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Kamukta story - तेरे प्यार मे....

#137

दिलो में जज्बात लिए, हाथो में हाथ लिए हम दोनों जंगल में चले जा रहे थे . ये जंगल , ये जंगल बस जंगल नहीं था ये गवाह था उस दास्ताँ का जिसे इसने जवान होते हुए थे. ये गवाह था उन रातो का जब मैंने निशा के साथ जी थी . ये जंगल आज गवाह था अंधियारों की रानी को उजालो में लाने का. पानी की खेली पर निशा रुकी और अपने होंठो को पानी से लगा दिया. . होंठो से टपकती पानी की बूंदे, इस से खूबसूरत दोपहर मैंने नहीं देखि थी . उसकी साँस बड़ी तेज चल रही थी . एक नजर उसने मुझे देखा और फिर पेड़ का सहारा लेकर बैठ गयी .

मैं- क्या सोच रही है

निशा- तुझे और मुझे सोच रही हूँ. डाकन से बगावत करवा दी तूने .

मैं- मैंने बस प्यार किया है इस डाकन से . इजहार किया है अपनी जान से . तूने कभी कहा था की अंधियारों से वास्ता है तेरा देख मेरी जान तेरे उजाले ले आया हूँ मैं .तुझे ले आया हु मैं

निशा- कैसी ये तेरी बारात सजना , न घोड़ी कोई भी संग न

मैं- क्या करते घोड़े हाथी, तू मेरी मैं तेरा साथी.

निशा- प्रेम समंदर दिल के अन्दर ओ मेरे साजन मुझ को ले चल मंदिर .

मैं- जब मन से मैंने तुझे , तूने मुझे अपना मान लिया तो क्या मंदिर जाना , रातो को इस जंगल में तुझे देखा था इसी जंगल में उजालो में तुझे अपनी बनाऊंगा

निशा- चल छोड़ बहाना, तू कैसा दीवाना सुन मेरी सुन, मुझे ले चल मंदिर.

मैं- जहाँ मेरी मोहब्बत वो ही मेरा मंदिर फिर उस मंदिर क्यों जाना

निशा- ये रीत पुराणी, ये प्रीत पुराणी

मैं- रीत भी तू , प्रीत भी तू. एक मन है एक प्राण हमारे जन्म जन्म से हम हुए तुम्हारे .

निशा- चल खा ले कसमे, जोड़ ले बंधन ओ साजन सुन मुझे ले चल मंदिर.

मैंने निशा का हाथ पकड कर खड़ा किया , उसके माथे को चूमा और बोला- चल मेरी जान मंदिर.

मैं निशा को कुवे पर ले आया.

निशा- यहाँ क्यों लाया

मैं उसे कमरे में ले गया और उसे वो दिया जिसके लिए मैं कबसे बेक़रार था .

निशा की आँखों में आंसू भर आये .

मैं- कबसे तम्मना थी मेरी जान तुझे इस पहनावे में देखने की , कितनी राते ये सोच कर बीत गयी की जब तुझे इस रूप में देखूंगा तो तू कैसी लगेगी . अब और इंतज़ार नहीं करना मुझे.

निशा - दिल धडकने की क्या बात करू मेरे साजन , ये सपना ही लग रहा है मुझे .

मैं- प्रीत की रीत सदा चली आई , मेरे सपने भी अब हो गए तेरे.

निशा- दिन लगते थे काली रैना जैसे, सोच राते कैसे बीती होंगी

मैं- अंधियारों में तेरा मन था जोगन और मेरा दिल था रमता जोगी. मन में तेरे प्यार के दीप जलाकर अब कर दे दूर अँधेरे.

जोड़ा पहनने के बाद उसने लाल चुडिया पहनी .

मैं- अब चल मंदिर.

दिल में हजारो अरमान लिए मैं निशा को थामे गाँव मे ले आया था . धड़कने कुछ बढ़ी सी थी पर किसे परवाह थी गाँव के लोग कोतुहल से हमें ही देख रहे थे. उनकी नजरो का उपहास उड़ाते हुए मैंने निशा के हाथ को कस कर थाम लिया. मंदिर के रस्ते में हम चौपाल के चबूतरे के पास से गुजरे , वो पेड़ ख़ामोशी से हमें ही देख रहा था .

"अब कोई लाली नहीं लटकेगी इस पेड़ पर मैं रीत बदल दूंगा." मैंने खुद से कहा . निशा का हाथ थामे मैं मंदिर की सीढिया चढ़ रहा था .

"पुजारी, कहाँ हु पुजारी . देखो मैं अपनी दुल्हन ले आया हूँ , आकर हमारे फेरे करवाओ " मैंने कहा

मैंने देखा पुजारी हमारी तरफ आया उसकी आँखों में मैंने क्रोध देखा,असमंस देखा.

पुजारी- कुंवर, बहुत गलत कर रहे हो तुम इसे प्रांगन में ले आये सब अपवित्र कर दिया.

मैं- जुबान पर लगाम रखो पुजारी . मैंने तुझसे कहा था न की मेरे फेरे तू ही करवाएगा

पुजारी- ये पाप है एक डाकन से ब्याह कहाँ जगह मिलेगी तुमको कुंवर.

मैं- मैं तुझसे पूछता हूँ पुजारी इसे डाकन किसने बनाया, उस माँ ने तो नहीं बनाया न जो सामने बैठी तुझे भी और मुझे भी देख रही है . उसने तो इसे तेरे मेरे जैसा ही बनाया था न . नियति ने दुःख दिया तो इसमें इसका क्या दोष, इसको भी हक़ है ख़ुशी से जीने का . कब तक ये दकियानूसी चलेगी, कोई न कोई तो इस रीत को बदलेगा न . इस गाँव में ये बदलाव मैं लाऊंगा. तू फेरो की तयारी कर

पुजारी- हरगिज नहीं , ये पाप मैं तो जीते जी नहीं करूँगा. मेरा इश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा.

मैं- किस इश्वर की बात करता है पुजारी , ये तो माँ हैं न ये मेरी माँ है तो निशा की भी माँ हुई न. और माँ अपने बच्चो में कब से भेदभाव करने लगी. और अगर बात माँ और उसकी औलादों की है तो तेरी फिर क्या जरूरत हुई भला.

मैं निशा को लेकर माता की मूर्त के सामने आया . मैंने थाली में रखा सिंदूर उठाया और निशा की मांग में भर दिया.निशा ने अपनी आँखे बंद कर ली. मैंने अपने गले से वो लाकेट उतारा और निशा के गले में पहना दिया . निशा मेरे गले से लग गयी मैंने उसके माथे को चूमा और बोला- देख पुजारी , माँ ने तो कोई ऐतराज नहीं किया. वो भी जानती है की उसके बच्चो की ख़ुशी किस्मे है . और हाँ अब ये मेरी पत्नी है , अब तेरा मंदिर पवित्र हो गया न . मोहब्बत ने पुराणी परम्परा की नींव हिला दी है पुजारी. आने वाले वक्त में तू जिया तो न जाने क्या क्या देखेगा. चल मेरी जान घर चल. अपने घर चल.

गाँव का सीना चीरते हुए मैं अपनी सरकार को अपने घर ले आया. मैंने देखा दरवाजे पर भाभी खड़ी थी ,हमें देख कर उसकी आँखों में चमक होंठो पर मुस्कान आ गयी थी . शायद हमारे आने की खबर हवाए हमसे पहले घर ले आई थी .

"तो " भाभी ने बस इतना कहा और निशा को अपनी बाँहों में भर लिया.

"स्वागत है " भाभी ने कहा और निशा को घर में ले लिया पीछे पीछे मैं भी आया. मैंने देखा अंजू दौड़ कर आई और निशा के गले लग गयी . अंजू की आँखों में आंसू थे. मैंने चाची को आरती की थाली लेकर आते हुए देखा. .................ये ख़ुशी , ये ख़ुशी जो मैं महसूस कर रहा था इसके पीछे आते तूफान को मैं महसूस नहीं कर पा रहा था .
 
#138


मैंने चाची से खाना परोसने के लिए कहा और कमरे में चला गया . कुछ देर बाद चाची मेरे पास गयी .

चाची- जेठ जी को मालूम होगा तो बहुत नाराज होंगे वो. मेरा मन घबरा रहा है .

मैं- बाप चुतिया है , वो कभी नहीं समझेगा चाची.

चाची- मन व्याकुल सा हो गया है. बेटा बहु को लाया है पर हालात ऐसे है की चाह कर भी खुशी नहीं मना सकते, किस मुह से मनाये कुछ रोज पहले के मातम के आंसू तो सूखे भी नहीं है .

मैं- समझता हूँ . वो दुःख तो रहेगा ही

चाची-जेठ जी आयेंगे तब तू अपने भाई की आड़ लेना

मैं- जरुरत नहीं है मैने सुबह ही बता दिया था पिताजी को

चाची- कहीं तेरा ये कदम घर को ना तोड़ दे कबीर

मैं- ये घर, कभी घर था ही नहीं चाची. तू ही बता तू मालकिन है इस घर की पर तुझे कितना सुख मिला इस घर में . तुझसे ज्यादा कौन घुट घुट कर जिया इस घर में . चाचा भोसड़ी का दुनिया भर की रंडियों के मजे लुटता रहा पर खुद की लुगाई के पास नहीं आ पाया. सच कहूँ तो अकेला चाचा ही नहीं हम सब भी तेरे दोषी है . तुझे क्या दे पाए हम , कुछ भी तो नहीं.

चाची- मुझे किस चीज की जरुरत भला, दो बेटे दो बहुए . तुम सब को जब देखती हूँ तो दिल को जो सकूं मिलता और और भला क्या चाहत होगी मेरी फिर. खाना खाकर मैं आया तो देखा की निशा ऊपर चोबारे में थी. मैं उसके पास जाना चाहता था की अंजू ने मुझे पकड़ लिया.

मैं- क्या हुआ

अंजू- रमा का कहीं कुछ पता नहीं चल रहा . कल रात प्रकाश के नए घर में आग लग गई. सब कुछ जल कर ख़ाक हो गया.

मैं- रमा की ही कारस्तानी होगी . पर वो अकेली नहीं है कोई तो है जो छिप कर ये खेल खेल रहा है

अंजू- कौन हो सकता है

मैं- अभी तो नहीं मालूम पर आज नहीं तो कल मालूम हो ही जायेगा.

अंजू- आज रात मैं फिर से ख़ाक छानुंगी जंगल में

मैं- एक बात सच बताना क्या तुम परकाश से सच्चा प्यार करती हो

अंजू- सच-झूठ कुछ नहीं होता कबीर, प्यार बस प्यार होता है तुमसे जायदा कौन जानता है इस बारे में

मैं- तो फिर प्रकाश से सम्बंधित सभी राज जानती होगी तुम

अंजू- क्या कहना चाहते हो तुम

मैं- रमा प्रकाश के लिए भी काम करती थी , वो एक मात्र कड़ी है जो पिताजी, चाचा, महावीर, और प्रकाश से जुडी है . तुमने उस रात देखा तो था ही न की कैसे प्रकाश रमा के साथ कार के बोनट पर क्या कर रहा था .

अंजू-प्रकाश चाहता था की राय साहब उसे उसका हिस्सा दे दे.

मैं- वसीयत का चौथा टुकड़ा

अंजू- हाँ ,

मैं इस से पहले कुछ कहता की बाहर से आते शोर ने मेरा ध्यान भटका दिया.

"बिशम्भर दयाल कहाँ छिप कर बैठा है बाहर निकल " इस आवाज को सुनते ही मेरा दिल जोर से धडक उठा. मैं जानता था की ये होगा पर इतनी जल्दी होगा ये नहीं जानता था .

पिताजी के कमरे का दरवाजा खुला और पिताजी बाहर आये. सामने चौधरी रुडा खड़ा था . चेहरे पर दुनिया जहाँ का गुस्सा लिए.

"तुम यहाँ " पिताजी ने बस इतना कहा

रुडा- आना ही पड़ा मुझे बिशम्भर , मैं अपनी अमानत लेने आया हूँ . लौटा दे उसे.

पिताजी ने एक नजर अंजू को देखा और बोले- अंजू जाना चाहती हो तो जाओ

रुडा- अंजू की बात नहीं कर रहा मैं . तेरी इस नालायक औलाद से पूछ क्या पाप किया है इसने

पिताजी ने एक नजर रुडा को देखा , एक नजर मुझे देखा और बोले- कबीर, चौधरी साहब किस बारे में बात कर रहे है .

मैं- निशा से ब्याह कर लिया मैंने

इतना कहते ही पिताजी की तरफ से एक जोर का थप्पड़ मेरे गाल पर आ पड़ा .

"तेरी हिम्मत कैसे हुई ये गुस्ताखी करने की . क्या सोचा तूने कोई खेल चल रहा है. कैसे सोचा की हर बार तेरी मनमर्जी चलेगी. " पिताजी ने गुस्से से कहा.

पिताजी- हरामजादे, ये जानते हुए भी की निशा..........

"हाँ ये जानते हुए भी की मैं कौन हूँ कबीर ने मेरा हाथ थामा,मुझसे प्रेम किया मुझसे ब्याह किया " सीढिया उतर कर निचे आते हुए निशा ने कहा .

रुडा ने निशा को देखकर थूकते हुए कहा -तू कैसे भूल गयी की तेरा नाम किस से जुड़ा है . जो पाप तूने किया है उसकी सजा तुझे मिलेगी. अरे कलंकिनी तेरे कदम क्यों नहीं कांपे घर की चोखट पार करते हुए.

निशा- घर , किस घर की बात करते है आप . घर तो वो कभी था ही नहीं . किसको फ़िक्र थी मेरी. मैं हूँ भी या नहीं . कितने ऐसे दिन थे जब आपने मेरे सर पर हाथ रखा. मेरा हाल पूछा आपको तो याद भी नहीं की उस घर में मैं भी रहती थी . किस हक़ से आप घर की बात करते हो.

"जुबान पर लगाम रख बदचलन " रुडा ने निशा को थप्पड़ मारने के लिए अपना हाथ उठाया .

मैंने आगे बढ़ कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- सोच कर चौधरी रुडा, अब ये मेरी पत्नी है और मेरी पत्नी से किसी ने बदतमीजी की न तो फिर ठीक नही होगा.

आस पास गाँव वाले इकठ्ठा होने लगे थे . राय साहब बिशम्भर दयाल जो दुनिया के तमाशे सुलझाता था आज उसके खुद के घर में तमाशा हो रहा था .

मैं- निशा मेरी पत्नी है यही एकमात्र सच है . हमने प्रेम किया है हमें अपनी जिन्दगी जीने दो

पिताजी- ये कहने से तेरे कर्म ठीक नहीं हो जायेंगे कबीर. गलती की है तूने समाज का नियम तोडा है तूने.

मैं- किस समाज की बात करते है आप वो समाज जो न जाने कब का मर चूका है , वो समाज जो झूठे नियम-कानून की सड़ांध में जी रहा है .

पिताजी- एक विधवा की मांग में सिंदूर भर कर तुमने पाप किया है

कबीर.

मैं - ये विधवा थी पर अब नहीं है इसका पति आपकी आँखों के सामने खड़ा है.और फिर नियमो की किस किताब में लिखा है की विधवा दुबारा से ब्याह नहीं कर सकती. ये विधवा हुई इसमें इसका क्या दोष था . क्या इसको अपनी जिन्दगी जीने का हक़ नहीं. इसे हक़ है , इसे वो तमाम है हक़ है जो दुनिया की किसी भी औरत को मिलने चाहिए.

रुडा- विशम्भर , आज तुम्हारे सामने चौधरी रुडा नहीं बल्कि एक बाप खड़ा है जो अपने बेटे की अंतिम निशानी, अपनी बहु को वापिस ले जाने आया है जिसे तुम्हारा बेटा ले आया है . सारी दुनिया तुम्हारे दरवाजे पर न्याय के लिए आती है आज मैं भी आया हूँ, करो न्याय. मुझे लौटा दो निशा को .

पिताजी- कबीर, निशा को लौटा दे.

मैं- हरगिज नहीं

पिताजी- कबीर तूने सुना नहीं हमने क्या कहा

मैं- निशा कहीं नहीं जाएगी वो मेरी पत्नी है और इस घर की छोटी बहु वो यही रहेगी

पिताजी- कबीर...........

मैं- देखते है कौन माई का लाल निशा को मुझसे जुदा करता है . खून की होली खेल कर आया हु मलिकपुर में , अगर किसी की भी फाग खेलने की इच्छा है तो आगे आये.....................
 
#139

रुडा बहन के लंड ने राय साहब के गुरुर को निशाना बनाते हुए बड़ी चालाकी से खेल खेल दिया था .उसने ऐसा माहौल बनाया की जैसे वो खुद पीड़ित है और हमारे चुतिया बाप को तो अपनी शान हद से जायदा प्यारी थी . पर हम भी पक्के वाले थे अगर आज हार जाते तो फिर आशिको की लिस्ट में हमारा कभी जिक्र होता ही नहीं.

"सामाजिक वयवस्था को बनाये रखने के लिए बरसो से कुछ कायदे चले आ रहे थे , जिनमे से एक है की विधवा का पुनर्विवाह नहीं हो सकता. इस से ताना बाना टूटेगा. " पिताजी ने कहा

मैं- क्या गजब चुतियापा है ये . एक विधवा अपनी मर्जी से अपने जीवन को नहीं संवार सकती पर रसूखदार लोग जब चाहे नियमो की बत्ती बना कर अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकते है , तो राय साहब समाज के ठेकेदार मत बनिए और यदि बनना भी है न तो मैं पूछता हूँ ये न्याय का पुजारी तब कहाँ गया था जब आपका छोटा भाई गाँव की बहन बेटियों को अपने बिस्तर में खींच रहा था . क्या उन औरतो की अपनी मर्जी थी उस काम में. न्याय का बीड़ा उठाने का इतना ही शौक है तो चाचा की खाल क्यों नहीं खींची आपने .

मैं जानता था की पिताजी के पास मेरे सवालो का कोई जवाब नहीं था .

मैं- और ये मादरचोद गाँव वाले जब इनकी बहन बेटियों की इज्जत तार तार हो रही थी तब ये साले किस बिल में छुप गए थे , कहाँ गयी थी इनकी मर्दानगी तब. लाली को लटकाने में ये सब लोग बड़े उतावले थे जैसे की इनको बहादुरी का मेडल मिला हो पर अपनी बेटियों-बहुओ पर अत्याचार करने वाले ठाकुर जरनैल सिंह के सामने इनमे से किसी की जुबान तक नहीं खुली . मैं पूछता हूँ क्यों. जो लोग अपने हक़ के लिए खड़े नहीं हो सकते वो मेरी तक़दीर का फैसला करेंगे इस से गया गुजरा मजाक क्या होगा.

पिताजी- मजाक तो तुमने हमारा बना दिया है

.

मैं- मैंने नहीं आपके कर्मो ने. ये रुडा तो आपका बचपन का दोस्त था न ये ही छोड़ गया आपको और कर्मो की बात यदि ना ही हो तो बेहतर रहेगा , मुखोटे जब उतारे जायेंगे तो नंगे लोगो की कतार में सबसे पहले आप खड़े होंगे पिताजी .

"और आप चौधरी साहब, बहु भी बेटी का ही रूप होती है , माना की निशा महावीर की पत्नी थी पर ये कोई इनाम नहीं था जो महावीर जीत कर लाया हो. निशा को पुरे गाजेबाजे के साथ , विधिवत रूप से ही तो लाये होंगे न आप.मैं आपको बता देना चाहता हूँ की औरत कभी किसी की अमानत नहीं होती. वो गुरुर होती है . आपका बेटा गया क्या इसकी वजह निशा थी , आपका बेटा मरा अपने कर्मो की वजह से , खैर, मुझसे ज्यादा आप अपने बेटे को जानते होंगे. अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये क्या होता अगर निशा आपकी बहु की जगह आपकी बेटी होती. कैसा लगता जब आप उसे रोज विधवा के लिबास में देखते, कितने सपने जो आपने बेटी के लिए देखे थे वो रोज टूटते ." मैंने कहा .

मैं- चौधरी साहब, आप प्रेम के अस्तित्व को अपने झूठे अहंकार के आगे नकार रहे है आप. आप जिसने खुद प्रेम किया. यदि आप आज हमारे विरोध में खड़े है तो माफ़ करना सुनैना अगर आज जिन्दा होती तो धिक्कार ही होता उसे आप पर. मैं समझता हूँ आपकी वेदना को. आप अपनी मोहब्बत को नहीं पा सके. पर आप चाहे तो ये निशा अपना आने वाला जीवन सुख से जी सकती है . बहु समझ कर नहीं बेटी समझ कर इसके सर पर हाथ रख दीजिये. माना की राय साहब और आपके दरमियान बर्फ जमी है पर इसमें हमारा क्या दोष है. मैं सच कहता हूँ निशा से पहली बार मिला तब नहीं जानता था की वो क्या है . और अगर जानता भी न तो भी मैं उसका साथ नहीं छोड़ता .

"ये नहीं मान रही थी , इसने मेरे प्रेम निवेदन को स्वीकार नहीं किया था . ये जानती थी की अगर इसने ऐसा किया तो ये दिन जो हम देख रहे है जरुर आएगा. पर मैंने इसे अपनी माना है . मैंने इस से वादा किया की मैं इसके दामन को खुशियों से भर दूंगा. क्योंकि इसको भी जीने का हक़ है , दुनिया की कोई भी ताकत इसे मुस्कुराने से इसलिए नहीं रोक सकती क्योंकि ये विधवा है , इसी समाज ने क्या इसे जलील नहीं किया ताने नहीं मारे डाकन कह के , आज मैं कहता हूँ की ये डाकन नहीं है न थी . आप लोग अपने झूठे अहंकार के लिए हमें मरवा भी देंगे न तो हमारी चिता से उठता धुंआ आपकी नाकामी का ही होगा. क्योंकि आप सब जानते है की मैं सच कह रहा हूँ , चौधरी साहब निशा का हाथ मेरे हाथ में हक़ से दीजिये . उसे अपना आशीर्वाद दीजिये आप केवल महावीर के ही बाप नहीं थे, निशा के भी पिता है . अपने दर्जे को आज इतना ऊँचा कर दीजिये की फिर कभी कोई बहु और बेटी में फर्क ना कर पाए. " मैंने कहा.

"कबीर सही कह रहा है , " नंदिनी भाभी ने हमारा समर्थन किया.

भाभी- फूफा, तोड़ दो ये रीत पुराणी , आने वाली पीढ़ी को साँस लेने के लिए खुली हवा दो. आप लोग समाज में मोजिज लोग है आप समाज को नयी दिशा दिखायेंगे तो आपके लोग भी उसी रस्ते पर चलेगे. आपको सुनैना की कसम. आपको उस मोहब्बत की कसम जो आपने कभी की थी , उस समय आप ज़माने की बंदिशों को तोड़ नहीं पाए थे आज वक्त ने आपको फिर से ये मौका दिया है इन बच्चो को नया जीवन देकर आप अपने अतीत को इनमे जिन्दा कर सकते है .

चौधरी रुडा की आँखों से आंसू बह निकले. उसने अपनी पगड़ी उतारी और निशा के सर पर रख दी. ये एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम था जो आने वाले समय में बहुत दिनों तक याद रखा जाने वाला था . एक व्यर्थ की रुढ़िवादी परम्परा को तोड़ दिया गया था आज.

रुडा- हम सब से गलतिया होती है पर इन्सान वहीँ होता है जो गलतियों को सुधारने की हिम्मत रखे , आज एक गलती को सुधार दिया गया है आज के बाद किसी भी विधवा को डाकन नहीं कहा जायेगा. उसे अपनी जिन्दगी का पूर्ण अधिकार होगा.दोष हमारे विचारो का है हमारी दकियानूसी सोच का है पर अब ये सोच बदली जायेगी. निशा मेरी बच्ची कभी तुझे बड़े अरमानो से बहु बनाकर लाया था आज उतने ही अरमानो से तुझे बेटी बना कर नए जीवन की शुभकामनाये देता हूँ.इश्वर तेरे दामन को तमाम रौनके दे. तू सदा सलामत रहे खुश रहे.

हम दोनों रुडा के गले लग गए . धीरे धीरे मजमा खत्म हो गया . राय साहब के पास कहने को कुछ नहीं था . मैंने अंजू से चाय के लिए कहा और निशा के साथ चाची के चबूतरे पर बैठ गया . वो बस मुझे ही देखे जा रही थी

मैं- इस तरह मत देख मुझे मेरी जान

निशा- मुझे हक़ है

उसने अपना सर मेरे काँधे पर टिका दिया . हम दोनों ढलती शाम को देखने लगे इस बात से बेखबर की इस शाम के बाद एक रात भी आनी बाकी थी................

 
#140

चाची की छत पर मैंने बिस्तर लगाया . कुछ देर बाद निशा भी मेरे पास आ गयी. उसने मेरे सीने पर सर रखा और बाजु में लेट गयी . मैंने रजाई डाल ली ऊपर से .

निशा- ऐसा लगता है की सपना सच हो गया .

मैं- तुझे पाना नेमत से कम नहीं . तेरी बाँहों में ये उम्र कटे बस इतना ही तो ख्वाब था मेरा.

निशा - शाम से देख रही हूँ कुछ परेशान से हो तुम . क्या चिंता है .

मैं- कुछ तो छुट रहा है मुझसे , कुछ ऐसा जिसे समझ नही पाया हूँ . ये घर तुझे और मुझे जोड़ता है . ये घर अपने अन्दर ना जाने क्या छिपाए हुए है . तूने कहा था की तेरे हिस्से का सच तेरे घर की दहलीज में ही छिपा है अब तू आ गयी है , दिखा मुझे वो सच.

निशा- इतना पा लिया है बाकि बचा भी पा ही लेंगे.

मैं सोचने लगा की क्या निशा को मालूम है की नंदिनी भाभी ही आदम खोर है क्या मुझे निशा को बताना चाहिए. मैंने उसे ये बात नहीं बताने का निर्णय लिया और बात को घुमाया.

मैं-महावीर कैसा था निशा मैं जानना चाहता हूँ उसके बारे में

निशा- वो तेरे जैसा था अनोखा , अपनों में बेगाना. दुनिया चाहे जो कुछ भी कहे पर मैं उसे जानती थी उसके साथ जी थी मैं. चाहे कोई बड़ा हो चाहे कोई छोटा हो सबको साथ लेकर चलता था वो . अंधियारी रातो में , उन मुलाकातों में मैंने तुझमे उसकी झलक देखि कबीर. वो खंडहर उसे बहुत प्रिय था कहता था की वहां जो शांति है और कहीं नहीं है . अक्सर वो मुझे वहां लाता था घंटो उन दीवारों को देखता था वो उनसे न जैसा कैसा लगाव था उसे.

मैं- दुनिया कहती है की अय्याशी बहुत करता था वो .

निशा- दुनिया कुछ ना कुछ तो कहेगी न कबीर. पता नहीं क्यों वो जंगल से प्यार करता था . दिन में रातो में घूमता था . क्या था उसके मन में कभी जान नहीं पायी पर इतना जरुर था की परेशान नहीं था वो . उसके मरने वाले दिन तक भी मुझे ऐसा नहीं लगा था की उसकी दुश्मनी होगी किसी से. उस दोपहर हमने साथ खाना खाया था . कह कर गया था की जल्दी ही लौट आएगा पर आया ही नहीं .

निशा की बात ने मेरे मन में और हलचल मचा दी. मैंने निशा की कमर में हाथ डाला और उसे अपने ऊपर ले लिया. उसकी पीठ को सहलाते हुए मैंने उसे देखा , निशा ने अपने होंठो मेरे होंठो से जोड़ दिए. सुबह जब मैं जागा तो बदन थोडा टूट सा रहा था . कपडे पहन कर मैं निचे आया तो देखा की निशा रसोई में थी चाची के साथ .

मैं बाहर चला गया . राय साहब के कमरे पर ताला लगा था . ये बाप आखिर जाता कहाँ था इसका जवाब मुझे हर हाल में तलाशना था .हाथ-मुह धो ही रहा था की मैंने सामने से मंगू की माँ को आते देखा . न जाने क्यों मेरी नजरे झुक सी गयी .

काकी- बेटा, मंगू घर नहीं आया है . तुझे बता कर गया है क्या वो .

अब मैं क्या कहता . पर कुछ तो कहना ही था

मैं- नहीं काकी, वैसे भी कई कई दिन नहीं आता हो तू परेशान मत हो आ जायेगा. आये तो थोडा गुस्सा करना मान जायेगा तेरी बात वो .

काकी चाची की तरफ चली गयी पर मैं जानता था की अब वो कभी भी नहीं आयेगा. इन बूढ़े माँ बाप पर क्या गुजरेगी जब सच उनके सामने आएगा . मेरा मन व्यथित हो गया था . मैंने सीढियों से उतर कर भाभी को आते हुए देखा.

मैं- आपसे बात करनी थी .

भाभी- अब कोई और भी है तेरे पास बाते करने को

मैं- मजे फिर कभी लेना मेरे . मैं क्या निशा जानती है आदमखोर कौन है

भाभी- नहीं , और उसे मालूम भी नहीं होना चाहिए .

मैं- क्या कुछ और भी है जो मुझसे छिपाया है आपने .

भाभी- अब कुछ नहीं

मैं- राय साहब कहाँ जाते है

भाभी- पता नहीं.

मैं- कुछ काम से बाहर जा रहा हूँ निशा का ध्यान रखना

भाभी- ये कोई कहने की बात है

मैं- दूसरी बात अब मुझे एक गाड़ी चाहिए

भाभी-तेरे भैया को आने दे , हम सोच ही रहे थे की तुम्हे कोई तोहफा दिया जाये.

मैं मुस्कुरा दिया. घर से बहार निकला ही था की चबूतरे पर चाय लिए निशा खड़ी थी .मैंने कप उसके हाथ से लिया

निशा- सुबह सुबह कहाँ की तयारी

मैं- खेतो पर जा रहा हूँ . मेरी बात सुन ध्यान से इस घर में तू किसी पर भी भरोसा मत करना. बेशक अब हम पति पत्नी है पर सुरक्षा की दृष्टि से तुझे सावधान रहना होगा.

निशा- समझती हूँ

मैं- ठीक है फिर.

गाँव से बाहर निकल कर मैं खेतो की तरफ चल दिया. अजीब सा विरोधाभास था मेरे अन्दर. जिसे जो समझा था वो वैसा नहीं था. चाचा का अतीत अलग था . पिताजी को देख कर कौन कह सकता था की इतना रसूखदार आदमी अपनी बेटी की उम्र की लड़की संग बिस्तर गर्म कर रहा था .सबसे बड़ी बात ये सब लोग जंगल से जुड़े थे किसी न किसी तरह से .

ये पहली बार था जब मैं दिन की रौशनी में खान में उतरा था . सब कुछ वैसा ही था बस कुछ नहीं था तो मंगू की लाश. शायद राय साहब ने ही उसे हटवा दिया होगा. संघर्ष के निशान मुझे उस रात की याद दिला रहे थे . क्या ऐसा हो सकता था की मंगू ही राय साहब पर दबाव बनाये हुए हो अपनी बहन को परोसना उसकी किसी साजिश का हिस्सा हो . क्या मालूम वसीयत के चौथे पन्ने पर प्रकाश की जगह मंगू अपना नाम लिखवाना चाहता हो.

दूसरी बात जो मुझे खटक रही थी वो थी परकाश के घर में में लगी आग अचानक से तो नहीं लगी हो. वो भी जब उस घर में कोई नहीं रहता हो.क्या कोई ऐसा था जो नहीं चाहता था की निशा का ब्याह मेरे साथ होने से परिस्तिथियों में बदलाव हो. क्या वो सूरजभान हो सकता था वो भी तो अपने भाई के कातिल की तलाश में जंगल में भटक रहा था . क्या वो रमा हो सकती है. क्या चाचा के बारे में मैंने जितना भी सोचा उसका कोई और पहलु भी हो सकता था .

मैंने वो चुदाई की तस्वीरों वाली किताब उठाई और उसे देखने लगा. काफी पुराणी किताब थी वो पन्ने पीले पड़े हुए. चूत का चस्का भी ना साला क्या से क्या करवा देता है मैंने पन्ने पलटते हुए सोचा. दूसरी फिर तीसरी किताब उठा कर मैंने देखि और तीसरी किताब में जो मुझे मिला वो एक मरी हुई उम्मीद थी .

 
#141

"क्या थे तुम महावीर ठाकुर, मैं पता करके ही रहूँगा." मैंने किताब का वो पन्ना जिस पर पेन से राज बुक स्टोर और उसका पता लिखा था उसे फाड़ कर जेब में रख लिया. मैंने खान का खेतो वाला रास्ता बंद किया और उस तरफ चल दिया जो नकली समाधी की तरफ मुझे ले जाता था .लालच इन्सान की फितरत में होता है तो फिर ऐसा क्या था की इस अथाह सोने के भंडार की किसी को भी परवाह नहीं थी.

जंगल के इस बियाबान में बने इन कमरों ने क्या छिपाया हुआ था . अगर सुनैना की समाधी यहाँ नहीं थी तो फिर क्यों बताया गया की सुनैना की समाधी यहाँ है . कमरों की कुण्डी खोल कर मैंने फिर से देखा सब कुछ वैसा ही था जैसा मैं छोड़ कर गया था . आखिर ऐसा क्या था जो मुझसे छुट रहा था . क्या था जिसे मैं चाह कर भी नहीं देख पा रहा था. शहर जाकर मैंने उस बुक स्टोर को तलाशने की कोशिश की और मेरी तलाश पूरी भी हो गयी . वो दूकान अनोखी थी . इतनी किताबे मैंने कभी नहीं देखि थी .

बड़े सलीके से सजी हुई किताबे , देख कर दिल ठहर सा जाये पर मुझे जो चाहिए था वो कही नहीं था .

"मैं कुछ मदद करू "

मैंने मुड कर देखा एक अधेड़ उम्र का आदमी धोती-कुरता पहने खड़ा था .

मैं- दुकान के मालिक से मिलना है मुझे

वो- मैं ही हूँ मालिक यहाँ का .

मैंने जेब से वो टुकड़ा निकाल कर उसके हाथ में रख दिया. चश्मे के अन्दर फैलती-सिकुड़ती उसकी आँखे अजीब सी हो चली थी .

मैं- इस पन्ने पर यहाँ का पता लिखा है . मैं जानना चाहता हूँ की कौन खरीदता है ये किताबे

उसने मुझे ऐसे देखा ,अगले ही पल मुझे महसूस हो गया की मूर्खतापूर्ण सवाल कर लिया है मैंने. जाहिर है ऐसी किताबो के रसिया बहुत लोग होंगे. मैंने नोटों की गड्डी उसके सामने रखी और बोला- मेरे कुछ सवाल है , ये पैसे तुम्हारे हो सकते है यदि मुझे मेरे जवाब मिलेंगे तो .

मालिक- मेरे पास बहुत से लोग आते है ऐसी किताबे खरीदने के लिए . अब उन हजारो लोगो में से तुम्हारी जरुरत के कौन है ये कैसे मालूम होगा.

मैं- थोडा मुश्किल है जानता हूँ , सवाल ये है की ताजा ग्राहक नहीं करीब सात-आठ या दस साल पहले के ग्राहकों के बारे में जानना है मुझे.

मैंने अपनी जेब से त्रिदेवो की तस्वीर निकाल कर उसके सामने रख दी.

मैं- दिमाग पर थोडा जोर डालो और देखो इनमे से कौन था वो . और वो एक दो बार का नहीं बल्कि नियमित तौर पर आता होगा यहाँ पर.

मैं जानता था की भूसे के ढेर से सुई निकालनी है मुझे . बहुत देर तक वो उस तस्वीर को देखता रहा . उसके चेहरे के भाव स्पस्ट नहीं थे. मेरी धड़कने बेकाबू हो रही थी . सांस फूलने लगी थी. बड़ी शिद्दत से मैं चाहता था की वो इनमे से किसी भी एक पर ऊँगली रख दे.

"एक मिनट रुक " उसने कहा और अन्दर चला गया कुछ देर बाद वो आया तो उसके पास एक पुराणी डायरी सी थी .

मैं- क्या है ये

मालिक- कुछ साल पहले मैं किताबो के साथ साथ फोटो स्टूडियो का काम भी करता था . ऐसी किताब ले जाने वाले कुछ खास लडको से एक तरह से यारी-दोस्ती सी हो जाती थी. मैं उनकी तस्वीरे उनके नाम के साथ इस डायरी में लगा लेता था , शौक के तौर पर . अगर इनमे से कोई भी हुआ तो मालूम हो जायेगा.

दुनिया में कैसे कैसे शौक थे. खैर, उसने डायरी की तस्वीरे देखनी शुरू की और करीब दस मिनट बाद मेरे दिमाग में हलचल मच गयी , डायरी में तीन तस्वीरे थी, तीन दोस्तों की तस्वीरे. ऐसा कैसे हो सकता था . ये तीनो इस दूकान के पक्के ग्राहक थे. तीन तस्वीरों के निचे महावीर, प्रकाश और अभिमानु लिखा हुआ था नीली स्याही में. मेरा गुरुर, मेरा भाई भी इन किताबो का शौक रखता था . खंडहर के कमरों का राज सबसे पहले उसने ही जाना था . साला दिमाग में जैसे कुछ बचा ही नहीं था .तीनो साथ ही रहते थे, भैया को किताबो का शौक था ये मैं जानता था हो सकता था की वो बस किताबे ही खरीदते हो यहाँ से.

मैं- एक मिनट, तूने बताया की फोटोग्राफी का काम भी था उस समय ये बता इन तीनो में से कैमरा किसके पास था या फिर इनमे से किसी ने रील धुलवाई हो तुझसे.

मालिक- ये बताना तो मुश्किल है और इन बातो को समय भी बहुत हो गया. पर अगर इनमे से किसी ने भी मुझसे कैमरा ख़रीदा होगा तो उस कैमरा को यदि मैं देख लू तो बता पाउँगा.

मैं- इतना यकीं कैसे तुझे

मालिक- यकीन क्यों नहीं होगा. दस साल पहले शहर में एक मात्र फोटो की दूकान मेरी ही थी , वो तो आग की वजह से नुकसान ज्यादा हो गया वर्ना आज बात ही कुछ और होती.

आग क्या इस की आग और प्रकाश के घर पर लगी आग में कुछ समानता हो सकती थी . मैंने सोचा .

मैं- क्या औरते भी आती है उस तरह की किताबे खरीदने तुझसे

मालिक- धत्त

बस एक सवाल मुझे परेशान किये हुए था की दोस्त भी अगर दोस्तों से कोई बात छुपाये तो इसका क्या मतलब हो सकता है . माना की सबके अपने राज होते है पर इतनी गहरी दोस्ती में कुछ छुपाया जाये तो फिर शक करना बनता था . हो सकता था की ये तीनो ही मिल कर चुदाई करते हो . हो सकता था की महावीर और उसके बाद प्रकाश भी उसी रस्ते पर चल पड़ा हो.

मुझे उस कैमरा को हर हाल में ढूँढना था और साथ ही एक चक्कर और लगाना था शहर का . घर लौटने से पहले मैं वैध के मकान में घुसा और उस शीसी में से कुछ गोलियों को पुडिया बना कर रख लिया जो सरला ने मुझे दिखाई थी जिनका इस्तेमाल प्रकाश करता था अपने शिकार के साथ . घर पहुँचते ही मैंने निशा को अपने सीने से लगा लिया. उसके लबो को चूमा और उसे लेकर छत पर चला गया .

मैं- बस एक बात पूछनी है

निशा- क्या

मैं- क्या तू जानती थी की महावीर ही वो आदमखोर था .?
 
#142

मैं- क्या तू जानती थी की महावीर आदमखोर था .

निशा- क्या बकवास कर रहा है कबीर .

मैं- तू जानती थी या नहीं इस बारे में .

निशा- कैसे हो सकता है महावीर आदमखोर वो तो खुद आदमखोर का शिकार हुआ था .

ये मेरे लिए एक और चौंकाने वाली बात थी

मैं- तेरे जज्बातों को समझता हूँ . अतीत की याद दिला कर तुझे दुख्ही नहीं करना चाहता पर मेरे लिए अतीत को जानना बहुत जरुरी है तूने उसकी लाश तो देखि होगी न

निशा- नहीं देखि . किसी ने देखने ही नहीं दी.

मैं- खंडहर के बारे में तुझे कब बताया उसने.

निशा-ब्याह के कुछ दिनों बाद ही वो मुझे वहां पर ले गया था. कहता था की दुनिया में उस खंडहर से ज्यादा कुछ भी खूबसूरत नहीं , न जाने क्यों उस भुला दी गयी ईमारत से उसे हद से जायदा प्यार था . मैंने महावीर को तो भुला दिया था पर उसकी उस निशानी को नहीं भुला पाई. उस घर में मैं पागल होने लगी थी , जब कुछ और नहीं सूझा तो मैं यहाँ आने लगी. घंटो अकेले बैठी रहती. आठ साल बीत गए कबीर, कोई नहीं आया परिंदे तक ने पैर नहीं मारा यहाँ और फिर एक रात तू आया , और जिन्दगी पलट दी तूने मेरी.

मैं- तूने उसके कातिल को ढूंढने की कोशिश नहीं की .

निशा- उसके बाप भाई ने दिन रात एक कर दिया पर कोई नहीं मिला. उसके घाव कहते है की आदमखोर ने मार दिया उसे. अगर वो खुद आदमखोर होता तो कैसे शिकार होता वो.

मैं- और उसके दोस्त उन्होंने कोशिश नहीं की उसके कातिल को तलाशने की .

निशा- अभिमानु भैया उसके दोस्त थे. जिस दिन से महावीर गया अभिमानु कभी हमारी हवेली नहीं आये.

मैंने निशा के सर पर हाथ फेरा . उसने सर हमेशा की तरफ मेरे काँधे पर टिका दिया.

मैं- एक वादा करेगी मुझसे

निशा- कैसा वादा

मैं- अगर मैं पूर्ण आदमखोर बन कर बेकाबू हो गया तो तू मुझे मार देना

निशा-वो दिन कभी नहीं आयेगा. तू नहीं बनेगा वैसा.

मैं- इतना यकीं कैसे तुझे

निशा- दुबारा डाकन नहीं बनूँगी मैं .

सुबह मैं मंगू के घर गया. एक खालीपन जिसका बोझ सारी उम्र मुझे उठाना था . चंपा मेरे लिए चाय ले आई.

मैं- कैसी है तू

चंपा- ठीक हूँ

मैं- चल कुवे पर चलते है , कब तक इधर बैठी रहेगी थोडा बहार निकलेगी तो मन हल्का होगा.

चंपा- क्या फर्क पड़ता है.

मैं- मुझे फर्क पड़ता है. घर टूट रहा है , सब बिखर रहा है . जो हुआ वो कभी नहीं होना चाहिए था .काश मैं तुझे बता सकता की कितना दिल टुटा है . तू कभी भी खुद को अकेला नहीं समझना कबीर हर पल तेरे साथ खड़ा है . चल कुवे पर चलते है .

मैंने साइकिल उठाई और हम लोग कुवे पर आ गये. चंपा मुंडेर पर बैठ गयी मैंने चारपाई निकाली और उस पर बैठ गया .

मैं- वक्त कितना बीत गया कुछ महीनो पहले हम सब कितने खुश थे, मौज थी मस्ती थी अब देखो हालात

चंपा- समय के साथ साथ सब बदल जाते है.

मैं- मुझे समय को बदलना है चंपा इसके लिए तेरी मदद चाहिए मुझे

चंपा- मैं खुद हालात की मारी हूँ मैं क्या मदद करू तेरी .

मैं- कुछ सवाल है जिनके जवाब तेरे पास है.

चंपा- पूछ ले फिर किसने रोका है तुझे .

मैं- रोका तो किसी ने नहीं . मैं अपनी दोस्त को वापिस पाना चाहता हूँ .

चंपा - कल भी तेरी थी आज भी तेरी हु

मैं- तो फिर वो वजह बता क्यों तुझे पिताजी के साथ सोना पड़ा .

चंपा- नहीं पता की ऐसा क्यों हुआ , बस हो गया एक बार हुआ फिर बार बार होने लगा. फिर ना वो रुके ना मैंने मना किया.

मैं- कभी सोचा नहीं की क्या परिणाम होंगे इसके.

चंपा- कुछ चीजे बस हो जाती है कबीर .

मैं- और परकाश , अब ये मत कहना की उसके साथ भी हो गया .

चंपा- मैंने उसके साथ एक सौदा किया था .

मैं- कैसा सौदा.

चंपा- उसके पास कुछ ऐसा था जो मुझे चाहिए था , उसे चूत चाहिए थी मैंने उसे चूत दी.

मैं- क्या था उसके पास ऐसा.

चंपा- वो चाचा के कातिल को जानता था

मैं ये सुन कर हैरान रह गया . मेरा दिमाग साला भन्ना गया .

मैं- कौन ,,, कौन था चाचा का कातिल

चंपा- तुझे यकीन नहीं आएगा कबीर

मैं- कौन था वो

चम्पा- राय साहब ,

चंपा ने जैसे ही पिताजी का नाम लिया . समझ नहीं आया की साला क्या चक्कर है ये , चाची ने कहा था की उसने अपने पति को मारा है और चंपा कुछ और ही कह रही थी .

मैं - उसने कहा और तूने मान लिया

चंपा- उसके पास सबूत था .

मैं- कैसा सबूत

चम्पा- उसने एक फोटो खिंची थी जिसमे चाचा के पेट में छुरा घोप रहे है राय साहब.

मैं- कहाँ है वो फोटो अब

चंपा- उसने मुझे दिखाई थी पर दी नहीं . कहता था जब सही समय आएगा तब देगा मुझे .

एक आदमी के दो कातिल , बहनचोद दिमाग की नसे फटने को ही बेताब हो चली थी. साला क्या चुतियापा चल रहा था घर में कैसे समझे हम .

मैं- तूने कभी परकाश के पास कोई कैमरा देखा था क्या

चंपा- नहीं उसने बस तस्वीर दिखाई थी .

मैं- और मंगू , उसके साथ क्यों सोना पड़ा तुझे

चंपा- हम दोनों एक ही कमरे में सोते थे , एक रात नशे में वो चढ़ गया मुझ पर . मैं खुद को रोक नहीं पाई .

मैं- बुरा नहीं लगा

चंपा- बुरा लगने से क्या होता है , कहा न कुछ चीजे बस हो जाती है .

मैं- कहाँ मिलता था परकाश तुझसे

चंपा-यही कुवे पर

बहनचोद क्या था इस कुवे पर जिसे देखो यही पर चुदाई करने आता था .कुवा न हुआ साला कोठा हो गया .

मैं- इसी कमरे में

चंपा- हाँ इसी कमरे में

"मैं उसे वहां छिपाती जहाँ वो सबके सामने तो होता पर उसे कोई देख नहीं पाता " . मेरे मन में अंजू के शब्द गूंजने लगे. और क्या उस रात अंजू मुझे यही पर नहीं मिली थी . तो तुम छिपे हो यहाँ पर तुम.....................
 
#143

मेरे बचपन की साथी , जिसके साथ हर दिन मैं जिया हर पल जिया मेरे सामने किस बेशर्मी से झूठ पर झूठ बोले जा रही थी . मैं हैरान नहीं था मुझे खुद पर गुस्सा था. क्या कमी थी दोस्ती में. मैंने तो पूरी इमानदारी से निभाया था न , क्यों बदल गयी थी ये लड़की. अपनी आँखों के समाने मैं घर टूटते हुए देख रहा था . मन इतना व्यथित था की मैं रोना चाहता था . कमजोर नहीं था मैं पर बचपन से इतनी खुशहाली देखि थी की रंग बदलते इन लोगो की नीचता पर यकीन नहीं होता था .

दिल तो करता था की इस लड़की की खाल खिंच लू पर उसके बदन से टपकता लहू भी मेरे ही दिल का होता . मैं चीखना चाहता था उस पर , हाथ उठाना चाहता था उस पर . खुद को रोका , वो जैसी भी हो गयी थी , दिल के किसी कोने में उसके हिस्से की जगह भी थी . मंगू के जाने से मैं और घुटने लगा था .

"कहाँ जा रहा है कबीर " चंपा ने सवाल किया

मैं- तुझसे दूर

चंपा- वो तो तू पहले ही जा चूका है

मैं- जाना पड़ा मुझे. इस मासूम चेहरे के पीछे जो धूर्तता का नकाब तूने ओढा है न . मुझे शर्म आती है मैंने तुझे अपनी दोस्त माना. मेरे जिगर का टुकड़ा मेरा ही न हो सका. तुझसे गिला ये नहीं है की तुने मेरे बाप का बिस्तर गर्म किया वो तेरी मर्जी की बात है . दुःख ये है की तेरे मन को नहीं जान सका. मुझसे बाते छिपाने लगी तू, तेरी आँखों में स्नेह की जगह अब मुझे धोखा और स्वार्थ दीखता है .

चंपा-स्नेह, स्वार्थ क्या मायने है इन शब्दों के. बरसो पहले खोखले हो चुके है ये सब . घर में मातम पसरा था , राख भी ठंडी नहीं हुई थी और तू दुल्हन ले आया. ब्याह कर लिया तूने . ये स्वार्थ नहीं था कबीर. मैं क्या गिला करू तुझसे, क्या उलाहना दू तुझे .

मैं- काश समझा सकता कितना बोझ था मेरे कदमो को उसके घर की तरफ उठते हुए. मैंने वादा किया था निशा से .

चंपा- वादा तो मुझसे भी किया था की मेरी डोली तू उठाएगा. वादा तो तूने भी किया था मेरे गुनेहगार को मेरे सामने लाकर खड़ा कर देगा. पर तू भूल गया . अपने स्वार्थ के आगे तू मुझे भूल गया .

मैं- कुछ वादे तोड़ देना जरुरी हो जाता है कभी कभी

चंपा- आ गयी न दिल की बात जुबान पर .

मैं- आ गयी . इमानदरी की क्या बात करती है तू , तू खुद एक धोखेबाज़ है .

चंपा- तू मुझसे प्यार नहीं करता था कबीर , कभी नहीं चाहा तूने मुझे . मैं किसी के साथ भी मुह काला करू तुझे क्या दिलचस्पी है उसमे

मैं- मैंने नहीं चाहा तुझे,प्यार को जाना ही कितना तूने, तुझे अपने निचे कर लेता वो प्यार समझती तू, हाँ मैं नहीं प्यार करता था तुझे, मेरा स्नेह था तुझसे. मेरा गुरुर थी तू . देख क्या थी तू और आज क्या बन कर मेरे सामने खड़ी है . मेरी आँखों के सामने तू मेरे बाप के साथ चली गयी तूने नहीं सोचा की तुझे पुकारने वाला कौन है . तू स्वार्थ की बात करती है . तूने परकाश के सामने सलवार उतार दी. ये जानते हुए भी की वो मेरा दुश्मन है तू सोई उसके साथ . तू स्वार्थ की बात करती है.मेरी माँ के कत्ल का सबूत था तेरे पास तूने मुझसे छिपाया. दोस्ती की बात करती है तू , तुम धोखेबाजो के बिच रह कर मैं भी धोखेबाज़ हो गया .

चंपा ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया.वो मुंडेर से उतरी और वहां से चली गयी . मैंने मटके को मुह से लगाया और प्यास बुझाने की कोशिश करने लगा.

"मैं उसे वहां पर छिपाती जहाँ वो सबकी नजर में होती पर उसे कोई देख नहीं पाता " मैंने अंजू के कहे शब्द फिर से दोहराए . इन शब्दों की क्या वैल्यू थी ये मैं जान गया था , ये शब्द कितने सार्थक थे मैं मान गया था क्योंकि चाची ने चाचा की लाश को वही पर छिपाया जहाँ वो सबकी नजरो में तो थी पर उसे को देख नहीं पाया था . परकाश क्यों आता था कुंवे पर . वो सोने की तलाश में नहीं आता था , उसे तो मालूम ही नहीं था की सोना कहाँ पर है , वो कुवे पर आता था ताकि अपने कुछ राज़ यहाँ पर छिपा सके. पर कहाँ .

मैंने कमरे की कुण्डी खोली और अन्दर दाखिल हो गया . सब कुछ तो जाना पहचाना था . वो ही पलंग उस पर पड़ा बिस्तर. कुछ जगह छोड़ के खेती के औजार, फिर एक कोने में सूखी घास और लकडिया. एक तरफ लकड़ी की कुंडिया जिन पर कपडे टांकते थे. मैंने आले-दिवाले सब देख मारे कहीं पर भी ऐसा कुछ नहीं था . कमरे की हर ईंट को ठोक बजा कर देखा. और फिर मेरे दिमाग में वो घंटी बजी जो इस गुत्थी को काफी हद तक सुलझा सकती थी .


ईंट. मैं दौड़ते हुए कुवे पर आया और उसकी मुंडेर को घूरने लगा. .ईंट , मुंडेर की ईंटे. पागलो की तरफ मैं एक एक ईंट को चेक करने लगा. सामने से घूमते हुए मैं पिछले हिस्से पर पहुँच गया था . इस तरफ जमीं पर घास थोड़ी जायदा थी क्योंकि एक छोटी नाली से पानी बहता रहता था . मैंने उस तरफ से थोडा सा ऊपर देखा तो मेरे होंठो पर न जाने क्यों मुस्कान सी आ गयी . यहाँ पर दो ईंटे खोखली थी , इनको जैसे बाद में लगाया गया हो. बढ़ी हुई धड़कानो को संभालते हुए मैंने कांपते हाथो से वो ईंटे हटाई और पुराना काला कपडा देख कर मेरी आँखे चमक सी गयी. कपडे में एक लकड़ी का छोटा सा बक्सा लपेटा गया था मैंने उस पुराने बक्से को खोला और जो मैंने देखा , यकीं होना आसान तो नहीं था पर मैंने तलाश कर ली थी , काले रंग का पुराना सा कैमरा मेरी हथेली में था.
 
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अब जबकि कैमरा मेरे हाथ में था तो कहीं न कहीं मुझे बताई गयी बातो में से कुछ तो सच होंगी ही.जिस तरह से इसे छुपाया गया था ये तो पक्का था की कुछ तो बताने वाला था ये मुझे बक्से में कुछ नेगेटिव भी थे जिनमे से जायदा तर की हालत ठीक नहीं लगती थी पर गनीमत थी की कैमरा में रील थी. मैं तुरंत शहर में पहुच गया एक बार फिर मैं राज बुक स्टोर पर खड़ा था .

दूकान वाले ने पहली नजर में ही कैमरा को पहचान लिया , उसकी दूकान से ही ख़रीदा था . ये पक्का होने में देर नहीं लगी की ये महावीर की ही अमानत थी. दुकानदार ने मुझे मदद की , उसके बताये बन्दे के पास मैं नेगेटिव और वो रील लेकर गया. जल्दी से जल्दी मैं उन आने वाली तस्वीरों को देखना चाहता था .

शहर से वापिस आते हुए बार बार मेरे हाथ उस लिफाफे पर जा रहे थे जिसमे वो तस्वीरे थी, कायदे से मुझे शहर में ही खोल कर देख लेना चाहिए था पर मैं चाहता था की कुवे पर ही खोला जाये. जो खेल कुवे पर शुरू हुआ , उस अतीत को वहीँ पर देखने की अजीब इच्छा थी वो. तस्वीरे थी जवान तीन दोस्तों की , खेत में कीचड़ में खेलते हुए. जंगल में पेड़ो पर चढ़े हुए.अटखेलियो की. मैंने उन्हें साइड में रखा दुसरे लाट में महावीर की तस्वीरे थी , लम्बा-तगड़ा मूंछ रखने वाला गबरू. विलायती कपड़ो में खूब जंचता था वो.

मैंने नंदिनी भाभी की तस्वीरे देखि, अंजू की तस्वीरे देखि जंगल के किसी कोने में टहलते हुए. अब तक कुछ ख़ास नहीं था , पर तीसरी रील ने कहानी के असली पन्ने पलटने शुरू किये. मैंने चाचा की तस्वीरे देखि रमा के साथ आपतिजनक अवस्था, में आगे वो कविता के साथ था . पर सरला के साथ उसकी कोई तस्वीर नहीं थी . एक दो तस्वीरों के बाद वो फोटो आई जिसने मुझे हिला कर रख दिया. वो थी चाची की तस्वीरे, चाची की नहाते हुए तस्वीरे. कुछ में उनकी चुचियो को केन्द्रित किया था तो कुछ में पूरी नंगी पर ताजुब ये था की चाची की इन तस्वीरों में से एक भी हमारे घर की नहीं थी सारी तस्वीरे यही इसी कुवे की थी.

मतलब साफ़ था , फोटो खींचने वाले को मालूम था की चाची यहाँ भी नहाती है .अपने हाथो में चाची की नंगी तस्वीरे लिए मैं गहरी सोच में डूबा हुआ था . हो सकता था की महावीर ये कर्म कर रहा हो. जैसा की मुझ को बताया गया था महावीर ही लग रहा था इन सब के पीछे. पर अगली कुछ तस्वीरों ने फिर से मुझे उलझा दिया. कुछ तस्वीरे अंजू की थी , अंजू की नंगी तस्वीरे देखना अजीब , दरसल तस्वीरे अजीब नहीं थी बल्कि ऐसा लगता था की जैसे अंजू जानती हो की कोई उसकी तस्वीरे ले रहा हो.

फिर बारी आई उनकी जो अस्पष्ट थी . जिनके नेगेटिव समय के साथ नहीं चल पाए थे. उन तस्वीरों में भी कोई औरत थी , ये चुदाई की तस्वीरे थी इतना तो समझा जा सकता था पर कौन ये समझना मुश्किल था . साफ़ नहीं थी ऐसे ही उन तस्वीरों को एक के बाद एक देखते हुए एक तस्वीर पर मेरी नजर ठहर गयी . उस कड़े को मैं पहचान गया था ये चांदी का कड़ा मेरे बाप का था . पर औरत कौन थी ये साला मगजमारी का विषय हो गया था .

चंपा ने कहा था की प्रकाश ने उसे चाचा की तस्वीर दिखाई थी माँ को धक्का देते हुए . पर इनमे से वैसी कोई तस्वीर नहीं निकली. मतलब साफ़ था ये कैमरा से वो तस्वीर नहीं ली गयी या फिर उसे हटा दिया गया होगा. अब सवाल ये था की क्या महावीर को बाप की अय्याशी का मालूम था या फिर इसी तस्वीर की वजह से प्रकाश बाप पर दबाव बनाये हुए हो .

शाम ढलने लगी थी , घर जाने से पहले मैंने उन तस्वीरों को छिपाने का सोचा उन्हें रख ही रहा था की कुछ फोटो मेरे हाथ से गिर गयी उन्हें फिर से उठाया ही था की एक तस्वीर पर मेरी नजर पड़ी. ये कैसे अनदेखी रह गयी . घर वापिस लौटते हुए मेरे सर में बहुत तेज दर्द हो रहा था . मैं जाते ही रजाई में घुस गया .

"एक तो सारा दिन गायब थे, और अब आते ही रजाई ओढ़ ली " ये निशा थी जो मेरे लिए चाय ले आई थी .

मैं- चाय रहने दे, बाम लगा दे सरमे दर्द हुए जा रहा है

निशा- अभी लाती हु.

रजाई ओढ़े ओढ़े ही मैं बैठ गया और निशा मेरे सर पर बाम लगाने लगी.

निशा- देख रही हूँ कुछ परेशान हो ,

मैं- ऐसी कोई बात नहीं

निशा- मुझसे झूठ बोल रहे हो , जानती हूँ की नाराज हो तुम

मैं- तुमसे क्यों नाराज होने लगा भला

निशा- मैंने तुमसे झूठ जो बोला

मैं- मुझे मालूम था की तुम्हे पता थी वो बात .

निशा- ये सच है कबीर की मैं महावीर के कातिल को तलाशती हु. ये भी सच है कबीर की महावीर आदमखोर था ये मालूम था मुझे. मुझे बिलकुल समझ नहीं आया की तुम्हे बताऊ या नहीं क्योंकि अतीत मेरे इस आज को कहीं ख़राब न कर दे. मैं डरती हूँ कबीर अब डरती हूँ .

मैं- मुझे हमेशा से पता था की तुझे मालूम था महावीर ही आदमखोर था , क्योंकि तूने मेरे साथ साथ उसके जख्मो का भी इलाज किया था . तेरा ये विश्वास , ये बता गया था.

निशा- तूने मुझे अपनाया . इतना मान दिया इस दामन को खुशियों से भर दिया . मैं नहीं चाहती थी की अतीत की किसी भी बात से तुझे दुःख हो. ये जानते हुए की मैं पहले किसी और की थी फिर भी तूने इतना इश्क किया मुझसे. मुझे लगा की छिपाना ही ठीक होगा.

मैं- तेरी मेरी डोर इतनी भी कमजोर नहीं मेरी जान . मैं महावीर को जानना चाहता हूँ , बता मुझे वो क्या था कैसा था .

निशा इस से पहले की कुछ कहती , कमरे में किसी के आने की आहट हुई और वो मुझसे अलग हो गयी...................

"ओह, मुझे दरवाजा खड़का कर आना चाहिए था पर क्या करे तुमने कुण्डी भी तो नहीं लगाईं " अंजू ने अन्दर आते हुए कहा.

हम दोनों मुस्कुरा पड़े.

अंजू- वापिस जा रही थी सोची तुमसे मिलती हुई चलू इसी बहाने तुमको न्योता भी दे दूंगी मेरे घर खाने पर आने का .

निशा- ऐसे कैसे जा रही हो

अंजू- काम भी तो करना है न भाभी, वैसे भी कितने दिन हो गए यहाँ पड़े हुए.

मैं- निशा अब ले आओ चाय

निशा के बाहर जाते ही मैं अंजू से बोला-तुमसे एक जरुरी बात करनी थी

अंजू-किस बारे में

मैंने जेब से अंजू की वो तस्वीरे निकाली और उसके हाथ में दे दी. उसके चेहरे का रंग बदलने लगा.
 
#145

अंजू ने वो तस्वीरे अपने पास छिपा ली और बोली- कहाँ से मिली तुझे ये

मैं- सवाल मेरा होना चाहिए, और वो सवाल है की जब ये तस्वीरे खिंची गयी क्या तुम खींचने वाले को जानती थी . मेरा मतलब है की जाहिर से बात है तुम जानती हो .

अंजू- मैंने पूछा कहाँ से मिली तस्वीरे तुमको

मैं- कुंवे से क्या ताल्लुक है तुम्हारा.

इस से पहले की अंजू कुछ भी कहती निशा चाय लेकर आ गयी. चाय की चुस्कियो के बीच मैं और अंजू जानते थे की मामला इतना भी सीधा नहीं है .इन्सान के लिए सबसे कमजोर लम्हे होते है जब उसे अपने परिवार की बेहयाई का बोझ उठाना पड़ता है , कहने को हसियत बहुत बड़ी थी पर हकीकत में बाप और चाचा ऐसे न लायक लोग थे जिनका बहिष्कार बरसो पहले हो जाना चाहिए था.

छत पर खड़ा मैं इसी उधेड़बुन में था की निशा पीछे से आकर मुझ से लिपट गयी . ठंडी रात में उसकी गर्माहट ने बड़ा सकूं दिया. उसकी गर्म सांसे मेरे कान तपाने लगी.

निशा- क्या परेशानी है सरकार. किस सोच में गुम हो .

मैं- तुमसे क्या ही छिपा है जाना.

निशा- मैं साथ हूँ न तुम्हारे

मैं- एक तेरा ही तो साथ है मेरी जाना.

निशा- एक रात तनहा और हम बेखबर.

निशा की ये बात सुनकर मैं पलटा ,

निशा- क्या हुआ

मैं- क्या कहा तूने जरा फिर से कह

निशा- क्या कहा मैंने

मैं- वो लाइन जो अभी गुनगुनाई तूने

निशा- एक रात तनहा और हम बेखबर.

ये लाइन मैंने कही तो सुनी थी , कहाँ पर मैं सोचने लगा.

निशा- कुछ ओढा भी नहीं तुमने आओ निचे चलते है .

मैं उसके साथ आ तो गया था पर दिमाग में ये लाइन ही घूम रही थी , कहाँ सुनी थी मैंने ये . कहाँ , कहाँ याद क्यों नहीं आ रही . कभी कभी मुझे खुद से कोफ़्त सी होने लगती थी . खैर मैं भैया को खाने के लिए बुलाने गया तो पाया की वो बोतल खोले बैठे थे .

भैया- लेगा क्या थोड़ी .

मैं- हाँ.

मैंने भैया के हाथ से पेग लिया और निचे कालीन पर ही बैठ गया .

भैया- ये मंगू न जाने कहाँ गायब है, कभी कभी तो मुझे समझ ही नहीं आता इस लड़के का . अभी आएगा न तो दो चार लगा ही दूंगा उसे. काम का तो ध्यान ही नहीं है उसको.

कडवा घूँट मेरी हलक में ही अटक गया. मैं कैसे बताता भैया को की वो अब कभी नहीं आएगा.

भैया- कुछ बोल तो सही

मैं- महावीर के जाने के बाद आपकी और प्रकाश की दोस्ती भी टूट सी ही गयी थी क्या कारण था भाई.

भैया- वो महावीर के कातिल को ढूँढना चाहता था , मैं कातिल को छुपाना चाहता था . कई बार वो कहता था की मुझे फ़िक्र ही नहीं की किसने हमारे दोस्त को मार दिया. और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था .

मैं- अंजू प्रेम करती थी उस से .

भैया- प्रेम बड़ा विचित्र शब्द है कबीर. इसे समझना कहाँ आसान है . हर व्यक्ति के लिए इसके अलग मायने होते है .

मैं- फिर भी आपने भाभी से प्रेम किया ये जानते हुए भी की वो किस बीमारी से जूझ रही है .

भैया- प्रेम का शर्ते नहीं होती छोटे, तू भी जानता है इस बात को .

मैंने गिलास खाली किया और निचे आया देखा की सियार आँगन में बैठा है. जैसे ही उसने मुझे देखा मेरे पास आया थोडा लाड करवाने के बाद वापिस से कम्बल पर जाके बैठ गया . एक जानवर भी प्रेम को समझता था फिर ये इन्सान क्यों इतनी बेगैरत फितरत का था. रात को जब मुझे लगा की निशा गहरी नींद के आगोश में है. मैंने कम्बल ओढा और मैं घर से बाहर निकल गया.

मेरे थके हुए कदम मुझे एक बार फिर जंगल की तरफ ले जा रहे थे . एक बार फिर से मेरे सामने दो रस्ते थे एक कुवे पर जाता था एक उस तरफ जहां मुझे मेरी तक़दीर मिली थी . तालाब के पानी को हथेली में भर कर जो होंठो से लगाया मैंने, ऐसा लगा की बर्फ उतर गयी हो मेरे सीने में . खंडहर हमेशा की तरह ख़ामोशी से खड़ा था .

"बता क्यों नहीं देते तुम क्या दास्ताँ है तुम्हारी " मैंने उस इमारत से पूछा.

एक बार फिर मैं उन अजीब से निशानों को देख रहा था जिन्होंने मुझे उन दो कमरों को दिखाया था . अंजू ने पहली ही मुलाकात में मुझे वो लाकेट दिया था जिसे वो बरसो से पहनती थी .उसी लाकेट से मैंने वो छिपे हुए कमरे ढूंढे. क्या अंजू भी जानती होगी उन कमरों के बारे में. क्या अंजू की पहले से ही नजर थी मुझ पर. हो सकता है की वो जानती हो मेरी और निशा की गुमनाम मुलाकातों के बारे में. इस जंगल में मैं अकेला भटकता था ये वहम तो मेरा कब का मिट गया था .

मुझे याद आया की कैसे मेरे सीने पर हाथ फिराते हुए उस लाकेट को देख कर निशा चौंक गयी थी . इसका मतलब साफ़ था की अंजू जानती थी मेरे और निशा के बीच बढ़ रही नजदीकियों को . निशा के आलावा अंजू ही वो सख्शियत थी जो खंडहर में आती-जाती थी तो फिर निशा को उसकी आमद क्यों महसूस नहीं हुई. अगर अंजू मुझे वो कमरे दिखाना चाहती थी तो क्या मकसद था उसका.

कभी लगता था की इस खेल की डोर पास ही है मेरे अगले पल लगता था की कोई डोर है ही नहीं. महावीर को तीन लोग सबसे ज्यादा जानते थे, निशा-अंजू -भैया. दो की राय में वो बुरा बन गया था तीसरी उसे आज भी मानती थी . इस चुतियापे में एक चीज पर मैंने बिलकुल ध्यान नहीं दिया था वो था रुडा और राय साहब का रिश्ता. क्या थी सुनैना. दो चौधरियो से उसका इतना नाता तो फिर क्यों उसे सम्मानजनक समाधी नसीब हुई. कच्चे पत्थर ही थे क्या उसका नसीब.


जंगल में चलते हुए मैं सुनैना की समाधी से थोडा ही दूर था की उस तरफ जलती एक लौ ने मुझे इशारा कर दिया की मैं अकेला नहीं हूँ . दबे पाँव मैं जब वहां पहुंचा , पेड़ो की ओट से मैंने देखा की वहां पर उन पत्थरों के पास कोई बैठा है .
 
# 146

आंच की तपत को ना जाने क्यों मैंने उस दुरी से भी महसूस कर लिया. आगे बढ़ते हुए मैं समाधी के पास गया और उस शख्श के पास जाकर बैठ गया .

"ठण्ड कुछ ज्यादा ही है न आज " मैंने आंच की तरफ अपने हाथ किये.

"इतनी भी नहीं की बर्फ पिघल जाये " चौधरी रुडा ने कहा.

मैं-कब तक आपके सीने में जमी रहेगी ये बर्फ, माना की जख्म पुराना है पर मरहम की कोशिश तो कर ही सकते है न . ये दर्द ही तो है जो मुझे आपसे जोड़ता है . ये दर्द ही तो है जो उस दिन पुराणी रीत तोड़ते हुए आपने निशा का हाथ मेरे हाथ में दिया.

रुडा- क्योंकि तुम लायक थे उसके. क्योंकि उस दिन मैंने तुमको नहीं पैंतीस साल पहले के रुडा को देखा , जवानी मे मैंने कोशिश की थी रीत बदलने की . समाज कोई बहुत बढ़िया चीज नहीं होती कबीर, समाज बेडियो के सिवा कुछ नहीं, जो हमें कभी आगे नहीं बढ़ने देती.

चौधरी रुडा ने समाधी के पत्थरों पर हाथ फेरा और बोला- इस से बेहतर हक़ था उसका .

मैं- आप बहुत चाहते थे न सुनैना को

रुडा- मैं आज भी चाहता हूँ उसे. मरते दम तक चाहता रहूँगा उसे.

मैंने आंच को अपने सीने में उतरते हुए महसूस किया.

मैं- कैसी थी वो

रुडा- अलबेली, अनोखी. ये जंगल न जाने अपने अन्दर क्या क्या छिपाए हुए है उसी कुछ में कुछ लम्हे हमारे भी है .जब वो हंसती थी जंगल मुस्कुराता था . जब वो गाती थी आसमान तक झूम जाता था . सबसे अलग. सबसे बेगानी. बहुत कहती थी वो मुझसे, रुडा मत चल इस पथ पर , प्रेम का पथ बड़ा मुश्किल

मैं- और आप क्या कहते थे .

रुडा-बस इतना की तु जो नहीं तो फिर कुछ भी नहीं .

मैं- इस जंगल ने दो लोगो की दोस्ती भी देखि है ऐसा सुना मैंने.

रुडा- दोस्ती , क्या बताऊ तुमको कबीर की क्या होती है दोस्ती.

मैं- फिर भी मैं उस दोस्ती की कहानी सुनना चाहता हूँ जो खो सी गयी है इस जंगल में . मैं आपसे त्रिदेव की असली कहानी सुनना चाहता हूँ.

रुडा- तो तुमने मालूम कर लिया

मैं- नहीं, बस अंदाजा लगाया.

रुडा- जैसा की तुम जानते हो मैं और बिशम्भर बचपन के दोस्त थे. एक थाली में खाना, उसके बिना मैं नहीं मेरे बिना वो नहीं. जवानी के जोश से भरपूर दो नो जवान जिन्होंने वो करने का सोचा जिसके बारे में कोई भी नहीं सोच सकता था .पढाई की किसे फ़िक्र थी . दिन रात हम जंगल में भटकते. न जाने क्यों हमें इतना लगाव था इस जंगल से मैं आज भी नहीं जानता. फिर हमें मिली सुनैना , तालाब किनारे पशुओ को पानी पिलाते हुए देखा जो उस को बस देखता ही रह गया. डेरे की लड़की थी वो .

तुमने दोस्ती की बात की , दोस्ती . दोस्ती ही तो थी जो डेरे की लड़की बिना किसी भय के हमारे साथ दिन रात रहती थी . मैं रोज जाता उसे देखने के लिए. वो रोज आती बकरियों को पानी पिलाने के लिए . हथेली में भर कर पानी को होंठो से लगाती, उसे रोज मालुम होता की मैं उसे देखता हूँ , पर ना वो कुछ कहती न मैं कुछ कहता. ऐसी ही दोपहर थी जब मैं उसे देखने में इतना खो गया था की कुछ ख्याल ही नहीं रहा , पर उसकी नजरबराबर थी मुझ पर , घात लगाये तेंदुए के हमले से बचाया उसने मुझे. वो पहली बार था जब हमने उस से बात की. एक बार जो सिलसिला शुरू हुआ फिर रुका ही नहीं .

हम तीनो हमउम्र ही थे,नए नए विचार हमें बहुत आंदोलित करते. बिशम्भर किताबे बहुत पढता था . उसे हमेशा लगता था की प्राचीन जगहों के अपने राज होते है .इतिहास का शोकीन मेरा दोस्त, उसका ये विश्वास की हर जगह की अपनी कोई कहानी होती है उसे बल दिया सुनैना ने डेरे में टोने का काम बहुत होता था . डेरे का मान भी बहुत था .लोगो की बहुत सी बिमारी डेरे की भभूत से ठीक हो जाती. हम मगन थे , अपनी बातो में अपनी हरकतों में पर कब तक रहता ये दिल के किसी कोने से बार बार आवाज आती की सुनैना भाने लगी है. साथ होते हुए भी मैं बेगाना होने लगा था . महकने लगी थी इस जंगल की फिजाए उस अहसास से.

एक शाम हम तीनो ऐसे ही तालाब के पास खंडहर में बैठे थे तो सुनैना ने कहा की उसे मालूम हुआ की जंगल में कुछ छिपा है . कुछ ऐसा जो जिन्दगी बदल सकता है . बिशम्भर ने पूछा तो सुनैना के बताया की पक्के तौर पर तो नहीं पर उसने इतना ही सुना की कुछ छिपा है जंगल में .

रुडा- क्या तुम भी सुनैना , बिशम्भर की बातो को जायदा पक्का ही समझ लिया है तुमने.

सुनैना- नहीं रुडा, डेरे में बड़े लोगो की बाते सुनी मैंने, वो कभी झूठ नहीं बोलते

बिशाभर- क्या हो सकता है वो

सुनैना- तुम यकीन नहीं करोगे

रुडा- ऐसा भला या हो सकता है

सुनैना- सोना

सुनैना ने अपने चुन्नी का कोना खोला और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा हमारे सामने रख दिया. खालिस सोने का टुकड़ा. मेरी और बिशम्भर की आँखे बाहर ही आ गिरी थी. पर सवाल ये था की सोना कहाँ पर छिपा है और उसे कैसे बहार निकाला जा सकता है.

सुनैना- मैं लाऊंगी उस सोने को बाहर और अगर हम इसमें कामयाब हुए तो हम उस सोने को इस्तेमाल नहीं करेंगे. बस देखेंगे और वापिस रख देंगे.

हम दोनों ने उसकी हाँ में हां मिलाई वैसे भी हमें कोई कमी तो थी नहीं . और लालच का तो सवाल ही नहीं था . ढाई साल तक हम लोग दिन रात एक कर इस जंगल में भटकते रहे. इस बीच प्रेम का अंकुर फूट पड़ा . मैंने सुनैना से वादा किया की उसे अपनी बना कर ले जाऊंगा. एक रात घनघोर ठण्ड में ओस से भीगे हम लोग बस उसे ही देख रहे थे जो अपने टोने में खो सी गयी थी . और फिर हमने करिश्मा होते देखा. सुनैना ने एक गड्ढा खोदा. गड्ढा सुरंग में बदलता गया और जब वो सुरंग खत्म हुई तो आँखों ने सामने जो देखा , मानने से इनकार कर दिया. सोने का विशाल भंडार हमारी आंखो के ठीक सामने थे .

पर कहते है न की उस चीज का ख्याल नहीं करना चाहिए जो आपकी न हो. इतना सोना देख कर हम तीनो अपनी खाई उस कसम को भूल गए . हमने उस सोने के तीन हिस्से करके उस पर अपना अधिकार करना चाहा और जिन्दगी बदल गयी .................
 
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