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Incest मटकनी गांड का कमाल

अपने बेटे में आए बदलाव से सुगंध बेहद खुश थी राहुल की संगत में कुछ तो असर हुआ था जिसके चलते उसके बेटे ने उसकी खूबसूरती की तारीफ किया था यह इशारा था कि अब वह पूरी तरह से बड़ा हो चुका है औरतों के प्रति आकर्षण उसके में भी स्वाभाविक रूप से आ चुका है वह भी समझ चुका है की औरतों का कौन सा अंग बेहद आकर्षक होता है,,, क्योंकि सुगंध अपने बेटे की नजर को अच्छी तरह से पहचानती थी काम करते वक्त वह काम में जरूर मन लगाती थी लेकिन उसकी नजर हमेशा अंकित के ऊपर ही रहती थी और उसकी तिरछी नजरों के बाण को अपने बदन पर चलता हुआ वह देखकर अंदर ही अंदर बहुत खुश होती थी,,,।

एक दिन बाहर मार्केट जाने के लिए तैयार हो रही थी और अपने साथ अंकित को भी ले जा रही थी वह अपने कमरे में तैयार हो रही थी,,, और अंकित तैयार होकर कमरे से बाहर कुर्सी पर बैठकर इंतजार कर रहा था,,, और अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था,,, अब वह अपने मन में यही सोचता था कि काश उसकी मां राहुल की मां की तरह होती तो कितना मजा आ जाता घर में ही खुला वातावरण देखने को मिलता ,,, क्योंकि राहुल की मां को देखकर मन ही मन वह भी यही चाहता था कि उसकी मां भी राहुल की मां की तरह ही घर में रहे मां बेटे के बीच में किसी प्रकार का पर्दा ना हो सब कुछ देखने को मिले जैसा कि वह खुद अचानक उसके घर पर पहुंच कर देख चुका था उसकी मां का कामुक रूप बड़ी-बड़ी चूचियां उस पर गीली साड़ी,,,उफ्फ,,,, उस दृश्य को याद करके अभी भी अंकित का लंड खड़ा हो जाता था। और इस समय भी उसका यही हाल था,,, राहुल की मां के बारे में सोचकर ही उसका लंड ठुनकी मारता हुआ अपनी औकात में आ चुका था,,,।

बाहर बैठा हुआ अंकित बार-बार अपनी घड़ी की तरफ देख रहा था क्योंकि मार्केट जाने का समय कुछ ज्यादा ही होता जा रहा था,,, वह बाहर से ही आवाज लगाता हुआ बोला,,,।

मम्मी तैयार हुई कि नहीं देर हो रही है,,,

अरे हां तैयार हो गई हूं बस थोड़ा सा रह गया है यह ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है,,,।

(उसकी मां का इतना कहना था कि अंकित की कल्पनाओं का घोड़ा पल भर में ही गति पकड़ लिया वह अपनी मां के बारे में कल्पना करने लगा अपनी मां के डोरी वाले ब्लाउज के बारे में कल्पना करने लगा वह अपने मन में सोच रहा था कि उसकी मां डोरी वाले ब्लाउज में कितनी खूबसूरत लगती होगी हालांकि वह पहले भी अपनी मां को डोरी वाले ब्लाउज में देख चुका था लेकिन इतना ध्यान नहीं दिया था लेकिन जब से उसका आकर्षण अपनी मां की तरफ बढ़ा था तब सेवा अपनी मां की हर एक हरकत और उसके रूप को देखकर उसके बारे में गंदी-गंदी कल्पना किया करता था और इस समय भी उसके मन में यही हो रहा था अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी चूचियां कैसे छोटे से ब्लाउज में समा जाती होगी,,, वह अपने मन में यह सोच रहा था कि पता नहीं उसकी मां कौन से रंग का ब्रा पहनी होगी,,, और अपने ब्लाउज की डोरी को कैसे बांधती होगी,,,,उफ्फ,,, कितना गजब का नजारा होगा अपने मन में इस तरह की कल्पना करके अंकित अपनी मां को इस रूप में देखना चाहता था अपनी मां को कपड़े पहनते हुए देखना चाहता था ब्लाउज पहना हुए देखना चाहता था उसे अंतर्वस्त्र पहनते हुए देखना चाहता था लेकिन वह जानता था ऐसी हालत में अपनी मां को देख पाना नामुमकिन सा है,, क्योंकि जब भी कपड़े पहनना होता था तो उसकी मां अपने कमरे में चली जाती थी और दरवाजा बंद कर लेती थी हां यह बात और ठीक ही वह अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में धीरे-धीरे कई बार देख चुका था, ।

घर के पीछे रात को पेशाब करते हुए उसकी नंगी गांड के दर्शन करके वह अपने आप को धन्य समझने लगा था और उस समय का पल उसके लिए बेहद उत्तेजनात्मक था,,, और वह बाथरूम में भी अपनी मां को पूरी तरह से नंगी होकर नहाते हुए देख चुका था उसके हर एक अंग को देख चुका था और उसे दृश्य को देखकर वह इस समय अपने लंड को हिला कर अपनी घर में शांत करने की लालच को रोक नहीं पाया था और हस्तमैथुन करके अपनी जवानी की गर्मी को शांत करने की कोशिश किया था और फिर उसके बाद सुबह-सुबह जब वह अपनी मां के कमरे में उसे जगाने के लिए गया था तब का दृश्य देखकर तो उसके लंड की नसे फटने को हो गई थी क्योंकि कमर के नीचे उसकी मां पूरी तरह से नंगी थी और उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को देखकर अंकित अपनी लालच को रोक नहीं पाया था और हल्के से अपनी मां की बुर को छूने का सुख प्राप्त कर लिया था,,,। अंकित यही सब अपनी मां के बारे में सोच ही रहा था कि तभी फिर से कमरे के अंदर से आवाज आई,,,।

अरे अंकित देखा तो ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है जरा आकर बंद कर देना तो,,,।

(इतना सुनते ही अंकित की आंखों की चमक एकदम से बढ़ गई उसे अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था और यह फैसला भी सोच समझ कर सुगंधा ने ली थी ऐसा नहीं था कि वह अपने हाथ से ब्लाउज की डोरी बंद नहीं कर पा रही थी बल्कि वह अपने बेटे के हाथ से अपनी डोरी को बंद करवाना चाहती थी और उसे उत्तेजित कर देना चाहती थी वह आदम कद आईने के सामने खड़ी थी,,,। और ऐसे हालात में,,, आईने में उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ब्लाउज में कैद नजर आ रही थी वह अच्छी तरह से जानती थी कैसे हालात में डोरी बातें जैसे मैं उसकी नजर आई नहीं पर जरूर पड़ेगी और वह उसे समय अपने बेटे के चेहरे पर बदलने वाले भाव को देखना चाहती थी उसके दोनों टांगों के बीच की स्थिति को महसूस करना चाहती थी देखना चाहती थी,,,,। अंकित अभी इसी कसमकस था कि उसकी मा सच में उसे अंदर बुलाई है या ऐसे ही उसके कान बज रहे हैं,,, और फिर कुछ देर तक अंकित की तरफ से कोई भी हरकत ना होता हुआ देख कर उसकी मां फिर से बोली,,,,।)

अंकित बेटा जरा अंदर आना तो मेरे ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है जरा बंद कर दे तो,,,,।

(इतना सुनते ही उसकी मां प्रसन्नता से भर गया उसकी मन भंवरा बनकर उड़ने लगा कि उसके कान नहीं बज रहे थे बल्कि सच में उसकी मां यही बोल रही थी जैसा कि वह सुन रहा था वह तुरंत अपनी जगह से उठकर खड़ा हो गया और अपनी मां के कमरे के पास जाने लगा दरवाजा अंदर से बंद जरूर था लेकिन सिटकिनी नहीं लगाई हुई थी,,, और हल्के से दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा एकदम से खुल गया,,, आंखों के सामने जो दृश्य नजर आया उसे देखकर अंकित के पेट के अंदर हलचल बढने लगी,,,, दरवाजा खुलते ही पीछे ब्लाउज की डोरी को दोनों हाथों से पकड़े हुए उसकी मां दरवाजे की तरफ देखने लगी ऐसी हालत में अंकित की नजर एकदम साफ तौर पर देख पा रहे थे कि उसकी मां आसमानी रंग का ब्रा पहनी हुई थी क्योंकि पीछे के साइड से ही दिख रही थी आगे से तो ब्लाउज का कपड़ा होने की वजह से सिर्फ चुचियों का उभार ही दिख रहा था,,,। अपनी मां की तरफ कामुक नजर से देखते हुए अंकित औपचारिकता निभाते हुए बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी,,,?

अरे देख नहीं रहा है ब्लाउज की डोरी बंद नहीं हो रही है,,,,।

अरे कैसे बंद नहीं हो रही मम्मी,,,,

बहुत दिनों बाद यह ब्लाउज पहन रही हुं,,,,

रोज ही तो पहनती हो,,,(अपनी मां की तरफ आगे बढ़ते हुए अंकित बोला)

अरे पागल हो गया है क्या कहां रोज पहनती हूं,,,।

क्या मम्मी तुम भी बिना ब्लाउज के रहती हो क्या रोज,,,,(अपनी मां के एकदम करीब पहुंचते हुए बोला,,,,, अपनी मां के साथ बात करते हुए ब्लाउज जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए उसके बदन की उत्तेजना और बढ़ती जा रही थी और सुगंधा के तन बदन में अजीब सी हलचल हो रही थी,,,)

अरे बुद्धू डोरी वाला बहुत दिन बाद पहन रही हूं तो हाउस तुम्हें रोज पहनती हूं लेकिन कभी उसकी डिजाइन तूने देखने की कोशिश किया है तुझे क्या मालूम मैं क्या पहनती हूं क्या नहीं पहनती हूं,,, पहले जो ब्लाउज पहनती थी उसका बटन आगे से,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा तुरंत अपने बेटे की तरफ घूम गई और अपनी छाती दिखाते हुए बोली) बंद होता है लेकिन इस ब्लाउज में बटन भी आगे से बंद होता है और पीछे से डोरी को भी बांधी जाती है समझ में आया तुझे कुछ,,,(ऐसा कहते हुए जिस तरह से सुगंध अपने बेटे की तरफ घूम कर अपनी छाती दिख रही थी हालांकि वह अपने ब्लाउज का बटन दिखाना चाहती थी लेकिन उसका उद्देश्य अपनी चूचियों को दिखाना ही था और वाकई में सूरज की नजर बटन पर तो बाद में लेकिन उसकी भरी हुई छाती पर पहले गई थी जिसे इतने करीब से देख कर पेंट में हलचल सी मचने लगी थी,,,। अंकित क्या कहता है कुछ समझ में नहीं आया उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी और यह बदलाव सुगंधा की नजर में आ चुका था वह अंदर के अंदर खुश हो रही थी,,,,, कुछ देर तक वह इस स्थिति में खड़ी रही पीछे से ब्लाउज खुला हुआ था उसकी ब्रा की पिछली पट्टी साफ दिखाई दे रही थी,,, यह किसी भी जवान लड़के की तरह मदहोश कर देने वाला दृश्य था इस तरह के दृश्य देख कर कोई भी मर्द उत्तेजित होकर जुगाड़ ना होने की स्थिति में हस्तमैथुन करके अपने घर में शांत करने की कोशिश जरूर करता और इसमें अंकित की भी हालत खराब हो रही थी वह कुछ सेकेंड तक अपनी मां की भारी भरकम चूचियों की तरफ देखते हुए औपचारिकता वश बोला,,,।)

तो यह बात है मुझे क्या करना है,,,,,।

तुझे ज्यादा कुछ करना नहीं है बस इस ब्लाउज की डोरी को बांधना है,,, इतना तो तुझे आता ही है ना,,,,

ठीक है मम्मी,,,,।

( अंकित की मां इतना सुनते ही वापस आईने की तरफ घूम गई और अपनी चिकनी पीठ को अपने बेटे की तरफ कर दी,,, अंकित तो यह दृश्य देख कर मदहोश हुआ जा रहा था,,, अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को बांधने के नाम से उसके बदन में उत्तेजना भारी कंपन हो रही थी,,,, वह नजर उठा कर आईने की तरफ देखा उसकी मां सीधे-सीधे आईने में नहीं देख रही थी क्योंकि वह जानती थी कि उसका बेटा आईने की तरफ देखेगी और उस नजर मिलते ही वह अपनी नजर को घुमा लगा और ऐसा हुआ नहीं चाहती थी वह चाहती थी कि उसका बेटा खुली नजरों से ब्लाउज में कैद उसकी चूचियों को देखें चूचियों के बीच से गुजरती हुई पतली दरार को देखें और ऐसा ही हुआ,,, सूरज नजर उठा कर आईने में देखने लगा जिसमें उसकी मां का खूबसूरत चेहरा और उसकी मां की मदद कर देने वाली ऊभरी हुई उन्नत छाती नजर आ रही थी जिस पर साड़ी का पल्लू नहीं था और साड़ी कमर तक भरी हुई थी और साड़ी का पल्लू नीचे जमीन पर लहरा रहा था एक तरह से यह दृश्य कामोतेजना से भर देने वाला था,,,। अगर इस समय स्त्री से पर किसी और की नजर पड़ जाती तो औपचारिक रूप से इस दृश्य के चलते मां बेटे के बीच गलत संबंध के रिश्ते का ठप्पा लग जाता और वैसे भी इस तरह के दिल से अक्षर प्रेमी प्रेमिका और पति पत्नी के बीच ही देखने को मिलता है और अगर इस समय यहदृश्य तृप्ति देख लेती तो शायद उसकी मां और उसका भाई दोनों उसके नजर से गिर जाते लेकिन इस समय दोनों निश्चिंत्य थे क्योंकि तृप्ति कोचिंग के लिए गई हुई थी,,,,,।

जवान हो चुके अंकित के लिए यह काम बेहद कठिन नजर आ रहा था क्योंकि आज तक कुछ नहीं कभी औरत के ब्लाउज की डोरी नहीं बांधी थी यह पहला मौका था जब उसकी मां खुद ही अपने बेटे से ब्लाउज की डोरी को बंधवाने जा रही थी,,, अंकित ठीक अपनी मां के पीछे खड़ा हुआ था उसके पेट में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था जो की एक कदम आगे बढ़ने से ही उसका तंबू उसकी मां की भारी भरकम नितंबों पर स्पर्श करने लगता उस पर रगड़ खाने लगता,,, और शायद इसी रगड़ को सुगंधा महसूस करना चाहती थी क्योंकि वह भी तिरछी नजर से अंकित के पेट में उभरे हुए तंबू को देख चुकी थी और इतना तो समझ ही गई थी कि उसके बेटे का लंड क्यों खड़ा है और इसी के चलते उसे अपनी जवानी पर अपने कसे हुए बदन पर गर्व महसूस हो रहा था,,,, कुछ पल के लिए कमरे के अंदर खामोशी छा चुकी थी मां बेटे दोनों खामोश थे आईने में अंकित की नजर अपनी मां की भारी भरकम छातियों पर टिकी हुई थी जिसके बीच से गुजरती हुई गहरी लकीर किसी नहर से काम नहीं लग रही थी और इसी नहर में अंकित डुबकी लगाना चाहता था,,,, अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि ब्लाउज के अंदर उसकी मां कितना बेश कीमती खजाना छुपा कर रखी है,,, जिसे देखने के लिए उसका मान कितना ललाईत हो रहा है और अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि काश उसकी मां राहुल की मां की तरह होती तो कितना अच्छा होता,,, तो उसे भी इस समय अपनी मां की नंगी चूचियों को देखने का सुख प्राप्त हो जाता गली साड़ी में बड़ी-बड़ी चूची और उसके कड़े निप्पल,,,उफ्फ ,,,, यही सब सोच कर अंकित मन ही मन खुश हो रहा था कि तभी उसकी मां बोली,,,।

अरे अब देख क्या रहा है बंद भी करेगा कि खड़ा ही रहेगा मार्केट भी जाना है,,,।

मैंने कभी बंद नहीं किया ना इसलिए समझ में नहीं आ रहा है,,,।

अरे तो सीख लेना चाहिए था, , आखिरकार यह सब आगे चलकर काम आएगा,,,,।

(अपनी मां की बातें सुनकर अंकित अपनी मां के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रहा था और मन ही मन प्रसन्न भी हो रहा था वह धीरे से अपना हाथ आगे बढ़े और अपनी मां के ब्लाउज की डोरी को अपने दोनों हाथों से थाम लिया,,,, ब्लाउज की डोरी पकड़ने में उसकी हालत खराब हो रही थी माथे से पसीना को पकने लगा था जबकि कमरे में पंखा चल रहा था और गर्मी का एहसास सुगंधा को बिल्कुल भी नहीं हो रहा था और वही वह पसीने से तरबतर होता जा रहा था,,,, यह सब सुगंधा आईने में अच्छी तरह से देख पा रही थी,,,। देखते ही देखते अंकित ब्लाउज की डोरी को बांधने लगा,,, उसकी उंगलियां कांप रही थी,, अपने बेटे की हालत देखकर सुगंधा को भी शक हो रहा था कि कहीं उसका बेटा सच में उसकी डोरी बांध पाएगा या नहीं,,,,।

डोरी को बांधते समय अंकित की उंगलियां अपनी मां की चिकनी पीठ से स्पर्श हो जा रही थी और इतने सही अंकित के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी वह मदहोश हुआ जा रहा था,,, उसे अपनी मां की नंगी पीठ का स्पर्श भी बेहद आनंददायक लग रहा था,,,, वह अपनी मन में सोच रहा था कि उसकी मां की चिकनी पीठ कितनी कोमल है अगर ब्लाउज उतार दिया जाए तो बस केवल ब्रा की पतली सी पट्टी ही नजर आती है कोई भी शख्स पैसे में उसकी मां की नंगी चिकनी पीठ की कल्पना कर सकता है कि बिगर ब्रा और ब्लाउज की कैसी दिखती होगी,,,,।

यही हाल सुगंधा का भी था,, जब जब उसे अपनी पीठ पर अपने बेटे की उंगली का स्पर्श होता तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,, देखते ही देखते एक गिठान मार कर अंकित दूसरी गिठान मार रहा था,,, उत्तेजना से अंकित की हालत बहुत खराब होती जा रही थी और यही हाल सुगंधा का भी था,,, सुगंधा किसी तरह से अपने बेटे के पेंट में बने हुए तंबू का स्पर्श अपनी नितंबों पर करना चाहती थी लेकिन कामयाब नहीं हो पा रही थी वह हल्के-हल्के अपने नितंबों में हरकत भी दे रही थी कि पीछे की तरफ जाकर बस स्पर्श हो जाए लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा था,,,, ऐसे में ब्लाउज की डोरी बांधते हुए अंकित की नजर अपनी मां की गांड पर गई तो उसके होश उड़ गए गांड का उभार बहुत ही गजब का था,, नजर नीचे करने पर उसे साफ दिखाई दे रहा था कि उसकी मां की बड़ी-बड़ी गांड और उसके लंड के बीच केवल दो तीन अंगुल का ही फासला रह गया था हल्का सा कमरक्ष आगे कर देता था उसका लंड उसकी मां के नितंबों से रगड़ खा जाता। लेकिन ऐसा करने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे इस बात का डर था कि अगर उसकी मां की गांड पर उसका लंड स्पर्श करेगा तो उसकी चुभन से वह कैसा महसूस करेगी,,, नाराज हो जाएगी यही सब सो कर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी जबकि उसकी मां तो चाहती थी कि किसी भी तरह से उसके बेटे का लंड उसकी गांड से रगड़ खा जाए बस इतने से ही सुगंधा प्रसन्न हो जाती और अंकित मत हो जाता लेकिन फिर भी आगे बढ़ने से डर रहा था,,,।

देखते ही देखते अंकित अपनी मां के ब्लाउज की डोरी की गिठान को मार दिया था,,,, और बोला,,,।

लो हो गया,,,,।

बाप रे तूने तो बहुत कस के डोरी बांध दिया है,,,, आगे से देख,,,(एकदम से अंकित की तरफ घूम कर एक बार फिर से अपनी छाती की गोलाई दिखाते हुए) कितना बाहर निकल गया,,, एकदम उभरा हुआ दिख रहा है,,,,।

(अपनी मां की हरकत और उसकी छातिया को देखकर अंकित की आंखें फटी की फटी रह गई क्योंकि वह एकदम से छाती को तानकर अपनी दोनों गोलाईयों को दिखा रही थी,,, अंकित की हालत एकदम खराब होती जा रही थी वह आंख फाड़े अपनी मां की छातियो को ही देख रहा था और सुगंधा को भी अपने बेटे को अपनी चूची दिखाने में मजा आ रही थी भले ही ब्लाउज के ऊपर से लेकिन आनंद बेहद प्राप्त हो रहा था,,,। अपनी मां की हरकत से पूरी तरह से मदहोश हो चुका अंकित अपनी मां की चूचियों की तरफ देखते हुए ही बोला,,,)

सच में यह तो एकदम बड़ी-बड़ी नजर आने लगी लाओ में गिठान खोल देता हूं,,,।

नहीं नहीं रहने दे अच्छी लग रही है,,, क्यों सच कह रही हो,,,।

(अब अंकित क्या बोलता वह तो एकदम से हक्का-बक्का रह गया,,, सीधे शब्दों में उसकी मां खुद अपनी ही मुंह से अपनी चूचियों की तारीफ कर रही थी और कोई झूठ तारीफ नहीं कह रही थी वाकई में उसकी चूची इस समय कुछ ज्यादा ही बड़ी और बेहद आकर्षक लग रही थी,,, इसलिए गहरी सांस लेते हुए अंकित भी बोला,,,)

सच में मम्मी बहुत अच्छी लग रही है,,,।

हां तभी तो,,, चलिए सब जाने दे बस पीछे से जरा ब्रा की पट्टी को ब्लाउज की डोरी के नीचे कर देना तो वरना दिखेगी तो खराब लगेगी,,,,(इतना कहने के साथ ही एक बार फिर से सुगंधा आईने की तरफ मुंह करके खड़ी हो गई और अब जिस तरह की बातचीत हुई थी उसके चलते और ब्रा की पट्टी को ठीक करने के नाम से ही अंकित पूरी तरह से अपने बदन में चुदवासा पन महसूस कर रहा था,,,,,, अपनी मां की बात सुनकर एक बार फिर से अंकित की उंगलियां उसकी नंगी चिकनी पीठ को स्पर्श करने लगी और एक औरत के बदन पर उसकी ब्रा की पट्टी को छुने का सुख अंकित प्राप्त करने लगा,,, और अपनी उंगलियों को अपनी मां की ब्रा की पट्टी के नीचे सरका कर वह पट्टी को एकदम ठीक करने हेतु,,, अपनी तरफ खींच जो कि एकदम कसी हुई थी और खींचने की वजह से सुगंधा का बैलेंस एकदम से गड़बड़ क्या और वह एकदम पीछे की तरफ गिरने लगी,,, और उसे संभालने के लिए अंकित तुरंत अपनी बाहों को खोल दिया और पीछे से अपनी मां को अपनी बाहों में ले लिया लेकिन सुगंधा का शरीर थोड़ा गदराया हुआ था जिसके चलते अंकित भी ठीक तरह से अपनी मां को संभाल नहीं पा रहा था और दो-तीन कदम पीछे की तरफ आ गया उसकी मां भी साथ में उसके बाहों में पीछे से उसके ऊपर गिरती हुई और खुद ही बचने की कोशिश करते हुए दोनों बिस्तर के करीब आ गए,,,, लेकिन आखिर में अंकित अपने आप को अपनी मां के भार को संभाल नहीं पाया और बिस्तर पर गिर गया गनीमत थी कि बिस्तर तीन कदम पीछे ही था,,,, इसलिए दोनों बिस्तर पर गिरे वरना नीचे जमीन पर गिर जाते तो दोनों को चोट लग जाती ,,,,,।

इसके बावजूद भी बेहद अद्भुत और मादकता से भरा हुआ नजारा बन चुका था,,, अंकित नीचे था और उसकी मां उसके ऊपर थी,,, पीछे से अपनी मां को बाहों में भरा हुआ था और ऐसे हालात में इसकी भारी भरकम गांड उसके मोटे तगड़े लंड के ऊपर टिकी हुई थी जो की पूरी औकात में आकर खूंटा बना हुआ था,,, पर सीधे-सीधे साड़ी सहित गांड की दोनों फांकों के बीच रास्ता बनाता हुआ,,, उसकी बुर के मुहाने दस्तक दे रहा था,,,,,, जिसका एहसास सुगंधा को एकदम बराबर हो रहा था,,, अपने बेटे के मोटे तगड़े लंड को साड़ी के ऊपर से ही अपनी बुर पर महसूस करते ही वह पूरी तरह से मचल उठी,,,, एकदम से मदहोश हो गई,,, पहले तो बिल्कुल अपरा तफरी का माहौल था क्योंकि गिरते गिरते बची थी लेकिन जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वह बिस्तर पर गिरी है और बच गई है तो राहत की सांस थी लेकिन तभी उसकी यह राहत मदहोशी में बदल गई जब उसे अपनी गांड के बीचों बीच कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ,, और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा के लिए,,, अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं देखी उसकी गांड के बीचों बीच जो चीज चुभ रही है वह क्या है,,, और जब उसे यहां एहसास हुआ कि वह चीज कुछ और नहीं बल्कि उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड है तो यह एहसास ही उसकी बुर को मदन रस से भिगोने लगी वह चारों खाने चित हो चुकी थी,,,।

और यही हाल अंकित का भी था जब उसे भी इस बात का एहसास हुआ कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच जाकर कहीं फस गया है तो वह भी एकदम से मदहोश हो गया और वैसे भी वह पीछे से अपनी मां को बाहों में झगड़ा हुआ था और उसे बचाने के चक्कर में अनजाने में उसकी दोनों हथेलियां उसके दोनों खरबुजो पर चली गई थी जिसे वह संभालने के चक्कर में दबा दिया था,,,, और शायद यह एहसास सुगंध को नहीं हो पाया था क्योंकि वह अपनी दोनों टांगों के बीच के एहसास में पूरी तरह से मस्त हो चुकी थी,,,।

कुछ देर तक दोनों इसी अवस्था में बिस्तर पर पड़े रहे दोनों की सांस ऊपर नीचे हो रही थी दोनों मदहोश हो चुके थे उत्तेजना दोनों के सर पर सवार हो चुकी थी लेकिन जैसे तैसे करके सुगंध अपने आप को संभाली और यह बोलते हुए उठने लगे की,,,, अच्छा हुआ बिस्तर पर गिरे वरना चोट लग जाती,,,।

और फिर दोनों मार्केट की तरफ निकल गए,,,।।

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घर में रोमांच कारी भिड़ंत के बाद मां बेटे दोनों मार्केट के लिए निकल चुके थे,,, वैसे तो अक्सर सुगंधा मार्केट जाने के लिए ऑटो करती थी लेकिन आज वह अपनी बेटी के साथ पैदल ही जाना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि उसका बेटा चलते समय उसके मचलते अंगो की तरफ देखता है या नहीं और वैसे भी,,, सुगंधा खुद अपने बेटे को अपनी तरफ आकर्षित करने में कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती थी,,, कुछ देर पहले कमरे में जो कुछ हुआ था वह बेहद अद्भुत था,,, पहली मर्तबा हिम्मत करके सुगंधा अपने बेटे को अपने ब्लाउज की डोरी बंद करने के लिए पूरी और वैसे भी बरसों बाद वह डोरी वाला ब्लाउज पहन रही थी क्योंकि वह जानती थी की डोरी वाला ब्लाउज में उसकी चिकनी गोरी पीठ कुछ ज्यादा ही दिखाई देती थी और डोरी को कस के बांधने की वजह से चुचियों का आकार कश्मीरी सेब से खरबूजा बन जाता है,,,।

वैसे उसे पक्का यकीन तो नहीं था कि उसके कहने पर उसका बेटा उसके ब्लाउज की डोरी बांधने के लिए कमरे में आ जाएगा लेकिन जिस तरह के हालात दोनों के बीच पैदा हो रहे थे उसे देखते हुए सुगंधा को अपनी चाल पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह अपने बेटे में आए बदलाव को अच्छी तरह से समझ रही थी उसके नजरीए को समझ रही थी,,, और इसीलिए उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुकी सुगंधा को पूरा विश्वास था कि जवान हो चुका उसका बेटा एक औरत के ब्लाउज की डोरी को बढ़ने के लिए जरूर ललाईत होगा और ऐसा ही हुआ,,,, लेकिन जो कुछ भी हुआ उम्मीद से ज्यादा हुआ सुगंध तो सिर्फ अपने बेटे से अपने ब्लाउज की डोरी बंधवाना चाहती थी लेकिन जिस तरह से उसके खुद के पर डगमगाए थे और वह अपने आप को समान नहीं पाई थी उसे संभालने के लिए उसका बेटा उसे हाथ बढ़ाकर जिस तरह से उसे अपनी बाहों में भरा था और नरम-नरम बिस्तर पर गिरा था ऐसी हालत में उसे अपनी गांड के बीचो-बीच अपने बेटे का मर्दाना खुंटा गजब का चुभता हुआ महसूस हो रहा था जो कि सीधे उसकी बुर पर दस्तक दे रहा था वह मंजर वह पल सुगंधा के जीवन का अद्भुत फल था बरसों बाद किसी मोटे तगड़े लंड को अपनी गांड के बीचों बीच महसूस कर रही थी उसकी गर्मी को अपनी बुर के अंदरूनी भाग में महसूस कर रही थी जिसकी वजह से उसकी बुर पसीज रही थी,,, सुगंधा कमरे में ही चारों खाने चित हो चुकी थी अगर उसका बेटा जरा भी होशियार होता तो कमरे में ही उसकी बुर का उद्घाटन कर देता,,,, और जिसमें सुगंध को जरा भी एतराज नहीं होता,,,,।

धीरे-धीरे इस खेल में सुगंधा को बहुत मजा आ रहा था,,, तालाब के पानी की तरह शांत हो चुकी जिंदगी को मानो जैसे नदी में प्रवेश करने का मौका मिल गया हो और वह नदी की तरह उछलती कूदती बांहें फैलाए आगे बढ़ती चली जा रही थी,,, यही तो चाहिए था सुगंधा को यही सुख था जिसे वह ढूंढ रही थी,,, यह वही सुगंधा थी जो अपने अरमानों को पर लगाकर आसमान में उड़ जाना चाहती थी लेकिन पति के देहांत के बाद ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके पर कट गए हो,,, लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि अंकित की वजह से उसे नए पर उग आए हो,,,,।

मार्केट जाते समय सड़क के फुटपाथ पर सुगंधा आगे आगे चल रही थी और तकरीबन 2 मीटर पीछे अंकित चल रहा था,,, जब इस तरह की माहौल घर में नहीं थे मां बेटे के बीच इस तरह का आकर्षण नहीं था तो अक्सर अंकित अपनी मां के बराबर चलता था और खुद सुगंधा ही उसे अपने बराबर लेकर चलती थी,,, लेकिन दोनों की नजरिए में बदलाव आ चुका था,, दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था दोनों रिश्तो में मां बेटे सिर्फ दूसरों के लिए रह गए थे दोनों के रिश्ते बदल चुके थे,,एक मर्द बन चुका था और दूसरी औरत बन चुकी थी,,, दोनों एक दूसरे में प्रेमी प्रेमिका ढूंढ रहे थे जो कि पति-पत्नी की तरह एक दूसरे के शरीर से सुख प्राप्त करना चाहते थे अपनी जवानी की गर्मी को बुझाना चाहते थे और ऐसे हालात में दोनों के पास दोनों के सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं था,,, दोनों के मन में अंदर ही अंदर सब कुछ परिपूर्ण हो चुका था बस देर थी आगे बढ़ने की मर्द और औरत के बीच के रिश्ते को आगे बढ़ाने की,,, दोनों बढ़ाना भी चाहते थे लेकिन कैसे यह दोनों को नहीं मालूम था लेकिन दोनों अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे थे ज्यादातर कोशिश सुगंधा की तरफ से ही हो रही थी तभी तो वह अपने बेटे को राहुल के पास भेजी थी ताकि राहुल से कुछ सीख पाता और उसका यह नुस्खा कुछ हद तक काम करने लगा था,,,

प्राकृतिक तौर पर अपनी मां के पीछे चलते हुए अंकित की नजर बार-बार अपनी मां की गांड की तरफ ही जा रही थी जो की चलते समय अद्भुत तरीके से लहरा रही थी और वैसे भी उसकी मां ने कुछ ज्यादा ही करके साड़ी बांधी हुई थी जिसकी वजह से गांड की दोनों फांकें बड़े-बड़े तरबूज की तरह बाहर निकली हुई नजर आ रही थी,,, अपनी मां की बड़ी-बड़ी गांड देखकर अंकित के लंड में हरकत होने लगती थी,,। वह अपने मन में सोचने लगता था कि काश इतनी बड़ी-बड़ी गांड उसके हाथों में होती तो कितना मजा आता,,, वह बड़ी-बड़ी गांड से बहुत प्यार करता है अपनी जीभ से चाटता चुंबन लेता उस पर अपना लंड रगड़ता,,, हर वह चीज करता जो एक मर्द औरत के अंगों से करता है उसकी गांड के साथ करता है,,,, सड़क पर चलते समय आते जाते अंकित ने बहुत सी औरतों को देखा था कपड़ों में उनके अंगों को देखा था लेकिन जिस तरह का उपहार उसे अपनी मम्मी की गांड में नजर आती थी उसे तरह का उभार उसने अभी तक किसी औरत में नहीं देखा था कुछ हद तक उसे नूपुर में अपनी मां का अक्स नजर आता था,,, क्योंकि उसकी भी कद काठी उसकी मां की ही तरह थी,,, लेकिन फिर भी नूपुर उसकी मां से उन्नीस ही थी,,,।

अपनी मां के भरावद्दार नितंबों को देखते-देखते उसकी नजर अपनी मां की चिकनी पीठ पर गई और उसकी डोरी पर गई जिसे वह खुद अपने हाथों से बांधा था,, उसे अब एहसास हो रहा था इस ब्लाउज में उसकी मां की चोरी की एकदम साफ नंगी नजर आ रही थी क्योंकि डोरी वाले ब्लाउज में पीछे से ज्यादा कपड़ा नहीं था केवल पतली सी डोरी थी और उसे ब्रा की पट्टी भी साफ नजर आ रही थी ,, जिसे ब्लाउज के डोरी के नीचे छुपाने के चक्कर में ही,,, वह दोनों बिस्तर पर गिर गए थे,,, अंकित को वह पल पूरी तरह से किसी मूवी के दृश्य की तरह याद था उसे अच्छे से याद था कि उसके ऊपर उसकी मां पूरी तरह से लदी हुई थी,,, इसकी भारी भरकम गांड ठीक उसकी दोनों टांगों के बीच आ चुकी थी,,, अद्भुत अवस्था थी एक तरह का यह आसान ही था जिसमें औरत अपनी गांड रखकर मर्द के लंड पर बैठ जाती और नीचे से मर्द का लंड उसकी बुर की गहराई नापने लगता है,,, अंकित इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि किस तरह से उसकी मां उसके ऊपर थी उन दोनों की अवस्था में केवल कपड़े ही बड़ा रूप थे अगर दोनों के बदन पर कपड़े ना होते तो उसे समय उसका लंड उसकी मां की बुर में होता ,,,, और उसे तो इस बात का अहसास तक हुआ था कि उसका लंड उसकी मां की गांड के बीचों बीच धंसा हुआ है,,,,।

इस अवस्था की वजह से पल भर में ही पूरे बदन का लहू अंकित की जननांगों में इकट्ठा हो गया,,, और उसकी सांसे ऊपर नीचे हो गई उसे तब जाकर एहसास हुआ कि वाकई में औरतों की जंननांगो और उनके नितंबों के उभार में कितनी गर्मी होती है क्योंकि अंकित पसीने से तरबतर हो चुका था। , और वही गर्मी का एहसास अंकित को इस समय हो रहा था अपनी मां के पीछे चलते-चलते सुगंधा बार-बार चलते हुए पीछे मुड़कर देख ले रही थी अपने बेटे की तरफ की उसका बेटा क्या देख रहा है और उसे इस बात का अहसास होते ही की उसका बेटा उसके नितंबों की तरफ ही देख रहा है इस एहसास से वह अंदर ही अंदर सिहर जाती थी,,,।

अभी मार्केट थोड़ी दूरी पर था फुटपाथ की दूसरी तरफ जंगल झाड़ी था और काफी दूर तक ढलान था जिसके अंदर जंगली झाड़ियां उगी हुई थी,,, वहीं पर पेड़ के पास एक आदमी खड़े होकर पेशाब कर रहा था और वह आदमी सुगंधा की नजर में चढ़ गया सुगंधा की नजर अनजाने में ही उसकी तरफ चली गई थी और सुगंधा उसे आदमी को पेशाब करते हुए देखने लगी हालांकि वह सहज रूप से चलते हुए ही अपनी नजर को उस तरफ की हुई थी और यह भी वह जानबूझकर ही कर रही थी वह अपने बेटे को दिखाना चाहती थी कि वह मर्दों को पेशाब करते हुए देखने में कितनी उत्तेजना का अनुभव करती है,,,, अंकित को उसे आदमी पर बहुत गुस्सा आ रहा था जो इस तरह से सड़क के किनारे खड़ा होकर पेशाब कर रहा था,,, हालांकि वह जिस तरह से खड़ा था उसका लंड नजर नहीं आ रहा था बल्कि छिपा हुआ था और उसकी इतनी लंबाई भी नहीं थी कि इस अवस्था में दूर से भी दिखाई दे इस बात की खुशी अंकित को जरूर थी क्योंकि अब वह नहीं चाहता था कि उसकी मां किसी दूसरे की तरफ देखें और देखते ही देखते दोनों आगे निकल गए,,,,।

वैसे तो हमेशा ही जब दोनों मां बेटे मार्केट की तरफ जाते थे तो आपस में बातें करते हुए जाते थे लेकिन इस समय दोनों के मन में कुछ और था अंकित अपनी मां को चलते हुए देख रहा था उसके नितंबों के कटाव को देख रहा था उसके उभार को देख रहा था उसकी पतली कमर के बीच की पत्नी लकीर को देख रहा था उसके ब्लाउज की कटिंग के साथ-साथ उसकी उघरी हुई पीठ को देख रहा था,,, और सुगंधा अपने आप को अपने बेटे को दिखाने में व्यस्त थी इसलिए दोनों के बीच किसी भी प्रकार की वार्तालाप नहीं हो रही थी लेकिन दोनों के बीच की खामोशी भी बहुत कुछ कह रही थी,,,,,।

मां बेट दोनों अपनी ही धुन में मार्केट की तरफ आगे बढ़ते चले जा रहे थे सड़क पर वाहनों का आवागमन चालू ही था और आते जाते सबकी नजर उसकी मां पर जरूर पड़ रही थी और इस बात का भी भान अंकित को अच्छी तरह से था लेकिन वह कुछ कर नहीं सकता था,,,, ऐसे ही ठीक उसके पीछे कब दो आदमी उससे थोड़ा फीट की दूरी पर चलने लगे उसे पता ही नहीं चला वह अपनी मां की चाल ढाल को देखने में ही व्यस्त था,,, तभी उसके कानों में जो बात सुनाई थी उसे सुनकर उसके होश उड़ गए जो कि उसके साथ चल रहे हैं दोनों आदमियों में से एक ने बोला था,,,।

बाप रे देख रहा है क्या औरत है इसका बदन कितना गदराया हुआ है,,,(इतना सुनते ही अंकित इधर-उधर देखने लगा लेकिन आगे चल रही है अपनी मां के सिवा और कोई औरत आसपास नहीं थी इसलिए वह समझ गया कि यह आदमी उसकी मां के बारे में ही बोल रहा हूं हालांकि उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन राह चलते किसी भी व्यक्ति से इस तरह से उलझ जाना उचित नहीं था,,,, तभी दूसरे आदमी की आवाज उसके कानों में पड़ी,,,)

यार कसम से इतनी गोरी औरत तो मैं आज तक नहीं देखा ऊपर से नीचे तक मलाई है जब ऊपर से इसका वजन इतना गोरा है तो इसकी बुर कितनी गोरी होगी ,,

अरे यार औरतों की बुर गोरी नहीं काली होती है,,(दूसरे आदमी ने बोला)

अरे वह तो दूसरी औरतों की होती होगी लेकिन मक्खन मलाई जैसी औरत की बुरे तो एकदम गोरी होती होगी कम से इसकी बर देखने के लिए तो मेरा मन तड़प रहा है साली का गांड का छेद भी कितना मस्त होगा,,,।

हां यार तू सच कह रहा है देख नहीं रहा है कैसा गांड मटका के चल रही है इसकी गांड देखकर तो ऐसा ही लगता होगा कि 5-10 मिनट में इसका कुछ पता नहीं होगा कम से कम एक घंटा तक जमकर चुदाई होती होगी तब जाकर इसकी प्यास बुझती होगी,,,।

(उन दोनों आदमियों की बातें सुनकर तो अंकित के काम के साथ-साथ उसका लंड भी खड़ा हो गया था वह दोनों उसकी मां के बारे में बातें कर रहे थे उसकी जवानी के बारे में बात कर रहे थे उसके खूबसूरत जिस्म के बारे में बात कर रहे थे और दोनों अपनी अपनी राय दे रहे थे हालांकि शुरू में अंकित को बहुत गुस्सा आया लेकिन एक तरह से वह दोनों उसकी मां की जवानी की तारीफ कर रहे थे इसलिए ना जाने की उसे अपनी मां के बारे में इस तरह की अश्लील बातें सुनने में आनंद आने लगा,,,, तभी दूसरा वाला आदमी बोला)

कसम से इसको देखते ही मेरा लंड खड़ा हो गया अभी तो किस्मत ही बेकार है हमारे घर ऐसी औरत होती तो,,, घर छोड़कर कहीं जाने का मन ही नहीं करता,,,

मैं तो दिन रात उसकी बुर में लंड डालकर पड़ा रहता,,,

जो भी इसकी लेट होगा वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत वाला आदमी होगा जिसे यह देती होगी अपनी टांगें खोलकर अपनी बड़ी-बड़ी चूची पिलाती होगी,,,,।

अरे यार ऐसी बातें मत करनी तो मेरा यही पानी छूट जाएगा,,,

मेरा भी तो यही हाल है अब घर पर जाकर बीवी की चुदाई करनी पड़ेगी जो कि इसके पैर की धूल के बराबर भी नहीं है,,,

सही कह रहा है तू तू तो खर्च कर अपनी बीवी को छोड़ने का लेकिन मुझे तो हाथ से हिला कर ही काम चलाना पड़ेगा,,,

क्यों क्याहुआ,,, भाभी देती नहीं है क्या?

अरे ऐसी बात नहीं है वह अपने मायके गई हुई है अपने भैया से गांड मरवाने इतना बोला कि मत जा मेरा मन तेरे बिना नहीं मानता लेकिन मानी नहीं और अपने भाई से गांड मरवाने चली गई,,

वह सब छोड़ अगर यह औरत साड़ी उठाकर सिर्फ अपनी बुर दिखा दे तो भी मैं हजार रुपया देने को तैयार हूं,,,।

तू तो हजार रुपया देने को तैयार है मैं तो महीने भर की तनख्वाह देने को तैयार हूं बस यह साड़ी उठाकर अपनी बुर के दर्शन कर दे क्योंकि मैं देखना चाहता हूं कि इस तरह की हाई क्लास औरत की बुर कैसी दिखती है,,,

सही कह रहा है तू अपनी जिंदगी में तो बस गांव की वही गवार औरत ही लिखी है ऐसी पढ़ी-लिखी अंग्रेज टाइप की औरत के बारे में सिर्फ सोच सोच करें पानी निकालना ही किस्मत है,,,।

(वह दोनों की बातें सुनकर अंकित के तन बदन में उत्तेजना के लहर उठ रही थी उसका पूरा बदन से लग रहा था उसे समझ में आ गया था कि उसकी मां की जवानी देखकर सब लोग यही सोचते हैं रहते हैं लेकिन वह हैरान था कि वह दोनों उसके इतने पास में होने के बावजूद भी इस तरह की बातें आपस में कर रहे थे तभी उसे ख्याल आया कि उन दोनों को क्या मालूम कि मैं उसका बेटा हूं वरना इस तरह की बातें नहीं करते लेकिन अच्छा ही होगा कि वह दोनों की बातें बहुत सुन लिया उसे पता तो चल गया कि उसकी मां कितनी जवानी से भरी हुई और एकदम सेक्सी है,,, उसे इस बात का गर्व भी हो रहा था कि उसकी मां की जवानी देखकर उन दोनों का लंड खड़ा हो गया था,, । अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अगर सच में उसकी मां 1 घंटे के लिए भी दोनों को मिल जाए तो 1 घंटे में दोनों उसकी मां की बुर का भोसड़ा बना देंगे इस तरह से पागल हो गए दोनों देखकर,,,, अभी उन दोनों की बातें और सुन पता था इससे पहले ही मार्केट आ चुका था और लोगों की भीड़भाड़ बढ़ने लगी थी,,,,)

कौन-कौन सी सब्जी लेना है मम्मी,,,

चल अंदर देखु तो सही,,,।

(इतना कहकर दोनों मार्केट के अंदर की तरफ जाने लगे क्योंकि अंदर की तरफ अच्छी-अच्छी सब्जियां मिलती थी और एक सब्जी के ठेले पर खड़ी होकर वह,,, भिंडी खरीदने लगी,,, अंकित को सब्जी के बारे में कुछ ज्यादा मालूम नहीं पड़ता था इसलिए वह खड़ा होकर इधर-उधर मार्केट देखने लगा,,, जिस ठेले पर उसकी मां सब्जी खरीद रही थी तीन-चार औरतों और भी थी उसी ठेले पर थी तभी एक आदमी पीछे चाहे और एकदम से उसकी मां के पीछे से सट गया और भिंडी वजन करने के लिए बोलने लगा,,, सुगंधा एकदम से चौंक गई क्योंकि वह आदमी सीधे-सीधे उसके नितंबों से सट गया था,,, तभी वह एकदम से पीछे घूम कर देखी और आदमी एक तरफ हो क्या लेकिन इतने में वह अपना काम कर चुका था अपनी अभिलाषा पूरी कर चुका था दूर से ही वह सुगंधा की खूबसूरत बदन को देख रहा था मानो कि जैसे कोई भंवरा खूबसूरत कली के पीछे-पीछे आ गई हो उसका रस चूसने के लिए उसी तरह से वह आदमी भी सुगंधा की मदहोश कर देने वाली जवानी को देखकर अपने लंड को सुगंधा की गांड पर रगड़ खाने की लालच को रोक नहीं पाया और एकदम से आकर उससे सट गया था सुगंधा को भी अपने नितंबों पर,,, उसके सटने का एहसास हुआ था तभी तो गुस्से से पीछे मुड़कर देखने लगी थी और आदमी एकदम से पीछे हट गया था,,,

अंकित भी सब कुछ देख रहा था लेकिन कुछ कर सकते की स्थिति में नहीं था वह उसे आदमी पर क्रोधित हुआ जरूर था लेकिन कुछ बोल नहीं पाया था और बोलना भी क्या बोलना क्या एग्जाम लगा था उसे यह कहता है कि तू उसकी मां के बदन से क्यों चढ़ गया क्यों अपने लंड को उसकी गांड से रगड़ाया रगडाया ,, उसके इस तरह के इल्जाम से वह खुद और उसकी मां हंसी के पात्र बन जाते क्योंकि भीड़भाड़ में थोड़ा बहुत सटना सटाना हो ही जाता है इसलिए वह खामोश है कुछ बोल नहीं पाया,,,,,।
 
भिंडी खरीद लेने के बाद तीन-चार सब्जिया और सुगंधा ने खरीद ली,,, सुगंधा चाहती थी की राहुल की तरह उसका बेटा भी उसके नितंबों पर हाथ रखें उसे महिलाएं लेकिन शायद उन दोनों के बीच राहुल और नूपुर की तरह खुला हुआ रिश्ता अभी नहीं बना था,,, सब्जी खरीद लेने के बाद सुगंधा नाश्ते की दुकान पर गई और समोसे और जलेबियां पैक करवाने लगी,,, अंकित कुछ बोल नहीं पा रहा था क्योंकि आज जो कुछ भी हो रहा था वह पूरी तरह से अंकित को स्तब्ध कर दिया था हालांकि सुगंधा भी पूरी तरह से मदहोश थी लेकिन फिर भी अपने आप को सहज बनाए हुए थी ज्यादातर हैरान दो अजनबी आदमियों की आपस में उसकी मां को लेकर बातचीत ने कर दिया था उन दोनों के विचार उसकी मां के प्रति कितने गंदे थे या फिर उसकी मां की तरह खूबसूरत औरत उन दोनों ने कभी देखा ही नहीं था इसलिए उन दोनों के मन की वासना एकदम से उनके होठों पर आ गई थी जो शब्द के जरिए बाहर निकल रही थी और उनकी बातों को सुनकर अंकित का भी बुरा हाल था,,,,।

तीन-चार दिन की सब्जियां तो हो गई,, और उसके बाद तो बाद में देखा जाएगा,,,,(हाथ में थैला लेकर मार्केट से बाहर निकलते हुए सुगंधा बोली,,,, तभी उसकी नजर केले के ठेले पर गई,,,, और इस समय अंकित की भी नजर केले के ठेले पर गई और अंकित केले के ठेले पर जाकर खड़े होकर केले को हाथ में लेकर देखने लगा जो की काफी छोटा था यह देखकर सुगंध बोली,,,)

ठीक नहीं है बेटा देख नहीं रहा कितना छोटा-छोटा और पतला सा है,,,।

हां सच कह रही हो मम्मी ,,, रहने दो,, (और इतना कहकर दोनों खेल से आगे हो गए और सुगंधा चलते हुए बोली)

केला हो तो मोटा मोटा और एकदम लंबा,,,(सुगंधा बात भले ही केले की कर रही थी लेकिन उसका इशारा दूसरी तरफ था और केले का जिक्र होते ही उसके मोटाई का जिक्र होते ही अंकित भी अपना ध्यान बात की दूसरी तरफ ले गया,,, सुगंधा अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,) और उस पतले केले को तो मुंह में ले,,,,(इतना कहने के साथ ही वह तुरंत अपने शब्दों को बदलते हुए बोली) मेरा मतलब है खाने में पता ही नहीं चलेगा कि केला खाए हो,,, अकेले को हमेशा मोटा और लंबा होना चाहिए ताकि एकदम से मन भर जाए एक ही बार में मन भर जाए,,,(यह बोलते समय उसके चेहरे के भाव ऐसी लग रहे थे मानो वाकई में वह बिस्तर पर टांग फैलाए लेटी हुई है और उसकी गुलाबी पुरानी उसके बेटे का मोटा तगड़ा लंड घुसा हुआ है अपनी मां की यह बात सुनकर उसके कहने के मतलब को अंकित अच्छी तरह से समझ गया था,,, इसलिए वह भी हामी भरता हुआ बोला,,)

सही कह रहे हो मम्मी मोटा और लंबा केला की सबसे ज्यादा सुख देता है,,, मतलब की भूख मिटाता है,,,।

(अपने बेटे के मुंह से ज्यादा सुख देता है शब्द सुनकर सुगंधा भी समझ गई थी कि उसके बेटे के कहने का मतलब क्या है और मन ही मन प्रसन्न होने लगी,,, मार्केट से वापस लौटते समय अंधेरा होने लगा था और स्ट्रीट लाइट जगमगाने लगी थी,,, मां बेटे दोनों इस जगह पर पहुंच गए थे जहां पर ढलान था और जंगली झाड़ियां होगी हुई थी यहां पर फुटपाथ पर आवा गमन भी बहुत कम था,,,, अब तक जो कुछ भी हुआ था उसे लेकर सुगंधा के तन बदन में आग लगी हुई थी वह किसी तरह से अपने बेटे को अपने अंग को दिखाना चाहती थी और भी बिना कपड़ों के,, इसलिए धीरे-धीरे चलते समय जब वहां घनी झाड़ियां वाली जगह पर एकदम बीचो-बीच आ गई और चारों तरफ देखकर अंदाजा लगा ली कि अभी कोई आ नहीं रहा है तो वह उसी जगह पर खड़ी हो गई,,, और इधर-उधर देखने लगी अपनी मां को इस तरह से बीच रास्ते में कड़ी होता देखकर और इधर-उधर देखा हुआ पाकर आश्चर्य से अंकित बोला,,,)

क्या हुआ मम्मी यहां क्यों खड़ी हो गई ,,

अरे मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,(इधर-उधर देखते हुए सुगंधा बोली लेकिन अपने बेटे के सामने जोड़ों की पेशाब वाली बात करके शर्म के मारे उसका चेहरा भी लाल हो गया था और यह बात सुनकर अंकित के लंड में हरकत होना शुरू हो गया था पहली बार उसकी मां खुले शब्दों में उसे पेशाब करने की बात कर रही थी हालांकि अपनी मां को घर के पीछे वह पेशाब करते हुए देख चुका था,, लेकिन अनजाने में उसकी मां को यह नहीं मालूम था कि उसका बेटा देख रहा है,,, ऐसा मानना अंकित का था लेकिन उसकी मां को सब पता था,, लेकिन इस समय मां बेटे दोनों के बदन में उत्तेजना के लिए रुकने लगी थी पेशाब करने के बहाने साड़ी उठाकर सुगंध अपने बेटे को अपनी गांड के दर्शन करना चाहती थी क्योंकि जिस तरह की उत्तेजना उसके तन बदन में हो रही थी वह किसी भी तरह से अपने बदन की सबसे स्वरूप वान और आकर्षक वाले अंग को दिखाना चाहती थी,,, अंकित के मन में भी अपनी मां को पेशाब करते हुए देखने की इच्छा जगने लगी और वह भी इधर-उधर देखते हुए बोला,,,)

यहां कैसे कर पाओगी मम्मी,, यहां तो कोई भी आ सकता है,(इधर-उधर देखते हुए अंकित बोला,,)

मैं जानती हूं लेकिन अभी कोई नहीं आ रहा है ले जल्दी से थैला पकड़ मैं जल्दी से निपट कर आ जाती हूं,,,,(ऐसा कहते हुए सुगंधा अपने हाथ में लिया हुआ था ना अंकित को थमाने लगी और अंकित भी जल्दी से अपनी मां के हाथ में से थेले को थाम लिया,,, पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली) कोई इधर ना आने पाए,,

ठीक हैमम्मी,,, (और इतना कहने के साथ है अंकित का दिल जोरो से धड़कने लगा और सुगंध स्टेट लैंप के खंभे के सामने ही ढलान की तरफ जाने लगी वह ऐसी जगह जा रही थी जहां से अंकित उसे बड़े आराम से देख सके,,, सुगंधा का भी दिल जोरों से धडक रहा था,, बाथरूम वाली हरकत के बाद यह उसकी दूसरी हरकत थी जो अपनी तरफ से करने जा रही थी,,, अंकित बार-बार अपनी मम्मी की तरफ तो कभी फुटपाथ की तरफ देख ले रहा था कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है और अपने मन में वह भी प्रार्थना कर रहा था कि इस समय कोई ना आए ताकि वह अपनी मां की नंगी गांड को आराम से देख सके और ऐसा ही हो रहा था दूर-दूर तक से कोई नजर नहीं आ रहा था बस सड़क पर से गाड़ी आ जा रही थी,,,।

देखते ही देखते आंठ दस कदम की दूरी पर जाकर सुगंधा खड़ी हो गई,,, उसकी पीठ अंकित की तरफ थी क्योंकि वह अपने बेटे को अपनी गांड दिखाना चाहती थी और इधर-उधर देखते हुए अपनी साड़ी को हाथ में पकड़ ली और जल्दी से उसे एक झटके से कमर तक उठा दी,,, और साड़ी के कमर तक उठते ही उसकी नंगी गांड एकदम से सामने नजर आने लगी लालटेन की पीली रोशनी में एकदम चमक रही थी,,, अंकित एकदम से हैरान हो गया अपनी मां की नंगी गांड देखकर तो हैरान था ही लेकिन साड़ी के उठते ही अपनी मां की संपूर्ण नंगी गांड को देखकर और इस बात से हैरान था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनी थी,,,, साड़ी के अंदर वह पूरी तरह से नंगी थी और यह एहसास होते ही उसका दिल जोरो से धड़कने लगा ,, और सुगंधा वहीं खड़े-खड़े एक नजर पीछे की तरफ घूमर अंकित की तरफ अच्छी और अंकित को अपनी तरफ देखता हुआ पाकर एकदम से उत्तेजना से भर गई,,, और तुरंत बैठ गई पेशाब करने के लिए और उसकी बुर से सरसरा कर धार निकलने लगी,,,,

कुछ ईस तरह से

पेशाब करने के लिए बैठने के बाद भी सुगंधा पीछे की तरफ देख रही थी अंकित अपनी मां की तरफ ही देख रहा था दोनों की नजर आपस में टकराई और दोनों एकदम से शर्म से पानी पानी हो गए अंकित शर्मिंदा होने के बावजूद भी अपनी मां की नंगी गांड पर से अपनी नजर को हटा नहीं पा रहा था अगर नजर हटा भी रहा था तो यह देखने के लिए कि कहीं कोई यहां तो नहीं रहा है लेकिन उसकी किस्मत बहुत तेज थी इस समय फुटपाथ पर से उस ओर कोई नहीं आ रहा था,,,, जी भर के पेशाब करने के बाद और जी भर कर अपनी मां की नंगी गांड देखने के बाद सुगंध तुरंत खड़ी हुई और साड़ी के किनारे को कमर पर से नीचे छोड़ दी और एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा गिर गया,,, करो मुस्कुराते हुए अंकित की तरफ आने लगी,,, ।

अंकित के पास पहुंचते हैं उसके हाथ से एक थाला अपने हाथ में ले ली और मुस्कुराते हुए बोली,,,।

(अच्छा हुआ कोई आया नहीं नहीं तो मैं कर भी नहीं पाती,,,)

सही कह रही हो मम्मी,,,,।

(इससे ज्यादा अंकित कुछ कह नहीं पाया और अपने बेटे के हाथ में से ठेला लेते हुए उसकी नजर अपने बेटे के पेट के आगे वाले भाग पर पड़ गई थी जिसमें अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी अंकित के मन में ढेर सारे सवाल थे साड़ी के उड़ने ही अपनी मां की गांड को ढकने वाली पेंटिं को न पाकर वह हैरान हो रहा था,,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी मां आज पेंटिं क्यों नहीं पहनी,,, वह अपनी मां से यह सवाल पूछना चाहता था लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी और दूसरी तरफ साड़ी के नीचे चड्डी ना पहने की युक्ति सुगंधा की ही थीवह अपने मन में ठान कर आई थी कि आज अपने बेटे को रास्ते में किसी भी तरह से अपनी गांड के दर्शन कराएगी और इसीलिए वह चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि वह जानती थी चड्डी पहनने पर उसे उतरते समय दिक्कत होगी और वह सब कुछ जल्दी जल्दी निपटाना चाहती थी इसलिए चड्डी नहीं पहनी थी,,, थोड़ी देर में दोनों घर पर पहुंच गए थे।)

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मार्केट से आते समय जो कुछ भी हुआ था वह बेहद मनमोहक और उन्मादीकता से भरा हुआ था अंकित कभी कल्पना भी नहीं किया था कि यू रास्ते में चलते समय उसे अपनी मम्मी की नंगी गांड देखने को मिल जाएगी,,,, जो कुछ भी हुआ था उससे बहुत कुछ दोनों की जिंदगी में बदलने वाला था,,,, घर पर पहुंचने तक दोनों में से किसी ने एक दूसरे से बात तक नहीं किया था क्योंकि बात करने को बचा ही कुछ नहीं था एक तरह से सुगंधा अपनी कामुक हरकत से अपने बेटे का मुंह बंद कर दी थी,,,।

घर पर पहुंचने पर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे हालांकि सुगंध मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि रास्ते में उसने अपने मन की जो कर ली थी जानबूझकर उसने साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी क्योंकि यह उसके काम यंत्र का ही भाग था जैसे लोग दूसरों को फसाने के लिए षड्यंत्र रास्ते हैं इस तरह से सुगंधा अपने बेटे को अपनी जवानी के जाल में फंसने के लिए काम यंत्र रची थी जिसमें वह सफल हो चुके थे वह जानती थी उसे किस जगह पर अपनी जवानी का बाण चलाना है,,, उसे जगह को वहां अच्छी तरह से जानती थी पहचानती थी और यह भी जानती थी कि शाम ढलते ही वहां पर लोगों का आना जाना बहुत ही कम हो जाता है,,, और इसी का फायदा उठाते हुए उसने उसे स्थान को चुनकर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी आकर्षक के जाल में फांस ली थी,, या यूं कह लो कि वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी का गुलाम बना ली थी,,,,

एक औरत होने के नाते और उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच जाने पर सुगंधा में भी मर्दों को पहचानने की कला अच्छी तरह से थी वह मर्दों की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ थी जिसमें से उसका खुद का बेटा भी बाकात नहीं था क्योंकि उसका बेटा भी आखिरकार था तो एक मर्द ही,,,, फुटपाथ के नीचे ढलान वाली जगह पर पहुंचकर वह अपने बेटे को बराबर नजर पीछे करके देख ले रही थी क्योंकि वह जानती थी कि जब तक उसका बेटा उसकी तरफ देखेगी नहीं तब तक उसकी यह क्रियाकलाप फूटी कौड़ी की भी नहीं थी उसकी क्रियाकलाप में चार चांद तभी लग जाता जब उसका बेटा उसे प्यासी नजरों से देखा और ऐसा ही हो रहा था,,,, जब सुगंधा को इस बात का एहसास हुआ कि उसका बेटा उसी की तरफ देख रहा है उसकी नंगी गांड को देख रहा है तो वह अंदर ही अंदर मदहोश हो रही थी उत्तेजित हो रही थी,,,।

घर पर पहुंच कर सुगंधा खाना बनाने के काम में जुट गई थी,,, तृप्ति भी घर पर हाजिर थी और वह भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद कर रही थी,,, सुकांत जो कुछ भी अपने बेटे की आंखों के सामने की थी उसके बारे में सोचकर अंदर ही अंदर प्रसन्न और उत्तेजित हो रही थी,,, और दूसरी तरफ अंकित अपने कमरे में बिस्तर पर बैठकर अपनी मां के बारे में सोच रहा था उसकी हरकत के बारे में सोच रहा था,,, उसे जहां अपनी मां की हरकत बेहद उत्तेजित कर देने वाली लग रही थी वही वह अपनी मां की हरकत से परेशान भी था उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वाकई में उसकी मां अनजाने में ही औपचारिक रूप से पेशाब करने बैठ गई थी या इसमें उसकी तरफ से कोई साजिश थी क्योंकि जितनी दूरी पर उसकी मां जाकर पेशाब करने बैठी थी उसकी मां को भी मालूम था कि इतनी दूर से उसका बेटा सब कुछ देख रहा होगा और ऐसे हालात में वह एकदम खुले में बैठी थी ना कि किसी झाड़ियों के पीछे जहां से उसे कुछ दिखाई ना दे लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था,,, उसकी मां एकदम खुले में बैठकर पेशाब कर रही थी जहां से वह सब कुछ देख रहा था और यही बात तो उसे हैरान कर देने वाली लग रही थी और उससे भी ज्यादा हैरान कर देने वालीं बात यह थी कि उसकी मां चड्डी नहीं पहनी थी जबकि अंकित को इस बारे में अच्छी तरह से पता था कि ज्यादा नहीं तो उसकी मां के पास चार-पांच चड्डी जरूर है और इसके बावजूद भी मार्केट जाते समय,,, उसकी मां चड्डी क्यों नहीं पहनी,,,, जहां एक तरफ अंकित अपनी मां की चड्डी वाली बात से हैरान था वही अपनी मां की चड्डी वाली बात से उत्तेजित भी था,,,।

रास्ते भर वह अपनी मां की हरकत के बारे में ही सोच रहा था और अपनी मां से चड्डी वाली बात करना चाहता था और पूछना चाहता था कि उसकी मां साड़ी के नीचे चड्डी क्यों नहीं पहनी थी लेकिन इस तरह के सवाल करने की हिम्मत अभी उसमें नहीं थी,,,, लेकिन अपनी बिस्तर पर बैठे-बैठे वहां कल्पना में ही अपनी मां से चड्डी के बारे में सवाल जवाब कर रहा था,,,।

क्या मम्मी तुम भी,,, तुम्हारे पास इतनी सारी चड्डीया है फिर भी तुम साड़ी के नीचे चड्डी नहीं पहनती हो,,,

किसने कह दिया तुझसे,,,

अब ऐसा कौन कहेगा मैं जानता हूं,,,

तू कैसे जानता है तो क्या मुझे कपड़े पहनते हुए देखता है क्या,,?(मुस्कुराते हुए सुगंधा बोली)

कपड़े पहनते हुए नहीं देखता हूं लेकिन मार्केट से आते समय जब तुम पेशाब करने के लिए फुटपाथ के नीचे उतर कर गई थी,,,

तो,,,, इसमें क्या हो गया रास्ते में आते जाते समय बहुत सी औरतों को पेशाब लग जाता है तो वह लोग भी यही रास्ता अपनाती है,,,,(एकदम सहज होते हुए सुगंधा बोली,,,)

अरे मैं यह नहीं कह रहा हूं,,, मेरा मतलब है कि तुम जब साड़ी कमर तक उठाई थी तो मेरी नजर तुम पर पड़ गई थी और मैंने देखा कि तुम साड़ी के अंदर चड्डी नहीं पहनी थी,,,।

(ऐसा सुनते ही अंकित के कल्पना में ही उसकी मां एकदम से हैरान होते हुए बोली)

बाप रे तू समय तू मेरी तरफ देख रहा था तुझे शर्म नहीं आई,,,

इसमें शरम कैसी मेरी नजर तो अपने आप ही तुम्हारे पर चली गई थी और तुम जब साड़ी कमर तक उठे तो तुम छुट्टी नहीं पहनी थी तुम्हारी नंगी गांड एकदम साफ दिखाई दे रही थी बड़ी-बड़ी,,,

हाय दैया कैसी बातें कर रहा है तु,,, क्या सच में मेरी गांड बड़ी-बड़ी है,,,,

हां,,,,, एकदम साफ तो दिखाई दे रही थी,,,,

मतलब की तो फुटपाथ पर खड़ा होकर दूसरों को देखने के बजाय मुझे देख रहा था,,,

मैं तो यह देख रहा था कि कहीं तुम ज्यादा दूर तो नहीं जा रही हो लेकिन तुम चड्डी क्यों नहीं पहनी थी,,,,।

अरे तो,,मेरे चड्डी नी पहनने से,,,कोन सा आसमान टुट पड़ा है,,,

आसमान नहीं टूट पड़ा लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि ऐसी कौन सी वजह थी जो तुम चड्डी नहीं पहनी,,,।

(कल्पना में ही अंकित पूरी तरह से अपनी मां से सवाल जवाब करने में मजबूर हो चुका था और कल्पना में ही उसकी मां भी एकदम मदहोश होते हुए अपने बेटे के सवाल से उत्तेजित हुए जा रही थी और अपने बेटे के सवाल पर एकदम सहज होते हुए मुस्कुरा कर बोली)

गीली थी,,, चड्डी सुखी नहीं थी इसलिए नहीं पहनी,,, और तुझे तो पता ही होगा गीली चड्डी पहनने से खुजली हो जाती है,,,।

ओहहहह तो यह बात थी,,, मुझे लगा कि शायद तुम्हारे पास है ही नहीं,,,।

अगर सच में नहीं होती तो क्या करता,,,

नई खरीद कर लाता,,,,

(अपने बेटे की बात सुनकर उसकी मासूमियत भरे चेहरे की तरफ देखकर सुगंधा मुस्कुराने लगी और अचानक ही उसकी नजर अपने बेटे की पेंट के आगे वाले भाग पर गई और वह एकदम से चौंकते हुए बोली,,,)

लेकिन यह तेरे पेंट में तंबू कैसा बना हुआ है,,,।

(उसकी मां का इतना कहना था कि अंकित एकदम से कल्पनाओं की दुनिया से जमीन पर आ गया क्योंकि दरवाजे पर दस्तक हो रही थी उसकी कल्पना टूट चुकी थी लेकिन कल्पना में जिस तरह के सवाल जवाब अपनी मां से कर रहा था वह बेहद मदहोश कर देने वाले थे बाहर उसकी बड़ी बहन खड़ी थी जो उसे खाना खाने के लिए आवाज दे रही थी,,,,)

हांआया,, (ऐसा कहकर अंकित बिस्तर पर पैर नीचे लटका कर बैठ गया और उसका ध्यान अपनी दोनों टांगों के बीच गया तो वह एकदम से स्तब्ध रह गया क्योंकि जिस तरह की कल्पना अपनी मां से बातचीत करते हुए कर रहा था उसे लेकर उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हो चुका था इसलिए वह तुरंत बिस्तर से नीचे खड़ा हो गया और कमरे में इधर-उधर तैरने लगा और अपना ध्यान भटकने लगा क्योंकि वह ऐसी अवस्था में कैमरे से बाहर जा नहीं सकता था क्योंकि ऐसी हालत में उसकी पेंट के ऊपर उसकी मां की नजर जा सकती थी,,, । जब सबको शांत हो गया तब थोड़ी देर बाद वहां कमरे से बाहर निकला और तीनों मिलकर खाना खाने लगे,,,,।

खाना खाते समय त्रप्ती कुछ जल्दबाजी दिखा रही थी उसे इस तरह से जल्दबाजी में खाते हुए देख कर सुगंधा बोली,,,,।

अरे इतनी जल्दबाजी क्यों है कहीं जाना है क्या आराम से खा ,,,

सुगंधा की कल्पना अपने बेटे के साथ

अरे मम्मी मुझे थोड़े नोट्स पूरे करने हैं मैं तो भूल ही गई थी अभी-अभी याद आया,,,

तो क्या हो गया फिर भी आराम से खा,,,,।

(दोनों मां बेटी आपस में बातें कर रहे थे लेकिन अंकित तिरछी नजरों से अपनी मां को देख रहा था,,, क्योंकि खाना खाते समय उसके कपड़े अपने आप ही अस्त-व्यस्त हो गए थे उसकी सारी कंधे से थोड़ा नीचे सरक गई थी जिसकी वजह से उसके ब्लाउज का ऊपरी वाला भाग एकदम साफ नजर आ रहा था और गर्मी का महीना होने के कारण उसकी मां पहले से ही ब्लाउज के ऊपर वाला बटन खोल रखी थी जिससे दोनों चूचियों के बीच की पतली गहरी लकीर एकदम साफ दिखाई दे रही थी,,, जिसे देखकर अंकित मत हो रहा था,,,, वैसे भी मर्दों की प्यास औरत के बदन से कभी ना तो बुझती है और ना ही पूरी होती है,,, क्योंकि अंकित पहले भी अपनी मां की खूबसूरत बदन को नग्न अवस्था में देख चुका ,,,, उसकी गांड देख चुका था उसकी चूचियां देख चुका था,,, यहां तक कि वह अपनी मां की बुर भी देख चुका था लेकिन इसके बावजूद भी आलम यह था कि इस समय वह केवल अपनी मां की चूचियों की हल्की सी झलक देखकर ही उत्तेजित हो रहा था और यह बात सुगंधा को पता चल गई थी और अंदर ही अंदर भाभी प्रसन्न होते हुए रोटी अपनी बेटी की थाली बढ़ाने के बहाने वह आगे की तरफ झुक गई जिसे उसकी साड़ी पूरी तरह से कंधे से नीचे उतर गई और उसकी भारी भरकम मदहोश कर देने वाली छातिया एकदम से उजागर हो गई,,,, और यह देखकर अंकित का मुंह खुला का खुला रह गया,,,

तृप्ति का ध्यान दोनों की तरफ बिल्कुल भी नहीं था क्योंकि उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था पर जल्द से जल्द खाना खाकर अपने कमरे में जाना चाहती थी उसे तो यह भी एहसास नहीं हुआ था कि उसकी मां उसकी थाली में एक रोटी और रख दी थी वह पूरी तरह से अपने ख्यालों में खोई हुई थी,,,,।

सुगंधा अपनी साड़ी का पल्लू कंधे से नीचे गिराकर अपने बेटे को अपनी जवानी से भरी हुई छातियों के दर्शन करा कर अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक कर ली थी,,, और ऐसा बर्ताव कर रही थी मानो सब कुछ अनजाने में हुआ हो अपने बेटे को इस तरह से अपने जवानी के दर्शन करने में उसे बेहद उत्तेजना और अद्भुत आनंद की प्राप्ति होती थी,,, थोड़ी देर में तीनों खाना खा चुके थे और तृप्ति बर्तन की सफाई करने के बाद अपने कमरे में चली गई थी आज वह टीवी देखने के लिए ड्राइंग रूम में भी नहीं आई थी,,,,।

कमरे में जाते ही वह अपने किताबों के बैग को बिस्तर पर रखकर उसमें से एक नोटबुक निकाली और उसके पन्नों को पलटने लगी और जल्द ही उसे अंदर रखा हुआ एक पन्ना नजर आया जिसे वह उठाकर पढ़ने लगी,,,।

वह किसी नोटबुक का पन्ना नहीं था,, बल्कि संदीप के द्वारा लिखा गया प्रेम पत्र था जिसे आज ही कॉलेज में उसने नोटबुक में उस पन्ने को रखकर त्रप्ती को थमा दिया था,,, उसे प्रेम पत्र को पढ़ाते हुए तृप्ति का दिल जोरो से धड़कने लगा था क्योंकि उसके जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जिसे संदीप ने लिख कर दिया था,,, उसे प्रेम पत्र में लिखो एक-एक शब्द को पढ़कर तृप्ति के बदन में उमंग जागने लगी उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आने लगे,,, लेकिन कहीं ना कहीं उसके बदन में उत्तेजना की फुहार भी उठ रही थी,,, वह प्रेम पत्र पूरी तरह से संदीप के प्रेम से भरा हुआ था उसका एक-एक शब्द तृप्ति के तन-बाद में मदहोशी भर रहा था जिसका असर उसे अपने दोनों टांगों के बीच हो रहा था,,, पल भर में उसे अपनी बुर फुलती और पिचकती हुई महसूस हो रही थी हालांकि उसे प्रेम पत्र में अश्लील शब्द बिल्कुल भी नहीं थे ना तो कोई अभद्र भाषा का उपयोग किया गया था लेकिन तृप्ति के जीवन का यह पहला प्रेम पत्र था जो संदीप के द्वारा लिखा गया था और मन ही मन में संदीप को प्यार करने लगी थी और जिस तरह की हरकत उसने पहली बार किया था वही हरकत प्रेम पत्र पढ़ते समय उसके जेहन में उभरने लगा था जिसके चलते वह उत्तेजित हुए जा रही थी,,,, हालांकि ट्यूशन से आते समय संदीप के द्वारा की गई हरकत से उसे समय तो वह काफी क्रोधित हुई थी लेकिन जिस तरह की उन्माद संदीप ने अपनी हरकत से उसके बदन में जगाया था उसके बाद से वह फुहार रह रहकर उसे परेशान करती थी और यह सिलसिला आज तक जारी था इसीलिए संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ते हुए वह पूरी तरह से मदहोश हो गई थी,,,, उसका दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था बहुत जल्दी से उसे प्रेम पत्र को इस तरह से मोड कर नोटबुक में रख दी और उसे अपनी बैग में भर दी और बिस्तर पर पीठ के बल लेटे हुए वह संदीप के बारे में ही सोचते हुए कब नींद की आगोश में चली गई उसे पता नहीं चला,,,।

..........................
 
तृप्ति का यह पहला प्रेम पत्र था जिसका एहसास उसे पूरी तरह से भिगोने लगा था,,, पत्र में लिखो एक-एक शब्द को वह बार-बार पढ़ रही थी,, ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे वह उसकी प्रेम पत्र नहीं बल्कि उसकी कुंडली हो जिसमें वह अपना भविष्य ढूंढ रही थी,,, वैसे तो ट्यूशन से आते समय संदीप ने जिस तरह की हरकत उसके साथ किया था उस हरकत को लेकर तृप्ति उससे काफी नाराज भी थी क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि संदीप इस तरह की हरकत करके उसकी नजर में गिर जाए,, और इस गलती के चलते संदीप ने उससे माफी भी मांग लिया था और तृप्ति ने उसे माफ़ भी कर दी थी,,,। और इस वजह से दोनों के बीच का रिश्ता टूटते टूटते बचा था,,,।

संदीप के द्वारा दिए गए प्रेम पत्र को पढ़ने के बाद तृप्ति उसे नोटबुक में वापस रख दी थी और उसे प्रेम पत्र के चलते अपने बदन में काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, क्योंकि वैसे तो वह प्रेम पत्र एकदम सीधे-सादे सरल भाषा में था लेकिन तृप्ति उस पत्र के एक-एक शब्द से काफी उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,, ऐसा लग रहा था कि पत्र में लिखें हर एक शब्द उसके बदन से उसके वस्त्र को उतार रहे हो और ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि तृप्ति उस पत्र को संदीप की हरकत से जोड़ रही थी जो कि वह भी अनजाने में एकाएक अपनी हरकत को अंजाम देने लगा था और इस समय भी यह पत्र भी अचानक ही उसे दे दिया था इसलिए अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रही थी,,,।

बिस्तर पर लेटे-लेटे तृप्ति सलवार के ऊपर से ही अपनी गुलाबी बुर को मसल रही थी,,,। ऐसा नहीं था कि तृप्ति के दिलों दिमाग पर वासना का भूत सवार हो जाता हो वह ऐसी लड़की बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन कभी कबार उसके बदन में कामुकता की फुहार उठने लगती थी जिसकी नमी में वह अपनी दोनों टांगों के बीच की उस पतली गली को गीली कर लेती थी,,,, इस समय भी उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर उठ रही थी और वह अपनी आंखों को बंद करके उसे पल को सोच रही थी,,जो उसके साथ घटीत हो चुका था,,, उसी दिन संदीप ने जो कुछ भी उसके साथ किया था वह काफी हैरान कर देने वाला था और काफी उत्तेजित कर देने वाला भी था क्योंकि धीरे-धीरे संदीप की हथेली उसकी सलवार के अंदर तक पहुंच चुकी थी,,, संदीप अपनी हरकत को अंजाम तक पहुंचाते हुए अपनी हथेली से तृप्ति की बुर को ढक लिया था और हथेली की गर्माहट तृप्ति को अंदर तक गर्म कर रही है वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी तृप्ति को ऐसा लग रहा था कि संदीप अब रुकने वाला नहीं है एक तरफ उसे मजा भी आ रहा था दूसरी तरफ वह घबरा भी रही थी क्योंकि उसके जीवन का यह पहला वाक्या था जब किसी मर्दाना हाथ को वह अपने जिस्म पर महसूस कर रही थी,,,।

तृप्ति पूरी तरह से मदहोशी के आलम में डूबने लगी थी संदीप की हरकत की वजह से उसकी आंखों में खुमारी छा रही थी बदन में चार बोतलों का नशा होने लगा था,,, उसके पैरों में कंपन हो रहा था वह ठीक से अपना संतुलन नहीं बना पा रही थी उसे ऐसा लग रहा था कि आज उसका कौमार्य भंग हो जाएगा जिसमें वह खुद सहभागी बनेगी,,, क्योंकि संदीप पूरे जोश के साथ उसके खूबसूरत बदन से खेलना शुरू कर दिया था खड़े-खड़े ही वह उसकी बुर को गीली कर दिया था यहां तक की पेंट में उसका कठोर लंड अपनी कठोरता का एहसास उसके नितंबों पर दिला रहा था कुल मिलाकर तृप्ति संदीप की इच्छाओं और उपासना के जाल में पूरी तरह से लिप्त होने लगी थी वह किसी भी वक्त घुटने टेक देना चाहती थी लेकिन तभी पीछे से आ रही मोटर साइकिल की लाइट की वजह से उसकी तंद्रा एकदम से भंग हुई और वह एकदम से जमीन पर आकर गिर गई वह एकदम होश में आ चुकी थी और संदीप की हरकत का विरोध करते हुए गुस्से में वहां से चली गई,,,,।

और यही एहसास इस समय तृप्ति को अपने बिस्तर पर हो रहा था उसे दिन की तरह अपने कौमार्य को जिस तरह से उसने बचा ली थी आज भी बहुत तुरंत अपनी हथेली को अपनी सलवार में से बाहर निकली थी और गहरी गहरी सांस लेते हुए कुछ देर तक अपने आप को दुरुस्त करने लगी थी,,,, भले ही वासना का तूफान उसे अपने साथ ले जाने को उसे मजबूर कर देता था लेकिन इन मौके पर वह अपने आप को संभाल ले जाती थी क्योंकि तृप्ति दूसरी लड़कियों की तरह बिल्कुल भी नहीं थी हां दूसरी लड़कियों की तरह उसके भी अरमान मचल जाते थे बदन में मदहोशी छा जाती थी लेकिन वह इतनी कच्ची नहीं थी कि तुरंत घुटने टेक दे,,,,।

अपने आप को दुरुस्त कर लेने के बाद वह बिस्तर पर से उठी और एक गिलास ठंडा पानी पीकर वापस बिस्तर पर लेट गई और दूसरे दिन संदीप मिलने की आतुरता दिखाते हुए नींद की आगोश में चली गई,,,।

दूसरी तरफ सुगंधा एक मां से पहले एक औरत थी और एक औरत के मन में उसके तन में भी कुछ चाहत होती है और यही चाहत उसमें जाग चुकी थी जिसके चलते वह अपने ही बेटे को अपनी जवानी के जाल में फसाने की पूरी तरकट रच रही थी जिसमें उसका बेटा पूरी तरह से आ भी चुका था,,, और भला जब सुगंध जैसी खूबसूरत जवान से लदी हुई औरत हो तो ऐसा कौन सा मर्द होगा जो उसके चंगुल में फंसने के लिए आतुर ना हो उसके जाल में खुद आने के लिए व्याकुल ना हो,, शुरू शुरू में सुगंधा को अपनी हरकत पर शर्मिंदगी महसूस होती थी उसका मन उसे रोकने की कोशिश करता था,,, और वह भी अपने आप को आगे बढ़ने से रोकना चाहती थी इसलिए रोज कोई ना कोई कसम खाकर ऐसा गलती दोबारा न करने का वचन लेती थी लेकिन दूसरे दिन फिर उसका मन मचलने लगता था,,, और वह फिर से लाचार और निसहाय अपने आप को महसूस करने लगती थी,,, लेकिन अब तो उसे मजा आ रहा था मदहोशी में वह डूबने लगी थी उसे अपने बदन पर गर्व होने लगा था कि इस उम्र में विवाह किसी भी मर्द का पानी निकालने में पूरी तरह से सक्षम है,,।

दूसरे दिन अंकित पढ़ने जाने के लिए तैयार हो चुका था,,, उसकी मां रसोई घर में बाकी का काम निपटा रही थी तृप्ति पहले ही तैयार होकर कॉलेज के लिए निकल चुकी थी और वैसे भी उसे आज संदीप से मिलने की व्याकुलता कुछ ज्यादा ही थी इसलिए कुछ जल्दी ही वह घर से पढ़ाई का बहाना बना कर निकल गई थी,,, घर से निकलते निकलते अंकित को शरारत सुझ रही थी,,, वह रसोई घर के दरवाजे पर खड़े होकर अपनी मां को ही देख रहा था और खाना बनाते समय उसकी मां किसी काम देवी से काम नहीं लग रही थी क्योंकि उसने साड़ी को उठाकर कमर से खून रखी थी उसके नितंबों का उभार साड़ी के कसाव की वजह से और भी ज्यादा उभर कर दिखाई दे रहा था,,, और साड़ी का पल्लू उसने इस तरह से गोल-गोल घुमा कर अपने कंधे पर डाली थी कि उसके साड़ी का पल्लू उसकी दोनों चूचियों के बीच से होकर गुजर कर उसकी कमर तक आ रहा था जिसे वह कमर में खोंस रखी थी,,,।

अपनी मां को इस रूप में देखते हुए अंकित अपने मन में यही सोच रहा था कि उसकी मां को इस रूप में अगर कोई देख ले तो जरूर उसका लंड खड़ा हो जाए क्योंकि लड़कों को और क्या चाहिए एक खूबसूरत औरत उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां उसकी बड़ी-बड़ी गांड बस इतने से ही तो उनकी उत्तेजना परम शिखर पर पहुंच जाती है जैसा कि उसकी खुद की उत्तेजना उसे मुठ मारने पर मजबूर कर देती थी,,, इस समय भी उसका यही हाल हो रहा था सादगी में भी उसकी मां कयामत लग रही थी,,, पर जिस तरह वह बर्तनों को इधर से उधर कर रही थी उसके साथ उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां भी लहर मार रही थी जिसे देखकर अंकित के मुंह में पानी आ रहा था,,,।

कुछ देर तक अंकित दरवाजे पर खड़ा होकर अपनी मां के रूप खूबसूरती को देखता ही रह गया,,, सुगंधा का ध्यान दरवाजे पर बिल्कुल भी नहीं था वह अपने काम में एकदम मशगुल थी लेकिन जैसे ही उसकी नजर दरवाजे पर गई तो दरवाजे पर अंकित को खड़ा देखकर मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,।

क्या हुआ अभी तक गया नहीं,,,

बस जा ही रहा था,,, मैं कह रहा था कि आते समय,,, तुम्हारे लिए लंबे-लंबे और मोटे केले लेकर आऊं क्या,,,।

(अपने बेटे के मुंह से इस तरह की बात सुनकर पल भर में ही सुगंध के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी उसे मार्केट में कहीं अपनी बात याद आ गई,,, और वह मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

क्यों तुझे पता है क्या कि मुझे कैसे केले पसंद है,,,

फिर क्या तुम ही ने तो कल बताई थी मार्केट में,,

वह तो ठीक है पर तुझे कैसे मालूम कि मुझे मोटे और लंबे केले पसंद है,,,,

अब मम्मी तुम्हें देखकर लगता ही नहीं की छोटे और पतले केले से तुम्हारा कुछ हो पाएगा,,,,,(इस बार अंकित दो अर्थ वाली बातें कर रहा था जिसे सुगंधा अच्छी तरह से समझ रही थी और अंदर ही अंदर उत्तेजित हो रही थी,,,)

तुझे कैसे पता कि पतले केले से मेरा कुछ नहीं हो पाएगा,,,

अब तुम्हारा शरीर देखो लंबी कद काठी की हो,,, कसा हुआ बदन है तुम्हारा,,, ऐसे में मरेला सा पतला सा केला तो तुम्हें कुछ एहसास ही नहीं दिला पाएगा,, ।

(अंकित। केले का नाम लेकर एक तरह से अपनी मां को लंड के बारे में बातें कर रहा था क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां की कद काठी बेहद उच्चस्तर किस्म की थी,,, ऐसे में उसके बदन की प्यास केवल मोटा तगड़ा लंड ही बुझा सकता था)

सही कह रहा है तू मुझे तो मोटा और लंबा लं,,, (इतना कहते ही उसकी जुबान एकदम से रुक गई,, आगे का शब्द उसके गले में ही अटक कर रह गया ,, और सुगंध जल्द ही अपने कहे शब्दों को सुधारते हुए बोली,,,) मेरा मतलब है कि मोटा और तगड़ा केला ही पसंद है,,,,,,(अपनी बातों को संभालते हुए वह पसीने से तरबतर हो चुकी थी उसके मुंह से अनजाने में भी लंड शब्द का आगे वाला शब्द निकल चुका था,,, जिसे उसके बेटे ने बखुबी सुन लिया था,,, अपनी मां के मुंह से इस तरह के शब्द सुनकर उसके भी होश उड़ गए थे,,, उसकी भी सांसों पर नीचे होने लगी थी और वह समझ गया था कि उसकी मां को क्या पसंद है,,,, लेकिन फिर भी ऐसा जताने लगा कि मानो जैसे वह अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द को सुना ही नहीं और बोला,,,।

ठीक है मम्मी में मार्केट से आते समय तुम्हारी पसंद का केला लेते आऊंगा,, (अपनी मां से दो अर्थ में बात करते हुए उसे भी बहुत मजा आ रहा था जिसका असर उसकी दोनों टांगों के बीच हो रहा था पेट का आगे वाला भाग उभरने लगा था जिस पर सुगंधा की नजर चली गई थी और वह मन ही मन उत्तेजित हो रही थी उसे भी अपनी बुर गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, और वह सहज होते हुए बोली,,,।

ठीक है लेते आना लेकिन पैसे तो लेता जा,,,

कोई बात नहीं मम्मी पैसे मेरे पास है मैं आते समय लेते आऊंगा,,,,(और इतना कहते हुए घर से बाहर चला गया और सुगंधा रसोई घर के दरवाजे तक आकर उसे जाते हुए देखते रह गई,,, और अपने मन में ही बोली,,, मुझे जिस तरह का केला पसंद है वह तो तेरे पास है,,,।)

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अपनी मां से हुई बातचीत की वजह से अंकित अपने तंबदन में अजीब सी हलचल का अनुभव कर रहा था आज साफ-साफ उसकी मां के मुंह से लंड शब्द पूरा निकलते निकलते रह गया था,,, अपनी मां के मुंह से केवल लं,,,, शब्द सुनकर ही अंकित चारों खाने चित हो चुका था क्योंकि आज तक उसने अपनी मां के मुंह से एक भी शब्द अश्लीलता के नहीं सुना था यह पहली बार था कि अपनी मां के मुंह से अश्लील शब्द सुन रहा था जो कि वह पूरा बोल नहीं पाई थी अपने शब्दों को अपने होठों में ही दबा ले गई थी ,, लेकिन अंकित अपनी मां के मुंह से निकलने वाले शब्दों को अच्छी तरह से समझ गया था वह जानता था कि उसकी मां क्या कहना चाह रही थी इसीलिए तो उसका खुद का लंड एकदम से खड़ा हो गया था,,,। अभी भी उसकी सांसे उत्तेजना का एहसास दिला रही थी,,,।

रास्ते में फुटपाथ पर चलते हो गई वह अपनी मां के बारे में ही सोच रहा था,,, वह जानता था कि उसकी मां एक शिक्षिका थी,, और एक शिक्षिका के व्यवहार को लेकर वह अच्छा खासा परिचित था वह जानता था कि एक शिक्षिका का व्यवहार कैसा होता है क्योंकि वह बचपन से ही अपनी मां को देखता आ रहा था,, और आज तक उसने अपनी मां के मुंह से ऐसा कोई भी शब्द नहीं सुना था जो मोहल्ले की आम औरतें आपस में बात करते हुए करती है,, कहीं औरतों के मुंह से तो उसने गाली गलौज तक सुना था और वह भी मां बहन की और वह अपने मन में यही सोचता था कि अच्छा ।हुआ उसकी मां इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करती किसी से गाली गलौज नहीं करती,,, और दिल सेवा अपनी मां की इज्जत भी करता था लेकिन धीरे-धीरे अंकित का खुद का रवैया बदलता जा रहा था ,,, अपनी मां को लेकर उसकी सोच बदलती जा रही थी,,, अंकित अपने मन में सोच रहा था कि अच्छा ही हुआ कि उसने केले वाला जिक्र छेड़ दिया था उसे अकेले की वजह से पता तो चला कि उसकी मां को क्या पसंद है जो कि उसके मुंह से निकली गया था कि उसे मोटा तगड़ा लंड पसंद है भले ही इशारे में उसकी मां के लिए बोल रही थी लेकिन केले का बोलते समय भी उसके मुंह से उसके मन की बात निकल ही गई थी,, और अपनी मां के मन में क्या चल रहा है एहसास अंकित को होते ही उसके तन बदन में आग लग गई थी बात ही बात में उसे पता चल गया था कि उसकी मां को मोटा और तगड़ा लंड पसंद है,, जोकि दुनिया की हर औरतों को पसंद है और इसीलिए उसकी मां भी दूसरी औरतों से अपवाद बिल्कुल भी नहीं थी भले ही चरित्र दूसरों से अलग था लेकिन औरत की जरूरत दूसरी औरतों से बिल्कुल भी अलग नहीं थी,,,।

अंकित पूरी तरह से उत्तेजना का अनुभव कर रहा था वह अपने मन में ही चलते हुए कल्पना कर रहा था कि उसकी मां मोटे तगड़े लंड से चुदवाना चाहती है,,, वैसे भी उसकी गांड इतनी बड़ी-बड़ी है कि छोटा और पतला लंड उसकी जवानी की आपको बुझा ही नहीं सकता उसे मोटा तगड़ा लंड चाहिए एकदम मेरी तरह,,, यह सब सोचते हुए अंकित अपने आप से ही बात करते हो बोल रहा था कि स्कूल से छूटने के बाद वह मोटे और तगड़े केले खरीद कर घर ले जाएगा,,,।

जहां एक तरफ बेटे के मन में इस तरह के खयालात चल रहे थे वहीं दूसरी तरफ मां का भी बुरा हाल था रसोई का काम पूरा कर चुकी थी लेकिन फिर भी वह रसोई घर में ही थी किचन फ्लोर पर अपनी गांड टीकाकर वह कुछ देर पहले की बात चीत के बारे में ही सोच रही थी,,, वह अपने मन में सोच रही थी कि नूपुर के बेटे से मिलकर उसका बेटा भी उसकी तरह होता जा रहा है और यह उसके लिए अच्छा ही दिशा निर्देश करते हैं आज पहली बार उसका बेटा दो अर्थ में बातें जो किया था,,, और इस बात को सुगंधा अच्छी तरह से समझ गई थी क्योंकि आज से पहले उसने कभी भी घर में कुछ भी खरीद कर लाने की बात नहीं की थी ,,, और इसीलिए तो उसके खुद के तन बदन में आग लगी हुई थी क्योंकि आज अनजाने में ही केले की जगह उसके मुंह से लंड निकल गया था,,,।

वैसे भी औपचारिक रूप से किले को देखकर अक्सर औरतें एक मोटे तगड़े लंड की कल्पना करने ही लगती हैं,,, क्योंकि केले का आकार एकदम लंड के आकार से मिलता जुलता रहता है,,, इसीलिए अनजाने में केले की जगह आज उसके मुंह से लंड शब्द निकलते निकलते रह गया था,,, सुगंधा इस बात से हैरान थी कि उसका बेटा उसके कहे शब्दों को जरूर समझ गया होगा उसका बेटा समझ गया होगा कि उसकी मां क्या चाहती है,,, और इसी बात से जहां एक तरफ हुआ परेशान नजर आई थी वहीं दूसरी तरफ अनजाने में अपने मुंह से लंड शब्द निकल जाने की वजह से वह अपने बदन में मदहोशी का एहसास कर रही थी और अपने आप से बात करते हुए बोल रही थी कि अच्छा युवा की उसके मुंह से आज वह निकल गया जो वह चाहती है खास उसका बेटा उसके कहने का मतलब कुछ समझ जाता तो उसकी भी रातें रंगीन हो जाती,,, अपने मन में इस तरह की बातें सोचते हुए उसके तन बदन में आग लग रही थी उसकी सांसे ऊपर नीचे हो रही थी उसे भी स्कूल जाना था ,,, वरना बाथरूम में जाकर वह अपनी जवानी की प्यास अपनी उंगली से बुझाने की भरपूर कोशिश करती,,,,।

अपने मन को काबू में करके वह स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगी,,, और थोड़ी देर में वह भी स्कूल जाने के लिए निकल गई,,,,।

दूसरी तरफ,, त्रप्ती संदीप से मिलने के लिए व्याकुल नजर आ रही थी कॉलेज में पहुंच जाने के बावजूद भी उसे संदीप कहीं नजर नहीं आ रहा था,,, क्लास में बैठकर वह संदीप के बारे में ही सोच रही थी ,,वह जल्दी से जल्दी संदीप से मुलाकात करना चाहती थी और प्रेम पत्र के बारे में बातें करना चाहती थी,,, प्रेम पत्र को लेकर उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी वह खुशी-खुशी संदीप से मिलकर इस बारे में बात करना चाहती थी इसीलिए उसका मन किसी काम में लग नहीं रहा था और जल्द से जल्द छुट्टी होने का इंतजार कर रही थी क्योंकि वह जानती थी कि संदीप अगर इस समय नहीं मिला है तो छुट्टी में जरूर मिलेगा क्योंकि वह भी इसी कॉलेज में पढ़ता था,,,, धीरे-धीरे समय अपनी रफ्तार से गुजर रहा था इस बीच तृप्ति कई बार संदीप के द्वारा लिखे गए प्रेम पत्र को चोरी-चोरी पढ़कर उसे बैग में रख ले रही थी,,, उससे रहा नहीं जा रहा था,,, आखिरकार अपने समय पर छुट्टी की घंटी बाज ही गई,,,।

एक तरफ छुट्टी की घंटी बज गई दूसरी तरफ तृप्ति के दिल की धड़कन बढ़ने लगी,,, संदीप से मिलने से पहले वह कभी सोची भी नहीं थी कि वह प्यार व्यार के चक्कर में पड़ जाएगी वह अपने आप से ही दृढ़ निश्चय कर चुकी थी कि वह दूसरी लड़कियों की तरह अपने कदम डगमगाने नहीं देगी प्यार व्यार के चक्कर में कभी नहीं पड़ेगी,,, लेकिन यह जो उम्र होती है यह बहुत ज्वलनशील होती है इस उम्र की जलन में जो जल गया तो समझो वह झुलस गया और जो इसकी तपन से बच गया तो वह आगे निकल गया वह अपना करियर बना ले गया क्योंकि यही उम्र होती है डगमगाने की,,, और जो बच गया सो बच गया वरना सब बर्बाद और यही इस समय तृप्ति के साथ हो रहा था,,,। वह अपने आप को संभालने में नाकामयाब साबित हो रही थी,,,,, वह कुछ समझ नहीं पा रही थी वह भूल गई थी कि इस उम्र का प्यार बिस्तर पर जाकर खत्म हो जाता है और संदीप उसे अपने बिस्तर पर ले जाना चाहता था,,, उसके रुप यौवन से खेलना चाहता था,,,, क्योंकि सुगंधा की तरह ही उसकी बेटी भी बला की खूबसूरत थी,,,।

आखिरकार दोनों का मिलन हो ही गया ,, संदीप थोड़ा त्रप्ती से घबरा रहा था क्योंकि पहले बार का अनुभव अच्छी तरह से जानता था,,, तृप्ति के रवैये से अच्छी तरह से वाकीफ था,, इसलिए घबरा रहा था कि कहीं फिर से वह नाराज ना हो जाए,,, इसलिए उससे मुंह छुपा रहा था,,, लेकिन तृप्ति बहुत खुश थी,,, वह संदीप से बोली,,,।

बगीचे में चलो तुमसे कुछ बात करना है वहीं बैठकर बातें करेंगे,,,

बगीचे में,,,(थोड़ा डरते हुए बोला)

हां बगीचे में हरकत जो तुमने इस तरह की किए हो की ,,

मैंने क्याकिया,,,

अब अनजान बनने की कोशिश मत करो यहां सड़क पर मैं कुछ कहना नहीं चाहती,,,

ठीक है चलो,,,(इतना कहकर संदीप आगे बढ़ गया तकरीबन 5 मिनट की दूरी पर ही बगीचा था जहां पर अक्सर लोग बैठकर बगीचे की ठंडक का एहसास करते हुए आपस में बातचीत करते थे और प्रेमी प्रेमिका प्रेमालाप करते थे,,, संदीप जानबूझकर बगीचे में सबसे पीछे वाली जगह पर गया जहां पर बड़े-बड़े पेड़ थे और यहां पर ज्यादा लोग आते भी नहीं थे,,, बड़ी-बड़ी घनी झाड़ियां होने की वजह से दूर से देखे जाने का डर भी नहीं था,,। दोनों टेबल पर अपना अपना बैग रख कर बैठ गए तृप्ति संदीप को ही देखे जा रही थी और संदीप डर के मारा अपनी नजर को नीचे झुका कर बैठा था वैसे तो लड़कियों से बातचीत करने में बिल्कुल भी घबराते नहीं था और ना ही तृप्ति से डरता था तृप्ति से इस बात से डरता था कि कहीं वह उसे नाराज होकर उससे दूरी न बना ले क्योंकि वह किसी भी कीमत पर तृप्ति का जिस्म पाना चाहता था,, उसे भोगना चाहता था,,,, कुछ देर की खामोशी के बाद बात की शुरुआत करते हुए तृप्ति बोली,,)

तुमने नोटबुक में क्या लिख कर दिए थे,,,।

क्या लिख कर दिए थे,,, मुझे क्या मालूम क्या लिख कर दिए थे,,,( संदीप जानबूझकर अनजान बनता हुआ बोला,,,)

अब बनने की कोशिश बिल्कुल भी मत करो,,, मैं सब जानती हूं,,, और तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर किसी के हाथ लग जाता तो क्या होता,,,।

(संदीप तृप्ति की बात सुनकर कुछ बोला नहीं बस खामोश रहा तृप्ति संदीप की तरफ ही देख रही थी और संदीप की हालत देखकर मन ही मन खुश हो रही थी क्योंकि उसे ऐसा लग रहा था कि संदीप घबरा रहा है जबकि वह घबरा नहीं रहा था बस नाटक कर रहा था,,, तृप्ति अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

तुम मुंह से भी तो कह सकते थे,,,

मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी,,,

वैसे तो बहुत हिम्मत दिखाते रहते हो इतना कहने में हिम्मत नहीं हो रही है,,,

सच में मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं तुम्हारी बहुत इज्जत करता हूं और मैं कुछ ऐसा नहीं करना चाहता जिससे तुम्हें बुरा लग जाए और तुम मुझे छोड़ दो,,,

मुझे तुम्हारी बात का बुरा नहीं लगता,,,, मैं भी तुमसे बहुत प्यार करती हूं,,,,(इतना कहते हुए दोनों एक दूसरे की आंखों में देखने लगे तृप्ति मदहोश होने लगी क्योंकि संदीप धीरे-धीरे अपने होठों को उसके करीब ले जाने लगा उत्तेजना वश तृप्ति भी अपने होठों को हल्के से आगे की तरफ बढ़ा दी यह उसकी तरफ से संदीप के लिए आमंत्रण था और इस आमंत्रण को स्वीकार करते हुए,, संदीप अपने प्यासे होठों को त्रप्ती के लाल लाल दहकते हुए होंठों पर रख दिया,,, महीनों बाद तृप्ति फिर से मदहोश हो गई,,, संदीप इस खेल में माहिर था वह पल भर में ही तृप्ति के लाल लाल रस भरे होठों को अपने होठों के बीच रखकर उसका रसपान करने लगा संदीप का यह चुम्मन तृप्ति को पूरी तरह से मदहोश कर रहा था,,, तृप्तिकेतन बदन में आग लगने लगी,,,, और इस बार मौका देखकर संदीप ने फिर से अपनी हथेली को उसकी छाती पर रख दिया,,, उसके संतरे को अपनी हथेली में हल्के से लेकर दबा दिया और तृप्ति के मुंह से घुटी-घुटी सी आह निकल गई,,,।

तृप्ति को इस चुंबन में बहुत मजा आ रहा था इस बार तृप्ति खुद पागलों की तरह संदीप के होठों को भी अपनी होठों के पीछे लेकर चूसना शुरू कर दी थी कोशिश बात का अच्छी तरह से एहसास हो रहा था कि संदीप उसकी चूची को दबा रहा था और चूची को दबाने में जो मजा उसे प्राप्त हो रहा था उससे भी ज्यादा मजा तृप्ति को महसूस हो रहा था वह मदहोश हुए जा रही थी,,,। लेकिन यह चुंबन और स्तन मर्दन का क्रियाकलाप कुछ देर और चल पाता इससे पहले की किसी के आने की आहट दोनों के कानों में सुनाई दी और दोनों तुरंत अलग हो गए,,, क्योंकि वहां पर कुछ आवारा लड़के आ रहे थे और अब वहां पर ज्यादा देर तक ठहरना उचित नहीं था इसलिए दोनों अपनी जगह से खड़े हो गए और जल्दी से वहां जाने लगे लेकिन जाते-जाते ही उनमें से एक लड़का बोला,,,।

चुदाई का प्रोग्राम था क्या,,, हमसे गलती हो गई थोड़ी देर बाद आना चाहिए था ताकि चुदाई का खेल अपनी आंखों से देख लेते,,,,।

(उसे हमारे लड़के की बात को अनसुना करके दोनों वहां से निकल गए लेकिन भले बात को अनसुना कर गए थे लेकिन जो बात उस आवारा लड़के ने बोली थी चुदाई वाली,,, उसे बात का तृप्ति के मन पर बहुत गहरा असर पड़ रहा था उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वास्तव में वह बगीचे के कोने वाली जगह पर चुदवाने के लिए गई थी,,, दोनों बगीचे से बाहर निकाल कर कुछ देर साथ चलकर अपने-अपने रास्ते हो लिए,,,

वादे के मुताबिक अंकित स्कूल से छूटने के बाद वास्तव में मोटे तगड़े और बड़े-बड़े केले खरीद लिया था एकदम अपने लंड के साइज का क्योंकि वह समझ गया था कि उसकी मां को इस माप का ही जरूरत है,,। वह जानता था कि घर पर केला ले जाते ही उसकी मां की नजर जैसे ही कैला पर पड़ेगी उसकी मां की बुर पानी छोड़ने लगेगी,,, वह जल्दी-जल्दी घर पहुंच गया,,, शाम के 5:00 बजे रहते और इस समय घर पर उसकी मां के लिए रहती थी इसलिए अंकित मन ही मन खुश हो रहा था लेकिन जैसे ही घर पर पहुंचा तो घर पर तृप्ति भी मौजूद थी वह पढ़ाई कर रही थी,,, और घर पर तृप्ति को देखकर उसके अरमानों पर पानी फिर गया,,, तृप्ति की नजर जैसे ही अंकित के हाथों में केले के थैले पर गई तो मोटे-मोटे तगड़े केले को देखकर तृप्ति बोली,,,।

यह क्या उठा लाया तू,,,

क्यों दीदी तुम्हें पसंद नहीं है क्या,,,?

तूने कभी देखा मुझे केला खाते हुए,,,,

हां सही बात है देखा तो नहीं हुं,,,

फिर तु यह सब क्यों लेकर आया,,,

अरे दीदी तुम्हें नहीं पसंद है तो क्या किसी को पसंद नहीं आएगा मम्मी को तो पसंद है ना,,,,

तो यहां लेकर क्यों खड़ा जा मम्मी को दे दे,,,,

( ओर इतना सुनकर अपने कमरे से सुगंधा बाहर निकल कर आ गई,,, अपने बेटे के हाथ में केला देखकर उसकी साइज देखकर उसकी मोटाई देखकर मन ही मन उत्तेजित होने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तु कितना ख्याल रखता है मेरा,,, और एक यह है जो आज तक कुछ नहीं लेकर आई,,,(तृप्ति की तरफ इशारा करते हुए बोली तो अंकित बोल पड़ा)

मां का ख्याल हमेशा हम लड़कों को ही रखना पड़ता है लड़कियों से थोड़ी ना कुछ होता है,,,,।

(अंकित दो अर्थ वाली बात कर रहा था जो कि उसकी मां अच्छी तरह से समझ रही थी और अपने बेटे के कहने के मतलब को समझ कर वह अंदर ही अंदर सिहर उठी,,,,,, वह जानती थी किसका बेटा मां का ख्याल लड़के रखते हैं ऐसा क्यों किया है क्योंकि लड़कों के पास लंड होता है जिनकी प्यास हर एक मां को होती है जिससे वह अपनी जवानी की प्यास बुझा सकती है,,,, यह सब सुनकर तृप्ति बोली,,,)

चलो कोई बात नहीं मैं जैसी हूं वैसी ही ठीक हूं अब मम्मी जल्दी से चाय बना दो,,,

को देखो महारानी के नखरे चालू हो गए,,,,।

(इतना कहकर सुगंधा रसोई घर में चली गई और पीछे-पीछे अंकित भी अकेला लेकर अपनी मां के पीछे चला गया और वही किचन फ्लोर पर रख दिया दोनों में और कुछ बात हो पाती से पहले तृप्ति भी वहीं आ गई और बोली,,,)

अच्छा लाओ मैं ही बना देती हुं,,,

(और तृप्ति चाय बनाने लगी तृप्ति की मौजूदगी में दोनों मां बेटे किसी भी तरह से दो अर्थ वाले संवाद नहीं कर पा रहे थे जिससे दोनों के अरमानों पर पानी फिर गया था,,,,।
 
रात को अपने कमरे में सुगंधा अपने बेटे के द्वारा खरीद कर लाए गए मोटे तगड़े केले को लेकर गई,, और बिस्तर पर लेट गई और अपने मन में कल्पना करने लगी अपने बेटे के लंड को लेकर उसके हाथ में लिया हुआ अकेला उसे अपने बेटे का लंड लग रहा था क्योंकि वह केला वाकई में बेहद दमदार और मोटा और तगड़ा और काफी लंबा था ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके बेटे ने केला नहीं बल्कि अपना लंड ही उसे खाने के लिए दे दिया हो वह उस केले को अपने हाथ में लेकर अपने अंगूठे और उंगली का छल्ला बनाकर उसके अंदर केले को धीरे-धीरे इस तरह से प्रवेश करने लगी मानव की जैसे वह उसकी उंगलियों के द्वारा बनाया गया छल्ला नहीं बल्कि उसकी खुद की गुलाबी बुर हो और वह केला उसके बेटे का लंड हो जिसमें वह धीरे-धीरे प्रवेश कर रहा हो,,,, सुगंधा को मन में कल्पना करते हुए बहुत मजा आ रहा था,,,।

सुगंधा केले से मस्त होती हुई

अपने मन में कल्पना करते हैं वह धीरे-धीरे अपने वस्त्र उतारने लगी और देखते ही देखते वह बिस्तर पर पूरी तरह से नंगी हो गई उसके अरमान पूरी तरह से मचल उठे थे,,,, वह अपने दोनों टांगों को फैला कर उसके लिए को इसकी मोटाई को धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रही थी पर ऐसा महसूस कर रही थी कि जैसे यह क्रिया उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर अपने लंड को हाथ में पकड़ कर अपने गरम सुपाड़े को उसके गुलाबी पत्तियों पर रगड़ रहा हो,,, यह कल्पना बेहद मदहोश कर देने वाली थी वह पूरी तरह से उत्तेजना के सागर में गोते लगाने लगी वह मदहोश होने लगी,,, उसकी कल्पनाओ के आज कुछ ज्यादा ही पर लग गए थे,,, वह केले को धीरे-धीरे अपनी बुर पर थपथपा रही थी,,, वह पागल हो जा रही थी और कल्पना कर रही थी कि जैसे उसका बेटा अपने लंड को हाथ में लेकर उसकी बुर पर उसकी चोट मार रहा हो ,,जिससे उसे दर्द तो हो रहा था लेकिन मजा भी बहुत आ रहा था।

सुगंधा से बिल्कुल भी रहा नहीं जा रहा था अपनी दोनों टांगों को खोल दी और फिर धीरे-धीरे उसकेले को जो कि उसके मदन रस से पूरी तरह से गिला हो चुका था धीरे-धीरे अपनी गुलाबी पत्तियों के बीच प्रवेश कराना शुरू कर दी,,, उसे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि किला का साइज बहुत ज्यादा ही मोटा था और अपने मन में सोच रही थी कि काश ऐसा मोटा तगड़ा लंड मिल जाता तो उसकी तो जिंदगी बन जाती,,, और वह ऐसा सोचते हुए धीरे-धीरे केले को आधा से ज्यादा अपनी बुर में प्रवेश करा दी और उसे अंदर बाहर करने लगी और अपनी आंखों को बंद करके महसूस करने लगी की जैसे उसका बेटा उसकी दोनों टांगों के बीच जगह बनाकर उसकी बुर में अपना लंड डालकर उसे चोदना शुरू कर दिया है,,, उसे बहुत मजा आ रहा था वह मदहोशी में अपने सर को दाएं बाएं पाठक रही थी और अपने हाथ को जोरो से चला रही थी जैसे-जैसे अकेला अंदर बाहर हो रहा था वैसे-वैसे उसकी रगड़ का एहसास उसे पागल बना रहा था,,,।

उसकी आंखें पूरी तरह से बंधी थी वह कल्पनाओं की दुनिया में पूरी तरह से खो चुकी थी अपने बिस्तर पर संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में वह कामांध हो चुकी थी,,, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस अपनी कल्पनाओं में वह पूरी तरह से खो चुकी थी तेज चलते हैं हाथों के साथ-साथ उसकी कल्पनाओं का घोड़ा बड़ी तेजी से दौड़ रहा था वह अपने मन में यही सोच रही थी कि उसका बेटा उसे अपनी बाहों में लेकर जोर-जोर से अपनी कमर हिला कर धक्के पर धक्का लगा रहा है,,,, पल भर में उसकी सांसे बड़ी तेजी से चलने उखड़ने लगी वह पागलों की तरह अपने सर को इधर-उधर पटकने लगी पसीने से तरबतर उसका गोरा नंगा बदन पूरी तरह से ट्यूबलाइट की रोशनी में चमक रहा था वह चरम सुख के बेहद करीब पहुंच चुकी थी और देखते ही देखते उसके मुंह से हल्की सी चीज निकाली और उसकी कमर ऊपर उठ गई वह अपनी भारी भरकम गांड को पल भर के लिए ऊपर उठाकर झड़ना शुरू कर दी,,, और देखते ही देखते हैं उसकी बुर से गरम लावा पिचकारी का रूप धारण करके निकलना शुरू कर दिया,,,,।

वासना का तूफान शांत हो चुका था,,, वह अपनी बुर में से केला बाहर निकाली जो की पूरी तरह से उसके मदन रस में डूब चुका था और वह धीरे से उसे टेबल पर रख दी उसकी सांसे अभी भी ऊपर नीचे हो रही थी और थोड़ी ही देर बाद वह नींद की आगोश में चली गई,,,।

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अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े और लंबे केले से रात को अपनी जवानी की प्यास बूझाकर सुगंधा उस केले को वहीं टेबल पर रखकर गहरी नींद में सो गई

गई ,,, रात का अनुभव बेहद उत्तेजनात्मक था सुगंधा अपने बेटे के द्वारा ले गए मोटे तगड़े केले को अपने बेटे का लंड समझकर उसे अपनी गुलाबी छेद में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझा ली थी लेकिन यह प्यास चाय किला कितना भी मोटा और लंबा क्यों ना हो पहले से बिल्कुल भी नहीं पूछने वाली हां कुछ पल के लिए यह गर्मी शांत जरूर हो जाती है लेकिन यह जो जवान की गर्मी है यह जो जवान की प्यास है वह केवल एक मर्द के मोटे तगड़े लंड से ही बुझती है,,,।

सुबह जब नींद खुली तो उसे उठने में 15 मिनट की देरी हो चुकी थी दीवार पर टंगी घड़ी में समय देखते ही वह तुरंत उठकर बैठ गई और बिस्तर से खड़ी हो गई,,, वह अभी भी हल्की-हल्की नींद में थी पूरी तरह से नींद से बाहर नहीं आई थी और वह चलकर दरवाजे तक पहुंच गई और दरवाजे की कड़ी पकड़ कर उसे खोलने वाली थी कि तभी उसे अपने दोनों टांगों के बीच बुर के ऊपर खुजली महसूस होने लगी और वह तुरंत अपना हाथ अपनी बुर पर ले गई और उसे खुजाने लगी,,, और उसे तुरंत एहसास हुआ कि उसने तो कुछ पहनी नहीं है और तुरंत वह एकदम से नींद से बाहर आगे और अपने आप को ऊपर से नीचे की तरफ देखने लगी तो उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में थी,,,, उसके बदन पर कपड़े का रेसा तक नहीं था,, तभी उसे याद आया कि रात को वह अपने सारे कपड़े उतार कर केले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी शांत की थी और बिना कपड़े पहने ही सो गई थी,,, ।

अपनी स्थिति का अहसास होते ही तुरंत कड़ी पर से अपने हाथ को हटा ली,,, और सहज रूप से उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी,, लेकिन इस बात से वह काफी घबरा गई थी कि अगर एन मौके पर बुर पर खुजली ना आई होती तो वह कमरा का दरवाजा खोलकर नंगी ही कमरे से बाहर निकल गई होती और अगर ऐसे में तृप्ति देख लेती तो क्या होता,,, बाप रे वह मेरे बारे में क्या सोचती,,,, अपने मन में सुगंधा इस बारे में सोच रही थी लेकिन उसे अपने बेटे के द्वारा देखे जाने पर बिल्कुल भी अफसोस ना होता बल्कि वह अंदर ही अंदर बहुत खुश होती है अपने बेटे को अपनी नंगी जवानी दिखाकर और वह भी सुबह-सुबह,,, अपने मन में यह सब सोच कर वह तुरंत बिस्तर के करीब आई और अपने कपड़ों को जोकि नीचे फर्श पर फेक हुए थे उन्हें उठाकर पहनने लगी और थोड़ी ही देर में अपने कमरे से निकल कर बाहर आ गई,,,।

दूसरी तरफ अपनी मां के कमरे में जाने का अंकित को उसे दिन के बाद कभी मौका नहीं मिला था क्योंकि जब वह उड़ जाता था तब उसकी मां उससे पहले ही उठकर घर का काम करती रहती थी या अंदर से कमरा बंद रहता था,,, क्योंकि अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखने की उसकी इच्छा बेहद प्रबल हो गई थी पहली बार जब अपनी मां को अस्त-व्यस्त हालत में देखा था तो उसकी कचोरी जैसी फुली हुई बुर को स्पर्श करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं पाया था और अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए अपनी मां की बुर पर हल्के से अपनी उंगली रख दिया था जो कि इतनी मात्रा से ही उसकी हालत पूरी तरह से खराब हो गई थी,,, उसे अनुभव के बारे में जब भी कभी अंकित सोचता था तो उसका लंड पूरी तरह से टनटना कर खड़ा हो जाता था ,,,।

सुगंधा कमरे से बाहर आते ही झाड़ू लेकर घर की सफाई करना शुरू कर दी थी और अंकित भी उठ गया था,,, तृप्ति भी गहरी नींद से जाग चुकी थी लेकिन जागते ही वह संदीप के बारे में सोचने लगी संदीप के दिए प्रेम पत्र के बारे में सोचने लगी और संदीप के साथ बगीचे में जो कुछ हुआ था उन सब के बारे में सोचने लगी,,, जिंदगी का पहला चुंबन बेहद रसीला और उन्माद भरा था,,, वह उसी चुंबन के बारे में सोच रही थी,,, और उसे चुंबन के बारे में सोचकर उत्तेजित हो रही थी पहली मर्तबा संदीप किस तरह की हरकत पर वह पूरी तरह से बिगड़ गई थी और संदीप से नाराज हो गई थी,,,, क्योंकि वह कभी सोची नहीं थी कि संदीप इस तरह से कोई हरकत करेगा और वह भी सड़क पर,,,,।

लेकिन कल जो कुछ भी हुआ था उसमें उसकी खुद की सहमति थी,,, से संदीप की तरफ ऐसे ही किसी हरकत की उम्मीद थी,,, संदीप ने अपनी हरकत की वजह से उसके बदन में हलचल मचा दिया था क्योंकि होठों का रस पीते हुए उसके हाथ उसने अपनी चूचियों पर महसूस कि थी,,, लेकिन उसे रोकने के बजाय उसकी हरकतों का वह खुद आनंद लेने लगी थी पहली मर्तबा उसे अच्छा तो लगा था लेकिन संदीप की हरकत से वह पूरी तरह से क्रोधित हो चुकी थी इसलिए उसे समय मिलने वाला मजा भी उसे जहर लग रहा था,,, लेकिन कल की बात कुछ और थी होठों के साथ-साथ संदीप के द्वारा स्तन मर्दन होते ही वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी और पिघलने लगी थी उसे अपनी दोनों टांगों के बीच थरथराहट से महसूस होने लगी थी,,, और संदीप उसे अपनी हरकत से पूरी तरह से मत किए हुए था।

लेकिन बगीचे में संदीप की हरकत कुछ और ज्यादा आगे बढ़ती इससे पहले ही कुछ अवारा लड़के वहां आ गए थे और वह दोनों उठकर वहां से जाने लगे थे लेकिन तभी उन्हें लड़कों में से एक ने जो बात कहा था वह अभी भी तृप्ति के दिलों दिमाग पर छप सा गया था,,, चुदवाने आई थी क्या,,,? उस लड़के के द्वारा कहे गए इस शब्द को सुनते ही उसके बदन में हलचल सी मचने लगी थी वह पूरी तरह से मदहोश होने लगी थी,,, वह अपने मन में सोचने लगी की लड़की कितने बेशर्म होते हैं कुछ भी कह देते हैं ,, लेकिन फिर वह अपने मन में सोचने लगी कि अगर वाकई में उसे लड़के की कही बात सच होती तो कैसा होता,,, अगर वह सच में बगीचे के अंदर संदीप से चुदवाने गई होती तो कैसा महसूस करती,,,।

इस बारे में सोचते हैं उसके बदन में गनगनाहट होने लगी,,, पल भर में वह कल्पना करने लगी,,, कि अगर वह सच में चुदवाने ही गई होती तो क्या होता कैसे होता,,,, वह अपने मन में कल्पना कर रही थी कि वह संदीप को लेकर बगीचे के सबसे कोने वाली जगह पर जाती जहां पर ढेर सारी जंगली झाड़ियां होगी हुई थी जहां पर लोगों का आना-जाना बिलकुल नहीं होता था,,, संदीप के साथ वह उसे जगह पर पहुंचती तो वहां पर पहुंचते ही दोनों एक दूसरे को चुंबन करने लगते हैं एक दूसरे के होठों को अपने मुंह में लेकर उसका रस चूसने लगते हैं और इसी बीच संदीप के हाथ उसकी चूचियों पर आ जाते कुर्ती के ऊपर से ही वह जोर-जोर से उसकी चुचियों को दबाता,,,जिसका आनंद लेते हुए वह मदहोश हो जाती पागल हो जाती और पागलों की तरह उसके होठों को चुस्ती,,,,।

कुर्सी बीच संदीप का हाथ उसकी चूचियों से नीचे की तरफ आते हुए उसकी कमर पर आ जाता है और वह दोनों हाथों से उसकी कमर को कस के दबोच देता जिससे उसके बदन में सनसनी से दौड़ने लगती और फिर सलवार के ऊपर से ही संदीप उसकी बुर को जोर-जोर से मसलना शुरू कर देता ,, और संदीप की हरकत पर वह पूरी तरह से मस्त हो जाती मदहोश हो जाती एकदम चुदवासी हो जाती,,,और चुदासपन के चलते उसके खुद के हाथ अपने आप ही संदीप के लंड पर चला जाता, और वह पेंट के ऊपर से ही उसके लंड को जोर जोर से दबा दी उसे खेलती और फिर ना तो संदीप बर्दाश्त कर पाता और ना ही वह खुद इसके बाद संदीप उसे पेड़ की तरफ घूमर पेड़ पकड़ने के लिए बोलना और फिर अपने हाथों से उसकी सलवार की डोरी खोलकर उसकी सलवार को पेटी सहित खींचकर उसके घुटनों तक ले आता और फिर उसकी नंगी गांड को दोनों हाथों से पकड़ कर सहलाता,,,, और उसके इस क्रियाकलाप को वह खुद नजर पीछे की तरफ घूम कर देखती,,,।

और फिर दिन दुनिया से बेखबर वह अपनी गांड को थोड़ा बाहर निकाल कर संदीप के आगे परोस देती और संदीप अपने लंड को हाथ में लेकर धीरे-धीरे उसको गुलाबी छेंद में अपना लंड डालता और फिर उसे चोदना शुरू कर देता,,, यह सब सोचते हुए कल्पना करते हुए वास्तव में तृप्ति की सांस ऊपर नीचे हो रही थी वह पूरी तरह से मदहोश हुए जा रही थी,,, सच में आंखों को बंद करके हुआ ऐसा ही महसूस कर रही थी कि वह इस समय बगीचे में है और अपनी सलवार को घुटनों तक नीचे करके अपनी नंगी गांड संदीप के सामने परोस कर उससे चुदाई का मजा लूट रही है लेकिन तभी एकदम से वह चौंक गई जब दरवाजे पर दस्तक होने लगी,,,।

तृप्ति,,,, अरे अभी तक सो रही है देर नहीं हो रही है कॉलेज जाना है,,,,।

(इतना सुनते ही उसके होश उड़ गए दीवार पर टंगे जब घड़ी में दिखी तो वह 10 मिनट लेट हो चुकी थी कल्पना करने में 10 मिनट गुजर चुके थे लेकिन 10 मिनट में वह पूरी तरह से मदहोश हो चुकी थी,, )

आई मम्मी,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह जल्दी से बिस्तर से उठकर खड़ी हो गई और अपने कमरे से बाहर निकाल कर जल्दी-जल्दी तैयार होने लगी,,,, सुगंधा नाश्ता तैयार कर दी थी और तृप्ति जल्दी-जल्दी नाश्ता करके घर से निकल गई थी क्योंकि अब उसे संदीप से मिलने की उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन अंकित अभी भी घर में ही था क्योंकि उसके मोजे नहीं मिल रहे थे वह जूते को टेबल के नीचे रखकर अपने कमरे में मौजा ढूंढ रहा था,,, लेकिन जब उसे बहुत कोशिश करने के बावजूद भी नहीं मिला तो वह रसोई घर में गया और अपनी मां से बोला,,,।

मम्मी मेरे मोजे कहां रख दी हो मिल नहीं रहा है,,,

अरे वही तो रखी थी तेरे कमरे में,,,,(कढ़ाई में चमची चलाते हुए बोली,,)

मैंने अपना पूरा कमरा ढूंढ मारा हूं लेकिन कहीं मिल नहीं रहा है,,,, जल्दी बताओ मुझे देर हो रही है,,,,।

अरे कहां रख दी मुझे खुद याद नहीं आ रहा है,,,, अरे हां याद आया मेरे कमरे में टेबल के ऊपर ही रखा हुआ है कल रात को ही अपने कमरे में लेकर चली गई थी,,,।

शुक्र है तुम्हें याद तो आया,,,,(और इतना कहने के साथ ही अंकित अपनी मां के कमरे में चला गया और टेबल पर देखा तो वाकई में उसके मोजे रखे हुए थे,,,,)

यह रखा हुआ है और मैं ईसे कब से अपने कमरे में ढूंढ रहा हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही अंकित टेबल की तरफ आगे पड़ा और अपने मोजे को उठा लिया लेकिन तभी उसकी नजर टेबल पर रखे हुए मोटे तगड़े किले पर गई और केले को देखते ही उसकी आंखों के सामने उसकी मां की कचोरी जैसी फुली हुई बुर नजर आने लगी जिसे वह अपनी उंगली से छूटकर उसकी गर्मी को महसूस कर चुका था उसने तुरंत टेबल पर पड़ा कीड़ा उठा लिया और उसे गोल-गोल घुमा कर देखने लगा और कुछ देर के लिए हुआ उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपनी उंगलियों का छल्ला बना हुआ देखने लगा जिसमें से उसका केलआ गुजर रहा था और वह अपनी मन में सोचने लगा कि अगर इतना मोटा लंड मम्मी की बुर में जाएगा तो क्या होगा,,, अपने मन में ऐसा कहते हुए वह तुरंत अपने दोनों टांगों के पीछे देखने लगा जहां पर थोड़ा-थोड़ा उठाव हो रहा था और वह अपने मन में सोचने लगा,,,, उसका तो अकेले से भी ज्यादा मोटा और लंबा है जब उसका लंड उसकी मां की बुर में जाएगा तब क्या होगा,,, अनायास ही उसके मन में एक ख्याल आया था और इस ख्याल से वह पूरी तरह से उत्तेजित हो गया था,,,, तभी उसे केले पर कुछ चिपचिपा सा लगा हुआ महसूस होने लगा,,, लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या लगा है और वह तुरंत केले को छिलना शुरू कर दिया,,,।

दूसरी तरफ,,, सुगंधा अपने मन में सोचने लगी कि पता नहीं अंकित को मिला होगा कि नहीं और वह रसोई घर से निकल कर अपने कमरे की तरफ जाने लगी और जैसे ही दरवाजे पर पहुंची तो अपने बेटे को केला खाता हुआ देखकर उसके एकदम से होश उड गए,,,, पल भर में उसे सब कुछ याद आने लगा रात को जो कुछ भी हुआ था उसके बारे में सोच कर उसके होश उड़ गए थे क्योंकि वह अकेले को अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की गर्मी को शांत करके केले को उसी स्थिति में टेबल पर रख दी थी और इस समय उसका बेटा उस केले को खा रहा था,,, पल भर में ही सुगंधा के माथे पर पसीने की बूंदे उपसने लगी,,, उसे यह सोचकर बेहद अजीब लग रहा था कि जिस केले को उसने अपनी बुर में डाली थी उसी केले को उसका बेटा खा रहा था,,,।

वह एकदम से कमरे में दाखिल होते हुए बोली,,,।

यह क्या कर रहा है अंकित इस केले को मैं अपने लिए रखी थी,,,।

अरे मम्मी दूसरा केला है खा लेना ना,,

नहीं मुझे यही खाना था तभी तो मैं टेबल पर लाकर रखी थी,,,

लगता है केले की मोटाई और लंबाई देखकर रखी थी,,,,(इस बार अंकित अपनी मां को नीचे से ऊपर की तरफ देखते हुए बोला था सुगंध तुरंत अपने बेटे के खाने के मतलब को समझ गई थी और अंदर ही अंदर अपने बेटे की बात सुनकर सिहर सी गई थी,,, और वह बोली)

नहीं मुझे इसी तरह का केला पसंद है इसीलिए तो लेकर आई थी,,,।

अरे मम्मी मेरे पास ऐसा ही केला है,,, मेरा मतलब है कि जब कहो गई तब खरीद कर ला दूंगा,,,(अचानक ही अंकित के मुंह से अपने मन की बात निकल गई थी जिसे सुनकर सुगंधा के तन बदन में आग लग गई थी और वह अपने मन में बोली तेरा ही केला तो मैं चाहती हूं नहीं तो इस्केले से इस जवानी की प्यास कहां बुझने वाली है,,, और अंकित पूरा केला खा लेने के बाद बोला,,,)

शाम को दूसरा खरीद कर ला दूंगा इससे भी ज्यादा लंबा और मोटा एक में ही खुश हो जाओगी,,,(अंकित अपनी मां से दूसरे शब्दों में बात कर रहा था और उसकी मां उसकी कहीं बात को समझ भी रही थी,,,, अंकित अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

लेकिन मम्मी केला एकदम चिपचिपा था,,,।

(अपने बेटे की इस बात से सुगंधा एकदम से चौक गई और उसे याद आया कि केले को वह इस हालत में टेबल पर रख दी थी जिस हालत में उसने अपनी बुर से बाहर निकाली थी उसे पर उसकी बुर का मदन रस लगा हुआ था या यू। कह लों की पूरा केला उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा ज्यादा कुछ कह नहीं पाई बस इतना ही बोली,,,।)

धोकर खाना चाहिए था ना पता नहीं कहां-कहां से निकल कर आता है,,,।

कोई बात नहीं मुझे तो ऐसा ही बहुत स्वादिष्ट लग रहा था,,,,।

(इतना कहकर अंकित अपनी मां के कमरे से बाहर निकल गया और तैयार होकर स्कूल के लिए निकल गया सुगंध उसे देखते ही रह गई वह हमारे शर्म के पानी पानी हो रही थी क्योंकि उसके बेटे ने उसकी बुर से निकला हुआ केला पूरी तरह से गटक लिया था,,,।)

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अंकित स्कूल के लिए जा चुका था,,,, लेकिन अपने पीछे अपनी मां को पूरी तरह से मदहोश कर चुका था अंकित नहीं जानता था कि उसने कौन सा केला खाया है उसे तो एहसास तक नहीं था कि उसे केले को उसकी मां ने किस उपयोग में लिया था वह पूरी तरह से अनजान था,,,,, वह तो उस केले को सामान्य केला समझ कर ही जल्दी-जल्दी छीलकर खा गया था,,,। लेकिन वह केला सामान्य बिल्कुल भी नहीं था,, क्योंकि उसके लिए नहीं एक बेहद खूबसूरत औरत की गुलाबी छेद की गुलाबी सुरंग के अंदरूनी भाग तक चक्कर लगा लिया था और एक खूबसूरत औरत के गुलाबी छेद की परिक्रमा कर लेने के बाद वह केला बिल्कुल असामान्य हो चुका था खास करके ऐसे लड़कों के लिए जो जवानी की दहलीज पर अभी-अभी कदम रखे हैं।

अगर कोई ऐसा व्यक्ति उसकेले के बारे में जनता की उसकेले को सुगंध जैसी खूबसूरत औरत अपनी बुर में डालकर अपनी जवानी की प्यास बुझाई है तो शायद उसके लिए को लेकर पहले उसके छिलके को छिलका नहीं बल्कि सुगंधा की खूबसूरत बुर के मदन रस का स्वाद लेने के लिए,,, केले को पूरी तरह से जीभ से चाटता उसके मदन रस का खारा सवाद लेता,,, और जी भर कर उसका स्वाद लेता उसके बाद कहीं जाकर उसकेले को खाता,,,, और शायद इस बात को अगर अंकित जानता तो वह भी यही करता लेकिन वह जानता नहीं था इसलिए बेझिझक उस केले को छीलकर खा गया था,,, हालांकि उस केले को खाते हुए सुगंधा ने देख ली थी लेकिन जब उसकी नजर पड़ी तब तक उसका बेटा आधे से ज्यादा केला खा चुका था,, उसे रोकने का बिल्कुल भी फायदा नहीं था और क्या कह कर रुकते की यह केला मत था लेकिन क्यों मत खा यह बता सकने कि उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,।

अंकित के स्कूल जाते ही,,, सुगंधा सोच में पड़ गई थी क्योंकि वह कभी सोचा नहीं थी कि अपनी ही बुरे में डाला हुआ केला वह अपने बेटे को खिला देगी,,, लेकिन वह जानबूझकर तो मिला ही नहीं थी उसका बेटा खुद ही अपने हाथ से लेकर खा गया था लेकिन फिर भी इस बात का अफसोस सुगंधा को हो रहा था,, लेकिन इस बात को लेकर उसके बदन में अजीब सी हलचल भी थी,,,। वह मदहोश हो रही थी,, क्योंकि उसके लिए भी यह पल बेहद अद्भुत और अतुलनीय था क्योंकि इस बारे में उसने कभी सोची भी नहीं थी,,, वह इस बात को सोच सोच कर हैरान थी कि वह केला पूरी तरह से उसकी बुर की गहराई नाप चुका था पूरी तरह से उसके मदन रस में डूबा हुआ था,,,, सुगंधा उसे केले को फेंक देना चाहती थी लेकिन उसे टेबल पर रखकर भूल गई थी उसे नहीं मालूम था कि उसका बेटा उसके कमरे में आ जाएगा और उसके लिए को खा जाएगा वरना वह सुबह ही उसे कूड़ेदान में फेंक देती,,,,।

सुगंधा इस बारे में सोच रही थी तभी उसे कह रहा है कि उसका बेटा इस बात को बोला था कि केला बहुत चिपचिपा है,, केले को धोई नहीं हो क्या,,,, इस बारे में सोचकर उसकी सांसे ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि वह जिसके लिए कोई चिपचिपा बोल रहा था उसकी चिपचिपाहट उसके मदन रस की वजह से थी,,, वह हैरान इस बात से थी कि उसका बेटा उसकी बुर से निकले हुए मदन रस को अपने हाथों से स्पर्श किया था भले ही अनजाने मे हीं,,, यह सोचकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,,,, उसकी दोनों टांगों के बीच कंपन महसूस होने लगा लेकिन उसका भी स्कूल जाने का समय हो चुका था इसलिए वह भी जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल चली गई,,,।

स्कूल में रिसेश के समय सुगंध और नूपुर लंच बॉक्स खोलकर खाना खा रहे थे,,,, पहले की अपेक्षा नूपुर के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव कुछ ज्यादा ही नजर आ रहे थे वह तरो ताजा और खीली हुई नजर आ रही थी,,, उसके चेहरे की ताजगी के कारण को सुगंधा अच्छी तरह से जानती थी,,,, दोनों के बीच खाना खाते समय सामान्य रूप से चुपकी छाई हुई थी,, लेकिन इस चुपकी को तोड़ते हुए नूपुर बोली,,,।

अंकित बडा ही प्यारा बच्चा है,, तुम्हें मालूम है वह मेरे घर आया था,,,।

हां मुझे बता रहा था राहुल के साथ क्रिकेट खेलने गया था,,,।

हां सही कह रही हो बहुत ही जल्दी दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई दोनों ऐसे साथ-साथ बातें कर रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे दोनों के बीच पहले से ही गहरी दोस्ती हो,,,।

मुझे भी अच्छा लगा नूपुर कि मेरा बेटा तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती कर रहा है उसकी संगत में रहेगा तो कुछ अच्छा ही सीखेगा,,,,(सुगंधा जानबूझकर उसकी संगत में अच्छा सीखने वाली बात कर रही थी क्योंकि सुगंधा अच्छी तरह से जानती अच्छी नूपुर और उसके बेटे के बीच किस तरह था रिश्ता बना हुआ है और सुगंधा भी यही चाहती थी कि जिस तरह से नूपुर और उसके बेटे के बीच रिश्ता बना हुआ है इस तरह का रिश्ता उसके और उसके बेटे के बीच भी बन जाए। ,)

हां जरूर क्यों नहीं मेरा बेटा भी बहुत समझदार है,,, वक्त से पहले ही समझदारी और जिम्मेदारी के चलते बड़ा हो गया है,,,,।

(नूपुर की बात सुनकर सुगंध अपने मन में ही बोली राहुल बड़ा नहीं हुआ है बल्कि उसका लंड बड़ा हो गया है,,, तभी तो तेरी प्यास बुझा रहा है,,, इस बात को सुगंधा नूपुर से खुले शब्दों में बोल देना चाहती थी लेकिन ऐसा कहने की उसकी हिम्मत नहीं हुई लेकिन उसकी बात सुनकर खाना खाते हुए बोली।)

अक्सर घर का बड़ा लड़का जिम्मेदार हो ही जाता है अपने परिवार की हालत को देखकर,,, तुम्हारी परेशानियों को देखकर राहुल सही समय पर बड़ा हो गया,,,,।

(सुगंधा की बात सुनकर नूपुर प्रसन्न हो रही थी लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी की सुगंधा दूसरे शब्दों में उससे बात कर रही थी,,,,, अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुगंधा बोली,,,)

पता नहीं कब अंकीत बड़ा होगा,,,,

हो जाएगा,,, सुगंधा,,, बच्चे संगत में ही सीखते हैं,,,

यह तो तुम सच कह रही हो नुपुर इसीलिए तो मैंने अंकीत को तुम्हारे बेटे के साथ दोस्ती बढ़ाने के लिए बोली हुं,,,,।

वह भी सब सीख जाएगा समझदार है तुम्हारा बेटा,,,,(पानी पीते हुए नूपुर बोली,,,, थोड़ी ही देर में दोनों खाना खाकर लंच बॉक्स रख लिए,,,,, नूपुर आगे आगे चल रही थी सुगंध पीछे-पीछे आगे चल रही नूपुर की मटकती हुई गांड देखकर सुगंधा अपने मन में सोचने लगी,,, वाकई में नूपुर पूरी तरह से चोदने लायक है,,,

बड़ी-बड़ी गांड बड़ी-बड़ी चूची एक मर्द को और क्या चाहिए यही देखकर या यह कह लो यह सब दिखाकर नूपुर अपने बेटे को पूरी तरह से अपनी जवानी के जाल में फंसा ली और फिर उसके साथ जवानी का सुख भोग रही है,,, लेकिन यह सब तो उसके पास भी है उससे बेहतर है फिर भी अंकित अभी तक राहुल नहीं बन पाया यह ऐसा भी हो सकता है कि खुद वही अभी तक नूपुर नहीं बन पाई,,,,,,,, उसके मन में तो आ रहा था कि इसी समय वह नूपुर से पूछ ले कि वह कैसे अपने बेटे को चोदने के लिए मनाई ताकि वह भी अपने बेटे को इस तरकीब से बना सके,,, लेकिन ऐसा पूछने की उसमें बिल्कुल भी हिम्मत नहीं थी,,,,।)

दूसरी तरफ कॉलेज से छूटने के बाद,,, तृप्ति संदीप के साथ चहल कदमी करते हुए चल रही थी,,, अभी कल ही वह संदीप के साथ चुंबन का अद्भुत रोमांच का अनुभव कर चुकी थी,,,,, इसलिए संदीप से आंख मिलाने में उसे शर्म महसूस हो रही थी,,, लेकिन संदीप मन ही मन बहुत खुश हो रहा था क्योंकि उसकी हरकत का तृप्ति ने बिल्कुल भी विरोध नहीं की थी बल्कि आनंद ने रही थी अपनी मंजिल तक पहुंचने की यह उसकी पहली सीढ़ी थी और उसकी मंजिल थी तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंचना,,, और कल हुई हरकत को देखकर वह समझ गया था कि बहुत ही जल्द तुम्हें तृप्ति की दोनों टांगों के बीच पहुंच जाएगा,,, दोनों टहलते टहलते बगीचे के पास आ गए तो संदीप बोला,,,।

चलो बगीचे में चलते हैं,,,

नहीं नहीं बगीचे में मैं नहीं जाऊंगी,,,

क्यों क्या हुआ कल तो तुम खुद बगीचे में लेकर गई थी,,,

हमें जानती हूं कल मैं तुम्हें खुद बगीचे में लेकर गई थी लेकिन देखे थे ना क्या हुआ था वह आवारा लड़के किस तरह से बातें कर रहे थे,,,

किस तरह से बातें कर रहे थे हम लोग तो उनके वहां आने से पहले ही उठकर जाने लगे थे,,,

हां तो जाते हुए ही उनमें से एक लड़का क्या बोला था कुछ याद है,,,(तृप्ति संदीप को याद दिलाते हुए बोल रही थी)

कहां,,, मुझे तो नहीं आते कि उनमें से किसी ने कुछ कहा था,,,

अरे पागल हो गए हो क्या उनमें से एक लड़के ने क्या बोला था नहीं मालूम,,,

तृप्ति सच में मुझे नहीं मालूम तुम ही बता दो,,,

नहीं मैं नहीं बता सकती मुझे शर्म आती है,,,,(शरमाते हुए तृप्ति बोली)

इसमें शर्माने जैसी कौन सी बात है अब मुझसे कैसी शर्म,,,

फिर भी,,, मुझे तो सोच कर ही शर्म आ रही है,,,(तृप्ति के चेहरे पर शर्म की लालिमा साफ नजर आ रही थी लेकिन वह कल वाली बात को बताना चाहती थी,,, लेकिन शर्म के मारे उसका बुरा हाल था,,,)

तब जाने दो नहीं बताना है तो चलो आगे चलते हैं,,,,।

(संदीप बहुत चला था वह जानता था कि कल उन आवारा लड़कों में किसी एक ने गंदे शब्दों का प्रयोग किया था और वह जानता था कि वह लड़के ने क्या-क्या बोला था लेकिन वह जानबूझकर अनजान बन रहा था और तृप्ति के मुंह से सुनना चाहता था,,, इसलिए वह चला कि दिखाकर आगे बढ़ने के लिए बोल रहा था,,, संदीप की बात सुनकर तृप्ति बोली,,,)

तुम तो सच में बहुत भुलक्कड़ हो,,,।

तृप्ति में माफी चाहता हूं मैं सच में भूल गया लेकिन तुम हो की बता भी नहीं रही हो,,,

बताना तो चाहती हूं लेकिन शर्म के मारे मेरा बुरा हाल है,,,।

क्या तृप्ति कल के बाद से तुम अभी भी मुझसे शर्म कर रही हो,,, कल याद है ना कितना गरमा-गरम चुम्मा लिया था तुम्हारा,,,।

(इस बात से तृप्ति एकदम से शर्मा गई,,,,,,, धीरे-धीरे बाद दोनों बड़े से पेड़ के नीचे पहुंच गए थे जहां पर कोई नहीं था इधर-उधर देखने के बाद तृप्ति बोली,,,)

कल उसे आवारा लड़कों में एक नहीं क्या कहा था,,,

अरे वही तो मैं भी पूछ रहा हूं,,,,

कैसे कहूं,,, अच्छा कह देती हूं,,,, जब हम वहां से उठकर जाने लगे तभी उनमें से एक लड़का बोला लगता है ,,चुद,,,,,चुद,,,,चुदवाने आई थी,,,(एकदम से हकलाहट और घबराहट भरे स्वर में बोली,,, पहली बार इस तरह के शब्द बोलकर उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी थी,,, और वह शर्म के मारे अपनी नजरों को नीचे झुका ली थी तृप्ति के मुंह से चुदवाने वाले शब्द सुनकर संदीप का लंड हरकत में आ गया था,,,।)

अच्छा यह बात तो इसमें गलत ही किया था आज नहीं तो कल हम दोनों जाने ही वाले हैं,,,।

(संदीप की आवाज सुनकर तृप्ति एकदम से गुस्से में उसे आंख दिखाने लगी तो घबराने का नाटक करते हुए संदीप बोला)

सॉरी मैं तो मजाक कर रहा था,,, चलो कहीं घूमने चलते हैं,,,(संदीप एकदम से बात बदलते हुए बोला)

कहां चले,,,, अभी तो मेरे पास समय नहीं है घर जाना है,,,,

अरे आज की बात नहीं कर रहा हूं तीन दिन बाद अपने मैडम का जन्मदिन है और उन्होंने हम सबको बुलाया ही है।

लेकिन मेरी मम्मी नहीं जाने देगी,,,

अरे उन्हें समझा देना ना,,,, कह देना मैडम का जन्मदिन है सबको बुलाई है उनकी क्लास के जितने बच्चे हैं सबको,,,

ठीक है,,, लेकिन चलेंगे कैसे,,,?

मैं हूं ना तुम बिल्कुल भी फिकर मत करना,,,

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही दोनों मुस्कुराते हुए अपने-अपने रास्ते चल दिए)

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सुगंधा का परिवार पूरी तरह से बदलाव के राह पर चल दिया था,,, एक तरफ मां बेटे थे जो एक दूसरे के आकर्षण में धीरे-धीरे एक दूसरे के सामने खुलते चले जा रहे थे और दूसरी तरफ तृप्ति थी जो अपने ही कॉलेज के सहपाठी के साथ,,, मर्यादा की सीमा लांघने के लिए तड़प रही थी,,, एक तरह से सुगंधा का पूरा परिवार जवानी के नशे में चूम रहा था तीनों की अपनी अपनी ज़रूरतें थी जो वह तीनों पूरा करना चाहते थे,,,, एक तरफ सुगंधा थी जो पति के देहांत के बाद अपने परिवार के पालन पोषण में एकाकी जीवन की रही थी लेकिन कुछ महीनो से उसके अंदर बदलाव आना शुरू हो गया था जवानी की तड़प बढ़ती जा रही थी अपने बदन की जरूरत को वह समझने लगी थी और अपनी जवानी की प्यास को अपने बेटे से बुझाया चाहती थी,,,।

दूसरी तरफ अंकित क्योंकि पूरी तरह से जवान हो चुका था औरतों के अंगों के बारे में जानने लगा था यहां तक की अपनी मां को कई बार वह अर्धनग्न अवस्था में संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में देख चुका था जिसे देखकर वह अपने लंड की कठोरता को शांत करने के लिए मूठ मारना भी शुरू कर दिया था,,,, भाभी अपनी मां की तरह ही अपनी मां के साथ हम बिस्तर होना चाहता था अपनी जवानी की प्यास को अपनी मां की जवानी से बुझाना चाहता था,,, और इन सबसे अलग की तृप्ति जिसका आकर्षक और झुकाव परिवार में नहीं बल्कि बाहर के लड़के में था शुरू-शुरू में उसे लड़के की हरकत से वह परेशान हो चुकी थी गुस्सा हो चुकी थी उसे इस तरह की हरकत अच्छी नहीं लगती थी लेकिन धीरे-धीरे उसे भी संदीप की हरकतें अच्छी लगने लगी चुंबन के साथ-साथ स्तन मर्दन उसकी दबी हुई ख्वाहिश को उभारने लगी थी,,, अगर संदीप अपनी तरफ से अपनी हरकत को आगे बढ़ते हुए उसकी दोनों टांगों के बीच पहुंच जाए तो इसमें अब तृप्ति को भी कोई दिक्कत नहीं थी,,,।

लेकिन तीनों में एक बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी मर्यादा और इज्जत,,,, सुगंधा भी अपने बेटे की हरकत को समझने लगी थी उसके अंदर की तभी ख्वाहिश को देखकर अपने बेटे की इच्छा को समझने लगी थी वह जानती थी कि उसका बेटा उसकी तरफ आकर्षित है लेकिन फिर भी वह इतनी ज्यादा अपने बेटे से खुल नहीं गई थी कि सामने से एकदम निमंत्रण दे दे संभोग करने का,,,, और यही बात सुगंधा में भी थी सुगंधा जवानी से भरी हुई थी खूबसूरत और हुस्न से लदी हुई थी वह चाहती तो एक ही साड़ी पर अपने बेटे को अपनी दोनों टांगों के बीच ले लेती लेकिन ऐसा करना किसी रंडी से कम ना होता वह नहीं चाहती थी कि उसका बेटा उसके कहने पर उसके साथ हम बिस्तर हो वह चाहती थी कि यह खेल धीरे-धीरे ऐसे कगार पर पहुंच जाए जहां पर दोनों एक दूसरे में समाने के लिए व्याकुल हो जाए जिसमें किसी भी तरफ से पल ना हो बस मौके और हालात की नजाकत पर निर्भर रखता हो,,,।

और दूसरी तरफ थी तृप्ति वह भी अपनी मां के दिए हुए संस्कारों से बड़ी बड़ी हुई थी लेकिन कॉलेज में पहुंच चुकी तृप्ति के बदन की भी कुछ ज़रूरतें थी दूसरी लड़कियों की तरह वह भी चाहती थी कि उसे भी कोई प्यार करने वाला हूं जो कि संदीप के रूप में उसे मिल गया था लेकिन वह संदीप की फितरत से वाकिफ नहीं थी संदीप उसके बदन को चाहता था उसे भोगना चाहता था लेकिन इसी में तृप्ति को प्यार नजर आता था और तृप्ति भी उसकी हरकत का आनंद ले रही थी जो कि किसी भी वक्त तृप्ति को उसके बिस्तर तक ले जा सकता था जिसके लिए वह अंदर ही अंदर तैयार भी हो रही थी,,,,।

संदीप से मिलने के लिए तृप्ती की बेचैनी हमेशा बढ़ने लगी थी,,,, लेकिन कॉलेज की मुलाकात से उसका मन नहीं भर रहा था,,, वह संदीप से एकांत में मिलना चाहती थी जैसा कि बगीचे में मिली थी लेकिन बगीचे में भी आवारा लड़कों के आवागमन से वह परेशान हो गई थी इसलिए वह संदीप से किसी और जगह मिलना चाहती थी उसे संदीप ने उसे मिलने का अच्छी जगह और बहाना भी बता दिया था,,, लेकिन वहां जाने के लिए उसे अपनी मां की इजाजत लेनी थी, इसलिए घर का काम कर रही है अपनी मां से वह धीरे से बोली,,,।

मम्मी तुमसे इजाजत लेनी है,,,,

मुझसे,,,, कैसी इजाजत,,,?(झाड़ू लगाते हुए एकदम से रुक कर वह तृप्ति की तरफ देखते हुए बोली)

अरे मम्मी हमारे कॉलेज की मेम का जन्मदिन है और उन्होंने सभी को इनवाइट किया है,,,।

जन्मदिन है,,,(ऐसा कहते हुए फिर से झाड़ू लगाने लगी)

हां उनका जन्मदिन है,,,

कहां पर आमंत्रण दी है,,,(एक बार फिर से झाड़ू लगाना रोक कर तृप्ति की तरफ देखते हुए सुगंधा बोली,,,)

उनके घर पर सुबह 10:00 बजे पहुंचना है और फिर शाम को वापस आ जाना है,,,

कौन-कौन जा रहा है,,,?

क्लास के सभी लोग हैं मेरी सहेलियों भी जा रही है,,,

सहेलियां भी जा रही है तो ठीक है,,,, लेकिन जाना कब है,,,,

कल ही जाना है,,,,

ओहहहह,,,, इसका मतलब है कि कल कॉलेज नहीं जाना है,,,,

नहीं मम्मी,,, जब सभी क्लास के लोग जाएंगे तो क्लास में कौन होगा,,,,

सही कह रही हो,,, लेकिन कल पहनोगी क्या,,,?

वो,,,, मम्मी दिवाली पर जो सूट सलवार खरीदी थी ना वही पहन लूंगी अच्छी भी लगती है,,,

हां यह ठीक रहेगा चलो कोई बात नहीं चली जाना लेकिन समय पर घर पर आ जाना वैसे भी लड़कियों का ज्यादा देर तक घर के बाहर रहना ठीक नहीं है,,,।

मम्मी हमारी मेम अच्छी तरह से जानती हैं इसीलिए तो दिन में बुलाएंगे ताकि शाम होते होते सब लोग अपने-अपने घर पहुंच जाए,,,

बहुत समझदार है तुम्हारी मैडम,,,,, अच्छा तो जल्दी से सब्जियां काट दे,,,, मैं तब तक सफाई कर देती हूं,,,

ठीक है मम्मी,,,(और इतना कहने के साथ ही वह भी खुशी-खुशी सब्जी काटने लगी वह इस बात से खुश थी कि मैडम के जन्मदिन पर जाने की वजह से कुछ देर से संदीप के साथ वक्त गुजारने को जो मिल जाएगा,,, वक्त गुजारने के साथ-साथ संदीप की हरकतों का आनंद लेने की उत्सुकता उसके अंदर बढ़ती जा रही थी वह जानती थी कि संदीप अगर उसके पास रहेगा तो उसकी हरकत भी जारी रहेगी वह एक नया एक बहाने से उसके अंगों को स्पर्श करेगा तब आएगा छूएगा चुंबन करेगा और यह सब उसे अच्छा लगेगा,,,,।

अपनी मां से इजाजत मिलने के बाद मैं बहुत खुश थी वह रात को ही पहनने के लिए अपना सूट सलवार निकाल ली थी जो की पीले रंग का शूट ओर ब्राउन रंग की सलवार उसके गोरे रंग पर बहुत अच्छी लगती थी,,,, सुबह जल्दी उसकी नींद खुल गई और वह तैयार होने के लिए बाथरूम में चली गई,,, बाथरूम में प्रवेश करते ही वह अपने बदन से एक-एक करके सारे कपड़ों को उतार कर एकदम नंगी हो गई और अपने नंगे बदन को ऊपर से नीचे नजर उठाकर घूमा कर देखने लगी,,,, अपने गोरे रंग पर और अपने बदन की बनावट पर तृप्ति को गर्व महसूस हो रहा था और अपनी चूची की तरफ देखकर तो अपने आप ही उसके गोरे गाल शर्म के मारे सुर्ख लाल होने लगे,,, उसे अपनी चूची देखकर संदीप की हरकत याद आ गई जो कुर्ती के ऊपर से उसकी चूची को जोर-जोर से दबा रहा था,,,, और अपनी चूची चाहिए बात करते हुए धीरे से बोली,,,।

बड़ा जालीम है ना संदीप,,, तुम्हें बहुत जोर से दबाता है ना,,, तुम कुछ कहती क्यों नहीं उससे कहना चाहिए ना कि दर्द होता है धीरे से दबाए,,,,(ऐसा कहते हुए अपने दोनों हाथों से अपनी चूची को थाम ली और अपने आप ही उसे दबाते हुए बोली,,) लेकिन कर भी क्या सकती हो तुम्हें दबाने से उसे मजा भी तो बहुत आता है,,,,सहहहह जालिम अगर हरामजादे को ना रोको तो उसका बस चले तो तुम्हें खा ही जाए,,,,(ऐसा कहते हुए उसकी नजर अपनी दोनों टांगों के बीच चली गई तो देखी कि उसकी बुर पर हल्के हल्के बाल उगे हुए हैं और अपने बुर पर उगे हुए हल्के बालों को देखकर उसे याद आया कि उसकी मम्मी बाथरूम में ही बीट क्रीम को छुपा कर रखती हैं,,, जिसका वह खुद कई बार उपयोग कर चुकी है बीट क्रीम का ख्याल आते हैं उसकी दोनों टांगों के बीच उस पतली दरार में हलचल मचने लगी,,,।
 
वह तुरंत बाथरूम के अंदर ही ऊपर की तरफ थोड़ी सी जगह थी उसे जगह में थोड़ा कपड़ा भरा हुआ था जब वह उसे कपड़े को हटाई तो अंदर बीट क्रीम पड़ा था और बीट क्रीम को अपने हाथ में लेकर उसके चेहरे पर मुस्कान करने लगी वह जल्दी से क्रीम निकाल कर उसे अपनी बुर के बालों पर अच्छी तरह से लगा ली,,, और 5 10 मिनट तक इंतजार करने लगे उसे अपनी बर पर क्रीम लगाने में आज बेहद शर्म और उत्तेजना का अनुभव हो रहा था वैसे तो उसे संदीप के साथ केवल वक्त गुजारना था लेकिन उसे खुद समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बुर क्यों चिकनी कर रही थी,,, अपने मन में उठ गए इस सवाल का जवाब उसे खुद समझ में नहीं आ रहा तेरे कर उसके मन में अनजाने में ख्याल आ जा रहा था कि संदीप से चुदवाने जा रही है,, और अपने ही मन में आए इस तरह के ख्याल से वह शर्म से पानी पानी हो जा रही थी,,,,।

देखते ही देखते 10 मिनट गुजर जाने के बाद अपनी पेंटिं को हाथ में लेकर उससे बुर पर लगी क्रीम को साफ करने लगी जिसके साथ उसकी झांट के बाल भी एकदम साफ होते जा रहे थे और देखते ही देखते उसकी पूरे एकदम मलाई की तरह चीकनी हो गई अपनी बर देखकर खुद उसके मुंह में पानी आ रहा था और वह अपनी हथेली को अपनी बर पर रखकर अपनी गुलाबी पतली दरार को अपनी हथेली के नीचे छुपा ली और अपने मन में सोचने लगी की जब इस पर संदीप का हाथ स्पर्श करेगा तब उसकी क्या हालत होगी,,, यह सोचकर उसके तन बदन में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी,,,,, और फिर जल्दी-जल्दी नहा कर वह बाहर आ गई,,,।

उसकी मां भी उठ गई थी और वह झाड़ू लगा रही थी,,, झाड़ू लगाते हुए वह उससे बोली,,,।

तू छोड़कर तैयार हो गई है लेकिन अभी राजकुमार सो रही जाकर उन्हें भी तो जगा दो,,,,।

अभी अंकित उठा नहीं,,,!(आश्चर्य जताते हुए दीवार में टंगी घड़ी की तरफ देखते हुए तृप्ति बोली)

नहीं अभी नहीं उठा है जाकर जल्दी से जगा दे,,,,।

ठीक है मम्मी पहले कपड़े पहन लु,,,(वह केवल टावल में ही थी,,,,)

ठीक है लेकिन जल्दी करना देर हो रही है फिर जल्दी-जल्दी करेगा तो नाश्ता किए बिना चला जाएगा,,,,

ठीक है मम्मी मैं जल्दी से जगा देती हूं,,,(और इतना कहने के साथ ही तृप्ति अपने कमरे में चली गई और फिर जल्दी-जल्दी कपड़े पहन कर अंकित को जगाने के लिए उसके कमरे में जाने लगी दरवाजे पर पहुंची तो दरवाजे की कड़ी बंद नहीं थी क्योंकि दरवाजे पर हाथ रखते ही दरवाजा अपने आप खुल गया था और वह धीरे से कमरे में प्रवेश कर गई,,,, वह अपनी ही धुन में थी देखते देखते हो अपने भाई के बिस्तर के करीब पहुंच गई और जब वह अपने भाई को आवाज लगाने ही वाली थी तो उसकी नजर अंकित पर पड़ी और अंकित पर नजर पढ़ते ही उसके तो हो सके उसकी आंखें फटी की फटी रह गई और उसका मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया,,,।

इसमें तृप्ति का दोष बिल्कुल भी नहीं था,,,,, नजर ही कुछ ऐसा था कि अगर उसकी जगह कोई और होती तो उसकी भी हालत तृप्ति की तरह ही होती,,,, तृप्ति की सांस ऊपर नीचे होने लगी थी क्योंकि बिस्तर में उसका भाई उनकी पूरी तरह से नग्न अवस्था में सोया हुआ था उसके बदन पर ना तो कपड़ा था और ना ही चादर और पूरी तरह से नंगा बिस्तर पर सोया हुआ था और इस हालत में उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर छत की तरफ मुंह उठाई खड़ा था,,, तृप्ति को अपने भाई के कमरे में इस तरह के नजारे की अपेक्षा बिल्कुल भी नहीं थी इसलिए तो उसके होश उड़ गए थे और वह कभी सोचा नहीं थी कि वह अपने भाई को इस रूप में देखेगी,,,।

तृप्ति को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें बार-बार उसकी नजर ना चाहते हुए भी अपने भाई के खड़े लंड पर चली जा रही थी,,,, तृप्ति अपने जीवन में पहली बार एक जवान लड़के के लंड को देख रही थी और वह भी अपने ही भाई के,,, उसे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था वह तो हैरान इस बात से थी कि क्या लंड ऐसा होता है इतना मोटा तगड़ा लंबा एकदम मुसल की तरह बाप रे,,, उसके मन में ही यह शब्द निकल पड़े वाकई में तृप्ति के लिए लड की लंबाई और चौड़ाई उसकी मोटाई सब कुछ हैरान कर देने वाली थी वह बड़ी गौर से अपने भाई के लंड को देख रही थी और दरवाजे की तरफ देख ले रही थी उसे इस बात का डर था कि कहीं उसकी मां दरवाजे पर न जाए,, वह खुद कमरे से बाहर निकल जाना चाहती थी लेकिन जवानी की कशिश उसे रोके हुए थी बार-बार वह अपने भाई के लंड को ही देख रही थी,,, और अनजाने में ही उसके मन में यह खेला गया कि संदीप का भी क्या ऐसा ही होगा,,,, इस ख्याल से उसके तन-बदन में अजीब सी हलचल होने लगी,,,।

तृप्ति को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें अगर इस अवस्था में वह अपने भाई को जगाती है तो उसके भाई के साथ-साथ वह खुद शर्मिंदगी से भर जाएगी और अगर बिना जगाए चली जाती है तो उसकी मां जगाने के लिए कमरे में आ जाएगी और अपने बेटे की इस हालत को देखकर वह भी न जाने क्या सोचेगी और वह भी समझ जाएगी की उसकी बेटी तृप्ति ने भी इस नजारे को अपनी आंखों से देख ली है,,,, इसलिए वह सोच समझ कर धीरे-धीरे कमरे से बाहर गई और दरवाजे को बाहर से बंद करके उसकी कड़ी को जोर-जोर से बजाने लगी,,,।

अंकित,,, कब तक सोता रहेगा ऊठ जा देर हो रही है,,, (तृप्ति के एक दो बार आवाज लगाने से अंकित की नींद खुल गई और वह अपनी हालत को देखा तो एकदम से घबरा गया रात को हुआ अपनी मां के ख्यालों में अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया था और अपनी मां को याद करके अपनी मां के बारे में गंदी कल्पना करके अपने लंड को हिलाकर मुठ मारा था उसे सब कुछ याद आते ही जल्दी से बिस्तर पर से उठा और बोला,,,)

हां दीदी आया,,,,।

(उसकी आवाज सुनकर तृप्ति अपने मन में ही बोली शुक्र है उठ तो गया,,,,)

चल जल्दी तैयार हो जा देर हो रही है,,,।

आया दीदी,,,,(इतना कहकर वह भी जल्दी से अपने कपड़े पहनने लगा,,,,,।

दूसरी तरफ नाश्ता करके तृप्ति जाने के लिए तैयार हो गई थी जाने से पहले वह रसोई घर में काम करिए अपनी मां से बोली,,,)

मम्मी में जा रही हूं सहेलियां इंतजार कर रही होगी,,,।

ठीक है समय पर आ जाना,,,,

जल्दी आ जाऊंगी मम्मी तुम चिंता मत करो,,,,

(और इतना कहकर वह घर से निकल गई,,,, संदीप ने उसे पहले ही बता रखा था कि कहां आना है इसलिए उसके बताएं अनुसार इस जगह पर तृप्ति पहुंच गई और थोड़ी ही देर में वहां संदीप भी आ गया अपनी मोटरसाइकिल लेकर,,,, मोटरसाइकिल को देखकर तृप्ति बोली,,,)

तुम्हारे पास मोटरसाइकिल भी है,,,।

दो है एक पापा ले जाते हैं एक ऐसे ही पड़ी रहती है जब कभी काम पड़ता है तो मैं ही चलाता हूं,,,

तब तो अच्छा है जल्दी जाएंगे जल्दी आ जाएंगे,,,,

हां इसीलिए तो मैं मोटरसाइकिल लेकर आया हूं और वैसे आज तो तुम एकदम माल लग रही हो,,,,(तृप्ति को ऊपर से नीचे की तरफ चलते हुए संदीप बोला तो अपने लिए माल शब्द सुनकर तृप्ति गुस्सा दिखाते हुए बोली,,,)

क्या बोले,,,,,?

कककक ,,, कुछ नहीं मैं तो यह कह रहा हूं कि आज तो तुम एकदम परी लग रही हो,,,(उसका इतना कहते हैं संदीप के साथ-साथ तृप्ति मुस्कुराने लगी और वह उसके पीछे मोटरसाइकिल पर बैठकर जल्दी मैडम के घर,,,)

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तृप्ति घर से निकल गई थी एक नए सफर के लिए,,, यह पहली बार था जब वह कहीं जाने के लिए अपनी मां से इजाजत मांगी थी और उसकी मां भी खुशी-खुशी उसे जाने की इजाजत दे दी थी क्योंकि वह कहीं और नहीं बल्कि अपने ही कॉलेज की मैडम की जन्मदिन पर जा रही थी पर वह भी शाम तक वापस लौट आना था इसीलिए उसकी मां ने उसे इजाजत दे दी थी,,,, तृप्ति बहुत खुश थी पीले और ब्राउन रंग के सूट सलवार में वह परी लग रही थी,,,, और इस कपड़े में देखकर संदीप भी लार टपकाने लगा था,,, तभी तो वह तृप्ति को माल कहकर संबोधन किया था जिसका तृप्ति ने भी हंस कर स्वागत की थी,,,,। संदीप अपना मोटरसाइकिल लाया था यह जानकार तृप्ति बहुत खुश थी,,, क्योंकि खुद का मोटरसाइकिल होने की वजह से आने जाने का समय बच जाता,,,,।

तृप्ति मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गई थी,,, यह उसका पहला मौका था जब वह कीसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर बैठी थी,,, वैसे तो आते जाते वह कई लड़कियों को इसी तरह से जवान लड़कों के पीछे बैठकर आते-जाते देखी थी और उन्हें देखकर वह भी अपने मन में यही सोचती थी कि उसका दिन कब आएगा जब वह अभी इसी तरह से मोटरसाइकिल पर बैठकर शहर घूमेगी,,, और ऐसा लग रहा था कि जैसे आज बहुत दिन आ गया था जब वह अपनी ख्वाहिश पूरी कर रही थी,,,,।

तर्प्ति बहुत खुश थी,,, लेकिन तभी उसे सुबह वाला वाक्या याद आ गया,,, और पल भर में उसके चेहरे पर सुर्ख लालीमा छाने लगी,,, उस पल के बारे में सोचकर,,, तृप्ति की सांसें ऊपर नीचे होने लगी, क्योंकि वह कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि अपने भाई के कमरे में उसे इस तरह के दृश्य देखने को मिलेगा,,, वह कभी सोची नहीं थी कि उसका भाई सारे कपड़े उतार कर नंगा होकर सोता होगा,,, तृप्ति इतना भी बर्दाश्त कर लेती लेकिन अपने भाई को नंगा देखने पर और उसके नंगे पन की चरम सीमा को देखकर खुद उसके होश उड़ गए थे,,,, जिंदगी में पहली बार वो किसी मर्दाना लंड को अपनी आंखों से देख रही थी और वह भी किसी गैर मर्द के नहीं बल्कि अपने ही भाई के लंड को,,,।

लंड की शक्ल सूरत और उसका भूगोल देखकर उसके होश उड़ गए थे,,, वह कभी सपने भी नहीं सोची थी कि मर्दों का लंड इतना बम पिलाट होता है,,, इतना मोटा लंबा और तगड़ा जिसमें बिल्कुल भी लचक नहीं थी और छत की तरफ मुंह उठाए खड़ा था,,, जवान लड़की के लिए यह दृश्य पूरी तरह से कामोत्तेजना से भरा हुआ होता है,,, लड़की के ही क्यों हर उस औरत के लिए जिनकी टांगों के बीच जवानी बरकरार रहती है,,, ऐसी हर एक औरत के लिए यह दृश्य,,, मादकता का काम करती है,,,, और वही मादकता तृप्ति के दिलों दिमाग पर छाया हुआ था,,,, वह मोटरसाइकिल पर बैठकर संदीप के साथ कॉलेज की मैडम के वहां जा रही थी लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह से अपने भाई के लंड पर टिका हुआ था,,, कॉलेज में पढ़ने वाली पढ़ी लिखी लड़की होने के साथ-साथ तृप्ति, पूरी तरह से जवान हो चुकी थी,, मर्द औरत के बीच के रिश्ते को अच्छी तरह से समझती थी और वह यह भी जानती थी कि उत्तेजित होने पर ही मर्द का लंड खड़ा होता है,,, और यही जानकारी उसे अचंभित कर रही थी अपने भाई के पक्ष में,,, क्योंकि सुबह-सुबह उसका भाई तो पूरी तरह से गहरी नींद में सो रहा था उत्तेजित करने वाली एक भी वस्तु या स्त्री उसके भाई के समीप बिल्कुल भी नहीं थे तो उसका भाई किसी भी उत्तेजित हो रहा था और उसकी उत्तेजना का मापदंड तृप्ति उसके लंड के खड़े होने पर लगा रही थी और इसीलिए तो वह हैरान थी,,,।

लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि सहज और प्राकृतिक रूप से सुबह-सुबह हर मर्द का लंड खड़ा ही रहता है,,, ज्यादातर पेशाब की तीव्रता की स्थिति मे,,, लेकिन ईस ज्ञान से तृप्ति पूरी तरह से अंजान थी,,,, अपने भाई का ख्यालों से पूरी तरह से उत्तेजित किए जा रहा था जिसका असर उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में महसूस हो रहा था,,, उसे अपनी पेंटिं गीली होती हुई महसूस हो रही थी,,, क्योंकि उसकी बुर से कम रस टपक रहा था,,,, तृप्ति कुछ बोल नहीं रही थी,,, वह खामोश थी,, और उसे खामोश देखकर संदीप बोला,,,।

क्या हुआ तर्प्ति कुछ बोल क्यों नहीं रही हो,,,।

नहीं कुछ नहीं,,,बस ऐसै ही,,,,।

(तृप्ति अपनी और संदीप के बीच हाथ रख कर बैठी हुई थी और ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अपनी और संदीप के बीच हाथ की दीवार खड़ी करके रखी हो ताकि दोनों का बदन आपस में स्पर्श न हो और संदीप बार-बार कोशिश भी कर रहा था ब्रेक लगा कर की झटका खाकर त्रप्ती का बदन उसकी पीठ से स्पर्श हो जाए,,, लेकिन तृप्ति के कारण ऐसा हो नहीं पा रहा था इसलिए संदीप बोला,,,)

कंधे पर हाथ रख कर बैठ जाओ,,,, तब आराम से बैठ पाओगी,,,,।

(संदीप जानबूझकर तृप्ति को अपने कंधे पर हाथ रखने के लिए बोल रहा था क्योंकि वह जानता था कि जब वह उसके कंधे पर हाथ रखेगी तो उसका हाथ ऊपर की तरफ हो जाएगा और ऐसे हालात में,,, जब भी ब्रेक लगाने पर उसका बदन उसकी पीठ से स्पर्श होगा तो उसकी चूचियां भी उसकी पीठ से रगड़ खा जाएंगी,,,, और ऐसा ही हुआ,,, संदीप के कहने पर तृप्ति अपना हाथ उसके कंधे पर रख दी थी,,, और जब जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तब उसके एक तरफ का संतरा उसकी पीठ से दब जा रहा था और उसकी नरमाहट संदीप को अपनी पीठ पर बहुत अच्छे से महसूस हो रही थी जिसके कारण वह अपने बदन में उत्तेजना का अनुभव कर रहा था,,, उसे बहुत मजा आ रहा था और इस बात का एहसास तृप्ति को भी हो रहा था तृप्ति को भी पता चल रहा था कि जब-जब संदीप ब्रेक लग रहा था तब तक वह एकदम से संदीप से सट जा रही थी,,, और उसकी चूची भी उसकी पीठ से दब जा रही थी,,,।

इन सबके बावजूद भी तृप्ति को बिल्कुल भी संदीप से ऐतराज नहीं हो रहा था बल्कि ना जाने क्यों उसके बदन में मदहोशी का आलम उबाल मार रहा था उसे संदीप के हरकत बहुत अच्छी लग रही थी जब जब ब्रेक लगाने पर उसकी चूची संदीप की पीठ से रगड़ खाती थी तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,,,,,एक तो अपने भाई के लंड का ख्याल और ऊपर से संदीप की हरकत की वजह से उसकी चुचियों का उसकी पीठ से रगड़ खाना कुल मिलाकर उसकी पेंटिं को पूरी तरह से गीली करने पर उतारू हो गए थे,,,,,,।

पहली बार इस तरह का एकांत दोनों को मिला था लेकिन फिर भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं कर रहे थे क्योंकि दोनों अपने-अपने तरीके से एक दूसरे से मजा ले रहे थे,,,, तर्प्ति की चूची की रगड़ से संदीप का लंड खड़ा हो गया था,,, और इस एहसास से तृप्ति की बुर पानी छोड़ रही थी,,, और इसी आनंद की पराकाष्ठा में दोनों एक दूसरे से बात करना भूल गए थे नतीजन मैडम का घर आ गया था,,,, वैसे तो दोनों यही सोच रहे थे कि यह सफर कभी खत्म ना हो लेकिन एक दूसरे में दोनों इस तरह से डूब गए थे कि सफर की दूरी का पता ही नहीं चला,,,।

यही है मैडम का घर,,,,(संदीप एकदम बड़े से दरवाजे के आगे मोटरसाइकिल रोक दिया था जिससे तृप्ति अंदाजा लगाते हुए बोल रही थी और वाकई में जिस दरवाजे के आगे दोनों रुके थे वही घर मैडम का था,,,,,)

हां यही है,,,,।

लेकिन देख कर लग तो नहीं रहा है कि मैडम का जन्मदिन है,,,,

,,, हां,,, ऐसा भी हो सकता है कि हम दोनों सबसे पहले पहुंच गए हो,,,,चलो चलकर देखते हैं,,,,

(संदीप मोटरसाइकिल खड़ी करके गेट खोल के अंदर जाने लगा और पीछे-पीछे तृप्ति भी जाने लगी,,,, दरवाजे के आगे पहुंचकर संदीप डोर बेल बजा दिया,,, थोड़ी ही देर में दरवाजा खुला और दरवाजे पर मैडम खड़ी थी दोनों को देखकर मुस्कुराने लगी,,, मैडम को देखकर संदीपबोला,,,)

हैप्पी बर्थडे मैडम,,,, साथ में त्रप्ती भी मैडम को जन्मदिन की बधाई दी,,,।

(मैडम एकदम से खुश होते हुए बोली)

अच्छा हुआ संदीप तुम पहले आ गए,,,

पहले आ गए मतलब,,,,।

मेरा मतलब है कि अभी बाकी बच्चों का आना बाकी है और अच्छा हुआ तुम आ गए,,, क्योंकि जल्दी आ गए हो तो काम में हाथ भी बंटा लोगे,,,।

यह तो हमारा सौभाग्य है मेडम,,(संदीप बोलता है इससे पहले ही तृप्ति बोल पड़ी,,, और तृप्ति,, की तरफ देखते हुए मैडम बोली,,,)

तुम्हारा नाम,,,,,,(कुछ सोचते हुए मैडम बोली)

मैडम इसका नाम तृप्ति है और यह भी अपनी ही कॉलेज में पढ़ती है,,,(संदीप मैडम से तृप्ति को मिलाते हुए बोला,,,,)

ओहहहह,,,,, तुम दोनों बाहर क्यों खड़े हो आओ जल्दी अंदर आओ,,,, और जल्दी से मेरे काम में हाथ बंटाओ,,,।

(इतना कहकर मैडम इन दोनों को घर में ले आई और उन दोनों को एक कमरे में लेकर गई जहां पर वह खुद सब्जी काटने बैठी हुई थी,,,, और वह संदीप और तृप्ति से बोली,,,)

बाकी का सब काम तो हो गया है लेकिन सब्जियां काटना रह गया है बस यही काम हो जाए तो छुटकारा हो जाए वैसे भी मेरे बच्चे केक लेने गए हैं,,, वैसे मैं ज्यादा लोग को बुलाई नहीं हूं लेकिन बहुत खास खास को बुलाई हुं ,,,,,(इतना कहकर मैडम वहीं पर बैठ गई और फिर से सब्जी काटने लगी मैडम को सब्जी काटता हुआ देखकर तृप्ति बोली,,,)

अरे अरे मैडम यह आप क्या कर रही है मेरे होते हुए आपको यह सब करने की जरूरत नहीं है,,,,।

(इतना सुनते ही मैडम तृप्ति की तरफ देखने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तुम कर लोगी ना,,,,

जी मैडम मैं कर लूंगी मेरा तो रोज का काम है,,,,।

हां,,, हां,,,, मैडम हम दोनों यह काम कर लेंगे मैं भी सब्जी काटने में अपनी मां की मदद करता ही रहता हूं,,,,।

ओहहहह ,,, तुम दोनों कितने अच्छे हो,,,,,।

हम कर लेंगे मैडम आप चिंता ना करें आप दूसरा काम संभालो,,,,(इतना कहते हुए तृप्ति वहीं बैठ गई सब्जी काटने के लिए और तृप्ति की बात सुनकर मैडम बोली,,,)

तुम दोनों कितने अच्छे हो अच्छा हुआ तुम दोनों पहले आ गए वैसे तो अब कुछ काम बचा नहीं है बस मुझे नहाना है और अगर तुम दोनों यह काम कर लोगे तो हमें जल्दी से जाकर नहा लूंगी और फिर खाना तो जल्दी बनजाएगा,,,।

कोई बात नहीं मैडम आप जल्दी से जाकर नहा लीजिए तब तक हम दोनों सब्जी काट लेते हैं,,,,।

ठीक है,,,,(और इतना कहने के साथ ही मैडम नहाने के लिए चली गई,,,, मैडम के जाते ही तृप्ति बोली)

लो यहां तो अभी खाना ही नहीं बना है,,,, लगता है सारा काम हम लोगों को ही करना होगा,,,।

अरे वह बात छोड़ो लेकिन यह तो देखो मैडम हम दोनों को कमरे में अकेला छोड़ कर चली गई नहाने,,,,

तोक्या हुआ,,,?(सब्जी काटते हुए तृप्ति बोली,,,)

तो क्या हुआ,,,, समझ नहीं रही हो एक जवान लड़का और एक जवान लड़की कमरे में इस तरह से अकेले रहेंगे तो क्या होगा,,,,।

क्या होगा,,,,?(तृप्ति संदीप के खाने के मतलब को अच्छी तरह से समझ रही थी इसलिए संदीप की तरफ देखे बिना ही वह शर्म के मारे नजर नीचे झुकाए हुए सब्जी काटते हुए बोली)

यह पूछो क्या नहीं होगा,,,,,(और इतना कहने के साथ ही बैठे-बैठे ही संदीप अपने प्यास होठों को तृप्ति के देखते हुए होठों की तरफ आगे बढ़ने लगा संदीप की हरकत से तृप्ति के बदन में सिहरन सी दौड़ने लगी,, एक तो सुबह का नजारा और फिर बाइक पर चुचियों का रगड़ खाना यह सब पहले से ही तृप्ति के तन बदन में आग लगाया हुआ था,, और अभी यह कमरे में एकांत कुल मिलाकर तृप्ति को मदहोश कर रहा था और देखते ही देखते संदीप भी अपने होठों को एकदम उसके होठों के करीब ले गया इतना करीब कि दोनों की सांस एक दूसरे के गालों पर अपनी गर्माहट का एहसास दिलाने लगी,,,, संदीप की हरकत की वजह से तृप्ति के बदन में मदहोशी का नशा छाने लगा उसकी सांस उखड़ने लगी और उसकी आंखें अपने आप बंद हो गई यही मौका देखकर संदीप अपने प्यासे होठों को,,, तृप्ति के दहकते हुए होठों पर रख दिया,,, और मानो,,, तृप्ति भी इसी मौके का इंतजार कर रही हो वह तुरंत अपने होठों को खोल दी और गरमा गरम चुंबन में पूरा सहकार देने लगी दोनों पूरी तरह से पागल हो गए दोनों के हाथों से सब्जी काटने वाला चाकू छोड़कर नीचे गिर गया और दोनों एक दूसरे की बाहों में समाने लगी देखते ही देखते संदीप अपना हाथ आगे बढ़ाकर कुर्ती के ऊपर से ही,,, उसकी चूचियों को दबाना शुरू कर दिया।
 
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