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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

अर्जुन तो अपनी दीदी की साँसों की गर्मी से सुन्न हो गया था जो सीधा उसके कान

की लौ पर महसूस हुई. वो कुछ ना बोला और सिर्फ़ अलका को उपर से नीचे एक बार देखा और फिर यहा वहाँ देखने

लगा. अलका अपने भाई की इस अदा पर मुस्कुरा उठी और उसने भी अपना ध्यान सामने की तरफ कर दिया.

"तू कब आई अलका? और ये जनाब कौन है?" एक बड़ी ही सुरीली आवाज़ पड़ी अर्जुन के कान मे तो उसने देखा के

2 लड़किया उसके और अलका दीदी के पास खड़ी है. और जिसकी ये आवाज़ थी वो एक मध्यम से कद की बेहद गोरी

लड़की थी. एकदम फक्क सफेद सी उस लड़की के कंधे तक तराशे हुए घने खुले बाल थे और उसने एक लाल

टॉप और नीला डेनिम पेंट पहना हुआ था. और साथ मे जो लड़की थी वो थोड़ी साँवली सी लेकिन भरे हुए शरीर

वाली थी. उसने एक चटख काला कमीज़ और सलवार पहना था. जहा उस गोरी की छोटी छोटी भूरी आँखें थी,

इस साँवली से लड़की की कुछ ज़्यादा ही बड़ी और काली थी. फिर अर्जुन ने संकोचवाश नज़रे खिड़की की तरफ कर

ली लेकिन कान उन्ही की तरफ थे.

"अर्जुन, इन से मिलो ये है आशा नेगी (गोरी) और ये है नुसरत ख़ान. दोनो ही मेरी क्लासमेट्स और पक्की दोस्त है."

अलका ने जब ये कहा तो अर्जुन ने अपने दोनो हाथ जोड़ उनका अभिवादन किया जिसे देख दोनो हंस पड़ी.

"अर्रे अर्रे.. ये क्या कर रहे हो? क्या हम दोनो तुम्हे आंटियाँ लगती है जो हाथ जोड़ रहे हो." ये बात कही थी

नुसरत ने और अपना हाथ आगे कर दिया.

"मेरा वो मतलब नही था." झेन्पते हुए अर्जुन ने भी हल्के से अपना हाथ आगे बढ़ा लिया तो दोनो सुंदरियों ने

बारी बारी से उसका हाथ भींच लिया. "ये हुई ना बात." कह दोनो ही उसको उपर से नीचे देखने लगी.

इधर अलका का नंबर आ गया था तो वो अपना काम करने लगी गई. यहा अर्जुन फँस गया था इन 2 बेबाक लड़कियों

मे.

"तो मिस्टर. अर्जुन क्या करते हो तुम?" ये सवाल किया आशा ने, सीधा अर्जुन के चेहरे को देखते हुए.

"जी अभी तो एग्ज़ॅम्स दिए है और कुछ ही दीनो मे स्पोर्ट्स अकॅडमी जाय्न करूँगा. 10 एप्रिल वापिस पढ़ाई और कोचैंग"

उसने झेन्पते हुए जवाब दिया. अर्जुन ज़्यादा ही शर्मा रहा था क्योंकि वो दोनो कुछ ज़्यादा ही खुलकर उसे ताड़ रही थी.

"ओह तभी इतना लंबे चौड़े हो. मतलब सिर्फ़ पढ़ाई और कसरत. कोई और खेल भी खेला है क्या कभी?" आशा के इतना

बोलते ही नुसरत भी खिलखिला के हंस पड़ी. लेकिन तब तक अलका का भी काम हो गया था.

"क्यों सता रही हो मेरे अर्जुन को तुम दोनो मिलकर? ये बिल्कुल शरीफ और प्यारा लड़का है." बड़ी अदा से अलका ने उसका

बाजू अपने दोनो हाथो से थाम लिया.

"तो हमें भी एक मौका दे इसका प्यार देखने का. फिर पता चलेगा कितना शरीफ है.?" इस बात पे तीनो लड़किया हंस

पड़ी. और अलका ने कुछ सोच कर बोला, "चल यार एक बार प्रॅक्टिकल फाइल्स सब्मिट करवा देते है फिर कॅंटीन मे बात

करेंगे. और अर्जुन हम तीनो अभी वापिस आ जाएँगी तब तक तू यही रहना. हमारा डिपार्टमेंट सामने वाला ही है."

ये बोलकर वो तीनो निकल गई और अर्जुन को पीछे छोड़ड़ गई हतप्रभ सा. जो अभी तक यही सोच रहा था कि सीधी

दिखने वाली ये लड़किया कितना बोलती है. और अलका दीदी ने उसको क्यो माना किया दीदी बोलने से? फिर अपने विचार वही ख़तम कर वो इधर उधर टहलने लगा. बिल्डिंग की सब तरफ अशोक, सफेदे और आम के पेड़ लगे थे. हर ब्लॉक मे

छोटे छोटे पार्क बने थे जहा बेंच भी लगे थे और अच्छी घँस भी थी, बिल्कुल सलीके से कटी . यूही टहलता

हुआ वो एक बेंच पे बैठ गया और पार्क मे बैठी हुई लड़कियों को देखने लगा. हर तरफ कई ग्रूप थे और सभी अपने

आप मे लगी हुई थी.

"आए लड़के तुम यहा क्या कर रहे हो?", अर्जुन का ध्यान उसके बिल्कुल पीछे से आई जोरदार आवाज़ की तरफ गया तो उसने

देखा एक 40-42 साल की महिला बेहद ही सलीके से पहनी क्रीम कलर की साड़ी मे खड़ी थी. आँखों पे काले पतले

फ्रेम का चस्मा था और खुले बाल.

"जी मैं यहा मिस अलका शर्मा के साथ आया हू. वो अभी अपने फाइल्स सब्मिट करवाने गई है. बी एस सी ईस्ट एअर के ब्लॉक मे."

अर्जुन ने हल्की घबराहट मे खड़े होते हुए जवाब दिया. उसको एहसास हो गया था कि ये एक टीचर है

और अर्जुन को ऐसे सावधान की मुद्रा मे खड़े देख उन मेडम का लहज़ा थोड़ा नर्म हुआ लेकिन अनुशाशित स्वर मे उसने कहा

"ठीक है ठीक है. लेकिन ज़्यादा इधर उधर मत जाना. ये गर्ल्स कॉलेज है तो यहा लड़के अलोड नही है."

"जी फिर मैं बाहर ही खड़ा हो जाउन्गा."

अर्जुन की मासूमियत देख वो मेडम भी मुस्कुरा दी और बोली, "बेटा ऐसी कोई बात नही है. तुम शरीफ हो और उमर भी

ज़्यादा नही लगती तुम्हारी. वो तो मैं इसलिए कह रही थी की यहा का माहूल थोड़ा खराब है. तुम्हारी सावधानी के लिए

मैने ऐसा कहा. तुम यही आराम से बैठो." मेडम के इतना कहते ही वो वापिस बेंच पर बैठ गया. और तभी वही पे अलका

भी आ गई अपनी दोनो सहेलियों के साथ.

"गुड मॉर्निंग मेम. हम तीनो ने आपके सब्जेक्ट्स की प्रॅक्टिकल फाइल भी लब असिस्टेंट को सब्मिट करवा दी है. प्लीज़ थोड़ा

रहम करना." अलका ने शोखी से ये बात कही तो उन मेडम ने उसका कान हल्के से खींचते हुए कहा, "तुझपे तो बिल्कुल

भी रहम नही होगा. लेकिन मुझे पता है मेरी लाडली ही टॉप करेगी." इतना कहकर उन्होने अलका के सर पे हाथ फेरा और

फिर बोली, "क्या अलका इस मासूम से लड़के को तू यहा बिठा गई? और तुम दोनो भी तो थी कम से कम एक तो इसके पास रह ही सकता था. तुम्हे तो पता ही है डेंटल डिपार्टमेंट का हाल."

"सॉरी मेम, जल्दी मे ध्यान ही नहीं रहा." तीनो ने कान पकड़े तो मेडम ने हंसते हुए विदा ली वहाँ से.

"क्या कह रही थी गुप्ता मेडम अर्जुन?" अलका ने पूछा अर्जुन से लेकिन जवाब मिला आशा से

"और क्या कहेगी दिल आ गया होगा उनका इस्पे. वैसे भी तो हॅटा कट्टा है ये." और फिर हँसी की आवाज़ गूँज उठी.

"अच्छा अब बहुत हुआ तुम दोनो अब कोई मज़ाक नही करोगी." ये बात जब अलका ने कही तो उसकी आवाज़ नॉर्मल लेकिन 2 टुक थी.

और उन दोनो ने भी हाँ मे सर हिला दिया. "चल अब थोड़ी देर कॅंटीन मे चलते है फिर मुझे वापिस भी जाना है और अर्जुन

को भी काम है." बोलकर अलका अर्जुन का हाथ थाम के चल दी पार्क के दूसरी तरफ जहा टीन की चद्दर से ढँकी एक

लंबी कॅंटीन बनी हुई थी. वो दोनो भी साथ चल दी.
 
"अच्छा अब बहुत हुआ तुम दोनो अब कोई मज़ाक नही करोगी." ये बात जब अलका ने कही तो उसकी आवाज़ नॉर्मल लेकिन 2 टुक थी.

और उन दोनो ने भी हाँ मे सर हिला दिया. "चल अब थोड़ी देर कॅंटीन मे चलते है फिर मुझे वापिस भी जाना है और अर्जुन

को भी काम है." बोलकर अलका अर्जुन का हाथ थाम के चल दी पार्क के दूसरी तरफ जहाँ टीन की चद्दर से ढँकी एक

लंबी कॅंटीन बनी हुई थी. वो दोनो भी साथ चल दी.

कॅंटीन का वातावरण भी उर्जा से भरपूर था. आमने सामने लगी कुर्सी टेबल्स पर बैठी लड़कियों का शोर, खाना पीना

और गपशप हो रही थी. ये चारो भी कोने की एक टेबल पकड़ के बैठ गये. अलका ने सबसे पूछा खाने का तो जहाँ

नुसरत और आशा ने कोला की फरमाइश रखी, अलका ने कोल्ड कॉफी की. अर्जुन काउंटर पे गया और वहाँ से 2 कोला, एक कोल्ड कॉफी और अपने लिए ऑरेंज जूस लेकर ट्रे सहित टेबल पे आ गया. उसको हर महीने जेबखर्ची मिलती थी जिसे वो जमारखता था. संजीव भैया से 200, 500 दादा जी की पेन्षन से, 300 अपने पिता शंकर जी से और 300 ही अपने ताऊ जी से.

आजभी वो घर से निकलते हुए 1500 रुपये पर्स मे लेके आया था क्योंकि ये शंकर जी की हिदायत थी की अगर कभी मार्केट

जाना हो या स्कूटर से जा रहे हो तो अपनी जेब मे हमेशा कुछ रकम रखनी चाहिए. यहा तो बिल भी कुछ खास नही आया

था सिर्फ़ 60 रुपये.

"तो आज की ट्रीट अलका के बाय्फ्रेंड की तरफ से है? मुझे तो लगा था कि ये अलका देगी अपने आने वाले जनमदिन की. क्योंकिपरसो तो छुट्टी है." नुसरत ने इतना कहा तो अर्जुन और अलका एक दूसरे को देखने लगे, जो एक दूसरे की विपरीत दिशा मे बैठे थे.

आशा, जो अर्जुन के साथ बैठी थी उसने बात को और बढ़ते हुए कहा, "अर्जुन जी, इस से काम नही चलेगा. हमें तो पार्टी चाहिए. अभी इस से काम चला रहे है लेकिन एग्ज़ॅम्स के बाद हमें अपनी मर्ज़ी की पार्टी देनी पड़ेगी. नही तो भूल जाओ अलका को." और दोनो लड़कियों ने आपस मे ताली मारी. यहा अर्जुन झेंप रहा था और उसका गला खुसक हो गया था ये सुनकर की दीदी ने अपनी सहेलियों को उसे अपना बाय्फ्रेंड बताया है..

"अर्रे बस भी करो अब. और ले लेना पार्टी जैसी मर्ज़ी. क्या याद करोगी किसी दिलदार से पाला पड़ा है." ये बात अलका ने अर्जुन की तरफ स्माइल करते कही थी जिसे सुनकर एक बार फिर अर्जुन को झटका लगा. उसका जूस गले में ही अटक गया था. "ये सब क्या हो रहा है मेरे साथ. और दीदी भी" बस यही सोच रहा था वो के तीनो उठ खड़ी हुई. उसने देखा तो उसका गिलास भी खाली हो चुका था.

"अच्छा तो अब हम निकलते है. टाइम भी हो गया है काफ़ी. एग्ज़ॅम्स मे मिलते है नही तो टेलिफोन पर बात हो ही जाएगी."

अलका ने कहा और उन दोनो ने अलका और अर्जुन से हाथ मिलाया. हाथ मिलते हुए नरगिस ने अर्जुन की हथेली सहला दी औरनज़दीक आकर कहा , "तुम भी फोन कर सकते हो. अलका की कॉलेज डाइयरी के पीछे नंबर है मेरे घर का. रात मे अकेली ही होती हू मैं."

अर्जुन तो बेचारा पानी पानी हो गया था ये सुन कर. वो तो अच्छा हुआ अलका ने उसका हाथ खींचा और चल दिए गेट की तरफ. दोनो बिल्कुल किसी प्रेमी जोड़े की तरह चल रहे थे. जहाँ अर्जुन सीधा चल रहा था वही अलका ने उसके बाह को थाम रखा था. बाहर आए तो एक बार फिर अलका ने सर पे दुपट्टा लिया और अर्जुन के पीछे बैठ गई.

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"भाई तुझे बुरा तो नही लगा आज जिस तरह से मैने तुझे मिलवाया अपनी फ्रेंड्स से?" स्कूटर के चलते ही अलका ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. अब वो बड़े ही आराम से उस से चिपक कर बैठी थी.

"देख भाई हमारी दुनिया कुछ ज़्यादा बड़ी नही है. घर के काम, कॉलेज और घर. बस यही दुनिया है. और वो दोनो भी बढ़ी अच्छी लड़कियाँ है. हा आपस मे सब मज़ाक चलता है लेकिन किसी का भी चरित्र खराब नही है." उसने अपनी बात बढ़ाई.

अर्जुन भी यही सोच रहा था कि उसकी चारों दीदी को कितनी थोड़ी सी आज़ादी तो मिलती है. कही कोई दोस्त नही ना कही आना जाना. वो तो फिर भी घूम लेता है, भैया के साथ बाहर चला जाता है. जो भी करना चाहता है उसके दादा जी उसका साथ देते है. बिना माँगे उसको इतना जेबखर्च और सुख मिलता है. दीदी लोग तो हर चीज़ पर निर्भर करती है. कितनी अजीब है इनकी जिंदगी. लड़की होने का मतलब इतनी बेड़िया, इतनी बंदीगई. पता नही उसको क्या सूझा और उसने स्कूटर घूमा दिया मॉडेल टाउन मार्केट की तरफ. जहाँ बड़े बड़े शोरुम और खाने पीने की अच्छी मार्केट थी.

"ये हम कहाँ जा रहे है? ये रास्ता तो घर की तरफ नही जाता भाई? और तू किसी बात का जवाब क्यो नही दे रहा?" अलका ने

घबराहट मे कई सवाल कर दिए लेकिन अर्जुन बस हल्का हल्का मुस्कुरा रहा था. और 5 मिनिट बाद वो दोनो खड़े थे एक बड़े

शोरुम के सामने.

"चलो आप मेरे साथ आओ यहा." इतना कहकर अर्जुन ने अलका का हाथ पकड़ा और चल दिया उस शोरुम के अंदर. अलका हैरान होते हुए खीची चली गई.

"एक अच्छा सा गर्ल'स टॉप दिखाए ज़रा." अर्जुन ने काउंटर पे खड़े लड़के से कहा तो अलका का ध्यान गया. हर तरफ रंग बिरंगे

टॉप्स, टी शर्ट्स , सूट लगे थे. ऐसा नही था कि रामेश्वर जी के बच्चों को अच्छे कपड़े नही मिलते थे. लेकिन ज़्यादातर सलवार कमीज़, त्योहार पे सारी वैईगरह ही होते थे. बेशक वो महँगे होते थे लेकिन कुछ ज़्यादा खुलापन नही था. रात के टाइम या घर मे ज़रूर लड़कियाँ टी शर्ट/कमीज़ और पाजामा पहाँ लेती थी. लेकिन चुस्त जीन्स, छोटे टॉप्स ऐसा कुछ नही मिलता था.

यहा अर्जुन ने अपनी मर्ज़ी से 2-3 टॉप सेलेक्ट किए तो काउंटर वाले लड़के ने एक असिस्टेंट लड़की को बुलाया.

"मेम, क्या साइज़ आता है आपको?" उस लड़की ने पूछा अलका से तो घबराहट मे अलका ने जवाब दिया 36-डी और वो लड़की थोड़ा हंस दी. "मेम मेरा मतलब है के लार्ज, मीडियम या स्माल. "

"पता नही." अलका ने झिझकते हुए कहा तो वो लड़की माप लेने वाला फीता लेके बाहर आई और अलका के कंधे और छाती का नाप लेने लगी. "मुझे लगता है आपको 'एल' साइज़ आएगा. फिट ना हो तो हम बदल देंगे."

इतना कहकर उसने अर्जुन के पसंद किए टॉप्स के 'एल' साइज़ निकलवाए और अलका को दिखाने लगी. "मेम पसंद कीजिए."

अर्जुन भी यहा अलका की हेल्प करने लगा क्योंकि उसके पास टी शर्ट्स का अंबार लगा था घर पे.

अलका को एक हल्का गुलाबी टॉप पसंद आया लेकिन इसका गला थोड़ा ढीला और कमर पे एलास्टिक था. उसके उपर कपड़ो की कतरन लटक रही थी और दोनो कंधो पे कट थे.

"ये वाला पॅक कर दीजिए." अर्जुन ने बिना अलका को देखे वो टॉप पॅक करवा दिया. "और एक जीन्स भी दिखा दीजिए इनके लिए"

लड़की ने फिर से अलका का माप लिया. "राजू 28 वेस्ट की जीन्स लाना." उस लड़की ने बोला तो अर्जुन को पता लगा की अलका दीदी की कमर 28 है. एक गहरी नीली स्किन फिट जीन्स अर्जुन ने पसंद की और उसको पॅक करवा लिया.

"कितना हुआ?" अर्जुन ने मुख्य काउंटर पे पूछा तो अलका अपना पर्स खोलने लगी.

"1150/-" और अर्जुन ने 1200 रुपये काउंटर पे दे दिए और बॅग ओर छुट्टा वापिस लेकर बाहर आ गया.

"ये सब क्या था अर्जुन?" अलका थोड़ा नाराज़गी से बोली

"अब अपनी इतनी खूबसूरत गर्लफ्रेंड के बर्तडे के लिए कुछ तो प्रेज़ेंट लेना ही चाहिए या नही.?" अर्जुन ने ज़रा मज़ाक मे ये बात कही तो अलका का गुलाबी चेहरा एकदम लाल हो चुका था. उसके मूह से कोई बोल ना निकला. ये देख पहली बार अर्जुन के दिल की धड़कन कुछ अलग सी धड़कती महसूस हुई. जैसे ये मुस्कुराहट दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ उसने देखी हो.

प्यार से दीदी के गाल पे हाथ रखते हुए उसने कहा, "चले घर या अभी आपने कुछ और भी लेना है."

"नही. चल घर चलते है देख एक बज चुका है." इतना कहते हुए भी अलका का सर नीचे था और पैर की उंगलिया सैंडल को कुरेद रही थी. वो शरमाती हुई सी अर्जुन के पीछे बैठ गई और अर्जुन ने स्कूटर आगे बढ़ा दिया. अब वो बड़े ही आराम से स्कूटर चला रहा था.

"वैसे दीदी एक बात पुच्छू? बुरा नही मानोगी तो ही पूछूँगा." अर्जुन ने कुछ सोचते हुए बोला

"हा तेरी बात का बुरा क्यो मानूँगी? पूछ."

"दीदी ये 36-डी क्या मतलब हुआ? जब आपने उस शोरुम वाली लड़की को बोला तो मुस्कुराइ भी थी."

"इसका कोई मतलब नही होता. और मुझे क्या पता वो क्यो मुस्कुरा रही थी." अब तो अलका का चेहरा लाल भी था और पसीने से भीग भी गया था.

"कोई बात नही. नही बताना तो सीधा मना कर दो. मैं नही पूछता." इतना बोल अर्जुन चुपचाप स्कूटर चलाने लगा. स्पीड भी थोड़ी तेज़ हो गई थी..

2 मिनिट भी अलका को किसी काँटे से चुभ रहे थे तो वो खुद ही बोल पड़ी. "मेरा प्यारा भाई नाराज़ है?"

"नही तो मैं किस लिए नाराज़ होऊँगा?" अर्जुन ने सपाट सा जवाब दिया.

"भाई देख ये बात कोई लड़की किसी लड़के से नही करती. लेकिन मैं तुझे नाराज़ नही देख सकती. ये जो मेरा सीना है ये उसका माप है 36". अलका ने काँपते होंठो से अपनी बात कही तो अर्जुन से स्कूटर की स्पीड कम हो गई.

"दीदी ऐसे तो मेरा भी 42" है. लेकिन ये डी क्या होता है." उसने फिर ना समझी मे सवाल कर दिया.

"वो.. वो लड़किया जो अंदर पहनती है ये उसका साइज़ होता है." शरम से अलका अंदर गढ़ी जा रही थी ये बात कहते हुए

"क्या अंदर और ये डी ही क्यो होता है.?"

"देख भाई जो हम लड़किया सूट के नीचे पहनती है उसको ब्रा बोलते है. और ब्रा का साइज़ सबका एक जैसा नही होता. मेरा डी है.बस इतना ही है ये." अब तो अलका की साँसें बहक ही गई थी लेकिन अर्जुन के तो और सवाल पैदा हो गये.

"मतलब सबका डी क्यो नही होता? क्या फरक है इसमे?"

"अच्छा अब मैं जो बोलूँगी उसके बाद कोई सवाल नही करेगा. चुप चाप सुनेगा."

ठीक है दीदी."

"देख मेरा सीना भारी है तो जो ब्रा का कप साइज़ मुझे आता है वो डी साइज़ है. और जो मेरे सीने की साइज़ है वो 36 इंच है, जैसे तेरी 42 है. लेकिन लड़कियों का सीना अलग होता है तो उन्हे उसके आकर के हिसाब से कप लेना पड़ता है.

ए सबसे छोटा कप होता है, फिर बी, फिर सी और ऐसे ही साइज़ के हिसाब से. ऋतु का 34-सी है जो मुझसे छोटा है लेकिन माधुरी दीदी का 38- एफ है क्योंकि उनका हम सब से बड़ा साइज़ है. अब मिल गये जवाब तो सीधा घर चल." इतना बोलकर अलका एकदम शांति से अर्जुन के पीछे चिपक कर बैठी रही. और अर्जुन भी खामोश सा चलाता रहा स्कूटर. घर बस थोड़ा ही दूर था के अर्जुन ने फिर से ये शांति भंग की. "वैसे दीदी आप हो बड़ी खूबसूरत. और आप जैसी लड़की अब मेरी गर्ल फ्रेंड है ये सोच कर ही दिल झूम रहा है मेरा." उसने ये बात दोनो के बीच फैली गंभीरता को कम करने के हिसाब से कही थी. और ऐसा हुआ भी.

"मैं और तेरे जैसे बंदर की गर्लफ्रेंड. कभी सपना भी मत देखि ओ, बड़ा आया बाय्फ्रेंड." बड़ी शोखी से अलका ने ये बात कही थी लेकिन अंदर ही अंदर उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था. जैसे एक नया अंकुर उगना शुरू हुआ हो उसके दिल मे अर्जुन के नाम का. सुबह जो सब एक मज़ाक से शुरू हुआ था और फिर अर्जुन का उसकी हर बात मानना, इज़्ज़त देना, बिना गये गिफ्ट दिलाना और प्यार से उसकी बात समझना. ये सब अलका के दिल मे पक्की स्याही से छप चुका था. और दोनो घर पहुच गये. अलका कपड़े वाले बॅग लेकर हेरानी से दौड़ती अंदर चली गई और अर्जुन स्कूटर को अंदर खड़ा कर चल दिया घर की बैठक मे.
 
दोपहर के 2 बज गये थे.

"आ गये मेरे सरकार." रामेश्वर जी ने बिना देखे तंज़ किया क्योंकि बैठक मे ऐसे सिर्फ़ अर्जुन ही आता था.

"बाबा वो दीदी के कॉलेज मे टाइम लग गया थोड़ा. सॉरी आगे से नही होगा."

रामेश्वर जी अपने पोते के इस जवाब पर मुस्कुरा दिए और सर पे हाथ रख बोले, "अर्रे बेटा तू तो मेरा मान है. तू सॉरी

मत बोला कर किसी बात पे. एक तू ही तो है जो मेरा अच्छा बेटा और मेरा दोस्त है. मैं तो मज़ाक कर रहा था. तेरा ताऊ

खाना खा रहा है फिर उसके साथ जाकर साइकल ले आना. जा खाना खा ले."

अर्जुन भी अपने दादा से गले लग कर चल दिया खाने की टेबल पर.

"आज बड़ा निखर रहा है तू." माधुरी ने जब ये बात कही तो अर्जुन को रात याद आ गई.

"वो आप मेरा इतना ध्यान जो रखती हो दीदी." बिना संकोच उसने माधुरी की आँखों मे देखा तो पाया के वो भी चमक

रही है.

"रखना तो पड़ेगा ही. तू भी तो इतनी सेवा करता है." ये बात बोल वो रहस्यमयी मुस्कान दिखा के रोटी लेने चली गई

"दीदी को शायद पता लग गया है रात वाली बात का. लेकिन वो गुस्सा नही हुई." अर्जुन ने ये सोचा और फिर उसको जैसे याद

आया अलका का कहा शब्द, "माधुरी दीदी का तो 38-F है, सबसे बड़ा." और ये सोचते ही पैंट मे हलचल हो गई.

खाना खाने के बाद राजकुमार जी अर्जुन को अपनी कार मे लेकर अगले सेक्टर की मार्केट मे ले गया. अर्जुन को वहाँ जाते ही हीरो कंपनी की नई रेंजर और एक पतले टाइयर वाली साइकल हॉक नज़र आई.

"अंकल ये साइकल के टाइयर इतने पतले क्यो है?" दुकानदार से उसने सवाल किया. ये साइकल उसने एक बार कही देखी थी लेकिन याद नहीं आ रहा था.

"बेटा ये एक अलग साइकल है जो रेस के काम आती है. और जो लोग साइकलिंग के शौकीन होते है. माहिर लोग तो इसको 60

की स्पीड पे भी चला लेते है." दुकानदार का जवाब सुनकर उसका दिल आ गया साइकल पर.

"ताऊ जी यही साइकल लेनी है मुझे."

"देख ले बेटा. चलानी तुझे है बाद मे कुछ मत कहना. और हा इसके पीछे तो कोई बैठ नही सकता." ताऊ जी ने जब साइकल

को ध्यान से देखा तो ये कहा क्योंकि उसका तो करिएर नहीं था.

"मैने किसे बिठाना है. एक्सर्साइज़ के लिए तो चाहिए और इस्पे टाइम भी बचेगा मेरा."

"ठीक है बेटा. तो भाई साहब इसको ये साइकल तयार कर दीजिए और पैसे बताए." ताऊ जी ने इतना बोलका पर्स निकल लिया

"शर्मा जी आपसे तो वही दाम लेंगे जीतने मे हमारे पास ये आई है. लेकिन इतना कहूँगा के एक ये हेल्मेट ज़रूर ले लीजिएगा.

सावधानी भी ज़रूरी है." दुकानदार ने बड़े अपनेपन से ये बात अर्जुन को देख कर कही.

"हा अंकल दे दीजिए ये हेल्मेट और वो पानी की बॉटल भी."

ताऊ जी ने पैसे दिए और चले गये. दुकान पे काम करने वाले 2 लड़को ने 15 मिनिट में ही साइकल तयार कर के अर्जुन को दे

दी. हेल्मेट जो सिर्फ़ सर के उपर तक ही था लगाया और मार दिया उसने पेडल.

"वाह ये तो एकदम हल्की है. " सावधानी से थोड़ी दूर चलते ही अर्जुन ने महसूस किया के ये और साइकल बहुत तेज़ है.

10-12 मिनिट लगे उसको घर आने मे और फिर सबको उसने अपनी नई साइकल दिखाई. बाहर आँगन में ही ताला मार के खड़ी की और चल दिया अपने कमरे मे. आज बहुत तक गया था वो तो थोड़ा आराम भी ज़रूरी था.
 
अपडेट - 8

बीच मझदार

मेरे होंठ अलका दीदी के होंठो से चिपके हुए थे. मैं उनका निचला होंठ धीरे धीरे अपने मूह से चूस रहा था. उनका एक हाथ मेरा सर सहला रहा था और दूसरा मेरी पीठ. मदहोशी से उनकी आँखें बंद पड़ी थी और मेरा एक हाथ उनके कूल्हे को दबा रहा था और एक गर्दन को. हम दोनो जैसे इस दुनिया से दूर एक अपनी ही दुनिया मे थे. उनके मूह की वो मिठास मुझे पागल बना रही थी जिसे मैं और ज़ोर से पीने लगा था. कुल्हो से सरकता हुआ हाथ कमीज़ के अंदर से उनके पेट को सहला रहा था. अलका दीदी के लिए ये सहन करना जब मुश्किल हो गया तो उन्होने अपना मूह खोल के मेरी जीब को चूसना शुरू कर दिया था.

अब वो मुझे खुद से चिपका रही थी जैसे मुझे खुद मे समाहित कर लेना चाहती हो. यहा मेरा हाथ अब उनकी छाती के उभार को मसल रहा तो जो रूई से मुलायम लेकिन रब्बर से लचीले और सख़्त थे. जैसे ही मैने उनका निप्पल कुरेदा उन्होने मुझे चूमना छोड़ मेरा मूह अपनी गर्दन पर सटा दिया. मेरी जीब उनकी सुराइ दार गर्दन पर कमाल दिखा रही थी और हाथ उनके स्तन ढूढ़ निकालने की कोशिश कर रहे थे. जैसे ही मैने अपना दूसरा हाथ उनकी सलवार के अंदर किया.....

"अर्जुन-अर्जुन.. अर्रे कब से हिला रही हू. उठ जा कुंभकारण?" ये आवाज़ बीच मे कहाँ से आई और जैसे ही मेरी नज़र सामने पड़ी तो माधुरी दीदी मेरे उपर झुकी हुई थी. उनका यौवन कमीज़ से बाहर झलक रहा था. उनकी तेज़ आवाज़ से मेरा होश वापिस आया.

"क्या हुआ दीदी? ऐसे क्यो जिंझोड़ रही हो आप मुझे?" अर्जुन ने सामने खड़ी माधुरी दीदी से पूछा

"4 बजे सोया था तू और अब 8 बज रहे है. चल सब नीचे बुला रहे है तुझे", इतना बोलकर वो हँसती हुई बाहर निकल गई. जाते हुए एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा और हँसती हुई गायब.

"जाने क्या हुआ है इनको?" लेकिन जैसे ही नज़र पेंट पर पड़ी तो दिखाई दिया सच. वहाँ तंबू बना हुआ था उस सपने की वजह से. झेंपता हुआ बाथरूम गया और हाथ मूह धोकर सूती पाजामा ओर लूस टी शर्ट पहन अर्जुन नीचे चल दिया.

"भाई तू बैठ मैं खाना लगाती हू.", कोमल ने उसके लिए कुर्सी खींच कहा. सामने ऋतु और माधुरी बैठे थे. रामेश्वर जी आज अपने कमरे में ही खाना खा चुके थे कौशल्या जी के साथ . रेखा जी रोटियाँ बना रही थी और अलका उन्हे सेक रही थी.

"मा, ताई जी और संजीव भैया कहा है? दिख नही रहे." अर्जुन ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए अपनी मा रेखा से पूछा.

बेटा वो दोनो तेरी ताई जी के गाँव गये है सुबह तक आएँगे. संजीव को वहाँ कुछ काम था ऑफीस का तो तेरी ताई जी भी इस बहाने अपने मा-बाप से एक रात मिल आएँगी." रेखा ने रोटी बनाते हुए ही जवाब दिया.

"अच्छा. और मा ये ऋतु दीदी कभी रसोई मे काम क्यो नही करती.?" ये बात अर्जुन ने ऋतु को छेड़ते हुए ही कही थी जो की

खाने में ही गुम थी लेकिन अपना नाम सुनकर अर्जुन को गुस्से मे देखने लगी थी.

"बेटा उसका वो ही जाने. मैं कुछ नही कहती जब अपने घर जाएगी तब देखेंगे." उसकी मा ने ये बात चुहल वाले अंदाज मे

कही थी.

"ये ही मेरा घर है और मैं यहा की मालकिन. और अपने मुन्ने को थोड़ा पल्लू से बाहर निकालो मा नही तो बिल्कुल लड़की होता जा रहा है ये दिन प्रतिदिन." ऋतु भी कहा कम थी

ऐसे ही वो लोग खाना खाते रहे और अलका भी आ गई अपनी प्लेट लेकर. रेखा जी चूल्‍हे के पास ही बैठ गई अपना खाना खाने.

जैसे ही अर्जुन ने अलका की और मुस्कुरा कर देखा, शरम से उसकी नज़र नीचे हो गई और खाँसी होने लगी.

"लो दीदी पानी पियो." अर्जुन झट अपना गिलास लेकर उसके सर के पास खड़ा हो गया. जैसे ही अलका ने ये देखा उसका चेहरा चमक उठा.

"थॅंक यू, आरू." उसने पानी पीते ही कहा, अर्जुन उसकी पीठ प्यार से सहला रहा था.

"क्या यही प्यार है?" दोनो के मन मे यही था.

"मुझे तो आजतक इतने प्यार से तूने पानी नही पिलाया. अलका शायद तेरी ज़्यादा प्यारी है." अब ऋतु ने फिर से अर्जुन को छेड़ा.

"दीदी प्यारी तो एक आप ही हो मेरे लिए. लेकिन कहा मैं नौकर और कहा आप मालकिन." अर्जुन ने उसकी पहले वाली बात ही सुना दी.

उसकी सभी बहने ये सुनकर ज़ोर से हँसने लगी और रेखा जी भी बच्चों के बीच इतना प्यार देख मुस्कुरा रही थी.

"चाची आप खाना खा के आराम कीजिए. बर्तन मैं कर दूँगी." माधुरी ने टेबल से सभी के बर्तन उठाते हुए कहा.

"ठीक है मेरी बच्ची. बस मैं मा- बाबूजी को दूध दे आऊ गरम कर के. और तू भी टाइम से सो जाना सारा दिन काम करती है."

रेखा जी ने माधुरी को माथा चूमते हुए कहा.

"भाई उपर वाले टेलीविजन पर हम फिल्म देख ले क्या?" कोमल ने अर्जुन से गुज़ारिश भरे लहजे मे कहा.

"अर्रे दीदी. आपका भी तो है वो. पूछ क्यो रही हो. और वैसे भी मैं तो दिन भर सो चुका, मैं भी देख लूँगा." इतना बोलकर

अर्जुन अपनी मा का गाल चूम उपर कमरे मे चल दिया. पीछे पीछे कोमल, अलका और ऋतु आ गई.

"सोनी पे हम दिल दे चुके सनम आ रही है. वही लगा ले ऋतु." अलका ने ऋतु को ये बात कही जिसके हाथ मे रिमोट था.

"तूने तो नही दे दिया किसी को दिल. हाहहः.."कहते हुए उसने वो चॅनेल लगा दिया और बैठ गई देखने फिल्म.

ऋतु हमेशा सिंगल सोफा पे बैठ कर ही देखती थी और बड़े सोफे पे कोमल और अलका थे. मूह सॉफ करके अर्जुन भी आ गया

और बैठ गया दोनो बहनो के बीच मे. कोई आधे घंटे बाद माधुरी दीदी भी आ गई थी. अब उन्होने एक खुली टी शर्ट ओर

पाजामा पहना हुआ था. ऋतु भी कुछ ऐसे ही लिबास मे थी. सभी फिल्म मे खोए हुए थे. बस एक अर्जुन था जो अलका मे खोया था.
 
अर्जुन ने अलका के कान मे सरगोशी की. "दीदी नई ड्रेस कब पहन कर दिखा रही हो.?"

"परसो जनमदिन है तो तभी देख लेना."उसने टेलिविषन की तरफ देखते हुए शर्मा कर जवाब दिया.

"जनमदिन तो कल रात 12 बजे से शुरू होगा ना. मैं चाहता हू आपको सबसे पहले मैं विश करू. और ज़्यादा अच्छा लगेगा अगर आप उस समय मेरे दिए गिफ्ट को पहन कर आओ." अर्जुन ने ये बात ऐसे कही थी जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से निवेदन कर रहा हो. अलका ने एक बार प्यार से उसकी तरफ देखा और उसकी आँखों ने कुछ कहा जो सिर्फ़ अर्जुन को ही दिखा. वो भी खुश हो गया.

अलका उठ गई अपनी जगह से और बोली, "चलो दीदी मैं तो सोने जा रही हू. हो गई फिल्म ख़तम." अर्जुन ने जब देखा तो सच मे फिल्म ख़तम हो चुकी थी. वो सारा टाइम सिर्फ़ अलका को ही देख रहा था.

"मैं तो अभी थोड़ी देर और देखूँगी जिसने सोना है वो सो जाए." माधुरी दीदी ने रिमोट लेते हुए कहा

लेकिन कोमल, ऋतु और अलका दीदी चले गये नीचे सोने और उपर रह गये अर्जुन और माधुरी दीदी.

"आप संजीव भैया के कमरे में ही सो जाना दीदी. वहाँ डबल बेड भी है." अर्जुन ने चॅनेल चेंज करती हुई माधुरी दीदी से कहा तो उन्होने पलट कर उसकी तरफ देखा. "मैं अकेले नही सोउंगी. हा तू भी वही सोएगा तो ठीक है. अलार्म वही लगा लिओ."

"चलो ठीक है. लेकिन आप ज़्यादा देर टेलिविषन नही देखोगी." अर्जुन ने चेताया क्योंकि 11:30 हो चुके थे.

"बस आधा घंटा भाई." इतना बोलकर वो सोफे पे अर्जुन के साथ जुड़कर बैठ गई. एक तरफ का सोफा खाली ही था.

अर्जुन की नज़र जब टेलिविषन पर गई तो उसकी आँखें वही जम् सी गई. टाइटॅनिक आ रही थी स्टार मूवीस पे. ये वो टाइम थे

जब इंडिया मे टेलिविषन सेन्सरशिप नही थी. रात 11 के बाद अडल्ट मूवीस आती थी.

फिल्म का सीन भी सबसे पॉपुलर चल रहा था. हीरोइन एक सोफे पे लेटी थी और हीरो कागज लेकर उसके सामने बैठा था.

धीरे से लड़की ने अपनी ड्रेस उतार दी और लेट गई. कॅमरा का फोकस जब उसके स्तनो पे आया तो दोनो भाई बहन की धड़कन बाहर तक सुनाई दे रही थी. कमरे की लाइट बंद थी लेकिन टेलीविजन की रोशनी मे चेहरे सॉफ दिख रहे थे. जहाँ अर्जुन हीरोइन की सर उठाए गोलाइयाँ देख रहा था, वही माधुरी कभी अर्जुन को तो कभी फिल्म को देख रही थी. बोल कोई भी नही रहा था. कुछ ही क्षण मे सीन ख़तम हो गया था लेकिन इन दोनो की हालत खराब हो चुकी थी.

"चल भाई अब सोने का टाइम हो गया." बोलते हुए माधुरी बिना पीछे मुड़े संजीव भैया के कमरे मे चली गई. अर्जुन ने टीवी

बंद किया और बाथरूम मे जाकर अपना अंडरवेर उतार वापिस पाजामा पहन उसी कमरे मे चल दिया.

माधुरी चुपचाप एक तरफ करवट लेकर लेटी थी और उसकी तरफ ही मूह करके अर्जुन भी लेट गया. कमरे मे लाइट बंद कर दी और पंखा चल रहा था. थोड़ी बहुत चाँद की रोशनी आ रही थी खिड़की से जिसमे अर्जुन अपनी बड़ी दीदी के खुले बाल और

सुंदर चेहरा निहार रहा था. बिल्कुल चाँदनी जैसी लग रही थी माधुरी.

"ऐसे क्या देख रहा है?"

"आप कितनी खूसूरत हो दीदी. ये देखो चाँद की रोशनी मे आपकी आँखें कैसे चमक रही है और आपके खुले हुए बाल."

इतना बोल अर्जुन वापिस देखने लगा.

"इतनी भी कुछ खास नही हू. अलका और ऋतु को देख वो दोनो कितनी ज़्यादा सुंदर है. और मेरी तो उमर भी कितनी ज़्यादा हो

गई है." इतना बोलकर माधुरी किसी सोच मे डूब सी गई. उसको एहसास तब हुआ जब अर्जुन का हाथ उसे अपने कान के पीछे महसूस हुआ

वो उसकी लटो को खोल रहा था. देख रहा था कि कितने प्यारे है बाल जो उसकी दीदी के गाल को सहला रहे है.

"क्या हुआ आरू? ऐसे क्या कर रहा है?"

"देख रहा हू दीदी के ये बाल कितने खुशनसीब है जो आपके चेहरे को सहलाते रहते है."

"तू भी तो सहला सकता है. तुझे किसने मना किया."ये बात माधुरी ने उसकी तरफ सरकते हुए कही थी. बड़ा प्यार आ रहा था

उसको अपने भाई के इस निस्वार्थ प्रेम को देख के.

अब हालत ये थी की दोनो ही एक दूसरे के साथ लेटे हुए थे. मूह से मूह 4-5 इंच दूर था. शरीर को भी दूसरे शरीर का एहसास

हो रहा था. अर्जुन ने जैसे ही अपना हाथ दीदी के गाल पे रखा उसका रोम रोम गनगना गया. हल्के भरे भरे और मुलायम गाल

यही हाल माधुरी का भी था. उसके शरीर मे भी उत्तेजना उठ रही थी. माधुरी एक पढ़ी लिखी लड़की थी. जिसको लड़का और

लड़की के काम का भी कुछ किताबी और कुछ सुना हुआ ज्ञान था. उसकी कुछ सहेलियों ने तो कॉलेज टाइम ही अपना कोमार्य ख़तम कर लिया था. लेकिन माधुरी ने ऐसा कभी नही किया था. एक-2 बार उसने ऐसी फ़िल्मे ज़रूर देखी थी लेकिन किया कभी कुछ नही था. लेकिन आज आसार कुछ और ही थे.

अर्जुन का एक हाथ खुद ही माधुरी की कमर पर आ गया था. और एक हाथ से वो अपनी दीदी की माथे से बाल पीछे कर रहा था.

अब दोनो कुछ बोल नही रहे थे लेकिन उनके शरीर चिपक चुके थे.

माधुरी ने अपनी एक बाह उसके उपर रख दी जिस से उसके स्तन अब अपने छोटे भाई के सीने मे धँस रहे थे. जब उसने देखा के अर्जुन इस से आगे कुछ नही कर रहा तो माधुरी ने धीरे से अपने तपते गरम होंठ उसके होंठ से चिपका दिए.

मज़े से अर्जुन की आँखें बंद हो गई थी और हाथ स्वतः ही उसकी दीदी के ठोस नितंबों को सहलाने लगे थे.

ये देख माधुरी का भी जोश बढ़ गया और उसने अपनी मांसल जाँघ अर्जुन की टाँग पर रख दी. दोनो चुपचाप बस एक दूसरे के

होंठ चूम रहे थे की अर्जुन का हाथ माधुरी क सीने पे आ गया.

"दीदी, मुझे ये सब नही आता?" बड़ी मासूमियत से उसने ये बात कही तो माधुरी मुस्कुराइ और बैठ गई. अपने हाथ पीछे ले

जाकर उसने कमीज़ के अंदर से अपनी ब्रा खोली और गले से निकाल दी.

"अच्छा भाई ये बता तुझे कितना पता है?"

"मतलब दीदी?" अर्जुन ने धीमे से पूछा.

"यही के औरत और मर्द के बीच ये जो प्यार होता है ये कैसे करते है?" माधुरी ने भी ये बात बहुत प्यार से कही

"दीदी जो अभी हम कर रहे थे वो किस होता है. ये आपके स्तन है (अपना हाथ हल्के से माधुरी के सीने पर रखते हुए),

ये आपके नितंब है (कूल्हे को सहलाते हुए), यहा आपकी योनि होती है (जाँघो पे हाथ रखते हुए), ये मेरा लिंग है. बस

इतना मालूम है दीदी." अर्जुन ने भोलेपन से कहा. उस पे उत्तेजना ज़रूर चढ़ि थी लेकिन वो अपनी बड़ी बहन से प्यार करता

था और उनका भरोसा नही तोड़ना चाहता था.

"हाहाहा. तुझे कुछ भी नही मालूम. ये देख जो ये गुब्बारे है इनको चुचिया, बूब्स, ब्रेस्ट्स या दूध बोलते है, और जो

तूने नितंब बताया उसको कूल्हे, चूतड़ या बट्स बोलते है. योनि को बोलते है चूत, वेजाइना या पुस्सी. और तेरे लिंग को कहते

है लॅंड, पेनिस या डिक." इतना बोलकर माधुरी ने एक बार फिर अर्जुन के होंठ चूम लिए.
 
"हाहाहा. तुझे कुछ भी नही मालूम. ये देख जो ये गुब्बारे है इनको चुचिया, बूब्स, ब्रेस्ट्स या दूध बोलते है, और जो

तूने नितंब बताया उसको कूल्हे, चूतड़ या बट्स बोलते है. योनि को बोलते है चूत, वेजाइना या पुस्सी. और तेरे लिंग को कहते

है लॅंड, पेनिस या डिक." इतना बोलकर माधुरी ने एक बार फिर अर्जुन के होंठ चूम लिए.

"और जब ये लंड चूत के अंदर जाता है तो इसको बोलते है चुदाई, सेक्स या लव मेकिंग." नीरा बुद्धू है तू प्यारे

"दीदी क्या आपने ये सब किया हुआ है?" भोलेपन से एक बार फिर उसने पूछा

"नही भाई कभी किसी को हाथ तक नही लगाने दिया है मैने. मेरी फ्रेंड्स है कुछ जिन्होने ये सब किया. कइयो की तो शादी

और बच्चे भी हो चुके है. लेकिन मैं आज तक इस अनुभव से दूर हू. लेकिन अब मुझे प्यार करने वाला तू मिल गया है ना तो

मैं भी करूँगी. बोल तू अपनी दीदी को प्यार करेगा?" माधुरी ने अपने भाई की छाती सहलाते हुए कहा

"आप बस मुझे सीखा देना. आप जैसा कहोगी मैं करूँगा." अर्जुन ने भी अपना हाथ दीदी के स्तन सॉरी चूचे पर रखते हुए

जवाब दिया.

"मेरा प्यारा भाई." और इसके साथ ही माधुरी ने होंठ खोल कर अर्जुन का मूह चूसना शुरू कर दिया. दोनो की जीभ एक दूसरे

के मूह मे आ जा रही थी. अर्जुन को अपनी बड़ी बहन का ये मीठा रस एक अलग ही सुख दे रहा था. जब साँस लेना भी मुश्किल हो गया तो दोनो अलग हुए और एक दूसरे को देखने लगे. हर साँस के साथ माधुरी के पहाड़ जैसे बूब्स हिल रहे थे. येदृश्य इतना कामुक था कि अर्जुन से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया और उसने कमीज़ के उपर से ही उन्हे पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया.

"एक मिनिट रुक मेरे भाई." माधुरी की उत्तेजना भी चरम पर पहुच चुकी थी लेकिन फिर भी उसने अर्जुन को खुद से दूर किया और अपने कमीज़ का एक छोर पकड़ कर कमीज़ उतार दिया. उसके चूचे इतने बड़े थे जैसे कोई मीडियम आकार की फुटबॉल हो. और बिल्कुल ठोस तने हुए. कमौत्तेजना की वजह से उनपे लगे दोनो निप्पल किसी सुई की तरह खड़े हुए थे. लेकिन निप्पल की मोटाई एक छोटे चने के दाने जितनी थी. जो बयान कर रही थी कि इनको आज से पहले कभी मसला या चूसा नही गया.

इतने विशाल उभार देख कर अर्जुन से सबर नही हुआ और उसने दोनो हाथ बढ़ा के पकड़ लिया. उनके भार का अनुमान हो गया था अर्जुन को. उसकी दीदी अपनी छाती पे कितना बोझ उठा के रखती है सारा दिन. ये सब सोचते सोचते वो उन बड़े बड़े खरबूजो को प्यार से दबा भी रहा था और सहला भी रहा था.

माधुरी की तो इतने में ही हालत खराब हो चुकी थी. उसको ऐसा लग रहा था जैसे उसकी चूत से कुछ तरल रीस रहा है और उसकी कच्छी को भिगो रहा है. अगले ही पल अर्जुन ने एक दूध को अपने मूह मे भर लिया और मज़े से चुसकने लगा. बीच बीच मे वो अपने दाँत से निपल को भी कड़ा कर देता. उसका दूसरे हाथ का पंजा अब माधुरी के दूसरे बूब को मसल रहा था. और वो मदहोशी मे अपने भाई का सर सहला रही थी. अब अर्जुन ने दूसरा वाला मूह मे लिया और पहले वाले को हाथ से मसलने लगा. उन दोनो को इसका पता ही नही चला कब अर्जुन पूरा माधुरी के उपर आ चुका था और वो अब बेड पे पीठ के बल लेटी मचल रही थी.

"दीदी, ऐसा लग रहा है जैसे इनमे से कुछ निकल रहा है लेकिन दिख नही रहा. इनको छोड़ने का दिल ही नहीं कर रहा." अर्जुन ने एक बार उपर होकर अपनी दीदी का मूह देखा. दोनो खरबूजे अब अर्जुन की लार से सने हुए थे और उनके निपल चमक रहे थे.

"भाई तू भी अपने कपड़े निकाल ना." अपनी बहन की गुज़ारिश सुनकर अर्जुन ने अपना टी शर्ट और पाजामा एक ही पल मे शरीर से अलग कर दिया. वही माधुरी दीदी ने भी अपनी अपनी सलवार पैरो से निकल कर अलग कर दी थी. अर्जुन एक बार फिर अपनी बड़ी दीदी के उपर आ गया. माधुरी ने अपनी टाँगे फैला दी थी जिनके बीच मे उसके भाई का लंड घिस रहा था. दोनो एक बार फिर सबकुछ भुला के पागलो की तरह एक दूसरे को चूमने मे लगे थे.

अर्जुन की चौड़ी छाती के नीचे माधुरी के बड़े बड़े उरोज़ कुचल रहे थे. दीदी ने अभी तक अपने भाई का लंड नही देखा था और ना ही अर्जुन ने अपनी बहन को कमर से नीचे देखा था.
 
अर्जुन के हाथ फिसल कर जैसे ही नीचे आ रहे थे उसको अपनी बहन की मोटी मांसल जांघे सुखद एहसास देने लगी. वो इतनी

मुलायम थी जीतने उनके बूब्स थे.

अर्जुन ने खुद ही अपनी बहन की टोनो जांघे विपरीत दिशा मे फैला दी थी और अब वो अपना लंड ठीक उनकी कच्छी के फूले हुए हिस्से पर घिस रहा था. वो जगह किसी गरम भट्टी के समान तपने लग रही थी. उसने ऐसे ही अपनी दीदी की आँखों मे देखा तो माधुरी ने अपनी कमर हल्की सी उपर उठाई और एक साइड से कच्छी को नीचे खींच दिया. अर्जुन ने बाकी का काम कर दिया उसको पैरो से बाहर निकाल कर. एक बड़ी तेज और अजीब सी सुगंध उसकी साँसों से टकराई . ये उसकी दीदी का यौवन रस था जो चूत से जाने कब से टपक रहा था.

"दीदी, अब क्या करू?" काँपते हुए अर्जुन ने कहा.

माधुरी ने देखा उसका भाई उसकी चूत के उपर उगे बालो मे उंगलिया फिरा रहा है. माधुरी दीदी ने नीचे से आगे होकर अपना हाथ बढ़ाया अर्जुन का लंड पकड़ने के लिए तो एक ही झटके मे हाथ पीछे खींच लिया.

"भाई... ये क्या चीज़ है? खड़ा हो ज़रा." हैरत से माधुरी दीदी अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और अर्जुन के पास आई.

जैसे ही उसकी नज़र उस आठ इंची के मोटे डंडे पर गई, माधुरी की धड़कन ही रुक गई कुछ पल के लिए. कभी वो नीचे

अपनी चूत की तरफ देखती जहाँ सिर्फ़ एक पतली सी लकीर थी 2 मोटे मोटे फूले हुए होंठो के बीच. और कहा ये डायटियकर

लंड जिसका अगला हिस्सा एक मध्यम आकर के आलू जितना था. हिम्मत करके उसने सिर्फ़ इतना कहा, " बाप रे एक काम कर मेरे उपर लेट कर अपना ये डंडा मेरी चूत के उपर आराम से घिस." ऐसा बोलते हुए माधुरी दीदी ने अर्जुन को अपने उपर लिटा लिया और फिर से अपनी टांगे पूरी खोल ली. अपने हाथ से उसका लंड जो की पूरी मुट्ठी मे नही समा रहा था, पकड़ के अपनी चूत के होंठो पर लंबवत घिसने लगी.

" आह दीदी. आपकी ये फूली हुई चूत कितनी गरम है. और इसका पानी से जब लंड फिसलता है तो कितना मज़ा आता है. आह"

बोलते बोलते अर्जुन दीदी के मोटे दूध छाती से रौंद रहा था और अपना लंड दीदी की पनियाई चूत पे घिस रहा था. बीच बीच

मे जब लंड का अगला हिस्सा हल्का सा चूत के होंठ ज़्यादा फैला देता तो दोनो के मज़े की इंतेहा हो जाती थी. दोनो भाई बहन

के शरीर पसीने से तर हो चुके थे और पूरा कमरा इस उत्तेजक सुगंध से भर उठा था.

अब तो माधुरी की कमर भी बेड से उपर उठने लगी थी ओर उसके नाख़ून अपने छोटे भाई के सख़्त चुतड़ों मे धँस रहे थे. ना जाने ये खेल कितनी देर चलता रहा लेकिन एक समय के बाद माधुरी का पूरा शरीर ऐंठ गया और उसकी चूत मे रह रह के झटके उठने लगे.

चूत में जैसे बाढ़ ही आ गई थी और इतनी गीली चूत पे अर्जुन का लंड भी फुल स्पीड से फिसल रहा था. उसको भी करेंट लगा जब उसके लंड ने पानी फेंकना शुरू किया. पिचकारी इतनी तेज थी की दीदी के बूब्स, पेट, गर्दन तक वो गरम लावा जाकर गिरा. और अर्जुन ऐसे ही अपनी बड़ी बहन के बदन पर ढह गया. इतना मज़ा तो उसे मालती की चुदाई से नही आया था जितना अपनी बड़ी बहन की चूत पर सिर्फ़ लंड घिसाई से आया था.
 
10 मिनिट बाद जब दोनो की साँस कुछ दुरुस्त हुई तो माधुरी ने प्यार से अपने छोटे भाई को उपर से उठाया और कान मे बोला. "भाई मुझे बाथरूम जाना है, उठ खुद को सॉफ करना है."

अर्जुन की हिम्मत नही थी लेकिन वो उठ गया. दीदी ने चद्दर लपेटी और बाथरूम मे चली गई. 5 मिनिट बाद वो आई तो अर्जुन अपना लंड सॉफ करके वापिस आया और वापिस अपनी दीदी से लिपट गया.

"दीदी, क्या इसको ही चुदाई कहते है?" होंठो पे एक छोटा चुंबन करने के बाद उसने पूछा

"नही बाबा. ये थोड़ी ना चुदाई होती है. ये तो सिर्फ़ रब्बिंग थी. तेरा इतना बड़ा है के ऐसे ये मेरी चूत के अंदर नही जाएगा. लेकिन थोड़ा टाइम सबर कर कुछ करूँगी इसका भी हाल. और हा बेटा ये बात कभी भी भूल के किसी के सामने मत कर देना. तेरी बहन बर्बाद हो जाएगी. तू अपनी बहन के प्यार की हिफ़ाज़त करेगा ना भाई?" भावुक होते हुए माधुरी लिपट गई अर्जुन से.

"दीदी आपके लिए मैं अपनी जान दे सकता हू. और आप ही मेरा पहला प्यार हो. मैं कसम ख़ाता हू मैं कभी किसी को इसका आभास नही होने दूँगा." और उसने कस कर भींच लिया माधुरी को अपनी बाहों मे.

माधुरी ने एक बार सर उठाकर टाइम देखा और फिर धीरे से बोली,"भाई अब सो भी जा देख ढाई बज रहे है. तुझे उठना भी है."

उन्हे पता ही ना चला था कि वो पिछले ढाई घंटे से प्यार कर रहे थे. अर्जुन ने अपनी बड़ी बहन, जो की एकदम नंगी थी, को बाहो मे भरा और दोनो नींद के आगोश मे चले गये.
 
अपडेट 9

ज्योति की आग

"तन्ंननननननणणन् तन्ंननननननणणन्" की पहली ही आवाज़ से अर्जुन उठकर बैठ गया. अलार्म का बटन दबा के उसको बंद किया और फिर नज़र गई एक जन्नत से नज़ारे पर. माधुरी दीदी का पूरा यौवन उसकी आँखों के सामने था. बड़े ठोस बूब्स जो बेड पर टीके थे, मासूम सा चेहरा, घने काले बाल, विशाल लेकिन गुदाज चूतड़, रेशम सी चिकनी जांघे. फिर खुद को संभालते हुए अर्जुन ने अपना हाथ उनके एक पूरे गोल चुचे पर लगाया और उनके होंठ चूम के धीरे से बोला, "आई लव यू दीदी, यू आर ब्यूटिफुल". और उनको चद्दर से ढक कर पूरा कमरा समेट कर अपने कमरे मे आ गया.

फिर वही रोजाना का रुटीन, दौड़, बादाम वाला दूध, नहाना-धोना किया और आ गया रसोई मे.

मा को देखा तो देखता ही रह गया. आज रेखा जी ने लाल रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी और अन्य दिनों से अधिक

खिली हुई थी.

"आज कुछ खास है क्या मा?" अर्जुन ने जैसे ही ये कहा तो कौशल्या देवी ने जवाब दिया, "ओह मेरे बुद्धू सपूत, आज होली का त्योहार है और कल फाग. कभी कभी त्योहार का कॅलंडर भी पढ़ लिया कर. और हा आज मेरा लाड़ला भी आ रहा है घर, तेरा बाप."

एक जगह त्योहार का सुनकर जहाँ अर्जुन खुशी से झूम उठा वही जैसे ही अपने पिताजी के आने की खबर सुनी तो उसकी सारी खुशी छु-मंतर हो गई. "अच्छा आज पापा आ रहे है? कब तक आएँगे वो?", बुझे मन से उसने पूछा तो रेखा जी ने कहा,

"बेटा तेरे पापा तो 7 बजे ही आ गये थे लेकिन उन्हे तेरे गुलाटी अंकल से कुछ काम था तो वो आधे घंटे तक आ जाएँगे.

डॉक्टर. गुलाटी एक र्राइव. सर्जन थे सिविल हॉस्पिटल के और शंकर शर्मा जी के स्कूल के दिनों से मित्र थे. जब भी शंकर जी

अपने शहर आते थे तो सबसे पहले वो अपने दोस्त से मिल कर ही घर आते थे. शाम का प्रोग्राम बना कर. अपने पापा को

याद करते ही अर्जुन की पुरानी यादें ताज़ा हो गई. कैसे उसके पिता जी उसको कड़ी सज़ा देते थे जब उसके कम नंबर आते

थे, और दादा जी भी उनको कुछ बोल नही पाते थे. आख़िरी बार वो अपने पिता जी से तब बोला था जब वो वापिस घर आया

था बोरडिंग से. शंकर जी का डर ही था कि अर्जुन ने कभी भी ज़िंदगी मे ज़्यादा दोस्ती नही करी थी और सिर्फ़ अपने लक्ष्य

पर ही ध्यान देता था. फिर सब यादों को भूलकर उसने खाना शुरू किया. आसपास कोई क्या बोल रहा है उसको कुछ सुनाई नही दे रहा था. बस जल्दी से खाना खाया और उठने लगा कुर्सी से की एक हाथ उसके कंधे पर था. साँसें रुक गई क्योंकि उसके दिल को एहसास हो गया था कि ये किसका हाथ है.

" गुडडड मॉर्निंग डेड. हाउ आर यू? हॅपी टू सी यू अराउंड?" ये सब उसने बिना पीछे मुड़े ही कहा था. शंकर जी का

सपना था कि उनका बेटा उनसे ज़्यादा पढ़े और जब भी वो उनसे और उनके दोस्तो से मिले तो सिर्फ़ अँग्रेज़ी में ही बात करे. उन दिनों ये बहुत कम ही होता था कि कोई बच्चा छोटी उमर में ही प्रवाह मे अँग्रेज़ी बोले. लेकिन अर्जुन ने इस भाषा पर मजबूत पकड़ बना ली थी दसवी तक आते आते.

" यू नो किड, यू आर माइ प्राइड. आंड नाउ आई'म मोर देन हॅपी टू सी यू ऑल ग्रोन अप आंड गेटिंग दिस हॅंडसम. सन, टर्न

अराउंड." जैसे ही शंकर जी ने ये बात कही अर्जुन अपने पिता के बिल्कुल सामने था. उन्होने आज पहली बार अपने बेटे को अपने सीने से लगाया. " आई' वी मिस्ड दिस कंफर्ट थ्रूवौट मी स्कूलिंग डेड. डॉन’ट लीव मी फॉर समवहील." कह कर अर्जुन ज़ोर से चिपक गया अपने पिता से. उन्होने भी बेटे को पहली बार महसूस किया. "ड्र. साहब आई होप यू डिड्न'त गॉट एनी ट्रबल रीचिंग हियर?" ये आवाज़ सुनकर दोनो बाप-बेटे अलग हुए और शंकर जी जा लगे अपने पिता रामेश्वर जी के गले.

उन दोनो मे कई देर तक गुफ्तगू होती रही और उनको कुर्सी पे बिठाया कौशल्या जी ने.
 
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