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Incest पहाडी आम (इन्सेस्ट)

दूसरे दिन भोला को किसी रिश्तेदार के घर जाना था तीन-चार दिनों के लिए और वह काफी जल्दबाजी में था,,,, इसलिए वह अपने बेटे से बोला,,,।

सूरज बेटा मैं तीन-चार दिनों के लिए रिश्तेदारी में जा रहा हूं वहां पर शादी है वहां पर सबको लेकर जा नहीं सकता इसलिए मुझे अकेले ही जाना है और तो यह बात मालकिन को बता देना कि मैं तीन-चार दिन तक नहीं आ पाऊंगा और कोई छोटा-मोटा काम हो तो तू कर देना,,,,,

ठीक है पिताजी मैं यह बात मुखिया जी को बता दूंगा और उनकी बीवी को भी,,,,, लेकिन शादी किसकी है,,,?

अरे हे एक रिश्तेदार उसी के वहां जा रहा हूं ठीक है बता देना,,,,(इतना कहकर भोला चलता बना,,,, कुछ देर खड़े होकर सूरज अपने पिताजी को देखता रहा जब तक कि वह दूर उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गए और अपने पिताजी को देखते हुए वह कमरे के दृश्य के बारे में सोचने लगा और अपने मन में ही बोलने लगा कि देखने पर उसके मन और बाबुजी इसे बिल्कुल भी नहीं दिखते जैसा कि उसने कमरे में देखा था और फिर वह भी मुखिया की बीवी के घर की तरफ निकल गया खबर पहुंचाने के लिए,,,,।

थोड़ी ही देर में वह उसे जगह पर पहुंच गया जहां पर खेतों में काम हो रहा था मजदूर लगे हुए थे उसे पूरा यकीन था कि यही मुखिया और मुखिया की बीवी भी मिल जाएंगे और ऐसा ही हुआ दूर बड़े से पेड़ के नीचे मुखिया और उसकी बीवी बैठे हुए थे सूरज जल्दी-जल्दी उन दोनों के पास किया और नमस्कार किया मुखिया की बीवी तो सूरज को देखते ही मन ही मन मुस्कुराने लगी और बोली,,,)

क्या हुआ रे सुरज,,,, तेरे पिताजी नहीं आए आज काम पर,,,,

की मालकिन यही तो बताने आया हूं कि पिताजी जरूरी काम से दो-तीन दिनों के लिए किसी रिश्तेदार के वहां गए हैं और यही खबर में देने आया हूं,,,,

ओहहहह ,, इसके बारे में तो कभी जिक्र भी नहीं किया भोला ने,,,, चलो कोई बात नहीं,,,,(मुखिया की बीवी गहरी सांस लेते हुए बोली और गहरी सांस लेने की वजह से उसकी उन्नत चुचीया एकदम से बाहर की तरफ निकल गई क्योंकि वह जानबूझकर की थी सूरज को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए और सूरज की भी नजर एकदम से उसकी चूचियों पर चली गई थी यह देखकर मुखिया की बीवी मन ही मन प्रसन्न होने लगी थी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तेरे पिताजी का काम तू कर देना,,,

वह तो ठीक है मालकिन लेकिन मुझे तो कुछ आता ही नहीं है,,,,,(सूरज एकदम मासूमियत भरे श्वर में बोला,,,)

हां शोभा ठीक तो कह रहा है यह इस कहां कुछ आता है,,,,

हां यह तो ठीक है लेकिन मैं सोच रही हूं कि कुछ दिनों से अपने आम के बगीचे में से आम की चोरी हो रही है रात को वहां रख वाली के लिए मुझे जाना होगा मैं सोच रही थी कि साथ में सूरज को ले जाती तो अच्छा होता,,,।

हां हां क्यों नहीं,,,, यह तो बहुत अच्छा है तुम्हें साथ भी मिल जाएगा और आम के बगीचे की रखवाली भी हो जाएगी,,,, ।

(मुखिया की बीवी के साथ रात को रख कर आम की रखवाली करने के बारे में सुनकर ही सूरज के बदन में रोमांच बढ़ गया उसके बदन में अच्छी सी हलचल होने लगी मुखिया की बीवी अपने फैसले पर मुस्कुरा रही थी उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था,,,, वह सूरज की तरफ देखकर बोली,,,)

तुझे कोई एतराज तो नहीं है ना बदले में तुझे पैसे भी मिलेंगे और पके हुए आम भी,,,(आम बोलते हुए वह अपनी छाती को थोड़ा सा और उभार दी थी,,, हालांकि उसके इस मतलब को सूरज समझ नहीं पाया था लेकिन उसे इनकार भी नहीं था उसे पैसे और पके हुए आम का लालच नहीं था बल्कि उसे मुखिया की बीवी के साथ रहना अच्छा लगता था इसलिए वह इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था,,,)

जी मुझे कोई एतराज नहीं है वैसे कब से रखवाली करने जाना है,,,(सूरज मुखीया और मुखिया की बीवी की तरफ देखते हुए बोला,,,,,)

आज से ही,,,, शाम ढलते ही आ जाना मेरे घर पर वहीं से मैं तुम्हें ले चलूंगी आम के बगीचे पर,,,

हां यह तुम ठीक कह रही हो शोभा ,, घर से ही इसे ले जाना तब सही रहेगा,,,,,

ठीक है सूरज अभी तो कोई काम नहीं है जाकर घर पर आराम कर सकते हो लेकिन समय पर आ जाना,,,

ठीक है मालकिन में समय पर आ जाऊंगा,,, नमस्ते,,,

(इतना कहकर दोनों का अभिवादन करके वह अपने घर की तरफ निकल गया लेकिन वह बहुत खुश था मुखिया की बीवी के साथ समय बिताने के नाम से ही उसके बदन में हलचल हो रही थी और मुखिया की बीवी उसे जाते हुए कुटिल मुस्कान बिखेर रही थी,,, आम के बगीचे की रखवाली करना तो उसके लिए केवल बहाना रहता था वह जब कभी मन होता था तो आम की रखवाली के बहाने अपनी जवानी की प्यास जवान लड़कों से बुझाती थी,,, इस बात को भोला भी नहीं जानता था मुखिया की बीवी को भी रात होने का इंतजार बड़ी बेसब्री से होने लगा,,,,।)

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मुखिया की बीवी आम के बगीचे की रखवाली करने का बहाना देकर अपनी चाल चल चुकी थी,,, और इस बात से सूरज भी बहुत खुश नजर आ रहा था वैसे भी उसे मुखिया की बीवी के साथ वक्त गुजारना अच्छा लगता था और इसी बहाने वह रात भर मुखिया की बीवी के साथ आम की रखवाली तो कर सकता था इसी बात को लेकर उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नजर आ रहे थे।

मुखिया को इसमें कोई एतराज नहीं था क्योंकि इससे पहले की उसकी बीवी आपके बगीचे की रखवाली करने के लिए बगीचे में कई राते रुक चुकी थी लेकिन मुखिया इस बात से अनजान था कि आम के बगीचे की रखवाली करने के बहाने उसकी बीवी रात रंगीन करतीथी। इसीलिए तो मुखिया एकदम सहज था अपनी बीवी के प्रति उसे बिल्कुल भी शंका नहीं था और वैसे भी जिस तरह से वह खेत खलिहान का काम संभालती थी,,, मजदूरों को संभालती थी और हिसाब किताब देखी थी इतना कुछ करने की क्षमता मुखिया में बिल्कुल भी नहीं थी इसीलिए तो वह अपनी बीवी से बहुत खुश था क्योंकि उसके चलते ही उसे आराम मिलता था।

एक तरफ मुखिया की बीवी पूरी तरह से उत्सुक थी सूरज से रात को मिलने के लिए और दूसरी तरफ सूरज का भी यही हाल था जिस तरह का नजारा मुखिया की बीवी ने उसे दिखाई थी वह नजारा आज तक उसके मन-मस्तिष्क में किसी चित्र की भांति छप गया था और उसे नजारे के बारे में जब भी उसे ख्याल आता था तब तब उसके बदन में सिहरन सी दौड़ने लगती थी,,, वह उसकी आंखों के सामने कपड़ा उतारना अपनी खूबसूरत बदन की नुमाइश करना और जिस तरह से वह पेटीकोट को खोलकर आगे की तरफ खींची थी उसकी दोनों टांगों के बीच घुंघराले बाल को देखकर आश्चर्यचकित हो जाना यह सब याद करके सूरज के तन बदन में आग लग जाती थी,,, इसलिए तो वह भी बेसब्री से शाम ढलने का इंतजार कर रहा था और यह बात उसने अपने घर पर भी बता दिया था पहले तो उसकी मां थोड़ा नाराज हुई लेकिन,, क्योंकि घर पर उसका पति भी नहीं था और अब सूरज भी कहीं आम की रखवाली करने के लिए जा रहा था वैसे उसने इस बात को नहीं बताया था कि वह मुखिया की बीवी के साथ आम की रखवाली करने के लिए जा रहा है वह सिर्फ इतना ही बताया था कि रात को आम के बगीचे की रखवाली करना है कुछ लोगों के साथ साथ में पैसे भी मिलेंगे और पके हुए आम भी मिलेंगे उसने मुखिया की बीवी के साथ वाली बात को छुपा ले गया था न जाने कहां से सूरज में इतना दिमाग आ गया था वरना अगर वह यह बात बता देता तो शायद सुनैना के मन में ढेर सारे शंका ने जन्म ले लिया होता। और आम के बगीचे की रखवाली के बदले में पैसे और पके हुए आम मिलने के लालच में सुनैना भी कुछ बोल नहीं पाई और जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी।

शाम ढल चुकी थी बहुत जल्द ही उसे मुखिया के घर पर पहुंचना था वैसे तो उसे रात बिरात डर बिल्कुल भी नहीं लगता था लेकिन वह समय पर पहुंचना चाहता था,,, सूरज ठीक रसोई के सामने बैठकर भोजन का इंतजार कर रहा था और उसकी मां जल्दी-जल्दी तवे पर रोटियां पका रही थी लेकिन उसकी इस जल्दबाजी में वह यह भूल गई थी कि उसके कंधे पर से उसके साड़ी का पल्लू नीचे गिर चुका था और वह चूल्हे के सामने बिना साड़ी के पल्लू की बैठी हुई थी जिसकी वजह से उसकी दोनों चूचियां ब्लाउज में एकदम कसी हुई नजर आ रही थी लेकिन ऐसी अवस्था में ,, उसकी बड़ी-बड़ी दोनों चूचियां ब्लाउज फाड़कर बाहर आने के लिए एकदम आतुर नजर आ रहे थे इस पर नजर पडते ही सूरज की हालत खराब होने लगी,,,।

सूरज एकदम से भूल गया कि उसे मुखिया की बीवी के साथ जल्दी आम के बगीचे पर जाना है वह तो अपनी मां के दोनों खरगोश में खो गया था और चूल्हे के आगे बेटी होने की वजह से उसके बदन से पसीना टपक रहा था और उसके माथे से पसीना बुंद बनकर उसके गोरे-गोरे गाल से होते हुए उसके गर्दन का रास्ता नापते हुए सीधे-सीधे उसके ब्लाउज के बीच वाली घाटी से होते हुए ब्लाउज के अंदर की तरफ जा रहे थे यह सब देखकर सूरज के लंड में हरकत होना शुरू हो गया,,, सुनैना इस बात से बेखबर खाना बनाने में लगी हुई थी,,, सूरज यह जानते हुए भी की जो कुछ भी वह अपनी मां की तरफ देख कर सो रहा है वह गलत है लेकिन फिर भी वह अपने आप को रोक नहीं पा रहा था अपनी मां की तरफ देखने से,,,खास करके उसकी चूचियों की तरह और वह भी चूल्हे के सामने बैठी होने की वजह से चूल्हे में जल रही आग की पीली रोशनी में उसका खूबसूरत बदन और भी ज्यादा चमक रहा था।। यह सब सूरज के लिए बहुत ही ज्यादा असहनीय होता जा रहा था। जिस तरह से सुनैना रोटियां बेल रही थी उसके हाथों की हरकत की वजह से उसके ब्लाउज में भी उतार चढ़ाव एकदम साफ नजर आ रहा था यह सब देखकर सूरज के लंड की अकड़ बढ़ती जा रही थी। इस नजारे को देखकर अनायास ही उसके मन में यह ख्याल आ गया कि काश उसकी मां ब्लाउज नहीं पहनी होती तो उसकी नंगी चूचियों को देखने में कितना मजा आता है लेकिन अपने इसी ख्याल पर वह अपने आप पर ही गुस्सा दिखाने लगा,। क्योंकि वह सब जानता था कि जो कुछ भी वर्क कर रहा है अपने मन में सोच रहा है वह बहुत ही गलत है लेकिन वह इससे ज्यादा कुछ सोच पाता इससे पहले ही सुनैना बोली।

बस ले अब तैयार हो गया है गरमा गरम खा ले,,,(इतना कहने के साथ ही एक थाली में थोड़ी सी सब्जी दाल चावल और रोटी निकालकर सूरज की तरफ आगे बढ़ा दी सूरज भी अपना हाथ आगे बढ़कर थाली को ले लिया और खाना शुरू कर दिया उसकी मां तुरंत अपनी जगह से उठकर खड़ी हुई और मटके से ठंडा ठंडा पानी गिलास भरकर लाई और उसके पास रख दी और उसे हिदायत देते हुए बोली,,)

देख रात का समय है और बगीचे का इसलिए ध्यान देना कहीं अकेले मत जाना जहां भी जाना अपने साथी लोग के साथ ही जाना,,, वैसे तो मुझे अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन तू भी अब बड़ा हो गया है कामकाज देखेगा तभी तो जीवन की गाड़ी आगे बढ़ेगी।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो ना मैं सब संभाल लूंगा,,,(निवाला मुंह में डालते हुए बोला और थोड़ी ही देर में वह खाना खा लिया और जाने के लिए तैयार हो गया था लेकिन जाते-जाते वह अपनी मां को बोला)

मैं अब जा रहा हूं पिताजी भी घर पर नहीं है इसलिए दरवाजा बंद कर लेना और खोलना नहीं और तुम दोनों की जल्दी से खाना खाकर सो जाना।

ठीक है सूरज तू अपना ख्याल रखना,,

ठीक है मां,,,(और इतना कहते हुए वह मुखिया की बीवी के घर की तरफ निकल गया,,, लेकिन रास्ते में वह अपनी मां की चूचियों के बारे में सोचने लगा,,, और अपने आप से ही बातें करते हुए बोला

मां की चूचीया कितनी बड़ी-बड़ी है,,, ब्लाउज में इतनी जबरदस्त लगती है तो बिना ब्लाउज की जब एकदम नंगी होती होगी तो कितनी खूबसूरत लगती होगी एकदम गोल-गोल खरबूजे जैसी मैंने तो कभी देखा भी नहीं है लेकिन ब्लाउज में उसकी गोलाई देखकर अंदाजा लगा लेता हूं कि कैसी दिखती होगी ,,, कसम से अभी तो मेरी हालत खराब हो गई थी,, अच्छा हुआ कि मां ने नहीं देखी,,, यह साला मुझे क्या हो जाता है सब कुछ जानते हुए भी की जो कुछ भी मैं देख रहा हूं जो सोच रहा हूं सब गलत है फिर भी मैं अपने आप को रोक क्यों नहीं पाता,,,, लेकिन पहले तो मैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं था तो अब ऐसा क्यों हो रहा है मां को देखते ही मेरे दिल की धड़कन क्यों बढ़ने लगती है क्यों मेरी नजर उनके अंगों पर चली जाती है वैसे भी जिस दिन से मा की चुदाई देखा हूं तब से तो न जाने मेरे मन में कैसे-कैसे विचार आने लगे हैं।

उस दिन कमरे में मां और पिताजी पूरी तरह से नंगे थे लेकिन मुझे ज्यादा कुछ नहीं दिखाई दिया सिर्फ मां की बड़ी-बड़ी गांड और उसकी दोनों टांगों के बीच पिताजी का अंदर बाहर होता हुआ लंड मां की बुर भी मै अभी तक नहीं देख पाया,,, लेकिन वह नजारा देखकर मेरी तो हालत खराब हो गई थी मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरी मां भी चुदवाती होगी लेकिन सब कुछ मैं अपनी आंखों से देखा था पिताजी कैसे जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे और न जाने कैसे-कैसे आवाज मां के मुंह से निकल रही थी इसका मतलब मन को भी चुदवाने में मजा आता है।

(सूरज अपने मन में यही सब सोते हुए और अपने आप से ही बात करते हुए आगे की तरफ चले जा रहा था वह अपनी बात को अपने मन में ही आगे बढ़ाते हुए अपने आप से ही बोला)

कितना अच्छा मौका था उसे दिन पूरी तरह से मांगी थी पिताजी नंगे थे लेकिन फिर भी ज्यादा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था पिताजी मां को नीचे लेट कर उसकी चुदाई करते तो मैं सब कुछ देख लेता उनके बुर भी देख लेता की कैसी उनके बुर हैं,,, नीलू की तो मैं अपनी आंखों से देख लिया था एकदम चिकनी कचोरी की तरह खुली हुई क्या इस तरह की मां की भी बुर होगी,,, पता नहीं मैं अभी तक नीलू की छोड़कर किसी और की बुर देखा ही नहीं,,, मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि सब की एक जैसी होती है कि अलग-अलग होती है लेकिन जो नशा देखकर हुआ था वह नशा आज तक मेरी नस-नस में घुला हुआ है,,,

पिताजी कितने कसकस के धक्के लगा रहे थे,,, पूरा दम लगाकर पता नहीं मा कैसे उनके धक्को को सहन कर पा रही थी,,,,,, कुछ पता ही नहीं चला था की मां को कैसा लग रहा है पता नहीं उन्हें दर्द कर रहा था कि मजा आ रहा था और वैसे भी दीवाल पकड़ कर झुकी हुई थी एकदम घोड़ी बनकर,,, जैसे की घोड़ी के ऊपर घोड़ा,,,, जो मां और पिताजी कर रहे थे उसे ही चुदाई कहते हैं और यह सब शादी के बाद ही होता है काश मेरी भी शादी हो गई होती तो मैं भी सब कुछ जान जाता,,,। और रोज मजे लेता,,,,।

(वह यही सब सोते हुए मुखिया के घर की तरफ चले जा रहा था कि तभी एक कुत्ता भोकता हुआ उसकी तरफ लपका तो उसका ध्यान एकदम से भंग हुआ और वह तुरंत नीचे से पत्थर उठा दिया और गाली देता हुआ उसकी तरफ चल दिया कुत्ता तुरंत वहां से भाग गया तब उसे इस बात का एहसास हुआ कि चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था उसे इस बात का डर था कि कहीं देर तो नहीं हो गई कहीं मुखिया की बीवी अकेले तो बगीचे पर नहीं चली गई यही सब सोता हुआ वह जल्दी-जल्दी मुखिया के घर की तरफ जाने लगा जो की दुर से ही मुखिया का घर नजर आ रहा था। ऊपर वाले मंजिले पर बाहर की तरफ लालटेन चल रही थी क्योंकि दूर से ही दिखाई दे रही थी।
 
सूरज जल्दी-जल्दी मुखिया के घर की तरफ जाने लगा और थोड़ी देर में पहुंच गया बाहर ही कुर्सी पर बैठकर मुखिया और मुखिया की बीवी सूरज का इंतजार कर रही थी सूरज को देखते ही मुखिया की बीवी बोली।

कहां रह गया था रे मैं कब से तेरा इंतजार कर रही हूं देख कितना समय हो गया या अंधेरा हो गया हमें और जल्दी जाना चाहिए था।

मैं माफी चाहता हूं मालकिन घर पर खाना बनने में देर हो गया था इसलिए जल्दी से खाकर मैं जल्दी-जल्दी भागता हुआ यहां आया हूं मुझे तो लग रहा था कि कहीं आप अकेले ना निकल गई हो।

अकेले क्यों जाऊंगी तुझे लिए बिना कैसे जा सकती हूं,,, तूने खाना खा लिया है।

हां मालकिन,,,

चल कोई बात नहीं खाना खा लिया तो ठीक ही है लेकिन खाने का डब्बा भी ले ले कहीं रात को भूख लग गई तो ,,,,

(इतना सुनते ही पास में पड़ा हुआ खाने के डब्बे को सूरज उठा लिया और फिर मुखिया जो वही कुर्सी पर बैठा हुआ था वह बोला)

सूरज वह सामने कुल्हाड़ी पड़ी है उसे भी ले ले,,,

कुल्हाड़ी क्यों मालिक,,,(सूरज आश्चार्य जताते हुए बोला,,,)

अरे पागल रात का समय है चोर उचक्के का डर तो रहता ही है लेकिन जंगली जानवरों का भी डर रहता है हाथ में हथियार रहेगा तो डर तो नहीं रहेगा।

(मुखिया की बात सुनकर सूरज को थोड़ी घबराहट हुई लेकिन फिर भी वहां मुखिया के बताएं अनुसार कुल्हाड़ी को हाथ में ले लिया और फिर मुखिया खुद अपनी जगह से खड़ा होकर लालटेन अपने हाथ में लिया और उसे अपनी बीवी को थमा दिया.. लालटेन को अपने हाथ में लेते हुए वह मुस्कुरा कर बोली,,,)

इसकी तो ज्यादा जरूरत है,,,,(और फिर एक हाथ में लालटेन और एक बड़ा सा डंडा अपने हाथ में लेकर दोनों आम के बगीचे की तरफ निकल गए)

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मुखिया की बीवी एक हाथ में लालटेन और एक हाथ में बड़ा सा डंडा लेकर आम के बगीचे की ओर जाने के लिए तैयार हो चुकी थी सूरज भी हाथ में कुल्हाड़ी ले लिया था हालांकि कुल्हाड़ी का जिक्र आते ही उसे थोड़ी बहुत घबराहट हुई थी लेकिन मुखिया की बीवी के साथ में होते ही ना जाने क्यों उसकी हिम्मत दुगनी हो जाती थी,,, वह भी बेफिक्र होकर हाथ में कुल्हाड़ी ले लिया था। सूरज के लिए यह पहला मौका था जब पहली बार वह रात को आम की रखवाली करने के लिए आम के बगीचे में जा रहा था वरना आज तक वह कभी रात को कहीं रुका ही नहीं था,,,। पैसों का लालच या किसी चीज को पाने का लालच उसमें बिल्कुल भी नहीं था अगर ऐसा होता तो शायद वह जाने के लिए तैयार भी नहीं होता लेकिन यहां बात थी मुखिया की बीवी के साथ रात गुजारने की उसके साथ रख कर आम के बगीचे की रखवाली करने की इसलिए सूरज तुरंततैयार हो गया था। क्योंकि मुखिया की बीवी का साथ ही उसके लिए काफी था।

देर तो हो चुकी थी लेकिन फिर भी मुखिया की बीवी सूरज को बिल्कुल भी डांट नहीं रही थी,,, और इसके पीछे उसका लालच भी छुपा हुआ था। चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। घर से निकलते समय मुखिया की बीवी रोटी और सब्जी रुमाल में बांध ली थी ताकि रात को अगर भूख लगे तो खा सके वैसे तो दोनों घर से खा कर ही निकले थे और मुखिया की बीवी तो सूरज के खाने का इंतजाम घर पर एक ही थी लेकिन वह घर से खा कर ही आया था और इसी में देर भी हो चुकी थी।

धीरे-धीरे मुखिया की बीवी और सूरज दोनों आगे बढ़ रहे थे चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था थोड़ी देर में दोनों गांव से दूर निकल गए थे वैसे तो आम का बगीचा कुछ खास दूरी पर नहीं था लेकिन फिर भी आधा घंटे का समय लगता था। बात की शुरुआत इस तरह के माहौल में वैसे तो मुखिया की बीवी ही करती थी लेकिन सूरज से रहा नहीं जा रहा था इसलिए वह बोला।

मालकिन तुम इसी तरह से आपकी रखवाली करने के लिए रात को आती रहती हो।,,,,

हां रे,,, मेरा तो रोज का काम है आए दिन में आम के बगीचे की रखवाली करने के लिए आती ही रहती हूं।

अकेली आती हो या फिर किसी के साथ,,,

वैसे तो अकेली कभी आई नहीं हूं क्योंकि रात का समय होता है तो अकेले थोड़ा तो डर लगता ही है लेकिन वैसे मुझे डर नहीं लगता लेकिन कोई साथ होता है तो अच्छा ही लगता है आज तू मिल गया तो तुझे लेकर आई हूं तू घर पर बात कर तो आया है ना।

हां मालकिन में घर पर बात कर आया हूं वैसे मैं घर से बाहर कभी रात को कहीं रुकता नहीं हूं लेकिन तुम्हारे कहने पर मैं चल रहा हूं।

(सूरज की इस बात पर मुखिया की बीवी मंद मंद मुस्कुराने लगी क्योंकि एक जवान होते लड़के के मन की बात को वह भी अच्छी तरह से समझती थी वह जानती थी कि सूरज किस लालच से उसके साथ रात को बगीचे की रखवाली करने के लिए आया है,,, सूरज की बात सुनकर मुस्कुराते हुए वह बोली,,)

तब तो बहुत अच्छा है कि तू मेरी बात मानने लगा है,,,, वैसे तुझे डर तो नहीं लगता ना रात में,,,

बिल्कुल भी नहीं मालकिन इसमें डरने का क्या है,,,

तब तो बहुत अच्छा है वैसे भी मुझे निडर लोग बहुत अच्छे लगते हैं डरपोक मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है,,,।

तुम भी बहुत बहादुर हो मालकिन वरना इस तरह से रात को कोई बगीचे की रखवाली करने के लिए औरत नहीं आती।

बात तो तो सही कह रहा है। और वैसे भी पहले में डरपोक रही थी लेकिन धीरे-धीरे जब घर की जिम्मेदारी अपने सर पर लेना पड़ता है तो निडर होना पड़ता है।

( मुखिया की बीवी भी काफी खुश नजर आ रही थी क्योंकि आज बहुत दिनों बाद वह आम के बगीचे की रखवाली जो करने जा रही थी और वह भी एक जवान लड़के के साथ,,,, चारों तरफ धुप्प अंधेरा छाया हुआ था,,, तकरीबन तीन-चार मीटर से ज्यादा दूर दिखाई नहीं दे रहा था इतना दे रहा था वह तो गनीमत थी कि आगेआगे मुखिया की बीवी लालटेन लेकर चल रही थी जिसकी रोशनी में सूरज सब कुछ साफ़-साफ़ देख पा रहा था उस दिन की तरह आज भी मुखिया की बीवी आगे आगे चल रही थी क्योंकि उसे दिन भी सूरज को नहीं मालूम था कि कहां जाना है और आज भी सूरज को नहीं मालूम था कि आम का बगीचा कहां है इसलिए दिशा निर्देश के लिए मुखिया की बीवी खुद आगेवानी करते हुए आगे आगे चल रही थी लेकिन उसके इस तरह से आगे चलने पर इसकी भारी भरकम नितंबों का घेराव लालटेन की पीली रोशनी में,,, एकदम साफ साफ दिखाई दे रहा था जो कि वातावरण और सूरज के मन में मादकता भर रहा था।

सूरज का ध्यान पूरी तरह से मुखिया की बीवी की गांड पर था,,, न जाने क्यों उसे मुखिया की बीवी की गांड का आकर्षण कुछ ज्यादा ही बढ़ता जा रहा था हालांकि अभी तक उसने मुखिया की बीवी की गांड को संपूर्ण रूप से नग्न अवस्था में नहीं देखा था। लेकिन फिर भी उसे पूरा यकीन था कि पूरा कपड़ा उतारने के बाद सबसे ज्यादा आकर्षक उसकी गांड ही नजर आती होगी,,, हालांकि नहाते समय जिस तरह से वह अपने कपड़े उतार रही थी उसके बदन की थोड़ी बहुत झलक सूरज देख लिया था जिसकी वजह से ही तो आज उसका मन उसका नजरिया पूरी तरह से बदल चुका था।,,,, कुछ देर वातावरण में पूरी तरह से खामोशी छाई रही,,,।

वातावरण में झींगुर की आवाज बड़ी तेज सुनाई दे रही थी रह रहकर कुत्तों के भौंकने की आवाज आ रही थी। बस्ती से दोनों काफी दूर आ चुके थे और वैसे भी एक गांव पूरी तरह से पहाड़ों से घिरा हुआ था इसलिए अंधेरे में कुछ ज्यादा ही,,, डरावना नजर आता था। जिस तरह का माहौल बना हुआ था चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था अगर ऐसे समय में केवल मुखिया की बीवी को ही आना होता तो शायद वह डर के मारे नहीं आती और शायद सूरज भी इस तरह से अंधेरे में बाहर निकलने से घबराता,,, क्योंकि इससे पहले कभी भी वहां रात को बाहर और अभी इतनी दूर निकला नहीं था लेकिन आज की बात कुछ और थी,,, दोनों के मन में किसी भी प्रकार का भय नहीं था दोनों निडर होकर आगे बढ़ रहे थे क्योंकि एक दूसरे का साथ जो था और उससे भी बड़ी बात थी कि दोनों का एक दूसरे के प्रति आकर्षण था,,,

जवानी से भरी हुई मुखिया की बीवी सूरज का साथ पाकर पूरी तरह से भाव भी बोर हो चुकी थी वह एक साजिश के तौर पर उसे आम के बगीचे की रखवाली करने के लिए ले जा रही थी क्योंकि वह उसकी जवानी से खेलना चाहती थी और जवानी के दहलीज पर कदम रख चुका सूरज एक जवान औरत का साथ प्रकार पूरी तरह से मत हो चुका था,,, उसके बदन के आकर्षण में पूरी तरह से अपने आप को डूबो चुका था,,, उसे यह तो नहीं मालूम था कि आम के बगीचे में उसके साथ क्या होने वाला है लेकिन वह बहुत खुश था,,,।

कुछ देर की खामोशी के बाद मुखिया की बीवी बोली,,,,।

बस अब आने ही वाला है,,,,आहहहह,,,(दर्द भरी कहानी की आवाज मुंह से निकलने के साथ ही अपनी हथेली को अपनी कमर पर रख दी और हल्का सा झुक गई और एक ही जगह पर खड़ी होकर,,) हाय दइया मर गई रे,,,

क्या हुआ मालकिन,,,,?(एकदम आश्चर्य से सूरज भी अपनी जगह पर खड़ा होकर बोला)

हाय मेरी कमर ऐसा लगता है कि जैसे मेरी जान लेकर छोड़ेगी,,,,,(मुखिया की बीवी उसी जगह पर खड़ी होकर अपनी हथेली को कमर पर हल्के-हल्के घूमाते हुए बोली,,, वह अपनी हरकत से सूरज का ध्यान अपनी कमर पर लाना चाहती थी लेकिन सूरज का ध्यान उसकी गोलाकार नितंबों पर था फिर भी वह कमर की तरफ देखते हुए बोला,,,)

कमर में क्या हो गया मालकिन,,,,!

ऊबड खाबड रास्ते से चलते हुए मेरी कमर लचक गई है,,,,आहहहहह,,,, बहुत दर्द कर रही हैं,,,,(एक कदम बढ़ाकर एकदम से लड़खड़ाने का नाटक करते हुए वह बोली,,, और मुखिया की बीवी को इस तरह से लड़खड़ाता हुआ देखकर सूरज से रहने की और वह तुरंत आगे बढ़ाकर उसकी कमर को दोनों हाथों से थाम लिया,,, और बोला,,,)

संभाल कर मालकिन,,,,,,

(जैसे ही मुखिया की बीवी ने अपनी कमर पर सूरज के मर्दाना हथेलियां का स्पर्श महसूस की वह पूरी तरह से मदहोश हो गई उसके बदन में एकदम से सुरसुराहट बढ़ गई,,,, खास करके उसकी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार में तो मानो जैसे आग लग गई हो,,,, तुरंत उसकी बुर नुमा कटोरी मदन रस से भर गई,,, मन तो उसका कर रहा था कि इसी समय सूरज को धर दबोचे और उसके ऊपर चढ़ जाए,,, लेकिन अनुभव से भरी हुई मुखिया की बीवी जल्दबाजी करने में नहींमानती थी,,,, वह जानती थी कि उसके दोनों टांग खोलते ही सूरज लार टपकाते हुए उसकी दोनों टांगों के बीच आ जाएगा,,,)

हाय दईया,,,,,,,(एकदम से मदहोश होते हुए मुखिया की बीवी बोली,,,,) अच्छा हुआ तू थाम लिया वरना मैं तो गिर जाती,,,,

मेरे होते हुए तुम कैसे गिर जाओगी मालकिन,,, मैं किस लिए हूं,,,,

अरे इसीलिए तो तुझे लेकर आई हूं,,,,(और इतना कहने के साथ ही वह खुद ही सूरज के कंधे पर हाथ रख दी और बोली) मुझे तो एक कदम भी नहीं चला जा रहा है,,,,, तुझे सहारा देकर ही मुझे ले जाना पड़ेगा,,,,,।

(सूरज के कंधे पर हाथ डालकर सहारा लेते ही सूरज के तन बदन में आग लग गई थी एक खूबसूरत औरत का इस तरह से उसके बदन से चिपकना उसे बहुत ज्यादा उत्तेजित कर रहा था उसका लंड पूरी तरह से औकात में आकर खड़ा हो चुका था उसकी सांसे बड़ी तेजी से चल रही थी क्योंकि जिस तरह से वह उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर सहारा ली थी उसकी भाई च सीधे-सीधे उसके एक तरफ की छाती से स्पर्श हो रही थी और सूरज भी उसे सहारा देते हुए अपने हाथ को दूसरी तरफ से उसकी कमर पर लपेट रखा था कुल मिलाकर दोनों की हरकत बेहद कामोत्तेजना से भरी हुई थी ,,,)

लाओ मालकिन लालटेन मुझे दे दो,,,(और इतना कहने के साथ ही सूरज मुखिया की बीवी के हाथ से लालटेन को अपने हाथ में ले लिया और उसकी पीली रोशनी में धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा,,,,)

मुझे नहीं मालूम था रे की कमर इतनी ज्यादा परेशान करेगी वरना मैं आज नहीं आती,,,,(धीरे-धीरे लंगड़ा कर पैर आगे बढ़ाते हुए बोली,,,)

कोई बात नहीं मालकिन में हूं ना तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है,,,।

तू तो बहुत अच्छा लड़का है मुझे लगता है कि तो हम लोगों का साथ बहुत देगा,,,, अब तो हमारे लिए ही काम किया कर पैसे इज्जत सब कुछ मिलेगा।
 
यह तो आपका बड़प्पन है मालकिन जो आपने काम के लिए मुझे चुना है,,,,(सूरज और मुखिया की बीवी बातें करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे मुखिया की बीवी की कमर में और ना ही पैर में बिल्कुल भी तकलीफ नहीं थी वह तो सिर्फ अपना जादू चल रही थी सूरज के ऊपर जो कि अच्छा खासा काम भी कर रहा था क्योंकि लालटेन की रोशनी में मुखिया की बीवी की नजर उसके पजामा के आगे वाले भाग पर थी जो की काफी उठा हुआ था उसमें तंबू बना हुआ था यही देखकर मुखिया की बीवी मन ही मनपसंद भी हो रही थी और उतेजित भी हो रही थी क्योंकि उसका जादू काम कर रहा था,,,, सूरज बात को आगे बढ़ाते हुए बोला,,,)

अभी कितना दूर है मालकिन,,,,

बस आने ही वाला है तुझे तकलीफ हो रही है क्या,,,!

नहीं नहीं मालकिन मुझे बिल्कुल भी तकलीफ नहीं हो रही है मैं तो जिंदगी भर तुम्हें सहारा देकर इसी तरह से चल सकता हूं,,,।

अरे वाह रे बातें तो तू बड़ी-बड़ी करता है,,, एकदम मर्द की तरह,,,

मैं भी तो मर्द ही हूं मालकिन,,,,

हां वह तो दिखाई दे ही रहा है,,,(कनखियों से सूरज के पजामे की तरफ देखते हुए बोली,,, वैसे भी इस तरह से मुखिया की बीवी को सहारा देने में उसे किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं थी जिस तरह से वह मुखिया की बीवी की कमर पर हाथ रखा हुआ था उसके कमर की चिकनाहट उसकी हथेली में स्पर्श हो रही थी,,, सूरज को अब जाकर इस बात का एहसास हो रहा था की औरतों की कमर कितनी चिकनी होती है एकदम मक्खन की तरह उसकी हथेली फिसल जा रही थी और मुखिया की बीवी सूरज की हथेली को अपनी कमर पर महसूस करके गनगना जा रही थी,,,,)

मैंने कितनी बार शालू और नीलू को कहा कि मेरी कमर की मालिश कर दे लेकिन वह दोनों है कि दिनभर बस खेलती रहती है इधर-उधर मेरी बात सुनती ही नहीं है,,,,

(मुखिया की बीवी जानबूझकर सूरज से कमर की मालिश वाली बात बोली थी और सच तो यही था कि ना तो उसकी कमर में दर्द हो रहा था ना ही वह मालिश के लिए चालू और नीलू को बोली थी वह तो बस सूरज के मन को टटोल रही थी)

हां मालकिन वो तो में देखा हूं,,, शालू और नीलू दोनों दिन भर बस घूमती रहती है उन्हें चाहिए था कि तुम्हारी कमर की मालिश कर देती ताकि आराम हो जाता,,,,

अरे सूरज मेरी कहां सुनने वाली है दोनों मैं तो परेशान हो गई हूं बस जल्दी से जल्दी दोनों के हाथ पीले करके ससुराल भेज दु तो समझ लूं की गंगा नहा ली,,, अच्छा सूरज तुझे आता है क्या मालिश करना,,,,

ममममम,, मालिश करना,,,,,,हां,,,हां,,, आता तो है एक दो बार मैंने मालिश किया हूं मां की उनकी भी कमर में इसी तरह का दर्द होता था,,,,(सूरज हड बढ़ाते हुए झूठ बोल रहा था,,, क्योंकि मालिश वाली बात सुनकर उसके मन में उमंग जगने लगी थी ,,, उसे इस बात का एहसास होने लगा था की मुखिया की बीवी उसे मालिश करने के लिए जरुर बोलेगी इसीलिए वह इनकार नहीं कर पाया और सच तो यही था कि उसे मालिश करना नहीं आता था और ना ही कभी उसने अपनी मां की मालिश किया था बस वह ईस मौके को जाने नहीं देना चाहता था,,,, मालिश के बहाने वहां मुखिया की बीवी की मक्खन जैसी कमर को अपने हाथों से छूना चाहता था स्पर्श करना चाहता था रगड़ना चाहता था इसलिए सूरज की बात सुनते ही वह बोली,,,,)

तब तो ठीक है तब तो तू मेरी भी मालिश कर लेगा ना,,,

जरूर मालकिन इसमें कौन सी बड़ी बात है,,,

सूरज तु कितना अच्छा लड़का है,,, काश तू मेरा बेटा होता तो मुझे यह सब चिंता करने की जरूरत ही नहीं होती,,,,

कोई बात नहीं मालकिन अपना ही समझो,,,,

(वैसे तो सूरज को औरतों से बात करने का अनुभव बिल्कुल भी नहीं था लेकिन न जाने क्यों इस समय वह मुखिया की बीवी के साथ एक मजे हुए मर्द की तरह बातें कर रहा था ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वह पहली बार किसी औरत से बात कर रहा हो ऐसा लग रहा था कि जैसे वह इस तरह की बातें औरतों से कर चुका है और उसे इस तरह की बातें करने में मजा भी आ रही थी,,,, मुखिया की बीवी की तो हालत खराब होती जा रही थी उसके बदन में उत्तेजना का तूफान उठ रहा था वह न जाने किस तरह से अपने आप को संभाली हुई थी वरना उसका मन तो चुदवाने के लिए मचल रहा था,,, उसकी बर पानी पानी हो रही थी उसे अपनी बुर से मदन रस टपकता हुआ महसूस हो रहा था,,,, मालिश वाली बात का जिक्र छेड़ कर वह मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह जानती थी की मालिश करवाने के बहाने वह अपने हर एक अंक को खोलकर सूरज को दिखा सकेगी और फिर सूरज को अपनी जवानी का जलवा दिखाकर मदहोश करके अपनी मनमानी करवा सकेगी और अपनी जवानी की आग बुझा सकेगी,,,,, क्योंकि अभी तक खेतों में जिस तरह से उसे गिरने से बचाते हुए सूरज ने उसे अपनी बाहों में भर लिया था,,, साड़ी के ऊपर से ही उसके लंड की चुभन उसे अभी तक महसूस होती थी,,,, और इस चुभन को महसूस करके मुखिया की बीवी अंदाजा लगा ली थी कि सूरज के पास जो मर्दाना अंग है वह बहुत खास और मजबूत है जो कि उसे अपनी बुर में लेकर वह पूरी तरह से अपनी जवानी का रस निचोड़ सकेगी,,,,)

रात धीरे-धीरे गहरा रही है देखो तो सही चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है और वैसे भी हम लोग गांव से काफी दूर आ चुके हैं,,,,

सही कह रहा है सूरज तू,,,, इसीलिए तो मुझे आम के बगीचे की रखवाली करने आना पड़ता है क्योंकि यह दूर है और यहां पर लोग आसानी से आम चुरा ले जाते हैं,,,,

(चूड़ियों की खनक पायल की झनक से वातावरण और भी ज्यादा उत्तेजित हुआ जा रहा था मुखिया की बीवी के खूबसूरत बदन की मादक खुशबू सूरज के तन बदन में आग लग रही थी पहली बार वह किसी औरत को इस तरह से अपने बदन से सटाया हुआ था इसीलिए तो औरत के बदन की खुशबू भी उसे महसूस हो रही थी,,,,,,, यहां तक की उसकी चूचियों की रगड़ से उसके बदन में उत्तेजना बरकरार थी वह पूरी तरह से मदहोश हुआ जा रहा था यहां तक कि उसे अपने लंड में दर्द महसूस होने लगा था,,,। और यही हाल मुखिया की बीवी का भी था उसकी बुर पानी पानी हो रही थी यहां तक की उसकी पर से निकलने वाला पानी उसे अपनी जांघों पर टपकता हुआ महसूस हो रहा था और जिस तरह से उसकी चूची उसकी छाती से रगड़ खा रही थी,,, उसकी वजह से उसकी चूची में उत्तेजना के चलते कसाव बढ़ता जा रहा था,,,,,, थोड़ी ही देर में आपका बगीचा दिखाई देने लगा बड़े-बड़े पेड़ की वजह से उसे जगह पर और भी ज्यादा अंधेरा छाया हुआ था,,,,, बगीचे पर नजर पडते ही मुखिया की बीवी बोली,,,।)

वह देख सूरज बगीचा आ गया,,,,

हां मालकिन बहुत बड़े-बड़े पेड़ हैं इसके आम भी तो बड़े-बड़े होंगे,,,,

बहुत बड़े-बड़े है रे चल तुझे दिखाती हूं,,,,

(मुखिया की बीवी यह बात अपनी चूचियों को लेकर बोली थी लेकिन सूरज समझ नहीं पाया था,,,, सूरज अभी भी उसी तरह से उसे सहारा देकर आगे बढ़ रहा था उसके हाथ में लालटेन थी और दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी थी और मुखिया की बीवी उसके कंधे पर हाथ रखकर एक हाथ में डंडा लेकर उसके सहारे से चल रही थी,,,, आम के बगीचे में प्रवेश करने से पहले ही वह शर्माने का नाटक करते हुए धीरे से बोली,,,)

ररररररर,,,, यही रुक जा सूरज,,,,,

(उसकी बात सुनते ही सूरज एकदम से रुक गया और उसकी तरफ आश्चर्य से देखते हुए बोला)

क्यों क्या हुआ मालकिन,,,,

अब तुझे कैसे कहूं मैं,,,,(इधर-उधर देखकर शर्माने का नाटक करते हुए बोली)

क्यों क्या हुआ बोलो तो सही,,,,

मुझे बड़ी जोरों की पेशाब लगी है,,,,

(मुखिया की बीवी के मुंह से पेशाब शब्द सुनते ही उत्तेजना के मारे सूरज का गला सूखने लगा पहली बार किसी औरत के मुंह से पेशाब करने वाली बात सुन रहा था उसका दिल जोरो से धड़कने लगा था वह पल भर में उत्तेजना के परम शिखर पर पहुंच चुका था वह आश्चर्य से मुखिया की बीवी के खूबसूरत चेहरे की तरफ देख रहा था जो की लालटेन की पीली रोशनी में और भी ज्यादा दमक रहा था,,,)

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
मुखिया की बीवी और सूरज दोनों आम के बगीचे में पहुंच चुके थे बगीचा एकदम घना था चारों तरफ आम के बड़े-बड़े पेड़ नजर आ रहे थे वैसे रात का समय था इसलिए कुछ खास ज्यादा दिखाई तो नहीं दे रहा था लेकिन जिस तरह का घना अंधेरा था उसे देखते हुए सूरत समझ गया था कि यह जगह आम के पेड़ों से पूरी तरह से घिरा हुआ था,,, और ऐसे में मुखिया की बीवी का पेशाब करने वाली बात का कहना सूरज के लिए पूरी तरह से उत्तेजना का संचार करने वाला साबित हो रहा था क्योंकि आज तक सूरज ने किसी औरत के मुंह से यह कहते हुए नहीं सुना था कि उसे बड़े जोरों की पेशाब लगी है यह मौका उसके लिए पहली बार का था इसीलिए तो उसके कान एकदम से खड़े हो गए थे और साथ में उसके पजामे में उसका लंड भी,,,, अपनी औकात में आ चुका था,,,,।

मुखिया की बीवी के मुंह से पेशाब करने वाली बात सुनकर सूरज पूरी तरह से चौंक गया था क्योंकि उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कोई औरत उसे यह शब्द का प्रयोग कर सकती है वह आश्चर्य से मुखिया की बीवी की तरफ ही देख रहा था जो की लालटेन की पीली रोशनी में पूरी तरह से दमक रहा था सूरज को पहली बार एहसास हो रहा था की मुखिया की बीवी कुछ ज्यादा ही खूबसूरत है उसका भरा हुआ चेहरा गोल-गोल ऐसा लग रहा था कि मानो जैसे गुलाब का फूल हो,,,, वह अभी भी सूरज के कंधों का सहारा लेकर खड़ी थी उसके बदन से उठ रही मादक खुशबू सूरज की तन बदन में आग लग रही थी इतने करीब वह किसी भी औरत के नहीं आया था जितना करीब मुखिया की बीवी के था,,,।

वैसे तो वह जानबूझकर ही सूरज को अपनी गांड दिखाने के लिए पेशाब करने वाली बात कही थी लेकिन पेशाब करने के नाम से ही उसे वास्तव में बड़े जोरों की पेशाब लग गई थी जिसकी वजह से वह अपने पैर को इधर-उधर रख रही थी वह अपनी पेशाब की तीव्रता को रोक नहीं पा रही थी उसकी हालत को देखकर सूरज भी समझ गया था कि वाकई में इसे पेशाब लगी है लेकिन वह पूरी तरह से मदहोश हो चुका था क्योंकि उसने आज तक किसी भी औरत को पेशाब करने की मुद्रा में कल्पना नहीं किया था उसके जीवन में पहली औरत उसके दोस्त की चाची थी जिसे वह पेशाब करते हुए देखा था और उसके दोस्त ने हीं दिखाया था,,,। सूरज को समझ में नहीं आ रहा था कि मुखिया की बीवी से वह क्या बोले,,, और मुखिया की बीवी खेली खाई औरत थी सूरज के मन की बात को अच्छी तरह से समझ रही थी सूरज के चेहरे के बदलते भाव को देखकर वह मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह समझ गई थी कि उसके मुंह से पेशाब करने वाली बात सुनकर सूरज पूरी तरह से हक्का-बक्का हो गया है,,,, इसलिए वह फिर से बोली,,,,।

समझ में नहीं आ रहा क्या करूं,,,,!

अब जैसा तुम ठीक समझो अगर रोक सको तो,,,(घबराते हुए सूरज ने बोला उसकी बात सुनकर मुखिया की बीवी बोली,,,,)

पागल हो गया है क्या कोई रोक सकता है अगर रोक भी सकता है तो कितनी देर तक पेट दर्द करने लगेगा पागल,,,

नहीं मेरे कहने का मतलब यह नहीं था,,,,

तू रहने दे अपने खाने के मतलब को यहां मेरी हालत खराब हो रही है अच्छा तो एक काम कर लालटेन को ठीक से पकड़,,,, और मेरी तरफ तु बिल्कुल भी मत देखना,,,

कैसी बात कर रही हो मालकिन मैं इतना बेशर्म थोड़ी हूं जो किसी औरत को,,,,(इतना कहकर सूरज रुक गया क्योंकि आगे का शब्द उसे कहने में शर्म महसूस हो रही,,, थी,,,।)

अच्छा ठीक है तो मुझे सहारा देकर उस झाड़ियों के पास ले जा,,,,

कहां ,,,,,,उधर,,,,(हाथ के इशारे से घनी झाड़ियां के बीच बताते हुए सूरज बोला,,,)

हां वही आज तो मुझे आना ही नहीं चाहिए था अगर मुझे पता होता है कितनी दिक्कत होगी तो मैं आता ही नहीं लेकिन अगर नहीं आती तो,,,, फिर कोई भी जाकर आम तोड़ कर ले जाता तूने देखा नहीं है सूरज इस बगीचे के हम बहुत बड़े-बड़े हैं खरबूजे जैसे मैं तुझे कल दूंगी,,,,,(मुखिया की बीवी के बाद जीत के दौरान सूरज उसे सहारा देकर घड़ी झाड़ियां के पास ले गया)

अब तू थोड़ा पीछे हो जा,,, लालटेन जितना लालटेन की रोशनी से ज्यादा दूर नहीं क्योंकि सांप बिच्छू का डर रहता है।

तुम चिंता मत करो मालकिन मैं चारों तरफ देख रहा हूं,,,,

भले तो चारों तरफ देखना लेकिन मेरी तरफ अभी मत देखना मुझे बहुत शर्म आती है,,,

नहीं नहीं मालकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं होगा मैं इतना गिरा हुआ नहीं हूं,,,,।

(मुखिया की बीवी जान बैठकर उसे अपनी तरफ ना देखने के लिए बोल रही थी लेकिन वह जानती थी कि सूरज उसे देखे बिना नहीं रह पाएगा क्योंकि वह मर्दों की फितरत से अच्छी तरह से वाकिफ थी,,, सूरज तीन-चार कदम दूर जाकर खड़ा हो गया जहां से लालटेन की रोशनी मुखिया की बीवी तक आराम से पहुंच रही थी वैसे भी वह इससे ज्यादा दूर नहीं जाना चाहता था क्योंकि वह लालटेन की रोशनी में मुखिया की बीवी को पेशाब करते हुए देखना चाहता था उसकी नंगी गांड के दर्शन करना चाहता था वह देखना चाहता था की पेशाब करती हुई औरत कितनी खूबसूरत लगती है क्योंकि वह अपने मां के इस लालच को दवा नहीं पा रहा था भले ही मुखिया की बीवी ने उसे ऐसा न करने की सलाह दी थी लेकिन वह मानने वाला नहीं था वह क्या दुनिया का कोई भी मर्द होता तो शायद इस समय मुखिया की बीवी की बात मानने से इनकार कर देता,,,,, मुखिया की बीवी झाड़ियां के पास खड़ी थी वह जानती थी कि इस बगीचे में सूरज के सिवा और कोई नहीं है फिर भी वह इधर-उधर देख ले रही थी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है यह उसकी आदत में शुमार था वैसे भले ही वह छिनार बन चुकी थी लेकिन फिर भी पेशाब करते हैं समय आदत के अनुसार वह इधर-उधर देख लेती थी कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा है और वैसे भी ज्यादा तर वह पेशाब करने बैठी थी तो किसी ना किसी को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ही,,,, जिसमें आज सूरज का नंबर था सूरज को वह पूरी तरह से अपनी जवानी का दीवाना बना देना चाहती थी ताकि वह उसका गुलाम बनकर रह जाए,,,, मुखिया की बीवी अपनी साड़ी को दोनों हाथों से पकड़ कर सूरज की तरफ देखे बिना ही वह बोली,,,)

तु यहां देख तो नहीं रहा है ना,,,,

नहीं मालकिन बिल्कुल भी नहीं,,,,( वह जानबूझकर अपनी नजर को दूसरी तरफ घूम लिया था)

ठीक है ऐसे ही खड़े रहना जब तक कि मैं पेशाब न कर लूं,,,,,(और इतना कहते हुए वहां अपने दोनों हाथों की नाजुक उंगलियों का सहारा लेकर अपनी साड़ी को उसमें फंसा कर ऊपर की तरफ उठने लगी जैसे-जैसे साड़ी ऊपर की तरफ जा रही थी वैसे सूरज का दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था वह तिरछी नजर से मुखिया की बीवी की तरफ ही देख रहा था,,,, देखते ही देखते मुखिया की बीवी की साड़ी उसके घुटनों तक उड़ गई उसकी मोटी मोटी मांसल चिकनी पिंडलियों को देखकर सूरज के बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी उसका लंड अकड़ने लगा,,,, धीरे-धीरे मुखिया की बीवी साड़ी को अपनी टांगों के ऊपर ले जा रही थी वह जानबूझकर धीरे-धीरे अपनी साड़ी को ऊपर उठा रही थी ताकि सूरज उसके बेहतरीन हुस्न को देखकर मदहोश हो जाए उसकी जवानी चारों खाने चित हो जाए,,, और ऐसा हो भी रहा था।

देखते ही देखते मुखिया की बीवी की साड़ी उसकी मोटी मोटी जांघों की ऊपर तक आ गई इतना ऊपर की सूरज को उसके नितंबों का नीचला हिस्सा दिखने लगा था और नितंबों के उसे गोलाकार आकार को देखकर सूरज की तो जैसे सांस ही अटकी जा रही थी उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था गांव से दूर अाम के बगीचे में इतना गर्म गर्म दृश्य देखने को मिलेगा उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था। जिस तरह से सूरज की हालत खराब थी उसी तरह से मुखिया की बीवी की भी हालत खराब हो रही थी हालांकि वह कई मर्दों के सामने अपने वस्त्र उतार कर नग्न हो चुकी थी लेकिन आज पहली बार उसे इस बात का एहसास हो रहा था कि कपड़े उतारते समय भी उसके बाद में उत्तेजना की लहर उठ रही थी वह मदहोश हो रही थी,,, आज उसे एक जवान लड़की के सामने अपने कपड़े उठाने में बेहद शर्म महसूस हो रही थी और इस शर्म की महसूसियत उसे अपनी दोनों टांगों के बीच की पतली दरार से बहती हुई महसूस हो रही थी,,,,।

जिस तरह से सूरज का दिल जोरों से धड़क रहा था उसी तरह से मुखिया की बीवी की भी सांस बड़ी तेजी से चल रही थी क्योंकि बस थोड़ा सा और उसकी अपनी साड़ी उठाना था इसके बाद सूरज को वही दिखने वाला था जो वह दिखाना चाहती थी उसकी गांड एकदम नंगी हो जाने वाली थी और इसी पल का सूरज के साथ-सा त मुखिया की बीवी को भी बड़ी बेसब्री से इंतजार,,,।

आम के बगीचे में पूरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ था बस चारों तरफ झींगुरों का शोर मचा हुआ था रहने कर दूर दराज से कुत्ते के भौंकने की भी आवाज आ रही थी कुल मिलाकर वातावरण भयानक ही था लेकिन इस भयानक वातावरण में भी मुखिया की बीवी अपनी जवानी के जोर से पूरे वातावरण को मदहोश बना दी थी,, सूरज जो की रात को बेवजह घर के बाहर नहीं निकलता था आज पहली बार मुखिया की बीवी के साथ वह खुली रात का आनंद ले रहा था और उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि रात में कितना मजा आता है रात में जितना दर का माहौल होता है उससे भी ज्यादा कहीं आनंद का माहौल बना होता है बस माहौल बनाने वाली होनी चाहिए,,, और इस समय रात के भयानक वातावरण में मदहोश कर देने वाला माहौल बनाने वाली थी मुखिया की बीवी जिसके अंग अंग से जवानी टपक रही थी,,,।
 
मुखिया की बीवी अब ज्यादा देर नहीं करना चाहती थी क्योंकि अभी रात बहुत बाकी थी और पूरी रात उसे आनंद लेना था इसलिए वह अपनी उंगलियों को हरकत करते हुए बाकी साड़ियों को भी अपने नितंबों से ऊपर उठा ली और देखते ही देखते लालटेन की पीली रोशनी में मुखिया की बीवी की भारी भरकम गोरी गोरी गांड एकदम से चमकने लगी जिस पर नजर पड़ते ही सूरज की हालत एकदम से खराब हो गई उसकी आंखें फटी की फटी रह गई मुखिया की बीवी की नंगी गांड देखकर वह मदहोश हो गया,,,,।

देख तो नहीं रहा है ना रे,,,,।

(मुखिया की बीवी पीछे नजर घुमाई बिना ही बोली क्योंकि वह तो जानती ही थी कि सूरज उसे ही देख रहा होगा पर इसीलिए वह सूरज के रंग में भंग नहीं डालना चाहती थी,,,, मुखिया की बीवी के इस सवाल पर सूरज पूरी तरह से हड़बड़ा गया और हडबढ़ाते स्वर में बोला,,,।)

नननन,,, नहीं बिल्कुल भी नहीं मैं ऐसा कर भी नहीं सकता,,,,।

(सूरज के लड़खड़ाते शब्दों को सुनकर मुखिया की बीवी के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव में जलने लगी क्योंकि उसके लड़का आते हुए शब्द ही उसके मन की बात को बयां कर रहे थे वह मुस्कुराने लगी और साड़ी को कमर तक उठाए हुए ही वह नीचे बैठ गई और अगले ही पल उसकी गुलाबी पूरे से पेशाब की धार फूट पड़ी और उसमें से एक तीर्व मधुर आवाज पूरे वातावरण में गुंजने लगी जो कि यह आवाज सूरज के कानों तक बड़े आसानी से पहुंच रही थी सूरत समझ गया था कि उसकी बुर से पेशाब निकल रहा है वह भी इस एहसास से ही मदहोश हुआ जा रहा था उसका लंड पूरी तरह से अकड़ गया था,,,। सूरज के लिए यह नजारा बेहद अद्भुत और अतुलनीय इस तरह के नजर को कभी अपनी आंखों से देखा नहीं था बस उसके दोस्त ने दूर से ही दिखाया था लेकिन इतना साफ-साफ उसे समय भी नहीं नजर आ रहा था क्योंकि वह काफी दूर था और झाड़ियां के पीछे खुद छुपा हुआ था लेकिन यहां सब कुछ खुला था लाल टीम की पीली रोशनी में मुखिया की बीवी पूरी तरह से नजर आ रही थी उसकी नंगी बड़ी-बड़ी गांड देखकर तू सूरज के मुंह में पानी आ रहा था उसका मन कर रहा था कि आगे बढ़कर मुखिया की बीवी की गांड को दोनों हाथों से पकड़ ले वह औरत की गांड को दोनों हाथों से पकडने का सुख भोगना चाहता था उसे सहलाना चाहता था देखना चाहता था की साड़ी में कसी हुई गांड वास्तव में छूने पर कैसी होती है,,,,।

मुखिया की बीवी की गुलाबी बुर में से निकल रही सीधी की आवाज पूरे वातावरण में गूंज रही थी और इस बात का एहसास मुखिया की बीवी को भी था वह अच्छी तरह से जानती थी कि बुर से निकल रही सिटी की आवाज सूरज के कानों में अच्छी तरह से पहुंच रही होगी और वही समाज को सुनकर पूरी तरह से मदहोश हो चुका होगा,,, वह इतना तो जानती ही थी कि सूरज उसकी तरफ ही देख रहा होगा लेकिन फिर भी वह अपने मन की तसल्ली के लिए हल्की नजरों से पीछे की तरफ देखने की कोशिश की तो वास्तव में सूरज आंख फाड़े उसकी तरफ ही देख रहा था उसके एक हाथ में कल आ रही थी और दूसरे हाथ में लालटेन थी,,, मुखिया की बीवी के तेज नजरों ने उसकी पजामे में उठे हुए भाग को भी देख ली थी और उसे भाग को देखकर उसके चेहरे की प्रसन्नता बढ़ने लगी और अंदर ही अंदर खुश होने लगी क्योंकि वह अपनी चाल में कामयाब होती हुई नजर आ रही थी वह जानती थी कि आज रात भर वह सूरज के साथ मजा लुटेगी,,,। फिर भी वह बोली,,,)

क्या रे सूरज देखा तो नहीं रहा है ना,,,

बिल्कुल भी नहीं मालकिन मैं अपने वादे का पक्का हूं एक बार कह दिया तो कह दिया,,,

मुझे तुझे यही उम्मीद थी तेरी जगह कोई और होता तो अपनी नजरों को यहां घूमाने से रोक नहीं पाता तु बहुत सीधा लड़का है,,।

(ऐसा कहते हुए वह अपनी बुर की गुलाबी छेद के अंदर से जोर लगाकर बड़े जोरों से पेशाब कर रही थी और उसके पेशाब की धार सामने की घास को भिगो रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पानी दे रही हो,,,, देखते ही देखते वह पूरी तरह से पेशाब कर चुकी थी लेकिन उसके झांट के बालों में उसके पेशाब की बूंदे अभी भी लगी हुई थी जिसे वह उठने से पहले अपनी बड़ी-बड़ी भारी भरकम गांड को झटका देते हुए अपने झांट के बाल में से पेशाब की बूंद को नीचे गिराने की कोशिश करने लगी,,, लेकिन उसकी यह हरकत सूरज के लिए बेहद जानलेवा साबित हो रही थी सूरज ठीक उसके पीछे खड़ा होकर मुखिया की बीवी को अपनी गांड झटकाते हुए देख रहा था,,, और उसके ऐसा करने पर उसकी गांड पूरी तरह से पानी में गिरे कंकड की तरह लहर मार रही थी,,, मुखिया की बीवी की तरफ से उसकी है हरकत सूरज को पूरी तरह से मदहोश कर गई और अनजाने में ही उसका हाथ पजामा के ऊपर से ही उसके खड़े लंड पर आ गया जिसे वह जोर से दबा दिया,,,, और उसकी यह हरकत पैनी नजरों से मुखिया की बीवी ने देख ली थी,,,। और मंद मंद मुस्कुराने लगी उसे यकीन हो गया था कि उसका जादू सूरज पर पूरी तरह से चल गया था,,, और वह पेशाब करने के बाद धीरे से उठकर खड़ी हो गई और फिर कमर तक उठे हुई साड़ी को वह धीरे से नीचे गिरा दी और पल भर में ही एक खूबसूरत नाटक पर पर्दा पड़ गया,,,, वह मुस्कुराते हुए सूरज की तरफ घूम गई और बोली,,,।

अब जाकर राहत हुई वरना ऐसा लग रहा था कि मैं चल ही नहीं पाऊंगी इतना दर्द कर रहा था मेरा पेट,,,,

चलो अच्छा हुआ मालकिन की तुम्हें आराम हो गया,,,,।

(सूरज चलने को तैयार था लेकिन मुखिया की बीवी उसके पास आकर उसके हाथ से लालटेन और कुल्हाड़ी लेते हुए बोली,,,,)

एक काम कर सूरज तू भी पेशाब कर ले वरना रात को लगेगी तो ऐसे माहौल में बाहर निकलना ठीक नहीं है क्योंकि सियार घूमते ही रहते हैं,,,,।

(सियार शब्द सुनकर ही सूरज को थोड़ी घबराहट हुई वह पेशाब नहीं करना चाहता था क्योंकि उसे लगी नहीं थी लेकिन मुखिया की बीवी का ठीक कहना भी था अगर रात को लगेगी तब क्या करेगा,,,, इसलिए वह तैयार हो गया और जहां पर मुखिया की बीवी बैठकर पेशाब कर रही थी उसे जगह पर जाने लगा और उसने लालटेन की रोशनी में गीली जमीन को देखा तो मन ही मन उत्तेजित होने लगा क्योंकि जहां पर मुखिया की बीवी बेठी थी वहां की मिट्टी मुखिया की बीवी के पेशाब से पूरी तरह से गीली हो चुकी थी,,,,। सूरज कदम आगे बढ़कर वहां से आगे निकल जाना चाहता था क्योंकि उसे भी मुखिया की बीवी के सामने पेशाब करने में शर्म महसूस हो रही थी लेकिन तभी मुखिया की बीवी ने उसे रोकते हुए बोली,,,)

अरे आगे मत जा जहां पर मैं कर रही थी वही कर ले आगे सांप बिच्छू का डर रहता है,,,,।

(मुखिया की बीवी अपने फायदे के लिए उसे पास में रखना चाहती थी लेकिन वह शर्म के मारे आगे चला गया लेकिन जैसे ही वह अपने पजामे पर हाथ रख वैसे ही झाड़ियां में हलचल हुई और वह एकदम से घबरा गया और तो कभी पीछे ले लिया मुखिया की बीवी भी इसी पल का फायदा उठाते हुए उसके पास पहुंच गई और उसका हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ खींचने लगी और बोली,,,,)

मैं कह रही हूं ना कि मत जा सांप बिच्छू का डर रहता है देख सांप निकल कर गया ना,,,,।

ओहहहह मालकिन मैं तो देखा ही नहीं मैं तो एकदम से घबरा गया,,,,।(डर के मारे हांफते हुए सूरज बोला,,,)

इसलिए तो कह रही हूं,,,, चल अब आगे मत जा यही पेशाब कर ले,,,, अगर तुझे कुछ हो गया तो तेरे घर वालों को क्या जवाब दूंगी,,,,,।

(झाड़ियों में सुरसुराहट की वजह से मुखिया की बीवी का काम बनता हुआ नजर आ रहा था,,,,, मुखिया की बीवी की बात सुनकर सूरज असहज होता हुआ बोला,,,,)

यहां,,,, नहीं नहीं मुझसे नहीं होगा,,, तुम्हारे सामने कैसे,,,,,

अरे तो क्या हो गया,,,, तू तो मेरे बेटे जैसा है और कोई मां भला अपने बेटे को नुकसान होने देना चाहेगी इसलिए तू यहीं पर कर ले अगर तुझे शर्म आती है तो मैं अपनी नजर घुमा लेती हूं,,,,,।

(इतना कहते हुए मुखिया की बीवी चालाकी दिखाते हुए अपनी नजर को दूसरी तरफ घुमली थी उसके हाथ में कुल्हाड़ी थी और दूसरे हाथ में लालटेन थी लालटेन की पीली रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था मुखिया की बीवी के सामने पेशाब करने में सूरज शर्म महसूस कर रहा था लेकिन उसे भी जोरों की पेशाब लग चुकी थी और मुखिया की बीवी नजर दूसरी तरफ घूम कर रखी थी इसलिए उसकी हिम्मत बढ़ने लगी और वह धीरे से पजामे को पकड़ कर नीचे कर दिया पजामे के नीचे होते ही उसका खड़ा लंड एकदम से हवा में झूलने लगा,,,, झाड़ियों में हुई सुरसुराहट की वजह से कुछ देर के लिए उसके लंड में थोड़ा ढीलापन आ गया था लेकिन सूरज के हाथ में आते ही एक बार फिर से उसमें रक्त का प्रभाव बड़ी तेजी से होने लगा और वह एकदम से कड़क हो गया और वह शर्म महसूस करते हुए पेशाब करना शुरू कर दिया,,,

पेशाब गिरने की आवाज कान में पडते ही,,, मुखिया की बीवी की दोनों कामों के बीच हलचल होना शुरू हो गया उसकी उत्सुकता बढ़ने लगी और वह अपने आप को सूरज की तरफ देखने से रोक नहीं पाई,,,, और वह धीरे से सूरज के लंड की तरफ निगाह घूमा कर देखने लगी तो उसके होश उड़ गए,,,, उसका मुंह खुला का खुला रह गया उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि आज तक कुछ नहीं इतना मोटा और लंबा लंड कभी नहीं देखी थी,, ।
 
सूरज के मोटे तगड़े लंड पर मुखिया की बीवी की नजर पढ़ते ही उसकी बुर उत्तेजना के मारे फुलने पीचकने लगी,,,, उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था उसे लग रहा था कि वह कोई सपना देख रही है कितना मोटा और लंबा लंड भी हो सकता है इसका उसे अंदाजा ही नहीं था,,, क्योंकि जवानी से लेकर उम्र के ईस पड़ाव तक बन जाने कितने लैंड को अपनी बुर में ले चुकी थी लेकिन आज तक उसकी आंखों के सामने उसकी बुर के अंदर इतना मोटा और तगड़ा लंड कभी भी प्रवेश नहीं कर पाया था,,, या यूं कह लो कि आज तक जितने भी मर्द उससे मिले थे उनका लंड ऐसा था ही नहीं तभी तो मुखिया की बीवी एकदम आश्चर्य चकित हो गई थी उसकी आंखों में उसे पाने की चमक साफ नजर आ रही थी सूरज को भी इस बात का एहसास हो गया था की मुखिया की बीवी उसके लंड को देख रही थी और यह एहसास होते ही सूरज के तन-बड़े में आग लगने लगी यह पहली मर्तबा था जब कोई औरत उसके लंड की तरफ देख रही थी,,,, सूरज शर्म से मरा जा रहा था लेकिन उसे अपने बदन मेंअत्यधिक उतेजना का अनुभव हो रहा था उसके हाथ में अभी भी उसका लंड था जिसमें से पेशाब की धार फूट रही थी वह मुखिया की बीवी को यह नहीं बोल पाया कि वह अपनी नजर को दुसरी तरफ कर ले क्योंकि ना जाने क्यों उसके मन में भी ऐसा हो रहा था की मुखिया की बीवी उसके लंड की तरफ देखते ही रहे,,, यही तो जवानी का नशा था यही तो इस उम्र की चाहत थी और इसी में सूरज मदहोशी के चरम शिखर पर विराजमान होता जा रहा था,,,,।

पेशाब करने के बाद जैसे ही सूरज ने लंड में से पेशाब की बूंद को झटकने के लिए अपने लंड को ऊपर नीचे करके दो-चार बार झटका और उसके इस तरह से झटकते हुए लंड को देखकर मुखिया की बीवी की उत्तेजना उसके बस में बिल्कुल भी नहीं रही और उसकी बुर से मदन रस की बुंद टपक कर नीचे जमीन पर गिर गई,,,, और फिर बिना कुछ बोले सूरज अपने लंड को वापस पजामे में डाल दिया लेकिन उसमें तंबू बना हुआ था,,,,।

हो गया मालकिन,,,,

हां अब ठीक है ,,ले लालटेन पकड़,,,, अब हमें चलना चाहिए,,,,, देख वह रही झोपड़ी बड़े से पेड़ के नीचे,,,, मैं आम के बगीचे की रखवाली के लिए ही है झोपड़ी बनवा कर रखी हूं,,,,,।

(हालांकि घना अंधेरा होने की वजह से वह झोपड़ी ठीक से सूरज को दिखाई नहीं दे रही थी लेकिन वह लालटेन पकड़कर आगे आगे चलने लगा,,,, और देखते ही देखते दोनों उस झोपड़ी के पास आ गए कुछ झोपड़ी के पास एक हेड पंप भी बना हुआ था,,, और हेड पंप को देखकर सूरज बोला,,,)

यह तो अच्छा की हो मालकिन की यहां पर हेड पंप गडवा कर रखी हो वरना अगर पानी प्यास लग जाए तो इंसान तो अपनी बिगर ही मर जाएगा,,,,।

इसीलिए तो हेड पंप लगवाई हूं,,,,,(इतना कहते हुए दोनों झोपड़ी के एकदम पास पहुंच गए एक हाथ में कुल्हाड़ी लिए हुए,,, मुखिया की बीवी लकड़ी के बने दरवाजे को खोलने लगी और लकड़ी का दरवाजा खोलते ही सूरज के हाथ में से लालटेन को ले ली और खुद पहले झोपड़ी में प्रवेश कर गई और उसके पीछे सूरज,,,,)

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रात पूरी तरह से गहरा चुकी थी चारों तरफ अंधेरा अंधेरा नजर आ रहा था,,, आपके बड़े-बड़े पेड़ होने की वजह से यह अंधेरा कुछ ज्यादा ही डरावना लग रहा था लेकिन इस समय ना तो मुखिया की बीवी के मन में किसी प्रकार का डर था और ना ही सूरज के मन में क्योंकि दोनों को एक दूसरे का साथ अच्छा लग रहा था और मुखिया की बीवी तो अपने मां के इरादों को पूरा करने के लिए सूरज को साथ में लेकर आई थी,,,, और जिस तरह का नजारा उसने कुछ देर पहले सूरज को दिखाई थी उसे देखने के बाद तो सूरज चारों खाने चित हो गया था वह पूरी तरह से मुखिया की बीवी की जवानी का गुलाम हो चुका था,,, इतने करीब से,,,, जिंदगी में पहली मर्तबा हुआ किसी औरत को पेशाब करते हुए देख रहा था जिसकी नंगी चिकनी गांड उसके इरादों को फिसलने पर मजबूर कर रही थी पहली बार वह औरत की बुर में से निकल रही सिटी की आवाज को एकदम साफ-साफ सुना था जिसे सुनने के बाद दुनिया का हर मधुर संगीत उसके लिए फीका नजर आ रहा था,,,,, वैसे तो सूरज इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि औरत से पेशाब करती है तो उनके बुर से सिटी की आवाज निकलती है लेकिन यह उसके लिए पहली बार था जब वह उस आवाज को सुना था,,, इसीलिए तो अभी भी उसके पजामे में उसका लंड तना हुआ था,,,।

मुखिया की बीवी के लिए खाई औरत थी इसीलिए जबरदस्ती उसे वहीं पर पेशाब करवाने के बहाने उसके लंड के दर्शन कर ली थी और आंखों ही आंखों में उसकी लंबाई और मोटी को नाप चुकी थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह जानती थी कि जिस तरह का हथियार सूरज के पास है उसकी जवानी का रस पूरी तरह से निचोड़ देगा,,,,, सूरज के मुसल को वह अपनी ओखली में लेने के लिए तड़प रही थी,,,। दोनों छोटी सी घास फूस की झोपड़ी के पास पहुंच चुके थे,,,, लकड़ी के दरवाजे को खोलकर सबसे पहले मुखिया की बीवी उसे झोपड़ी में प्रवेश की ओर पीछे-पीछे सूरज,,,, सूरज का दिल बड़े जोरों से धड़क रहा था क्योंकि वह पहली बार रात के एकांत में किसी खूबसूरत जवान औरत के साथ रात गुजारने वाला था उसे नहीं मालूम था कि आज की रात उसके साथ क्या होने वाला है,,, लेकिन मुखिया की बीवी की हरकत को देखकर इतना तो वह समझ ही गया था कि मजा बहुत आने वाला है,,,,,,।

थोड़ी ही देर में पुरी झोपड़ी में लालटेन के पीली रोशनी फैल गई झोपड़ी के अंदर सब कुछ साफ-साफ नजर आने लगा,,,, झोपड़ी के अंदर एक टेबल रखा हुआ था जिस पर गिलास और थाली रखी हुई थी पास में चारपाई बिछी हुई थी लेकिन बिस्तर मोड कर रखा गया था क्योंकि जब झोपड़ी के अंदर रुकना होता था तभी बिस्तर को चारपाई पर बिछाया जाता था,,,,, सूरज झोपड़ी के अंदर खड़ा होकर पुरी झोपड़ी में नजर घुमा कर देख रहा था घास फूस की झोपड़ी में भी छोटी सी खिड़की बनी हुई थी जिसमें से ठंडी हवा अंदर आती थी ताकि गर्मी ना लगे और इस समय भी ठंडी हवा खिड़की से झोपड़ी के अंदर बड़े आराम से आ रही थी और बदन में ठंडक का एहसास दिला रही थी,,,,। मुखिया की बीवी भी मुस्कुरा कर कभी सूरज की तरफ तो कभी अपनी झोपड़ी की तरफ देख रही थी ईस झोपड़ी में उसके जीवन के बहुत ही रंगीन रातें बीती थी यह वही चारपाई थी जिस पर उसने अपनी जवानी लुटाई थी,,, और आज अपनी ही चारपाई पर वहां सूरज का बिस्तर गर्म करने के इरादे से उसे लेकर आई थी,,,,।

अरे सूरज दरवाजा तो बंद कर दे नहीं तो जंगली जानवर अंदर घुस जाएंगे,,,,।

जी मालकिन,,,(इतना कहने के साथ ही वह दरवाजे की तरफ बढ़ गया,,, दरवाजे पर खड़े होकर वहां बाहर की तरफ नजर घुमाई तो बाहर का अंधेरा देखकर उसे थोड़ी बहुत घबराहट महसूस हो रही थी क्योंकि चारों तरफ उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था बस केवल चारों ओर से झींगुर की आवाज आ रही थी जिससे वातावरण और भी भयानक नजर आ रहा था,,, वह तो उसके साथ मुखिया की बीवी थी जिसकी जवानी के दर्शन वह कर चुका था और इसी लालच में हो उसके साथ इस आम के बगीचे की रखवाली करने के लिए इतनी रात को आया था वह जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया छोटी सी झोपड़ी को भी मुखिया की बीवी ने बहुत अच्छे तरीके से बनवा कर एक छोटा सा घर की तरह उसे सकल दे दी थी और इस झोपड़ी में रात रुकने लायक सभी साधन मौजूद थे,,,, दरवाजा बंद करने के बाद जैसे ही हो मुखिया की बीवी की तरफ घुमा मुखिया की बीवी उसे फिर से बोली,,,,।

लालटेन को टेबल पर रख दे,,,, ताकि पूरे झोपड़ी में रोशनी बनी रहे,,,, तुझे रोशनी में नींद तो आती है ना,,,

की मालकिन कोई दिक्कत नहीं होती,,,,,(सूरज सो रहा था की मुखिया की बीवी सहज रूप से यह सवाल पूछ रही थी,,, लेकिन हकीकत यही था कि वह लालटेन की पीली रोशनी में सब कुछ साफ-साफ देखना चाहती थी वरना उसे भी रोशनी में नींद नहीं आती थी,,,,)

ठीक है मुझे भी रोशनी पसंद है,,,

अब तुम्हारी कमर का दर्द कैसा है,,,(लालटेन को टेबल पर रखते हुए सूरज बोला)

कैसा क्या है इसका इलाज ही कहां हुआ है जो आराम मिल जाएगा,,,, हाय दइया बहुत दर्द कर रही है,,,(मुखिया की बीवी को जैसे एकदम से याद आ गया हो कि उसकी कमर में तो दर्द हो रहा था और तुरंत अपनी कमर पर हाथ रखते हुए बोली,,,)

लगता है मालिस से ही इसका दर्द ठीक होगा,,,,

मुझे भी ऐसा ही लग रहा है,,,,

लेकिन मालकिन यहां तेल मिलेगा कहां,,,(सूरज थोड़ा निराश होते हुए बोला)

अरे बुद्धू सब कुछ मिल जाएगा वह टेबल पर जो संदूक रखी है ना उसके अंदर देख सरसों के तेल की सीसी रखी होगी,,, मुखिया की बीवी के कहते हैं सूरज टेबल पर रखे हुए संदूक को खोलकर अंदर देखा तो अंदर वाकई में सरसों के तेल की शीशी दिया सलाई और थोड़ी बहुत काम के साधन पड़े हुए थे सरसों के तेल की शीशी को देखकर सूरज मन ही मन प्रसन्न होने लगा क्योंकि वह जानता था की मालिश के बहाने वह आज औरत के अंगों को स्पर्श कर पाएगा,,, वह जल्दी से सब दुख में से सरसों के तेल की शीशी को निकाल लिया और संदूक को बंद कर दिया,,,, मुखिया की बीवी सूरज की तरफ देख रही थी सूरज के चेहरे पर उत्सुकता और प्रसन्नता के भाव साफ नजर आ रहे थे और मुखिया की बीवी सूरज को देखकर प्रसन्न हो रही थी उसके अरमान मचल रहे थे क्योंकि वह अच्छी तरह से जानते थे कि बस थोड़ी देर की बात है उसके बाद तो सूरज उसकी पूरी तरह से गुलाम हो जाएगा और वह जो कहेगी वही करेगा ,,,,, क्योंकि मुखिया की बीवी को पूरा अनुभव था कि मर्द किस तरीके से औरत के काबू में आते हैं पहली मर्तबा तो वह सूरज को नहाने के बहाने अपनी खूबसूरत अंग के दर्शन करा कर उसे ऐसा मोह जाल में फंसा ही थी कि आज वह खुद आम के घने बगीचे में रात रुकने के लिए तैयार हो गया था,,,

सूरज तू मालिश कर तो लेगा ना,,,,,,,(मुखिया की बीवी जानबूझकर आश्चर्य से सूरज की तरफ देखते हुए बोली,,,, लेकिन औरतों से हमेशा कन्नी काटने वाला सूरज कुछ भी दिनों में औरतों के बेहद करीब रहने का शौकीन बन चुका था इसलिए पूरे आत्मविश्वास के साथ वह बोला,,,,)

जी मालकिन चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है ऐसी मालिश करूंगा कि तुम जिंदगी भर याद रखोगी,,,,(हाथ में सीसी लिए हुए वह हल्की मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए बोला,,,,,,, सूरज को मुस्कुराता हुआ देखकर मुखिया की बीवी के मन में भी संतुष्टि हो रही थी वह भी मुस्कुरा कर सूरज की तरफ अच्छी और हल्के से लंगड़ा कर चलने का बहाना करते हुए वहां बिस्तर के करीब जाने लगी और बोली,,,)

रुक पहले में बिस्तर लगा लूं,,,,,(इतना कहने के साथ ही वह चारपाई पर रखे हुए बिस्तर को खोलने लगी बिस्तर लगाने से सूरज मुखिया की बीवी को इनकार करना चाहता था लेकिन जिस तरह से वह बिस्तर लगाने के लिए झुकी हुई थी उसकी भारी भरकम गांड एकदम उभर कर सामने नजर आ रही थी साड़ी में कई होने के बावजूद भी उसकी रूपरेखा लालटेन की पीली रोशनी में एकदम साफ नजर आ रही थी सूरज तो एकदम मतवाला हो चुका था उसका मन कर रहा था कि पीछे से जाकर मुखिया की बीवी को पकड़ ले और उसकी बड़ी-बड़ी गांड पर अपना लंड रगड़ रगड़ कर अपने तन की गर्मी को शांत करें,,, सूरज ठीक उसके पीछे खड़ा होकर मुखिया की बीवी को देख रहा था वह झुक कर बिस्तर लगा रही थी उसके इस तरह से झुकने में भी बड़ा आनंद था सूरज नजर भरकर उसके पिछवाड़े को देख रहा था,,,, की तभी उसे याद आया की झोपड़ी में तो एक ही कर पाई है वह कहां सोएगा क्योंकि यह तो निश्चित ही था कि मुखिया की बीवी चारपाई पर ही लेटने वाली है लेकिन उसके लेटने की कोई व्यवस्था नहीं थी और ना ही कोई चादर थी जिसे वह जमीन पर बिछाकर सो सके या चटाई पर आराम कर सके,,, इसलिए अपने मन में उमड़ रहे इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए वह मुखिया की बीवी से बोला,,,)

मालकिन यहां तो सिर्फ एक ही कर पाई है और कोई चटाई भी नहीं है मैं कहां सोऊंगा,,,,।

(उसके इस मासूमियत भरे सवाल पर मुखिया की बीवी मन ही मन प्रसन्न होने लगी और उसकी प्रसन्नता के भाव उसके होठों पर आ गए और मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

अरे बुद्धू एक ही चारपाई का मतलब है कि हम दोनों इसी पर सोएंगे तुझे कोई दिक्कत है क्या मेरे साथ सोने में,,,,।

(मुखिया की बीवी के मुंह से इतना सुनते ही सूरज के तन बदन में उत्तेजना की लहर उठने लगी उसके मन की तरंगे उछाल मारने लगी,,,,,, वह एकदम से मदहोश हो गया और मुखिया की बीवी की तरफ आश्चर्य से देखने लगा,,, क्योंकि एक औरत के मुंह से इस तरह के जवाब कि उसे उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी वह सच में पड़ गया था कि यह खूबसूरत जवान औरत एक जवान लड़के के साथ एक ही चारपाई पर कैसे सो सकती है लेकिन यहां पर वही हो रहा था जिसके बारे में उसने कभी कल्पना भी नहीं किया था,,,, मुखिया की बीवी भी सूरज के चेहरे पर उठ रहे भाव को देख रही थी और समझ रही थी और मन ही मन प्रसन्न हो रही थी वह समझ गई थी कि एक ही चारपाई पर सोने के नाम पर सूरज की हालत खराब हो गई थी और वह‌ चोर नजरों से उसके पजामे की तरफ भी देखी तो उसके होश उड़ गए,,, उसके पजामे में अच्छा खासा तंबू बना हुआ था और उसके तंबू की शक्ल देखकर,,,, उसकी बुर पानी छोड़ने लगी और वह अपने मन में ही अपने आप से ही बोली,,,, बाप रे ये तो तेरी बुर का भोसड़ा बना देगा,,,,। सूरज के चेहरे पर अभी भी आश्चर्य के भाव साफ नजर आ रहे थे उसके मन में यही चल रहा था कि वह एक खूबसूरत जवान औरत के साथ एक ही बिस्तर पर कैसे सोएगा यह सोचकर वह हैरान भी था और उसे उत्सुकता भी हो रही थी क्योंकि वह इस अनुभव को पूरी तरह से जी लेना चाहता था,,,।

जो हाल इस समय सूरज का था वही हाल मुखिया की बीवी का भी था,,, ऐसा नहीं था कि यह मुखिया की बीवी के लिए पहली बार था जिंदगी में न जाने वह कितनी बार अनजान जवान मर्दों के सामने अपने कपड़ों को उतार कर नंगी हो चुकी थी और उनके साथ जवानी का मजा लूट चुकी थी लेकिन फिर भी सूरज के सामने न जाने क्यों उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह पहली बार यह सब करने जा रही थी और सूरज के लिए तो यह सब बिल्कुल नया सा था एक नई दुनिया नया सुख नहीं अनुभूति इसलिए उसके मन में उत्सुकता बहुत ज्यादा थी,,,,।

मुखिया की बीवी बिस्तर लगा चुकी थी सिरहाने दो तकिया भी था दो तकिया को देखकर सूरज मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था क्योंकि जिंदगी में पहली बार वह खूबसूरत औरत के पास सोने जा रहा था और वह भी एक ही चारपाई पर,,, सूरज के हाथ में सरसों के तेल की सीसी थी सीसी की तरफ देखते हुए मुखिया की बीवी बोली,,,,।

तू तैयार है ना मालिश करने के लिए,,,,।

जी मालकिन,, ,,

(सूरज के इतना कहते ही मुखिया की बीवी मुस्कुराते हुए,,,, अपनी साड़ी का पल्लू कंधे पर से पकड़ कर नीचे गिरा दी और उसकी छातिया एकदम से उजागर हो गई ब्लाउज में कैद उसकी दोनों चूचियां जाल में फंसे हुए कबूतर की तरह पंख फड़फड़ा रहे थे सूरज तो मुखिया की बीवी का यह रूप देखता ही रह गया उसकी भरी फूली छाती देखकर उसके होश उड़ गए,,।)

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मुखिया की बीवी धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए सूरज को अपनी जवानी के जाल में पूरी तरह से फंसा रही थी,,, घनघोर रात में मुखिया की बीवी सूरज को लेकर अपने आम वाले बगीचे पर बगीचे की रखवाली करने के बहाने पहुंच चुकी थी और उसे झोपड़ी में मालिश के बहाने अपने वस्त्र उतारना शुरू कर दी थी मुखिया की बीवी इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि दुनिया का कोई मर्द औरत के उत्तेजक बदन को देखकर मुंह नहीं मोडता,,, बल्कि खूबसूरत औरत के मादक रूप को देखकर वह उसका गुलाम बन जाता है और यही सूरज के साथ भी हो रहा था धीरे-धीरे सूरज मुखिया की बीवी के हर एक बात को मानते हुए आज उसके बेहद करीब पहुंच गया था,,,, सूरज को यह नहीं मालूम था कि आज की रात क्या होने वाला है लेकिन इतना जरुर जानता था कि मजा बहुत आने वाला है जिसकी शुरुआत हो चुकी थी,,।

मुखिया की बीवी अपने साड़ी के पल्लू को अपने कंधे पर से पकड़ कर नीचे गिरा दी थी जिसकी वजह से उसकी भारी भरकम चूचियां ब्लाउज में कैद एकदम से उजागर हो गई थी,, जिसे देखते ही सूरज की आंखें फटी की फटी रह गई थी सूरज की आंखों के सामने मुखिया की बीवी की खरबूजे जैसी चूचियां कबूतर की तरह उसके ब्लाउज की कैद में फड़फड़ा रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी चूचियां खुद ब्लाउज फाड़कर बाहर आने को उतारू हो चुकी है,,,, सूरज की तो सांसे ऊपर नीचे होने लगी क्योंकि मुखिया की बीवी की चूची हो कि बीच की पतली तरह एकदम साफ नजर आ रही थी और बहुत ही ऊपर और गहरी लकीर छोड़ रही थी,,,। सूरज आंख फाड़े मुखिया की बीवी की छातियो की तरफ देख रहा था और यह देखकर मुखिया की बीवी मन ही मन प्रसन्न हो रही थी जवानी की पहली सीढ़ी सफलतापूर्वक मुखिया की बीवी ने सूरज को पार करा दी थी,,,, मुखिया की बीवी अच्छी तरह से जानती थी कि जब सूरज का यह हाल सिर्फ ब्लाउज के ऊपर से देखने से है अगर वह ब्लाउज उतार कर अपनी नंगी चूचियां दिखाई की तब सूरज का क्या हाल होगा यह सोचकर वह मन ही मन प्रसन्न हो रही थी,,, ।

रुक जरा मैं साड़ी उतार दूं तब तू आराम से मालिश कर सकेगा नहीं तो मालिश करने में भी दिक्कत आएगी,,,,,(साड़ी को अपनी कमर से खोलते हुए मुखिया की बीवी बोली और उसकी यह बात सुनकर सूरज कुछ बोल नहीं पाया बस वह हैरान होकर मुखिया की बीवी की तरफ देखता रह गया और मुखिया की बीवी उसकी आंखों के सामने ही अपने वस्त्र को उतार रही थी अपनी साड़ी को अपने कमर से खोलकर उसे धीरे-धीरे अपनी कमर से अलग कर रही थी यह देखकर तो सूरज का तंबू एकदम बंबू बन चुका था,,, वह पसीने से तरबतर होने लगा था,,,.।,,, सूरज के सामने अपने वस्त्र उतारने में मुखिया की बीवी के भी तन बदन में हलचल हो रही थी खास करके जब-जब उसकी नजर सूरज के तंबू की तरफ जाती तब तब उसकी दोनों टांगों की पतली दरार में हलचल सी होने लगती थी उसकी बुर कुल बुलाने लगती थी,,, क्योंकि उसकी पारखी नजरे अच्छी तरह से जानती थी कि सूरज के पजामे में कौन सा हथियार छुपा हुआ है और वैसे भी वह पेशाब करते हुए उसके लंड के दर्शन को कर चुकी थी और जिस तरह के हालात उसकी दोनों टांगों के बीच नजर आ रहे थे उसे देखते हुए वह अंदर ही अंदर थोड़ा घबरा भी रही थी,,,। क्योंकि नजर भर में ही उसने सूरज के लंड की मोटाई और लंबाई को अपनी आंखों से ही नाप ली थी उसके लंड कैसे पानी को देखते ही उसकी आंखों के सामने आलू बुखारा नजर आ रहा था जो कि उसके लंड का सुपाड़ा एकदम आलू बुखारे की तरह था,,, और यही सोचकर वह घबरा रही थी कि सूरज का आलू बुखारा जैसा सुपाड़ा उसकी गुलाबी बुर में कैसे घुसेगा,,, आज तक जितने मर्दों के साथ उसने संबंध बनाई थी यह सवाल उसके मन में कभी नहीं उभरा था लेकिन सूरज के मामले में कुछ अलग ही हलचल उसके मन में हो रही थी और इस हाल-चाल को लेकर वह‌ बेहद उत्सुक भी थी,,,, वह जल्द से जल्द सूरज के संड के मोटे सुपाड़े को अपनी गुलाबी छेद पर महसूस करना चाहती थी वह देखना चाहती थी कि एक जवान मर्द का मोटा तगड़ा लंड जब एक औरत की बुर पर स्पर्श होता है तो औरत को कैसा महसूस होता है हालांकि इस अनुभव से वह कई बार गुजर चुकी थी लेकिन आज नए अनुभव की तलाश उसे थी,,,, जिसके लिए वह धीरे-धीरे करके अपने कमर पर से अपनी साड़ी को खोलकर अपने बदन से अलग कर चुकी थी और उसे नीचे जमीन पर गिरा दी थी सूरज की आंखों के सामने अब वह केवल पेटिकोट और ब्लाउज में थी जो की पीली रोशनी में सबको साफ नजर आ रहा था सूरज हक्का-बक्का होकर मुखिया की बीवी की मदहोश कर देने वाली जवानी को अपनी आंखों को देख रहा था या यूं कह लो की मुखिया की बीवी की मदहोश जवानी का रस वह अपनी आंखों से पी रहा था,,,।

एक तरह से सूरज इस खेल में पूरी तरह से अनाड़ी ही था क्योंकि अगर उसकी जगह कोई और अनुभव से भरा हुआ जवान मर्द होता तो मुखिया की बीवी को अपने हाथों से अपने वस्त्र उतारने की जरूरत ही नहीं पड़ती वह खुद अपने हाथों से अब तक तो मुखिया की बीवी के वस्त्र को उतार कर उसे संपूर्णता नग्न कर चुका होता,,, लेकिन इसमें सूरज का भी कोई दोस्त नहीं था उसमें अनुभव की कमी थी वह इस खेल में पूरी तरह से नया था इस खेल के नियम के बारे में उसे बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था वह नहीं जानता था कि औरत रूपी किताबों के पन्नों को किस तरह से खोला जाता है किस तरह से उसके अंगों के शब्दों को पढ़ा जाता है वह तो नादान की तरह बस आंखें फाड़े देखे जा रहा था और इतने से ही उसे अत्यधिक उत्तेजना का अनुभव हो रहा था उसकी उत्तेजना इतनी चरम पर थी कि उसे लग रहा था कि उसका लंड फट जाएगा और उसे इस बात का डर था कि कहीं उसका लंड पजामा फाड़ कर बाहर न जाए,,,।

मुखिया की बीवी साड़ी को उतारकर जमीन पर फेंकने के बाद सूरज की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए चारपाई पर बैठ गई उसके पैर नीचे जमीन पर थे और वह सूरज की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी सूरज के होठों से एक भी शब्द फुट नहीं रहे थे ऐसा लग रहा था कि जैसे वह कोई मूर्ति बन गया हो वह मुस्कुराते हुए बोली,,,।

देख सूरज,,, आज मजबूरी वश किसी जवान लड़के के सामने अपने कपड़े उतार रही हूं तुझ पर भरोसा करके लेकिन इस बात की खबर अपने मालिक को बिल्कुल भी नहीं होने देना नहीं तो मेरी सामत आ जाएगी और साथ में तेरी भी,,, मैं क्या कह रही हूं समझ रहा है ना,,,, इस बात को राज ही रखना है कि आज की रात झोपड़ी में क्या हो रहा है,,,।

बिल्कुल मालकिन मैं इस बात को किसी से नहीं कहूंगा मैं अच्छी तरह से जानता हूं एक औरत की इज्जत क्या होती है और वैसे भी कोई औरत अनजान मर्द के सामने इस तरह से कपड़े नहीं उतरती वह तो तुम्हारी मजबूरी है मैं सब समझता हूं आज की रात जो कुछ भी हो रहा है वह राज ही रहेगा तुम निशचिंत रहो,,,,

(सूरज का जवाब सुनकर मुखिया की बीवी मुस्कुराने लगी और मुस्कुराते हुए बोली,,,)

तू बहुत समझदार है इसीलिए तो तुझ पर भरोसा कर रही हूं,,,, अब अच्छे से मालिश करना ताकि मेरा दर्द एकदम से दूर हो जाए,,,।

तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो नमकीन ऐसी मालिश करूंगा कि तुम खुश हो जाओगी,,,।

ठीक है,,,(इतना कहकर मुस्कुराते हुए मुखिया की बीवी चारपाई पर पेट के बल लेट गई और पेट के बल लेटने से जो नजर सूरज की आंखों के सामने नजर आ रहा था उसे देखकर सूरज के तन बदन में आग लगने लगी उसके होश उड़ाने लगे और मदहोशी उसके नसों में घुलने लगी,,,, पेट के बल लेटने की वजह से,,, मुखिया की बीवी की भारी भरकम गांड और भी ज्यादा उभरी हुई नजर आने लगी क्योंकि उसने साड़ी उतारती थी और पेटिकोट का पतला कपड़ा उसके कसे हुए नितंबों से एकदम चिपक सा गया था,,ं और उसकी गांड की रूपरेखा एकदम साफ तौर पर नजर आ रही थी जिसे देखकर सूरज के तन बदन में आग लग रही थी उसके पीठ की नीचे कमर के इर्द-गिर्द जो हल्का सा दोनों तरफ गड्ढा पड़ा हुआ था उसे देखकर तो सूरज की जवानी मुखिया की बीवी की जवानी के आगे घुटने टेक रही थी सूरज मदहोश होकर मुखिया की बीवी के खूबसूरत बदन की रूपरेखा को देख रहा था और मुखिया की बीवी नजर को तिरछी करके सूरज की तरफ देखकर मन ही मन प्रसन्न हो रही थी क्योंकि वह इतना तो समझ ही गई थी कि ,, सूरज उसकी गांड देखकर ही मंत्र मुग्ध हुआ जा रहा है,,,, सूरज को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें और कुछ देर तक इसी तरह से खड़े होकर केवल मुखिया की बीवी की जवानी को रह गया वह तो यह भी भूल गया था की मदहोशी के आलम में उत्तेजित अवस्था में उसका लंड पूरी तरह से अपनी औकात में आकर खड़ा था और पजामे में तंबू बनाया हुआ था,,,,।

अरे खड़ा होकर देखता ही रहेगा या मालिश भी करेगा,,,(मुखिया की बीवी की आवाज से सूरज की तंद्रा भंग हुई और एकदम से हड़बड़ा गयाऔर बोला,,,)

जजजज,,,,जी मालकिन मै शीशी का ढक्कन खोल रहा था,,,,(और इतना कहने के साथ ही वहां जल्दी-जल्दी सीसी का ढक्कन खोलने लगा सीसी का ढक्कन खुलते ही वह,, हाथ में सरसों के तेल की सीसी लिए हुए ठीक उसके बगल में चारपाई के पाटी पर बैठ गया,,,,,, इससे पहले उसने कभी भी किसी औरत की मालिश नहीं किया था हां अपने पिताजी की मालिश जरूर किया था जब उनकी कमर दुखती थी लेकिन एक औरत के अंगों की मालिश करने की लालच को वह रोक नहीं पाया था इसलिए हामी भर दिया था लेकिन फिर भी अनुभव न होने के बावजूद भी अपने पिताजी की पीठ और कमर की मालिश का अनुभव उसे जरूर था,,,।

दोनों तरफ से उत्सुकता बढ़ती जा रही थी मुखिया की बीवी जल्द से जल्द सूरज के हाथों को अपनी चिकनी नंगी पीठ पर महसूस करना चाहती थी उसका बस चलता है तो इसी समय अपने सारे वस्त्र उतार कर नंगी होकर सूरज से मालिश करवाती ,,,लेकिन धीरे-धीरे आगे बढ़ने में उसे भी मजा आ रहा था,,,

सूरज चारपाई की पाटी पर बैठा हुआ था,,, उसकी नज़रें मुखिया की बीवी के गोलाकार उभरे हुए नितंबों और उसकी चिकनी कमर पर ही टिकी हुई थी,,,। सूरज सरसों के तेल की सीसी में से तेल की धार को अपनी हथेली में गिराने लगा और फिर उसे सीसी को चारपाई के नीचे रख कर धीरे से अपनी हथेली को मुखिया की बीवी की कमर पर रख दिया और जैसे ही सूरज ने अपनी हथेली को मुखिया की बीवी की चिकनी कमर पर रखा मुखिया की बीवी एकदम से मदहोश हो गई उसके चेहरे के भाव एकदम से बदल गए ऐसा लग रहा था कि जैसे पहली बार यह सब हो रहा है और सूरज भी एक खूबसूरत जवान औरत की चिकनी कमर पर अपनी हथेली रखते ही उसके नरम नरम चिकनी कमर का एहसास हथेली पर होते ही मदहोश होने लगा,,,,, और धीरे-धीरे वह अपनी हथेली को मुखिया की बीवी की कमर पर घुमाना शुरू कर दिया,,,, सूरज का यह पहला मौका था जब वह किसी जवान खूबसूरत औरत की कमर की मालिश कर रहा था और पल भर में ही वह आनंद के परम सागर में गोते लगाने लगा उसे बहुत अच्छा लग रहा था उसकी नज़रें लगातार उसके नितंबों पर टिकी हुई थी वह मनी मनी यही चाह रहा था की मुखिया की बीवी अपनी पेटीकोट भी उतार देती तो उसकी नंगी गांड़ की मालिश करने में और ज्यादा मजा आता,, कुछ ही देर में सूरज की दोनों हथेलियां सरसों के तेल की चिकनाहट और मुखिया की बीवी की चिकनी कमर की चिकनाहट पाकर फिसलने लगी,,,, देखते ही देखते सूरज पेटिकोट के किनारे और ऊपर ब्लाउज के किनारे के बीचों बीच चिकनी पीठ पर तेल की मालिश करना शुरू कर दिया था और उसकी चिकनी पीठ सरसों के तेल की वजह से लालटेन की पीली रोशनी में एकदम चमक रही थी,,,, मुखिया की बीवी को सुखद अनुभव हो रहा था,,,ं एक तरफ उसे मालिश की वजह से आराम की अनुभूति हो रही थी वहीं दूसरी तरफ सूरज की हथेली से मदहोशी का एहसास भी हो रहा था जिसके चलते उसकी बुर से नमकीन रस टपक रहा था,,,। कुछ देर मालिश करने के बाद मालिश करते हुए सूरज बोला,,,

अब कैसा लग रहा है मालकिन,,,

बहुत मजा आ रहा है सूरज मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है कि तू मालिश करने में इतना माहिर है इतना तो औरतें भी अच्छी तरह से मालिश नहीं कर पाती तुझे मालूम है गांव में एक औरत है जिसे मालिश करने के लिए मैं बुलाती हूं वह अक्सर महीने में एक दो बार मेरी मालिश कर देती है लेकिन जितना अच्छा तू कर रहा है उतना वह नहीं कर पाती,,,,।

यह तो तुम्हारा बड़प्पन है मालकिन वरना में मालिश करने में माहिर तो नहीं हूं लेकिन अच्छी खासी कर लेता हूं,,,,(इतना कहने के साथ ही सरसों के तेल की चिकनाहट पाकर सूरज की उंगली एकदम से मुखिया की बीवी के ब्लाउज के किनारी में हल्के से प्रवेश कर गई,,,, और इसका एहसास मुखिया की बीवी को होते ही वह एकदम से मदहोश हो गई उसे ऐसा लग रहा था कि जैसे जानबूझकर सूरज ने अपनी उंगली को उसके ब्लाउज में घुसाने की कोशिश किया हो,,, वह अंदर ही अंदर प्रसन्न होने लगी लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं था तेल की चिकनाहट पाकर सूरज की उंगली अपने आप फिसल कर ब्लाउज में सरक गई थी,,,, लेकिन अनजाने में हुए इस हरकत से सूरज को भी बहुत अच्छा महसूस हो रहा था और उसकी हरकत पर मुखिया की बीवी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया होता ना देखकर सूरज की हिम्मत बढ़ने लगी थी और वह मालिश करते हुए अपनी उंगली को रह रहा कर मुखिया की बीवी के ब्लाउज में प्रवेश करा दे रहा था,, , सूरज की हरकत पर मुखिया की बीवी का दिल जोरो से धड़क रहा था उम्मीद की किरण उसे नजर आ रही थी उसे लग रहा था कि आगे का काम सूरज को बताना नहीं पड़ेगा वह खुद ही कर लेगा लेकिन कुछ देर तक सूरज की तरफ से इसी तरह की हरकत होती रही लेकिन इससे आगे वह बढ़ नहीं पा रहा था,,, इसलिए मुखिया की बीवी को लगने लगा कि उसे ही कुछ करना होगा वरना रात यूं ही मालिश में ही गुजर जाएगी,,,।

रात पूरी तरह से गहरा चुकी थी,,, एक अजीब सा सन्नाटा पूरे वातावरण में घुला हुआ था,,, रह रहकर कुत्तों के भौंकने की आवाज आती थी और झींगुर के शोर से वातावरण थोड़ा और भी ज्यादा डरावना हो जाता था लेकिन इन सब के बावजूद भी घनघोर रात में आम के बगीचे में बस्ती से दूर मुखिया की बीवी और सूरज एक दूसरे के संगत में आनंद प्रमोद में डूबे हुए थे इसलिए बाहर के वातावरण से उन दोनों को कुछ भी लेना-देना नहीं था,,,, मुखिया की बीवी जानती थी कि अब दूसरे वस्त्र को उतारने का समय आ गया है,,,, इसलिए वह बोली,.।

सूरज थोड़ा ऊपर भी दर्द कर रहा है,,,, ऊपर भी थोड़ी मालिश कर देता तो आराम मिल जाता,,,।

(इतना सुनकर सूरज के हाथ वहीं के वहीं रुक गए वह कुछ पल खामोश रहने के बाद बोला,,)

लेकिन मालकिन ब्लाउज में,,,,, मालिश कैसे होगी,,,

(सूरज थोड़ा रुक रुक कर बोला वैसे भी एक औरत के सामने ब्लाउज शब्द बोलते हुए उसके लंड की अकड़ बढ़ गई थी और उसके मुंह से इतना सुनकर मुखिया की बीवी मन ही मन प्रसन्न हो रही थी और वह बोली).

अरे हां मैं जानती हूं इस तरह से मालिश नहीं हो पाएगी इसके लिए मुझे ब्लाउज को उतारना होगा,,,।

(मुखिया की बीवी के मुंह से इतना सुनते ही ,,, सूरज का दिमाग एकदम सन्न हो गया,,, पहली बार हो किसी औरत के मुंह से अपने ब्लाउस उतारने की बात को सुन रहा था,,, इसलिए उसके तन बदन में अजीब सी हलचल होने लगी थी ,, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह सच में मुखिया की बीवी के मुंह से ब्लाउज उतारने वाली बात सुना था या उसके कान बज रहे थे इसलिए अपने मन की तसल्ली के लिए वह बोला,,,)

क्या सच में उतारना पड़ेगा मालकिन,, !

हां रे सच में उतारना पड़ेगा क्या बिना उतारे मालिश कर पाएगा तु ,

नहीं ऐसे तो बिल्कुल भी मालिश नहीं हो पाएगी,,,

हां तो इसीलिए तो कह रही हूं कि ब्लाउज उतारना पड़ेगा,,, तेरे हाथों में तो जादू है,,,, रुक मैं अपना ब्लाउज उतार देती हूं,,,,,,,(इतना कहने के साथ ही मुखिया की बीवी धीरे से चारपाई पर उठकर बैठ गई उसका मुंह दूसरी तरफ था वह जानबूझकर सूरज की तरफ पी५ किए हुए बैठी थी क्योंकि वह सूरज के तन-बदन में और ज्यादा आग लगाना चाहती थी,,,, सूरज ठीक उसके पीछे चारपाई की पाटी पर बैठा हुआ था,,, और मुखिया की बीवी की हर क्रियाकलाप को देख रहा था,, ,। वह मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहा था क्योंकि धीरे-धीरे मुखिया की बीवी अपने बदन पर से एक-एक वस्त्र उतरती जा रही थी साड़ी के बाद अब उसके ब्लाउज की बारी थी और ब्लाउज के उतरते ही सूरज जैसा जवान लड़का इतना तो जानता ही था कि ब्लाउज के अंदर औरतें अपने कौन से अंग को छुपा कर रखती हैं और ब्लाउज के उतरते ही उसका खूबसूरत अंग उजागर होने वाला था जिसे देखने के लिए सूरज का मन ललाईत हुआ जा रहा था,,, और दूसरी तरफ मुखिया की बीवी के भी तन-बदन में आग लग रहा था वह जानती थी कि सूरज के सामने वह धीरे-धीरे करके अपने सारे वस्त्र उतार कर एकदम नंगी हो जाएगी और एक खूबसूरत जवान औरत को आधी रात के वक्त कोई भी मर्द है संपूर्ण रूप से नंगी देखने के बाद अपने आप पर काबू नहीं कर पाएगा और यही सोचकर मुखिया की बीवी के तन बदन में भी हलचल मची हुई थी वैसे तो वह न जाने कितनी मर्दों के सामने अपने वस्त्र उतार कर नंगी हो चुकी थी लेकिन आज सूरज के सामने अपनी वस्तु उतारने में उसे कुछ ज्यादा ही मजा और आनंद की प्राप्ति हो रही थी,,,,।
 
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