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Guest
फिर हम दोनों हँसने लगे। मैंने उस ड्रेस की पेमेंट की और हम लोग होटेल चले गये। वहां पर थोड़ी देर काम करने के बाद मेम घर चली गई, और उनके जाने के बाद में भी घर चला गया।
मैंने घर पहुँच के शाजिया और फूफी को वो सूट्स दिखाए और मैंने जब उन दोनों को ये बताया की मेरी मैडम ने मुझे ये दिलवाया है तो अचानक पता नहीं फूफी और शाजिया को क्या हुआ की उन दोनों के खुश चेहरे गुस्से से लाल हो गये।
मैंने पूछा- "अचानक क्या हो गया? तुम दोनों इतना गुस्सा क्यों हो गये?"
फूफी- "तुम्हारी मेडम को अचानक क्या हो गया की उन्होंने तुम्हें इतने महंगे सूट दिलवा दिए?
शाजिया- हाँ भैया, इतने महंगे सूट कोई ऐसे ही नहीं दिलवा देता है। आखिर बात क्या है?
मैं- कोई बात नहीं है जान। मैं उनका दोस्त हूँ, इस नाते शायद उन्होंने मेरे लिए ये सूट खरीद दिया है।
फूफी नहीं वसीम ऐसा नहीं होता की कोई अपने पी.ए. या दोस्त के लिए इतने महंगे ड्रेस खरीद दे, वो भी बिना किसी बात के, और तुमने उससे ये ले कैसे लिया?"
मैं- "मैं सूट के पैसे दे रहा था पर उन्होंने देने नहीं दिया। इसलिए मैंने उनके लिए एक लड़कियों वाला सूट खरीदा और उनको दे दिया..."
शाजिया- आपने भी उनके लिए सूट खरीदा?
मैं- हाँ। क्यों क्या हो गया? मेम ने मेरे लिए 3 सूट खरीदे तो क्या मैं उनके लिए एक सूट भी ना खरीदूं?
फूफी और शाजिया मुझे गुस्से से देख रहे थे
शाजिया- "वाह भैया वाह... आपने उसके लिए सूट खरीदा। वैसे कितने का था वो सूट?"
मैं- “क्यों तुम जान के क्या करोगी?"
फूफी और शाजिया एक साथ बोली- "नहीं मुझे जानना है..."
उन दोनों को इतने गुस्से में देखकर मेरी तो हवा टाइट हो रही थी। मैंने सोचा- "यार मुझे इन दोनों को मेम के सूट के बारे में नहीं बताना चाहिए था। लग रहा है इन दोनों को जलन हो रही है...."
मैं- “वो सूट ₹10500 का था...'
शाजिया और फूफी- "क्या 10500 रुपये ?"
फूफी- "तुम आज तक मेरे लिए तो कोई इतनी महंगी चीज नहीं लाए ...
"
शाजिया- "अम्मी को छोड़ो... आपने मेरे लिए भी आज तक इतना महंगा सामान नहीं खरीदा जबकी आप मुझसे
" ये कहते कहते शाजिया रुक गई।
फूफी शाजिया को घूर घूर के देखने लगी।
शाजिया ने बात पलट दी- "मतलब... जबकी हम दोनों आपसे इतना प्यार करते हैं...
मैं मन में सोच रहा था- "आज तो लग रहा है की ये दोनों मुझे नहीं छोड़ेंगी.. "
फूफी - सच-सच बोलो वसीम कहीं तुम दोनों के बीच कुछ चल तो नहीं रहा है?
मैं- नहीं नहीं फूफी ऐसा कुछ नहीं है। तुम दोनों ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ?
शाजिया- सच बोलिए भैया?
मैं- हाँ मेरी जान मैं सच बोल रहा हूँ। मेरे और मेडम के बीच कुछ नहीं है। तुम दोनों मेरा यकीन करो ।
उन दोनों ने कुछ नहीं कहा, और कमरे में एकदम शांति थी।
मैं- गुस्से से "लग रहा है तुम दोनों को मुझ पे यकीन नहीं है। इसलिए तुम लोग कुछ बोल नहीं रहे हो। मैं जानता हूँ की मैंने अभी तक कोई गलत काम नहीं किया है। फिर भी तुम लोगों को मुझ पर यकीन नहीं तो कोई बात नहीं। मैं भी अब से तुम दोनों से बात नहीं करूँगा...”
फूफी और शाजिया ये सुनकर एकदम से चौंक गई।
फूफी- "नहीं नहीं वसीम ऐसा कुछ भी नहीं है। तुम तो गुस्सा हो गये..."
शाजिया- "हाँ भैया, आप ऐसी बातें ना करो। आपके सिवाए मेरा है ही कौन?"
फूफी उसे घूर के देखने लगी।
मैं- “नहीं। मुझे लगता है की तुम दोनों को मुझ पर अब यकीन नहीं रहा..."
फूफी- ऐसा ना बोलो वसीम तुम ही तो हम दोनों के सब कुछ हो।
शाजिया और फूफी माफी माँगने लगी और कहने लगी- “अब से हम लोग तुमपे शक नहीं करेंगी...
मैंने कहा- "चलो ठीक है माफ किया। कोई बात नहीं..." और थोड़ी देर बाद सब कुछ नार्मल हो गया।
मैंने घर पहुँच के शाजिया और फूफी को वो सूट्स दिखाए और मैंने जब उन दोनों को ये बताया की मेरी मैडम ने मुझे ये दिलवाया है तो अचानक पता नहीं फूफी और शाजिया को क्या हुआ की उन दोनों के खुश चेहरे गुस्से से लाल हो गये।
मैंने पूछा- "अचानक क्या हो गया? तुम दोनों इतना गुस्सा क्यों हो गये?"
फूफी- "तुम्हारी मेडम को अचानक क्या हो गया की उन्होंने तुम्हें इतने महंगे सूट दिलवा दिए?
शाजिया- हाँ भैया, इतने महंगे सूट कोई ऐसे ही नहीं दिलवा देता है। आखिर बात क्या है?
मैं- कोई बात नहीं है जान। मैं उनका दोस्त हूँ, इस नाते शायद उन्होंने मेरे लिए ये सूट खरीद दिया है।
फूफी नहीं वसीम ऐसा नहीं होता की कोई अपने पी.ए. या दोस्त के लिए इतने महंगे ड्रेस खरीद दे, वो भी बिना किसी बात के, और तुमने उससे ये ले कैसे लिया?"
मैं- "मैं सूट के पैसे दे रहा था पर उन्होंने देने नहीं दिया। इसलिए मैंने उनके लिए एक लड़कियों वाला सूट खरीदा और उनको दे दिया..."
शाजिया- आपने भी उनके लिए सूट खरीदा?
मैं- हाँ। क्यों क्या हो गया? मेम ने मेरे लिए 3 सूट खरीदे तो क्या मैं उनके लिए एक सूट भी ना खरीदूं?
फूफी और शाजिया मुझे गुस्से से देख रहे थे
शाजिया- "वाह भैया वाह... आपने उसके लिए सूट खरीदा। वैसे कितने का था वो सूट?"
मैं- “क्यों तुम जान के क्या करोगी?"
फूफी और शाजिया एक साथ बोली- "नहीं मुझे जानना है..."
उन दोनों को इतने गुस्से में देखकर मेरी तो हवा टाइट हो रही थी। मैंने सोचा- "यार मुझे इन दोनों को मेम के सूट के बारे में नहीं बताना चाहिए था। लग रहा है इन दोनों को जलन हो रही है...."
मैं- “वो सूट ₹10500 का था...'
शाजिया और फूफी- "क्या 10500 रुपये ?"
फूफी- "तुम आज तक मेरे लिए तो कोई इतनी महंगी चीज नहीं लाए ...
"
शाजिया- "अम्मी को छोड़ो... आपने मेरे लिए भी आज तक इतना महंगा सामान नहीं खरीदा जबकी आप मुझसे
" ये कहते कहते शाजिया रुक गई।
फूफी शाजिया को घूर घूर के देखने लगी।
शाजिया ने बात पलट दी- "मतलब... जबकी हम दोनों आपसे इतना प्यार करते हैं...
मैं मन में सोच रहा था- "आज तो लग रहा है की ये दोनों मुझे नहीं छोड़ेंगी.. "
फूफी - सच-सच बोलो वसीम कहीं तुम दोनों के बीच कुछ चल तो नहीं रहा है?
मैं- नहीं नहीं फूफी ऐसा कुछ नहीं है। तुम दोनों ऐसा सोच भी कैसे सकते हो ?
शाजिया- सच बोलिए भैया?
मैं- हाँ मेरी जान मैं सच बोल रहा हूँ। मेरे और मेडम के बीच कुछ नहीं है। तुम दोनों मेरा यकीन करो ।
उन दोनों ने कुछ नहीं कहा, और कमरे में एकदम शांति थी।
मैं- गुस्से से "लग रहा है तुम दोनों को मुझ पे यकीन नहीं है। इसलिए तुम लोग कुछ बोल नहीं रहे हो। मैं जानता हूँ की मैंने अभी तक कोई गलत काम नहीं किया है। फिर भी तुम लोगों को मुझ पर यकीन नहीं तो कोई बात नहीं। मैं भी अब से तुम दोनों से बात नहीं करूँगा...”
फूफी और शाजिया ये सुनकर एकदम से चौंक गई।
फूफी- "नहीं नहीं वसीम ऐसा कुछ भी नहीं है। तुम तो गुस्सा हो गये..."
शाजिया- "हाँ भैया, आप ऐसी बातें ना करो। आपके सिवाए मेरा है ही कौन?"
फूफी उसे घूर के देखने लगी।
मैं- “नहीं। मुझे लगता है की तुम दोनों को मुझ पर अब यकीन नहीं रहा..."
फूफी- ऐसा ना बोलो वसीम तुम ही तो हम दोनों के सब कुछ हो।
शाजिया और फूफी माफी माँगने लगी और कहने लगी- “अब से हम लोग तुमपे शक नहीं करेंगी...
मैंने कहा- "चलो ठीक है माफ किया। कोई बात नहीं..." और थोड़ी देर बाद सब कुछ नार्मल हो गया।