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जब उसने घाव साफ़ कर दिया, तो वह नीचे की ओर झुकी और बहुत धीरे से उस घाव पर फूँक मारी। फिर उसने अपनी जीभ निकालकर उस घाव को हल्के से चाट लिया।
"यह सबसे अच्छा एंटीसेप्टिक है," वह शरारत से मुस्कुराई।
राज का जिस्म तन गया। दर्द और वासना का यह कॉकटेल उसके ख़ून में आग लगा रहा था।
कामिनी अब उसकी पसलियों पर मरहम लगा रही थी। उसकी उँगलियाँ राज के जिस्म पर ऐसे फिसल रही थीं जैसे वे किसी वाद्य यंत्र के तार छेड़ रही हों। वह जानबूझकर हर निशान पर थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगा रही थी, उसे अपनी छुअन से तड़पा रही थी।
"लगता है तुम्हें फिर से मेरे ख़ास 'इलाज' की ज़रूरत पड़ गई," वह फुसफुसाई, और उसका चेहरा राज के चेहरे के और क़रीब आ गया। "तुम्हारे जिस्म में बहुत दर्द और तनाव भर गया है। मुझे उसे बाहर निकालना होगा।"
राज ने अपना एक हाथ बढ़ाकर उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। "तो इंतज़ार किसका कर रही हो, डॉक्टर?"
कामिनी हँसी, और उसकी हँसी किसी संगीत की तरह थी। "मरीज़ इतना बेताब हो रहा है।"
यह कहकर वह नीचे झुकी और जहाँ उसने अपनी जीभ से चाटा था, उसी जगह पर अपने होंठ रख दिए। यह चुंबन गहरा, भूखा और उन्मादी था। यह सिर्फ़ एक चुंबन नहीं था, यह एक वादा था - एक ऐसी रात का वादा जो दर्द को मिटाकर जिस्म में सिर्फ़ और सिर्फ़ जुनून भर देगी।
वह चुंबन किसी बाँध के टूटने जैसा था। राज का सारा ग़ुस्सा, सारा अपमान और दर्द उस एक चुंबन में पिघलकर वासना बन गया। उसने कामिनी को अपनी गोद में खींच लिया और उसे ऐसे चूमने लगा जैसे वह सदियों का प्यासा हो। कामिनी भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी, उसकी जीभ राज की जीभ से लड़ रही थी, एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश कर रही थी।
"बेडरूम में," राज ने हाँफते हुए कहा और उसे अपनी गोद में उठाए हुए ही बेडरूम की तरफ़ बढ़ गया। हर क़दम पर उसकी पसलियों में दर्द की एक लहर उठती, लेकिन कामिनी के जिस्म का भार और उसके होंठों का स्वाद उस दर्द पर हावी हो रहा था।
उसने कामिनी को बिस्तर पर फेंका और उसके ऊपर आ गया। उनके कपड़े कैसे उतरे, उन्हें पता ही नहीं चला। वे एक-दूसरे के जिस्म पर भूखे जानवरों की तरह टूट पड़े थे। राज कामिनी के हर इंच को चूम रहा था, काट रहा था, उस पर अपने अधिकार के निशान छोड़ रहा था। वह उन गुंडों से मिले ज़ख़्मों का बदला कामिनी के जिस्म से ले रहा था।
"आराम से, मेरे शेर," कामिनी ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाते हुए कहा।
"तुम्हें चोट लगी है।"
"तुम मेरा इलाज हो," राज ने उसकी गर्दन और स्तनों के बीच की घाटी में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा। उसने कामिनी के एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे किसी बच्चे की तरह चूसने लगा।
कामिनी की आहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। उसे राज का यह जंगली रूप पसंद था। वह जानती थी कि वह ज़ख़्मी है, और ज़ख़्मी शेर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।
जब भी राज का हाथ या जिस्म का कोई हिस्सा उसकी चोट से टकराता, उसके मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल जाती। और दर्द का वह एहसास जैसे उसकी हवस को और बढ़ा देता। वह कामिनी को और ज़ोर से पकड़ लेता, उसके अंदर और गहराई तक जाने की कोशिश करता।
कामिनी ने इस खेल को एक नया मोड़ दिया। वह उसके ऊपर आ गई।
"अब तुम आराम करो," उसने राज की आँखों में देखते हुए कहा। "इलाज मैं करूँगी।"
उसने राज के लिंग को अपने हाथ में पकड़ा और धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।
राज की आँखें सुख से बंद हो गईं।
कामिनी अब पूरी तरह से नियंत्रण में थी। वह अपनी कमर को बहुत धीरे-धीरे, एक लय में घुमा रही थी। उसके लंबे बाल किसी काले झरने की तरह राज के सीने पर फैल गए थे।
"मैं तुम्हारा सारा दर्द चूस लूँगी," वह फुसफुसाई और नीचे झुककर उसे चूमने लगी।
वह जानती थी कि राज की पसलियों में दर्द है, इसलिए वह अपने जिस्म को ऐसे चला रही थी कि उस पर कम से ज़्यादा दबाव पड़े। वह एक कुशल नर्तकी की तरह थी, जो दर्द और जुनून के संगीत पर नाच रही थी।
राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। पसीने की बूँदें कामिनी के माथे से फिसलकर उसकी छाती पर गिर रही थीं। उसकी आँखें वासना से भरी हुई थीं। वह किसी देवी की तरह लग रही थी, एक ऐसी देवी जो दर्द हरकर सुख प्रदान करती हो।
लेकिन राज ज़्यादा देर तक निष्क्रिय नहीं रह सकता था। उसने कामिनी की कमर को पकड़ा और एक झटके में उसे पलट दिया।
"नहीं," वह गुर्राया। "आज मैं तुम्हें बताऊँगा कि दर्द में कितना मज़ा आता है।"
यह कहकर उसने अपनी पूरी ताक़त से धक्के लगाने शुरू कर दिए। यह संभोग अब इलाज नहीं, बल्कि एक जंग बन चुका था, एक ऐसी जंग जिसमें दोनों जीतना चाहते थे।
"यह सबसे अच्छा एंटीसेप्टिक है," वह शरारत से मुस्कुराई।
राज का जिस्म तन गया। दर्द और वासना का यह कॉकटेल उसके ख़ून में आग लगा रहा था।
कामिनी अब उसकी पसलियों पर मरहम लगा रही थी। उसकी उँगलियाँ राज के जिस्म पर ऐसे फिसल रही थीं जैसे वे किसी वाद्य यंत्र के तार छेड़ रही हों। वह जानबूझकर हर निशान पर थोड़ा ज़्यादा वक़्त लगा रही थी, उसे अपनी छुअन से तड़पा रही थी।
"लगता है तुम्हें फिर से मेरे ख़ास 'इलाज' की ज़रूरत पड़ गई," वह फुसफुसाई, और उसका चेहरा राज के चेहरे के और क़रीब आ गया। "तुम्हारे जिस्म में बहुत दर्द और तनाव भर गया है। मुझे उसे बाहर निकालना होगा।"
राज ने अपना एक हाथ बढ़ाकर उसकी कमर को पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। "तो इंतज़ार किसका कर रही हो, डॉक्टर?"
कामिनी हँसी, और उसकी हँसी किसी संगीत की तरह थी। "मरीज़ इतना बेताब हो रहा है।"
यह कहकर वह नीचे झुकी और जहाँ उसने अपनी जीभ से चाटा था, उसी जगह पर अपने होंठ रख दिए। यह चुंबन गहरा, भूखा और उन्मादी था। यह सिर्फ़ एक चुंबन नहीं था, यह एक वादा था - एक ऐसी रात का वादा जो दर्द को मिटाकर जिस्म में सिर्फ़ और सिर्फ़ जुनून भर देगी।
वह चुंबन किसी बाँध के टूटने जैसा था। राज का सारा ग़ुस्सा, सारा अपमान और दर्द उस एक चुंबन में पिघलकर वासना बन गया। उसने कामिनी को अपनी गोद में खींच लिया और उसे ऐसे चूमने लगा जैसे वह सदियों का प्यासा हो। कामिनी भी पूरी तरह से उसका साथ दे रही थी, उसकी जीभ राज की जीभ से लड़ रही थी, एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश कर रही थी।
"बेडरूम में," राज ने हाँफते हुए कहा और उसे अपनी गोद में उठाए हुए ही बेडरूम की तरफ़ बढ़ गया। हर क़दम पर उसकी पसलियों में दर्द की एक लहर उठती, लेकिन कामिनी के जिस्म का भार और उसके होंठों का स्वाद उस दर्द पर हावी हो रहा था।
उसने कामिनी को बिस्तर पर फेंका और उसके ऊपर आ गया। उनके कपड़े कैसे उतरे, उन्हें पता ही नहीं चला। वे एक-दूसरे के जिस्म पर भूखे जानवरों की तरह टूट पड़े थे। राज कामिनी के हर इंच को चूम रहा था, काट रहा था, उस पर अपने अधिकार के निशान छोड़ रहा था। वह उन गुंडों से मिले ज़ख़्मों का बदला कामिनी के जिस्म से ले रहा था।
"आराम से, मेरे शेर," कामिनी ने उसकी पीठ पर अपने नाखून गड़ाते हुए कहा।
"तुम्हें चोट लगी है।"
"तुम मेरा इलाज हो," राज ने उसकी गर्दन और स्तनों के बीच की घाटी में अपना चेहरा छिपाते हुए कहा। उसने कामिनी के एक स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे किसी बच्चे की तरह चूसने लगा।
कामिनी की आहें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। उसे राज का यह जंगली रूप पसंद था। वह जानती थी कि वह ज़ख़्मी है, और ज़ख़्मी शेर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है।
जब भी राज का हाथ या जिस्म का कोई हिस्सा उसकी चोट से टकराता, उसके मुँह से दर्द की एक सिसकी निकल जाती। और दर्द का वह एहसास जैसे उसकी हवस को और बढ़ा देता। वह कामिनी को और ज़ोर से पकड़ लेता, उसके अंदर और गहराई तक जाने की कोशिश करता।
कामिनी ने इस खेल को एक नया मोड़ दिया। वह उसके ऊपर आ गई।
"अब तुम आराम करो," उसने राज की आँखों में देखते हुए कहा। "इलाज मैं करूँगी।"
उसने राज के लिंग को अपने हाथ में पकड़ा और धीरे-धीरे उस पर बैठ गई।
राज की आँखें सुख से बंद हो गईं।
कामिनी अब पूरी तरह से नियंत्रण में थी। वह अपनी कमर को बहुत धीरे-धीरे, एक लय में घुमा रही थी। उसके लंबे बाल किसी काले झरने की तरह राज के सीने पर फैल गए थे।
"मैं तुम्हारा सारा दर्द चूस लूँगी," वह फुसफुसाई और नीचे झुककर उसे चूमने लगी।
वह जानती थी कि राज की पसलियों में दर्द है, इसलिए वह अपने जिस्म को ऐसे चला रही थी कि उस पर कम से ज़्यादा दबाव पड़े। वह एक कुशल नर्तकी की तरह थी, जो दर्द और जुनून के संगीत पर नाच रही थी।
राज ने अपनी आँखें खोलीं और उसे देखा। पसीने की बूँदें कामिनी के माथे से फिसलकर उसकी छाती पर गिर रही थीं। उसकी आँखें वासना से भरी हुई थीं। वह किसी देवी की तरह लग रही थी, एक ऐसी देवी जो दर्द हरकर सुख प्रदान करती हो।
लेकिन राज ज़्यादा देर तक निष्क्रिय नहीं रह सकता था। उसने कामिनी की कमर को पकड़ा और एक झटके में उसे पलट दिया।
"नहीं," वह गुर्राया। "आज मैं तुम्हें बताऊँगा कि दर्द में कितना मज़ा आता है।"
यह कहकर उसने अपनी पूरी ताक़त से धक्के लगाने शुरू कर दिए। यह संभोग अब इलाज नहीं, बल्कि एक जंग बन चुका था, एक ऐसी जंग जिसमें दोनों जीतना चाहते थे।