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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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यहां से निकलने की उसे कोई उम्मीद नजर नहीं आती थी। क्योंकि वो समझ गया था कि यह मन्दिर सुनसान क्यों पड़ा है

और यह भी उसकी समझ में आ गया था कि यहां बरसों से कोई नहीं आया होगा। बरसों पहले जब इस जगह कोई आता भी होगा तो सन्दूक में पड़ी ज्योति की लाश देखता होगा और जब वो मुस्कराती होगी तो लोग डरकर भाग जाते होंगे। धीरे-धीरे लोगों में यह मन्दिर भुतहा मशहूर हो गया होगा और उन्होंने झांकना भी छोड़ दिया होगा। ऐसे स्थान भारत में बहुत पाए जाते हैं।

अब राज को अफसोस हो रहा था कि उसने सतीश और इस्पेक्टर विकास त्यागी की अपने प्रोग्राम के बारे में आगाह क्यों नहीं किया था? लेकिन उस वक्त उन्हें मालूम भी क्या था कि यहां मौत उनके इन्तजार में मुंह फाड़े खड़ी है। डॉक्टर जय कह रहा था

"हां, यही ठीक रहेगा। लेकिन मुझे डॉक्टर सावंत की मौत का हमेशा अफसोस रहेगा।"

इधर राज को अपने मरने से ज्यादा डाक्टर सावंत की सम्भावित मौत का दुख था। वो बेचारा सिर्फ राज की वजह से ही इस मुसीबत में फंसा था। लेकिन डॉक्टर सावंत हिम्मत वाला आदमी था, उसने बड़ी दिलेरी से सीना तानते हुए ठोस लहजे में कहा

"मैं मौत से भयभीत नहीं हूं जय । मौत एक दिन तुम्हें भी आनी है और में भविष्यवाणी कर सकता हूं कि तुम्हारी मौत हम दोनों की मौत से ज्यादा खौफनाक और अपमानजनक होगी।"

"वो बाद ही बातें हैं। पहले मैं आप लोगों को बता दूं कि हाल ही में मेरे पास ऑस्ट्रेलिया से कुछ रेगिस्तानी बिच्छू आए हैं, जिनके काटने से अच्छा भला सेहतमंद आदमी आठ-दस घंटे जल बिन मछली की तरह तड़पता रहता है और अगर उचित इलाज न किया जाए तो दस घंटे बाद मर जाता है।" उसने रूककर दोनों की तरफ देखा और बोला

"उन्हीं बिच्छुओं पर मुझे कुछ परीक्षण करने हैं। मालूम करना चाहता हूं कि उन बिच्छुओं का जहर इन्सानी खून में मिलकर क्या असर दिखाता है।" वो क्रून मुस्कान के साथ बोला, "मेरा ख्याल है कि इन प्रयोगों के लिए आप दोनों से अच्छा जानवर मुझे दूसरा नहीं मिल सकता।"

"वो क्यों?" राज ने कुढ़ कर पूछा।

"क्योंकि आप दोनों अपने अहसास मुंह से बोल कर बता सकेंगे कि आपकी आंतें कट रही हैं या खून में आग लग रही है....।"

"मुझे तो लगता है आप पागल हो गए हैं डॉक्टर जय।" डॉक्टर सावंत ने शायद उकताकर कहा।

"इस बात को तो पन्द्रह साल हो चुके हैं, अब डॉक्टरों ने पहली बार मुझे बताया था कि मेरे दिमाग में कोई अनोखी केमिकल गड़बड़ है।" डॉक्टर जय ने गम्भीर लहजे में कहा।

राज के सारे जिस्म में दहशत की कंपकपी दौड़ गई। उनका पाला एक विक्षिप्त व्यक्ति से पड़ गया था, वो बेहद खतरनाक हो रहा था। आस्ट्रेलिया के रेगिस्तानी बिच्छुओं के बारे में राज ने बहुत कुछ पढ़ रखा था। वो बहुत खौफनाक बिच्छू थे और शायद दुनिया भर के बिच्छुओं में सबसे खौफनाक बिच्छू थे और शायद दुनिया भर के बिच्छुओं में सबसे ज्यादा जहरीले थे।

डॉक्टर सावंत ने राज की तरह बेबसी से देखते हुए पूछा

"राज, आप भयभीत तो नहीं हैं?"

"बिल्कुल नहीं।" राज ने हिम्मत बटोरते हुए जवाब दिया-"अगर इसी तरह मरना किस्मत में लिखा है तो ऐसे ही सही। डरने से क्या होगा।"

डॉक्टर जय ने हंस कर कहा

"जब मौत आती है तो बड़े-बड़े बहादुरों के हौसले पस्त हो जाते हैं। आपके हौसलों का भी अभी इम्हिान होने वाला है।"

उसने अपने कारिन्दों से उसी अजनबी भाषा में कुछ कहा, फौरन ही वो खूखार चेहरों वालों हे-के आदमी आगे बढ़े और दो-दो बदमाशों ने राज और डॉक्टर सावंत का दबोचा और इन्हें तरफ को ले चले। जय और ज्योति वहीं खड़े बातें करते रह गए।

यह डॉक्टर जय की प्रयोगशाला थी। दीवारों में बने खानों के सामने शीशे में ढक्कन लगे हुए थे और शीशों के पीछे डॉक्टर जय के पालतू सांप, बिच्छू, छिपकलियां वगैरह जहरीले जानवर बन्द थे। सैकड़ों किस्मों के सांप थे वहां, तरह-तरह के बिच्छू थे और अजीब-अजीब से कीड़े थे। आखिर डॉक्टर सांवत पूर्व जन्म का संपेरा था, जहरों और जहरीले प्राणियों से दिलचस्पी उसकी आत्मा तक में रच-बस गई थी। राज और डॉक्टर सांवत ने सोचा, सिन्देह याह जहरीले कीड़ों का अनुपम संग्रह है।

हॉल के बीचों-बीच दो लम्बी-लम्बी मेजें पड़ी हुई थीं, मेजों के दोनों तरफ चमड़े की पयिों से कस दिया जाता था और फिर उन पर प्रयोग किए जाते थे, उनके जिस्मों में जहर इंजेक्ट करके।

उन बदमाशें ने जबर्दस्ती राज और डॉक्टर सावंत को मेज पर लिटाकर चमड़े की पट्टियां उनके जिस्मों पर कस दीं। अब वो हिल भी नहीं सकते थे। यहां तक कि हाथ-पांव भी नहीं हिला सकते थे।

वो दोनों विवश थे। मुकाबले का कोई फायदा नहीं था। एक तो वो चारों मुश्टंडे उनसे बहुत ज्यादा ताकतवर थे, दूसरे वो हथियारबन्द भी थे।

उन्हें मेजों पर बांधकर वो सभी बाहर निकल गए और राज तथा डॉक्टर सावंत एकांत में रह गए। उन दोनों की इस वक्त यह पोजीशन थी कि वो गर्दन घुमा कर भी एक-दूसरे को नहीं देख सकते थे। उनकी मनोस्थिति का हाल तो शब्दों में ब्यान ही नहीं किया जा सकता।

राज को इस वक्त डॉक्टर सावंत के अहसास का तो पता नहीं था, वो खुद इस वक्त वाकई भयभीत था। उसका जिस्म पसीने में भीग चुका था।

कुछ देर खामोशी के बाद डॉक्टर सावंत ने कहा

"राज साहब.....।"

राज ने घुटे हुए स्वर में कहा

"आपकी मौत का जिम्मेदार मैं खुद को मान रहा हूं डॉक्टर सावंत....मुझे सख अफोसस है।"

"तुम मेरे बारे में न सोचो। अगर हमने मरना ही है और आज ही, तो कोई हमारी किस्मत नहीं बदल सकता। पहले तो यह अन्दाजा लगाएं कि क्या वाकई हमारी जिन्दगी मौत की सरहद की तरफ बढ़ रही है?"

"मैंने मायूम होना नहीं सीखा डॉक्टर सावंत।" राज ने जवाब दिया, "अब भी उम्मीद की एक किरण बाकी है।"

"तुम्हारा ख्याल है कि कोई हमारी मदद को आ सकता है?"

"मालूम नहीं।" राज ने गहरी सांस ली, "शायद यह मेरा अति आशवाद ही। मुझे याद है कि ठीक बारह बजे मुझे सतीश के साथ एक दोस्त से मिलने जाना था। बारह बजे सतीश ने मेरा इन्तजार किया होगा। वो जानता है कि मैं वक्त का बहुत पाबन्द इन्सान हूं। इसलिए दस-पन्द्रह मिनट इन्तजार के बाद उसने जरूर आपके यहां फोन किया होगा, फिर दो-चार जगह और फोन करके भी मुझे तलाश करने की कोशिश की होगी और जब मैं न मिला हूंगा तो लाजिमी है कि उसे फिक्र हुई होगी। अब देखना यह है कि इस फिक्रमंदी की हालत में वो क्या सोचता है? और किस तरह हमें तलाश करने की कोशिश करता है। बस यही एक उम्मीद एक टिमटिमाते चिराग की तरह मुझे नजर आ रही है।"

"बारह बजे....और इस वक्त पांच बज रहे हैं। पूरे पांच घंटे गुजर चुके है।"

"जी हां, शायद साढ़े ग्यारह बजे हमें बाजार में ज्योति नजर आई थी। उस वक्त में सतीश को कुछ नहीं बताना चाहता था, जिसका अब मुझे अफसोस हो रहा है। काश ! मैं रास्ते में से ही उसको फोन कर देता।"

"हम जो नहीं कर सके, उसका अफसोस करना बेकार है।

सवाल सिर्फ यह है कि हमारे लापता होने के बाद सतीश क्या कर सकता है?"

"वो इंस्पेक्टर विकास त्यागी से जाकर मिलेगा।" राज ने कहा।

"इंस्पेक्टर त्यागी भी क्या करेगा? उसे क्या मालूम कि हम कहां

"यही बात मुझे परेशान कर रही है। हो सकता है वो यही समझे कि हम कहीं घूमने-फिरने निकल गए हैं, सुबह तक लौट आएंगे। उनको किसी खतरे का आभास भी हो तो कैसे जान पाएंगे कि हम इस तरफ आए हैं? सच पूछिए डॉक्टर सावंत कि मैं किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहा हूं।"

इस जमाने में ऐसे चमत्कार नहीं होते डॉक्टर राज ।"

उसी वक्त बाहर किसी के चलने की आवाज पैदा हुई, जो उन तक भी पहुंची। वो दोनों खामोश होकर आने वाली मुसीबत का इन्तजार करने लगे।

डॉक्टर जय, ज्योति और एक कोई सात फुट लम्बा पहलवान अन्दर दाखिल हुए। ज्योति ने दोनों कूल्हों पर हाथ रख कर किसी विजेता की सी मुद्रा में कहा

"कितना खूबसूरत सीन है! किसी दुश्मन को बेबस करके उसके सामने खड़े होने मेंक्या आनन्द आता है यह तुम क्या जानो? याद है, तुमने मेरे इस शीर को खत्म करने की कोशिश की थी राज ? मैं तो तुम सब लोगों को माफ कर चुकी थी, लेकिन डॉक्टर जय ने मुझे फिर याद दिलाया है कि तुम लोगों ने कई बार मुझसे दुश्मनी निभाई है। अब बोलो, क्या सलूक किया जाए तुमसे?"

"हमने जो ठीक समझा, किया। तुम्हारी मर्जी, तुम जो चाहो करते रहो।"
 
अब राज को अफसोस हो रहा था कि उसने सतीश और इस्पेक्टर विकास त्यागी की अपने प्रोग्राम के बारे में आगाह क्यों नहीं किया था? लेकिन उस वक्त उन्हें मालूम भी क्या था कि यहां मौत उनके इन्तजार में मुंह फाड़े खड़ी है। डॉक्टर जय कह रहा था

"हां, यही ठीक रहेगा। लेकिन मुझे डॉक्टर सावंत की मौत का हमेशा अफसोस रहेगा।"

इधर राज को अपने मरने से ज्यादा डाक्टर सावंत की सम्भावित मौत का दुख था। वो बेचारा सिर्फ राज की वजह से ही इस मुसीबत में फंसा था। लेकिन डॉक्टर सावंत हिम्मत वाला आदमी था, उसने बड़ी दिलेरी से सीना तानते हुए ठोस लहजे में कहा

"मैं मौत से भयभीत नहीं हूं जय । मौत एक दिन तुम्हें भी आनी है और में भविष्यवाणी कर सकता हूं कि तुम्हारी मौत हम दोनों की मौत से ज्यादा खौफनाक और अपमानजनक होगी।"

"वो बाद ही बातें हैं। पहले मैं आप लोगों को बता दूं कि हाल ही में मेरे पास ऑस्ट्रेलिया से कुछ रेगिस्तानी बिच्छू आए हैं, जिनके काटने से अच्छा भला सेहतमंद आदमी आठ-दस घंटे जल बिन मछली की तरह तड़पता रहता है और अगर उचित इलाज न किया जाए तो दस घंटे बाद मर जाता है।" उसने रूककर दोनों की तरफ देखा और बोला

"उन्हीं बिच्छुओं पर मुझे कुछ परीक्षण करने हैं। मालूम करना चाहता हूं कि उन बिच्छुओं का जहर इन्सानी खून में मिलकर क्या असर दिखाता है।" वो क्रून मुस्कान के साथ बोला, "मेरा ख्याल है कि इन प्रयोगों के लिए आप दोनों से अच्छा जानवर मुझे दूसरा नहीं मिल सकता।"

"वो क्यों?" राज ने कुढ़ कर पूछा।

"क्योंकि आप दोनों अपने अहसास मुंह से बोल कर बता सकेंगे कि आपकी आंतें कट रही हैं या खून में आग लग रही है....।"

"मुझे तो लगता है आप पागल हो गए हैं डॉक्टर जय।" डॉक्टर सावंत ने शायद उकताकर कहा।

"इस बात को तो पन्द्रह साल हो चुके हैं, अब डॉक्टरों ने पहली बार मुझे बताया था कि मेरे दिमाग में कोई अनोखी केमिकल गड़बड़ है।" डॉक्टर जय ने गम्भीर लहजे में कहा।

राज के सारे जिस्म में दहशत की कंपकपी दौड़ गई। उनका पाला एक विक्षिप्त व्यक्ति से पड़ गया था, वो बेहद खतरनाक हो रहा था। आस्ट्रेलिया के रेगिस्तानी बिच्छुओं के बारे में राज ने बहुत कुछ पढ़ रखा था। वो बहुत खौफनाक बिच्छू थे और शायद दुनिया भर के बिच्छुओं में सबसे खौफनाक बिच्छू थे और शायद दुनिया भर के बिच्छुओं में सबसे ज्यादा जहरीले थे।

डॉक्टर सावंत ने राज की तरह बेबसी से देखते हुए पूछा

"राज, आप भयभीत तो नहीं हैं?"

"बिल्कुल नहीं।" राज ने हिम्मत बटोरते हुए जवाब दिया-"अगर इसी तरह मरना किस्मत में लिखा है तो ऐसे ही सही। डरने से क्या होगा।"

डॉक्टर जय ने हंस कर कहा

"जब मौत आती है तो बड़े-बड़े बहादुरों के हौसले पस्त हो जाते हैं। आपके हौसलों का भी अभी इम्हिान होने वाला है।"

उसने अपने कारिन्दों से उसी अजनबी भाषा में कुछ कहा, फौरन ही वो खूखार चेहरों वालों हे-के आदमी आगे बढ़े और दो-दो बदमाशों ने राज और डॉक्टर सावंत का दबोचा और इन्हें तरफ को ले चले। जय और ज्योति वहीं खड़े बातें करते रह गए।

यह डॉक्टर जय की प्रयोगशाला थी। दीवारों में बने खानों के सामने शीशे में ढक्कन लगे हुए थे और शीशों के पीछे डॉक्टर जय के पालतू सांप, बिच्छू, छिपकलियां वगैरह जहरीले जानवर बन्द थे। सैकड़ों किस्मों के सांप थे वहां, तरह-तरह के बिच्छू थे और अजीब-अजीब से कीड़े थे। आखिर डॉक्टर सांवत पूर्व जन्म का संपेरा था, जहरों और जहरीले प्राणियों से दिलचस्पी उसकी आत्मा तक में रच-बस गई थी। राज और डॉक्टर सांवत ने सोचा, सिन्देह याह जहरीले कीड़ों का अनुपम संग्रह है।

हॉल के बीचों-बीच दो लम्बी-लम्बी मेजें पड़ी हुई थीं, मेजों के दोनों तरफ चमड़े की पयिों से कस दिया जाता था और फिर उन पर प्रयोग किए जाते थे, उनके जिस्मों में जहर इंजेक्ट करके।

उन बदमाशें ने जबर्दस्ती राज और डॉक्टर सावंत को मेज पर लिटाकर चमड़े की पट्टियां उनके जिस्मों पर कस दीं। अब वो हिल भी नहीं सकते थे। यहां तक कि हाथ-पांव भी नहीं हिला सकते थे।

वो दोनों विवश थे। मुकाबले का कोई फायदा नहीं था। एक तो वो चारों मुश्टंडे उनसे बहुत ज्यादा ताकतवर थे, दूसरे वो हथियारबन्द भी थे।

उन्हें मेजों पर बांधकर वो सभी बाहर निकल गए और राज तथा डॉक्टर सावंत एकांत में रह गए। उन दोनों की इस वक्त यह पोजीशन थी कि वो गर्दन घुमा कर भी एक-दूसरे को नहीं देख सकते थे। उनकी मनोस्थिति का हाल तो शब्दों में ब्यान ही नहीं किया जा सकता।

राज को इस वक्त डॉक्टर सावंत के अहसास का तो पता नहीं था, वो खुद इस वक्त वाकई भयभीत था। उसका जिस्म पसीने में भीग चुका था।

कुछ देर खामोशी के बाद डॉक्टर सावंत ने कहा

"राज साहब.....।"

राज ने घुटे हुए स्वर में कहा

"आपकी मौत का जिम्मेदार मैं खुद को मान रहा हूं डॉक्टर सावंत....मुझे सख अफोसस है।"

"तुम मेरे बारे में न सोचो। अगर हमने मरना ही है और आज ही, तो कोई हमारी किस्मत नहीं बदल सकता। पहले तो यह अन्दाजा लगाएं कि क्या वाकई हमारी जिन्दगी मौत की सरहद की तरफ बढ़ रही है?"

"मैंने मायूम होना नहीं सीखा डॉक्टर सावंत।" राज ने जवाब दिया, "अब भी उम्मीद की एक किरण बाकी है।"

"तुम्हारा ख्याल है कि कोई हमारी मदद को आ सकता है?"

"मालूम नहीं।" राज ने गहरी सांस ली, "शायद यह मेरा अति आशवाद ही। मुझे याद है कि ठीक बारह बजे मुझे सतीश के साथ एक दोस्त से मिलने जाना था। बारह बजे सतीश ने मेरा इन्तजार किया होगा। वो जानता है कि मैं वक्त का बहुत पाबन्द इन्सान हूं। इसलिए दस-पन्द्रह मिनट इन्तजार के बाद उसने जरूर आपके यहां फोन किया होगा, फिर दो-चार जगह और फोन करके भी मुझे तलाश करने की कोशिश की होगी और जब मैं न मिला हूंगा तो लाजिमी है कि उसे फिक्र हुई होगी। अब देखना यह है कि इस फिक्रमंदी की हालत में वो क्या सोचता है? और किस तरह हमें तलाश करने की कोशिश करता है। बस यही एक उम्मीद एक टिमटिमाते चिराग की तरह मुझे नजर आ रही है।"

"बारह बजे....और इस वक्त पांच बज रहे हैं। पूरे पांच घंटे गुजर चुके है।"

"जी हां, शायद साढ़े ग्यारह बजे हमें बाजार में ज्योति नजर आई थी। उस वक्त में सतीश को कुछ नहीं बताना चाहता था, जिसका अब मुझे अफसोस हो रहा है। काश ! मैं रास्ते में से ही उसको फोन कर देता।"

"हम जो नहीं कर सके, उसका अफसोस करना बेकार है।

सवाल सिर्फ यह है कि हमारे लापता होने के बाद सतीश क्या कर सकता है?"

"वो इंस्पेक्टर विकास त्यागी से जाकर मिलेगा।" राज ने कहा।

"इंस्पेक्टर त्यागी भी क्या करेगा? उसे क्या मालूम कि हम कहां

"यही बात मुझे परेशान कर रही है। हो सकता है वो यही समझे कि हम कहीं घूमने-फिरने निकल गए हैं, सुबह तक लौट आएंगे। उनको किसी खतरे का आभास भी हो तो कैसे जान पाएंगे कि हम इस तरफ आए हैं? सच पूछिए डॉक्टर सावंत कि मैं किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहा हूं।"

इस जमाने में ऐसे चमत्कार नहीं होते डॉक्टर राज ।"

उसी वक्त बाहर किसी के चलने की आवाज पैदा हुई, जो उन तक भी पहुंची। वो दोनों खामोश होकर आने वाली मुसीबत का इन्तजार करने लगे।

डॉक्टर जय, ज्योति और एक कोई सात फुट लम्बा पहलवान अन्दर दाखिल हुए। ज्योति ने दोनों कूल्हों पर हाथ रख कर किसी विजेता की सी मुद्रा में कहा

"कितना खूबसूरत सीन है! किसी दुश्मन को बेबस करके उसके सामने खड़े होने मेंक्या आनन्द आता है यह तुम क्या जानो? याद है, तुमने मेरे इस शीर को खत्म करने की कोशिश की थी राज ? मैं तो तुम सब लोगों को माफ कर चुकी थी, लेकिन डॉक्टर जय ने मुझे फिर याद दिलाया है कि तुम लोगों ने कई बार मुझसे दुश्मनी निभाई है। अब बोलो, क्या सलूक किया जाए तुमसे?"

"हमने जो ठीक समझा, किया। तुम्हारी मर्जी, तुम जो चाहो करते रहो।"
 
"हमने जो ठीक समझा, किया। तुम्हारी मर्जी, तुम जो चाहो करते रहो।"

"हर शख्स का जिन्दगी के बारे में अपना एक नजरिया होता है। अपने कुछ असूल होते हैं। हमारा असूल यह है कि दुश्मनों को कभी जिन्दा न छोड़ा जाए।" डॉक्टर जय ने कहा।

कह कर वो सीधा दीवार में ग्र खानों की तरफ गया और शीशे का एक मर्तबान जैसा बर्तन उठा लाया। जिसमें भूरे रंग का एक भयानक बिच्छू हिल रहा था। बिच्छू कम से कम चार इंच लम्बा था। जय ने मर्तबान राज के चेहरे सामने करते हुए कहा

"यह है वो बिच्छू डॉकटर राज! जिसके जहर की मारक क्षमता का परीक्षण मैं आपके जिस्म पर करना चाहता हूं।"

एक बार फिर राज के जिस्म में दहशत से झुरझुरी दौड़ गई। माथे पर पसीना आ गया।

जय ने कहकहा लगा कर कहा

"देखा, मौत कितनी लजीज चीज है डॉक्टर राज?

आपके माथे पर पसीने के कतरे बता रहे हैं कि आप पर मौत की दहशत सवार हो गई है।"

राज की भी सारी उम्मीदें खत्म होती जा रही थीं। उसे जिस चमत्कार का इन्तजार था, उसका ख्याल भी उसके दिल के किसी कोने में दफन होता जा रहा था, उसे यकीन होता जा रहा था कि अब कोई ताकत उसे नहीं बचा सकती।

जय ने एक चिमटी मर्तबान में डालकर बिच्छु को पकड़ा और उसे बाहर निकाला और उसे राज की आंखों के सामने लहरात बोला

"यह बिच्छु आपके जिस्म पर किस जगह डंक मारना चाहता है, इसका चुनाव मैं इसी पर छोड़ देता हूं।" कहकर उसने धीरे से बिच्छु, राज के बाजू पर रख दिया।

राज को अपने सारे जिस्म में च्यूटियां सी रेंगती महसूस हुईं

और उसके गले में दहशत भरी चीख निकलते-निकलते डंक अपने जिस्म में घुसने का इन्तजार करने लगा। वो इस वक्त बिल्कुल बेबस था। उसकी कलाईयां चमड़े की पयिों से मेज के साथ बंधी हुई थी और उसका जिस्म जरा भी हिल नहीं सकता था।

बिच्छू कुछ क्षण एक जगह ही चिपका रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता वो बाजू से कलाई की तरफ रेंगने लगा। जय और ज्योति राज की दहशत से आनन्द उठा रहे थे। जय अगर चाहता तो वह बिच्छू को छेड़कर उत्तेजित कर सकता था, जिससे वो फौरन डंक मार देता। लेकिन वो राज की बेबसी से मजे लेना चाहते थे।

बिच्छू धीरे-धीरे रेंगता हुआ राज की कलाई तक पहुंच गया , फिर चमड़े की पी पर से हाता हुआ हाथ पर पहुंच गया।

अचानक एक नया ख्याल राज के दिमाग में उभरा, वो अपनी कलाईयों को हिला नहीं सकता था, लेकिन अंगुलियों को हिला-डुला सकता था, खोल सकता था, बन्द कर सकता था। इस नये ख्याल दिमाग में आते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा वो दिल ही दिल में प्रार्थना करने लगा कि बिच्छू उसकी अंगुलियों तक पहुंच जाए।

वक्त जैसे रूक गया था, एक-एक पल एक-एक साल की तरह गुजरता लग रहा था राज को। जय राज के हाथ से दो ढ़ाई फुट की दूरी पर ही खड़ा हुआ था और खौफनाक नजरों से उसी की तरफ देख रहा थ। वो पूरा ध्यान लगा कर बिच्छू की तरफ देख रहा था।

आखिर बिच्छू रेंगता हुआ राज की अंगुलियों तक पहुंच गया। वो क्षण आ गया था जिसका राज को बड़ी बेकब्री से इन्तजार था।

राज ने अपनी बीच वाली अंगुली पहली अंगुली के नीचे की और पहली अंगुली का नाखून लगभग अंगूठे से सटा दिया। फिर जैसे ही वो बिच्छू उन दोनों अंगुलियों की नोक पर आया, राज ने अपने जिस्म की पूरी ताकत लगाकर बिच्छु को डॉक्टर जय पर उछाल दिया, ठीक उसी तरह, जिस तरह कैरम बोर्ड के स्ट्राईगर को गोटी पर मारा जाता है।

यह सब इतना अचानक हुआ था कि डॉक्टर जय इस हमले के लिए तैयार नहीं था। बिच्छु में उड़ता हुआ जय की गर्दन के पास उसक कंधे पर जा गिरा। राज की अंगुली की चोट से वो इतना जिलमिला गय था कि उसने जय के कंधे पर टिक्ते ही उसकी गर्दन पर डंक मार दिया था।

डॉक्टर जय के गले से एक दर्दनाक चीख निकली, उसने हाथ मार कर बिच्छु को कंधे से नीचे गिरा दिया और तकलीफ की अधिकता से नीचे बैठता चला गया।

ज्योति चिल्लाई

"यह क्या हो गया जय?"

बिच्छु अब फर्श पर रेंग रहा था, उस सात फुट लम्बे पहलवान ने आगे बढ़ कर उसे जूते से कुचन दिया। जय हाफ रहा था

और उसके गले से ऐसी आवाजें निकल रही थीं जैसे कोई उसका गला काट रहा हो।

ज्योति ने आगे बढ़कर डॉक्टर जय को सहारा दिया तो वह बड़ी मुश्किल से बोला

"मुझे बिस्तर पर लिटा दो। इस जहर का तो परीक्षण भी नहीं हुआ.....इसका तोड़ मेरे पास नहीं है।"

ज्योति ने जल्दी से कहा

"जय...फौरन मुझे मणि का पता बताओ, शक्ति प्राप्त करके मैं तुम्हारा जहर चूस लूंगी। हम दोनों सदियों तक जिन्दा रहकर प्रेम करते रहेंगे....।"

"वो.....वो....चार नम्बर के काले जहर वाले जार में है......जाओ....जल्दी ले आओ।"
 
ज्योति ने जय को फर्श पर पटका और आंधी-तूफान की तरह भागी जहां शीशियों और जारों में डॉक्टर जय ने जहर रखे हुए थे।

काले रंग के जहर से आधा भरा हुअउ एक जार उठा कर जमीन पर दे मारा। शीशे का जार टुकडे-टुकड़े हो गया। इसके साथ ही ज्योति फर्श पर बैठ गई। अगले ही पल लेब्रॉटरी में ऐसा तेज प्रकाश फैल गया जैसे हजारों वाट के बल्ब जल उठे हों। शायद ज्योति ने मणि ग्रहण कर ली थी।

उसके बाद जो कुछ हुआ, उसने सबके होश उड़ा दिए। ज्योति उठ खड़ी हुई। लेकिन यह वो ज्योति नहीं थी, जो कुछ क्षण पहले फर्श की तरफ झुकी थी।

इस ज्योति ने प्राचीन काल के राजसी वस्त्र रख्ने थे और उसकी आंखों से किरणें निकल रही थीं। वो तेज प्रकाश उसके पूरे जिस्म में से फूट रहा था।

सीधे खड़े होकर ज्योति ने अपना हाथ सीधा किया और उन खानों की तरफ घुमाया जहां चारों ओर शीशियों में जहरीले जीव कैद थे।

तड़ाक-तड़ाक-तड़ाक।

एक-एक करके सभी जार और शीशियां टूटने लगीं और उनमें से वो सांप, बिच्छू, छिपकलियां वगैरह निकल-निकल कर फर्श पर टपकने लगीं।

कुछ ही मिनटों ने सभी शीशियों और जार खाली हो गए और सभी जहरीले जीव फर्श पर रेंगने लगे। चारों तरफ सांपों की फंफकारों जोर-जोर से गूंज रही थीं।

फिर ज्योति रोशनी के घेरे में खड़े-खड़े मुड़ी और चल पड़ी।

उसका रूख दरवाजे की तरफ था। सभी जहरीले जीव उसके पीछे बढ़े। ज्योति राज और डॉक्टर सावंत वाली मेजों के पास से भी गुजरी, लेकिन उसने उठाकर भी किसी तरफ नहीं देखा और गरिमामयी चाल से चलती हुई दरवाजे पर पहुंची और फिर दरवाजे से बाहर चली गई। सभी जहरीले प्राणी भी उसके पीछे-पीछे रेंगते हुए बाहर चले गए। हैरत की बात तो यह थी कि इनमें से किसी भी प्राणी ने रेंगकर इधर-उधर छुपने की या किसी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की।

आजादी के बाद सभी मुक्त हवा में जाने के लिए बेचैन दिखते थे और उनकी नेत्र ज्योति भी, वो मणि हासिल करके खुद छ: सौ साल बाद आजाद हुई थी।

सबसे ज्यादा हैरत की बात तो यह थी कि ज्योति ने अपने जन्म-जन्म के प्रेमी बसंता सपेरा यानि डॉक्टर जय की तरफ भी नजर उठा कर नहीं देखा था। मानों डॉक्टर जय के व्यवाहार से वो भी मन ही मन कुढ़ी हुई हो और उसे दम तोड़ते हुए भी न देखना चाहती हो।

वहां मोजूद लोगों में से राज और डॉक्टर सावंत तो खैर बंधे ही हुए थे, डॉक्टर सावंत फर्श पर पड़ा छटपटा रहा था, लेकिन उसके पहलवानो पर भी शायद इच्छाधारी नागिन ने कोई जादू कर दिया था, कोई भी अपनी पलक तक नहीं झपका सका था।

राज और डॉक्टर सावंत जरा सी गर्दन मोड़ देख रहे थे

और सभी पहलवान स्तब्ध खड़े-खड़े।

उनके जाने के बाद राज का सम्मोहन तब टूटा, जब उसके कानों में किसी के चीखने की आवाज पड़ी-फिर अचानक कमरे में भगदड़ की आवाजें सुनाई दी। उसके बाद फिर सन्नाटा छा गया।

उसके बाद राज को अहसास नहीं रहा कि कितना वक्त गुजर गया। सब तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। एक ही स्थिति में लेटे-लेटे उनका जोड़-जोड़ सुन्न हो चुका था, प्यास की वजह से उनके गले सूख रहे थे और रहे थे और वो दोनों धीरे-धीरे बोलते हुए एक दूसरे की हिम्मत बढ़ा रहे थे।

उन्हे इस बात का भी पता नहीं चल रहा था कि इस वक्त दिन ही या रात हो चुकी है। फिर इसी हालत में न जाने कब उन्हें नींद के झोंकें आने शुरू हो गए थे। वो हर तकलीफ से बेखबर हो गए।

फिर एक खौफनाक धमाके की आवाज से उनकी आंखें खुली थीं। आंखें खुलते ही नहींकण्ठ को ऐसा लगा जैसे बाहर कयामत आ गई हो।

लोगों के इधर-उधर भागने की आवाजें आ रही थीं, कुछ चीजों के टूटने-फूटने की आवाजें भी आईं। राज ने डाक्टर सावंत को पुकारा

"डॉक्टर सावंत, यह क्या हो रहा है.....?"

"कोई धमाका था, जैसे बम फटा हो.....।" डॉक्टर सावंत ने कहा, "कुछ समझ नहीं आ रहा है यहां कितना अधेरा हो गया

"काश....इस वक्त हमारे हाथ-पांव खुले होते।" राज ने ठण्डी आह भर कर कहा।

उसी वक्त उन्हें बाहर कोई गोलियां चलने की आवाज सुनाई दी।

"यह तो गोलियां चल रही हैं.....।” डाक्टर सावंत ने कहा।

"आपका मतलब है, पुलिस पहुंच गई है।"

"ऐसा ही लगता है।” डॉक्टर सावंत ने जवाब दिया।

और फिर......वाकई वो वमत्कार हो गया, जिसका राज को दोपहर से ही इन्तजार था। तीन-चार आदमियों के भारी जूतों की आवाजें गूंजी और दो क्षण बाद ही फ्लैश लाइट की तेज रोशनी राज के चेहरे पर पड़ी।

"नीकण्ठ!"

यह सतीश की आवाज थी जो राज ने साफ पहचानी।

यह आवाज सुनते ही जैसे राज के मुर्दा जिस्म में जान दौड़ गई। खुशी के आंसू उसकी आंखों में भर आए।

दूसरी आवाज इंस्पेक्टर विकास त्यागी की थी।

"भगवान का शुक्र है कि आप लोग सही सलामत हैं....।"

डॉक्टर सावंत ने खुशी से कांपती हुई आवाज में कहा

"स्वागत है इंस्पेक्टर त्यागी और सतीश साहब....शुक्र है कि आप वक्त पर ही पहुंच गए। वर्ना न जाने क्या होता....।" सतीश आगे बढ़कर राज की रस्सियां खोलने लगा और इंस्पेक्टर त्यागी डॉक्टर सावंत को खोलने लगा। उन दोनों के जिस्म बिल्कुल सुन्न पड़ चुके थे।

इंस्पेक्टर त्यागी ने कहा

"आप लोग अभी उठने की कोशिश न कीजिए। मनोज जी आप राज साहब की थोड़ी मालिश कर दें, ताकि खून का दौरा जल्दी ठीक हो सके।"

सतीश ने राज के हाथ-पैर मलने शुरू कर दिए और इंस्पेक्टर त्यागी डॉक्टर सावंत पर झुक गया। करीब पन्द्रह मिनट बाद राज के सुन्न हाथ पैरों में झनझनाहट सी शुरू हुई। इसका मतलब था, खून का दौरा सुन्न अंगों में पहुंचने लगा था।

राज उठ कर बैठ गया और उसने हाथ-पैर चलाने की कोशिश शुरू कर दी। फिर वो फर्श पर खड़ा हो गया और उसने वहां नजर डाली, जहां डॉक्टर जय गिरा था।

"अंस्पेक्टर साहब! जरा इधर रोशनी डालिए।" उसने इंस्पेक्टर त्यागी से कहा।

इंस्पेक्टर त्यागी ने फ्लैश लाइट उधर घुमाई तो सतीश और त्यागी की नजर भी जय पर पड़ी थी, जो अब बिल्कुल निश्चल पड़ा हुआ था।

"य....यह तो डॉक्टर जय लगता है?" सतीश ने लगभग चीखकर कहा।

"वही है।" राज बोला और साथ ही डॉकटर जय पर झुक गया।

"इसे क्या हो गया है?" सतीश ने पूछा।

राज ने गहरी सांस लेकर कहा, "जहरों का माहिर शिकारी

आज खुद ही खतरनाक बिच्छू के जहर का शिकार होकर भयानक मौत मरा है।"
 
तब तक डॉक्टर सावंत भी उठ कर उसके करीब पहुंच चुका

था। जय के चेहरे पर निगाह पड़ते ही उसकेगले से एक चीख निकल गई।

"यह...यह क्या....डॉकटर राज ?"

राज ने गहरी सांस लेकर कहा

"देश का सबसे बड़ा जहर विशेषज्ञ शायद जिन्दगी में पहली बार गच्चा खा गया। इन बिच्छुओं के जहर की मारक क्षमता के बारे में उसका अनुमान गलत निकला। यह जहर इतना तेज और सख्त है कि इसका जिस्म गलना शुरू हो चुका है। शायद इसको मरे हुए भी कई घंटे बीत चुके हैं।"

"और ज्योति......ज्योति कहां है?" सतीश ने हड़बड़ा कर पूछा।

"वो जरा लम्बी कहानी है।" राज ने कहा, "फिलहाल यही कहा जा सकता है कि वो जहां से आई थी, वहीं लौट गई। और अब हमें कभी भी दिखाई नहीं देगी।"

सतीश ने सोचते हुए सिर हिला दिया, हालांकि उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया था। डॉक्टर सावंत की हालत भी अब पहले से बेहतर थी। उसने पूछा

"आप लोग यहां तक कैसे पहुंचे?"

"तुम भी अजीब आदमी हो राज ।” जवाब में सतीश ने गुस्से से कहा, " कम से कम हमें सूचना तो दे देते।"

"वो कहानी भी मैं बाद में बताऊंगा।" राज बोला, "जो कुछ हुआ, वो एकदम अनापेक्षित हुआ। अब बोलो, तुम लोग यहां तक कैसे पहुंचे?"

"तुम्हें बारह बजे तक घर वापिस आना था, क्योंकि हम दोनों ने राकेश के यहां लंच पर जाना था, साढ़े बारह बजे तक भी तुम नहीं लौटे तो मैंने डॉक्टर सावंत के घर फोन किया। वहां से भी कोई मुनासिब जवाब न मिला तो मैंने क्लब से फोन किया, इंस्पेक्टर त्यागी को फोन किया। लेकिन तुम किसी जगह भी नहीं थे। तुम्हारे साथ डॉक्टर सावंत भी गायब थे। मुझे परेशानी होनी शुरू हो गई। मैं फौरन इंस्पेक्टर त्यागी के पास पहुंचा था

और उन्हें बताया था कि तुम दोनों ही गायब हो। हम दोनों तुम्हें हर उस जगह तलाश करते रहे, जहां तुम लोगों के होने की सम्भावना थी।

जब कोई नतीजा न निकला तो इंस्पेक्टर त्यागी ने दो घंटे बाद तुम लोगों के हुलियों के साथ वायरलेस पर पुलिस की सभी पेट्रोल कारों पर फ्लैश जारी करवा दी कि तुम दोनों गायब हो और तुम्हें तलाश किया जाए।

आखिर शाम को पांच बजे के बाद एक थाने से इंस्पेक्टर त्यागी को फोन आया कि वहां किसी टैक्सी ड्राईवर ने रिपोर्ट दर्ज करावाई है कि दो मर्द सवारियां उसकी टैक्सी में बैठ कर गुफाओं और मन्दिरों वाले एक इलाके में गई थीं। और कई घंटे इन्तजार के बाद भी वापिस नहीं लौटी थीं।

हम दोनों ने उस थाने में जाकर टैक्सी ड्राईवर से मुलाकात की थी और उसने हमें बताया था कि वो दोनों आदमी एक खूबसूरत औरत का पीछा करते हुए वहां पहुंचे थे। हमारे पूछने पर उसने औरत का जो हुलिया बताया था, वो शत-प्रतिशत ज्योति का था।

हम फौरन समझ गए थे तुम ज्योति के पीछे गुफाओं वाले इलाके में गए होगे। हमने उसी वक्त सशस्त्र पुलिस की एक टुकड़ी तैयार करवाई और यहां पहुंच गए।"

डॉक्टर सावंत ने बेताबी से कहा

"हां, हमें धुंधली सी उम्मीद थी कि ऐसा ही होगा।"

राज बोला, "ठीक है, अब आगे कहिए।"

"आगे यह कि हमारे साथी पुलिस वालों ने काफी मेहनत के बाद इस लेब्रॉटरी का दरवाजा तो तलाश कर लिया, लेकिन वो बाहर से बन्द। दीवारें बड़े-बड़े पत्थरों करी बनी हुई हैं और उस गुप्त दरवाजे को तोड़ने के लिए हमें अपने माइंड का इस्तेमाल करना पड़ा है।"

राज ने डॉक्टर सावंत की तरफ देखते हुए कहा

"इसका मतलब, वो धमाका डादनामाइट का था।"

"जी हां।' इंस्पेक्टर ने सिर हिला कर कहा, "डायनामाइट से दीवार टूट गई और रास्ता खुल गया। उसी धमाके ने यहां रहने वाले बदमाशे को होशियार कर दिया ओर उनमें से कुछ फरार हो गए। बाकी हमारे साथ हुए एनकाऊंटर में मारे गए या जख्मी हो गए हैं। उनके पास से करोड़ों के जेवर, हीरे, जवाहरात और नकदी बरामद हुई हैं। अब यहां की हर चीज पर हमारा कब्जा है।" डॉक्टर सावंत ने कहा।

"और मुझे खुशी है कि हम लोग वक्त पर पहुंचे। प्लीज कल सुबह पुलिस स्टेशन आकर मुझे सब कुछ विस्तार से नोट करवा दीजिएगा।" इंस्पेक्टर त्यगी ने कहा।

"हम रास्ते में ही आपको सब कुछ बता देंगे । इंस्पेक्टर साहब, आप चाहें तो इस जगह पर अपने आदमियों से पहरा लगवा सकते हैं।" राज बोला, "अब भगवान के लिए इस मनहूस जगह से निकलने की करें।"

"जी, चलिए।" इंस्पेक्टर त्यागी ने कहा और अपने आदमियों को निर्देश देने लगा।

फिर सभी पुलिस की गाड़ियों में चल पड़े। वो टैक्सी ड्राईवर भी पुलिस पार्टी के साथ जगह दिखाने आया था। राज ने उसे एक हजार रूपये नकद दिए और बड़ी गर्मजोशी के साथ उससे हाथ मिलाकर उसको धन्यवाद दिया।

रास्ते में राज ने इंस्पेक्टर त्यागी और सतीश को सभी घटनाए सुना दीं।

ज्योति के इच्धारी नागिन होने का पता सतीश को पहली बार चला था।

"हे भगवान!" सुनकर सतीश ने फंसी-फंसी आवाज में कहा, "तो क्या मेरी शादी एक छ: सौ साल पुराने शरीर वाली ओरत से हुई थी, जिसमें इच्छाधारी नागिन की आत्म थी!"

और वो बेहोश होकर पुलिस-कार की सीट पर लुढ़क गया।

राज ने उसे सम्भलते हुए कहा

"इसीलिए मैं उसे ये बातें नहीं बताना चाहता था। अब यह कुछ दिन और दिन रात शराब पियेगा......और मुझे इसको सम्भालना पड़ेगा।"

"और कुछ दिन बाद....कुछ दिन बाद इसका क्या बनेगा?"

डॉक्टर सावंत ने फिक्रमंदी से पूछा।

"कुछ दिन बाद.....?" राज ने गहरी सांस लेकर गम्भीरता से कहा-"क्लब में इसे कोई भरे-भरे बदन वाली हसीना मिल जाएगी और यह उसके साथ फ्लर्ट में मस्त हो जाएगा....."

"कमाल का बन्दा है फिर तो यह!'' इंस्पेक्टर त्यागी ने कहा।

"क्या करें साहब, इसकी फितरत ही ऐसी है....।” राज ने फिर गम्भीरता से कहा। सभी ठहाका लगाकर हंस पड़े।

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