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Fantasy मोहिनी

पंद्रह दिन की निरंतर यात्रा के बाद एक सुबह मैंने अपने आपको उस झरने के पास पाया जहाँ पहली बार मुझे माया मिली थी। मैं अपनी मंज़िल पर आ गया था। ऊपर वह कुटी थी जहाँ कुलवन्त को होना चाहिए था। मैंने मोहिनी से कहा कि देखकर आओ कुलवन्त क्या कर रही है।

मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी और कुछ सेकेंड बाद लौट आयी।

“मुझे कुलवन्त नज़र नहीं आयी।” मोहिनी ने सूचना दी। “कुटी मण्डल के घेरे में है और भीतर कुछ नज़र नहीं आता और मैं वहाँ नहीं जा सकती।”

“और तरन्नुम ?”

“तरन्नुम पहाड़ी से उतरते हुए आ रही है।”

“ओह, इसका मतलब कुलवन्त यहाँ किसी जाप में लीन होगी! पहले भी तो तुम वहाँ बेबस हो गयी थी मोहिनी।”

“हाँ आका! वह प्रेम लाल का पवित्र स्थान है और मोहिनी को वहाँ अपनी इच्छा से जाने का अधिकार नहीं।”

मैं चुप हो गया। मोहिनी की विवशता को मैं अच्छी तरह समझता था।

अधिक देर नहीं हुई जब तरन्नुम झरने के क़रीब आती दिखायी दी। उसने दूर से ही मुझे पहचान लिया। उसकी चाल तेज हो गयी और जब वह क़रीब आयी तो दौड़कर मुझसे लिपट गयी।

“भाईजान!”

“हाँ तरन्नुम, मैं ही हूँ! कैसी हो ?”

“बहुत मज़े में हूँ।”

“और तुम्हारी दीदी ?”

“बाज़ी भी ठीक है ?”

“लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ ?”

“रात ही सपने में बाज़ी ने मुझसे कहा था कि आप सुबह-सुबह तशरीफ ला रहे हैं; और मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी।”

“कुलवन्त इस समय क्या कर रही है ?”

“छः दिन हो गए, वह मण्डल में बैठी है। ग्यारह दिन बाद वह मण्डल से बाहर आएगी।”

“ओह! अभी कितने दिन बाकी हैं ?”

“ग्यारहवें दिन बाहर आएगी।” तरन्नुम ने कहा।

इसका मतलब यह था कि मुझे ग्यारह दिन उसकी प्रतीक्षा करनी थी। तरन्नुम के साथ और बहुत सी बातें करते हुए हम ऊपर की तरफ़ चल पड़े।

ग्यारह दिन कैसे बीते इसके बारे अधिक कुछ कहना निरर्थक है क्योंकि इस बीच सिवाय मोहिनी के चुहलबाजियों के अलावा कोई विशेष बात उल्लेखनीय नहीं है।

मोहिनी के लिए अब मुझे खुद उसकी गिजा का प्रबंध नहीं करना पड़ता था। जब उसे खून की ज़रूरत होती मेरे सिर से उतर जाती और इंसानी लहू से अपनी प्यास बुझाकर लौट आती।

जब मैं कुटी में आराम कर रहा था तो मोहिनी बीच में तीन दिन ग़ायब रही। बाद में अपने सैर-सपाटों का हाल सुनाती रही।

इस बार उसने किसी शराबी का खून पी लिया था। मोहिनी ने हँस-हँसकर बताया कि उस कमबख्त के खून में सिवाय अल्कोहल के कुछ था ही नहीं और उसे भी तीन रोज़ तक नशा रहा। नशे की हालत में वह तीन दिन तक एक सिर से दूसरे सिर पर जाती रही और उधम मचाती रही। मोहिनी को हंगामे पसंद थे और वह क्या कुछ कर सकती थी इसका तजुर्बा मुझे बहुत था।

ग्यारहवें दिन कुलवन्त का जाप खत्म हुआ। वह अपने मण्डल से बाहर आ गयी। उसके हाथ में एक माला थी जिस पर वह जाप कर रही थी। कुलवन्त अब पहले से हसीन और जवान दिखायी पड़ती थी; और उसके जवान जिस्म की सुगंध जंगली फूलों की तरह भीनी-भीनी थी। उसके चेहरे पर प्रखर तेज था और आँखों में सम्मोहन।

उसने मुस्कराकर मेरा स्वागत किया।

“ग्यारह दिन से यहाँ डटा हूँ कुलवन्त और तुम हो कि तुम्हें इसका ख़्याल ही नहीं कि कौन यहाँ आया है। देखो, मैं हूँ तुम्हारा राज। पहचाना मुझे ?”

“राज, तुम क्या सोचते हो कि मुझे तुम्हारा ख़्याल ही नहीं! कहो तो तुम्हारी रोजमर्रा की बातें सुना डालूँ ? अगर मुझे ख़्याल न होता तो किस तरह तरन्नुम ने तुम्हारी खातिरदारी में कोई कसर छोड़ी है।”

“लेकिन कुलवन्त, तुम्हारी यह ज़िंदगी देखकर मुझे भी मायूसी होती है। सोचता हूँ तुम्हें यहाँ अपने साथ लाकर मैंने बहुत बड़ा पाप किया था। तुम्हारी सुंदरता का यह पुजारी जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है अपने मनहूस साये को लेकर; और तुम यहाँ जंगल में तनहा ज़िंदगी गुज़ार रही हो।”

“मैं इस ज़िंदगी में भी बहुत ख़ुश हूँ राज; और यहाँ भी मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूँ। जब तुमने हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कदम रखा तो मैंने तुम्हारी सुरक्षा का कवच बनाना शुरू कर दिया था। तुम्हारे दुश्मनों की तादाद बहुत बढ़ गयी है राज।”

“कुछ दिन के लिए ही सही तुम मेरे साथ तो चलो; और देखो तो दुनिया कितनी आगे बढ़ गयी है। मैं तुम्हारे साथ सारी दुनिया घूमना चाहता हूँ। मेरा जीवन बहुत वीरान हो चुका है कुलवन्त। मुझे अपने साये से भी डर लगता है। मुझे किसी पर भी ऐतबार नहीं रहा। बहुत से लोग मेरी ज़िंदगी में आना चाहते हैं तो मैं उनसे दूर भागना चाहता हूँ। ऐसा इसलिए कुलवन्त क्योंकि मेरी ज़िंदगी में आनी वाली हर प्रिय वस्तु मुझसे छीन गयी। मैं कितना अकेला हो गया हूँ।”

मेरा गला भर्राने लगा, आँखें नम होने लगीं। कुलवन्त के सामने मैं अपने आपको एक बच्चा समझ रहा था। फिर कुलवन्त मुझे दिलासा देती रही, मेरा हौसला बढ़ाती रही और मैं उसके घुटनों में सिर रखे सुबकता रहा।

मैं कुलवन्त से ज़िद करता रहा कि वह मेरे साथ चले। अपने फूल मेरे आँखों में खिला दे और मैं सबकुछ भूलकर अपनी जिंदगी चैन व सुकून से बिता लूँगा। हम दोनों के पास अंधेरों में टिमटिमाता एक दीपक था- कुलवन्त।

“मेरे पागल प्रेमी, तुम अकेले कभी नहीं रहे। हर वक्त तो मैं तुम्हारे साथ होती हूँ। तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। दुनिया के इस छोर से उस छोर तक। इस सदी से आख़िरी सदी तक। इस जन्म से आख़िरी जन्म तक। यह इंसानी देह का साथ तो चंद दिनों का होता है। देह मिट जाती है तो सबकुछ मिट जाता है, सभी कुछ यहाँ छूट जाता है और आत्मा बस भटकती रहती है। फासले इतने बढ़ जाते हैं कि कोई फिर कभी नहीं मिलता।

“मैं इन फासलों को मिटा देना चाहती हूँ। मेरी देह तुम्हारे साथ नहीं तो क्या हुआ, आत्मा तो साथ है; और जब आत्मा आत्मा से मिल जाती है तो फासले नहीं रहते। देखो राज, दिल छोटा न करो!
 
“मेरे पागल प्रेमी, तुम अकेले कभी नहीं रहे। हर वक्त तो मैं तुम्हारे साथ होती हूँ। तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। दुनिया के इस छोर से उस छोर तक। इस सदी से आख़िरी सदी तक। इस जन्म से आख़िरी जन्म तक। यह इंसानी देह का साथ तो चंद दिनों का होता है। देह मिट जाती है तो सबकुछ मिट जाता है, सभी कुछ यहाँ छूट जाता है और आत्मा बस भटकती रहती है। फासले इतने बढ़ जाते हैं कि कोई फिर कभी नहीं मिलता।

“मैं इन फासलों को मिटा देना चाहती हूँ। मेरी देह तुम्हारे साथ नहीं तो क्या हुआ, आत्मा तो साथ है; और जब आत्मा आत्मा से मिल जाती है तो फासले नहीं रहते। देखो राज, दिल छोटा न करो!

“हाँ, अगर चाहो तो तरन्नुम को साथ ले जाओ और उसकी कहीं शादी करवा दो। हालाँकि उसकी ज़िद है कि वह आख़िरी दम तक मेरे साथ रहेगी। उसे बड़ा कष्ट दिया है दुनिया वालों ने। अशर्फी बेगम और बब्बन अली ने उसकी ज़िंदगी वीरान कर दी; और उसे संसार से घृणा हो गयी।”

“और तुम न चलोगी ?”

“नहीं! अब मैं इस स्थान की होकर रह गयी हूँ। अब कहीं नहीं जा सकती।”

“फिर एक बात और सुन लो कुलवन्त। यहाँ से जाने के बाद मैं वह न रहूँगा जो था। कभी किसी के लिए मेरे दिल में प्यार न उमड़ेगा। तुम देखना, देखना मेरा क्या हश्र होता है।

“तरन्नुम को तुम यहाँ लायी थी इसलिए तुम जो उसके लिए उचित समझो करो। मैं किसी पर अपना साया भी नहीं पड़ने देना चाहता। जो लोग मेरे पीछे पड़े हैं वह तरन्नुम का घर-संसार भी बर्बाद कर सकते हैं।”

मैं बेहद जज्बाती हो गया था। मेरा दिल चाह रहा था कि सारी दुनिया को आग लगा दूँ। कुलवन्त का ठोस उत्तर सुनकर अब मैं वहाँ अधिक नहीं ठहरना चाहता था। यहाँ आकर मेरे दिल पर एक चोट सी लगी थी।

अगले ही दिन मैंने वापसी की तैयारियाँ शुरू कर दी।

जब मैं कुलवन्त से विदा ले रहा था तो कुलवन्त ने एक माला मेरे गले में डालते हुए कहा- “समझ लो कि यह माला मैं हूँ जो हमेशा तुम्हारे गले में रहेगी और जब तक यह माला तुम्हारे गले में होगी तुम्हारी शक्तियाँ हज़ार गुना बढ़ जाएँगी।

“इस माला में एक सौ एक दाने हैं और सभी बलवान ऋषियों के वरदान हैं। तुम अपने दुश्मनों पर आग बरसा सकते हो। तुम अपने इर्द-गिर्द एक सौ एक जाल बुन सकते हो। यह माला हर ख़तरे में तुम्हारी रक्षा करेगी और जब तुम इसे स्पर्श करोगे, मेरी समस्त शक्तियाँ तुम्हारे पास होंगी। जाओ राज, भगवान तुम्हारी रक्षा करेगा।

कुलवन्त से विदाई के बाद मैं तेजी से ढलान पर उतर गया। मेरा दिल टूट गया था और अब मैं हर तरफ़ नफ़रत की आग धधकते हुए देखना चाहता था।

मेरे सीने में ज्वालामुखी दहक रही थी। मेरे कदम तेजी के साथ उठते जा रहे थे। मेरी दाढ़ी और सिर के बाल बढ़ चुके थे। इस पूरे सफ़र में मैं रात-दिन चलता रहा और जरा भी न थका। मुझे बड़ी हैरत थी कि मैंने यह रास्ता इतनी जल्दी तय कैसे कर लिया। मैं शहर की हवा में दाख़िल हो चुका था।

मोहिनी बड़ी परेशान दृष्टि से मुझे देख रही थी। और मुझे यूँ लग रहा था जैसे मेरे अंदर हाथियों का बल आ गया हो।

“राज!” अचानक मोहिनी ने मुझे झिंझोड़ा। “अब तुम कहाँ जा रहे हो ?”

“चुप रहो और बस तमाशा देखती रहो। मेरी मौत क़रीब आ गयी है।”

“लेकिन मैं तुम्हें मरने नहीं दूँगी राज।”

“तो फिर बेशुमार लोग मेरे हाथों मरेंगे।”

“राज, क्या तुमने सोचा है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?”

“मेरी हैसियत एक पागल कुत्ते जैसी है।” मैंने कहा। “कहो तो भौंककर दिखाऊँ।”

“तुम मुझ पर चाहे जितना नाराज़ हो। मगर मेरे आका मैं तुम्हारी बात का बुरा नहीं मानूँगी। तुम्हारे इर्द-गिर्द एक सौ एक जाले बुनी हुई है और तुम्हारे गले में जो माला है उससे तुम्हारी शक्तियाँ बहुत बढ़ चुकी हैं। इसके किस दाने में क्या शक्ति छिपी है, मैं तुम्हें बताऊँगी; लेकिन अभी कुछ दिन झगड़े फसादों से दूर रहना तुम्हारे हित में होगा।”

लेकिन मैं मोहिनी की विनती सुने बिना हवा महल की तरफ़ बढ़ता चला गया। मोहिनी ने मुझे अपनी ज़िद पर अड़े देखा तो जल्दी-जल्दी मुझे कुछ निर्देश देने शुरू कर दिए। वह निर्देश उस माला के संबंध में थे जो मेरे गले में पड़ी थी और कुलवन्त की यादगार थी। मैं हैरत से अपने साथ जुड़ी शक्तियों के बारे में मोहिनी से सुनता रहा और अपनी मंज़िल तय करता रहा।

रात का कोई पहर था जब मैं नदी पार करके पहाड़ी का रास्ता तय कर रहा था। हवा महल अब मुझसे अधिक दूर नहीं था। रास्ते भर मोहिनी मुझे तरह-तरह के हिदायतें देती रही और बेचैनी से मेरे सिर पर चहल कदमी करती रही।

“बस, अब मैं आगे नहीं जा सकती!” एक जगह मोहिनी ने कहा तो मैंने देखा मैं हवा महल की चार दीवारी के क़रीब खड़ा था।

मोहिनी मेरे सिर से चली गयी और मैं महल के फाटक की तरफ़ बढ़ता रहा।

पौ फटने में अभी देर थी। अंधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था। मैं सावधानी से कदम उठाता फाटक तक पहुँच गया। फाटक बंद था और हर तरफ़ सन्नाटा व्याप्त था। मैं अंदर जाने के लिए रास्ता तलाश करने लगा। लेकिन बड़ी ठोस और ऊँची चार दीवारी ने मठ को घेर रखा था और फाटक खुलने में शायद अभी देर थी।

फाटक अंदर से बंद था। मैं फाटक के ठीक सामने खड़ा हो गया और फिर मेरा हाथ गले में पड़ी माला पर सरकने लगा। अब मैं इस माला के दानों का चमत्कार देखना चाहता था।

एक दाने पर मेरी उँगलियाँ ठहर गईं। तभी मुझे अपने कानों में एक बेहद ठंडा स्वर सुनाई दिया।
 
“मैं उपस्थित हूँ। आज्ञा दो!”

“फाटक भीतर से खोल दो।”

मेरी आज्ञा की देर थी कि फाटक के दूसरी तरफ़ हल्की आवाज़ें उभरने लगीं और कोई एक मिनट बाद फाटक खुलने लगा।

फाटक खोलने वाला चौकीदार ही था जो फाटक खोलकर चुपचाप एक तरफ़ खड़ा हो गया था। मैं बेधड़क अंदर दाख़िल हो गया फिर मैंने सोचा इस तरह फाटक खुला रहना ठीक नहीं। मैंने मन ही मन दूसरी आज्ञा दी तो चौकीदार फाटक बंद करने लगा।

मुझे बड़ी हैरत हुई कि चौकीदार ने मेरी तरफ़ कतई कोई ध्यान नहीं दिया था जैसे उसने मुझे देखा ही न हो। उसकी कोठरी फाटक के पास ही थी।

फाटक बंद करके वह अपनी कोठरी की तरफ़ जा रहा था। मैं हवा महल के भीतर तो आ गया था परंतु मुझे वहाँ के वातावरण का जरा भी आभास नहीं था। न ही मैं उसके भौगोलिक ढाँचे से वाकिफ था। लेकिन मेरा हौसला बहुत बढ़ा हुआ था।

पार्किंग पर कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं लेकिन वहाँ दूर-दूर तक सन्नाटा छाया हुआ था। मैं आगे बढ़ने लगा। मेरा रुख़ इमारत की ओर था। यह इमारत काफ़ी बड़ी थी। उसके कंगूरों पर सुनहरी चमक थी जो धीरे-धीरे धुंध में चमकने लगी थी।

अभी मैंने इमारत के बरामदे में कदम रखा ही था कि जोर-ज़ोर से घंटियाँ बजने लगीं। इन घंटियों की आवाज़ चारों दिशा में गूँज रही थी। मैं ठिठक कर चारों तरफ़ देखने लगा कि घंटे कहाँ बज रहे हैं लेकिन शीघ्र ही मुझे आभास हो गया कि इमारत में जगह-जगह लाउड स्पीकर लगे हैं जिससे आवाज़ चारों तरफ़ गूँज रही थी और कदाचित यह घंटे मठ के मंदिर में गूँज रहे थे।

मैंने बरामदे में कदम बढ़ाया ही था कि एक दरवाज़ा खुला और बरामदे में रोशनी हो गयी।

एक सिरघुटा जवान पट्ठा मेरे सामने था और आश्चर्य से मुझे घूर रहा था। उसकी आँखें बिल्लियों जैसी चमक रही थीं।

“कौन हो तुम ?” उसने कड़क स्वर में पूछा। “और यहाँ क्या कर रहे हो ?”

उसके तेवर अच्छे मालूम नहीं होते थे और उसके घूरने का अंदाज़ भी सही नहीं था। मैं वहाँ आया ही किसी ठोस इरादे से था। मैंने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया और माला के एक दाने पर अपना हाथ रखा। फिर कुछ बुदबुदाते हुए उस पर नज़रें गड़ा दीं।

वह पहले काँपा फिर कटे वृक्ष की तरह लहराया और धड़ाम से फर्श पर गिरा।

मैं उसे खींचकर उसी दरवाज़े में ले गया जिधर से वह बरामद हुआ था। वह एक कमरा था। मैंने उसे वहीं फर्श पर छोड़ दिया और फिर कमरे का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।

मैंने दूसरी आज्ञा अपने वीर को दी तो उस गंजे को होश आने लगा। होश में आने के बाद भी वह बुरी तरह काँप रहा था।

“सुनो, अगर तुमने मेरे सवालों का सही-सही जवाब दिया तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा। अन्यथा तुम्हें भस्म कर दूँगा।”

“पूछिए महाराज, आप क्या पूछना चाहते हैं ? मेरी औकात ही क्या है जो मैं आपके सवालों का जवाब न दूँ।” वह काँपते स्वर में बोला।

“इस मठ का बड़ा पुजारी इस वक्त कहाँ है ?”

“मंदिर में भेंट चढ़ा रहे हैं। थोड़ी देर में सभी भक्तजन मंदिर में पहुँच जाएँगे।”

“मठ में इस वक्त कुल कितने लोग हैं ?”

“पचास पुजारी और बीस पुजारिनों के अलावा चार बाहर के मेहमान यहाँ हैं। बाकी एक दर्जन रक्षक दस्ते के सिपाही हैं।”

“क्या रक्षक दस्ता हथियारों से लैस रहता है ?”

“हाँ महाराज! वे खाली हाथ कभी नहीं रहते और बड़े पुजारी के हुक्म पर किसी को भी गोली मार सकते है।”

“इस वक्त रक्षक दस्ता कहाँ है ?”

“रात के वक्त फाटक बंद होने के बाद सिर्फ़ दो आदमी गश्त लेते हैं और सवेरे तक गश्त समाप्त हो जाती है। सिर्फ़ फाटक पर एक चौकीदार रह जाता है।”

“रक्षक दस्ते का कमाण्डर कौन है ?”

“उसका नाम बलवान आनन्द है। वह मठ में एक पुजारी की हैसियत रखता है।”

“बलवान आनन्द इस वक्त कहाँ है ?”

“आपके क़दमों में है महाराज। मैं ही बलवान आनन्द हूँ।”

“ओह! तब तो पहला ही आदमी मुझे काम का मिला है।” मैं बरबस मुस्कुरा पड़ा। “तो बलवान आनन्द, मठ में गोला बारूद का भंडार भी होगा ? ये तो सुना है बड़ा असला अपने पास जमा रखता है।”

“झूठ क्या बोलूँ महाराज। आप तो सर्वज्ञाता हैं। जो इंसान खाली नज़रों के वार से मुझे इस तरह गिरा सकता है, वह महान शक्तिशाली होगा। मैं आपकी आँखों की ताव भी नहीं सह सकता। असला, गोला-बारूद सब कुछ यहाँ है महाराज। यहाँ तक कि मोटर तक की व्यवस्था भी है।”

“इन पंडित महापुरुषों को हथियार जमा करने की क्या आवश्यकता बलवान ?” मैंने उससे पूछा।

“मैं तो बस भीतर की सुरक्षा तक सीमित हूँ। यहाँ बड़े-बड़े लोग आते हैं। वी.आई.पी. आते हैं। यहाँ वह अकेले ही आते हैं। उनके किसी गार्ड को यहाँ आने का अधिकार नहीं होता। बाहर का आदमी यहाँ कदम तभी रखेगा जब बड़े महंत की आज्ञा मिलेगी। उनके ख़ास मेहमानों की हिफाजत करना भी हमारे जिम्मे होता है।”

“ओह! वे लोग यहाँ क्या करने आते हैं ?”

“यहाँ कौन क्या करने आता है महाराज, यह तो मुझे भी नहीं मालूम। इस वक्त भी यहाँ चार मेहमान रात से ठहरे हुए हैं। आज वे लौट जाएँगे। वे बाहर से आए हैं और महंत महाराज के ख़ास मेहमान हैं।”
 
मेरे पास समय बहुत कम था। दिन की रोशनी फैलने के बाद ख़तरा बढ़ सकता था। अगर अचानक ही रक्षक दस्ते का कमांडर इस तरह मेरे हाथ न आ जाता और मुझसे भयभीत होकर मेरे क़दमों में न आ गिरता तो कदाचित मेरे लिए बड़ा भारी ख़तरा पैदा हो जाता। उन लोगों को अभी मेरे आगमन की खबर न थी



मैंने जल्दी-जल्दी बलवान से दूसरी जानकारियाँ इकट्ठी की और उसके बाद उसे हुक्म दिया कि मुझे गोला-बारूद वाले कमरे में ले चले।

वह एक तहखाना था जिसमें बलवान मुझे लेकर आया। बलवान मुझसे आज भी भयभीत था।

मैंने तहखाने को देखा। एक मोर्टार भी वहाँ रखी थी और उसके अलावा विस्फोटक पदार्थों के कई ड्रम वहाँ भरे पड़े थे।

मैंने कई हथगोले एक थैले में भरे और उसे पीठ पर लटका लिया। फिर मैंने बलवान को हुक्म दिया कि मोर्टार उठाकर बाहर ले चले। बलवान मेरे कहे पर काम करता रहा।

फिर जब मोर्टार इमारत पर पहुँचा दी गयी तो मैंने बलवान को अगला हुक्म दिया और खुद वहीं रुक गया। मैं देखना चाहता था कि मुझसे दूर होने के बाद भी क्या वह मेरा कहा मानता है या नहीं लेकिन वह मशीन की तरह काम करता रहा। यूँ भी मेरा एक वीर उसके साथ-साथ था और बलवान को कंट्रोल करना उसका काम था।

थोड़ी ही देर में बलवान के साथी वहाँ आ गए। वे सभी बलवान के हुक्म पर काम कर रहे थे। उसके बाद मेरी विध्वंसक कार्रवाही शुरू हो गयी।

बलवान ने मुझे एक सुरंग का रास्ता भी दिखा दिया था जो मठ में आने-जाने का एक गुप्त रास्ता था।

बलवान को मोर्टार पर छोड़कर मैं उसके दो चेलों के साथ इमारत के दूसरे खंड में पहुँचा। वह मेहमानखाना था। दो पुजारियों ने हमारा रास्ता रोका तो बलवान के चेलों ने उन्हें स्टेनगन से भून डाला। फायरिंग का हंगामा होते ही मठ में एक शोर सा गूँज उठा। मैं तेजी से घूमता हुआ इमारत के उन कमरों तक पहुँच गया जहाँ मेहमान ठहरे थे। मेहमान अभी तक नशे में धुत्त थे और सुंदरियों को आगोश में लिए पड़े थे।

मैंने उनकी हैसियत नहीं देखी। वे देश की महत्वपूर्ण हस्तियाँ थीं। उनका यह घिनौना नंगा रूप देखकर मेरा ज्वालामुखी फट पड़ा। वे समाज के नाम पर कोढ़ थे, दरिंदे थे, भेड़िये थे।

मैंने उन पर हथगोले बरसाने शुरू कर दिए। धमाकों में चीखें डूबने लगीं। मैं पागलों की तरह ठहाके लगाता इधर से उधर तबाही मचा रहा था। मुझे अपनी जान की भी चिंता नहीं थी। जिन लोगों ने इमारत से बाहर भागने की कोशिश की बलवान और उसके साथियों ने उन्हें अपने निशाने पर ले लिया।

मोर्टार गरज रही थी। इमारत के कंगूरे धमाकों से फट रहे थे। अब मैंने उसी तहखाने का रुख़ किया जहाँ गोला-बारूद पड़ा था। मैंने वहाँ आग लगा दी और फिर विप्लवकारी धमाकों को अपने पीछे छोड़ता हुआ सुंरग के रास्ते फरार हो गया। आख़िरी ग़ोले मैंने सुराख में ही फेंक मारे और वह रास्ता भी बंद कर दिया।

उसके बाद मैं पथरीली ढलान पर दौड़ता चला गया। मेरे पीछे हवा महल शोलों से घिरा था। शोले ही शोले और धमाके ही धमाके। आसमान का रंग लहू के मानिंद हो गया। सूर्योदय की लालिमा और भी सुर्ख हो गयी थी।

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अब मैं पागलों की तरह हरि आनन्द का पीछा कर रहा था। मुझे अपनी शक्तियों का इल्म हो गया था और मैं उन शक्तियों का इस्तेमाल करना मोहिनी से सीख रहा था।

जो कांड मैंने मैसूर में किया था उससे सारे मुल्क में सनसनी फैल गयी थी। उस संबंध में समाचारों पर से सर लग गया था क्योंकि अख़बार वालों ने बाल की ख़ाल उतारनी शुरू कर दी थी।

लेकिन सारे देश की पुलिस सतर्क हो गयी थी। एक वी.आई.पी. और तीन महत्वपूर्ण अधिकारी मठ में मारे गए थे। बलवान पकड़ा गया था। उसके बयान हैरतअंगेज थे। उसके बयान से लोगों ने उसे पागल क़रार दे दिया था। उसका बयान था कि खुद भगवान शंकर इंसान का रूप धर कर आए थे और उन्हीं के आज्ञा से उसने यह सब किया था।

जब पुलिस उसे टार्चर कर रही थी तो मैंने मोहिनी को बलवान के सिर पर भेज दिया और बलवान अपने बयान पर अड़ा रहा कि उसे भगवान शंकर ने ही आदेश दिया था। जब उससे उस इंसान का हुलिया पूछा जाता तो वह यही कहता कि इंसानों का जितने रूप दुनिया में है उतने ही रूप थे।

उसके साथियों में तीन बुरी तरह घायल थे। अभी अस्पताल में उन्हें होश नहीं आया था। शेष मारे जा चुके थे। घायलों के बचने की कोई उम्मीद नहीं थी; और वे बच भी जाते तो क्या फ़र्क़ पड़ जाता। दूसरे लोगों ने तो मुझे ठीक से देखा भी न था। उस वक्त अंधेरा ही था और वे सिर्फ़ बलवान के आदेश पर काम करते रहे थे।

कई दिन तक अख़बारों में उन रहस्यमय घटनाओं की चर्चा चलती रही। पुलिस बलवान से कुछ भी मालूम नहीं कर सकी और उसे इतनी मार पड़ चुकी थी कि अगर उसे कुछ भी होता तो वह भी याद न रहा था। फिर अचानक खबरें छपनी बंद हो गयी।

हरि आनन्द इलाहाबाद में था। जब मैं इलाहाबाद पहुँचा तो वह लखनऊ के लिए रवाना हो गया और जिन शहरों से मैं गुज़र रहा था वहाँ कत्लोगारत से सड़कें लाल होती जा रही थीं।

मैं स्वयं एक ख़ूनी भेड़िया बन गया था। हरि आनन्द ने जिसके पास भी शरण ली, मैंने उसका सर्वनाश करके ही छोड़ा।

अब मठों ने उसे शरण देनी बंद कर दी थी और उसकी कार्रवाहियाँ भी कुछ ख़ामोश हो गयी थीं।

मैसूर के मठ की तबाही से उन्हें बहुत बड़ा सबक़ मिला था। लेकिन इसका यह अर्थ हरगिज नहीं था कि उन्होंने हथियार डाल दिए थे। यह एक ऐसी खामोशी थी जो तूफ़ान के आने से पहले छा जाती है। निश्चय ही वे मेरे ख़िलाफ़ बहुत बड़ी तैयारी कर रहे थे। मैंने फिलहाल उनके किसी मठ का रुख़ नहीं किया। मैं सिर्फ़ हरि आनन्द का पीछा कर रहा था और दुनिया का हर कोना उसके लिए बंद कर देना चाहता था। उसके चक्कर में न जाने कितने निर्दोष मारे गए



मेरे हाथ भी खून से रंगे थे। मैं भी जालिम और जल्लाद बन गया था। जिन घरों में उसने पनाह ली मैंने उनकी औरतों तक को नहीं छोड़ा। अब किसी औरत पर प्यार न आता था। बल्कि मेरे प्यार करने का अंदाज़ ही बदल गया था। मैं वहशियों की तरह इस तरह उस औरत पर टूटता था जैसे भेड़िया अपने शिकार पर टूटता है। लगातार नाकामी ने मुझे दीवाना बना दिया था।

और अब मुझमें मानवता नाम की कोई चीज़ न रही थी। मोहिनी मेरे विचारों से थर्रा जाती और मेरे मामलों में बहुत कम दखलअंदाजी करती थी। उसका दख़ल भी अब पसंद न था। मैं उसे फटकार देता था। वह गुमसुम सी रहती थी।

हरि आनंद लखनऊ में नवाब बब्बन की हवेली में ठहरा था। किसी जमाने में वह बब्बन का दोस्त रह चुका था।

लखनऊ में नवाब बब्बन का बड़ा रोब था और उसकी बर्बादी मेरे ही हाथों हुई थी। वह भी मेरा एक दुश्मन था। मेरे दुश्मन ने दुश्मन के यहाँ ही पनाह ली थी।

लखनऊ पहुँचते ही मुझे पुरानी बातें याद आने लगीं। अशर्फी बेगम का बाला खाना, तरन्नुम पर हुए अत्याचार और दूसरी बहुत सी लड़कियाँ जिनके घर बब्बन और अशर्फी ने उजाड़े थे।

इस शहर में आया तो पुराने दुश्मन भी याद आ गए और मैं नवाब बब्बन की हवेली की तरफ़ चल पड़ा।

“राज ?” मोहिनी ने मुझे टहोका दिया। “हरि आनन्द पटना पहुँच गया है।”

“तुम मुझे बता चुकी हो और तुमने यह भी बताया था कि बब्बन अभी भी हवेली में ठहरा है।”

“लेकिन तुम अपना वक्त जाया कर रहे हो। तुम्हारा उद्देश्य हरि आनन्द को पकड़ना है। वहाँ हवेली में अब क्या रखा है। बब्बन को तो अपने किए की सजा मिल ही गयी। अब वहाँ है ही कौन ?”

“अगर वहाँ कोई नहीं रहता तो हरि आनंद को किसने पनाह दी थी ?”

“हरि आनन्द पहली बार तो उस हवेली में नहीं गया। बब्बन उसका दोस्त था और कई एक मामलों में उसने बब्बन की मदद भी की थी। बब्बन ने जब पागल होकर आत्महत्या की थी तो उसके बाद हरि आनन्द कभी-कभी हवेली में बब्बन की दोनों बहनों की कुशलता पूछने आ जाया करता था।”

“यह हुई न कोई काम की बात। तुमने एक बार कहा था कि नवाब की दोनों बहनें बड़ी खूबसूरत हैं। उन्हें देखने भर की तमन्ना दिल में लिए मैं यहाँ से चला गया था। अब जब यहाँ आया ही हूँ तो उनका भी हिसाब चुकता कर चलूँ। और फिर तुम्हें तो ऐसे खेल बहुत पसंद है न ?”

“मेरी बात मानो राज, वापस लौट चलो।” मोहिनी ने प्रार्थना भरे स्वर में कहा।

“कौन मेरे कदम वापस ले जाएगा। तुम ? नहीं मोहिनी, तुम्हारी अब इतनी हैसियत कहाँ रही। तुम तो बस सिर पर आराम करने की चीज़ भर हो। अगर तुम वहाँ नहीं जाना चाहती तो न सही, जाकर किसी का खून पियो।”

“राज!” वह तड़प कर बोली। “मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ, तुम क्या जानो।”

“जब प्यार की बात दिमाग़ में आया करे तो मैंने कहा था न कि किसी से लग जाया करो। लेकिन तुम्हारा प्यार तो बस हवाई प्यार है। अभी तुम्हें कोई जाप करके हासिल कर लेगा। तो प्यार करने की बजाय मेरा खून पीने लगोगी।” मैंने ठहाके के साथ कहा।

“कभी तो मेरी बात मान लिया करो आका! उस हवेली में तुम्हारे लिए ख़तरा है।”

“खतरा और मेरे लिए ? ख़तरा मेरे लिए कहाँ नहीं है ? ख़तरा तो मरते वक्त मेरे साथ रहेगा। तुम खतरों से डरती हो ?”

“नहीं राज, यह बात नहीं है! तुम्हें याद है, एक बार पहले भी मैंने तुम्हें इस हवेली के जनानखाने में जाने से रोका था और तुमने ज़िद की थी तो किसी ने तुम्हारा रास्ता रोक लिया था ?”

“हाँ, याद है! वह कोई जिन्न था। एक बार नहीं, दो बार मेरे आड़े आया था; लेकिन तुमने उसकी याद क्यों दिला दी ?”

“वे लोग आज भी वहाँ मौजूद हैं और नवाब की दोनों बहनों पर उनका साया है। वे फिर तुम्हारा रास्ता रोकेंगे।”

मोहिनी की बात सुनकर मैंने अपनी चाल की गति कम नहीं की।

“अच्छा, तो तुमने इस ख़तरे का संकेत दिया है! लेकिन मोहिनी तुम्हें यह भी याद होगा कि मैंने जिन्न से कहा था कि मैं फिर आऊँगा। चलो, आज मैं अपना वह वचन भी पूरा कर लूँगा!”

“मैं तुम्हें अंदर जाने से रोकना चाहती हूँ।” मोहिनी ने उस वक्त आख़िरी विनती की जब मैं हवेली के फाटक पर पहुँच चुका था।

“मुझे किसी का भय नहीं। भय मुझे अपनी ज़िद का है।” मैंने हवेली के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए कहा।

“आगे का रास्ता बंद मिलेगा।”

“मुझ रास्ता खोलना भी आता है।”

मैं हवेली में दाख़िल हो गया। अब वहाँ न तो दरबान थे, न नौकरों की फ़ौज़ थी। हवेली वीरान पड़ी थी। उसकी दीवारों का प्लास्तरप्लास्टर जगह-जगह से उखड़ गया था। उसके बाग में झाड़-झंकार बेतरतीबी से उगे हुए थे। एक बुत जो रंगीन फुहारों में नहाया करता था, टूटा पड़ा था।

अंदर मुझे सिर्फ़ एक बूढ़ा नौकर मिला। वह भला मेरा रास्ता क्या रोकता। उसने तो मेरी तरफ़ देखा तक नहीं। मोहिनी बार-बार मेरे सिर से उतरती, फिर आ जाती। फिर वह बेचैनी से मेरे सिर पर चहल-कदमी करने लगी।

झाड़-फानूस अब नहीं थे। कालीन ग़ायब थी और फर्श जगह-जगह से उखड़ा हुआ था। अधिकतर दरवाज़ों पर जंग खाए ताले पड़े थे।

किसी जमाने में हवेली की रातें रंगीन हुआ करती थीं। सारी-सारी रात सुरा सुंदरी और घुंघरुओं की झंकार गूँजा करती थीं। क्या शान थी। आज भी उसके खण्डहर अपनी कहानी सुना रहे थे।

मैं ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। नीचे मैंने सभी कमरे देख डाले थे। लेकिन अभी मैं अंतिम सीढ़ी पर पहुँचा ही था कि किसी का सर्द हाथ मेरे कंधे पर आ पड़ा। फिर एक जानी-पहचानी सी आवाज़ कानों में पड़ी।

“आप फिर आ गए ?”

मैं चौंककर रुक गया और बिजली की सी तेजी से पलटकर देखा परंतु वहाँ कोई नहीं था।

थोड़ी देर के लिए तो मैं चकराकर रह गया। परंतु फिर अपना मानसिक संतुलन बरकरार रखते हुए मैंने कहा- “कौन है ? सामने तो आइए। क्या यही विशेष रक्षक है ?” मैंने व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा। “इस बार मेरा ख्याल है कि आमना-सामना करना पड़ेगा।”

“जिस रास्ते आप ऊपर तशरीफ लाए है इजराहे करम उसी रास्ते से खामोशी के साथ वापस चले जाइए।” आवाज़ मेरे समीप ही थी।

“राज!” मोहिनी ने सरगोशी की। “वापस चलो! निरर्थक मत उलझो।”

“मैं वापस भी जाऊँगा लेकिन उस तरह नहीं जैसे पहले गया था।” मैंने उस आवाज़ को संबोधित किया। “बेहतर है तुम्हीं मेरा रास्ता छोड़ दो।”

“आपको मेरा रास्ता काटना पड़ेगा। हाँ, यह सही है कि आपमें ख़ास फ़र्क़ आ गया है। लेकिन हम यहाँ के मुहाफिज है। हमारी दरख्वास्त है कि आप वापस चले जाइए। जिस आदमी की तलाश में आप यहाँ आए हैं, वह यहाँ नहीं है।”

“मुझे मालूम है बरखुरदार, लेकिन मैं उस आदमी के लिए यहाँ नहीं आया हूँ। जरा सामने तो आइए। यह पर्दादारी क्यों ?”

मैंने बाईं तरफ़ घूमकर देखा। मुझे साया नज़र आया। एक इंसानी खाका जो देखते ही देखते एक खूबसूरत पुरुष के रूप में परिवर्तित हो गया।

उसके अंदाज़ में शहाना जलाल था। वह पौराणिक मुग़ल शहजादे जैसी लिबास पहने हुए था। मैं उसे एक बार पहले भी देख चुका था। वह जिन बब्बन अली के दो बहनों पर साया किए हुए था।

मेरे अंदर का वह आदमी जाग उठा जो बहुत ज़िद्दी और क्रोधी है।

“हमारी मुलाक़ात पहले भी हो चुकी है।” वह नौजवान जिन्न बोल उठा। “उस वक्त भी हमने आपसे दरख्वास्त की थी कि हमें बब्बन अली या हरि आनन्द से कोई सरोकार नहीं। लेकिन रुखसाना और शबाना का मामला दूसरा है। वह आपके किसी मामले से संबंध नहीं रखतीं। आप उनसे दूर रहें हो बेहतर रहेगा।”

“मुझे सिर्फ उनसे मिलने की इच्छा है। मुझे मेहमान ही समझ लो।” मैंने खुश्क स्वर में कहा। “मेहमानों के साथ अभद्र व्यवहार पाप कहलाता है।”

“हमें अफ़सोस है कि आप जनानखाने में तशरीफ नहीं ले जा सकेंगे। निचली मंज़िल खाली है। अगर आप वहाँ ठहरना ही चाहते हैं तो बेतकल्लुफ निचली मंज़िल इस्तेमाल कर सकते हैं। हम आपकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।”

“राज!” मोहिनी ने ठहोका दिया। “तुम बात बढ़ा रहे हो। जिन्न अपनी बिरादरी के साथ रहते हैं। उसे अकेला मत समझो।”

“आपकी फितना आपको सही मशवरा दे रही है।” नौजवान जिन्न ने मुस्कराते हुए कहा। “और दूसरी ताकतें आपको इसलिए नहीं दी गयीं कि आप मासूम बेगुनाहों पर जुल्म तोड़ते रहें। यह सब जो आप कर रहे हैं, वह आपका मन्सब नहीं है।”

“मैं तुम्हारा नाम पूछ सकता हूँ ? तुम्हारा नाम क्या है ?” मैंने दिलचस्पी से पूछा।

“जमाल!” उसने बड़े अदब से उत्तर दिया।

“जमाल, मुझे नहीं मालूम कि तुम जिन्नों की कौन सी बिरादरी से संबंध रखते हो, मगर तुम कोई पाक साफ जिन्न नहीं हो। वरना नौजवान लड़कियों के लिए इतने बेचैन न होते।” मैंने फिर पैंतरा बदलकर कहा। “बहरहाल, एक जिन्न होने के नाते तुम मेरे बारे में बहुत सी बातें जानते होगे। अगर नहीं जानते तो एक बार फिर मुझे गौर से देखो।”

“हमें अफ़सोस है, हम रास्ता किसी क़ीमत पर नहीं छोड़ेंगे। आख़िरी वक्त तक हम रुकावट बनकर खड़े मिलेंगे।”

“अपने फ़ैसले पर एक बार फिर सोच लो और मेरी शक्तियों को मत ललकारो।”

“चाहे कुछ भी हो। हम मज़बूर हैं।”

“रुखसाना और शबाना का संबंध इंसानों की जात से है। तुम नाहक बीच में टाँग क्यों अड़ाते हो ?” मैंने कुछ कठोरता से कहा।

“हमारा उनका ताल्लुक बहुत पुराना है। आप यह बात समझने की कोशिश कीजिए। और इजहार करम सवाल और जवाब से गुरेज कीजिए। जो दरख्वास्त की जा रही है उस पर तवज्जो दीजिए।” जिन्न के स्वर में भी कठोरता भर गयी



“तो बर्खुरदार, तुम्हें याद होगा मैंने अपनी पहली मुलाक़ात में कहा था कि हमारी मुलाक़ात दोबारा होगी। सो मैं आ गया हूँ। मेरे इरादे इतने कठोर नहीं थे लेकिन तुमने मुझे मजबूर कर दिया।” मैंने क्रोधित स्वर में कहा।

“आप माहौल नाखुशगवार बनाना चाहते हैं। तो हमें मजबूरन जंग का ऐलान करना पड़ेगा।” जिन्न के चेहरे पर कठोरता आ गयी।

“तो फिर मेरा रास्ता रोककर दिखाओ। मुझे कोई नहीं रोक सकता।” मैंने आगे बढ़कर कमरे का बंद दरवाज़ा हाथ के संकेत से खोलना चाहा।

उसी क्षण जमाल ने दूर खड़े-खड़े अपना लम्बा हाथ करके मेरी कलाई पर अपनी पकड़ जमाते हुए कहा- “हम आपको बार-बार कह रहे हैं, चुपचाप वापस चले जाइए।”

संभव है जमाल तुरंत कोई और फ़ैसला भी कर लेता। मोहिनी ने मुझे बताया था कि वह अकेला नहीं है। जब उसने मेरी कलाई पर अपना हाथ रखा तो मुझे होश न रहा। मेरे बदन में एक सनसनाहट सी दौड़ गयी। वह हाथ नहीं, लोहे का शिकंजा मालूम पड़ता था। और मेरी उलझन यह थी कि मैं माला के दाने नहीं छू सकता था।

लेकिन मैंने अपने आपको संभाला। अपनी तमाम शक्तियों को समेटकर आँखों में भर लिया। दाने स्पर्श करने की अब मैं कम ही ज़रूरत समझता था। मैंने उन शक्तियों को अपनी आँखों में भर लिया। जिन्न ने मेरी तौहीन की थी और मेरी भृकुटियाँ तन गयी थीं।

मैंने शोलों भरी नज़रों से उसे देखा तो जमाल ने एक झटके से अपना हाथ खींच लिया जैसे बिजली का झटका लग गया हो। उसकी आँखों में चिंगारियाँ सी उभरी। मेरा हाथ माला के दानों पर चला गया।

“जमाल, वह जमाना और था! गिरती हुई दीवार के नीचे मत जाओ वरना कुचल दिए जाओगे।”

“यह दुश्मनी आपको बहुत महँगी पड़ेगी ठाकुर साहब।”

“कमबख्त, मुझे धमकी देता है!” मैंने उस जिन्न पर छलांग लगा दी लेकिन जिन्न छलावे की तरह वहाँ से ग़ायब हो गया। मोहिनी तमाशाई बनी हुई थी और हैरत से यह नाटक देख रही थी।

अचानक मज़बूत हाथों का शिकंजा मेरी गर्दन पर आ फँसा। मैंने एक दाने को छू कर मंतर पढ़ा तो जिन्न ने कराह के साथ मेरी गर्दन छोड़ दी। अब मेरे क्रोध का पैमाना लबरेज होकर छलक रहा था।

मैंने एक ज़ोरदार ठोकर दरवाज़े पर मारी और दरवाज़ा भड़ाक से खुल गया।

अंदर दो खूबसूरत गुदाज जिस्म की जवान लड़कियाँ सहमी हुई एक दूसरे से लिपटी बैठी थीं।

मैंने उन्हें देखा तो दंग रह गया। ऐसे खूबसूरत फूल कहाँ छुपे बैठे हैं। इन्हें तो कोई गुलशन आबाद करना चाहिए था। किसी की साँसों की ख़ुशबू बनना चाहिए था; और यह जिन्न का बच्चा इनकी जवानी को यूँ तंग दीवारों में झुलसा-झुलसा कर मार रहा था।

वह रुखसाना और शबाना ही थीं। भय के आलम में और भी हसीन लग रही थीं। एक अजनबी को अपने कमरे में देखकर और भी सहम गईं।
 
अंदर दो खूबसूरत गुदाज जिस्म की जवान लड़कियाँ सहमी हुई एक दूसरे से लिपटी बैठी थीं।

मैंने उन्हें देखा तो दंग रह गया। ऐसे खूबसूरत फूल कहाँ छुपे बैठे हैं। इन्हें तो कोई गुलशन आबाद करना चाहिए था। किसी की साँसों की ख़ुशबू बनना चाहिए था; और यह जिन्न का बच्चा इनकी जवानी को यूँ तंग दीवारों में झुलसा-झुलसा कर मार रहा था।

वह रुखसाना और शबाना ही थीं। भय के आलम में और भी हसीन लग रही थीं। एक अजनबी को अपने कमरे में देखकर और भी सहम गईं।

मेरी आँखें उनके रंग-रूप पर जमकर रह गयी थीं। मोहिनी भी उन्हें देख रही थी। एकाएक जमाल ने मेरे मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा रसीद कर दिया। साथ ही उसका कठोर स्वर गूँजा।

“यह गुस्ताख़ नज़रें नीची कर लीजिए ठाकुर साहब। देखिए हम आपसे कहे देते हैं, मान जाइए। हम यह आँख फोड़ देंगे।”

“बुजदिल!” मैंने तिलमिलाकर कहा। “मुझे तेरा कुछ अधिक ही ख़्याल रखना पड़ेगा। सामने आ, और अगर नहीं आता तो यह मत समझ कि मेरी आँखें सिर्फ़ अस्तित्व वाली चीज़ें ही देख सकती हैं। मैं अपनी सम्पूर्ण शक्तियों से काम नहीं ले रहा हूँ।”

जमाल खुद सामने आ गया। उसका चेहरा पीड़ा और रंज में डूबा हुआ था। उसने बब्बन अली के बहनों को हाथ के संकेत से तसल्ली दी। फिर वहीं खड़े-खड़े हाथ घुमाया और मैं धोखा खा गया।

वह मुझसे चार गज दूर खड़ा था लेकिन उसका हाथ अचानक लम्बा होकर मेरी कनपटी पर इतनी ज़ोर से पड़ा कि मैं त्योरा कर गिर पड़ा।

उसकी सर्द हाथों में फौलाद सी सख़्ती थी। तब मुझे ख्याल आया कि कुँवर राज ठाकुर तुम्हारा मुक़ाबला एक जिन्न से है। किसी इंसानी देह से नहीं। इतना अंदाज़ा मुझे हो गया था कि उस नौजवान को जिन्नों में कोई ख़ास बड़ा दर्जा हासिल नहीं है फिर भी वह जिन्न तो था ही और उसके पास वह शक्तियाँ थीं ही जो एक साधारण स्तर के जिन्न में होना चाहिए। एक ऐसा जिन्न जो हुस्न के आँगन में फन फैलाए बैठा था।

मैंने अपने आपको जमा किया। मैंने स्वयं को उसकी तरफ़ जमा किया और अपनी उन शक्तियों को जागृत किया जो वरदान में मुझे मिली थी। अपने आपको फौलाद की दीवारों पर खड़ा कर लिया। अब मेरे चारों तरफ़ अभेद्य दीवार थी।

जमाल ने फिर हाथ घुमाया लेकिन इस बार उसका हाथ आगे नहीं बढ़ सका और रुक गया। मैं संभल कर तेजी से उठा। जमाल ने मुझे अभेद्य दीवारों के घेरे में खड़ा देखकर ज़ोर से फूँक मारी थी लेकिन उसका यह प्रयास भी व्यर्थ गया।

“इस हिस्सार से बाहर निकलकर मेरा मुक़ाबला करो फिर देखो तुम यहाँ से कुछ खो कर वापस जाओगे।” वह दहाड़ते हुए बोला।

“राज! खबरदार, बाहर न निकलना। इसकी बातों में मत आना।” मोहिनी मेरे बाल पकड़कर बोली।

“बेहतर है तू ख़ामोश बैठी रह।” जमाल मेरे सिर की तरफ़ देखते हुए चिल्लाया। “कुँवर राज ठाकुर, हम इसे भी पकड़ लेंगे।”

मैंने सावधानी के लिए यही बेहतर समझा कि दीवारों के घेरे में रहूँ।

रुखसाना और शबाना एक-दूसरे से लिपटी हुई थर-थर काँप रही थीं। और मुझे यह भी ख़तरा था कि कहीं वह जिन्न अपनी बिरादरी को न बुला ले। उसे तुरंत क़ाबू में लेना आवश्यक था और मैंने मंतर पढ़ना शुरू कर दिया। मेरा हाथ फिर माला पर घूम गया।

अचानक एक धमाका हुआ और जिन्न चीखता हुआ धड़ाम से फर्श पर गिरा। वह बुरी तरह हाथ-पाँव पटक रहा था। मेरे वीरों ने उसे धर-दबोचा था। मैंने तुरंत उसके इर्द-गिर्द भी एक दीवार बाँध दी। जिन्न अब भी चीख पुकार मचा रहा था परंतु अब वह मेरी क़ैद में था।

अब मैंने अपना घेरा तोड़ा। कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर इधर-उधर देखने लगा। जिन्न को बोतल में बंद करने की मैंने बहुत सी कहानियाँ सुनी थी। अब मैं उसे किसी उपयुक्त जगह बंद कर देना चाहता था।

मेरी दृष्टि कमरे में घूमती हुई एक दरवाज़े पर पड़ी। वह स्टोर रूम था। मैंने मोहिनी से कहा कि जाकर देखे उस कोठरी में कोई खिड़की रोशनदान तो नहीं है। मोहिनी पलों में लौट आई और उसने मुझे बताया कि वहाँ ऐसा कोई रास्ता नहीं है।

अब मैं आगे बढ़ा। जिन अब भी तड़प रहा था और मुझे धमकियाँ दे रहा था। मुझसे निवेदन कर रहा था और गिड़गिड़ा रहा था कि लड़कियों पर जुल्म न करूँ अन्यथा जिन्नों की दूसरी बिरादरियाँ भी मुझसे खफा हो जाएँगी। सारी ज़िंदगी वह मेरा पीछा करते रहेंगे।

लेकिन मैंने उसकी धमकियों, गिड़गिड़ाहटों पर कोई ध्यान नहीं दिया। आगे बढ़कर घेरे में हाथ डाला और उसकी कलाई पकड़ ली। वह एकदम से अदृश्य हो गया परंतु मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।

उसका हाथ पतला होता जा रहा था। यहाँ तक कि एक धागे जैसा रह गया परंतु मैंने हाथ नहीं छोड़ा। वह चीख-पुकार से आसमान सिर पर उठाए था।

बड़ी दर्दनाक दिल दहला देने वाली आवाज़ें थीं। मैंने उसे उस कोठरी में फेंक दिया और कोठरी का दरवाज़ा बंद कर दिया। उसकी आवाज़ें बंद हो गईं।

जिन्न से छुटकारा पाकर मैंने राहत की साँस ली। अपने दो वीरों को उसके लिए छोड़ दिया ताकि वे कभी उसे बाहर न आने दें। मेरे दो वीर कमरे के दरवाज़े पर खड़े थे ताकि बाहर से कोई जिन अंदर न आने पाए।

अब मैं दोनों लड़कियों की तरफ़ घूमा। उनके गुदाज जिस्म ने मुझे जनानी कैफियत में डाल दिया था।

इस जिन्न के बच्चे ने इन हसीन शहजादियों का जीवन बर्बाद कर दिया था अन्यथा वह किसी नवाबजादे के घर की शान होतीं लेकिन यह तोहफ़ा शायद मेरे लिए था।

कुँवारी कलियों को फूल बनाने का सौभाग्य शायद मेरे ही मुक़द्दर में लिखा था। दोनों लड़कियाँ भयभीत सी दीवारों से लगकर खड़ी थीं। अब मुझे यह नहीं मालूम हो पाया था कि उनमें से कौन रुखसाना है और कौन शबाना। मैंने मोहिनी को तुरंत शबाना के सिर पर जाने का हुक्म दिया क्योंकि लड़कियाँ भागने का रास्ता तलाश कर रही थीं। मोहिनी के जाते ही मुझे उनके नाम मालूम हो गए।

रुखसाना ने दरवाज़े की तरफ़ दौड़ लगाई तो मेरे एक अदृश्य वीर ने उसे उठाकर मेरे क़दमों में पटक दिया और मैं मुस्कुरा दिया। शबाना चुपचाप खड़ी थी।

रुखसाना ने मेरे पाँव पकड़ लिए। “हमें माफ़ कर दीजिए कुँवर साहब। हम आपकी बहनें हैं।” वह रोती गिड़गिड़ाती फ़रियाद करने लगी। “भाईजान को उनके किए की सजा मिल गयी। उनके जाने के बाद हम बिल्कुल अकेली रह गईं। हमारा इस दुनिया में कोई नहीं रहा। कोई हमें पनाह देने को तैयार नहीं हुआ। आप हमें पनाह दे दीजिए। हम पर रहम खाइए।”

“क्यों, हरि आनन्द ने भी तुम्हें पनाह नहीं दी ?” मैंने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा।

“इसमें हमारा क्या कसूर था। वह भाईजान के दोस्त थे।”

मैंने झुककर रुखसाना का बाज़ू पकड़ा और झटके के साथ उसे सीधा खड़ा कर दिया। “बेफिक्र रहो, तुम्हें मैं कोठे पर पहुँचाने नहीं आया हूँ! लेकिन मेरे दिल में जो आँधियाँ चल रही है उसे तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू ही शांत कर सकती है। मेरे साथ सहयोग करो और अपने आपको मेरे सीने में पेवस्त कर दो। पनाह मिल जाएगी।”

“नहीं, हरगिज नहीं!” रुखसाना ने झटके के साथ अपना बाज़ू छुड़ा लिया। “हम जान दे देंगी लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, कभी नहीं।”

“क्यों अपना जीवन बर्बाद करने पर तुली हो ? किसी न किसी दिन तो तुम्हें किसी मर्द की बाँहें आबाद करनी ही है। तो फिर आओ, मेरे आगोश में मुँह छिपा लो।”

मैंने उसे पकड़ना चाहा तो वह उछलकर पीछे हट गयी।
 
“रुखसाना, कुँवर साहब ठीक ही तो कहते हैं!” शबाना ने कहा। “हमें इससे अच्छी पनाह कहाँ मिल सकती है। बड़े अच्छे आदमी हैं। दौलतमंद है। फिर हमें और क्या चाहिए। तू क्यों घबराती है री। मैं भी तो तेरे साथ हूँ।”

“शबाना की बात मानो और बिस्तर पर आ जाओ।” मैंने आगे बढ़ते हुए कहा।

“नहीं शब्बो, तू कैसी बेइज़्ज़ती की बातें करती है! मैं जीते जी अपनी इज़्ज़त पर हरगिज दाग़ न लगने दूँगी।”

“अच्छा तो क्या मुझे ज़बरदस्ती करनी पड़ेगी।” मैंने क्रोधित स्वर में कहा।

“खबरदार, आगे मत बढ़ना।” रुखसाना ने एक गुलदान उठा लिया।

मैंने उस पर एक झपट्टा मारा तो उसने गुलदान मेरे सिर पर दे मारा। मेरा सिर फट गया और खून के कतरे आँखों में उतर आए।

अपना खून बहता देख मुझ पर पागलपन सवार हो गया। मैं पागल दरिंदे की तरह उस पर टूट पड़ा। वह कब तक और कहाँ तक बचती और वहाँ कोई ऐसी चीज़ भी नहीं थी जो वह अपनी जान दे देती। आख़िर वह मेरे शिकंजे में थी।

मैंने तमाचों से उसका मुँह लाल कर दिया। शबाना पर मोहिनी सवार थी और वह भी रुखसाना को पकड़ने में मेरा सहयोग कर रही थी। रुखसाना ने चीखना चाहा तो मैंने उसका मुँह दबोच लिया। शबाना ने मेरे इशारे पर उसके कपड़े फाड़-फाड़कर तार-तार कर दिए। अब रुखसाना का विरोध टूट गया और एक दरिंदा शिकार खेलता रहा। शबाना अपने आप ही मेरे आगोश में आ गयी। और जब मैं उसके ऊपर से हटा तो दोनों लड़कियाँ बेहोश पड़ी थी। रुखसाना के चेहरे पर चोटों के निशान थे। उसने मेरे चेहरे पर भी नाखूनों का प्रयोग किया था।

कमरे के फर्श पर खड़ा मैं उसे घूर रहा था।

“देखो कुलवन्त, यह है मेरी नयी ज़िंदगी। पसंद आई न तुम्हें ? और अब यह सिलसिला मेरे मौत के बाद ही खत्म होगा। मैं जानता हूँ कुँवर राज ठाकुर धीरे-धीरे मर रहा है लेकिन मैं इसकी रफ्तार में तेजी लाना चाहता हूँ।”

इतना कहकर मैंने ठहाका लगाया और मोहिनी को नीचे हवेली के नौकर के सिर पर भेजकर स्वयं बाहर निकल आया। मैं जानना चाहता था कि इस चीख-पुकार के कारण हवेली के बाहर या अंदर कोई हलचल तो नहीं हुई।

जैसे ही मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला धड़ाम से औंधे मुँह गिर पड़ा। किसी ने मुझे उठाकर पटक दिया था। फिर मुझ पर लात-घूँसे बरसने लगे। मैंने तुरंत ही अपनी शक्तियों को समेटा और जलती आँखों से चारों तरफ़ देखा। मेरा हाथ माला के दानों पर था और होंठ फड़फड़ा रहे थे। हमले रुक गए।

“सामने आ जाओ! कौन है ?” मेरी गर्जना हवेली राहदारी में गूँजी।

वे सब के सब सामने आ गए। वे जिन्न थे। सभी कदीम लिबास पहने थे और जवान थे। मैंने अपना हाथ उनकी तरफ़ उछाला तो मेरे वीरों ने उन पर धावा बोल दिया। बड़ा घमासान युद्ध हुआ जिसमें मेरे चार वीर भी मारे गए परंतु जिन्न जवानों को बाद में मैदान छोड़कर भागना पड़ा। देखते ही देखते वे सब ग़ायब हो गए।

मेरे शरीर पर खासी चोटें आ गयी थीं। आँख पर सूजन थी और होंठ भी फट गया था। मैं नीचे पहुँचा। मेरा लिबास जगह-जगह से फट गया था और चेहरा भी चोटों से भर गया था। मैंने हवेली के एक कमरे में पहुँचकर अपना हुलिया दुरुस्त किया।

मेरे कहने पर मोहिनी एक नौकर के सिर पर गयी जिसने कपड़ों वगैरा के अलावा कुछ मरहम भी लाकर दिए। मोहिनी ने बताया कि कहीं कोई हलचल नहीं है। अपना हुलिया दुरुस्त करने के बाद मैं हवेली से बाहर निकला।

जिन्नों ने जो मेरी ठुकाई की थी उसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता था। यही सोचता हुआ आगे बढ़ रहा था कि मोहिनी ने बहुत देर बाद खामोशी तोड़ी-

“चेहरे पर इतनी सारी चोटें कैसे राज ?”

“ठीक ही है मोहिनी।” मैंने लापरवाही से कहा।

“यह तुम्हें क्या हो गया था ? मैंने अचानक तुम्हें इतना सख़्त दिल नहीं देखा।” मोहिनी ने झिझकते हुए कहा।

“क्यों ? क्या तुम्हें बुरा लगा ?” मैंने चिढ़कर कहा।

“नहीं! अच्छा-बुरा लगने की सोच तो मुझमें तुम्हारी वजह से है। तुम्हें अच्छा लगा तो मुझे भी ठीक ही लगा।”

“अब यूं ही ज़िंदगी के शेष दिन कटेंगे मोहिनी। मैं महसूस कर रहा हूँ कि मेरे दिन बहुत थोड़े रह गए हैं। मुझे जल्दी ही मर जाना चाहिए।” मैंने मायूसी से कहा।

“ज़िंदगी तो बहुत रंगीन है राज! अब तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं है। हरि आनन्द तुमसे भागा-भागा फिर रहा है। और उसके मठ के लोग भी तुमसे दूर ही रहना चाहते हैं। तुम चाहो तो बहुत सलीके से दोबारा ज़िंदगी बसर कर सकते हो। कहो तो मैं तुम्हारे लिए कोई लड़की ढूँढ़ू। कहो तो रुखसाना या शबाना को ही घर से ले आऊँ।”

“बेवक़ूफ़! तुम मुझे सुझाव दे रही हो। मैं रुखसाना या शबाना को तुम्हारे जरिए आसानी से पा सकता था। और मैं उन दोनों को अपनी ताक़त से बेबस कर सकता था। वह जुबान तक न हिला सकती थी। मैं उन्हें साथ भी ला सकता था मगर मैंने ऐसा क्यों नहीं किया ? मुझे अब आने वाले दिनों का यक़ीन नहीं रहा है।”

“तुमने जिन्नों को भी अपना दुश्मन बना लिया और आते वक्त तुम इतने मदहोश थे कि तुम्हें उस कोठरी का भी ख़्याल न रहा जिसमें तुमने जमाल को बंद किया था।”

“जिन्न भी अपने हौसले आज़मा कर देख लें। मैंने उन्हें परखा था। उनमें से कोई खानदानी राजसी नहीं है। सब लौंडे लवारे हैं। वह जमाल तो नम्बर एक का हरामी है।”

“फिर भी उनकी बिरादरी को अनदेखा करना मूर्खता है।”

“देखा जाएगा!”

मोहिनी की आदत ही मोहब्बत और तकरार की हो गयी थी। मैं उसकी बातों का हूँ, हाँ में जवाब दे रहा था।

असल में मुझे बब्बन अली के हवेली के जिन्नों की फ़िक्र यह थी कि अब क्या किया जाए। पटना चला जाए, जहाँ मोहिनी की सूचना के अनुसार हरि आनन्द पहुँच चुका था। मगर वह पटना से भी फरार हो गया तो। फिर मैं कहाँ-कहाँ जाऊँगा। वह कभी किसी मंदिर में छिप जाता है, कभी किसी पुजारी के शरण में। वह हमेशा मुझसे दूर रहता है कि मैं रहस्यमय शक्तियों का जाल फैलाने में कामयाब न हो सकूँ।

सारे कर्ज़ तो मैं दे चुका था। अब बस उसी का लेन-देन बाकी रह गया था। शायद उसकी ज़िंदगी में थोड़े-बहुत दिन ऐसे ज़रूर आएँगे जब उसके दिन पूरे हो जाएँगे और वह मेरे हाथों परलोक सिधार रहा होगा। आखिर कब तक यह लुका-छिपी का खेल चलता रहेगा। ऐसा समय ज़रूर आएगा जब उसे सारी दुनिया में कहीं भी शरण न मिले। जो लोग उसे शरण दे रहे थे, मैं उसे सजाए मौत देता जा रहा था और उन्होंने इस सिलसिले में पुलिस की मदद लेना भी बंद कर दिया था।

वे लोग मुझसे बहुत भयभीत हो गए थे। एक भी माँ का लाल मेरा सामना करने को तैयार न था।

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पटना में उसे मठ में शरण मिली थी। न जाने कैसे उन लोगों ने यह साहस कर डाला था। या उन्होंने जंग की तैयारियाँ कर ली थीं। जब मैं पटना पहुँचा तो मेरी कल्पना में यह बात नहीं थी कि मुझे वहाँ जबरदस्त संघर्ष करना पड़ेगा। मोहिनी ने अचानक मुझे बताया कि हरि आनन्द कहीं नज़र नहीं आ रहा है। उसके इर्द-गिर्द कोई जबरदस्त हिस्सार बँध गया है। लेकिन वह पटना में ही था, कहीं बाहर नहीं गया।

मोहिनी ने मुझे वह दिशा भी बताई थी जिसपर उसने आख़िरी बार हरि आनन्द को जाते हुए देखा था। मैं पटना में हरि आनन्द की तलाश में मंदिर-मंदिर तमाम पुजारियों के घर छानने लगा। बस शोलों को हवा मिल गयी और मेरे ख़िलाफ़ जबरदस्त गैंगवार शुरू हो गयी। मुझ पर पहला ही हमला जबरदस्त था।

पटना में मैंने एक दोस्त बना लिया था और उसी की हवेली में ठहरा था। हवेली को आग लगा दी गयी और मेरे दोस्त सहित आठ इंसान मौत के घाट उतार दिए गए।

पुलिस बहुत देर से पहुँची। मैं भी घायल हो गया था। किसी तरह जान बचाकर भाग निकला था। वे लोग जो भी थे दो ट्रकों में भरे हुए थे और हथियारों से लैस थे। यह मेरी जरा सी असावधानी के कारण हो गया था। शराब और औरत के नशे में मोहिनी उस वक्त मुझसे इजाज़त लेकर खून पीने गयी थी और मैं जानता था उसे अपना पेट भरने में तीन-चार घंटे लग जाते हैं। उसके बाद भी वह मदहोश रहती है।

मैं तो उन दिनों अपनी ताक़त के नशे में चूर रहता था और मेरा यह घमंड उस रात टूटा। हालाँकि उनमें से बहुत से वीरों ने मार डाले थे। परंतु वे अपने साथियों की लाशें ट्रकों में भरकर ले गए थे।

तब मुझे मोहिनी की कमी बहुत खटकी। मोहिनी जो ख़तरे की गंध पहले ही सूंघकर मुझे संकेत कर देती थी। अगर मोहिनी उस वक्त मेरे साथ होती तो कुछ न होता। वह ट्रक ड्राइवर के सिर पर जाकर दूसरा ही हंगामा करवा सकती थी।

मोहिनी की अहमियत का पता लगते ही मुझे उसके प्रति पिछले दिनों का अभद्र व्यवहार भी याद आ गया। मोहिनी अब मेरे किसी मामले में दख़ल नहीं देती थी।

मैं रात के समय घायल अवस्था में सड़कों-गलियों में मारा-मारा फिर रहा था। मैं जानता था पुलिस वहाँ पहुँच चुकी होगी। मुझे किसी शरण स्थल की तलाश थी। लेकिन इतनी रात को मैं उस अजनबी शहर में किसका दरवाज़ा खटखटाता और क्या बताता। फिर पुलिस भी तो सारे शहर में सक्रिय हो जाएगी।

मैंने किसी के यहाँ जाना उपयुक्त नहीं समझा और शहर के बाहर एक उजाड़ खंडहर में वह रात बितायी।

सवेरे ही मोहिनी मेरे सिर पर थी। मेरी यह गत देखकर उसका नशा हिरण हो गया। उसकी आँखों में नशे की सी कैफियत थी और नन्हें-नन्हें होंठ सुर्ख हो रहे थे। चेहरा गुना हो रहा था। परंतु मेरी हालत देखते ही उसका चेहरा जर्द पड़ गया। फिर मैंने उससे कहा कि जल्दी किसी डॉक्टर, वैद्य का प्रबंध करे।

उस वक्त मोहिनी ने कुछ न पूछा और डॉक्टर का प्रबंध करने चली गयी। लगभग एक घंटे बाद वह एक डॉक्टर के सिर सवार होकर एक डॉक्टर को वहाँ ले आई। डॉक्टर ने मेरा उपचार शुरू कर दिया।

मैं लगभग बेसुध सा पड़ा था। डॉक्टर मेरे जख्मों पर पट्टियाँ बाँधकर चला गया। मोहिनी उसे दूर छोड़ आई। मुझे थोड़ा-थोड़ा होश आने लगा था।

तीन दिन तक डॉक्टर आता रहा। मोहिनी उसे ले आती थी। उसे डॉक्टर के सिर पर रहना पड़ता था ताकि वह दुनिया को कोई बयान न दे दे। पुलिस मुझे तलाश कर रही थी।

तीन दिन बाद मुझमें सोचने-समझने की शक्ति आ गयी। मोहिनी इन दिनों बड़ी व्यस्त रहती थी और मैंने अपने इर्द-गिर्द एक हिस्सार खींच दिया था ताकि उस अवस्था में कोई मुझ पर हमला कर पाने में सफल न हो जाए।

मैंने मोहिनी को सारी कहानी सुना दी थी। एक हफ़्ते तक खंडहर में रहने के बाद मैं अपनी संपूर्ण शक्तियों के साथ निकल पड़ा। और अब मेरा निशाना सीधा पटना का मठ था। सिर्फ़ वह जगह थी जहाँ से मुझ पर हमला किया जा सकता था।

उन्होंने जंग के दरवाज़े खुद खोले थे। उसके बाद कत्ल गारत, खून-खराबा, आगजनी, बम-धमाके और शहर थर्राता रहा। हर रात कोई न कोई हंगामा होता था। सड़कें मुँह अंधेरे वीरान हो जाती थीं।

मैंने भी स्थानीय गुंडों की एक फ़ौज़ जमा कर ली थी और मठ की ईंट से ईंट बजा दी थी। एक महीने तक पटना लगभग बंद सा रहा। शहर के बाजार बंद हो गए थे। कानून की बिगड़ती हालत के कारण शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था और मिलिट्री ने शहर की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी। तबाही और तबाही।

लेकिन कमबख्त हरि आनन्द फिर मेरे हाथों से निकल गया। मोहिनी ने मुझे बताया कि वह हैदराबाद चला गया है और मैं विनाश लीला फैलाता हुआ हैदराबाद जा पहुँचा। न जाने कितने खून मेरे सिर पर थे।

मेरे पाँव अब मन-मन के भारी हो गए थे। कुछ बोला ही नहीं जाता था। जिस्म पैरों पर अपना नहीं मालूम होता था। चीखते हुए जिस्म, जलती हुई इमारतें, खौफ, अंधेरे बिलखते हुए चेहरे और सुलगती आँखें। मेरी आँखें उन्हें देखते-देखते बुझने लगी थी। और मेरे कान उन्हें सुनते-सुनते फटने लगे थे।

खुद से कई बार नफ़रत की थी। मगर दुनिया ने इस नफ़रत की इजाज़त नहीं दी। कई बार मैंने किस्सा तमाम करना चाहा, मगर लकीरें मिटती ही नहीं थी। मोहिनी और मैं चुप गुमसुम फिर अनदेखी मंज़िल की तरफ़ जा रहे थे।

हैदराबाद में भी मेरे हाथ असफलता ही लगी और फिर मेरी हिम्मत जवाब दे गयी।

“अब कहाँ चलोगे ?” मोहिनी ने टूटे-फूटे स्वर में पूछा।

“कहाँ जाएँ मोहिनी ?” मैंने मुर्दा आवाज़ में पूछा।

“क्यों न बम्बई चलें। शायद वहाँ दिल बहल जाएगा। इस खून-खराबे से कुछ दिन दूर हो जाते हैं।”

“नहीं मोहिनी, हमारे कदम बड़े मनहूस हैं। जहाँ जाएँगे यही होगा। क्यों न हम किसी शमशान में जाकर रहें। सारे चिराग तो बुझ ही चुके हैं।”

“तुम तो मर सकते हो, मुझे अपनी मौत पर भी अधिकार नहीं।”

चार मीनार हैदराबाद की प्रसिद्ध इमारत है। मैं उसके एक दरवाज़े से टेक लगाकर बैठ गया। लेकिन मुझसे वहाँ अधिक देर तक बैठा न गया। मैं फिर सड़क पर चल पड़ा। वहाँ से कुछ दूर ही एक नदी है जिस पर एक पुल बना है जो शहर का यह हिस्सा दूसरे हिस्से से मिलाता है। वहीं जंगले के सहारे खड़ा रहा और जब वहाँ खड़ा रहना भी दूभर हो गया तो हैदराबाद की हिस्टोरिकल लाइब्रेरी के लॉन में लेट गया।

हवा खनक थी, लेटा रहा था। सुबह तक वहीं लेटा रहा। मैं हाल से बेहाल हो रहा था। बढ़ी हुई दाढ़ी-जटायें, गंदे फटे पुराने कपड़े। अब अपना हुलिया सुधारने को भी जी नहीं चाहता था।

खून इतना बह चुका था कि अब मैं अपने भीतर बेहद कमज़ोरी महसूस करता था। कभी पुलिस की वजह से मुझे टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलना पड़ता था तो कभी मेरे सीने में सख़्त दर्द होने लगता था। कभी मैं ग़लत गाड़ी में बैठ जाता था और किसी दूसरे स्टेशन पर उतर जाता था। कभी बस का हादसा हो जाता था। एक से एक मुसीबतें और दुर्घटनाएँ लेकिन मैंने हिम्मत न हारी। जहाँ-जहाँ मोहिनी मुझे बताती उधर ही चल पड़ता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि रास्ते में बहक जाता, मोहिनी को झिड़क देता और किसी दूसरी बस्ती में पहुँच जाता।

कई जगह पुलिस मुझे घेर लेती। उनसे तो कई बार में छुटकारा हासिल कर लेता था लेकिन एक जगह पर लोगों ने मुझ पर पत्थर बरसाए। जाने क्या हुआ था। शायद मैंने किसी लड़की की कलाई पकड़ी थी।

मेरा माथा खुल गया। खून बहता रहा और मैं चलता रहा। यूँ मालूम पड़ता था जैसे सारे मुल्क की पुलिस मेरी ही तलाश में है। मोहिनी मुझे जगह-जगह ऐसे खतरों से बचाती रही।

वह मोहिनी थी कि मोहिनी द ग्रेट। मैं एक बच्चा था जो मोहिनी की लाठी के सहारे एक स्थान से दूसरा स्थान बदल रहा था। सुबह सफ़र, शाम को सफ़र। रात को किसी सराय में या किसी खंडहर में या किसी दुकान के धढ़े पर। देहात में किसी वृक्ष के नीचे।

मोहिनी मौजूद थी और एक इशारे पर वह मेरे लिए दौलत इकट्ठा कर सकती थी। लेकिन अब दौलत से भी जी भर गया था। दुनिया में कौन का गम, कौन सी ख़ुशी नहीं देखी थी। अब न ख़ुशी में कोई आनन्द प्राप्त होता था न ग़म में कोई दुःख पहुँचता था। दुनिया बड़ी जालिम चीज़ है। आदमी को जकड़ती है।
 
बहुत दिनों बाद तबियत कुछ संभली और वह भी तब जब मथुरा का स्टेशन आया और वहाँ सिर मुड़ाते हुए पंडो की एक टोली देखी। उन्हें देखकर मुझे फिर हरि आनन्द याद आ गया और अहसास हुआ कि अभी वह ज़िंदा है।

उसी क्षण मैंने मोहिनी से पूछा- “कुछ और नहीं तो उसी को तलाश कर लिया जाए ?”

“उसका ख़्याल छोड़ दो। मेरी मानो तो बम्बई चलो।” मोहिनी ने मुझे टालते हुए कहा और बम्बई जाने के लिए ज़िद करने लगी।

“नहीं मोहिनी, अब वे दिन कहाँ रहे। मैं ज़िंदगी से दूर हो चुका हूँ। लेकिन मरने से पहले क्या मेरी आत्मा को शांति भी नहीं मिलेगी ?”

“राज, तुम मर जाओगे तो मेरा क्या होगा ?”

“तुम्हारा क्या, किसी के सिर पर जाकर ऐश करना। तुम्हारा मेरा साथ ही कहाँ का मोहिनी। एक दिन तो यह शरीर त्यागना ही है। तब भी तुम्हें मेरा शरीर छोड़ना ही पड़ेगा।

“मैं तुम्हें प्यार करती हूँ राज।”

“प्यार! हाँ मोहिनी, कितनी अजीब बात है। इंसानी शरीरों का प्यार मैं न पा सका। जो मेरी ज़िंदगी में आया वही मुझसे रूठ गया। और तू एक बिना हाड़-माँस की है। इतनी बात तो है कि तू कम से कम मरते दम तक मेरे साथ रहेगी लेकिन प्यार...। प्यार की बात ज़हर लगती है। मुझे तो अफ़सोस बस इसी बात का रहेगा कि मैं अपनी मोहिनी को कभी सीने से नहीं लगा सका। हम एक-दूसरे में पेवस्त नहीं हो सके।

“मोहिनी, बस ईश्वर के लिए अपने प्यार का वास्ता न देना। अगर तुम मुझे इतना ही चाहती हो तो मेरी आत्मा की शांति के लिए दुआ करो। मुझे बताओ यह हरि आनन्द कहाँ है ?”

“राज, तुम बहुत कमज़ोर हो गए हो। तुम में वह शक्तियाँ नहीं रही।”

“नहीं मोहिनी, आत्मा जब मर जाती है इंसान तब कमज़ोर होता है। तभी उसकी शिकस्त होती है।

“तुम मुझे बच्चों की तरह बहलाना छोड़ दो वरना ईश्वर की सौगंध मैं जान दे दूँगा।”

मोहिनी बेबसी की हालत में निचला होंठ दाँतों में दबाए कुछ सोचती रही।

“हरि आनन्द कहाँ है मोहिनी ?” मैं चीख पड़ा। “मुझे बताओ ?”

सड़क चलते लोग ठिठक कर मुझे देखने लगे। उनके लिए मैं पागल था जो अपनी बर्बादी पर चिल्ला रहा था।

“अच्छा राज, तुम नहीं मानते तो सुनो।” मोहिनी ने मुझ पर तरस खाते हुए कहा। “वह बनारस में है। एक पहुँचे हुए साधु ने उसे शरण दी है।

“उस साधु की अपरम्पार शक्तियों का मुक़ाबला तुम नहीं कर सकते। और मुझे तो खौफ यह भी है कि तुम्हारे दुश्मन, जिन्न बिरादरी हरि आनन्द की मदद पर उतर आए हैं।

“पटना में जो कुछ हुआ उसमें भी तो जिन्न बिरादरी साथ थी। वह तुम्हारे पीछे लखनऊ से ही पड़ गए थे। अब बोलो, क्या तुम उनसे लड़ सकोगे ?”

“अभी मैं इतना मरा-गिरा नहीं हूँ। लेकिन वह कमबख्त न जाने कैसे मेरी बू पा लेता है। अगर वह इतना ही ताक़तवर होता तो मुझसे इस तरह क्यों छिपता रहता है। मेरे दिमाग़ में तो एक विचार आता है मोहिनी। हो न हो वह तुम्हारे कारण मेरी उपस्थिति जान लेता है। इस बार तुम ऐसा करो कि अपना रुख़ बदल लो। मैं अकेला वहाँ जाऊँगा।”

“नहीं! मैं तुम्हें हरगिज अकेला नहीं छोड़ूँगी।”

“बस तुम्हें अधिक वक्त तक मुझसे दूर नहीं रहना होगा। तुम मीलों का फासला पलक झपकते ही तय कर सकती हो। जब हरि आनन्द तुम्हें दूर महसूस करेगा तो बेफिक्र रहेगा और फिर मैं जैसे ही तुम्हें याद करूँ तुम मेरे पास आ जाना।”

“लेकिन राज, इस बीच अगर कोई खतरा...!”

“ख़तरे की बात बार-बार अपनी जुबान पर मत लाया करो। मैं ख़तरा महसूस करूँगा तो तुम्हें बुला लूँगा और तुम तैयार रहना।”

मोहिनी को मेरे इस हुक्म पर बड़ी मायूसी हुई लेकिन मेरे दिमाग़ में जो तरक़ीब आई थी मैं उसका भी इस्तेमाल करना चाहता था। यह मेरे लिए आखिरी मुहिम था। हरि आनन्द पर आख़िरी हमला।

मोहिनी मेरे हुक्म की पाबंद थी। मुझसे अधिक जिरह किए बिना उसने मेरी बात मान ली और मेरे शरीर से उतर कर चली गयी।

अब मैं अकेला बनारस की ओर बढ़ रहा था।

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बनारस क़रीब आ रहा था और अब मैं पूरी तरह सावधान था। हर तरफ़ मेरी दृष्टि सतर्क थी। मोहिनी ने आख़िरी वक्त में मुझे उस जगह का पता बता दिया था। हरि आनन्द अभी तक बनारस में ही था और मैं अपने दुश्मन के क़रीब होता जा रहा था। इस विचार ने ही मेरे मन में अजीब सा उत्साह भर दिया था।

इस बार हरि आनन्द का पीछा करने में आँख मिचौली का खेल नहीं हुआ। बनारस में दाख़िल होते समय मुझे मालूम हुआ कि वह बनारस में ही है। मैं उसके बहुत नज़दीक था। अब मैंने सावधानी से मोहिनी को बुला लिया। मोहिनी ने आते ही मुझे बम्बई के क़िस्से सुनाने शुरू कर दिए।

इस बीच वह न जाने कहाँ-कहाँ घूम आई थी। लेकिन मैं उसकी बातें कहाँ सुन रहा था। मैंने उससे हरि आनन्द के बारे में पूछा।

मोहिनी ने बताया कि वह अभी तक यहीं है। वह एक स्थानीय पुजारी योगानन्द के पास ठहरा है। मैं निहत्था था और न ही मेरे पास कोई सामान था।

रेलवे से सीधा हरि आनन्द की ओर बढ़ता चला गया। इस बार मैं उसे भागने का अवसर नहीं देना चाहता था और मेरी यह चाल कामयाब रही थी।

मैं तेजी से बढ़ता रहा। मुझे हैरत हुई कि हरि आनन्द ने मुझे और मोहिनी को बनारस में अपने क़रीब महसूस करके भी भागने का उपाय क्यों नहीं किया था। वह मेरी उपस्थिति से अनभिज्ञ था

। जब मैंने इस बारे में मोहिनी से पूछा तो वह बोली-

“वह यहीं है और जिस पुजारी की शरण में है उसने चालीस साल तक हिमालय की बर्फपोश चोटियों और वीरान घाटियों में कठिन तपस्या की है। हरि आनन्द ने हर तरफ़ से निराश होकर उसके पास शरण ली है और योगानन्द को पूरी तरह तुम्हारे ख़िलाफ़ तैयार कर लिया है।”

“तो यह आख़िरी जंग भी कम दिलचस्प नहीं रहेगी मोहिनी। आख़िर अंत भी तो बड़ी धूमधाम से होना चाहिए।”

“जाने से पहले कहीं बैठकर कुछ देर सोच लो।”

“क्या तुम नहीं चाहती कि वह कमीना अपने अंजाम तक पहुँचे ? तुम्हें उसका खून पीने की इच्छा नहीं है ?”

मोहिनी ने मेरे तेवर देखकर उत्तर नहीं दिया। वह जब कभी मेरे चेहरे पर तल्खी देखती तो ख़ामोश हो जाती।

योगानन्द का निवास बनारस के अंतिम छोर पर था। एक शांत मकान में, जो एक महाजन की संपत्ति थी। वह इस बार किसी मठ में शरणागत नहीं था। उस मकान तक पहुँचने में मुझे किसी रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा। अब कौन कमबख्त ज़िंदा रहना चाहता था। मोहिनी भी बेचैन नज़र आ रही थी। वह कहती थी कि आगे ख़तरा है। मैं कहता था ख़तरे की परवाह उसे होनी चाहिए जो ज़िंदा रहना चाहता हो। फ़ैसला तो किसी भी रूप में होना ही था।

मैं आसानी के साथ मकान में प्रविष्ट हो गया। उस वक्त मेरा जोश ओ खरोश बुलंदी पर था। इधर-उधर कमरों में गुज़र कर मैं उस कमरे में पहुँच गया जहाँ वह दोनों मौजूद थे। हरि आनन्द की शक्ल नज़र आई तो सारे शरीर का लहू गर्म हो गया। योगानन्द वास्तव में ज्ञानी-व्यानी व्यक्ति मालूम होता था। उसकी आँखों की कशिश और ललाट की चमक उसके ज्ञान का इजहार करती थी।

निश्चय ही वह कोई बड़ा तपस्वी था। मैं उसे गौर से देख रहा था और उसकी शक्ति को तौल रहा था। आयु क़रीब साठ साल मालूम होती थी। उसके चेहरे पर एक झुर्री नहीं थी और चेहरे से जवान दिखायी पड़ता था।

एक के बाद एक घटनाएँ चलचित्र की तरह मेरे सामने घूमती चली गयीं। इंतकाम का ज्वालामुखी फटने को आ गया था। मेरा दुश्मन ठीक मेरे सामने था जिसने मेरी दोनों पत्नियों का कत्ल किया था और जिसने मेरी हरी-भरी ज़िंदगी में आग लगा दी थी। जिसने मुझे गारत के अंधेरे गढ्ढे में धकेल दिया था।

मोहिनी ने मेरा सिर झिंझोड़कर कहा- “राज, अब देखते क्या हो। इस पर फ़ौरन हमला कर दो। कोई रियायत ख़तरनाक होगी।”

“देखती रहो, मैं इसे ललकारे बिना नहीं मारूँगा।”

“हवा करने में विलम्ब मत करो।” मोहिनी दीवानी सी होकर बोली।

“तुम दखलअंदाजी कर रही हो। मैं कहता हूँ चुप रहो।”

“मेरी बात मान लो।” मोहिनी ने बेसब्री से कहा।

मैं दरवाज़े की आड़ में खड़ा था। जब दरवाज़ा खोलकर मैं अंदर पहुँचा तो हरि आनन्द ने मेरी शक्ल देखी और अचानक एक फिट ऊपर उछल पड़ा।

“महाराज, महाराज!” उसने तुरंत योगानन्द के पैर पकड़ लिए। “महाराज आँखें खोलो। वह दुष्ट आ गया है।” उसने घबराए हुए अंदाज़ में योगानन्द का ध्यान आकर्षित कराया।

“अरे आने दे, मैं भी तो उसी की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।” योगानन्द ने आँखें बंद किए-किए जवाब दिया।

“महाराज, अब तुम्हारा वचन निभाने का समय आ गया है। आँखें खोलिए और इस दुष्ट पापी को देखिए। इसने हमारे कई धर्मात्माओं का खून किया है।” हरि आनन्द बेताबी से बोला।

“क्यों परेशान हो रहे हो ? मेहमान का स्वागत करो।” योगानन्द उसी मुद्रा में बोला।
 
हरि आनन्द की आँखों में आतंक का भाव देखकर मुझे ख़ुशी हुई। उसके चेहरे पर भय था। योगानन्द ने करवट बदलकर मुझे लापरवाही से देखा और अचानक उसकी दृष्टि में एक विलक्षण चमक जाग उठी। मैंने पलकें नहीं झपकायीं। वह मेरे अंदर देख रहा था। मगर मैंने पहले ही अपने गिर्द एक मज़बूत दायरा खींच लिया था।

मोहिनी की हालत बड़ी बदतर होती जा रही थी। वह मेरे सिर पर बुत बनी बैठी थी। हरि आनन्द अपनी बौखलाहट पर क़ाबू पाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। हर चीज़ शंकित होकर रह गयी थी।

एक गहरा सन्नाटा छा गया था। जिस वक्त मैंने पुतलियाँ हरकत देकर खींची और माला के दानों पर उँगलियाँ फिराई योगानन्द के होंठो पर एक मुस्कराहट थिरक आयी।

मैंने हरि आनन्द को संबोधित किया- “महाराज योगानन्द ने कहा है, सुना नहीं तुमने। मेहमान का स्वागत करो। मुझे गौर से देखो। यह मैं ही हूँ, कुँवर राज ठाकुर। तेरा पुराना दोस्त। पूरे भारत में घुमाया और हाथ नहीं आया। अब सामना करने से क्यों कतरा रहा है ?”

“पापी!” हरि आनन्द ने बौखलाहट पर क़ाबू पाते हुए कहा। “मुझे तेरी ही तलाश थी पर समय नहीं आया था।”

“समय आ गया। खूब। बहुत खूब हरि आनन्द। तुझे तो किसी नौटंकी में होना चाहिए था। तूने भारत में कितने पंडित-पुजारियों को धोखा दिया। तूने धर्म का नाश किया। तूने मेरे हाथों न जाने कितने निर्दोषों का खून कराया। उसका ज़िम्मेदार तू है हरि आनन्द, तू। और तूने महापुरुष योगानन्द को भी बीच में घसीट लिया। मुझे तलाश कर रहा था तू। ले मैं खुद तेरे पास चला आया।” मैं जहरीले स्वर में बोला।

“अब तुझे काली के प्रकोप से कोई नहीं बचा सकता।”

“काली का नाम बीच में क्यों लाता है कमीने। तेरे मुँह से शोभा नहीं देता।”

फिर मैंने योगानन्द को संबोधित किया- “महाराज, तुम तो एक बलवान महा शक्तिमान पुजारी हो, तुमने इसे श्राप नहीं दिया। तुमने इसकी पीठ पर हाथ रखा।”

“बड़ी गरज है तुम में अब भी बालक!” योगानन्द बहुत नम्र स्वर में बोला। “लेकिन बालक तेरी जड़े तो कभी की कमज़ोर हो चुकी। जा अपनी जड़े मजबूत कर ले। किसी की दान दी हुई माला से इंसान खुद बलवान नहीं बन सकता। तू एक सौ एक वीरों के घमंड में घूमता रहा और तुझे तो यह भी नहीं मालूम कि उसमें से कितने नष्ट हो चुके।

“तू एक सौ एक दिन तक खून खराबा करता रहा और अपनी खुद खोखली करता रहा। तूने उन महापुरुष का नाम गर्क में मिला दिया जिन्होंने तुझे अपनी शक्तियाँ दान दी थी। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। मेरे आश्रम में आ जा, मेरे साथ रह। मन का मैल दूर कर। समझा, मैं क्या कह रहा हूँ ?

“मेरे पास आ, बैठ जा! हरि, जा तू जल ले आ। कुँवर राज ठाकुर ने बड़े-बड़े सूरमा मारे हैं लेकिन इंसान बुरा नहीं है। मैं इसका नाम बदल दूँगा। इसे बहुत बड़ा तपस्वी बनाऊँगा। यह मेरा शिष्य भक्तानन्द के नाम से प्रसिद्धि पाएगा। यह नाम पसंद आया तुझे बालक ?”

योगानन्द की जानकारी सुनकर मैं थोड़ा विचलित हो उठा।

“महाराज, यह आप क्या कह रहे हैं ?” हरि आनन्द ने कहा। “यह तो हमारे सारे समुदाय का दुश्मन है।”

“मैं ठीक ही कह रहा हूँ हरि। अब तू भी विचार बदल दे...।”

“मेरा नाम कुँवर राज है महाराज।” मैंने भारी आवाज़ में कहा। “मैं यहाँ नाम बदलने या तपस्वी बनने नहीं आया हूँ।”

“बालक, तू अपनी ज़िद छोड़ दे! मेरे पास बैठ। यहाँ छाँव ही छाँव है।” योगानन्द ने बड़े शांत और ठंडे स्वर में कहा। “आनन्द ही आनन्द मिलेगा।”

“आनन्द और इस पापी की मौजूदगी में।” मैंने जहरीले स्वर में कहा। “मैं जिस कारण शहर-शहर भटकता यहाँ तक आया हूँ महाराज, उसकी बात करो। मैं भी तुम्हें शांति और आनन्द का सुझाव दे सकता हूँ। तुम शायद मुझे अच्छी तरह नहीं जानते। बीच में न आओ महाराज। मेरे और हरि आनन्द के कुछ पुराने हिसाब हैं।”

योगानन्द के माथे पर सिलवटें पड़ गईं लेकिन वह नम्र ही बना रहा। “अब छोड़ दो पुराने बहीखाते और यहाँ नहीं बैठना तो यहाँ से चले जा।”

“तुमसे पहले भी हरि आनन्द के कुछ हिमायती इसी तरह मेरे मार्ग में आते रहे हैं। क्या तुम्हें उनका अंजाम मालूम है ?” मैंने तीखे स्वर में कहा।

योगानन्द गरजनाक हो गया- “अरे तू कैसी बातें करता है।”

“यह बातें तुम समझना चाहो तो भी नहीं समझ सकते महाराज। तुमने हरि आनन्द जैसे नीच जानवर के सिर पर बिना सोचे-समझे हाथ रखा है। बस अब ख़ामोश होकर इसे मेरे हवाले कर दो ताकि मैं इसका कीमा बनाके गिद्धों को दावतनामा भेज सकूँ।”

“महाराज!” हरि आनन्द ने मेरे बिगड़े हुए तेवर देखकर कहा। “महाराज, यह दुष्ट आपका अपमान कर रहा है।”

“तू नामर्द है हरि आनन्द, जनखा है, भड़वा है। आ, मेरे सामने आ।” मैंने गरजकर कहा। “आज तुझे मेरे हाथों से कोई नहीं बचा सकेगा।”

हरि आनन्द के होंठ स्वतः ही किसी अंतर को बुदबुदाने के लिए हिलने लगे। मैंने उँगली उठाई तो वह बिलबिलाता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा।

मैंने अपनी सभी शक्तियों को जमा कर लिया क्योंकि आख़िरी जंग का वक्त आ गया था।
 
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