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Thriller Sex Kahani छाया ( अनचाहे रिश्तों में पनपती कामुकता एव उभरता प्रेम)

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Administrator
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छाया भाग 1
प्रस्तावना
कुछ रिश्ते जन्म के साथ ही मिलते हैं उन रिश्तो में एक अलग आत्मीयता होती है और कुछ रिश्ते सामाजिक मजबूरियों की वजह से थोप दिए जाते हैं पर कामुकता से उत्पन्न हुआ प्रेम इन थोपे गए रिश्तो को नजरअंदाज कर देता है. "छाया" इन्हीं थोपे गए रिश्तो के बीच पनपते प्रेम का चित्रण है.
भारतवर्ष में 80 और 90 के दशकों में लड़कियों के कौमार्य की बहुत अहमियत थी. विवाह पूर्व और विवाहेत्तर सेक्स समाज में था तो अवश्य पर आम नहीं था. इस प्रेम कथा के पात्रों ने इन्हीं परिस्थितियों में अपने आपसी सामंजस्य से अपनी सारी उचित या अनुचित कामुक कल्पनाओं को खूबसूरती से जीया है.
कथा के पात्र काल्पनिक हैं उनका किसी जीवित या मृत किसी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. कथा में वर्णित दृश्यों से यदि किसी पाठक की भावनाएं आहत हुयीं हो तो कथाकार क्षमा प्रार्थी है.
परिचय
हर इंसान के जीवन में अनचाहे रिश्तों हों यह जरूरी नहीं. मेरे जीवन में इनकी प्रमुख भूमिका रही है. आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर पीछे देखने पर यह महसूस होता है कि कैसे कुछ अनचाहे रिश्ते प्यार और काम वासना के बीच झूलते रह जाते हैं.
मुझे आज भी दुर्गा अष्टमी का वो दिन याद है, जब मैं पहली बार इस कथा की नायिका से मिला था. दुर्गा पूजा घूम कर थका हुआ मैं अपने घर के अहाते में प्रवेश करते समय घर के बाहर और अंदर की दुनिया के बीच फर्क के बारे में सोच रहा था. एक तरफ जहां दोस्तों के साथ जीवन का आनंद आता था वहीँ घर पर एकदम एकांत था. जेब से घर की चाभी निकाल कर दरवाजे की ओर बढ़ा. दरवाजा खुला देखकर ये यकीन ही नहीं हुआ की पापा आज घर जल्दी आ गए थे. दरवाजा अन्दर से बंद नहीं था और मैं सीधा हाल में दाखिल हो गया जहां पापा के अलावा एक महिला को देखकर आश्चर्यचकित हो गया. कुछ कहने से पहले पापा बोले...
"बेटा ये माया जी हैं और आज से ये यहीं रहेंगी मैंने इनसे विवाह कर लिया है" .
मैं अनमने मन से उनको ध्यान से देखे बिना , नमस्ते कर सीधा अपने कमरे में चला गया. शायद इस जल्दी की वजह मुझे आई हुई लघुशंका थी. जैसे ही मैंने अपने बाथरूम के दरवाजे को खोलने की कोशिश की तभी अंदर किसी के होने की आवाज आई. मैं आश्चर्यचकित हो कर पीछे हटा पर लघुशंका जोर से लगे होने के कारण दरवाजे को तेजी से पीटने लगा. तभी अंदर से आवाज आई "एक मिनट". आवाज किसी बच्ची जैसी थी. मैंने जैसे ही मुड़कर आपने बिस्तर की ओर देखा वहां पड़ा सूटकेस देख कर कुछ अंदाज लगाने की कोशिश की तभी बाथरूम के दरवाजे के खुलने की आवाज हुई और उसमे से एक लड़की को चहरे पर तौलिया डाले निकलते हुए देखकर मैं कुछ भी बोल नहीं पाया.
शायद आप सभी को यह इस समय मेरी मनोस्थिति का आभास हो रहा होगा. मुझे इस शादी की जानकारी पहले से ही थी और इस रिश्ते को मैं पहले ही अस्वीकार कर चुका था. पर यह सब इतनी जल्दी घटेगा और ये इतनी जल्दी यहाँ आ जाएंगी ये मैंने नहीं सोचा था.
जैसे जैसे मैं लघुशंका समाप्ति की ओर बढ़ रहा था वैसे वैसे घर में आये इस परिवर्तन के बारे में सोच रहा था. अभी अभी जो लड़की गयी थी वो कौन है ? कही ये माया जी की बेटी तो नहीं.
मैं तो इतनी जल्दी में घर में आया था कि उन्हें देख भी नहीं पाया था इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुचना मुश्किल था. बाथरूम से बाहर आकर मैं अपने बिस्तर पर पड़ गया. मेरे दिमाग में बहुत हलचल थी. कुछ ही देर में पापा ने आवाज लगायी तो मैं धडकते हृदय से वापस हाल में प्रवेश किया.
सोफे पर एक ३०-३२ साल की एक खूबसूरत महिला बैठी हुई थी और उसके बगल में एक वही मासूम लड़की बैठी थी. शायद यह वही लड़की थी जो अभी- अभी मेरे बाथरूम से निकल कर आयी थी.
आप सभी को मैं अपना और अपने परिवार का परिचय दे दूं. मेरा नाम मानस है और मेरी उम्र उस समय १८ बर्ष की थी. मैं उस समय १२वीं पास करने के बाद इंजीनीयरींग प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी कर रह१५था. मेरे पिता शासकीय कॉलेज में प्रोफेसर थे और उनकी उम्र लगभग ५० बर्ष थी. मेरी माँ का देहांत आज से १० वर्ष पूर्व हो गया था. हम लोग एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे. मेरा गाँव शहर से ८ किलोमीटर दूर था. यह एक विकसित गाँव के जैसा था. माँ के जाने के बाद घरेलू कार्यों का सारा बोझ दादी पर आ गया था. दुर्भाग्यवश २ वर्ष पूर्व वो भी चल बसीं थी.
पापा, माँ के जाने के बाद अकेले तो थे पर दुबारा शादी की लिए कभी इच्छुक नहीं थे. उन्होंने अपना समय शराब के हवाले कर दिया था. हाँ दादी के जाने के बाद वो परेशान रहते थे. घर आने के बाद खाना बनाना और अन्य घरेलू कार्य करना ये सब बहुत कठिन हो रहा था. मैं अपनी पढ़ाई की वजह से उनका साथ कम ही दे पाता था. शायद इन्हीं परिस्थितियों की वजह से उन्होंने माया जी को पत्नी रूप में घर ले आये थे. मुझे पूरा विश्वास था की इसमें स्त्री सुख भोगने जैसी कोई बात नहीं थी. दरअसल वो पापा से उम्र में लगभग १५-२० वर्ष छोटी थी. उम्र का यह अंतर और पापा का सामाजिक कद एवं उनका स्वास्थ्य इस स्त्री सुख का भोग करने की इजाजत नहीं देता था. आस पास में सभी लोग यह जानते थे की मेरे पापा एक चरित्रवान व्यक्ति थे और उन्होंने माया जी को लाकर सिर्फ उनके सर पर एक छत दी थी और उन्हें एक सम्मान पूर्वक जीने का हक़ दिया था. इसके एवज में मेरे पिता को घरेलू कार्यौं से मुक्ति मिलनी थी.
शायद आप सब कहानी की नायिका के बारे में जानने को उत्सुक हो रहे है? धीरज रखिये. यदि आप इस कहानी को पढ़कर तुरंत निष्कर्ष पर पहुचने को लालायित हैं तो शायद आप को दूसरी कहानियों पढ़नी चाहिए. क्षमा कीजिएगा पर धीरज का फल हमेशा मीठा होता है.
इस कथा का नायक मैं, उस समय अपने भविष्य निर्माण के लिए पिछले कई वर्षों से अपनी पढ़ाई पूरी ईमानदारी से कर रहा था. लड़कियों में मेरी विशेष दिलचस्पी नही थी. ऐसा नहीं था कि मैंने उस समय तक सेक्स कभी अनुभव न किया हो पर मैं इसका आदि कभी नहीं था.
मेरे पड़ोस में रहने वाली मंजुला चाची की जेठानी चंडीगढ़ में रहतीं थीं. उनकी लड़की सीमा बहुत ही खूबसूरत थी. वह अक्सर छुट्टियों के समय अपने पैतृक निवास यानि गांव पर आया करती थी. इसी दौरान वह हर साल मेरे संपर्क में आती थी. हम सब अन्य पडोस के बच्चों रोहन, रिया, साहिल, सौरभ आदि के साथ खेलते कूदते थे और अपने बचपन का आनंद लेते थे.

पहला अनुभव
एक बार हम सब मेरी छत के सीढ़ी रूम में लूडो का गेम खेल रहे थे. खेल की शुरूआत में सीमा, मैं और दो अन्य बच्चे खेल रहे थे पर बाद में सिर्फ मैं और सीमा ही बचे. सीमा का बदन थोडा थुलथुल किस्म का था. उभरता यौवन एवं पेट में जैसे होड़ लगी हुई थी की कौन आगे निकलता है. वो गोरी और चेहरे पर नूर लिए थी.
आम तौर पर घर में सम्पन्नता और सुख को आप उस घर की लड़कियों के नूर से अंदाज सकते है.
खेलते खेलते बातें होने लगीं और अंत में लड़कों और लड़कियों में अंतर पर आ गयी। सीमा मेरे से ज्यादा समझदार थी और सेक्स के बारे में ज्यादा उत्सुक थी । उसने मुझसे पूछा की
"क्या तुम्हें अपने शरीर और मेरे शरीर के अंतर के बारे में पता है?" मैंने हाँ में सर हिलाया तो उसका साहस बढ़ गया और उसने पूछा
"अच्छा बताओ क्या क्या अंतर है?" उसके प्रश्न के उत्तर में मैं क्या जवाब दूं यह सोच नहीं पा रहा था फिर भी मैंने उसके स्तनों और जांघों की ओर इशारा किया. वह समझ गई और बोली..
"मानस मैंने आज तक किसी लड़के का वह भाग नहीं देखा है. क्या तुम मुझे एक बार दिखाओगे?"
मैं सकुचाया पर वह प्लीज प्लीज रटती रही. अंततः मैंने कहा
"ठीक है. पर बदले में मुझे क्या मिलेगा" तो उसने कहा कि
"मैं भी वही काम तुम्हारे लिए करूंगी."
मैंने स्वयं आज तक कभी किसी लड़की का वह भाग नहीं देखा था यहां तक की किसी फोटो में भी नहीं. वह उतावली हो रही थी.
"दिखाओ ना... क्यों शर्मा रहे हो."
उसके बार बार कहने पर मैंने धीरे से अपना पैजामा नीचे कर दिया और अपने लिंग को बाहर ले आया जो कि इन सब बातों के दौरान काफी कड़ा हो गया था. मेरा लिंग सामान्य युवा था पर एकदम साफ सुथरा था. लिंग का रंग गोरा था. सीमा अपनी उत्सुकता ना रोक पायी और बोली
"क्या मैं इसे छू सकती हूं?"
मेरे उत्तर का इंतज़ार किये बिना उसने अपना हाथ सीधा लिंग पर रख कर उसे महसूस करना शुरू कर दिया. थोड़ी ही देर में मेरा लिंग इतना कड़ा हो गया जैसे कि फट जाएगा. मेरे लिंग के ऊपरी भाग में मुझे हल्का दर्द का अनुभव हुआ. मुझे लगता है इसके पहले शायद दो या तीन बार मैंने अपने लिंग को इतना कड़ा महसूस किया था. उसके हाथों का स्पर्श पाकर आज जैसी अनुभूति शायद पहले कभी नहीं हुई थी. वह बार-बार मेरे लिंग की तारीफ करती और हल्के हल्के सहलाती जा रही थी. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था. मैंने देखा कि सीमा का दूसरा हाथ उसकी जांघों के बीच है। मुझे अब विश्वास हो चुका था की सीमा ये काम पहले भी किसी के साथ कर चुकी है. मैंने उससे कहा...
"मुझे भी देखना है"
उसने कुछ देर सोचा और कहा...
"ठीक है रुको"
उसने धीरे से मेरे से लिंग के अग्रभाग पर अपनी हथेलियों का प्रेशर बढ़ा दिया. उसके इस कार्य से उत्तेजना की एक तीव्र लहर मेरे शरीर में दौड़ गई. मेरा शरीर बुरी तरह कांप रहा था. शायद उसे मेरी स्थिति का अंदाजा था. उसने अपना कार्य जारी रखा और धीरे-धीरे मेरे और पास आ गई. पास आने के बाद उसने अपना बाया हाथ अपनी जांघों के बीच से हटा लिया और मेरे कान में धीरे से कहा ...
"अपनी आँखें बंद कर लो."


उसने मेरे लिंग को सहलाना जारी रखा। जब वह लिंग की चमड़ी को पीछे की तरफ खींचती थी तो शिश्नाग्र में बहुत सनसनाहट होती और हल्का दर्द भी होता। चमड़ी को पीछे करके उसने जब सुपाड़े को छुआ तो मेरी जान ही निकल गयी. अग्रभाग इतना संवेदनशील था की उसे सीधा सहलाना मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा था. मैंने सीमा का हाथ पकड़ लिया. वो यह जान चुकी थी की मेरे सुपाड़े को शायद पहली बार हस्तमैथुन के लिए छुआ गया था. वो अपने हथेली में मेरे कोमल पर अत्यंत सख्त हो चुके लिंग को पकड़कर आगे पीछे करने लगी. मैं आनंद की पराकाष्ठा में था. मैंने स्खलित होने के पहले सीमा को जोर से पकड़ लिया और लिंग के अन्दर धधक रहे ज्वालामुखी ने लावा उड़ेल दिया.

इससे पहले कि मैं यथार्थ में वापस आता, उसने हाथ में लगे वीर्य रस को मेरे बनियान में पोछा और "आती हूँ" कह कर भाग गयी.
सीमा इस कला में उस उम्र के हिसाब से शायद पारंगत थी. मुझे नहीं पता की उसे इस क्रिया में क्या मिला पर वो खुश थी.
सुनहरी यादों में एक खूबी होती है की उन्हें व्यक्त या याद करते समय समय तेजी से निकल जाता है.


नए मेहमान
मेरे लिए माया जी और उनकी बेटी का कोई महत्व नहीं था. मैं उस समय पूरी तरह अपनी पढ़ाई में मशगूल था. अतत: मैं शांति से हाल में आकर बैठ गया. पापा ने एक बार फिर माया जी को मेरे बारे में बताया और बाद में उस प्यारी लड़की की तरफ इशारा करके बोले ये छाया है माया जी की बेटी. वो तुरंत उठकर मेरे पास आई और मेरे पैर छूए. मुझे कुछ अटपटा सा लगा, मैं "ठीक है" कह कर थोड़ा पीछे हटा.
बाद में मुझे पता चला की माया जी पापा के ससुराल के गांव की थी. पति के देहांत के बाद माया जी और उनकी बेटी का गाँव में कोई न था. पापा के ससुराल पक्ष वालों की सहमति से मंदिर में शादी कर वे उनके साथ चली आयीं थीं. शायद यही नियति को मंजूर था. मैं और पापा दोनों ही उनको माया जी कहकर ही संबोधित करते थे. यह इस बात का भी परिचायक था की वो हमारे घर में जरूर थीं पर हमारे मन में उनका कोई विशेष स्थान नहीं था.
जैसे माया जी घरेलू कार्य में निपुण थी और वैसे ही उनकी बेटी छाया. पापा भी खुश रहने लगे और घर एक में एक बार फिर रौनक हो गयी.
नारी की उपस्थिति घर के सजीव और निर्जीव दोनों में जान डाल देती है.
घर की कुर्सियां परदे एवं अन्य साजो सामान चमकने लगे. पापा और मैं भी खुश थे हमें घर का कोई काम नहीं करना पड़ता था. पापा को अब घर की कोई चिंता नहीं थी. वक्त काटने के लिए शराब अपनी जगह थी ही. मैं उस समय न तो माया जी से न ही छाया से कोई रिश्ता रखने को उत्सुक था. दरअसल मेरे पास पढाई के अलावा वक्त ही नहीं था खास कर इस नए रिश्ते के लिए.
माया जी समय से मेरे रूम में ही नाश्ता व खाना दे जाया करतीं थी. इसके अलावा उनसे बात करने का कोई तुक भी नहीं था.
जब स्वीकार्यता नहीं होती तो अक्सर आदमी बातचीत से दूर भागता है यही हाल मेरा था.
परीक्षा अच्छे से देने के बाद मैं बहुत खुश था और घर आने पर उस दिन मैंने माया जी से पहली बार बात की. उन्होंने अपने गाँव के बारे में बताया और अपने पहले पति को याद कर दुखी ही गयीं. मैंने बात बदल कर वापस उन्हें वर्तमान में ले आया. छाया की बात करते हुए उन्होंने कहा कि उसे भी अपने जैसा होशियार बना दो. मैंने बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया वैसे भी ये सब पापा को ही करना था. छाया भी मुझसे दूर ही रहती थी.
पनपती कामुकता
अगले कुछ दिनों में मैंने सीमा को बहुत याद किया उसका स्पर्श और उसके कोमल हाथों में मेरे लिंग के एहसास मात्र से मेरा लिंग उत्तेजित हो जाता था. अब जब पढाई का तनाव न था तो सिर्फ सीमा के साथ एक बार किया गया हस्तमैथुन ही एक सुनहरी याद थी. मैंने उसे याद कर कर के कई बार हस्तमैथुन किया. मैंने उस समय तक कभी किसी लड़की के उपरी या निचले भाग को नही देखा था. सीमा ने मुझसे वादा तो किया पर वो बिना पूरा किये ही चली गयी थी.
जब आप स्त्री अंगों से परिचित न हो तो आपकी कल्पना भी अजीब होती है. मैं चाहकर भी योनि की बनावट और कोमलता की कल्पना नहीं कर पा रहा था.
पर युवावस्था में अपना हाथ ही किसी काल्पनिक योनि की तरह चरमावस्था देने में निपुण होता है. अगले एक महीने में मैंने कई बार अपने लिंग को सुखद एहसास दिलाया जैसे उसे आने वाली जिन्दगी के लिए तैयार कर रहा था. कई बार हस्तमैथुन करने से मेरे लिंग की चमड़ी आसानी से आगे पीछे होने लगी थी और अब हस्तमैथुन करते समय होने वाला हल्का दर्द आनंद में बदल चुका था. शिश्नाग्र की सवेंदना भी कुछ कम हो गयी थी.
कुछ ही दिनों में मेरा एडमिशन दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कालेज में हो गया. घर से जाते समय छाया भी मुझे छोड़ने आई थी. मैंने पहली बार उसे ध्यान से देखा था. वो बहुत मासूम थी और थोडा दुखी भी लग रही थी. सुनहरे सपने लिए मैं दिल्ली के लिए निकल चुका था.
होस्टल की दुनिया निराली थी. मेरे लिए यहाँ सब कुछ नया था. नए वातावरण में ढलने में मुझे १० - १५ दिन लगे. जिंदगी को जैसे पर लग गए थे. दोस्तों के साथ घूमना फिरना, शहर की लड़कियों को देखना एक अलग ही अनुभव था. कुछ दोस्त अपने सेक्स के अनुभव भी शेयर करते थे पर मैंने कभी भी सीमा के साथ हुए अपने छोटे अनुभव को साझा नहीं किया था.
होस्टल के टीवी रूम में एक रात काफी लोगों के होने की आवाज आ रही थी. मैं और मेरा रूम पार्टनर उत्सुकता वश उधर की तरफ गए तो देखा कि टीवी रूम खचाखच भरा हुआ था. टीवी पर एक ब्लू फ़िल्म चल रही थी जिसमे सम्भोग क्रिया जारी थी. मेरी तो आंखें फटी रह गयीं. मैंने आज तक यह दृश्य नहीं देखा था न ही कभी कल्पना कर पाया था.


पर आज नारी शरीर के नग्न अवस्था में साक्षात दर्शन कर समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या देखूं क्या छोडू. ह्रदय की धड़कन तेज हो गयी थी. पर लिंग में कोई हलचल नहीं थी. दिमाग में तरह तरह के ख्याल आ रहे थे. सामाजिक वर्जनाएं एक झटके में खंडित हो रही थी. बायोलॉजी की क्लास से स्तन और योनि के बारे में ज्ञान तो था पर इस तरह विदेशी नायिका के नग्न अंगो का दर्शन अप्रत्याशित था. चार पांच मिनट बाद मन की ग्लानि को मिटा कर नायिका के अंगों को मैंने भावविभोर होकर नहाना शुरू किया तो साक्षात कामदेव लिंग में प्रवेश कर गए. बिना हाँथ लगाये ही लिंग की धड़कन बढती गयी और वीर्य प्रवाह हो गया. इसके बाद मैं वहां से चला आया पर इन १० - १५ मिनट में मेरे जेहन में नग्नता की इतनी तश्वीरें कैद हो गई थी जो २ -४ महीने तक मेरे हस्तमैथुन को जीवंत बनाए रखती.

फ़िल्म की वयस्क नायिका को नग्न देखने के उपरांत मेरी कल्पना सातवे आसमान पर पहुच गई. नायक के साथ सम्भोग करते हुए नायिका को देखकर अविस्मरणीय अनुभूति हुई थी. अब मेरा एकांत मेरे लिए सुखद होता था तथा मैं अपनी सेक्स की कल्पनाओ को नयी नयी ऊंचाइयां देने लगा. दोस्तों से प्राप्त नग्न किताबें एवं कामुक साहित्य ने छ; सात महीनों में मुझे मेरी नजर में आज का वात्स्यायन ( कामसूत्र के रचयिता) बना दिया. मैंने नायिका के शरीर और उससे की जाने वाली छेड़छाड़ के बारे में इतना सोचने लगा की प्रतिदिन एक या दो बार हस्तमैथुन अवस्य करता था. इस दौरान मेरी सेहत भी गिरने लगी थी.
धीरे धीरे मेरी कल्पनाओं में आसपास के लोगो ने अपनी जगह बनाई.
ब्लू फ़िल्मो का एक ख़राब असर यह भी है कि सुन्दर और सुडौल नायिका की उस मदमस्त जवानी के सामने आसपास की लड़कियां या युवतियां फीकी दिखाई पड़ती है. आप चाह कर भी उन्हें अपने विचारों में नग्न नहीं कर सकते आपका मन खट्टा हो जाएगा.
मैं तो और भी भावुक था. सेक्स अब मेरे लिए जीवन में एक अहम् भाग हो गया था. मेरी कल्पना आसमान छू रही थी. एक साल बीतने को आ रहा था. इस साल भर में मैंने सिर्फ अपनी एक प्यारी सहपाठी राधिका और एक टीचर को अपने ख्वाबों में नग्न किया था और उनके साथ शरमाते हुए जमकर संभोग किया था. वो दोनों मुझसे बात चीत करती थी पर शायद उन्हें इस बात का इल्म भी न हो की एक सीधा साधा लड़का न जाने अपनी कल्पना में कितनी बार उनका योनि मर्दन कर चुका है.
सीमा और गुरुदक्षिणा
पहली छुट्टियाँ
परीक्षाओ के बाद मैं वापस अपने घर आया. एक सीधा साधा लड़का अब बदल चूका था. सफर में मिलने वाली सुन्दर युवतियों को अपनी कल्पना में नग्न कर उनके यौवन एवं योनि प्रदेश की कोमलता का मन में अनुभव करते हुए सफर का समय तेजी से बीत गया. अब नारी अंगों को छूने का मन तो बहुत करता था पर हिम्मत नहीं होती थी. जितना मैं अपने खयालों में नंगा था शायद वो मासूम सी युवतियां एवं लड़कियां नहीं होंगी यह मुझे पूरा विश्वाश था.
मैं अब १९ वर्ष का हो चुका था. चेहरे पर मासूमियत कायम थी पर कद काठी ठीक हो चली थी. लम्बाई ५ फुट ११ इंच, रंग भी साफ था. ज्यादा हस्तमैथुन से लिंग अब समय से पहले वयस्क हो गया तथा उस पर नसें अब साफ दिखाई पड़ती थी. इन साल भर में सबसे ज्यादा किसी ने मेहनत की थी तो वह यही बहादुर था. जितना वीर्यदान इसने साल भर में किया था उसमें तो मेरी प्यारी सहपाठी राधिका आराम के एक बार स्नान कर लेती.
घर पहुँचने पर सभी खुश थे . माया जी ने मेरे पसंदीदा पकवान बनाए थे. मैंने उन्हें शुक्रिया कहा तथा दिल्ली से लायी मिठाई उन्हें दी जो उन्होने छाया को दे दी. छाया भी खुश थी. छाया से अभी तक मेरी कोई बातचीत नहीं थी. वो फिर मेरे पैर छूने आई और मैं "ठीक है, ठीक है" कहकर पीछे हटा. पापा से मिलकर मैंने कॉलेज के बारे में कई बातें की. मैं उनका अभिमान था वो मुझे बहुत मानते थे.
''मानस भैया चाय ले आऊं'' रसोई से आवाज आई तो मैं आश्चर्यचकित था की किसने मुझे आवाज दी वो भी मानस भैया कहकर? "भैया" शब्द अपने से छोटे लड़कों के नाम के साथ लगाना सम्मान देने के लिए एक आम बात थी. पर माया जी से ये शब्द मुझे अच्छे नहीं लगे. मुझे अचानक उनके चार की कामवाली जैसे होने का अहसास हुआ. वो चाय लेकर आयीं तो मैंने उनसे कहा "आप मुझे मानस ही बुला सकती है."
दो तीन दिनों में मैं नए परिवेश में अपने आप को व्यवस्थित कर लिया. पापा ने छत पर एक नया कमरा भी बनवा दिया था जिसमे मेरे पसंद की सारी चीजें थी. खिड़की घर के आगन में खुलती थी. वहां से नीचे किसी से भी आसानी से बात हो सकती थी. मेरा कमरा वास्तव में बहुत सुन्दर हो गया था. मेरे पुराने कमरे में माया और छाया साथ में रहतीं थी. छाया ने उसे अपने अनुसार व्यवस्थित कर लिया था. उसका कमरा पुराना होने के बावजूद सुन्दर लग रहा था.
वैसे भी काबिल लड़कियों का कमरा हमेशा साफसुथरा और सजा हुआ होता है.
मुझे राजकुमार जैसा महसूस हो रहा था. छत का खुला खुला वातावरण मुझे बहुत पसंद था. पापा अब भी अपने कमरे में एकांत में रहते थे तथा अपनी किताबों और शराब में मस्त रहते थे. छाया का एडमिशन भी पापा ने अपने ही कॉलेज में करा दिया था. वो समय निकल का उसे पढ़ा भी दिया करते थे. कुल मिलाकर अब घर घर जैसा लगने लगा था.
रात्रि में खाना खाकर सोने गया तो इस घर में बिताए सारे पल एक एक कर याद आते गए. माँ को याद कर मन रुआंसा भी हुआ पर धीरे धीरे वर्तमान में वापस आ गया. आज मैं नए कमरे में बहुत खुश था. यहाँ गर्मियों में ही मौषम खुशनुमां होता था और जाड़े में कडाके की ठण्ड पड़ती थी.
मानसिक सुख और एकांत दिमाग में सेक्स को जीवंत कर देते है.
धीरे धीरे मेरा हाथ अपने लिंग का हाल चाल लेने लगा. उसका साथ देने के लिए चंचल मन एक वयस्क नायिका की तलाश में भटकने लगा जिसे मैं अपनी कल्पना में निर्वस्त्र कर अपनी काम पिपासा को शांत कर सकूं.
घटना या दुर्घटना
मुझे सीमा की याद आई. काश वो भी यहाँ छुट्टियाँ मनाने आई होती. मैंने उसे आज अपनी नायिका बनाने की कोशिश की पर वो मेरी यादों में बहुत छोटी थी. मैंने उसे भूल कर आज रात की नायिका के लिए कई और चेहरों को दिमाग में लाया पर अंततः वीर्यस्खलन का श्रेय मेरी सहपाठी राधिका को ही मिला.
अगले दिन मैं बहाने से पड़ोस में मंजुला चाची से मिलने गया. उन्होंने कहा आओ मानस बेटा हम लोग अभी तुम्हारी ही बात कर रहे थे. सीमा की मम्मी का फ़ोन आया था वो लोग भी परसों आ रहे हैं. सीमा आगे की पढाई के बारे में तुम्हारा मार्गदर्शन चाह रही थी. तुमने तो हम सब का नाम रोशन कर दिया है. थोडा ज्ञान सीमा को भी दे देना.
यही होता है तकदीर जब मेहरबान होती है तो खुशियाँ आपको खोजती हुई आ जाती हैं.
सीमा मुझसे मिलने आ रही थी वो भी अपने परिवार वालों की सहमति से. यहाँ मिलने का उद्देश्य अलग अलग हो सकता है मेरा उद्देश्य आप समझते ही होंगे. परिवार वालों की मंशा स्पष्ट थी पर सीमा के उद्देश्य पर अभी प्रश्नचिन्ह था.
दो दिनों के बाद सीमा आ गई. शाम को अपनी मां के साथ हमारे घर आई इस बार सीमा को देखकर एक नया अनुभव हो रहा था. अब मेरी आंखें लड़कियों को देखने का नजरिया बदल चुकीं थीं. यौवन का उतार चढाव वरीयता प्राप्त कर चुका था. सीमा जो पहले एक थुलथुली लड़की थी अब वह काफी सुंदर हो गई थी. उसमें काफी शारीरिक बदलाव आ चुका था. उसका पेट और वक्षस्थल अब अलग दिखाई दे रहे थे. वक्षस्थल उभरा हुआ और पेट सपाट था. उसका कद लगभग 5 फीट 2 इंच था. अभी भी वह सामान्य लड़कियों से थोड़ी मोटी थी, पर अब शरीर उसका व्यवस्थित लग रहा था.
मैं उसे देख कर मुस्कुराया और वो भी मुझे देखकर वैसे ही मुस्कुराई. उसकी मां ने कहा.
"बेटा मानस, सीमा भी तुम्हारी तरह इंजीनियर बनाना चाहती है जब तक वो यहाँ है तुम उसकी मदद कर देना वो तुम्हें बहुत मानती है."
हम उसकी पढाई के बारे में बात करने लगे. कुछ देर बाद सीमा की मम्मी माया जी के साथ किचन में चली गई. सीमा बात करते करते काफी खुल चुकी थी. हम सब हंसी मजाक की बात भी कर रहे थे. मैंने बात ही बात में उसके साथ छत पर बिताए उन पलों का भी जिक्र कर दिया. वह बहुत शर्मा गई और अपनी नजरें नीची कर ली. मैंने उसके अधूरे वादे का भी जिक्र किया जिसे सुनकर वह उठ गई और सीधा किचन में चली गई.
मैं मन ही मन सोच रहा था कि यह मैंने क्या कर दिया. इतना उतावलापन शायद ठीक नहीं था.
पर जब सेक्स दिमाग में भरा हो तो उतावलापन स्वाभाविक रूप से आ जाता है.
वैसे भी मैं अभी इस क्षेत्र का नया खिलाड़ी था. तीर कमान से निकल चुका था अब उसकी प्रतिक्रिया ही आगे का मार्ग प्रशस्त करती. वह अपनी मम्मी और माया जी के साथ चाय और स्नैक्स लेकर आई. हम सब ने चाय पी इस दौरान दो तीन बार मेरी नजरें सीमा से मिली पर वह नजर हटा लेती थी. आखिर में जाते समय सीमा की मम्मी ने कहा बेटा दिन में जब भी खाली रहो तो सीमा को बुला लिया करो तुमसे मिलकर कुछ सीख लेगी. मैं उसकी तरफ देख कर मुस्कुराया तो इस बार वह भी मुस्कुरा दी.
मेरे दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया और आशा की एक नई किरण जाग उठी. रात बड़ी बेचैनी से कटी . रात में मैंने पिछले साल सीमा के साथ बिताए गए उन अंतरंग पलों को याद किया तो मेरा लिंग अपनी मालकिन सीमा को सलामी देने को उठ खड़ा हुआ. उसकी नसें तन गई उसके कष्ट को कम करने के लिए हाथ स्वयं ही उसे सहलाने लगे . परंतु जितना ही हाथ उसे सहलाते वह और तन जाता. मैंने अपने दिमाग में सीमा को निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया था. सीमा ब्रा का प्रयोग करती थी या यह प्रश्नचिन्ह था, परंतु मेरे दिमाग में एक नई तस्वीर बन रही थी. मैं उसके छोटे छोटे स्तनों की खूबसूरती की पूरी कल्पना तो नहीं कर पा रहा था तुरंत उसका एहसास बड़ा सुखद था. इसका कारण शायद इस बात की आशा थी कि शायद उन के साक्षात दर्शन हो सके. वक्षस्थल से नाभि प्रदेश होते हुए कमर तक पहुंचने के पूर्व ही लिंग लावा उगलने के लिए के लिए तैयार हो गया था. मैंने उसे शांत करने के लिए अपना ध्यान सीमा की कमर से हटाकर उसके चेहरे की तरफ ले गया. मुझे लगा उसकी मासूमियत मेरे लिंग को थोड़ा नरम कर देगी पर सीमा की हंसी और उसके बाद करने के अंदाज ने मेरे सब्र का बांध तोड़ दिया. मेरा लिंग के अंदर का लावा एकदम मुहाने पर आ गया. मेरे हाथों ने लिंग को कसकर दबाया ताकि वह शांत हो सके पर हुआ उसका उल्टा ही. निकलने वाले वीर्य की गति दोगुनी हो गई और उसकी धार लगभग चार फुट उपर जाने के बाद वापस मेरे ही चेहरे पर आ गिरी.
चेहरे पर वीर्य गिरने कि यह घटना मुझे ताउम्र याद रहेगी. वीर्य स्खलन के दौरान ही दरवाजे पर नॉक हुआ. सामान्यतः इतनी रात को कोई मेरे कमरे में कोई नहीं आता था. मैं फटाफट अपने बिस्तर से उठा और अपने लिंग (जो अभी भी उछल रहा था) को व्यवस्थित करने के बाद जल्दी जल्दी अपने चेहरे को पोछा एवं दरवाजे को खोला . माया जी कटोरी में दो रसगुल्ले लेकर खड़ी थी. मैंने पूछा ..
"इतनी रात को?"
उन्होंने कहा आपके पापा आपके लिए लाए थे . उन्होंने ही जिद की कि अभी ही मानस को दे दो वह सोया नहीं होगा. माया जी ने मेरी झल्लाहट को पहचान लिया था. रसगुल्ले की कटोरी देने के बाद अचानक उन्हें मेरे माथे पर मेरे वीर्य की एक मोटी लकीर दिखाई दी. उन्होंने कहा.
"माथे पर यह क्या लगा है?" मेरे कहने से पहले ही उन्होंने हाथ बढ़ाकर उसे पोंछ लिया. हे भगवान यह क्या हो गया ? उन्हें एहसास भी नहीं था ली उन्होंने क्या छू लिया था. माया जी ने अपना हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में पोछ लिया. वापस जाते समय मैंने देखा की वो अपनी उंगलियों को नाक के पास ले गयीं जैसे पहचानने की कोशिश कर रही हो कि वो क्या चीज थी. मुझे यह बात दो तीन वर्षों बाद मालुम चली कि माया जी ने उसे सूंघने के बाद पहचान लिया था कि वो मेरा वीर्य ही था.
हस्तमैथुन के दौरान कुछ घटनाएं या दुर्घटनाएं इस तरह घट जाती है की हमेशा याद रहतीं है. यह उन्हीं में से एक थी.
छुपन- छुपाई
हमारे यहाँ ज्यादा जगह होने के कारण मोहल्ले के छोटे बच्चे खेलने के लिए आया करते थे. उनमे सीमा का भाई सौरभ , साहिल, पड़ोस में रहने वाला रोहन, रिया मुख्य थे और बाद में छाया भी जुड़ गई थी. बचपन में मैं और सीमा भी इसी टोली का हिस्सा थे. हालाँकि, अब हम लोग थोडा बड़े हो चुके थे पर बच्चे अभी भी हम लोगों को अपने साथ खेलने के लिए आग्रह करते रहते थे.
गांवों से संबंध रखने वाले सभी लोग यह जानते होंगे कि दोपहर में खाना खाने के पश्चात सभी बड़े लोग आराम करते हैं और यही समय हम बच्चों के लिए खेलने के लिए उपयुक्त होता है. हम सब इसी समय इकट्ठा होकर कई प्रकार के खेल खेलते. कभी लूडो, कभी चाइनीस चेकर तो कभी कभी छुपन छुपाई खेलने का भी आनंद लेते. सीमा के भाई सौरभ और साहिल बहुत ही मासूम थे. उन्हें छुपन छुपाई में ज्यादा मजा आता था. बच्चों में रोहन सबसे छोटा था. बच्चे अपनी दुनिया मे थे बड़े अपनी दुनिया मे
अगले दिन मैं नाश्ता करके अपने बेड पर लेटा हुआ था और सीमा के बारे में ही सोच रहा था तभी नीचे से नमस्ते आंटी की मधुर आवाज आई.
" मानस कहां है ?"
बेटा वह ऊपर अपने कमरे में ही होगा.
"ठीक है आंटी, मैं वहीं चली जाती हूँ." मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि सीमा इतनी जल्दी चली जाएगी. मैंने तुरंत अपने हाथ में पड़ी पुस्तक को तकिए के नीचे रखा और उसका इंतजार करने लगा.
सीमा ने दरवाजे पर दस्तक दी. मैंने कहा...
"आ जाओ"
उसने कमरे में घुसते ही कहा
"कमरा तो बहुत ही खूबसूरत है"
मैंने भी उसे छेड़ा
"तुमसे ज्यादा नहीं" वह हंसने लगी.
वह अपने हाथ में एक डायरी और एक किताब लेकर आई थी . मैंने उसे अपनी कुर्सी खींच कर बैठने के लिए दी. और मैं भी उसके पास एक स्टूल खींच कर बैठ गया. वह बोली
"आप कुर्सी पर बैठ जाइए"
"नहीं नहीं तुम आराम से बैठो. मैं ठीक हूं." मैंने लड़कियों को सम्मान देना सीख लिया था.
" मुझे बताइए ना इंजीनीयरिंग की तैयारी में मुझे किन चैप्टर्स पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए."
मैं समझ गया कि वह अभी पढ़ाई की बातों को लेकर संजीदा है. मैंने उसे कई सारी टिप्स दीं तथा जितना मेरा ज्ञान था उसके हिसाब से उसे भरपूर मदद की. उसने मेरी टिप्स को अपनी डायरी में लिखा. धीरे-धीरे वह अपने बारे में बताने लगी. वह अब बातूनी हो चुकी थी. उसने मुझे अपने स्कूल, अपनी सहेलियां और जाने क्या क्या बताया. बातचीत के दौरान अधिकतर उसका चेहरा खिड़की की तरफ रहता कभी-कभी वह मेरी तरफ देखती पर तुरंत ही अपना चेहरा वापस खिड़की की तरफ घुमा लेती. शायद वो नजरें मिलाकर बात करने में सहज नहीं हो पा रही थी. जब वह खिड़की की तरफ देख रही होती तब मेरी निगाहें उसके शरीर का नाप ले रहीं होती.
सीमा के बाल कंधे तक आ रहे थे उसने एक पिंक टॉप तथा काले रंग की पजामी पहनी थी. उसके वक्ष स्थल पर निगाह पड़ते ही मैंने अपनी निगाहों से यह जानने की कोशिश की कि क्या वह ब्रा का उपयोग करती है?
साथ बैठकर आपस में बात कर रहे दो इंसानो की मानसिक अवस्था अलग अलग हो सकती है.
जहां सीमा अभी पढ़ाई पर केंद्रित थी पर मैं कामुक हो रहा था. सीमा की जांघें थोड़ी मोटी लग रही थी. शायद कुर्सी पर बैठने की वजह से जांघों की चौड़ाई बढ़ गई थी. अचानक सीमा ने मेरी तरफ नजर घुमाई और मेरी निगाहों को नीचे देखते हुए पकड़ लिया. उसने सीधा प्रश्न किया
"आप वहां क्या देख रहे हैं?"
मेरे मुंह से अचानक निकला
"जिसे तुमने दिखाने का वादा किया था."
यह उत्तर अप्रत्याशित था. मैंने भी यह सोच समझकर नहीं बोला था. वह बुरी तरह झेंप गई. न वह कुछ बोल पा रही थी न मैं.
हम हम दोनों लगभग एक मिनट तक मौन रहे. अचानक सीढ़ियों पर बच्चों के आने की आवाज आई. साहिल दरवाजे के पास पहुंचते ही बोला..
"अरे सीमा दीदी भी यहीं पर है. चलिए सब लोग नीचे , हम लोग छुपन छुपाई खेलेंगे."
उस बच्चे का आर्डर सुनकर सीमा खुश हो गई और उठ कर नीचे जाने लगी और मौन तोड़ते हुए बोली आप भी चलिए.
हम दोनों में काफी कुछ बदल चुका था. सीमा का मन और तन जवान हो चुका था. वो समझदार हो चुकी थी. मैं स्वयं सेक्स और उससे संबंधित क्रियाकलापों में काफी ज्ञान प्राप्त कर चुका था. सीमा द्वारा किया गया हस्तमैथुन एक सुनहरी याद थी पर आज की परिस्थितियों में दोबारा यह अवसर मिलेगा या नहीं यह प्रश्न चिन्ह था. हम सब नीचे आ गए थे.
आप में से शायद कुछ लोगों ने गांव में अपना समय बिताया हो. वे लोग गांव के घरों और उनके आसपास की जगह जैसे दालान गौशाला आदि से परिचित होंगे. मेरे घर के सामने एक बड़ी सी दालान थी इसमें कुल तीन कमरे थे दो कमरे आपस में जुड़े हुए थे तथा एक कमरा अलग था. जुड़े हुए कमरों में से एक कमरे में भूसा और पुवाल रखा रहता था तथा उस कमरे में काफी अंधेरा रहता था. उसके साथ वाले कमरे में पुरानी अलमारियां पड़ी हुई थी. दालान के सामने आम और नीम के पेड़ थे. सीमा का घर हमारी दालान के ठीक पीछे था.
छुपन छुपाई में छुपने के लिए दालान के दोनों कमरे , पेड़ की ओट, छत, आँगन एवं सीमा के घर का बाहरी कमरा था. इसमें भी बड़ी-बड़ी अलमारियां पड़ी थी जिनके पीछे आदमी आसानी से छुप सकता था एक पुरानी खाट भी थी जिसे खड़ा किया हुआ था उसके पीछे भी छुपा जा सकता था. सीमा दालान की परिस्थितियों से परिचित थी. यह खेल हम बचपन में भी खेला करते थे. यह खेल मैं और सीमा बचपन से खेलते आ रहे थे. भूसा वाले अंधेरे कमरे के बगल वाला कमरा छुपने के लिए मेरी और सीमा की पसंदीदा जगह थी.

राजकुमार और घायल राजकुमारी
खेल शुरू हुआ, सबसे पहले मैंने खुद ही चोर बनना स्वीकार किया. सब बच्चे अलग-अलग जगहों पर छुप गए. मैंने खेल का आनन्द लेते हुए सबसे पहले छोटे रोहन को फिर बाकी सबको ढूंढ लिया.
सबसे छोटा रोहन इस बार चोर बना था और हम सब की छिपने की बारी थी. सारे बच्चे अपनी अपनी जगहों पर छिपने चले गए. मैंने सीमा को दालान के दूसरे वाले कमरे की तरफ जाते हुए देख लिया था. यह ऐसी जगह थी कि कोई भी छोटा बच्चा उधर जाने की हिम्मत नहीं करता था. मैं भी सीमा के पीछे हो लिया. सीमा ने मुझे आते हुए देख लिया था पर फिर भी वो चुपचाप रही. मुझे बड़ी अलमारी के पीछे थोड़ी हलचल सी लगी. मैं पीछे से गया और सीमा को पकड़ लिया. मैंने अपना एक हाथ उसके मुंह पर रखा ताकि वह आवाज न निकाल दे. सीमा ने कहा..
"आप यहां कैसे आ गए?" मैंने कहा..
"कुछ मत बोलो रोहन आता ही होगा"
इस समय मेरा एक हाथ सीमा के मुंह पर था तथा दूसरा हाथ उसके पेट पर था. कुछ ही सेकंड में हमें अपनी स्थिति का एहसास हुआ. मैंने महसूस किया कि सीमा भी असहज थी. सीमा के नितंब मेरे लिंग से सटे हुए थे. सीमा मुझसे सटी हुयी थी. इसका एहसास होते हुए ही मेरे लिंग में तनाव उत्पन्न हो गया. इस तनाव की अनुभूति सीमा को बखूबी हो रही थी पर वह कुछ नहीं बोल रही थी. धीमे-धीमे यह तनाव असहनीय हो गया. मैंने अपनी कमर को थोड़ा पीछे कर अपने लिंग को आरामदायक स्थिति में लाने की कोशिश की. पर लिंग और तन चुका था. सीमा से चिपकने पर लिंग सीधा सीमा की कमर में छेद करने को आतुर दिखा. सीमा ने हँसते हुए कहा.
"राजा जी जाग गए हैं क्या?"
"राजा जी" मैं सोच नहीं पा रहा था कि सीमा ने किसे राजा जी कहा. मैंने धीरे से कान में पूछा.
"कौन राजा जी" इस पर वह अपना हाथ पीछे ले गई और मेरे लिंग को अपनी उंगलियों से दबा दिया. मैं भी हँस पड़ा. मैंने उसके कान में धीरे से कह..


"राजा जी अपनी रानी खोज रहे हैं."
बात करते समय मैंने अपनी पजामी को थोड़ा नीचे कर दिया अब लिंग खुल खुल बाहर आ चुका था. मैंने अपनी कमर को और नीचे किया ताकि वो सीमा के की जांघों के बीच आ जाए. बाहर बच्चों की आवाज आ रही थी अब सीमा से यह स्थिति बर्दाश्त नहीं हो रही थी. उसने भी अपनी कमर को हिलाया तथा मेरे लिंग को अपनी जांघों के बीच जगह दे दी. उसकी जांघों और मेरे लिंग के बीच में उसकी पजामी थी. मेरा लिंग सीमा की जांघों के बीच से होते हुए बाहर की तरफ आ गया था. सीमा की जांघों का तनाव मेरे लिंग पर पड़ रहा था. वो मेरे इरादे जान चुकी थी तभी रोहन के दरवाजे पर आने की आवाज हुई.
सीमा में मुझे चिकोटी काटकर अपनी पकड़ से छुड़ाया और धीरे से रोहन की नजर में आ गयी और बाहर आकर खुद बोली
"चलो अब मानस भैया को ढूंढते हैं".
सारे बच्चे उस कमरे से बाहर चले आए. मैंने भी अपनी पजामी ठीक की और मौका देख कर कमरे से बाहर आ गया और एक पेड़ के पीछे छुप गया.
अगली बार में मैं सीमा को देख नहीं पाया कि वह किधर छुपी है. वो अलमारी के पीछे नहीं थी. अतः मुझे भी किसी दूसरी जगह पर छुपना पड़ा. दूसरी बार का खेल समाप्त हो गया. तीसरे दौर में मैंने सीमा को फिर उसी कमरे की तरफ जाते देखा और मैं भी उसके पीछे हो लिया. मैंने बिना समय गवाएं फिर से सीमा को पीछे से पकड़ लिया. सीमा के सहयोग से पहले वाली स्थिति पुनः बन चुकी थी. लिंग पूर्ण तनाव में था सिर्फ उसे सीमा के सहलाने का इंतजार था. सीमा ने मेरा इंतजार खत्म करते हुए अपनी हथेली मेरे लिंग पर पर रख दी और प्यार से सहलाने लगी. मैं सातवें आसमान पर पहुंच चुका था. मैंने अपना हाथ उसके पेट पर से हटा कर उसके स्तनों पर रखने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ रोक लिया. शायद वह निर्णय नहीं कर पा रही थी पर उसने मेरे लिंग को सहलाना जारी रखा. मैंने सीमा को छेड़ते हुए कहा
" "राजा जी" अपनी "रानी" को खोज रहे है." मेरे इस संबोधन से वो हँस पड़ी.
सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा.
"यदि रानी की तलाश है तो आपको शादीशुदा महिलाओं के पास जाना पड़ेगा. यहां पर तो सिर्फ राजकुमारी है"
मैं उसकी बात समझ गया. मैंने उससे कहा..
"तुम चाहोगी तो राजकुमारी को रानी बना देते हैं"
"अभी राजकुमारी को रानी बनने में समय है"
"इस हिसाब से तो मेरा राजा भी अभी राजकुमार ही है" वह खिलखिला कर हंस पड़ी और अपनी हथेली से शिश्नाग्र पर दबाव बढ़ा दिया. मैंने फिर आग्रह किया किया कि राजकुमार राजकुमारी से मिल तो सकता है राजा रानी की तरह ना सही दोस्त की तरह ही सही. वह मेरा आशय समझ रही थी. उसने कहा..
"ठीक है.. पर अभी राजकुमारी घायल है. तीन-चार दिन बाद मुलाकात कराएंगे."
मैं स्खलित होने ही वाला था तभी रोहन के आने की आहट हुई. सीमा मुझे छोड़कर पहले की भांति अलग हो गयी. रोहन ने फिर से उसे पहचान लिया. वह रोहन को लेकर कमरे से बाहर आ गयी, ताकि हम दोनों एक साथ थे यह बच्चे न जान सकें और मुझे समय मिल सके अपने आप को व्यवस्थित करने का. सीमा की यह समझदारी मुझे बहुत प्रभावित कर गई थी.
हम सब बाहर आ गए थे. खेल खत्म हो गया था, सब लोग जाने लगे मैंने सीमा को रोकना चाहा पर वह हंसते-हंसते जाने लगी. मैं उसके पीछे भागा और बिलकुल पास पहुचने पर वो रुकी. मैंने उससे पूछ लिया
"राजकुमारी घायल कैसे हो गयी?"
उसने मुझे पलट कर देखा और हंस कर बोली..
"आप बुद्धू हैं...आराम से सोचियेगा" कह कर वो अपने घर भाग गई.

गुरुदक्षिणा की तैयारी
मैं मन मसोसकर रह गया पर आज सीमा के साथ गुजारे पलों ने मुझे गर्मियों की छुट्टियों के यादगार बनने की उम्मीदें बढ़ा दी.
मैं वापस अपने कमरे में आकर सीमा द्वारा दिए गए इन नए संबोधनों के बारे में सोचने लगा. मैं मन ही मन खुश भी हो रहा था कि सीमा मुझसे खुलकर बात कर रही थी. राजकुमारी के घायल होने की बात मैं अभी भी नहीं समझ पा रहा था. अचानक मुझे महिलाओं के रजस्वला होने की बात याद आई. मुझे अब पूरी बात समझ में आ गई. सीमा का यह अंदाज निराला था. मेरे लिए आज का दिन बहुत अच्छा था. धीरे-धीरे दिन गुजर गया अगले 2 दिन 3 दिनों तक सीमा रोज मेरे पास आती. मैं उसकी पढ़ाई में दिल से मदद करता और कभी कभी हम इधर उधर की बातें करते और बच्चों के साथ खेलते. कभी-कभी बातों ही बातों में राजकुमार और राजकुमारी का जिक्र हो जाता. मैंने भी अपने आपको नियंत्रित कर लिया था कि जब तक राजकुमारी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाती तब तक इंतजार करूंगा. मेरे राजकुमार का क्या था उसकी तो रोज रात में मालिश हो जाया करती थी और वह वीर्य दान कर सो जाया करता था. मैंने सीमा को अपने नोट्स एवं अपनी किताबें भी दी ताकि वह पढ़कर इसका लाभ ले सके. वह मेरे से बहुत प्रभावित थी. उसने मुझसे कहा.
"आपने मेरी पढ़ाई में इतनी मदद की है. आप मेरे गुरु है."
मैंने मुस्कुराकर पूछा
"गुरुदक्षिणा कब मिलेगी?" उसने सर झुका लिया और अपनी उंगलियों पर कुछ गिन कर बोली..
"परसों" इतना कह कर वो मुस्कुराते हुए सीढियों की तरफ बढ़ गई. परसों का दिन मेरे लिए क़यामत का दिन होने वाला था.
आपको यह जानकर हर्ष होगा की इस उपन्यास को लिखते समय सीमा मेरे साथ थी. उसने उस समय अपने मन में चल रही भावनाओं को मुझे बताया . आगे की कहानी को मैं उसकी उसकी यादों के अनुसार प्रस्तुत करता हूँ.

[मैं सीमा]
सोमवार का दिन था. मेरी राजकुमारी अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थी. पिछली दोपहर से ही मैं सामान्य हो चुकी थी. आज सुबह नहाने के पश्चात मैंने बहुत ध्यान से अपनी राजकुमारी का निरीक्षण किया. कहीं पर भी लालिमा नहीं थी. मैं खुश थी और आज होने वाले नए अनुभव के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार कर रही थी.
अभी दोपहर होने में दो-तीन घंटे का वक्त था. मेरी राजकुमारी के चारों तरफ हल्के हल्के बाल आ गए थे जैसे उसकी दाढ़ी मूछ आ गई हो. बाल बहुत कोमल थे. मैंने आज तक इन बालों को नहीं हटाया था. पर आज राजकुमारी, राजकुमार से मुलाकात करने वाली थी. एक बार के लिए मैंने सोचा कि इन्हें हटा दूँ पर संसाधनों की कमी की वजह से यह विचार त्याग दिया। मैंने मानस भैया के राजकुमार के लिए एक अलग ही गुरुदाक्षिणा सोच रखी थी.

राजकुमारों को काबू में रखने की कला मुझे बखूबी आती थी. दरअसल चंडीगढ़ में मेरा एक दोस्त सोमिल था. (आज के समय में आप उसे ब्याय फ्रेंड कह सकते हैं) वो मेरे स्कूल में ही पढ़ता था एवं मेरे पड़ोस में रहता था.. मैंने उसके राजकुमार की पिछले २ सालों में बहुत सेवा की थी. लेकिन मैंने उसे अपनी राजकुमारी से नहीं मिलवाया था. उसने मुझे हर जगह छुआ था पर हमेशा कपड़ो के साथ. मैंने उससे यही करार किया हुआ था. दरअसल वो इन मामलों में संयम खो बैठता था. मुझे हमेशा डर लगता था की कही वो मेरी राजकुमारी को देख कर उग्र न हो जाए और मेरा कौमार्य भंग कर दे. मेरी राजकुमारी पिछले दो वर्षों से अक्सर समय-समय पर लार टपकाती रहती थी और मुझे उस समय बहुत अच्छा भी लगता था. इस दौरान मैं तकिया या रजाई को अपने पैरों के बीच फंसा लेती और थोड़ा बहुत उछल कूद करने से मेरी राजकुमारी ख़ुशी के आसूं बहती और मैं आनंदित हो जाती.

मानस मानस भैया अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के थे. वो सामाजिक ताने बाने को समझते थे. पहले भी जब मैंने मानस भैया के राजकुमार को हाथ लगाया था तभी मैं जान गयी थी की वो उस समय तक हस्तमैथुन भी नहीं करते थे. उस दिन भी उनका सुपाडा ठीक से नहीं खुल पाया था. आज भी मेरे मन का कौतूहल वैसा ही था. अब मानस भैया का राजकुमार कैसा होगा इसकी मैं कल्पना नहीं कर पा रही थी.

मैं अच्छे से तैयार हुई. मैने रेड कलर की टॉप और ब्लैक कलर की एंकल लेंथ स्कर्ट पहनी. अलमारी से जाकर लाल रंग की पेंटी निकाली और मन ही मन मुस्कुराने लगी. मम्मी के कमरे में जाकर अपने बाल बनाएं परफ्यूम लगाया और सजधज कर तैयार हो गइ. अभी दोपहर में समय था . मैं अभी भी मानस भैया से मिलने के लिए उचित जगह की तलाश कर रही थी. मानव भैया का कमरा एक आदर्श जगह थी परंतु वह मेरी राजकुमारी के साक्षात दर्शन करते मैं इसके लिए तैयार नहीं थी. मैंने अभी तक सेक्स करने का मन नहीं बनाया था. मैं अपने कौमार्य को मैं हर हाल में सुरक्षित रखना चाहती थी. उनके राजकुमार को अपने हाथों में लेने के बाद मुझे यह महसूस हो गया था कि सारे राजकुमार एक जैसे नहीं होते और इस राजकुमार के लिए मुझे कुछ खास करना पडेगा.

चार पांच दिन पहले आलमारी के पीछे मानस भैया के राजकुमार से मुलाकात को याद करते समय मुझे नया विचार आया. और मैं उठकर मुस्कुराते हुए मानस भैया के घर की तरफ बढ़ चली . मैंने सबकी नजर से बचकर दालान में पड़ी अलमारी के पीछे वाली जगह को थोड़ा साफ किया. वहां पर एक पुराना ड्रम ( स्टूल की उचाई का) पड़ा हुआ था जिसे साफ कर मैंने अलमारी के पीछे रख दिया. मैं खुश होकर मुस्कुराते हुए मानस भैया के कमरे में गई मानस भैया मुझे बहुत अच्छे लगते थे मैं मन ही मन उन्हें बहुत प्यार करती थी पर इस समय मेरे ऊपर सिर्फ हवस हावी थी.

गुरुदक्षिणा
मैं मानस भैया के कमरे में पहुंची वो मुझे देखते ही बोले.. .
"सीमा मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था."
मैंने मजाक किया
"सच में मेरा या राजकुमारी का?" वो हँस पड़े.
"सच में आज तुम बहुत खूबसूरत लग रही हो."
मैं मुस्कुरा दी. मैंने यह बात नोटिस की थी इस बार मेरे गांव आने के बाद से मानस भैया मेरे ऊपर बहुत ध्यान देते थे. हम सब इधर-उधर की बातें करने लगे. तभी मेरा छोटा भाई साहिल जल्दी-जल्दी सीढ़ियां चढ़ता हुआ आया और बोला आप लोग नीचे चलिए सब लोग आपका इंतजार कर रहे हैं.
छुपन छुपाई का खेल शुरू हो रहा था. पहले दौर में छाया चोर बनी सभी बच्चे इधर उधर छुपने चले गए. मैं भी मानस से नजर बचाकर दालान की जगह सीढ़ी रूम में जाकर छुप गई . मैंने मानस को दालान की तरफ जाते देखा मुझे हंसी छूट गयी. वो अधीर हो रहे थे. धीरे-धीरे छाया ने सब को ढूंढ लिया. मानस मुझे अलमारी के पीछे न पा कर बगल वाले कमरे में छुप गए. छाया ने अंत में उन्हें भी ढूंढ लिया . अगले दौर के लिए सबका प्यारा रोहन चोर बना. रोहन बहुत छोटा था और सब को ढूंढने में ज्यादा समय लगाता था यही मानस भैया और मेरे लिए उपयुक्त समय था . बच्चों के इधर-उधर छुपने के बाद मैं अलमारी की तरफ गई मानस ने मुझे जाते हुए देख लिया था और वो धीरे से मेरे पीछे पीछे आ गए. मैं अलमारी के पीछे धड़कते ह्रदय के साथ खड़ी थी. उन्होंने पीछे से आकर बिना कुछ कहे मुझे पकड़ लिया. आज उनके दोनों हाथ मेरे पेट पर ही थे मेरा मुंह ढकने की कोई आवश्यकता नहीं थी. वह भी जान रहे थे कि मैं स्वेक्छा से यहां आई हूं. यहाँ पर्याप्त अँधेरा था.
वासना अँधेरे में जवान होती है.
वह मेरी पीठ और गले को चूमने लगे मैं भी भाव विभोर हो गई थी. धीरे-धीरे उनके हाँथ एक दूसरे से दूर होने लगे. एक हाथ ऊपर की तरफ तो दूसरा नीचे की तरफ बढ़ने लगा. उनका बाया हाथ मेरे दाहिने स्तन पर आ चुका था और दूसरा मेरी राजकुमारी की तलाश कर रहा था. उनके उतावलेपन को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे यह उनके लिए भी पहली बार था. उनका राजकुमार अब पूरी तरह तन चुका था और मेरी कमर में गड रहा था. उन्होंने पिछली बार की तरह अपनी कमर पीछे की. मैं समझ रही थी कि वह अपने राजकुमार को आजाद कर रहे हैं. ठीक वैसा ही हुआ और उनका राजकुमार मेरे नितम्बों में अपने लिए उपयुक्त जगह ढूंढने लगा. मानस भैया ने अपने घुटने मोड़े. पर इस बार राजकुमार का मेरी जांघों के बीच आ पाना इतना आसान नहीं था. इस बार मैंने स्कर्ट पहनी हुई थी. वह परेशान थे मेरी स्कर्ट को ऊपर कर पाने की हिम्मत नहीं थी. मैंने उनकी मदद करने के लिए अपने ही हाथों से अपने स्कर्ट को ऊपर किया.
मानस में अपनी कमर को थोड़ा और नीचे किया अब उनका राजकुमार मेरी नंगी जांघों के स्पर्श से उछलने लगा. उसकी धड़कन मुझे अपने जांघो पर महसूस हो रही थी. मानस भैया ने मुझे अपनी तरफ और तेजी से चिपका लिया था. धीरे-धीरे उनका राजकुमार मेरी जांघों के बीच से होते हुए सामने की तरफ आ चुका था. मेरी राजकुमारी और उसके बीच लगभग थोड़ी जगह ही बची होगी .
उनका बायां हाथ मेरे दाहिने स्तन को धीरे-धीरे सहला रहा था तथा दाहिना हाथ राजकुमारी को तलाश करते हुए उनके उनके राजकुमार से टकरा गया जहां पर मेरी उंगलियां उसे पहले से ही सहला रही थी. मैंने उनकी उँगलियों को अपनी राजकुमारी के सिर पर रखा और उनकी उंगलियों से उसे धीरे धीरे सहलाया ताकि वह समझ सके कि उन्हें क्या करना है. वो अंदाज़ पर ही अपनी उंगलियों को मेरी राजकुमारी के उपर फिराने लगे. पैंटी पहने होने के कारण उन्हें राजकुमारी का एहसास नहीं हो पा रहा था. परन्तु मैं नंगे राजकुमार के सुपाडे को अपनी उँगलियों से सहला कर आनंदित हो रही थी. राजकुमार और राजकुमारी दोनों ही लगातार खुशी के आंसू बहा रहे थे. मेरी पेंटी अब गीली हो चुकी थी तथा जांघों के बीच का हिस्सा भी चिपचिपा और गीला हो गया था. राजकुमार को सहलाने से मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. मानस ने अपना हाथ बारी-बारी से दोनों स्तनों पर घूमना शुरू कर दिया था. मेरा मन हुआ कि उनका हाथ पकड़ कर अपनी टॉप के नीचे से अपने स्तनों पर रख दूं पर मेरी हिम्मत नहीं हुई. धीरे-धीरे उनके लिंग का तनाव चरम पर पहुंच रहा था और उनकी धड़कन बढ़ती जा रही थी. जैसे जैसे उनके लिंग में उत्तेजना बढ़ रही थी उसी तरह उनके हृदय की गति भी बढ़ रही थी. मेरे पीठ पर उनकी धड़कन का एहसास लगातार हो रहा था.
थोड़ी ही देर में मैंने उनकी उंगलियों को अपनी पेंटी के इलास्टिक को पकड़कर नीचे खींचते हुए पाया. मैं घबरा रही थी पर मैंने उन्हें इस बात का एहसास नहीं होने दिया. जैसे ही पैंटी मेरे नितंबों से नीचे आई मैंने उनका हाथ पकड़ लिया. उन्होंने बिना किसी जोर-जबर्दस्ती के पैंटी को वापस ऊपर कर दिया और वापस मेरी राजकुमारी को सहलाने लगे. मैं उनके इस व्यवहार से बहुत खुश थी. उपहार स्वरूप मैंने उनका बाया हाथ स्तनों पर से हटा कर अपने टॉप के अंदर कर दिया. इससे पहले कि वह मेरे नग्न स्तन छू पाते बाहर रोहन के आने की आहट हुई. मैं बहुत अस्त व्यस्त थी मैंने मानस को बोला आप जाइए मैं रुकती हूँ. उन्होंने अपने राजकुमार को अंडरवियर में व्यवस्थित किया और अपने कपड़े ठीक करते हुए रोहन की निगाह में आ गए. रोहन पकड़ लिया - पकड़ लिया करते हुए खुश हो गया. वह सब बच्चों को लेकर बाहर चले गए मैंने अपने आप को ठीक किया. आधी चढ़ी पैंटी के बारे में सोचने लगी. मेरे मन में मानस की शराफत नया उत्साह भर रही थी. मैंने हिम्मत करके अपनी पेंटी उतार दी और उसे वहीं स्टूल जैसे पुराने ड्रम पर रख दिया. अपने टॉप को नीचे और उसके सिलवटों को दूर करने के बाद मैं भी बाहर आ गई. पहली बार बिना पैंटी के सिर्फ स्कर्ट में मैं दालान के बाहर खड़ी थी मेरी राजकुमारी और जांघों के बीच का हिस्सा गीला हो चुका था. बाहर चलने वाली हल्की हल्की हवा वहां ठंडक का अहसास करा रही थी.
इस बार मेरा छोटा भाई साहिल चोर बना था. सारे बच्चे फिर अपनी अपनी जगह पर छिपने चले गए. और मैं भी वापस अलमारी के पीछे आ गई. मानस भी बिना देर किए वापस मेरे पास आ गए. आने के पश्चात उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरी टॉप के नीचे से मेरे स्तनों पर ले गए तथा दोनों स्तनों को पकड़ लिया.
उनके हाथों का नग्न स्पर्श पाकर स्तन और कड़े हो गए. स्तनों के निप्पल पत्थर की तरह हो गए थे. जब उनकी उंगलियों निप्पलों से टकराती मेरी राजकुमारी कांप उठती तथा शरीर में एक अजीब सी लहर दौड़ जाती. नग्न स्तनों की संवेदना से उनका लिंग वापस पूरे उफान पर आ चुका था और मेरी जांघों के बीच आने की कोशिश कर रहा था. उनके दोनों स्तनों पर व्यस्त थे. मैं नहीं चाहती थी कि वह अपना हाथ हटाए इसलिए मैंने खुद ही अपनी स्कर्ट ऊपर कर दी. अब उनका लिंग मेरी जांघों के बीच से सामने की तरफ आने लगा. पैंटी हट जाने की वजह से लिंग का रास्ता बिल्कुल आसान हो गया था वह मेरी योनि से सटते हुए आगे की तरफ आ गया था. उनके लिंग से निकल रहे द्रव्य ने मेरी जांघों के बीच के उस हिस्से को पूरी तरह गीला कर दिया था. राजकुमार राजकुमारी के बिल्कुल समीप पहुंच चुका था. अभी तक मानस को मेरी पैंटी हटाने का एहसास नहीं था पर लिंग के चारो ओर मिल रही चिकनाहट से वो उत्तेजित थे.
मानस अपना एक हाथ स्तनों से हटाकर राजकुमारी के समीप ला रहे थे. नाभि के नीचे आते आते मेरी धड़कनें तेज हो गई. जैसे ही उनकी उँगलियाँ ने आगे का सफर किया उन्हें कोई रूकावट नहीं मिली. पैंटी पहले ही हट चुकी थी. पैंटी के हटने का एह्साह होते ही मानस ने मेरे गाल पर चुम्बनों की बारिश कर दी तथा कान में धीरे से कहा " थैंक यू". मैंने भी अपनी उंगलियों से राजकुमार को सहलाकर उन्हें खुस किया. उनकी उंगलियां मेरी राजकुमारी के बिल्कुल समीप पहुंच चुकीं थी. धीरे-धीरे यह इंतजार खत्म हो गया उनकी उंगलियां मेरे दरार के बीच में पहुंच गयीं. उत्तेजना अपने चरम पर थी इस अद्भुत और नई चीज को उनकी उंगलियां महसूस करना चाह रहीं थीं.. जैसे ही वह दरार में थोड़ा नीचे गए उनकी तर्जनी मेरी राजकुमारी के मुह में चली गयी. मैंने उन्हें धीरे से कहा.
"अन्दर मत ले जाइएगा." वो समझ गए. मैं भी उनके लिंग को प्यार से सहलाने लगी. मुझे याद आया की मानस अभी तक अपने घुटने मोड़े हुए थे. मैंने "एक मिनट" कहकर अपने आप को उनसे अलग किया. तथा उनकी तरफ घूमी. उनका राजकुमार अब काफी बड़ा हो गया था. वह अँधेरे में भी आकर्षक लग रहा था. मैंने उन्हें स्टूल पर बैठने को कहा.
मानस स्टूल पर बैठ चुके थे. उन्होंने अपने राजकुमार को व्यवस्थित कर लिया था. मानस भैया ने अपनी पीठ दीवाल से लगा ली थी और वह आरामदायक स्थिति में आ गए थे उनकी कमर अब स्टूल पर थी. उनका नाभि प्रदेश बिल्कुल सपाट था. उनका राजकुमार उर्ध्व स्थिति में छत की तरफ देख रहा था. मैंने वापस अपनी पीठ मानस भैया की तरफ की तथा अपना एक पैर उठाकर उन्हें अपने दोनों पैरों के बीच ले लिया. अपने आप को संतुलित करते हुए मैंने अपनी कमर को नीचे करना शुरू किया. जैसे जैसे मैं नीचे आ रही थी मेरी धड़कन तेज हो रही थी. और नीचे आने पर राजकुमार ने मेरी राजकुमारी को छू लिया. राजकुमारी पूरी तरह प्रेम रस में डूबी हुई थी. राजकुमार भी अपने चेहरे पर प्रेम रस लपेटे हुए था. मैंने राजकुमार का मुखड़ा अपनी राजकुमारी के मुंह में जाने दिया. दोनों ने एक दूसरे का स्पर्श किया. मैंने महसूस किया की मानस भैया का हाथ मेरे नितंबों को सहला रहा है. इस उत्तेजना की घड़ी में भी मैं पूरी तरह सतर्क थी. मैं किसी भी स्थिति में अपना कौमार्य नहीं खोना चाहती थी .
कुछ ही देर में राजकुमारी के प्रेम रस में राजकुमार पूरी तरह डूब चुका था. मेरी जांघों पर भी चिपचिपपा सा महसूस हो रहा था. मेरे पैर अब दर्द करने लगे थे. मैंने राजकुमार को थोड़ा आगे किया और मानस की नाभि और लिंग के बीच के भाग में बैठ गई. मैंने पीछे मुड़ कर मानस की तरफ देखा वह आनंद में डूबे हुए थे. उन्होंने अपने दोनों पैर आपस में सटा लिए थे ताकि मुझे अपने पैर ज्यादा न फैलाने पड़े. उनके हाथ वापस मेरे स्तनों तक आ चुके थे. मेरी उंगलियां उनके राजकुमार को छू रही थी. मैंने अपनी हथेली और योनि के बीच में एक रास्ता जैसा बना दिया था. उनका राजकुमार इसी पतली गली में उछल कूद कर रहा था. मैं इस गली की चौड़ाई कम ज्यादा करती और वह खुद उछलने लगता. बीच-बीच में मैं उसे राजकुमारी के पास भी ले जाती तथा दोनों की मुलाकात कराती. मिलन के समय राजकुमार का उछलना तेजी से बढ़ जाता. (जिन्दा मछली पकड़ते समय मुझे कभी कभी इस समय की याद आती है.)
मुझसे और बर्दाश्त नहीं हो रहा था मैंने राजकुमार को अपनी राजकुमारी के मुख पर रगड़ना शुरु कर दिया. अपनी हथेली से राजकुमार को सहारा देकर अपनी राजकुमारी को आगे पीछे करने लगी. मेरी कमर में हरकत देख कर मानस सतर्क हो गए थे. राजकुमार मेरे हाथों से भी ज्यादा मुलायम था उसके स्पर्श से राजकुमारी बहुत प्रफुल्लित थी और थोड़ी देर में उसका कंपन भी अतिरेक तक पहुंच गया. मेरे पैर तनने लगे थे. मैंने मानस भैया के पैरों में भी तनाव देखा. उनकी पकड़ मेरे स्तनों पर और ज्यादा हो गई थी. कुछ ही पलों में राजकुमार में लावा उड़ेल दिया. राजकुमारी से भी खुशी के आंसू झर झर बह रहे थे. मेरे छोटे हाथ इतने सारे काम रस को समेट पाने में असमर्थ थे. मानस का भी हाथ भी कुरुक्षेत्र में आ गया था उनका हाथ भी प्रेम रस से सराबोर हो चुका था. उन्होंने राजकुमारी के चेहरे पर उंगलियां फेरी पर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया. राजकुमारी बहुत संवेदनशील हो गई थी. आज उसके साथ कुछ अद्भुत हुआ था. वह अभी तक फड़क रही थी.
मैं धीरे से उठी. मानस भी उठ गए. मैंने स्टूल पर पड़ी अपनी पेंटी को उठाया. मैंने उससे मानस के राजकुमार को पोछा इसके बाद मैंने अपनी राजकुमारी तथा जांघों को साफ किया. पेंटी लगभग आधी गीली हो चुकी थी. मेरे हाथ पोछे के बाद मानस ने भी पैंटी मांगी. हाथ पोछने के बाद वह पेंटी को अपनी जेब में रखने लगे. मैंने उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो वह बोले.
" मैं इसे रख लेता हूं" मैंने पूछा ..
"क्यों " तो उन्होंने कहा
"गुरु दक्षिणा"
यह सुनकर मैं निरुत्तर हो गयी तथा बाहर आ गई. साहिल मुझे देख कर खुस हो गया मैंने खेल समाप्ति की घोषणा की तथा अपने घर आ गई.
ग्रामीण परिवेश में भी काम वासना उसी तरह फलती फूलती है जिस तरह शहरों और विदेशों में. अंतर सिर्फ इतना होता है की गांवों में सेक्स में इतना नंगापन नहीं होता.

राजकुमारी दर्शन
अपने रूम में पहुंचने के बाद मैं बिस्तर पर लेट गया. आज जो हुआ था उसकी कल्पना भी मुझे नहीं थी. लड़कियों का वह अंग इतना कोमल होता है मैं नहीं जानता था. उसकी राजकुमारी अत्यंत कोमल तथा रसभरी थी तथा दोनों स्तन भी अत्यंत कोमल थे. मैंने अपनी हाथ की उंगलियों को चुम्मा जो अभी-अभी राजकुमारी से मिलकर आयीं थीं. उंगलियों पर राजकुमारी के खुशी के आंसू तथा मेरा लावा दोनों मिले हुए थे. ब्लू फिल्मों में मैंने देखा था की नायिका वीर्य को अपने मुंह में ले लेती है तथा नायक नायिका की योनि अपनी जिह्वा से छूता है. मेरे लिए यह एक घृणास्पद क्रिया थी परंतु आज सीमा की योनि छूने के बाद उससे एक अजीब किस्म के आत्मीयता हो रही थी ना चाहते हुए भी मैंने उसका स्वाद को जानने की कोशिश की. मेरी उंगलियां गीली होकर वापस चिपचिपी हो गयीं पर स्वाद के बारे में मैं कोई राय नहीं बना पाया.
अगली सुबह सीमा नहीं आई. मैं समझ गया था कि वह कल की घटना के बाद मुझसे मिलने में कुछ समय अंतराल चाह रही थी. सीमा ने कल जो किया था वह उस उम्र की लड़की के लिए बहुत बड़ी बात थी. मुझे इस बात का पूरा एहसास था कि मेरे राजकुमार के अलावा उसने और भी राजकुमारों की सेवा की थी परंतु उसका कौमार्य सुरक्षित था ऐसा मुझे प्रतीत होता था. उसका पढ़ाई में संजीदा होना भी इस बात का परिचायक था. 2 दिनों बाद सीमा फिर आई अपनी पढ़ाई के संबंध में और कुछ बातें की. मैंने पूरी तन्मयता से उस विषय को समझाया वह खुश हो गयी. उसके संतुष्ट होने के बाद मैंने उसे छेड़ा "राजकुमारी कुशल मंगल से तो है ना?" वह हंसने लगी और बोली.
"आपके राजकुमार ने उसे इतनी चुम्मियाँ ली है कि वह बार-बार खुशी के आंसू बहाती रहती है" मैं उसकी भाषा समझने लगा था. आज वह फिर से स्कर्ट और टॉप पहन कर आई थी छोटा रोहन सीढ़ियों से आकर सीमा से बोला..
"दीदी आप 2 दिनों से खेलने नहीं आयीं. आज चलिए ना. मानस भैया आप भी आइए"
" चलिए आइए बच्चों का मन रख लेते हैं" हम सब नीचे आ गए. सीमा को फिर अलमारी की तरफ छुपते देख मन प्रफुल्लित हो उठा था आज भी मैं उसी उत्साह के साथ सीमा के पीछे हो लिया. अब हम दोनों इस खेल के खिलाड़ी हो चुके थे. हमने 2 - 3 बार खेल के दौरान अपनी काम पिपासा बुझाई और वापस आ गए. सीमा ने इस बार हमारे प्रेम रस को अपनी स्कर्ट में ही पोछ लिया आज वह पैंटी नहीं पहने हुयी थी.
अगले कुछ दिनों तक सीमा लगातार मेरे पास आती रही और अपनी पढ़ाई के बारे में मुझसे कई चीजें समझती रही. कई बार वह पजामी पहन कर आती थी तो कई बार स्कर्ट पहनकर. मैंने नोटिस किया कि जब वह पजामी पहन कर आती थी तो छुपन छुपाई खेल से बचती थी और जब स्कर्ट पहन कर आती थी तो खुशी-खुशी छुपन छुपाई खेलने को तैयार हो जाती. मेरे लिए या इशारा बन चुका था कि यदि मैंने उसे स्कर्ट में आते हुए देखा तो मेरे राजकुमार को आज सुख मिलना पक्का लगता था. कुछ ही दिनों में हमारा यह सुख ख़त्म होने वाला था.
सीमा के दिल्ली जाने का वक्त करीब आ रहा था. सीमा ने बताया कि 3 दिनों के बाद वह वापस जा रही है. मैं दुखी हो गया मैंने कहा ..
"सीमा तीन-चार दिन और रुक जाओ मैं भी तुम्हारे साथ वापस चलूंगा"..
"उसने कहा मानस भैया पापा टिकट करा चुके हैं" उसने मुझे खुश करने के लिए मेरे साथ बिताए पलों को याद किया और कहा ..
"आपके राजकुमार ने तो राजकुमारी से मुलाकात कर ली"
मैंने उसे याद दिलाया कि उसने मुझे राजकुमारी को दिखाने का वचन 2 वर्ष पूर्व दिया था. वह पशोपेश में पड़ गयी. हमारे पास बहुत कम वक्त बचा था सीमा ने कहा अच्छा मैं कोशिश करूंगी . 2 दिन बाद अचानक सुबह-सुबह माया जी की तबीयत खराब हो गई उनके पेट में दर्द हो रहा था. पापा उनको शहर में डॉक्टर से दिखाने ले गए छाया भी साथ में जाने की जिद करने लगी और वह भी गाड़ी में बैठ कर चली गयी. पापा ने कहा.
" बेटा कुछ बना कर खा लेना हम लोग दोपहर तक लौट आएंगे" जाते समय मंजुला चाची भी वहां थीं. वो पापा की बात सुनकर यह समझ गयीं थीं कि मैंने नाश्ता नहीं किया है .
[मैं सीमा]
चाची ने कहा.
" मानस ने नाश्ता नहीं किया है. तुम जाकर मानस को नाश्ता दे आवो वह घर पर अकेला है" मैं यह सुनकर बहुत खुश हो गई और बोली.. "चाची मैं नहा कर जाती हूं उन्होंने कहा बेटा वह भूखा होगा मैंने कहा बस 5 मिनट लगेगा"
" ठीक है" मैं फटाफट बाथरूम में चली गयी. बाथरूम जाने के बाद मैंने यह निर्णय कर लिया कि आज अपनी राजकुमारी के दर्शन मानस भैया को करा ही दूंगी पता नहीं फिर कभी मौका मिले ना मिले. अपनी राजकुमारी की दाढ़ी मूछें मैं 2 दिन पहले ही साफ कर चुकी थी. मेरी राजकुमारी अब अत्यंत सुंदर और चमकदार लग रही थी. शीशे में मैं खुद को देखकर शरमा गयी. मैंने अपनी राजकुमारी को साबुन से धोया और नहाकर वापस बाहर आ गयी. मैं सीधा मम्मी के कमरे में गई अपनी पहले दिन वाली स्कर्ट और टॉप पहनी. मम्मी का वही परफ्यूम लगाया और चाची के पास आकर बोली..
"लाइए चाची दीजिए" चाची ने मानस भैया के लिए नाश्ता निकाल कर रखा था जिसे लेकर में धड़कते ह्रदय के साथ मानस भैया के पास पहुंच गयी. मानस भैया थोड़े दुखी थे क्योंकि माया जी और उनके पापा सभी लोग शहर गए हुए थे. मैं उनकी स्थिति समझ सकती थी. मैंने कहा.
"छोटी मोटी तकलीफ होगी. वह जल्दी ठीक हो जाएंगीं आप प्रेम से नाश्ता कर लीजिए." मैंने उन्हें अपने हाथों से एक रोटी खिलाई. मैं अभी अभी नहा कर आई थी वह मुझे एकटक देख रहे थे. नाश्ता करने के बाद मैंने उनसे कहा कि कल मैं चली जाऊंगी. वो मेरे जाने की बात से ज्यादा दुखी हो गए. मैंने उनके हांथों को अपने हाँथ में ले लिया और उनसे कहा.
"मेरी राजकुमारी आपको दर्शन देना चाहती है" उनका गम एक पल में गायब हो गया. तभी फ़ोन की घंटी बजी. मानस नीचे गए और वापस आकर बताया ..
"पापा का फोन था. माया जी ठीक हैं. ड्रिप लग रहा है एक दो घंटे में वापस घर आ जाएंगें." वो खुश हो गए थे. उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में खींच लिया. मैंने उनसे कहा ..
"आप आखें बंद कर लीजिए जब मैं कहूं तब खोलिएगा."
उन्होंने अपनी आखें बंद कर लीं. मैंने अपनी स्कर्ट उतार दी पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैंने अपना टॉप भी उतार दिया अब मैं उनके सामने पूर्ण नग्न खड़ी थी. मेरे मन में एक और शरारत सूची मैंने मानस भैया से कहा अपनी आंख बंद किए रहिए और अपने राजकुमार को भी आजाद कर दीजिए. उन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी पजामी को अलग कर दिया. मैंने उनसे कहा आप अपना कुर्ता भी हटा दीजिए.मेरे कहने पर अब वह पूरी तरह मेरे सामने नग्न खड़े थे. मैं उन्हें देख कर मन ही मन उत्तेजित हो रही थी. वो नग्न अवस्था में और भी सुन्दर लग रहे थे. मैं भी नग्न थी पर वह मुझे देख नहीं पा रहे थे. उन्होंने ईमानदारी से अपनी आंखें बंद की थी. मैं बिस्तर पर बैठी हुई थी. मैं खड़ी हुई और उनसे कहा आप अपनी आंखें खोल सकते हैं.
आंखें खोलने के पश्चात उन्होंने अपने जीवन में पहली बार किसी लड़की को नग्न देखा था. उनका राजकुमार तो इस परिस्थिति की कल्पना में पहले ही तन कर खड़ा हो चुका था. राजकुमार पहले से बड़ा हो चुका था यह मैंने पहले ही नोटिस कर लिया था. वह मुझे एकटक देखते रहे मैं शर्म से अपनी आंखें नीचे की हुई थी पर मेरी आंखें उनके राजकुमार पर ही टिकी थी. लगभग एक मिनट तक देखने के बाद वह धीरे धीरे मेरे पास आए और बोले "सीमा तुम बहुत ही खूबसूरत हो मैं तुम्हें जी भर कर देखना चाहता हूँ." मैंने फिर वही प्रश्न किया ..
"मैं या राजकुमारी?"
" दोनों" उन्होंने मुझे सहारा देकर बिस्तर पर लिटा दिया. उन्होंने मेरे पैरों को छुआ. धीरे-धीरे उनके हाथ मेरी जांघों तक आ गए. उन्होंने अपने गाल मेरी जांघों पर सटा दिए. उन्होंने मुझसे पूछा ..
" क्या लड़कियां इतनी कोमल होती है?" यह कहते हुए वह धीरे धीरे मेरे राजकुमारी के पास आ गये.
राजकुमारी को देखकर वह अपनी नजरें नहीं हटा पा रहे थे. वो बहुत देर तक उसे देखते रहे फिर मेरी अनुमति से उन्होंने उसे छुआ. मैंने जानबूझकर अपनी जांघें अलग कर दी. वह आश्चर्य से मेरी राजकुमारी को देखते रहे राजकुमारी अपनी लार टपका रही थी. वह धीरे धीरे अपना ध्यान नाभि प्रदेश से होते हुए स्तनों की ओर तरफ ले आये. मेरे दोनों स्तन तने हुए थे. मेरे स्तनों को वह पहले भी छू चुके थे इसलिए उन्होंने मेरी इजाजत के बिना ही उन दोनों को छू लिया. कुछ देर उन्हें सहलाने के बाद उन्होंने मेरे दोनों निप्पलों को भी अपनी उंगलियों में लेकर महसूस किया. वो अपने हाथ मेरी गर्दन से होते हुए मेरे चेहरे पर ले गए और दोनों हाथों में मेरा चेहरा लेकर मुझे माथे पर चूम लिया और बोले..
" सीमा तुम मेरे जीवन की पहली लड़की हो जिसे मैंने नग्न देखा है मैं तुम्हारा ऋणी हूँ. काश तुम मेरी जीवनसंगिनी बन पाती." उन्होंने मुझे होठों पर चुम्बन नहीं दिया. वह वापस मेरी राजकुमारी की तरफ गए तथा अपनी हथेलियों के दबाव से मेरी जाँघों को अलग कर रहे थे. मैं समझ गई थी वह क्या चाहते है मैंने उनका सहयोग करने के लिए अपने दोनों हाथों से अपने पैरों को पकड़ लिया और जितना संभव हो सकता था उसे फैला दिया. . राजकुमारी की दरार अब बढ़ गई थी वो पूरी तरह रस में डूबी हुई थी ठीक उसी तरह जिस तरह
किसी ताजे फल में चीरा लगाने के बाद उस का रस छलक कर बाहर आ जाता है.

मानस ने मेरी तरफ देखा और अपनी उंगलियों को मेरी राजकुमारी के पास ले आये और मेरी इजाजत के लिए धीमी आवाज में पूछा.
"क्या मैं इसे छू सकता हूं?" मैंने सिर हिला कर इसकी सहमति दे दी. वह अपनी उंगलियों से राजकुमारी का मुआयना करने लगे. पहले उन्होंने अपनी तर्जनी से मेरी दरार को ऊपर से नीचे तक छुआ. ऐसा लग रहा था जैसे वो उसके रस को बराबर से बांट देना चाहते हैं. उनकी तर्जनी पूरी तरह गीली हो गई थी. अगली बार उन्होंने तर्जनी का दबाव बढ़ाया तो दरार अपने आप फैल गई उन्हें अंदर और भी गीलापन महसूस हुआ. हमारी उंगलियों के 3 भाग होते हैं उन्होंने उन्होंने अपनी तर्जनी का पहला भाग मेरी दरार के अंदर डाल दिया था. अब उनकी तर्जनी नीचे से ऊपर की तरफ आ रही थी. जैसे ही उनकी उंगली मेरी भग्नासा से टकराई मैं तड़प उठी. मेरे पैरों की हरकत से उन्हें मेरे इस भाग की अहमियत का अंदाजा हुआ. उन्होंने अपनी उंगली पीछे कर ली. भग्नासा से नीचे आने के बाद तर्जनी राजकुमारी के मुख में प्रविष्ट होने लगी. वह आगे बढ़ना चाह रहे थे उन्होंने अपनी तर्जनी का दबाव बढ़ाया. यदि मैं उन्हें न रुकती तो वह अपनी अज्ञानता में अपनी तर्जनी से ही मेरा कौमार्य भेदन कर देते. वह अपनी इन क्रियाओं के दौरान बीच-बीच में मेरी तरफ देखते थे शायद मेरी रजामंदी के लिए.
मैंने उन्हें सिर हिला कर मना कर दिया था उन्होंने मेरी दरार के दोनों होंठों को अब अपने दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी तर्जनी से और फैलाने की कोशिश की ताकि वह अनजानी गुफा के रहस्य से परिचित हो सकें. दरार को फैलाते ही अंदर गुलाबी गुफा दिखाई दे गई.
गुफा के शीर्ष पर स्थित भग्नासा को भी उन्होंने बहुत ध्यान से देखा. उनका अंगूठा गुफा में प्रवेश करने को आतुर हो रहा था. मैंने इशारे से उन्हें रोक दिया. उन्होंने अपने हाथों के सहारे मुझे करवट लेटने को कहा. फिर धीरे-धीरे मुझे पेट के बल लिटा दिया. कभी कभी मुझे ऐसा एहसास हो रहा था जैसे कोई डॉक्टर मेरा मुआयना कर रहा हो. लड़कियों के शरीर में कोमलता हर जगह होती है. मेरे नितंब देखकर बिना कहे उन्होंने अपने गाल उससे सटा दिए. उन्होंने अपने दोनों हाथों से नितंबों को नापा तथा उन को अलग कर अलग करके देखने की कोशिश. मेरे दूसरे द्वार को देखते ही उन्होंने अपेक्षाकृत तेज आवाज में बोला.
"दासी भी राजकुमारी जितनी ही खूबसूरत है" उन्होंने उसे छुआ नहीं और मेरी पीठ से सहलाते और गर्दन पर चुंबन करते हुए बालों के पास आ गए और मेरे कान में धीरे से कहा..

"सीमा मैं राजकुमारी को एक अभूतपूर्व उपहार देना चाहता हूं" मैंने कुछ नहीं बोला बस सहमति में सर हिला दिया. मानस भैया पर मुझे पूरा विश्वास था.
इस वक्त मैं भी वासना में पूरी तरह घिरी हुई थी. स्वीकृति पाकर वह मेरी पीठ सहलाते हुए नितंबों तक आ गए और मेरी कमर को पकड़ कर मुझे एक बार फिर पीठ के बल लिटा दिया. उन्होंने मुझे आंखे बाद करने के लिये कहा और अगले दो मिनट तक आंखें खोलने के लिए मना किया. मै उनके चमत्कारी उपहार की प्रतीक्षा करने लगी.
अचानक मेरी राजकुमारी की दरार में में किसी मोटी पर चिपचिपी चीज के रेंगनें का एहसास हुआ. वह दरारों के बीच से होते हुए मेरी भग्नासा तक गयी और वापस लौट आयी. यह बड़ा ही उत्तेजक एहसास था. एक दो बार इस यही क्रिया को दोहराने की बाद उस रहस्यमई चीजें ने गुफा के द्वार पर दस्तक दी और प्रवेश करने की कोशिश की. यह इतनी मुलायम थी कि मेरा कि मेरा कौमार्य भेदन इसके बस का नहीं था. मैं निश्चिंत थी. उसने मेरी गुफा में मैं प्रवेश पाने की भरसक कोशिश की तथा कुछ देर प्रयास करने के पश्चात मेरी भग्नासा पर थिरकने लगी. मेरी राजकुमारी के लिए यह बिल्कुल नई चीज थी. इस स्पर्श से राजकुमारी के अंदर धड़कन बढ़ गई थी. मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था. मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका साथ देने के लिए उसके साथी भी आ गए हैं. मेरी राजकुमारी पर तीन तरफ से वार हो रहा था. वह रहस्यमई चीज कभी मेरी दरारों को फैलाती कभी भग्नाशा पर थिरकती. मैं उत्तेजना के चरम पर थी मेरी राजकुमारी स्खलित होने लगी. मैं अपने पैरों को अपने सीने की तरफ तेजी से खींचे हुए थी. उत्तेजना के अंतिम पड़ाव पर मैं अपने पैरों को छोड़कर अपने हाथ अपनी राजकुमारी तक ले जा रही थी ताकि उसकी मदद कर सकूं. . मेरे हाथ वहां तक मेरे हाथ वहां तक पहुंचते, इससे पहले वह मानस भैया के बालों से टकरा गए. मैं सारी बात समझ चुकी थी.

मैंने उनका सिर अपनी जांघों के बीच से हटाने की. उन्होंने अंत में मेरी राजकुमारी को दोनों होठों से चुंबन लिया एवं एवं अपनी जीभ को दरारों के बीच से ले जाते हुए मेरी भग्नासा को छू लिया. मैं एक फिर उछल पड़ी. उत्तेजना के बाद भग्नासा बहुत संवेदनशील हो जाती है. मैंने अपनी जाँघों को वापस सटा लिया और धीरे से उठ कर बैठ गयी.
मानस की आखों में वासना थी. उनके होठों पर मेरा प्रेम रस दिखाई पड़ रहा था. वह कमरे से सटे बाथरूम में चले गए मैं बिस्तर पर अभी भी नग्न बैठी थी. अब मेरी राजकुमारी की धड़कन शांत हो चुकी थी.
मैंने आज तक सोमिल ( मेरा चंडीगढ़ वाला दोस्त) के साथ इतने खुले मन से सेक्स नहीं किया था. हमने आज तक एक दूसरे को नग्न नहीं देखा था मैंने उसका हस्तमैथुन कई तरीकों से किया था तथा इसमें महारत हासिल कर चुकी थी. वह बार-बार अपना वीर्य मेरे शरीर पर गिराने को उत्सुक रहता पर मैं हमेशा उसे अपनी रुमाल या उसकी रुमाल में गिरा देती थी. कभी कभार लापरवाही बरतने पर उसने अपना वीर्य मेरे कपड़ों पर गिरा दिया था. दरअसल सोमिल में धीरज नहीं था. वह सेक्स को बहुत जल्दी जी लेना चाहता था. उसने मुझे नग्न करने के लिए कई प्रकार के प्रलोभन दिए थे पर मैं हमेशा टाल जाती थी. वह मुझसे बहुत प्यार करता था और मुझे सर आंखों पर बिठाये रखता था. उसने आज तक मेरी कोई बात नहीं टाली. मैं अपनी सोच में डूबी हुयी थी तभी बाथरूम का दरवाजा खुला और मानस भैया बाहर आ गये.
उनके लिंग का तनाव कुछ कम हो गया था वह चेहरा धोकर वापस आए थे. वापस आकर वह वापस कुर्सी पर बैठ गए मुझे अभी तक नग्न देखकर उनकी उम्मीदें जाग उठी थी. मैंने अपने कपड़े क्यों नहीं पहने थे शायद वो यही सोच रहे थे. मैं धीरे से उठ कर उनके पास गई. पास पहुंच कर मैंने बिना उनसे पूछे उनके राजकुमार को अपने हाथों में ले लिया. राजकुमार तुरंत अपनी तनी हुई अवस्था में आ गया. मैंने देखा कि राजकुमार 2 सालों में पर्याप्त बड़ा हो गया था. सुनील के जितना तो नहीं पर उससे थोड़ा ही कम था. यह राजकुमार बहुत ही कोमल था. मैंने उसे प्यार से आगे पीछे करना शुरू किया. मैं स्टूल लेकर उनके दोनों पैरों के बीच बैठ गई और अपने हाथों से राजकुमार को खिलाने लगी मैंने अपनी सारी कार्यकुशलता और अनुभव जो सोमिल ने मुझे सिखाया था उसका प्रयोग करने लगी. हर बार नए अंदाज से मानस भैया खुश हो जाते तथा स्खलित होने के लिए तैयार हो जाते . फिर मैं उनका तनाव कम करती.
इस प्रक्रिया में राजकुमार के दोनों अन्डकोशों के वीर्य उत्पादन की गति बढ़ती जा रही थी. कुछ वीर्य तो राजकुमार के मुंह से लार की तरह टपक रहा था यही राजकुमार को सहलाने में मेरी मदद कर रहा था. जरूरत पड़ने पर मैं अपनी राजकुमारी के प्रेम रस का उपयोग भी कर ले रही थी. मानस भैया अपने हाथ कभी मेरे पीठ पर रखते कभी स्तनों पर. राजकुमार का उछलना बढ़ चुका था मानव भैया का चेहरा लाल हो चुका था और वह अपनी गर्दन को इधर-उधर कर रहे थे तथा कमर को ऊंचा कर राजकुमार को मेरी तरफ लाने का प्रयास कर रहे थे. मैं समझ गयी मैंने भी उन्हें ज्यादा परेशान ना करते हुए राजकुमार के शिश्नाग्र के नीचे वाले भाग पर अपनी रगड़ बढ़ा थी.
ज्वालामुखी का विस्फोट हो गया वीर्य की पहली धार मेरे गालों पर पड़ी. इस अप्रत्याशित विस्फोट से लिंग पर मेरी पकड़ ढीली हुई. उसके मुख पर जब तक मैं अपना हाथ लगाती तब तक वह वीर्य वर्षा प्रारंभ कर चुका था मैंने तुरंत ही अपनी हथेली राजकुमार के मुख पर रख दी अब वीर्य मेरी हथेलियों से टकराकर वापस राजकुमार पर ही गिर रहा था ऐसा लग रहा था जैसे उसका दुग्ध स्नान हो रहा हो. मानस भैया मेरे एक स्तन को तेजी से दबाए हुए थे तथा मेरे कंधे पर उनका हाथ कसा हुआ था. लिंग से हो रहे वीर्य प्रवाह के रुकने के पश्चात मैंने अपना हाथ लिंग पर से हटा लिया.
मानस भैया के चेहरे पर संतुष्टि थी. उनकी आंखें बंद थी मेरे हाथ हटाने के बाद उन्होंने आंखें खोलीं और मुस्कुराते हुए मुझे देखा उनका वीर्य मेरे गाल गर्दन तथा स्तनों पर गिरा हुआ था. मैं उसे पोछने के लिए किसी उचित वस्त्र की तलाश में इधर उधर देख रही थी तभी मानस भैया ने हाथ पकड़ कर मुझे अपनी जांघ पर बैठा लिया. उन्होंने अपने हाथों से मेरे शरीर पर गिरे हुए वीर्य को पोछा और स्तनों पर मलने लगे. मुझे थोड़ी असमंजस हो रही थी. मेरे गाल पर गिरा हुआ वीर्य मेरे होठों तक आ चुका था मानस भैया की नजर पड़ते ही तुरंत उन्होंने अपने हाथों से पोछा पर तब तक वीर्य मेरे होठों के रास्ते अंदर प्रवेश कर चुका था. वीर्य का अजीब सा स्वाद मेरे चेहरे घृणा का भाव उत्पन्न करता इससे पहले ही उनके होंठ मेरे होंठों पर आकर चिपक गए. जैसे अपने वीर्य की इस गुस्ताखी पर वह उसे सजा देना चाह रहे हैं और उसे मेरे मुख में प्रवेश करने से पहले ही रोक लेना चाहते हैं. मैं इस अप्रत्याशित कदम से हतप्रभ थी. इतने दिनों में कभी भी होठों पर चुंबन की स्थिति नहीं आई थी. मानस भैया मेरे होंठ चूस रहे थे मैं खुद को रोक नहीं पाई और इसमें सहयोग करने लगी.
राजकुमारी में एक अजीब सी हलचल हुई राजकुमार का तनाव भी मुझे महसूस होने लगा था. कुछ ही पलों में मैंने अपने आपको उनसे दूर किया. मेरी नजरें अभी भी झुकी हुई थी. मैंने अपने वस्त्रों की तरफ देखा जो उपेक्षित से पड़े हुए थे. शायद इस रासलीला में उनकी अहमियत नहीं रह गई थी.
मैं अपने वस्त्र लेकर बाथरूम में चली गई. वापस आकर मैंने देखा मानस भैया ने भी अपने कपड़े पहन लिए थे. अभी मैं बात कर पाने की स्थिति में नहीं थी. अतः मैंने नाश्ते की थाली उठाई बिना कुछ बोले अपने घर की तरफ आ गई . मानस भैया ने भी कुछ नहीं बोला पर मुझे छोड़ने सीढ़ियों तक आए. अंततः आज उन्होंने राजकुमारी के दर्शन उसके प्रेम रस एवं स्पर्श का पूर्ण आनंद लिया था.
युवाओं का शांत और सौम्य व्यवहार चंचल युवतियों की उत्तेजना जगाने में मददगार होता है. वो जब अपने साथी पर पूर्ण विश्वास कर लेतीं हैं तो नग्नता का उतना ही आनंद लेतीं है जितना कि उनके साथी युवा .

मंजुला चाची ने मुझे देखते ही पूछा
"बेटा कितनी देर लगा दी" मुझे लगा मेरी चोरी पकड़ी गई. मैंने तुरंत अपने कपड़े ठीक करते हुए कहा.
"चाची वह भैया से कुछ पढ़ाई की बातें होने लगी" मेरी यह दलील उन्हें पसंद ना आयी पर मानस भैया पे शक करने का कोई कारण नहीं था. मैं अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गई . आज की घटना से मेरे हृदय में मानस भैया के लिए प्रेम उत्पन्न हो गया था. मेरे मन में सोमिल और मानस को लेकर पशोपेश की स्थिति हो गई थी. मुझे यह भी नहीं पता था कि इसके बाद मानस भैया से अगले साल ही मुलाकात होगी कि नही .
मानस से 1 महीने में हुई अंतरंग मुलाकातों मैं उनका कामुक परंतु सहज व्यवहार मेरे दिल को प्रभावित कर गया था.
प्रेम में बिताए गए कुछ पल आपके दिल पर एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं. कामुकता से जन्म लिए इस प्यार का अपना महत्व था.

[मैं मानस]
सीमा को छोड़कर आने के बाद मेरा ध्यान सिर्फ होंठों के चुम्बन पर केंद्रित हो गया था. होठों के चुम्बनों के दौरान सीमा ने मेरा बराबरी से साथ दिया था. मेरे मन में उसके प्रति प्यार पनप रहा था. 1 महीने में उसने मेरी काम पिपासा को एक अलग ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया था. पिछले 1 महीने में वह कई बार मेरा वीर्य प्रवाह कर चुकी थी. क्या उसकी भी कामुकता मेरे ही जितनी थी प्रबल थी? परंतु सीमा को यह सब कैसे पता था? यह मेरे लिए प्रश्न चिन्ह था.
मुझे ऐसा प्रतीत होता था कि वह किसी और के साथ भी यह सब करती है. परंतु राजकुमारी को छूने के दौरान उसकी प्रतिक्रिया अलग ही थी. इससे भ्रम होता था जैसे यह सब उसके लिए पहली बार हुआ था. . उसका कौमार्य सुरक्षित था यह बात अलग थी परंतु उसे अपनी प्रेमिका का स्थान दे पाना पाना कठिन था. लेकिन सीमा ने मेरे हृदय में अपना स्थान बना लिया था.
माया जी दोपहर के पश्चात डॉक्टर से मिलने के बाद घर वापस आ चुकी थी. उनकी तबीयत अब ठीक लग रही थी शाम तक सब कुछ सामान्य हो गया.
सीमा को वापस जाना था मैं बहुत दुखी था. अगले दिन मैं बाजार गया और उसके लिए कुछ गिफ्ट खरीदे. सीमा जाने से पहले मुझसे मिलने आई आज भी उसने स्कर्ट पहनी थी पर मुझे पता था आज हम दोनों को वह सुख नहीं मिलने वाला था. मैंने उसे अगले साल होने वाले एग्जाम के लिए शुभकामनाएं दीं और मुस्कुराते हुए राजकुमारी दर्शन के लिए उसका धन्यवाद क्या. उसनें मुस्कुराते हुए कहा..
" आपने तो दासी के भी दर्शन कर लिए थे" मैं भी मुस्कुरा पड़ा. मैंने उसे गिफ्ट वाला बैग पकड़ाया. इससे पहले कि वह वापस मुड़ती मैंने उसे अपने आलिंगन में ले लिया तथा उसके गालों को चुमते हुए होठों पर आ गया. होठों पर चुंबन लेने के पश्चात वह मुझसे अलग हुई आज कामुकता का कोई स्थान नहीं था. हमारी आंखें नाम थीं. मैं सीमा के साथ नीचे आ गया. सब सीमा का ही इंतजार कर रहे थे. वह अपनी जीप में पीछे बैठी और जीप धूल उड़ आती हुई नजरों से ओझल हो गई. मेरी सीमा भी इसी धूल में खो गई.. मै रुवांसा हो कर अपने कमरे में वापस आ गया

 
छाया भाग 2
सीमा की यादें
एक-दो दिन उदास रहने के बाद मैं धीरे-धीरे सामान्य हो गया मेरे वापस दिल्ली जाने का वक्त भी आ गया था. माया जी ने मेरे लिए कई सारे नाश्ते के सामान बनाए थे. छाया मेरे लिए अभी भी एक अपरिचित ही थी. इस बार में उसकी नजरें मुझसे सिर्फ दो बार मिली थी वह भी खेल के दौरान, वापस आते समय भी वह मुझे छोडने नहीं आयी आई. मैंने पापा के पैर छुए तथा माया जी को हाथ हिलाकर अभिवादन किया और दिल्ली के सफर पर रवाना हो गया. माया जी का पैर न छूना शायद पापा को अजीब लगा हो पर वह मेरी स्थिति समझते थे. माया जी मेरे पैर छूने का इंतजार नहीं था. इस एक महीने में उन्होंने मेरी काफी मदद की थी जैसे मेरे पसंद के पकवान बनाना तथा मेरे कपड़ों आदि का ख्याल रखना. दिल्ली पहुंच कर मैं अपने दोस्तों में मशगूल हो गया. मैं अपनी पढ़ाई पर वापस ध्यान देने लगा इस बार की छुट्टियां मेरे लिए यादगार छुट्टियां थी. मैं 19 वर्ष का हो चुका था और मुझे अपने युवा होने पर उचित इनाम भी मिल चुका था इसका सारा श्रेय सीमा को जाता था.
मेरा मन अब ब्लू फिल्मों से पूरी तरह हट चुका था. मशीनों की तरह एक दूसरे से संभोग करने वाले नायक और नायिका मुझे अब प्रभावित नहीं करते थे. नायक द्वारा नायिका का बेरहमी से योनि मर्दन अब मुझे हास्यास्पद लगता था. पर ब्लू फिल्मों से मुझे मुखमैथुन की शिक्षा मिली थी. मैंने इस इस विद्या का प्रयोग सीमा की राजकुमारी पर किया था और इसका परिणाम सुखद रहा था. उसे मेरी यह कला पसंद आई थी. इस बात की तस्दीक उसने अपने प्रत्युत्तर में कर दी थी.
सीमा के साथ बिताए पलों से मुझे लड़कियों के शर्म और हया का मूल्य समझ आ चुका था. लड़कियों की योनि इतनी कोमल होती है मैंने यह नहीं सोचा था. मेरी जीभ भी उसकी कोमलता से प्रभावित थी. सीमा के स्तनों का स्पर्श और उसकी कोमलता मुझे याद है परंतु उसका आकार अभी छोटा था. ब्लू फिल्मों की नायिकाओं की तरह उसके स्तन विकसित नहीं थे. मैं इस बात से लज्जित महसूस कर रहा हूं की मैंने सीमा की ब्लू फिल्म की नायिका के साथ तुलना की. सीमा की हाजिर जवाबी और कामुक परिस्थितियों में भी बिना साथी को दुखी किए अपने कौमार्य की रक्षा करने की कला अद्भुत थी.
मुझे दिल्ली आए 4 महीने बीत चुके थे इस दौरान ना तो मैंने कोई ब्लू फिल्म देखी नहीं ना कोई गंदे और कामुक साहित्य पढ़े. मैं अपनी पढ़ाई पर पूरी तरह ध्यान दे रहा था हां कभी-कभी सीमा को याद करके हस्तमैथुन कर लिया करता था. चंडीगढ़ यहां से बहुत दूर नहीं था पर सीमा से मिलने जाने की मेरी हिम्मत नहीं थी. वहां जाने का और उससे मिलने का रिस्क मैं नहीं ले सकता था. उस समय मोबाइल की उपलब्धता आम नहीं थी और सीमा से बात करने का कोई तरीका नहीं था. मुझे नहीं पता था कि सीमा मुझे कितना याद करती है पर मैं उसको अक्सर याद करता था सिर्फ हस्तमैथुन के समय ही नहीं अपितु उसकी बातें उसका राजकुमारी कहने का अंदाज यह हमेशा मेरे मन को गुदगुदाते रहते थे.

छायाचित्र "लम्हें"
सेमेस्टर एग्जाम खत्म होने के बाद मैं अपने दोस्तों के साथ "लम्हे" पिक्चर देखने गया. यह अनिल कपूर और श्रीदेवी द्वारा अभिनीत फिल्म थी. इसमें अनिल कपूर अपने से उम्र में काफी बड़ी युवती से प्यार करता है बाद में उसकी शादी उसी युवती की पुत्री से होती है,. फिल्म मुझे मेरे सभी दोस्तों को भी पसंद आई थी. परीक्षा खत्म होने के कारण मैं भी तनाव मुक्त था बिस्तर पर लेटते ही मुझे सिनेमा के दृश्य याद आने लगे. मैं श्रीदेवी जैसी मादक हीरोइन को अपनी कल्पना में नग्न करने लगा. साड़ी के पीछे श्रीदेवी के नितंबों की कल्पना करते करते अचानक मिले माया जी की याद आ गई. उनकी उम्र फिल्म की नायिका के करीब ही थी मैंने उससे ध्यान हटाने की कोशिश की. माना कि मेरे से उनसे कोई रिश्ता नहीं था फिर भी वह मेरे घर में रहती थी मुझे इस बात पर थोड़ी ग्लानि हुई और मैं श्रीदेवी को आगे नग्न नहीं कर पाया परंतु श्रीदेवी के उरोज और नितंब भुलने लायक नहीं थे. मैंने श्रीदेवी के दूसरे किरदार की ओर ध्यान लगाया जिसमें वह नायिका की बेटी बनी थी. वह मेरी उम्र के हिसाब से हस्तमैथुन के लिए उपयुक्त नायिका बन सकती थी. मैंने श्रीदेवी के वस्त्र उतारने शुरू किए और फिर माया जी का ध्यान वापस दिमाग में आ गया. दरअसल श्रीदेवी के नितंब और उरोज माया जी से हुबहू मिलते थे. मैंने हस्तमैथुन का विचार त्याग दिया और सो गया.

स्वप्नसुंदरी
एक बड़े से राजसी पलंग पर मैं पीठ के बल लेटा हुआ था पलंग पर सफेद रंग की मलमल की चादर पड़ी हुई थी. कमरे में कई सारी मोमबत्तियां जल रही थी कमरे में अद्भुत शांति थी. एक नव योजना जिसने सफेद रंग की लाल पाढ़ वाली साड़ी पहन रखी थी कमरे में प्रविष्ट हुई. उसके हाथ में एक बड़ा कटोरा था वह धीरे धीरे चलते हुए मेरे समीप आई. ज्यादा रोशनी ना होने की वजह से मैं उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था. उसके उरोज पूर्णतयः विकसित थे कटी प्रदेश के उभार दर्शनीय थे. ऐसा लग रहा था जैसे उसने सिर्फ एक वस्त्र ही पहना है. स्तन अंदर से झांक रहे थे. उसकी नाभि स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी. उसने साड़ी नाभि से लगभग चार अंगुल नीचे बांधी हुई थी. उसके बाल खुले हुए थे एवं सामने की तरफ लटके हुए थे उसका कटी प्रदेश मादक तथा जांघें सुडौल थी. धीरे धीरे वह मेरे समीप आकर बैठ गई. उसने कटोरा पलंग पर रख दिया उसके दोनों घुटने मेरे मेरी जांघों से सटे हुए थे वह मुझे वज्रासन में बैठी हुई दिखाई दे रही थी.
इस अवस्था में मैं उसके स्तनों का उभार पूरी तरह देख पा रहा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने सांची के स्तूप को सफेद पारदर्शी चादर से ढक दिया था. कमर का खुला हुआ हिस्सा आकर्षक लग रहा था. उसकी जांघें घुटना और पिंडलियों सभी दिखाई पड़ रहे थे कभी वह नग्न दिखाई पड़ती कभी उसकी साड़ी सामने आ जाती. उसने पैर में आलता लगाया हुआ था तथा पैरों में पाजेब पहनी हुई थी. वह साक्षात रति लग रही थी. मैं उसका चेहरा अभी तक नहीं देख पा रहा था. मैं स्वयं एक सफेद रंग की धोती पहने हुए लेटा हुआ था. कमर के ऊपर मेरे शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था. उसने कटोरी में से सुगंधित तेल निकालकर मेरे पैरों की उंगलियों में लगाना शुरू किया और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ बढ़ने लगी. मैं बार-बार उसे पहचानने की असफल कोशिश कर रहा था. उसके हाथ अब मेरे घुटनों तक आ चुके थे वह बढ़ती गई तथा मेरी जाँघों तक पहुंच गई. उसने मेरी धोती की गाँठ खोल दी तथा अपने दोनों हाथों से धोती को मेरी कमर के दोनों तरफ गिरा दिया.
मैं उसके सामने पूरी तरह नग्न पड़ा हुआ था. मेरा लिंग तनाव से भर चुका था. उस नव योजना के मादकता ने मेरे लिंग में अभूतपूर्व तनाव पैदा कर दिया था. उसके हाथ मेरी कमर को तेल से सराबोर करते हुए नाभि प्रदेश तक पहुंच गए उसने मेरे लिंग को उपेक्षित साथ छोड़ दिया था. धीरे-धीरे वह मेरे सीने तक आ गई सीने की मालिश करते समय उसने मेरे छोटे-छोटे निप्पलों को अपनी उंगलियों से दबाया मेरा लिंग अब और भी उत्तेजित हो चुका था. वह मेरे बायीं तरफ बैठी थी. उसने मेरे बाएं कंधे और बाएं हाथ मैं तेल लगाया. जब वह दाहिने हाथ में तेल लगाने के लिए आगे की तरफ झुकी तो उसके स्तन मेरे सीने के बिल्कुल समीप आ गए.
मैं अपना कौतूहल बर्दाश्त नहीं कर पाया तथा अपने बाएं हाथ से उसके स्तनों को छूने की कोशिश की. पर पता नहीं मेरे हाथ क्यों नहीं उठ रहे थे. जैसे लग रहा था वह जड़ हो गए हैं. मैं चाह कर भी वह वो कोमल स्तन नहीं छू नहीं पा रहा था, बड़ी विषम परिस्थिति बन गई थी. मैंने अपने दाहिने हाथ को भी उठाना चाहा पर असफल रहा. उसके हाथ वापस मेरे सीने पर आ चुके थे और वह धीरे-धीरे मेरे नाभि की तरफ बढ़ रही थी. उसने अपनी उंगलियों से मेरे नाभि के अंदर तेल लगाया उसने अपनी हथेलियों से मेरे नाभि प्रदेश को सहलाते हुए अपने हाथ मेरे अंडकोष तक ले आई. मेरी व्यग्रता अब बढ़ती जा रही थी.
मेरे हाथ पैर अपनी जगह से नहीं उठ रहे थे. सिर्फ लिंग के तनाव का एहसास मुझे हो रहा था. अचानक मैंने अपने लिंग पर उसका हाथ महसूस किया. जैसे वह लिंग को मेरी नाभि की तरफ व्यवस्थित कर रही हो. उसने मेरी पीठ और मेरे नितंबों को भी तेल से सराबोर कर दिया मेरा पूरा शरीर तेल से डूबा हुआ था. आश्चर्यजनक रूप से मुझे अपने पूरे शरीर पर उसके हाथों और उंगलियों का दबाव महसूस हो रहा था परंतु मैं अपना हाथ और पैर उठाने में सक्षम नहीं था.
उसने मुझे फिर से मुझे पीठ के बल लिटा दिया और हाथों में तेल लेकर मेरे लिंग के चारों तरफ मलने लगी. मेरा लिंग भी उसके हाथों की प्रतीक्षा कर रहा था. मैंने फिर से उसे छूने की कोशिश की पर असफल रहा. अंततः उसने मेरे लिंग को अपने कोमल हाथों में ले लिया तथा अपनी उंगलियों से उसकी चमड़ी को पीछे किया. जैसे वह लिंग के मुख को देखना चाहती हो.
उसकी उंगलियां तरह-तरह के करतब दिखा रही थी. मैंने उससे पूछने की कोशिश की आप कौन हैं परंतु मुझे कोई जवाब नहीं मिला. उत्तर में उसने मेरे लिंग को प्यार से सहला दिया. अब वह अपने हाथ तेजी से चला रही थी. मेरा लिंग लावा उगलने के लिए तैयार हो चुका था .अचानक मैंने देखा उसके स्तन से साड़ी हट चुकी है वह कमर के ऊपर पूरी तरह नग्न दिखाई दे रही थी. फिर मैंने उसे पुकारा "सीमा" मुझे उसके हंसने की आवाज सुनाई दी. एक पल के लिए मुझे लगा जैसे वह कोई अप्सरा थी. उसने अपने हाथों को तेजी से चलाते हुए कहां
"मानस भैया मैं आपके मन में हूं आप मुझे क्यों नहीं पहचान पा रहे हैं?" मेरी धड़कनें तेज हो गयीं और उसकी उंगलियों की चाल भी. मैंने कहा "माया जी" वह हंस पड़ी और मेरे शिश्नाग्र को कसकर दबा दिया मेरे लिंग से वीर्य की धार फूट पड़ी. मुझे अब चेहरा साफ साफ दिखाई दे रहा था. माया जीके चेहरे और स्तनों पर मेरे वीर्य के धार दिखाई पड़ रही थी वह मुस्कुराते हुए बिस्तर से उठने लगीं मैं भी उनके पीछे-पीछे उठने लगा.
जमीन पर मेरे पैर पड़ते ही मेरी निद्रा भंग हो गयी. मेरी आंखें खुल चुकी थी और मैं अपने आप को हॉस्टल के कमरे में अकेला अपनी पजामी को नीचे किए स्खलित हुए लिंग के साथ असहाय सा खड़ा था. मेरा स्वप्न टूट चुका था. मैं माया जी को याद करते हुए पुनः सो गया. मन ही मन यह ख्वाहिश थी कि वह स्वप्न फिर से आए .
जीवन में कुछ विचार और भावनाएं सिर्फ सपनों में ही आते हैं हकीकत उन से भिन्न होती है.

घर की याद
पढ़ाई के बाद मुझे जब भी समय मिलता मैं रोमांटिक साहित्य पढ़ने लगा. मैंने कामसूत्र की पुस्तक पढ़ीं पर वह अत्यंत जटिल थी . लोलिता उपन्यास ने भी मुझे अंदर तक छू लिया था. मेरे मन में हमेशा नायिका के साथ जी गयी कामवासना एक पूजा स्वरूप थी. मैं हर हाल में अपनी नायिका को खुश और मदमस्त देखना चाहता था. नायिका की स्वीकृति होने पर मेरे लिए उसकी उम्र और यहां तक की रिश्तों की अहमियत भी नहीं रह गई थी. सपने में माया जी के आने के बाद मैंने कभी कभी उनके सपने खुली आंखों से भी देखे थे, मैं भी अब काम पिपासु हो चुका था, धीरे धीरे यह वर्ष बीत गया परीक्षा के बाद मुझे ट्रेनिंग में जाना था इसलिए मैं गांव नहीं जा सका, पापा मुझसे मिलने दिल्ली आए उन्होंने बताया कि सीमा गांव पर आई हुई है और उसका सिलेक्शन इंजीनियरिंग में हो गया है. उसने तुम्हें धन्यवाद बोला है.
मैंने अपनी कामुकता और कैरियर में से कैरियर को चुना था.
मैं पापा से मिलकर अपनी ट्रेनिंग पर चला गया. रास्ते में मुझे सीमा की बहुत याद आ रही थी. इस समय वह पूरी तरह तनाव मुक्त होती. और हम दोनों उन्मुक्त भाव से प्रेम रस में डूबे होते. पर नियत को यह मंजूर नहीं था. मेरी ट्रेनिंग उतनी ही जरूरी थी. अगले कुछ महीने मैंने खूब पढ़ाई कि अपने कोर्स की भी और कामुक साहित्य की भी. अपनी कामवासना को शांत करने के लिए मेरी मुख्य नायिका सीमा ही थी परंतु कभी-कभी मेरी सहपाठी राधिका और मेरी टीचर भी मेरा साथ दे देतीं थीं.
कॉलेज में मेरे दो वर्ष बीत चुके थे. इस दौरान मैं सिर्फ एक बार घर गया था जब मैं सीमा से मिला था.

बदलते रिश्ते
छाया एक अप्सरा
इस बार दीपावली की छुट्टियां ज्यादा ही लंबी थी मुझे लगभग 7 दिनों का समय मिल गया था. सभी दोस्त अपने अपने घरों को जा रहे थे मैं भी घर जाने की तैयारी करने लगा. घर पर मुझे पापा से ही मिलने की खुशी थी. पर इस सीमा वहां नहीं थी. अचानक मुझे माया जी याद आई और मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. मैं अगली सुबह अपने गांव पहुंच गया.
पापा मुझे लेने आए थे. घर पहुंच कर मैं सबसे पहले मंजुला चाची के यहां गया. उनसे बातें की और उनसे सीमा का हालचाल पूछा. उन्होंने बताया कि सीमा ने बेंगलुरु के किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले लिया है और वह वही रहती है. मैंने उनसे कॉलेज का नाम पूछा तो वह मुझे नहीं बता पायीं. मुझे पापा ने बाद में बताया की सीमा के पापा का उनके छोटे भाई से जमीन को लेकर कुछ विवाद हो गया है और वह शायद गांव नहीं आएंगे. उन्होंने अपने हिस्से की जमीन भी बेच दी है.
मेरे पास सीमा का हाल-चाल लेने के लिए कोई सूत्र नहीं बचा था. मैं मायूस होकर अपने कमरे में आ गया मेरे मन से सीमा की यादें नहीं जा रही थीं. अचानक मेरी नजर बिस्तर पर पड़ी माया जी ने आज वही चादर बिछाई थी जिस पर मैंने सीमा की राजकुमारी के दर्शन लिए थे. अचानक मुझे सीमा की दी गई गुरुदक्षिणा की याद आई. मैंने बिस्तर के नीचे रखे अपने पुराने संदूक का ताला खोला और सीमा द्वारा दी गई हमारे प्रेम रस में डूबी सीमा की पेंटी को बाहर निकाल लिया. पैंटी पूरी तरह सिकुड़ कर आपस में चिपक गई थी. मैंने उसे उसके पुराने स्वरूप में लाने की कोशिश की.
पैंटी का सुर्ख लाल रंग थोड़ा बदल चुका था उस पर जगह-जगह गहरे निशान पड़ चुके थे. मैंने अनायास ही उसे उठाकर चूम लिया और और उसकी खुशबू लेने की कोशिश की. उसमें से अभी भी सीमा द्वारा उस दिन लगाए गए परफ्यूम की खुशबू आ रही थी. मैं आज महसूस कर पाता हूं सीमा ने गुरुदाक्षिणा के लिए अपनी सुहागरात जैसी तैयारी की थी और मेरे मन में उस दिन की एक अमिट छाप छोड़ गई थी.
नित्य कर्मों से निवृत्त होकर मैं अपनी किताबें पलट रहा था तभी सीढ़ियों पर किसी के आने की आहट हुई. दरवाजा खुला और माया जी हाथ में थाली लिए हुए अंदर आयी. माया जी ने ठीक वैसी ही साड़ी पहनी थी जैसी मैंने अपने स्वप्न में देखी थी. बस साड़ी पहनने का ढंग पूर्ण व्यवस्थित था. थाली रख कर वो वापस जाने लगी इसी दौरान मैंने उनके स्तनों, कमर और जांघों की तुलना स्वप्न में देखी गई सुंदरी से कर डाली. माया जी शायद उस स्वप्न सुंदरी से ज्यादा आकर्षक थीं.
"लम्हे" फिल्म ने मुझे अपने से बड़ी तथा छोटी यौवनाओं में प्यार और कामुकता ढूंढने की इजाजत दे दी थी वह भी बिना आत्मग्लानि के.
थोड़ी देर में रोहन और रिया हाथ में लूडो लिए मेरे कमरे में आए. वह दोनों बहुत प्यारे बच्चे थे. उन्होंने मुझसे लूडो खेलने की जिद की. मैंने उसे स्वीकार कर लिया. हम लोग लूडो खेलने लगे. मैं बार-बार खिड़कियों से बाहर देख रहा था अचानक मुझे एक लड़की अपने बाल तौलिए से झड़ते हुए दिखाई दी. उसने गुलाबी रंग का घाघरा चोली पहना हुआ था. उसकी कद काठी बहुत आकर्षक थी. मैंने उसे पहचानने की बहुत कोशिश की पर असफल रहा. मैंने छोटे रोहन से पूछा ..
" वो कौन है? छोटा रोहन हंसने लगा और बोला
"वह तो छाया दीदी हैं." और अपने खेल में लग गया.
मेरी आंखों को यकीन नहीं हो रहा था. मेरे घर में आज से दो- ढाई साल पहले आई छाया इतनी बड़ी हो गई थी. मैं उसे देखने को लालायित हो रहा था. पिछले 2 सालों में मैंने जितना उसे नजरअंदाज किया था उतनी ही तड़प मुझे अब उसे देखने के लिए हो रही थी. मेरा खेल में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था. पर सीधा छत पर जाने की हिम्मत नहीं थी. मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी.
शाम को नीचे मैं पापा के साथ बैठकर चाय पी रहा था तभी वहां पर माया जी आ गई. उन्होंने बताया इस बार छुट्टियों में जब सीमा आई थी तो वह तुम्हारी बहुत तारीफ करती थी. तुमने पिछली छुट्टियों में उसे जो पढ़ाया था उससे उसको बहुत फायदा हुआ था. और वह तुम्हारी बहुत शुक्रगुजार थी. इस बार आने के बाद उसने छाया को भी परीक्षा की तैयारी के बारे में सिखाया तथा अपनी किताबें भी दी गई है.
पापा ने कहा
"मानस पिछले 2 साल में छाया ने पढ़ाई में बहुत प्रगति की है. उसने 11 वीं की परीक्षा भी 85% अंकों से पास की है. तुम उसका मार्गदर्शन करो तो शायद इंजीनियरिंग में दाखिला पा सकती है."
मैंने सहमति में सर हिला दिया. रात को लगभग 8:00 बजे मैं खाने की प्रतीक्षा कर रहा था. तभी दरवाजे से छाया ने हाथ में थाली लिए प्रवेश किया. मुझे एक पल के लिए विश्वास ही नहीं हुआ की छाया इतनी बड़ी हो गई है.
युवावस्था में लड़कियों में शारीरिक विकास तीव्रता से होता है.
मेरी पारखी निगाहों ने उसे बहुत ध्यान से देखा. मैंने मौन तोड़ते हुए कहा
"थाली टेबल पर रख दीजिए." सुंदर लड़कियों के लिए मेरे मुख से सम्मान सूचक शब्द स्वयं ही निकलते थे.
उसने सहमति में सिर हिला दिया. वह दो कदम आगे बढ़ी और टेबल पर थाली रखकर वापस मुड़कर जाने लगी. मैंने उसे रुकने को कहा. वह वापस मुड़कर खड़ी हो गई. मैंने उससे इशारा कर स्टूल पर बैठने के लिए कहा. वह खुशी-खुशी बैठ गई. वह प्रसन्न दिखाई दे रही थी. मैंने हिचकिचाते हुए उसे पढ़ाई में अच्छे नंबरों के लिए बधाई दी और कहा कि वह मेरे पास कुछ भी पूछने आ सकती है. मैं बीच में तिरछी नजरों से छाया को देख रहा था. वह गर्दन झुका कर अपने घुटनों की तरफ देख रही थी. तथा अपनी उंगलियों को आपस में रगड़ रही थी. वह अभी भी सामान्य नहीं हो पा रही थी.
कुछ देर बाद वह चली गई. मैं बिस्तर पर आकर छाया के बारे में सोचने लगा. आज से लगभग ढाई साल पहले जब वह यहां आई थी तब एक ग्रामीण लड़की थी. पर अब वह एक आकर्षक युवती में परिवर्तित हो चुकी थी. मैंने कभी भी उसे अपनी छोटी बहन की संज्ञा नहीं दी थी. मेरी मुलाक़ात ही उससे बहुत कम होती थी बातचीत तो दूर की बात थी. जब मेरा संबंध माया जी से ही नहीं था तो छाया से होने का प्रश्न ही नहीं उठता था.
आज छाया को देखकर मुझे उसमें सीमा दिखाई दे रही थी. छाया सीमा की तुलना में पतली और छरहरी थी उसका रंग बेहद गोरा था तथा त्वचा बहुत ही कोमल एवं पतली थी. चेहरे पर नाक नक्श बेहद खूबसूरत थे. आंखें बड़ी बड़ी थी और होंठ गुलाबी थे. घागरा उसके नितंबो और जांघों का आकार अवश्य छुपा ले गया था पर चोली स्तनों का आकार छुपा पाने में नाकाम थी. छाया के स्तन विकसित हो चुके थे और उसके कोमल शरीर की शोभा बढ़ा रहे थे. उसके बाल थोड़े घुंघराले थे तथा उसके कंधे तक आ रहे थे. चेहरे पर मासूमियत कूट कूटकर भरी हुई थी. आज तक जितनी युवतियां मैने देखी थी उनमे छाया सबसे खूबसूरत, कोमल और मासूम थी. मैं उसे याद करते हुए नींद के आगोश में चल गया.
अगली सुबह मैं प्रसन्न मुद्रा में उठा. बाहर धूप खिली हुई थी. छत पर थोड़ी देर टहलने के बाद मैं वहीं धूप का आनंद लेते हुए फिर छाया के बारे में सोचने लगा. छाया ने अपने सौंदर्य से मुझे उसके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया था.
छाया एवं सीमा
( मैं छाया )
आप सब मुझसे परिचित हो ही चुके हैं. जब से मैं इस घर में आई थी मुझे इस घर में सब कुछ मिला. मानस के पापा मुझे अपनी बेटी की तरह ही प्यार करते थे. उन्होंने मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया था. वह चाहते थे कि मैं पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊं ताकि खुद का और अपनी मां का ख्याल रख सकूं. जब मैं यहां आई थी तब मानस भैया अपनी पढ़ाई में पूरी तरह मशगूल थे. वह मुझसे दूर दूर रहते थे यह मेरे लिए भी अच्छा था. मैं भी नए माहौल में अपने आप को ढालने की कोशिश कर रही थी. मैंने घर में इतनी संपन्नता कभी नहीं देखी थी. मानस भैया के दिल्ली जाने के बाद घर में हम 3 लोग ही बचे थे. मैं अब घर की लाडली बन चुकी थी. मैंने मन ही मन या निश्चय कर लिया था मैं अपनी आगे की पढ़ाई पूरी इमानदारी से और मेहनत से करूंगी. अपनी पुरानी जिंदगी में मैं पढ़ाई में पहले ही पीछे हो चुकी थी. पिछले साल जब सीमा दीदी और मानस भैया यहां आए थे तो सीमा दीदी से मेरी दोस्ती हो गयी थी. उन्होंने मुझे पढ़ाई के लिए प्रेरित किया और तरह-तरह की बातें की.
मैं सीमा दीदी से छोटी थी फिर भी मेरे स्तन उनसे थोड़े से बड़े थे. वह बार-बार मुझसे मजाक में इसे बदलने के लिए कहती और मेरी हंसी छूट जाती थी. मेरी त्वचा और उसका निखार भी उनके लिए कौतूहल का विषय था. वह बार-बार मुझसे पूछती कि तुम क्या लगाती हो मैं निरुत्तर थी. मैंने घरेलू चीजों के अलावा कभी किसी ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल नहीं किया था. वह कहती कि तुम्हारी त्वचा बहुत कोमल है. एक बार उन्होंने अपने हाथों से मेरी कलाई को तेजी से पकड़कर मुझे खींचा. जब उन्होंने अपना हाथ हटाया तो उंगलियों के निशान मेरी कलाई पर साफ दिखाई दे रहे थे. उन्होंने हंसकर मुझे मेरी कलाई दिखाई और कहा छाया जब तुम लड़कों के हाथ लगोगी तब तो पूरी तरह चितकबरी हो जाओगी और कह कर जोर जोर से हंसने लगी,
छाया दीदी से बातें कर कभी-कभी मुझे अपनी योनि में गीलापन महसूस होता था. वो मुझसे पूरी तरह खुल गई थी. एक बार हम दोनों अकेले थे तब उन्होंने मुझे अपने स्तन दिखाए थे. वो मुझसे मेरे स्तनों को दिखाने की जिद की उनके बार-बार आग्रह करने पर मैंने अपने स्तन भी दिखा दिए थे. उन्हें अपने हाथों से छूने के बाद वह बहुत खुश लग रही थी. बार-बार यही कहती थी स्तन मुझे दे दे. मुझे शोले फ़िल्म का डायलाग याद आ जाता और हम दोनों हँस पड़ते.
एक बार वह मेरे स्तनों को देर तक सहलाती रही. उनके बार-बार छूने से मेरे योनि में गीलापन आ चुका था. उन्होंने मुझे मेरे नितंबों से पकड़ कर अपने आलिंगन में ले लिया और बोली वह कौन भाग्यशाली होगा जो मेरी सहेली का कौमार्य भंग करेगा. जैसे उन्हें पूरा विश्वास हो कि मेरा कौमार्य सुरक्षित है. उनके आलिंगन से मैं उत्तेजित होने लगी थी. उनका साथ मुझे बहुत अच्छा लगता था. एक दिन उन्होंने मुझसे मानस भैया के साथ चल रही उनकी रासलीला के बारे में भी बताया. जितना वह बताती उतना ही मैं उत्सुक होती.
जब श्रोता अच्छा हो तो वक्ता अपने मन की सारी बातें खुल कर बताता है.
सीमा दीदी ने छुप्पन छुपाई के दौरान की गई कामुक गतिविधियों की सारी कहानी मुझे सुना दी. गुरुदक्षिणा और राज कुमारी दर्शन का वह वृत्तांत मेरी योनि को प्रेम रस में भिगो दिया था. मुझे एसा महसूस हो रहा था जैसे मैं स्खलित हो गयी थी.
सीमा ने मुझे यह भी बताया था की उन्होंने मानस भैया के अलावा सोमिल ( जो उनका चंडीगढ़ में दोस्त था) के साथ भी इसी प्रकार मजे किये हैं.
मेरे मन में मानस भैया की छवि बदल चुकी थी उन्होंने मुझे शुरू से ही अपनी बहन का दर्जा नहीं दिया था अतः मैंने भी उन्हें इस बंधन से आजाद कर दिया था. अभी भी मैं उन्हें मानस भैया बुलाती थी पर यह सीमा द्वारा बुलाए गए मानस भैया से कहीं भी अलग न था. मैं जान चुकी थी कि
अपनी कामुकता को जीवंत रखते हुए अपने कौमार्य को सुरक्षित रखा जा सकता है.
. मैंने उन्हें अपना गुरु मान लिया था.
इस बार मानस भैया पूरे डेढ़ साल बाद आए थे मेरा शारीरिक विकास भी हो चुका था. मेरी योनि के आसपास सुनहरे बाल आ गए थे परंतु आश्चर्यजनक रूप से मेरे हाथ पैरों या शरीर के अन्य किसी हिस्से पर कोई बाल नहीं थे. मैंने अपने आप को आईने में नग्न देखती और भगवान द्वारा दी गई इस इस सुंदर काया के लिए उनकी कृतज्ञ होती.

छाया के मानस भैया
अगले दिन मैं मानस भैया के पास के पास अपनी किताबें लेकर गई. उन्होंने मुझसे कई सारे प्रश्न किए जैसे वह जानना चाहते हैं कि मैंने अभी तक कितना ज्ञान अर्जित किया है. उसके पश्चात मानस भैया ने मुझे हर हर विषय को पढ़ने का तरीका बताया. मैं उनकी बातों से मंत्रमुग्ध थी कब दो-तीन घंटे बीत गए यह पता ही नहीं चला. वह पूरी तन्मयता से मुझे पढ़ा रहे थे. मेरी मां के खाना लेने लेकर आने के बाद ही उन्होंने मेरी पढ़ाई बंद की. मैं बहुत खुश थी.
यह सिलसिला अगले दो दिनों तक चला. तीसरे दिन जब वह मुझे पढ़ा रहे थे तो मुझे झपकी आ रही थी. उन्होंने मुझसे ध्यान देकर पढ़ने के लिए कहा तभी उनके कुछ पुराने दोस्त नीचे आकर आवाज देने लगे. उन्होंने कहा तुम पढ़ाई जारी रखो मैं थोड़ी देर में आता हूं. मुझे नींद आ रही थी. उनके जाते ही मैं उनके बिस्तर पर झपकी लेने लगी और जाने मुझे कब नींद आ गई. कुछ देर बाद मुझे अपने घुटने के ऊपर ठंडक का एहसास हुआ मैंने अपनी पलकें थोड़ी थोड़ी ऊपर की तो देखा मानस भैया खड़े थे उनका हाथ मेरे लहंगे को ऊपर की तरफ उठा रहा था. मैं थरथर कांपने लगी वह मेरे घुटने और पैरों को लालायित नजरों से देख रहे थे. मेरा घाघरा अब मेरी जांघों तक आ चुका था. मैंने इस कामुक परिस्थिति को यहीं पर विराम देना उचित समझा और करवट लेने लगी. मैंने देखा मानस भैया ने तुरंत मेरा लहंगा नीचे कर दिया और बोले
"छाया उठो पढ़ाई नहीं करनी है क्या?"
उनकी इस बात में हक भी दिखाई दे रहा था. मैं आंखे मीचती हुई उठ खड़ी हुई. मेरी धड़कने अब सामान्य हो गई थी पर मैं आगे पढ़ पाने की स्थिति में नहीं थी. मानस भैया के साथ मेरे रिश्ते का नया अध्याय शुरू होने वाला था. मैं उनसे नजरें नहीं मिला पा रही थी. बाकी कल पढ़ेंगे यह कहकर में मानस भैया के कमरे से चली आयी.
मानस भैया कल वापस दिल्ली जाने वाले थे. माँ पड़ोस में होने वाले किसी सांस्कृतिक समारोह में जा रही थी. उन्होंने मानस भैया को आवाज देकर बोला यदि कोई जरूरत हो तो छाया को आवाज दे देना. पता नहीं क्यों मुझे अंदेशा हो रहा था कि वह मुझसे मिलने जरूर आएंगे. मैंने एक सुंदर सा घाघरा और चोली पहनी तथा अपने कमरे में बिस्तर पर लेट गई. दस मिनट बीत गए अचानक मानस भैया की आवाज सुनाई दी वह मुझे पुकार रहे थे. मैंने जानबूझकर उनकी बात को अनसुना किया कुछ ही देर में वह मुझे ढूंढते हुए मेरे कमरे में आ गए. मैंने जैसा सोचा था ठीक वैसा ही हुआ मैं सोने का नाटक करती रही. मेरा घाघरा मैंने स्वयं अपने घुटने तक उठा दिया था. मैं आंखें बंद कर मानस भैया के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रही थी. तभी मैंने अपने घाघरे को ऊपर की तरफ उठता महसूस किया. उस दिन वाली घटना की पुनरावृत्ति हो रही थी.
मैंने अपनी धड़कनों पर काबू कर कर रखा था. मैं मानस भैया की तरफ पीठ करके लेटी हुई थी. मेरी चोली के पीछे से मेरी अधनंगी पीठ दिखाई पड़ रही थी. घाघरा अब जांघों तक आ गया था और मेरे नितंबों से कुछ ही नहीं नीचे रह गया था. इससे ऊपर वह घाघरे को नहीं ले जा पा रहे थे क्योंकि वह मेरे पैरों से दबा हुआ था. कुछ देर तक वह शांत रहे उन्हें आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं दिखाई पड़ रहा था. मैं मुड़ते हुए पीठ के बल हो गई. मैंने उन्हें एहसास ना होने दिया कि मैं जाग रही हूं. फिर भी वह सहम गए मेरी जांघें सामने से दिखाई पड़ रही थी. मेरे चोली में बंद स्तन भी अब दिखाई देने लगे थे. कुछ देर में उन्होंने हिम्मत जुटाई और मेरे घागरे तक अपने हाथ लाये पर उसे छूने की हिम्मत नही जुटा पाए.
मैं उनके मन में चल रही भावनाओं को समझ रही थी पर पहल उनको ही करनी थी. मैं तो अपना मन बना ही चुकी थी.
मानस और छाया के बीच प्रेम पनप रहा था जो समाज द्वारा थोपे गए रिश्ते के ठीक विपरीत था.
आकस्मिक आगमन .
कॉलेज में वापस आने के बाद मुझे छाया का चेहरा हमेशा याद आता था. गांव में इस बार उसने मेरे साथ जो पल बिताए थे वह मेरे लिए यादगार बन गए थे. उसका सुंदर और प्यारा चेहरा तथा कोमल तन मुझे आकर्षित करने लगे थे. पता नहीं क्यों मुझे ऐसा महसूस होता जैसे मेरा उसके साथ कोई नया रिश्ता जुड़ने वाला था. मेरे मन में उसके प्रति कामुकता जरूरत थी पर वह उसकी खूबसूरती को देखने के बाद स्वाभाविक थी. मैंने छाया को केंद्र में रखते हुए कभी भी हस्तमैथुन नहीं किया. वह मेरे लिए प्यार की मूर्ति बन रही थी.
समय बीत रहा था और कुछ दिनों बाद होली आने वाली थी. मैंने छाया से मिलने की सोची. मुझे पता था यदि मैं पापा से बात करूंगा तो शायद वह मेरी पढ़ाई को ध्यान में रखते हुए मुझे आने के लिए रोक देंगे. होली के एक महीने बाद ही मेरी परीक्षा थी. मेरा मन छाया से मिलने के लिए उत्सुक हो उठा था. और अंततः मैं बिना किसी को बताए अपने गांव के लिए निकल पड़ा. स्टेशन पर उतरने के बाद मैंने ऑटो किया और घर पहुंच गया.
सुबह के लगभग 10:00 बज रहे थे मुझे दूर से ही छत पर छाया दिखाई पड़ गई. वह धूप में अपने बाल सुखा रही थी. मैंने घर में प्रवेश किया और देखा की पापा की स्कूटर घर पर नहीं थी. मैं समझ गया की वो कॉलेज गए हुए हैं. घर के अंदर प्रवेश करने पर मुझे माया जी कहीं दिखाई नहीं पड़ रहीं थीं. मेरे इस आकस्मिक आगमन के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. मैंने अपना बैग नीचे रखा और सीधा छत पर छाया से मिलने चला गया.
छत पर आते ही मैंने देखा छाया मेरी तरफ पीठ किए हुए खड़ी है. उसने एक घाघरा और चोली पहनी हुई थी. मैं धीरे-धीरे उसके पास गया और पीछे से उसकी आंखों पर अपनी हथेलियाँ रख दीं. वह मुझे पहचानने की कोशिश कर रही थी.
उसने अपनी कोमल उंगलियों से मेरी उंगलियों को छू कर पहचानने की कोशिस की और उन्हें अपने आंख से हटाने लगी. उसने खुश होकर कहा ...
"मानस भैया?" उसकी आवाज में प्रश्न छुपा हुआ था.
" हां" मैं अपने हाथ नीचे की और ले गया और उसे उसके पेट से पकड़ कर हवा में उठा लिया उसकी कमर मेरी नाभि से सटी हुई थी. मेरा राजकुमार उसके नितंबों से सटा हुआ था. उसके पैर जमीन से ऊपर आ चुके थे मैं उसे गोल गोल घुमाने लगा. मेरा राजकुमार अब तक तनाव में आ चुका था वह छाया के नितंबों में निश्चय ही चुभन पैदा कर रहा होगा और अपनी उपस्थिति का एहसास दिला रहा होगा. उसे घुमाते समय मेरी हथेलियां छाया में पेट पर थी. उन्होंने घाघरा और चोली के बीच में अपनी जगह बना ली थी. अपनी हथेलियों से छाया के पेट की कोमलता को महसूस करते हुए मुझे काफी आनंद आ रहा था. कुछ देर बाद मैंने छाया को नीचे उतार दिया वह खिलखिला कर हंस रही थी. उसे भी इस तरह घूमने में आनंद का अनुभव हुआ था. नीचे उतरने के बाद वह मुझसे लिपट गई उसका शरीर मेरे शरीर से पूरी तरह सटा हुआ था. स्तन और पेट पूरी तरह से मुझसे चिपके हुए थे. एक दूसरे से चिपके होने के कारण मेरा राजकुमार उसके पेट पर कछु रहा था.
उसने कहा
"अच्छा हुआ आप होली पर आ गए मैं इस बार आपका इंतजार कर रही थी" यह कहते हुए वह मुझसे अलग हो गइ और भागती हुई नीचे गइ.
"मां देखो मानस भैया आए हैं" माया जी भी खुश हो गयीं. उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहा
"होली के त्योहार पर घर आ गए अच्छा किया. छाया भी तुम्हें याद करती है." शाम को पापा के आने के बाद वो भी खुश थे. मैं रात्रि में छाया को याद करते हुए सो गया .
अगले तीन-चार दिन मेरे लिए रोमांचक होने वाले थे. अगली सुबह मैं अपने दोस्तों से मिलने घर से बाहर गया था. लगभग 11:00 बजे वापस घर आया तो माया जी ने कहा छाया पढ़ने के लिए तुम्हारे कमरे में कब से इंतजार कर रही हैं. मैं खुश हो गया और अपने कमरे में जाकर देखा छाया वहां मेरे बिस्तर पर लेटी हुई थी. उसकी किताब उसके चेहरे के पास गिरी हुई थी. वह अत्यंत सुंदर और मासूम लग रही थी. वह करवट लेकर सोई हुई थी. त्योहार के अवसर पर उसके पैरों में आलता लगा हुआ था और एक छोटी सी पायल पहनी थी जिससे उसके पैर अत्यंत खूबसूरत लग रहे थे. मेरे मन में फिर एक बार उसकी जांघों को देखने की इच्छा प्रबल हो गई. मैंने घागरे को ऊपर करना शुरू कर दिया घागरा तुरंत ही घुटनों के ऊपर आ गया मैंने थोड़ा और प्रयास किया. घाघरा अब जांघों तक आ गया पर अभी भी उसकी राजकुमारी दूर थी. पर मेरे लिए दृश्य अत्यंत लुभावना था. आज तीन चार महीने बाद मुझे यह दृश्य मेरी आँखों के सामने था. पता नहीं मेरे मन में क्या आया मैंने अपने राजकुमार को छू लिया. वह शायद मेरी ही प्रतीक्षा कर रहहा था. मैंने अपने पजामे के अंदर ही उसे सहलाने लगा. छाया की नग्न जांघों को देखते हुए उसे छूने में एक अद्भुत आनंद आ रहा था. कुछ देर तक मैं ऐसे ही अपने राजकुमार को सहलाता रहा. अंततः मेरे राजकुमार में अपना वीर्य त्याग दिया. आज पहली बार मैंने छाया को ख्वाबों में कुछ और दूर तक नंगा कर दिया था. उसकी राजकुमारी की परिकल्पना मात्र से राजकुमार ने अपना वीर्य त्याग दिया था. मैं मजबूर था राजकुमार पर मेरा कोई बस नहीं था उसे अपनी राजकुमारी को याद कर अपना प्रेम जता दिया था. मैंने अपने आपको व्यवस्थित किया. सारा वीर्य मेरे पाजामें में ही लगा हुआ था. मैंने अपना कुर्ता नीचे किया और छाया की जांघों को उसके लहंगे से ढक दिया. मैंने छाया को पुकारा
"छाया उठो मैं आ गया." वह आंखें मींचती हुई उठ खड़ी हुई. अगले दो-तीन घंटे तक हम लोग पढ़ाई की बातें करते रहे.
मेरे आकस्मिक आगमन का उपहार मुझे मिल चुका था.

छाया के साथ यादगार होली.
[मैं छाया]
मानस भैया ने इस बार कुछ नया कर दिया था. उस दिन छत पर मुझे गोल-गोल घुमाते समय उनके राजकुमार का तनाव मुझे स्पष्ट रूप से अपने नितंबों के बीच महसूस हुआ पर मैंने उस पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दी थी. उनसे गले लगते समय मेरे स्तन उनसे टकरा रहे थे तब मुझे अपनी राजकुमारी में उसकी अनुभूति हो रही थी. मैं भी मन ही मन उनसे निकटता बढ़ाने के आतुर थी. उस दिन उनके कमरे में जब उन्होंने मेरे लहंगे को ऊपर करना शुरू किया तो मुझे पूरा विश्वास था कि वह इसे और ऊपर तक ले जाएंगे पर शयद वो डर गए. पर उन्होंने मेरे सामने ही अपने राजकुमार को सहलाना शुरू किया. यह मेरे लिए एक अलग अनुभव था. मुझे राजकुमार की कद काठी तो नहीं दिखाई दे रही पर एक अलग अनुभव हो रहा था. मेरी राजकुमारी से निकलने वाला प्रेम रस मेरी पैंटी को गीला कर रहा था. यदि वह घाघरे को थोड़ा और ऊपर करते तो मेरी चोरी उस दिन पकड़ी जाती. पर ऐसा हो ना सका.

होली के दिन मैंने अपनी तरफ से भी स्वीकृति देने की सोच ली थी. होली के दिन मैंने सुबह-सुबह एक पतला लहंगा तथा एक पतला टॉप पहना था.
मुझे पता था की अगर मैं भीग गइ तो मेरे अंग प्रत्यंग के अर्ध दर्शन मानस को अवश्य हो जाएंगे. पर मैं इसके लिए मन ही मन तैयार थी. सुबह १० बजे के आसपास मैं मानस भैया के कमरे में कई. वह तौलिया पहने हुए थे और अपने कपड़े पहनने जा रहे थे. मैंने जाते ही उनकी पीठ पर रंग गिरा दिया और उन्हें कहा "हैप्पी होली"
वह इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थे.
"अरे रुको तो, पहले कपड़े तो पहन लेने दो"
मैं नहीं मानी और उनकी पीठ और छाती पर ढेर सारा रंग डाल दिया. मैंने उनकी तौलिया को भी पीछे की तरफ खीचा और उसमें भी रंग डाल दिया जो निश्चय ही उनके नितंबों से होता हुआ पैरों की तरफ जा रहा था. वह मुझे पकड़ने के लिए सामने की तरफ मुड़े पर छीना झपटी में उनका तौलिया नीचे गिर गया. वह पूरे तरह से नग्न हो गए थे. मैंने अपनी आँखे बाद कर ली. उनका राजकुमार एक झलक मुझे दिखाई पड़ गया. मैं कमरे से निकलकर छत पर भाग गयी. उन्होंने मुझे पकड़ने की कोशिश की पर वो नग्न अवस्था में बाहर नहीं आ सके..
वह अभी भी अपने कमरे में थे और शायद कपड़े पहनने की कोशिश कर रहे थे मैं उनके आने की प्रतीक्षा कर रही थी. मैं मन ही मन डर भी रही थी. हमारी अठखेलियाँ कहां तक जाएंगी यह तो समय ही बताता पर मैं मन ही मन उन सब के लिए तैयार भी थी. उनके राजकुमार के दर्शन मैं कर ही चुकी थी वो शायद अभी तैयार नहीं था. जैसा सीमा ने बताया था वैसा तो बिल्कुल भी नहीं था. शायद वह भी मानस भैया की तरह मेरे आगमन के लिए तैयार नहीं था.
होली का त्यौहार मिलन का प्रतीक होता है, प्रेमियों की लिए ये उनकी कामुकता को आगे बढ़ने में भी मदद करता है.
मानस भैया के छत पर आते ही मैं फिर भागने लगी. कुछ ही देर में उन्होंने मुझे पकड़ लिया. उनकी हथेलियां रंग से सराबोर थी. उन्होंने अपनी हथेलियां मेरे गालों पर मलीं और वह धीरे-धीरे मेरे कंधों तक आ गए. उनके हाथ रुक ही नहीं रहे थे. पर उन्होंने मेरे स्तनों को जरूर छोड़ दिया. पर अब उनके हाथ मेरे पेट तक पहुंच चुके थे. मेरे पेट और नाभि प्रदेश को पूरी तरह रंगने के बाद वह अपने हाथों को और नीचे ले जाने लगे. उनकी उंगलियां मेरे घाघरे के अंदर प्रवेश कर चुकीं थी पर पैंटी तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपनी उंगलियों को रोक लिया और वापस पेट की तरफ आ गए.
अब उन्होंने मुझे आगे की तरफ घुमा दिया. मैं उनके सामने आ चुकी थी. मेरा शरीर रंग से सराबोर हो चुका था. स्तनों और योनि प्रदेश को छोड़कर सामने से पूरा शरीर रंग से सना हुआ था. मैं अपने हाथों में रंग लेकर उनके चेहरे पर लगाने लगी. उनके चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए मुझे एक अलग आनंद की अनुभूति हो रही थी. मेरे मन में इच्छा हुए की मैं उन्हें चूम लू पर मैंने अपने आप को रोक लिया. मैंने उनके गर्दन और सीने पर भी रंग लगाया. अपने कोमल हाथ उनके कुर्ते के अंदर ले जाते हुए मुझे एक अलग अनुभव हो रहा था. इसी दौरान उनके हाथ मेरी पीठ पर घूम रहे थे . कुछ ही देर में उनके हाथ मेरे नितंबों की तरफ बढ़ रहे थे. मैने अपने हाथों पर लगा हुआ रंग अनायास ही उनके राजकुमार पर न सिर्फ लगा दिया बल्कि कुछ देर तक उसे पकड़ी रह गई फिर उन्हें हैप्पी होली कहकर पीछे हट गयी. . राजकुमार पर रंग लगाते समय मैंने यह महसूस कर लिया था कि वह पूरी तरह तना हुआ है. उन्हें शायद इसकी उम्मीद नहीं थी. मेरे पीछे हटते ही एक बार उन्होंने फिर से मुझे खींच लिया और इस बार मेरे नितंबों के नीचे दोनों हाथ लगाकर मुझे ऊपर उठा लिया गोल गोल घुमाने लगे. मेरे स्तन उनके चेहरे के ठीक सामने थे.
कुछ देर यूं हीं अठखेलियां करने के बाद हम नीचे आ गए. नीचे सारे बच्चे हमारा इंतजार कर रहे थे छोटे रोहन ने बोला
"मानस भैया ने तो छाया दीदी को अपने रंग में सराबोर कर दिया है" उसकी बात बिल्कुल सही थी.
बच्चों की वाणी में भगवान बसते है यह बात सच ही थी.
रोहन ने अपनी पिचकारी से ढेर सारा रंग मेरे ऊपर डाल दिया. मानव द्वारा लगाया गया रंग बहते हुए मेरे शरीर के हर हिस्से पर पहुंचने लगा. कुछ देर रंग खेलने के बाद मानस ने पूरी बाल्टी मेरे सिर पर डाल दी. मैं पूरी तरह भीग गई मुझे हल्की ठंड लगी और मैं छत पर भाग गइ. मेरी चोली और घाघरा बहुत पतला था पानी से भीगने के बाद वह मेरे शरीर में चिपक गया मैं छत पर आ चुकी थी मेरे पीछे-पीछे मानस भी आ गए. मेरे कपड़े मेरे शरीर से चिपके हुए थे मेरे स्तनों का आकार पूरी तरह स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. भीगने के बाद मेरा घाघरा मेरी जांघों से चिपक गया था दोनों पैरों के बीच की बनावट स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. यहाँ तक की मेरी पैंटी का रंग और आकार भी दिखाई दे रहा था.
मैं मानस भैया के सामने अर्धनग्न अवस्था में खड़ी थी मेरी नजरे झुकी हुई थी वह मुझे एकटक देखे जा रहे थे धीरे-धीरे वह मेरे पास आ गए उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और अपने आलिंगन में ले लिया और कहां..
"छाया मैं तुमसे प्रेम करने लगा हूं मुझे अपना भाई मत समझना"
मैंने भी इस रिश्ते को सीमा से मुलाकात के बाद ही छोड़ दिया था. मैंने कहा...
" जिस तरह आप सीमा दीदी के भैया थे उसी तरह मेरे भी रहिएगा" और मुस्कुराते हुए मैं नीचे आ गयी.
अगले एक-दो दिनों में उनसे अंतरंग मुलाकात ना हो पायी पर जाते समय मैं उनसे एक बार फिर आलिंगनबद्ध हुई. हमने एक दूसरे को वस्त्रों के ऊपर से ही छुआ और महसूस किया.
मानस भैया के विदा होने से पहले मैंने उनके राजकुमार को भी यह एहसास करा दिया था आखिर आने वाले समय में मेरे पास उसके लिए बहुत कुछ था.

नटखट छाया
मैं वापस अपने हॉस्टल आ चुका था. समय का पहिया तेजी से घूम रहा था मेरे केंद्र बिंदु में अब सिर्फ और सिर्फ छाया थी. छाया की सुंदरता देखकर मेरा मन मंत्रमुग्ध हो गया था उसकी जांघें कितनी कोमल और सुडौल थीं.. मैं अपनी कल्पना में उसकी योनि और नितम्बों को महसूस कर पा रहा था. उसके स्तन किसी परिचय के मोहताज नहीं थे. चोली में बंद होने के बाद भी वह अपनी उपस्थिति सबसे पहले दर्ज कराते थे. छाया की परिकल्पना के लिए आप अबोध सिनेमा की माधुरी दीक्षित को याद कर सकते हैं. मैं मन ही मन छाया को अपनी प्रेमिका मान चुका था.
सीमा से मेरे संबंध में दोस्ती और वासना का महत्व ज्यादा था. राजकुमारी दर्शन और होंटो के चुम्बन के दौरान मुझे उससे कुछ समय तक प्यार की अनुभूति हुई थी और उसके जाने के बाद मेरी आँखों मे आँसू भी आए थे पर छाया के साथ बात अलग थी. में उस पर मर मिटने को तैयार हो रहा था.
समय तेजी से बीत रहा था. छाया 12वी की परीक्षा दे चुकी थी. मेरा तीसरा वर्ष पूरे हो चुका था. मैं छुट्टियों घर आ गया था. अब छाया के समीप रहना मेरी पहली प्राथमिकता थी. कुछ ही दिनों में छाया का रिजल्ट भी आ गया वह बहुत अच्छे नंबरों से पास हुई थी. रिजल्ट आने के बाद वह मेरे पास आई और मेरे सीने से लिपट गई. मैंने उससे इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए एक वर्ष तक तैयारी करने के लिए कहा वह मान गयी. मैंने उसे उसकी तैयारी में मदद करने की सहमति दी. इन पूरी छुट्टियों में मैंने छाया को सिर्फ और सिर्फ पढ़ाया उसे कामुक परिस्थितियों से बिल्कुल दूर रखा और स्वयं पर भी अपना नियंत्रण कायम रखा. जब भी मेरी छुट्टियां होतीं मैं छाया के पास आ जाता इस दौरान कामुकता सिर्फ मेरे मन जन्म लेती पर मैं उसे वहीं दफन कर देता,
इसी बीच एक दुर्घटना घट गई मेरे पापा हमें छोड़ कर चले गए. दीपावली के पहले हुई इस घटना ने मुझे और छाया को झकझोर दिया था. मैं दीपावली की छुट्टियों पर घर आया मैंने माया जी और छाया को सांत्वना दी तथा उन्हें संयम बरतने को कहा. घर में पैसों की कोई कमी न थी परंतु माया जी और छाया को अगले कुछ महीनों तक अकेले ही रहना था. मैंने छाया को अपनी तैयारी जारी रखने के लिए प्रेरित किया और वापस कॉलेज लौट आया.
मेरी इंजीनियरिंग खत्म होने के पहले ही बेंगलुरु की एक बड़ी कंपनी में मेरी नौकरी लग चुकी थी. मुझे 2 महीने बाद वहां जाना था मेरी कंपनी के द्वारा मुझे एक पूर्णतयः सुसज्जित दो कमरे का आवास दिया गया था. मैंने उस आवास को देखा तो नहीं था पर अपने वरिष्ठ साथियों से उसके बारे में सुना जरूर था. उस घर में रहने के लिए सिर्फ अपने कपड़ों की आवश्यकता थी बाकी उस घर में सभी साजो सामान उपलब्ध थे. इन 2 महीनों की छुट्टियों में मैं अपने घर वापस आ चुका था . अपनी नौकरी लगने के उपलक्ष में मैंने माया जी के लिए एक सुंदर साड़ी तथा छाया के लिए एक बहुत ही सुंदर गुलाबी रंग का लहंगा और चोली खरीदा था. यह लहंगा वास्तव में बहुत सुंदर था. मैंने छाया के लिए अपने अंदाज से अधोवस्त्र भी खरीदे थे.
जब उपहार लेकर मैं वापस गांव आ गया तो छाया वह लहंगा देखकर बहुत खुश हुई और मेरे सीने से लिपट गई. छाया की इंजीनियरिंग की परीक्षा 15 दिनों बाद थी. मैं छाया के साथ दिनभर रहकर उसकी पढ़ाई में मदद करता वह लगभग मेरे कमरे में ही रहती. माया जी मेरे आने से बहुत खुश थी. और छाया की इस तन्मयता से मदद करते देखकर बहुत खुश होती. शायद मैंने अपने समय पर भी इतनी मेहनत नहीं की थी जितनी इस समय कर रहा था.
छाया अपनी इंजीनियरिंग की परीक्षा दे आई थी. वह बहुत खुश थी उसे अच्छे नंबरों से पास होने की पूरी उम्मीद थी. परीक्षा खत्म होने के बाद वह पूर्णता तनाव मुक्त हो गई थी. अगले दिन उसने स्वयं आकर मेरा कमरा जो लगभग पुस्तकालय बना हुआ था उसे बहुत करीने से साफ किया. उसने सारी किताबें उठाकर एक बक्से में डाल दी. वह अब भी मेरे साथ समय गुजारती थी और अब मुझसे खुलकर बात करती थी. उसने मुझसे अपने कॉलेज के अनुभवों के बारे में पूछा फिर अचानक सीमा की बात छेड़ कर उसने मुझसे कहा
"सीमा दीदी छुपन छुपाई खेल को बहुत याद करती थी." मैं उसकी बात सुनकर शरमा गया
" उन्होंने शायद आपको कुछ गुरु दक्षिणा भी दी थी बताइए ना उन्होंने क्या दिया था"
मैं निरुत्तर था.
कभी मुझे लगता कि वह मुझे छेड़ रही है. शायद सीमा ने उसे सब कुछ खुल कर बता दिया था. पर मैं इस पर बात करने की स्थिति में नहीं था. कुछ दिनों बाद छाया का इंजीनियरिंग का रिजल्ट आ गया वह अच्छे नंबरों से पास हुई थी. माया जी और मैं बहुत खुश थे वह मेरे पास आई और मेरे सीने से लिपट गई मैंने पूछा ...
"अब तो खुश हो ना?"
वह दोबारा मेरे गले से लिपटी और मेरे गालों पर चुंबन देकर कहा
"सब आपके कारण ही हैं" मैं मन ही मन प्रसन्न हो गया था. अचानक मेरे मुंह से निकला
"छाया मुझे क्या मिलेगा" उसने अपनी गर्दन झुका ली और मुस्कुराते हुए बोली "राजकुमारी दर्शन" और पीछे मुड़कर हंसते हुए भाग गई.
 
छाया - भाग 3

जन्मदिन और अनूठा उपहार.
2 दिन बाद छाया का जन्मदिन था. वह १९ वर्ष की होने वाली थी. माया जी ने मुझसे राय कर उस दिन घर में पूजा का आयोजन रखा था. इस शुभ अवसर पर माया जी ने मेरे द्वारा लाई गई साड़ी पहनी थीं. छाया भी मेरे द्वारा लाये खूबसूरत गुलाबी रंग का लहंगा चोली पहनी.

माया जी ने मेरे लिए भी एक सफेद रंग का मलमल का कुर्ता मंगाकर रखा था. छाया आज पूजा का केंद्र बिंदु थी. वह अत्यंत खूबसूरत लग रही थी आस पड़ोस की स्त्रियों ने उसे खूब अच्छे से तैयार किया था. उसके केस खुले और व्यवस्थित थे. मुझसे नजर मिलते ही वह शरमा गई. पूजा खत्म होने के पश्चात सभी मेहमान अपने अपने घर वापस चले गए. माया जी भी थक चुकी थी वह भी भोजन करने के उपरांत अपने कक्ष में विश्राम के लिए चली गई. मैं अभी भी नीचे था व्यवस्था में शामिल अपने दोस्तों को विदा करने के बाद मैं अपने कमरे में आया.
मेरे कमरे से मनमोहक खुशबू आ रही थी.

मेरे बिस्तर पर सफेद चादर बिछी हुई थी. और उस पर मेरी छाया लाल तकिए पर सर रख कर सो रही थी. मैं उसे देखते हुए अपनी कुर्सी पर बैठ गया. छाया मेरी तरफ करवट ली हुई थी. चोली में बंद उसके दोनों स्तन उभरे हुए दिखाई पड़ रहे थे. उसकी दोनों जांघें लहंगे के पीछे से अपने सुडोल होने का प्रमाण दे रहीं थीं. उसका लहंगा थोड़ा ही ऊपर था उसके पैर में लगा हुआ आलता और पाजेब अत्यंत मोहक लग रहे थे. मैं इस खूबसूरती को बहुत देर तक निहारता रहा.
अपने स्वभाव बस मैं छाया के लहंगे को ऊपर उठाने की चेष्टा करने लगा. मैंने उसके लहंगे को घुटनों तक उठा दिया. लहंगे को इससे ऊपर उठाना संभव नहीं हो पा रहा था. तभी छाया करवट से अपनी स्थिति बदलते हुए पीठ के बल आ गई. कुछ देर बाद मैंने उसके लहंगे को थोड़ा और ऊपर किया. अब लहंगा उसकी जांघों तक आ गया. लहंगे को इसके ऊपर ले जाने में मेरी हिम्मत जवाब दे रही थी. बिना छाया की अनुमति के मेरे लिए यह करना उचित नहीं था. छाया अभी भी शांत थी परंतु उसकी धड़कनें तेज थी. मैंने धड़कते हृदय से छाया पुकारा. उसने एक पल के लिए अपनी आंखें खोली मेरी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए दोनों हथेलियों से अपनी आंखें बंद कर लीं मानो वह राजकुमारी दर्शन के लिए अपनी मौन स्वीकृति दे रही हो.
मेरे प्रसन्नता की सीमा न रही मैं छाया के चेहरे के पास गया और उसे गाल पर चुंबन दिया वह मुस्कुरा रही थी. मैंने उसकी चोली के धागों को खोल दिया. स्तनों के आजाद होने से चोली का ऊपरी भाग एसा लग रहा था जैसे उसने स्तनों को सिर्फ ढका हुआ है. मैंने एक झटके में उसे भी हटा दिया छाया के नग्न और पूर्ण विकसित स्तन मेरी नजरों के सामने थे. मेरे मन में उन्हें छूने की तीव्र इच्छा हुई पर मैं इस खूबसूरत पल का धीरे धीरे आनंद लेना चाह रहा था. छाया के दोनों स्तन उसकी धड़कनों के साथ थिरक रहे थे. मैं छाया के लहंगे की तरफ बढ़ा और कमर में बंधी लहंगे की डोरी को ढीला कर दिया. छाया के पैरों की तरफ आकर मैंने लहंगे को नीचे की तरफ खींचने की कोशिश की परंतु लहंगा छाया के नितंबों के नीचे दबा हुआ था. छाया स्थिति को भांप कर अपने अपने नितंबों को थोड़ा ऊपर उठाया और मैंने लहंगे को उसकी जांघों के रास्ते खींचते हुए बाहर निकाल दिया. छाया ने सुर्ख लाल रंग की मेरे द्वारा लाई गई पेंटी पहनी हुई थी. मैंने उसके खूबसूरत लहंगे को अपनी टेबल पर रख दिया. मेरी छाया लाल रंग की पेंटी में अपने खुले स्तनों के साथ लाल तकिए पर अपना सर रखे हुए अधखुली आंखों से मेरी प्रतीक्षा कर रही थी.
मैं छाया के चेहरे के पास गया तथा उससे राजकुमारी दर्शन की अनुमति मांगी. उसने मेरे गालों को पकड़कर मेरे होठों पर चुंबन कर दिया. मैं इस प्रेम की अभिव्यक्ति को बखूबी समझता था. मैंने बिना देर किए उसके होठों को अपने होठों से चूसने लगा. उसके होंठ इतने कोमल थे कि मुझे डर लग रहा था कहीं उसके होठों से रक्त ना आ जाए. इस दौरान मेरे हाथ बिना उसकी अनुमति लिए उसके स्तनों को सहला रहे थे.
मैंने उसके होंठों से अपने होंठ हटाए. मेरे होठों पर रक्त देखकर उसने अपनी उंगलियों से उसे पोछने की कोशिश की. उसकी कोमल उंगलियों के होठों पर आते ही मैंने उन्हें अपने मुंह में लेकर चूसने लगा. उसने मुस्कुराकर अपनी उंगलियां वापस खींच ली.
राजकुमारी दर्शन का वक्त आ चुका था मैं उठकर उसके दोनों पैरों के बीच आ गया. मैंने अपने दोनों हाथों की उंगलियां उसकी पैंटी में फसाई और धीरे-धीरे नीचे की तरफ खींचने लगा. छाया ने एक बार फिर अपने नितंबों को ऊपर उठाया. और पेंटी जांघों से होते हुए घुटनों तक आ गई. क्योंकि मैं दोनों पैरों के बीच बैठा था इसलिए पेंटी का बाहर निकलना मुश्किल हो रहा था.

छाया ने अपने दोनों पैर छत की तरफ उठा दिए. और मैंने उसकी पैंटी को धीरे-धीरे बाहर निकाल दिया. मैंने अपनी आंखें बंद की हुई थीं. मैंने छाया से कहा
"मैं राजकुमारी के दर्शन को यादगार बनाना चाहता हूं मेरा सहयोग करना"
कुछ देर बाद मैंने अपनी आंखें खोली. छाया ने अपने दोनों घुटने अपने स्तनों से सटा रखे थे. उसके दोनों जांघें पूरी तरह फैली हुई थी. उसने अपने कोमल हाथों से अपनी राजकुमारी के मोटे मोटे होठों को को यथासंभव अलग किया हुआ था. रस से भरी हुई राजकुमारी मेरे सामने थी. राजकुमारी का रंग अत्यंत गुलाबी था. उसके ऊपर उसका मांसल मुकुट थोड़ा गहरे रंग का था और अत्यंत मोहक एवं आकार में बड़ा था. मैंने छाया की तरफ प्यार से देखा और बिना किसी अनुमति के अपने होंठों से उसे चूम लिया.
मैंने छाया से कहा
"आज इस राजकुमारी का भी जन्मदिन है" वह मुस्कुरा रही थी.
मैंने अपनी जीभ को राजकुमारी के अंदर प्रवेश करा दिया. रस में डूबी हुई राजकुमारी मेरे जीभ का स्पर्श पाते ही अपना रस बहाने लगी. मेरे होंठ राजकुमारी के होठों से टकरा रहे थे. कुछ ही पलों में छाया ने अपनी कोमल जांघें मेरे दोनों गालों से सटा दीं . मैं पूरी तन्मयता से उसकी राजकुमारी से निकलने वाले रस का स्वाद ले रहा था. मैंने अपनी जीभ से उसकी गहराई नापने की कोशिश की तो छाया में अपनी दोनों जांघों से मेरे मेरे गालों को जोर से दबाया. मैं राजकुमारी में इतना खो गया था कि मुझे छाया के स्तनों का ध्यान भी नहीं रहा. यह उसके खूबसूरत स्तनों से बेईमानी थी. मेरे हाथ उसके स्तनों की तरफ बढ़ चले. अपनी दोनों हथेलियों से मैं उसके दोनों स्तनों को सहलाने लगा. मेरी जीभ राजकुमारी के अंदर बाहर हो रही थी. छाया अपनी उंगलियां से कभी मुझे बाहर की तरफ धकेलती की कभी अपनी तरफ खींच लेती. मैंने एक बार नजर उठाकर छाया की तरफ देखा उसने आंखें बंद कर रखी थी. और बहुत तेजी से हाफ रही थी. मैंने इस बार उसके मुकुट ( भग्नाशा ) को अपने दोनों होंठों के बीच ले लिया. छाया से अब बर्दाश्त नहीं हुआ उसने लगभग चीखते हुए पुकारा
"मानस भैया..."

और अपने दोनों पैर हवा में तान दिए मैंने अपने होठों पर राजकुमारी के कंपन महसूस किये. उसके हाथ अब मेरे सिर को राजकुमारी के पास आने की इजाजत नहीं दे रहे थे. वह कांप रही थी. उसकी राजकुमारी से प्रेमरस बह रहा था. मैं इस अद्भुत दृश्य को देख कर खुश हो रहा था. कुछ सेकंड बाद उसके हवा में तने हुए पैर नीचे आए और मेरे कंधे से छूते हुए बिस्तर पर आ गए. छाया ने अपनी आंखें खोली और इशारे से मुझे ऊपर बुलाया और मेरे होंठों को अपने होंठो में ले लिया. एक पल के लिए मुझे लगा . शायद वो अपने प्रेम रस को मेरे होठों से चूसकर उसका स्वाद लेना चाहती हो.
छाया ने आज एक दिन में इतना कुछ पा लिया था जिसे पाने में कई युवतियों को विवाह तक और कईयों को जीवन भर इंतजार करना पड़ता है. बहुत खुश लग रही थी. उसने कमरे से जाते समय शरमाते हुए बोली
"मानस भैया अपने जन्मदिन पर राजकुमारी को दिया गया आपका यह उपहार मैं कभी नही भूलूंगी." इतना कहकर वह मेरे पास आयी और मेरे कान में बोला
"अब आपको सीमा दीदी की याद भी कम आएगी" कहकर वह बाथरूम में चली गयी.
मैंने अपने राजकुमार को इंतज़ार करने की सलाह दी और कमरे से बाहर चला आया.

राजकुमार से मित्रता
अगले कई दिनों तक छाया मुझसे नहीं मिली. शायद वह शर्मा रही थी. एक दिन वह मेरे कमरे में कुछ सामान निकालने आई. सामाँन काफी उचाई पर था. वह मुझसे उतारने के लिए बोली. मैंने उससे कहा
"मैं तुम्हें ही उठाता हु तुम खुद ही निकाल लो."
वह हँस पड़ी और बोली
"ठीक है:
मैंने उसे उसकी जांघो से पकड़ कर ऊपर उठा लिया . उसके कोमल नितम्ब मेरे हांथों से सटे हुए थे. उसकी राजकुमारी लहंगे के अन्दर से मेरे चहरे से सटी हुए थी. मेरे नथुनों में उसकी खुशबू आ रही थी. मैंने अपने होंठों से उसे चूमने की कोशिश की तो छाया में कहा
" मानस भैया मैं गिर जाउंगी."
मैं रुक गया. उसने सामान निकाल लिया था. वह मुझसे सटे हुए फिसलते हुए नीचे आ रही थी. उसके स्तनों की रगड़ मैंने अपने चहरे पर भी महसूस की. मेरे हाथ उसके नितंबो को भी सहला चुके थे.
उसने अपने कपडे ठीक किये. और बोली
"आप तो हमेशा राजकुमारी के साथ ही छेड़खानी करते हैं मुझे तो राज कुमार से कभी मिलवाया ही नहीं. उस दिन भी आप मुझे बाथरूम में छोड़कर चले गए." कह कर वह सामान लेकर जाने लगी.
मैंने कहा
" वो तब से तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा है."
"अच्छा ? तो मैं सामान माँ को दे कर आती हूँ."
वह चली गयी और मैं और मेरा राजकुमार उम्मीद लिए उसका इंतज़ार करने लगे.
छाया आई और उसमे मुझे आंखे बाद करने के लिया कहा. मैंने भी अपनी आंखे वैसे ही बंद कर लीं जैसे वह राजकुमारी के दर्शन के समय की थी. छाया ने राजकुमार को बाहर निकाल लिया था. उसने कौतूहल भरी निगाहों से मेरे राजकुमार को देखा. उसने उसकी कोमलता और तनाव को नापने की कोशिश की. उसके कोमल हाथों में आते ही राजकुमार उछलने लगा. राजकुमार की धड़कन छाया को बहुत पसंद आ रही थी. जब वह अपने हाथों से उसे दबाती तो राजकुमार ऊपर की तरफ उछलता. छाया को इस कार्य में बहुत मजा आ रहा था. उसने अपनी उंगलियों से राजकुमार की चमड़ी को पीछे किया. चमड़ी पीछे आते हैं मेरा शिश्नाग्र जो अभी आधा खुला था पूरी तरह उसके सामने आ गया. उसके मुंह से निकल गया
"मानस भैया यह कितना सुंदर है" मैं हँस पड़ा. वह शर्मा गयी. उसने अपनी उंगलियों से उसे छुआ. राजकुमार फिर उछला वह इस खेल में तल्लीन हो गई थी. वह मेरे राजकुमार को अपने दोनों हाथों से अपनी इच्छा अनुसार खिलाने लगी. यह उसका पहला अनुभव था और मैं इसमें अपना अनुभव नहीं डालना चाह रहा था. जैसे जैसे वह राजकुमार से अपना परिचय बढ़ाती गयी मेरा तनाव बढ़ता गया मैं अभीअब स्खलित होने वाला था. वह मेरे बिल्कुल समीप बैठी थी जैसे ही उसने अपनी हथेली से शिश्नाग्र को छूना चाहा ज्वालामुखी फूट गया. स्खलित हो रहे लिंग को पकड़ पाना छाया जैसी कोमल युवती के लिए असंभव था. राजकुमार में अपना वीर्य छाया के ऊपर ही छिडक दिया छाया इस अप्रत्याशित वीर्य वर्षा से हतप्रभ थी. उसे शायद इसका अंदाजा नहीं था वह हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई और मेरी तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखी जैसे पूछ रही हो यह क्या हुआ. मैं मुस्कुराने लगा और उसे अपने आलिंगन में खींच लिया.
मैंने उसे बताया
" ये तुम्हारी मेहनत का फल था. अब राजकुमार तुम्हारा मित्र हो गया है" इसका ध्यान रखना.
वयस्क छाया
बैंगलोर आगमन
15 दिन बाद मुझे बेंगलुरु मैं अपनी नई नौकरी ज्वाइन करनी थी मैंने सीमा का इंजीनियरिंग में दाखिला बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित कालेज में कराने के लिए आवेदन कर दिया. माया जी को मैंने जाकर यह सूचना दी कि अब हम सब बेंगलुरु में ही रहेंगे. छाया और माया जी की खुशी का ठिकाना ना रहा. छाया बहुत खुश थी यह आप समझ सकते हैं पर माया जी की खुशी इस बात से भी थी कि उन्हें यहां अकेले नहीं रहना
पड़ेगा. उन्हें इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि मैं उन्हेंअपने साथ ले जाऊंगा. मेरे और छाया के बीच बन चुके इस नए रिश्ते के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.
छाया और माया जी ने अपने जरूरी सामानों की पैकिंग चालू कर दी.
कुछ ही दिनों में बेंगलुरु जाने का वक्त आ गया छाया और माया जी का यह पहला हवाई सफर था. वह दोनों ही बहुत
उत्सुक और खुश थे. माया जी मेरी बहुत शुक्रगुजार थी. छाया तो मेरी प्रेमिका बन चुकी थी. हम हवाई सफर का आनंद लेते हुए बेंगलुरु आ गए.
बेंगलुरु में मेरी कंपनी द्वारा दिया गया नया घर बहुत ही सुंदर था इस घर में दो कमरे बाथरूम सहित एक बड़ा हाल
और एक किचन था सभी कमरे पूरी तरह सुसज्जित थे . उनमें आधुनिक साजो सामान लगे हुए थे कुछ ही घंटों में हम सब घर में व्यवस्थित हो गए. छाया ने तो किचन में जाकर चाय भी बना लाई. माया जी बहुत खुश थी उन्होंने इतने अच्छे घर की कल्पना नहीं की थी. शाम को मैं घर से बाहर जाने लगा ताकि जरूरत की सामग्री ले आऊं तो छाया भी मेरे साथ आ गई. हम दोनों ने घर के आस-पास आवश्यक साजों सामग्री की दुकानें देखीं और अपनी जरूरत का सारा सामान ले आए.
रास्ते में आते समय मुझे एक बढ़िया रेस्टोरेंट दिखा मेरे मन में छाया और माया जी को खुश करने का एक और विचार आया मैंने छाया को बोला तुम घर पहुंचो मैं आता हूं. मैंने फूलों की दुकान से दो खूबसूरत गुलदस्ते लिए और मुस्कुराते हुए घर चल पड़ा. वह अभी लिफ्ट का ही इंतजार कर रही थी. मेरे हाथों में दो गुलदस्ते देखकर वह कौतूहल से भर गई उसने कहा
"यह किसके लिए" मैं कुछ बोलता इससे पहले लिफ्ट आ गइ. और हम दोनों लिफ्ट के अंदर प्रवेश कर गये. लिफ्ट खाली थी हम ऊपर की तरफ चल पड़े. छाया ने दोनों हाथों में सामान पकड़ा हुआ था. मैंने उसे सामान नीचे रखने के लिए कहा और अपने हाथ में लिया हुआ गुलदस्ता उसे दिया. मैंने उसे बड़े प्यार से कहा...
"मेरी प्रेयसी का बैंगलोर और मेरी जिंदगी में स्वागत है."
वह भावुक हो गइ और मुझसे लिपट गई.
"मानस भैया आप बहुत अच्छे हैं" मैंने उसकी गाल पर चपत
लगाई और बोला अब भी भैया बोलोगी क्या. वह मुस्कुराइ और बोली
"घर में तो बोलना ही पड़ेगा"
घर पहुंच कर मैंने दूसरा गुलदस्ता माया जी को दे दिया वह भी बहुत खुश हुयीं और मुझे जी भर कर आशीर्वाद दिया. यह वही माया जी थी जो आज कुछ साल पहले मेरे सपने में आयीं थी पर अब रिश्ते बदल चुके थे उनकी पुत्री मेरी प्रेयसी बन चुकी थी. मैंने माया जी से कहा..
"आप लोग तुरंत अच्छे से तैयार हो जाइए हमें किसी से मिलने जाना है."
माया जी ने कहा...
"मानस अभी बहुत देर हो चुकी है खाना भी बनाना है क्यों ना हम लोग कल चलें"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा..
"आज ही जरूरी है ज्यादा समय नहीं लगेगा" थोड़ी ही देर में हम सब तैयार होकर घर से बाहर आ गए. मैं उन लोगों को लेकर रेस्टोरेंट में गया उनकी प्रसन्नता की सीमा न रही मैंने अपनी पसंद से सभी के लिए भोजन मंगाया और खाना खाकर हम खुशी खुशी घर वापस आ गए. माया जी के रूम में जाते ही छाया मेरे से लिपट गई. उसके स्तनों का मेरे सीने पर दबाव उसके खुश होने की गवाही दे रहा था. अगले कुछ दिनों में धीरे धीरे हम सब नए परिवेश में अपने आप को ढाल रहे थे.

छाया की मालिश
दो हफ्ते बाद छाया का एडमिशन था. उसका कॉलेज मेरे ऑफिस के रास्ते में ही था. छाया के एडमिशन कराने मैं उसके साथ गया. छाया की एडमिशन की प्रक्रिया काफी थकाने वाली थी. एक काउंटर से दूसरे काउंटर दूसरे से तीसरे ऐसा करते करते पूरा दिन बीत गया. हम दोनों बुरी तरह थक चुके थे. वापस टैक्सी में आते समय वह मेरे कंधे पर अपना सर रख कर सो गइ. घर पहुंचते ही पता लगा माया जी सोसाइटी में चल रहे कीर्तन में गई हुई हैं. हम दोनों घर पर आ चुके थे मैं और छाया दोनों ही अपने बाथरूम में नहाने चले गए. कुछ ही देर में फूल की तरह खिली हुई छाया बाथरूम से बाहर आई. मैं उससे पहले ही बाहर आ चुका था. उसने मुझसे कहा पूरे शरीर में दर्द हो रहा है. वह वास्तव में थकी हुई थी. यह बात में भली-भांति समझता था. मैंने कहा
"छाया लाओ में तुम्हारी पीठ में तेल लगा दूं." मेरे मुंह से यह सुनकर वह खुश भी हुई और शर्मा भी गई पर बात निकल चुकी थी उसने कहा
"ठीक है" वह भी रोमांचित लग रही थी.
कुछ ही देर में मैंने किचन से सरसों का तेल ले आया. गांव में सरसों
के तेल की बड़ी अहमियत होती है. मैंने तेल को थोड़ा गर्म कर लिया था. उसने अपनी बिस्तर पर एक बड़ी और मोटी सी पुरानी चादर डाली और पेट के बल लेट गई.
उसने स्कर्ट और टॉप पहना हुआ था. बैंगलोर आने के बाद उसका लहंगा चोली भी स्कर्ट टॉप में बदल गया था. उसे इस तरह तुरंत तैयार होते देखकर मुझे एहसास हो रहा था कि शायद वह इस मालिश से कुछ और भी आनंद लेना चाह रही है. पता नहीं क्यों मुझे यह बात छठी इंद्रिय बता रही थी. मैं धीरे-धीरे उसके पास गया और बिस्तर पर आकर अपने दोनों हाथों से उसके पैरों में तेल लगाने लगा.उसकी पिंडलियों तक पहुंचते-पहुंचते मैंने अपने राजकुमार में तनाव महसूस करना शुरू कर दिया. वह पूरी तरह तन कर खड़ा था. कुछ ही देर में मेरी उंगलियां उसकी जांघो तक पहुंच गई थी वह शांत भाव से लेटी हुई थी. उसने चेहरा एक तरफ किया हुआ था. मुझे उसके गालों पर
लालिमा स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. मैंने अपने हाथ नहीं रोके और मैं उसकी जांघों पर तेल से मालिश करता रहा. कुछ ही देर में स्कर्ट बिल्कुल ऊपर तक उठ गया था. उसके नितम्ब दिखाई पड़ने शुरू हो गए थे. शायद उसने पैंटी मेरे किचन में जाते समय उतार दी थी. . मुझे उसकी दासी की हल्की झलक दिखाई पड़ी. उसके नीचे से उसकी राजकुमारी भी अपनी झलक दिखा रही थी. मैंने उसको उसी अवस्था में रोक दिया और वापस स्कर्ट को थोड़ा सा नीचे कर दिया. अब मैं सीमा की कमर पर तेल लगा रहा था. मैंने स्कर्ट को इतना नीचे किया था जिससे उसके नितंबों का अधिक से अधिक भाग पर मैं तेल लगा सकूं. मेरे हाथ स्कर्ट के अंदर जाकर भी अब पूरे नितंबों को तेल से सराबोर कर चुके थे. धीरे धीरे मैं उसके कमर पीठ और गर्दन तक तेल से सराबोर कर दिया था. मेरे हाथ उसके कोमल शारीर पर फिसल रहे थे. इससे निश्चय ही उसके दर्द और थकान में राहत मिली होगी. मैंने छाया का स्कर्ट व टॉप उतारे बिना उसके नितंबों और पूरे शरीर पर तेल मालिश कर ली थी. उसके नितंबों की मालिश करते समय जितना सुख उसे प्राप्त हो रहा था उतना ही सुख मुझे भी मिल रहा था.
उसके नितंब अत्यंत कोमल थे जब मेरी उंगलियां जांघों के बीच होते हुए नितंबो तक पहुंचती तो कभी-कभी वह उसकी दासी से भी टकरा जाती. उन मांसल जांघों और नितंबों के बीच के बीच उंगलियां फिसलाते हुए मुझे अद्भुत आनंद मिल रहा था. कुछ ही देर में मुझे उंगलियों पर राजकुमारी के प्रेम रस की अनुभूति हुई. उंगलियों के राजकुमारी के होठों से टकराहट से राजकुमारी उत्तेजित हो चुकी थी और उसका प्रेमरस उसके होठों पर आ चुका था.
मैंने छाया को पीठ के बल लेट जाने का इशारा किया. उसके स्तन उसके टॉप के नीचे थे. जांघे खुली हुई थी. मैंने उसके पैरों पर तेल लगाना शुरू किया. उसके उंगलियों, टखनो और घुटनों पर तेल लगाने के पश्चात धीरे-धीरे मेरे हाथ उसकी जांघों तक पहुंचते गए. उसकी जांघे अत्यंत सुंदर थी. छाया ने अपना एक पैर थोड़ा ऊपर किया. मुझे राजकुमारी के दर्शन हो गए. यह समझते ही उसने अपना पैर पुनः नीचे कर लिया. मैं उसकी जांघों की मालिश करता रहा और मेरी उंगलियां राजकुमारी के करीब पहुंच चुकी थी. उसका स्कर्ट अभी भी राजकुमारी के ऊपर था. कुछ देर उसकी जांघों की मालिश करने के बाद मैंने अपनी उँगलियों से उसकी राजकुमारी को छुआ.
छाया के चेहरे पर तनाव दिख रहा था वह इस आनंद की अनुभूति कर तो रही थी पर थोड़ा घबराई हुई थी.मैंने अपनी उंगलियां राजकुमारी से हटा लीं और वापस उसकी नाभि प्रदेश में चला गया. धीरे-धीरे मैंने उसकी नाभि पर तेल लगाया और बढ़ते बढ़ते स्तनों तक आ पहुंचा. मैंने स्तनों को बिना छुए स्तनों के बीच की जगह और अगल-बगल तेल से सराबोर कर दिया. मैं उसके कंधे की भी मालिश कर रहा था और गर्दन पर अपनी उंगलियां फिरा रहा था. छाया पूरी तरह आनंद के आगोश में थी.
मैंने उसके माथे पर चुंबन दिया और अब मैं उसके स्तनों पर तेल लगाना शुरू कर चुका था. उसके स्तन अत्यंत कोमल थे. आज कई दिनों बाद मैं उसके नग्न स्तनों को इस प्रकार से छू रहा था. स्तनों को तेल लगाते वक्त मैं उन्हें उनके आकार में लाने की कोशिश कर रहा था. मैं अपनी हथेलियों से उन्हें आगे की तरफ खीचता . अपने हाथों से लेकर दबाते हुए ऊपर की तरफ आता और उनके निप्पलों को अपनी तर्जनी और अंगूठे के बीच रखते हुए उन्हें सहलाता. जैसे मैं उसके स्तनों
को उचित आकार देने की कोशिश कर रहा था जो गुरुत्वाकर्षण की वजह से अभी थोड़ा दबे हुए लग रहे थे.
छाया आनंद से अभिभूत थी. उसके चेहरे पर संतुष्ट के भाव दिखाई पड़ रहे थे पर उत्तेजना से उसके गोरे चेहरे पर लालिमा आ गयी थी. कुछ देर स्तनों की मालिश करने के बाद मैंने उसके पैरो में हलचल देखी. उसके
पैर तन गए थे. छाया स्खलित होने की प्रतीक्षा कर रही थी. उसकी जाँघों का कसाव और उनमे हो रही हलचल इस बात का प्रतीक थी. छाया कभी अपने दोनों जाँघों को एक दूसरे में सटा लेती और कभी उन्हें फैलाती. मैं उसकी स्थिति को समझ रहा था. मैं अपनी उंगलियां
उसकी जांघों के बीच ले गया और अपनी हथेली और उंगलियों से उसकी राजकुमारी को एक आवरण दे दिया.
मेरी उंगलियां राजकुमारी के होंठों में घूमने लगी जो प्रेम रस से भीगे हुए थे. हुए थे. कुछ ही देर में मैंने छाया के जांघों का दबाव अपनी हथेलियों पर महसूस किया. उसने अपनी दोनों जांघों को ऊपर उठा लिया था. मुझे राजकुमारी के कंपन महसूस होने लगे थे. मैं कुछ देर राजकुमारी को यु ही सहलाता रहा. अपने दूसरे हाथ से मैं उसके स्तनों को भी सहला रहा था. अंततः राजकुमारी स्खलित हो गई. छाया के मुख से " मानस भैया ............." की धीमी आवाज आयी जो अत्यंत उत्तेजक थी. सीमा की जांघें अब तनाव रहित हो चुकी थी. उसके पैर फैल चुके थे और धड़कन बढ़ी हुई थी.
मैंने फिर से उसे माथे पर चूमा और उसका स्कर्ट तथा टॉप को नीचे कर दिया और कमरे से बाहर आ गया.
कुछ देर बाद छाया भी हाल में आई वह बहुत खुश लग रही थी उसके चेहरे पर तृप्ती के भाव थे.

छाया और पूर्ण एकांत
बेंगलुरु आने के पश्चात मैं और छाया एक दूसरे के बहुत करीब आ चुके थे पर हमें कभी एकांत नहीं मिल पाता था. हम दोनों एक दूसरे के आलिंगन में आते एक दूसरे को सहलाते. कभी-कभी छाया मुझे इस स्खलित भी करा देती. परन्तु जिस तरीके का आनंद राजकुमारी दर्शन में आया था ऐसा आनंद कई दिनों से नहीं मिल पा रहा था. छाया की मालिश करने का सुख भी अद्भुत था पर उसे भी कई दिन हो चुके थे.
मुझे छाया को नग्न देखने की तीव्र इच्छा हो रही थी.इन दिनों वह जींस और टॉप में और सुन्दर एवं आधुनिक लगती थी. हम दोनों ने एक दूसरे को पूर्ण नग्न देखा तो जरूर था पर जी भर कर नहीं. राजकुमारी दर्शन के समय मेरा सारा ध्यान उसकी राजकुमारी पर ही केंद्रित था. छाया को पूर्ण नग्न देखने के विचार से ही मेरा मन प्रसन्न हो उठता था.
अंततः एक दिन भगवान ने यह अवसर हमें दे ही दिया. माया जी को पड़ोस की एक महिला के साथ एक पूजा में जाना था. मैं और छाया दोनों घर पर ही थे. उनके जाने के बाद मेरे मन में छाया को पूर्ण नग्न देखने का विचार आया. मुझे पता नहीं था वह क्या सोचती पर मैंने पूरे
मन से ऊपर वाले से प्रार्थना की और इसके लिए अपने मन में निश्चय कर लिया. कुछ देर बाद छाया मेरे कमरे में चाय लेकर आई तो मैंने उसे एक छोटा खत उसे देते हुए बोला..
" छाया इसे हाल में जाकर पढ़ लेना" खत में मैंने लिखा था
" छाया मैं तुम्हें पूर्णतया नग्न देखना चाहता और तुम्हारे साथ कुछ घंटे इसी अवस्था में बिताना चाहता हूं . यदि तुम्हें यह स्वीकार हो तो कुछ देर बाद चाय का कप लेने वापस आ जाना अन्यथा इस टुकड़े को फाड़ कर फेंक देना. तुम मेरी प्यारी हो और हमेशा रहोगी. मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार ही आगे बढ़ता रहूंगा"
मुझे नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है क्या छाया इतनी हिम्मत जुटा पाएगी? १९ वर्ष की लड़की क्या मेरे साथ पूरी तरह नग्न होकर कुछ घंटे से व्यतीत कर पाएगी. मैं इसी उधेड़बुन में फंसा चाय पी रहा था. चाय कब ख़त्म हो गयी मुझे पता भी न चला. तभी दरवाजा खोलने की आवाज हुई. छाया अंदर आ रही थी. मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था. छाया अंदर आई उसने चाय का गिलास लिया और एक कागज रख कर वापस चली गई. मैंने वह कागज उठाया जिसमें लिखा था ठीक 10:30 बजे पर आप भी हॉल में उसी अवस्था में मेरा इंतजार कीजिएगा.
मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा था. घड़ी 9:45 दिखा रही थी. मैं तेजी से बाथरूम की तरफ भागा और नहा धोकर तैयार हो गया. आज का दिन मेरे लिए विशेष होने वाला था. कुछ ही देर में मैं हॉल में सोफे पर बैठा छाया का इंतजार कर रहा था. मेरा राजकुमार छाया के इंतजार में
अपनी गर्दन उठाए हुए था. ठीक 10:30 बजे छाया ने अपने कमरे का दरवाजा खोला और बाहर आ गई. वह दरवाजे के पास कुछ देर तक खड़ी रही. उसका एक पैर आगे की तरफ निकला था तथा उसके दोनों हाथ उसके कमर पर थे. ऐसा लग रहा था जैसे उसने जानबूझकर मुझे खुश करने के लिए यह पोज बनाया थी. उसके स्तन अत्यंत खूबसूरत लग रहे थे और पूरी तरह तने हुए थे .स्तनों के नीचे उसकी नाभि और राजकुमारी के बीच का भाग उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे. राजकुमारी के आसपास का भाग अत्यंत सुंदर लग रहा था. उसके बाल सामने की तरफ आए हुए थे तथा उसके बाएं स्तन को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे. दोनों जांघें एक दूसरे से सटी हुई थीं . वो कुछ देर इसी तरह खड़ी रही फिर धीरे धीरे चलते हुए मेरे समीप आ गयी.
छाया जैसी खूबसूरत नवयौवना को नग्न देखकर मेरे मन में तूफान मचा हुआ था. वह मेरे पास आकर खड़ी हो गयी. मैं स्वयं भी उठ खड़ा हुआ उसकी आंखें झुक गई थी. वह मेरे राजकुमार पर अपनी नजरें गड़ाई हुई थी हम कुछ देर एक दूसरे को यूं ही देखते रहे. अंततः हमारे बीच दूरी कम होती गई. कुछ समय में हम दोनों आपस में आलिंगन बंद हो चुके थे. मैंने छाया को अपने से सटा लिया था और उसकी गालों पर लगातार चुंबन ले रहा था. वह भी मेरे चुम्बनों का जवाब दे रही थी. उसके स्तन मेरे सीने से सटे हुए थे. मेरा राजकुमार उसके पेट पर दबाव बनाया हुआ था. मेरे हाथ उसकी पीठ से होते हुए उसके दोनों नितंबों को छूने लगे. मैंने महसूस किया छाया की हथेलियाँ धीरे धीरे बढ़ते हुए मेरे राजकुमार तक जा पहुंची थीं. वो उसे पकड़ कर सहला रही थी. मैं उसके नितंबों पर ही पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए था. कभी कभी मेरी उंगलियाँ छाया की राजकुमारी के होठों को छू लेतीं. राजकुमारी उन्हें प्रेम रस की सौगात देती और वो भीग कर वापस सहलाने में लग जातीं.
छाया ने उसने अपनी एड़ियां ऊंची कर अपना चेहरा मेरे पास लाया. मैंने उसके होठों को फिर से चूम लिया. छाया ने अपना एक पैर ऊपर किया मेरा राजकुमार जो अभी तक छाया के पेट से टकरा रहा था उसमें और हरकत हुई. छाया ने अपने कोमल हाथों से उसे पकड़ा तथा अपनी जांघों के बीच ले आयी. मेरा लिंग अब उसकी दोनों जांघों के बीच था. उसके प्रेम रस से उसकी जांघों के बीच का हिस्सा चिपचिपा
हो गया था. मैंने अपने राजकुमार को आगे पीछे करना शुरू कर दिया. राजकुमार का ऊपरी भाग छाया की राजकुमारी से स्पर्श करता हुआ आगे जाता और आगे जाकर मेरी उंगलियों से टकराता जो छाया के नितंबों को सहला रही होतीं
अचानक मेरे राजकुमार ने राजकुमारी के मुख पर अपनी दस्तक दे दी. मैंने उसे पुराने रास्ते पर ले जाने की कोशिश की पर पर उसे यह नया रास्ता ज्यादा पसंद आ रहा था. मैंने अपनी कमर को थोड़ा पीछे किया और दोबारा उसकी जांघों के बीच से ले जाने का प्रयास किया पर इस बार भी वह राजकुमारी के मुंह में जाने को तत्पर था. छाया चौंक गयी और मेरी तरफ शरारती नजरों से देखते हुए मुझ से थोड़ा दूर हो गई. उसके हाथ धीरे-धीरे राजकुमार की तरफ बढ़ने लगे जैसे वो इस गुस्ताखी की सजा देने जा रही हो.
मैंने छाया को अपनी अपनी बायीं जांघ पर बैठा लिया. मैंने अपने बाएं हाथ से उसकी पीठ को सहारा दिया तथा हथेलियों से उसके बाएं स्तन को सहलाने लगा. मेरा दाहिना हाथ उसके नाभि प्रदेश को सहलाता हुआ उसकी राजकुमारी तक पहुंच गया. उसका दाहिना स्तन मेरे सीने से चिपका हुआ था. मैंने अपनी हथेली से उसकी राजकुमारी को पूरी तरह आच्छादित कर लिया मेरी उंगलियां राजकुमारी के होठों से खेलने लगी.छाया का दाहिना हाथ मेरे राजकुमार को अपने आगोश में ले चुका था. वह अपनी हथेलियों से मेरे राजकुमार को आगे पीछे कर रही थी. हम दोनों इस अद्भुत आनंद में डूबे हुए थे. मैं छाया के गालों और गर्दन पर लगातार चुंबन ले रहा था. वह भी अपने होठों से मुझे चुंबन दे रही थी. हम दोनों एक दूसरे को बड़ी तन्मयता से सहला रहे थे. कुछ देर तक हम इसी तरह एक दूसरे को प्यार करते रहे. हमारी उंगलियां तरह-तरह की अठखेलियां करते हुए एक दूसरे को खुश कर रही थीं.
कुछ ही देर में छाया की जांघें तन रही थी. वह स्खलित होने वाली थी और अपनी जाँघों का दबाव लगातार मेरी हथेलियों पर बढ़ा रही थी. कुछ ही देर में छाया ने मुझे अपनी तरफ खींच कर सटा लिया उसकी जांघें पूरी तरह मेरी हथेलियों को दबा ली थीं. छाया के मुख से " मानस भैया ............." की आवाज धीरे धीरे आ रही थी जो अत्यंत उत्तेजक थी. मुझे अपनी हथेलियों पर एक साथ ढेर सारे प्रेम रस की अनुभूति हुई. छाया स्खलित हो चुकी थी. मैंने उसके दोनों पैर अब अपने ऊपर रख लिए थे वह एकदम मेरी गोद में आ चुकी थी.
मेरा राजकुमार उसके नितंबों से टकरा रहा था. वह उसके हाथों से छूट चुका था. छाया खुद को नहीं संभाल पा रही थी वह मेरे राजकुमार को क्या संभालती. वह मासूम सी मेरी गोद में नग्न पड़ी हुई थी और अपनी स्खलित हो चुकी राजकुमारी को धीरे-धीरे शांत कर रही थी. इस अद्भुत दृश्य को देखकर मेरे मन में छाया के प्रति असीम प्यार उत्पन्न हो रहा था .
मैंने उसके स्तनों को चूम लिया. उसकी तंद्रा टूटी और वह उठकर खड़ी
होने लगी. उसकी जाँघों से बहते प्रेमरस की अनुभूति ने उसे शर्मसार कर दिया था. मैंने सोफे पर पड़े तकिए से उसकी जांघों को पोछ दिया. वह खुश हो गई धीरे-धीरे वह मेरे पास आयी और सोफे के पास रखे स्टूल पर बैठ गई.
उसका सारा ध्यान मेरे राजकुमार पर केंद्रित हो गया. वह अपने दोनों हाथों से उसे पूरी तरह से सहलाने लगी. मुझे उसकी राजकुमारी भी दिखाई पड़ रही थी मेरी नजर वहां पढ़ते ही छाया ने मेरी तरह शरारती निगाहों से देखा और अपनी जाँघों को सटा लिया. मैंने अपने दोनों पैरों
से उसकी जांघें फिर अलग कर दीं. राजकुमारी मुझे साफ दिखाई दे रही थी. छाया के हाथ लगातार अपने करतब दिखा रहे थे छाया मेरे बिल्कुल समीप थी. मैं उसके स्तनों को भी सहला ले रहा था. राजकुमार वीर्य स्खलन के लिए तैयार था. मैंने छाया के होंठो को चूमा
और वीर्य की धार फूट पड़ी जो छाया के चेहरे और स्तनों को भिगो दी. उसे इतने सारे वीर्य की उम्मीद न थी. इस कला में वह पारंगत हो गई थी . उसने राजकुमार को इसका पूर्णतयः शांत हो जाने पर हो छोड़ा और मेरे होठों पर चुंबन किया.
मैंने उसे अपने पास खींच लिया. अब उसकी दोनों जांघे मेरी दोनों जांघों के दोनों तरफ हो गई. उसके दोनों घुटने सोफे पर थे. वह मेरी गोद में थी. मेरा राजकुमार है जिसमें अब तनाव न था वह राजकुमारी के संसर्ग में चाह कर भी नहीं आ पा रहा था. धीरे-धीरे वह नीचे की तरफ झुक गया था. राजकुमारी मेरे पेट से सटी हुई थी. छाया का शरीर मेरे वीर्य से नहाया हुआ था. मैंने अपने हाथों से छाया के स्तनों पर उसकी मालिश कर दी. वह हंस रही थी और मुस्कुरा रही थी. उसके होठों पर लगा वीर्य हमारे होठों के बीच कब आ गया हमें पता ही नहीं चला. मैं लगातार उसे झूम रहा था. मेरे हाथ अभी भी उसके नितंबों को सहला रहे थे और बीच-बीच में दासी को छु रहे थे जब मेरे हाथ दासी को छूते वह मुझे शरारती निगाहों से देखती मैं उसे फिर चूम लेता. हम दोनों मुस्कुरा रहे थे.

कुछ देर इसी अवस्था में रहने के बाद छाया मुझसे अलग हुई. मैंने उसे अलग हो जाने दिया वह मेरे बगल में कुछ देर बैठी रही. हम एक दूसरे को देखते रहे. आज हम दोनों पूर्णतयः तृप्त महसूस कर रहे थे. इसी अवस्था में मैंने छाया से चाय पीने की इच्छा जाहिर की छाया उसी तरह नग्न अवस्था में चाय बनाने चली गई. उसके नितंब पीछे से स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे. छाया के चलते समय उसके कम्पन मोहक लग रहे थे. उसके शरीर के उतार-चढ़ाव भी पीछे से स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे. उसके नितंबों के बीच थोड़ी सी जगह से उसकी राजकुमारी के होंठ भी दिखाई पड़ रहे थे. यह दृश्य देखकर राजकुमार में हलचल हुई और मैं छाया के पास दोबारा चल पड़ा. मैंने उसकी पीठ से अपने शरीर को सटा दिया मेरे दोनों हाथ उसके स्तनों को फिर से सहलाने लगे. चाय पीने के पश्चात हम दोनों फिर एक दूसरे के आगोश में थे. इसी प्रकार नग्न अवस्था में खेलते हुए छाया मेरे बाथरूम में आ चुकी थी. हम दोनों ने एक साथ स्नान किया और अंत में मैंने स्वयं अपनी छाया को कपड़े पहनाये इस दौरान वो मुझे चूमती रही. वह मुझसे लगभग चार साल छोटी थी और कभी कभी मैं खुद को बड़ा मानकर उसे प्यार करता था.
छाया ने मुझसे कहा..
" कभी उत्तेजना के दौरान मेरा कौमार्य भेदन हो गया तो?
वह चिंतित लग रही थी.
मुझे भी इस बात की चिंता थी. मैं उसका हाँथ पकड़कर भगवान की मूर्ती के पास ले गया और उसे वचन दिया " जब तक तुम्हारा विवाह नहीं हो जाता मैं तुम्हारा कौमार्य भेदन नहीं करूंगा तुम्हारे कहने पर भी नहीं."
वह खुश थी और उसे मुझ पर पूरा विश्वाश भी था. यह एकांत हम दोनों के लिए हम दोनों के लिए ही
यादगार था.
 
छाया भाग -4
छाया मेंरी प्रेयसी
आप कल्पना कर सकते हैं कि जब आपकी प्रेयसी आपके साथ रह रही हो और आप दोनों के बीच कामुक संबंध हों तो जीवन कितना सुखद हो सकता है. मेरे लिए मेरा घर ही स्वर्ग बन चुका था छाया अब जो मेरी प्रेयसी थी उसे आने वाले समय में मैं उसे पत्नी की तरह स्वीकार करने के लिए मन बना चुका था परंतु इसके लिए अभी छाया की पढ़ाई पूरी होनी बाकी थी. हमारे पास अपने प्रेम संबंधों को जीने के लिए ३-४ वर्ष थे. छाया और माया जी के साथ शुरू से ही मेरा कोई संबंध नहीं था पर पिछले वर्ष छाया मेरी जिंदगी में आयी और उसके कारण ही माया जी से मेरा रिश्ता बना.
परिस्थिति वश छाया मुझे मानस भैया बुलाया करती थी जो अब उसकी आदत में आ गया था मेरे एक दो बार मना करने के बाद अब वह मुझे आप, जी, सुनिए इन्हीं शब्दों से बुलाया करती परंतु मुझे सिर्फ मानस बुलाना उसे पसंद नहीं था. पर जब भी वह स्खलित होती मुझे उसके मुख से मानस भैया ही निकलता. मेरे मना करने पर वह कहती
"ठीक है अगली बार नहीं." और मुस्कुराने लगती. पर स्खलित होते समय वह भूल जाती और उसके मुख से मानस भैया ही निकलता. मैं उसे स्खलन के समय टोकना नहीं चाहता था. मुझे लगता था वो सीमा से प्रेरित थी वो भी मुझे मानस भैया ही बुलाया करती थी.

छाया को नग्न देखें कई दिन बीत चुके थे. मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. हम दोनों अपनी छोटी छोटी मुलाकातों में अपने राजकुमार और राजकुमारी को स्खलित करा लेते थे पर तन्मयता से प्यार का सुख नहीं मिल पा रहा था. नग्न छाया को अपनी गोद में लेने का सुख अद्भुत था.
अगले दो दिनों तक छुट्टियां थी मैं अपने दिमाग में छाया के साथ एकांत में वक्त बिताने के लिए उपाय सोच रहा था. घर पहुंचने के बाद छाया ने दरवाजा खोला. वह घर पर अकेली थी. मैंने उससे पूछा
"माया जी कहां है?"
"घर का राशन खत्म हो गया था वही लेने वह पड़ोस की एक आंटी के साथ गई है. आप नहा कर तैयार हो जाइए मैं आपके लिए चाय ले आती हूं."
यह सुनते ही मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा मैंने दरवाजे की कुण्डी लगाई और छाया को अपनी गोद में उठा कर अपने कमरे में ले आया वह खिलखिला कर हंस रही थी. मैंने बिना देर किए अपने कपड़े उतारे वह मुझे मंत्रमुग्ध होकर देख कर रही थी. मैंने उसे अपने आलिंगन में ले लिया और उसका टॉप उतार दिया उसने भी अपने दोनों हाथ ऊपर करके उसे उतारने में मेरी मदद की और खुद ही अपनी स्कर्ट को नीचे
कर उससे बाहर आ गई. उसने अंदर ब्रा और पेंटी नहीं पहनी थी मैंने समय व्यर्थ न करते हुए अपने आलिंगन में ले लिया. मैंने उसे थोड़ा ऊपर उठाया और धीरे धीरे चलते हुए बाथरूम में आ गया उसने इसकी उम्मीद नहीं की थी मैंने तुरंत ही शॉवर आन कर दिया. हम दोनों भीग चुके थे. वह मेरा साथ देने लगी मैंने थोड़ा शावर जेल छाया के हाथ में दिया और थोड़ा अपने हाथ में लेकर उसके शरीर पर मलने लगा उसने भी मेरे सीने और पीठ पर साबुन लगाना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में उसके हाथ मेरे राजकुमार तक पहुंच गए मैंने भी उसके नितंबों को
अपने हाथों में ले लिया. हम एक दूसरे को सहलाते और स्पर्श करते रहे. मैंने उसकी राजकुमारी को भी साबुन से भिगो दिया. हम दोनी एक दुसरे के अंग प्रत्यंगों को सहलाते हुए शावर के नीचे नहा रहे थे,
छाया ने अपनी पीठ मेरी तरफ कर ली थी अब मेरे हाथ उसके स्तनों और नाभि प्रदेश को बड़े अच्छे से सहला रहे थे मेरी उंगलियां उसकी राजकुमारी को छू रही थी इधर मेरा राजकुमार भी उसके नितंबों के नीचे से होता हुआ सामने की तरफ आ चुका था तथा कभी-कभी मेरी उंगलियों से टकरा था. मैंने अपने राजकुमार को अपनी ही उंगलियों से राजकुमारी के समीप लाया छाया ने मुझे पलट कर देखा और मेरे गालों पर चुंबन जड़ दिया. मेरा यह कृत्य उसे अच्छा लगा था मैंने यही काम दो तीन बार किया. छाया ने अपनी राजकुमारी को राजकुमार के अग्रभाग से रगड़ने के लिए अपने शरीर को थोड़ा आगे झुका लिया था.
अब राजकुमार राजकुमारी के मुहाने पर खड़ा था. मेरे कमर हिलाने पर वह राजकुमारी के मुख पर अपनी दस्तक दे रहा था. इस समय सावधानी हटी और दुर्घटना घटी की स्थिति बन चुकी थी. छाया का कौमार्य एक गलती में ख़त्म हो सकता था. मेरे राजकुमार छाया कि कौमार्य झिल्ली से छू रहा था. उसका शिश्नाग्र लगभग राजकुमारी के मुंह में प्रवेश कर चुका था परंतु उसका धड़ बिना कौमार्य झिल्ली का भेदन किए अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था.
हम दोनों लोग पूरी तरह उत्तेजित हो चुके थे. छाया ने अपनी हथेलियों का प्रयोग कर मेरे राजकुमार के लिए तंग और चिपचिपा रास्ता बना दिया इसमें एक तरफ उसकी हथेली थी और दूसरी तरफ राजकुमारी के होंठ. इस रास्ते का मुंह छाया की भग्नासा पर खत्म होता था. मैंने अपनी कमर को तीन चार बार आगे पीछे कर अपने राजकुमार से उसकी भग्नासा पर 3 - 4 कोमल प्रहार किए.
छाया कांप रही थी. मैंने अपने दोनों हाथ उसके नाभि प्रदेश पर रखकर उसे सहारा दिया हुआ था. मेरे अगले प्रहार पर " मानस भैया ............." की उत्तेजक मुझे सुनाई दे गयी. . छाया स्खलित होने लगी थी. मैंने स्थिति को जानकर उसे कुछ देर यूं ही रहने दिया और अपने राजकुमार को आगे पीछे करता रहा.
कुछ देर बाद वह सामान्य हुई मैं उसके गाल पर मीठी सी चपत लगाईं और बोला
"फिर भैया"
वह पलट कर मेरे सीने से लग गयी. मैंने उसे चूम लिया. मेरा राजकुमार भी लावा उगलने के लिए तैयार खड़ा था. छाया को आलिंगन में लिए हुए मैं अपने राजकुमार को सीमा की नाभि के आसपास रगड़ने लगा जितना ही मैं सीमा के नितंबों को अपनी तरफ खींचता मेरे राजकुमार पर घर्षण उतना ही बढ़ता सीमा भी इस कार्य में मेरा साथ दे रही थी. वह तथा अपने स्तनों को लगातार मेरी छाती से हटाए हुए थी.
अचानक मैंने अपनी कमर को नीचे कर राजकुमार को राजकुमारी के मुख में कर दिया एक बार फिर छाया के कौमार्य ने मेरे राजकुमार को आगे जाने से रोक दिया पर राजकुमार ने उत्तेजित होकर लावा छोड़ दिया.
वीर्य प्रवाह के दौरान राजकुमार का उछलना ऐसा प्रतीत हो रहा ऐसे प्रतीत हो रहा था जैसे हम दोनों की नाभि के नीचे कोई बड़ी मछली आ गई थी जिसे हम दोनों ने बीच में दबाया हुआ हो. राजकुमार उछल उछल कर वीर्य वर्षा कर रहा था पर बीच में दबे होने के कारण उसका वीर्य उसके आस पास ही गिर रहा था. मैं और छाया ने एक दुसरे को पूरी तरह एक दुसरे से चिपकाया हुआ था.
कुछ देर बाद छाया मुझसे अलग हुइ अपने आप को साफ किया और तौलिया लेकर बाहर आ गई.
छाया ने माया जी को बाजार बाजार दिखा कर हमारे मिलन को आसान कर दिया था.

पनपती कामुकता
छाया को बैंगलोर आये एक वर्ष बीत चुका था. छाया में आशातीत परिवर्तन आ चुका था. गांव की भोली भाली और कमसिन छाया अब नवयौवना बन चुकी थी. उसकी त्वचा और स्वाभाविक सुंदरता भगवान द्वारा दिया गया एक अद्भुत उपहार था. उसके केश चमकीले थे इन सबके वावजूद शहर की टिप टॉप लड़कियों की तुलना में कभी कभी वह अपने को पीछे समझती. पिछले कुछ महीनों में छाया ने सजना सवारना शुरू कर दिया था. मुझे यह बहुत अच्छा लगता. वह जब भी तैयार होकर मेरे पास आती और पूछती..
"मैं कैसी लग रही हूँ."
मैं कहता
"जैसे भगवान् ने तुम्हे इस धरती पर भेजा था तुम वैसे ही अच्छी लगती हो." वो समझ गयी और मुस्कुराने लगी.
छाया को अपने बालों को सवारने थे. उसने मुझसे ब्यूटी पार्लर ले जाने के लिए कहा. मैं उसकी बात तुरंत मान गया उसके केस ब्यूटी पार्लर वालों ने बहुत खूबसूरती से सजाएं.
उसके सीधे बाल अब थोड़े घुंघराले हो गए थे. उसकी छरहरी काया पर भी अब कुछ वजन भी आ गया था. सुख के दिनों में यह स्वाभाविक होता है. उसे शारीरिक और मानसिक दोनों ही सुख प्राप्त थे. मेरे साथ चल रहे प्रेम संबंधों और कामुक गतिविधियों ने उसके चहरे पर नव वधु वाली लालिमा भी ला दी थी. अब वह अत्यंत मादक दिखाई देने लगी थी. मेरे बार बार स्तन मर्दन से उसे स्तन भी आकर में बड़े हो गए थे.
मेरी अबोध सिनेमा की माधुरी दीक्षित अब धीरे-धीरे मनीषा कोइराला के रूप में परिवर्तित हो रही थी..
जब भी मैं उसे अपने साथ लेकर बाहर जाता वह लोगों के आकर्षण का केंद्र बनती. कई बार तो मुझे इस बात को लेकर गुस्सा भी आता पर मन ही मन मैं उन्हें माफ कर देता अप्सरा के दर्शन लाभ से यदि उन्हें खुशी मिलती है तो इसमें छाया या मेरा कोई नुकसान नहीं था. मैं खुश होता कि यह अप्सरा मेरी है.
समय के साथ सीमा कामुक हो चली थी. वह अक्सर माया जी को काम में तल्लीन देखकर मेरे कमरे में आ जाती और दरवाजे की ओट लेकर मुझे अपने पास बुलाती. हम दोनों आलिंगन में बंध जाते मैं छाया को किस करता और वह मेरे चुम्बनो का आनंद उठाते हुए मेरे राजकुमार को अपने दोनों हाथों में लेकर अत्यंत उत्तेजित कर जाती और कुछ ही देर में बिना मुझे इस स्खलित किये मेरे कमरे से चली जाती. मैं भी उसके नितम्बों और स्तनों को सहला कर उसे भी उत्तेजित कर देता. हम दोनों अक्सर इसी अवस्था में रहा करते.
छाया या तो पढ़ रही होती या मेरे साथ यही खेल खेल रही होती. उसमें एक अच्छी बात थी. अक्सर शाम को आफिस से आने के बाद हम दोनों एक दुसरे को उत्तेजित करते. वह अपनी राजकुमारी की प्यास शांत करें या ना करें मेरे राजकुमार को अवश्य स्खलित करा देती थी और मैं खुशी-खुशी निद्रा के आगोश में चला जाता था. वह देर रात तक पढाई करती थी. मुझे उसकी यह आदत बहुत पसंद थी.
मुझे उसके कोमल अंगों को छूने में बहुत आनंद आता था पर मैं कभी उसे कष्ट नहीं देना चाहता था. . मैंने छाया का मुखमैथुन तो राजकुमारी दर्शन के समय किया था. परंतु उसने आज तक मेरे राजकुमार को मुख मैथुन का सुख नहीं दिया था. शायद उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था. मैंने भी कभी इस बात के लिए उसे प्रेरित नहीं किया था. मैं उससे बहुत प्यार करता था और उसमें स्वाभाविक रूप से पनप रही कामुकता का ही आनंद लेता था. मैंने उसका मुख मैथुन करने का प्रयास एक दो बार और किया था पर उसने रोक दिया था.
वह जैसा चाहती मैं उसके साथ वैसा ही करता था.
यह छाया को ही निर्धारित करना था कि उसे अपनी कामुकता को किस हद तक ले जाना है मैं सिर्फ उसका साथ दे रहा था.

छाया और उसकी सहेलियां
छाया के साथ मैं अब अक्सर बाहर जाने लगा था. हमारे पास घर से बाहर जाने के कई बहाने थे. छाया के वस्त्र भी अब समय के अनुसार बदल चुके थे. अब वह जींस और टीशर्ट में आ चुकी थी. पतली टाइट फिट जींस और ढीला टॉप उसे बहुत पसंद था. वह जानबूझकर अपने टॉप को अपने कूल्हों तक रखती थी ताकि वह एक संस्कारी युवती लगे.
छाया पर बीसवां साल लग चूका था. मन ही मन वह कामुक थी पर बाहर से एक दम सौम्य थी. जब भी मैं उसे बाजार या किसी शॉपिंग मॉल में ले जाता अक्सर लोगों की निगाहें हम पर ही रहती वह अत्यंत खूबसूरत थी.
एक बार हम मॉल में घूम रहे थे तभी छाया की कॉलेज की कुछ सहेलियां वहां आ गई. उसे मेरे साथ देख कर उन्होंने छाया को छेड़ा..
'अरे वाह हमारी परी को उसका राजकुमार मिल गया " छाया शर्मा गई (विशेषकर राजकुमार शब्द पर) परंतु मुस्कुरा कर उनकी बात टालने की कोशिश की पर वह सब मुझसे मिलने को आतुर थीं. छाया ने मजबूरी बस उनका परिचय मेरे से कराया. छाया ने कहा..
"यह मानस जी हैं" इसके आगे वह कुछ बोलती उसकी एक सहेली बोली
"और यह छाया के बॉयफ्रेंड हैं" यह कहकर बाकी सहेलियों के साथ हंसने लगी. मैं भी मुस्कुरा दिया. उन्होंने स्वयं ही हमारा और छाया का रिश्ता अपने विवेक के हिसाब से चुन लिया था. मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी. उन्होंने मुझे छेड़ा..
"मानस जी छाया इतनी कोमल है और आप इतने हष्ट पुष्ट
हैं अपनी शक्ति वहां कम ही लगाइएगा वरना हमारी छाया आनंद लेने की बजाय घायल हो जाएगी" वो सब फिर से हंसने लगीं.
छाया ने आज तक अपनी किसी सहेली को घर पर नहीं बुलाया था. यह उसकी समझदारी ही थी अन्यथा किसी अन्य व्यक्ति को हमारे रिश्ते को समझा पाना थोड़ा कठिन होता.
ऐसे खुशकिस्मत लोग बहुत कम मिलेंगे जिनकी प्रेमिका उनके साथ एक ही छत के नीचे रह रही हो और प्रेम लीला में पूरी तरह संलग्न हो.
मैं भी अब ज्यादा खुल चुका था. मैं छाया को लेकर उसकी सहेलियों की पार्टियों में जाने लगा. पार्टियों में हमने तरह- तरह के दृश्य देखे लड़कियों का अर्धनग्न पहनावा और मदिरा पीकर पार्टियों में बिंदास थिरकना छाया के लिए बिल्कुल नयी चीज थी. वह कभी उन लड़कियों की ओर देखती कभी मेरी ओर जैसे जानना चाहती हो कि मुझे क्या अच्छा लगता है.
अगले शनिवार छाया की प्रिय सहेली पल्लवी की जन्मदिन पार्टी थी. उसने अपने कुछ चुनिंदा दोस्तों को बुलाया था. मैं और छाया भी उस पार्टी के लिए अपना मन बना चुके थे. दरअसल इस पार्टी में आने वाले सभी लड़के लड़कियां जोड़े में थे. पार्टी बेंगलुरु शहर से दूर एक खूबसूरत फार्म हाउस में थी. मैंने वह फार्म हाउस पहले भी देखा था. पल्लवी ने छाया को पहले ही बता दिया था की पार्टी के बाद रात में वहीं
रुकना है तथा अगली सुबह वापस आना है.
मुझे लगता था छाया इसी बात से उत्साहित थी. मैं छाया को लेकर बाजार गया और उसके लिए एक बहुत ही खूबसूरत स्कर्ट और टॉप लिया. मैंने अपने लिए भी अच्छे कपड़े ले लिए थे. अब माया जी की अनुमति की जरूरत थी. आखिरकार छाया को पूरी रात घर से बाहर रहना था. छाया ने माया जी को समझाने की कोशिश की "वहां सिर्फ मेरी सहेलियां है हम लोग रात भर बातें करेंगे और सुबह वापस आ जाएंगे"
माया जी छाया को अकेले भेजने में घबरा रही थी. मैं उनकी घबराहट देखकर बोला...
" आप चिंता मत करिए मैं छाया को वहां पहुंचा भी दूंगा और सुबह लेते हुए आऊंगा. मेरा एक दोस्त वहीं पास में रहता है. मैं रात को वहीं रुक जाऊंगा."
मेरे इस आश्वासन पर वह खुश हो गई . शनिवार को हम लोगों की छुट्टियां थी. छाया को कॉलेज नहीं जाना था और मुझे ऑफिस. माया जी जैसे ही पूजा करने के लिए हमारी सोसाइटी के मंदिर की तरफ निकलीं छाया ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और मुझसे आकर लिपट गई वह बहुत खुश लग रही थी. उसने मुझे बताया..
"पार्टी में आने वाली कुल 8 - 10 सहेलियों में से अधिकतर का कौमार्य भेदन हो चुका है. पर पल्लवी ने भी अपना कौमार्य अभी तक सुरक्षित रखा है."
मुझे लगा छाया से पल्लवी की गहरी दोस्ती मैं यही राज होगा. मैंने छाया से मजाक किया " यदि कभी प्रेम के अतिरेक में राजकुमार ने तुम्हारा
कौमार्य भेदन कर दिया तब?"
उसने प्रेम पूर्वक कहां "राजकुमार स्वयं यह कार्य नहीं करेगा इसका मुझे पूरा विश्वास है पर यह दुष्ट राजकुमारी ही बेचैन रहती है यही खुद अपना भेदन न करा ले मुझे इसी बात का डर रहता है"
उसने अपनी राजकुमारी को एक प्यारी ही चपत लगायी और हँस पड़ी. इन बातों के दौरान ही मेरा राजकुमार उसके हाथों में आ चुका था उसने राजकुमार को पायजामे से बाहर निकाल लिया और उसे सहलाने लगी. उसने उसके आकार को नापने की कोशिश की वह उसके पंजे से बड़ा था. उसकी मोटाइ नापने की कोशिश में उसने अपनी तर्जनी और अंगूठे को मिलाकर राजकुमार को उसके अन्दर लेना चाहा पर सफल नहीं हुइ. उसने मुझे मुस्कुराते हुए बताया मेरी सहेलियां इस बारे में बात करती हैं इसलिए ही मैं अपने राजकुमार का नाप ले रही थी. इस नापतोल में राजकुमार स्खलित होने के लिए मन ही मन तैयार हो गया था. छाया को शायद राजकुमार की इस मंशा का अंदाजा नहीं था उसने उत्तेजित अवस्था में ही उसे पायजामा में डालने की कोशिश की पर वह टस से मस ना हुआ..
जैसे जिद्दी बालक ठान लेने पर खिलौने की दुकान से नहीं हटता है.
छाया मुस्कुराई और राजकुमार को अपने दोनों हाथों में लेकर हिलाना शुरु कर दिया. वह इस कला में पारंगत हो गई थी कुछ ही देर में
राजकुमार ने वीर्य दान कर दिया उसकी सारी अकड़ ठंडी हो चुकी थी. छाया ने राजकुमार को प्यार से एक चपत लगाई और वापस उसे पायजामें में बंद कर दिया. छाया के हाथ वीर्य से सुने हुए थे. उसने अपने हाथों को देखा और सोचा अब इसका क्या करूं. मेरी आंखों में देखते हुए वह अपना हाथ अपने टॉप के नीचे से अपने स्तनों पर ले गई और सारा वीर्य वहीं पोछ दिया. उसे पता था मुझे यह बहुत पसंद है.
मैंने छाया को किस किया वह मुस्कुराती हुई नहाने चली गई. मैंने रात के खाने के लिए माया जी की पसंद का खाना मंगवा दिया था. छाया तैयार हो रही थी माया जी, छाया की मदद कर रही थी. कुछ ही देर में हम दोनों टैक्सी की पीछे वाली सीट पर थे. मेरी कद काठी और हष्ट पुष्ट शरीर छाया के सौंदर्य को टक्कर देता था. हम दोनों किसी नायक नायिका से काम नहीं थे.
छाया आज चमकदार वस्त्रों में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उसकी त्वचा अब भी उतनी ही कोमल थी बल्कि उसमे और निखार आ गया था. उसके साथ छेडछाड करते समय कई बार उसके शरीर पर मेरी उंगलियों के निशान पड़ जाते जिन्हें देखकर मैं दुखी हो जाता. मुझे अफसोस होता कहीं मैंने उसके साथ ज्यादती तो नहीं कर दी. वह तुरंत ही मुझे चुंबन देकर प्यार से बोलती अरे ठीक हो जाएगा. मैंने छाया की तरफ देखा वह खिड़की से बेंगलुरु शहर को निहार रही थी.
उसके जीवन में पिछले तीन-चार सालों में इतना परिवर्तन आया था जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी. हमारी टैक्सी एक बड़ी सी हवेलीनुमा घर के दरवाजे पर रुकी. दरबान हमारी तरफ आया. छाया ने
खिड़की खोल कर पल्लवी का नाम लिया. उसने अपने साथी को इशारा कर बड़ा सा गेट खोल दिया. अंदर पहुंचकर टैक्सी रुक गई.
पल्लवी हम दोनों का इंतजार कर रही थी. हम सब एक बड़े से हॉल में आकर अपने लिए निर्धारित सोफे पर बैठ गए. बाकी सारी लड़कियां भी अपने दोस्तों के साथ आ चुकी थी. मैंने एक सरसरी निगाह से हॉल में उपस्थित छाया की सहेलियों और उनके पुरुष मित्रों को देखा. छाया की अधिकतर सहेलियों के पुरुष मित्र मेरे हम उम्र ही थे शायद उस समय तक लड़के और लड़की में उम्र का अंतर लड़कियों को भी उतना ही स्वीकार्य था.
पुरुष तो स्वभाव से ही अपने से कम उम्र की लड़की ही पसंद करता है.
पल्लवी ने हम सबका परिचय करवाना चाहा इसके लिए उसने बड़ा ही अजीब तरीका अपनाया. हम सभी अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ सोफे पर बैठे हुए थे. सोफा गोल घेरे में लगा हुआ था. बीच में एक लाल रंग का कारपेट रखा था. पल्लवी के नियमानुसार प्रत्येक पुरुष को अपनी प्रेमिका को अपनी गोद में उठाकर लाना था तथा अपना और
अपनी प्रेमिका का नाम बताना था. साथ में यह भी बताना था कि उन्होंने पहली बार संभोग कब किया था. और उस समय उनकी उम्र कितनी थी. सभी खिलखिला कर हंस पड़े.
बारी बारी से लड़के अपनी अपनी प्रेमिकाओं को गोद में उठाकर लाते और अपना परिचय देते. पहले संभोग के बारे में बताते हुए लड़कियों का चेहरा लाल हो जाता. उनके विवरणों से एक बात तो स्पष्ट हो गई थी कि शहरों में कौमार्य भेदन के लिए सुहागरात की प्रतीक्षा न थी. शहर की लड़कियों ने अपना कौमार्य पहले ही खो दिया था. और अब वह खुलकर सम्भोग सुख ले रहीं थीं .
अंततः हमारी बारी भी आ गई मैंने छाया को अपनी गोद में उठाया और लाल कारपेट पर लेकर जाने लगा. स्कर्ट का कपड़ा इतना मुलायम था मुझे लगा जैसे मैंने छाया को बिना स्कर्ट के ही पकड़ लिया हो. उसकी जांघें मेरे दाहिने हाथ में थी तथा बाया हाथ उसकी पीठ पर को सहारा दिया हुआ था मेरी हथेली उसके बाए स्तन की पास थीं. छाया का
चेहरा मेरे चहरे के समीप था. चलते समय हमारे गाल कभी कभी एक दूसरे में छू रहे थे. सभी लड़कियां तालियां बजा रहीं थी. मैंने पहुंचकर अपना परिचय दिया. छाया की बारी आने पर वह शरमाते हुए बोली हमने आज तक संभोग नहीं किया है. कहकर मेरे गालों पर चुंबन जड़ दिया और मुस्कुराने लगी. सभी लड़कियां जोर-जोर से "क्यों क्यों" कह कर चिल्लाने लगी. छाया ने जी बड़ी चतुराई से कहा.
"मेरी राजकुमारी अभी इनके हष्ट पुष्ट राजकुमार के लिए तैयार हो रही है" इतना कहकर वह मेरे गोद से उतर गयी.
हम दोनों सब का अभिवादन करते हुए वापस अपनी सीट पर बैठ गए. पल्लवी भी अपने पुरुष मित्र के साथ आई और अपना परिचय दिया. पल्लवी ने एक अनोखी बात बताई..
" दोस्तों मैंने आज तक संभोग नहीं किया पर आज जरूर करूंगी यह पार्टी मैंने इसी उपलक्ष्य में दी है. सभी लोग उठकर खड़े हो गए और पल्लवी का जोरदार अभिवादन किया."
कुछ ही देर में हम सब आपस में घुलने मिलने लगे. हम लोगों ने थोड़ी-थोड़ी वाइन पी और तरह तरह की बातें करने लगे. छाया अपनी सहेलियों के पास चली गई थी. वो सभी वहां हंसी मजाक कर रही थी. कुछ ही देर में हम वापस हाल में आ चुके थे और अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ डांस कर रहे थे. छाया ने मुझे बताया कि सारी लड़कियों ने थोड़ी-थोड़ी वाइन पी थी पर मैंने नहीं ली. मैंने उसका
उत्साहवर्धन किया यदि तुम्हें इच्छा हो तो मैं तुम्हारा साथ दे सकता हूं.
वह मुस्कुराइ और हम दोनों बार काउंटर की तरफ चल पड़े हमने वाइन ली और पास लगे टेबल पर बैठकर एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले वाइन पीने लगे सीमा को उसका स्वाद कुछ अटपटा सा लगा पर उसकी परवाह किये बिना उसने धीरे धीरे अपना ग्लास ख़त्म कर लिया.

निराले खेल
हम वापस हाल में आकर डांस करने लगे. धीरे धीरे पार्टी में कामुकता बढ़ती जा रही थी. अमूमन सभी लड़कों ने अपनी प्रेयसीओ के या तो नितंब या स्तन पकड़ रखे थे और उन्हें बेसब्री से सहला रहे थे. कुछ ने उनके होंठ भी अपने होठों में ले रखे थे. कुछ लड़कियों के हाथ अपने पुरुष मित्रों की जांघों पर घूम रहे थे. इस कामुक माहौल में हमारी भी स्थिति कमोबेश यही थी. वाइन का असर छाया पर क्या हुआ था यह अनुत्तरित था पर वह बहुत खुश थी और मुझसे लता की तरह लिपटी हुई मेरे होंठों को चूस रही थी.
म्यूजिक बंद होने पर सब अलग अलग हुए एक लड़की ने माइक पकड़ा और मुस्कुराते हुए बोली...
"मैं अपनी सहेलियों की स्थिति समझ सकती हूं इतनी देर तक आलिंगन बंद होकर डांस करने से हम सभी के मन में अलग भावनाएं आ रही होंगी. आप सब अपने अपने कमरे में जाकर १५ मिनट में अपनी भावनाएं शांत कर ले." यह कहकर वह हंसने लगी..
"हॉल में लगी हुई बड़ी घड़ी की तरफ इशारा करके उसने कहा कि जो युगल 11:30 तक इस हाल में वापस नहीं आएगा उसे एक प्यारा सा दंड मिलेगा.
सभी ने कौतूहल से पूछा ..
" क्या "
" उसे पार्टी खत्म होने तक अपने अधोवस्त्रों में ही रहना पड़ेगा और यह लड़का और लड़की दोनों पर लागू होगा सभी खिलखिला कर हंस पड़े"
सभी अपनी अपनी प्रेमिकाओं को लेकर अपने अपने कमरे की तरफ गए. मैं और छाया भी अपने कमरे में आ चुके थे. होटल के कमरे की साज-सज्जा सुहागरात के बेड जैसी ही थी सिर्फ फूलों की सजावट नहीं थी. पलंग के दोनों तरफ दो सुंदर ताजे फूलों के गुलदस्ते रखे हुए थे. पल्लवी ने अपने कौमार्य भेदन को एक उत्सव में बदल दिया था. छाया मेरे पास आई. मैंने उसे अपने आलिंगन में लिया उसकी स्कर्ट
को ऊपर कर मैंने उसकी पैंटी निकाल दी. उसने भी अपने पैर झटक कर उसे बाहर कर दिया. हमारे पास समय बहुत कम था. मैं भी अपने पेंट को ढीला कर घुटने तक ले आया.
छाया अब मेरी गोद में बैठ चुकी थी. उसके दोनों पैर मेरे कमर में लिपटे हुए थे. राजकुमारी राजकुमार से सटी हुई थी. नृत्य के दौरान राजकुमारी में गीलापन आ चुका था जो उसकी दरारों से निकलकर मेरे राजकुमार पर लग रहा था. हम दोनों अपनी कमर को हिलाने लगे. हमारे होंठ एक दूसरे से चिपके हुए थे. मैं एक हाथ से सीमा के नितंब सहला रहा था और दूसरे हाथ से सीमा की पीठ को सहारा दिया हुआ था. हॉल में हुई कामुक बातें और अत्यंत कामुक माहौल ने हम दोनों
को तुरंत ही स्खलित कर दिया.
स्खलित होने से पूर्व छाया ने बेड के पास पड़ा हुआ टावेल उठाकर अपनी नाभि के समीप रख लिया था. वो बहुत समझदार थी. स्खलन के पश्चात उसने जल्दी-जल्दी प्रेम रस को साफ किया. हमने देखा
11:25 हो चुके थे. हम जल्दी-जल्दी हॉल की तरफ भागे . जल्दी में दरवाजा बंद करना भी भूल गए. हम तेजी से भागते हुए हॉल में आ गए और अपने सोफे पर बैठ गए.
घड़ी में 11:30 बजते ही अलार्म बज गया. सभी हॉल में आ चुके थे सिर्फ सलमा और अब्दुल ही सीढ़ियों पर रह गए थे. देर हो चुकी थी. माइक पकड़ी हुई लड़की ने बोला..
"सलमा और अब्दुल आप लोग देर से आए हैं आप रेड कारपेट पर आ जाएं". वो दोनों सर झुकाए रेड कारपेट पर आ चुके थे.
"शर्तों के अनुसार आपको पार्टी में अपने अधोवस्त्रों में ही रहना होगा. कृपया इसे दंड न समझे आप दोनों ही अत्यंत सुंदर हैं. आपको आपके अधोवस्त्रों में देखकर हमें खुशी होगी" चारों तरफ से आवाजें आने लगी सलमा और अब्दुल ने वस्त्र उतार दिए सलमा ब्रा और पैंटी में आ चुकी थी.
सलमा सुंदर तो थी ही इस अवस्था में सारे लड़कों की निगाह उसके स्तनों की तरफ चली गई. उसके स्तन इस पार्टी में उपस्थित सभी लड़कियों में सबसे बड़े थे. बाकी लड़कियों ने अपने अपने पुरुष मित्रों के गाल पर चपत लगाई और उनका ध्यान सलमा के स्तनों से हटाया.
अचानक मोना ने एक और घोषणा की उसने कहा...
" जिस लड़की ने अपनी पैंटी न पहनी हो वह रेड कारपेट पर आ जाए. मैंने छाया की तरफ देखा वह घबरा गई थी. छाया ने अपने पैर एक दूसरे पर चढ़ा लिये. उसे अपनी पैंटी वहीं छोड़ आने का बड़ा अफसोस हो रहा था. मोना ने फिर से कहा." देर करने पर सजा मिलेगी यह
कह कर हंसने लगी."
छाया अब उठ खड़ी हुई और रेड कार्पेट पर आ गयी. सब लोग जोर जोर से हंसने लगे. मोना ने छाया की लाल पेंटी को दोनों हाथ से सभी को
दिखाते हुए मुझसे पूछा मानस क्या यही छाया की पेंटी है?
मुझे हां कहना पड़ा. उसने कहा "तो आइए और जैसे आपने अपने हाथों से उतरा था उसे वापस पहनाइए. इस तरह पानीअपनी प्रेमिका को नग्न रखना उचित नहीं है"
सभी जोर जोर से हँस रहे थे. छाया सर नीचे किये हुए मुस्कुरा रही थी. मैं कारपेट की तरफ चल पड़ा मेरे पास कोई चारा नहीं था. देर करने का मतलब सब की हूटिंग का पात्र बनना था. मैं छाया के पास पहुंचा उसे प्रपोज करने के अंदाज में नीचे बैठा और उसकी पैंटी को अपने दोनों हाथों से पकड़ा. वह अपना एक पैर ऊपर उठाई और पेंटी से पास करते हुए हुए जमीन पर रख दी. इसी प्रकार उसने दूसरा पैर भी डाल दिया. मैं उसकी पैंटी को उसके टखनों से ऊपर उठाता हुआ उसकी पिंडलियों और जांघों के रास्ते उसे कमर तक ले आया. इस दौरान मेरे लिए सबसे बड़ा कार्य यह था की सीमा के गोरे और कोमल नितम्बों के कोई और दर्शन ना सके. पर सावधानी के बाद भी कुछ लालची पुरुषों ने उसके नितम्ब देख लिए. पीछे से आवाजे आ रही थीं "बधाई हो मानस सच में छाया बहुत सुन्दर हैं" हम दोनों शर्मा गए और वापस अपनी जगह पर आ गए.
पार्टी फिर शुरू हो चुकी थी मैंने और सीमा ने वाइन का एक एक गिलास और ले लिया. मैंने यह अनुभव किया कि अधिकतर लड़कियां लहंगा स्कर्ट मिनी स्कर्ट आदि पहने हुई थी. हो सकता है सभी लड़कियों ने मिलकर यह निर्धारित किया हो. कुछ ही समय में हम सभी डांस फ्लोर पर थे.
अपनी प्रेयसी को आलिंगन में लिए हुए नृत्य करने का सुख हम सभी उठा रहे थे. छाया मेरे होठों को तेजी से चूस रही थी तथा मुझे अपनी और खींच रही थी. उसके हाथ मेरे राजकुमार को बीच-बीच में सहला दे रहे थे. अचानक मोना
की आवाज फिर से गूंजी उसने कहा..
" दोस्तों आज हमारी पल्लवी अपना कौमार्य खोने जा रही है. आप सब भी बेसब्र हो रहे होंगे इसी उम्मीद के साथ मैं इस पार्टी की समाप्ति की घोषणा करती हूं."

छाया, मैं और वो यादगार रात
पल्लवी के प्रेमी ने उसे बाहों में उठा लिया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ चला. हब सब भी अपनी प्रेमिकाओं के साथ अपने कमरों की तरफ चल पड़े. छाया के कदम थोडे डगमगा रहे थे. मैं उसे अपनी गोद में उठा लिया वह मुझे लगातार चूमती जा रही थी.
कमरा खुला हुआ था हम दोनों के अंदर आने के बाद. छाया को बिस्तर पर उतार कर मैं बाथरूम चला गया. बाहर आने के बाद मैंने देखा की छाया बिस्तर पर नग्न लेटी हुई थी. सफेद चादर पर उसकी लाल रंग की पैंटी और ब्रा उसके शरीर के दोनों तरफ अड़हुल के फूल की की तरह दिखाई पड़ रहे थे. अत्यंत मोहक दृश्य था. छाया की आंखें बंद थी. उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. उसमें स्वयं अपनी ब्रा और पैंटी उतारी थी यह इस बात का परिचायक थी कि वह कामोत्तेजित थी और मेरा साथ चाहती थी. शायद बाथरूम में हुई देरी की वजह से उसकी आंख लग गई थी. उस पर वाइन का नशा पहले से ही था. मुझे लगा वह सो गई.
मैं सोच नहीं पा रहा था कि क्या करूं. मैंने उसके स्तनों की तरफ देखा उन्होंने अपना तनाव कायम रखा हुआ था परंतु गुरुत्वाकर्षण के कारण थोड़ा चपटे हो गए थे पर उसके निप्पल अभी भी अपना तनाव बनाए हुए थे. स्तनों के बीच मेरा दिया हुआ नीले नग वाला पेंडेंट लटक रहा था. उसके कानों के कुंडल भी पेंडेंट से मिलते जुलते थे. उस लगा हुआ नीला नग अत्यंत खूबसूरत लग रहा था. छाया के चेहरे पर लालिमा अभी भी कायम थी लगता था उसे सोए हुए अभी दो-तीन मिनट ही बीते थे. पिछले कुछ महीनों में छाया "१९४२ एक लव स्टोरी" फ़िल्म की नायिका मनीषा कोइराला के जैसी लगाने लगी थी. .
मेरा ध्यान उसकी राजकुमारी की तरफ गया जिस तरह छोटे बच्चे दूध पीने के बाद अपनी लार बाहर गिरा देते हैं उसी प्रकार राजकुमारी की लार एक पतले धागे की तरह उसके होंठो से गिरते हुए चादर को छू रही थी.
यह एक अत्यंत उत्तेजित करने वाला दृश्य था. मुझे गांव के मवेशी याद आ गए. सम्भोग की आशा में खूंटे से बंधी मादा मवेशी अपनी योनि से लार टपकाती रहती है. समझदार गृहस्थ यह बात समझते हैं और उन्हें तुरंत गर्भधारण के लिए ले जाते हैं. यहां पर भी मेरी प्यारी छाया उसी स्थिति में पड़ी हुई थी. मुझे अपनी सोच पर हंसी भी आई. मैं भी पूर्ण नग्न होकर छाया के बगल में आ गया. कमरे में ठंड होने की वजह से मैंने चादर खींच ली. अब हम दोनों चादर के अंदर थे. मैं छाया के साथ इस अवस्था में कुछ नहीं करना चाहता था. मैं उसके साथ बिताए पलों को याद करने लगा अचानक मेरे राजकुमार पर उसके हाथों का स्पर्श महसूस हुआ और मैं छाया की तरफ पलट गया. वह भी मेरी तरफ पलट चुकी थी. उसने मुझसे मादक अंदाज में कहा "मानस भैया आज मेरा भी कौमार्य भेदन कर दीजिए मुझसे अब बर्दाश्त नहीं होता" इतना कहकर वह मेरे आलिंगन में आ गई. मैंने उसे अपने आगोश में ले लिया. वाइन के हल्के नशे में वह थोड़ी मदमस्त हो गई थी. उसने अपना एक पैर मेरे ऊपर चढ़ा लिया था. मैं उसके नितंबों को सहलाते सहलाते गलती से उसकी दासी को छू लिया.
उसने आँखे खोली, शरारत भरी नजरों से मेरी तरफ देखा और बोली
" दासी की तरफ नजरें मत बढ़ाइए अभी तो राजकुमारी ही कुंवारी बैठी है" इतना कह कर हंस पड़ी और मेरे होंठ चूसने लगी. मेरा राजकुमार अब राजकुमारी के मुंह पर दस्तक दे रहा था प्रेम रस से भीगी हुई राजकुमारी राजकुमार को अपने आगोश में लेने के लिए पूरी तरह से तैयार थी. राजकुमार भी मुंह से लार टपकाते हुए राजकुमारी के मुख पर ठोकर मार रहा था उसे सिर्फ मेरे एक इशारे की प्रतीक्षा थी.
छाया के हल्के नशे में होने के कारण कौमार्य भेदन का यह उपयुक्त समय था. उसे दर्द की अनुभूति भी शायद कम ही होती. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सारी कायनात ने साजिश कर उसका कौमार्य भेदन सुनिश्चित किया था.
पर मुझे मेरे दिए वचन की याद आ गई मैंने भगवान को साक्षी मानकर उसे वचन दिया था जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता मैं उसका कौमार्य भेदन नहीं करूंगा.
इस वचन की याद आते ही मेरा राजकुमार थोड़ा शिथिल पड़ गया. मैंने छाया के माथे पर चुंबन जड़ा और बोला.
" मैं कल ही माया जी से अपनी शादी की बात करता हूं. पर मैं अपने दिए वचन को नहीं तोड़ पाऊंगा."
" मैं उस पल के लिए हमेशा इंतजार करुँगी" इतना कहकर वह मुझसे जोर से लिपट गई राजकुमार एक बार फिर राजकुमारी को चूमने लगा. मैं पहली बार छाया के ऊपर आ चुका था छाया ने अपनी जांघें फैला कर मेरे राजकुमार के लिए कार्य आसान कर दिया था. राजकुमार अब
राजकुमारी के होंठों के एक सिरे से दूसरे तक प्रेम रस में भीगते हुए यात्रा करने लगा. जब वो राजकुमारी के मुख तक पहुंचता तो एक उसके मुखमे एक डुबकी मार ही लेता था. उसका सफर राजकुमारी के मुकुट {भग्नासा} पर खत्म होता. यह प्रक्रिया राजकुमार लगातार कर रहा था. मैं छाया के दोनों स्तन अपने हाथों से दबा रहा था. उनके निप्पलों को छूने पर छाया अपनी जीभ अपने ही दांतों से काटने लगाती. स्खलित होने का समय करीब आ चुका था. मैं छाया के ऊपर और झुक गया तथा उसके स्तनों को अपने होठों से छूने लगा. बीच-बीच में मैं उसके निप्पलों को अपने मुंह में लेता. छाया की राजकुमारी राजकुमारी को तंग करने का एक अच्छा उपाय मिल गया था. उसके कठोर निप्पलों को मुंह में लेने पर मेरे राजकुमार में भी हलचल हो रही थी.
अचानक मुझे राजकुमारी में कंपन महसूस होने लगा. छाया मुझसे तेजी से लिपट गइ और एक बार फिर उसकी कोमल आवाज "मानस भैया............" मेरे कानों तक आई.
राजकुमारी अपना प्रेम रस छोड़ने लगी मेरा राजकुमार भी जैसे राजकुमारी के कंपन का इंतजार कर रहा था वह भी ताल में ताल मिलाते हुए वीर्य वर्षा करने लगा.

मैंने छाया के स्तनों से अपना मुंह हटा लिया था. वीर्य की धार छाया के गालों, स्तनों राजकुमारी और उसकी जांघों को भिगोती रही. मैं छाया से लिपट गया. हमारे स्तनों ने मेरे वीर्य को आपस में साझा कर लिया. छाया की गालों पर लगे वीर्य रस को मेरी जीभ छाया के होठों तक ले आई हम दोनों ने फिर से एक दूसरे के होठ चुसे. मैंने मुस्कुराते हुए छाया से कहा...
" कौमार्य भेदन के दिन भी 'मानस भैया........." ही बोलोगी
क्या ?" वो हँस पड़ी मेरे गालों पर चुम्बन दिया और मेरे आलिंगन में आ गयी. हम दोनी इसी अवस्था में सो गए. सुबह मेरी नींद खुलने पर मैंने पाया की छाया मेरे ऊपर लेटी हुई है उसकी दोनों जांघे मेरी कमर के दोनों तरफ है और वह मेरे राजकुमार को अपने राजकुमारी से दबाई हुए थी. वह अपनी कमर की हल्के हल्के आगे पीछे करती हुई मेरे राजकुमार को उत्तेजित कर रही थी. राजकुमारी का रस एक बार फिर से बह रहा था. मेरी नींद खुलते ही मुझ में भी उत्तेजना आ गयी. और हम दोनों एक दुसरे को कुछ देर प्यार करते रहे " मानस भैया ........." कि आवाज आते ही उसके स्तन भीग रहे थे ... कुछ देर बाद उठकर हम साथ में नहाने चले गए. हमनेरात एक साथ अपनी पहली रात गुजार ली थी.
साथी पर अटूट विश्वास लड़कियों में साहस भर देता है, छाया ने आज वाइन पीने के बाद बिस्तर पर नग्न लेटकर मुझे खुला आमंत्रण दिया था, पर वो मेरी छाया थी. मैं उसे धीरे धीरे जवान होते देख रहा था बल्कि अपने हांथों से जवान कर रहा था.

दोपहर में घर आने के पश्चात हम दोनों काफी थके हुए थे. माया जी ने हमें खाना खिलाया और हम दोनों सोने चले गए छाया गलती से मेरे कमरे में घुस गइ शायद उसे आभास ही नहीं था कि हम घर वापस आ चुके हैं. माया जी थोड़ा आश्चर्यचकित थी. छाया मेरे कमरे के अंदर आकर अपनी एक पुस्तक हाथ में उठाई मेरी तरफ देख कर अपनी इस गलती पर मुस्कुरायी और हंसते हुए वापस अपने कमरे में चली गइ. मेरी छाया अब समझदार हो गयी थी.
 
छाया ( भाग -5)

छाया प्रेयसी से मंगेतर तक.
नज़रों के नीचे
समय तेजी से बीत रहा था. मैं और छाया एक ही छत के नीचे प्रेमी प्रेमिका का खेल खेल रहे थे. अपनी मां की उपस्थिति में भी छाया इतने कामुक और बिंदास तरीके से रहती थी जैसे उसे किसी बात का डर ही ना हो. वह अपनी मां की नजर बचाकर मेरे पास आती मुझे उत्तेजित करती और हट जाती. कई बार तो उसने अपनी माया जी की उपस्थिति में ही उनकी पीठ पीछे मेरे राजकुमार को सहला दिया था.
एक बार खाना खाते समय अपने पैरों को मेरे पैरों से रगड़ रही थी. मेरा राजकुमार उत्तेजित हो रहा था. कुछ देर बाद उसके हाँथ से एक चम्मच गिरी. वह टेबल के नीचे झुकी और मेरे राजकुमार को मेरे पायजामा से बाहर कर दिया और चम्मच उठाकर उपर आ गयी. कुछ ही देर में खाना खाते- खाते उसने अपने पैरों से मेरे राजकुमार को छूना शुरु कर दिया. बड़ा अद्भुत आनंद था माया जी बगल में बैठी थी. हम सब खाना खा रहे थे, और नीचे छाया के पैर रासलीला कर रहे थे.
खाना खाते खाते मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई. खाना खत्म करने के बाद जैसे ही माया जी बर्तन साफ करने किचन की ओर गयीं छाया मेरे कमरे में आई और अगले 2 मिनटों में ही मुझे स्खलित कर मेरा सारा वीर्य अपने हाथ से अपने स्तनों पर लगा लिया. मुझे इस बात से बहुत खुशी मिलती थी यह उसे पता था.
कभी-कभी वह मेरी गोद में आकर बैठ जाया करती. वह भी एक अलग तरह का आनंद होता. एक बार हम सब सोफे पर बैठकर फिल्म देख रहे थे. ठण्ड की वजह से हमने अपने ऊपर रजाई डाल रखी थी. नायिका की सुहागरात देखकर छाया उत्तेजित हो गई उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी पैंटी में डाल दिया. मैं उसकी मंशा समझ चुका था. बगल में माया जी बैठी थी फिर भी मैंने हिम्मत करके उसके राजकुमारी को सहलाया. कुछ ही देर में उसकी राजकुमारी कांपने लगी उसने मेरे हाथ को अपनी दोनों जांघों से दबा दिया. राजकुमारी के कंपन यह बता रहे थे कि वह स्खलित हो रही थी.
उसने पिछले कुछ महीनों में कई प्रकार की परिस्थितियां बनाकर सेक्स को रोमांचक बना दिया था. कभी कभी वह स्कर्ट के नीचे पैंटी नहीं पहनती और मुझे इस बात का एहसास भी करा देती. हम दोनों दिन भर एक दुसरे से माया जी उपस्थिति में ही छेड़खानी करते. एक बार मैंने उसकी जांघो और राजकुमारी से खेलते हुए पेन से एक बिल्ली की आकृति बना दी. राजकुमारी का मुख बिल्ली के मुख की जगह आ गया था. वह आईने में देखकर बहुत खुस हो गयी थी.

एक दिन छाया ने मुझसे पूछा
"आप मम्मी से शादी की बात कब करेंगे?"
" तुम्हारे कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद."
"कोई हमें भाई बहन तो नहीं मानेगा न?"
"तुम किसी भी तरीके से मेरी बहन नहीं हो . मेरे पापा और तुम्हारी मां की मजबूरियों की वजह से हम सब एक ही छत के नीचे आ गए. मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूं कि हम दोनों के एक होने में क्या दिक्कत आएगी. हम भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे विवाह में आने वाली अड़चनों को दूर करें."
डर तो मुझे भी था पर मैं उसे समझा रहा था.

माया जी के नए साथी.
हमारी सोसाइटी में रहने वाले शर्मा जी एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर थे. वह बहुत ही मिलनसार थे. जब भी वह देखते मुस्कुरा देते कुछ महीने पहले एक दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी. लिफ्ट में जाते समय उन्होंने मुझसे कहा ...
"मानस क्या आप मेरी एक मदद करोगे? मेरे लिए कुछ दवाएं ला दो"
उनके चेहरे से पसीना निकल रहा था. मैं उन्हें उनके फ्लैट में जो ठीक हमारे ऊपर था छोड़कर दवा लेने चला गया. लौटकर मैं देखता हूं कि वह अपने बिस्तर पर बेसुध पड़े हुए थे. मैं घबरा गया मैं नीचे जा कर माया आंटी को बुला लाया. माया आंटी को उनके पास छोड़कर मैं डॉक्टर को फोन करने लगा. माया आंटी ने उनके चेहरे पर पानी के छींटे मारे थोड़ी देर में उन्होंने अपनी आंखें खोली वह माया आंटी को अपने पास देख कर आश्चर्यचकित थे. माया आंटी उनके सर को हल्के हल्के दबा रहीं थीं. कुछ ही देर में पास में रहने वाले डॉक्टर वहां आ गए और उन्होंने शर्मा जी का चेकअप किया. उन्होंने माया आंटी की तरफ देखते हुए बोला ..
"आपके पति बिल्कुल ठीक-ठाक है. लगता है इनका ब्लड प्रेशर ज्यादा बढ़ गया था . चिंता की कोई विशेष बात नहीं है."
फिर वह शर्मा की की तरफ मुखातिब हुआ...
"आप घर पर आराम करिए और तेल मसाला वाला खाना मत खाइए. कुछ ही दिनों में आपका ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाएगा" मैं एक बार फिर डॉक्टर की बताई दवा लेने गया तब तक माया आंटी वही बैठी थी. वहां से आने के बाद माया आंटी खाना बनाने चली गई और मैं शर्मा अंकल का ध्यान रख रहा था. माया आंटी ने अगले तीन-चार दिनों तक शर्मा अंकल का खूब ख्याल रखा और उन दोनों में दोस्ती हो गई. हम और छाया कभी-कभी यह बात करते कि माया आंटी ने अपने जीवन में कितने कष्ट सहे हैं. लगभग सत्ताईस वर्ष की अवस्था में उनके पति का देहांत हो गया था. तब से वह अकेली ही थीं. मेरे पापा के साथ आकर उन्होंने अपने और अपनी बेटी छाया के लिए एक छत तलाश ली थी पर शारीरिक सुख की बात असंभव थी. तीन-चार दिन शर्मा अंकल की सेवा करने के बाद माया आंटी की उनसे दोस्ती हो गई थी.

माया जी का शक
छाया पर इक्कीसवां साल लग चुका था. मैंने और छाया ने पिछले कुछ महीनों में एक दूसरे के साथ इतनी कुछ किया था पर माया जी को इसकी भनक न लगी हो यह बड़ा आश्चर्य लगता था. हमने घर के हर कोने में अपनी कामुकता को अंजाम दिया था. मुझे तो लगता है कि यदि किसी फॉरेंसिक एक्सपर्ट को घर की जांच करने को दे दी जाए तो उसे हर जगह मेरे या छाया के प्रेम रस के सबूत मिल जाएंगे.
हमने घर की लगभग हर जगह पर अलग-अलग प्रकार से अपनी कामुकता को जिया था. घर का सोफा, डाइनिंग टेबल, किचन टॉप, बालकनी, बाथरूम आदि मेरे और छाया के प्रेम के गवाह थे.
माया जी ने हमारे कपड़ों पर भी उसके दाग जरूर देखे होंगे पर व हमेशा शांत रहती थी. मुझे नहीं पता कि उनको इसकी भनक लग चुकी थी या नहीं पर उनका व्यवहार सामान्य रहता था .
परंतु एक दिन मैं और छाया अपनी प्रेम लीला समाप्त करके उठे ही थे और अपने वस्त्र पहन रहे थे तभी माया जी के आने की आहट हुई वो बाज़ार से वापस जल्दी आ गयीं थी. इस जल्दबाजी में छाया अपने गालों पर लगा मेरा वीर्य पोछना भूल गई. माया जी की निगाहों ने उसके गाल पर लगा सफेद द्रव्य देख लिया उन्होंने अपनी उंगलियों से उसे पोछते हुए बोला यह क्या लगा रखा है. सीमा घबरा सी गई वह कुछ बोल नहीं पाइ. उसने अपने हाथों से अपना गाल पोछा और बोला "कुछ लग गया होगा"
माया जी ने चलते चलते अपना हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में पोछा और अपनी उंगलियों को अपनी नाक के पास ले गयीं जैसे वह उसे सूंघ कर पता करना चाहती हो की वह क्या था.
[ मैं माया ]
अपनी उंगलियों को अपनी नाक के पास ले जाते ही मुझे अपनी उंगलियों में लगे चिपचिपे पदार्थ पहचानने में कोई वक्त नहीं लगा मैं समझ गई कि मेरा शक सही था. छाया और मानस के बीच बढ़ती हुई नजदीकियां इतनी जल्दी ऐसा रूप ले लेगी यह मैंने नहीं सोचा था. इन दोनों का साथ में हंसना मुस्कुराना एक दूसरे के साथ घूमना और कई बार देर रात तक वापस लौटना हमेशा से शक पैदा करता था पर मानस को देखकर ऐसा लगता नहीं था कि वह छाया को इस कार्य के लिए मना लेगा.
मैंने छाया के कपड़ों पर अलग तरह के दाग देखे थे पर मैं यह यकीन नहीं कर सकती थी कि वह अपने कपड़ों पर किसी पुरुष का वीर्य लगाए घूम रही होगी. छाया जब भी मानव के कमरे से निकलती थी उसके कपड़े की सलवटे यह बताती थी जैसे किसी ने उसके स्तनों को अपने दोनों हाथों से खूब मसला हो. आज यह देखने के बाद कि यह वीर्य मानस का है मैं सच में चिंतित थी.
मुझे अब छाया पर निगाह रखना आवश्यक हो गया था. मैंने मन ही छाया को रंगे हाथ पकड़ने का निश्चय कर लिया. छाया भी शायद अब सतर्क हो गई थी. मैंने तीन चार दिनों तक उस पर पैनी निगाह रखी पर उसने मुझे कोई मौका नहीं दिया. कई बार मुझे लगता जैसे मैंने इन दोनों पर नाहक ही शक किया हो. मानस एक निहायती शरीफ और जिम्मेदार लड़का था उसने छाया की बहुत मदद की थी. आज उसकी बदौलत ही छाया ने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया था और वह अपनी पढ़ाई अच्छे से कर रही थी. वह छाया को इन गलत कामों के लिए प्रेरित करेगा ऐसा यकीन करना मुश्किल था.
परंतु ये छोटी छोटी घटनाएं मुझे हमेशा शक में डालती थी. छाया के गाल पर वह चिपचिपा पदार्थ देखकर मुझे आज से लगभग 3 वर्ष पहले मानस के गाल पर लगा द्रव्य याद आ गया. इन दोनों घटनाओं में एक ही संबंध था वह था मानस.
मेरे पास इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था मैंने अपनी निगाहें चौकस रखनी शुरू कर दी और वक्त का इंतजार कर रही थी. मैंने घर से बाहर जाना लगभग बंद कर दिया. मैं घर से तभी बाहर निकलती जब मानस या छाया में से कोई एक घर के बाहर होता. मानस कभी-कभी छाया को बाहर ले जाना चाहता पर मैं किसी ना किसी बहाने उसे टाल देती.
दिन बीतते जा रहे थे और मेरा सब्र अब जवाब दे रहा था. बाहर न निकल पाने के कारण मैं भी अब तनाव में रहने लगी थी. मेरी शर्मा जी से भी मुलाक़ात नहीं हो पा रही थी. पर अपनी बेटी को इन गलत कार्यों से बचाने के लिए और इन दोनों के बीच बन रहे इस नए रिश्ते को रोकने के लिए मेरी निगरानी जरूरी थी..
एक ही छत के नीचे जवान लड़की और लड़का दिया और फूस की तरह होते हैं.
छाया अब २१ वर्ष की हो चुकी थी एवं मानस लगभग २5 वर्ष का. इनके बीच में कामुकता का जन्म लेना यह साबित कर रहा था की इन दोनों ने अपने बीच भाई बहन के रिश्ते को अभी तक स्वीकार नहीं किया था.
सतर्क छाया
[मैं छाया]
मां के द्वारा मेरे गालों से मानस का वीर्य पोछना मुझे बहुत शर्मनाक लगा. मुझे यह डर भी लगा कि कहीं मां ने उसे पहचान लिया तो? अभी तक मैं उनकी रानी बिटिया थी उनके लिए मेरा यह रूप बिल्कुल अचंभा होता. मैंने मानस को भी इसकी जानकारी दे दी. वह भी काफी चिंतित हो गए थे अब हम सतर्क रहने लगे , पर कितने दिन ? हमें एक दूसरे की आदत पड़ गई थी. राजकुमारी बिना राजकुमार के एक दिन भी नहीं रह सकती थी. हमारी रासलीला में रुकावट हमें बर्दाश्त नहीं थी.
मैंने भी जैसे अपनी मां की आंखों में धूल झोंकने का बीड़ा उठा लिया था. अब इस काम में मुझे और मजा आने लगा.
कामवासना पर लगी रोक उसमे और उत्तेजना पैदा कर देती है.
एक बार हम ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ कर फिल्म देख रहे थे. ठंड का समय था मैं जाकर रजाई ले आई. मैंने भी अपने पैर रजाई में डाल दिए. हम दोनों कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे माया जी किचन से हम दोनों को देख रही थी. रजाई लाने से बाद मैंने बाथरूम गयी और अपनी पेंटी उतार कर बाथरूम में फेक आई. सोफे पर बैठते समय मैंने मानस का हाथ पकड़ा और उसे सोफे पर रखा और अपनी स्कर्ट ऊपर करके उनकी हथेली पर बैठ गई. उनकी उंगलियां अब मेरी राजकुमारी के संपर्क में थी. मैं मानस से सामान्य रूप से बात कर रही थी तथा बीच-बीच में मां को आवाज भी लगा रही थी. मेरी आवाज पर मां बार-बार कुछ न कुछ जवाब देती हमारे संवादों के बीच में शक की गुंजाइश खत्म हो गई थी.
मेरी राजकुमारी मानस की उंगलियों से लगातार बातें कर रही थी. मानस की उंगलियां मेरी राजकुमारी के होंठों पर घूमतीं कभी राजकुमारी के मुख पर दस्तक देती. उनकी उंगलियां मेरे रस से सराबोर हो गई थी. उंगलियों से बहता हुआ प्रेम रस मेरी जांघों यहां तक कि मेरी दासी को भी गीला कर गया था. उनका हाथ अब मुझे बहुत चिपचिपा लग रहा था मेरी उत्तेजना अब चरम पर पहुंच गई थी. मानस ने भी जैसे मुझे सताने की ठान ली थी. जब भी मां मुझसे कुछ पूछती वह अपनी उंगलियों का कंपन बढ़ा देते. कम्पन से मेरी आवाज लहराने लगती. मां किचन से बोलती
" क्या हुआ ऐसे क्यों बोल रही है ?"
मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता. कुछ ही देर में राजकुमारी ने अपना प्रेम रस उगल दिया. मानस ने अपने हाँथ साफ किये और हम दोनों खाना खाने बैठ गए.
एकांत पाने के लिए मैं और मानस अपनी सोसाइटी की छत पर रासलीला करने लगे. हम दोनों छत पर ही एक दूसरे से मिलते और अपनी काम पिपासा को शांत करते. लिफ्ट भी हमारा एक पसंदीदा स्थल था। हमेशा एक बात का ही दुख रहता था कि हमें अपना कार्य बड़ी शीघ्रता से करना पड़ता.
"जल्दबाजी में किया हुआ सेक्स कभी-कभी तो अच्छा लगता है पर यह हमेशा उतना आनंददायक नहीं रहता"
हम कुछ ही दिनों में अपने मिलन के लिए उचित समय का इंतज़ार करने लगे.

रंगे हाँथ
[मैं माया]
मानस और छाया पर निगरानी रखते रखते मैं भी अब थक चुकी थी. पिछले १५ दिनों से हम सभी एक दूसरे को शक की निगाहों से देखते. मैंने अपने मन में इन दोनों को रंगे हाथ पकड़ने की सोची. इसके लिए एक उपयुक्त मौके की तलाश थी.
एक दिन मैंने जानबूझकर यह बताया कि बुधवार शाम को मुझे सोसाइटी की एक महिला के साथ उसकी बेटी के लिए शादी के कपड़े खरीदने जाना है और इस कार्य में चार-पांच घंटे का वक्त लग सकता है. मैंने मानस से कहा...
" मानस तुम अपनी चाबी जरूर लिए जाना और वापस आते समय छाया को भी लेते आना।"
मेरी बातें सुनकर उन दोनों के चेहरे पर चमक आ गई थी. पर उन्होंने इसे व्यक्त नहीं होने दिया. बुधवार को छाया अपने कॉलेज और मानस ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा. कुछ ही देर में दोनों निकल गए.
घर का मुख्य दरवाजा अंदर से भी बंद किया जा सकता था. जिसे बाहर से चाभी से खोला जा सकता था. शाम होते ही मैं उन दोनों के घर आने का इंतजार करने लगी. लगभग पांच बजे घर के मुख्य दरवाजे पर चाबी लगाये जाने की आवाज हुई. निश्चय ही मानस घर आ चुका था और चाबी से दरवाजा खोल रहा था. उसके साथ छाया थी या नहीं यह तो मुझे नहीं पता पर मुझे अब छिप जाना था. मैं भागकर अपने बाथरूम में गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
मेरे बाथरूम की खिड़की और मानस के बाथरूम की खिड़की अगल-बगल थी. इन खिड़कियों से बाथरूम में देखा तो नहीं जा सकता था पर ध्यान से सुनने पर वहां की आवाज सुनाई देती थी. मुझे सिर्फ एक बात का डर था कहीं गलती से छाया मेरे कमरे में ना आ जाए और मुझे बाथरूम में देख ले. यदि वह मेरे कमरे में आ जाती तो उन दोनों को रंगे हाथ पकड़ने का मौका छूट जाता. मैं सांसे रोक कर इंतजार करने लगी. अचानक मानस के बाथरूम से मानस की आवाज आई
"छाया यहीं पर आ जा"
" नहीं मेरे कपड़े बगल वाले रूम में है. पहले कपड़े तो ले आऊँ"
" अरे अभी कपड़ों की कहां जरूरत है कपड़े तो बाद में पहनने हैं"
अचानक झरना चलने की आवाज आई और छाया ने कहा
'मेरे कपड़े भींग जाएंगे पहले उन्हें उतार तो लेने दो"
फिर उन दोनों की हंसी ठिठोली और चुंबनो की आवाज आने लगी मुझे बड़ा अजीब लग रहा था कि मैं अपनी बेटी को इस तरह की रासलीला करते हुए सुन रही थी. पर उन दोनों को रंगे हाथ पकड़ना जरूरी था. मैंने कुछ देर और इंतजार किया उनके हंसी मजाक चालू थी. मानस कभी-कभी राजकुमारी और राजकुमार का नाम ले रहा था मुझे नहीं पता वह किनकी बातें कर रहे थे पर इतना विश्वास जरूर हो चलाता कि वह दोनों रासलीला में मगन थे. कुछ देर बाद झरने की आवाज बंद हुई. मानस की आवाज सुनाई थी
"आज पूरे बीस दिन हो गए. आज अपनी हसरत मिटा ले .....
उन दोनों की आवाज आना बंद हो गई. मैं अब हॉल में आ चुकी थी . मैंने देखा कि मानस के कमरे का दरवाजा खुला हुआ है. वह दोनों शायद बिस्तर पर आ चुके थे. इन दोनों की हल्की हल्की आवाजें आ रही थी और बीच-बीच में चुंबनों की भी आवाज आ रही थी. मैंने कुछ देर और इंतजार किया और एक ही झटके में दरवाजा खोल दिया.
मानस बिस्तर पर लेटा हुआ था वह पूरी तरह नग्न था मेरी बेटी छाया उसकी जांघों पर बैठी हुई थी. छाया का चेहरा मानस की तरफ था. वह भी पूर्णतया नंगी थी. मुझे देखते ही मानस घबरा गया. छाया ने भी पलट कर मुझे देखा और मानस की जांघों से उतर गई. उन दोनों के सारे कपड़े बिस्तर से नीचे थे. बिस्तर पर उन दोनों के अलावा दो तकिए पड़े थे. दोनों ने एक एक तकिया अपने गुप्तांगों पर रखा. पर सीमा के तने हुए स्तन अभी भी खुले थे. उसने अपने दोनों हाथों से उसे छुपाने की नाकाम कोशिश की. मैंने भी इस प्रेमी युगल की जो तस्वीर देखी यह मैंने जीवन में कल्पना भी नहीं की थी. दोनों अत्यंत खूबसूरत थे भगवान ने इन दोनों की काया को बड़ी फुर्सत से गढ़ा था. वो साक्षात् कामदेव और रति के अवतार लग रहे थे. छाया एक अप्सरा की तरह लग रही थी उसके शरीर का नूर मंत्रमुग्ध करने वाला था. मेरा ध्यान दूसरी तरफ चला गया एक बार के लिए मेरा क्रोध जाने कहां गायब हो गया था. मैं इस पल को कुछ देर तक यूँ ही निहारती रही. दोनों अपनी गर्दन नीचे झुकाए बैठे थे. मैं वापस अपनी कल्पना से हकीकत में आइ और डांटते हुए बोली
"तुम दोनों हाल में तुरंत आओ."
यह कहकर मैं हॉल में आ गइ कुछ ही देर में दोनों हॉल में मेरे सामने सर झुकाए खड़े थे.

समाज से बगावत
[मैं माया]
मैंने छाया से पूछा
"तुम्हारा मानस भैया के साथ यह सब कब से चल रहा है."
"मां मानस मेरे भैया नहीं है."
"तो फिर क्या हैं ?"
"यह मुझे नहीं पता परंतु मेरे भाई तो कतई नहीं"
"मानस क्या तुम भी यही सोचते हो ?"
" हां बिल्कुल, छाया मेरी बहन तो नहीं है. और आप मेरे लिए माया जी थी और माया जी ही रहेंगी."
" इसका मतलब हम मां- बेटी तुम्हारे कोई नहीं लगते?"
" यह मुझे नहीं पता पर मेरा संबंध अभी सिर्फ छाया से है. मैं उससे प्रेम करता हूं."
मानस द्वारा बोली गई यह बात मुझे निरुत्तर कर गइ कुछ देर सोचने के बाद मैंने कहा गांव में सब लोग यही जानते हैं कि तुम और छाया भाई बहन हो.
"जब हमारी मां एक नहीं हमारे पिता एक नहीं तो हम भाई-बहन कैसे होते हैं?"
"आप मेरे पिताजी के साथ आयी थीं इसका मतलब यह नहीं कि आप मेरी मां है. आप छाया की मां है और छाया मेरी प्रेमिका मुझे इतना ही पता है"
"पर हम गांव वालों को क्या बताएंगे यदि मैं तुम्हारे प्रेम संबंधों को स्वीकार भी कर लूं फिर भी तब भी जब हम गांव जाएंगे तो हमारे पास क्या उत्तर होगा? तुम पर भी कलंक लगेगा."
" मुझे गांव वालों की चिंता नहीं मैं अब वयस्क हो चुका मैं छाया से प्रेम करता हूं और मैं उससे ही शादी करना चाहता हूं. वह मेरी बहन नहीं है यह बात मैं पहले ही बता चुका हूं मुझे सिर्फ आपकी इजाजत की आवश्यकता है बाकी मुझे समाज से कोई लेना देना नहीं "
मानस की यह बाते सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वह समाज से बगावत करने का इच्छुक है. मैं उसकी बात एक बार के लिए मान भी लूं तो क्या हम आज के बाद कभी गांव वालों से या मानस के रिश्तेदारों से या अपने बचे खुचे रिश्तेदारों से कभी नहीं मिलेंगे? यदि हम उनसे मिलते हैं तो छाया और मानस के बीच बने इस नए रिश्ते को कैसे बताएंगे? उनकी निगाह में तो यह दोनों अभी भी भाई बहन जैसे ही हैं. यह कौन जानता था कि यह दोनों आपस में एक दूसरे को भाई-बहन नहीं मानते और एक दूसरे से प्रेम करने लगे हैं. मेरे लिए विषम स्थिति थी. मैं समझ नहीं पा रही थी कि किस रास्ते से जाऊं.
मैंने उन दोनों को अपने अपने कमरे में जाने के लिए कहा और खुद इन सब घटनाओं के बारे में सोचने लगी. छाया मेरी बेटी के लिए मानस से अच्छा लड़का नहीं मिल सकता था. मानस छाया का बहुत ख्याल रखता था. मानस को अपने दामाद के रूप में सोच कर मेरे दिमाग में भी समाज से बगावत करने की इच्छा ने जगह बनाना शुरू कर दिया. मुझे बार-बार यही लगा यह समाज ने हमें क्या दिया है जो हमें इस कार्य के लिए रोकेगा. मैंने खुद भी मानस के पिता से कभी भी शारीरिक संबंध नहीं बनाया. हमारी शादी एक समझौता मात्र थी. इस प्रकार मैं किसी भी तरह से उनकी पत्नी ना हुई थी. हम दोनों सिर्फ नाम के पति पत्नी थे. धीरे-धीरे मेरा मन भी मानस और छाया के इस नए रिश्ते रिश्ते को स्वीकार करने लगा था.
कभी-कभी मुझे लगता था की लोग इस रिश्ते में मेरा और मेरी बेटी का स्वार्थ देखेंगे और हमें लालची समझेंगे. यही बात मुझे कभी-कभी खटकती कि समाज के सभी लोग यही बात कहेंगे कि इन मां बेटी ने मानस को अपने कब्जे में कर लिया. बिना भाई बहन के रिश्ते की परवाह किए मां ने अपनी बेटी को मानस पर डोरे डालना सिखाया होगा और अपनी बेटी के इस्तेमाल से अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया होगा.
इस बात को सोचते ही मेरा विचार बदल जाता मैं यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि मैं और मेरी बेटी जीवन भर इस कलंक का सामना करें. हम लोग गरीब जरूरत थे पर अपने सम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया. छाया को एक प्यार करने वाला पति मिलता मुझे एक अच्छा दामाद यही मेरे लिए एक उपलब्धि होती.
आज तक मेरे पूर्व पति के अलावा किसी ने मेरे शरीर को हाथ भी नहीं लगाया था. मानव के पिता से विवाह करते समय यह बात सर्वविदित थी कि यह विवाह पति-पत्नी के हिसाब से नहीं किया गया था अपितु दो जरूरतमंद लोगों को एक साथ एक ही छत के नीचे लाया गया था ताकि दोनों का परिवार संभल जाए. इसी उधेड़बुन में अंततः मैंने छाया और मानस के इस नए संबंध को पूरे मन से स्वीकार कर लिया. मैंने समाज से उठने वाली आवाजों को अपने मन में कई बातें सोच कर दबा दिया.
मानव मन परिस्थितियों को अपने मनमुताबिक सोचते हुए उसका हल अपने पक्ष में ही निकालता है.
शाम को मैंने छाया को अपने पास बुलाया और पूछा...
"छाया तुम दोनों के बीच में कब से चल रहा है?"
"जब से मैं अठारह वर्ष की हुई थी"
"इसका मतलब क्या तुम्हारा कौमार्य सुरक्षित नहीं है"
"नहीं, मैं अभी भी एक अक्षत यौवना हूं."
" पर तुम तो मानस के साथ नग्न अवस्था में थी"
हाँ मैं जरूर नग्न थी और अक्सर हम इसी तरह साथ में होते हैं. हम दोनों ने एक दूसरे से वचन लिया है कि जब मेरा विवाह नहीं हो जाता मैं अपना कौमार्य सुरक्षित रखूंगी. हम दोनों सिर्फ एक दूसरे के साथ वक्त गुजारते हैं तथा जिस तरह बाकी लडके- लड़कियां हस्तमैथुन करते हैं उस तरह हम दोनों भी करते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि इस कार्य में हम दोनों एक दूसरे का साथ देते हैं."
छाया द्वारा इतना बेबाक उत्तर सुनकर मैं स्वयं निरुत्तर हो गइ. मैं क्या बोलूं मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था मैंने मानस को भी बुला लिया. मैंने उसकी तरफ देखा और पूछा
"तुम्हें भी कुछ कहना है"
"आंटी में छाया से बहुत प्यार करता हूं. हमने आज तक जो भी किया है एक दूसरे को खुश करने के लिए किया है. जब तक छाया का विवाह नहीं हो जाता उसका कौमार्य सुरक्षित रहेगा यह मैं आपको वचन देता हूं. मैं छाया से शादी करने के लिए पूरी तरह इच्छुक हूं. बस मैं उसके कॉलेज की पढ़ाई पूरा होने का इंतजार कर रहा था. इसके बाद हम दोनों विवाह कर लेंगे."
दोनों की बातें सुनकर उनके रिश्ते को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. दोनों युवा पूरी तरह साथ रहने का मन बना चुके थे. उन्हें समाज का बिल्कुल डर नहीं था. मैंने भी अपनी पुत्री की खुशी देखते हुए उनके इस नए रिश्ते को स्वीकार कर लिया.
अब छाया मानस की प्रेयसी थी. मानस ने छाया का कौमार्य सुरक्षित रखने का जो वचन दिया था उससे मेरी सारी चिंताएं खत्म हो गई थी. यदि किसी वजह से यह शादी नहीं भी हो पाती तो भी छाया का कौमार्य उसके साथ था.

मैंने उन दोनों को आशीर्वाद दिया और मानस से कहा आज से छाया तुम्हारी प्रेयसी नहीं मंगेतर है. तुम जब चाहे इससे मिल सकते हो. अपने वचन का पालन करते हुए तुम दोनों एक दूसरे को खुश रखो यही मेरी कामना है. मानस और छाया ने मेरे पैर छुए. मानस ने कहा
"थैंक यु माया आंटी" मैं मुस्करा दीं. " आंटी " शब्द मुझे अच्छा लगा था. मानस के मेरे भी एक रिश्ता जुड़ रहा था.

मैंने छाया को बताया की हम नए रिश्ते की नयी शुरुवात नवरात्रि की बाद करेंगे. वो खुश थी.
 
छाया ( भाग -5)

छाया प्रेयसी से मंगेतर तक.
नज़रों के नीचे
समय तेजी से बीत रहा था. मैं और छाया एक ही छत के नीचे प्रेमी प्रेमिका का खेल खेल रहे थे. अपनी मां की उपस्थिति में भी छाया इतने कामुक और बिंदास तरीके से रहती थी जैसे उसे किसी बात का डर ही ना हो. वह अपनी मां की नजर बचाकर मेरे पास आती मुझे उत्तेजित करती और हट जाती. कई बार तो उसने अपनी माया जी की उपस्थिति में ही उनकी पीठ पीछे मेरे राजकुमार को सहला दिया था.
एक बार खाना खाते समय अपने पैरों को मेरे पैरों से रगड़ रही थी. मेरा राजकुमार उत्तेजित हो रहा था. कुछ देर बाद उसके हाँथ से एक चम्मच गिरी. वह टेबल के नीचे झुकी और मेरे राजकुमार को मेरे पायजामा से बाहर कर दिया और चम्मच उठाकर उपर आ गयी. कुछ ही देर में खाना खाते- खाते उसने अपने पैरों से मेरे राजकुमार को छूना शुरु कर दिया. बड़ा अद्भुत आनंद था माया जी बगल में बैठी थी. हम सब खाना खा रहे थे, और नीचे छाया के पैर रासलीला कर रहे थे.
खाना खाते खाते मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई. खाना खत्म करने के बाद जैसे ही माया जी बर्तन साफ करने किचन की ओर गयीं छाया मेरे कमरे में आई और अगले 2 मिनटों में ही मुझे स्खलित कर मेरा सारा वीर्य अपने हाथ से अपने स्तनों पर लगा लिया. मुझे इस बात से बहुत खुशी मिलती थी यह उसे पता था.
कभी-कभी वह मेरी गोद में आकर बैठ जाया करती. वह भी एक अलग तरह का आनंद होता. एक बार हम सब सोफे पर बैठकर फिल्म देख रहे थे. ठण्ड की वजह से हमने अपने ऊपर रजाई डाल रखी थी. नायिका की सुहागरात देखकर छाया उत्तेजित हो गई उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी पैंटी में डाल दिया. मैं उसकी मंशा समझ चुका था. बगल में माया जी बैठी थी फिर भी मैंने हिम्मत करके उसके राजकुमारी को सहलाया. कुछ ही देर में उसकी राजकुमारी कांपने लगी उसने मेरे हाथ को अपनी दोनों जांघों से दबा दिया. राजकुमारी के कंपन यह बता रहे थे कि वह स्खलित हो रही थी.
उसने पिछले कुछ महीनों में कई प्रकार की परिस्थितियां बनाकर सेक्स को रोमांचक बना दिया था. कभी कभी वह स्कर्ट के नीचे पैंटी नहीं पहनती और मुझे इस बात का एहसास भी करा देती. हम दोनों दिन भर एक दुसरे से माया जी उपस्थिति में ही छेड़खानी करते. एक बार मैंने उसकी जांघो और राजकुमारी से खेलते हुए पेन से एक बिल्ली की आकृति बना दी. राजकुमारी का मुख बिल्ली के मुख की जगह आ गया था. वह आईने में देखकर बहुत खुस हो गयी थी.

एक दिन छाया ने मुझसे पूछा
"आप मम्मी से शादी की बात कब करेंगे?"
" तुम्हारे कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद."
"कोई हमें भाई बहन तो नहीं मानेगा न?"
"तुम किसी भी तरीके से मेरी बहन नहीं हो . मेरे पापा और तुम्हारी मां की मजबूरियों की वजह से हम सब एक ही छत के नीचे आ गए. मैं खुद नहीं समझ पा रहा हूं कि हम दोनों के एक होने में क्या दिक्कत आएगी. हम भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे विवाह में आने वाली अड़चनों को दूर करें."
डर तो मुझे भी था पर मैं उसे समझा रहा था.

माया जी के नए साथी.
हमारी सोसाइटी में रहने वाले शर्मा जी एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर थे. वह बहुत ही मिलनसार थे. जब भी वह देखते मुस्कुरा देते कुछ महीने पहले एक दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी. लिफ्ट में जाते समय उन्होंने मुझसे कहा ...
"मानस क्या आप मेरी एक मदद करोगे? मेरे लिए कुछ दवाएं ला दो"
उनके चेहरे से पसीना निकल रहा था. मैं उन्हें उनके फ्लैट में जो ठीक हमारे ऊपर था छोड़कर दवा लेने चला गया. लौटकर मैं देखता हूं कि वह अपने बिस्तर पर बेसुध पड़े हुए थे. मैं घबरा गया मैं नीचे जा कर माया आंटी को बुला लाया. माया आंटी को उनके पास छोड़कर मैं डॉक्टर को फोन करने लगा. माया आंटी ने उनके चेहरे पर पानी के छींटे मारे थोड़ी देर में उन्होंने अपनी आंखें खोली वह माया आंटी को अपने पास देख कर आश्चर्यचकित थे. माया आंटी उनके सर को हल्के हल्के दबा रहीं थीं. कुछ ही देर में पास में रहने वाले डॉक्टर वहां आ गए और उन्होंने शर्मा जी का चेकअप किया. उन्होंने माया आंटी की तरफ देखते हुए बोला ..
"आपके पति बिल्कुल ठीक-ठाक है. लगता है इनका ब्लड प्रेशर ज्यादा बढ़ गया था . चिंता की कोई विशेष बात नहीं है."
फिर वह शर्मा की की तरफ मुखातिब हुआ...
"आप घर पर आराम करिए और तेल मसाला वाला खाना मत खाइए. कुछ ही दिनों में आपका ब्लड प्रेशर नार्मल हो जाएगा" मैं एक बार फिर डॉक्टर की बताई दवा लेने गया तब तक माया आंटी वही बैठी थी. वहां से आने के बाद माया आंटी खाना बनाने चली गई और मैं शर्मा अंकल का ध्यान रख रहा था. माया आंटी ने अगले तीन-चार दिनों तक शर्मा अंकल का खूब ख्याल रखा और उन दोनों में दोस्ती हो गई. हम और छाया कभी-कभी यह बात करते कि माया आंटी ने अपने जीवन में कितने कष्ट सहे हैं. लगभग सत्ताईस वर्ष की अवस्था में उनके पति का देहांत हो गया था. तब से वह अकेली ही थीं. मेरे पापा के साथ आकर उन्होंने अपने और अपनी बेटी छाया के लिए एक छत तलाश ली थी पर शारीरिक सुख की बात असंभव थी. तीन-चार दिन शर्मा अंकल की सेवा करने के बाद माया आंटी की उनसे दोस्ती हो गई थी.

माया जी का शक
छाया पर इक्कीसवां साल लग चुका था. मैंने और छाया ने पिछले कुछ महीनों में एक दूसरे के साथ इतनी कुछ किया था पर माया जी को इसकी भनक न लगी हो यह बड़ा आश्चर्य लगता था. हमने घर के हर कोने में अपनी कामुकता को अंजाम दिया था. मुझे तो लगता है कि यदि किसी फॉरेंसिक एक्सपर्ट को घर की जांच करने को दे दी जाए तो उसे हर जगह मेरे या छाया के प्रेम रस के सबूत मिल जाएंगे.
हमने घर की लगभग हर जगह पर अलग-अलग प्रकार से अपनी कामुकता को जिया था. घर का सोफा, डाइनिंग टेबल, किचन टॉप, बालकनी, बाथरूम आदि मेरे और छाया के प्रेम के गवाह थे.
माया जी ने हमारे कपड़ों पर भी उसके दाग जरूर देखे होंगे पर व हमेशा शांत रहती थी. मुझे नहीं पता कि उनको इसकी भनक लग चुकी थी या नहीं पर उनका व्यवहार सामान्य रहता था .
परंतु एक दिन मैं और छाया अपनी प्रेम लीला समाप्त करके उठे ही थे और अपने वस्त्र पहन रहे थे तभी माया जी के आने की आहट हुई वो बाज़ार से वापस जल्दी आ गयीं थी. इस जल्दबाजी में छाया अपने गालों पर लगा मेरा वीर्य पोछना भूल गई. माया जी की निगाहों ने उसके गाल पर लगा सफेद द्रव्य देख लिया उन्होंने अपनी उंगलियों से उसे पोछते हुए बोला यह क्या लगा रखा है. सीमा घबरा सी गई वह कुछ बोल नहीं पाइ. उसने अपने हाथों से अपना गाल पोछा और बोला "कुछ लग गया होगा"
माया जी ने चलते चलते अपना हाथ अपनी साड़ी के पल्लू में पोछा और अपनी उंगलियों को अपनी नाक के पास ले गयीं जैसे वह उसे सूंघ कर पता करना चाहती हो की वह क्या था.
[ मैं माया ]
अपनी उंगलियों को अपनी नाक के पास ले जाते ही मुझे अपनी उंगलियों में लगे चिपचिपे पदार्थ पहचानने में कोई वक्त नहीं लगा मैं समझ गई कि मेरा शक सही था. छाया और मानस के बीच बढ़ती हुई नजदीकियां इतनी जल्दी ऐसा रूप ले लेगी यह मैंने नहीं सोचा था. इन दोनों का साथ में हंसना मुस्कुराना एक दूसरे के साथ घूमना और कई बार देर रात तक वापस लौटना हमेशा से शक पैदा करता था पर मानस को देखकर ऐसा लगता नहीं था कि वह छाया को इस कार्य के लिए मना लेगा.
मैंने छाया के कपड़ों पर अलग तरह के दाग देखे थे पर मैं यह यकीन नहीं कर सकती थी कि वह अपने कपड़ों पर किसी पुरुष का वीर्य लगाए घूम रही होगी. छाया जब भी मानव के कमरे से निकलती थी उसके कपड़े की सलवटे यह बताती थी जैसे किसी ने उसके स्तनों को अपने दोनों हाथों से खूब मसला हो. आज यह देखने के बाद कि यह वीर्य मानस का है मैं सच में चिंतित थी.
मुझे अब छाया पर निगाह रखना आवश्यक हो गया था. मैंने मन ही छाया को रंगे हाथ पकड़ने का निश्चय कर लिया. छाया भी शायद अब सतर्क हो गई थी. मैंने तीन चार दिनों तक उस पर पैनी निगाह रखी पर उसने मुझे कोई मौका नहीं दिया. कई बार मुझे लगता जैसे मैंने इन दोनों पर नाहक ही शक किया हो. मानस एक निहायती शरीफ और जिम्मेदार लड़का था उसने छाया की बहुत मदद की थी. आज उसकी बदौलत ही छाया ने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया था और वह अपनी पढ़ाई अच्छे से कर रही थी. वह छाया को इन गलत कामों के लिए प्रेरित करेगा ऐसा यकीन करना मुश्किल था.
परंतु ये छोटी छोटी घटनाएं मुझे हमेशा शक में डालती थी. छाया के गाल पर वह चिपचिपा पदार्थ देखकर मुझे आज से लगभग 3 वर्ष पहले मानस के गाल पर लगा द्रव्य याद आ गया. इन दोनों घटनाओं में एक ही संबंध था वह था मानस.
मेरे पास इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था मैंने अपनी निगाहें चौकस रखनी शुरू कर दी और वक्त का इंतजार कर रही थी. मैंने घर से बाहर जाना लगभग बंद कर दिया. मैं घर से तभी बाहर निकलती जब मानस या छाया में से कोई एक घर के बाहर होता. मानस कभी-कभी छाया को बाहर ले जाना चाहता पर मैं किसी ना किसी बहाने उसे टाल देती.
दिन बीतते जा रहे थे और मेरा सब्र अब जवाब दे रहा था. बाहर न निकल पाने के कारण मैं भी अब तनाव में रहने लगी थी. मेरी शर्मा जी से भी मुलाक़ात नहीं हो पा रही थी. पर अपनी बेटी को इन गलत कार्यों से बचाने के लिए और इन दोनों के बीच बन रहे इस नए रिश्ते को रोकने के लिए मेरी निगरानी जरूरी थी..
एक ही छत के नीचे जवान लड़की और लड़का दिया और फूस की तरह होते हैं.
छाया अब २१ वर्ष की हो चुकी थी एवं मानस लगभग २5 वर्ष का. इनके बीच में कामुकता का जन्म लेना यह साबित कर रहा था की इन दोनों ने अपने बीच भाई बहन के रिश्ते को अभी तक स्वीकार नहीं किया था.
सतर्क छाया
[मैं छाया]
मां के द्वारा मेरे गालों से मानस का वीर्य पोछना मुझे बहुत शर्मनाक लगा. मुझे यह डर भी लगा कि कहीं मां ने उसे पहचान लिया तो? अभी तक मैं उनकी रानी बिटिया थी उनके लिए मेरा यह रूप बिल्कुल अचंभा होता. मैंने मानस को भी इसकी जानकारी दे दी. वह भी काफी चिंतित हो गए थे अब हम सतर्क रहने लगे , पर कितने दिन ? हमें एक दूसरे की आदत पड़ गई थी. राजकुमारी बिना राजकुमार के एक दिन भी नहीं रह सकती थी. हमारी रासलीला में रुकावट हमें बर्दाश्त नहीं थी.
मैंने भी जैसे अपनी मां की आंखों में धूल झोंकने का बीड़ा उठा लिया था. अब इस काम में मुझे और मजा आने लगा.
कामवासना पर लगी रोक उसमे और उत्तेजना पैदा कर देती है.
एक बार हम ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ कर फिल्म देख रहे थे. ठंड का समय था मैं जाकर रजाई ले आई. मैंने भी अपने पैर रजाई में डाल दिए. हम दोनों कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे माया जी किचन से हम दोनों को देख रही थी. रजाई लाने से बाद मैंने बाथरूम गयी और अपनी पेंटी उतार कर बाथरूम में फेक आई. सोफे पर बैठते समय मैंने मानस का हाथ पकड़ा और उसे सोफे पर रखा और अपनी स्कर्ट ऊपर करके उनकी हथेली पर बैठ गई. उनकी उंगलियां अब मेरी राजकुमारी के संपर्क में थी. मैं मानस से सामान्य रूप से बात कर रही थी तथा बीच-बीच में मां को आवाज भी लगा रही थी. मेरी आवाज पर मां बार-बार कुछ न कुछ जवाब देती हमारे संवादों के बीच में शक की गुंजाइश खत्म हो गई थी.
मेरी राजकुमारी मानस की उंगलियों से लगातार बातें कर रही थी. मानस की उंगलियां मेरी राजकुमारी के होंठों पर घूमतीं कभी राजकुमारी के मुख पर दस्तक देती. उनकी उंगलियां मेरे रस से सराबोर हो गई थी. उंगलियों से बहता हुआ प्रेम रस मेरी जांघों यहां तक कि मेरी दासी को भी गीला कर गया था. उनका हाथ अब मुझे बहुत चिपचिपा लग रहा था मेरी उत्तेजना अब चरम पर पहुंच गई थी. मानस ने भी जैसे मुझे सताने की ठान ली थी. जब भी मां मुझसे कुछ पूछती वह अपनी उंगलियों का कंपन बढ़ा देते. कम्पन से मेरी आवाज लहराने लगती. मां किचन से बोलती
" क्या हुआ ऐसे क्यों बोल रही है ?"
मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता. कुछ ही देर में राजकुमारी ने अपना प्रेम रस उगल दिया. मानस ने अपने हाँथ साफ किये और हम दोनों खाना खाने बैठ गए.
एकांत पाने के लिए मैं और मानस अपनी सोसाइटी की छत पर रासलीला करने लगे. हम दोनों छत पर ही एक दूसरे से मिलते और अपनी काम पिपासा को शांत करते. लिफ्ट भी हमारा एक पसंदीदा स्थल था। हमेशा एक बात का ही दुख रहता था कि हमें अपना कार्य बड़ी शीघ्रता से करना पड़ता.
"जल्दबाजी में किया हुआ सेक्स कभी-कभी तो अच्छा लगता है पर यह हमेशा उतना आनंददायक नहीं रहता"
हम कुछ ही दिनों में अपने मिलन के लिए उचित समय का इंतज़ार करने लगे.

रंगे हाँथ
[मैं माया]
मानस और छाया पर निगरानी रखते रखते मैं भी अब थक चुकी थी. पिछले १५ दिनों से हम सभी एक दूसरे को शक की निगाहों से देखते. मैंने अपने मन में इन दोनों को रंगे हाथ पकड़ने की सोची. इसके लिए एक उपयुक्त मौके की तलाश थी.
एक दिन मैंने जानबूझकर यह बताया कि बुधवार शाम को मुझे सोसाइटी की एक महिला के साथ उसकी बेटी के लिए शादी के कपड़े खरीदने जाना है और इस कार्य में चार-पांच घंटे का वक्त लग सकता है. मैंने मानस से कहा...
" मानस तुम अपनी चाबी जरूर लिए जाना और वापस आते समय छाया को भी लेते आना।"
मेरी बातें सुनकर उन दोनों के चेहरे पर चमक आ गई थी. पर उन्होंने इसे व्यक्त नहीं होने दिया. बुधवार को छाया अपने कॉलेज और मानस ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा. कुछ ही देर में दोनों निकल गए.
घर का मुख्य दरवाजा अंदर से भी बंद किया जा सकता था. जिसे बाहर से चाभी से खोला जा सकता था. शाम होते ही मैं उन दोनों के घर आने का इंतजार करने लगी. लगभग पांच बजे घर के मुख्य दरवाजे पर चाबी लगाये जाने की आवाज हुई. निश्चय ही मानस घर आ चुका था और चाबी से दरवाजा खोल रहा था. उसके साथ छाया थी या नहीं यह तो मुझे नहीं पता पर मुझे अब छिप जाना था. मैं भागकर अपने बाथरूम में गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
मेरे बाथरूम की खिड़की और मानस के बाथरूम की खिड़की अगल-बगल थी. इन खिड़कियों से बाथरूम में देखा तो नहीं जा सकता था पर ध्यान से सुनने पर वहां की आवाज सुनाई देती थी. मुझे सिर्फ एक बात का डर था कहीं गलती से छाया मेरे कमरे में ना आ जाए और मुझे बाथरूम में देख ले. यदि वह मेरे कमरे में आ जाती तो उन दोनों को रंगे हाथ पकड़ने का मौका छूट जाता. मैं सांसे रोक कर इंतजार करने लगी. अचानक मानस के बाथरूम से मानस की आवाज आई
"छाया यहीं पर आ जा"
" नहीं मेरे कपड़े बगल वाले रूम में है. पहले कपड़े तो ले आऊँ"
" अरे अभी कपड़ों की कहां जरूरत है कपड़े तो बाद में पहनने हैं"
अचानक झरना चलने की आवाज आई और छाया ने कहा
'मेरे कपड़े भींग जाएंगे पहले उन्हें उतार तो लेने दो"
फिर उन दोनों की हंसी ठिठोली और चुंबनो की आवाज आने लगी मुझे बड़ा अजीब लग रहा था कि मैं अपनी बेटी को इस तरह की रासलीला करते हुए सुन रही थी. पर उन दोनों को रंगे हाथ पकड़ना जरूरी था. मैंने कुछ देर और इंतजार किया उनके हंसी मजाक चालू थी. मानस कभी-कभी राजकुमारी और राजकुमार का नाम ले रहा था मुझे नहीं पता वह किनकी बातें कर रहे थे पर इतना विश्वास जरूर हो चलाता कि वह दोनों रासलीला में मगन थे. कुछ देर बाद झरने की आवाज बंद हुई. मानस की आवाज सुनाई थी
"आज पूरे बीस दिन हो गए. आज अपनी हसरत मिटा ले .....
उन दोनों की आवाज आना बंद हो गई. मैं अब हॉल में आ चुकी थी . मैंने देखा कि मानस के कमरे का दरवाजा खुला हुआ है. वह दोनों शायद बिस्तर पर आ चुके थे. इन दोनों की हल्की हल्की आवाजें आ रही थी और बीच-बीच में चुंबनों की भी आवाज आ रही थी. मैंने कुछ देर और इंतजार किया और एक ही झटके में दरवाजा खोल दिया.
मानस बिस्तर पर लेटा हुआ था वह पूरी तरह नग्न था मेरी बेटी छाया उसकी जांघों पर बैठी हुई थी. छाया का चेहरा मानस की तरफ था. वह भी पूर्णतया नंगी थी. मुझे देखते ही मानस घबरा गया. छाया ने भी पलट कर मुझे देखा और मानस की जांघों से उतर गई. उन दोनों के सारे कपड़े बिस्तर से नीचे थे. बिस्तर पर उन दोनों के अलावा दो तकिए पड़े थे. दोनों ने एक एक तकिया अपने गुप्तांगों पर रखा. पर सीमा के तने हुए स्तन अभी भी खुले थे. उसने अपने दोनों हाथों से उसे छुपाने की नाकाम कोशिश की. मैंने भी इस प्रेमी युगल की जो तस्वीर देखी यह मैंने जीवन में कल्पना भी नहीं की थी. दोनों अत्यंत खूबसूरत थे भगवान ने इन दोनों की काया को बड़ी फुर्सत से गढ़ा था. वो साक्षात् कामदेव और रति के अवतार लग रहे थे. छाया एक अप्सरा की तरह लग रही थी उसके शरीर का नूर मंत्रमुग्ध करने वाला था. मेरा ध्यान दूसरी तरफ चला गया एक बार के लिए मेरा क्रोध जाने कहां गायब हो गया था. मैं इस पल को कुछ देर तक यूँ ही निहारती रही. दोनों अपनी गर्दन नीचे झुकाए बैठे थे. मैं वापस अपनी कल्पना से हकीकत में आइ और डांटते हुए बोली
"तुम दोनों हाल में तुरंत आओ."
यह कहकर मैं हॉल में आ गइ कुछ ही देर में दोनों हॉल में मेरे सामने सर झुकाए खड़े थे.

समाज से बगावत
[मैं माया]
मैंने छाया से पूछा
"तुम्हारा मानस भैया के साथ यह सब कब से चल रहा है."
"मां मानस मेरे भैया नहीं है."
"तो फिर क्या हैं ?"
"यह मुझे नहीं पता परंतु मेरे भाई तो कतई नहीं"
"मानस क्या तुम भी यही सोचते हो ?"
" हां बिल्कुल, छाया मेरी बहन तो नहीं है. और आप मेरे लिए माया जी थी और माया जी ही रहेंगी."
" इसका मतलब हम मां- बेटी तुम्हारे कोई नहीं लगते?"
" यह मुझे नहीं पता पर मेरा संबंध अभी सिर्फ छाया से है. मैं उससे प्रेम करता हूं."
मानस द्वारा बोली गई यह बात मुझे निरुत्तर कर गइ कुछ देर सोचने के बाद मैंने कहा गांव में सब लोग यही जानते हैं कि तुम और छाया भाई बहन हो.
"जब हमारी मां एक नहीं हमारे पिता एक नहीं तो हम भाई-बहन कैसे होते हैं?"
"आप मेरे पिताजी के साथ आयी थीं इसका मतलब यह नहीं कि आप मेरी मां है. आप छाया की मां है और छाया मेरी प्रेमिका मुझे इतना ही पता है"
"पर हम गांव वालों को क्या बताएंगे यदि मैं तुम्हारे प्रेम संबंधों को स्वीकार भी कर लूं फिर भी तब भी जब हम गांव जाएंगे तो हमारे पास क्या उत्तर होगा? तुम पर भी कलंक लगेगा."
" मुझे गांव वालों की चिंता नहीं मैं अब वयस्क हो चुका मैं छाया से प्रेम करता हूं और मैं उससे ही शादी करना चाहता हूं. वह मेरी बहन नहीं है यह बात मैं पहले ही बता चुका हूं मुझे सिर्फ आपकी इजाजत की आवश्यकता है बाकी मुझे समाज से कोई लेना देना नहीं "
मानस की यह बाते सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे वह समाज से बगावत करने का इच्छुक है. मैं उसकी बात एक बार के लिए मान भी लूं तो क्या हम आज के बाद कभी गांव वालों से या मानस के रिश्तेदारों से या अपने बचे खुचे रिश्तेदारों से कभी नहीं मिलेंगे? यदि हम उनसे मिलते हैं तो छाया और मानस के बीच बने इस नए रिश्ते को कैसे बताएंगे? उनकी निगाह में तो यह दोनों अभी भी भाई बहन जैसे ही हैं. यह कौन जानता था कि यह दोनों आपस में एक दूसरे को भाई-बहन नहीं मानते और एक दूसरे से प्रेम करने लगे हैं. मेरे लिए विषम स्थिति थी. मैं समझ नहीं पा रही थी कि किस रास्ते से जाऊं.
मैंने उन दोनों को अपने अपने कमरे में जाने के लिए कहा और खुद इन सब घटनाओं के बारे में सोचने लगी. छाया मेरी बेटी के लिए मानस से अच्छा लड़का नहीं मिल सकता था. मानस छाया का बहुत ख्याल रखता था. मानस को अपने दामाद के रूप में सोच कर मेरे दिमाग में भी समाज से बगावत करने की इच्छा ने जगह बनाना शुरू कर दिया. मुझे बार-बार यही लगा यह समाज ने हमें क्या दिया है जो हमें इस कार्य के लिए रोकेगा. मैंने खुद भी मानस के पिता से कभी भी शारीरिक संबंध नहीं बनाया. हमारी शादी एक समझौता मात्र थी. इस प्रकार मैं किसी भी तरह से उनकी पत्नी ना हुई थी. हम दोनों सिर्फ नाम के पति पत्नी थे. धीरे-धीरे मेरा मन भी मानस और छाया के इस नए रिश्ते रिश्ते को स्वीकार करने लगा था.
कभी-कभी मुझे लगता था की लोग इस रिश्ते में मेरा और मेरी बेटी का स्वार्थ देखेंगे और हमें लालची समझेंगे. यही बात मुझे कभी-कभी खटकती कि समाज के सभी लोग यही बात कहेंगे कि इन मां बेटी ने मानस को अपने कब्जे में कर लिया. बिना भाई बहन के रिश्ते की परवाह किए मां ने अपनी बेटी को मानस पर डोरे डालना सिखाया होगा और अपनी बेटी के इस्तेमाल से अपना भविष्य सुरक्षित कर लिया होगा.
इस बात को सोचते ही मेरा विचार बदल जाता मैं यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती थी कि मैं और मेरी बेटी जीवन भर इस कलंक का सामना करें. हम लोग गरीब जरूरत थे पर अपने सम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया. छाया को एक प्यार करने वाला पति मिलता मुझे एक अच्छा दामाद यही मेरे लिए एक उपलब्धि होती.
आज तक मेरे पूर्व पति के अलावा किसी ने मेरे शरीर को हाथ भी नहीं लगाया था. मानव के पिता से विवाह करते समय यह बात सर्वविदित थी कि यह विवाह पति-पत्नी के हिसाब से नहीं किया गया था अपितु दो जरूरतमंद लोगों को एक साथ एक ही छत के नीचे लाया गया था ताकि दोनों का परिवार संभल जाए. इसी उधेड़बुन में अंततः मैंने छाया और मानस के इस नए संबंध को पूरे मन से स्वीकार कर लिया. मैंने समाज से उठने वाली आवाजों को अपने मन में कई बातें सोच कर दबा दिया.
मानव मन परिस्थितियों को अपने मनमुताबिक सोचते हुए उसका हल अपने पक्ष में ही निकालता है.
शाम को मैंने छाया को अपने पास बुलाया और पूछा...
"छाया तुम दोनों के बीच में कब से चल रहा है?"
"जब से मैं अठारह वर्ष की हुई थी"
"इसका मतलब क्या तुम्हारा कौमार्य सुरक्षित नहीं है"
"नहीं, मैं अभी भी एक अक्षत यौवना हूं."
" पर तुम तो मानस के साथ नग्न अवस्था में थी"
हाँ मैं जरूर नग्न थी और अक्सर हम इसी तरह साथ में होते हैं. हम दोनों ने एक दूसरे से वचन लिया है कि जब मेरा विवाह नहीं हो जाता मैं अपना कौमार्य सुरक्षित रखूंगी. हम दोनों सिर्फ एक दूसरे के साथ वक्त गुजारते हैं तथा जिस तरह बाकी लडके- लड़कियां हस्तमैथुन करते हैं उस तरह हम दोनों भी करते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि इस कार्य में हम दोनों एक दूसरे का साथ देते हैं."
छाया द्वारा इतना बेबाक उत्तर सुनकर मैं स्वयं निरुत्तर हो गइ. मैं क्या बोलूं मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था मैंने मानस को भी बुला लिया. मैंने उसकी तरफ देखा और पूछा
"तुम्हें भी कुछ कहना है"
"आंटी में छाया से बहुत प्यार करता हूं. हमने आज तक जो भी किया है एक दूसरे को खुश करने के लिए किया है. जब तक छाया का विवाह नहीं हो जाता उसका कौमार्य सुरक्षित रहेगा यह मैं आपको वचन देता हूं. मैं छाया से शादी करने के लिए पूरी तरह इच्छुक हूं. बस मैं उसके कॉलेज की पढ़ाई पूरा होने का इंतजार कर रहा था. इसके बाद हम दोनों विवाह कर लेंगे."
दोनों की बातें सुनकर उनके रिश्ते को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. दोनों युवा पूरी तरह साथ रहने का मन बना चुके थे. उन्हें समाज का बिल्कुल डर नहीं था. मैंने भी अपनी पुत्री की खुशी देखते हुए उनके इस नए रिश्ते को स्वीकार कर लिया.
अब छाया मानस की प्रेयसी थी. मानस ने छाया का कौमार्य सुरक्षित रखने का जो वचन दिया था उससे मेरी सारी चिंताएं खत्म हो गई थी. यदि किसी वजह से यह शादी नहीं भी हो पाती तो भी छाया का कौमार्य उसके साथ था.

मैंने उन दोनों को आशीर्वाद दिया और मानस से कहा आज से छाया तुम्हारी प्रेयसी नहीं मंगेतर है. तुम जब चाहे इससे मिल सकते हो. अपने वचन का पालन करते हुए तुम दोनों एक दूसरे को खुश रखो यही मेरी कामना है. मानस और छाया ने मेरे पैर छुए. मानस ने कहा
"थैंक यु माया आंटी" मैं मुस्करा दीं. " आंटी " शब्द मुझे अच्छा लगा था. मानस के मेरे भी एक रिश्ता जुड़ रहा था.

मैंने छाया को बताया की हम नए रिश्ते की नयी शुरुवात नवरात्रि की बाद करेंगे. वो खुश थी.
 
भाग -6
रिश्तों में उतार चढ़ाव .
नया घर नया रिश्ता
बेंगलुरु में आने के बाद मैंने एक पॉश कॉलोनी में दो फ्लैट बुक कर दिए थे. यह दोनों फ्लैट एक दूसरे के ठीक सामने थे. हर फ्लैट में दो बैडरूम एक हॉल और किचन था दोनों फ्लैट के हाल की मुख्य दीवार कॉमन थी. मैंने बिल्डर से बात करके वहां पर एक बड़ा दरवाजा लगा दिया था. उस दरवाजे को खोल देने पर दोनों फ्लैट एक हो जाते थे. घर पूरी तरह से बन चुका था. अब सिर्फ घर के साजो सामान सजाने थे. हर फ्लैट के मास्टर बेडरूम की डिजाइन बहुत खूबसूरत थी. कमरा भी काफी बड़ा था साथ में लगा बाथरूम भी काफी बड़ा था. ड्रेसिंग के लिए अलग जगह थी. मास्टर बैडरूम के साथ लगी हुई बालकनी से बेंगलुरु शहर बहुत खूबसूरत दिखाई देता था यह बिल्डिंग कुल दस वाले की थी और हमारा फ्लैट दसवें माले पर था. मैंने दो फ्लैट एक साथ लेकर यह सोचा था कि एक में खुद रहूंगा और दूसरे को अपने किसी मित्र या दोस्त को किराए पर दे दूंगा या जरूरत पड़ने पर दोनों फ्लैट को जोड़कर अपने ही प्रयोग में रखूंगा.

अभी तक इस घर के बारे में मैंने माया आंटी और छाया को नहीं बताया था. घर की चाबियां मिल जाने के बाद मैं उन्हें अचानक यह खबर देकर खुश करना चाहता था.

अंततः एक दिन मैं छाया को लेकर इस नए फ्लैट में गया फ्लैट का दरवाजा खुलते हैं छाया अंदर आई उसने फ्लैट को बहुत बारीकी से देखा. "इतना सुंदर फ्लैट? बालकनी में जाकर वह चहकने लगी..

"किसका है यह फ्लैट?

मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके गालों पर

चुम्बन करते हुए बोला

"हमारा" वह बहुत खुश हो गई.

वह फिर से मास्टर बेडरूम में गई और बोली

"मैं इस रूम को अपने मन से सजाऊंगी"

मैंने उससे कहा

"जरूर"

वह आकर मुझसे लिपट गई. उसने मेरे होंठ चूसने शुरू कर दिये. वह एकांत का फायदा उठा लेना चाहती थी. कुछ ही देर में हम दोनों एक दूसरे को सहलाने लगे. उसने मेरे राजकुमार को बाहर निकाल लिया तथा उसे आगे पीछे करने लगी. मैं भी उत्तेजित हो गया और उसके दोनों नितंबों को छूने लगा. वह पेंटी नहीं पहनी थी. कभी कभी जब वो मेरे साथ अकेले

बाहर आती थी तो पैंटी नहीं पहनती थी. मुझे उसके नंगे नितंब छूने में बहुत मजा आ रहा था अब मेरी आदतों में नितंबों के साथ-साथ उसकी दासी को छूना अच्छा लगता था. जैसे ही मेरी उंगलियां उसकी दासी पर जाती वह मेरी तरफ तीखी नजरों से देखती थी. मुझे उसकी यह अदा बहुत अच्छी लगती थी. कुछ ही देर में उसकी राजकुमारी का रस मेरी उँगलियों पर महसूस होने लगता था. यही वक्त होता था जब राजकुमार और राजकुमारी मिलने के लिए व्याकुल होते थे. छाया मुझे बालकनी में लगे एक प्लेटफार्म के पास ले गइ. वह उस प्लेटफार्म पर झुक गई. उसकी राजकुमारीपीछे से मुझे दिखाई देने लगी मैंने तुरंत ही अपने राजकुमार को उसके राजकुमारी के मुख पर रख दिया और उसकी भग्नासा पर रगड़ बनाने लगा.

वह कुछ ज्यादा ही उत्तेजितथी थोड़े से घर्षण से राजकुमारी कापने लगी. हम दोनों के प्रेम रस से पर्याप्त गीलापन आ चुका था. मेरा लावा भी फूटने वाला था. उसने मेरा उतावलापन पहचान लिया था. अचानक वह उठी और मेरी तरफ मुड़ कर दोनों हाथों में मेरे राजकुमार

को ले लिया. राजकुमार ने अपना लावा उसके हाथों में ही उड़ेल दिया. वह हाथों में मेरे वीर्य को लेने के बाद मास्टर बेडरूम की तरफ आई और उसकी एक दीवार पर मेरे वीर्य से ही एक दिल का निशान बनाया और उसमें एक तीर बना दिया. मैंने उससे पूछा.

"यह क्या कर रही हो"

आज हम दोनों ने पहली बार इस घर में प्रवेश किया यह हमें हमेशा इसकी याद दिलाएगा" हम फ्लैट बंद करके बाहर

आ चुके थे.मैं छाया को लेकर एक बड़े फर्नीचर शोरूम में गया. छाया ने वहां अपनी पसंद से घर के कई सारे फर्नीचर खरीदें. पलंग पसंद करते समय मैंने उसकी चुटकी ली. मैंने उससे कहा..

"पलंग मजबूत लेना तुम्हारे साथ इसी पर उछल कूद होनी है"

वह हंसने लगी उसकी यह मुस्कुराहट मुझे बहुत अच्छी लगती थी. उसने मोटे और मुलायम गद्दे भी लिए. उसने मुझसे कहा..

"छू कर देखिए ना कितने मुलायम हैं."

"तुम्हें गद्दे पर सोना है मुझे तुम पर. तुम से ज्यादा मुलायम तो नहीं है"

वो फिर हंसने लगी.

सुन्दर नवयौवना की हसीं अत्यंत मादक होती है.

कुछ ही देर में हमारी खरीदारी संपन्न हो गई. मैंने शॉपकीपर को अपने घर का पता दिया और दो दिनों बाद उसकी डिलीवरी सुनिश्चित कर ली. अब हम घर की तरफ वापस आ रहे थे. छाया की खुशी का ठिकाना नहीं था उसका यह नया घर मेरी मंगेतर बनने के उपलक्ष्य में एक उपहार जैसा लग रहा था. हालांकि यह घर मैंने पहले बनाया था पर छाया को यह घर देने या इस घर से रूबरू कराने का यह बेहतरीन मौका था. वह बहुत खुश थी. मैंने छाया से कहा था कि वह माया जी को इस बारे में कुछ भी ना बताएं. वह मान गई थी.

अगले दिन मैं माया आंटी को लेकर अपने दूसरे फ्लैट में गया. एक फ्लैट की सजावट उनकी बेटी छाया पहले ही कर चुकी थी दूसरा फ्लैट मैंने उनकी पसंद से सजाना चाहा. मैंने यह सोचा था कि दूसरा फ्लैट मैं शर्मा जी को दे दूंगा शर्मा जी के पास माया आंटी का आना जाना रहता ही है. उन्होंने मुझसे बार-बार कहा..

"बेटा छाया को ले आए होते तो अच्छा होता. वह अपनी पसंद से अपना घर सजा लेती."

"आप सामान पसंद कर लीजिए हम लोग घर सजाने के बाद उसे ले आएंगे. आप तो उसकी पसंद नापसंद जानती है."

हम फिर एक दूसरी फर्नीचर शॉप में गए और वहां से माया जी की पसंद के फर्नीचर खरीदें. माया जी भी घर देखकर बहुत खुश थी. उनको भी उस घर का बालकनी वाला एरिया बहुत पसंद आया था. अपनी बेटी के लिए पलंग पसंद करते समय उनके मन में जितने क्या ख्याल आये होंगे ये वही जानती होंगीं.

हम घर आ चुके थे. हमारे वर्तमान घर में सारा सामान कंपनी का दिया हुआ था. सिर्फ हमारे कपड़ों को छोड़कर इस घर में हमारा कुछ भी नहीं था. घर का राशन पानी ले जाने लायक स्थिति में नहीं था. उधर तीन-चार दिनों के अंदर ही मेरा नया फ्लैट सुसज्जित हो चुका था.

जब से हमने नए घर में जाने का फैसला किया था तब से माया आंटी थोड़ा चिंतित रहती थी. कहीं न कहीं उनके मन में कोई चिंता अवश्य थी. जिसे वह खुलकर नहीं बताती थी. हमारे प्रेम संबंधों की स्वीकार करने के बाद शर्मा जी से उनकी मुलाकात ज्यादा होती थी. जब इन मुलाकातों के दौरान वो घर से बाहर रहतीं तो मैं और छाया अपनी कामुकता को संतुष्ट कर बहुत खुश होते.

एक दिन तो छाया ने मुझसे कहा...

"अच्छा होता मम्मी शर्मा जी से शादी कर लेती"

शायद छाया जा जान गई थी की माया आंटी को शर्मा जी के साथ वक्त बिताने में अच्छा लगता था. एक दिन माया आंटी ने मुझसे कहा शर्मा जी कह रहे थे कि आप लोगों के जाने के बाद मैं फिर से अकेला हो जाऊंगा. मैं सारी परिस्थिति को पहले ही समझ चुका था. मैंने सिर्फ इतना कहा..

"वह अकेले नहीं रहेंगे आप खुश हो जाइए." माया आंटी के चेहरे पर खुशी आ गई. मैं समझ चुका था कि शर्मा जी से उनके संबंध प्रगाढ़ हो चुके हैं और दोनों का एक साथ रहना ही उनके लिए अच्छा है.

माया आंटी खुश तो हो गयीं पर उन्हें

समझ नहीं आ रहा था कि ये सब कैसे होगा. हम अपने नए घर में जा रहे थे. वहां रहने वाले लोगों से अभी मेरा परिचय नहीं था परंतु वहां जाने के बाद उनसे परिचय अवश्य होता. मैंने माया आंटी से बात की मैंने उनसे कहा...

"आप शर्मा अंकल को कहिए कि वह भी हमारे साथ उसी सोसाइटी में चलें. माया आंटी शर्मा गई. आप दोनों का मिलना जुलना है और दोनों साथ में समय व्यतीत करते हैं इसमें कोई बुराई नहीं है. शर्मा जी वहां हमारे साथ में रहेंगे तो अच्छा ही रहेगा उनके लिए भी और हमारे लिए भी. मैंने अपने फ्लैट के सामने एक फ्लैट देखा है हम उसे भी किराए पर ले लेंगे.

मैंने माया आंटी से कहा..

"शर्मा जी से आप ही बात कर लीजिए हम नवरात्रि के बाद नए घर में चलेंगे"

आखिरकार हम अपने नए घर में पहुंच गए. पहले हम सब उस फ्लैट में गए जिसमें माया जी ने सजावट कराई थी.

उनका शयन कक्ष बहुत ही खूबसूरत लग रहा था. शयनकक्ष में पहुंचते ही उन्होंने छाया से कहा..

"बेटी मानस के कहने पर मैंने अपनी पसंद से तेरा कमरा सजाया है उम्मीद करती हूं तुझे पसंद आएगा"

अब यहां पर मुझे बोलना पड़ा..

"आंटी यह कमरा आपका है"

"पर छाया कहां रहेगी" मैं उन्हें दूसरे फ्लैट में ले गया. हॉल से जाते समय उन्होंने यह पहचान लिया की पिछली बार उन्होंने आधा घर ही देखा था. अब हम छाया के कमरे में थे. वह बहुत खुश हो गयीं. छाया ने भी अपना कमरा बहुत अच्छे से सजाया था. माया आंटी ने कहा बेटा इतना बड़ा घर. मैंने उनसे कहा..

"यह हम सब के लिए ही है. आप सब लोग अपना अपना सामान व्यवस्थित कर लें." शर्मा अंकल भी घर के अंदर आ चुके थे.

मैंने माया आंटी से कहा..

" हम सोसाइटी के लोगों को यही कहेंगे आप और शर्मा जी पति पत्नी है तथा छाया आपकी बेटी है. मैंने यह घर आप लोगों को किराए पर दिया हुआ है."

माया आंटी को मेरी बात ठीक लग रही थी. वहां की सोसाइटी के लोग हमें जानते नहीं थे अतः इस नए रिश्ते के साथ वहां रहने में कोई बुराई नहीं थी. शर्मा जी का साथ रहने से हम दोनों के लिए अच्छा ही था.

शर्मा जी भी मान गए थे माया आंटी ने उन्हें हमारे घर की सारी परिस्थितियों से अवगत करा दिया था. वह जान गए थे कि मैं और छाया प्रेमी प्रेमिका है और माया आंटी ने उनका रिश्ता स्वीकार कर लिया है. उन्होंने माया आंटी को आश्वस्त किया था की वह जरूरत पड़ने पर हर स्थिति संभालने में उनकी मदद करेंगे और हमेशा उनके साथ रहेंगे.

उन दोनों के बीच में एक ऐसा संबंध बन गया था जो पति-पत्नी जैसा ही था बस विवाह नहीं हुआ था. मेरी और छाया की स्थिति भी कमोवेश ऐसी ही थी.

मैं और छाया अपना सामान अपने बेडरूम में लगाने लगे. हम दोनों यही बात कर रहे थे की क्या माया आंटी और शर्मा अंकल एक ही कमरे में रहेंगे या अलग अलग. यह एक ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर कुछ घंटे बाद ही मिलना था. थोड़ी देर बाद माया. आंटी की आवाज आई वह हमें चाय के लिए बुला रहीं थी.

हम हॉल में गए. छाया अपनी उत्सुकता नहीं रोक पाई और और यह देखने गई कि शर्मा अंकल ने अपना सामान कहां लगाया है. मास्टर बेडरूम के बाथरूम से आ रही शर्मा जी की आवाज ने सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया. हमने इस पर आगे कोई चर्चा नहीं की. हमें माया आंटी की खुशी ज्यादा ज्यादा प्यारी थी. शर्मा जी के साथ उनका रहना उनके जीवन का नया अध्याय था. लगभग अड़तीस वर्ष की उम्र में माया आंटी लिव इन रिलेशनशिप में रहने जा रहीं थी. माया आंटी एक समझदार महिला थी. उन्होंने अपने वाले फ्लैट में एक कमरे में छाया का कुछ सामान रख दिया था.

आखिरकार वह उनकी बेटी थी किसी भी आकस्मिक परिस्थिति में वह उस कमरे में जाकर रह सकती थी. हम लोगों ने यह निर्णय किया था की जरूरत पड़ने पर हम हॉल का दरवाजा बंद कर देंगे. शर्मा अंकल और माया आंटी यही कहेंगे कि मैंने अपने फ्लैट का वह हिस्सा उन लोगों को किराए पर दिया हुआ है. छाया के लिए अब दो कमरे बन चुके थे. माया आंटी वाले फ्लैट का कमरा उसका मायका बन गया था और मेरा बेडरूम उसकी भावी ससुराल.

जब वह मेरे कमरे में रहती मेरी मंगेतर बनकर रहती और जरूरत पड़ने पर वह अपने घर के अपने कमरे में भी रह सकती थी. घर पूरी तरह से व्यवस्थित हो गया था. अब हम इन नए संबंधों के साथ नए घर में खुश थे.

नियति ने हमारे नए घर में दो नए रिश्तों को जीने का पूरा मौक़ा दे दिया था. दोनों ही जोड़े प्यार के लिए तरस रहे थे और एकांत उन्हें प्रिय था.

माया आंटी और शर्मा जी.
{मैं माया}

मेरे मन में दिन पर दिन शर्मा जी के प्रति स्नेह बढ़ता जा रहा था वह मेरा बहुत ख्याल रखते थे. मैं उनके साथ कभी अंतरंग तो नहीं हो पाई थी परंतु हमने अपने जीवन के बारे में सारी बातें एक दूसरे से साझा कर ली थी. वह मेरी पति की अकाल मृत्यु पर बहुत दुखी थे. उन्होंने तो अपना वैवाहिक जीवन अपनी पत्नी के साथ लगभग 10 - 15 वर्षों तक जी लिया था और वह उससे काफी संतुष्ट भी लगते थे परंतु वह मेरे लिए सोच सोच कर दुखी होते कि कैसे युवावस्था में ही मुझे अपने पति के बिना रहना पड़ा और अपनी जिम्मेदारियों की वजह से मैं अपने जीवन का सुख नहीं ले पाइ. परंतु हम दोनों में से सेक्स के लिए कभी किसी ने पहल नहीं की.

जब मैंने छाया और मानस को एक साथ रंगे हाथों पकड़ा था उस दिन उन दोनों की तस्वीर मेरी आंखों में कैद हो गयी थी. इन दोनों को नग्न देखकर मेरा मन विचलित हो गया था. बिस्तर पर बैठे हुए थे और दोनों के गुप्तांगों पर तकिया रखा हुआ था पर पूरा शरीर नग्न था. उन दोनों की छवि को देखकर मेरे मन में बहुत दिनों बाद कामुकता आई. यह बहुत दिनों बाद हो रहा था जब मैं किसी स्त्री पुरुष को नग्न देखी थी. छाया को देखकर ऐसा लगा जैसे मैं अपनी युवावस्था में आ गई थी. छाया काफी हद तक मेरे ऊपर ही गई थी उसकी शारीरिक संरचना लगभग मेरे जैसी थी पर वह युवा थी और मैं युवती हो चुकी थी. उन दोनों को नग्न देखने के बाद जब मैं एकांत में होती मेरे मन में कामुकता जन्म लेती और कई कई बार मैं अपनी योनि में गीलापन महसूस कर रही होती.

शर्मा जी का साथ होने पर यह कामुकता और तीव्र होती. नए घर में आने के बाद मानस और छाया एक ही कमरे में चले गए. मैं और शर्मा जी भी अपने कमरे मैं आ गए बातों ही बातों में शर्मा जी ने यह बात बोली मानस और छाया एक आदर्श जोड़ी हैं वह दोनों इतने सुंदर हैं जैसे कामदेव और रति. भगवान उन दोनों का प्रेम हमेशा बनाए रखें.

शर्मा जी द्वारा कहे गए यह वाक्य मेरी अपनी सोच से मिलते थे. एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे मैं और शर्मा जी एक ही दिशा में सोच रहे हैं. अचानक उन्होंने कहा छाया तुम पर ही गई है" मैंने हंसकर कहा..

"किस मायने में." वह मुस्कुरा दिए. मैंने फिर पूछा

"बताइए ना"

उन्होंने कहा

"हर तरह से. तुम्हारे शरीर की बनावट उससे काफी मिलती है"

"क्या मिलता है"

तुम दोनों का रंग. शरीर की बनावट आदि"

मैं चाहती थी कि वह मुझसे खुलकर बात करें पर वह बहुत ही संभल कर बातें कर रहे थे फिर अचानक ही उन्होंने मुझसे पूछा..

"क्या कभी भी तुम्हारे मन में कामुकता जन्म नहीं

लेती?"

"जब मनुष्य का मन प्रसन्न हो और उसके शरीर में कोई कष्ट ना हो तो युवावस्था में यह स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है. साथी उपलब्ध न होने की दशा में हम उसे दबा ले जाते हैं"

उन्होंने हंसते हुए कहा..

"पर आज तो साथी भी है यह कहते हुए वह मुस्कुरा दिए"

मैं उनका इशारा समझ चुकी थी बाथरूम में नहाते समय मैंने अपने आपको आईने में देखा मेरे स्तन पूर्णतयः उभरे हुए थे पर उनमे अब थोड़ा झुकाव आ चुका था. रतिक्रिया के लिए इनका उपयोग तो हुआ था पर सिर्फ कुछ ही वर्षों तक. मेरा शरीर अभी भी सुंदर था. ग्रामीण परिवेश में लगातार रहने और कार्य करने से मेरे शरीर गठीला हो गया था. आप अपनी परिकल्पना के लिए स्वर्गीय स्मिता पाटिल को याद कर सकते हैं. मेरा शरीर लगभग उनके जैसा था सिर्फ रंग गोरा था. मैंने

अपने कमर के नीचे अपनी योनि को देखा मुझे सिर्फ अपने बाल ही दिखाई दे रहे थे. आज पता नहीं क्यों मुझे इन्हें काटने की इच्छा हुई मैंने वहीं पड़े शर्मा जी की शेविंग किट से उन्हें साफ कर लिया. कई दिनों बाद अपनी योनि पर लगातार हाथ लगने से वह गीली हो चली थी. रेजर को बार-बार उसके होठों पर लगाने से एक अलग तरह की अनुभूति हो रही थी.

कभी कभी मेरे मन में छाया और मानस के बीच चल रही अठखेलियों

का ध्यान आ जाता. आज वह दोनों भी अपने कमरे में अकेले थे. उनके बारे में सोचते हुए कभी मुझे यह शर्मनाक भी लगता.

कामुकता के समय हमारे ख्याल वश में नहीं होते वो किसी भी दिशा में किसी भी हद तक जा सकते हैं इसमें रिश्तों को कोई भूमिका रह नहीं जाती.

कुछ ही देर में मेरी योनि पूरी तरह चमकने लगी थी. उसके सारे बाल साफ हो गए थे. मैंने अपना नहाना धीरे-धीरे खत्म किया और एक सुंदर सी नाइटी पहन कर बाहर आ गई. शर्मा जी बिस्तर पर बैठे-बैठे टीवी देख रहे थे. मुझे देखते ही वह बोले..

" अरे वाह आज तो आप अत्यंत सुंदर लग रही हैं." मैं अपने बाल सुखा रही थी और पीछे मुड़कर कहा..

" ठीक है पर अपनी नजरें दूर ही रखिए." कुछ ही पलों में मैं भी बिस्तर पर आ चुकी थी उन्होंने लाइट बंद कर दी. कुछ ही देर में मैंने उनके हाथों को अपनी कमर पर महसूस किया जैसे वह मुझे अपनी तरफ खींच रहे हैं. मैं धीरे-धीरे उनकी तरफ मुड़ गइ वह मेरे और करीब आ गए. कुछ ही देर में उन्होंने मुझे आलिंगन में ले लिया. अभी भी हमारे वस्त्र पूरी तरह सही सलामत थे. वह अपना चेहरा मेरे पास लाए और बोले

"माया तुम बहुत अच्छी हो तुम्हारे साथ रहते हुए चार-पांच महीने कैसे बीत गए पता ही नहीं चला क्या हम जीवन भर साथ नहीं रह सकते" इतना कहते हुए उन्होंने मुझे गालों पर चूम लिया. मैं थरथर काँप रही थी. आज कई वर्षों के बाद किसी पुरुष ने मुझे छुआ था. वह मेरे जवाब की प्रतीक्षा कर रहे थे. इस दौरान वह निरंतर अपने चुम्बनों की बारिश

मेरे गालों और माथे पर कर रहे थे. मुझसे भी अब बर्दाश्त नहीं हुआ. मैंने अपने हाथ उनकी पीठ पर रख दिए. कुछ ही पलों में मैं पूरी तरह उनके आलिंगन में थी मेरे स्तन उनकी छाती से टकराने लगे. धीरे-धीरे उनका दाहिना पैर मेरी कमर पर आ चुका था. और हमारे अंग प्रत्यंग एक दूसरे से मिलने के लिए बेताब हो गए थे.

शर्मा जी धीरे-धीरे मेरी नाइटी को कमर तक ले आए अब उनके हाथ मेरी जाँघों और नितंबों सहला रहे थे कई वर्षों बाद किसी पुरुष का हाथ मुझे इस प्रकार छू रहा था. मेरी योनि पूरी तरह गीली हो चुकी थी धीरे धीरे वो कब निर्वस्त्र हो गए यह मुझे पता भी न चला. मुझे एहसास तब हुआ जब शर्मा जी ने नाइटी हटाने के लिए मेरे दोनों हाथों को ऊपर करने करने लगे. कमरे में अंधेरा अभी भी कायम था. खिड़की से बैंगलोर शहर दिखाई पड रहा था. उसकी कुछ रोशनी हमारे कमरे में भी आ रही थी. हम दोनों एक दूसरे को कुछ हद तक देख पा रहे थे. उनके आलिंगन में आने पर मुझे उनके लिंग का एहसास

अपनी पेट पर हो रहा था. मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि मैं उस लिंग को छू लूं. मन में कहीं न कहीं अपराध बोध भी अपनी जगह स्थान बनाया हुआ था.

पर आज कामुकता प्रबल थी अपराधबोध बहुत कम. कामुकता

अपना प्रभाव जमाते जा रही थी.

शर्मा जी ने मेरे स्तनों को अपने होठों से छूना शुरू कर दिया. मैं पहले ही काफी उत्तेजित थी. मुझसे और उत्तेजना बर्दाश्त नहीं हो पा रही थी. मैंने भावावेश में आकर अपने हाथ उनके लिंग पर रख दिए तथा उसे महसूस करने लगी. शर्मा जी का लिंग मेरे अनुमान से बड़ा था. उसकी लंबाई तो लगभग मेरी हथेलियों के बराबर थी पर उसकी मोटाई कुछ ज्यादा लग रही थी. मैंने अपने अंगूठे और तर्जनी से उसे पकड़ना चाहा पर सफल न हो सकी. शर्मा जी अब मेरे दाहिने स्तन का निप्पल अपने मुंह में लेकर चुभला रहे थे. मैं उनके लिंग को हाथों में लेकर आगे पीछे करने लगी.

हमारी कामेच्छा अब चरम पर पहुंच चुकी थी. शर्मा जी के हाथ लगातार मेरे नितंबों पर घूम रहे थे. कभी-कभी उनके हाथ नितंबों के रास्ते मेरे योनि तक पहुंचने की कोशिश करते पर मेरी जांघों का दबाव

आते ही वह वापस हो जाते. शर्मा जी ने मुझे धीरे धीरे अपने ऊपर ले लिया. शर्मा जी पीठ के बल बिस्तर पर लेटे हुए थे और मैं अब उनके ऊपर आ चुकी थी. जैसे ही मैंने अपना दाहिना पैर उनकी कमर के दूसरी तरफ किया मैं उनके नाभि पर बैठी गयी. उनका लिंग मेरे नितंबों से टकरा रहा था उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरे होंठों को अपने होठों में ले लिया. मेरे होठों को चूमने वाले वह दूसरे पुरुष थे.

इन चुम्बनों के दौरान कब मेरी कमर पीछे होती गयी मुझे कुछ भी पता नहीं चला.

अचानक मुझे शर्मा जी का लिंग अपनी योनि के मुख पर महसूस हुआ. मेरे योनि से निकला प्रेम रस उस लिंग को अपनी सही जगह तक ले

आया था. उनके लिंग की अनुभूति मेरी योनि को अत्यंत उत्तेजक लग रही थी. आज लगभग 10 वर्षों के बाद मुझे यह सुख प्राप्त हो रहा था. मैं इससे पहले कुछ करती लिंग का अगला भाग मेरी योनि में प्रवेश कर चुका था. शर्मा जी ने मुझे एक बार फिर जोर से किस किया और अपनी कमर ऊंची करते गए. लिंग मेरी योनि में लगभग आधे से ज्यादा प्रवेश कर गया. योनि पूरी तरह गीली थी.इतने वर्षों बाद योनि में लिंग प्रवेश से मुझे अजीब सी अनुभूति हुयी. शर्मा जी का लिंग थोड़ा मोटा था इस वजह से मुझे हल्का दर्द भी महसूस हुआ. परंतु शर्मा जी के लगातार होंठ चूसने की वजह से वह दर्द ना के बराबर था मेरी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई थी.

मैंने अपनी कमर पूरी तरह नीचे कर दी शर्मा जी का लिंग मेरे अंदर पूरी तरह प्रवेश कर चुका था पर अभी भी मेरी भग्नाशा उनसे सट नहीं रही थी. अपनी कमर को इससे ज्यादा पीछे ले पाना मेरे लिए संभव नहीं था. मुझे लगता था अभी भी लिंग का कुछ हिस्सा बाहर था. भग्नाशा की रगड़ बनाने के लिए लिंग को पूरी तरह अंदर लेना अनिवार्य था. मैंने एक बार फिर प्रयास किया अब मेरी भग्नासा उनसे सट चुकी थी. उनका लिंग मेरी योनि में पूरी तरह फंसा हुआ था. मुझे अंदर हल्का हल्का दर्द महसूस हो रहा था . मैं इस स्थिति में कुछ देर यूं ही पड़ी रही. शर्मा जी के हाथ लगातार मेरे नितम्बों को सहला रहे थे. जैसे मुझे शाबाशी दे रहे थे कि अंततः मैंने लिंग को पूरी तरह अन्दर ले लिया.

कुछ देर बाद मैंने अपनी कमर को आगे पीछे करना प्रारंभ कर दिया. भग्नाशा पर होने वाली रगड़ बढ़ती जा रही थी. लिंग अपना काम कर रहा था जैसे ही लिंग बाहर की तरफ होता ऐसा लगता जैसे मेरे शरीर में एक अजीब सा खालीपन आ गया आ गया है. जब वो अंदर की तरफ आता तो एक अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती और शरीर पूरा भराव महसूस करता. मैं इस प्रक्रिया में अपनी कमर को तेजी से आगे पीछे करने लगी थी. योनि के अंदर शर्मा जी के लिंग के कंपन महसूस हो रहे थे. शर्मा जी लगातार नितंबों को सहलाते जा रहे थे. कभी-कभी वह अपने चहरे को उठा कर मेरे स्तनों को अपने मुह में ले लेते. योनि के अंदर लिंग के उछलना लगातार महसूस हो रहा था.

मेरी योनि अब स्खलित हो रही थी. मैं शर्मा जी के ऊपर लगभग गिर सी गयी. मेरी कमर चलाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी. शर्मा जी ने यह महसूस करते ही स्खलित हो रही योनी में के बीच में अपने लिंग को तेजी से आगे पीछे करने लगे. यह एक अद्भुत अनुभव था इस क्रिया में उनके लिंग ने भी अपना स्खलन प्रारंभ कर दिया था. हम दोनों के एक साथ स्खलित हो रहे थे.

स्त्री की योनि को स्खलित होने में कुछ समय लगता है परंतु पुरुष का स्खलन अपेक्षाकृत जल्दी होता है.

मैं शर्मा जी के उपर कुछ मिनटों तक पड़ी रही. मेरा चेहरा उनके बगल में था. हम दोनों एक दूसरे के देख तो नहीं पा रहे थे पर दोनों के आनंद को महसूस जरूर कर पा रहे थे. हमारी धड़कने तेज थी. छाती पर पसीना आ गया था. मैंने अपनी कमर को आगे किया और शर्मा जी लिंग धीरे से बाहर आ गया. हम मुझे उनका वीर्य अपनी योनि से निकलता हुआ महसूस हुआ जो शायद शर्मा जी के ऊपर ही गिरा होगा. मैं हाल ही में रजस्वला हुयी थी मुझे गर्भाधान का डर नहीं था.

हम दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले उसी अवस्था में सो गए सुबह उठकर मैंने देखा तो शर्मा जी उसी तरह नग्न पड़े हुए थे. मैंने उनके ऊपर चादर डाली और मैं बाथरूम में चली गई. शर्मा जी ने मुझे जो सुख दिया था वह एक यादगार सुख था मैंने अपने स्वर्गीय पति से इस कार्य के लिए क्षमा मांगी.

जीवन में आया यह बदलाव सही था या गलत मैं नहीं जानती पर मैं आज बहुत खुश थी. मानस को मैंने दिल से आशीर्वाद दिया और किचन में नाश्ता बनाने चली गयी.
 
( भाग-7)
हमारी यादगार रात.
[मैं मानस ]

खाना खाने के बाद मैं बिस्तर पर बैठा छाया का इंतजार कर रहा था. आज हमारी नए घर में पहली रात थी. मैं इस रात को यादगार बनाना चाहता था. छाया आने में विलंब कर रही थी. मैं अधीर हो रहा था. तभी मैंने छाया को आते देखा उसने एक सुर्ख लाल रंग की नाइटी पहनी हुई थी. नाइटी बहुत ही खूबसूरत थी तथा हल्की पारदर्शी भी थी. छाया के पीछे पीछे माया आंटी भी हमारे बेडरूम तक आ गई थीं. मैं बिस्तर पर पायजामा कुर्ता पहन कर लेटा हुआ था. मैं उठ कर बैठ गया उन्होंने छाया का हाथ मेरे हाथ में देते हुए बोला मैं तुम दोनों के प्रेम संबंधों को स्वीकार कर चुकी हूं. छाया तुम्हारी प्रेयसी है. पर जिस तरह से तुमने इसका ख्याल रखा है विवाह तक उसी तरीके से इसका ख्याल रखना. तुम्हारा दिया गया वचन मुझे बहुत भरोसा दिलाता है. उन्होंने छाया की तरफ भी देख कर कहा...

"मानस का अच्छे से ख्याल रखना.." कह कर उन्होंने छाया के हाथ में चिकोटी काटी और मुस्कुराते हुयीं वापस चली गयीं.

छाया ने शयन कक्ष का दरवाजा बंद किया और मेरे पास आ गई. मुझे माया आंटी का छाया को इस तरह मुझे सौपना अत्यधिक उत्तेजक लगा. छाया के लिए आज का दिन बहुत विशेष था उसने यह

नाइटी शायद इसी दिन के लिए खरीदी थी. बिस्तर पर आने के बाद वह मुझे बेतहाशा चूमने लगी. हम दोनों एक दूसरे को प्यार करने लगे. कुछ ही देर में हमारे वस्त्र हमारा साथ छोड़ते गए. हमने अपना प्यार अपने पुराने अंदाज में हीं शुरू किया.

वयस्क पुरुषों और स्त्रियों का प्यार हर बार एक जैसा ही होता है परंतु उसमें नयापन और ताज़गी छोटे-छोटे परिवर्तनों से लाई जा सकती पर आज तो बहुत बड़ा दिन था.

छाया मेरे राजकुमार को दोनों हाथों में लेकर बहुत प्यार से उसे

सहला रही थी. उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा

"माँ ने इसे मेरी राजकुमारी को रानी बनाने की अनुमति दे दी है. बस उस दिन का इंतजार है"

इतना कहकर छाया ने राजकुमार को चूम लिया. अचानक छाया ने पास पड़ी हुई अपनी नई नाइटी को उठाया और मेरे चेहरे पर डाल दिया. उसने मुझे हिदायत दी "जब तक मैं ना कहूं अपनी आंखें मत खोलिएगा"

मुंह पर उसकी नाइटी पड़े होने की वजह से मुझे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और नाइटी से उसके बदन की खुसबू लेने लगा. उसकी उंगलियां मेरे राजकुमार के ऊपर अपना करतब दिखा रहीं थीं. मैंने छाया को छूना चाहा पर वह पास नहीं थी मेरे लहराते हाथों को देखकर समझ गई कि मैं उसे छूना चाहता हूं. उसने उठकर अपने आपको व्यवस्थित किया. अब उसकी कमर मेरे दाहिने कंधे के पास थी. मैं उसके नितंबों को अपने दाहिने हाथ से आसानी से छु पा रहा था. मेरी उंगलियां खुद ब खुद उसकी राजकुमारी के होंठों के बीच में घूमने लगी. उसकी राजकुमारी गीली हो रही थी. गीले और चिपचिपे होंठों में उंगली फिराने का सुख अप्रतिम होता है. छाया की उंगलियां मेरे राजकुमार को तरह-तरह से छेड़ रहीं थीं और वह पूरे मन से फुदक रहा था.

अचानक मुझे अपने लिंग पर किसी गर्म चीज का एहसास हुआ. मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह क्या है? राजकुमार के मुख पर गर्मी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे उसका संपर्क राजकुमारी से हो रहा है. परंतु राजकुमारी तो मेरी उंगलियों के साथ खेल रही थी. अचानक मुझे अपने लिंग पर कोई चीज रेंगती हुई महसूस हुई. यह एक अद्भुत अनुभव था. मेरा राजकुमार एक अनजाने गुफा की दहलीज पर खड़ा था. अचानक ऐसा प्रतीत हुआ जैसे लिंग
गुफा की तरफ जा रहा और वह अनजानी चीज उससे रगड़ खा रही हैं. मुझे छाया के दातों की रगड़ अपने लिंग पर महसूस हुयी . मैं समझ गया कि छाया ने आज मेरा मुखमैथुन करने का मन बना लिया है. मैं इस आनंद से अभिभूत हो गया. छाया ने आज तक राजकुमार को अपने मुह में नहीं लिया था सिर्फ चूमा था. पर आज मेरी प्यारी छाया ने मुझे नया सुख देनी की ठान ली थी.

छाया अपने मुख से मेरे लिंग के चारों तरफ घेरा बना ली थी और होंठों को गोल करके वह उसे एक सुरंग का आकार दे रही थी. वह अपना मुंह बार-बार आगे पीछे करती और मेरा लिंग पूरी तरह मचलने लगता.

उसकी राजकुमारी भी लगातार प्रेम रस बहाए जा रही थी. मुझे अपनी ब्लू फिल्मों की शिक्षा याद आ गई. और मैंने छाया के नितंबों को पकड़कर अपनी ओर खींचा. मैंने उसका एक पैर अपने सीने के दूसरी तरफ ले आया. अब छाया के

नितम्ब मेरी गर्दन के दोनों ओर थे. मेरी आंखें बंद होने के कारण मैं कुछ देख नहीं पा रहा था पर महसूस कर सकता था.

मैंने छाया की अनुमति से कपड़ा हटा दिया . छाया के गोरे-गोरे नितम्ब मेरे सामने थे. अद्भुत दृश्य था. इतने कोमल और बेदाग नितम्ब .... एसा लग रहा था जैसे दो छोटे चन्द्रमा मेरे सामने जुड़े हुए हों. नितंबो के बीच से उसकी दासी स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी. दासी से कुछ ही नीचे छाया

की राजकुमारी के होंठ दिखाई पड़ रहे थे. रस में भीगे होने के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी फल को दो टुकड़ों में काट दिया गया हो और उससे फल का रस रिस रिस कर बाहर आ रहा हो.

मैंने छाया को अपनी तरफ खींचा अब मेरी जीभ आसानी से राजकुमारी के होंठों को छू सकती थी. मैंने राजकुमारी के होंठों में अपनी जीभ फेरनी शुरू कर दी. छाया उछलने लगी. छाया ने अपना मुख वापस मेरे राजकुमार पर रख दिया था. अब हम दोनों इस अप्रतिम सुख को महसूस कर पा रहे थे. मेरे राजकुमार स्खलित होने के लिए पूरी तरह तैयार था.

इधर छाया की राजकुमारी भी व्याकुल थी. लग रहा था कि वह कभी भी अप्रत्याशित तरीके से अपने कंपन चालू कर देगी. हम दोनों का चरमसुख लगभग साथ ही आने वाला था.

अंततः राजकुमारी ने कांपना शुरू कर दिया. पर मैंने अपना मुख वहां से हटाया नहीं अपितु उसकी कमर पकड़ कर अपने ऊपर और तेजी से खींच लिया. मेरी नाक भी सीमा के दरारों के बीच आ गइ. जब तक छाया के कंपन होते रहे उसकी राजकुमारी मेरे मुह के अन्दर ही रही. कंपन होते समय ही छाया ने अपनी जीभ और मुख का घर्षण राज्कुम्मार पर पर तेज कर दिया और राजकुमार से यह बर्दाश्त ना हुआ


और उसमें अपना लावा उड़ेल दिया. छाया इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थी. वीर्य की पहली धार उसके मुंह में ही गिरी. वो अपना मुंह हटा पाती तब तक वीर्य की कई धार उसके गालों स्तनों पर आ गयी. वीर्य का स्वाद छाया ने पहले भी चखा था पर एक साथ इतना सारा वीर्य ये उसके लिए पहली बार था. वह इसे संभाल नहीं पायी. उसने अपना मुंह खोल दिया. मुह में एकत्रित लावा उसके होठों से गिरता हुआ उसके गर्दन तक पहुंच गया. उसने मेरी तरफ चेहरा किया. यह दृश्य देखकर मैं मुझे ब्लू फिल्मों की याद आ गई. इतना कामुक कर देने वाला दृश्य था. मेरी कोमल और मासूम छाया वीर्य से भीगी हुई अपने होंठों से वीर्य बहाती मेरे पास थी. मैंने उसे अपनी बाहों में खींच लिया. उसके स्तन अब मेरे स्तनों से टकराने लगे. उसकी राजकुमारी मेरे राजकुमार के पास आ चुकी थी. थका हुआ राजकुमार राजकुमारी के संसर्ग में आकर एक दूसरे को चूम रहे थे. छाया ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए. अपने वीर्य को उसके होठों से चूसते हुए मैं उसे प्यार करने लगा.

छाया ने आज जो मुझे सुख दिया था यह किसी प्रेयसी का उसके प्रियतम को दिया गया अप्रतिम उपहार था.

हम दोनों इसी अवस्था में सो गए.

छाया मेरी मंगेतर..
[मैं छाया]

नए घर में मेरा पहला दिन भी बहुत यादगार था मैंने आज मानस को वह दिया था जिसका शायद वह हमेशा से इंतजार करते थे. पहले मुझे मुखमैथुन के बारे में बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी. मेरे लिए यह कल्पना से परे था कि कोई किसी के गुप्तांगों को किस तरह अपने मुंह से छू सकता है. मेरे लिए राजकुमार और राजकुमारी का आपस में मिलन ही पर्याप्त था पर कामुकता की सीमा किस हद तक जा सकती

हैं यह मुझे समय के साथ-साथ मालूम चल रहा था. मेरी सहेलियों ने मुझे इस बारे में बताया तो मुझे इसका पता चला. वैसे तो राजकुमारी दर्शन के दिन मानस ने मेरी राजकुमारी को अपने होठों से छुआ था और मुझे इस स्खलित भी किया था तथा मेरे प्रेम रस को उन्होंने अपने होठों से छुआ था और मुझे भी चुंबन दिया था पर वह दिन मेरे लिए एक ही दिन में कई सारी नई चीजें लेकर आया था. मैं यह नहीं समझ पा रही थी कि मानस ने कैसे उस दिन मेरी राजकुमारी को छुआ और भी अपने मुख से चूमा.

उसके बाद भी मानस ने कई बार मेरी राजकुमारी को चुमने की कोशिश की पर मैंने उन्हें रोक लिया था. जिस कार्य को मैं नहीं कर सकती थी उन्हें उसके लिए प्रेरित करना मेरे लिए उचित नहीं था. पर अब अपनी सहेलियों से इस बारे में इतनी सारी बातें सुनकर मैंने अपना मन बना लिया था. और नए घर में मानस के साथ पहली बार मैंने मुखमैथुन कर लिया था.

मानस ने जब मेरे नितम्बों को अपनी तरफ खींचा तो मैं समझ गई कि उन्हें मेरा मुखमैथुन करने में भी आनंद आता है. शुरू में तो यह कार्य थोड़ा अजीब लगा पर धीरे-धीरे मुझे अच्छा लगाने लगा. राजकुमार के वीर्य का स्वाद मैं पहले भी ले चुकी थी पर सीधा उसे मुंह में लेने का यह पहला अनुभव था. मेरी इस कार्य से घृणा तो लगभग समाप्त हो चुकी थी. अगले कुछ दिनों में मानस को मैंने इसका भरपूर सुख दिया.

पहले दिन जब माँ ने मानस के हाथ में मेरा हाथ देते हुए कहा था कि मानस का ख्याल रखना तभी से मैंने तय कर लिया था कि मानस को हर स्थिति में खुश रखूंगी और उन्हें उनकी सारी इच्छाएं पूरी करुँगी. मेरे लिए वो सब कुछ थे.

अगली सुबह जब मैं अपनी मां से मिली तो मुझे उनके चेहरे पर एक अलग सी चमक दिखाई पड़ी मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास हो गया की आज शर्मा जी के साथ उनकी रात्रि अच्छी बीती है. मुझे उनके लिए अच्छा लग रहा था. आज 10 वर्षों बाद यदि उन्हें यह सुख मिला था तो वह इसकी हकदार थीं. उन्होंने मेरे लिए बहुत त्याग किया था.

अगले कुछ दिनों में मैंने अपनी और मानस की कई इच्छाएं पूरी की. हम दोनों पति पत्नी के जैसे अपने कमरे में रहने लगे थे. मां की पूर्ण सहमति मिलने के बाद मैं भी थोड़ी उच्छृंखल हो गई थी. बगल में शर्मा जी की उपस्थिति जरूर थी पर वह अक्सर अपने कमरे में ही बंद रहते हैं मां रात को उनके कमरे में सोने जाया करती थी बाकी समय वह किचन और घरेलू कार्यों में लगाती.

मैं मानस का इंतजार करती जैसे ही मानस घर में आते मां मुझे उनके पास जाने के लिए बोलती ठीक उसी प्रकार जिस तरह घर की नई बहू को लोग अपने पति के साथ छोड़ देते हैं.

एक अजीब किस्म का रिश्ता बन गया था. विवाह ना होने की वजह से हम दोनों संभोग सुख से वंचित रहे बाकी हमारे बीच में कोई दूरियां नहीं बची थी. मेरे साथ नग्न रहने की उनकी इच्छा भी पूर्ण हो रही थी . रात में हम दोनों एक दूसरे के आगोश में नग्न ही सोया करते. राजकुमार भी मेरा भक्त हो चला था. वह मेरे हाथों में आते ही मचलने लगता. मेरा मुंह उसे चूमने की लिए आगे बढ़ता और वह मेरे मुह में अपनी जगह बना लेता. मानस मेरे बालों को सहलाते रहते और कुछ ही डेरे में मेरा मुह भर जाता. जब मैं नग्न होती मैं अपना मुह खोल देती और सारा वीर्य मेरे होंठो से बहता हुआ मेरे गर्दन और स्तनों पर आ जाता मानस मुझे उठाते और मेरे स्तनों पर लगे वीर्य की अच्छी तरह मल देते.

मानस मेरे लिए कई प्रकार की ब्रा, पैंटी तथा नाइटी लाया करते. कई बार मेरी मां भी मेरे लिए ऐसे आकर्षक वस्त्र लाया करती जो मानस को रिझाने में मुझे काम आते थे. मैंने और मानस ने इस बीच कई बार नग्न होकर एक दुसरे की मालिश भी की. हमने जितना कुछ सीखा था सब कुछ एक दूसरे पर प्रयोग किया और एक दूसरे को खुश करते रहे.

समय तेजी से बीत रहा था हमारी खुशियाँ परवान चढ़ रही थीं.
ब्लू फ़िल्म और छाया
छाया को फिल्में देखना बहुत पसंद था. वह अपने कॉलेज की पढ़ाई में से कुछ समय निकालकर फिल्में जरूर देखती. शायद इससे उसकी कल्पना को उड़ान मिलती थी. एक दिन बातों ही बातों में उसने मुझसे बताया कि कॉलेज की लड़कियां किसी ब्लू फिल्म के बारे में बात करती है.

" वह क्या होता है" मैं हंस पड़ा मैंने उसे बताया..

"यह फिल्म नायक और नायिका के संभोग के विषय में होती हैं और इसमें बहुत सारी अश्लीलता होती है". वह इसके लिए अति उत्सुक हो गई वह बार-बार कहती...

"मुझे कम से कम एक बार देखना है" मैंने उसे समझाया यह ठीक नहीं होगा. परंतु वह मेरी बात नहीं मान रही थी...

" मेरी सारी सहेलियां इन सब चीजों के बारे में बात करती हैं परंतु मैं कुछ नही बोल पाती और सिर झुका कर वहां से हट जाती हूँ."

मुझे लगा हॉस्टल में रहने वाली उसकी सहेलियां ये सब फिल्में देखती होंगी. मैंने उससे कहा अच्छा ठीक है..

"मैं तुम्हें ऐसी फिल्म दिखाऊंगा."

वह मुझसे जिद करने लगी . मुझे नहीं पता था की छाया को ऐसी फिल्में दिखाना उचित होगा या नहीं. वह एक मासूम लड़की थी उसमें कामुकता जरूर थी परंतु अभी भी उसमें नवयौवना सी लज्जा और चेहरे पर मासूमियत वैसे ही कायम थी. कोई दूसरा आदमी उसको देखता तो वह कभी नहीं सोच सकता था कि यह सीधी साधी लड़की इतनी कामुक हो सकती है. एसा प्रतीत होता था जैसे मुझे देखकर उसमे कामुकता भर जाती थी. मैंने इस बात को कुछ दिनों के लिए टालना ही उचित समझा.

परंतु एक दिन वह नग्न अवस्था में मेरे साथ प्रेमालाप कर रही थी. उसने मुझसे फिर पूछा "यह डॉगी स्टाइल क्या होता है" मैं निरूत्तर था. उसने

मुझसे कहा...

"अब आपको मुझे ब्लू फिल्म दिखा ही देनी चाहिए मैं अपनी सहेलियों के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहती मैं अभी २२ वर्ष की होने वाली हूं मुझे भी यह सब जानने का हक है. आप मुझे नहीं दिखाओगे तो मैं अपनी सहेलीयों के साथ हॉस्टल में देखूँगी"

मैं मजबूर हो गया था अंततः मैं एक दिन छाया के लिए एक ब्लू फिल्म की सीडी ले आया. वह बहुत उत्साहित थी. उसने शाम को जल्दी-जल्दी माया आंटी के साथ मिलकर खाना पकाया और खाना खाने के बाद माया आंटी को कहा...

"मुझे बहुत तेजी से नींद आ रही है" कहकर फटाफट मेरे कमरे में चली आई अंदर आते ही कहने लगी...

"जल्दी से लगाइए ना"

उसकी बेचैनी देखते ही बनती थी. मैंने कहा...

"कुछ देर और रुक जाओ उन लोगों को सो जाने दो .वरना यदि कहीं पता चल गया तो हम लोग मुसीबत में पड़ जाएंगे."

ब्लू फिल्म का इस तरह घर में देखना एक अलग अनुभव था. वह मेरी बात मान गई. कुछ समय बाद हुम बिस्तर पर आ चुके थे. मैंने सीडी लगाकर फिल्म चालू कर दी.

छाया बिस्तर पर नंगी लेटी हुई थी मैं भी सीडी प्लेयर पर सीडी लगाकर कूदते हुए बिस्तर पर आ गया. मैंने भी अपने कपड़े पहले ही उतार दिए थे. मैं छाया को बाहों में लिए हुए फिल्म के शुरू होने का इंतजार करने लगा. कुछ ही समय में टीवी में नायक और नायिका

अवतरित हो चुके थे. छाया की मानसिक स्थिति के अनुरूप वह दोनों नग्न ही अवतरित हुए थे. कुछ ही देर में उनकी रासलीला शुरू हो गयी. छाया टकटकी लगाकर उन दोनों को देख रही थी. इस बीच मैंने छाया

को छूने की कोशिश की पर उसने मेरा हाथ हटा दिया. वह पूरी तन्मयता के साथ देख रही थी. नायक और नायिका का संपर्क बढ़ता ही जा रहा था कुछ ही देर में नायक और नायिका मुखमैथुन करने लगे. ब्लू फिल्म की हीरोइन द्वारा नायक का लिंग अपने मुंह में लेने को अति उत्साहित होकर ध्यान से देख रही थी. कुछ ही देर में नायक ने अपना लिंग नायिका की योनी के बजाय उसके गुदाद्वार में प्रविष्ट करा दिया. संभोग के बारे में वह जानती थी परंतु राजकुमार का दासी से मिलन उसने नहीं सोचा था, उसने मुझसे पूछा...

"ऐसा भी होता है क्या?"

मैंने उससे कहा...

"वह देखो सामने हो तो रहा है"

वह हंसने लगी.

दुर्भाग्य से हमारे हाथ गलत सीडी लग गई थी.

उस समय इस प्रकार की फिल्मों की उपलब्धता तो थी परंतु आप अपने पसंद की सीडी नहीं प्राप्त कर सकते थे. यह विक्रेता पर ही निर्भर था कि वह आपके हिस्से में क्या लगता है.

फिल्म का दूसरा दृश्य प्रारंभ हो चुका था. विदेशी मूल के दो नव युवक और युवती रासलीला शुरू कर रहे थे फिल्म के शुरुआती दृश्य में ही नायक और नायिका नग्न थे सर्वप्रथम दोनों नायकों ने नायिका के यौन अंगों को चूसना शुरू कर दिया. एक नायक स्तन तो दूसरा योनि को चूस रहा था. नायिका तरह-तरह की उत्तेजक आवाजें निकाल रही थी. कुछ समय पश्चात नायिका ने दोनों नायकों के लिंग को अपने मुंह में ले लिया और बरी बारी से चूसने लगी जैसे हम लोग कुल्फी चूसते हैं. छाया यह दृश्य अपनी आखें बड़ी करके देख रही थी. वह सोच रही थी क्या ऐसा भी होता है. कुछ ही देर में नायक और नायिका संभोग करने लगे. नायक का लिंग नायिका में प्रवेश करते हैं छाया की आंखें लाल हो गयीं .

छाया पूरी तरह उत्तेजित हो चुकी थी. वह मुझसे लिपट चुकी थी पर उसकी आंखें टीवी पर अटकी थी. कुछ ही देर में नायक और नायिका ने तरह-तरह के करतब दिखाने शुरू कर दिए. वह तरह-तरह के आसन बनाते हुए नायिका की योनि में अपने लिंग को प्रवेश कराता नायिका

उत्तेजित होकर आवाजें निकालती. नायिका दुसरे नायक के लिंग को अपने मुख में लेकर उसे भी उत्तेजित रख रही थी. उन्होंने एसी विभिन्न अवस्थाओं में संभोग किया जो आम इंसानों के बस की बात नहीं थी. मैं यह दृश्य पहले भी देख चुका था इसलिए मेरी उत्सुकता कम थी. मैं यह भली-भांति जानता था कि आम जीवन में ऐसा कर पाना असंभव था.

कुछ ही देर में नायक में अपना लिंग योनि से बाहर निकाल दिया और नायिका की दासी पर अपने लिंग का प्रहार करने लगा. कुछ ही देर में

नायक का लिंग नायिका की दासी के अंदर प्रवेश कर चुका था. तभी दूसरा नायक आया और उसने भी अपना लिंग नायिका को योनी में प्रवेश करा दिया.

छाया की आंखें फटी रह गई. दोनों अपने लिंग को तेजी से आगे पीछे कर रहे थे. नायिका उत्तेजना के साथ साथ दर्द में भी प्रतीत हो रही थी. कुछ देर बाद दोनों ने अपना लिंग बाहर निकाल लिया और नायिका ने उसे अपने दोनों हाथों में ले लिया और तेजी से हिलाने लगी. लगी वीर्य स्खलन प्रारंभ हो गया और दोनों नायकों का सारा वीर्य नायिका के शरीर पर लगा हुआ था. वीर्य का कुछ भाग मुंह में जा चुका था. छाया का शरीर काँप रहा था. वो मुझसे लिपटी हुई थी. मैं उसकी पीठ सहला रहा था.

उसने मेरी और देखा मैंने उसे समझाया यह सब कल्पना लोक है. सब इसकी सिर्फ कल्पना करते है हकीकत में यह सब नहीं होता. इन्हें इस काम के लिए बहुत पैसे दिए जाते हैं. वह मेरी बात सुनी पर समझी या नहीं मैं नहीं जानता लेकिन उसका ध्यान टीवी पर अभी भी लगा हुआ था. कुछ ही देर में हम लोगों ने टीवी बंद कर दी.

उसने मुझे चुम्बन लिया और बोली...

"आपने जरूर पहले ये सब फिल्म देखी थी तभी आपको मुझे अपने वीर्य से भिगोना पसंद है."

उसने एक बार फिर मेरे होंठों को अपने होंठों के बीच लिया और उन्हें काटते हुए मादक आवाज में कहा

"आपने मेरे सपने पूरे किये हैं मैं आपके करूंगी"

मैंने उसके गाल पर प्यार से चपत लगाई और कहा..

"हट पगली" और उसे नग्न अवस्था में ही अपने आलिंगन में लेकर सो गया.

छाया और जिम
एक दिन छाया मेरे पास आई और बोली मैंने कई लड़कियों को एक्सरसाइज करते हुए देखा है मैं हमेशा नाजुक कली जैसी रहती हूं वह लोग एक्सरसाइज भी करते हैं और उनके शरीर में एक अलग सा कसाव है. मैं भी चाहती हूं कि मैं भी एक्सरसाइज करूं. मैंने उससे कहा तुम बहुत नाजुक हो और मुझे ऐसे ही बहुत पसंद हो. तुम क्यों इन सब चक्करों में पड़ती हो. तुम्हारी मासूमियत थी तुम्हारा सबसे बड़ा गहना है.

वह शुरू से ही कोमल थी परंतु जैसे जैसे वह जवान हो रही थी उसकी कोमलता में दिन पर दिन वृद्धि हो रही थी.

मैंने उसे समझाया की कोमलता लड़कियों का सबसे बड़ा गहना है फिर भी उसने जिद की मुझे थोड़ी बहुत एक्सरसाइज करनी और मेरे पेट पर चिकोटि काटती हुई बोली देखिए आपका भी पेट निकल रहा है आप भी एक्सरसाइज किया करें. और फिर मुस्कुराते हुए इशारा किया कि आप चाहेंगे तो हम लोग बिना कपड़े के भी एक्सरसाइज कर सकते हैं यह कह कर मुस्कुरा दी. मुझे हंसी आ गई. वह पत्नी की तरह मुझे मना रही थी.

मैंने अपने वाले शयनकक्ष के बगल में सटे कमरे को एक छोटा सा जिम बनाने की सोची.

जब आपके पास पैसे होते हैं तो आपकी इच्छा और हकीकत में ज्यादा अंतर नहीं रहता.

अगले ६-७ दिनों में ही मैं जिम से संबंधित कई सारे छोटे-मोटे सामान ले आया. छाया ने जिम करना प्रारम्भ कर दिया. हम दोनों अपने समय पर जिम करते पर छाया के साथ नग्न होकर जिम करने का जो स्वप्न उसने दिखाया था वो पूरा होना बाकी था.

एक दिन हमें मौका मिल ही गया ऑफिस से आने के बाद मैंने देखा छाया मेरे लिए लेमन टी लेकर खड़ी थी मैंने पूछा आज सिर्फ लेमन टी उसने कहा अभी आपको जिम करना है. उसके बाद ही अच्छा नाश्ता करेंगे.

थोड़ी ही देर में हम दोनों जिम में थे मैं शाम को जिम जरूर करता था पर कुछ देर से. आज सीमा के कहने पर मैं जल्दी ही जिम में आ चुका था मैंने पूछा माया आंटी कहां है उसने बताया कि वह दोनों किसी काम से बाहर गए हुए हैं. मैं समझ गई छाया क्या चाहती है. मेरे बिना कहे वह एकदम नंगी हो गई और मुझे भी अपनी अवस्था में ला दिया.


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पिछले 10 15 दिनों की जिम की एक्सरसाइज में उसके शरीर में अवश्य थोड़ा कसाव आया पर फूल तो फूल ही होता है मेरे लिए वह अभी भी उतनी ही कोमल थी . मेरे सामने ही उसने जिम मैं कई तरह के आसन करना शुरू कर दिए उसके हर आसन में उसकी राजकुमारी और दासी की एक अलग झलक मिलती जो मुझे अत्यंत उत्तेजित कर रही थी.

जब वह सामने की तरफ झुकती और अपने पैर छूती मुझे पीछे से उसकी राजकुमारी के दर्शन हो जाते. कभी वह अपनी पीठ पीछे

करती तो उसके स्तन भर कर सामने आ जाते और राजकुमारी का स्पष्ट दृश्य सामने से दिखाई पड़ता. उसने यह बात जान ली और बोला कि..

"खाली मुझे देखते ही रहेंगे या एक्सरसाइज भी करेंगे" मैंने इस तरह नग्न अवस्था में एक्सरसाइज करने का सोचा भी नहीं था मेरा लिंग पूरी तरह खड़ा था. तने हुए राजकुमार के साथ एक्सरसाइज करना मुश्किल था. अचानक वह पास आई और बोली...

"आपको याद है फ़िल्म में नायक और नायिका किस तरह के आसन कर रहे थे"

मैंने कहा..

"हां"

वह बोली .. " हम वही करते हैं ध्यान रहे कि आसन करते समय मेरा

कौमार्य भंग ना हो जाए" मुझे उसकी बात सुनकर हंसी आ गई.

और सच में उसने नायिका द्वारा किए गए लगभग हर हर अवस्था को अपने ऊपर आजमाने की कोशिश की वह मुझे कभी इस तरह झुकाती कभी उस तरह. आधे घंटे में उसने मुझे पूरी तरह थका दिया. हर अवस्था में उसकी राजकुमारी मेरे राजकुमार को अपने आगोश में लेती और फिर छोड़ देती. कभी कभी वह अपनी कमर को आगे पीछे करती जैसे प्रयोग कर रही हो की कि जरूरत पड़ने पर वह यह सब कर पाएगी या नहीं. कुछ ही देर में मैं पूरी तरह थक चुका था मैंने उससे कहा

" तुम तो उस नायिका के जैसी ट्रेंड हो गई हो"

वह हंसी बोली अरे कुछ ही महीनों में हमारा विवाह हो जाएगा तब आपको खुश करने के लिए इस तरह के आसन करना जरूरी होगा मैं उसी की तैयारी कर रही हूं"


यह सुनकर मैं भी बहुत खुश हो गया और उसे बाहों में भर लिया. वह मेरी तरफ चेहरा करके मेरी गोद में बैठ गयी. मेरा राजकुमार उसकी राजकुमारी से सटा था. हम दोनों ने उनके बीच घर्षण बढ़ा दिया और थोड़ी ही देर में मुझे एक बहुत दिनों बाद " मानस भैया......." की कापती आवाज सुनाई दी और हमारे पेट मेरे वीर्य से नहा चुके थे. छाया ने पूझे प्रूरी तरह पकड़ रखा था. छाया के शरीर पर पसीने की बूंदे पहले से थी उसमें मेरा प्रेम रस मिलकर समाहित हो गया था. हम

दोनों पसीने और प्रेम रस से लथपथ बाथरूम की तरफ चल पड़े. भविष्य में हम दोनों के बीच होने वाली संभावित संभोग परिस्थितियों ने मेरी कल्पनाओं को नयी उचाइयां दे दी थीं.
 
भाग-8
सीमा और छाया.
[मैं छाया]
कॉलेज का वार्षिक फंक्शन चल रहा था. इसमे कालेज के पुराने विद्यार्थी भी आये थे. मैं इस कार्यक्रम में एक नृत्य प्रस्तुत करने वाली थी. जैसे ही मेरा नृत्य खत्म हुआ एक नवयुवती ने स्टेज के बाहर मुझे रोका...
"मैं सीमा पहचाना मुझे"
"अरे सीमा दीदी आप तो इतनी सुंदर हो गई है मैं तो यकीन
भी नहीं कर पा रही"
"चल झूठी कितनी देर में खाली हो रही हो"
"बस कोई 20 मिनट."
" ठीक है"
"मैं तुम्हारा इंतजार करती हूं"
कुछ ही देर में मैं सीमा दीदी के साथ कॉलेज की कैंटीन में बैठी थी. सीमा दीदी गजब की सुंदर हो गई थी. उनके नाक नक्श फिल्मी हीरोइनों की तरह हो गए थे. उनका शरीर ऐसा लगता था सांचे में ढाला गया हो उन्होंने मुझे अपने आलिंगन में ले लिया और बोली..
"अरे मैंने बहुत मेहनत की है इस शरीर को बनाने के लिए तुम तो जानती ही हो पहले में कितनी मोटी और थुलथुली थी"
ऐसा कहकर वह हंस पड़ी फिर हम लोगों ने ढेर सारी बातें की.
उन्होंने मानस भैया के बारे में पूछा . मैंने कहा ..
"ठीक हैं"
"कभी मुझे याद करते हैं"
"हाँ कभी - कभी"
"क्या मानस ने शादी कर ली"
"नहीं अभी तो वह अपनी प्रेयसी के साथ मजे कर रहे हैं "
सीमा ने तुरंत पूछा
"कौन है उनकी प्रेयसी"
"खुद ही मिल लेना एक दिन" कहकर मैंने बात टाल दी. मैंने अपने और मानस के बीच चल रहे संबंधों की उन्हें भनक नहीं लगने दी. आज उनसे मिलकर काफी अच्छा लग रहा था.
सीमा दीदी मेरी मार्गदर्शक रही है वह इंजीनियरिंग कॉलेज में आने से पहले गांव में आई थी. उस साल मानस गांव नहीं आए थे. मैं और सीमा दीदी ही अपना वक्त साथ में गुजारा करते. वह मुझे पढाई के साथ साथ कई बाते बताया करतीं. उनमें सेक्स को लेकर एक विशेष उत्सुकता थी. वह मुझसे भी जिद करती कि मैं अपने अंग उनको दिखाउ और बदले में वह अपने अंग मुझे दिखाएं. मुझे यह सब ज्यादा पसंद नहीं था. पर उनसे संबंध बनाए रखने के लिए कभी कभी उनकी बात मान लेती थी.
मैं और सीमा दीदी अक्सर मिलने लगे वह मुझे कॉलेज से ले लेती मुझे घुमातीं, खाना खिलाती और ढेर सारी बातें कर मुझे घर के लिए रवाना कर देती. उनके साथ मैंने कई शामें बिताई पर मानस से मिलवाने की बात पर मैं उन्हें टाल देती.
लड़कियों के मन में में एक विशेष किस्म का डर होता है मैं सीमा को मानस से शायद मैं इसी डर से नहीं मिलवा रही थी.

छाया का सपना
एक दिन ऑफिस में देर होने की वजह से मैं घर देर से पहुंचा. घर पर छाया सजी-धजी छाया मेरा इंतजार कर रही थी. वह बहुत खुश लग रही थी उसने खूब अच्छा खाना भी बनाया था. खाना खाने के बाद मुझे नींद आने लगी और मैं अपने बिस्तर पर सोने चला गया जब तक छाया आती तब तक मुझे नींद लग चुकी थी. सुबह लगभग 5:00 बजे मुझे कमरे में आह आह की कामुक आवाजें सुनाई दी. मुझे लगा मैं कोई स्वप्न देख रहा हूं. पर मेरी नींद खुल गई मैंने देखा छाया इस तरह की आवाज निकाल रही है. मैं समझ नहीं पा रहा था यह क्या हो रहा है. कितनी मासूम और प्यारी लड़की इस तरह की आवाज निकाल रही जैसे कोई ब्लू फिल्म की हीरोइन निकालती है. वह अपनी कमर भी हिला रही थी.
मैं बहुत देर तक उसका आनंद लेता रहा अचानक उसकी आंखें खुल गई. मैं हंस पड़ा वह बोली "अरे मैं कहां हूं"
मैंने कहा "तुम घर में हो मेरे पास" वह बार-बार अपनी आंखे मीच रही थी और मुझे छूने की कोशिश कर रही थी.
मैंने उसको पकड़ कर हिलाया. वह अब पूरी तरह जाग चुकी थी. मैंने पूछा..
"क्या हुआ"
वह बहुत ज्यादा शर्मा गई . मैंने उससे फिर कहा
"बताओ ना क्या हुआ"
वह बोली
"मैं आपको नहीं बता सकती"
मैंने उससे जिद की. तो उसने कहा अच्छा बताती हूं दो मिनट बाद वह बाथरूम से आइ और मेरी बाहों में आकर लेट गई उसने कहा
"मैंने एक सपना देखा"
"कौन सा सपना. तुम तो की ब्लू फिल्म तरह आवाजें ही निकाल रही थी."
"आपने बिल्कुल सही पकड़ा मैं वही सपना देख रही थी."
मैंने उससे कहा..
" विस्तार से बताओ ना क्या देखा"
छाया ने कहा...
"एक सुंदर सा होटल में कमरा था उस पर सिर्फ बिस्तर दिखाई दे रहा था अगल-बगल की स्थिति समझ पर बिस्तर बहुत खूबसूरत था. उस बिस्तर पर मैं नंगी थी. वहां पर आप भी थे. हम दोनों पूर्णतयः नग्न अवस्था में थे. मैं आपके लिंग को सहला रही थी तभी वहां पर दूसरा व्यक्ति आ गया. वह भी पूर्णतयः नग्न था. वह बार-बार मेरे शरीर को छूने का प्रयास कर रहा था. वह बार-बार अपने लिंग को मेरे हाथों मैं पकड़ा
रहा था और मेरे नितम्बों को सहला था. पता नहीं क्यों यह सब मुझे उत्तेजित कर रहा था. आप भी उसे रोक नहीं रहे थे. अचानक मैंने महसूस किया की अपरिचित आदमी का राजकुमार मेरी राजकुमारी में प्रवेश कर चुका है. और वह बार-बार अपने राजकुमार को अंदर बाहर कर रहा है. आश्चर्य की बात मुझे उस समय किसी दर्द का एहसास भी नहीं हो रहा था. बल्कि अत्यंत मजा आ रहा था और मैं तरह-तरह की आवाजें निकाल रही थी. मैं आपके लिंग को दोनों हाथों से हिला रही थी और वह अपने राजकुमार को मेरी राजकुमारी में पूरी तरह प्रविष्ट कराया हुआ था वह मेरे नितंबों पर अपनी पकड़ बनाए हुए था जैसे ही मेरी राजकुमारी स्खलित होने वाली थी मेरी नींद खुल गई."
मेरी हंसी छूट पड़ी मैंने मुस्कुराते हुए कहा.
" मेरी प्यारी छाया अब बड़ी हो गई है उसके सपने भी बड़े हो गए है लगता है मैं अकेले राजकुमारी की प्यास नहीं बुझा पाऊंगा."
उसने मेरी छाती पर दो मुक्के मारे और अपना सिर मेरी छाती में छुपा लिया. मैंने अपने हाथ उसके नितंबों की तरफ ले गए और उसकी नाइटी को ऊपर कर दिया. मैंने अपनी हथेली से राजकुमारी को सहलाया तथा उसके होठों के बीच में अपनी उंगलियां रख दी छाया पहले से ही बहुत ज्यादा उत्तेजित थे कुछ ही देर में मैंने उसके राजकुमारी के कंपन महसूस कर लिया वह मुझसे लिपट चुकी थी. मैं उसे गालों पर चुंबन देते हुए उसे वापस हकीकत में लाने की कोशिश कर रहा था.
ब्लू फिल्मों का छाया के मन पर गहरा असर पड़ा था यह बात मुझे अब समझ में आ रही थी.

कुठाराघात
मंजुला चाची का आगमन
मैं, छाया और माया आंटी अपने नए घर में बहुत प्रसन्न थे. शर्मा अंकल और माया आंटी के बीच भी कुछ मधुर रिश्ते पनप चुके थे. वह दोनों भी हमेशा खुश दिखाई पड़ते मैं और छाया दोनों एक ही कमरे में रहते थे. हमारा जीवन पति-पत्नी की भांति हो चला था. पर छाया ने अपनी कामुकता और विविधताओं से हमारे प्रेम संबंधों को रस से सराबोर रखा था.
पर हमारी यह खुशियां ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई. हमारा घर जिस सोसाइटी में था उस सोसाइटी में कई सारे टावर थे. यह बेंगलूर की एक प्रतिष्ठित सोसाइटी इसमें कुल पैतालीस सौ फ्लैट थे. यह सोसायटी एक छोटे शहर जैसी विकसित हो गयी थी. इस नए घर में आए हमें नौ महीने बीत चुके थे. एक दिन सोसाइटी के शॉपिंग मॉल में माया आंटी की मुलाकात मंजुला चाची से हो गइ. दोनों एक दूसरे को देख कर अत्यंत खुश हुयीं.
जब कोई अपना पूर्व परिचित किसी बड़े शहर में मिल जाता है तो उसे देख कर मन प्रसन्न हो उठता है.
माया आंटी उनसे घुल मिल कर बात करने लगी और बातों ही बातों में उन्होंने हमारे घर के बारे में उन्हें बता दिया. उन्होंने हमारे घर की बदली हुई परिस्थितियों को नजरअंदाज कर मंजुला चाची को घर बुला लिया.
मंजुला चाची यहां हमारे गांव के मुखिया मनोहर चाचा के लड़की की सगाई में आई थी. लड़के वालों ने भी इसी सोसाइटी में फ्लैट ले रखे थे. इस सोसाइटी में शादी विवाह के लिए उत्तम व्यवस्था थी. लड़के वाले बेंगलुरु के ही थे. उन्होंने ज़िद की थी कि शादी बेंगलुरु से ही करें. मेरे गांव के कई लोग इस सगाई में सम्मिलित होने बेंगलुरु आए हुए थे.
मनोहर चाचा ने हम लोगों को भी कार्ड भेजा था पर हम अपना घर बदल चुके थे इसलिए उनका निमंत्रण हम तक नहीं पहुंच पाया था.
मैं पिछले वर्ष गांव गया था और सब से मुलाकात कर वापस आया था गांव से थोड़ा बहुत संबंध बना कर रखना आवश्यक था क्योंकि वहां पर हमारी जमीन जायदाद थी. मनोहर चाचा मेरे स्वर्गीय पिता जी के पारिवारिक मित्र थे.
घर आने के बाद माया आंटी ने मुझे मंजुला चाची के बारे में बताया. माया आंटी यह बात भूल चुकी थी की हमारे घर में रिश्ते नए सिरे से परिभाषित हो गए थे. यह बात मंजुला चाची और किसी अन्य गांव वालों को पता नहीं थी. मंजुला चाची का अप्रत्याशित आगमन यदि हमारे घर में होता तो मेरे और छाया के संबंध शक के दायरे में आ जाते. हम उनकी नजरों में अभी भी भाई बहन ही थे चाहे हमारे संबंध
अच्छे हो या खराब. माया आंटी को जब यह बात समझ में आई तो वह बहुत उदास हो गइ.
हम लोगों ने आनन-फानन में घर को नए सिरे से व्यवस्थित किया छाया के कपड़े उसके अलग कमरे में शिफ्ट किए गए. संयोग से शर्मा जी कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे. इसलिए एक तरफ से हम निश्चिंत थे. घर को व्यवस्थित करने के बाद हम इसी उधेड़बुन में फंसे थे की मंजुला चाची और गांव वालों का यहां बेंगलुरु में आना और खासकर इसी सोसाइटी में आना एक इत्तेफाक था या कुछ बड़ा होने
वाला था.
अगले दिन मंजुला चाची मनोहर चाचा की पत्नी और एक अन्य महिला के साथ हमारे घर पर आ गई. मैं और छाया भी संयोग से घर पर ही थे. हम दोनों ने उनके पैर छुए उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया और कहा..
"दोनों भाई बहन हमेशा खुश रहो"
मंजुला चाची मेरी तारीफ के कसीदे पढ़ने लगीं.
"मानस जैसा लड़का भगवान सबको दे पापा के जाने के बाद इसमें पूरे परिवार को संभाल लिया अपनी बहन छाया को पढ़ा लिखा कर इंजीनियर बना दिया. जब माया और सीमा गांव पर आए थे तो यह उन लोगों से बात भी नहीं करता था परंतु समय के साथ इसने अपनी जिम्मेदारी समझीं और इन दोनों को संभाल लिया."
उनकी बातें सुनकर मैं खुश होऊ या दुखी यह समझ नहीं पा रहा था. जिस रिश्ते को भूल कर ही हम तीनों खुश थे वही रिश्ते पर मंजुला चाची जोर दे रहीं थी. मैं अपने मन में चीख चीख कर यह कह रहा था की छाया मेरी बहन नहीं है. वह माया जी की लड़की है जिसे मैं प्रेम करता हूँ. पर यह बात मेरे मन के अंदर ही चल रही थी. मंजुला चाची की बातों में बाकी दोनों महिलाएं भी साथ दे रही थी.
उन्होंने छाया का भी हालचाल लिया और बोली बेटा तुम तो बहुत सुंदर हो गइ हो.तुम्हारी पढाई पूरी हो जाए तो मैं तुम्हारे लिए एक सुंदर सा लड़का देखूंगी. तुम तो इतनी सुंदर हो की तुम्हारे पीछे लड़कों की लाइन लग जाएगी कहकर वह तीनों मुस्कुराने लगी.
वह सब आपस में खुलकर बातें कर रही थी. मैं वहां से हट कर बाहर आ गया. मैं उनके आगमन से थोड़ा घबराया हुआ था मुझे इस बात का डर था की मेरे और छाया के बीच वर्तमान संबंधों पर कोई आंच ना आ जाए.
मन में जब आशंकाएं जन्म लेती हैं तो उनके घटने की संभावनाएं कुछ न कुछ अवश्य होती है. बिना कारण ही कोई आशंका स्वयं जन्म नहीं लेती.
जितना ही इस बात पर मैं सोचता उतना ही दुखी होता पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. इन तीनों के जाने के बाद छाया और मेरे मन में भूचाल मचा हुआ था. माया आंटी उन लोगों को छोड़ने नीचे गई हुई थी वापस आते ही वह भी हमारे साथ बातों में शामिल हो गई. उनका भी ध्यान मंजुला चाची द्वारा बताए गए भाई बहन के संबंधों पर ही था. मैंने
माया आंटी से कहा
"आखिर एक ना एक दिन लोगों को इस बात का पता चलना ही है तो क्यों ना इसकी शुरुआत मंजुला चाची से ही की जाए "
मेरे और छाया के बीच में बने इस नए संबंध के बारे में जानने के बाद उनकी प्रतिक्रिया ही हमारा आगे का मार्ग प्रशस्त करेगी.

भाई बहन
[मैं मानस ]
दो दिनों के बाद मनोहर चाचा की लड़की की सगाई का कार्यक्रम था. हम तीनों समय से कार्यक्रम में पहुंच गए. कार्यक्रम शुरू होने में अभी देर थी माया आंटी मंजुला चाची से बात करने के लिए उत्सुक थी. उनकी अधीरता उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रहे थी. कुछ ही देर में उन्होंने मंजुला चाची को एकांत में पाकर उनसे बात छेड़ दी और कहा
" मंजुला मुझे तुमसे एक जरूरी बात करनी है"
" हां बोलिए ना"
" मानस और छाया के भी संबंध वैसे नहीं है जैसा तुम समझ रही हो"
" क्या मतलब"
" वह दोनों एक दूसरे को भाई-बहन नहीं मानते"
" क्या मतलब यह कैसे हो सकता है"
" अरे वह दोनों शुरू से ही एक दूसरे से बात नहीं करते थे और एक बार जब बातचीत शुरू हुई तो उन दोनों ने लड़के लड़कियों वाले संबंध बना लिए. मुझे यह कहते हुए शर्म भी आ रही है कि दोनों अभी तक इन संबंधों में लगे हुए हैं. मेरे समझाने के बाद भी वह दोनों एक दूसरे को भाई बहन नहीं मानते. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं"
माया आंटी ने खुद को निर्दोष रखते हुए सारी बातें एक साथ कह दी.
मंजुला चाची समझदार महिला थी उन्होंने कहा..
" मैं भी समझती हूं की छाया मानस की अपनी बहन तो है नही. और वैसे भी उन दोनों की मुलाकात युवावस्था में हुई है. इस समय लड़का और लड़की में शारीरिक परिवर्तन हो रहे होते हैं जिससे वह दोनों करीब आते हैं . मुझे लगता है छाया इतनी सुंदर थी की मानस उसके करीब आ गया होगा. और दोनों में इस तरह के संबंध बन गए होंगे. पर क्या छाया अब कुंवारी नहीं है?
"नहीं नहीं वह पूरी तरह कुंवारी है"
"तब तो चिंता की कोई बात ही नहीं है. युवावस्था में लड़के लड़कियों के बीच ऐसे संबंध बन ही जाते हैं वैसे भी छाया उसकी सगी बहन तो थी नहीं इसलिए वो दोनों पास आ गये होंगे. तुम इन बातों को दिमाग से निकाल दो वह भी इस बात को समझते होंगे."
"अरे नहीं वह दोनों तो एक दूसरे से विवाह करना चाहते हैं मुझसे बार-बार इस बात के लिए अनुरोध करते हैं"
" यह कैसे संभव होगा? तुम यह बात कैसे सोच भी सकती हो. गांव वालों के सामने क्या मुंह दिखाओगी. सब लोग यही कहेंगे की माया ने अपनी बेटी को मानस को फासने के लिए खुला छोड़ रखा होगा. मां-बेटी ने मानस जैसे शरीफ लड़के को अपने जाल में फांस लिया ताकि उनका भविष्य सुरक्षित हो सके. छाया इतनी समझदार लड़की है और काबिल भी, क्या तुम दोनों इस अपमान के साथ जीवन गुजार पाओगी."

मंजुला आंटी की बातें माया आंटी को निरुत्तर कर गयीं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बोलूं.
मंजुला आंटी फिर बोलीं ..
" गांव में तुम्हारे परिवार की बड़ी इज्जत है. सभी लोग गर्व से मानस का नाम लेते हैं और कहते हैं कितना अच्छा लड़का है पिता के जाने के बाद अपने परिवार को पूरी तरह संभाल लिया. अपनी बहन छाया को पढ़ाया लिखाया. भगवान ऐसा लड़का सबको दे. तुम इन दोनों के विवाह के बारे में सोच कर अपनी और अपने बच्चों की आने वाली जिंदगी हमेशा के लिए बर्बाद कर दोगी. यह बात अपने दिमाग से बिल्कुल निकाल दो"
इतना कहकर उन्होंने माया आंटी की पीठ पर हाथ रखा और बोला चलो सगाई का कार्यक्रम शुरू हो रहा है.
मेरा मन कार्यक्रम में नहीं लग रहा था. छाया भी कुछ लड़कियों के साथ गुमसुम बैठी थी. कार्यक्रम के बाद हमने गाँव से आए सभी लोगों से मुलाकात की. मनोहर चाचा के पैर छूते समय वह भावुक हो गए और बोले..
"मानस बेटा तुम्हें देख कर बहुत अच्छा लगा. तुमने पापा के जाने के बाद अपनी बहन छाया और इनकी मां को अपना लिया. यह एक बहुत बड़ा कदम है. तुम्हारे इस अच्छे काम की सराहना आस पास के गांवों में भी होती है. सभी लोग अपने बच्चों को तुम से प्रेरणा लेने को बोलते हैं और तुम्हारे जैसा बनने की अपेक्षा रखते हैं. भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे."
मनोहर चाचा ने यह भी कहा कि "तुम्हें और छाया को साल में एक बार गांव अवश्य आना चाहिए. वहां तुम लोगों की संपत्ति है तुम्हारे पापा ने संपत्ति के कुछ हिस्से छाया के साथ साझा किए हैं. अपनी जमीन को व्यवस्थित और अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए साल में एक दो बार गांव आना उचित होगा. मुझे पता है तुम्हारी नौकरी में व्यस्तता ज्यादा रहती होगी पर दायित्व निर्वहन भी जरूरी है. उन्होंने चलते चलते फिर से आशीर्वाद दिया तुम दोनों भाई बहन हमेशा खुश रहो यही मेरी भगवान से प्रार्थना है."
कार्यक्रम से वापस आने के बाद मैं और माया आंटी बहुत दुखी थे. माया आंटी के चेहरे पर उदासी यह स्पष्ट कर रही थी कि उन्हें मंजुला चाची का समर्थन नहीं मिला है. सारे गांव वालों द्वारा हम भाई बहन की तारीफों ने और इस सामाजिक ताने बाने ने हमारे मन में चल रहे विचारों पर कुठाराघात किया था.

कुठाराघात
माया आंटी ने मुझे अपने पास बुलाया और सारी बाते बतायीं और बोला..
" बेटा मानस अब तुम्हें ही छाया को समझाना होगा. तुम दोनों के बीच में चल रहे प्रेम संबंधों को यहीं पर विराम देना होगा. तुम दोनों का विवाह होना असंभव लग रहा है. कोई भी इस बात को स्वीकार करने को राजी नहीं है कि तुम दोनों भाई बहन नहीं हो. बल्कि तुम दोनों को आदर्श भाई बहन की संज्ञा दी जा रही है. गांव में तुम लोगों की इतनी तारीफ होती है यह बात मुझे लगभग हर व्यक्ति ने कही. जब उन्हें यह पता चलेगा की तुम दोनों विवाह कर रहे हो वह इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. और समाज में हमारी बड़ी बेइज्जती होगी. तुम दोनों एक दूसरे को प्रेम करते हो मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी. मैं समझती हूं परंतु विवाह होना यह शायद संभव नहीं हो पाएगा.
तुम छाया को समझा लो अभी तक उसका कौमार्य सुरक्षित है यह एक अच्छी बात है. तुम दोनों ने एक दूसरे के साथ अभी तक जो भी किया है वह उचित है या अनुचित इस बारे में न सोचते हुए इस संबंध को यहीं पर विराम दे दो. कुछ ही महीनों में छाया की पढ़ाई पूरी हो जाएगी. उसके बाद हम लोग उसका विवाह कर देंगे. विवाह के पश्चात वह स्वयं इन सब चीजों को भूल जाएगी.
तुम दोनों के बीच जो प्रेम संबंध बने हैं वह बने रहे. यह आवश्यक नहीं कि उसमें कामुकता ही प्रधान रहे तुम दोनों बिना कामुकता के भी एक दूसरे के प्रति प्रेम भावना रखते हुए आगे का जीवन व्यतीत कर सकते हो. मैं उम्मीद करती हूं तुम दोनों के जीवन साथी भी तुम लोगों की तरह ही खूबसूरत और समझदार होंगे. ताकि तुम दोनों उनके साथ अपनी अपनी इच्छाओं को पूरा कर सको. यही एकमात्र उपाय है"
इतना कहकर माया आंटी उठ गई. इन बातों के दौरान छाया कब हमारे पीछे आ चुकी थी यह मैं नहीं देख पाया था. उसने भी वह सारी बातें सुन ली थी वह पैर पटकती हुई मेरे कमरे में चली गई और बिस्तर पर पेट के बल लेट कर उसके दोनों हांथों से सर पकड़ लिया था. मैं उसे उठाने की चेष्टा करने लगा. उसकी आंखें भीगी हुई थीं
वह मुझसे लिपट कर रोते रोते बोली
" क्या यह सच में नहीं हो पाएगा"
मैं निरुत्तर था. मैं उसकी पीठ सहलाता रहा और बालों पर उंगलियां फिरता रहा. मेरे पास कुछ कहने को शब्द नहीं थे मैं स्वयं भी रो रहा था.
गांव वालों ने आकर हमें हमारी कल्पना से हमें वापस जमीन पर पटक दिया था.

छाया से वियोग.
अंततः यह सुनिश्चित हो चुका था कि मेरा और छाया का विवाह संभव नहीं है. छाया बहुत दुखी थी, पर वह स्थिति की गंभीरता को समझती थी. माया आंटी ने छाया से उसके सारे कपड़े अपने नए कमरे में लाने के लिए कहा. छाया का नया कमरा माया आंटी के शयन कक्ष के बगल वाल था. छाया जब अपने कपड़े और सामान मेरे कमरे से बाहर ले कर जा रही थी तो मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मेरे जीवन से सारी खुशियां एक साथ बाहर जा रहीं है. मेरी आँखे भर आयीं थी. इतना मजबूर मैं कभी नहीं था.
छाया को मैंने आज तक कभी अपनी बहन नहीं माना था और न ही भविष्य में कभी मान सकता था पर परिस्थितियां ऐसी बन गई थी कि मैं उसे अपनी प्रेमिका या प्रेयसी नहीं बना सकता था. हमारे सपने खंडित हो चुके थे.
हम दोनों ने कई दिनों तक एक दुसरे से बात नहीं की. जब भी वह मुझसे मिलती अपना सर झुकाए रखती थी. हम क्या बातें करें यह हमें खुद भी नहीं समझ में आता था. घरेलू बातों के लिए माया आंटी ही मेरा ध्यान रखती. मेरे कमरे में चाय खाना या किसी अन्य तरह की सहायता के लिए वही आती. मुझे छाया से यह सब काम बोलने में शर्म आती थी. जब भी मेरे से उसकी नजरें मिलतीं उसकी नजरों में एक अजीब सी उदासी रहती.
मैंने इतनी प्यारी लड़की से जैसे अन्याय कर दिया हो. इसकी आत्मग्लानि मुझे हमेशा रहती. मुझे लगता जैसे मैं उसकी भावनाओं और शरीर के साथ पिछले तीन वर्षों से खेल रहा था. इस आत्मग्लानि ने मेरा भी सुख चैन छीन लिया था.
नियति में जो लिखा होता है उसे आप बदल नहीं सकते. हमारे प्रेम में हम दोनों की साझेदारी बराबरी की थी पर उम्र में बड़ा होने के कारण मैं इस आत्मग्लानि से ज्यादा व्यथित था.
समय सभी घावों को भर देता है इसी उम्मीद के साथ हम अपनी गतिविधियों में व्यस्त होने का प्रयास कर रहे थे. लगभग दो महीने बीत गए थे. घरेलू कार्यों के लिए की गई बातों को दरकिनार कर दें तो मैंने और छाया ने आपस में कभी भी एक दूसरे से देर तक बात नहीं की थी . अब वह मुझे बिल्कुल पराई लगने लगी थी. माया आंटी मेरी केयरटेकर बन चुकी थी. छाया मुझसे दूर ही रहती और पता नहीं क्यों मैं भी उससे बात करने में कतराता था.
मेरे मन की कामुकता जैसे सूख गयी थी.

[शेष समय के साथ। ]

मेरा विवाह हो चूका था. छाया की अपनी भाभी से बहुत बनती थी. हम तीनों घनिष्ठ दोस्त बन गए थे. अंततः छाया का विवाह भी हुआ पर उसके साथ सुहागरात उसके प्यार ने ही मनायी ... छाया का देखा हुआ स्वप्न भी साकार हुआ. छाया मेरी बहन तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है. जिनके लिए हम भाई बहन थे उनके लिए आज भी हैं. माया आंटी ही हमें समझ पायीं थी की हम दोनों एक दुसरे के लिए ही बने थे. ...वह भी कामदेव ओर रति के रूप में ...
 
भाग-9

छाया सीमा की गहराती दोस्ती.

कुछ दिनों से मैं बहुत उदास थी. मुझे सीमा दीदी की याद आई. मैंने उन्हें अपने आने की सुचना उनके आफिस में फ़ोन करके दे दी. रविवार को मैं निर्धारित समय पर उनके घर पहुच गयी. वह घर पर ही थी
" आओ छाया आज मैं बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी"
"जाने दीजिए मैं आ गई ना"
हम दोनों अंदर आ गये. मैं उनके लिए बहुत सारी चाकलेट लायी थी. वह बहुत खुस हुईं और मुझे गले से लगा किया. हम दोनों के ही स्तन पूर्ण रूप से उन्नत थे गले लगते ही सबसे पहले उनकी ही मुलाकात हुई. मैं और सीमा दीदी दोनों हँस पड़े. कुछ समय बाद उन्होंने पूछा
" छाया क्या खाओगी"
"कुछ भी बहुत भूख लगी है" हम दोनों ने झटपट कुछ खाने की सामग्री बनाई और बिस्तर पर बैठ कर खाना खाने लगे. कुछ ही देर में बाते करते करते हमें नींद आने लगी और मैं बिस्तर पर ही लेटने लगी. उन्होंने कहा..
" अरे अपनी जींस उतार दो मेरा पायजामा पहन लो"
"नहीं दीदी ठीक है"
"अरे क्या ठीक है"
"इतनी चुस्त जींस में क्या तुझे नींद आएगी"
मैं शर्मा रही थी. पर सीमा तुरंत जाकर एक सफेद कलर का पजामा ले आइ और मुझ पर हक जताते हुए बोली "खुद खोलेगी या मैं खोलू." मैंने उनकी बात मान ली और पैजामा लेकर बाथरूम में जाने लगी. उन्होंने कहा " यही बदल लो मैं कौन सा तुम्हें खा जाऊंगी"
मुझे फिर भी शर्म आ रही थी.
"अच्छा लो मैं आंखें बंद कर लेती हूँ. और उन्होंने सच में आंखें बंद कर लीं. मैंने अपनी जींस उतार दी और उनका दिया पायजामा पहन लिया. हम लोग फिर से बातें करने लगे. बातों ही बातों में मैंने उनके दोस्त सोमिल के बारे में पूछा वह थोड़ी रुवासीं हो गयीं. उन्होंने बताया
" गांव से आने के बाद मैं सोमिल के साथ दो वर्षों तक मिलती-जुलती रही पर पिछले दो ढाई सालों से उसका कुछ अता पता नहीं है. मैंने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश की पर मैं सफल नहीं हो पाई. उसके माता-पिता अब उस पते पर नहीं रहते. मैं प्रयास कर कर के थक गइ अब उससे मुलाकात होगी भी या नहीं यह मैं नहीं जानती. पर मैं उसे बहुत याद करती हूँ."
मैंने स्थिति को सामान्य करते हुए हंसते हुए पूछा..
"सीमा दीदी आपका कौमार्य अभी तक बचा है या सोमिल ने ले लिया"
वह मुस्कुरा पड़ी
"तुझे बड़ा मेरे कौमार्य की पड़ी है. तुम खुद इतनी सेक्सी और खूबसूरत हो गई हो किब मुझे लगता है कि तुम्हारी राजकुमारी अब रानी बन चुकी होगी"
मैं उनके इस पुराने संबोधन पर हंस पड़ी. उनके इन्ही संबोधनों ने कुछ समय पहले तक मानस और मेरे संबधों को जीवंत कर रखा था. मैंने एक बार फिर पूछा
"क्या सच मे आपने अभी तक अपना कौमार्य बचा कर रखा है"
वह हंस पड़ी और कहा..
"तुम्हें देखना है"
" दिखाइए" मेरा कौतूहल चरम पर था. मैंने आज तक अपनी राजकुमारी के अलावा किसी और की वयस्क राजकुमारी नहीं देखी थी. अपनी राजकुमारी को भी मैंने सिर्फ आईने में देखा था. मुझे राजकुमारी की गुफा देखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी. मैं देखना चाहती थी की कौमार्य की झिल्ली किस प्रकार दिखाई देती है. मैं अपनी उत्सुकता ना रोक पाइ और सीमा दीदी से कहा...
"क्या मैं आपकी कौमार्य झिल्ली देख सकती हूं" वह हसीं और बोली
"तुम्हारी उत्सुकता आज भी वैसी ही है" और यह कह कर अपने पजामे को ढीला करने लगीं. कुछ ही देर में उनका पजामा जमीन पर पड़ा था. उनकी गोरी और सुडौल जांघे देखकर मुझे इर्ष्या हो रही थी. उनका रंग गेहुआ था पर जांघों के पुष्ट उभार उन्हें एक अलग किस्म की खूबसूरती प्रदान कर रहे थे. उन्होंने काले रंग की पैंटी पहनी हुई थी. मेरे कुछ कहने से पहले ही उन्होंने अपनी पेंटी उतारना शुरू कर दिया कुछ ही देर में वह कमर के नीचे नंगी हो गयीं थीं. उन्होंने बिना मुझसे पूछे बिना मेरी कमर से अपनी दी हुई सफेद पजामी उतारना शुरू कर दी. मैं अब धीरे-धीरे नंगी हो रही थी उन्होंने मेरी लाल पैंटी को भी उतार दिया.
हम दोनों को नग्न होने का कुछ ऐसा विचार आया कि हम दोनों ने बिना बात किए एक दूसरे का टॉप उतारना शुरू कर दिया. मैं आज कई महीनों बाद नंगी हो रही थी मानस से दूरियाँ बढ़ने के बाद यह पहली बार हो रहा था. इतना सब होने के बाद अकेले हम दोनों के ब्रा क्या करते उन्होंने भी हमारा साथ छोड़ दिया अब हम दोनों पूर्णतया नंगे थे. हम दोनों ने एक दूसरे के शरीर को बहुत ध्यान से देखें सीमा दीदी का तो पता नहीं पर मैंने किसी वयस्क लड़की को आज पहली बार नंगा देखा था. और वह भी मेरी सीमा दीदी उनके स्तन अत्यंत खूबसूरत थे. उनका रंग मुझसे जरूर सावला था पर उनके पुष्ट शरीर के आगे मुझे मेरी खूबसूरती कम लगती थी. हूम दोनों के शरीर की परिकल्पना ले लिए आप मुझे " १९४२ एक लव स्टोरी की मनीषा कोइराला " ( जैसा मानस मुझे कहते हैं) और आज की जेक्लीन फर्नाडिस से सीमा दीदी की तुलना कर सकते हैं.
सीमा तो मुझे देखकर मंत्रमुग्ध हो गइ थी. मैं इतनी हष्ट पुष्ट तो नहीं थी पर अत्यंत कोमल थी. उन्होंने मुझे आलिंगन में ले लिया और बोली यदि मैं लड़का होती तो तुम्हारे जैसी नवयुवती के दर्शन कर धन्य हो जाती. इतना कहकर उन्होंने मुझे अपने आगोश में ले लिया और मेरी पीठ को सहलाने लगी.

हम दोनों के स्तन आपस में टकरा रहे थे जिसका आनंद हम दोनों के चेहरे पर देखा जा सकता था. धीरे धीरे हमारे हाथ एक दूसरे के नितंबों को भी सहलाने लगे. हमारी जांघे एक दूसरे में समा जाने के लिए बेकरार थी. सीमा दीदी मेरे गालों पर लगातार चुम्बनों की बारिश कर रही थी मैंने भी उनका साथ दिया. कुछ ही देर में हम दोनों पूरी तरह उत्तेजित हो गए थे. मैं सीमा दीदी के पैरों के बीच आ गइ उन्होंने अपनी दोनों जांघे फैला दी मेरे सामने उनकी राजकुमारी स्पष्ट दिखाई दे रही थी. राजकुमारी के होंठो पर हुआ प्रेम रस अत्यंत सुंदर लग रहा था. सीमा दीदी ने कहा
"लो देख लो जो तुम्हें देखना है"

मैंने कांपती उंगलियों से उनकी राजकुमारी के होठों को फैलाया. अंदर अद्भुत नजारा था चारों तरफ गुलाबी रंग की चादर फैली हुई थी. अंदर उनकी मांसल राजकुमारी अत्यंत खूबसूरत लग रही थी. मैंने अपनी दोनों उंगलियां राजकुमारी के मुख में डालकर उसे फैलाने की कोशिश की पर मुझे कुछ विशेष दिखाई नहीं दे रहा था. मैंने उसे और फैलाने की कोशिश की ताकि उनकी कौमार्य झिल्ली को देख सकूं पर मैं इसमें सफल न हो सकी. मैंने अपनी उंगलियां और अंदर की. सीमा दीदी चीख पड़ी और बोलीं....
"छाया बस" मैं समझ गई कि मेरी उंगलियां उनकी कौमार्य झिल्ली तक पहुंच चुकी हैं. मैंने एक बार फिर राजकुमारी के मुख को फैलाया मैंने देखा की राजकुमारी का मुख आगे जाकर सकरा हो गया था. शायद यही उनकी कौमार्य झिल्ली थी. राजकुमार को इसके आगे जाने के लिए इस सकरे रास्ते की दीवार को तोड़ना जरूरी था.
सीमा दीदी की राजकुमारी इस छेड़छाड़ से अत्यंत उत्तेजित हो गई थी. मैंने अपनी हथेलियों से उनकी राजकुमारी को सहलाया. कुछ ही देर में उनकी राजकुमारी में कंपन उत्पन्न होने लगे थे. उसके कम्पन और प्रेम रस की धार ने मुझे यह एहसास करा दिया कि वह स्खलित हो चुकी हैं. उन्होंने मुझे अपने आगोश में फिर से ले लिया. कुछ देर शांत रहने के बाद मैंने अपनी जांघे फिर उनकी जांघों में घुसा दी वह समझ गई कि मेरी राजकुमारी भी स्खलित होना चाहती है. उन्होंने मेरे स्तनों को अपने मुंह में ले लिया तथा अपने हाथ मेरी राजकुमारी के ऊपर ले गयीं. वो राजकुमारी को सहलाने लगी थोड़ी ही देर में मैं भी स्खलित हो गई. हम दोनों इसी प्रकार एक दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थोड़ी देर के लिए सो गए. उठने के बाद हम दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराए और अपने कपडे पहने. सीमा दीदी ने मुझे चाय पिलाई और मैं वापस अपने घर के लिए चल दी.
सीमा दीदी और मेरे बीच बना यह संबंध आने वाले समय में और मधुर होते गए. हम अक्सर एक-दूसरे से मिलते और एक दूसरे की बाहों में वक्त गुजारते सीमा के साथ मैंने कई बार इसी तरह एकांत में समय गुजारा और हर बार सीमा से कुछ नया सीखने को मिलता.

मानस से दूरियां बढने के बाद मैं सीमा के साथ ज्यादा वक्त गुजारती पिछले कुछ महीनों से मानस ने मेरे शरीर को नहीं छुआ था. अब सीमा के साथ ही मेरी काम पिपासा शांत हो रही थी. अभी तक मैंने सीमा को मैंने अपने और मानस के संबंधों के बारे में कुछ भी नहीं बताया था.

छाया वापस दोस्त बनते हुए.
वक्त का पहिया घूमता हुआ एक दिन हमारे लिए खुशी ले आया. मैं घर पर अकेला था छाया कॉलेज से आई वह बहुत खुश थी. उसके चेहरे की चमक उसकी प्रसन्नता की परिचायक थी. मैंने उससे पूछा
"क्या बात है बहुत खुश लग रही हो"
"आज कॉलेज में एक बड़ी कंपनी आई थी उसने प्लेसमेंट के लिए टेस्ट लिया था मैं उस टेस्ट में अव्वल आई हूं. कल हम लोगों का फाइनल इंटरव्यू है" यह कहकर वह बिना कुछ कहे मुझसे आकर लिपट गई. मैंने उसकी पीठ पर थपथपाई और उसे अपने से अलग करते हुए बोला
"मुझे तुम पर गर्व है. तुमने अपनी पढ़ाई के लिए जो मेहनत की है अब उसका परिणाम सामने आ रहा है"
"मुझे कल होने वाले इंटरव्यू के बारे में कुछ बताइए आपने हमेशा मेरा साथ दिया है और मुझे यहां तक ले आए मुझे उम्मीद है कि आप का मार्गदर्शन कल भी मेरा साथ देगा"
वह बहुत खुश थी और एक बार फिर मेरे गले से लिपट गई. पर आज आलिंगन में कहीं भी कामुकता नहीं थी. वह कुछ देर मुझसे यूं ही लिपटी रही फिर अलग होने के बाद उसने कहा
"क्यों ना आज हम लोग आज खाना बाहर खाएं" . मैं उसकी बात कभी नहीं टालता था. मैंने कहा ...
" ठीक है"
हम माया आंटी के आने का इंतजार करने लगे. काफी दिनों के बाद हमारी शाम अच्छी बीत रही थी. छाया के चेहरे पर दिख रही खुशी से मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने हमारे वियोग से उत्पन्न दुःख पर विजय प्राप्त कर ली हो और आने वाले समय में वह खुशियों के साथ जीना सीख रही हो.

[ मैं छाया ]
अगले दिन मेरा इंटरव्यू था. मैं सबका आशीर्वाद लेकर कॉलेज पहुची. इंटरव्यू समाप्त होने के कुछ ही समय पश्चात सेलेक्ट किए गए प्रत्याशियों की सूची नोटिस बोर्ड पर टांग दी गई. मेरा नाम सबसे ऊपर था. मैं अपना नाम देखकर बहुत खुश हुई. मुझे मानस की याद आई. मैं इस दुनिया में सबसे ज्यादा शायद मानस से ही प्रेम करती थी. मैं जितनी जल्दी हो सके अपने घर जाना चाहती. मेरे सेलेक्ट होने की सबसे ज्यादा खुशी मानस को होती. आखिर आज मैं जो कुछ भी थी मानस की बदौलत थी.
घर पहुंच कर मैंने अपने सेलेक्ट होने की सूचना दी मानस ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया वह जब भी खुश होते थे मुझे अपने आगोश में लेकर कर उठा लेते थे और मुझे गोल गोल घुमाते. हमारे पेट चिपके हुए हुए थे और मेरे पैर बाहर निकले हुए . थोड़ी देर घुमाने के बाद उन्होंने मुझे छोड़ा. मुझे हल्का हल्का मुझे चक्कर आ रहा था. मैं बहुत खुश थी. उन्होंने मुझे फिर अपने आगोश में ले लिया और मेरे गालों पर एक चुम्मी दे दी. यह बहुत दिनों बाद हुआ था. हम दोनों घर पर अकेले ही थे मैंने भी प्रतिउत्तर में उनके गालों पर चुंबन दे दिया. एक पल के लिए मैं भूल गइ कि मानस अब मेरे प्रेमी नहीं थे.
पर उद्वेग में हुई क्रिया आपके नियंत्रण में नहीं होती हम स्वभाविक रूप से एक दूसरे को प्रेम करते थे आज इस खुशी के मौके पर एक दूसरे के आलिंगन में लिपटे हुए हम अपनी वर्तमान स्थिति भूल चुके थे.
राजकुमार अपनी राजकुमारी से मिलने के लिए बेताब हो रहा था और इसका तनाव मैंने अपने पेट पर महसूस कर लिया था. मैं उनसे दूर हटी और बोली
"मेरी हर सफलता के पीछे आपका ही योगदान है. आप मेरे गुरु हैं:
वो भी मजाक में बोले
"फिर मेरी गुरु दक्षिणा कहां है"
मैं कुछ बोली नहीं और शरमाते हुए उनके पास चली गयी. जाने मुझे क्या सूझा मैंने राजकुमार को अपनी हथेलियों के बीच ले लिया. मैंने कहा
"अब मैं आपकी मंगेतर या प्रेयसी नहीं हूं पर बहन भी नहीं हूँ. मैं अपने राजकुमार का ख्याल आगे भी रखती रहूंगी यही मेरी गुरु दक्षिणा है" मैं खुश थी.

माँ के आने के बाद हम सब भगवान के मंदिर गए और सबने भगवान से मेरे उज्जवल भविष्य की कामना की. रात्रि में मैं समय मानस के पास गयी और हम दोनों ने कसी दिनों बाद बाद एक दूसरे की प्यास बुझाय. पर आज हमारी कामुकता में एक अजब सी सादगी थी. हम दोनो ने सिर्फ अपने हाँथो से ही एक दुसरे के गुप्तांगों की सहलाया और स्खलित हो गए. हमारे प्रेमरस भी हमारे कपड़ों में लगे रह गए.


[मैं मानस]
विधि का यही विधान है हर दुख की घड़ी के बाद सुख की घड़ी आती है. मुझसे वियोग के बाद उसके चेहरे पर जो कष्ट या दुख आए थे वह धीरे धीरे छट रहे थे. एक नई छाया उभर कर सामने आ रही थी जो पूर्णतयः परिपक्व थी.
 
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