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"दीदी, आपका पेपर कितनी देर का है?" अर्जुन ने रास्ते मे स्कूटर चलाते हुए ऋतु दीदी से पूछा जो अपने भाई के पीछे चिपकी सी बैठी थी.
"3 घंटे का है. तू बता क्या करना है तुझे?" अपने हाथ को उसकी कमर पर फिरते हुए कहा
"कुछ नही मैं 3 घंटे क्या करूँगा ये सोच रहा था.?" अर्जुन की बात ऋतु को समझ आ गई थी जो सही भी थी.
"अच्छा तू एक काम करियो, मेरा पेपर है 9-12 और तू मुझे कॉलेज गेट पर उतार कर अगली मार्केट मे चला जइओ. वहाँ सुना है सिनिमा है 2-3 पास पास मे.
11:45 तक वापिस आ जाना." दीदी की बात उसको भी जच गई. फिर कुछ मस्ती मे जब उसने देखा की ये सड़क खाली है तो अपना हाथ पीछे कर उनका एक उभार सूट पे से ही सहला दिया.
"तू मार खाएगा. ऐसी हरकत सड़क पर नही करते.' ऋतु दीदी ने भी देख लिया था कि वहाँ कोई भी नही था फिर भी नाटक करते उन्होने ये बात कही.
"आप ना मेरी हो तो जो मेरा है उसके साथ मैं कुछ भी कही भी करू."
"अच्छा बाबा. लेकिन ना हम दोनो किसी परिवार से तो है जिसको सब जानते भी है. अब खुद सोच ले."
अर्जुन दीदी की बात से शांत हो गया.
"अकेले मे तू जो मर्ज़ी कर मेरे भाई. मैं तो खुद पूरी तेरी हूँ. " थोड़ा चिपक अपने दोनो दूध उसकी पीठ से लगाते ये कहा तो अर्जुन ने समझदारी से कहा. "हा वो जब सुबह आपको जगाने रूम मे गया था तभी से दिल मे था कि एक बार आपको गले लगाऊ , प्यार करू फिर आप ही देखो. ग़लती से सबर नही रहा."
"चल कोई बात नही अब तू मुझे उतार और आगे किसी से भी पूछ लिओ. बाइ" इतना बोलकर ऋतु दीदी कॉलेज के आगे उतर कर अंदर भाग गई और अर्जुन अगली मार्केट की तरफ बढ़ गया.
………………
"जलता बदन" ये पोस्टर एक सड़क किनारे बने शौचालय की दीवार पर चिपका था. और इस शीर्षक के साथ वैसे ही 5-6 पोस्टर से पूरी दीवार भरी हुई थी.
अर्जुन को तो इसका कोई अनुभव नही था तो लाल रंग की उस इमारत की तरफ चल दिया वो खुली पार्किंग मे स्कूटर खड़ा कर. मुश्किल सी 12-13 लोग टिकेट की खिड़की पर खड़े थे. सिनिमा के प्रवेश द्वार पर मूह पर कपड़ा लपेटे 2-3 लड़किया/औरते भी थी. अंदर से तो वो घबरा रहा था लेकिन सोचा चलो आज ये अनुभव भी ले लिया जाए. 100 का नोट भाड़ा दिया उसने छोटे सी सलाखो वाली की खिड़की के अंदर बैठे आदमी की तरफ. एक मरियल सा अधेड़, शायद मूह मे तम्बाकू या गुटखा दबाए उसकी ओऱ देखते हुए बोला, "हॉल या बाल्कनी? हॉल का 20 बाल्कनी का 50."
थोड़ा सयम्म से अर्जुन ने कहा, "बाल्कनी की एक."
"अंदर की तरफ ही दीवार पर लाल पिचकारी मार कर उसने एक बस टिकेट जैसी गुलाबी रसीद और 10-10 के 5 नोट उसकी और बढ़ा दिए. "अगला बोलो."
अर्जुन वहाँ से हट गया और जिधर की तरफ बाकी सब जा रहे थे वो भी पीछे चल दिया.
"3 घंटे का है. तू बता क्या करना है तुझे?" अपने हाथ को उसकी कमर पर फिरते हुए कहा
"कुछ नही मैं 3 घंटे क्या करूँगा ये सोच रहा था.?" अर्जुन की बात ऋतु को समझ आ गई थी जो सही भी थी.
"अच्छा तू एक काम करियो, मेरा पेपर है 9-12 और तू मुझे कॉलेज गेट पर उतार कर अगली मार्केट मे चला जइओ. वहाँ सुना है सिनिमा है 2-3 पास पास मे.
11:45 तक वापिस आ जाना." दीदी की बात उसको भी जच गई. फिर कुछ मस्ती मे जब उसने देखा की ये सड़क खाली है तो अपना हाथ पीछे कर उनका एक उभार सूट पे से ही सहला दिया.
"तू मार खाएगा. ऐसी हरकत सड़क पर नही करते.' ऋतु दीदी ने भी देख लिया था कि वहाँ कोई भी नही था फिर भी नाटक करते उन्होने ये बात कही.
"आप ना मेरी हो तो जो मेरा है उसके साथ मैं कुछ भी कही भी करू."
"अच्छा बाबा. लेकिन ना हम दोनो किसी परिवार से तो है जिसको सब जानते भी है. अब खुद सोच ले."
अर्जुन दीदी की बात से शांत हो गया.
"अकेले मे तू जो मर्ज़ी कर मेरे भाई. मैं तो खुद पूरी तेरी हूँ. " थोड़ा चिपक अपने दोनो दूध उसकी पीठ से लगाते ये कहा तो अर्जुन ने समझदारी से कहा. "हा वो जब सुबह आपको जगाने रूम मे गया था तभी से दिल मे था कि एक बार आपको गले लगाऊ , प्यार करू फिर आप ही देखो. ग़लती से सबर नही रहा."
"चल कोई बात नही अब तू मुझे उतार और आगे किसी से भी पूछ लिओ. बाइ" इतना बोलकर ऋतु दीदी कॉलेज के आगे उतर कर अंदर भाग गई और अर्जुन अगली मार्केट की तरफ बढ़ गया.
………………
"जलता बदन" ये पोस्टर एक सड़क किनारे बने शौचालय की दीवार पर चिपका था. और इस शीर्षक के साथ वैसे ही 5-6 पोस्टर से पूरी दीवार भरी हुई थी.
अर्जुन को तो इसका कोई अनुभव नही था तो लाल रंग की उस इमारत की तरफ चल दिया वो खुली पार्किंग मे स्कूटर खड़ा कर. मुश्किल सी 12-13 लोग टिकेट की खिड़की पर खड़े थे. सिनिमा के प्रवेश द्वार पर मूह पर कपड़ा लपेटे 2-3 लड़किया/औरते भी थी. अंदर से तो वो घबरा रहा था लेकिन सोचा चलो आज ये अनुभव भी ले लिया जाए. 100 का नोट भाड़ा दिया उसने छोटे सी सलाखो वाली की खिड़की के अंदर बैठे आदमी की तरफ. एक मरियल सा अधेड़, शायद मूह मे तम्बाकू या गुटखा दबाए उसकी ओऱ देखते हुए बोला, "हॉल या बाल्कनी? हॉल का 20 बाल्कनी का 50."
थोड़ा सयम्म से अर्जुन ने कहा, "बाल्कनी की एक."
"अंदर की तरफ ही दीवार पर लाल पिचकारी मार कर उसने एक बस टिकेट जैसी गुलाबी रसीद और 10-10 के 5 नोट उसकी और बढ़ा दिए. "अगला बोलो."
अर्जुन वहाँ से हट गया और जिधर की तरफ बाकी सब जा रहे थे वो भी पीछे चल दिया.