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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

"भाई कभी हमें भी ले जा करो अपनी कॅषुयल मीटिंग्स मे", रामेश्वर जी ने ठहाका लगते हुए कहा तो शंकर जी अपने पिता की बात पर मुस्कुरा दिए और जाते जाते आँखों से ही अपनी पत्नी रेखा जी को कुछ इशारा कर गये जिसे देखकर वो शरमाती हुई

वापिस रसोई की तरफ चल दी जहाँ ललिता जी और कोमल मीठी पूरियाँ बना रहे थे, माधुरी गुझिया बेल रही थी.

"वैसे एक बात तो है चाची, आप और चाचा अभी तक जवान हो. लगता नही कोमल और ऋतु जीतने बड़े बच्चे होंगे आपके",

माधुरी की इस बात से जहाँ रसोईघर मे आती हुई कौशल्या जी के साथ साथ ललिता जी और कोमल भी हंस दिए, वही रेखा जी

पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदने लगी.

"चल इधर ला ये थाल कुछ भी बोलती है. मार खाएगी मुझसे", उन्होने झूठा दिखावा किया लेकिन मूह पे शरम छाई थी.

"तो सही तो कह रही वो. ग़लत क्या कह दिया मेरी बच्ची ने. अब तुम दोनो महीने मे 1-2 बार ही मिलोगे तो जवान ही रहोगे."

कौशल्या जी ने भी माहॉल को थोड़ा और रंगीन कर दिया लेकिन यही उनसे ग़लती हो गई. रेखा जी तो कुछ बोली नही लेकिन कोमल ने बड़ा खूब कहा, "दादी तभी मैं कहूँ कि आप तो खुद अभी मा की बड़ी बहन लगती हो. देखो तो सर के बाल भी अब तक नही पके आपके." और माधुरी की तरफ आँख मार दी. ऐसे ही ये लोग हसी खुशी काम करते रहे. कौशल्या जी की एक बात तो तारीफ के काबिल थी कि वो अपनी बहू-बेटिओं मे फरक नही करती थी. और हँसी मज़ाक भी खूब कर लेती थी

रामेश्वर जी भी अपनी बीवी के उपर हुए इस तारीफ युक्त हमले को सुनकर हंसते हुए वहाँ से निकल चले अपने बगीचे की तरफ.
 
अपडेट 11

भाई, आई लव यू

शाम गहरा चुकी थी और संजीव कार चलाता हुआ अपने पिता राजकुमार जी के साथ घर आ रहा था बाजार से समान खरीद कर.

"पापा, मैं सोच रहा था इस बार छुटकी को स्कूटी दिलवा देते है. वैसे भी कल जनमदिन है उसका. कॉलेज भी जाने मे सहूलियत

होगी उसको और ऋतु को.", उसने ये बात बड़े सोच विचार कर कही थी. राजकुमार जी भी अपने बेटे को पूरी इज़्ज़त देते थे तो उन्होने सिर्फ़ इतना कहा,"बेटा जैसा तुझे ठीक लगे. लेकिन उन्हे चलानी नही आती और एक बार मा से भी बात कर लेना." राजकुमार जी का इशारा कौशल्या देवी से था.

"हा दादी से मैं रात को ही बात कर लूँगा. आपसे पूछना ज़्यादा ज़रूरी था क्योंकि दादी जी मान जाएँगी. वैसे भी कभी रिक्शा

तो कभी आप और मैं उन्हे लेके जाते है. इस से उनका टाइम भी बचेगा और निर्भर भी नही रहेंगी."

"ठीक कहा बेटा. वैसे भी अगले महीने मेरा तबादला अगले शहर हो रहा है तो यहा सिर्फ़ तू ही रह जाएगा मैं तो सिर्फ़ सप्ताह

के अंत ही आया करूँगा." राजकुमार जी को बात बिल्कुल सही लगी अपने बेटे की.

रास्ते मे उन्होने कार को हीरालाल ज़ोहरी की दुकान पर रुकवाया और वहाँ से अपना दिया हुआ ऑर्डर उठा लिया. दोनो वापिस घर चल दिए जहाँ सभी इंतजार कर रहे थे. जैसे ही कार घर मे दाखिल हुई संजीव समान निकालने लगा पिछली सीट से. अलका और कोमल ने भी मदद की उनकी. मिठाई के डब्बे, रंग-गुलाल, फल-फूल, कपड़े थे जो उन्होने खरीदे थे.

"छोटा कहाँ है गुड़िया?" संजीव जी ने ये बात अलका को देख कर कही

"वो तो सो रहा होगा अपने कमरे मे शायद. नही तो आपकी आवाज़ सबसे पहले उसको ही सुनाई देती है भैया."

बहन की बात सुनकर संजीव भी मुस्कुरा दिया और बोला, "मैं और कोमल रखते है समान को, तू जाकर उसको उठाकर नीचे ले आ." इतना बोलकर वो बैठक की तरफ समान लेकर चल दिए. अर्जुन को उठाने को सोचकर अलका के मन मे भी फुलझड़ी सी जल गई और वो कुलाँचे मारती सी बाहर वाली सीढ़ियों से ही दौड़ गई दूसरी मंज़िल पर. जैसे ही वो अर्जुन के कमरे मे दाखिल हुई तो देखा साहब बाजू के बल सोए पड़े है. चौड़े सीने पे कसी हुई सफेद बनियान और नीचे सफेद पाजामा. और जब नज़र रुकी बीच वाली भाग पर तो हया सी छा गई अलका के चेहरे पर. तंबू सा बना था वहाँ. हिम्मत कर वो उसके बिस्तर पर जा बैठी और गाल सहलाते हुए उसका नाम पुकार के लगी उठाने. "अर्जुन-अर्जुन, उठ ना. देख कितना टाइम हो आया है. 7 बज गये है भाई और सब बुला रहे है नीचे."

थोड़ी से पलके उठा अर्जुन ने जब अलका को देखा तो गहराई से उसको देखते हुए खुद के उपर लिटा लिया बाहों मे भर के.

"आप भी आ जाओ ना यहा मेरे पास." बंद आँखों से ही उसने अलका के कान मे ये सरगोशी की तो अलका ने खुद को ढीला छोड़ दिया उसकी बाहों मे. अर्जुन ने होले से अपने गाल अलका के गाल से रगड़ दिए. और अपनी छाती पर उसके भारी उरोजो को महसूस करने लगा.

"छोड़ दे ना भाई देख कोई आ जाएगा." अलका ने भी ये बात बिना कोई छूटने के प्रयास से कही. उसको भी अपना नाज़ुक बदन अर्जुन की बाहों मे जकड़ा मज़ा दे रहा था.

"एक शर्त पर. अगर रात 12 बजे आप मेरा प्रेज़ेंट पहनकर मेरे रूम मे दिखाने आओगी तभी."

अर्जुन की बात सुनकर अलका का रोम-रोम खिल उठा लेकिन फिर भी उसने दिखावा किया, "इतनी रात को मैं तेरे कमरे मे कैसे आउन्गी भाई.? तू खुद ही सोच ना और उपर से साथ वाला कमरा संजीव भैया का है. उन्होने देखा तो?"

"मैं कुछ नही जानता दीदी, मुझे तो बस आपको उन्हीं कपड़ो मे सबसे पहले देखना है. और मैं ही सबसे पहले विश करूँगा." अर्जुन ने अब खड़े होते हुए ये बात कही. और फिर अलका के गाल को चूमकर सीधा बाथरूम मे घुस गया. अलका वही खड़ी सोचती रही. 5 मिनिट बाद दोनो नीचे चल दिए.
 
"आजा भाई यहा बैठ.", कोमल ने कुर्सी आगे करते हुए अर्जुन को कहा. दोनो की नज़र 4 हुई तो दोनो खिल उठे. अर्जुन वही बैठ गया

"मेरे लिए क्या लेके आए भैया आप?" अर्जुन ने संजीव भैया से पहली बात यही कही तो सभी उसकी बात सुनकर हँसने लगे

"तेरे लिए तो कुछ मिला ही नहीं भाई. और पापा को घर जल्दी आना था तो वैसे भी कुछ खास ले नही पाए." संजीव ने जवाब दिया तो अर्जुन को मूह लटक गया. फिर भी उसने मूड सही किया और बोला, "तो ठीक है ना. हम अभी चलते है और ले आते है मार्केट से."

"कोई कही नही जाएगा. जिसने जो भी लेना हो परसो ले लेना." ये आवाज़ थी रामेश्वर जी की. ये सुनकर तो अर्जुन बिल्कुल ही उदास हो गया

"सब चुप करो. बहुत हुआ. मेरे बच्चे के लिए तो मैं ऐसे त्योहार रोज मनाउन्गी." कौशलया जी इतना बोलकर अर्जुन को दुलार्ने लगी और अपने हाथ से 5-6 डब्बे उसके सामने रख दिए. "ये ले बच्चे ये सब तेरे लिए है. तेरी पसंद की सफेद शर्ट, जीन्स, जूते, पर्स."

"दादी आप जैसा कोई नही." इतना बोलकर अर्जुन ने अपनी दादी के गाल चूम लिए. फिर रामेश्वर जी ने भी हंसते हुए सभी बच्चों को उनके उपहार दिए और कौशल्या जी ने अपनी बहुओं को.

"वो दादी जी एक बात करनी थी आपसे. अगर इजाज़त हो तो.?" संजीव ने जब ये बात कही तो वहाँ रामेश्वर जी, अलका, ऋतु और अर्जुन ही थे.

"बोल मेरे बच्चे. तुझे कब से मुझसे पूछने की ज़रूरत आन पड़ी?", स्नेह भाव से कौशल्या जी ने ये बात तो कही लेकिन उन्हे संदेह हुआ की शायद कुछ ज़्यादा ज़रूरी बात है.

"वो मैं दादी जी ये कह रहा था कि अलका और ऋतु कॉलेज जाती है और दोनो समझदार भी है."झीजकते हुए अपनी बात जारी रखी

"तो मैं सोच रहा था कि उन दोनो के लिए एक स्कुटी ले दूँ. इस से उनको किसी पे निर्भर भी होना नही पड़ेगा और कॉलेज आने जाने का टाइम भी बचेगा. पापा का भी तबादला हो रहा है अगले महीने और तब तक इनके एग्ज़ॅम्स भी ख़तम हो जाएँगे. छुट्टियों मे सीख भी लेंगी और नई क्लास मे दोनो उसी पे साथ चली जाया करेंगी." इतना कहकर संजीव चुप हो गया और सब तरफ शांति छा गई.

"हा तो बात बिल्कुल ठीक है तेरी बेटा. लेकिन.." कौशल्या जी ने अनमने ढंग से बात शुरू करी थी की अलका ने अपने दादा जी की तरफ गुहार लगाई.

"जब बात ठीक है तो थानेदारनी जी इजाज़त मे इतना टाइम क्यो? और वैसे भी मेरी बेटियाँ कोई बेटों से कम है क्या? तू बोल संजू बेटा कितने पैसे लगेंगे, मैं परसो देता हू बॅंक से निकलवा कर." रामेश्वर जी ने दो टुक बात कही

"वो दादा जी मैं पहले ही बुकिंग करवा चुका हू गुड़िया के जनमदिन का यही तोहफा मुझे ठीक लगा था. आपकी और दादीजी की इजाज़त के बिना तो मैं ये कर नही सकता था तो इसलिए आपकी आग्या ही चाहिए. परसो आ जाएगी घर." संजीव ने अभी भी गंभीरता से बात कही.

"ठीक बात है बेटा. लेकिन ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नही है. कॉलेज से आने के बाद चाबी रोज मेरे कमरे मे होनी चाहिए." दादी ने इतना ही बोला था कि अलका जा चिपकी अपनी दादी से. ये देख रामेश्वर जी को बड़ी खुशी हुई की उनके परिवार मे आज भी सभी निर्णया बडो की मर्ज़ी और सलाह से होते है. अपनी जगह से उठते हुए उन्होने एक बार संजीव के सर पर प्यार से हाथ फेरा और कौशल्या जी के साथ अंदर जाने लगे.

तभी उन्हे अर्जुन मूह लटकाए बैठा दिखा.. "अब तुझे क्या हुआ जो ऐसे मूह बनाए बैठा है?" रामेश्वर जी ने उस से पूछा तो जवाब कौशल्या जी ने दिया, "इसको कार सीखनी है और मैने मना कर दिया है."

"चल बेटा कभी कभी अपनी दादी की एक आधी बात मान लिया कर. गर्मी की छुट्टियों मे तुझे कार सीखा देंगे लेकिन तुझे तेरी कार कॉलेज के बाद ही मिलेगी." इतना बोलकर दोनो चले गये और यहा संजीव अपनी कुर्सी से उठा और अर्जुन को इशारा कर बाहर चल दिया.
 
"हा भैया. अब बताओ" बाहर आकर अर्जुन ने संजीव भैया से पूछा

"छोटे मैने पापा को बोल दिया है के दोस्त के घर जा रहा हू. तू घर का ध्यान रखना मेरे पीछे से.", संजीव ने कार की चाबी जेब

से निकलते हुए कहा.

"वो तो ठीक है भैया आप आओगे कब वापिस?"\

"भाई मैं सुबह 7 बजे तक आ जाउन्गा."

"ठीक है भैया." इतना बोलकर संजीव भैया कार लेकर निकल गया और अर्जुन ने मैं न गेट ढाल दिया.

अंदर आया तो अब मा और ताई जी खाना बना रहे थे और कोमल अपने दादा-दादी को उनके कमरे में ही खाना दे रही थी.

"तेरे पापा नज़र नही आ रहे ऋतु?", राजकुमार जी ने ये बात पूछी ऋतु से जो वही बैठी थी.

"पापा देर से आएँगे ताऊ जी. वो मल्होत्रा अंकल के साथ गुलाटी अंकल के घर गये है. और बोलकर गये थे के सुबह आपको उनके साथ कही जाना है."

अपनी भतीजी की बात सुनकर उनके मूह पर एक छोटी सी मुस्कान आ गई. "ठीक है."

अब अलका, कोमल और माधुरी खाना खा रहे थे और ऋतु खाना परोस रही थी. अर्जुन भी आकर बैठ गया फ्रेश होकर वही.

"मालकिन इस ग़रीब को रोटी मिलेगी क्या आज?", अर्जुन ने ये बात ऋतु को छेड़ते हुए कही थी.

"हा. लेकिन हमारे घर मे रिवाज है के नौकर मालिक के बाद खाते है." ऋतु ने भी अर्जुन को उसके ही लहजे मे जवाब दिया ये देख अलका मुस्कुरा रही थी.

"दीदी आप खाना खाओ नही तो फिर खाँसी आ जाएगी." अर्जुन ने अब अलका को छेड़ा तो ऋतु और अलका दोनो ही हँसने लगी

"चाची आज मुन्ना दूध ही पिएगा." जब ये बात अलका ने कही तो चारो बहने खिलखिलाकर हँसे लग पड़ी और अर्जुन ने तल्खी से अलका को देखा लेकिन कुछ कहा नही. ऋतु ने भी उसकी प्लेट लगा दी थी लेकिन अर्जुन ने खाना शुरू नही किया.

"अर्रे मेरा प्यारा भाई. चल गुस्सा नही करते देख खाना ठंडा हो रहा है ना."माधुरी ने ये बात पीछे से अर्जुन के गले मे हाथ डालते हुए कही तो अर्जुन के चेहरे पे वापिस चमक आ गई और वो खाने लगा. अलका ने देखा तो उसको उसकी ग़लती महसूस हुई लेकिन वो चुपचाप खाना बीच मे छोड़ अपने कमरे मे चली गई.

"अच्छा सब टाइम से सो जाना अब ठीक है. सुबह बहुत काम है. और माधुरी और कोमल अभी तुम दोनो एक बार नहा लो फिर मा जी के साथ पूजा करनी है 10 बजे.", ललिता जी ने ये बात सबसे कही थी.

अर्जुन उठा और चल दिया उपर अपने कमरे मे. समय था कि कट ही नहीं रहा था. वापिस उठकर उसने टेलीविजन चालू किया और हाथ मे तकिया लेकर बैठ गया. ज़ी सिनिमा चॅनेल पर एक डरावनी फिल्म आ रही थी "रात", वो बस वही देखने लगा. थोड़ी देर में ही ऋतु और अलका उपर आ गये कपड़े बदल कर. अलका का चेहरा अभी उतना नही चमक रहा था लेकिन वो ठीक लगने की कोशिस कर रही थी.

"क्या देख रहा है तू?" ऋतु ने हक़ जमातेहुए ये बात कही अर्जुन से और बैठ गई उसके साथ. ये पहली बार था कि वो बड़े सोफे पे ऐसे बैठी थी.

"तू वहाँ क्यो बैठी है? चल इधर आ देख कितनी जगह है यहा." उसने अलका को भी ऑर्डर दिया तो वो कुछ सहमी हुई से ऋतु के साथ बैठ गई. ऋतु का ध्यान फिल्म मे था, अलका चुपके चुपके टेलीविजन और अर्जुन को देखे जा रही थी. 10 मिनिट बाद ब्रेक हुआ तो ऋतु खड़ी हुई. "यार फिल्म मत बदलना मैं बस अभी आई पानी लेकर." इतना बोलकर वो चली गई और पीछे रह गये अर्जुन और अलका.

"आई एम सॉरी अर्जुन." जैसे ही अर्जुन को ये आवाज़ सुनाई दी तो उसकी नज़र गई अलका पर जिसकी आँखे भीगी हुई थी. वो एक झटके मे खड़ा हुआ और अपने दोनो हाथो से अलका का चेहरा थामते हुआ बोला, "दीदी, ये क्या है? किस बात की सॉरी? आप रो क्यू रही हो?" उसका दिल बैठ गया अपनी बहन की आँखों मे आँसू देख कर. और उसने अलका को अपने से चिपका लिया.

"वो मैने आ तुझसे ग़लत तरह से बात की थी इसलिए. जब तुझे बुरा लगा तो मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ. आई एम सॉरी अर्जुन.", इतना बोलकर वो फफक पड़ी.

" ओह्ह्ह चुप हो जाओ दीदी. वो तो देखो रोज का मज़ाक ही था ना. अब आपकी आँखों मे आँसू देख कर मेरे दिल मे दर्द हो रहा है. प्लीज़ चुप हो जाओ." और उसने एक बार अलका के गाल चूमे और सर सहलाया. सीढ़ियों पर कदमो की आवाज़ से अलका सीधा बाथरूम मे चली गई. मूह सॉफ करने और अर्जुन वापिस वही बैठ गया. "कितनी भोली है अलका दीदी" उसने मन मे सोचा.

"ये महारानी कहाँ चली गई अब.?" ऋतु ने आते ही अर्जुन से पूछा.

"वो दीदी वॉशरूम गई है."

इतने में ही अलका बाहर आ गई. चेहरा पानी से धोया हुआ था और कुछ बूंदे अभी भी थोड़ी से नीचे टपक रही थी टीशर्ट पर.

"क्या हुआ जो तुझे मूह धोना पड़ा?" ऋतु ने मज़ाक किया तो अलका ने भी हंसते हुए जवाब दिया, "वो तूने दिन मे गाल छु लिए थे ना तो अभी भी जलन हो रही थी." और वो दोनो हंस पड़ी. अर्जुन को इल्म नही था कि इन दोनो ने दिन मे क्या किया था.
 
तीनो 11 बजे तक फिल्म देखते रहे. बीच बीच मे अलका ऋतु का हाथ दबा देती थी जब भी कोई डरावना सीन आता था. ऐसे ही

जब फिल्म ख़तम हुई तो वो दोनो चल दी अपने कमरे की ओर. अर्जुन ने भी सोचा की एक चक्कर नीचे लगा आता हू.

"आज तो मुझे और कोमल को नीचे ही सोना है दादी जी के पास. वो पूजा के बाद फिर मैं कल तेरे साथ छत पर सोउंगी.", ये बात माधुरी ने अर्जुन के कान मे कही जब वो रसोई मे अकेला खड़ा पानी पी रहा था.

"ठीक है दीदी." इतना बोलकर उसने जल्दी से एक छोटा सा चुम्मा ले लिया माधुरी के गाल का.

"बदमाश." और मुस्कुराती हुई वो वहाँ से बैठक की तरफ़ चल दी जहाँ पूजा हो रही थी. अर्जुन भी यूही घूमता फिरता तीस री मंज़िल पर चला गया और बैठ गया ख़ूले आसमान के नीचे. तारे टिमटिमा रहे थे और बड़ी अच्छी हवा चल रही थी. वो कितनी ही देर ऐसा बैठा रहा और निहारता रहा नीले-काले आकाश को. उसका ध्यान टूटा जब अलका की आवाज़ सुनाई दी. "तो जनाब यहा बैठे है और हमने सारा घर देख लिया" बड़ी चंचलता से वो अर्जुन की तरफ चली आई. अब अर्जुन का ध्यान गया अपनी दीदी की तरफ. बिल्कुल चुस्त जीन्स और टाइट टॉप मे वो कमाल लग रही थी. उसको कपड़ो का रंग नही दिख रहा था.

"चलो जल्दी नीचे चलो." अर्जुन ने अलका का हाथ पकड़ा और उसको खींचता हुआ दूसरी मंज़िल वाले ड्रॉयिंग रूम मे आ गया. लाइट जलाई तो उसके होश ही उड गये. वो हल्का गुलाबी रंग का टॉप ऐसा लग रहा था जैसे अलका के जिस्म का ही हिस्सा हो. दोनो का रंग एक सा था. और चुस्त नीली जीन्स ऐसे चिपकी थी जैसे खाल के उपर कोई रंग किया हुआ हो. पिंडलिओं को आकर, जांघे, कूल्हे सब उसकी आँखों के सामने ही हो जैसे. अर्जुन को अपनी तरफ यू देखते देख अलका की नज़रे फर्श मे गढ़ने लगी और चेहरा लाल हो चुका था. अर्जुन ने जैसे ही अपने कदम अलका दीदी की तरफ किए दोनो के दिल की धड़कन बढ़ गई. उसने बड़े आराम से एक हाथ से अलका की ठोडी उपर करी और दूसरे हाथ से उसकी कमर को लपेट लिया. "आ वेरी हॅपी बर्तडे टू दा मोस्ट ब्यूटिफुल गर्ल ओं अर्त." इतना बोलकर अर्जुन ने अपने होंठ अलका के होंठो से जोड़ दिए. अलका इस सबके लिए जैसे अंदर से ही तयार थी. उसने भी चुंबन का जवाब एक चुंबन से दिया." थॅंक यू सो मच फॉर मेकिंग इट दिस स्पेशल." और दोनो ऐसे ही चिपके खड़े रहे एक दूसरे के साथ.

"अब मैं चलती हू नीचे. मुझे सोना है भाई." उसने ये बात ऐसे कही जैसे सिर्फ़ चुप्पी तोड़ना चाहती हो जो कमरे मे फैली थी.

"कही नही जा रही हो आप अभी. मेरा रिटर्न गिफ्ट है के आप थोड़ी देर मेरे पास रहोगी." इतना बोलकर उसने अलका दीदी को अपनी बाहों मे उठा लिया और अपने कमरे मे ले आया. यहा सिंगल बेड ही था. और दोनो किसी चुंबक की तरह चिपक गये एक दूसरे से.

"आई लव यू अर्जुन.", अलका ने ये बात अर्जुन का चेहरा अपने दोनो हाथो मे पकड़ते हुए कही. और ये सुनते ही अर्जुन ने दीदी को अपने उपर लिटा लिया और फिर से अपने होंठ दीदी के होंठो से मिला दिए. बारी बारी से दोनो लबो को चूस रहे थे और अब हालत ये थी की अलका की लार अर्जुन के मूह मे जा रही थी. होंठ बुरी तरह से भीग चुके थे. अलका की जिंदगी मे ये पहला पुरुष स्पर्श था. और उसको एहसास हुआ के इस चुंबन मे और ऋतु के साथ किए हुए मे कितना फरक था. एक पुरुष का स्पर्श ही कही ज़्यादा सुखद था ऋतु के साथ की हुई छेड़छाड़ से.

"आपके वहाँ पर तिल है.?" अर्जुन ने ये बात जब अलका से कही तो वो और ज़ोर से लिपट गई शरमाती हुई. उसके टॉप के बड़े गले से अर्जुन ने आधा मंज़र देख लिया था.

"बताओ ना"

"अब देख लिया तो क्यू पूछ रहा है." शरमाते हुए अलका ने कहा.
 
"देखा कहा है सिर्फ़ झलक ही तो मिली थी. प्लीज़ देखने दो ना." अर्जुन ने प्राथना की तो अलका शरमाते हुए हंस दी.

"लाइट बंद कर दो अर्जुन."

"फिर मैं इस खूसूरत परी का दीदार कैसे करूँगा." कहते ही अर्जुन ने अपनी दीदी को अपने नीचे घुमा लिया.

अब वो धीरे धीरे टॉप को उपर उठा रहा था और अलका ने अपना मूह तकिये मे छुपा लिया था. जैसे ही टॉप ब्रा से उपर हुआ अर्जुन कुछ पल के लिए वही रुक गया. अलका का पेट मखमल की तरह मुलायम और सपाट था. नाभि थोड़ी ही गहरी थी और उसका बेजोड़ रंग. अर्जुन ने ब्रा के निचले हिस्से पर अपनी जीभ भिड़ा दी. उसके ऐसा करते ही अलका की एक तेज सिसकी निकल गई,'आ ह्ह्ह "

अर्जुन वैसे ही झुका रहा और उसने ब्रा के कप से दाया दूध पकड़ लिया.

"मत कर भाई मुझे कुछ हो रहा है." अलका ने धीमे से ये बात बोली लेकिन इसमे इनकार ना था. और अर्जुन ने उसका पूरा मोटा दूध उस ब्रा के कप से बाहर निकाल लिया. गोल गोरे तने हुए चूचे पर किशमिश के आकर का गुलाबी-भूरा निप्पल. और उसके थोड़ी उपर एक मूँग दाल जितना काला तिल. अर्जुन ने अपने होंठ उस तिल के उपर रख दिए.

अलका को ऐसे लगा जैसे अर्जुन ने वहाँ से उसकी आत्मा चूस ली हो. उसका धड़ बिस्तर से उपर उठ गया और तभी अर्जुन ने उसका वो गुलाबी निप्पल अपने मूह मे लेकर चूसना शुरू कर दिया.

"आ भाई. क्या जादू कर रहा है तू. देख मैं मर जाउन्गी इस आनंद से मत कर." अब अलका तड़पने लगी थी लेकिन अर्जुन यही ना रुका उसका वो दूध चूस्ते हुए दूसरे हाथ से उसना अलका का दूसरा चूचा भी बाहर निकाल लिया. ब्रा के कप नीचे लटक रहे थे और वो एक दूध को दबा रहा था और एक को चूस रहा था. बारी बारी से चूस दबा कर उसने अलका के दोनो बड़े चूचे लाल कर दिए थे

"दीदी आपको पता है के आपके ये अनार मुझे सोने नही देते. दिल करता है बस इनको चुसता दबाता रहूं." अर्जुन ने अपने आप को पूरी तरह से अलका के उपर बिछते हुए कहा. उसका लंड अब अलका की जाँघो को रगड़ रहा था.

"भाई क्या तू ऐसे ही मुझे सारी ज़िंदगी प्यार करेगा.?" उसने अर्जुन का मूह उपर करते हुए कहा.

"मरते दम तक." इतना बोलकर दोनो एक दूसरे की जीब से जीभ लड़ाने लगे. कभी अर्जुन अलका की जीब अपने मूह मे लेके चुसता तो कभी अलका. अलका की चूत ने सिर्फ़ चूचे चूसाई से ही पानी बहा दिया था. जैसे ही उसका जिस्मा अकड़ा बाहर कार का हॉर्न सुनाई दिया.

अलका और अर्जुन दोनो ही खड़े हो गये और अर्जुन सामने वाली सीडीयों से नीचे चल दिया गेट खोलने. उसके पिता शंकर जी वापिस आ गये थे.
 
अलका और अर्जुन दोनो ही खड़े हो गये और अर्जुन सामने वाली सीडीयों से नीचे चल दिया गेट खोलने. उसके पिता शंकर जी वापिस आ गये थे.

" यू स्टिल अवेक?"

"एस डेड. आक्च्युयली मोस्ट मेंबर्ज़ आर अवेक. सम रिटूयल्स."

"ओके, आई एम गोयिंग टूमी रूम. जस्ट पास दिस मेसेज टू युवर मदर." कार खड़ी करके शंकर जी अंदर चले गये और अर्जुन ने गेट पे ताला लगा लिया अंदर से.

"मा पापा आ गये है." पूजा बस अभी ख़तम हुई थी तो सब लोग खड़े हो गये. ललिता जी रेखा जी अपने कमरे की तरफ चल दिए और कोमल और माधुरी अपनी दादी के साथ. अर्जुन जब उपर आया तो वहाँ कोई नही था. लेकिन वो खुश था क्योंकि बिस्तर पर एक कागज के टुकड़े पर लिखा था "आई लव यू".
 
अपडेट 12

होली के दिन दिल जुड़ जाते है

रात के तकरीबन 2 बजे थे और कौशल्या जी के कमरे मे सोई हुई माधुरी की नींद प्यास की वजह से खुल गई थी. कमरे मे

हल्की रोशनी मे उसने देखा कि पानी बिल्कुल विपरीत दिशा मे रखा था और इस बीच दादी और कोमल सो रहे थे. माधुरी बिना शोर किए रसोईघर की तरफ चल दी. फ्रिज से बॉटल निकाल के वही खड़े होकर पानी पिया और पेशाब करने के लिए आँगन मे बने बाथरूम की और चल दी. माधुरी नंगे पैर ही थी तो उसके चलने की कोई आवाज़ नही थी. घर मे घुप शांति छाइ

हुई थी. माधुरी ने कमोड पे बैठने से पहले पाजामा सरकाया और बैठ गई. इतनी शांति मे उसके पेशाब की सीटी सी आवाज़

मधुर शोर मचा रही थी. निपटने के बाद बाहर निकल कर जैसे ही माधुरी नाल की तरफ बढ़ी उसके कानो मे चूड़ियों के

खनकने की आवाज़ आई. ये बहुत हल्की ही आवाज़ थी लेकिन इतनी शांति थी की सुनाई दे ही गई. माधुरी ने ध्यान दिया तो ये चाची के कमरे से आ रही थी जहाँ अभी भी ज़ीरो बल्ब की रोशनी हो रही थी. धीमे कदमो से वो उत्सुकता से उस तरफ

चल दी. दीवार पे लगी हुई बड़ी खिड़की के पल्ले थोड़े से खुले हुए थे तो माधुरी ने अपनी नज़र वही गढ़ा दी. उसकी नज़र

जैसे ही अंदर देखने की अभ्यस्त हुई तो उसका गला ही खुसक हो गया. रेखा चाची जो हमेशा सारी मे लिपटी रहती थी और

आधे से ज़्यादा समय सर पे भी पल्लू रखती थी माधुरी के नज़रो से कुछ ही दूरी पे एकदम नंगी पड़ी थी. उनके बड़े बड़े

अमृत कलश किसी पेंडुलम से हिल रहे थे. उसको चाचा का चेहरा और छाती ही नज़र आ रही थी जो बड़ी बुरी तरह से

चाची की टाँगे उपर उठाए मशीनी अंदाज मे धक्के पेल रहे थे.थपथप, फूच-फूच की आवाज़ से कमरा गूँज रहा था

उनका हाथ चाची के एक बड़े उभार को बेदर्दी से निचोड़ रहा था लेकिन चाची के चेहरे पे मज़े की लहर दिख रही थी. उंसकी सिसकारिया हल्की थी लेकिन वो लगातार सिसक रही थी.

कुछ ही देर मे चाचा ने उन्हे घुटनो के भार कर दिया. पहली बार माधुरी को चाचा का हथियार नज़र आया जो तकरीबन 6-7

इंच लंबा था और चाची की चूत के रस से भीगा चमक रहा था.

"अब डाल भी दो जी." बड़ी धीमी सी आवाज़ सुनाई दी चाची की फिर चाचा ने हंसते हुए अपना लंड चूत पर सेट करके एक करारा धक्का लगा दिया और पूरा लंड जड़ तक अंदर घुस चुका था. "आई मा. हा ऐसे ही करते रहो." और चाची की बात मानते हुए चाचा लग गये उनकी चूत ढीली करने. उनके बड़े चूतड़ हर धक्के के साथ हिल रहे थे और बड़े बड़े चूचे हवा मे झूल

रहे थे. कुछ देर बाद ही चाची का सर बिस्तर पर टिक चुका था और उनकी साँसें भी माधुरी को सुनाई दे रही थी.

"तुम्हारा तो हो गया जान अब ज़रा इसका भी ख़याल करो." चाचा ने अपना लंड चाची के मूह के सामने कर दिया ये देख माधुरी

चकित रह गई के ये क्या हो रहा है

"इधर लाओ जी नही तो फिर तीसरी बार मेरी जान निकाल दोगे." इतना बोल मुस्कुराती हुई रेखा चाची ने चाचा का लंड हाथ मे

पकड़ लिया और अगले ही पल आधे से ज़्यादा उनके लिपस्टिक से सजे रसीले होंठो मे घुस चुका था. और चाची मज़े से अपना मूह उसपे चला रही थी. ऐसा नज़ारा माधुरी ने अपने 25 साल के जीवन मे पहली बार देखा था और वो भी अपनी चाची को करते.

इधर चाचा की आँखें मज़े से बंद हुई पड़ी थी, ये देख माधुरी सोच रही थी के उसकी चाची कितनी शरीफ और संस्कारी

दिखती है लेकिन चाचा के साथ तो खुल कर मज़े उड़ा रही है.

"मेरा होने वाला है जान." चाचा की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी तो देखा कि चाची अभी भी उनका लंड चूसे जा रही है.

और फिर जब उसने देखा कि अब चाची ने लंड निकाल दिया तो नज़र आया के कुछ सफेद बूंदे उनके होंठो पर लगी है.

" हे भगवान ये दोनो तो कॉलेज के जोड़ो को भी पीछे छोड़ दे." माधुरी अपनी चाची का अंदाज देख प्रभावित हो गई थी.

तभी तो चाचा उनके आगे पीछे घूमते रहते है जब भी घर होते है. वो दोनो अब हल्के कपड़े पहन चुके थे. माधुरी भी

चुपके से खिसक ली वहाँ से. उसकी चूत ने अतचा ख़ासा पानी बहा दिया था ये फिल्म देख कर. वापिस कमरे मे आकर पता नही वो कितनी देर करवटें बदलती रही फिर थोड़ी ही देर मे उसकी भी आँख लग गई.
 
अर्जुन 4:30 बजे अपना ट्रॅक पेंट पहन कर नीचे आया था तो देखा उसके पिता जी भी स्पोर्ट्स शूस पहनी शरीर गरम कर रहे

थे. "गुड मॉर्निंग बेटा. आई वाज़ एक्सपेक्टिंग यू अट दिस टाइम आंड सी यू आर राइट ऑन टाइम." शंकर जी ने कहा तो अर्जुन ने भी

प्रतिउत्तर दिया." गुड मॉर्निंग डेड. बट आई वाज़ नोट एक्सपेक्टिंग यू अट दिस अर्ली टाइम. बट ग्लॅड तट यू स्टिल मेनटेन युवर हेल्थ रुटीन." और मन मे सोचने लगा के अगर आज लेट हो जाता तो अपने पिता जी नज़र ना मिला पता और दादा जी से भी पिताजी सवाल करते.

"कम ऑन. लेट'स गो." इतना बोलकर शंकर जी ने हल्के कदमो से दौड़ना शुरू कर दिया और अर्जुन भी उनका अनुसरण करने लगा. ऐसे ही 15 मिनिट दौड़ने के बाद उसके पिताजी पार्क मे चले गये और अर्जुन रोज की तरह अपने रास्ते हो लिया. शंकर जी पार्क मे हल्की चहल कदमी करते हुए घास पे बैठ योगा करने लगे और फिर नंगे पाव घास पर टहलने लगे. अर्जुन ने जब देखा कि आज वो 5 किमी आ चुका है तो वापिस चल दिया दौड़ लगाता हुआ घर पे. मौसम मे अभी भी हल्की ठंडक थी लेकिन अब उजाला हो रहा था.

5:30 बजे जैसे ही वो घर के अंदर आया तो सामने अपने पिताजी को दादा जी के साथ बैठे पाया. दोनो बातें कर रहे थे की

दादी चाय की ट्रे लेकर आ गई. "आ गया मेरा शेर." दादाजी ने अर्जुन को जूते खोलते देखा तो पुकारा.

"हा दादाजी. मौसम अच्छा था तो आज पता ही नहीं चला."

"अच्छा अब तू यहा बैठ मैं तेरे लिए दूध लेके आई." इतना बोलकर दादीजी वापिस चली गई और रामेश्वर जी अपने बेटे से बातें

करते हुए ही अर्जुन के पाँव की उंगलियों पर सरसो के तेल से मालिश करने लगे.

"आप तो इसको खिलाड़ी ही बनाने मे लगे हो पापा. इतनी ट्रैनिंग और सेवा से कल को अगर ये कही आगे निकल गया तो?", शंकर जी ने अपने पिता जी से ज़रा हल्के से ये बात कही.

"बेटा बड़े सांड़ को पालने वाला उसको एक पतली सी रस्सी से भी बाँध ही लेता है." इतना बोलकर रामेश्वर जी ने अपने बेटे की तरफ देखा तो अब शंकर जी शांत मुद्रा से मुस्कुरा रहे थे.

"किस सांड़ की बात हो रहे है दादा जी?", अर्जुन ने भोलेपन से पूछा तो उसके दादाजी ने भी हँसके कहा, "बेटा तेरे पापा की ही

बात कर रहा हू. ये शादी से पहले सांड़ जैसा ही था और फिर तेरी मा के प्यार से देख अब शांत बैल बन गया है." इस बात

पर तीनो ही हंस दिए. शंकर जी को आज बड़ा अच्छा महसूस हो रहा था. दादी जी ने दूध का लौटा अर्जुन को दिया और तौलिया कपड़े शंकर जी. "जा बेटा अब नहा ले. फिर तेरा क्या भरोसा तू कहा निकल जाए." अपनी मा को एक बार फिर गले से लगा के अर्जुन के पिता जी चल दिए बाथरूम की तरफ और अर्जुन दूध ख़तम कर पिछले आँगन मे चल दिया जहाँ पर उसकी मा रेखा झाड़ू दे रही थी. आ गया मेरा बचा", इतना कह उन्होने अर्जुन का माथा चूमा और गले लगाया. अभी तक माधुरी, कोमल और ऋतु सो रहे थे लेकिन अलका अपनी दादी जी के पास पूजा मे बैठी थी, उसका जनमदिन जो था.
 
"अच्छा बेटा तेरी ताई जी उपर सफाई कर रही है और मैं अब रसोईघर मे जा रही हू. तू जाकर ऋतु और कोमल को उठा दे. फिर नहाने चले जाना." और इतना बोलकर वो रसोईघर मे चली गई. अर्जुन भी अपनी बड़ी दीदी के कमरे की तरफ चल दिया. उसने एक बार दरवाजे पर थपथपाया लेकिन कोई जवाब नही आया. दरवाजा वैसे ही भिड़ा था तो उसने धकेल दिया और अंदर आ गया.

कोमल ने छाती तक एक चद्दर ले रखी थी और वो सीधी सो रही थी लेकिन जब उसकी नज़र ऋतु दीदी पर गई तो उसके कदम

उनकी तरफ खुद ही चल दिए. घुटने तक पाजामा चढ़ा हुआ था, गोरी पिंडलियाँ नुमाया हो रही थी और फिर पूरा पेट कमीज़ से

बाहर था. इतनी खूबसूरत और गोरी पतली कमर, और चाँद से चेहरे पे आई हुई बालो की लटे. खूबसूरती का मुजस्समा सी

दिख रही थी. ध्यान से देखा तो ऋतु के चूचे कमीज़ के नीचे आज़ाद दिख रहे थे. अर्जुन होश मे आया और ऋतु के पास जा

बैठा. "दीदी उठिए. आज फाग है और अलका दीदी का जनमदिन. उठिए ना दीदी." उसने अपनी बहन के गाल को एक बार हल्के से छुआ और फिर बाह पे हल्के से थपथपाया. ऋतु उनिंदी से अपने आस पास देखने लगी. जैसे ही उसको अपने पास अपना छोटा भाई बैठा दिखा उसकी मासूम सूरत मे एक पल के लिए खो सी गई वो. और उसने उसको अगले ही पल गले लगा लिया. "गुड मॉर्निंग भाई. ग्लॅड टू सी यू हियर." एक तरफ तो अर्जुन को ऋतु दीदी के नंगे चूचे अपनी छाती पर महसूस हुए, लेकिन अगले ही पल वो अपनी बहन के प्यार को महसूस करने लगा. लेकिन उसने अपने हाथ से ऋतु दीदी को नही जकड़ा.

"आज तो शायद चमत्कार ही हो गया. या मैं सपना देख रही हू." जैसे ही ऋतु ने कोमल की आवाज़ सुनी वो झट से अर्जुन से अलग हो गई. "मा को बोल वो कॉफी बनाए मैं अभी फ्रेश हो के आ रही हू." ऋतु ने जैसे आदेश सा दिया और अर्जुन मशीन सा बाहर चल दिया.

"तू तो मेरी समझ से बाहर ही है ऋतु. इतना प्यार भी करती है उस से और फिर उसको अपने पास भी नही आने देती. क्या समस्या है तेरी?", थोड़ा नाराज़गी भरे स्वर मे उसने ऋतु को डाँट सी लगाई क्योंकि उसके इस व्यवहार से अर्जुन कोमल से मिले बिना ही चला गया था.

"जो अपनी मर्ज़ी से कभी दूर गया हो और फिर इतने साल बाद वापिस आए तो रिश्ते मे फरक आ ही जाता है दीदी.", थोड़ा गुस्सा था ऋतु की आवाज़ मे और दर्द भी. वो चुपचाप बाहर निकल गई. अर्जुन ऊपर वाले बाथरूम मे चला गया था अपनी मा को ऋतु दीदी का ऑर्डर बता कर. अर्जुन को उसके दादाजी ने एक बात बार बार सिखाई थी, जो बात या इंसान तुम्हे दुख दे उसके बारे मे सोचना नही.

और उसने वही किया. बस इतनी खुशी थी की वो आज 9 साल बाद अपनी बहन के गले लगा था. नहाने के बाद उसने संजीव भैया को उठाया और खुद तीसरी मंज़िल पर जाकर बैठ गया. बड़ी शांति थी वहाँ पर तो वो पानी की टंकी से पीठ लगा कर आँखें

बंद करके बैठ गया. 15 मिनिट गुज़रे होंगे के उसको अपने होंठो पर कुछ गीला सा महसूस हुआ. पलके खोली तो देखा माधुरी

दीदी अपनी जीभ उसके होंटो पर फिरा रही थी. बड़ी ही सेक्सी लग रही थी उनकी ये हरकत. अर्जुन ने भी नीचे से हाथ बढ़ा कर उनका एक दूध पकड़ कर दबा दिया. "अऔच. बदमाश कुछ भी करता है. च्ला नीचे खाना खा ले फिर तो टाइम मिलेगा नही. फाग खेलने पड़ोसी और ऋतु/अलका की सहेलियाँ आ जाएँगी." इतना बोलकर वो पलट गई जाने के लिए लेकिन अर्जुन ने उनको एक बार पीछे से बाहो मे जकड़ बूब्स दबाए और उनके कुल्हो पर चुटकी काट उनसे आगे भाग गया. माधुरी भी अपने छोटे भाई की मस्ती देख खुश होती हुई उसके पीछे चल दी..
 
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