"आ गई बाबा. और वैसे भी दरवाजा खुला ही है. चल अंदर आजा मैं इतने अपनी प्रॅक्टिकल फाइल्स ले लू."
बोलते हुए अलका खुद को आईने के सामने निहार रही थी और तभी अर्जुन भी अंदर आ गया. जहा उसका स्वागत
इस मनमोहक दृश्य ने किया. 5'9" लंबी अलका ने एक नीला पंजाबी सूट और सफेद पाजामी पहनी हुई थी. कमीज़
पूरी तरह से उसके शरीर से चिपका हुआ था. जहा उसके वक्ष पूरा सर उठाए थे वही कमीज़ के निचले
हिस्से पे उसके बाहर को निकले कूल्हे अलग ही कहर बरपा रहे थे. अर्जुन की तो साँस ही अटक गई ये देख
कर. उसका ध्यान जब टूटा जब उसकी बेहन ने अपनी कमर तक आती चोटी को सही किया और दुपट्टा लेते हुए
बोली, "क्या हुआ तुझे? तेरी सेहत तो ठीक है जो चुपचाप खड़ा है?"
"हाँ.. हा मुझे क्या होना है? बिल्कुल फिट खड़ा हू आपके सामने. लेकिन आप तो दीदी एकदम अप्सरा लग रही हो"
आज पहली बार उसके मूह से अपनी किसी बेहन के लिए तारीफ के शब्द निकले थे और उसको खुद नही पता था
के उसने क्या कहा है. अलका थी ही इतनी हसीन. पतली कमर, पहाड़ जैसी छातियाँ, उभरे गोलाकार नितंब,
लाल सुर्ख होंठ, कमर तक लंबे भूरे बाल और बड़ी बड़ी भूरी आँखें. यू तो अर्जुन की चारो ही
बहने नायाब हुस्न से भरी हुई थी लेकिन एक अलका ही थी जो सब पे भारी थी.
"चल चल जल्दी यहा से. कॉलेज को लेट हो रहे है. बाद मे कर लेना तारीफ मेरी." थोड़ा रोब से बोलते हुए
उसने अपने फाइल उठाई तो अर्जुन सहम सा गया और बाहर की तरफ चल दिया. वही अलका भी मूह नीचे कर मंद
मंद मुस्कुरा रही थी इस अपने छोटे भाई पे.
"दीदी आप ध्यान से बैठना. कही गड्ढा वॅड्डा आया तो गिर जाओ." अर्जुन जो स्कूटर स्टार्ट कर चुका था अपनी
बेहन अलका से बोला जब वो बैठने लगी. ये लंबी सीट वाला एल एम एल स्कूटर था, जिसपे अलका अपने दोनो पैर एक
ही तरफ कर बैठ चुकी थी. उसने एक हाथ मे अपनी फाइल्स और छोटा सा पर्स पकड़ा हुआ था. और दूसरा हाथ
अर्जुन के दाएँ कंधे पे था. दुपट्टा अब उसके सर के उपर से आता हुआ सीने को ढके हुए था. शायद ये भी
एक संस्कार का ही हिस्सा था कि घर की कोई भी लड़की बिना सर ढके घर से बाहर नही निकलती थी.
"बस तू स्कूटर चलाने पे ध्यान दे भाई. मैं गिरी तो तुझे भी ले गिरूंगी." खिल खिलाती हुई अलका बोली और
वो दोनो निकल दिए विमन कॉलेज की तरफ. ये कोई 4-5 किमी था घर से और शहर के सुरक्षित हिस्से मे था.
इस कॉलेज का आस पास के कही शहरो मे नाम था क्योंकि यहा लगभग सभी विषय उपलब्ध थे. और पुलिस
चेक पोस्ट भी थे कॉलेज मे दाखिल होने वाले सभी रास्तो पर, बेलगाम मजनुओ की खैर खबर लेने के लिए.
कॉलेज से थोड़ी दूर पहले ही सड़क कुछ ज़्यादा ही टूटी हुई थी. शायद कुछ निर्माण चल रहा था वहाँ तो
स्कूटर ने हल्के से झटके खाए. अलका ने अपने एक हाथ से अर्जुन की कमर को कस कर पकड़ लिया. अब उसका एक साइड
को पूरा स्तन अर्जुन की पीठ से चिपका हुआ तो और वो तो मज़े में ही आ गया अपनी बेहन के इस तरह चिपकने
से.
"ध्यान से चला छोटे यहा थोड़ी ज़्यादा ही सड़क खराब है." बोलते हुए अलका ने खुद को और आगे कर लिया
बार बार छोटे गड्ढे के आने से अब उसकी पीठ पे अलका दीदी के लगभग दोनो ही नारियल घिस रहे थे.
ना चाहते हुए भी अर्जुन के शरीर मे कंपन्न होने लगी थी. ऐसे ही मज़े के दौर से होते हुए वो कब कॉलेज
के गेट के सामने पहुँच गये पता ही नही चला. और जब अर्जुन ने ब्रेक लगाई तब जाकर अलका का ध्यान
टूटा. वो अभी तक अपने छोटे भाई की पीठ से चिपकी हुई थी.
"चलो दीदी आप जाओ, मैं यही बाहर आपका इंतजार करता हू." अर्जुन ने कॉलेज की दीवार क साथ स्कूटर का
स्टॅंड लगाते हुए कहा.
"बड़ा आया इंतजार करने वाला. सीधी तरह चल मेरे साथ अंदर और हा मेरी सहेलियाँ भी होंगी वहाँ तो
थोड़ा अच्छे बच्चे जैसा व्यहवहाँर करना." बोलकर उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा और ले गई उसको खींचते हुए
कॉलेज के अंदर. वैसे तो ये महिला महाविद्याल य था लेकिन यहा पे पढ़ने वाली लड़कियों के संबंधी भी
अंदर आ जा सकते थे. बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पे ही अलका ने सुरक्षाकर्मी को अर्जुन की एंट्री करवाई अपने
भाई के नाम से और वो दोनो चल दिए अंदर.
अर्जुन तो आज पहली ही बार किसी कॉलेज मे आया था. एक बार
पहले वो कॉलेज तक आया ज़रूर था लेकिन बाहर से ऋतु को लेकर चला गया था. आज जब वो यहा अंदर
आया तो हैरान ही रह गया. हर तरफ सिर्फ़ लड़कियाँ ही लड़कियाँ थी और यहा कोई 10 बिल्डिंग थी जो एक
दूसरे से थोड़ी दूर दूर थी. सभी अलग अलग विषय के हिसाब से थी. और चहल पहल भी सिर्फ़ 2 बिल्डिंग्स
में ही थी. एक तो जहा वो अभी आए थे. और एक उनसे कुछ ही दूरी पे थी. जहा हर तरफ हसीनाओं के झुंड
खड़े थे.
"चल पहले अकाउंट्स डिपार्टमेंट का काम निपटा लेते है." अलका की आवाज़ से अर्जुन का ध्यान वापिस अपनी बड़ी
बेहन पर आया जो अभी तक उसका हाथ थामे थी. यहा खुली रोशनी मे खड़ी वो पूरे कॉलेज की लड़कियो
को पानी भरने पे मजबूर किए थी. अर्जुन को खुद पे गर्व महसूस हो रहा था जब उसने आसपास देखा के
कई जोड़े आँखों के उन्ही दोनो को देख रहे है. अलका उनकी परवाह किए बिना अर्जुन को लेकर चल दी वही पास
मे बने गलियारे मे जहा हर दरवाजे के बाहर एक तख़्ती लगी थी. 3 कमरो के बाद आया "अकाउंट्स एंड अड्मिशन"
का कमरा. वहाँ कुछ ज़्यादा भीड़ नही थी क्योनि कॉलेज 8 बजे शुरू हो जाता था और आज ज़्यादातर स्टूडेंट्स का
अवकाश था. अलका का खिड़की पे 6 नंबर था. उन्हे यहा 10-15 मिनिट तो लगने ही थे. अर्जुन ने ये देख बात
शुरुआत की.
"दीदी अपनी फाइल आप मुझे पकड़ा दीजिए.", उसने अपना हाथ फाइल्स पर रखते हुआ कहा
अलका ने शून्य भाव से देखते हुए अपनी फाइल उसको थमा दी. और अर्जुन भी समझ गया के कुछ तो हुआ है.
अलका ने उसके मन को भाँप लिया और उसके करीब आकर धीमे से कान मे बोली, "यहा तू मुझे दीदी मत बोल.
सिर्फ़ अलका बोल या कुछ भी."
अर्जुन तो अपनी दीदी की साँसों की गर्मी से सुन्न हो गया था जो सीधा उसके कान
की लौ पर महसूस हुई. वो कुछ ना बोला और सिर्फ़ अलका को उपर से नीचे एक बार देखा और फिर यहा वहाँ देखने
लगा. अलका अपने भाई की इस अदा पर मुस्कुरा उठी और उसने भी अपना ध्यान सामने की तरफ कर दिया.