीनों एक दूसरे को जानते हैं।लेकिन मैं कुछ और भी जानता हूँ।"

हे प्रभु आज मेरे पापा को हो क्या गया है?ऐसा कौन करता है?बचा लो प्लीज प्रभु।मैं सपना देख रही हूँ शायद।ऐसा तो सपना ही होता है।

हो ना हो ये सपना ही है।प्रभु प्लीजप्लीजप्लीज
 
लेकिन ये सपना नहीं है।हकीकत में चल रही इस ट्रेजेडी में खुद को बहुत फसा सा फील कर रही थी।

पापा जी के कुछ भी बोलने के पहले भाग जाना चाहती थी।उस कमरे से खुली जगह पर जंहा सुकून की सांस ले सकूं।

अब पंकज की स्तिथि और भी बेहतरी से समंझ पा रही थी लेकिन कुछ कह नही पा रही थी।

पापा जी फिर बोले।

"मुझे लगता है हम सभी को इन तीनों को बातें करने देना चाहिए।आप सभी क्या कहते हैं?"

ये पहली बार था कि अभ्युदय जी की माँ ने पहली बार कुछ कहा।

"जी भाई साहब।इन्हें भेज दीजिए, ताकि हम सभी आगे की बातें आप से जान सकें।"

"ठीक है आप तीनों जाओ अंदर।भैय्यू लेकर जाओ सबको।"

माँ ने हम तीनों को, मेरे कमरे में भेज दिया।

कमरे में पहुँचते ही मैंने और पंकज ने एक गहरी सांस ली।

"उफ़्फ़।"

"उफ़्फ़.. तेरा उफ़्फ़ करके हो गया?क्या रायता फैलाया तूने?"

"मैंने?हद है।मैं खुद इस में फंसा सा फील कर रही हूँ।तुझे लग रहा मैंने फैलाया ये सब?"

"चुप हो जाओ तुम दोनों।तुम क्यों आपस में लड़ रहे हो?"

अभ्युदय जी बीच में न बोलते तो शायद हम आपस मे बाल पकड़ कर लड़ मर रहे होते।

"अभ्युदय जी देखिये आप इसे।कैसे बोल रहा है।"

"ये सब निशी के पापा चाहते थे तो उन्होंने प्लान किया।अब बस शांत हो जाओ।"

"मेरे पापा?क्या चाहते थे?बताइये?बोलिये न।"

पंकज अब शांत था,वो चुपचाप सुनना चाहता था कि ये माजरा क्या है?

"निशी, तुमने कुछ बोला है अपने पापा को?रिगर्डिंग शादी?"

"जी।बोला है।"

"तो तुम्हें इतना आश्चर्य क्यों हो रहा है?"

"क्योंकि उन्होंने कहा था कि वो मिलेंगे आपसे जब जबलपुर आएंगे।"

"लेकिन तभी पंकज के पापा ने मिलने की और शादी की बात की।ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिये?"

"जो कर रहे हैं वो तो नही करना चाहिए न अभ्युदय जी।"

पंकज भी आखिर बोल ही पड़ा।कब तक शांत रहता बेचारा।

"देखो मुझे जब मालूम चला कि निशी ने कहा है कि उसे मुझसे शादी करनी है और उसके पापा मुझसे मिलना चाहते हैं तो मैंने उन्हें फोन लगाया।उन्होंने कहा कि जो भी बात होनी है आज ही हो जाये तो बढ़िया है।इसलिए उन्होंने तुरंत निकलने को कहा।मुझे बताया उन्होंने की आज पंकज की फैमिली भी आ रही है।इसलिए वो सब कुछ आज ही तय कर लेना चाहते हैं।"

"ओह तब तो ठीक है।ज्यादा ड्रामा भी नही है और दो घरों से रिश्ते हों तो बात कलियर ही होनो चाहिए।पापा जी ने एकदम सही किया।"

"मेरे पापा बहुत नाराज़ हो जाएंगे पर।आप दोनों नही जानते उनका गुस्सा।अभी तो मेरी क्लास घर जाकर भी लगनी है कि मैंने ये बात क्यों छिपाई की मैं निशी को जानता हूँ।"

"पंकज तू डर मत।सब सही होगा।"

"तुम दोनों का ड्रामा हो गया?अब बात मुद्दे की करें?"

"मुद्दे की बात?मतलब?ठीक से बताइये अभ्युदय जी।"

"मुद्दे की बात शादी।"

"वो तो सबको पता है कि निशी आपसे प्यार करती है,आपसे शादी करना चाहती है।इसमें क्या मुद्दा है?"

पंकज की इस मासूमियत पर हंसी भी आ रही थी और दुख भी हुआ।

"निशी तुम मुझसे शादी करना चाहती हो?"

"जी।"

"क्या पूछ सकता हूं क्यों?"

"ये कैसा सवाल है अभ्युदय जी?"

"सवाल तो एकदम सटीक है,तुम जवाब दो।क्यों?"

"आपसे प्यार करती हूँ, आपसे ही शादी करूँगी।"

"अगर पंकज से तुम्हारी अरेंज मैरिज होती तब?"

"तब का मुझे नही पता।जो पता है वो यही है कि मुझे आपसे शादी करनी है।"

"तुम अपनी बात से पलटोगी तो नही न निशी?"

"आपको लगता है?"

"पंकज तुम्हें कुछ कहना है?"

"अभ्युदय जी।मैं निशी को कह चुका हूँ की सारी उम्र उसका इंतजार करूँगा।जानता हूँ मेरी किस्मत आप जितनी अच्छी नहीं।पर फिर भी इंतजार करूँगा अपनी आखिरी सांस तक।"

"प्यार करते हो निशी को?"

"नहीं अभ्युदय जी।प्यार का नही जानता बस निशी .. छोड़िए न।अब सब तय है न?चलिए फिर बाहर चलें?"

मैंने पंकज को कभी इतना उदास नही देखा था।उसके सपने का इस तरह बिखरना उसे भी अंदर से तोड़ रहा था।जंहा मैं और अभ्युदय जी अपनी आगे आने वाली जिंदगी में एक दूसरे को देख पा रहे थे वंहा पंकज के लिए सिर्फ अंधेरा था शायद इसलिए।

हम तीनों उठकर बाहर आ गए।

बाहर का माहौल अंदर के माहौल से भी ज्यादा गर्म था।

राजनीति की बात छिड़ गई थी शायद।इन पापा लोगों को कितना मजा आता है न कमल और पंजे पर लड़ना।हम तीनों को बाहर देख अब राजीनीतिक बातों पर लगाम लगी।

माँ ने चाय के बाद अब ठंडा सर्व कर दिया था।सबने कोल्ड ड्रिंक हाथ मे लेकर हम तीनों की तरफ देखा। पापा जी ने कहा,

"क्या बात हुई आप तीनों की?"

पंकज कुछ बोलने को हुआ पर फिर अपने पापा को देख कर शांत हो गया।

"आप तीनो में से कोई भी कुछ बोले उसके पहले मैं भी पंकज और अभ्युदय से बात करना चाहता हूँ।"

"जाइये चौहान साहब।तब तक हम सभी निशी बिटिया की परीक्षा ले लेंगे।"

आज तो वाइवा से ज्यादा खतरनाक प्रेक्टिकल चल रहा था।कैसा खेल है समंझ नही आ रहा था।

पापा जी, अभ्युदय जी और पंकज अंदर चले गए।यंहा मेरी हर बात पर खिचाई चल रही थी।

हाथ पांव खिंचने के अलावा और क्या कर लेती हो?खाना बना लेती हो या नहीं?बहुत सारे उलपटाँग प्रश्नों से मन थोड़ा हल्का हो चला था पर दिल मे अभी भी उलझन थी कि अंदर क्या चल रहा है?

"अभ्युदय मैं जानता हूँ निशी तुमसे शादी करना चाहती है।क्योंकि उसे लगता है व्व तुमसे प्यार करती है।"

"उसे लगता है?मैं समझा नही अंकल?"

"अभ्युदय तुम में और निशी की उम्र में अंतर है।चलो वो भी हटा दो क्योंकि मुझमे औऱ निशी की माँ की उम्र में भी फर्क है।पर बेटा सच-सच बताना अगर मेरी बेटी का आधा शरीर लकवाग्रस्त होता तो क्या तुम उससे शादी करते?"

"मैं?क्यों नही करता अंकल?"

"तुम बताओ पंकज।"

"क्या बताना है?"

"यही की तुम अभ्युदय की जगह होते तो क्या करते?"

"मैं निशी से शादी नही करता।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं उसे बहुत प्यारे करता हूँ।"

अभ्युदय जी का बी पी शायद हाई हो गया था। पापा जी ने पंकज को बाहर भेज दिया और सिर्फ अभ्युदय जी से अकेले में बात की।

अब सब बाहर थे और पापा जी ने अनोउंसमेन्ट की।

"अभी एक घण्टे में अभ्युदय और निशी की सगाई होगी।"

सुनते ही माँ का चेहरा उतर गया।पंकज के माँ पापा भी थोड़े निराश नज़र आये।पंकज तो पहले से ही अजीब मूड में था।पर एक जो नई चीज देखने मिली वो ये कि अब अभ्युदय जी का चेहरा भी उतरा हुआ था।

ऐसा क्या हुआ कि अभ्युदय जी मन की बात होने पर भी खुश नही हैं?
 
"तो हम लोग निकले चौहान साहब?"

पंकज के पापा ने कहा।

"नही हम साथ भोजन करेंगे पहले।"

मैं और माँ उठ गए और रसोई में आ गए।

"निशु ये सब क्या है?"

"क्या माँ?"

"तुझे अभ्युदय से शादी करनी है?"

"हाँ माँ।मैं प्यार करती हूं अभ्युदय जी से।"

"खुद को और उनको देखा है कभी?रिश्ता बराबरी वालों में होता है।होगा उनके पास पैसा बहुत पर बेटा शादी और जिंदगी पैसे से नही चलती।"

"जानती हूं माँ।शादी प्यार से चलती है।जो है हमारे बीच।"

"कब तक रहेगा?"

"मतलब?"

"ये प्यार कब तक रहेगा?जब शारीरिक सुख नहीं पूरे होंगे तो ये प्यार मर जायेगा,रिश्ता बोझ बन जायेगा और जिंदगी नीरस हो जाएगी बेटा।"

"माँ हर चीज़ शारीरिक सुख से जोड़ कर नही देखी जा सकती ना?"

"तुम पापा बेटी को जो समंझ आये करो।मेरी सुनता कौन है?"

"माँ खाना लगाएं?"

फिल्मों की तरह ही माने लेकिन असल जिंदगी में भी खूब होता है ये।हमारी बातें पंकज की माँ और अभ्युदय जी की माँ ने सुन ली थीं।

"हम मदद कर देते हैं भाभी जी।निशी आप जाओ बाहर डाइनिंग पर ग्लासेस रखो।"

पंकज की माँ ने मुझे बाहर भेज दिया।

तीनों माओ की खिचड़ी अंदर और बाकी लोगों की बाहर। मैं अकेली डाइनिंग पर ग्लास रख ही रही थी कि भैय्यू आया।

"दी,आपको एक बात बोलूं?"

"हम्म।लेकिन कोई उपदेश मत देना।"

"दी, पंकज भैया आपको क्यों पसन्द नही हैं?"

"भैय्यू पंकज मुझे पसन्द है नही है वाली बाई ही नही है।मुझे अभ्युदय जी से प्यार है बस।"

"दी ये प्यार कैसे हो जाता?"

"भैय्यू मुझे नहीं पता।"

"तो पता करो न दी।पंकज भैया को भी आपसे प्यार है फिर आपको उनसे प्यार क्यों नही हुआ?"

"मुझे नही पता।दिमाग मत खा अब मेरा।"

"दी आप पहले अभ्युदय भैया से मिले हो न?इसलिए आपको लगता है कि आपको उनसे प्यार है।"

"लगता नही है भैय्यू।मैं नही समझा सकती।प्लीज अब मेरा दिमाग खाना बंद कर।"

"जाता हूँ।पर मुझे खुशी होती अगर आपकी शादी पंकज भैया से होती।"

भैय्यू तो चला गया पर मेरे दिमाग मे एक ही प्रश्न बार -बार चलने लगा।

"मेरी शादी किसी से भी होती और शादी के बाद अगर मेरे पति को लकवा लग जाता तो भी मेरे माँ पा मेरी शादी तुड़वा कर दूसरी शादी करवाते क्या?हुह।बिना मतलब बस एक ही चीज़।"

खाना लग चुका था सब डाइनिंग पर आ गए।माँ ने सबका खाना परोसना शुरू किया।

अचानक अभ्युदय जी की माँ बोलीं।

"अगर आप सभी को ऐतराज ना हो तो एक बात कहूँ?"

"जी कहिये।"

पापा जी ने आंटी की तरफ देखकर कहा।

"शादी,सगाई जैसी चीज़ों में हमें जल्दबाजी नही करनी चाहिए।वैसे भी निशी अभी मास्टर्ज़ का एग्जाम देना चाहती है।क्यों न सिर्फ एग्जाम हो जाने तक उसे इन सभी चीज़ों से दूर रहने दें।"

माँ को ये सुझाव बहुत ही पसन्द आया था।

"बिल्कुल सही बात है भाभी जी।बच्ची ने बहुत मेहनत की है,कर रही है।क्या पता ये सगाई के चक्कर मे कंही उसका सपना,सपना न रह जाये।"

मैं समझ रही थी दोनों की बातें ओर शायद मंशा भी।

"मैं तैयार हूं।लेकिन आप सभी को सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि शादी या सगाई हो।अभ्युदय जी से प्यार है और उनसे ही करूँगी।"

सभी चुप थे।लेकिन मेरी बात पर पंकज के पापा चुप नही रहे।

"निशी बेटा आपने कह दिया तो बस कह दिया।लेकिन अगर हमारे बेटे ने हमसे किसी दिन कहा कि हमें निशी से ही शादी करनी है तो हम तो आपको उठवा ले जाएंगे।"

ये पहली बार था जब अंकल कुछ बोल कर जोर से हंसे।सभी हंस पड़े थे साथ मे।

खाना खाकर, मम्मी की खूब तारीफ करके सभी ने कहा कि निशी को भी खाना बनाना सिखाया जाए।माहौल हल्का हो गया था।सबके चेहरे पर खुशी थी।पापा जी बार-बार सिर्फ मुझे और अभ्युदय जी को ही देख रहे थे।मैं अभ्युदय जी से बात करने की पूरी कोशिश कर रही थी पर उनका मन कुछ बुझा सा था।पंकज हम दोनों के पास बैठकर बातों ही बातों में शादी हो जाने की बधाइयां दे रहा था साथ ही छेड़ भी रहा था कि मैं बोलूं पापा को तुझे उठवाने?

शाम होने को थी और अब सब उठकर जाने तैयार थे।पर माँ ने चाय का लालच देकर फिर सबको बैठा लिया था।सिंह सर बहुत खुश नजर आ रहै थे पर आंटी के चेहरे पर भी अजीब सी परेशानी थी।

चाय पीकर जब पंकज के पेरेंट्स निकलने को हुए तो अंकल ने मेरे हाथ में एक लिफाफा थमा दिया और आंटी ने एक पोटली।मुझे समझ नही आ रहा था कि क्यों? पर मना करने के बावजूद भी वो माने नही और हारकर मुझे व्व रखना ही पड़ा।

पंकज पास आया।

"सुन वो लेटर पढ़ा तो नहीं?"

"कौन सा?"

"ट्रैन वाला?"

"नही फिर भूल गई।आज पक्का।"

"सुन अब तुझे कसम है तेरे प्यार की उसे पढ़ना नहीं।मैं ले लूंगा तुझसे वापिस।बाय।"

"ओके।"

"सुन।"

"हम्म।"

"तुझे एक सेकंड के लिए भी कभी मुझसे प्यार नही हुआ?"

"पंकजssss?"

"बता न?"

"बाय।"

"पंकज।" नीचे उतर चुके अंकल ने आवाज लगाई तो बाय बोलकर चुपचाप नीचे उतर गया।
 
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