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Incest XXX Kahani मेरे गाँव की नदी

निर्मला तु और कल्लु वो सामने की घास बची है उसे मिल कर काट लेना और उधर गट्ठर बना कर रख देना।

बाबा के जाने के बाद वह बिरजु आ गया और माँ के पैर छुता हुआ कहने लगा पाय लागूं बड़ी माँ।
निर्माला : क्यों रे बिरजु आज कल तो तू इधर का रास्ता ही भूल गया, कहा है तेरी माँ।
बीरजु : बड़ी माँ वहाँ खेत में है, संतोष चाची का खेत नदी के उस पार था और चूँकि नदी में पानी न के बराबर था इसलिए माँ ने गुड़िया से कहा चल गुडिया
तूझे चाची के खेत दिखा कर लाती हु और फिर माँ ने मेरी ओर देखते हुये कहा कल्लु मै अभी एक घंटे में आती हु तब तक तू वहाँ की घास काटना शुरू कर दे फिर मै भी आकर कटवाती हु और माँ गुड़िया के साथ जाने लगी।,
बीरजु बराबर गुड़िया के बोबो को देख रहा था और जब गुड़िया जाने लगी तो वह उसके चूतडो को घुरने लगा, मैंने बिरजु को देखा और जब मैंने गुड़िया के चूतडो
को देखा तो वह बहुत मटक रहे थे, लेकिन तभी मेरी नजर माँ के चूतडो पर पडी तो मुझे मजा आ गया माँ के चूतड़ गुड़िया से काफी बड़े और हैवी नजर आ रहे थे, जिन्हे देखते ही लंड अकड गया था।

कल्लु : क्यों रे आज कल दिन भर अपने खेतो में ही घुसा रहता है गांव में भी कम नजर आता है।
बीरजु : तुझे क्या करना है दादा मै घर में रहु या बाहर।
कालू : अच्छा बिरजु मैंने सुना है तू चुदाई की कहानी की किताब पढता है।
बीरजु : सकपकाते हुये, तुम ।।।।तुमसे किसने कह दिया, मै ऐसे काम नहीं करता हूँ।
कालू : झूठ न बोल मुझे सुख लाल ने सब बता दिया है जब तुम दोनों शहर गए थे और वह तुमने किताब ख़रीदी थी
बीरजु : अरे दादा तुम उसकी बात कहा मान गए वह तो पक्का मादरचोद है।
कालू : अच्छा सुख लाल तो तेरा दोस्त है ना।
बीरजु : अरे दोस्त तो है दादा लेकिन है पक्का मादरचोद।
कालू : वह भला क्यो।
बीरजु : अरे दादा एक दिन मै उसके घर गया तो उसकी माँ ऑंगन में नंगी होकर नहा रही थी और सुख लाल छूप कर अपनी माँ को पूरी नंगी देख रहा था और अपना लंड मुठिया रहा था।
कालू : इस हिसाब से तो तू भी पक्का मादरचोद है।
बीरजु : मुझे देख कर सकपकाते हुये, मै क्यों मादरचोद होने लगा।
कालू : अच्छा कल तो नदी के अंदर झाड़ियो के पास चाची के साथ क्या कर रहा था।

मेरी बात सुन कर बिरजु का गला सूखने लगा और वह हकलाने लगा और कहने लगा वो तो ।।।। वो तो दादा माँ के पांव में काँटा लगा था मै उसे ही निकाल रहा था।
कालू : झूठ न बोल तू समझता है मै कुछ जानता नही, मैंने सब देखा था की तो काँटा निकालने के बहाने क्या देख रहा था।
बीरजु : अपने माथे का पसीना पोछते हुये, नहीं तुम्हे धोखा हुआ है दादा मै कुछ नहीं देख रहा था मै तो बस माँ के पैर में लगे काँटे को निकाल रहा था।
 
कल्लु : अबे भोसडी के मुझसे नखरे न चोद, नहीं तो समझ लो मै कहा कहा ढिंढोरा पिटूंगा।
बीरजु : तुम गलत सोच रहे हो दादा।
कालू : ज्यादा होशियारी नहीं बेटा, खा जा अपनी माँ की कसम की तू चाची की मस्त फुली हुई चुत नहीं देख रहा था।
बीरजु : बिना कुछ बोले अपने मुह को निचे झुकाये खड़ा था।
कालू : अब क्यों बोलति बंद हो गई।
बीरजु : दादा मुझे माफ कर दो आगे से ऐसा नहीं करुँगा।
कालू : मुस्कुराते हुये, एक शर्त पर माफ़ कर सकता हूँ।
बीरजु : वह क्या।
कालू : तो मुझे वचन दे की आज से मै जो कहुंगा मेरी हर बात मानेगा।
बीरजु : मेरे पांव पकड़ते हुये, दादा तुम तो वैसे भी बड़े भाई हो, आज से यह बिरजु तुम्हरा दास हो गया पर दादा तुम यह बात किसी को नहीं बताओगे ना।
कालू : नहीं बताउंगा, लेकिन तुझे मेरा एक काम करवाना पडेगा।
बीरजु : कौन सा काम।
कालू : मुझे भी चाची की फुली हुई चुत देखना है।
बीरजु : लेकिन दादा यह सब मुझसे कैसे होगा वो तो उस दिन इतफ़ाक़ से मुझे माँ की चुत के दर्शन हो गये, नहीं तो माँ तो मुझे छोटा बच्चा ही समझती है।
और बापु तो शहर में नौकरी करता है और महिने भर में आता है और माँ अपनी चुत कभी कभी खुद ही रगड लेती है।

कल्लु : अच्चा यह बता तेरा मन भी होता है न अपनी माँ संतोष को नंगी करके चोदने का।
बीरजु : मुस्कुराते हुये, अरे दादा मन होने से माँ चोदने को थोड़े ही मिल जयेगी ।
कालू : अगर तू मेरी मदद कर दे तो मै तुझे तेरी माँ को चोदने की व्यवश्था कर सकता हूँ।
बीरजु : लेकिन कैसे।
कालू : कल दोपहर को मै तेरे खेतो में आउंगा तब वही बात करेगे लेकिन यह बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिये।
बीरजु : ठीक है दादा लेकिन तुम भी वह नदी वाली बात किसी से न कहना।
कालू : हाँ ठीक है चल अब तो यहाँ से कट ले कल मिलेगे उसके जाने के बाद मै खेतो में जमी घास काटने लगा और उधर माँ और गीतिका चाची के खेतो की ओर पहुच गई थी।
 
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rakesh bhai....................

kahani bahut badhiya chal rahi hai

keep it up
 
संतोष चाची : और सुनाओ दीदी तुम्हे तो आजकल मेरे पास बेठने की भी फुर्सत नहीं है।
निर्माला : नहीं रे ऐसी बात नहीं है, बस काम में ही लगी रहती हूँ।
संतोष : गीतिका को सामने टहलते हुए उसके मोटे मोटे लहराते चूतडो को देख कर, क्यों दीदी अब तो गीतिका भी बड़ी हो गई है, इसकी शादी वादी के बारे मे
सोचा है की नही।
निर्माला : अरे अभी तो वह और आगे पढना चाहती है कहती है अभी तो मै छोटी हूँ।
सन्तोष : अरे कहा छोटी है उसके चूतडो का उठाव तो देख, इसकी उम्र में तुम और मै तो बच्चे जन चुकी थी और वह कहती है की छोटी है, अच्छा तुम ही
बाताओ अभी बुढों के सामने नंगी करके खड़ी कर दो तो उनका लंड खड़ा हो जाए।
निर्माला : चुप कर रंडी, अभी वो सुन लेगी तो क्या सोचेगी।
संतोष : अरे दीदी सुन लेगी तो कुछ न सोचेगी, आज कल तो लड़किया आपस में यही सब बाते करती ही है, और सुनाओ जब से भैया ने तुम्हे चोदना बंद किया है तब से तुम कुछ ज्यादा ही गदरा गई हो, अब तो चलने पर भी तुम्हारे चूतड़ खूब मटकने लगे है।
निर्मला : तू भी तो लंड के लिए तरसती रहती है, तेरा आदमी भी तो शहर में ही पड़ा रहता है, इसीलिए तुझे दिन रात यह सब बाते ही सूझती है।
संतोष: अरे दीदी, सुबह से घाघरे से चुत का पानी पोछना शुरू करती हु तो घाघरा पूरा गीला हो जाता है, कई बार तो बिरजु भी कहने लगता है, माँ तेरा घघरा
कहा से गीला हो गया।
निर्माला : लो तो अब हालत इतनी ख़राब है की बेटा खुद माँ को बता रहा है की तेरे चुत से रस बह बह कर तेरे घाघरे को गीला कर रहा है, कही तेरे घाघरे की
गंध सूँघ कर तेरा बेटा समझ न जाये की यह पानी तो उसकी अपनी माँ की फुली चुत से रह रह कर रिस रहा है।

संतोष : अरे दीदी आज कल के लोंडो का कोई भरोषा नहीं हम उन्हें बच्चा समझते है और वह हमें नंगी करके चोदने का सोचने लगते है।
निर्माला : ऐसा क्या हो गया।
संतोष : अरे क्या बताऊ दीदी कल नदी पार करते हुए मेरे पेरो में काँटा लग गया तब मैंने बिरजु से कहा बेटा देख जरा काँटा कहा लगा है तो उसने मेरी टाँगो
को उठा कर देखना शुरू किया और फिर मैंने उसे ध्यान से देखा तो मुआ मेरे घाघरे के अंदर से मेरी चुत देखने की कोशिश कर रहा था।
निरमला : तूने कुछ कहा नही।
संतोष : मैंने कहा क्या कर रहा है जल्दी निकाल, तो कहने लगा माँ निकाल तो रहा हु बहुत गहरा लगा है थोड़ा पैर और ऊपर उठाओ, मुझे तो लगता है उसने मेरी पुरी फटी हुई चुत को खूब अच्छे से देखा है।
निर्माला : वह तो मस्त हो गया होगा तेरी फुली चुत देख कर।
संतोष : हाँ दीदी वह तो मेरा पैर छोड़ ही नहीं रहा था और मेरी टांगो को कस कर पकडे हुए ऊपर उठा रहा था।
निर्माला : तेरा बेटा अब जवान हो गया है उसे भी चोदने का मन करता होगा अब उसके लिए लुगाई का बंदोबस्त कर ले नहीं तो वह कही तुझे ही न छोड़ दे,
यह कहते हुए निर्मला हँस पडी।
संतोष : हसो मत दीदी, जिसके घर खुद शीशे के होते है उसे दूसरो के घरो में पथ्थर नहीं फ़ेकना चहिये।
निर्माला : क्या मतलब।
संतोष : मतलब की केवल मेरे ही घर जवान बेटा नहीं है, तुम्हारे भी एक जवान बेटा है और वह तो और भी मुस्टंडा हो गया है, कही ऐसा न हो की तुम मुझ पर हसो और वह तुम्हे ही चोद दे।
निर्माला : नहीं मेरा बेटा बड़ा भोला है वह ऐसी नजरे मुझ पर डाल ही नहीं सकता।
संतोष : अरे दीदी ऐसे भोले ही तो ज्यादा खुराफ़ाती होते है, कभी गौर करना अपने बेटे की नज़रो पर, जरुर तुम्हारे चूतडो को घूरता होगा।
 
निर्माला : चुप कर गीतिका आ रही है।
गीतिका : कहो चाची कैसी हो।
संतोष : मै तो ठीक हु गीतिका तू बता जब से शहर पढने गई है अपनी चाची को तो भूल ही गई।
गीतिका : अरे चची भूली होती तो माँ को ले कर यहाँ क्यों आती, अब तो कभी आप आ जाओ तो आपको शहर घुमा देति हूँ।
सन्तोष : अरे बिटिया अपने ऐसे भाग्य कहा, तेरे चाचा रहते तो है पर मुझे ले जाने की उनको फुर्सत कहा है।
गीतिका : अरे वो नहीं ले जाते तो क्या हुआ आप ही चलो मेरे साथ।
संतोष : देख कभी मोका लगा तो जरुर चलुंगि।
निर्माला : चल संतोष अब मै चलती हु बड़ा काम पड़ा है और कल्लु अकेले लगा होगा आज तो उसके बाबा की भी तबियत ठीक नहीं लग रही थी तो वह भी घर
चले गए है।

थोड़ी देर बाद माँ वहाँ से वापस आ गई और फिर गुड़िया आराम से खटिया पर लेट गई और माँ अपनी गुदाज मोटी गाण्ड मेरे मुह की ओर करके निचे बेठी और घास काटने लगी।
थोड़ी देर बाद घास काटते काटते हम दोनों एक दूसरे के सामने आ गए तभी मेरी नजर माँ की दोनों जांघो की गैप में पड़ी तो मेरी आँखे खुली रह गई, मेरी माँ की मस्त फुली हुई चिकनी चुत अपनी फांके
फैलाये मेरी और देख रही थी, माँ की भोसडी पर एक भी बाल नहीं था और बहुत चिकनी लग रही थी, उसकी चुत की फाँके बहुत फुली हुई नजर आ रही थी, और माँ का ध्यान जमीन पर घास काटने में लगा हुआ था।

मा की मस्त बुर देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया था और धोती में बड़ा भारी तम्बू बनाये हुए था, मै टक टकी लगा कर माँ की मस्त चुत देख रहा था, घास
काटते हुए माँ जब बैठे बैठे आगे बढ़ती तो उसकी फुली चुत की फाँके और भी खुल जाती और माँ की चुत का गुलाबी रसीला छेद भी नजर आ रहा था, तभी माँ ने मुझे अपनी मस्त चूत को घुरते हुए देख लिया और पहले तो माँ ने ध्यान नहीं दिया फिर जब उसे मेरे लंड का तम्बू नजर आया तो उसकी नजरे मेरी नज़रो से मिली और मा मंद मंद मुस्कुराते हुए दूसरी ओर घुम गई और घास काटने लगी, मेरा लंड अकड़ा जा रहा था और मैंने अपने लंड को धोती के ऊपर से मसलते हुए माँ की चूत की कल्पना करने लगा।
 
निर्माला : मन ही मन में मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन झुका कर अपनी फटी चुत और उसकी फुली फाँको को देखति हुई, सोचने लागि, बाप रे कल्लु का लंड कितना मोटा और बडा लग रहा है, कैसे मेरी भोस को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, उसका लंड मेरी भोस को देख कर कैसे किसी डण्डे की तरह खड़ा हो गया था, संतोष सच ही कहती है आज कल के लड़को का कोई भरोषा नहीं है।

पर मेरी बुर क्यों फूल रही है, और निर्मला ने अपनी बुर को हाथ लगा कर देखा तो उसके हाथ में पानी आ गया, उसके अपनी बुर को रगडा और फिर कुछ सोच कर, खड़ी हो गई और कल्लो की ओर देख, और उसकी नजर कल्लु के तने हुए लंड पर पडी, तो वह सोचने लगी हाय राम यह तो और भी बड़ा हो गया, कितना मस्त लंड है कल्लु का।

निर्माला : बेटे मै वहा का गठ्ठर इसमें मिला देती हु तू यही बैठ कर बांध लेना और निर्मला अपने भारी चूतडो को मटकाते हुए जाने लगी, उसकी घुटनो तक के घाघरे में उसकी गोरी पिण्डलिया और मोटी जांघो की झलक दिखाई दे रही थी, और वह यह देखना चाहती थी की कल्लु उसके भारी चौड़े चौड़े चूतडो को देखता है की नही, जब उसने पीछे मुड कर देखा
तो कल्लु अपनी माँ की मोटी लहराती गाण्ड को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, और निर्मला की साँसे तेज चलने लगी, निर्मला गठ्ठर लेकर वापस कल्लु की ओर आने लगी और उसकी निगाहें कल्लु के मोटे लोडे पर ही थी।

निर्माला को तभी संतोष की काँटा लगने वाली बात याद आ गई और निर्मला को यह भी याद आया की कैसे संतोष का बेटा काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की
गुलाबी रसीली बुर को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, क्या सोच रहा होगा बिरजु अपनी गदराई माँ की मस्त चुत देख कर, जरुर उसका मन अपनी माँ की चुत में मुह डाल कर चुस्ने का कर रहा होगा।
या फिर वह अपनी माँ की फुली हुई चुत देख कर अपने मोटे लंड को ड़ालने के बारे में सोच रहा होग, पर यह सब मै क्यों सोच रही ह, मेरी चुत इतनी क्यों मस्त हो रही है।
 
निर्माला : आह बड़ा दर्द हुआ रे।
कालू : ज्यादा मोटा था ना।
निर्माला : मंद मंद मुस्कुराते हुये, हाय रे बहुत ही मोटा था क्या।

उस दिन पूरा दिन मेरे सामने माँ के मोटे मोटे चूतड़ और मस्त फुली चुत ही घूमते रहा, अगले दिन गुड़िया जाने को तैयार हो गई।
कालू : गुड़िया अब कब आयेगि।
गीतिका : भैया अब तो जल्दी ही आउंगी और कुछ दिनों की छुटटी लेकर आउंगी, मैंने गीतिका को साईकल पर बेठा लिया और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे लंड से सट गई फिर साईकल चलाते हुये मै उससे बाते करने लगा, और फिर बस स्टैंड आ गया और गुड़िया एक दम से मेरे सिने से लग गई, आज पहली बार मुझे गीतिका के मोटे मोटे कसे हुए दूध का मस्त सा
एहसास हुआ क्योंकि गीतिका ने अपनी छातिया बहुत जोरो से मेरे सिने से चिपका ली थी, मैंने भी गुड़िया के गालो को चुमते हुए एक बार उसके भारी चूतडो में हाथ फेर दिया।
गुडिया : भैया मुझे आपकी सबसे ज्यादा याद आती है, मै आपको बहुत मिस करुँगी।
कालू : मुझे भी तेरे बिना अच्छा नहीं लगता तो जल्दी से एक लम्बी छुटटी लेकर आजा फिर हम खूब मजे करेगे।
गुड़िया : रोते हुए ओके भेया।
कालू : जरा एक बार मुसकुराकर कर बोल।
गुडिया : मुस्कुराते हुए बाय भैया आई लव यु, उसके बाद बस चल दी और कल्लु बुझे बुझे मन से वापस गांव की और साईकल मोड़ देता है।

होस्टल में मोनिका टी वी देख रही थी और फिर गीतिका आ गई गीतिका को देख कर मोनिका उससे चिपक गई।
मोनिका : क्यों परी क्या विचार है, अपना रसीला जूस पिलाओगी।
गीतिका : रुक जा पहले मुझे चेंज तो कर लेने दे।
मोनिका : गीतिका का हाथ पकड़ कर बेड पर खीचते हुये, मेरी जान तू तो मुझे नंगी ही अछि लगती है।
गीतिका : पहले मुझे वो निग्रो वाली मूवी तो दिखा।
मोनिका : लगता है तो भी बड़ी चुदासी है अपने गांव में किसी का तगड़ा लंड ले लेती ना।
गीतिका : यार मोका ही नहीं लगा नहीं तो लंड तो बहुत है।
मोनिका : वो देख उस निग्रो के मोटे और काला लंड की बात कर रही थी मैं।
गीतिका : हाय क्या मस्त लंड है, कितना मोटा है।
मोनिका : क्या बात है आज तेरी चुत पहले से ही पानी छोड़ रही है।
गीतिका : अरे मेरी चुत तो 4 दिन पहले से ही पानी छोड़ रही है।
मोनिका : क्यों ऐसा क्या हो गया।
गीतिका : अरे इस बार गांव में आम खाने में बड़ा मजा आया, मै अपने भैया के ऊपर चढ़ कर आम तोड़ रही थी और भैया मुझे अपनी गोद में उठाये खड़े थे।
मोनिका : क्या बात कर रही है, फिर तो तेरे भैया ने तुझे खूब मसला और दबोचा होगा।
गीतिका : हाँ पर मै भी जानबूझ कर घाघरे के निचे पेंटी पहन कर नहीं गई थी मै पहले से ही भैया के साथ घाघरे के निचे नंगी जाने को रेड्डी हो गई।
मोनिका : ऐसा क्योँ।
गीतिका : मैंने भैया की एक किताब देखी जिस्मे भाई और बहन की चुदाई की कहानिया लिखी थी बस मैंने वह पढ़ी और मुझे भैया की नीयत का अन्दाजा हो गया।
मोनिका : तेरा मतलब यह है की तुझे ऐसा लगता है जैसे तेरे भैया तुझे चोदना चाहते हो।
गीतिका : हाँ और फिर जब मै उनके ऊपर चढ़ी तो कई बात तो मैंने अपनी चुत भी उनके मुह से रगड दी।
 
मोनिका : तो तूने अपनी चुत मरवाया क्यों नही, वही आम के बगीचे में खूब तबियत से चुद लेती किसी को पता भी नहीं चलता।
जीतिका : नहीं यार भैया भाई बहन की चुदाई की किताबे पढ़ते है इससे यह पक्का तो नहीं होता न की वह मुझे अपनी बहन को ही चोदना चाहते है।
मोनिका : गीतिका के मोटे मोटे दूध दबाते हुये, अच्छा तो अगर मैडम के भैया उनको पूरी नंगी करके चोदना चाहे तो क्या आप चुद्वाओगि।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मै कैसे चुदवाऊंगी, भला कोई अपने सगे भाई से अपनी चुत मारवाता है क्या।,
मोनिका : अरे रंडी परी आज कल तो लोग अपने बाप से चुदवा लेते है वह तो फिर भी भाई है, और देखना जब तेरे भैया का लंड तेरी बुर में घुसेगा तो तुझे सबसे ज्यादा मजा आएगा।,
गीतिका : आह थोड़ा दाने को सहला न, कितना कस कस कर चोद रहा है वह काला।
मोनिका : अच्छा तूने लंड देखा है तेरे भैया का।
गीतिका : कपडे के उपर से देखा है बहुत बड़ा और मोटा नजर आता है, बिलकुल काला होगा।
मोनिका : मुस्कुरा कर यह कैसे कह सकती है।
गीतिका : मुस्कुराकार, उनके नाम पर गया होगा।
मोनिका : यार तू भी न इतना अच्छा मोका था तुझे चुद ही लेना था, बोल कब चुदेगी अपने भैया से।
गीतिका : तू ही बता यार मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।
मोनिका : अरे इसमें समझना क्या है कॉलेज से छुटटी मार और पहुच जा अपने गांव, घर में तबियत ख़राब का बहाना कर लेना और आराम से एक महिने खूब कस कर चुत मरवा लेना अपने भैया से।

गीतिका : नहीं यार अभी जाऊंगी तो ठीक नहीं रहेगा। कुछ समय बाद जॉउगी, ले अब तो चूस कर मुझे थोड़ी राहत तो दे, उसके बाद दोनों एक दूसरे की मस्त रसीली बुर को चुस्ती हुई सो गई।
करीब 2 महिने बीत चुके थे, और फिर बारिश शुरू हो गई और इस बार गीतिका एक लम्बी छुटटी लेकर चली वह अब मस्ती के मूड में थी, और फिर गीतिका बस से उतरी और सामने कल्लु को खड़ा देखा।
मुस्कराते हुए उसके सिने से लग गई, कल्लु ने भी अपनी बहन की गुदाज जवानी को अपनी बांहो में भर लिया और फिर गीतिका को साईकल पर बेठा कर गांव की ओर चल दिया।
 
कल्लु : गुड़िया इस बार तो जीन्स पहन कर नहीं आई।
गीतिका : मुस्कुरा कर क्यों आपको मै जीन्स में ज्यादा अच्छी लगती हु क्या।
कालू : हाँ वो तो है, वैसे तो सभी कपडो में मस्त दिखती है।
गीतिका : पर आपने पहले से सोच रखा होगा की गीतिका जीन्स पहन कर बस से उतरेगी।
कालू : मुस्कुराते हुये, हाँ पहले तुझे जीन्स में देखा था न बस इसिलिये।

धीरे धीरे हम गांव पहुच गए और फिर अगले दिन गीतिका भी मेरे साथ खेतो में चल दी, गीतिका मेरे साथ चल रही थी और उसने आज फिर घाघरा चोली पहना हुआ था, मै उसके गले में हाथ डाल कर चल रहा था और बीच बीच मै उसके मस्त उभरे हुए चूतडो को भी सहला देता था, खेत में पहुंचने के बाद गीतिका काफी खुश होते हुये कहने लगी भैया बारिश के बाद गांव में कितनी हरियाली हो जाती है, अब तो कही भी नरम नरम घास में बैठ जाओ।

गीतिका : भैया आम का मौसम इतनी जल्दी क्यों ख़तम हो गया।
कालू : अरे तो क्या साल भर आम लगे रहेगे।
गीतिका : भैया मुझे तो बोरियत हो रही है।
कालू : चल तुझे नदी की तरफ घुमा कर लाता हूँ।
गीतिका : खुश होते हुए हाँ भैया चलो आप मुझे तैरना सीखाने वाले थे ना।
कालू : अरे ऐसे घाघरा चोली में तुझसे तैरते नहीं बनेगा कल दूसरे कपडे पहन कर आना फिर तुझे तैरना सीखा दुँगा।

गीतिका : अच्छा ठीक है, मै खुद भी घबरा रही थी की कही भैया अभी मुझे घाघरा उतार कर तैरने के लिए न कहने लगे नहीं तो उनसे क्या कहूँगी की मै अंदर चडडी
पहन कर नहीं आई हूँ।

तभी सामने से बिरजु आ गया और
बीरजु : अरे गीतिका दीदी तुम्हे मेरी माँ बुला रही है, वह नदी किनारे कपडे धो रही है जाओ चली जाओ।
उसकी बात सुन कर गीतिका मेरी ओर देखने लगी तब मैंने कहा गुड़िया जा चलि जा मै थोड़ी देर में आता हूँ। मेरे कहने पर गुड़िया वहाँ से जाने लगी और उसके चूतडो को बिरजु घुरते हये उसके पीछे पीछे जाने लगा।
कालू : ये बिरजु रुक तू कहा जा रहा है।
बीरजु : अरे दादा हमें भी नहाना है नदी किनारे माँ कपडे धो रही है हम तो सिर्फ गीतिका दीदी को बुलाने आये थे माँ पूछ रही थी।
कालू : अरे नहा लेना पहले तू मेरी बात तो सुन आ बैठ यहॉ, बिरजु मेरे बगल मै बैठ गया और मैंने उसके काँधे पर हाथ फेरते हुए कहा, अच्छा बिरजु यह बता कभी तूने चाची को मुतते हुए देखा है या नहि।
बीरजु : देखा है भेया।
कालू : कैसी है तेरी माँ की चूत, बड़ी मोटी धार के साथ मुतति होगि।
बीरजु : अरे भैया माँ की चुत तो बहुत मस्त और बिलकुल चौड़ी और गुलाबी है जब मुतती है तो बड़ी मोटी धार निकलती है लेकिन भैया।
कालू : अबे लेकिन क्या बे।
बीरजु : दादा माँ से भी ज्यादा बड़ी और मस्त फुल्ली हुई चुत है बड़ी माँ की और जब वह मुतती है तो उनकी चुत से पेशाब की धार इतनी मोटी निकलती है की क्या बताऊ।
कालू : अबे हरामि तूने कब देख ली मेरी माँ की चूत।
बीरजु : वो दादा जब बड़ी माँ और माँ दोनों खेत में बैठ कर बाते करती है तब उन्हें पेशाब लगती है तो झोपडी के पीछे जाकर मुतती है और बस मै झोपडी के अंदर से छूप कर उनकी मस्त चुत के दर्शन कर लेता हु।
कालू : तू तो बड़ा हरामि है साले, फिर क्या करता है चुत देख कर।
बीरजु : दादा वाही खड़ा होकर मुट्ठ मार लेता हु बड़ा मजा आता है।
कालू : यार मुझे भी अपनी माँ की चुत के दर्शन करवा दे।
बीरजु : क्यों बड़ी माँ की चुत नहीं देखना चाहोगे, बड़ी माँ तो और भी ज्यादा मस्त माल है, मैंने तो बड़ी माँ और माँ के मोटे मोटे चूतडो को भी पूरा नंगा देखा है, सच दादा अगर तुम बड़ी माँ को नंगी देख लो
तो तुम्हारा लंड पानी छोड़ देगा।
 
कल्लु : नहीं ऐसी बात नहीं है, मेरी निगाहें चाची की मोटी चिकनी जांघो से हट ही नहीं रही थी और चाची मेरी नज़रो को ताड गई थी
चाची : आ बैठ मेरे पास मै जरा हाथ पैर धो लु बड़ी जलन हो रही थी पेरो में और फिर चाची ने अपनी जांघो को सहलाते हुए पानी डालना शुरू किया।
चाची : पानी बड़ा मस्त है कल्लु पियेगा, चाची ने मेरी ओर कातिल निगाहें मारते हुए कहा।
कालू : चाची की जवानी को ऊपर से निचे तक घुरते हुये, हाँ चाची प्यास तो मुझे भी लगी है पीला दो पानी।

चाची एक पत्थर पर बैठी थी और उसके सामने एक गड्ढ़ा था जिस्मे पानी इकठ्ठा होता था। चाची ने पानी की नली पकड़ कर मुझे सामने आने को कहा और उस पत्थर पर ऐसे बैठ गई जैसे मुतने बेठती है।
जब मै सामने आकर बेठा और अपने मुह को झुका कर पानी पिने लगा तब चाची की जांघो की जडो में मेरी नजर गई और मेरी साँसे वही थम गई चाची का मस्त फुला हुआ भोस देख कर मेरा लंड झटके देने लगा मेरी पानी पिने की रफ़्तार धीमी हो गई और मै चाची की फुल्ली हुई फाँके और फ़ाँको के बीच के गहरे कटाव को देख कर मस्त हो गया।

चाची : मुस्कुराते हुए कहने लगी तू तो बड़ा प्यासा है कालू, लगता है सारा पानी पी जाएगा।
कालू : क्या करू चची गर्मी भी तो इतनी है।
चेची : आराम से पी ले कल्लु तेरी चाची की टूबवेल का पानी बड़ा मीठा है।
पानी पिने के बाद मै वही बैठा रहा और चाची की मस्त चुत को देखता रहा।
चाची : और बता मैंने सुना है आज कल तो दिन भर गीतिका तेरे ही आगे पीछे घुमति रहती है।
कालू : हाँ वो तो है आखिर इतने दिनों बाद जो मिलति है मेरी गुडिया।
चेची : लगता है बहुत चाहता है अपनी बहना परी को लेकिन जब वह शादी करके चलि जायेगी तब क्या करेंगा।
कालू : अरे चाची अभी तो वह छोटी है कहा अभी से उसकी शादी कर रही हो।
चाची : अरे क्या बात करता है बेटा, इतनी भरी पूरी जवान तो हो गई है, साल भर पहले ब्याहि होती तो अभी उसकी गोद में बच्चा खेल रहा होता, कभी गौर से देखा नहीं क्या अपनी बहन को।
पुरी तेरी माँ पर गई है, तेरी माँ से कम न पडेगी।

कल्लु : लेकिन चाची माँ तो बहुत मोटी और भारी है, और गुड़िया तो कमसीन लड़की है।
चाची : अरे तेरी माँ शादी के बाद इतनी फैल गई है, अभी गीतिका को देखना जब वह अपने पति के पास से होकर आएगी तो उसका भी अंग अंग खूब फ़ैल जाएगा।

चाची की बाते सुन कर मेरा लंड खूब मस्त हो रहा था और चाची अपनी मस्त चुत फ़ैलाये मुझसे बाते कर रही थी।
चाची : वैसे पिछ्ली बार जब गुड़िया आई थी तब तूने उसे आम चुसाये थे की नहीं या फिर गुड़िया तुझसे केला खाने की जिद कर रही थी, यह बात बोल कर चाची हॅसने लगी, मै भी उनके साथ मुस्कुरा दिया।
कालू : नहीं चाची मैंने उसे खूब आम चुसाये थे, केला तो मैंने पूछा ही नहीं की उसे पसंद है की नही।
चाची : वैसे केला तेरी माँ को बहुत पसंद है, गुड़िया को भी केला खिलायेगा तो उसे भी पसंद आएगा, हर लड़की को केला बहुत पसंद होता है।
कालू : आपको भी केला बहुत पसंद है क्या।
चेची : हाँ रे केला खाने का बड़ा मन करता है लेकिन अब मुझे कौन केला खिलायेंगा।
कालू : मै हु न चाची मुझसे कहो मै केला खिलाऊँगा आपको।
चाची : अपनी जांघो को हिलाते हुये, अरे बेटा कल्लु मै तो तुझसे केला खाने के लिए कब से बेठी हूँ, पर तू अपनी चाची को क्यों खिलायेगा, तू तो लगता है बस अपनी माँ और बहन को ही केला खिलायेंगा।
कालू : अरे चाची मै आपको भी खिलाउंगा, किसी दिन मेरे साथ बाजार तक चलो।
चाची : तो ले चलेगा मुझे अपनी साईकल पर बेठा कर।
कालू : क्यों नहीं जब कहो तब चल देता हूँ। चाची मै जरा पेशाब करके आता हूँ।
चाची : कल्लु : वहाँ झोपडी के पीछे जा कर कर ले।

चाची ने झोपडी के पीछे जाकर मुझे मुतने को कहा तो मुझे कुछ अजीब लगा फिर मै झोपडी के पीछे चला गया और मुझे झोपडी के अंदर से परछाइ नजर आई तो मै समझ गया की चाची छूप कर मेरा लंड देखने वाली है।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाला वह पूरी तरह खड़ा था और खूब मोटा और काला नजर आ रहा था, उधर चाची ने जैसे ही मेरे खड़े लंड को और उसकी मोटाई और लम्बाई को देखा तो वह अपनी चुत को रगडते हुये गहरी साँसे लेने लगी, यह वही जगह थी जहा से बिरजु अपनी माँ और मेरी माँ को मुतते हुए देखता था, मै अपने लंड को खूब सहलाते हुए रगड रहा था और चाची अपनी चुत सहलाते हुए मेरे लंड को खा जाने वाली नज़रो से देख रही थी।
 
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