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Fantasy कालदूत(पूर्ण)

sexstories

Administrator
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[color=rgb(184,]प्रस्तावना[/color]

हमारी दुनिया भिन्न भिन्न प्रकार के लोगो से भरी है. यहाँ हर इंसान की अपनी एक विचारधारा है, हर किसी का सोचने का अपना एक नजरिया है पर यहाँ बात इसकी नहीं है, यहाँ बात हम दो क़िस्म के लोगो की करेंगे जिन्हे आस्तिक और नास्तिक कहते है, आस्तिक माने वो जो भगवान् मैं मानते है उसका अस्तित्व स्वीकारते है और नास्तिक वो जो ये मान के चलते है के भगवान् जैसा कुछ नहीं होता, तार्किक रूप से ये बात भी सत्य है के जिसे हमने कभी अपनी आँखों से देखा ही नहीं उसका अस्तित्व कैसे स्वीकारे,

मेरा मानना ये है के हरामी इर्द गिर्द सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा हर समय मौजूद रहती है और किस ऊर्जा का प्रभाव हम पर अधिक पड़ेगा ये सर्वस्वी हमारे विचार और हमारे आस पास के माहौल पर निर्भर करता है...... और भगवान् इसी सकारात्मक ऊर्जा को कहते है जो प्रतिपल हमें आश्वासित और सुरक्षित महसूस कराती है... खैर हमारा मुद्दा भगवान है या नहीं ये नहीं है

हम सदियों से अपने बड़ो से कहानिया सुनते आ रहे है देव दानवो के युद्ध की, अच्छाई पर बुराई की जीत की पर क्या हो अगर ये कहानिया महज कहानिया न होकर सत्य हो और आज भी कोई दानव देवो से, समूची मानवजाति से प्रतिशोध लेने के लिए तड़प रहा हो और उसे वो मौका मिल जाये जिसमे वो समूची पृथ्वी का विनाश कर दे

यह कहानी ऐसे ही एक दानव की है को अपनी लाखो वर्ष की कैद से मुक्ति पाना चाहता है और इस ब्रह्माण्ड पर अपना अधिराज्य जमाना चाहता है और उसे रोकने के लिए जरुरत है शास्त्र शस्त्र और विज्ञान के ज्ञाता की जो अपने साथ साथ सारी मानवजाति और इस ब्रह्मांडकी रक्षा कर सके

यह कहानी उस महारथी और उस दानव की है......

उनके अंतिम युद्ध की है.......
 

[color=rgb(184,]भाग 1[/color]

आज से करीब १०००-१२०० वर्ष पूर्व (देखो वैसे मुझे घंटा आईडिया नहीं है के १००० साल पहले क्या माहौल था लोगो का रेहन सेहन कैसा था बोलीभाषा क्या हुआ करती थी इसीलिए जहा तक दिमाग के घोड़े दौड़ रहे थे उतना लिख रहा हु )

हिन्द महासागर

इस वक़्त हिन्द महासागर मैं कुछ ३-४ नावे चल रही थी, देखते ही पता चलता था के मुछवारो की नाव है जो वह मछली पकड़ने का अपना काम कर रहे थे, वैसे तो नाव एकदूसरे से ज्यादा दूर नहीं थी पर उन्होंने अपने बीच पर्याप्त अंतर बनाया हुआ था,

ये कुछ जवान लड़के थे जो पैसा कमाने और मछली पकड़ने की होड़ मैं आज समुन्दर मैं कुछ ज्यादा ही दूर निकल आये थे, सागर के इस और शायद ही कोई आता था क्युकी इस भाग मैं अक्सर समुद्र की लहरें उफान पर रहती थी इसीलिए ये लड़के यहां तो गए थे पर अब घबरा रहे थे पर आये है तो बगैर मछली पकडे जा नहीं सकते थे इसीलिए जल्दी जल्दी काम निपटा के लौटना चाहते थे

पर जब मछलिया जाल मैं फसेंगी तभो तो कुछ होगा न अब उसमे जितना समय लगता है उतना तो लगेगा ही

"हम तो पहले ही बोले थे यहाँ नहीं आते है यहाँ अक्सर तूफान उठते रहते है हमारा तो जी घबरा रहा है" उनमे से एक लड़का दूसरी नाव वाले से बोला, हवा काफी तेज चल रही थी तो वो चिल्ला के बोल रहा था

"ए चुप बिरजू साले को पैसा भी कामना है और जोखिम भी नहीं लेना है " दूसरे लड़के ने उसे चुप कराया

"बिरजू सही कह रहा है पवन मेरे दादा भी कहते है के सगर का ये भाग खतरनाक है उन्होंने तो ये भी बताया था के ये इलाका ही शापित है" तीसरा बाँदा भी अब बातचीत मैं शामिल हो गया

"इसीलिए तो मैं कह रहा हु के जितनी मछलिया मिल गयी है लेके के चलते है मुझे मौसम के आसार भी ठीक नहीं लग रहे " बिरजू ने कहा

बिरजू की बात के पवन कुछ बोलना छह रहा था के "अरे जाने दे से पवन ये बिरजू और संजय तो फट्टू है सालो को दिख नहीं रहा के यहाँ कितनी मछलिया जाल मैं फास सकती है कमाई ही कमाई होगी और अगर कोई बड़ी मछली फांसी तो राजाजी को भेट कर देंगे हो सकता है कुछ इनाम मिल गए " ये पाण्डु था चौथा बंदा

"सही बोल रहा है तू पाण्डु " पवन

वो लोग वापिस अपने काम मैं जुट गए , देखते देखते दोपहर हो गयी और अब तक उन चारो ने काफी मछलिया पकड़ ली थी और अब वापिस जाने मैं जुट गए थे

"बापू काफी खुश होगा इतनी मछलिया देख के " बिरजू ख़ुशी से बोला

"हमने तो पहले ही कहा था इस और आने अब तो रोज यही आएंगे मछली पकड़ने " पाण्डु बोल पड़ा

तभी मौसम मैं बदलाव आने सुरु हो गए, धीरे धीरे मौसम बिगड़ने लगा और इस प्रकार के मौसम मैं नाव चलना मुश्कुल हो रहा था, हवा की गति भी अचानक से काफी तीव्र हो गयी थी, वो चारो नाविक लड़के परेशानी की हालत मैं थे के इस तूफ़ान से कैसे बचे, किनारा अब भी काफी दूर था , तभी उन्हें समुद्र के बीच से कही से हवा का बवंडर अपनी और आता दिखा जिसकी तेज गति से पानी भी १३-१४ फुट तक ऊपर उठ रहा था, वो चारो घबरा गए और मन ही मन भगवन को याद करने लगे

देखते ही देखते उस बवंडर ने उनकी नावों को अपनी चपेट मैं ले लिया पर इसके पहले ही वो चारो पनि मैं कूद चुके थे,

वैसे तो वो तैरना जानते थे पर इस तूफ़ान मैं उफनती सागर की लेहरो मैं तैरना आसान काम नहीं था, कभी मुश्किल से थोड़ा ही तेरे थे के उस बवंडर से उन्हें अपने अधीन कर लिया और वे चारो सागर की गहराइयो मैं गोता लगाने लगे

बिरजू उन सब मैं सबसे अच्छा तैराक था इसीलिए वो थोड़े लम्बे समय तक तैरता रहा जबकि उसके बाकि साथी तो पहले ही सागर की गहराइयो मैं खो चुके थे

धीरे धीरे बिरजू के सीने पे पानी का दबाव पड़ने लगा और वो भी डूबने लगा उसकी आँखें बंद होने लगी थी......

कुछ समय बाद बिरजू की आँखें खुली तो उसने अपने आप को सागर की गहराइयो मैं आया पर आश्चर्य उसे सास लेने मैं कोई कठनाई नहीं हो रही थी पर जब उसने सामने देखा तो उसके होश उड़ गए थे

उसके सामने विशालकाय ३० फुट ऊचा कोई व्यक्ति जंजीरो से बंधा हुआ था, सबसे भयावह और अजीब बात ये थी के उसका सर आम इंसानो जैसा न होकर सर्प के सामान था और उसके पीठ पर ड्रैगन जैसे पंख लगे हुए थे, उस अजीबोगरीब चीज़ को देख के बिरजू की डर से हालत ख़राब हो रही थी तभी उसके कानो मैं कही से आवाज गुंजी

"मनुष्य"

बिरजू एकदम से घबरा गया

"घबराओ नहीं मनुष्य मैं कालदूत हु और मैं तुम्हे कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगा"

"तुम क्या हो और मुझसे कैसे बात कर पा रहे हो "

"मैं कालदूत हु मनुष्य ये मेरे लिए मुश्किल नहीं है मैं तुम्हारी मानसिक तरंगों से जुड़ा हु और मैं तुम्हे कुछ नहीं करूँगा मैं तो खुद लाखो वर्ष से समुद्रतल की गहराइयो मैं कैद हु, देवताओ ने मुझे कैद किया था"

"पर मैं यहाँ कैसे आया " बिरजू

"क्युकी मैं तुम्हे यहाँ लाया हु, मुझे मुक्त होने के लिए तुम्हारी आवश्यकता है तुम्हे हर तीन सालो मैं १०० लोगो की बलि देनी होगी वो भी निरंतर १००० वर्षो तक ताकि मैं मुक्त हो पाउ बदले मैं मैं तुम्हे असीम शक्ति प्रदान करूँगा, आज से मै ही तुम्हारा भगवान हु, तुम जो ये पानी के भीतर भी सास ले पा रहे हो ये मेरी ही कृपा है अब जाओ और हमारी मुक्ति का प्रबंध करो "

कालदूत की बातो का बिरजू पर जादू हो गया और वो उसके सामने नतमस्तक हो गया तभी वहा एक किताब प्रगट हुयी

"उठो वत्स और ये किताब को यह हमारा तुम्हारे लिए प्रसाद है जिसमे वो विधि लिखी है जिससे तुम हमें अपने भगवान हो मुक्त करा पाओगे और इसी किताब की सहायता से तुम्हे और भी कई साडी सिद्धिया प्राप्त होगी "

बिरजू ने वो किताब ली

"पर 1000 वर्ष मैं जीवित कैसे रह सकता हु प्रभु"

"यही किताब उसमे सहायक होगी वत्स और हमारी शरण में आते ही तुम्हारी आयु साधारण मनुष्य से अधिक हो गयी है पर तुम्हे यह कार्य जारी रखने के लिए संगठन बनाना होगा हमारे और भक्त बनाने होंगे अब जाओ हम सदैव तुमसे जुड़े रहेंगे"

"महान भगवान कालदूत की जय" और इतना बोलते साथ ही बिरजू की आँखें बंद हो गयी और जब खुली तब उसने अपने आप को किनारे पे पाया,

पहले तो उसे यकीं नहीं हुआ की ये क्या हुआ पर जब उसकी नजर अपने हाथ मैं राखी किताब पे पड़ी तब उसे यकीन हो गया की जो हुआ वो सत्य था और वो लग गया अपने स्वामी को मुक्त करने की मोहिम मैं........



 

[color=rgb(184,]भाग २[/color]

समय रात के 11 बजे

अमावस की वो एक बेहद ही काली और भयान रात थी हर तरफ निर्जीव शांति फैली हुई थी सिवाय जंगल के.....
जंगल के बीचों बीच एक हवन कुंड जल रहा था और उसके इर्द गिर्द 5 लोग काले कपडे पहन कर कुछ मंत्रोच्चारण कर रहे थे और उस हवन कुंड के ठीक सामने एक पेड़ पर एक व्यक्ति अधमरी हालत मैं जंजीरो से बंधा हुआ था

यहा इन पांचों लोगो का मंत्रोच्चारण सुरु था, उन सभी के चेहरे ढके हुए थे और आँखें लाल होकर देहक रही थी तभी उनलोगों ने हवन मैं आहुतियां देना सुरु किया और जोर जोर से मंत्रोच्चारण करते हुए आहुतियां देने लगे,
उनलोगों की आवाजें उस जंगल की शांति की भंग कर रही थी वातारवण ऐसा हो रखा था मानो किसी ने संसार से सारि ख़ुशी चूस ली हो

जैसे ही उन लोगो ने अपनी आखरी आहुति पूरी की वहा उन पांचो मैं से एक व्यक्ति की अट्टहास भरी हँसी की आवाज गूंगी

"आखिर को क्षण आ ही गया, मेरे मालिक की मुक्ति अब ज्यादा दूर नहीं"

वो शख्स अपनी जगह से उठा और उसी हवन कुंड से जलती हुयी एक लकड़ी उठायी और उस पेड़ से बंधे इंसान के पास गया और अपने चेहरे से नकाब हटाया

"न.... नहीं.....म... मुझे... म...मत..मारो....मैं ...मैं तुम्हारा बाप हु...." उस अधमरे इंसान ने बोलने की कोशिश की

"जो मेरे भगवान को नहीं मानता वो मेरा बाप नहीं हो सकता आप बहुत खुशनसीब है के आपको महान भगवन कालदूत की मुक्ति के लिए योगदान देने का अवसर मिला है" और इतना बोलने के साथ ही उस आदमी ने अपने हाथ मैं पड़की वो जलती हुई लकड़ी उस आदमी को लगाई. उन लोगो ने पहले ही इस इंसान पर मिटटी का तेल छिड़का होने की वजह से उस इंसान का शरीर जलने लगा. उसकी चीखे पुरे जंगल में गूंज उठी

वो पांचो वहा उस जलते हुए शख्स को देख कर खुश हो रहे थे... आग ने जिस पेड़ पे वो इंसान बंधा हुआ था उसे भी अपनी चपेट में ले लिया था और अब आग की लपटें ऊँची ऊँची उठ रही थी....

थोड़े समय बाद वह केवल रख बची थी और उस जल हुए शारीर के अंश...

"महान भगवान कालदूत अपने भक्त बिरजू के हाथो पहली आहुति स्वीकार करे" और इतना बोलते साथ ही बिरजू ने वहा राख बने अपने पिता के शरीर के कुछ अंश उठाये और उस हवन कुंड मैं डाल दिए.

बिरजू और कालदूत की भेंट हुए आज दो माह हो गए थे और कालदूत ने मनो बिरजू पर सम्मोहन कर दिया था. बिरजू उसका निस्सीम भक्त बन गया था और उसे ही अपना देवता मानता था... और साथ ही उस किताब की पूजा करता था जो उसे कालदूत ने दी थी...

वो किताब खुद कालदूत ने लिखी थी जो उसके जीवन के अनुभवो पर आधारित थी जिसमे उसके देवताओ से लड़ने की कई कहानियां थी और ये भी लिखा था के पापी देवताओ ने कैसे उसे छल से समुद्रतल की गहराइयों में कैद किया था जिससे मुक्ति पाने के लिए कालदूत को आत्माओ की शक्ति की आवश्यक्ता थी... उस किताब मैं काले जादू से सम्बंधित कई सिद्धिया और उसे प्राप्त करने की विधि के बारे में विस्तृत जानकारी थी जिसकी कोई भी सामान्य मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता....

बिरजू जैसे जैसे उस किताब को पढता गया वैसे वैसे कालदूत के प्रति उसकी भक्ति भी बढ़ रही थी, वो मानने लगा था के सृष्टि का उद्धार केवल कालदूत ही कर सकता है, उसने जंगल मैं कालदूत का मंदिर भी बनाया था जहा अभी अभी उसने अपने पिता की बलि दी थी

इंसान जब भी कोई नयी चीज़ करता है तो वो उसकी सुरवात अपने परिवार से करता है बिरजू ने भी वैसा ही किया, उसके परिवार मैं उसके पिता के अलावा कोई नहीं था उसने अपने पिता को कालदूत के बारे मैं बताया और कालदूत की शरण मैं आने के लिए समझाया लेकिन उसके पिता ने उसकी पागलो मैं गिनती की और ईश्वर की राह चलने की सहल दी और यही से.... जब बिरजू के पिता बटुकेश्वर ने कालदूत की भक्ति से इंकार कर दिया बिरजू के मन मैं उनके प्रति नफरत के भाव बनने लगे.......

जिस दिन बिरजू समुद्र के तूफ़ान से बच कर आ गया था और उसके तीनो साथिओ मरे गए थे तब उसने अपने गाओ वालो को भी कालदूत के बारेमे बताया पर उस समय किसीने उसकी बातो पर यकीं नहीं किया सिवाय ४ लोगो को छोड़ के जिनके मन मैं कालदूत को लेकर कुतूहल जगा था....धीरे धीरे १ महीने का समय व्यतीत हुआ, बिरजू उस किताब का अध्यन करके कई सारी सिद्धिया प्राप्त कर चूका था और कालदूत का भक्त तो वो पहले ही बन चूका था और अब अपने स्वामी को मुक्त करना चाहता था लेकिन ये काम आसान नहीं था और ये उसके अकेले के बस का भी नहीं था उसे लोगो की जरुरत थी जो उसी की तरह कालदूत के भक्त हो.....

बिरजू ने ऐसे लोगो को ढूंढ़ना सुरु किया जिनके मन मैं ईश्वर के प्रति गुस्सा हो, जिन्होंने अपनी कोई अतिमुल्यवान चीज़ खोई हो और उसका जिम्मेवार ईश्वर को मानते हो और जब उसने ऐसे लोगो की खोज की तो पाया के इनके सबसे अग्रणी वही ४ थे जिनके मन मैं कालदूत को लेकर कुतूहल जगा था.....

बिरजू ने धीरे धीरे उनसे दोस्ती बनायीं, उन्हें कालदूत के बारेमें बताया, और ये भी बताया के कैसे महान कालदूत को देवताओ ने कैद किया था, बढ़ते समयके साथ साथ वो चारो भी बिरजू के साथ कालदूत की भक्ति करने लगे और इन सब क्रियाओ मैं बिरजू अपने पिता से दूर होता गया क्युकी उसके पिता बार बार उसे समझने की कोशिश करते,

इस पुरे घटनाक्रम मैं कालदूत बिरजू के दिमाग से जुड़ा हुआ था और समय समय पर सपनो के जरिये उसे निर्देश भी देता था और जैसे ही बिरजू के अलावा वो चारो भी कालदूत की भक्ति करने लगे तो कालदूत उनके सपनो मैं भी आ गया और इन पांचो को बताया के उसकी भक्ति करने से वो उन्हें कई प्रकार की सिद्धिया देगा न की उनके भगवान् की तरह उन्हें दुःख और गरीबी देगा.....कालदूत की बाते उसके भक्तो पर सम्मोहन की तरह काम करती थी......बिरजू को अपने पिता की बलि देने के लिए भी कालदूत ने ही आदेश दिए थे जिसे बिरजू ने पूरा किया......

"आज ये पहली बलि है हमारे भगवन कालदूत की मुक्ति के लिए लेकिन अंतिम नहीं, जब मेरी भेट कालदूत से हुयी थी उन्होंने कहा था के हमें हर 3 वर्षो मैं १०० बलिया देनी होगी वो भी निरंतर १००० वर्ष तक तब हम हमारे स्वामी को उस समुद्रतल से मुक्त कर पाएंगे साथियो हमारा असली काम अब सुरु हुआ है, बोलो महान भगवान कालदूत की..!" बिरजू बोला जिसके पीछे सब एकसाथ चिल्लाये "जय !!"

उसके बाद इनलोगो ने अपना संगठन मजबूत करने पर जोर दिया और उसे नाम दिया 'कालसेना' समय के साथ साथ इनकी विचारधारा से कई लोग जुड़े और कालसेना का हिस्सा बने, बलि के लिए ये लोग मुख्यत्व उनलोगो को निशाना बनाते जो किसी भी धार्मिक कार्य से जुड़े होते जिससे ये लोगो को यकीन दिला सके के इनका ईश्वर इन्हे बचाने नहीं आएगा बल्कि कालदूत की शरण मैं आने से इनके दुःख दूर होंगे,

कालसेना छिप कर काम करती थी और बलि का तरीका वही था जिससे इन्होने पहली बलि दी थी, कालसेना की विचारधारा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे प्रसारित होती रही और हर ३ वर्षो मैं १०० बलिया कालदूत को निरंतर मिलती रही,

आज कालसेना से कई लोग जुड़े थे और कालदूत की भक्ति कर उसे मुक्त करना चाहते थे, ये एक काफी बड़ा संगठन था जिसका मुखिया आज भी बीरजु का परिवार था बिरजू के मरने के बाद ये हक़ उसके बेटे को मिला लेकिन उसके बाद कालसेना का मुखिया बनने के लिए संगठन मैं द्वन्द होता और जो श्रेष्ठ होता उसे कालसेना के मुखिया का पद मिलता जिसमे हमेशा से ही बिरजू के परिवार का बोल बाला रहा


कालसेना बड़ा संगठन था लेकिन छिपा हुआ था और इनके लोग हर क्षेत्र मैं मौजूद थे व्यवसाय से लेकर राजनीति और मीडिया तक मैं इनकी पहुंच थी जो इनका भेद छिपा रखने मैं मदद करती थी, कालसेना का मानना था के जिस दिन इनके भगवान कालदूत मुक्त होंगे उसी दिन ये भी दुनिया के समक्ष आएंगे...और फिर दुनिया पर राज करेंगे और अब काल सेना अपने लक्ष के काफी करीब थी आने वाले 3 वर्षो मैं १०० बलि देने से उनकी १००० वर्षो की तपस्या सफल होने वाली थी जिसमे से वो २० बलियो का प्रबंद कर चुके थे बस इंतज़ार कर रहे थे सही अवसर का...........
 

[color=rgb(184,]भाग ३[/color]

वर्तमान समय
छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट, मुंबई

अभी अभी एयरपोर्ट के डोमेस्टिक टर्मिनल पर दिल्ली से आयी हुयी फ्लाइट लैंड हुयी थी जिसमे रोहित दिल्ली से मुंबई आया था, रोहित अपने सबसे खास दो दोस्तों से पुरे चार साल बाद मिलने वाला था जिसके लिए वो काफी खुश था. ये लोग मुंबई से २०० कम दूर बने राजनगर(काल्पनिक) जाने वाले थे जो की एक हिल स्टेशन था और यहाँ पर काफी ख्याति प्राप्त बोर्डिंग स्कूल भी थे, रोहित ने भी अपनी स्कूलिंग और ग्रेजुएशन यही से कम्पलीट की थी इस लिए उसे इस जगह से काफी लगाव था और अब वो वापिस राजनगर जा रहा था अपने सबसे खास दोस्तों से साथ जो उसे के साथ पढ़े थे फिर से अपनी उन्ही यादो को ताजा करने...

रोहित जैसे ही डोमेस्टिक एयरपोर्ट टर्मिनल से बहार आया उसकी नजर अपने दोस्त संतोष पर पड़ी जो उसे वह रइवे करने आया था, और यहाँ से वो दोनों साथ मैं राजनगर के लिए निकलने वाले थे जहा अगले दिन शाम मैं उनका दोस्त विक्रम भी उनके पास पहुंचने वाला था

संतोष के पास पहुंच कर रोहित ने उसे गले लगा लिया, अपने दोस्त से काफी समय बाद मलने की बात ही कुछ और होती है

संतोष- साले इतना कस के गले लगाएगा तो लोग गलत समझेंगे अपने बारे मैं दूर हैट लवडे

रोहित- तुमको तो BC दोस्तों से मिलना भी नहीं आता हट !! चल सामान उठा अब

संतोष- कुली नहीं हु bsdk एक ही तो बैग है खुद उठा ले

रोहित- मैं खुद को संभाल रहा हु काफी नहीं है

संतोष- है और मेरे बाप ने तो कुली पैदा किया है न मुझे

रोहित- भाई संतो चार साल बाद मिलके भी लड़ाई करनी है क्या चल न यार भूख भी लगी है

संतोष- है भाई चल पहले मस्त तेरा मटका भरेंगे और फिर राज नगर के लिए निकलेंगे

रोहित- अरे गज़ब चलो तो फिर देर किस बात की

बात करते हुए कार तक पहुंच गए डिक्की में रोहित का सामान रख कर संतोष ने क्यार५ एक बढ़िया से रेस्टोरेंट की और बढ़ा दी....
कुछ ही देर मैं वो रेस्टॉरेंट के सामने थे

रोहित- तेरी बात हुयी विक्रम से कब तक पहुंचने वाला है वो

रोहित ने कहते टाइम संतोष से पूछा

संतोष- आज बात नहीं हुयी है वैसे भी अभी तो वो फ्लाइट मैं होगा उसकी कंपनी का मुंबई मैं कुछ काम है वो करके कल हमसे मिलेगा

रोहित- चलो अच्छा है वैसे मैं भी सोच के आया हु उसे सब बता के माफी मांग लूंगा

संतोष- किस बारे मैं कह रहा है तू...

संतोष ने सवालिया नजरो से रोहित को देखा

रोहित- तू जानता है संतो मैं नंदिनी और अपनी बात कर रहा हु विक्रम की शादी से पहले हम दोनों के बीच जो भी था....नहीं यार

संतोष- भाई वो सब पहले की बात है अब उस बारे मैं सोचने का कोई मतलब नहीं है नंदिनी और विक्रम खुश है अपनी जिंदगी मैं क्यों इस बारे मैं विक्रम को बताना चाहता है वैसे भी अब ऐसा कुछ नहीं हैतेरे और नंदिनी के बीच

रोहित- नहीं भाई, मेरे मन पे बोझ है यार अपने दोस्त को धोका देने का मैं उसे सब बता के माफ़ी मांगना चाहता हु फिर चाहे वो जो भी करे

संतोष- ठीक है जैसा तुझे सही लगे पर मैं इतना ही कहूंगा के एक बार और सोच लियो कही तेरा डिसिशन नंदिनी और विक्रम की जिंदगी ख़राब न करे.....अब चले

रोहित- है चलो चलते है

फिर अपना खाना ख़तम करके रोहित और संतोष अपनी मंजिल की तरफ रवाना हो गए ......

उसी सुबह ७ बजे
राजनगर

'राधे कृष्णा की ज्योत अलौकिक तीनो लोक मैं छाए रही है' ये भजन गाते हुए सुमित्रा देवी तुसली के पौधे को जल चढ़ा रही थी जो उनके घर के आँगन के बीचो बीच था घर की बनावट आलिया भट के घर के जैसी थी जो २ स्टेट्स मूवी मैं दिखाया गया था जिन्होंने को फिल्म देखि है वो समझ जायेंगे बाकि गूगल कर लेना तो सुमित्रा देवी के सुमधुर भजन की वजह से पुरे घर का वातावरण प्रफुल्लित हो रहा था तभी उस कर्णप्रिय आवाज के बीच एक दूसरी आवाज गुंजी

'ॐ भग भुगे भगनी भोगोदरी भगमासे ॐ फट स्वाहा......!!!
ॐ भग भुगे भगनी भोगोदरी भगमासे ॐ फट स्वाहा......!!! '

ये आवाज सुनके सुमित्रा देवी ने अपना भजन रोक दिया और उस आवाज की तरफ देखने लगी तो उनकी नजर वह पड़े एक खाट पे पड़ी जिसपर उनका छोटा बेटा राघव सोया हुआ था वैसे तो इसका और इसके बड़े भाई का एक कमरा था पर एक साल पहले भाई की शादी होने के बाद ये कमरे से बहार हो गए थे और ये आवाज़ उसके फ़ोन से आ रही थी...ये ॐ फट स्वाहा फ़ोन की रिंगटोन थी

फ़ोन की रिंगटोन की आवाज से राघव की आँख खुली और उसने फ़ोन उठाया
राघव-हेलो

"नींद से उठ जाओ महाराज यूनिवर्सिटी चलने का है "

राघव- सूरज तू नहीं होता तो मेरा क्या होता

फ़ोन राघव के दोस्त का था

सूरज- BC जल्दी आ गाड़ी का टायर पंक्चर है मेरे इसीलिए फ़ोन किया तुझे

राघव- रख फ़ोन आ रहा हु

राघव, उम्र २३ साल, अनिरुद्ध शास्त्री के छोटे बेटे बाप पेशे से पंडित है और बेटा पूरा नास्तिक, इनका मानना है के जो आँखों से दीखता ही नहीं है उसपे कोई विश्वास कैसे करे इसके हिसाब से भगवन केवल एक काल्पनिक किरदार है जिसे पुराने लोगो ने आम जानता को आदर्श जीवन सिखाने के लिए बनाया है और कुछ नहीं..... इसी वजह से इनकी पिता से थोड़ी काम बनती है

रिंगटोन से अब राघव की नींद खुल चुकी थी और कुछ समय बाद वो मस्त तैयार होक नाश्ते की टेबल पर आके बैठा जहा उसका भाई भी बैठा था

अनिरुद्ध- ये कैसी रिंगटोन लगा राखी है तुमने सुबह सुबह दिमाग भ्रष्ट कर दिया कोई अछि सी धुन नहीं रख सकते थे

राघव जैसे ही टेबल पर बैठने लगा उसके पिता अनिरुद्ध ने कहा

राघव- अब आपको इससे भी दिक्कत है

"राघव ये क्या तरीका हुआ बाबूजी से बात करने का " ये बोला राघव का बड़ा भाई रमन अपने ही शहर के पुलिस स्टेशन मैं सब इंस्पेक्टर है, वैसे इनको पूरा ईमानदार पुलिस वाला तो नहीं बोलूंगा बस दबंग के सलमान के जैसे है पैसा भी लेते है और काम भी पूरा करते है इसीलिए जल्द ही इनके प्रमोशन के आसार है पर फिलहाल एक केस मैं फसे हुए है

तो रमन के बोलने पे अनिरुद्ध और राघव चुप हो गए और चुप चाप नाश्ता करने लगे

रमन-तो राघव कुछ काम करना है या कोई और प्लानिंग है

राघव- फिलहाल कुछ सोचा नहीं है भैया अभी यूनिवर्सिटी जा रहा हु शाम को मिलता हु

और राघव उठ के चला है

रमन-ये क्या करता है कुछ समझ नहीं आता बाबूजी आप इससे काम ही बोला करिये अभी भी आपके बोलने पे वो कुछ बोलने वाला था पर मेरे बोलने पे रुक गया

अनिरुद्ध- मैंने तो उससे सारी उमीदे छोड़ दी है खैर मैं चलता हु एक यजमान के यहाँ पूजा करने जाना है

रमन- है मैं भी निकलता हु थाने के लिए इस मिसिंग केस ने परेशान किया हुआ है बाबूजी आप संभाल कर जाना जो लोग पूजा पाठ मैं ज्यादा है वही आजकल गायब हो रहे है

अनिरुद्ध- हम्म.....


और रमन भी अपनी बीवी और माँ से मिलके निकल गया....
 

[color=rgb(184,]भाग ४ [/color]


घर का सभी पुरुष वर्ग अपने अपने कामो के लिए निकल गया था अनिरुद्ध जी अपने पूजा अनुष्ठान केलिए रमन अपने ठाणे की ओर ओर राघव अपने दोस्त के साथ, अब घर में केवल सुमित्रा देवी ओर उनकी बहु श्रुति बचे थे,

राघव जिस हिसाब से अपने पिता से उखड़े स्वर मैं बात करता था उससे कोई भइये स्पष्ट अन्दाज लगा सकता था के दोनों बाप बेटे की आपस मैं जमती नहीं है, राघव ओर अनिरुद्धजी की नोक झोक घर मैं आम बात थी, केवल एक रमन ही था जिसके बोलने से वो दोनों चुप हो सकते थे रमन ही दोनों कोचुप करा सकता था ओर राघव भी कभी रमन की कोईबात नहीं टालता था, हालाँकि ऐसा भी नहीं था के राघव अपने पिता से प्यार नहीं करता था या उनके लिए उसके मन मैं कोई आदर नहीं था ये सब तो उस एक घटना की वजह से हुआ था जो शास्त्री परिवार मैं घटी थी जिसके बाद राघव का स्वाभाव ही एकदम बदल सा गया था.

अनिरुद्ध शास्त्री एक जाने मने ज्योतिष पंडित थे ओर सदैव ईश्वर की भक्ति मैं लीं रहने वाले इंसान थे वही राघव बिलकुल उल्टा था उसका तो मनो भगवन से छतीस का आकड़ा हो, उसका मानना था के जो दीखता ही नहीं उसपर विश्वास कैसे किया जाये उसके हिसाब से जो दीखता ही नहीं है वो तो है ही नहीं और बस इसी बात पे दोनों बाप बेटे मैं नोक झोक होती रहती थी .

अब ये बात तो किसी को भी अटपटी लगेगी के बाप एक विख्यात पंडित और बेटा शुद्ध नास्तिक और यही बात श्रुति को भी खटकती थी पसर उसने आज तक इस बारे मैं किसी से पूछा नहीं था घर मैं पर आज उसने इस बारे मैं सुमित्रा देवी से बात करने की ठानी

श्रुति- मम्मीजी आपसे एक बात पूछनी है (किचन मैं काम करते हुए श्रुति से सुमित्रा देवी से कहा )

सुमित्रादेवी- हा पूछो न बेटा

श्रुति- ये राघव भैया का स्वाभाव मतलब मेरी शादी को एक साल होते आया है और जितना मैंने देखा है राघव भैया किसी से ज्यादा बात नहीं करते बस अपने मैं खोये रहते है उनसे जितनी बात करो उतना ही जवाब देते है और तो और उन्हें हस्ते हुए तो मैंने कभी देखा ही नहीं है ऐसा क्यों है? और उनके और बाबूजी के बीच की ये रोज की नोकझोक इसकी क्या वजह है?

श्रुति का सवाल सुन सुमित्रादेवी मुस्कुरायी

सुमित्रादेवी- ये सवाल तुमने पहले क्यों नहीं पूछा

श्रुति- पूछना तो चाहती थी मगर पूछ नहीं पायी

सुमित्रादेवी- चलकोई बात नहीं अब पूछ ही लिया है तो तुम्हे सब बाबति हु पहले काम निपटा ले कहानी जरा लम्बी है फिर तुम्हे आराम से बताउंगी

श्रुति- ठीक है

और दोनों सास बहु अपने काम निपटने मैं लग गयी

वही दूसरी और रमन अपने पुलिस स्टेशन पहुंच गया था, उसके ऊपर मिसिंग केसेस सॉल्व करने का दबाव बढ़ता जा रहा था, अभी ३ दिन पहले ही थाने मैं एक चर्च के फादर की गुमशुदगी की रिपोर्ट आयी तह जिसके साथ ही रमन के पास पेंडिंग मिसिंग केसेस की संख्या कुल १४ हो गयी थी जो पिछले दो सालो मैं आये थे जिनमे से एक भी केस के बारे मैं रमन के पास कोई सुराग नहीं था और इन्ही बढ़ते केसेस के चलते रमन के सीनियर ऑफिसर्स भी उससे खफा चल रहे थे और उसपास जल्द से जल्द केसेस सॉल्व करने का दबाव बना रहे थे और अगर इस केस मैं भी कोई सुराग नहीं मिला तो रमन से ससपेंड होने के भी चान्सेस थे, वैसे तो रमन कि शादी को एक साल होते आया था लेकिन इन केसेस के चलते वो श्रुति के साथ भीअचे से समय नहीं बिता पाया था

रमन ने सरे केसेस को एक बार फिर शुरू से स्टडी करने का सोचा क्या पता शुरुवात से देखने पर कोई क्लू ही हाथ लग जाये, इस सब केसेस मैं एक बात जो रमन के धयान मैं आयी थी वो ये थी के इन दो सालो में राजनगर मैं जितने भी लोग गायब हुए है वो सभी किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठान से जुड़े हुए थे और इन लोगो का आपस मैं एक दूसरे से कोई ताल्लुक नहीं था, और गायब हुए सभी लोग माध्यम वर्गीय परिवार वाले थे और कुछ ऐसे थे जो अकेले थे जिनका दुनिया मैं कोई नहीं था, किसी भी गायब शक्श के लिए फिरौती का फ़ोन नहीं आया था और रमन का ये मानना था के हो न हो ये गायब हुए लोग अब शायद इस दुनिया मैं नहीं है, उन्हें मार दिया गया है लेकिन ये सोच सोच के उसका दिमाग फटा जा रहा था के ये जो कोई भी इस घटनाओ को अंजाम दे रहा है आखिर वो चाहता क्या है, क्युकी इन सब घटनाओ के पीछे किसी बड़े गिरोह का हाथ था जिसका पता रमन को लगाना था.

इस पुरे घटनाक्रम में एक बात हैरान करने वाली थी के इतनी गुमशुदा लोगो की रिपॉर्ट होने के बाद भी मीडिया शांत बैठा हुआ था कही किसी न्यूज़ चैनल पर या अख़बार मैं कोई भी खबर नहीं छपी थी पर इन घटनाओं का असर शहर में देखा जा सकता था लोग बगैर काम के घर से बहार नहीं निकलते थे और दुकाने भी जल्द ही बंद होने लगी थी लोगो के मन में डर था कि कल को कहिब्व ही गायब न हो जाये इसीलिए लोग ज्यादा से ज्यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहते थे

रमन अपने केबिन मैं बैठा इन्ही सब बातो के बारे मैं सोच रहा था और फिर उसने अपने एक साथी को आवाज लगायी

रमन- चन्दन!

चन्दन- जय हिन्द सर ! (अंदर आते हिसालुते करते हुए चन्दन ने कहा)

रमन- उस लापता हुए फादर के बारे मैं कुछ पता चला

चन्दन - नहीं सर, जैसा हाल बाकि केसेस मैं था वैसा ही हाल है, हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे है पर कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है, और अब तोये बात शहर मैं भी फैलने लगी है की लोग लापता हो रहे है जिससे शहर मैं भी डर का माहौल बन रहा है

रमन- है वो तो मैं भी देख रहा हु के शहर का माहौल कुछ बदला बदला सा है

चन्दन- सर ये बातसमझ मैं नहीं आ रही के जब शहर का माहौल बदल रहा है तो कोई भी अख़बार या न्यूज़ चैनल ये बात क्यों नहीं दिखा रहा है

रमन- चन्दन जो कोई भी ये अपहरण कर रहा है न वो जरूर कोई बड़ा आदमी है या उसकी पहुंच बहुत ऊपर तक है पर इस सब के पीछे का उसका मकसद मुझे समझ नहीं आ रहा है आखिर क्या वजह हो सकती है इसके पीछे, खैर और कोई अजीब बात तुम्हारे धयान मैं आयी हो

चन्दन- नहीं सर

रमन- एक काम करो शहर मैं आने जाने वाले टूरिस्ट्स की भी लिस्ट निकालो क्या पता वह से कोई सुराग मिल जाये या हो सकता है के उन टूरिस्ट को भी कोई खतरा हो

चन्दन- ठीक है

रमन ने चन्दन को काम बता कर वहा से भेज दिया और फिर से अपने केस के बारे मैं सोचने लगा वही दूसरी तरफ अनिरुद्ध शास्त्री के घर से थोड़ी दुरी पर पुरे काले कपडे पहने एक शख्स खड़ा था, उसने अपना चेहरा ढका हुआ था और बगैर पलक झपकाए शास्त्रीजी के घर पर अपनी नजरे गड़ाए हुए था......


क्या लगता है कौन है वो शख्स ??? और ऐसी कौनसी घटना हुयी ही जिससे राघव का स्वाभाव ऐसा बन गया? जानने के लिए पढ़ते रहिये कालदूत, अगला भाग जल्द ही.......
 

[color=rgb(184,]भाग ६[/color]

शाम होते होते रोहित और संतोष राजनगर पहुच चुके थे पर वह पहुच कर उन्हें राजनगर की हवा मैं एक अजीब सा सूनापन महसूस हुआ, सर्दी और कोहरा बढ़ गया था और लोग कम हो गए थे, वो पहले वाली चहल पहल भी नहीं थी जो राजनगर मैं हुआ करती थी,

संतोष- यार कुछ कुछ अजीब सा लग रहा है.

रोहित- हा कुछ अजीब बात तो है, लगता नहीं की ये वही जगह है जहा हमने अपने कॉलेज के दिन गुजारे थे

संतोष- लोग भी डरे डरे से लग रहे है

रोहित और संतोष राजनगर पहुच कर अपनी पसंदीदा जगह पर खड़े होकर शहर के बदले वातावरण के बारे मैं बात कर रहे थे की तभी उनके पीछे से एक रौबीली और कड़कदार आवाज आयी "ये उनकी वजह से है " रोहित और संतोष ने पीछे मुड़कर देखा तो इस रौबीली आवाज का मालिक इंस्पेक्टर रमण उनके पीछे खड़ा था, रमण अपने थाने से गश्त लगाने बहार आया हुआ था और जब वो इस जगह पहुच तो इन दो नए लोगो को देख कर और इनकी बातो को सुनकर वह ठिठक गया

रमण- आपलोग टूरिस्ट है क्या??

संतोष- जी नहीं, दरअसल हमने हमारी कॉलेज की पढाई यहाँ के विवेकानंद इंजीनियरिंग कॉलेज से पूरी की है, ग्रेजुएशन तक हम यही थे फिर नौकरी के सिलसिले मैं अलग अलग जगह जाना पड़ा, हमारा एक और दोस्त भी आज रत तक यहाँ आने वाला है

रमण- हम्म,फिरतो आपलोगों को पता नहीं होगा की यहाँ क्या चल रहा है ?

संतोष- जी नहीं

रमण- किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि मैं संलग्न लोग गायब हो रहे है, मुख्या रूप से बड़े बड़े पंडित मौलवी पादरी इत्यादि, काफी तहकीकात करने के बाद भी हम केवल इतना पता लगा पाए है की ये किसी एक आदमी का काम नहीं बल्कि किसी रहस्मयी संगठन का काम है.

रोहित- क्या? ये तो बहुत बड़े स्टार का मामला है फिर इस घटना का उल्लेख अखबारों मैं या कसी न्यूज़ चैनल पर्क्यु नहीं नहीं ?

रमण- ये मामला भि पेचिदा है सुरु की घटनाओ कोटो मैंने ही मीडिया की नजरो मैं आने से रोक रखा था, ये एक संवेदनशील मुद्दा है कुछ पोलिटिकल पार्टीज अपने लाभ के लिए इस बात का प्रयोग करने की कोशिश कर सकती है जिससे शायद सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे इसीलिए पुलिस प्रशासन ने सोचा था के ये बात जितनी दबी रहे ठीक होगा पर लगता है मीडिया को इस मामले की भनक है और इसी के चलते उनकी चुप्पी से भी अचंभे मैं हु, अब बस उम्मीद कर सकता हु के जो भी इस के पीछे है जल्द से जल्द उसे गिरफ्तार कर सकू.

संतोष- लेकिन कोई भी धार्मिक क्रिया मैं जुड़े व्यक्ति को ही क्यों उठाना चाहेगा?

रमण- यही तो हम पता लगाने की कोशिश कर रहे है, आप लोग शहर मैं आज हि आये है आप लोगो को अपने आसपास कोई भी अजीब घटना होते दिखे तो तुरंत पुलिस से संपर्क करे, फिलहाल तो पूरा शहर आतंकित है

रोहित- जी ठीक है

रमण- देखिये ऐसा कहकर मैं आपको हतोत्साहित नहीं करना चाहता लेकिन आपने राजनगर आने के लिए शायद सही समय नहीं चुना है.

रमण से बात करने के बाद रोहित और संतोष वह से निकल गए,

रमण- चन्दन इन लोगो पर नजर रखो मुझे कुछ खटक रहा है और कोई भी गड़बड़ हो तो तुरंत मुझे फ़ोन करना

चन्दन-ठीक है सर

रमण ने चन्दन को रोहित और संतोष पर नजर रखने कह दिया और वापस पुलिस स्टेशन आ गया वही रोहित और संतोष रमण की कही बातो पर भी गाड़ी मैं बात चित कर रहे थे

संतोष- इंस्पेक्टर साहब ने काफी मदद की

रोहित-(गंभीर स्वर मैं ) हम्म

संतोष- अब तुमको क्या हुआ?

रोहित- इंस्पेक्टर की बाते सुनी न तुमने ?

संतोष- हा, लेकिन ये लोगो का अपहरण करने वाले हो कौन सकते है ?

रोहित-क्या पता? शायद आतंकवादी हो, भय का माहोल कायम करने के लिए धार्मिक कार्यो से जुड़े नमी गिरामी लोगो को उठा लिया होगा, ये जो भी लोग है बहुत चालक है, इतनी आसानी से पुलिस को चकमा देते हुए लोगो को उठाना किसी साधारण गंग के बस की बात नहीं है.

बाते करते करते ही दोनों होटल पाइनग्रोव पहुचे गाड़ी पार्क करके होटल मैं चेक इन किया

रोहित- ये होटल भी कही....शांत शांत सा लग रहा है

संतोष- हा सही कहा खैर चलो अपने अपने रूम देख लेते है

रिसेप्शन पर चेक इन करके रोहित और संतोष अपने अपने कमरों मै चले गए , संतोष ने कमरे मैं घुसते से ही अपना बैग एक साइड पटका और बहार का व्यू शिद्की के शिशे से देखने लगा, शायद ये वो राजनगर नहीं था जिसे ये लोग जानते थे, वह उन्होंने अपने कॉलेज का सबसे बेहतरीन समय गुजरा था, हर तरफ मौत सा संन्नता पसरा हुआ था और लोग घर से बहार निकलने मैं डरते थे तभी अचानक रोहित संतोष के कमरे मैं आया

रोहित- विक्रांत से बात हुई तुम्हारी

संतोष- इतनी जल्दी क्या है वो आ जायेगा तो खुद की फ़ोन करेगा.

रोहित- अरे तुमको यार नहीं क्या उसके परिवार का फार्महाउस है यहाँ पर, हम लोग तो कॉलेज होटल मैं रहते थे उसका घर था, जितनी जल्दी वो आ जायेगा हाही शिफ्ट हो जायेंगे वैसे भ ये तेल थोडा महंगा है.

संतोष-(मुस्कुराते हुए) लगता हा इंस्पेक्टर ने तुमको अपनी कहानी से डरा दिया है

रोहित-क्या!! नहीं नहीं उसकी बातो से इसका कोई लेना देना नहीं है

संतोष- ठीक है मेरे बहादुर भाई आ होटल बालकनी से राजनगर कि सुन्दरता देखे , इतने समय बाद यहाँ आना का मौका मिला है

रोहित और संतोष बालकनी मैं कहते थे की तभी उनने देखा के होटल से थोड़ी दुरी पर एक तरफ एक सुनसान इलाका थ जहा छोटी छोटी तोड़ी झाडिया उगी हुयी थी वह खड़ा एक रहस्यमयी व्यक्ति जिसने काले रंग का चोगा रहना हुआ था और चेहरा भी नकाब से ढक रखा था लगातार उनके फ्लोर की तरफ घूरे जा रहा था

रोहित- ये कौन है?और हमारी तरफ क्यों देख रहा है

संतोष- मुझे कैसे पता होगा

रोहित-पहनने ओढने के ढंग से कोई सामान्य व्यक्ति तो नै लगता

संतोष-होगा कोई पागल हमें क्या करना है आओ केलकर कुछ खाने के लिए ऑर्डर करते है

होटल मैं कहना का करोहित आर संतोष होटल के बहार टहलने के लिए निकल गये, रोहित के दिमाग मैं अभी भी उस रहस्यमयी व्यक्ति की अजीब सी वेशभूषा का ख्याल रह रहकर आ रहा था, दोनों दोस्त बाते करते हुए होटल से दूर सुनसान जंगल के इलाके की तरफ निकल आये थे

रोहित- ये होटल शहर से थोड़ी दूर है यहाँ तो जंगले झाड सब है

संतोष- सोचो इतने साल राजनगर मैं रहने के बाद भी हमें इस जगह का पता नहीं था

रोहित- राजनगर काफी बड़ी जगह है संतो तुम हर आदमी से राजनगर का पूरा नक्षा जानने की उम्मीद नहीं कर सकते

तभी संतोष का फ़ोन बज उठा

संतोष- अरे विक्रांत का फ़ोन है

संतोष ने फ़ोन उठा लिया

संतोष- हेल्लो बिक्रांत! कहा तक पहुचे भाई

विक्रांत(फोनेपर)- बस अभी निकला हु जल्द ही मिलते है

संतोष- ठीक है तो तुम यहाँ पहुच कर हमें होटल पाइनग्रोव से पिक कर लेना

विक्रांत- ठीक है पहुच कर बात करता हु

और फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया

रोहित- क्या बोला

संतोष- आ रहा है मैंने बता दिया के हमें कहा से पिक करना है

रोहित-सही है ......

तभी अचानक पास के झाड मैं दोनों को कुछ हलचल महसूस हुयी दोनों ने मुड़कर देखा तो बुरी तरह चौक गए क्युकी एक सात फूट का व्यक्ति चिंघाड़ मार कर भरी सी कुल्हाड़ी लेकर उनकी तरफ दौड़ा आ रहा था..........
 

[color=rgb(184,]भाग ७[/color]


वो सात फूट लम्बा आदमी भागते हुए रोहित और संतोष के पास पंहुचा और उसने रोहित और संतोष पर अपनी कुल्हाड़ी से वार करने की कोशिश तो दोनों ने उसका वार बचा लिया फिर उसने संतोष की तरफ वार किया लेकिन संतोष ने असाधारण फुर्ती दिखाते हुए उसका वार नाकाम कर दिया और उसके हाथ पर लात मार कर उसके हाथ से कुल्हाड़ी निचे गिरा दी औरन सिर्फ कुल्हाड़ी गिराई बल्कि उस आदमी की छाती मैं लात मार कर उसे कुछ फूट पीछे धकेल दिया, फिर वो व्यक्ति रोहित की तरफ मुड़ा और उसे गर्दन से पकड़ कर उठा लिया

रोहित- स...संतोष कुछ कर..!

संतोष-चिंता मत करो मैं कुछ करता हु

संतोष गठीले शारीर का मालिक था लेकिन वो भी जोर लगाकर वो भरी कुल्हाड़ी नहीं उठा पा रहा था पर कुछ कोशिशो बाद उसने ताकत का एक एक कतरा लगा कर वो कुल्हाड़ी उठाई और उस लम्बे व्यक्ति की गार्डन पर जोरदार वार किया,

'खच्च' की आवाज उस सुनसान जंगल मैं गूंज उठी, कुल्हाड़ी उस आदमी के कंधे से होते हुए गर्दन के पार निकल गयी, हमला करने वाली की पकड़ रोहित की गर्दन पर ढीली पड़ गयी और उसका उसका निर्जीव शारीर धरती पर धराशायी हो गया. ये पूरा घटनाक्रम इतनी तेजी से घटित हुआ के रोहित और संतोष बिलकुल समझ नहीं पाए के आखिर ये सब था क्या .

रोहित(खस्ते हुए) - उफ़ ये कौन था?? और हमें मरना क्यों चाहता था??

संतोष हाथ मैं कुल्हाड़ी और चेहरे पर खून लिए स्तब्ध खड़ा था

संतोष-म...म..मैंने एक आदमी का खून कर दिया! उसे मार दिया!!!!

रोहित(संतोष को झंझोड़कर)- संतोष मेरि बात सुन..तूने जो कुछ भी किया है आत्मरक्षा के लिए किया है जिसमे कुछ गलत नहीं है...समझ रहा है न तू...

संतोष-तो क्या हमें पुलिस को बता देना चाहिए....

रोहित(कुछ सोचते हुए)- नहीं....देखो ये समझदारी की बात नहीं होगी उल्टा हम भी फस सकते है

संतोष-तो फिर क्या करे??

रोहित- एक काम करते है इसके शारीर को यही पास के जंगल मैं गाड देते है, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा वैसे भी यहाँ हम दोनों और इस अनजान हमलावर के अलावा इस सुनसान जंगली इलाके मैं कोई नहीं है जिसने हमें देखो हो

संतोष-क्या ये उस समूह का हिस्सा हो सकता है जिसकी बात उस इंस्पेक्टर रमण ने की थी?? जिसकी वजह से लोग लापता हो रहे है??

रोहित-क्या पता? फ़िलहाल तो इसे उठाओ ताकि जंगल मैं इसको गाड़ा जा सके

संतोष को भी रोहित की बात सही लगी, रोहित और संतोष ने सम्लावर को उठाया और जंगल मैं ले जाने लगे, जंगल भी उस समय बड़ा शांत था, चिडियों के चहचहाने की भी आवाज नहीं आ रही थी

संतोष-ह्म्फ़!! बड़ा भरी है कम्भख्त

रोहित-हा सो तो है अच एक बात बताओ तुम इतना अच्छा लड़ना कब सीखे?

संतोष-वो...वो यहाँ से जाने के बाद करते की ट्रेनिंग ली थी कुछ समय के लिए

रोहित-और तुमने इतनी भरी कुल्हाड़ी भी उठा ली ये तो वाकई काबिले तारीफ था

संतोष-आ..हा....हा...धन्यवाद पर ये भैसा बहुत भरी है

रोहित-हा सो तो है

रोहित को संतोष का जवाब सुन कर लगा की वो बस उसे टालने के प्रयास कर रहा है लेकिन उसे इस विषय मैं सोचने का ज्यादा मौका नहीं मिला क्युकी उसी वक़्त उस शांत जंगल मैं उन दोनों को अपने अलावा किसी और की हलकी चहलकदमी कि अवाज आयी, रोहित ने संतोष की तरफ देखा तो संतोष उसका इशारा समझ गया, उन्होंने लाश वही पर छोड़ दी फिर दोनों उस आवाज की दिशा मैं बढे लेकिन वहा उन्हें कोई दिखाई नहीं दिया फिर वो जब वापिस लाश लेने आये तो वह से लाश भी गायब थी और इस घटना से वो बुरी तरफ घबरा गए

संतोष(हैरान होकर)- लाश कहा गयी? इतने भरी आदमी की लाश इतनी जल्दी कौन गायब कर सकता है ?

रोहित-एक बात तो साफ़ है कोई हमें मरने का प्रयास कर रहा है और हो न हो ये वही संगठन है जिसके बारे मैं इंस्पेक्टर साहब बता रहे थे

संतोष-तुम कंपनी मैं काम करते हो और मैं बैंक मैं, इंस्पेक्टर के कहे अनुसार ये उन लोप्गो को गायब करते है जो किसी धर्मिल कार्य मैं संलग्न हो जबकि हमलोग तो साधारण नौकरी करते है हमें भला कोई क्यों मरना चाहेगा?

रोहित-दिमाग बिलकुल काम नहीं कर रहा इस वक़्त इससे पहले की कोई और जानलेवा हमला हो चलो होटल लौट चले

संतोष- लेकिन वो लाश

रोहित-लाश को भूल जाओ यार यहाँ थोड़ी देर और रुके तो शायद हम ही लाश बन जायेंगे

संतोष-ठीक है

संतोष और रोहित दोनों होटल जाने के लिए लौट ही रहे थे कि न जाने कहा से काले नकाब और काले चोगे वाले लोग जंगल से निकल कर आये और उन्हें चारो तरफ से घेर लिया, रोहित और संतोष दोनों की ही धड़कने तेज हो उठी

रोहित(घबराकर)-ये...ये तो वैसी ही वेशभूषा वाले लोग है जैसी उस व्यक्ति ने पहनी थी जो हमको बालकनी से घूर रहा था उस लम्बे पहलवान की वेशभूषा भी ऐसी ही थी, अब शक की कोई गुंजाईश नहीं है के ये वही लोग है जो इतने दिनों से यहाँ राजनगर मैं आतंक मचाये हुए है

अचानक ही दो चार लोग तेजी से रोहित और संतोष की तरफ बढ़कर आये और उन्हें पकड़ लिया, उनके हाथो मैं जैसे कोई अमानवीय शक्ति थी जिसकी वजह से दोनों मैं से कोई भी छुट नहीं पा रहा था फिर उन्ही मैं से एक व्यक्ति ने सफ़ेद रुमाल पर क्लोरोफार्म डालकर उन्हें सुंघा दिया, अब उन दोनों के लिए अपने होश कायम रखना मुश्किल था, दो मिनट के अंदर ही उनकी आँखें बोझिल हो गयी और वो बेहोशी के समुन्दर मैं धुब्ते चले गए......

रमण के कहे अनुरस चन्दन रोहित और संतोष पर नजर बनाये हुए थे उसने इन्हें जंगल की तरफ जाते देखा था और कही इतनी शक न हो इसिलिओये इनके पीछे नहीं आया था जब जब काफी समय बीतने के बाद भी रोहित और संतोष जंगल से लौट कर नहीं आये तो चन्दन को थोडा अजीब लगा और उसने इस बात की जानकारी तुरंत रमण को दी

वही दूसरी तरफ शास्त्री सदन मैं सुमित्रादेवी अपनी बहु के पूछने पर उसे राघव के बारे मैं बता रही थी कि कैसी राघव उनका बीटा नहीं है बल्कि उन्होंने अपने ससुर के कहने पे उसे गोद लिया था और कैसे उनके सरुर के कहा था के राघव के हाथ से कोई महान काम होने वह है जिसे उनकी बहु श्रुति सुन रही और जब सुमित्रादेवी की बात ख़तम हुयी तब उनका और श्रुति का ध्यान दरवाजे के पास खड़े राघव पर गया जिसने उनकी सारी बाते सुन ली थी,

सुमित्रादेवी कभी नहीं चाहती थी के राघव को इस बात का कभी पता चले के उन्होंने उसे गोद लिया था, उन्होंने बचपन से ही राघव और रमण मैं कभी कोई भेदभाव नहीं किया था बल्कि राघव तो उनके लिए रमण से भी ज्यादा लाडला था और जब उन्होंने देखा ये राघव को इस बारे मैं पता चल गया है तो उनका मन घबरा रहा था ये सोच सोच कर की अब पता नहीं राघव क्या कहेगा या उसे कैसा लगेगा

राघव की आँखें पनिया गयी थी उसे समझ नहीं आ रहा था के किस बात का दुःख मनाये, वो अनिरुद्ध शास्त्री और सुमित्रादेवी का बेटा नहीं है इस बात का या अपने दादाजी की इच्छा पूर्ण न कर सकने का

राघव बस आँखों मैं पानी लिए सुमित्रादेवी को देख रहा था और फिर वो वह से निकल गया और जाते जाते अपनी माँ से ये कह गया के उसे कुछ समय अकेला रहना है

राघव को वह से ऐसे जाता देख सुमित्रादेवी की भी आँखें झलक आयी,

राघव वह से निकल कर सीधा अपने दादाजी के कमरे मैं आया, अपने दादाजी की मृत्यु के बाद वो पहली बार इस कमरे मैं आया था, यही वो जगह थी जहा उसके दादाजी उसे अभ्यास कराते थे, फिलहाल सुमित्रादेवी की कही बाते सुनने के बाद राघव का दिमाग फटा जा रहा था एक साथ कई ख्याल दिमाग मैं घूम रहे थे तभी उसकी नजर अपने दादाजी की तस्वीर पर पड़ी और उसके मन मैं ख्याल आया की अब वही राह दिखायेंगे जिन्होंने उसे इस घर मैं आया है और राघव अपने दादाजी की तस्वीर के सामने धयान की मुद्रा मैं बैठ गया, राघव ने आज कही समय बाद धयान लगाया था या हु कहे उसके दादाजी के जाने के बाद शायद पहली बार और जब राघव धयान्स्त होता तो उसे समय का भान नहीं रहता था

धयान करने से राघव का दिमाग शांत होने लगा और उसके दिमाग मैं एक सफ़ेद रौशनी कौंध उठी और उसके मानसिक पटल पर एक छवि उभरने लगी............
 

[color=rgb(184,]भाग ८[/color]

राघव को धयान लगाये हुए एक घंटा हो चला था, उसका चेहरा एकदम शांत था मगर मन मैं उथलपुथल मची हुयी थी, राघव के मन मैं अपने अस्तित्व को लेकर इस वक़्त ढेरो सवाल उमड़ रहे थे जिनका उसे जवाब जानना था, राघव का मानसिक पटल एक सफ़ेद दुधिया रौशनी मैं नाहा गया था और उसी प्रकाश मैं उसे एक आकृति उभरती दिखी, वो आकृति एक पुस्तक की थी, राघव को समझ नहीं आ रहा था की ये किताब उसे क्यों दिख रही है, धीरे धीरे वो प्रकाश का घेरा कम होने लगा और राघव ने अपनी आँखें खोली

राघव का मन अब पहले की तुलना मैं काफी ज्यादा शांत था मगर अब भी उसे उसके सवालो का जवाब नहीं मिला था

राघव ने अपनी आंखे खोली और उस कमरे मैं चारो तरफ अपनी नजर दौडाई, सारा कमरा उसके दादाजी के सामान से भरा हुआ था जिनमे से अधिकांश किताबे और ग्रन्थ थे, राघव अब उन सब चीजों को देखने लगा, बचपन मैं उसके दादाजी के कहने पर भी कभी राघव ने इन चीजों मैं ज्यादा रूचि नहीं दिखाई थी जितनी आज दिखा रहा था तभी उसकी नजर वह राखी एक किताब पर पड़ी जिसने राघव को हैरत मैं दाल दिया क्युकी ये यही पुस्तक थी जिसकी छवि उसने कुछ समय पहले देखि थी

राघव ने उस किताब को उठाया और धयान से देखने लगा, वो किताब उसके दादाजी ने खुद लिखी थी राघव ने जब उसे खोला तो उस किताब के पहले ही पन्ने पर उसके नाम का जिक्र था, वो किताब सिर्फ राघव के लिये लिखी गयी थी, राघव को अब उस किताब को पढने की और ज्यादा उत्सुकता होने लगी थी, उसने अगला पन्ना पलटा तो उसपर भगवन शिव का एक चित्र बना हुआ था जिसके सामने एक शिवलिंग था और उस शिवलिंग के पास एक छोटा सा बच्चा, राघव ने उस चित्र दो देखने के बाद अगला पन्ना पलटा

"राघव मेरे बच्चे मैं ये किताब सिर्फ तुम्हारे लिए लिख रहा हु, मैं जनता हु ये किताब जब तुम पढोगे तब मैं तुम्हारे पास नहीं रहूँगा और ऐसे समय मैं यही किताब तुम्हे आगे का रास्ता दिखाएंगी,

राघव मैंने अपना सारा जीवन शिव की आराधना मैं गुजारा है और उसी भगवान् शिव के आशीर्वाद से मुझे कई सिद्धिया और शक्तिया मिली जिनके उपयोग से मैंने कई लोगो की मदद की, मैं कुछ क्षण किसी भि९ की आँखों मैं देख कर उसके विचार बता सकता था और एक विशिष्ट अनुष्ठान की वजह से मुझे थोडा बहुत भविष्य का ज्ञान भी था,

जिस समय मैंने तुम्हे जंगल मैं उस शिव मंदिर मे देखा था तब मुझे काफी अचम्भा हा था क्युकी उस समय वह किसी इंसान का आना कफि दुर्लभ था, मैंने जब तुम्हे अ[प्निगोद मैं उठाया था तब मुझे एक विशिष्ट उर्जा का बहाव अपने अंदर महसूस हुआ था, राघव तुम्हे अंदाजा भी नहीं है की तुम किन शक्तियों के स्वामी हो बस जरुरत है तुम्हे उन शक्तियों को समझने की,

मेरे लिए तुम मेरे शिव का प्रसाद थे इसीलिए मैंने तुम्हे अपने साथ अपने घर ले आया और अनिरुद्ध को तुम्हे गोद लेने कहा, ये शायद मेरे पुण्य कर्म थे की मेरे बेटे बहु ने कभी मेरी कोई बात नहीं टाली, मैंने अपनी विद्याओ से कई बार तुम्हारे जन्म का समय जानने की कोशिश की और तुम्हारे असल माता पिता का पता भी लगा चाह पर मैं असफल रहा, शायद शिव की यही इच्छा हो की तुम अनिरुद्ध और सुमित्रा के बेटे बने रहो,

जिस समय तुम मुझे मले थे उस समय के अनुसार मैंने तुम्हारी कुंडली बनायीं थी और उस समय जोग्रहो का योग बन रहा था उसके हिसाब से तुम कोई साधारण बालक नहीं हो, इश्वर ने तुम्हे किसी खास कार्य के लिए चुना है, और मुझपर ये जिन्ना था की मैंने तुम्हे इश्वर के उस खास कार्य के लिए तयार करू जो मैंने मेरे हिसाब से किया,

मेरे बच्चे आने वाला समय काफी विकट है, इस ब्रह्माण्ड पर अन्धकार का सामराज्य फैलने वाला है, कई काली शक्तिया जागृत होने वाली है, ये मानवजाति अपने ही हाथो से अपनी मृत्यु को आमंत्रण देगी और अन्धकार का साम्राज्य इस ब्रह्माण्ड मैं स्तापित करेगी

निकट भविष्य मैं होने वाले महा विनाश को केवल तुम रोक सकते हो इसलिए तुम कौन हो इसपर अपना धयान केन्द्रित न कर तुम क्या हो ये सोचो अपनी सुप्त शक्तियों को जागृत करो,

इस महा विनाश को तुम अकेले नहीं रोक पाओगे राघव तुम्हे अपने साथ कुछ सच्चे और बहादुर लोगो की जरुरत होगी, उन महारथियों की खोज करो मैंने तुम्हे और रमण को सामान शिक्षा दी है रमण का मन साफ़ है इसलिए अपने भाई का साथ मत छोड़ना वो तुम्हारे इस कार्य मैं निरंतर तुम्हारा सहयोग करेगा

मैंने अपनी योग शक्ति से अपनी मृत्यु को भाप लिया था और उसे रोक भी सकता था लेकिन मैं इश्वर की बनायीं इस सृष्टि के नियमो मैं दखल नहीं देना चाहता था,

मैंने अपना शारीर त्यागने से पहले अपना सारा ज्ञान अपनी सटी सिद्धिया-शक्तिया अपनी रुद्राक्ष की माला मैं एकत्रित की थी वो माला मैं तुम्हे प्रदान करता हु, यर तुम्हे तुम्हारी लक्ष्पुर्ती मैं सहायता करेगी

राघव तुम्हारा सामना कालदूत नामक महाभयंकर शक्ति से होने वाला है, उससे सामना करने से पहले तुम्हे उसके बारे मैं जानना होगा....इससे अधिक मेरे पास तुम्हारे लिए और कुछ नहीं है

मेरा अशोर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है राघव......"

राघव ने वो किताब बंद की, जहा से उसने वो किताब उठाई थी वही उसे वो रुद्राक्ष की माला भी मिल गयी जो उसके दादाजी ने उसके लिए छोड़ी थी, राघव को अपने सवालो के जवाब मिल गए थे, उसके जीवन का उद्देश्य उसके सामने स्पष्ट था और केवल एक ही नाम उसके दिमग मैं चल रहा था 'कालदूत'

राघव कालदूत के बारे मैं कुछ नहीं जानता था न ही अपनी शक्तियों के बारे मैं, सबसे पहले उसके सामने अब यही कार्य था की कालदूत के बारे मैं जितना हो सके पता करे लेकिन किससे......

राघव कमरे से बहार आया तो उसने देखा की सुमित्रादेवी गुमसुन की बैठी रो रही है और श्रुति उनके पास बैठी है

"भाभी क्या हुआ है माँ को ऐसे रो क्यों रही है" राघव ने एकदम नॉर्मली कहा जीने सुन श्रुति और सुमित्रादेवी हैरान ह गए की ये इतना शांत कैसे है

"वो..." श्रुति ने बोलने की कोशिश की तो सुमित्रादेवी से उसे इशारे से रोक दिया

राघव अपनी माँ के सामने जाकर घुटने पर बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया

"माँ....."

"तू...तू हमें छोड़ के जायेगा तो नहीं न वो सब सुन के....."

"मैं...मैं कहा जाऊंगा, मैं अपनी माँ के पास से कही नहीं जाने वाला ये मेरा घर है मैं क्यों जाऊ यहाँ से..और किस बारे मैं बात कर रही हो तुम..."

राघव को इस तरह नार्मल देख कर सुमित्रादेवी काफी खुश हुयी उन्हें डर था की सच पता चलने के बाद राघव कही कुछ उल्टा सीधा न कर दे पर अब उनके मन को शांति मिली थी राघव को नार्मल देख कर

"भाभी कुछ खिला दो यार भूख लगी है" राघव ने कहा

वैसे तो राघव एकदम नार्मल लग रहा था पर अब भी उसके दिमाग मैं एक ही नाम घूम रहा था 'कालदूत'

वही दूसरी तरफ जब संतोष और रोहित काफी समय तक जंगल से बहार नहीं आये तो चन्दन ने तुरंत रमण को इस बात की खबर की और रमण अपनी साडी टीम के साथ संतोष और रोहित को ढूंढने निकल पड़ा.....
 

[color=rgb(184,]भाग ९[/color]


रोहित और संतोष को जंगल मैं गए हुए आधे घंटे से उपर हो गया था ये बात चन्दन को खटकी और उसने तुरंत रमण को इस बात की खबर की और रमण भी अपनी फाॅर्स के साथ उन दोनों को ढूंढने निकल गया क्युकी अगर राजनगर से टूरिस्ट भी गायब होने लगते तो मामला और भी ज्यादा बिगड़ जाता

वही वो काले नकाब वाले लोग रोहित और संतोष को बेहोश करके अपने साथ ले गए थे,

धीरे धीरे जब रोहित और संतोष को होश आया तो वो एक अँधेरे सीलन भरे कमरे मैं अलग अलग दीवारों पर आमने सामने लोहे की जंजीरों मैं जकड़े हुए थे. वो कमरा किसी पुराने वेअरहाउस की तरह था, आने जाने के लिए पुराना लकड़ी का दरवाजा था, लकड़ी का दरवाजा पुराना होने की वजह से उसमे जगह जगह दरारे थी और उन्ही दरारों के बीच से हल्की सी मध्हीम रोशनी उस अँधेरे कमरे मैं पहुच रही थी

संतोष-र....रोहित....क्या ये तुम हो...रोहित!

रोहित(धीरे धीरे होश मैं आते हुए)- आह! संतोष...उफ्फ....ये कहा है हम!

संतोष-पता नहीं, कोई पुराना सा कमरा है

रोहित(चिल्लाकर)- कौन हो तुम लोग! क्या चाहते हो?

संतोष-चिल्लाने का कोई खास मतलब नहीं लग रहा, मुझे लगता है की उन्होंने हमें किसी आबादी वाले इलाके से दूर सुनसान इलाके मैं कैद किया होगा

तभी लकड़ी का वो दरवाजा धीरे धीरे चर्रर की आवाज के साथ खुला और चार पांच काले चोगे वाले रहस्यमयी लोगो ने अंदर प्रवेश किया

संतोष-कौन हो तुम लोग, क्या चाहते हो?

उन काले चोगे वालो मैं से एक आगे आया और बडी ही शांत धीमी आवाज मैं बोला जिसने दोनों को अंदर तक हिला दिया "हम चाहते है.....तुम्हारी जान!!"

संतोष(घबराकर)- प...पर क्यों?

काले चोगे वाला व्यक्ति-वैसे तो हमें अब तक कोई जनता नहीं नहीं पर जल्द ही ये सारा ब्रह्माण्ड हमें जानेगा, तुम चाहो तो हमें कालसेना कह सकते हो, आम दुनिया से अलग हमारी अपनी दुनिया है, हमारे अपने विश्वास है मान्यताये है.....और अपना इश्वर है.

रोहित(झुंझलाकर)- ठीक है ठीक है! सीधे मुद्दे पर आते है..कितना पैसा चाहिए बोलो तुमलोगों को?

वो काले चोगे वाला व्यक्ति धीरे धीरे रोहित की तरफ बढ़ा औ एक जोरदार थप्पड़ रोहित के गाल पर रसीद किया, थप्पड़ इतना जोरदार था के रोहित फिर से बेहोश होते होते बचा, फिर उस व्यक्ति ने रोहित के गिरेब्वन को पकड़कर उसे अपनी तरफ खिंचा और उसके कान मैं बहुत धीमे फुसफुसाया "धन और दौलत! आखिर लोग क्यों इन सब के पीछे पूरी जिंदगी निकल देते है! क्या तुम्हारा इश्वर तुमको ये सब उपलब्ध नहीं करवा सकता? दुनिया मैं दुःख दर्द क्यों है? असंतोष क्यों है? लोग क्यों धर्म के नाम पर क़त्ल करते है? क्या तुम्हारा इश्वर पक्षपात करता है? अगर नहीं तो अमीर और गरीब क्यों है? सबको सबकुछ क्यों नहीं मिल पता! लेकिन हमारा इश्वर ऐसा नहीं है क्युकी हम कमसे कम उसके वजूद के बारे मैं जानते तो है लेकिन तुमको तो अपने इश्वर के वजूद का ही नहीं पता, लेकिन कोई बात नहीं, जब हमारे प्रभु इस धरती पर आयेंगे तो सबको उन्हें मानना पड़ेगा, जो ऐसा नहीं करेगा वो धुल मैं मिल जायेगा और अपने इश्वर को इस धरती पर लेन के लिए हमको कुछ कुर्बानिया देनी होंगी!" जैसे ही उसने अपना आखरी वाकया ख़त्म किया दुसरे कालसैनिक ने आकर केरोसिन से भरी बोतल को रोहित के उपर उड़ेल दिया

संतोष-ये...ये क्या कर रहे हो तुम लोग!! रुको...रुक जाओ!!

पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी, रोहित के उपर जलती हुयी माचिस की तीली दाल कर उसे जला दिया गया था, रोहित बहुत चीखा बहुत चिल्लाया लेकिन वह पर उसकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था,

रोहित इतनी बुरी तरह चीख रहा था के उसकी आवाज पुरे इलाके मैं गूंज रही थी, आग उसके शारीर को से चमड़ी को गलाकर धीरे धीरे अलग कर रही थी, जल्द ही उसकी आवाज शांत पड़ती चली गयी, चीखो ने गले मैं ही दम घोट दिया, आग बुझ चुकी थी लेकिन अब दिवार पर रोहित नहीं बल्कि मांस का लोथड़ा लटक रहा था जिसके शारीर से अभी भी हल्का हल्का धुआ उठ रहा था,

संतोष अपने दोस्त को अपने सामने जलता देख कर सदमे जैसी स्तिथि मैं पहुच गया था, उसके मुह से अब कोई बोल नहीं फुट रहे थे, उसे शायद यकीं नहीं हो पा रहा था के उसके सबसे अच्छे दोस्त ने उसके सामने ही आग मैं जलकर तड़प तड़पकर दम तोड़ दिया था

जिस कालसैनिक से रोहित को जलाया था वही संतोष के पास आकर बोला "चिंता मत कर दो घंटे बाद तेरी बारी है! तुझे आज अपने सारे दर्द सारी यातनाओ से मुक्ति मिल जाएगी"

फिर वो सभी कालसैनिक उस कमरे से बहार निकल आये, वो लकड़ी का छोटा सा कमरा एक विशाल कब्रिस्थान की धरती पर बना हुआ था

वो सभी एक घेरा बना कर खड़े हुए थे और उनमे से एक बुलंद आवाज मैं बाकि सबसे बोला

"आज एक और कुर्बानी पूरी हुयी, अब बस कुछ कुर्बानिया और, उसके बाद हिन्द महासागर की गहराइयों मैं कैद हमारे इश्वर कालदूत अपनी कैद से स्वतंत्र हो जायेंगे और पूरी दुनिया पर राज करेंगे!"
 

[color=rgb(184,]भाग १०[/color]


रमण अपनी पूरी टीम के साथ संतोष और रोहित को ढूंढने निकल गया और चन्दन की बताई जगह पर पंहुचा, वो लोग काफी समय तक जंगल मैं रोहित और संतोष को तलाश करते रहे मगर उनका कोई पता नहीं चला

शाम हो चली थी और सूरज धीरे धीरे ढलने लगा था, संतोष उस अंधेरे सीलन भरे कमरे में करीब 1 घंटे से कैद था

वह कई बार पूरी ताकत के साथ 'बचाओ बचाओ' चिल्ला चुका था लेकिन कोई बाहरी प्रतिक्रिया नहीं मिलने की वजह से उसने रही सही उम्मीद भी छोड़ दी थी

इस समय तापमान गिरने की वजह से ठंड भी थोड़ी सी बढ़ गई थी सामने रोहित की जली हुई लाश लोहे की जंजीरों में अब भी बंधी हुई थी तभी खटाक से लकड़ी का दरवाजा टूटा इंस्पेक्टर रमन अपनी पूरी टीम के साथ वहां आ चुका था उसने संतोष को और रोहित की जली हुई लाश को लोहे की मोटी जंजीरों से आजाद करवाया संतोष अभी भी सदमे की स्थिति में था और फटी फटी आंखों से रोहित को घूर रहा था

रमन- मैं जानता हूं कि तुम पर बहुत बुरी बीती है लेकिन यकीन मानो यह दरिंदे ज्यादा दिनों तक नहीं बच पाएंगे

संतोष - लेकिन आप आपको पता कैसे चला कि हम लोग यहां कैद है

रमन- सब बताऊंगा लेकिन पहले तुम मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलो

रमन ने संतोष को अपनी जीप में बैठाकर पुलिस स्टेशन में ले आया और अपने हवलदार से कहा

रमन- मुझे इससे अकेले में कुछ जरूरी पूछताछ करनी है इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर घबरा सकता है वैसे भी इसने अभी-अभी अपने दोस्त की हत्या होते हुए अपनी आंखों से देखी है इसीलिए इसकी मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा पाना मुश्किल काम है मैं चाहूंगा कि आप लोग पूछताछ के दौरान मुझे किसी भी काम के लिए डिस्टर्ब ना करें जरूरी काम के लिए ही केबिन में आए

उसके बाद किसी भी हवालदार ने रमण से कोई सवाल नहीं किया

इस वक़्त संतोष शाल ओढ़े रमण के केबिन मैं उसके सामने बैठा हुआ था, रमण ने उसके और अपने लिए दो कॉफ़ी मंगवायी, संतोष अब भी अपने विचारो की दुनिया मैं खोया हुआ था ये देख कर रमण ने ही बात की पहल करना सही समझा

रमण- तुम लोग वह कैसे पहुचे बता सकते हो

रमण से बात आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन संतोष ने उसका कोई जवाब नहीं दिया तो रमण से उससे दोबारा पूछा और अब की बार संतोष की आँखों से आसू बहने लगे, उसने अभी अभी अपना सबसे खास दोस्त खोया था रमण ने भी उसे रो लेने दिया और जब कुछ समय बाद संतोष शांत हुआ तब रमण ने दोबारा अपना सवाल किया

रमण-संतोष मैं जनता हु ये समय तुम्हारे लिए काफी मुश्किल है पर अपने आप को संभालो और जो भी हुआ मुझे सब सच बताओ वरना मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाउँगा, क्या तुम कुछ बता सकते हो उन लोगो के बारे मैं जो कुछ हुआ है मुझे सुरु से सब बताओ

संतोष ने रमण को शुरू से सब बताया की कैसे वो जंगल की तरफ बस टहलने गए थे कैसे वहा उनपर एक अनजान शख्स ने हमला किया और खुदकी आत्मरक्षा मैं इनके हाथो उसका खून हो गया और फिर उस लाश का गायब होना और संतोष उर रोहित का उन लोगो द्वारा अपहरण संतोष ने रमण को सब बता दिया था

संतोष की बाते सुन कर रमण के एक्सप्रेशन बदल रहे थे उसे जरा भी अंदाजा नहीं था के इतना सब कुछ हुआ होगा

रमण- उनलोगों ने तुम्हे कुछ बताया के वो कौन है या तुम्हे उनकी बातो से कुछ पता चला हो

संतोष- वो अपने आप को कालसेना बता रहे थे और कुछ और लोगो को मारने का भी कह रहे थे, उनमे से एक शख्स के बताया की वो ये सब अपने भगवान् को आजाद करने के लिए कर रहे थे

रमण-किसी का नाम सुना था तुमने

संतोष- नहीं, वो किसी कालदूत का जिक्र कर रह थे

रमण-कालदूत? खैर मुझे लगता ई बाकि किगुम्शुदा घटनाओ मैं भी इसी गिरल का हाथ होगा क्या नाम बताया 'कालसेना', तुम एक काम करो संतोष तुम आज रात यही पुलिस स्टेशन मैं रुको यहाँ तुम सेफ रहोगे और तुम्हारा एक और दोस्त आने वाला था न उसका क्या हुआ

संतोष-वो आएगा तो कॉल करेगा पर सर आपको कैसे पता चला की हमे वह कैद किया गया है

रमण-मैंने अपना एक आदमी तुमपर नजर रखने के लिए छोड़ रखा था उसी से पता चला के तुम जंगल की तरफ गए हो, मेरी टीम तुम लोगो को ढूंढते हुए जब काफी अंदर पहुची तब हमें एक पुराने कब्रिस्तान मैं एक कमरा मिला जब उसे हमने खोला तो तुम मिले, हम रोहित को तो नहीं बचा पाए इसका अफ़सोस है

संतोष- थैंक यू सर आप सही वक़्त पर आये वरना शायद मेरा हाल भी रोहित जैसा होता

रमण-हम्म तुम रुको मैं आता हु

रमण संतोष को अपने केबिन मैं छोड़ कर बहार आया उसे न जाने क्यों संतोष की बातो पे डाउट हो रहा था क्युकी जिस हिसाब से संतोष ने कालसेना के बारे मैं जवाब दिया था उससे रमण को लग रहा था के संतोष इस बारे मैं और भी कुछ जनता है पर उसने अभी ये बात पूछना सही नहीं समझी उसने २ हवलदारो को उसपर नजर रखने कहा और घर की और निकल गया, उसके दिमाग मैं केवल २ चीज़े घूम रही थी कालसेना और कालदूत जिसके बारे मैं उसे पता लगाना था

वहा घर पर राघव भी यही सोच रहा था के आगे उसे क्या करना है

रमण कुछ देर बाद घर पंहुचा और हाथ मुह धोकर सबके साथ खाना खाने बैठा पर उसका धयान खाने मैं नहीं था वो कुछ सोच रहा था, बाकि लोग भी शांत बैठे थे राघव ने रमण से पूछना भी चाह की क्या हुआ है पर उसने कुछ नहीं कह कर बात को ताल दिया जो राघव को अटपटा लगा क्युकी रमण अक्सर घर पर केसेस की बात करता था, राघव ने अपने दादाजी की रुद्राक्ष की माला पहनी हुयी थी और वो देखना चाहता था के इस माला की शक्तिया कितनी कारगर है उसने कुछ सेकंड्स अपनी आँखें बंद की और फिर खोल कर रमण की आँखों द्वारा उसके दिमाग मैं झाँकने की कोशिश की....रमण के दिमाग मैं उसे कालसेना का सन्दर्भ मिला उनदोनो भाइयो को एक ही चीज़ के बारे मैं पता लगाना था, राघव ने उस समय कुछ नहीं कहा और खाना खाने के बाद रमण से बात करने की ठानी........
 
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