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Adultery हादसा

जब उनका लंच आ गया तो तीनों ने एक साथ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर साथ में ही खाना खाया. उस दौरान भी विजय और लोकेश बिलकुल नोर्मल बातें कर रहे थे. हमेशा की तरह. सुरभि को ये समझ ही नहीं आ रहा था कि ये चल क्या रहा था.

अचानक से लोकेश ने अजीब सी बात पूछी विजय को. “और सुनाओ,…कोई हॉट आइटम मिली क्या मुंबई में? सुना है वहाँ कि लड़कियाँ बड़ी मस्त हैं.”

“मैं वहाँ काम से गया था, लोकेश…कोई डेट पर थोड़े ही,” विजय झेंपते हुए बोला और हंस दिया.

“कभी कभी थोड़ी मस्ती भी करनी चाहिए, यार. अच्छा…सच बता... सारा दिन बस काम ही किया या फिर अपनी बीवी को इमप्रेस करने के लिए बोल रहा है?” लोकेश बोला.

विजय उसकी बात पर बस हँस दिया, कहा कुछ भी नहीं.

सुरभि बड़ी उलझन में थी. वो बार बार विजय के मन की थाह लेने की कोशिश कर रही थी पर उसे कुछ भी पता नहीं चल रहा था कि उसके मन में क्या चल रहा है.

लंच के बाद लोकेश अपने कमरे में चला गया. सुरभि और विजय दोनो ऊपर अपने बेडरूम में आ गए.

दरवाज़ा बंद करने के बाद विजय ने जैसे ही अपने कमरे की हालत देखी और अपने अस्त व्यस्त बिस्तर को देखा तो सब समझ गया कि यहाँ उसके पीछे से क्या चल रहा था.

“अच्छा…तो ये चल रहा था यहाँ. लोकेश यहीं था ना सुरभि?” विजय बोला.

सुरभि को समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दे. इसलिए उसने चुप रहना ही मुनासिब समझा.

“और तुम भी यहाँ उसके साथ थी ना...? बोलो... तुम दोनो इस बिस्तर पर साथ थे ना?

“विजय वो मैं….मैं…आइ एम वेरी सॉरी…” सुरभि के मुँह से शब्द बाहर ही नहीं निकल रहे थे इसलिए वो इतना बोलकर ही चुप हो गई.

“मुझे पहले से ही पता था कि एक ना एक दिन ये ज़रूर होगा…” विजय ने बैड की तरफ़ बढ़ते हुए कहा.

“तुम कैसे जानते थे…” सुरभि ने लड़खड़ाती हुई आवाज़ में कहा.

“बस, मैं जानता था,” विजय ने बैड पर लेटते हुए कहा,

सुरभि चुपचाप नज़रें झुकाए दूर ही खड़ी रही.

“अच्छा… ये बताओ कि उसने तुम्हारे साथ कितनी बार किया?”

सुरभि को बड़ा ही अजीब लग रहा था कि वो ये क्या पूछ रहा था. वो असमंजस में पड़ गई कि क्या कहे. थोड़ी सी हिम्मत कर के उसने कहा, “बस, एक बार…”

“बस एक बार…? मुझसे कुछ मत छुपाओ सुरभि. इधर आओ मेरे पास और खुल के बताओ पूरी कहानी कि ये सब कैसे हुआ,” विजय ने बैड पे हाथ मार कर उसे अपने पास बुलाते हुए कहा.

वो झिझकते हुए उसके पास जा कर बैड पर बैठ गई और बोली, “क्यों जानना चाहते हो तुम ये सब... रहने दो. तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा.”

“मुझे क्या अच्छा लगेगा क्या नहीं तुम मुझ पर छोड़ दो. मैं सच जानना चाहता हूँ. बताओ कि ये सब कुछ कैसे हुआ…”
 
सुरभि ने सब कुछ जैसे जैसे हुआ था बिलकुल वैसे वैसे विजय को बता दिया सिवाय उसके छोटे लिंग वाली बात की कहानी के. बोलते वक्त उसके गाल शर्म से लाल हो रखे थे और जुबान बार बार लडखडा रही थी पर फिर भी वो बोलती गई और सब सुना कर ही चुप हुई.

“हम्म… तो खूब मज़े किए तुमने मेरे दोस्त के साथ, हैं ना?” विजय बोला.

“इसपर मेरा कोई वश नहीं था, विजय. मेरा विश्वास करो सब कुछ अपने आप ही होता चला गया.” ये बोलते हुए उसका चेहरा शरम और झिझक से लाल हो गया था.

“चलो छोड़ो ये सब बातें ,सुरभि. तुम ज़्यादा परेशान मत हो. मैं जानता हूँ कि इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है. लोकेश जैसे अल्फ़ा मर्द के आगे तो कोई भी औरत पिघल सकती है. तुम क्या कर सकती थी. मैं समझ सकता हूँ…तुम ज़्यादा मत सोचो.”

“तुम्हें सच में बुरा नहीं लग रहा, विजय…” सुरभि ने हैरानी से विज़य की तरफ़ देखते हुए कहा.

“ हम्म…ऐसा नहीं है कि मुझे बुरा नहीं लग रहा. पर मैं ये भी जानता हूँ कि तुम्हारे जैसी औरत पर लोकेश जैसे अल्फ़ा मर्द ने हाथ डालना ही डालना था...”

“मेरे जैसी… मतलब?”

“तुम्हारे जैसी मतलब… सुंदर और हॉट. तुम तो मेनका हो सुरभि, किसी साधु की भी तपस्या भंग कर सकती हो तुम... लोकेश तो फिर भी सांसारिक इंसान है,” विजय ने कहा और सुरभि के बाँये उभार पर अपनी उँगलिया फिराने लगा.

“मुझे नहीं पता मैं उसकी बातों में कैसे आ गई. सच मानो मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था…” सुरभि ने शर्मा के कहा.

“अब झूठ मत बोलो सुरभि. मुझे सब पता है. अच्छा…ये बताओ कि क्या तुम हमेशा लोकेश जैसे अल्फ़ा मैन की फंटेसी नहीं करती थी? तुम्हें तो ऐसे डील डोल वाले मर्द पहले से ही पसंद आते थे. तो बात ये है बेबी…कि जब तुम्हें लोकेश के रूप में ऐसे आदमी के साथ नज़दीकी बढ़ाने का मौक़ा मिला तो तुमने बिना किसी झिझक के इसका फ़ायदा उठा लिया…बोलो, सही कह रहा हूँ ना मैं?” विजय हँसते हुए बोला.

“ये सच नहीं है, विजय. मेरा यक़ीन करो. मैंने ये सब रोकने की काफ़ी कोशिश की थी. जैसा तुम सोच रहे हो ऐसा कुछ नहीं है. मेरे बस में होता तो मैं उसे अपनी ऊँगली भी ना छूने देती,” सुरभि बोली. बोलते वक्त उसकी आवाज काँप रही थी.

“रहने दो-रहने दो…इतनी ही कोशिश की होती तो तुमने तो तुम्हारी टाँगे उसके लिए कभी ना खुलती. मन तो तुम्हारा भी कर रहा होगा ना उसका मोटा मूसल लेने का. मुझे बनाओ मत, सुरभि …हा-हा-हा...”

विजय की हंसी अजीब थी. वो पता नहीं क्यों ऐसी बातें कर रहा था. इतनी बड़ी बात को वो कैसे इतने हलके में ले रहा था और सुरभि का मजाक उड़ा रहा था. सुरभि को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो ऐसा क्यों कर रहा था.

“मैं सच बोल रही हूँ, विजय…ऐसे मेरा मज़ाक़ मत उड़ाओ.”

“तुम्हें लगता है कि मैं मज़ाक़ कर रहा हूँ? मेरा तो जी जल रहा है ये सब सोचकर,” विजय ने चेहरे पर बहुत ही परेशानी वाले भाव ला कर कहा.

सुरभि का गला सुख गया ये सुन कर. “तो तुम मुझसे नाराज़ हो?”

“हम्म…थोड़ा नाराज़ तो हूँ तुमसे.”

“थोड़ा क्यों...? मैं जानती हूँ कि मेरी गलती कोई छोटी मोटी नहीं बल्कि बहुत बड़ी है और तुम्हें मुझसे नाराज़ होने का... झगड़ा करने का पूरा हक़ है...”
 
थोड़ी देर के लिए विजय चुप हो गया और फिर सुरभि का हाथ पकड़ के बोला, “मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा ,सुरभि. कल जब मैं मुंबई के लिए निकल रहा था तो शायद मैं कहीं ना कहीं ये जानता था कि लोकेश इस बात का फ़ायदा ज़रूर उठाएगा.”

“तुम ये कैसे कह सकते हो?”

“बस मुझे अंदेशा था इस बात का…मुझे पता था कि वो तुम्हें अपने जाल में फ़साने की पूरी कोशिश करेगा और तुम अपनी मर्ज़ी से उसके जाल में जा फँसोगी क्योंकि तुम्हें ख़ुद उसके जैसे अल्फ़ा मर्द पसंद हैं. फिर भी मैं तुम्हें यहाँ उसके साथ अकेला छोड़ कर चला गया…”

“तुम सब जानते थे तो तुमने ऐसा क्यों किया, विजय...? क्यों मुझे अकेला छोड़ा उसके साथ...?”

“देखो…सुरभि, इस सवाल का जवाब बहुत ही मुश्किल है मेरे लिए.”

“मुझे बताने की कोशिश तो करो विजय, मैं सब जानना चाहती हूँ.”

“तुम नहीं समझोगी, सुरभि… जाने दो इन बातों को.”

सुरभि ने झल्ला कर अपनी गर्दन हिलाते हुए कहा, “एक तो तुम सब जानते बुझते हुए मुझे अपने अड़ियल दोस्त के पास अकेला छोड़ कर चले गए और अब ये भी नहीं बताओगे कि तुमने ऐसा क्यों किया?”

“और जो तुमने किया वो कितना सही था? तुम कैसे इतनी आसानी से किसी और के साथ हमबिस्तर हो गई? तुमने ये भी नहीं सोचा कि तुम मेरी पत्नी हो.”

“रहने दो, विजय… अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम जानते थे कि लोकेश ऐसी हरकत करेगा और अब सारा दोष मेरे सिर मढ़ रहे हो,” सुरभि ने तपाक से कहा.

कुछ देर दोनों चुप रहे. फिर अचानक विजय बोला, “छोड़ो, ये सब बातें, सुरभि. मैं तुम्हें कुछ नहीं कह रहा हूँ … मैं तो सिर्फ़ तुम्हें ये बताने की कोशिश कर रहा था कि शायद मैं ये रोक सकता था अगर थोड़ा हिम्मत दिखा कर उसे यहाँ ना बुलाकर किसी होटेल में ठहरने को बोलता.” इतना बोलकर विजय चुपचाप मायूस सा हो टकटकी लगा कर छत की तरफ़ देखने लगा.

“मेरा मतलब तुम्हें दुःख पहुँचाने का नहीं था, विजय… आई एम सॉरी.” सुरभि ने विजय की ऐसी हालत देखते हुए तुरंत उसे संभालने की कोशिश की.

“ मैं ठीक हूँ सुरभि… मैं तो बस तुम्हें अपने मन की बात बता रहा था,” कहता हुआ विजय बैड के सिरहाने पर कमर टिका कर बैठ गया.
 
थोड़ी देर उन दोनो के बीच एक अजीब सा सन्नाटा छाया रहा फिर विजय अपना गला साफ़ कर के बोला, “अच्छा, तो ये बताओ कि जब मैंने बेल बजाई तो तुम उसके साथ यहीं थी… हैं ना?”

“हाँ,” सुरभि ने धीरे से कहा.

विजय ने एक ग़हरी साँस ली और बोला, “लोकेश तुम्हें हमारी शादी वाले दिन से ही बहुत पसंद करता था. कईं बार वो मुझे कह चुका था कि वो तुम्हें एक बार पाना चाहता चाहता है.”.

“ये तुम क्या कह रहे हो. वो तुमसे सीधे सीधे ऐसी बात कैसे कर सकता है,” सुरभि ने हैरान हो कर पूछा.

“मुझे तो हमेशा लगता था कि वो सिर्फ़ मज़ाक कर रहा है और इसलिए मैंने उसे कभी कुछ नहीं कहा. मेरी ख़ामोशी को वो मेरी हाँ समझ बैठा और आज मौक़ा मिलते ही उसने तुम्हें…”

“मुझे भी अजीब लग रहा था कि वो तुम्हारे पीछे से यहाँ रहने के लिए क्यों आ रहा है… तो क्या ये सब पहले से ही प्लान्ड था?”

“नहीं-नहीं, मेरी तरफ़ से ऐसा बिलकुल भी नहीं था. बात यूँ हुई कि मैंने उसे पिछले हफ़्ते बातों बातों में फ़ोन पर ये बता दिया था कि मैं एक मीटिंग के लिए मुंबई जा रहा हूँ. फिर अगले ही दिन मुझे उसका फ़ोन आया कि उसे दिल्ली में किसी काम से आना है इसलिए वो हमारे घर ही रुकेगा कुछ दिन. मुझे उस वक्त ही उसके इरादे नेक नहीं लग रहे थे पर मैं उसे मना नहीं कर पाया. पता नहीं क्यों… मैं उसे कुछ कह नहीं पाता हूँ. इसलिए मैं ये कह रहा हूँ कि जो कुछ भी हुआ उसमें पूरी गलती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है बल्कि कुछ गलती मेरी भी है.”

“अपने आप को दोष मत दो ,विजय. गलती मेरी ही है…मैं ही तो बहक गई थी और उसकी बातों में आ गई... काश मैंने खुद को संभाला होता तो ऐसा कुछ नहीं होता.”

दोनो के बीच फिर से शांति छा गई.

“तो तुम अब क्या करने वाले हो?” सुरभि ने उनके बीच की ये चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

“मतलब…?”

“मतलब ये कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी क्या अब तुम उसे इस घर में रहने दोगे या फिर बाहर निकाल दोगे?”

विजय ने लंबी गहरी साँस ली. “तुम्हें क्या लगता है...? मुझे क्या करना चाहिए?”

“मैं तो ख़ुद तुमसे पूछ रही हूँ.”

“मैं क्या बोलूँ अब… मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ.”

“तो क्या तुम हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहोगे... उसे कुछ नहीं कहोगे,” सुरभि ने हैरान हो कर कहा.

“ये बातें बोल कर तुम मुझे शर्मिंदा मत करो , सुरभि.”

“मैं तो बस तुमसे पूछ रही हूँ कि ऐसी क्या बात है जो कि तुम लोकेश से इतना डरते रहते हो. मैंने देखा है तुम्हें उसके सामने… पता नहीं क्या हो जाता है तुम्हें. क्यों डरते हो उस से इतना...?”

“म-मुझे ख़ुद कुछ नहीं पता…”

“कुछ नहीं पता का क्या मतलब है ,विजय? तुम मुझे ये बताओ कि अगर उसने फिर से मुझे फ़साने की कोशिश की तो तुम क्या करोगे?” ये पूछते हुए सुरभि को अजीब सी उत्तेजना महसूस हो रहा थी अपनी योनि में. ऐसा क्यों हो रहा था उसे नहीं पता था. शायद उसके मन में कहीं न कहीं ये इच्छा थी कि लोकेश एक बार फिर उस पर चढ़ जाए और अपने लंबे और मोटे हथियार से उसे खूब मजे दे.

“म-मैं…” विजय के मुँह से कुछ नहीं निकला.

“देखो, विजय…लोकेश जानता है कि तुम्हें अब पता चल चुका है कि उसने तुम्हारी बीवी को भोग लिया है और फिर भी तुम चुप हो. तुम्हें नहीं लगता कि इससे उसकी हिम्मत और भी बढ़ जाएगी. ये भी हो सकता है कि वो इस बार तुम्हारी मौजूदगी में ही मुझे हासिल करने की कोशिश करे... ऐसा हुआ तो तुम क्या करोगे?” सुरभि बोली. इस बार फिर से उसकी योनि मचल उठी. इस बार उसे हल्का सा गीलापन भी महसूस हुआ अपनी टांगो के बीच. बात साफ़ थी. उसे इन बातों में अजीब सा मजा आ रहा था. पर ऐसा हो क्यों रहा था उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसका मन हो रहा था कि ये सब बातें बंद करके वो नहाने चली जाए. शायद पानी की बुँदे उसके बदन में उठ रही वासना को शांत कर दे. पर विजय को छोड़ कर जाने को भी मन नहीं मान रहा था उसका. इसलिए वो चुपचाप बैठी रही.

“हम्म… तुम सही बोल रही हो,” विजय ने कुछ सोच विचार करके कहा. इस बार उसकी आँखो में कुछ शरारत सी थी.

“तो क्या तुम उसे रोक पाओगे...? उसे बोल पाओगे यहाँ से जाने के लिए...” सुरभि बोली.
 
विजय ने उसे बिस्तर पर लेटा दिया और उसके ऊपर लेट गया और उसकी आँखो में देखते हुए मस्ती में बोला, “तुम क्या सच में चाहती हो कि मैं उसे रोकूँ?” ये बोल कर विजय उसकी योनि को कपडे के ऊपर से अपनी उँगलियो से छेड़ने लगा.

“और नहीं तो क्या… तुम पति हो मेरे. भला किसी ग़ैर मर्द को मेरे साथ मज़े कैसे करने दे सकते हो?” सुरभि ने भी शरारती अन्दाज़ से कहा.

“अगर उस दोस्त का बहुत बड़ा हो, तो भी रोकूँ क्या…?” कहते हुए विजय ने सुरभि की पैंटी में हाथ घुसा के एक उँगली उसकी योनि में डाल दी.

सुरभि सिसक उठी.

“पर मेरे लिए उसका वो बहुत बड़ा है. मैं इतना बड़ा नहीं ले सकती…” वो सिसकते हुए बोली. सुरभि को नहीं पता था कि वो ऐसी बाते करके सही कर रही थी या नहीं. पर वो खुद को रोक नहीं पा रही थी.

“अच्छा, अगर ऐसा है तो उसके बड़े और मोटे मूसल के साथ मस्ती किसने की इस बिस्तर पर? बोलो बोलो…जवाब दो मुझे?” विजय अपनी ऊँगली को सुरभि की योनि में अन्दर बाहर करते हुए बोला.

सुरभि पहले मजे में सिसकी और फिर बोली, “आह...वो तो उसने मुझे बातों में उलझा लिया था... मुझे तो बहुत डर लग रहा था उसके हथियार से...”

“अच्छा जी…” विजय बोला और अपनी एक और ऊँगली सुरभि की योनि में घुसा दी.

सुरभि सिसक पड़ी और शर्माते हुए बोली, “जी...”

“अच्छा एक बात बताओ. क्या सच में उसने बस एक बार किया तुम्हारे साथ?”

“हाँ बस एक बार...”

“सच बोल रही हो?”

“हाँ विजय मैं सच बोल रही हूँ...”

“उसने दोबारा कोशिश नहीं की...”

“वो दोबारा करना चाहता था पर तुम आ गए...,” उसने शर्माते हुए बताया.

“हा-हा-हा…तो मैंने तुम्हारे रंग में भंग डाल दिया,” विजय हँसते हुए बोला. बातें करते हुए वो बार बार अपनी दोनों उँगलियाँ उसकी योनि में अंदर बाहर कर रहा था.

सुरभि के लिए खुद को थामना मुश्किल हो रहा था. वो सिसकियाँ लिए जा रही थी बार बार. “ऐसी बात नहीं है…”

“तो फिर कैसी बात है? तुम उसे दुबारा अपनी देने वाली थी, हैं ना?”

“नहीं-नहीं मैं सच में ऐसा नहीं चाहती थी पर मैं कर भी क्या सकती थी. वो हमारा मेहमान है... इसीलिए मैं उसकी बातें मान रही थी.”

“तो क्या तुम्हारी बिलकुल भी इच्छा नहीं थी लोकेश जैसे अल्फ़ा मेल के साथ सेक्स करने की,” विजय ने सुरभि की योनि में शरारती अंदाज में उँगली घुमाते हुए कहा. ऐसा लग रहा था जैसे वो उस से कुछ सच उगलवाने की कोशिश कर रहा हो.

“ओहो… तुम समझते क्यों नहीं. मेरे मन में जो भी इच्छा हो पर ये सच है कि मैं तुम्हें धोखा नहीं देना चाहती थी. मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ. तुम जानते हो ना ये बात.”

“अगर ऐसा है तो फिर तुमने लोकेश को एक बार भी क्यों करने दिया, बताओ जरा.”

“वो सब कैसे हो गया मुझे सच में नहीं पता पर मैं ये चाहती नहीं थी.”

“झूठी… तुम्हारी पुस्सी जिस तरह उसके नाम से ही नदियाँ बहा रही है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ये कितना मचली होगी उसका मोटा अपने अंदर लेने के लिए.”

बात तो सच कही थी विजय ने. पर ये बात सुरभि स्वीकार कैसे करे. “ये सच नहीं है, विजय...” सुरभि शर्माते हुए बोली.

“उसका वीर्य अभी तक तुम्हारी गहराइयों में मौजूद है, हैं ना?”

“ये तुम कैसी बातें कर रहे हो विज़य?” सुरभि ने हैरान होते हुए कहा.

“क्यों... क्या हुआ? क्या ये बातें तुम्हें एक्साइट नहीं कर रही?” विजय तेजी से उसकी योनि में ऊँगली घुसाते हुए बोला.

“तुम कहना क्या चाहते हो?” सुरभि सिसकते हुए बोली.

“मैं ये कहना चाहता हूँ मेरी रानी कि जब हम इस अजीब सी घटना के शिकार हो ही गए हैं तो क्यों ना इसका मज़ा लिया जाए?” ये कहते हुए वो अपनी उँगली उसकी तर बतर हो चुकी योनि में और तेजी से अंदर बाहर करने लगा.

“इसमें हमें कौन सा मज़ा मिलने वाला है?” सुरभि हँस पड़ी.
 
“अभी कुछ नहीं कह सकता पर लगता है कि इससे हमारी शादीशुदा ज़िंदगी में और भी रंग भर सकता है.”

“कौन सा रंग?…ज़रा खुल के बताओ,” सुरभि ने उत्सुक हो के पूछा.

“हमारी सेक्स लाइफ़ और रंगीन हो जाएगी यार बात को समझो...”

“पता नहीं तुम क्या बोल रहे हो...?”

“अच्छा ये बताओ उसने पहले अपनी उँगली घुसाई थी या सीधा अपना मूसल ही डाला दिया था तुम्हारी छोटी सी पुस्सी में?” विजय ने अपनी उँगली सुरभि की योनि में और गहरे घुसाते हुए पूछा.

“प्लीज़…विजय, मुझसे ऐसी बातें मत पूछो. मुझे बहुत अजीब सा लग रहा है,” सुरभि ने उस से नज़रें चुराते हुए कहा.

तभी कमरे के बाहर से आवाज आई.

“अरे भाभी जी…अगर तुम्हें अजीब लग रहा है तो मैं बता दूँ क्या विजय को अंदर आकर कि पहले मैंने क्या डाला था.”

लोकेश की आवाज़ सुनकर दोनो की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई.

“हे भगवान...! वो हमारे दरवाज़े के बाहर खड़ा है,” विज़य ने सुरभि को धीरे से कहा और अपनी उंगलिया सुरभि की योनि से बाहर निकाल ली.

“मुझे लगता है उसने हमारी सारी बातें सुन ली होंगी,” सुरभि सहमी हुई आवाज में बोली.

“हाँ, लगता तो यही है.”

“अब क्या करेंगे हम... ये ठीक नहीं हुआ...”

“विजय… दरवाजा खोलो. आगे का मोर्चा मुझे संभालने दो,” लोकेश ने दरवाज़ा खड़काते हुए कहा.

“अब क्या होगा? ये तो अंदर आना चाहता है,” सुरभि ने घबराते हुए कहा.

“मुझे लगता है वो अंदर आकर फिर से तुम्हारी लेना चाहता है,” विजय ने गहरी साँस लेते हुए कहा.

सुरभि की साँसे अटक गई ये सुन कर. “क्या तुम्हें सच में लगता है कि वो ऐसा कर सकता है?”

“मुझे पक्का तो नहीं पता… पर वो कुछ भी कर सकता है...” विज़य बोला.

लोकेश कमरे में आने को मरा जा रहा था. वो बार बार दरवाज़ा खड़काने लगा.

“क-क्या करें अब?” विजय ने सुरभि से पूछा.

“मुझे क्या पता. तुम्हारा दोस्त है… तुम ख़ुद सोचो कि क्या करना है.” सुरभि ने घबराहट में जवाब दिया.

“मैं जानता हूँ कि अगर वो अंदर आ गया तो अपनी मनमानी ही करेगा. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ…उसे कैसे रोकूँ,” विजय ने अपनी बेबसी बताते हुए कहा.

“मुझे मालूम है कि तुम उसे रोक नहीं पाओगे. पर अब करें तो क्या करें?” सुरभि ने धीरे से कहा.

“मुझे तो ख़ुद कुछ भी समझ नहीं आ रहा. मेरे हिसाब से तो इसे हमारे बेडरूम के बाहर इस वक्त होना ही नहीं चाहिए था. इसे तो ज़रा भी तमीज़ नहीं रही,” विजय धीरे से बोला.

“तुम अब इससे किसी तमीज़ की उम्मीद नहीं कर सकते. एक तो पहले ही तुमने उसके हौंसले बढा दिए. ये जानते हुए भी कि वो ऊपर तुम्हारे बेडरूम से निकल के आ रहा था तुमने उसे कुछ भी नहीं कहा. अब भला वो क्यों डरेगा तुमसे? उसे तो ये ही लगेगा ना कि तुम्हें कोई एतराज़ नहीं इस बात से कि वो तुम्हारी बीवी के साथ कुछ भी करे. और अब तो वो हमारी सारी बातें भी सुन चुका है... तभी तो बेशर्मी से दरवाज़ा पीटे जा रहा है. उसे मालूम है कि तुम उसका विरोध नहीं करोगे और चुपचाप अपनी बीवी उसे सौंप दोगे.”

विजय कुछ नहीं बोला. सुरभि की तीखी बातें शायद उसे चुभ गई थी.

“चुप क्यों हो विजय...”

“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ...”

“दरवजा खोलो यार...” लोकेश चिल्लाया.

“दरवाजा खोला तो वो तुम पर चढ़ जाएगा मेरे सामने ही...”

विजय की इस बात पर सुरभि की योनि मचल उठी और पानी छोड़ने लगी. “ये तो है... वो अब रुकेगा नहीं... पर हम उसे इग्नोर तो नहीं कर सकते ना...”

“तुम कहना क्या चाहती हो सुरभि? क्या मुझे दरवाज़ा खोल कर उसे अंदर बुला लेना चाहिए?”

“मैंने ये कब कहा…”

“मैं सब जानता हूँ... तुम भी उसे देने के लिए मरी जा रही हो...”

“तुम भी ना... कुछ देर पहले तो खुद ही अपनी सेक्स लाइफ़ रंगीन करने की बातें कर रहे थे और अब...”

“बातें सिर्फ बातें होती हैं. उन्हें अमल में लाना इतना आसान नहीं होता. इसे अंदर आने दिया तो जाने क्या होगा. तुम मुझे दरवाजा खोलने के लिए मत उकसाओ...”

“तुम कैसी बातें कर रहे हो? मैं तुम्हें ये सब करने को नहीं कह रही. मैं तो बस फ़ैक्ट ही बता रही थी और कुछ नहीं… तुम भी ना कुछ भी समझ लेते हो.”

“सच सच बताओ… क्या तुम उसका मोटा मूसल फिर से अपनी योनि में नहीं लेना चाहती?” विजय ने सुरभि की आँखों में झांकते हुए पूछा.
 
“तुम कैसी बातें कर रहे हो? मैं तुम्हें ये सब करने को नहीं कह रही. मैं तो बस फ़ैक्ट ही बता रही थी और कुछ नहीं… तुम भी ना कुछ भी समझ लेते हो.”

“सच सच बताओ… क्या तुम उसका मोटा मूसल फिर से अपनी योनि में नहीं लेना चाहती?” विजय ने सुरभि की आँखों में झांकते हुए पूछा.

सुरभि ने ना में गर्दन हिला दी, “मुझे कुछ नहीं पता कि मैं क्या चाहती हूँ.” बोलते वक्त उसकी योनि पानी छोड़ रही थी लोकेश का एक बार फिर लेने के ख्याल से.

“पर तुम्हारी आँखें तो कुछ और ही कह रही हैं…”

“आँखें तो तुम्हारी भी कुछ और ही कह रही हैं,” उसने विजय को छेड़ते हुए कहा. उसे विजय की आँखों में एक्साईटमेंट साफ़ नज़र आ रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे कि वो खुद उसे लोकेश को सौंपने की तैयारी कर रहा हो.

“क्या?” विजय ने कहा.

“कुछ तो है… ये तुम भी जानते हो. मुझसे क्यों पूछते हो, अपने आप से पूछो.” सुरभि ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा.

“तुम्हें झूठ नहीं बोलूँगा... सोच तो रहा हूँ मैं कुछ. पर पता नहीं ये करना चाहिए या नहीं,” विजय गहरी साँस लेते हुए बोला.

“मुझे भी तो बताओ कि तुम क्या सोच रहे हो,” सुरभि ने उत्सुक हो कर पूछा.

“मैं एक बार तुम्हें और लोकेश को साथ में देखना चाहता हूँ…” पूरी बात बोलते ही उसे अहसास हो गया कि वो ये क्या बोल गया इसलिए चुप हो गया. उसके चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव उभर आए थे.

“ ये तुम क्या बोल रहे हो, विज़य. मुझसे ये नहीं होगा. तुम्हारे सामने उसके साथ मैं वो सब कैसे कर सकती हूँ. ना बाबा ना. ये बहुत ही अजीब है.” सुरभि ने सकपकाते हुए बोला.

विजय जो कह रहा था उसकी कल्पना मात्र से सुरभि का चेहरा शरम से लाल हो गया था.

“मैं तो बस यूँ ही बोल रहा था. हम ऐसा किंकी काम बिलकुल नहीं करेंगे. तुम चिंता मत करो,” विजय बोला.

“तुमने तो मुझे डरा ही दिया था…पर सोचो तुम्हारी ये बातें अगर लोकेश को पता चल गई तो…” सुरभि धीरे से बोल कर हँस पड़ी.

इतने में लोकेश ने फिर से उनका दरवाज़ा खड़का दिया. “अरे खोलो ना दरवाजा यार...”

“क्या करें सुरभि?”

सुरभि ने ग़हरी साँस लेते हुए कहा, “अब हम इसे यहाँ दरवाज़े पर पूरा दिन ऐसे ही खड़ा तो नहीं रख सकते. मेहमान है वो हमारा आख़िर. अच्छा नहीं लगता ये सब.”

“बोल तो तुम सही रही हो लेकिन हम करें तो क्या करें?”

“दरवाज़ा खोलो और बात करो उससे… और क्या.”

“मैं,” उसने बहुत ही हैरान हो कर कहा.

“तुम ही करोगे और कौन करेगा? आख़िर तुम ही तो मर्द हो इस घर के…मुखिया हो. ये तुम्हारी ही ज़िम्मेदारी है, विजय,” सुरभि ने विजय की हिम्मत बढ़ते हुए कहा.

विजय ने ग़हरी साँस लेते हुए दरवाज़े की तरफ़ देखा और कहा, “ठीक है… मैं दरवाज़ा खोलता हूँ. देखते हैं क्या होता है.”
 
दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए विजय के मन में कईं तरह के ख़्याल आ रहे थे. दरवाजा खोलना चाहिए या नहीं...? लोकेश अंदर आकर क्या करेगा...? अंदर आते ही सुरभि पर चढ़ाई तो नहीं कर देगा...? वगैरह वगैरह...

ये सब सवाल उसे विचलित तो कर रहे थे पर क्योंकि उसकी सच में फैंटेसी थी सुरभि को लोकेश के साथ देखने की इसलिए ये विचार उसे अजीब सी उत्तेजना से भी भर रहे थे. वो इन विचारों में खोया हुआ आगे बढ़ ही रहा था कि दरवाजे पर फिर से दस्तक हुई. वो तेज़ी से दरवाज़ा खोलने के लिए आगे बढ़ा.

दरवाज़े पर पहुँच कर विजय ने एक बार पीछे मुड़कर सुरभि को देखा और फिर एक ग़हरी साँस लेते हुए दरवाज़ा खोल दिया. सामने लोकेश मुँह फुलाए खड़ा था.

“ये क्या है यार... कब से दरवाज़ा खड़का रहा हूँ... खोल क्यों नहीं रहे थे?”

“त-तुम यहाँ क्या करने आए हो, लोकेश?” विजय ने डरते डरते कहा.

“सब कुछ जानते हुए भी तुम ये बेतुका सवाल क्यों पूछ रहे हो, विजय?”

“म-मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो.” विजय ने अनजान बनने की कोशिश की.

“तुम्हें सच में नहीं पता कि मैं यहाँ क्या करने आया हूँ?” उसने अपनी पैंट के ऊपर से ही अपने मूसल को सहलाते हुए पूछा. उसकी पैंट में बना हुआ टैंट उसकी मंशा को साफ़ ज़ाहिर कर रहा था.

“मुझे कुछ नहीं पता… तुम क्या कहना चाह रहे हो,” विजय ने हकलाते हुए कहा.

लोकेश ने बड़ी ही बेशर्मी से अपने तने हुए लिंग को सहलाते हुए कहा, “तुम सच में नहीं जानते मैं क्या चाहता हूँ?”

“नहीं...”

“चल ठीक है बताता हूँ... तुम तो जानते ही हो मुझे. घुमा फिरा कर बात करने की आदत नहीं है मेरी. तो बात ये है यार कि तुम्हारी बीवी की एक बार ले चुका हूँ और दोबारा लेने के लिए तड़प रहा हूँ... बोल दोबारा मिलेगी क्या उसकी...”

विजय हैरान रह गया लोकेश की बात पर. अब बिलकुल साफ़ हो गया था कि लोकेश ने सब सुन लिया था. तभी तो बेख़ौफ़ ऐसी बातें कर रहा था.

“द-दोबारा...? ये तुम क्या बोल रहे हो लोकेश,” विजय ने अनजान बनते हुए कहा.

“हैरान मत हो यार... अब तुम ही बताओ कि मैं क्या करता… तुम अपने छोटे से औजार से अपनी बीवी को खुश नहीं कर पा रहे थे. तुम्हारा दोस्त होने के नाते मैंने मोर्चा संभाल लिया और उसे अपने बड़े औजार का सुख दे दिया.”

एक तरह से तो लोकेश विजय की बेइज़्ज़ती कर रहा था पर विजय ने उसे कुछ भी नहीं कहा. उसके मन में तो ये सोच कर गुदगुदी हो रही थी कि लोकेश और सुरभि को साथ में देखने से उसे कितना मज़ा आएगा. कब से छुपाए तो वो इस फैंटसी को अपने दिल में. ये फैंटसी अब पूरी होने के करीब थी. इसलिए वो चुपचाप लोकेश की बात सुनता रहा.

“मैंने ठीक किया ना तुम्हारी बीवी को सुख देकर...”

“हाँ हाँ ठीक किया...” विजय ने कहा.

"अच्छा… एक बात बताओ, तुम्हें पता था ना कि मैं तुम्हारे मुंबई जाने के बाद तुम्हारी सुंदर पत्नी के साथ क्या करूँगा? तुम्हें सब पता था कि मैं तुम्हारी अप्सरा जैसी सुंदर बीवी की ले लूँगा. और तुम्हें ये भी पता था कि तुम्हारी असंतुष्ट पत्नी भी मेरे बड़े औजार को ख़ुशी ख़ुशी ले लेगी... तुम्हें पता था ना कि वो मेरे जैसे मर्द का लेने के लिए तुम्हें धोखा दे देगी. जानते थे ना तुम विजय? मुझे सब मालूम है कि तुम पहले से ही सब कुछ अच्छी तरह से जानते थे और फिर भी तुम चले गए अपनी बीवी को मेरे लिए यहाँ अकेला छोड़ कर. कितने कमीने हो तुम...”

विजय शर्म से भर उठा ये सब सुनकर. फिर भी वो हिम्मत जुटा कर बोला, "तुम हमारी बातें सुन रहे थे...?"

"हाँ मैं सब कुछ सुन रहा था. मैं सब समझ गया हूँ. तुम्हें जरा भी ऐतराज नहीं है इस बात से कि मैंने तुम्हारी बीवी की मार ली. अब जब सब खुल ही गया है तो बोलो कैसे आगे बढ़ा जाए...”

“मैं मैं क्या बोलूं...”

“अबे बता ना... शर्मा मत... बता कि क्या मुझे तुम्हारे सामने तुम्हारी बीवी की लेनी चाहिए?"

लोकेश की बात सुनते ही विजय के तन बदन में आग सी लग गई. उसका मन हुआ कि वो तुरंत हाँ बोल दे लोकेश को और देखे कि वो कैसे संभोग करेगा उसकी सुंदर बीवी के साथ. लेकिन उसे लग रहा था कि सुरभि इसके लिए राजी नहीं होगी. इसलिए वो चुप रहा.

“क्या सोच रहा है... बोल ना... करूँ क्या ठुखाई तेरी बीवी की तेरे सामने...”

"म-मुझे उससे बात करनी पड़ेगी. मुझे नहीं लगता कि वह मानेगी...”

“अरे उसकी ले तो चुका ही हूँ मैं... उसे क्या दिक्कत होगी...”

“ये सब इतना आसान नहीं है लोकेश... वो मेरे सामने शर्म महसूस करेगी..."
 
"उसकी छोडो, तुम बताओ? तुम क्या सोचते हो? क्या तुम्हें भी शर्म आएगी अगर मैं तुम्हारे सामने उसकी अधूरी जरूरतों को पूरा करूँ..." लोकेश ने विजय के कंधे पर हाथ रखते हुए उसकी आँखों में देखते हुए पूछा.

"थोड़ा अजीब तो लगेगा ही...”

“बिल्कुल...वो तो जाहिर सी बात है... अगर किसी की बीवी उसी के सामने किसी और के साथ हमबिस्तर होगी तो उसे अजीब तो लगेगा ही," लोकेश ने हँसते हुए कहा. उसकी हंसी में शैतानियत छुपी थी. “पर तुम्हें मजा भी तो आएगा ये देख कर. बोलो सच कह रहा हूँ ना...”

विजय ने सहमती में सर हिला दिया.

"एक बात कहूँ…”

“हाँ कहो...”

“तुम सुरभि के लायक नहीं हो विजय. उसे एक असली मर्द की जरूरत है. तुम्हारे साथ शादी करके उसने गलती कर ली है. तुम अपने मूंगफली जैसे औजार से उसे कभी खुश नहीं कर पाओगे... पर तुम चिंता मत करो. मैं हूँ ना. तुम्हें इस बात से बुरा महसूस करने की ज़रूरत नहीं है. बल्कि तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि कोई असली मर्द तुम्हारी पत्नी की अधूरी जरूरतों को पूरा कर रहा है…”

“मैं तुम्हें कुछ नहीं कह रहा, लोकेश...”

“यही तो तुम्हारी वो अदा है जिसके कारण मैं तुम्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता हूँ. तुम मेरी हर बात मानते हो. जो कहता हूँ कर देते हो. मुझे पूरा यकीन है कि जो आइडिया मुझे आ रहा है तुम उसमें मेरा पूरा सहयोग करोगे. बोलो करोगे ना?”

विजय एक पल के लिए झिझका और फिर बोला, "क्या आइडिया आ रहा है तुम्हें?"

"मेरे साथ नीचे आओ आराम से बताता हूँ,” लोकेश ने कहा और सीढ़ियों की ओर चलने लगा.

विजय भी एक दब्बू के जैसे उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ उतरते हुए नीचे आ गया. उसके मन में उधेड़बुन चल रही थी कि आख़िर लोकेश के मन में है क्या.

नीचे आकर लोकेश अपने कमरे में गया और एक मिनट के बाद एक मिनी स्कर्ट और टॉप हाथ में पकड़े हुए बाहर आया.

“सुरभि को ये कपडे पहनाओ और उसे यहाँ ड्रॉइंग रूम में ले आओ... मैं उसके साथ सोफ़े पर सेक्स करूँगा.”

"सोफे पर?" विजय ने हैरानी से पूछा.

“हाँ... इतना हैरान क्यों हो रहे हो? तुमने कभी उसकी सोफे पे नहीं ली क्या?”

“अभी तक तो नहीं...”

“कोई बात नहीं आज मुझे लेते देखना और बाद में ट्राई करना. अब ज्यादा देर मत करो और उसे ये कपडे पहना कर जल्दी नीचे ले आओ. उसकी टाइट पुस्सी को ठोकने के लिए मैं मरा जा रहा हूँ.”

विजय बुत बना हुआ खड़ा रहा.

“क्या सोच रहे हो... याद रखो... मैं इस घर का मेहमान हूँ... मेरी बात तुम्हें माननी ही पड़ेगी.”

विजय सब समझ रहा था कि लोकेश कैसे हर तरह के हथकंडे अपना रहा था अपनी बात मनवाने के लिए. विजय भी उसकी बात मानने को लगभग राजी थी. पर उसे ये लग रहा था कि शायद सुरभि इसके लिए राजी नहीं होगी.

"उम्म... अगर वो इस बात से सहमत नहीं हुई तो…? वो क्या है ना, सुरभि इस तरह के कपड़े नहीं पहनती..." विजय ने कहा.

यह सच था. लोकेश ने जो मिनी स्कर्ट पकड़ रखी थी, वह बहुत छोटी थी. पोर्न फिल्मों में इस तरह की चीजें सिर्फ पोर्न स्टार ही पहनती हैं. विजय के लिए सुरभि को ऐसे कपडे पहनने के लिए राजी करना आसान नहीं था. इसलिए वो ऐसी बात बोल रहा था.

"इस बात से मेरा कोई लेना देना नहीं है…उसे ये कपड़े कैसे पहनाने हैं, ये तुम जानो. और वैसे भी मैं ये सब तुम दोनो के लिए ही तो कर रहा हूँ. मैंने तुम दोनो की सारी बातें सुन ली हैं. तुम्हीं तो अपनी शादीशुदा ज़िंदगी में नया रंग भरना चाहते थे. और तुम्हें भी इस सब में मज़ा आ रहा है…तो अब आनाकानी क्यों कर रहे हो. ज़िंदगी तुम्हें एक मौक़ा दे रही है अपनी सेक्स लाइफ़ रंगीन करने का तो इस मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाओ. ये लो कपड़े और उसे जल्दी से ये पहना के यहाँ नीचे ले आओ… मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा.”

विजय ने कपड़े लिए लोकेश के हाथ से और बोला, “ठीक है… मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूँ.”

“कोशिश नहीं... तुम्हें उसे नीचे लाना है इन कपड़ो में...”

"ओ-ओके...मैं लाता हूँ उसे किसी तरह से मनाकर,” विजय ने कहा और कपड़े हाथ में पकड़ कर सीढ़ियों की तरफ़ चल पड़ा.
 
बेड के हेडबोर्ड के पास बैठी सुरभि उत्सुकता से दरवाजे की ओर देख रही थी. विजय को दरवाजे से बाहर निकले पंद्रह मिनट हो चुके थे. उसे कुछ पता नहीं था कि उसके और लोकेश के बीच में क्या हो रहा था. वो अपनी साँसे थामे दरवाजे को देख रही थी एक तक.

अचानक बाहर क़दमों की आहट हुई. सुरभि के दिल से आवाज आई कि शायद लोकेश अंदर आ रहा है. उसकी योनी मचल उठी इस ख्याल से और हल्का सा पानी भी छोड़ गई.

दरवाजा खुला और विजय अंदर दाखिल हुआ. अंदर आते ही उसने कुण्डी लगा ली. विजय को देख कर सुरभि को हलकी सी निराशा हुई. वो तो लोकेश को देखने की उम्मीद कर रही थी.

"क्या हुआ?" सुरभि ने पूछा.

"उसने हमारी पूरी बातचीत सुन ली सुरभि..." विजय ने सुरभि के पास आते हुए कहा.

“ओह… मुझे लग ही रहा था कि वो हमारी सारी बातें सुन चुका होगा. वो आखिर यहाँ कर क्या रहा था.”

तभी सुरभि का ध्यान उन कपड़ो पर गया जो विजय ने हाथ में पकड़े हुए थे.

“ये तुम्हारे हाथ में क्या है विजय?” सुरभि ने पूछा.

"यह एक मिनी स्कर्ट और टॉप है..."

"मिनी स्कर्ट और टॉप?"

"हाँ ... वो तुम्हें इन कपड़ों में नीचे बुला रहा है. इस ड्रेस में तुम्हें देखना चाहता है वो," विजय ने उसकी ओर कपड़े बढ़ाते हुए कहा.

सुरभि ने कपड़े पकड़ लिए और उनको उलट पलट कर देखने लगी. शॉर्ट लेंथ स्कर्ट और लो नेक टॉप का जोड़ा था. बहुत ही भड़काऊ क़िस्म के कपड़े थे वो. जैसे कि उन्हें शरीर ढकने के लिए नहीं बल्कि अंग प्रदर्शन के लिए डिज़ाइन किया गया हो. जब उसने उन कपड़ों में खुद की कल्पना की तो उसका चेहरा शर्म के मारे लाल हो गया.

"मैं उसके सामने ये कपड़े नहीं पहन सकती, विजय” ,सुरभि ने कहा.

"क्यों? अभी कुछ देर पहले तो तुम उसके सामने बिना कपड़ों के ही थी…बोलो थी ना?”

"हाँ...ये तो है लेकिन..."

विजय बिस्तर के किनारे पर बैठ गया और उसके बाएं उभार को सहलाते हुए बोला, "पर वर छोड़ो…इन कपड़ों में तुम बहुत खूबसूरत लगोगी.”

"तुम ये क्या कह रहे हो, विजय? क्या तुम्हें इस बात में भी मज़ा आ रहा है?” सुरभि ने मुस्कुराते हुए पूछा.

"हाँ...इसमें अजीब क्या है. हम पहले से ही कुछ ऐसा करने के बारे में बात कर रहे थे, हैं ना? यही मौका है अपनी फैंटेसी जीने का. और हाँ…तुम्हें इन कपड़ों में देखकर और भी मज़ा आएगा.”

"मैं नहीं पहनने वाली इतने छोटे-छोटे कपड़े," उसने अपने निचले होंठ को चबाते हुए कहा.

"अरे बेबी छोड़ो ना… क्या तुम हॉट और सेक्सी नहीं दिखना चाहती...?"

विजय ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं उसके सामने ऐसे कपड़े कैसे पहन सकती हूँ विजय... समझने की कोशिश करो?"

"इसमें समझने या समझाने जैसा कुछ भी नहीं है बेबी. भगवान ने तुम्हें इतना सुंदर शरीर दिया है, उसको दिखाने में क्या जिझकना. मैं तो तुम्हें कहूँगा कि थोड़ी बोल्ड बनो और पहन लो ये ड्रेस. वैसे तो वो तुम्हें बिना कपड़ों के देख ही चुका है. तो फिर उस से शर्मना कैसा. मुझे पक्का यक़ीन है कि इस ड्रेस में तुम उसके पसीने छुड़ा दोगी.”

सुरभि ने ड्रेस को देखा एक बार फिर. “यार ये ड्रेस हद से ज्यादा छोटी है...”

“मैं फिर वही कहूँगा... जब उसने तुम्हें पहले ही नंगा देख लिया है और तुम्हारे साथ सेक्स भी कर लिया है तो मुझे नहीं लगता कि ये कोई बड़ी बात है. तुम ये ड्रेस पहन के आराम से नीचे जा सकती हो.”

“पर मैं ये ड्रेस पहन कर नीचे क्यों जाऊं...”

“क्योंकि वो ऐसा चाहता है... अल्फा है वो... अपनी बात मनवा कर ही रहता है...”

“वो तो है पर...”

“पहन लो ना क्यों नखरे कर रही हो...”

“तुम यहीं रहोगे या मेरे साथ आओगे?" सुरभि ने पूछा. ये सवाल करते हुए उसकी नज़रें झुकी हुई थी.

" उसने मुझे तुम्हें नीचे लाने के लिए कहा है... इसलिए मैं साथ ही रहूँगा तुम्हारे..."

सुरभि ने असहमति में गर्दन हिलाई. “मैं इन कपडे में तुम्हारे साथ उसके सामने नहीं जाने वाली.”

“क्यों क्या दिक्कत है?”

“दिक्कत ही दिक्कत है... तुम मेरे पति हो... इन कपड़ों में मैं गैर मर्द के सामने कैसे जा सकती हूँ.”

“ये मत भूलो कि हम ये सब अपनी सेक्स लाइफ को और रोमांचक और रंगीन बनाने के लिए कर रहे हैं. और जब मुझे कोई दिक्कत नहीं है तो तुम क्यों झिझक रही हो...?”

"ये तुम्हारा ही आइडिया था क्या?"

"नहीं ... मेरा ऐसा कोई विचार नहीं था. ये तो लोकेश का ही आइडिया था. लेकिन मुझे लगता है कि हम दोनों को इसमें मजा आएगा. चलो ...अब जल्दी से ये कपड़े पहन लो..."

“एक बात पूछूं?”

“हाँ पूछो...”

"जब मैं तुम्हारे सामने इन कपड़ों में लोकेश के सामने जाऊंगी तो तुम्हें बुरा नहीं लगेगा?”

“अरे मुझे मजा आएगा... बुरा बिलकुल नहीं लगेगा...”

“जरा सा भी नहीं?”

“थोडा सा तो लगेगा... तुम आखिर मेरी बीवी हो... पर मैं इस बात से खुश हूँ कि मेरी फैंटसी पूरी हो जाएगी आज...”

"पर विजय, मैंने ऐसे कपड़े कभी नहीं पहने..."

"कोशिश करो... एक बार पहन लोगी तो तुम्हारी झिझक अपने आप गायब हो जाएगी..."
 
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