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Guest
नाना के नीचे जाते ही मै मा के पास गया जो इस समय नाना के ही कपड़े धुल रही थी ।
मै कपडे निकाल कर सिर्फ अंडरवियर मे अन्दर बाथरूम मे घुसा और पीछे से मा को दबोच लिया
मा कसमसा कर - अह्ह्ह क्या कर रहा है बेटा,, बाऊजी है यही
मै अंडरवियर मे तने लण्ड को मा की पेटिकोट के उपर से ही उनकी गाड मे धंसाते हुए - मा वो तो नीचे गये
मा - हा फिर हट मुझे काम करना है
मै फटाक से दरवाजा बंद किया और अपना अंडरवियर निकाल दिया।
मा अभी भी झुकी हुई बालटी मे कपडे डुबो कर उसे गार कर दुसरी बालटी मे रख रही थी ।
मै बहुत ही उत्तेजित था तो मैने झुक कर मा का पेटिकोट एक झटके मे उठाया और उनकी गोरी फैली हुई तरबुज सी गाड़ मेरे सामने थी
मैने मा के कूल्हो को थामा और लण्ड को उनके चुतडो के पाटो पर फिराया जिससे मा सिहर गयी और जिस पोजीशन मे थी वही रुक गयी
मा - अह्ह्ह बेटा रुक जा ना
मै अपने लण्ड की चमडी खिच कर सुपाडे को मा के चुत के मुहाने पर दबाकर - बहुत मन कर रहा है मा अह्ह्ह
मा - ओह्ह बेटा अह्ह्ह्ह
मै एक जोर का धक्का पेला और लण्ड जगह बनाते हुए सीधा मा के भोसड़े मे घुस गया और मै उन्के कूल्हो को थामे धक्के पेलने लगा ।
मा ने सामने हाथ बढ़ा कर टोटी को पकड़ ली लेकिन मेरे धक्के से उनको दिक्कत हो रही थी।
मै धक्के लगाते हुए - मा कूछ बात आगे बढ़ी आपकी और नाना की
मा कसमसा कर - तू ये अभी क्यू पुछ रहा है ,,,अभी चोद ले मुझे अह्ह्ह मै कबसे गरम हो रही थी अह्ह्ह बेटा
मै समझ गया कि कुछ मजेदार जरुर हुआ है दोनो के बीच और उसके लिये मा पूरी तसल्ली से ही मुझे बतायेगी
मैने मा को झुकाये हुए ही लन्ड़ को तेजी से उनकी खुली चुत मे गचागच पेलता रहा ,,, थोडी देर हमारी ये चुदाई सभा चली और मै झड़ने के करीब था और मा ने मेरा माल अपने मुह मे लिया ।
फिर मै और मा एक साथ नहा कर नीचे आये । मैने अपने कपडे पहने थे जबकी मा ने ब्लाउज पेटिकोट
नीचे हाल मे उतर कर देखा तो नाना कुछ फ़ाईल लेके बैठे है और उनकी नजर मा पर पड़ी तो वो मुस्कुराये और बदले मे मा ने भी एक शर्माहट भरी मुस्कान दी ।
नाना की नजर मा के चुचो की घाटी और पेटिकोट के साइड के कट पर थी जहा से मा के कुल्हे साफ दिख रहे थे । जिसका असर मुझे नाना की धोती मे साफ नजर आ रहा था ।
फिर मा ने उसी अवस्था मे मेरे और नाना के लिए खाना लगाया । फिर मै और नाना खाना खा कर निकल गये ।
सबसे बडी बात थी कि नाना इस उम्र मे भी खुद गाडी चलाते थे ।
मै भी उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था , आज नाना काफी खुश लग रहे थे
मै - क्या बात है नाना जी बडे खुश लग रहे है
नाना किसी याद से उभर कर - अह हा खुश तो हू ही ,, अब इतने समय बाद अपने नाती के साथ कही घूमने जा रहा हू ।
मै - वैसे कहा जा रहे है हम लोग
नाना - बस यही पास के गाव गोपालपुर मे मुखिया के घर , मेरे पूराने मित्र रहे है , उन्ही के यहा
मै चुप रहा और गाडी से बाहर खेत खलिहानों को देख रहा था ।
गोपालपुर काफी नामी गिरामी गाव था और वहा के मुखिया जयराज ठाकुर थे । जो नाना के पूराने मित्र थे और
उनका काफी समय प्रतापपुर यानी मेरे नाना के गाव मे ही बिता है ।
रास्ते ने नाना ने बताया कि उनकी पहली बीवी की मृत्यु के बाद उन्होने दुसरी शादी की एक कम उम्र के लड़की से जो अपने माता पिता की एक्लौती संतान थी और कुछ साल बाद वो प्रतापपुर छोड कर यहा गोपालपुर चले आये ।
कुछ किलोमीटर की यात्रा कर हम गोपालपुर गाव पहुचे और गाव मे थोड़ी ही दुर घूसने पर जयराज ठाकुर की हवेली थी जो असल मे उन्के स्वर्गीय सास ससुर की थी ।
हवेली काफी बडी थी और काम करने वालो की कमी नही थी ।
लेकिन फिर भी उस हिसाब से ज्यादा लोग दिखाई नही पड रहे थे जैसा नाना जी ने ब्ताया था । काम करने वाले और कुछ गार्ड बस
नाना जी हवेली के कम्पाउंड मे गाडी पार्क की और हाल की ओर बढ़ गये वही फ़ाईल लेके जो सुबह घर पर देख रहे थे । मै भी उनके पीछे पीछे चला गया ।
हाल मे पहुच कर नाना जी और मै बैठे रहे और थोड़ी ही देर मे एक नौकर पानी देके गया ।
मै - नाना जी मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है यहा
नाना हस कर - अरे इसे अपना घर समझो और अभी जयराज से मिलवा दूँगा तो तुम कभी भी यहा आ सकते हो । हर साल सावन मे गोपालपुर मे बहुत जोरदार और बड़ा मेला लगता है ।
मै - ओह्ह
मै बड़ी जिज्ञासा और उत्सुकता से हवेली मे नजर घुमा रहा था ।
थोडी देर बाद एक नौकर आया और नाना को अपने साथ ले गया ।
नाना बहुत ही खुश नजर आ रहे थे और मुझे बोल के गये - कि मै यही आस पास ही रहू और चाहू तो पीछे बागिचे की ओर जा सकता हू ।
मै हा मे सर हिलाया और मोबाईल मे लग गया ।
हवेली के साथ कुछ अच्छी सेल्फी भी निकाली । थोड़ी देर मे हाल मे एकदम चुप्पी सी थी । सारे लोग कही गायब से थे कोई कही नजर नही आ रहा था उपर से मैने पूरानी बड़ी हवेलियो के बारे बहुत भूतिया खिस्से सुने थे तो फटने लगी मेरी ।
मैने एक दो नजर उस जिने की ओर मारा जहा से नाना उपर की ओर गये थे । मगर कोई नजर नही आ रहा था तो मैने सोचा कि क्यू ना पीछे बागिचो मे चला जाऊ
मै उठा और ताकझाक करते हुए एक गलियारे से पीछे की ओर चला गया ।
ताजी हवा मे सास लेते ही मन की सारी शन्काये दुर हो गयी और मै ऐसे ही टहलने लगा ।
पीछे बगिचे के दुसरे छोर पर काफ़ी सारे आदमी काम कर रहे थे और खेतो मे भी लोगो को काम करते देख मन को और भी अच्छा लगा ।
तभी मेरी नजर हवेली के पीछे से लगी एक सीधी पर गयी जो उपर एक बाल्किनी नुमा जगह पर खुलती थी और वही से अन्दर जाने का रास्ता भी था ।
रास्ते मे मुझे कोई रुचि नही थी , मुझे उस बाल्किनी से बागिचे को देखने की तलब हुई । मै फटाफट उस सीढी से उपर वाल्किनी पर गया
वाह क्या नजारा था , दुर तक खुले खेत और बगीचे की रंग बिरंगी हरियाली दिख रही थी ।
मैने जेब से फोन निकाला और तस्वीरे लेना शुरु कर दी और कुछ सेल्फी भी लिये । इसी दौरान मुझे बाल्किनी के गैलरी से कुछ बर्तन के गिरने की आवाजे आई । लेकिन गैलरी मे काफी अन्धेरा सा था ।
मै कपडे निकाल कर सिर्फ अंडरवियर मे अन्दर बाथरूम मे घुसा और पीछे से मा को दबोच लिया
मा कसमसा कर - अह्ह्ह क्या कर रहा है बेटा,, बाऊजी है यही
मै अंडरवियर मे तने लण्ड को मा की पेटिकोट के उपर से ही उनकी गाड मे धंसाते हुए - मा वो तो नीचे गये
मा - हा फिर हट मुझे काम करना है
मै फटाक से दरवाजा बंद किया और अपना अंडरवियर निकाल दिया।
मा अभी भी झुकी हुई बालटी मे कपडे डुबो कर उसे गार कर दुसरी बालटी मे रख रही थी ।
मै बहुत ही उत्तेजित था तो मैने झुक कर मा का पेटिकोट एक झटके मे उठाया और उनकी गोरी फैली हुई तरबुज सी गाड़ मेरे सामने थी
मैने मा के कूल्हो को थामा और लण्ड को उनके चुतडो के पाटो पर फिराया जिससे मा सिहर गयी और जिस पोजीशन मे थी वही रुक गयी
मा - अह्ह्ह बेटा रुक जा ना
मै अपने लण्ड की चमडी खिच कर सुपाडे को मा के चुत के मुहाने पर दबाकर - बहुत मन कर रहा है मा अह्ह्ह
मा - ओह्ह बेटा अह्ह्ह्ह
मै एक जोर का धक्का पेला और लण्ड जगह बनाते हुए सीधा मा के भोसड़े मे घुस गया और मै उन्के कूल्हो को थामे धक्के पेलने लगा ।
मा ने सामने हाथ बढ़ा कर टोटी को पकड़ ली लेकिन मेरे धक्के से उनको दिक्कत हो रही थी।
मै धक्के लगाते हुए - मा कूछ बात आगे बढ़ी आपकी और नाना की
मा कसमसा कर - तू ये अभी क्यू पुछ रहा है ,,,अभी चोद ले मुझे अह्ह्ह मै कबसे गरम हो रही थी अह्ह्ह बेटा
मै समझ गया कि कुछ मजेदार जरुर हुआ है दोनो के बीच और उसके लिये मा पूरी तसल्ली से ही मुझे बतायेगी
मैने मा को झुकाये हुए ही लन्ड़ को तेजी से उनकी खुली चुत मे गचागच पेलता रहा ,,, थोडी देर हमारी ये चुदाई सभा चली और मै झड़ने के करीब था और मा ने मेरा माल अपने मुह मे लिया ।
फिर मै और मा एक साथ नहा कर नीचे आये । मैने अपने कपडे पहने थे जबकी मा ने ब्लाउज पेटिकोट
नीचे हाल मे उतर कर देखा तो नाना कुछ फ़ाईल लेके बैठे है और उनकी नजर मा पर पड़ी तो वो मुस्कुराये और बदले मे मा ने भी एक शर्माहट भरी मुस्कान दी ।
नाना की नजर मा के चुचो की घाटी और पेटिकोट के साइड के कट पर थी जहा से मा के कुल्हे साफ दिख रहे थे । जिसका असर मुझे नाना की धोती मे साफ नजर आ रहा था ।
फिर मा ने उसी अवस्था मे मेरे और नाना के लिए खाना लगाया । फिर मै और नाना खाना खा कर निकल गये ।
सबसे बडी बात थी कि नाना इस उम्र मे भी खुद गाडी चलाते थे ।
मै भी उनके साथ आगे की सीट पर बैठा था , आज नाना काफी खुश लग रहे थे
मै - क्या बात है नाना जी बडे खुश लग रहे है
नाना किसी याद से उभर कर - अह हा खुश तो हू ही ,, अब इतने समय बाद अपने नाती के साथ कही घूमने जा रहा हू ।
मै - वैसे कहा जा रहे है हम लोग
नाना - बस यही पास के गाव गोपालपुर मे मुखिया के घर , मेरे पूराने मित्र रहे है , उन्ही के यहा
मै चुप रहा और गाडी से बाहर खेत खलिहानों को देख रहा था ।
गोपालपुर काफी नामी गिरामी गाव था और वहा के मुखिया जयराज ठाकुर थे । जो नाना के पूराने मित्र थे और
उनका काफी समय प्रतापपुर यानी मेरे नाना के गाव मे ही बिता है ।
रास्ते ने नाना ने बताया कि उनकी पहली बीवी की मृत्यु के बाद उन्होने दुसरी शादी की एक कम उम्र के लड़की से जो अपने माता पिता की एक्लौती संतान थी और कुछ साल बाद वो प्रतापपुर छोड कर यहा गोपालपुर चले आये ।
कुछ किलोमीटर की यात्रा कर हम गोपालपुर गाव पहुचे और गाव मे थोड़ी ही दुर घूसने पर जयराज ठाकुर की हवेली थी जो असल मे उन्के स्वर्गीय सास ससुर की थी ।
हवेली काफी बडी थी और काम करने वालो की कमी नही थी ।
लेकिन फिर भी उस हिसाब से ज्यादा लोग दिखाई नही पड रहे थे जैसा नाना जी ने ब्ताया था । काम करने वाले और कुछ गार्ड बस
नाना जी हवेली के कम्पाउंड मे गाडी पार्क की और हाल की ओर बढ़ गये वही फ़ाईल लेके जो सुबह घर पर देख रहे थे । मै भी उनके पीछे पीछे चला गया ।
हाल मे पहुच कर नाना जी और मै बैठे रहे और थोड़ी ही देर मे एक नौकर पानी देके गया ।
मै - नाना जी मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है यहा
नाना हस कर - अरे इसे अपना घर समझो और अभी जयराज से मिलवा दूँगा तो तुम कभी भी यहा आ सकते हो । हर साल सावन मे गोपालपुर मे बहुत जोरदार और बड़ा मेला लगता है ।
मै - ओह्ह
मै बड़ी जिज्ञासा और उत्सुकता से हवेली मे नजर घुमा रहा था ।
थोडी देर बाद एक नौकर आया और नाना को अपने साथ ले गया ।
नाना बहुत ही खुश नजर आ रहे थे और मुझे बोल के गये - कि मै यही आस पास ही रहू और चाहू तो पीछे बागिचे की ओर जा सकता हू ।
मै हा मे सर हिलाया और मोबाईल मे लग गया ।
हवेली के साथ कुछ अच्छी सेल्फी भी निकाली । थोड़ी देर मे हाल मे एकदम चुप्पी सी थी । सारे लोग कही गायब से थे कोई कही नजर नही आ रहा था उपर से मैने पूरानी बड़ी हवेलियो के बारे बहुत भूतिया खिस्से सुने थे तो फटने लगी मेरी ।
मैने एक दो नजर उस जिने की ओर मारा जहा से नाना उपर की ओर गये थे । मगर कोई नजर नही आ रहा था तो मैने सोचा कि क्यू ना पीछे बागिचो मे चला जाऊ
मै उठा और ताकझाक करते हुए एक गलियारे से पीछे की ओर चला गया ।
ताजी हवा मे सास लेते ही मन की सारी शन्काये दुर हो गयी और मै ऐसे ही टहलने लगा ।
पीछे बगिचे के दुसरे छोर पर काफ़ी सारे आदमी काम कर रहे थे और खेतो मे भी लोगो को काम करते देख मन को और भी अच्छा लगा ।
तभी मेरी नजर हवेली के पीछे से लगी एक सीधी पर गयी जो उपर एक बाल्किनी नुमा जगह पर खुलती थी और वही से अन्दर जाने का रास्ता भी था ।
रास्ते मे मुझे कोई रुचि नही थी , मुझे उस बाल्किनी से बागिचे को देखने की तलब हुई । मै फटाफट उस सीढी से उपर वाल्किनी पर गया
वाह क्या नजारा था , दुर तक खुले खेत और बगीचे की रंग बिरंगी हरियाली दिख रही थी ।
मैने जेब से फोन निकाला और तस्वीरे लेना शुरु कर दी और कुछ सेल्फी भी लिये । इसी दौरान मुझे बाल्किनी के गैलरी से कुछ बर्तन के गिरने की आवाजे आई । लेकिन गैलरी मे काफी अन्धेरा सा था ।