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Incest XXX Kahani मेरे गाँव की नदी

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Administrator
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अरे कल्लु कहा चल दिया सूरज सर पर है और तू है की बार बार नदी की तरफ जा रहा है सुबह से तीन दफ़ा जा चूका है।
आज क्या तेरा पेट ख़राब है।
मेरे बाबा ने मुझे खेत से नदी की और जाते हुए देख कर कहा।
मैंने कहा हाँ बाबा आज तो सुबह से पेट गड़बड़ हो रहा है क्या करू बार बार लग रही है।
बाबा ने हँसते हुए कहा जा जल्दी करके आ जा और जरा सोच समझ कर खाया कर फिर तो जब खाने को मिलता है तो तबियत से पेल लेता है और आगा पीछा कुछ नहीं सोचता।
मेरी गाण्ड फ़टी जा रही थी और बाबा था की लैक्चर मार रहा था मै जल्दी से नदी के पास पंहुचा और निचे उतरने लगा।
दरअसल हमारे खेत के पास की नदी गर्मियो में सुख जाती थी और उसमे इतना ही पानी बचता था की लोग अपनी गाण्ड धो सके, मै झाड़ियो के बीच जाकर अपनी धोती खोल कर बैठ गया तभी मुझे कुछ आवाज सी सुनाइ दी।

आवाज किसी औरत की थी, लेकिन आह बीरजु
क्या कर रहा है बेटा की आवाज सुनते ही मेरी तो टट्टी बंद हो गई मैंने जल्दी से अपनी गाण्ड धोइ और चुपके से झाड़ियो के पीछे जहा से आवाज आ रही थी उस तरफ बैठे बैठे ही आगे बढ़ने लगा।
मेरे रोंगटे तो बिरजु शब्द सुनते ही खड़े हो गये थे क्यों की मै उस औरत की आवाज पहचान चूका था वह मेरी चाची संतोष की आवाज थी और मेरे चचेरे भाई का नाम बिरजु था।
बीरजु से मेरी बिलकुल नहीं बनती थी वह मुझसे एक साल छोटा था, लेकिन था मेरा भाई ही पर उसका बाप शहर में पंचायत में नौकर था तो दोनों माँ बेटो के भाव कुछ ज्यादा ही था, घमण्ड सर चढ़ कर बोलता था, लेकिन वही मेरी माँ और चाची में काफी जमती थी, वैसे भी सुना जाता है की पहले माँ बहुत सीधी साधी थी लेकिन जब से चाची से मिली तब से काफी तेज तरार हो गई थी।
अब मै जरा अपने बारे में बता दू फिर कहानी की ओर चलते है।

मेरा नाम कल्लु है मै 20 साल का हु मेरे दादा जी मेरे लिए काफी जमीन छोड़ कर गए जिसमें हम बाप बेटे खेती करते है।
हल चलाते है, खेती किसानी के काम के चलते मेरा शरीर काफी बलिश्त और लम्बा है, मेरे पिता जी की दूसरी शादी हुई है पहली के मरने के बाद मेरे पिता जी ने मेरी माँ निर्मला से शादी कर ली, मेरे पिता जी 50 पार कर चुके है जबकि मेरी माँ उनसे बहुत छोटी केवल 38 साल की है याने मुझसे सिर्फ 18 साल ही बड़ी है, गांव में लड़कियो की शादी कम उम्र में ही हो जाया करती है इसलिए कम उम्र में ही माँ की शादी हो गई और 18 की उम्र में मै पैदा हो गया, मेरी माँ बहुत खूबसूरत और सेक्सी नजर आती है, मेरी एक छोटी बहन भी है 18 साल की जिसका नाम गीतिका है लेकिन प्यार से हम सब उसे गुड़िया भी कहते है, मेरे बाबा का बड़ा मन था उसे डॉक्टर बनाने का इस्लिये उनहोने उसे शहर भेज दिया था पढने के लिये, वह काफी सुन्दर और बिलकुल मेरी माँ के जैसी गदराई हुई और सेक्सी है।
वह पढने में बड़ी तेज है शहर में हॉस्टल में रह कर पढाई करती है और एक महिने में एक बार गांव जरुर आती है।

लेकिन अभी मेरी माँ की तो यह हालत है की उसको देख कर हर किसी का मन उसे चोदने का होता है यह बात मैंने गांव के लोगो की जो नजर मेरी माँ पर
पडती है उससे मैंने जाना। माँ बहुत गदरा गई है और उसके बदन पर चर्बी भी बढ़ गई है जिसके कारन उसका पेट काफी उभरा हुआ नजर आता है वह घाघरा भी नाभि के निचे ही पहनती है, हमारे यहाँ घाघरा और चोली पहनने का ही चलन है माँ का घाघरा घुटनो तक और बहुत घेरे वाला होता है, उनके चुचे और उनकी गाण्ड बहुत उठि हुई और मोटी है, उनकी गाण्ड देखते ही लौंडा खड़ा हो जाये इस बात की ग्यारंटी है, वह भी हमारे साथ खेतो में काम करती है।

हाँ तो जब मैंने देखा की आवाज पास की झाड़ियो के पीछे से आ रही है तब मै झाड़ियो के पास जाकर पीछे देखने लगा, लेकिन खोदा पहाड और निकली चुहिया वाली बात थी, संतोष चाची के पैर में कान्टा लगा हुआ था और उसका बेटा बिरजु उसके पैरो से काँटे
को निकाल रहा था संतोष चाची अपने दोनों हांथो को जमीन पर पीछे टेके हुए अपनी एक टाँग उठा कर अपने बेटे के मुह की ओर देख रही थी।
लेकिन मैंने देखा बिरजु का ध्यान काँटा निकालने की बजाय अपनी माँ के घाघरे के अंदर उसकी जांघो की जोडो की ओर देख रहा था।

संतोष : क्या हुआ मुये कितनी देर लगाएगा तुझसे एक कांटा भी नहीं निकाला जाता है, जल्दी कर मेरा पैर उठाये उठाये दर्द करने लगा है।
बीरजु : अरे माँ काँटा भी तो देखो कितनी बीच में घुसा है जरा चुप चाप बैठो निकाल रहा हु और अपने पैर न हिलाओ।
संतोष चाची आँखे बंद किये हुए अपने चहरे पर सारा दर्द समेटे आह ओहः कर रही थी और बिरजु था की अपनी माँ की बुर देखने की कोशिश कर रहा था, तभी बिरजु ने अपनी माँ की टाँगो को थोड़ा चौड़ा कर दिया और बिरजु तो बिरजू, संतोष चाची की चुत की फटी हुई फाँक
 
मुझे भी साफ नजर आ गई, वह दोनों नहीं जानते थे की मै बिरजू के जस्ट पीछे वाली झाडी के पीछे बेठा था, अब संतोष चाची की फुली हुई बड़ी बडी फांको वाली बुर साफ नजर आ रही थी, कुछ देर बाद बिरजु ने कहा ले माँ निकल गया तेरा काँटा और फिर संतोष चाची उठ गई और लंगड़ाते लंगडाते चलने लगी।
बिरजु उसके पीछे पीछे जाने लगा और मै चाची की घाघरे में उठि लहराती गाण्ड को देख कर मस्त हो रहा था, यह पहली दफ़ा था जब मैंने चाची की गुदाज
गाँड पर ध्यान दिया था।
चाची के जाने के बाद मै वहाँ से अपने खेतो में आ गया और अपने बाबा के साथ खेत के कामो में हाथ बटाने लगा।

बाबा : कल तो बेटा गीतिका आएगी तू बस स्टैंड जाकर उसे ले आना, मैंने कहा ठीक है बाबा, कुछ देर हमने काम किया उसके बाद दुर से हमें माँ आती हुई दिखाई दी।
मा खाना बना कर हमारे लिए लेकर रोज दोपहर तक आ जाती है, उसके बाद बाबा खाना खा कर फिर से खेती में लग जाता है और मुझे एक दो घंटे अपने खेत की झोपडी में आराम करने को कह देता है, माँ एक दो घंटे काम करती है और फिर वह भी झोपडी में आकर लेट जाती है, शाम को मै और माँ घर आ जाते है और अगले दिन फिर वही खेत किसानी का काम बस हमारी लाइफ ऐसे ही चल रही थी, अभी तक मेरा ध्यान औरतो पर कम ही रहता था लेकिन एक तो संतोष चाची की चुत जबसे मैंने देखा तब से मेरा लंड बहुत परेशान करने लगा था यही वजह थी की आज जब खेत से मै और माँ लौट रहे थे तो अनायास ही मेरी नजर अपनी माँ के बड़े बड़े मटकते गदराए चुतडो पर चलि गई जो की घाघरे में बहुत उछल रहे थे और समा नहीं रहे थे, सच बताऊ माँ को चलते हुए उसके मटकते भारी भरकम चूतडो को देखने पर चलते चलते ही मेरा लंड खड़ा हो गया था।

आज मुझे महसूस हुआ था की मेरी माँ को लोग गांव में क्यों घुरते रहते है और जब वह उनके सामने से अपनी भारी गाँड मटकाते हुए गुज़रती है तब लोग अपने लंड को क्यों मसलने लगते थे।

मा का घाघरा इतना छोटा था की उसके घुटने साफ नजर आते थे और अगर वह बैठती थी तो कई बार
उसकी मोटी मोटी गुदाज जाँघे भी नजर आ जाती थी, उस रात मै ठीक से सोया नहीं मुझे कही चाची की फुली हुई चुत और कभी माँ के लहराते हुए मोटे मोटे चूतड़ नजर आ जाते थे, मै यह भी सोचने लगा था की जब चाची की चुत इतनी फुली और बड़ी नजर आ रही थी तो माँ तो चाची से कई गुणा ज्यादा सुन्दर और तगडे बदन की है फिर उसकी चुत कितनी फुली हुई होगी, मेरे विचार अभी पनपे ही थे जिनमे किसी चिंगारी लगने के बाद उठते धुएं को आग देने का काम मेरी बहन गीतिका ने पूरा कर दिया और मै अपनी चाची माँ और बहन को चोदने के लिए तडपने लगा।

मै बस स्टैंड पर खड़ा शहर से आने वाली बस का इंतजार कर रहा था, तभी बस स्टैंड पर एक किताब बेचने वाला आया और मेरे पास आकर कहने लगा बाबू जी मेहँदी की बच्चो की और गानो की शायरी की बताइये कौन सी बुक लेना पसंद करेंगे, मैंने कहा कहानियो की बुक है, उसने कहा है बाबू जी अकबर बीरबल के चुटकुली, पुराणी दंतक कथाए,

पंचतन्त्र बोलो कौन सी दूँ, मैंने उससे धीरे से कहा चुदाई की कहानियो की किताब है क्या, तब उसने भी धीरे से कहा बाबूजी २० रु की आएगी, मैंने कहा कहानी मस्त है न उसने कहा बाबू जी एक बार पढोगे तो बार बार मुझसे लेकर जाओगे, मैंने उससे वह किताब ले ली और इतने में सामने से बस आ गई और मैंने वह किताब अपनी धोती में कमर पर खोस ली, तभी गीतिका बस से उतरी, मै तो उसे देखता ही रह गया, सच बताऊ गीतिका को ऊपर से निचे तक देखने भर से मेरा लंड खड़ा हो गया था, गीतिका तो बहुत मॉडर्न हो गई थी, उसके खुले हुए बाल होठो पर लिप्स्टीक, एक रेड कलर की टीशर्ट और टाइट जीन्स है क्या लग रही थी,
जब उसने अपनी गुदाज गाण्ड मेरी ओर की तो मै तो उसके जीन्स में न समा सकने वाले चौड़े सी भारी चूतडो को देख कर पागल हो गया और सच पुछो तो मेरे मन में उस समय यह आया की गीतिका की इतनी चौड़ी गाण्ड जीन्स में इतनी मस्त नजर आ रही है तो अगर यह जीन्स मेरी माँ पहने तो उसके चौड़े चूतड़ तो और भी बडे बड़े है जीन्स में माँ की मोटी गाण्ड कैसे नजर आएगी, मै अभी कुछ सोच ही रहा था की मुझे दुसरा झटका तब लगा जब गीतिका, एक दम से भैया कहती हुई मेरे सिने से लग गई मुझे और कुछ एह्सास तो नहीं हुआ पर मेरे सिने से जब उसकी एक झीनी सी टीशर्ट में कसे हुए मोटे मोटे दूध जब दबे तो ऐसा लगा जैसे मेंरा लंड पानी छोड़ देगा।
 
कल्लु : अरे गुड़िया इतना कह कर मैंने भी उसकी पीठ को और कस कर अपने सिने की ओर दबोचा और उसके मोटे मोटे मस्त दूध के मस्त एह्सास का खूब मजा लिया।
गीतिका अभी भी मुझसे चिपकी हुई थी इसलिए मैंने धीरे से उसकी मस्त गुदाज मोटी गाण्ड पर जीन्स के ऊपर से हाथ फेरा और क्या बताऊ उसके चूतडो के नरम माँस के उठाव ने मुझे पागल कर दिया दिल कर रहा था की अपनी बहन गीतिका के भारी चूतडो और उसके मोटे मोटे दूध को यही खूब कस कस कर दबा डालूं।
कुछ देर बाद गीतिका ने मुझे छोड़ा और कहने लगी अब चलिये भी या यही खड़े रहेगे।

कल्लु : अरे गुड़िया तू तो हर एक दो महिने में बढ़ने लगी है अभी पिछ्ली बार देखा था तो तो काफी छोटी थी और अब एक दम से जवान लड़की के जैसे लगने लगी है,
अगर तू साड़ी पहन कर आती तो मै तो तुझे पहचान ही नहीं पाता।
गीतिका : मुसकुराकर मुझे देखति हुई, भैया मै तो उतनी ही बड़ी हूँ, पर मुझे इस बार ऐसा लग रहा है जैसे आपका अपनी बहन को देखने का नजरिया बदल गया है।तभी तो आपको अपनी बहन बड़ी नजर आ रही है

कल्लु : पता नहीं गुड़िया पर तूने यह कैसे कपडे पहने है भला अपने गांव मै लड़किया ऐसे पेंट शर्ट में कहा रहती है, गांव के लोग कैसी कैसी बाते करने लगते है
गीतिका : मै जानती हु भैया तुम फिकर न करो चलो हम पहले उस सामने वाले काम्प्लेक्स में चलते है वहां मै ड्रेस चेंज कर लेती हु।
कालू : मै अपनी बहन की गुदाज जवानी को देखते हुए कहने लगा, वैसे गुड़िया तू मुझे तो इन कपडो मै अच्छी लग रही है, पर मै सोचता हु गांव घर में कोइ तूझसे कुछ कहे न इसलिए मै कह रहा था।

गीतिका : भैया आप नहीं भी कहते तो भी मै यह ड्रेस चेंज करके गांव जाती क्योंकि मै जानती हु गांव के लोगो को उन्हें बात का बतंगड बनाते देर नहीं लगती है,
पर मुझे यह जान कर अच्छा लगा की आपको मेरी यह ड्रेस अछि लगी है
कालू : अरे पगली तेरी ड्रेस तो ठीक है तू तो कुछ भी पहन लेगी तो अच्छी लगेगी, आखिर मेरी गुड़िया परी है जो इतनी खुबसुरत।
गीतिका : मुस्कुराते हुए चलिये अब इतना भी झूठ मत बोलिये।
कालू : नहीं गुड़िया मै सच कह रहा ह, मैंने तुझसे सुन्दर लड़की आज तक नहीं देखी।
गीतिका : अरे क्या भैया, आप कभी शहर में नहीं रहे हो न इसलिए ऐसी बाते करते हो कभी शहर की लड़कियो को देखते तो पागल हो जाते।

कल्लु : क्यों शहर में तुझसे भी सुन्दर लड़कियाँ रहती है।
गीतिका : लड़किया तो ठीक है भैया पर उनकी ड्रेस जब आप देख लोगे तो आपका तो बस।।।।।।।।।।यह कह कर गीतिका जोर जोर से हॅसने लगी।
कालू : क्या गोल मोल बाते कर रही है, साफ साफ बता ना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, बाद मै बताऊँगी अब चलो भी, उसके बाद गीतिका ने काम्प्लेक्स में जाकर कपडे बदले और अब वह एक येलो सलवार कमीज मे नजर आ रही थी।
 
गीतिका : मुस्कुराते हुये, अब कैसी लग रही हु भैया,
कालू : अच्छी लग रही हो।
गीतिका : अच्छा भैया मै आपको पहले ज्यादा अच्छी लग रही थी या अब।
कालू : मुस्कुराते हुए सच कहु तो तू जीन्स और टॉप में मुझे ज्यादा सुन्दर लग रही थी।
गीतिका : मै जानती हु भैया और गीतिका फिर मुस्कुराने लगी, कुछ भी कहो गीतिका इस बार और बार की अपेक्षा कुछ बदली हुई लग रही थी।
गीतिका : भैया अब तो यह खटारा साइकिल बेच दो और कोई बाइक का जुगाड़ करो।

कल्लु : अरे वह तो ठीक है पर यहाँ गाड़ी चलाना आती किसे है।
गीतिका : वह तो मै आपको सीखा दूंगी।

मैने साईकल के पीछे गुड़िया का बैग बांध दिया और फिर साईकल पर चढ़ कर उसे साईकल का डंडा दिखाते हुए कहा, आजा गुड़िया डण्डे पर बैठ जा
गीतिका मेरी बात सुन कर खिलखिला कर हँस पड़ी इस बार तो मै भी उसकी हँसी का मतलब समझ गया था, गीतिका का चेहरा कुछ लाल हो रहा था और वह साईकल के आंगे के डण्डे पर बैठ गई जब वह बेठी तो उसके मोटे मोटे चूतडो से मेरा लंड जो की खड़ा हो गया था टकराने लगा और मै एक दम से सिहर गया,
उपर से गीतिका के बदन से बहुत ही मस्त खुशबु आ रही थी, मै धीरे धीरे साइकिल चलाने लगा और गुड़िया से बात करने लगा।

कल्लु : गुड़िया इस बार कितने दिनों की छुट्टी पर आई है
गीतिका : भैया ८-१० दिन तो रहुँगी।
कालू : तेरी पढाई का क्या पुछु वह तो अच्छी ही चल रही होगी, आखिर तू इतनी होशियार तो है।
गीतिका : आखिर बहन किसकी हूँ।
कालू : अरे इसमें तेरे भैया का क्या बड़प्पन हुआ यह तो सब तेरी मेहनत का नतीजा है, पर यह तो मर्दो जैसे कपडे कब से पहनने लगी, क्या वह सब ऐसे ही कपडे
पहनती है।
गीतिका : भैया आज कल ऐसा ही जमाना है, सब या तो मिनी स्कर्ट या फिर जीन्स पहनती है।
कालू : मिनी स्कर्ट मतलब।
गीतिका : भैया जो स्कर्ट घटनो से भी ऊपर रहती है। उसे मिनी स्कर्ट कहते है।
कालू : तो क्या बड़ी उम्र की औरते भी जीन्स या वह मिनी स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भैया तुम देख लो तो कहोगे की कैसे यह औरते अपने भारी शरीर पर जीन्स पहन कर निकलती है।

कल्लु : क्या हमारी माँ जैसी औरते भी जीन्स या स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भइया, आज कल सब औरते ऐसे ही कपडे पहनती है।
कालू : तो गुड़िया उन्हें शर्म नहीं आती होगी, ऐसे कपडो में तो बड़ी उम्र की औरते न जाने कैसी दिखती होगी।
गीतिका : क्यों मै जीन्स में आपको अच्छी नहीं लग रही थी।
कालू : नहीं तू तो बहुत अच्छी लग रही थी।
गीतिका : तो फिर अब यह बताओ अगर वह जीन्स माँ पहनेगी तो क्या अच्छी नहीं लगेगी।

कल्लु : पता नही।
गीतिका : पता नहीं क्या अगर तुम माँ को जीन्स और टीशर्ट में देख लो तो तुम तो उन पर मर मिटोगे।
कालू : मतलब।
गीतिका : ओह भैया आप भी न बहुत भोले हो यही नुकसान है गांव में रहने के, अरे बाबा माँ जब यह कपडे पहनेगी तो बहुत सेक्सी नजर आएगी।
अच्छे अच्छे पागल हो जाएगे उन्हें देख कर।
कालू : ये सेक्सी का क्या मतलब होता है गुडिया, मै जानता था लेकिन गीतिका मुझे कुछ ज्यादा ही भोला समझती थी लेकिन वह यह नहीं जानती थी की मेरा भी
एक दोस्त है गोपी जो शहर में रहता था और
वह मुझे नई नई बाते बताता रहता था, सेक्स की बाते भी उसने मुझे बताइ थी इसलिए मुझे उसका मतलब पता था, मै यह तो समझ गया था की गीतिका
जितनी दिखाई दे रही है वह उससे कही ज्यादा सेक्सी है पर इस बार उसमे कुछ ज्यादा ही बदलाव दिखाई दे रहा था।

गीतिका : मुस्कुराते हुये, भैया अब मै आपको सेक्स का मतलब कैसे बताऊ।
कालू : अरे बोलने वाली चीज न हो तो कर के दिखा दे मै समझ जाऊँगा
मेरी बात सुन कर गीतिका ठहाके लगा कर हॅसने लगी और कहने लगी भैया आप बहुत बुद्दू हो, आपको तो सच में कुछ भी नहीं पता, अगर यह बात
आप शहर में मेरे दोस्तों के सामने बोलते तो लोग आपका मजाक उड़ा उड़ा कर इतना हँसते की उनका पेट् दुखने लगता।
कालू : अरे हमने ऐसा क्या कह दिया, हमको अब उसका मतलब पता नहीं है तो हम क्या करे।
 
गीतिका : सच भैया आप भी ना।
कालू : अब हँसती ही रहोगी या हमें उसका मतलब भी बतायेगी।
गीतिका : हस्ते हुए भैया मै आपको बाद में उसका मतलब बताऊँगी, मै पगडण्डी से होता हुआ गांव के रास्ते पर पहुच गया। वहाँ आम का बगीचा था और पके हुए आम नजर आ रहे थे, तभी गीतिका ने इशारा करते हुए कहा भैया वो देखो कितना मस्त पका हुआ आम है प्लीज उसे तोड़ो ना।

कल्लु : मैंने साईकल रोकी और फिर गीतिका अपने भारी चूतडो को डण्डे से हटा कर उतर गई, मैंने साईकल खड़ी कर दी और उचक कर उस पके आम को तोड़ने लगा लेकिन वह मेरे हाथ से थोड़ा ऊपर था, मै बार बार ऊपर उचक कर उस आम को तोड़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन वह मेरे हाथ से टच होकर रह जाता था।
तभी गुड़िया ने कहा भैया ऐसे नहीं टूटेगा आप एक काम करो मुझे अपनी गोद में उठाओ मै तोड़ती ह, मैंने गीतिका की बात सुन कर उसे अपनी गोद में उठाया, गुड़िया की सलवार इतनी पतले कपडे की थी की मुझे तो ऐसा लगा जैसे मै गुड़िया को नंगी करके उठा रहा हूँ।

मैने गुड़िया की मोटी जांघो पर दोनों हाथो का
घेरा डाल कर उसे ऊपर उठाया, गुड़िया काफी हेल्दी हो गई थी 55 के जी के लगभग वजन होगा मेरे हाथ उसकी जांघो से गुजरते हुए जब गुड़िया के भारी चूतडो
पर पहुचे तो गुड़िया की जांघो और भारी चूतडो के गर्म मांस के एह्सास ने मुझे पागल कर दिया था मै गुड़िया को उठाये हुए उसके मोटे मोटे चूतडो को खूब कस कर दबोचे हुए था और मेरे लंड महराज धोती में टनटना चुके थे, मै गुड़िया के चूतडो को दबाये ऊपर देखने लगा तभी गुड़िया ने मुझे हँसते हुए देखा उसके हाथ में पका हुआ आम था और वह कहने लगी अब उतारो भी आम तो मैंने तोड़ लिया, मैंने धीरे से गुड़िया को छोडना चालु किया।
आउर गुड़िया मेरे बदन से रगड ख़ाति हुई निचे आई और मेरा लैंड गीतिका के चुत वाले हिस्से से रगड खाता गया, गुड़िया ने आम की ख़ुश्बू लेते हुए कह
वाह भैया क्या मस्त पका है।

गीतिका : आओ न भैया थोड़ी देर इस आम की छाया में बेठते है फिर चलते है, मै वही बैठ गया और गीतिका भी बैठ गई और आम के ऊपर के हिस्से को अपने
दान्तो से थोड़ा सा काट कर उसने आम को दबाया और उसका रस चुसते हुए कहने लगी।

गीतिका : वह भैया कितना रसीला और मीठा आम है, मेरी नजर गीतिका के रसीले होठो पर चलि गई और मै उसके रस भरे होठो को हसरत भरी निगाहॉ
से देखने लगा।
गीतिका : लो भैया तुम भी चुसो बड़ा मस्त टेस्ट है इसका।
मै आम चुसना तो नहीं चाहता था लेकिन गीतिका के रसिले होठो और उसकी गुलाबी जीभ को देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया और मैंने सोचा गीतिका का
जूठा आम चुसने का मेरा मन हो गया और मैंने भी गीतिका से आम लेकर चुसने लगा, गीतिका ने कहा भैया चीटिंग नहीं एक बार आप चुसो एक बार मैं।
बस फिर बारी बारी से गुड़िया और मै आम को चुसने लगे।
गीतिका : भैया गांव का माहौल बड़ा अच्छा लगता है यहाँ कितनी शांति है ऐसे में तो कोई कुछ भी करे कोई देखने वाला नहीं है।
कालू : मतलब।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मतलब की मुझे और आम चुसना है और तोड़ो न भैया और फिर गीतिका खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी और फिर उसने उछलते
हये एक आम दिखाया और उसे तोड़ने के लिए कहने लगी।

वाह आम भी ऊँचाई पर था और गीतिका ने मेरी ओर देखा और बड़ी स्टाइल में अपने हाथ ऊपर कर दिए की आओ और मुझे गोदी में उठाओ, मेरा लंड तो खड़ा ही था।
इस बार गुड़िया को मैंने पीछे से उठाया, लेकिन आम थोड़ा ऊपर था तब गुड़िया कहने लगी भैया थोड़ा और ऊपर उठाओ न, आप भी न इतने बालिश्त शरीर है आपका और आप अपनी कमसीन और नाजुक बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहे है।
 
मेरा इतना सुनना था की मैंने गुड़िया को ऊपर किया इस बार गुड़िया की मोटी गाँड बिलकुल मेरे मुह पर दबी थी और मै अपने मुह से गुड़िया के भारी चूतडो को महसूस कर रहा था, इतने में गुड़िया ने कहा भैया बस थोड़ा और उपर, गुडिया का इतना कहना था की मैंने गुड़िया की गाण्ड में हाथ भर कर उसे और ऊपर उठा दिया, मेरा लंड झटके मारने लगा मेरा हाथ गुड़िया की मस्त उभरी हुई चूत और गाण्ड की जडो में फसा हुआ था।

उसकी भरी गदराई जवानी ऐसी थी मनो मैंने किसी बड़ी औरत को ऊपर उठा रखा हो, कुल मिला कर यह था की गीतिका एक मस्त पका हुआ माल हो चुकी थी जिसे अब चुसना बहुत जरुरी हो गया था, मैंने गीतिका के चूतडो और चुत को इस दौरान अपने हाथो से दबा कर देख लिया था, तभी गीतिका ने आम तोड़ लिया और मैं उसे धीरे से निचे उतारने लगा लेकिन वह एक दम से निचे सरक गई और मेरे दोनों हाथो में गुड़िया के सुडौल खूब मोटे मोटे और कसे हुये
मस्त दूध दब गए और तब मुझे एह्सास हुआ की गीतिका के मस्त बड़े बड़े आम खूब मोटे मोटे और खूब कसे हुए है जब मेरा हाथ अपनी बहन के पके
आमो पर पड़ा तो मुझे एक अजीब सा आननद आया और गीतिका मजे से आम चुसने लगी।

वह बीच बीच में मुझे भी आम चुस्ने को दे देति थी।
कुछ देर हम वही आम खाते रहे और फिर गुड़िया को मैंने साईकल पर बैठा लिया और गांव की ओर चल दिया।

हम जब घर पहुचे तो गुड़िया माँ से लिपट गई और फिर मै वहाँ से खेतो में चला गया कुछ देर बाबा के साथ काम किया।
उसके बाद मैं झोपड़ी में चला गया और बाबा खेतो में काम में लगे रहे वहाँ जाकर मैंने अपनी धोती से किताब निकाल कर पढना शुरू किया।
जब मैंने पहली कहानी पढ़ी तो पहली कहानी ही अपनी सगी बहन को चोदने की थी जिसे पढ़ कर मै मस्त हो रहा था, लेकिन किताबे तो मै बहुत बार पढ चूका था पर इस बार मुझे बार बार गुड़िया ही याद आ रही थी गुड़िया की गदराई जवानी रह रह कर मेरे लंड को खड़ा कर रही थी।
कहानी पढने के बाद मै थोड़ी देर लेट गया
शाम को घर पर जब मै पंहुचा अभी मै दरवाजे के बाहर ही था दरवाजे से एक रास्ता घर के अंदर और दुसरा पास के बाथरूम में जाता था।
बाथरूम ऐसा था की उसमे दरवाजा नहीं था और वह तीन तरफ लकड़ी के पटिये लगा कर बनाया गया था।

निर्माला : अरे गीतिका जल्दी नहा ले खाना बन गया है।
गीतिका : बस माँ आती हूँ।

मै समझ गया की गुड़िया बाथरूम में नहा रही है, मेरे मन में गीतिका को नंगी देखने का ख़याल आ गया, जबकि इससे पहले भी उस बाथरूम में माँ या गीतिका
नहाती रही है पर पहले ऐसा ख़याल नहीं आया, मै धीरे से बाथरूम के पीछे की तरफ चला गया और जैसे ही मैंने लकड़ी के गैप से झाँका ।
क्या बताऊ सीधे मेरी आँखों के सामने गुडिया के मोटे मोटे गोरे गोरे चूतड़ थे और क्या उठे हुए और क्या मस्त गांड थी उसकी गाण्ड की दरार में मेरा लंड तो पूरी तबियत से खड़ा हो गया।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाल कर मसलते हुए गीतिका को देखना शुरू किया गीतिका जब भी थोड़ा झुकती तो उसकी फुली चुत की फाँके पीछे से नजर आ जाती और मेरा लंड उसकी फांको
को और फाडने के लिये मचलने लगता था तभी गीतिका मेरी और मुह करके घुम गई और जब मैंने उसके मस्त बड़े बड़े कलमी आमो को देखा तो ऐसा लगा की यह कठोर आम मुझे निचोडने के लिए मिल जाये तो मजा आ जाए, फिर गुड़िया जल्दी जल्दी अपने नंगे बदन पर पानी ड़ालने लगी, उसकी चुत के ऊपर हलके हलके बाल नजर आ रहे थे और चुत का उभार मुझे बहुत उत्तेजित कर रहा था।

कुछ देर में गीतिका ने एक लाल रंग की पेंटी पहन ली और ऊपर उसने ब्रा नहीं पहनी बल्कि एक ब्लू कलर की टी शर्ट पहन लिया और निचे एक टाइट लेगी पहन ली।
उसकी मोटी मोटी जाँघे लेगी में बड़ी मुश्किल से समां रही थी और उसके चुतड़ तो लेगी में और भी चोदने लायक नजर आ रहे थे, गीतिका ने अपनी उत्तरी हुई ब्रा और पेंटी वही छोड़ कर बाथरूम से बाहर आई और घर के अंदर घुस गई।
मै कुछ देर बाद घर के अंदर गया तब माँ खाना बना रही थी और गीतिका बैठ कर खा रही थी, मुझे देखते ही माँ ने कहा कल्लु आजा तू भी हाथ मुह धो कर खा ले।

मैने भी खाना खा लिया उसके बाद बाबा आ गए और माँ उन्हें खाना देने लगी ।
गर्मी ज्यादा थी मै बहार खटिया डाल कर लेता हुआ था और गीतिका माँ और बाबा के पास बेठी थी, मै आँखे बंद किये लेटा था तभी पायल की आवाज सुनाइ दी छन छन छ्न छ्न।
मैंने धीरे से आँखे खोल कर देखा। माँ बाथरूम की तरफ जा रही थी।
 
मेरा लंड माँ के भारी उठे हुए चूतडो की मतवाली थिरकन देख कर खड़ा हो गया और मै चुपके से बाथरूम के पीछे चला गया, माँ के भरे चूतङ मेरी तरफ थे तभी माँ ने अपने घाघरे को ऊपर चढ़ाया और जब मैंने माँ के चौड़े चौड़े मस्त चूतडो को देखा तो लगा पानी निकल जाएगा।
आज पहली बार मैंने माँ के गोरे गोरे चौड़े चौड़े चूतडो के दर्शन किये थे, माँ वही मुतने बैठ गई और रात के सन्नाटे में मुतने की तेज आवाज ने मुझे पागल कर दिया, माँ काफी देर तक मुतती रही फिर खड़ी होकर अपने घाघरे से चुत पोछती हुई बाहर आ गई।

मै वापस खटिया पर जाकर लेट गया, थोड़ी देर बाद गीतिका मेरे बगल में आकर बैठ गई और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे कमर से टच होने लगी।
गीतिका : क्या भैया सो गए क्या।
कालू : अरे नहीं अभी कहा नींद आएगी, और बता तुझे तो शहर में अच्छा लगता होगा।
गीतिका : हाँ भैया बड़ा मजा आता है काश आप भी मेरे कॉलेज में होते तो मस्त मजा आता।

कल्लु : हाँ मजा तो आता लेकिन गांव में खेती का काम भी तो सम्भालना पड़ता है। इसीलिए तो मै पढने नहीं गया।
गीतिका : भैया रात को आप बाहर यही खटिया पर ही सोते हो क्या।
कालू : हाँ गर्मी में बाहर ठण्डी हवा में सोने का मजा ही कुछ और है।
गीतिका : भैया मै भी यही सो जाउ।
कालू : नहीं तू अंदर ही सो बाबा ग़ुस्सा होंगे, तभी गीतिका के मोबाइल पर कोई फ़ोन आया और वह बातें करने लगी और मै उसकी बात सुनने लगा।

गीतिका : हेलो
मोनिका : क्यों राजकुमारी पहुच गई अपने गाँव।
गेटिका : हाँ यार बड़ा मस्त माहौल है गांव में बड़ी सुहानी हवा चल रही है।
मोनिका : क्या यार तू वहाँ चलि गई यहाँ अब मुझे अकेले ही टाइम पास करना पड़ रहा है, आज एक मस्त डीवीडी ले कर आई हूँ, एक निग्रो एक गोरी को मस्त चोद रहा है।
उस निग्रो का लंड तो बड़ा मस्त है।
गीतिका : अरे यार अभी नहीं बाद में बात करते है।
मोनिका : क्यों क्या हुआ।
गीतिका : मै भैया के पास बेठी हूँ।
मोनिका : मुस्कुराते हुये, भैया के पास बेठी है या भैया की गोद में बेठी है।
गीतिका : चुप कर जो मुह में आया बक देति है।
मोनिका : सच कह रही हु रानी, एक बार अपने भैया की गोद में बैठ कर देख ले तेरे जवान चौड़े चूतडो के वजन से तेरे भैया का लंड न डगमगा जाए तो कहना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, मै फ़ोन रख रही हु।
मोनिका : अच्छा मेरी बात तो सुन।
गीतिका :क्या।
मोनिका : अच्छा तो कुछ मत बोल मै तुझे मूवी का लाइव शो बताती हूँ।
गीतिका : चल तेरे पास ज्यादा बैलेंस है तू बोल मै तो चुपचाप यही बेठी हु।
मोनिका : वो गोरी उस निग्रो के काले काले मस्त मोटे लंड को लोलीपोप की तरह चूस रही है, तू देखति तो तेरा भी मन चुसने का होने लगता।
गीतिका : और वह निगरो।
मोनिका : वह निग्रो उस गोरी की चुत की तरफ मुह करके लेटा हुआ है और अपनी लम्बी जीभ निकाल कर उस गोरी की मस्त चुत को चाट रहा है दोनों ६९ की पोजीशन में एक दूसरे के लंड और चुत को खूब कस कस कर चूस चाट रहे है।
गीतिका : बस कर मोनिका मै अब फ़ोन रख रही हूँ। तुझसे बाद में बात करती हूँ।
मोनिका : अच्छा चल जब फ्री हो तो मिस कॉल कर देना।

कल्लु : तेरी दोस्त थी क्या गुडिया।
गीतिका : हाँ भैया मेरी सबसे पक्की सहेली है
मै केवल धोती पहने हुए था और गीतिका की नजरे मेरे चौड़े सिने की तरफ बार बार चलि जाती थी लेकिन मै कुछ समझ नहीं पाया फिर रात को सब सो गए और
सूबह वही दिनचर्या।

सूबह सुबह गीतिका मस्त घाघरा चोली पहन कर नजर आई मै तो उसकी गोरी गोरी टाँगो को देखता ही रह गया।
जीतिका : भैया मै भी आपके साथ खेतो में चल रही हु।
कालू : ठीक है चल पर खेत दुर है तू थक जायेगी तो।
गीतिका : निकालो न अपनी खटारा साईकल उसी पर बैठ कर चलते है।
कालू : ठीक है चल और मैंने अपनी साईकल निकाली और गीतिका को फिर से कहा चल बैठ डण्डे के उपर, मेरे इतना कहने पर गीतिका मुस्कुराते हुए डण्डे पर
बैठ गई और कहने लगी, भैया आराम से चलाना आपका डंडा मुझे बहुत चुभता है।
गीतिका की बात सुन कर मेरा लंड अकडने लगा था, पर मजा भी बहुत आ रहा था।
कालू : तू क्यों तैयार हो गई सुबह।
गीतिका : भैया कल के रसीले आमो ने बड़ा मजा दिया, आज फिर मुझे ऐसे ही रसीले आम खाना है।
कालू : हाँ हाँ क्यों नहीं अपने खेतो के पास तो बहुत बड़ा बगीचा है वैसे तुझे आम खाता देख मेरा भी मन आम चुसने का होने लगा था नहीं तो मैं
वेसे आम चुसता नहीं हूँ।

गीतिका ; मुस्कुराते हुये, भैया जब आपको अच्छे मस्त रसीले आम चुसने को मिलेँगे तो आप भी नहीं छोडोगे।
कालू : गांव में आम तो बहुत है पर चुसने का समय कहा मिलता है।
गीतिका : फिकर न करो भैया मै आ गई हु न अब मस्त आम चुसाउंगी आपको।
 
कालू : तू तो दो चार दिन रहेगी और फिर चलि जाएगी, अगली बार कुछ ज्यादा दिनों की छुटटी लेकर आ तो मजा आएगा तब तक शायद बारिश भी हो जाये तो नदी में पानी भी आ जायेगा और फिर मस्त नदी में नहाने का मजा ही अलग होगा।
जीतिका : भैया आपको तैरना आता है।
कालू : हाँ मै तो एक साँस में इस छोर से उस छोर तक तैर कर जा सकता हूँ।
गीतिका : भैया मुझे भी तैरना सीखा दोगे क्या।
कालू : क्यों नहीं पर पहले नदी में पानी तो आने दे।
गीतिका : अगली बार जब आउंगी तब तक बारिश हो ही जायेगी।
कालू : हाँ वह तो है।

जब हम खेतो में पहुच गए तो कुछ देर मैंने काम किया और फिर गीतिका ने रट लगा दी की चलो भैया आम के बगीचे में।
उधर बाबा उसकी रट सुन रहे थे और फिर मुझसे कहने लगे अरे बेटा कल्लु दो दिनों के लिए बिटिया आई है जाता क्यों नहीं उसे मस्त मीठे आमो का रस तो चखा दे।
मै वहाँ से गीतिका को लेकर पास के बगीचे में चल दिया और फिर गीतिका आम देखने लगी तभी वह चिल्लाइ वाह भैया क्या मस्त बड़ा सा पका हुआ आम लगा है।
उसको तोड़ो न, मैंने कहा गुड़िया वह तो बहुत ऊपर है।
गीतिका : तो मुझे उठाओ न अपनी गोद में, मैंने गीतिका के पीछे आकर उसकी कमर पकड़ कर उसे उठाया और जब उसके गुदाज चोदने लायक चूतडो का स्पर्श मेरे लंड से हुआ तो वह गीतिका के घाघरे में घूसने को तैयार हो गया, लेकिन गीतिका को ऊपर उठाने पर भी आम उसके हाथो से थोड़ी दुर ही रह गया और मैंने गीतिका को थक कर निचे उतार दिया।

कल्लु : गुड़िया वह बहुत ऊपर है कोई दुसरा देख ले
गीतिका : पैर पटकते हुए नहीं भैया मुझे तो वही वाला चहिये, आप कैसे उठा रहे हो मुझे आपको तो सचमुच कुछ नहीं आता।
कालू : तो तू ही बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका : मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और मेरे नंगे चौड़े सिने को और मेरी बाजुओ को हाथ लगा कर कहने लगी, मेरा भाई इतना बलिश्त है और अपनी कमसिन सी बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहा है।

मैने गीतिका के खूब मोटे मोटे कसे हुए दूध पर नजर डालते हुए अपनी नज़रो को निचे फिसलाया और गीतिका के भारी चूतडो और मोटी मोटी गदराई जांघो को देखते हुए कहा ।अब तू कमसीन कहा रही अब तो भरपूर जवान हो गई है 55 के जी तो वजन होगा तेरा फिर कैसे मै तुझे आसानी से उठा लु।
गीतिका : क्या भैया आपके बराबर मरद तो बड़ी बड़ी औरतो को उठा लेते है मै तो फिर भी लड़की हूँ।
कालू : अच्छा बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका मेरे सामने आकर मेरे हाथो को पकड़ कर अपनी कमर में रखते हुए कहने लगी पहले झुक कर मेरी जांघो पर अपने हाथ का घेरा डालो और मुझे
उपर उठाओ।
मैने गीतिका की मोटी जांघो को अपनी बांहो में भर कर उसे ऊपर उठाया अब उसके मोटे मोटे चोली में कसे दूध मेरे मुह से टकराने लगे और मै अपने आपको रोक न सका और मैंने अपने मुह को गीतिका के मोटे मोटे बोबो में दबा दिया और उसकी मस्त सुगंध लेने लगा, हाय क्या मतवाली मस्त महक थी मेंरा
लंड तो ऐसा लग रहा था की धोती फाड कर बाहर आ जाएगा।

गीतिका ने अपनी बांहे मेरी गर्दन पर डाले हुए एक हाथ ऊपर बढ़ाया लेकिन आम उसकी पहुच से दुर था,
गीतिका : भैया ऐसे ही उठाये रहना उतारना मत, बस थोड़ा सा और ऊपर उठाओ, अब की बार मैंने अपने हाथो से गीतिका के चौड़े चौड़े मोटे चूतडो को
दबोचते हुए अपने पंजो को उसकी मस्त गुदाज गाण्ड में भर कर और भी ऊपर उठाया।लकिन गीतिका का हाथ आम तक नहीं पहुच रहा था, गीतिका भैया बस
थोड़ा सा और ऊपर करो न, गीतिका का घाघरा ऊपर हो गया और मेरे हाथ गीतिका की नंगी जांघो से होते हुये, जैसे ही उसकी गाण्ड की दरार में पहुचे मै चौक गया और मेरा लंड झटके देने लगा।
 
गीतिका घाघरे के अंदर पूरी नंगी थी जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मै तो एक दम से मस्त हो गया और न जाने कहा से मेरे हांथो में इतनी ताकत आ गई की मैंने गीतिका को और ऊपर करते हुए उठा दिया और गीतिका की चुत वाला हिस्सा मेरे मुह के सामने आ गया।
मैने अपनी आँखे बंद कर ली और गीतिका की चुत को अपने मुह पर दबाने लगा, लेकिन घाघरे का अगला हिस्सा चुत को ढके हुए था और मै गीतिका की बुर को
सूँघने की कोशिश कर रहा था, और फिर अचानक मैंने अपने मुह को गीतिका की चुत के ऊपर दबाते हुए उसकी फुली चुत को घाघरे के ऊपर से ही पप्पी लेनी
शुरु कर दी, तभी गीतिका के मुह से आवाज निकली यस और मैंने जब ऊपर देखा तो उसके हाथ में आम आ चूका था।

गीतिका : भैया अब उतारो भी लेकिन आराम से मैंने गीतिका पर पकड़ ढिली की और वह धीरे धीरे निचे की तरफ फ़िसलने लगी, जब वह निचे फ़िसलने लगी तो पहले उसका नंगा पेट मेरे मुह के सामने आया और मैंने भरपूर उसके नंगे पेट पर अपने होठो को फेरा और फिर जब वह और निचे सरकी तो उसके मोटे मोटे दूध मेरे
मुह के सामने आ गये।

लेकिन मुझे यह ध्यान नहीं था की गीतिका जब और निचे सरकेगी तो मेरा खड़ा लंड उसकी चुत को रोक लेगा और जैसे ही गीतिका की चुत मेरे लंड के पास पहुची लंड से उसकी बुर घिस गई और मेरे डण्डे की वजह से शायद गीतिका की फाँके एक बार खुल कर बंद हो गई या फिर उसके भग्नाशे से मेरे लंड
का घर्षण हो गया और गीतिका के मुह से आह जैसे शब्द निकल पड़े और गीतिका अब जमीन पर खड़ी थी।

उसकी नजर मेरी नज़रो से बच कर मेरे खड़े लंड
पर जा रही थी जो धोती के अंदर से तम्बू बनाये खड़ा था और गीतिका के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान फैल गई थी लेकिन उसका चेहरा कुछ लाल हो गया था और
सच कहु तो गीतिका मुझे बहुत चुदासी चुत नजर आ रही थी उसका चेहरा देख कर ही लग रहा था की उसकी बुर जरुर लंड के लिए पानी छोड़ रही होगी, फिर भी मै जानना चाहता था और ऊपर से वह अपनी चड्डी भी पहन कर नहीं आई थी मतलब उसके अंदर कुछ चल जरुर रहा था, गीतिका ने उस आम को चुसना शुरू कर दिया और मै उसके रसीले होठो को देखने लगा फिर जब उसने मेरी ओर नजरे उठा कर देखि तो उसकी नशीली आँखे ऐसी लग रही थी जैसे कह रही हो की भइया अपनी बहन की कुंवारी चुत में अपना मस्त लंड पेल दोगे क्या।
 
कल्लु : गुड़िया तू आम चूस तब तक मै और दूसरे आम देखता ह, गुड़िया पेड़ के निचे बैठ गई और मै इधर उधर के पेडो पर आम देखने लगा तभी गुड़िया ने आवाज देकर मुझे बुलाया और एक दुसरा आम दीखाते हुए कहने लगी भैया वो वाला तोड़ो देखो कितना मस्त पका है, मै गुड़िया की बात सुन कर उसके मोटे मोटे चोली में कसे उरोजो को देखने लगा, फिर मैंने कहा गुड़िया वह भी बहुत ऊपर है, तब गुड़िया ने झट से अपना हाथ मेरी ओर लम्बा करते हुए कहा तो फिर उठाओ अपनी बहन को अपनी गोद में।

गुडिया की बात सुन कर मेरे लंड की नशे और भी तन गई और गुड़िया जैसे ही मेरे पास आई उसकी मादक ख़ुश्बू ने अलग पागल कर दिया मै झुका और गुड़िया के भारी भरकम चूतडो को अपनी बांहो में कस कर
उसे ऊपर उठा दिया, जब गुड़िया का चिकना पेट मेरे मुह के पास पहुच गया तब गुड़िया ने मेरे सर को पकड़ते हुए कहा भैया और ऊपर करो न अभी तो आम
बहुत दुर है।
मैने गुड़िया की मोटी जांघो को पकड़ा और दुसरा हाथ गुड़िया की गुदाज चौड़ी गाण्ड के निचे लगा दिया, मुझे ऐसा लग रहा था की मेरा लंड फट जाएग, गुड़िया क
गुदाज चूतडो के नरम नरम माँस को दबोचने में बड़ा मजा आ रहा था, तभी मेरी ऊँगली गुड़िया की गाण्ड के जडो में घुस गई और मै तब चौक गया जब गुड़िया की गाण्ड के गैप में उसका घघरा गीला हो रहा था, मै समझ गया की गुड़िया की रसीली बुर खूब पानी छोड़ रही है, मै बिना घबराये गुड़िया की दोनों जांघो की जडो में अपने हाथ को भर कर गुडिया को और ऊपर उठाने लगा।

मेरे हाथ का पूरा जोर गुड़िया की जांघो की जडो में यानि उसकी फुली हुई बुर और गाण्ड के छेद पर लगा हुआ था, जहा से मैंने गुड़िया को दबा रखा था वही उसका घाघरा काफी गीला लग रहा था, अब मुझे गुड़िया की नीयत पर शक होने लगा था, क्या गुड़िया जानबूझ कर चड्ढी पहन कर नहीं आई थी, क्या गुड़िया भी लंड लेने के लिये तडपने लगी है, पर मै तो उसका भाई हु फिर वह.
मैं सोच में डूबा हुआ था तभी गुड़िया ने कहा भैया अब उतारो भी और मैंने फिर से उसे नीचे उतारा और इस बार फिर उसका गुदाज रसीला बदन मेरे बदन से रगड खाता हुआ निचे आया और फिर से गुड़िया की चुत में मेरे खड़े लंड का एह्सास हुआ, गुड़िया के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान
थी। जिसे वह दबाते हुए कहने लगी वाह भैया क्या मस्त आम है, उसके बाद एक दो आम और तोड़ने के बाद मैं और गुड़िया खेत में आ गये, गुड़िया खाट पर बैठ कर आम चुस्ने लगी और मै बाबा के साथ काम में
लग गया, मै दुर से गुड़िया को देख रहा था लेकिन वह मोबाइल में न जाने क्या कर रही थी, तभी मुझे ध्यान आया की मैं किताब झोपड़ी में ही मै भूल गया था
जाकर उसे कही छुपा देता हु नहीं तो गुड़िया के हाथ न लग जाए, जब मै गुड़िया की ओर जाने लगा तब गुड़िया को मैंने फ़ोन पर यह कहते सुना की चल रंडी मै तुझसे बाद में फ़ोन करती हूँ।।

गुडिया : मुस्कुराते हुए क्या हुआ भैया काम में मन नहीं लग रहा क्या या फिर भूख लगी है, अगर भूख लगी हो तो आम चूस लो काफी पके और बड़े बड़े है,
मैने गुड़िया के तने हुए आमो को देखते हुए कहा
हाँ भुख तो लगी है पर तू अपने आम मुझे कहा चुसने देगी।
गुडिया : मुस्कुराते हुये, तुम मुझसे कहते ही नहीं।
नहीं तो मै क्या अपने भाई को अपने आम न चुसा दूँ।
कालू : चल ठीक है जब मुझे चुसना होगा मै तुझसे कह दुँगा।, इतना कह कर मै झोपड़ी के अंदर गया लेकिन जहा मैंने किताब रखी थी वह वहाँ नहीं थी, अब तो
मै पक्का समझ गया की किताब गुड़िया ने ली है, तभी आज वह पूरी रंडी की तरह मेरे ऊपर चढ़ चढ़ कर मजे ले रही थी, जरुर उसने भाई और बहन की चुदाई वाली कहानी पढ ली थी इसीलिए आज उसकी चुत इतनी गरमा रही है।

मै बाहर आया और गुड़िया की ओर देखा तो वह मुसकुराकर मुझे देखते हुए पहले आम को दबा कर उसका रस बाहर निकाली और फिर मुझे देखते हुए अपनी रसीली जीभ बाहर निकाल कर उसे चाटने लगी, मेरा मन तो किया की अपनी रंडी बहना को वही नंगी करके खूब कस कस कर उसकी मस्त फुली चुत में लंड पेल दू लेकिन मै मन मार कर रह गया और गुड़िया कहने लगी, आओ भइया बैठो।

कल्लु : नहीं गुड़िया बाबा अकेले काम कर रहे है मुझे भी उनकी मदद करना होगा।
गुडिया : माँ कब आएगी खाना खाने का टाइम तो हो गया बड़ी भुख लगी है।
कालू : बस आती ही होगी थोड़ी देर और राह देख ले और फिर मै बाबा के साथ काम में लग गया, कुछ देर बाद माँ नजर आई, और फिर मै और बाबा हाथ मुह धोकर पेड़ की छाँव मै बैठ गए सामने गुड़िया और माँ बैठी थी और उनके सामने मै और बाबा, हमने खाना खाया और फिर बाबा कहने लगे की भाई मेरी तो आज तबियत ठीक नहीं लग रही है इसलिए मै तो घर जाकर आराम करुँगा।
 
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