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Incest ये प्यास है कि बुझती ही नही

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StoryPublisher

Guest
ये प्यास है कि बुझती ही नही

अपडेट - 1

प्यार. बड़ा छोटा सा लफ्ज़ है लेकिन ज़िंदगी बदल जाती है जो एक बार ये हो जाए.

लोग कहते है के ये एक बार होता है और सिर्फ़ नसीब वालो को मिलता है. दुनिया मे

इस से बढ़कर कुछ नही. इश्क़ को लोग भगवान/खुदा के बराबर मानते है. लेकिन

क्या सच है ये? क्या प्यार सबसे बड़ा एहसास है? कैसा होता है ये? और क्या दुनिया

प्यार से आगे भी है? और क्या सीमा है इस प्यार की?

शायद सही, शायद ग़लत. कम से कम एक शक़स तो है ऐसा जो मानता है कि प्यार ऐसा

नही जैसा लोग कहते है. और इसका एहसास उनको ज़रा भी नही है क्योंकि जो भी प्यार

पे निबंध लिखता है उसको ये कभी हुआ ही नही होता. प्यार एक बार नही सो बार हुआ.

आज 40 का होने वाला हू तो अपने अतीत को देख रहा हू. करने को कुछ बचा ही नही है.

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"अर्जुन-अर्जुन, कहा है तू? उठा या नही अभी तक. आज पेपर है तेरा", अर्जुन की मा रेखा

अपने बेटे को आवाज़ दे रही थी क्योंकि सुबह क 7 बज रहे थे. और वो घोड़े बेच के सो

रहा था. सारी रात जो पढ़ता रहा था वो. फिर मा के आवाज़ देने पे उठा और सीधा चला

गया आँगन मे बने बाथरूम मे.
 
इंट्रोडक्षन

साल - 1998

ये परिवार है हरयाणा राज्य के एक शहर मे बसे प्रतिष्टित व्यक्ति पंडित रामेश्वर जी का.

रामेश्वर शर्मा - परिवार के मुखिया. रिटायर्ड एसएसपी है अभी उमर है 70 साल. पूरे शहर मे इनका

नाम इज़्ज़त से लिया जाता है बड़े ही सुलझे हुए इंसान है. अपने नाम का अनुसरण करते है और

हमेशा सिर्फ़ सच का साथ देने वाले. अपने टाइम मे लाहोर से एम.ए. किया था और फिर पोलीस मे नौकरी

लग गई. 4 बजे उठ जाते है ऑर रात 10 सो जाना इनकी आदत है. पूजा पाठ नियम से करते है ऑर

पूरे परिवार का ध्यान रखते है. सब इन्हे पंडित जी कहते है. कुल मिला कर खुशमिजाज़ इंसान है.

कौशल्या देवी - 68 साल की एक बेहद संस्कारी ऑर धार्मिक महिला है ये. इस घर को घर बनाने वाली

यही है. पति तो पोलीस की नौकरी मे रहे 35 साल लेकिन इन्होने अपने बच्चो की परवरिश मे कोई कमी

नही आने दी. सबकी इज़्ज़त करती है लेकिन मिजाज़ से एकदम सख़्त औरत है. अनुशासन, संस्कार ऑर धरम

करम. बस यही इनको पसंद है. रामेश्वर जी से इनको 4 संतान हुई. तीन बेटे और सबसे छोटी एक बेटी

है.

1. राजकुमार शर्मा - ये है रामेश्वर जी के सबसे बड़े बेटे. 51 साल की उमर है इनकी ऑर पढ़ाई के बाद

इनकी सरकारी विभाग मे नौकरी लग गई थी. शरीर दरमियाना है लेकिन सेहतमंद इंसान है. सही उमर

मे रामेश्वर जी ने इनकी शादी पास के ही गाँव के एक अच्छे परिवार की लड़की से करवा दी थी. इनकी पत्नी

का नाम है ललिता देवी. 47 साल की एक बेहद खूबसूरत महिला है. राजकुमार जी का दिल आज भी इन्ही

के क़ब्ज़े मे है. इनकी 3 संतान है. एक बेटा संजय (25 साल), बेटी मधुरी (23) और सबसे छोटी अलका

(20 साल). संजय एक प्राइवेट इन्सोरेन्स कंपनी मे मॅनेजर है. अंतर्मुखी व्यक्ति है. ज़्यादा बोलता नही

बस काम से काम रखता है. दादा-दादी की हर बात इसके लिए एक कसम समान है. सांवला है लेकिन शरीर

एकदम पत्थर है. वही मधुरी अपनी मास्टर्स डिग्री करने के बाद अपनी माँ के साथ घर के काम मे हाथ

बँटवाती है और खाली समय मे सिलाई कढ़ाई करती है. नाचने का शौंक है इनको. खूबसूरत इतनी है

कि मधुरी डिक्सिट भी पानी भरती नज़र आए. राजकुमार जी की लाडली अलका भी कुछ कम नही है. घर

मे कद-काठी तो सभी अच्छी है पर ये लड़की तो अपने भाई से भी 2 इंच उँची है. जहाँ मधुरी का

शरीर गठीला ऑर एवरेज लंबाई है वही अलका बिलुल गुलाब सी गुलाबी और एकदम नाज़ुक. इसकी हर बात

पूरे घर मे सुनी जाती है. दादा जी प्यार से इसको लक्ष्मी बुलाते है.

2. शंकर शर्मा - ये जनाब पूरे शर्मा परिवार मे विख्यात है. पेशे से सरकारी डॉक्टर है ऑर

इनकी उमर है 48 साल. 5'10" की लंबाई है और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी. कॉलेज टाइम मे ये

राष्ट्रीय स्तर पे बॉक्सिंग कर चुके है. लेकिन एक भी गुण रामेश्वर जी का नही है इनमे सिवाए

शरीर और अनुशासन के. इनके गुस्से से खुद रामेश्वर जी भी चुप रह जाते है. बचपन से ही

ये अपने माँ-बाप के चहेते थे. जो दिल मे आता है वही करते है. सिग्रेट और शराब के भी शौकीन लेकिन

समाज सेवा भी इनके जैसी कोई नही करता. ग़रीब इंसान का इलाज़ उसके घर भी जाकर कर देते है.

लेकिन इनकी धर्मपत्नी जी एकदम शांत महिला है. रेखा शर्मा, उमर 45 साल और ये इस घर की सबसे

शांत महिला है. अपनी जेठानी को बड़ी बेहन मानती है. इनके बच्चे ही इनकी दुनिया है. 2 बड़ी लड़किया

और सबसे छोटा है इनका बेटा अर्जुन. बड़ी बेटी कोमल 21 वर्ष की है ऑर ग्रॅजुयेशन लास्ट एअर मे है.

दूसरी बेटी ऋतु 19 साल की है ऑर अभी एमबीबीएस के फर्स्ट एअर मे है. जहाँ कोमल एकदम भरे शरीर की

आकर्षक युवती है है वही ऋतु लंबी छरहरी काया वाली एक ग़ुस्सेल लड़की. कोमल अपनी माँ रेखा जी

पे गई है ऑर ऋतु अपने पिता शंकर जी की लाडली है. सबसे छोटा है अर्जुन. ये अभी मेट्रिक मे है.

माँ-बाप से ज़्यादा ये अपने दादा-दादी की जान है. अर्जुन मीट्रिक से पहले बोरडिंग मे ही रहा था 8 साल.

और साल मे एक बार ही घर आता था. शुरू से ही रामेश्वर जी का अनुसरण करता आया है. पढ़ाई मे

पूरे घर मे इस जैसा कोई नही. बड़ी बहनो को भी इंग्लीश पढ़ा देता है. पूरे 6 फीट की लंबाई है

इसकी ऑर कसरत का शौकीन. रामेश्वर जी खुद इसको 4:30 बजे उठा देते है ऑर 10 किमी की दौड़ लगा के आने

के बाद 2 गिलास बादाम का दूध अपने सामने पिलाते है. अर्जुन भी रोज रात को अपने दादा जी और दादी जी

के पैर दबाता है जितने दोनो सो नही जाते. कुलमिलाकर ये लड़का इस घर का तारा है.

3. नरेन्दर शर्मा - ये है सबसे छोटे बेटे रामेश्वर जी के. अच्छे कद-काठी के ज़िंदगी से भरपूर

इंसान. 44 साल की उमर मे भी ये किसी कॉलेज के युवक समान है. बहुत ही सरल और हँसमुख व्यक्ति.

इनकी सबसे ज़्यादा अपने भाई शंकर शर्मा से निभती है. दोनो भाई एक दूसरे से बे-इंतिहा प्यार करते है.

ये पंजाब के एक बड़े शहर मे अपने परिवार के साथ रहते है. इनकी पत्नी कृष्णा देवी एक अंतर्मुखी

महिला है. ज़्यादातर सेहत खराब रहती है इनकी ब्लड प्रेशर की वजह से. लेकिन नरेन्दर जी अपनी

बीवी से प्यार बहोत करते है. जिसका परिणाम है इनकी 2 बेहद खूबसूरत बेटियाँ. प्रियंका (21) और

आरती (19). दोनो ही कॉलेज मे है और बिलुल एक जैसी है ये. जवानी से भरपूर, एकदम सही साँचे मे

ढली हुई. शहर के लड़के इनके कॉलेज के बाहर इन दोनो को ही देखने आते है बस ऐसा समझ लीजिए.

लेकिन ये भी बड़ी अनुशासन प्रिया ऑर अपने परिवार की इज़्ज़त रखने वाली लड़कियाँ है. नरेन्दर जी ने इन्हे

कहीं कोई कमी नही होने दी है आजतक. और साल मे 2 बार ये सब लोग कुछ दिनो के लिए अपने बड़े घर

ज़रूर जाते है. गर्मी की छुट्टियों मे और दीवाली के समय. ये रामेश्वर जी की बनाई हुई एक परंपरा

है.

4. मधु शर्मा. रामेश्वर जी की सबसे छोटी औलाद ऑर सब को अपने से छोटा समझने वाली महिला. इतना

घमंड शायद रावण मे ना रहा हो जितना इनमे है. हो भी क्यो ना इनके बाप शहर के सबसे बड़े पोलीस

अधिकारी जो रह चुके. उपर से इनका विवाह भी रामेश्वर जी ने ऐसे परिवार मे कर दिया जहाँ संस्कार से

ज़्यादा पैसा मायने रखता हो. ये रिश्ता करवाया था कौशल्या जी के छोटे भाई हँसमुख ने.

मधु शर्मा की उमर तो है 40 साल लेकिन पैसे ने इनको जवान बना रखा है. दिखने मे ये बिलखुल खजुराहो की

मूर्ति के समान है. इनके पतिदेव श्रीमान अशोक वशिष्ठ जी की खुद की कंपनी है हिमाचल मे जहाँ

बिजली का समान बनाया जाता है. अशोक जी का अधिकतर समय कंपनी और टूरिंग मे ही रहता है. और

मधु शर्मा रहती है अपने 2 बच्चो के साथ हिमाचल के एक खूबसूरत शहर मे. जहाँ साल मे आधा

समय बरफ ही जमी रहती है. बहुत बड़ा घर है इनका ऑर करने को ज़्यादा कुछ है नही. एक बेटी है

तारा (19), बिल्कुल अपनी माँ पे गई है. खूबसूरत, घमंडी और रोब झाड़ने वाली. बेटा हिमांशु (18)

बिल्कुल अलग. होशियार है, प्रकृति प्रेमी और लोगो के बीच खुश रहने वाला. अभी बोरडिंग स्कूल मे

है. वही तारा देल्ही मे फॅशन का कोर्स कर रही है. कुल मिलाकर ये एक अलग परिवार है रामेश्वर

जी के बनाए संसार से.
 
अपडेट - 2

प्रारंभ (शुरुआत)

पंडित जी को बागवानी का बहोत शॉक है. अपनी मेहनत से उन्होने 1000 गज के अपने घर मे 500 गज

जगह मे एक खूबसूरत बगीचा बनाया हुआ था जो पूरे घर को और आकर्षक बनाता था. गुलाब, गेन्दा,

चमेली, अशोक, अमरूद, पपीते, अंगूर ऑर पता नही कॉन कॉन से पौधे लगा रखे थे उन्होने. अपने

बच्चो की तरह ध्यान रखते थे वो अपने बगीचे का और उनका पूरा साथ देता था उनके दोनो पोते का.

अपने घर का नाम उन्होने रखा था "संसार" और वाकई मे ये एक संसार ही तो था जिसको उन्होने

अपनी संगिनी कौशल्या के साथ मिलकर बनाना शुरू किया था जब उनके बच्चे भी नही हुए थे. और

आज यही घर सिर्फ़ घर नही रहा था. आशियाना था ये एक भरे पूरे संस्कारी परिवार का. लेकिन

समय कब एक सा रहा है.

2 मंज़िल का ये घर सबके रहने के हिसाब से ही बनाया गया था. जैसे जैसे सदस्य बढ़ते गये

वैसे वैसे कमरे भी बनते गये. पहली मंज़िल पे सबसे आगे रामेश्वर जी की बैठक थी जहाँ

3 सोफे और एक दीवान सजे रहते थे. और कुछ कुर्सिया. उसके पीछे ही थे उनका ऑर कौशल्या जी का

कमरा जिसके साथ एक मंदिर कक्ष भी जुड़ा था. आँगन और बड़ी रसोई इनसे आगे और फिर आख़िर मे 4

कमरे और बने थे. एक कमरा था राजकुआर जी ऑर उनकी पत्नी का, उसके साथ मे उनकी दोनो बेटियो मधुरी ऑर अलका का,

तीसरा कमरा था कोमल और ऋतु का और सबसे आख़िर मे रेखा और शंकर का. शंकर तो महीने मे

कभी एक या 2 बार ही आते थे. सभी कमरे हवादार ऑर बेहद प्यार से सजाए गये थे.

दूसरी मंज़िल. यहाँ पे जाने के लिए 2 रास्ते थे. एक घर के मुख्य द्वार के पास बनी गोलाकार सीढ़ियो

से ऑर दूसरा पिछले आँगन मे बने बाथरूम के साथ बनी सीढ़ियो से. उपर तो कोई आँगन था नही

लेकिन वहाँ 2 पार्टीशन थे. सामने वाले भाग मे 2 कमरे, एक ड्रॉयिंग रूम, एक बाथरूम और एक रसोई जो अब स्टोर का ही काम करती थी. पिछले पोर्शन मे 2 कमरे और एक बाथरूम था. ये वाला हिस्सा अधिकतर बंद ही

रहता था. अगले हिस्से मे सीढ़ियो के सामने वाले कमरे मे संजीव सोता था और दूसरा कमरा था अर्जुन

का. जहाँ सिर्फ़ किताबें ऑर एक सिंगल बेड ही था. पूरे घर मे टीवी सिर्फ़ 2 ही थे. एक पहली मंज़िल

की बैठक मे और दूसरी मंज़िल के ड्रॉयिंग रूम मे. संजीव ने वही पे एक छोटी जिम भी बना रखी थी.

इतना संपन्न परिवार था रामेश्वर जी का लेकिन एक और खास बात थी कि पूरे घर मे कही भी ए.सी. नही

लगवाया गया था. हाँ 4 कूलर ज़रूर थे. ये वो दिन थे जब बिजली भी बहोत जाती थी और ज़्यादा इनवेर्टर

भी प्रचलन मे नही थे. गर्मियो मे बड़े लोग तो नीचे दोनो आँगन मे सो जाया करते थे ऑर बच्चे उपर

खुली छत पे.

आस-पड़ोस भी बड़ा शांत और हरा-भरा था. घर लगभग सभी बड़े थे तो दूर-दूर भी थे. लेकिन

इसके आसपास सभी सहूलियत भी थी. पार्क, थोड़ी दूर पे मार्केट, 3 बड़े स्कूल और एक कॉलेज भी था.

शहर का सबसे खुला सेक्टर था ये और शांतिपूर्ण भी.

चलिए वापिस कहानी पे चलते है.

अर्जुन नहा धो के आया और फिर पंडित जी के पास गया आशीर्वाद लेने. आज उसका आख़िरी इम्तिहान है

दसवी कक्षा का. और इसके बाद एक महीने का आराम.

रामेश्वर जी (आरएस)- मेरा शेर आज कुछ ज़्यादा ही सोया लगता है. बर्खुरदार इतनी मेहनत भी नही करो

कि बिस्तर पकड़ लो. साइन्स का पेपर है?

अर्जुन - क्या बाबा, आप ही तो बोलते हो जिनके सपने बड़े हो उन्हे ज़्यादा जागना चाहिए उन्हे पूरा करने

के लिए. बस ये पर्चा आज हो जाए फिर तो मैं आपके साथ रोज नये फूल उगाउन्गा हमारे बगीचे मे.

आरएस- क्यो नही बेटे. हम दोनो चलेंगे यूनिवर्सिटी और जो नई किसमे आई है वो लगाएँगे यहाँ.

फिर कौशल्या देवी ने अर्जुन को दही-शक्कर खिला के विदा किया. फिर अर्जुन अपनी माँ और ताई

जी के पाव छू आशीर्वाद ले निकल गया.

घर के पास ही उसके क्लासमेट संदीप का भी घर था. अर्जुन और संदीप साथ चल दिए स्कूल.

संदीप- भाई आज का क्या इरादा है? देख आख़िरी दिन है तेरे पास जवाब देने का. मैं तेरी जगह होता

तो कब का खिलाड़ी बन चुका होता.

अर्जुन- पागल है क्या? भाई अभी ये सब की उमर नही अपनी. और उपर से वो मुझे पसंद भी नही.

संदीप - देख मेरे भाई आकांक्षा पे पूरा स्कूल जान देता है और वो सिर्फ़ तुझे देखती है. सुना था

ना इंग्लीश वाले पेपर क टाइम राणा और कुलविंदर क्या बोले थे. "अर्जुन की जगह हम होते तो कब का पेल

दिया होता उस पर-कटी को". देख आज पेपर के बाद जब वो तुझे बुलाए तो कम से कम अकेले मे एक बार

मिल तो लिओ उस से. फिर चाहे जो दिल कर वो करिओ भाई.

अर्जुन- देख भाई ये जो भी है कुछ सही नही है. मैं तुझे मेरी ज़िंदगी का लक्ष्य समझा नही सकता

लेकिन जो तू मुझे सलाह दे रहा है ये उसमे विघ्न ज़रूर डाल सकती है. और रही बात सिर्फ़ मिलने की

तो चल मैं आज मिल लेता हूँ उस से.

(राणा और कुलविंदर स्कूल के सबसे बदनाम लड़के थे. और वो 2 साल सीनियर भी थे अर्जुन के. हर लड़की

इनको सिर्फ़ काम की देवी ही लगती थी. लेकिन दिल के सॉफ थे वो दोनो. सामने से किसी को कुछ नही कहते थे

लेकिन इनके खुद के फैलाए झूठे क़िस्सों ने इन्हे बदनाम किया हुआ था)

बातें करते हुए संदीप और अर्जुन स्कूल पहुँच गये. वहाँ पे खड़ी स्कूल बस से सभी स्टूडेंट्स को

उनके सेंटर पे लेके जाया जाता था. एक बस देख दोनो चढ़ गये लेकिन यही ग़लती हो गई. पूरी बस मे

सिर्फ़ 2 सीट खाली थी जिसमे से एक पे संदीप बैठ गया और दूसरी सीट जिसके साथ वाली सीट पे एक बेहद

ही खूबसूरत सी लड़की बैठी थी वो खाली थी. अर्जुन वही रुक गया बस के गेट पे. लेकिन तभी उनकी

स्कूल टीचर मिसेज़ वालिया की आवाज़ आई.

मिसेज़ वालिया - अर्जुन. खड़े क्यो हो. चलो बैठो वहाँ पे आकांक्षा के साइड मे.

अर्जुन - यस मॅम.

ये वही लड़की थी जिसके बारे मे संदीप बात कर रहा था. दूध सी गोरी, आँखों पर एक स्टाइलिश

नज़र का चश्मा, हल्के गुलाबी होंठ, भूरी आँखें. लड़की क्या साक्षात परी थी वो. और जो मुस्कान

उसके चेहरे पे आई मेडम की बात सुन के बेहद दिलकश. अर्जुन चुपचाप जा कर उसके बगल मे बैठ गया.

आकांक्षा- हाई (बेहद शालीनता से)

अर्जुन- हेलो आकांक्षा

आकांक्षा- नाराज़ हो. देखो उस दिन मैं हार गई थी खुद से और सबके सामने अपने प्यार का इज़हार कर दिया.

मैं और कुछ नही कहूँगी अर्जुन. तुम्हे मेरा प्यार क़बूल हो या नही. बस एक बार पेपर के बाद मुझे

5 मिनिट दे देना. और कुछ नही चाहिए.

अर्जुन- ठीक है. वापिस स्कूल आने के बाद.

ये दोनो जो भी बात कर रहे थे ये इतनी धीमे हो रही थी की शायद ही किसी को सुनाई दे. एग्ज़ॅम का सेंटर

15 किमी दूर था और अभी काफ़ी टाइम बाकी था. दोनो खामोश हो गये थे अब. बाकी स्टूडेंट्स कुछ डिसकस कर

रहे थे कुछ शोर मचा रहे थे. आज आख़िरी इम्तिहान जो था. आकांक्षा खिड़की से बाहर देख रही थी

अपनी ही विचारो मे गुम. अर्जुन, जो संयम और अनुशासन का पक्का था आज उसने पहली बार कनखियो से

उस लड़की की तरफ देखा. उसकी गुम्सुम सी भोली सूरत, सफेद रब्बर मे बँधे गर्दन तक आते बाल जिनमे

से कुछ आज़ाद होकर हवा से उड़ रहे थे. सफेद स्कूल शर्ट मे उसका गुलाबी चेहरा ऐसा लग रहा था

जैसे एक दूध पे रखा गुलाब हो.

"चलो चलो जल्दी करो सब. सब लाइन से एंट्री करेंगे", स्कूल टीचर की आवाज़ सुनाई दी अर्जुन को.

अर्जुन अपने ही मन मे, "ये क्या हुआ. आज एक मिनिट मे ही सेंटर पहुँच गये."
 
अर्जुन को पता भी नही चला की कितनी देर से वो उस लड़की को देख रहा था. शायद समय ही रुक गया

था. और एहसास तब हुआ जब मेडम की आवाज़ सुनाई दी.

"हम भी चलें बाहर, देखो सब उतर गये बस से.", अर्जुन ने देखा उन्ही 2 आँखों को जो उसे शरमा के

कुछ बोल रही थी.

अर्जुन - (झिझकते हुए) सॉरी - सॉरी. चलिए

झेंपता हुआ वो बिना किसी की तरफ देखे सीधा बिल्डिंग मे एंटर हो गया. मन मे उथल पुथल मची हुई

थी उसके. ये सब क्या था और ये आज कैसे हो गया. मैं तो कभी उसको पसंद नही करता था तो आज

क्यूँ मेरा ध्यान उसपे गया. ये सब विचार उसके मन को हिला रहे थे. जब कुछ भी नही सूझा तो अर्जुन

ने अपनी आँखें बंद की ऑर खुद से कहा, "ये आख़िरी इम्तिहान है. लक्ष्य से नही भटकना,"

अगले 2 1/2 घंटे उसका ध्यान सिर्फ़ परीक्षा पत्र और उनके उत्तर लिखने मे ही रहा. सभी सवाल हाल

करने के बाद एक बार फिर से उसने पूरे प्रश्न-उत्तर का मिलान किया ऑर अपनी शीट जमा करवा दी. परीक्षा

कक्ष से बाहर आया तो कलाई घड़ी मे देखा कि अभी भी 20 मिनिट बाकी है. वो चुप चाप स्कूल बस की

तरफ चल दिया. वहाँ उसके अलावा कोई भी स्टूडेंट नही था. सिर्फ़ बस के 2-3 ड्राइवर छाया मे खड़े बीड़ी का

कश लगा रहे थे. अर्जुन उनको नज़र-अंदाज़ करता हुआ बस मे आख़िरी सीट पे जाकर बैठ गया. मंन

फिर से अशांत हो रहा था उसका. ये कभी ऐसा नही हुआ था उसके साथ. फिर आज क्यो ऐसा हो रहा है.

जब ध्यान टूटा तो देखा कि बस पूरी भर गई थी ऑर उसके पास दूसरे सेक्षन के स्टूडेंट्स बैठे थे.

30 मिनिट क बाद सभी बस उनके स्कूल के स्टॅंड पे खड़ी थी और सभी लोग एक दूसरे से मिल रहे थे.

अर्जुन चुप चाप निकलने की कोशिश मे मुख्य द्वार की तरफ चल पड़ा. अभी कुछ हे दूर गया था की

उसकी नज़र विपरीत दिशा मे फुटबॉल ग्राउंड के कोने मे पेड़ के नीचे खड़ी आकांक्षा पर पड़ी जो उसकी

तरफ एकटक देख रही थी. अर्जुन सम्मोहित सा चल पड़ा उस तरफ बिना कुछ देखे. संदीप दूर खड़ा

सब देख रहा था और मुस्कुरा रहा था.

आकांक्षा- जा रहे थे ना बिना मिले?

अर्जुन- नही बस संदीप को ढूंड रहा था. तुम यहा अकेली?

आकांक्षा- हा मेरी ज़्यादा फ्रेंड्स नही है स्कूल मे. और तुम्हारा दोस्त तो खुद तुम्हारे हे पीछे चल

रहा था.

अर्जुन नज़र घूमाते हुए देखता है कि सच मे संदीप दूर खड़ा था वही जहाँ कुछ समय पहले अर्जुन

खड़ा था.

"हां वो ज़रा सर दर्द था तो ध्यान नही दिया." कुछ और नही सूझा तो अर्जुन ने यही बोल दिया

अगले ही पल उसको ऐसा लगा जैसे किसी ने बरफ रख दी हो उसके सर पे. आकांक्षा का हाथ उसके

माथे पे था.

"तुम ठीक तो हो?" घबराई सी आवाज़ मे उसने अर्जुन से पूछा..

"आह... हाँ. मैं ठीक हूँ."

10 महीने मे पहली बार आज अर्जुन ने आकांक्षा को इतने करीब से देखा था या यूँ कहे कि उसका

स्पर्श महसूस किया था. उसको ऐसा लगा था के सिर्फ़ हाथ के स्पर्श से इस लड़की ने उसकी आत्मा को

पकड़ लिया हो. आलोकिक अनुभव

"तुम्हे कुछ कहना था मुझ से?" अर्जुन ने होश मे आते ही सवाल किया

"मुझे नही पता कि तुम मेरे बारे मे क्या सोचते हो अर्जुन. शायद जैसा बाकी सब सोचते है

कि मैं एक अमीर, घमंडी, बे-गैरत लड़की हूँ तुम भी ऐसा सोचते होगे. लेकिन मुझे उनके सोचने

से कोई फरक नही पड़ता क्योंकि मुझे उनकी परवाह नही है. मेरे माँ-बाप ने कभी प्यार नही दिया

लेकिन वो सब दिया जिस से लोग मेरे बारे मे ग़लत अनुमान लगते है. मैने कभी किसी की तरफ

नही देखा लेकिन जब भी तुम्हे देखती हूँ तो ऐसा लगता है जैसे बस एक तुम्हारी कमी थी

इस ज़िंदगी मे." बोलते बोलते उस फूल सी खिली लड़की की आँखें नम हो चुकी थी और ये देख

के आज पहली बार अर्जुन का दिल भी पसीज गया था.

वो फिर बोली,"जब मुझे लगा कि अब शायद हम ना मिल पाए तो मैने पिछले एग्ज़ॅम मे तुम्हे प्रपोज़

कर दिया और शायद ये भी एक और ग़लती हो गई मुझ से. मैं तुम्हारे सपनो के बीच नही आना

चाहती अर्जुन लेकिन मेरा सपना अब तुम ही हो. इसलिए मैने पहली बार तुम्हारे दोस्त से भी रिक्वेस्ट

की थी कि वो तुम्हे एक बार मुझ से बात करने के लिए मना ले." इतना बोल कर आकांक्षा अर्जुन की

तरफ आशा भरी नज़रों से देखने लगी.

"सच कहूँ आकांक्षा? आज तक मैने कुछ भी नही सोचा था. एक साल से मैने कभी भी तुम पे

गोर नही किया था. आज सुबह मैने पहली बार तुम्हे देखा था. और अभी मैं यहाँ तुम्हारे पास

खड़ा हूँ. मुझे नही पता कि इस सबका क्या मतलब है लेकिन इतना कहता हूँ कि मैं यहाँ अभी 2 साल

और हूँ. हम दोस्त बन सकते है और बात कर सकते है." हिम्मत कर के अर्जुन ने उसकी आँखों

मे देखते हुए ये सब कहा. लेकिन उसकी बात पूरी होते होते आकांक्षा के चेहरे पे एक छोटी

सी मुस्कान आ चुकी थी. अब तक सभी स्टूडेंट्स जा चुके थे और वहाँ कोई भी नही था.

"मुझे भी सिर्फ़ यही चाहिए अर्जुन." खुशी मे वो अर्जुन के गले लग गई थी. और आज ये

एक और नया एहसास था उसकी ज़िंदगी मे. दोनो ही चल पड़े गेट की तरफ जहाँ संदीप खड़ा

इंतज़ार कर रहा था अर्जुन का. फिर मिलने का बोल के अर्जुन चल दिया अपने दोस्त के साथ घर की तरफ.

"वाह चीते! कमाल कर दिया भाई तूने आख़िर उस से बात कर ही ली", संदीप ने बात शुरू की

"पता नही यार मैं घर की तरफ निकल रहा था लेकिन जैसे ही उसको देखा तो लगा कि ये सही

नही होगा. बात ही तो करनी है, कर ही लेता हूँ. और फिर दोस्त बनाने मे क्या बुराई." अर्जुन बोला

संदीप- भाई वो तुझे पसंद करती है, देखा नही कैसे गले लगी थी. और लड़की भी ग़ज़ब है

तेरी तो लॉटरी लग गई."

अर्जुन- क्या कुछ भी बोलता है. ऐसा कुछ भी नही होता. चल छोड़ ये सब और बता अब एक महीना

क्या करना है?

संदीप"करना क्या है भाई मैं तो आराम करूँगा, जिम शुरू करूँगा और बुक्स लूँगा नेक्स्ट क्लास की."

अर्जुन- कंबाइंड स्टडीस भी कर लेंगे भाई कभी कभी. और जिम तो शायद मैं संजीव भैया

के साथ ही करूँगा."

ऐसे ही बातें करते करते दोनो अपने अपने घर पहुच गये. शाम को मिलने का प्लान बना के.

घर पहुचते ही हाथ-मूह धोया और बैठ गया खाने की टेबल पे अर्जुन.

"सब कहा है? कोई नज़र नही आ रहा दीदी." अर्जुन ने कोमल से पूछा जो उसका खाना लगा रही थी

"मल्होत्रा अंकल के घर आज पूजा है तो सभी वही गये है. और बाबा अपने कमरे मे सो रहे है

वो भी कुछ देर पहले ही आए थे. बाकी सब शाम तक आएँगे." खाना डालते हुए कोमल ने बताया

घर पे कोमल ज़्यादातर कॉटन के सिंपल सूट ही पहनती थी और आज भी उसने वही सिंपल सा नीला

सूट पहना हुआ था. लेकिन शरीर कुछ ज़्यादा ही गदराया हुआ था तो सूट भी छाती से चिपका रहता

था. दुपट्टा लिया नही था गर्मी की वजह से तो जैसे ही वो झुकी तभी अर्जुन की नज़र उसके सूट

से झाँकते उभार पर चली गई. उसने शर्मिंदगी से अपनी नज़र नीचे कर ली. कोमल भी खाना परोस

के चली गई.

"आज शायद सब कुछ ग़लत हो रहा है. ऐसा एहसास पहले कभी नही हुआ था. लेकिन अभी जो हुआ

वो आकांक्षा वाले एहसास से अलग था. बुरा भी लगा लेकिन नही भी." खुद के मन मे ही सोचता हुआ

अर्जुन खाना खा के अपने कमरे मे जा कर लेट गया..
 
अपडेट 3

भैया ने किया मार्गदर्शन

आगे अब अर्जुन की ज़ुबानी:

शाम को किसी के हिलाने से मेरी आँखें खुली. देखा तो सामने संजीव भैया खड़े थे.

"छोटे चल खड़ा हो जा. बाहर चलते है थोड़ा घूमने." भैया ने मुझे बोला तो मैं एक झटके मे

खड़ा हो गया. कमरे के साथ ही बने वॉशरूम मे मूह धोया और चल दिया भैया के पीछे. नीचे

आए तो देख बाहर बगीचे मे दादा जी अपने कुछ दोस्तो के साथ बैठे थे और मधुरी दीदी चाइ

सर्व कर रही थी. सबको नमस्कार करने के बाद मैं भैया के पीछे स्कूटर पर बैठ गया.

संजीव भैया ज़्यादा किसी से बात नही करते थे लेकिन मुझ से उन्हे बहुत लगाव था. सबके सामने

चुपचाप रहने वाला ये मेरा बड़ा भाई मेरे साथ कुछ हद तक खुला था और मेरी परवाह भी करते थे.

घर से निकल के हम पहुँच गये दूसरे सेक्टर की मार्केट मे.

"छोटे तू तो जीरा-लेमन ही लेगा ना? या और कुछ चाहिए?", भैया ने शॉप पे जाने से पहले मुझ से

पूछा. मैं पार्किंग मे ही फुटपॅत पे बैठ गया.

"नही भैया. बस एक जीरा-लेमन." मैने बोला

थोड़ी देर मे भैया मेरे लिए एक जीरा ऑर अपने लिए एक कोला ऑर सिग्रेट ले आए.

"भैया इसको पीने से सेहत खराब होती है. फिर क्यो पीते हो? मैने उन्हे बोला जब वो सिग्रेट जला रहे थे

"भाई देखा जाए तो हर चीज़ से सेहत खराब होती है. खाने से, पीने से, खेलने से, रोने से, सोने से

और प्यार से. तो फिर क्या फायेदा नही पीने का." उन्होने हंस कर मुझे जवाब दिया.

"प्यार. ये कैसे होता है भैया? इसके लिए तो शादी ज़रूरी है ना?" मैने पूछा तो वो हँसने लगे

"छोटे तू ना सच मे छोटा है. चाचा ने तुझे बोरडिंग भेजा तब भी तू बड़ा नही हुआ. प्यार तो

किस्मत से होता है ऑर वो भी सबको नही होता. और जो भी प्यार व्यार करने का ड्रामा करते है वो सिर्फ़

जिस्म की प्यास भुजाने का काम है." उनका जवाब कुछ समझ नही आया मुझे.

"भैया मेरी प्यास तो ये जीरा लेमन से बुझ गई. पानी से भी बुझ जाती है. ये जिस्म की प्यास मतलब?"

मैने अगला क्वेस्चन पूछ लिया

भैया बोले,"चल जल्दी ख़तम कर और वीसीआर वाले रिंकू के पास चलते है. कुछ नई फिल्म आई है वो देखेंगे.

कल मेरी भी छुट्टी है और तेरी भी. गुड़िया लोग भी एक फिल्म देख ही लेंगे."

मैं भी बिना कुछ कहे चल दिया उनके पीछे स्कूटर पे बैठ के. ये रिंकू भाई का दोस्त ही था बचपन से

लेकिन ज़्यादा पढ़ाई नही करी तो अपने भाई के साथ दुकान चलाता था वीसीआर की ऑर वीडियो गेम की. हम वहाँ

पहुचे तो संजीव भैया रिंकू से बात करने लगे.

"बड़ा आदमी हो गया है संजीव तू तो.. स्कूटर, नौकरी और छोकरी.." रिंकू भाई को देखते ही बोल दिया

मुझे झटका लगा ये सुनकर "छोकरी"..

कुछ नॉर्मल बातें कर के संजीव भैया ने उस से पूछा नई फिल्म कोन्सि आई है तो रिंकू ने 6-7 नाम

लिए. मुझे उस समय तक कोई खास लगाव नही था टीवी ऑर फिल्म का लेकिन देख लेता था कभी कभी. भैया

ने एक अजय देवगन की फिल्म ली, एक शाहरुख की जो दीदी लोगो को पसंद था उस टाइम और एक फिल्म ली जिसके

उपर कोई नाम नही था. वीसीआर मैने पकड़ा और हम आ गये घर.
 
8 बजे घर मे खाना खाने का टाइम रहता था. घर पहुचे तो ताऊ जी, दादा जी, ऋतु दीदी, अलका दीदी

खाना खा रहे थे. दादी जी अपने कमरे मे खा रही थी. वीसीआर हम चुपके से पहले ही उपर रख आए थे अपने

रूम मे. दादा जी ने देखते ही कहा.

"बर्खुरदार सिर्फ़ कल तक कर लो मौज मस्ती. सोमवार से नया टाइम टेबल बनाएँगे आपका."

मैने भी हंसते हुए कहा "जो हुकुम आपका मालिक". मैं अकेला हे था जो दादा जी मज़ाक कर लेता था.

वो भी हंस दिए.

हाथ धो कर मैं और संजीव भैया भी बैठ गये खाना खाने. भैया दीदी लोग से भी ज़्यादा बात

नही करते थे लेकिन जो भी वो मँगवाती हमेशा ला देते थे. फिर उन्होने मुझे इशारा किया कि मैं

चारों दीदी को बता दूं कि "दिल तो पागल है" फिल्म देखने आ जाना उपर खाना खा के. मैं सिर्फ़ एक कोमल

दीदी से ही तोड़ा ज़्यादा बात करता था. जब वो मुझे रोटी देने आई तो मैने उनके कान मे बता दिया.

वो मुस्कुराती हुई गई ऑर धीरे धीरे मेरी चारों बहनें मुझे स्माइल देने लगी.

दादा जी के पैर दबाए और चुप चाप चल दिया अपने कमरे मे.

रात तकरीबन 10 बजे संजीव भैया ने 2न्ड फ्लोर के ड्रॉयिंग रूम मे वीसीआर लगाया टीवी पे ऑर शाहरुख की

फिल्म चला दी. एक सोफे पे भैया बैठे थे, एक पे ऋतु दीदी, बड़े सोफे पे अलका, मधुरी और कोमल दीदी

बैठ गये. मैने वही नीचे मेरा मॅट्रेस बड़े सोफे के नीचे बिछा लिया क्योंकि मेरी नींद का कोई भरोसा

नही था. रात मे लगभग सभी दीदी लूस या पुराने सूट मे ही रहते थे तो आज भी कुछ नया नही था

फिल्म अछी थी और गाने भी सबको पसंद थे. लेकिन जब भी सॉंग आता तो भैया आगे कर देते. करिश्मा

कपूर को देख के मुझे बहोत मज़ा आ रहा था. 12 बजे तक फिल्म ख़तम हो गई तो भैया ने अजय देवगन

वाली फिल्म लगा दी. ऋतु दीदी उठ कर नीचे पानी पीने चली गई और अलका दीदी सोने. फिर मैं भी बड़े

सोफे पे बैठ गया कोमल दीदी और मधुरी दीदी के बीच मे. हम फिल्म देखने लगे तो ऋतु भी आ गई थी.

थोड़ी देर बाद फिल्म मे काजोल को देख कर मैं उसके शरीर की तुलना कोमल दीदी से करने लगा. दीदी का सीना

काजोल से भी भारी था लेकिन फीचर्स लगभग एक जैसे. पता नही क्या हो रहा था मुझे. फिल्म देखते हुए

मैं सो गया और मेरा सर कोमल दीदी के कंधे पे टिका था. लगभग एक घंटे बाद संजीव भैया ने मुझे

उठाया तो देखा कि ड्रॉयिंग रूम कोई नही था. 2 बज रहे थे और वीसीआर खाली था.

"डोर बंद कर उठ के मैं एक और केसेट लगाता हूँ. सब गये नीचे" भैया ने मुझे कहा तो मैने हैरान

होते हुए दरवाजे बंद कर दिए.

थोड़ी देर तो टीवी पे कुछ नही आया लेकिन जैसे ही फिल्म शुरू हुई तो नाम लिखा आया "छमिया"

"भैया ये कोन्सि फिल्म है? ये नाम तो पहले कभी नही सुना? कौन हीरो है?"

"बेटा आज तुझे मैं असली ग्यान देता हूँ जो सिर्फ़ अंधेरे मे ही दिखाई देता है. लोग इसके बारे मे ज़्यादा बात

नही करते. शाम को पूछा था ना जिस्म की प्यास, अब देख."

मैं उत्सुकता से देखने लगा टीवी. कुछ ही देर मे एक लड़की जो हेरोइन थी वो दिखने लगी. किसी से फोन पे बात

करते हुए. थोड़ी देर मे सीन चेंज. एक लड़का उस लड़की के घर की डोर बेल बजाता है ऑर वो लड़की शरीर

पे तोलिया लपेटे हुए दरवाजा खोलती है. दोनो गले मिलते है. यहाँ तक मुझे कुछ अजीब नही लगा.

5 मिनिट के बाद सीन कुछ बदल गया. वो दोनो एक दूसरे को चूमने लगे और लड़के ने धीरे धीरे पूरा

तोलिया निकल दिया. जहाँ अंदर वो लड़की नंगी थी. ये देख मैने अपनी आँखें बंद कर ली.

संजीव भैया,"छोटे आँख खोल और देख. शरमा मत. ये सब ज़रूरी है सीखना. ये दोनो प्यार कर रहे

है."

डरते डरते मैने खोली तो देखा कि वो लड़का उस लड़की के दूध पी रहा था. मुझे मेरे कानो मे गर्मी

लगने लगी. आज पहली बार ऐसा कुछ देख रहा था. फिर लड़की ने उस लड़के के सब कपड़े निकाले ऑर नीचे

बैठ कर उस लड़के का पिशाब वाला अंग मूह मे ले लिया.

"छि... ये सब गंदगी है भैया. ऐसे कॉन करता है?" मैने नज़र हटा के भैया से पूछा

"बेटा प्यार करने मे कुछ गंदगी नही होती. जब एक दूसरे से प्यार करते है तो उसकी कोई सीमा थोड़ी

होती है. और वो पिशाब करने वाला अंग लिंग है. जिसको लंड भी बोलते है. ऑर लड़की के अंग को योनि या

चूत. एक बार देख अगर तुझे फिर भी अछा नही लगा तो आज के बाद मैं खुद कभी नही देखूँगा.?" भैया

ने मुझे बोला
 
मैं एक बार फिर से देखने लगा सब कुछ भूल कर. अब वो लड़का लड़की एक दूसरे के अंग चाट रहे थे. ऑर

थोड़ी देर बाद उस लड़के ने लड़की को बेड पे लिटाया ऑर अपना लिंग डाल दिया उसकी योनि मे. उस लड़की के चेहरे

का हावभाव बिल्कुल बदल चुका था. वो लड़का लगा हुआ था धक्के मारने मे. थोड़ी देर बाद उसने लड़की

को पैरो के बल किया ऑर पीछे से धक्के देने लगा. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे मुझे बुखार हो गया

है. और फिर उस लड़के ने अपना लिंग निकाला और लड़की के उपर सफेद पानी टपकाने लगा.

"इसको वीर्य बोलते है भाई. तेरी लॅंग्वेज मे स्पर्म." भैया ने बताया

"ओह तो इस से ही बच्चा होता है." मैने भी बिना सोचे बोल दिया.

"हाँ भाई. जब ये लड़की की योनि के अंदर छोड़ दो तो बचा होता है."

"भैया सेक्षुयल रिप्रोडक्षन मे पढ़ा था स्पर्म, पेनिस, वेजाइना.. लेकिन सिर्फ़ वही पता था. देखा आज है"

फिर संजीव भैया ने मुझे बताना शुरू किया. बूब्स, किस, वेजाइनल सेक्स, अनल सेक्स.. पल्ले कुछ ज़्यादा नही

पड़ा लेकिन नज़र टीवी पे ही थी. एक बार फिर वैसा ही सीन था. यहा एक कामवाली अपने मालिक के साथ वही सब

कर रही थी. इसके ब्रेस्ट्स पहले वाली से बहोत बड़े थे. ये देख भैया ने मुझे बताया कि बड़े ब्रेस्ट

वाली लड़की मे सेक्स ज़्यादा होता है. मैने भी मान लिया.

थोड़ी देर हम दोनो टीवी देखते रहे. मेरा ध्यान जब भैया की तरफ गया तो देखा कि वो अपनी ज़िप खोल कर

अपने लिंग को सहला रहे थे. जैसी हालत उनके लिंग की थी ऐसी मेरी कभी कभी सुबह जागने के टाइम होती

थी. वैसी ही हालत फिल्म वाले अंकल के लिंग की थी.

"तू भी हल्का कर ले अपने आप को भाई. बड़ा मज़ा आएगा. शरमा मत यहा सिर्फ़ हम दोनो है."

मैं चुप रहा ऑर शरम के मारे वापिस टीवी देखने लगा. भैया की आवाज़ फिर आई.

"अर्रे लड़की तो नही है तू?"

मैने घबरा के बोला "नही नही भैया ऐसा तो मेरे भी पास है लेकिन शरम आती है."

"अगर तूने आज ज़िप खोल ली तो मैं तेरा प्रॅक्टिकल भी जल्दी करवा दूँगा." भैया ने जैसे ही ये बोला

मैने झटके मे अपने पेंट की ज़िप खोल दी. अंडरवेर मैं रात मे पहनता ही नही था.

"साले ये क्या है? भैया अपनी कुर्सी से खड़े हो के मेरे सोफे के पास आ कर देखने लगे

"वही है भैया जो आपके पास है." मैने अपने लिंग को दोनो हाथ से पकड़ा हुआ था

संजीव भैया ने फिर थोड़ी देर बाद बोला,"भाई ये लिंग नही लोडा है. देख तेरे दोनो हाथ से भी बाहर

है."

मैने कहा, "भैया मेरी हाइट लंबी है शायद इसलिए. सबकी हाइट के अकॉरडिंग ही तो होता होगा"

वो एकदम से बोले, "छोटे अपने रूम मे जा और स्केल लेके आ."

मैं भाग के साथ वाले कमरे से 12 इंच वाला रूलर लेके आ गया. पहले उन्होने अपने लिंग की जड़ पर

स्केल लगाया तो उनका लिंग का हेड 5.5 इंच पे था. फिर उन्होने मुझे वो दिया ऑर बोले ले अब अपना चेक

कर छोटे.

मैने स्केल टच किया तो अलग सा मज़ा आया. फिर ध्यान दिया तो देखा 7.5 इंच.

भैया बोले, "देख मेरे भाई तेरा खास है. शायद तू हमेशा सेहत का ध्यान रखता है ऑर ग़लत काम

नही करता. हेल्त पे और ध्यान देगा तो ये और मजबूत बनेगा. चल अब अपना लिंग सहला."

हम दोनो अपनी अपनी जगह बैठ गये वापिस और लग गये लिंग सहलाने. 10 मिनिट के बाद मुझे लगा

जैसे मेरी जान निकल रही है. और फिर एक दम से जैसे चिपचिपी गोंद मेरे लिंग से उड़ने लगी. 3-4

बार. और फिर मैं ऐसे ही लाते गया. 5 मिनिट के बाद भैया भी वैसे ही निढाल हो गये.

"क्यो छोटे मज़ा आया? भैया ने धीमी आवाज़ मे पूछा

"भैया ऐसा लगा जैसे जान निकल गई. लेकिन फिर एकदम अलग मज़ा आया जैसे कभी नही आया"

"भाई इसको हस्तमैथुन कहते है. हफ्ते मे एक दो बार तो ठीक है ज़्यादा मत करना." भैया

उठते हुए बोले. उन्होने अख़बार से ज़मीन पे पड़ा वीर्य सॉफ किया और फेंक दिया डस्टबिन मे.

4 बज चुके थे सुबह के. दादा जी के तो जागने का टाइम और आज मैं पहली बार इस टाइम सो रहा था.

फिर जो नींद आई तो ऐसा लगा जैसे पहली बार सोया हू.
 
अपडेट - 4

नया सवेरा

सुबह कोई 10 बजे अर्जुन के कमरे मे उसको जगाने माधुरी दीदी आई. आज रविवार था तो लगभग

सभी घर पे ही थे. संजीव अपने दोस्तो से मिलने चला गया था. रामेश्वर जी पड़ोस मे अपने दोस्त

मिस्टर पूरी, जो एक रिटाइर्ड कर्नल थे उनके घर गये थे. रेखा जी पिछले आँगन मे बने हॅंडपंप के

नीचे कपड़े धो रही थी. कौशल्या जी अपनी बड़ी बहू ललिता जी के साथ तीसरी मंज़िल, जो की छत

थी वहाँ पर आचार और मिर्चो को धूप लगवा रही थी. ये मार्च का पहला हफ़्ता था तो यहा अभी

भी मौसम हल्का ठंडा था. 3 दिन बाद होली का भी त्योहार था तो उसकी भी कुछ तैयारी चल रही

थी. अलका बाहर आँगन मे पानी डाल रही थी और ऋतु उस पानी को बाहर रही थी. राजकुमार जी भी

कही यार दोस्त से मिलने पास में ही गये हुए थे.

जैसे ही माधुरी ने अर्जुन के कमरे मे प्रवेश किया तो उसने देखा के उसका छोटा चचेरा भाई एक साइड

को लेटा है. छाती पे कोई भी कपड़ा नही और नीचे एक ढीला पाजामा पहना हुआ था. एक बार तो माधुरी

भी खो सी गई थी सी दृश्य मे. मासूम सा चेहरा जिसपे अभी कोई बाल ठीक से नही आया था. बाजू

पे मछलिया बन रही थी, चौड़ी छाती बिल्कुल बेदाग और फिर जहा नज़र गई तो गला ही सूख गया.

"आरू बेटा उठ जा देख दोपहर होने को आई है. बाबा पूछ रहे थे तुझे." अपने आप पर काबू कर

माधुरी ने थोड़ा ज़ोर से अर्जुन को हिलाया. शायद अब माधुरी को भी जल्दी पड़ी थी यहा से भागने की.

"दीदी, आज तो पहला दिन है छुट्टी का. सोने दो ना प्लीज़. ", अर्जुन ने मूह पर तकिया रखते हुए जवाब

दिया.

"भाई,10 बज चुके है. और शायद आज शंकर चाचा भी आने वाले है." माधुरी ने जैसे ही अर्जुन

के पिताजी का नाम लिया, वो बिजली की रफ़्तार से उठा और सीधा बाथरूम में ही जाकर रुका.

माधुरी हंसते हुए वहाँ से चली गई. वो जानती थी के अर्जुन सिर्फ़ इस एक नाम से डरता है. और ये

सच भी था.

बाथरूम से फ्रेश होने के बाद जैसे ही अर्जुन नीचे आया तो आँगन मे सफाई करती कोमल दीदी दिखाई

दे गई. अपनी नज़र नीचे कर वो सीधा रसोई मे गया जहा माधुरी खाना गरम कर रही थी. यहा भी

अर्जुन की नज़र अपनी सबसे बड़ी बेहन के नितंब पे अटक गई.

"हे भगवान ये क्या है? आज सबकुछ अलग क्यू लग रहा है?" मन में बोलता हुआ वो वहाँ से भी निकल

के अपने ताऊ जी के कमरे मे बैठ गया.
 
माधुरी खाने की प्लेट देकर चली गई और अर्जुन एकांत मे बैठा खाने लगा. ये बेडरूम ऐसा था

के सामने बिल्कुल खाली जगह और कपड़े की अलमारी थी. और अंदर की तरफ बेड लगा हुआ था. दरवाजे

से कमरे का बेड वाला हिस्सा बिल्कुल नज़र नही आता था. अर्जुन बेड पे बैठा दीवार से टेक लगा खाना

खा रहा था. अभी खाना आधा भी ख़तम नही हुआ था कि दरवाजे से कोई अंदर आया और दरवाजा बंद

किया. ना अर्जुन ने ध्यान दिया और ना ही आने वाले ने. अलका अपने कपड़े लेकर अंदर आई थी क्योंकि उसके

कमरे मे कोमल सफाई कर रही थी और कोमल/ऋतु वाले कमरे मे ऋतु अपने गीले कपड़े बदलने गई थी.

अलका ने जल्दी से अपना भीगा हुआ कुर्ता उतारा और सलवार नीचे करी. उसका मूह अलमारी की तरफ था

लेकिन अब अर्जुन की ज़ुबान लकवा मार चुकी थी. जैसे ही उसने देखा अलका के शरीर पे सिर्फ़ एक सफेद

ब्रा और काली चड्डी थी जो उसके नितंब की दरार मे फसी हुई थी. अर्जुन के मूह में ही नीवाला रुक

गया. नज़रे इस दिलकश मंज़र को देख जड़ हो गई थी.

अलका ने अपने हाथ पीछे किए ओर उसकी ब्रा भी ज़मीन पे गिरी पड़ी थी अब. फिर अर्जुन को वो मंज़र

दिखा जो आज से पहले उसने कभी नही देखा था. अलका ने झुक कर अपनी चड्डी पैरो से निकाली तो

अर्जुन का दिल धड़कना ही बंद हो गया था. एकदम घड़े सी गोलाइयाँ थी अलका की, रेशमी चिकनी जाँघ

जिनपे कही कोई बाल का रेशा तक नही था. लेकिन उसको वो नही दिखा जिसे वो देखने की आस लगा चुका

था. अलका की योनि/ चूत. अलका ने जल्दी से दूसरी ब्रा और चड्डी पहनी. अर्जुन ने जैसे ही ये देखा वो

बेड पे उल्टा लेट गया. अलका ने सूट बदला और जैसे ही पलटी तो नज़र पड़ी अर्जुन पे.

"अर्जुन-2.. तू यहा क्यो सो रहा है. चल उठ.", ना चाहते हुए भी अलका ने ऐसा किया. ये देखने के

लिए कि वाकई वो सो ही रहा था.

"सोने दो ना दीदी. सारी रात फिल्म ने नही सोने दिया. थोड़ी देर मे उठता हू."

ये देख अलका कुछ संभल गई और उसको जल्दी उठने का बोल बाहर निकल गई.

अर्जुन ने बेड के नीचे से थाली उठाई और खाना ख़तम कर जल्दी से किचन मे प्लेट रखने चला गया.
 
"कैसा था खाना? आज तेरी पसंद के परान्ठे मैने बनाए थे." माधुरी ने खाली प्लेट लेते हुए बोला

उसके चेहरे पे एक अलग हे चमक थी.

"अच्छा था दीदी. मज़ा आ गया."

" अकेले ही मज़ा लिया या मज़ा दिया भी?" खिलखिलाकर माधुरी ने ये बोला तो अर्जुन को कुछ समझ नही आया

वो सर खुजाता चल दिया अपने दोस्त संदीप के घर.

"दीदी संदीप है?" अर्जुन ने जैसे ही बेल बजाई तो गेट संदीप की बड़ी सिस्टर ज्योति ने खोला. ज्योति एक

साँवली लेकिन आकर्षक चेहरे मोहरे वाली लड़की थी. 20 साल की उमर और उपर से नई जवानी से भरपूर.

"अंदर आजा अर्जुन. संदीप अभी आ रहा है समान लेके." ज्योति ने जवाब दिया तो अर्जुन अंदर चला आया

सनडे था तो आज संदीप के मम्मी-पापा अपने रिश्तेदार से मिलने गये हुए थे और संदीप भी उनके साथ

गया था. ज्योति ने अर्जुन को झूठ बोल कर अंदर बुला लिया था. वो अकेली थी और उसको हमेशा से अर्जुन

पसंद था. आज भगवान ने उसकी सुन ली थी.

संदीप का परिवार एक शिक्षित जात परिवार था. पिता धर्मपाल जी सिंचाई विभाग मे थे और माता रजनी एक

सरकारी टीचर थी. ज्योति अभी कॉलेज के फर्स्ट एअर मे थी. इनका बाकी परिवार गाँव में ही बसा हुआ था.

यहा सिर्फ़ ये 4 लोग रहते थे.

"क्या पिएगा बता? संदीप तो थोड़ी देर मे आएगा." कहते हुए ज्योति ने अपनी छाती थोड़ी बाहर निकाल ली

जैसे कह रही हो के इनको पी ले अर्जुन इन्होने बहुत तंग किया हुआ मुझे.

"दीदी घर से आ रहा हू क्यो तकलीफ़ करती हो. फिर मैं चलता हू शाम को आउन्गा." जैसे ही अर्जुन ने इतना

कहा ज्योति के अरमान ही टूटने लगे.

"अच्छा तो सिर्फ़ संदीप का दोस्त है तू? मैं कुछ भी नही? अकेली को छोड़कर जाएगा ऐसे मुझे?" रूठने

की आक्टिंग करते हुए ज्योति ने अपना निशाना लगाया अर्जुन पे. वो तो वैसे ही भोला था. बैठ गया वही

"क्या दीदी. आप तो मेरी सबसे प्यारी दीदी हो. कही नही जाता, यही हू आपके पास."

ज्योति ने एक चुस्त सलवार के उपर एक नॉर्मल टी-शर्ट पहनी हुई थी. जहा सलवार फिटिंग की थी, टी-शर्ट

थोड़ी घिसी हुई थी. उसके उभार और बाहर आ रहे थे. वो अपने कूल्हे मत काती हुई किचन मे गई और

अर्जुन के लिए शरबत बना के ले आई, एक गिलास अपने लिए भी. टीवी पे वी चॅनेल चल रहा था और ज्योति

सोफे पे अर्जुन के साथ सट के बैठ गई.

"सुना है दादा जी तुझे बॉक्सिंग के लिए स्टेडियम मे अड्मिशन दिलवा रहे है?" ज्योति ने अर्जुन के जाँघ पे

हाथ रखते हुए बोला

"आपको किसने कहा?" हैरान होते हुए अर्जुन ने ज्योति को देखा.

"वो अलका ने बताया आज सुबह जब मैं तुम्हारे घर आई थी", ज्योति ने जवाब दिया और अर्जुन की जाँघ सहलाने

लगी. एक तरफ से वो अपने स्तन भी उसकी बाजू पे रगड़ रही थी. और अब उसकी टी-शर्ट पे 2 बिंदु बन गये

थे.

"हा शायद. बाबा ने कहा था कि सोमवार से टाइम्टेबल चेंज कर देंगे. यही बात होती." अर्जुन सोच कर बोला.

उमंग तो अर्जुन के भी मन में जाग रही थी. कल रात से ही उसने एक नई दुनिया देख ली थी.

"तू इतना तगड़ा लगता नही मुझे. अभी भी देख बिल्कुल बच्चा सा है." ज्योति ने अपनी अगली चाल चल दी

"क्या बात करती हो दीदी. 10 किमी दौड़ लगाता हू. 200 दंड पेलता हू. अब दुम्बेल भी करता हू." अर्जुन अपना

बचपना दिखाने लगा जिसको ज्योति जैसी गरम लड़की अच्छे से समझ चुकी थी कि बिल्कुल कोरा है. कोरी तो

ज्योति भी थी लेकिन उसने अपनी सहेलियो से सब सुना हुआ था. और एक बात थी कि वो अपने मा-बाप को

प्यार का खेल खेलते देखने लगी थी चुपके चुपके.

"अच्छा तो मुझे भी दिखा तेरी बॉडी. देखु कितनी मजबूत है."

"आपको कैसे दिखा सकता हू दीदी." शरमाते हुए अर्जुन बोला

क्यों. अलका, कोमल, ऋतु ने कभी नही देखी जो मुझ से शर्मा रहा है", ज्योति ने ताना मारा तो अर्जुन

भी सोफे से खड़ा हुआ और अपनी शर्ट उतार दी. उसका शरीर सच मे मजबूत और दिलकश था. ज्योति ने

देखा तो उसकी छाती कड़क होने लगी. ज्योति बिल्कुल उस से सट के खड़ी हो गई और धीरे धीरे अर्जुन की

मांसपेशियो पे हाथ घुमाने लगी. दोनो को ही एक अजीब नशा हो रहा था. जहा अर्जुन का पहले कोई एक्सपीरियेन्स

ना था वही ज्योति ने सिर्फ़ अपने मा-बाप को देखा था. अर्जुन ऐसे ही सोफे पे बैठ चुका था और ज्योति उसके

उपर आ चुकी थी. कब दोनो के होंठ मिले दोनो को पता ही ना चला. अनाड़ी दोनो ही थे तो अर्जुन ने जितना

रात की फिल्म मे देखा उसी तरह ज्योति के होंठ चूसने लगा. अब हाल ये था कि ज्योति अर्जुन की गोद पे दोनो

तरफ पाँव किए बैठी थी ओर उसकी गर्दन पकड़ के उसे अपने होंठ चुस्वा रही थी.

अर्जुन भी होश खो चुका था. उसने ज्योति की जीब से जीब लगाई और अपने एक हाथ से टी शर्ट के उपर से ही

उसका एक अनार पकड़ लिया. दोनो को ज़ोर का झटका लगा. रुका कोई भी नही. अर्जुन को लगा जैसे उसने कोई नरम

रब्बर की बॉल पकड़ ली हो और वो उसे हल्के दबाने लगा. ज्योति खुद को उसके उपर डालने लगी. अब अर्जुन ने अपना

दूसरा हाथ उसके टॉप के अंदर डाला तो वो और ज़्यादा गंगना गया. क्या एहसास था उन नंगी चुचियो का. निप्पल

एकदम कड़े हो चुके थे जिसे उसने अपनी दो उंगलिओ से सहला दिया. इधर ज्योति भी अपनी चूत को अर्जुन की ज़िप

पर घिस रही थी. 10 मिनिट ये खेल ऐसे ही चलता रहा और अब अर्जुन ने ज्योति का टॉप निकाल के उछाल दिया.

ज्योति के दोनो अनार सर उठाए खड़े थे. बिल्कुल लाल और उनपे आधा इंच के तीखे निप्पल.

"मूह मे ले इन्हे मेरे भाई. चूस.. खा जा इन्हे. बहुत दर्द करते है ये." ज्योति ने इतना बोला ही था

अर्जुन ने एक चूची को मूह मे भर लिया और लगा चुसकने. दूसरी को वो किसी भोपु की तरह दबा रहा था.

5-5 मिनिट बाद वो उन्हे बदल बदल के चूस्ता रहा और इधर ज्योति की सलवार जाँघ तक गीली हो चुकी थी.
 
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