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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

“क … क्या?” अचानक कामिनी मेरे आगोश से छिटक कर दूर हो गई जैसे उसे 370 डिग्री का बिजली का झटका सा लगा हो।

“क … क्या हुआ?”

“ना बाबा ना … मैं तो मल जाऊंगी …”

“अरे नहीं मेरी जान ऐसे कोई नहीं मरता।”

“ना … बा … ना इसमें बहुत दल्द होता है.” कामिनी ने घबराए अंदाज़ में कहा।

“तुम्हें कैसे पता कि इसमें करने से दर्द होता है?”

“वो … वो त … क … तालू … भ …”

“क्या … मतलब … कौन तालू?”

“तमलेश भैया … ” (कमलेश-कामिनी का बड़ा भाई)

“ओह … क्या किया कहीं … ठ … ठोक तो नहीं दिया? उस मादर … ” मेरे मुंह से गाली निकलते-निकलते बची।

मैं इतना जोर से बोला था कि कामिनी तो एक बार सकपका सी गई उसके मुंह से तो आवाज ही नहीं निकल पा रही थी।

“बताओ ना … क्या किया उसने?”

“वो … बबली भाभी …” कामिनी ने डरते-डरते बताने की कोशिश की।

“अब बीच में ये भाभी कहाँ से आ गई?”

“भैया ने अपनी सुहागलात में … बबली भाभी … ” कहकर कामिनी एक बार फिर चुप हो गई। मेरी उलझन और असमंजस बढ़ता ही जा रहा था।

“हाँ … क्या किया कालू ने … तुम्हारे साथ?”

“मेले साथ नहीं …”

“तो?”

“वो भाभी के साथ पीछे से किया था”

“ओह … फिर?”

“तो भाभी को बहुत दल्द हुआ था वो तो जोल-जोल से रोने लगी थी। बहुत देल बाद उनका दल्द ठीक हुआ था।”

“पर सुहागरात तो पति-पत्नी मनाते हैं तुम्हें यह सब कैसे पता? क्या तुम्हारी भाभी ने बताया?”

“नहीं हमने छुपकल उनकी सुहागलात देखी थी।”

“हमने मतलब? तो क्या तुम्हारे साथ किसी और ने भी उनकी सुहागरात देखी थी?”

“हओ … ”

“और कौन था?”

“मेले साथ अ.. अंगूल दीदी भी थी हम दोनों ने देखी थी।”

“हम” मैंने एक लम्बी राहत की सांस ली। मुझे तो लगा था साले उस कालू ने कहीं कामिनी को ही तो नहीं ठोक दिया था। शुक्र है ऐसा कुछ नहीं हुआ था। मेरी उत्सुकता बढती ही जा रही थी।

सुहागरात में ही अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन की नौबत कैसे आ गई? समझ से परे था। सुहागरात में तो चूत ही बड़ी मिन्नतों के बाद मिलती है यहाँ तो उसने पहली ही रात में कैसेट को दोनों तरफ से बजा लिया था, भई … यह तो सरासर कमाल है।
 
“कामिनी प्लीज … पूरी बात विस्तार से बताओ ना? ऐसी क्या बात हो गई थी कि कालू ने पहली ही रात में अपनी पत्नी के साथ गुदा मैथुन करके उसके नितम्बों का मज़ा ले लिया?”

“वो … वो … मुझे शल्म आती है?” कामिनी अब थोड़ी संयत तो हो चुकी थी। पर उसकी शर्म वाली आदत मुझे इस समय वाकई अच्छी नहीं लग रही थी।

“यार इसमें शर्म की क्या बात है? प्लीज बताओ ना? तुम्हें मेरी कसम?”

और फिर कामिनी ने जो बताया वह मैं उसी की जबानी आप सभी को बता रहा हूँ …

प्रिय पाठको और पाठिकाओ! मैं माफ़ी चाहता हूँ आपको लग रहा होगा यह कथानक अपने मूल विषय से भटक रहा है और थोड़ा लंबा भी होते जा रहा है पर मुझे पूरा यकीन है इस देशी सुहागरात का किस्सा सुन और पढ़कर आप सभी मस्ती से झूम उठेंगे और आपको इसकी प्रासंगिकता का अंदाज़ा भी हो जाएगा। हालांकि यह किस्सा कामिनी की जबानी है पर इसमें तोतली भाषा के स्थान पर साधारण शब्दों का प्रयोग किया गया है।

अथ श्री एक देशी सुहागरात सोपान प्रारंभ:

कमलेश भैया (घर का नाम कालू) की शादी नवम्बर माह में थी। गुलाबी सी ठण्ड थी। शादी बहुत अच्छे ढंग से हो गई थी और आज उनकी सुहागरात थी।

मैंने और अंगूर दीदी ने भाभी को खूब सजाया था। उनके जूड़े और बाजुओं पर मोगरे के गज़रे भी लगा दिए थे। नाक में नथ, कानों में सुन्दर झुमके, कलाइयों में कोहनियों तक लाल रंग की चूड़ियाँ, पैरों में पायल और अँगुलियों में बिछिया।

हाथों में मेहंदी और पैरों में महावर तो पहले से लगी थी हमने उनका खूब मेकअप भी किया था।

अंगूर दीदी ने उन्हें यह भी समझा दिया था कि हमारे भैया को ज्यादा तरसाना मत जल्दी से अपना खजाना उन्हें सौम्प देना वरना वो फिर सारी रात तुम्हारी हालत बिगाड़ देंगे।

भाभी लंबा घूंघट निकाल कर बैड पर बैठ गई थी। हमने कमरे में ट्यूब लाइट जला कर रोशनी कर दी थी। बैड के पास रखी छोटी टेबल पर एक थर्मोस में केशर और शिलाजीत मिला गर्म दूध, पानी की बोतल और मिठाइयां और पान की दो गिलोरी का इंतजाम करके रख दिया था।

अंगूर दीदी ने क्रीम की एक शीशी भी टेबल पर रख दी थी। लगता है अंगूर दीदी सुहागरात की पूरी एक्सपर्ट (विशेषज्ञ) बनी हुई थी।

हमने सुहागरात का कमरा (छत पर बना चौबारा) भी थोड़ा सजा दिया था। बैड पर नई सफ़ेद चादर बिछा दी थी और उस पर गुलाब की पत्तियाँ भी बिखेर दी थी।

मैंने गौर किया अंगूर दीदी वैसे तो हमेशा खिसियाई सी ही रहती है पर आज तो वह बहुत ही खुश नज़र आ रही थी। उन्होंने आज गहरे सुनहरी रंग का लाचा (भारी लहंगा, छोटी कुर्ती और चुन्नी वाला एक परिधान) पहन रखा था। कलाई में सोनाटा की घड़ी, हाथ में बढ़िया मोबाइल और ऊंची एड़ी की सैंडिल और कंधे पर लेडीज पर्श। इन कपड़ों में तो वह दुल्हन सी लग रही थी।

ऐसे ही कपड़े पहनने का मेरा भी कितना मन होता है आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं। मैंने तो मौसी और माँ-बाप दोनों के यहाँ अभाव ही देखे हैं। काश! मेरी शादी किसी अच्छे घर में हो जाए तो मैं भी अपनी इन दमित इच्छाओं को पूरा कर लूं।

ओह … मैं भी कई बार क्या-क्या ख्वाब देखने लग जाती हूँ।

बाहर जब भैया के कदमों की आहट सुनाई दी तो मैं और अंगूर दीदी सुहागरात वाले कमरे के दरवाजे पर आकर खड़े हो गई।

भैया ने बिना कुछ बोले हमें पांच सौ रुपये बाड़-रुकाई (एक रस्म का शगुन) के दिए तो हम लोगों ने उन्हें अन्दर जाने दिया।

भैया ने कुर्ता पाजामा पहना हुआ था और हाथ की कलाई पर एक गज़रा भी बांधा हुआ था। वे जल्दी से कमरे में घुस गए और अन्दर से दरवाजे की सिटकनी (कुण्डी) लगा ली।

अब वो दोनों आजाद पंक्षी थे बिना किसी खटके और डर के हुड़दंग मचा सकते थे। मैं नीचे जाने के लिए सीढ़ियों की ओर जाने लगी तो अंगूर दीदी ने मुझे इशारे से रुकने के लिए कहा। उसने सीढ़ियों पर लगे दरवाजे को अन्दर से बंद करके सांकल (कुण्डी) लगा दी और फिर मेरा हाथ पकड़कर चौबारे के पिछली ओर बनी खिड़की के पास ले आई।

उन्होंने अपनी एक अंगुली होंठों पर रखकर मुझे खामोश रहने का इशारा किया। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अब वह खिड़की से कमरे के अन्दर झांकने लगी। यह कमरा पुराना बना हुआ था और खिड़की के दरवाजों के बीच में थोड़ा गैप सा था जिसकी झिर्री से अन्दर का नजारा देखा जा सकता था। बाहर तो घुप्प अन्धेरा था पर अन्दर पूरी रोशनी थी।

फिर अंगूर दीदी ने मुझे भी अन्दर देखने का इशारा किया। मैंने डरते-डरते पहले तो इधर उधर देखा और फिर खिड़की दरवाजों के बीच की झिर्री से अन्दर देखने की कोशिश की।

भाभी बैड के एक कोने में बैठी हुई थी। उसने अपना घूंघट दोनों हाथों से कसकर पकड़ रखा था। भैया उसके पास आकर बैठ गए और अपना हाथ बढ़ाकर उसका घूंघट उठाने की कोशिश करने लगे। पर भाभी ने अपना घूंघट नहीं उठाने दिया अलबत्ता उन्होंने अपना घूंघट और जोर से कस लिया।

दो-तीन कोशिशों के बाद जब बात नहीं बनी तो भैया ने उसके पैरों की पिंडलियों पर हाथ फिरना चालू कर दिया। अब भाभी ने एक हाथ से उनको परे हटाने की कोशिश की। फिर भैया ने दूसरे हाथ से घूंघट को थोड़ा सा हटाया तो भाभी के पीछे हटते हुए मुंह से मना करने के अंदाज़ में ऊं … ऊं … की आवाज निकली और उन्होंने अपनी कोहनी को ऊंचा करते हुए भैया का हाथ परे हटा दिया।

मेरी कुछ समझ नहीं आया कि ये लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? सुहागरात के बारे में मैंने ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा बहुत सुना जरूर था कि इस रात को पति पत्नी पहली बार मिलते हैं और फिर पति अपनी पत्नी को कुछ गिफ्ट देकर उसका घूंघट उठता है और फिर दोनों आपस में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं।

पर यहाँ तो मामला कुछ और ही लग रहा है। भाभी तो मरखने सांड की तरह भैया को हाथ ही नहीं लगाने दे रही।

फिर मैंने अंगूर दीदी से पूछने की कोशिश की। अंगूर दीदी ने मुझे फिर चुप रहकर देखने का इशारा किया और वह फिर से अन्दर झांकने लगी। अब मैंने भी फिर से अन्दर देखना शुरू कर दिया।

“हम्म … अच्छा तो यह बात है?” कहकर भैया ने अपने कुरते की जेब से बटुआ निकाला और उसमें से पांच सौ के दो नोट निकाल कर भाभी की ओर बढ़ाए।

भाभी ने पहले तो घूंघट के अन्दर से ही नोटों की ओर देखा और फिर वही ऊं … की आवाज निकाली।
 
फिर भैया ने वो पांच सौ वाले नोट वापस रख कर दो हज़ार का एक नोट निकाल कर भाभी की ओर बढ़ाया तो नोट पकड़ लिया और तकिये के पास रखे अपने लेडीज पर्स में रख लिया। अब भैया उसके पास आ गए और उसका घूंघट धीरे-धीरे खोलने लगे।

भाभी थोड़ा शर्मा रही थी।

“यार बबिता जानू! तु तो आज बड़ी मस्त लगेली है?” कह कर भैया ने भाभी के गालों पर हाथ फिराने की कोशिश की तो भाभी थोड़ा सा पीछे हट गई।

आपको भैया की बोली सुनकर हैरानी हो रही होगी। दरअसल 2-3 साल पुरानी बात है एकबार कमलेश भैया ने मोहल्ले के कुछ लड़कों के साथ मिलकर किसी के साथ मार-कुटाई कर दी थी और फिर पापा के डर के कारण वह मुंबई भाग गया था और फिर वहीं किसी अस्पताल में नौकरी कर ली और अब वहीं की भाषा बोलने लग गए।

“देख जानी, अपुन को पेली (पहली) रात में कोई लफड़ा नई माँगता। अब तो तेरे को मूँ दिखाई भी दे दियेला है। अब जास्ती नाटक नई करने का … क्या?”

और फिर भैया ने उसके गालों पर हाथ फिराया और फिर उसके मोटे-मोटे दुद्दुओं (सॉरी बोबे) को दबाने लगे।

अब भाभी ने ज्यादा नखरे नहीं किये। फिर भैया ने हाथ बढ़ा कर टेबल पर रखी मिठाई के डिब्बे से बर्फी का एक टुकड़ा उठाया और भाभी के मुंह की ओर बढ़ाया।

“देख बे चिकनी! इसे पूरा मत खा जाना। इसी तरह मुंह में दबा के इच रखने का। अपुन बी तेरे साथ खाएंगा।”

भाभी ने अपने होंठों और दांतों के बीच बर्फी का टुकड़ा दबा लिया और भैया ने अपना मुंह उसके होंठों में दबी बर्फी पर लगा कर पहले तो आधा टुकड़ा अपने मुंह में डाला और बाद में भाभी के होंठों को अपने होंठों में दबा लिया।

भाभी तो गूं … गूं करती ही रह गई।

“जिओ मेरे राजा भैया! वाह … क्या शुरुआत की है.” अचानक अंगूर दीदी की धीमी पर रोमांच भरी आवाज सुनकर मैं चौंकी।

अब तो भैया ने भाभी को अपनी बांहों में भर लिया और एक हाथ उसके सिर के पीछे करके उसके होंठों, गालों और गले पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। दूसरे हाथ से उसके बोबे दबाने लगे। भाभी थोड़ा कसमसा जरूर रही थी पर लगता है उसे भी मज़ा आ रहा था।

फिर भैया ने पहले तो अपना हाथ उसके नितम्बों पर फिराया और फिर उसकी साड़ी को ऊपर उठाने की कोशिश करने लगे।

“ऊँहू … किच्च … ” भाभी ने उनका हाथ पकड़ कर रोकने की कोशिश की।

“देख जानी! तेरे को मूँ दिखाई तो पेले इच दे दी है अब नखरे काये को?”

“इसकी मुंह दिखाई कहाँ दी है?” भाभी ने नीचे की ओर इशारा करते हुए कहा।

“ओह … चल कोई बात नहीं तू भी क्या याद रखेगी?” कहकर भैया ने जेब से पांच सौ का एक नोट निकाल कर भाभी के ओर बढाया।

“किच्च …” भाभी ने ना में सिर हिलाते हुए मुंह से आवाज निकाली।

“अच्छा … एक काम कर! में (मैं) नोट फर्श पर रखेला हे लेकिन इनको अपने हाथ से नई उठाने का?” भैया ने अपने बटुए से नोट निकालते हुए कहा।

भाभी ने आश्चर्य से भैया की ओर देखा तो भैया बोले “इनको तु अपनी चिकनी की फांकों से उठा सकती है तो उठा ले में (मैं) पांच सौ के नोट मोड़ कर आडे खड़े करके रखता है? तेरे पास बस पांच मिनट का टैम (टाइम) रहेंगा.”

फिर भैया ने कुछ नोट आधे मोड़कर (अंग्रेजी के उलटे V के आकार में) फर्श पर रख दिए।

“आप अपना मुंह उधर कर लो, मुझे शर्म आ रही है.” भाभी ने शर्माते हुए कहा।

“अपुन को ऐड़ा (बेवकूफ) समझा क्या? तुम चीटिंग किया तो?”

“किच्च”

“यार अब तेरे को नोट लेने का हो तो उठा ले नई तो कोई बात नहीं.”
 
भाभी असमंजस में थी पर मन में थोड़ा लालच भी था तो उन्होंने बेड से नीचे उतरकर पहले तो अपनी साड़ी को जाँघों तक ऊपर उठाया और फिर अन्दर दोनों हाथ डालकर अपनी पेंटी खींचकर बाहर निकाल कर बेड पर रख दी। भैया ने वह काली पेंटी झट से लपक ली और अपनी नाक से लगा कर सूंघने लगे।

“छी …” मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी भला किसी की पेंटी सूंघने में क्या मज़ा आता होगा?

मैंने अंगूर दीदी से पूछा तो वह फुसफुसाते हुए बोली- तुम भी निरी पूपड़ी ही है … जवान बीवी की पेंटी से उसकी जवानी की खुश्बू सूंघकर आदमी मतवाला हो जाता है और फिर वह दुगने जोश के साथ उसकी खूब चुदाई करता है।

मैं सोच रही थी अंगूर दीदी भी कितना गन्दा बोलने लगी है।

अब भाभी ने झिझकते हुए अपनी साड़ी को थोड़ा और ऊपर उठाया और फिर भैया से बोली- मुझे शर्म आ रही है … आप थोड़ा सा मुंह उधर कर लो मैं चीटिंग नहीं करुँगी.

“चल आज की रात तेरे को माफ़ किया … में मूँ फेरता है लेकिन चीटिंग नई करने का?”

फिर भैया ने अपनी मुंडी दूसरे तरफ कर ली और भाभी ने अपनी साड़ी को पेट तक ऊपर उठा लिया। मोटी-मोटी गदराई हुई जाँघों के ठीक बीच में उनकी बुर तो काले लम्बे झांटों से पूरी तरह ढकी हुई थी। बीच में थोड़ा काले और कत्थई से रंग का गहरा चीरा दिखाई दे रहा था और चीरे के बीच में सिकुड़ी हुई सी दो मोटी-मोटी पत्तियाँ (लीबिया)।

मुझे आश्चर्य हो रहा था भाभी ने अपनी झांटें क्यों नहीं काटी? शादी के समय तो दुल्हन अपने हाथों और पैरों के भी बाल हटवाती हैं तो भाभी ने ये बाल क्यों साफ़ नहीं करवाए।

मैंने इस बाबत अंगूर दीदी से पूछा तो उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ के रिवाज के अनुसार सगाई होने के बाद लड़कियां अपनी बुर के बाल नहीं काटती हैं और सुहागरात मनाने के बाद उनका पति दूसरे दिन उनकी बुर के बालों को अपने हाथों से साफ़ करता है। मान्यता है कि ऐसा करने से दोनों पति पत्नी का प्रेम बढ़ता है और दाम्पत्य जीवन लंबा और मधुर बनाता है।

“क्या आपके भी बाल जीजू ने ही साफ़ किये थे?” मैंने पूछा तो दीदी गुस्सा हो गई और बोली- चुप कर हरामजादी!

पता नहीं दीदी इतना गुस्सा क्यों हो रही थी?

हम दोनों फिर से अन्दर का नजारा देखने लगी।

भाभी धीरे-धीरे अपने भारी और मोटे नितम्बों को नीचे करने लगी और अपनी बुर की फांकों को अँगुलियों से चौड़ा किया। अन्दर से लाल चीरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी तरबूज की गिरी हो। फिर एक नोट को अपनी बुर की फांकों के बीच में करते हुए उठाने की कोशिश की पर नोट नीचे गिर गया।

भाभी पहले तो भैया की ओर देखा और चुपके से नोट को फिर से आड़ा खड़ा कर दिया। दूसरे प्रयास में उन्होंने एक नोट उठा लिया। अब भाभी दूसरा नोट उठाने में लगी थी।

इतने में भैया ने चुपके से मुड़कर भाभी की ओर देखना शुरू कर दिया। उनका पायजामा पेशाब करने वाली जगह से उभरा हुआ सा लग रहा था। और वह अपने लंड को पायजामे के ऊपर से ही जोर-जोर से दबा रहे थे और अपने होंठों पर जीभ फिरा रहे थे।

भाभी ने अब तक 3 नोट उठा लिए थे और चौथे नोट को उठाने में लगी थी।

“कोई चीटिंग तो नई किएला ना?”

अचानक भैया कि आवाज सुनकर और उन्हें अपनी ओर देखता पाकर भाभी हड़बड़ा सी गई और चौथा नोट नीचे गिर गया।

“चीटिंग आपने की है मैंने नहीं! आप इधर नहीं देखते तो मैं यह नोट भी उठा लेती.” भाभी ने कहकर उस नोट को भी उठा लिया और झट से खड़ी हो गई।

उनकी साड़ी और लहंगा नीचे आ गिरा।

अब भैया उनके पास आ गए और उनको बांहों में भरकर बैड पर ले आये। अब दोनों बैड पर बैठ गए।

“जान अब अपुन का दिल तेरी छमिया को प्यार करने का होने लगेला है। अब अपुन से रुका नई जाएंगा।”

कहकर भैया ने अपना कुर्ता और पायजामा उतार फेंका। उन्होंने जांघिया तो पहना ही नहीं था। उसका काले रंग का कोई 7-8 इंच का लंड फनफनाकर हिलने लगा। भैया ने उसे अपने हाथ में पकड़ लिया और उस पर हाथ फिराते हुए उसे हिलाने लगे। उसका सुपारा तो ट्यूब लाईट की रोशनी में ऐसे चमक रहा था जैसे किसी सांप का फन हो।

अंगूर दीदी के मुंह से अचानक निकला- वाह … मेरे राजा भैया क्या हथियार है! यह साली तो इसे पूरा का पूरा खाकर मस्त हो जायेगी.

मैंने आश्चर्य से दीदी की ओर देखा।

उनके गुलाबी रंगत वाले चहरे पर बहुत बड़ी ख़ुशी की लहर सी दौड़ने लगी थी। अंगूर दीदी सिसकारियाँ सी लेने लगी थी उनका एक हाथ लाचा के लहंगे के अन्दर था। मुझे लगा वह भी अपनी सु-सु को मसलने लगी हैं।

उधर भाभी बार-बार कनखियों से भैया के लंड को ही देखे जा रही थी। उनकी आँखों में ऐसी चमक सी आ गई थी जैसे किसी मोटे से चूहे को देखकर बिल्ली की आँखों में आ जाती है।

भैया अपने खड़े लंड को मसलते और हिलाते जा रहे थे। फिर अपने घुटनों के बल होकर भाभी की ओर सरक कर आ गए और बोले- क्यों है ना टनाटन?

भाभी ने नाक चढ़ाकर मुंह सा बनाया। अलबत्ता उनकी निगाहें तो लंड पर से हट ही नहीं रही थी।

“मेरी जान … ये देख कितना तड़फेला हे तेरी छमिया के लिए … इसे हाथ में लेके तो देख?”

भैया ने अपना लंड भाभी के मुंह के सामने कर दिया।

भाभी ने उसे हाथ में तो नहीं पकड़ा लेकिन वह बिना पलक झपकाए उसे देखती ही रही।

“साली अभी कितने नखरे दिखा रही है बाद में तो हाथ में तो क्या पूरा का पूरा अपनी गांड में भी ले लेगी.” अंगूर दीदी ने आह भरते हुए बोली- आह … कितना शानदार लंड है। हाय … इतना लंबा और मोटा तो प्रेम का था।

“कौन प्रेम?” मैंने आश्चर्य से दीदी की ओर देखते हुए पूछा।

“चुप कर हरामजादी … कब से बेकार पटर-पटर किये जा रही है।” अंगूर दीदी ने मुझे जोर से डांट दिया।

मैं अपना सा मुंह लेकर रह गई।
 
और फिर भैया ने भाभी की साड़ी उतारनी शुरू कर दी। भाभी ने ज्यादा ना-नुकुर नहीं की। फिर उन्होंने उनका ब्लाउज भी उतार दिया अब तो भाभी के शरीर पर सिर्फ पेटीकोट और काले रंग की ब्रा ही बचे थे।

भैया ने ब्रा के भी हुक खोल कर दोनों उरोजों को आजाद कर दिया। छोटे नारियल जैसी साइज के थोड़े लम्बूतरे से मोटे-मोटे उरोजों के ऊपर काले से रंग का अरोला और बीच में जामुन जैसे चूचुक। उरोजों का रंग शरीर के अन्य अंगों के बजाय थोड़ा गेहूंआ सा था।

अब भैया ने उसका पेटीकोट उतारने की कोशिश की तो भाभी बोली- ना … इसे मत उतारो मुझे शर्म आती है पहले लाईट बंद करो.

“हट साली! अपुन को ऐड़ा समझा क्या? आज की रात कोई शर्म नई करने का … क्या?”

“ओह … पर धीरे करना … इतना मोटा और लंबा इतने छोटे से छेद में कैसे जाएगा? मुझे बहुत डर लग रहा है।” भाभी शायद बहुत डर रही थी।

भैया ने अपने लंड को नीचे जड़ की तरफ से अपनी मुट्ठी में पकड़ रखा था और अभी भी उनका लंड 4-5 इंच उनकी अँगुलियों के बाहर तक निकला हुआ था और उसकी ऊपर गोल मोटा काले रंग का सुपारा नज़र आ रहा था ऐसा लगता था जैसे कोई काले रंग का मोटा सा बैंगन हो या खीरा।

कई बार मैंने लड़कों को पेशाब करते समय उनकी लुल्लियाँ देखी थी पर इतना बड़ा और मोटा लंड तो मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। मैंने एक दो बार मौसा और मौसी को चुदाई करते और लंड चूसते हुए भी देखा तो था पर उनका भी इतना बड़ा तो नहीं था।

मैंने अपनी कुछ सहेलियों से सुना जरूर था कि कुंवारी लड़कियां मोटे और लम्बे लंड की कामना करती रहती हैं।

“देखो साली कितने नाटक कर रही है? थोड़ी देर बाद देखना उछल-उछल कर चुदवाएगी.” अंगूर दीदी की आवाज सुनकर मैं चौंकी।

“अंगूर दीदी, सच में इतना मोटा इसकी सु-सु में चला जाएगा क्या?” मैंने डरते डरते पूछा।

मुझे लगा अंगूर दीदी मुझे फिर डांट देगी।

दीदी ने मेरी ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोली- अरे मेरी भोली बन्नो, तू इस चूत रानी की महिमा नहीं जानती। लंड चाहे जितना मोटा और लंबा हो अगर मस्ती में आ जाये तो ये गधे और बुलडॉग का भी घोंट जाती है।

अब भाभी बैड पर लेट गई। भैया उसके बगल में आ गए और उसके पेटीकोट को ऊपर कर दिया। फिर उन्होंने पहले तो उनकी मोटी-मोटी जाँघों पर हाथ फिराया और फिर उसकी बुर को सहलाने लगे।

भाभी आह … ऊंह … करने लगी थी।

“यार तू तो अख्खा आइटम लगेली है? बहुत मस्त है तेरी पूपड़ी (बुर) तो! अपुन को ऐसी इच मांगता था।”

अब भैया ने भाभी की बुर की फांकों को अपने हाथों की चिमटी में पकड़ कर खोल दिया। अन्दर ला रंग का चीरा अब साफ़ नज़र आने लगा था। भैया ने एक चुम्बन उस चीरे ऊपर लिया और फिर अपनी जीभ को अपने होंठों पर फिराने लगे।

छी … मुझे बड़ा अजीब सा लगा कोई सु-सु को कैसे चूम सकता है। मैंने डरते डरते अंगूर दीदी की ओर देखा।

वह तो अन्दर का नजारा देखने में इतनी मस्त हो रही थी कि उनके मुंह से सीत्कार सी निकलने लगी थी और उनका हाथ लहंगे के अन्दर जोर-जोर से चलने लगा था।

“चल अब एक बार पलट के बी दिखा तेरी गूपड़ी (पिछवाड़ा-गांड और नितम्ब) बड़ी मस्त लगेली है।”

भाभी डरते-डरते अपने पेट के बल हो गई। उनके मोटे-मोटे नितम्ब ट्यूब लाईट की दूधिया रोशनी में ऐसे लग रहे थे जैसे कोई दो मोटे-मोटे तरबूज एक साथ रख दिए हों। भैया ने उन पर बारी-बारी से एक-एक थप्पड़ लगाया और फिर उन पर एक चुम्बन ले लिया।

फिर उन्होंने उन दोनों नितम्बों को अपने हाथों से पहले तो दबाया और थोड़ा खोलकर उसके बीच का छेद देखने लगे।

और फिर उन्होंने उस छेद पर भी एक चुम्बन ले लिया।

“हट! क्या कर रहे हो?” कहकर भाभी अचानक पलट कर फिर से सीधी हो गई।

“यार कसम चमेली जान की तेरा पिछवाड़ा तो बड़ा इच मस्त है.” कहकर भैया हंस पड़े।

भाभी तो बेचारी शर्मा ही गई।

“हाय … मेरे राजा भैया! पीछे से भी ठोक दे साली को ताकि दो दिन ठीक से चल ही ना पाए.” अंगूर दीदी ने अपनी तरफ से नया गुरु मंत्र दिया हो जैसे।

अब भैया मेरी नयी नवेली भाभी की टांगों के बीच आ गए तो भाभी ने अपनी जांघें थोड़ी खोल दी।

भैया ने अपने पास पड़ी शीशी उठाई और उसमें से क्रीम निकालकर अपने हथियार पर लगाया। उनका लंड तो हाथ में ही उछलकूद मचा रहा था जैसे कोई अड़ियल घोड़ा हिनहिना रहा हो।

भाभी ने एकबार तसल्ली से उसकी ओर देखा और फिर अपने दोनों हाथ अपने चेहरे पर रख लिए। लगता है उम्हें शर्म आ रही थी।

“ए क्या बोलती … मैच शुरू करें क्या?”

“ऊं … ” भाभी के मुंह से हलकी सी आवाज आई- मुझे बहुत डर लग रहा है प्लीज धीरे करना!

“फिकर नई करने का अपुन इस मामले में पूरा एक्सपर्ट खिलाड़ी है।”

अब भैया ने थोड़ी सी क्रीम भाभी की बुर के चीरे और फांकों पर भी लगा दी और फिर एक हाथ के अंगूठे और तर्जनी अंगुली से उसकी फांकों को चौड़ा किया और फिर अपने खड़े लंड का सुपारा उसके छेद पर लगा दिया और भाभी के ऊपर आ गए।
 
उन्होंने अपने पैर भाभी की जाँघों के दोनों ओर करके कस से लिए और एक हाथ भाभी की गर्दन के नीचे लगा लिया। और फिर उन्होंने एक जोर का धक्का लगाया। उसके साथ ही भाभी की एक चीख पूरे कमरे में गूँज उठी- “ओ … माँ … मर गई … ओह धीरे … मेरी चूत फट जायेगी.

भाभी अपने पैर पटकने लगी थी और अपने हाथों से भैया को परे धकलने की कोशिश सी करने लगी थी। पर इन बातों का भैया पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने 2-3 धक्के और लगा दिए।

“वाह … जिओ मेरे राजा भैया क्या सटीक (परफेक्ट) निशाने के साथ सही एंट्री मारी है। साली के सारे कस बल निकाल दो आज।” अंगूर दीदी पता नहीं क्या बड़बड़ाते जा रही थी।

मेरी तो जैसे साँसें ही अटक सी गयी थी। मुझे लगा मेरे शरीर में भी कुछ सनसनी सी दौड़ने लगी है और मेरी सु-सु में भी सुरसराहट सी होने लगी है। मेरे कानों में सांय-सांय होने लगी थी और गला तो जैसे सूखने ही लगा था।

उधर भाभी कमरे के अन्दर अभी भी ‘आ … आई … मर गइईईई … ’ कर रही थी।

“बस मेरी छमिया अपना हीरो तेरे घर में चला गया है अब कोई ज्यास्ती फिकर की बात नहीं.” कहकर भैया ने उसके गालों और होंठों पर पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए।

“देखा ना साली किस तरह नाटक कर रही थी … दर्द होगा? बहुत बड़ा है? कैसे जाएगा? मेरी तो फट जायेगी?” इतनी देर बार अंगूर दीदी के मुंह से निकला।

हमें भाभी की बुर और उसमें धंसा लंड तो दिखाई नहीं दे रहा था पर मेरा अंदाज़ा है पूरा का पूरा लंड अन्दर गर्भाशय तक चला गया है। थोड़ी देर दोनों ऐसे ही पड़े रहे।

“ओह … बहुत दर्द हो रहा है … कोई इतना जोर से पहली बार डालता है क्या? तुम तो कहते थे बड़ा अनुभव है? मार ही डाला मुझे!” भाभी ने उलाहना सा दिया।

“मेरी बुलबुल पेली बार में थोड़ा दर्द तो होता इच है अब देखना तेरे को बी कित्ता मज़ा आयेंगा?” कहकर भैया ने दनादन धक्के लगाने शुरू कर दिए।

अब तो भाभी ने अपने दोनों हाथ भैया की पीठ पर कस लिए और अपने टांगें भी और ज्यादा फैला दी।

“बोल … मेरी चिकनी अब मज़ा आएला हे के नई?” भैया ने उसके होंठों को चूमते हए धक्के लगाने शुरू कर दिए।

“आह … साथ में बहुत दर्द भी हो रहा है … ” भाभी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी।

“साली छिनाल है एक नंबर की। पहले कितने नखरे कर रही थी अब देखो कैसे मज़े ले लेकर चुदवा रही है.” अंगूर दीदी अपनी धुन में अपनी सु-सु को सहलाती जा रही थी और साथ में धीमे-धीमे बड़बड़ाती भी जा रही थी।

मैंने ध्यान दिया भैया जब भी जोर का धक्का लगाते तो फिच्च की सी आवाज आती और उसके साथ ही भाभी की एक मीठी आह सी निकलती। थोड़ी देर इसी प्रकार धक्कमपेल करने के बाद भैया थोड़े से ऊपर उठ गए और अपने लंड को भाभी की चूत से बाहर निकालने लगे।

“क्या हुआ?” भाभी ने उनकी कमर पकड़ कर नितम्बों को अपने ओर दबाते हुए पूछा।

“एक मिनट रुक.” कहकर भैया ने अपना लंड बाहर निकाल लिया। भाभी तो उनको रोकती ही रह गई।

फिर उन्होंने अपने लंड की ओर गौर से देखा। लंड पर हल्का चिपचिपा सा लेप लगा था। अब उन्होंने भाभी की बुर की ओर ध्यान से देखा। भाभी ने अपनी बुर पर हाथ रख लिया शायद उन्हें शर्म आ रही थी।

“ओह क्या हुआ? रुक क्यों गए?” भाभी ने पूछा।

“अपुन एक बात सोचेला हे?”

“क … क्या?” भाभी ने घबराते हुए पूछा।

“ये साला तेरी चूत से खून तो निकला इच नहीं? क्या चक्कर पड़ेला … बाप?”

“म … मुझे क्या पता?” भाभी की तो जैसे हवा ही खराब हो गई थी। उनके चहरे पर जैसे हवाइयां सी उड़ने लगी थी।

“अपुन को ऐड़ा समझा क्या? जरूर कोई ना कोई लोचा होएंगा? सच्ची बोल पेले से सील टूटेली थी ना?”

भाभी उठकर बैठ गई। वह कुछ नहीं बोली और उन्होंने अपनी मुंडी झुका ली।

“अब चुप काएको होएली है जल्दी जवाब दे नई तो अपुन का भेजा सटक जायेंगा?” भैया ने थोड़ा कड़क लहजे में पूछा।

“मुझे माफ़ कर दो … गलती हो गई थी.” भाभी की आवाज ऐसे काँप सी रही थी जैसे अभी रोने लगेगी।

“साला अपुन पेले इच सोचेला था इतना कटीला आइटम अभी तक खालिश केसे रह गएला?”

“किसके साथ किएला था?”

“वो … वो … हमारे पड़ोस में?”

“कौन था?”

“मेरी एक सहेली के भाई ने एक बार मेरे साथ जबरदस्ती किया था तो सील टूर गई।” और फिर सच में भाभी की आँखों से आंसू निकलने लगे थे।

“एक बात और बता?”

भाभी ने प्रश्नवाचक निगाहों से भैया की ओर देखा।

“वो तेरा पिछवाड़े का गेम तो नई बजाया ना?”

“किच्च” भाभी ने कातर नज़रों से भैया की ओर देखा और फिर मरियल सी आवाज में बोली- सच्ची बोलती उसमें कभी नहीं करवाया।

“हम्म …”

“प्लीज मुझे माफ़ कर दो … मैं आपके पैर पकड़ती हूँ.” भाभी ने रोते-रोते फिर मिन्नत की।

“हम्म …” भैया कुछ सोचने लगे थे।

थोड़ी देर बाद भैया बोले- देख मेरी पपोटी … अब सील तो दुबारा जुड़ नई सकेला अब तो बस एक इच इलाज़ हो सकता है?

“क्या?” भाभी ने आशा भरी नज़रों से भैया की ओर देखा।

“देख अपुन अब तेरी गूपड़ी (पिछवाड़ा) की सील तोड़कर मन को तसल्ली दे लेंगा। बोल तेरे को मंजूर?”

“ओह … पर उसमें तो बहुत दर्द होता है?”

“अब दर्द होएंगा के नई होएंगा अपुन नई जानता, तेरे को शर्त मंजूर हो तो बोल नई तो तेरे को अभी इच तेरे बाप के घर भेज देंगा।”

“ओह …” कह कर भाभी कुछ सोचने लगी।

उनकी हालत तो इस प्रकार हो रही थी जैसे बिना आर.सी. के उनका भारी रकम का चालान काट दिया हो जिसकी भरपाई अब उनके लिए कतई संभव नहीं थी।

थोड़ी देर बाद भाभी के मुंह से मरियल सी आवाज निकली- ठीक है.

“अपुन का एक और शर्त है?”

“अ … और क … क्या?” भाभी ने सकपकाते हुए पूछा।

“वो प्रीति है ना? तुम्हारी छोटी बहन?”

“हओ?”

“अपुन का दिल उस पर आ गएला है। अपुन की शादी वाले दिन उसने गज़ब का डांस किएला था। कित्ता मस्त कमर और पिछवाड़ा है साली का। अपुन उसी दिन सोच लिएला था कि इसका बी एकबार गेम जरूर बजाने का।”

“पर वो इसके लिए कैसे मानेगी?”

“ये … इच तो अपुन बोलता है … उसको मनाने का जिम्मा तेरा!”

“वो … वो … ” भाभी कुछ बोल ही नहीं पा रही थी।

शायद वह सोच रही थी किसी तरह यह मामला हाल फिलहाल यहीं सुलझ जाए और घरवालों तक बात ना पहुंचे तो ठीक है।

“तू बोलेंगी तो वो नक्की मान जायेंगी.”

“ठीक है मैं कोशिश करुँगी.” कहकर भाभी ने फिर से अपना सिर झुका लिया। वह कुछ सोचे जा रही थी।

अब दीदी ने मेरी ओर देखकर फुसफुसाते हुए ग़मगीन लहजे में बोली- साली ने सारा मज़ा किरकिरा ही कर दिया। पता नहीं कहाँ-कहाँ ठुकवा कर आई है।

“दीदी एक बात पूछूं?” मैंने डरते डरते कहा।

“हाँ बोल?”

“पहली बार में सील टूटने पर सबको खून निकलता है क्या?”

“हाँ अगर शादी होने तक कुंवारी है तभी निकलता है। अगर सुहागरात को बिना खून खराबे (रक्तपात) के युद्ध समाप्त हो जाता है तो…. समझ लेना चाहिये कि ये देश पहले से ही आजाद हो चुका है।” कहकर अंगूर दीदी हंसने लगी।

मेरी प्रबल इच्छा हो रही थी अंगूर दीदी से उसकी सुहागरात के बारे में पूछूं पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

फिर मैंने डरते-डरते पूछा- दीदी, आपको तो पहली रात में बहुत खून निकला होगा?
 
“चुप! तू मार खाएगी अब!” कहकर दीदी फिर हंसने लगी थी और फिर एक आह सी भरते हुए उदास हो गई।

पता नहीं क्या बात थी।

अब हमने फिर से कमरे के अन्दर झाँका।

“चल मेरी रानी अब थोड़ा पलट जा … अपने पीओके का नजारा बी दिखा दे.”

“प्लीज मुझे बहुत डर लग रहा है … इसमें करने से बहुत दर्द होता है. आज-आज रहने दो इसमें कल कर लेना.” भाभी ने फिर मिन्नत की।

“ना … धारा 370 तो आज ही हटाने को माँगता.”

“ओह … मैं तो मर ही जाऊंगी. इसमें बहुत दर्द होता है.”

“देख … ग़ालिब चचा ने बी बोला हे गांड मरवाने से कोई नई मरता ग़ालिब, बस चलने का अंदाज़ बदल जाता है.”

“मैं वही तो बोल रही हूँ मेरे से तो दर्द के मारे चला ही नहीं जाएगा.”

“तेरे को कैसे मालूम कि इसमें बहुत दर्द होएंगा? बोल?”

“वो … वो.. हमारे पड़ोस में मेरी एक सहेली के पति ने एक बार उसके साथ पीछे से किया था.”

“तो? क्या वो मर गई थी?”

“उसने बताया कि उसे बहुत दर्द हुआ था और फिर 2-3 दिन उससे तो चला ही नहीं गया था।”

“वो कोई फत्तू (अनाड़ी) रहा होएंगा अपुन इस मामले में पूरा एक्सपर्ट है।”

“क … कैसे?”

“अपुन इधर था तब बी दो-तीन छोकरे लोग की गांड मारेला था और एक आंटी की बी पूपड़ी और गूपड़ी दोनों तसल्ली से बजाएला था और फिर मुंबई में बी एक चिकनी का आगे और पीछे से कई बार अपुन का गेम बजायेला है।”

“मुंबई में कौन थी?”

“वो हमारी चाल के पास में रेहती थी। वो रोज अपुन की ओर देखकर इशारे किया करती थी। एक दिन उसका बाथरूम का वाटर टैंक खराब था तो अपुन को ठीक करने को बुलाया था। जब टैंक ठीक हो गया तो उसने नल चलाकर चेक किया। गलती से शॉवर चालू हो गया तो मेरे और उस चिकनी के कपड़े भीग गए। फिर वो चिकनी बोली तेरे तो कपड़े भीग गए तू नहा ले। अपुन नहाने लगा तो अपुन का सिकंदर खड़ा हो गया। वो चिकनी उधर इच खड़ी होके अपुन को देखेली थी। वो बोली तेरा हथियार तो बहुत बड़ा लगता है रे, तेरी बीवी तो मस्त हो जायेंगी। ऐसा करके बोली और फिर उसने अपुन के सिकंदर को हाथ में पकड़ लिया.”

इतना कहकर भैया रुक गए। अब तो उनका सिकंदर जोर-जोर से उछलकूद मचाने लगा था।

“फिर क्या हुआ?” भाभी ने पूछा।

“अरे … होने को क्या था वहीं इच साली का गेम बजा डाला। बाप … क्या मस्त पूपड़ी थी अपुन को भोत मज़ा आया। उसने खुश होकर अपुन को पहनने को नए कपड़े दिए, एक हज़ार रुपया बी दिया और नाश्ता बी करवाया.”

“और … वो … पीछे से कब किया?”

“हा … हा … उसके बाद उस चिकनी को कई बार और बजाया। एक दिन अपुन उससे बोला तेरा पिछवाड़ा बड़ा मस्त लगेला है। अपना इसमें करने का मन होएला है तो वो बोली इसमें बड़ा दर्द होता है मेरे राजा तू आगे ही कर लिया कर। अपुन ने आगे करने से मना कर दिया तब वो चिकनी पीछे से करवाने को राजी हुई। उसने पेले तो उसने अपुन का जी भर के चूसा और फिर सिकंदर का खूब तेल मालिश किया और अपनी गूपड़ी (गांड) में बी क्रीम और तेल लगाया। फिर अपुन ने उसको मोरनी बना के उसका पिछवाड़ा बजाया। उसको पेले तो थोड़ा दर्द तो हुआ पर बाद में उसे बी बहोत मज़ा आया।”

“तो फिर उसी के पास रह जाते यहाँ क्यों आये?” भाभी थोड़ा नाराज़ सी होकर बोली।

“अरे मेरी जान फिर तू मेरे को केसे मिलती? सच में तू बहुत खूबसूरत है। पेली बार देखते इच अपुन का दिल तेरे पे आ गयेला था।”

भाभी गुमसुम हुई पता नहीं किन ख्यालों में डूबी थी। पर मैं जरूर यह सोच रही थी इस समाज में पुरुष और स्त्री के लिए अलग-अलग मानदंड क्यों बनाए हुए हैं? पुरुष अपनी मर्जी के अनुसार शादी से पहले और शादी के बाद भी किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकता है पर स्त्री अगर गलती से या अनजाने में भी किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना ले तो सारा दोष स्त्री पर ही क्यों आता है?

“ए स्याणी अब ज्यास्ती सोचने का नई जल्दी फेसला करने का … क्या?”

“ओह … पर आराम से तो करोगे ना? मुझे बड़ा डर लग रहा है.” भाभी ने सच में डरते हुए मिन्नत की।

“तेरे को बोला ना … अपुन इस मामले का एक्सपर्ट है … और आज तक कोई बी चूत और गांड मरवाने से नहीं मरा। में तेरे को प्रॉमिस देता आराम से करेगा बस …”

“वो … वो … क्रीम और तेल लगा लेना प्लीज …”

“फिकर नई करने का अपुन सब देख लेंगा … बस अब तू पलट जा.”

“वाह … जिओ मेरे राजा भैया … साली को बिना तेल लगाए ही पेल दे बड़े नखरे दिखा रही है.” अंगूर दीदी ने बड़ी देर के बाद चुप्पी तोड़ी।

सच में मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई अपनी पत्नी के साथ इस प्रकार पीछे से भी करता है क्या!

बचपन में लड़कों के बारे में तो जरूर सुना था कि लड़के आपस में कई बार एक दूसरे की गांड मार लेते हैं पर मेरे लिए पति-पत्नी द्वारा किया जाने वाला यह काम नितांत नया और विस्मित करने वाला था।

मेरा मन अंगूर दीदी से पूछने का हो रहा था कि कभी जीजू ने उनके साथ इस प्रकार किया है क्या? पर मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। मैंने बात नोटिस की है कि जब भी जीजू का जिक्र आता है अंगूर दीदी को बिलकुल अच्छा नहीं लगता और वह गुस्सा हो जाती है। पता नहीं क्यों?

अब भाभी बैड पर पेट के बल लेटी गई थी और भैया ने उनका पेटीकोट भी उतार दिया था। अब दोनों मादरजात नंगे थे। भैया उसके दोनों नितम्बों के बीच अपना हाथ फिराना चालू कर दिया। फिर उन्होंने क्रीम वाली शीशी का ढक्कन खोला और लगभग आधी शीशी क्रीम अपनी हथेली पर उंडेल ली। अब एक हाथ की अँगुलियों से उसके नितम्बों की खाई में क्रीम लगाने लगे।

“उईई … मुझे गुदगुदी हो रही है.” भाभी ने अपने नितम्ब भींचते हुए कहा।

शायद भैया ने गांड के छेद में अपनी अंगुली घुसा दी थी।

“उसमें बी तो क्रीम लगाने दे … नई तो फिर बोलेगी दर्द होयरेला है?”

भैया ने अपनी अंगुली पर फिर क्रीम लगाई और गांड के छेद पर लगाकर अपनी अंगुली को गोल-गोल घुमाने लगे। भाभी आह … ऊंह करती रही।

फिर उन्होंने अपनी अंगुली भाभी की गांड से निकाल ली और उसके नितम्बों को चौड़ा करके गौर से देखने लगे। शायद वह उसकी गांड का छेद देख रहे थे।

इतनी दूर से हमें भाभी की गांड का छेद तो नज़र नहीं आ रहा था पर भैया के चेहरे पर आई मुस्कान देखकर लगता है उन्हें वह छेद जरूर पसंद आ गया था।

“वाह … मेरी पपोटी क्या मस्त गांड है तेरी। चल अब मेरे शेर का गृहप्रवेश करवा देते हैं.”

भाभी ने बिना कुछ बोले घुटनों के बल होकर अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। भैया ने उसके नितम्बों को थोड़ा और खोल दिया। हालांकि इतनी दूर से गांड का छेद साफ़ तो नहीं दिख रहा था पर सांवले से छेद का अंदाज़ा तो हो ही रहा था।

भैया ने भाभी के नितम्बों पर थपकी सी लगाई जैसे घुड़सवारी करने से पहले घोड़ी को थपथपाया जाता है।

अब भैया उसके पीछे आ गए और भाभी को अपने नितम्बों को अपने हाथों से थोड़ा चौड़ा करने को कहा। भाभी ने अपना सिर तकिये पर रख लिया और अपने दोनों हाथों को पीछे करके अपने नितम्बों को और खोल दिया।

अब भैया ने अपने सिकंदर पर एक बार फिर से हाथ फिराया और भाभी की गांड के छेद पर अपना सुपारा लगा दिया। भाभी मन ही मन कुछ बुदबुदा सी रही थी। शायद डर के मारे हनुमान चालीसा पढ़ने लगी थी।

“प्लीज … धीरे करना!”

“बस तू अपनी गूपड़ी को ढीला छोड़ने का … बाकि काम में अपने आप कर देगा।”

अब भैया ने अपना निशाना साधकर दोनों हाथों से भाभी की कमर को कसकर पकड़ लिया। और फिर एक जोर का धक्का लगाया।

धक्का इतना जबरदस्त था कि एक ही झटके में सुपारे सहित आधा लंड भाभी की गांड में बिना किसी रोक टोक के घुस गया … और उसके साथ ही भाभी की दर्द भरी एक चीख पूरे कमरे में गूँज गई- मर गईई … अबे साले … मादरचोद … मार डाला रे … हाय … आह … मैं मर गई.
 
भैया ने कोई रहम ना करते हुए 2-3 धक्के और लगा दिए। अब तो लगता था उनका पूरा लंड भाभी की गांड में चला गया था। भाभी दर्द के मारे कराहे जा रही थी। वह भैया की पकड़ से अपने आपको छुड़ाने की भरपूर कोशिश कर रही थी और अपने हाथों को उनकी जाँघों पर लगाकर पीछे धकलने की कोशिश भी कर रही थी।

“अबे भोसड़ी के … मार डालेगा क्या … निकाल ले बाहर … मैं मर जाऊँगी … आईई माआआआ!” भाभी की आँखों से आंसू निकलते जा रहे थे।

“अरे मेरी जान अब बाहर निकालने का क्या फ़ायदा … जो होना था हो गया। फिकर मत करो दो मिनट में सब ठीक हो जाएंगा … बस तू अपनी गूपड़ी को ढीला छोड़ दे।”

“तुम एक नंबर के कसाई हो. ओईईईई माँ … कोई तो मुझे बचा लो …” भाभी रोये जा रही थी पर लगता था भैया रहम करने के मूड में कतई नहीं थे। उन्होंने भाभी की कमर को और जोर से कस कर पकड़ लिया था।

थोड़ी देर भाभी कसमसाती और छटपटाती रही और फिर उन्होंने अपने आप को ढीला छोड़ दिया। उनकी आँखों से अब भी आंसू तो निकल रहे थे पर हाय-तोबा अब जरूर कम हो गई थी।

“साले बहनचोद … मैं तेरी बातों में आ गई … लगता है मेरी तो फट ही गई है … बाहर निकाल ले … साले हरामी …”

“बस मेरी जान अब तू काये को फिकर कर रयेली है? किला फ़तेह हो गयेला है। बस दर्द बी ठीक हो जायेंगा। बस थोड़ी देर एसे इच रहने का … हिलने का नई!” भैया उसे तसल्ली देते जा रहे थे।

थोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद भाभी का रोना अब सिसकारियों में बदल गया था। भैया ने उसके नितम्बों और पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया था।

“ऐसे तो कोई दुश्मन या कसाई भी नहीं करता … मैंने बोला था ना … धीरे करना … मैं … मैं … ”

“ओह … मैं सॉरी मांगेला है जान … मुझे लगा धीरे करने से तेरे को जास्ती दर्द होएंगा …”

“ओह … अब तो बाहर निकाल लो … या मुझे जान से ही मारोगे?”

“अरे मेरी बुलबुल … अब बाहर निकालने का क्या फायदा … बस मेरे खातिर थोड़ा सा कष्ट और सह ले … में तेरे को प्रोमिज देता तेरे को बहोत प्यार करेंगा … ” कहकर भैया ने अपनी मुंडी झुकाते हुए भाभी की पीठ पर एक चुम्बन ले लिया।

“मेरे तो पैर दुखने लगे हैं.”

“तू एक काम कर धीरे-धीरे अपने पैर पीछे करले इससे तेरे को आराम मिलेगा।”

“एक बार बाहर निकाल लो बाद में जब दर्द ठीक हो जाए तब कर लेना.”

“अपुन को सटकेला समझा क्या? किता मुश्किल से अन्दर किएला है अब बाहर निकल गया तो फिर अन्दर डालने में बहुत मुश्किल होएंगा और तेरे को दर्द बी बहुत ज्यास्ती होएंगा जैसा बोला तू अपने पैर पीछे कर तो सही!”

अब भाभी धीरे धीरे अपने घुटने और पैर पीछे की ओर करने लगी तो उनके नितम्ब भी नीचे होने लगे।

भैया उनके नितम्बों से चिपके रहे और ध्यान रखा कि उनके मूसल का संपर्क भाभी की ओखली से नहीं टूटे।

हौले-हौले भाभी ने अपने पैर पीछे की ओर सीधे कर दिए। भैया अब भी उनके ऊपर थे और उनका लंड पूरा भाभी की गांड में धंसा हुआ था।

थोड़ी देर दोनों इसकी प्रकार पड़े रहे।

अब भैया ने भाभी के कानों और गर्दन पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए और अपने हाथ नीचे करके उसके उरोजों की घुन्डियाँ मसलने लगे थे। भाभी का दर्द ख़त्म तो नहीं हुआ था पर शायद उनके गूपड़ी अब तक भैया के गबरू सिकंदर से अच्छी तरह परिचित जरूर हो गई थी।

अब भैया ने हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखी पान की गिलोरियां उठाकर एक अपने मुंह में डाल ली और दूसरी भाभी के मुंह की ओर बढ़ा दी।

“क्या है?”

“ये केशर कस्तूरी वाला पेशल पान है इसको खाकर तू सारा दर्द भूल जायेंगी … क्या?”

अब भाभी ने भी वह पान की गिलोरी अपने मुंह में ले ली और साथ ही भैया की एक अंगुली भी दांतों से काट खाई।

“क्या करती बे साली? दर्द कर दियेला ना?”

“अब पता चला ना मुझे कित्ता दर्द हुआ है?”

“अच्छा ये बात … तो ले फिर … ” और भैया ने धीरे से अपने नितम्ब उठाकर एक धक्का और लगा दिया।

“अईई … ” भाभी के मुंह से फिर आह सी निकली पर अब लगता था उसमें दर्द नहीं था।

“जान … तेरा पिछवाड़ा बहुत ही मस्त हे। सच में ऐसा तो उस चिकनी का बी नई था.”

“निकालो बाहर इसे … और चले जाओ अपनी उसी चिकनी के पास!”

“हाय … मेरी रानी … तेरे को छोड़ के अब किधर जायेंगा? तेरे को प्रोमिज देता अपुन तेरे को रानी बनाके रखेगा.”

“चल झूठे … अब मैं दुबारा तेरी बातों में नहीं आने वाली!”

लगता है भाभी का दर्द अब कम हो गया था। भैया ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। भाभी की आँखें बंद थी और अब उन्होंने अपनी टांगें और ज्यादा खोल दी थी और कभी-कभी जब भैया धक्के लगाने के लिए अपना लंड थोड़ा बाहर निकालते तो वह भी साथ में अपने नितम्ब उठाने लगी थी।

भैया उसके गालों, कानों, और गले पर चुम्बन लिए जा रहे थे। एक हाथ से उसकी बुर के पपोटे भी शायद मसल रहे थे और दूसरे हाथ की चिमटी से उसके उरोजों की घुन्डियाँ भी मसल रहे थे। भाभी की अब हल्की-हल्की सित्कारें सी निकालने लगी थी।

“क्यों मेरी रानी मजा आयेला ना अब?”

“हट! तुमने तो मेरी जान ही निकाल दी अपने मजे के लिए!”

“तेरी जान लेके अपुन किधर जाएगा रे। तूने तो अपुन को दीवाना बना लिएला है एक इच रात में!”

“आह … धीरे … ” भाभी ने एक मीठी सिसकारी सी ली।

लगता था अब भाभी का दर्द ख़त्म हो चुका था और अब तो उनकी गूपड़ी को भी मज़ा आने लगा था। भैया ने हल्के धक्के लगाने चालू रखे।

“जान मैं क्या बोलता तू फिर से घुटनों के बल हो जा इससे तेरे को बी बड़ा मज़ा आयेंगा।”

“मेरे से तो हिला ही नहीं जा रहा … लगता है तेरा गधे जितना बड़ा हथियार मेरे पेट के अन्दर से गले तक आ गया है।” कह कर भाभी हंसने लगी।

फिर भाभी ने अपनी गूपड़ी पर हाथ लगा कर चेक किया कि कितना अन्दर है। और फिर धीरे धीरे भाभी ने अपने नितम्ब उठाते हुए अपने घुटनों को मोड़ा और फिर से डॉगी स्टाइल में हो गई।

भैया ने कस कर उनकी कमर पकड़ी रखी ताकि उनका सिकंदर अपने लक्ष्य से कहीं भटक ना जाए।

अब भैया ने फिर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। वह अपना लंड सुपारे तक बाहर निकालते और फिर किसी पिस्टन की तरह अन्दर कर देते। उन्होंने थोड़ी क्रीम अपने लंड पर और लगा ली इससे लंड को अन्दर बाहर होने में अब कोई दिक्कत महसूस नहीं हो रही थी।

लंड तो फूलकर बहुत मोटा हो गया था। अब तो भाभी की गांड का छेद भी पूरा दिखाई देने लग गया था। बाहर से तो काला छल्ला सा लग रहा था पर जब भैया अपना लंड बाहर निकालते तो अन्दर का गुलाबी रंग नज़र आ जाता था।

“हाय … क्या मस्त चुदाई करता है? साली के जोर-जोर से धक्के लगा ना मेरे राजा भैया? आह … ईईईईई …” अंगूर दीदी अब जोर जोर से बदबुदाने लगी थी और लहंगे के अन्दर उनका हाथ तेजी से चल रहा था और फिर एक किलकारी के साथ वो लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगी और उनका हाथ अब रुक गया था।

“क्या हुआ दीदी?” मैंने देखा दीदी की अँगुलियों पर चिपचिपा सा पानी लगा था। दीदी ने अपने पर्स से रुमाल निकालकर उसे साफ़ करने लगी थी।

मुझे थोड़ा तो पता था कि कुंवारी लड़कियां को अपनी सु-सु सहलाने में और उसके ऊपर बने दाने को छेड़ने में बड़ा मजा आता है पर दीदी की तो शादी हो चुकी थी तो उसे अब अपनी सु-सु को इस तरह सहलाने की क्या जरूरत थी? मेरे समझ में नहीं आ रहा था।

“तेरी शादी हो जायेगी तब पता चल जाएगा … ” कहकर दीदी फिर से अन्दर देखने लगी।

अन्दर अब भैया ने पूरे जोर जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। भाभी को भी शायद अब मज़ा आने लगा था।

“दीदी अब तो लगता है भाभी को दर्द बिल्कुल नहीं हो रहा?” मैंने डरते डरते कहा.

“हाँ … यह सब उस पान की गिलोरी का कमाल है अब देखना साली कैसे मस्त होकर गांड में लेने लगी है पहले कितना नखरा दिखा रही थी।”

भैया एक हाथ नीचे करके उसकी चूत के दाने को भी मसलने लगे थे। भाभी आह … ऊंह करते जा रही थी।

और फिर कोई 15 मिनट के बाद एक लम्बी हुँकार के साथ भैया ने आखिरी 5-6 धक्के जोर-जोर से लगाए और भाभी की पीठ से चिपक गए। लगता है उनका वीर्य भाभी की गांड में निकल गया था।

थोड़ी देर बाद भैया का लंड एक पुच्च की आवाज के साथ बाहर निकल गया। भैया का लंड सिकुड़ने के बाद भी 4-5 इंच का तो जरूर लग रहा था। और भाभी की गांड का छेद अंग्रेजी के ‘ओ’ अक्षर की तरह खुला हुआ सा दिखने लगा था।

अब भाभी घुटनों के बल बैठ गई। ऐसा करने से उनकी गांड से वीर्य बाहर निकल कर चादर पर गिरने लगा और चादर पर कोई 4-5 इंच के दायरे में वह फ़ैल गया।

उसे देख कर भैया बोले- देख मेरी रानी, ऐसेइच अभी तो 4-5 निशान और बनाने का है आज!

पहले तो भाभी को कुछ समझ नहीं आया बाद में वह शर्मा सी गई।

और उसके बाद उन दोनों ने थर्मोस से केशर और शिलाजीत मिला दूध पीया और मिठाई खाई।

फिर भैया ने उसे एक बार फिर से अपनी बांहों में दबोच लिया।

भाभी थोड़ी सी कसमसाई और बोली- ओहो … आपने तो एक ही बार में मेरी हालत बिगाड़ दी है अब और नहीं बाकी कल कर लेना। मुझे लगता है मैं तो कल ठीक से चल भी नहीं पाऊँगी, घर और रिश्तेदार औरतें क्या सोचेंगी?

“अरे मेरी पपोटी … ! उन औरतों के बीच तेरी कितनी इज्जत बन जायेगी ये तो सोच?” भैया ने उन्हें चूमते हुए कहा कहा।

“कैसे?” भाभी ने आश्चर्य से पूछा।

“कल जब तू अपनी टांगें चौड़ी करके चलेंगी तो औरतें सोचेंगी कि तुम कितनी किस्मत वाली हो कि इतने लम्बे और बड़े हथियार से रोज चुदाने को मिलेंगा … क्या?” भैया ने हंसते हुए कहा।

भाभी एक बार फिर से शर्मा गई।

और फिर इनका यह प्रेम-युद्ध सुबह 5 बजे तक चला था। भैया ने 4 बार खूब जोर-जोर से भाभी की चूत को बजाया था। भैया तो और एक बार उसकी गूपड़ी को प्यार करना चाहते थे पर भाभी ने मना कर दिया कि आज केवल उसकी पूपड़ी को ही प्यार करो। भैया एक आज्ञाकारी पति की तरह पूपड़ी को प्यार करने लगे।

इतना कह कर कामिनी चुप हो गई।
 
“भई वाह … क्या कमाल की सुहागरात मनाई है दोनों ने!” कहकर मैंने कामिनी को एक बार फिर से अपनी बांहों में भर कर चूम लिया।

“कामिनी … आओ हम भी वैसी ही सुहागरात मना लें?”

“हट! मुझे जान से मारने का इरादा है क्या?”

“वो तुम्हारे भैया और ग़ालिब चचा ने भी अब तो साबित कर दिया है कि गांड मरवाने से … ”

“बस … बस … ज्यादा बातें रहने दें। मैं अब आपकी चिकनी चुपड़ी बातों में नहीं आने वाली। अब आप ऑफिस जाओ आपको देर हो जायेगी।” कामिनी ने मुझे दूर धकलते हुए कहा।

“कामिनी प्लीज मान जाओ ना?”

“मेरे साजन! मैंने आपको कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया पर इसके लिए मुझे पहले मानसिक रूप से तैयार हो लेने दो फिर आप जो चाहो कर लेना मैं कौन सी भागी जा रही हूँ?” कामिनी ने तो मुझे निरुत्तर ही कर दिया था अब मैं क्या बोलता।

मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार होने बैडरूम में चला आया और कामिनी रसोई में।

मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार होने बैडरूम में चला आया और कामिनी रसोई में।

पूरा दिन कामिनी के नितम्बों के बारे में सोचते ही बीत गया।

शाम को जब मैं घर आया तो रास्ते में देखा कि गुप्ताजी का घर रंगीन रोशनी से जगमगा रहा था।

घर आकर जब मैंने इस बाबत मधुर से पूछा तो उसने बताया- गुप्ताजी की बेटी नेहा की कल शादी है। हिन्दू धर्म में चौमासे के दिनों में अमूमन शादी-विवाह के मुहूर्त नहीं हुआ करते पर लगता है बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता मिला है कोई गड़बड़ ना हो जाए इसलिए गुप्ताजी ने लड़के वालों को अपने स्वास्थ्य का हवाला देकर जल्दी ही शादी का मूहूर्त निकलवा लिया था।

कामिनी की तबियत आज कुछ ठीक नहीं लग रही थी, वह अपने कमरे में सोने चली गई थी।

खाना निपटाने के बाद मधुर और मैं टीवी देखने लगे। आज मधुर कुछ ज्यादा ही खुश नज़र आ रही थी।

“आज शाम को सामने वाली नेहा आई थी।” मधुर ने बताया।

“कौन नेहा?”

“वही गुप्ताजी की बेटी जिनकी बात अभी मैंने बतायी कि शादी है! 3 नंबर ब्लाक में!”

“ओह … अच्छा? वो पूपड़ी? क्या बोल रही थी?”

“कल उसकी शादी है तो मुझे विशेष रूप से सारे दिन अपने साथ रहने की रिक्वेस्ट करने आई थी। और बोल रही थी कल रात में भी आप विदाई तक मेरे साथ ही रहना मुझे बहुत घबराहट सी हो रही है।”

“हम्म …” मुझे भी हंसी आ गई।

“पता है और क्या बोल रही थी?” मधुर ने हँसते हुए कहा।

“क्या?”

“बोलती है दीदी मुझे तो बहुत डर लग रहा है।”

“शादी में डरने वाली क्या बात है?”

“अरे … आप भी ना … वो बोल रही थी मुझे सुहागरात में जो होगा उससे डर लग रहा है.” कह कर मधुर जोर-जोर से हंसने लगी।

“अच्छा फिर?”

“पूपड़ी है एक नंबर की। बोलती है कि मैंने सुना है सुहागरात में पहली बार में बड़ा दर्द भी होता है और खून भी निकलता है? मुझे तो बहुत डर लग रहा है। क्या सच में बहुत दर्द होता है?”

सुनकर मेरी भी हंसी निकल गई।

“35-36 साल की हो गई है और ऐसे नाटक कर रही है जैसे 19 साल की हो.”

“फिर तुमने क्या बोला?”

“बोलना क्या था मैंने उसे बोला तुम तो बस चुपचाप अपनी टांगें चौड़ी करके लेट जाना फिर जो करना होगा तुम्हारा पति अपने आप कर लेगा.” कहकर मधुर ठहाका लगा कर हंसने लगी।

“तुमने अपने दाव-पेंच नहीं बताये क्या उसे?”

“ए … हे … हे … मेरे जैसी सीधी थोड़े ही होती हैं सभी लड़कियाँ? मुझे तो तुमने ठीक से मनाया भी नहीं उस रात? हूंह …” कहकर मधुर ने नाराज़ सा होने का नाटक किया।

“आओ आज मना लेता हूँ।” कहकर मैंने मधुर को अपनी बांहों में भरने की कोशिश की।

“हटो परे! वो.. वो … कामिनी देख लेगी।” कहकर मधुर शर्मा सी गई।

“अरे … हाँ वो कामिनी को क्या हुआ आज?” मैंने पूछा।

“पता नहीं उसकी तबियत सी ठीक नहीं है। ये खाने पीने का ध्यान नहीं रखती। सिर दर्द और पेट की गड़बड़ बता रही है। बोलती है कि जी खराब है। आज खाना भी नहीं खाया।”

“ओह … ”

हे लिंग देव! कहीं लौड़े तो नहीं लग गए … कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई। कामिनी तो बता रही थी उसके पीरियड्स आने ही वाले हैं! फिर यह जी मिचलाने वाला क्या किस्सा है?

अचानक मुझे अपने कानों के पास मधुर की गर्म साँसें सी महसूस हुई। इससे पहले की मैं कुछ समझ पाता मधुर ने मेरे कानों की लोब को अपने मुंह में लेकर दांतों से हल्का सा काट लिया। आज मधुर बहुत चुलबुली सी हो रही थी।

प्रिया पाठको और पाठिकाओ! स्त्री कभी भी खुलकर प्रणय निवेदन नहीं करती है। वह तो बस इशारों में ही बहुत कुछ कह देती है। अब मेरे लिए उसके इशारे समझना इतना भी मुश्किल काम नहीं था।

मैंने मधुर को अपनी गोद में उठा लिया और फिर हम अपने बैडरूम में आ गए।

और उसके बाद मधुर ने आज जी भर के 2 बार चुदवाया। दूसरी बार तो उसने खुद मेरे ऊपर आकर किया।

दोस्तो! अब मैं इसे विस्तार से बताकर आपको बोर नहीं करना चाहता। हाँ यह बात अवश्य सांझा करूंगा के मधुर के साथ सम्बन्ध बनाते हुए भी मुझे यही लग रहा था जैसे कामिनी मेरी बांहों हो और वह कह रही हो मेरे साजन … आज मेरी गोद भराई करके मुझे पूर्ण स्त्री बना दो।

सुबह मधुर ने स्कूल से फिर बंक (छुट्टी) मार लिया. बहाना पूपड़ी की शादी का था। सच कहूं तो मुझे और कामिनी दोनों को आज की रात का बेसब्री से इंतज़ार था।
 
दिन में लगभग 2 बजे मधुर का फ़ोन आया उसने बताया कि वह गुप्ताजी के यहाँ जा रही है और रात को भी विदाई तक वही रहेगी।

हे लिंग देव! आज तो तेरी सच में जय हो। आज ऑफिस से घर जाते समय तुम्हें एक सौ एक रुपये का प्रसाद जरूर चढाऊँगा।

एक तो साली यह नौकरी भी आदमी के लिए फजीहत ही होती है। जब भी घर जल्दी जाने का होता है कोई ना कोई काम ऐसा आता है कि चाहते हुए भी ऑफिस से नहीं निकला जा सकता।

आज हैड ऑफिस में स्टॉक की रिपोर्ट भेजनी थी। सम्बंधित क्लर्क आया नहीं था तो नताशा के साथ मिलकर रिपोर्ट तैयार करके मेल करते-करते 7:30 बज ही गए। मेरा तो मन कर रहा था उड़कर ही घर पहुँच जाऊं।

जब मैं घर पहुंचा कामिनी बाहर मुख्य दरवाजे पर मेरा इंतज़ार ही कर रही थी। मेरे अन्दर आते ही कामिनी ने अन्दर से सांकल लगा ली। मैंने अपना बैग टेबल पर फेंक दिया और मधुर को आवाज लगाई। वैसे तो मुझे मधुर ने बता दिया था कि वह आज शाम को गुप्ताजी के यहाँ जाने वाली है पर मैं पूरी तसल्ली कर लेना चाहता था।

“दीदी तो आपकी पूपड़ी की शादी में गई हैं।” कामिनी ने हंसते हुए बताया। (कामिनी की भाषा तोतली ना लिख कर स्पष्ट लिख रहा हूँ.)

“अच्छा … वह मेरी … पूपड़ी कब से हो गई?” कहते हुए मैंने कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया। कामिनी तो उईईइ … करती ही रह गई।

अब हम दोनों सोफे पर बैठ गए।

“ओहो … रुको … आपके लिए पानी लाती हूँ.”

मेरा लंड पैंट में ही उछलकूद मचाने लगा था। कामिनी पानी लेने रसोई में चली गई। आज उसने सलवार सूट पहन रखा था जिसकी कुर्ती बहुत कसी हुई थी। आँखों में काजल भी डाल रखा था और ऐसा करने से उसकी आँखें किसी कटार की तरह लगने लगी थी।

लगता था वह अभी थोड़ी देर पहले ही नहाकर आई है और उसने आज कोई बढ़िया परफ्यूम भी लगाया है। आज उसने बालों की दो चोटियाँ भी बना रखी थी। आप तो जानते ही हैं मधुर जब बहुत खुश होती है और उसे कोई काम करवाना होता तब वह इस प्रकार बालों की दो चोटियाँ बनाती है। आज तो कामिनी ने भी दो चोटियाँ बनाई हैं हो सकता है यह संयोग मात्र रहा हो पर मेरा दिल तो अभी से जोर-जोर से धड़कने लगा था।

कामिनी पानी ले आई और थोड़ी परे सी हटकर बोली- चाय बना दूं?

“किच्च … आज चाय पानी कुछ नहीं बस तुम मेरी बांहों में आ जाओ।” कहकर मैंने कामिनी का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा।

कामिनी का संतुलन बिगड़ सा गया और वह मेरी गोद में आ गिरी। वह थोड़ा कसमसाई तो जरूर पर उसने मेरी गोद से हटने की ज्यादा कोशिश नहीं की। मेरा लंड पैंट के अन्दर ठुमके लगाने लगा था जिसे कामिनी ने भी महसूस कर लिया था। उसने थोड़ा सा ऊपर होकर अपने नितम्बों को मेरी गोद में सेट कर लिया। मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया।

“ओह … आप फिल शरारत करने लगे?”

“कामिनी मेरी जान आज पूरे दिन ऑफिस में मैं बस तुम्हें ही याद करता रहा.”

“क्यों?” कामिनी ने मेरी ओर तिरछी नज़रों से देखा।

वह मंद-मंद मुस्कुरा भी रही थी।

“कामिनी तुम बहुत खूबसूरत हो मेरी जान!”

“बस … बस झूठी तारीफ़ रहने दो … आप कपड़े चेंज कर लो। मैं चाय बनाती हूँ, वैसे खाना भी तैयार है आप बोलो तो गर्म करके लगा दूं?”

“कामिनी तुम्हें अपनी बांहों से अलग करने का मन ही नहीं हो रहा.”

“क्यों?”

“मेरा मन तो करता है सारी रात तुम्हें ऐसे अपने सीने से चिपकाए रखूँ।”

कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। पता नहीं कामिनी क्या सोचे जा रही थी। उसके चहरे पर एक अनजानी सी मुस्कराहट के साथ-साथ भय भी नज़र आ रहा था। जैसे वह किसी निर्णय के लिए अपने आप को तैयार कर रही हो।

“आप पहले फ्रेश हो लो.” कहकर कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अपनी मुंडी झुका ली।

मैं बहुत कुछ सोचते हुए कपड़े बदलने बैडरूम में चला आया। पहले तो मेरा मन हाथ मुंह धोने का ही था पर बाद में मैंने एक शॉवर ले लिया और अपने पप्पू को साबुन से धोकर उस पर सुगन्धित क्रीम भी लगा ली। मैंने कुर्ता पायजमा पहन लिया था।

जब तक मैं हॉल में आया कामिनी चाय बना कर ले आई थी। मेरा इच्छा चाय पीने की कतई नहीं थी मैं तो जल्द से जल्द कामिनी के साथ अपने प्रेम का अंतिम सोपान पूरा कर लेना चाहता था। पर आप तो जानते हैं स्त्रियां जल्दबाजी में कोई भी काम करना पसंद नहीं करती हैं।

अब चाय पीने के मजबूरी थी।

“कामिनी … ”

“हओ?”

“पता नहीं क्यों मेरा मन आज तुम्हें अपनी बांहों में भरकर रखने को कर रहा है।”

“नहीं मैं आज कोई शरारत नहीं करने दूँगी.”

“कामिनी तुम्हें ज़रा भी दया नहीं आती?”

“कैसे?”

“क्यों मुझे तड़फा रही हो?”

“मैंने क्या किया?”

“तुमने मुझे अपना दीवाना बना लिया है। ए कामिनी! आओ ना मेरी बांहों में आ जाओ … प्लीज …”

“आप पहले खाना खा लो, फिर सोचेंगे?” कामिनी ने रहस्यमई ढंग से मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा।

आप मेरे दिल, दिमाग और लंड की हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

“चलो ठीक है पर आज खाना हम दोनों साथ-साथ खायेंगे और वह भी तुम्हें अपनी गोद में बैठाकर!”

“हट!” कामिनी ने शरमाकर अपनी मुंडी झुका ली थी।

ईईइ … स्स्स्सस …

याल्लाह … उसकी आँखों की चमक, गालों की लाली और उन पर पड़ने वाले डिम्पल तो आज जानलेवा ही थे। मुझे तो लगने लगा था कि उसकी यह अदा मेरा कलेजा ही चीर देंगे। मेरा दिल इतना जोर से धड़क रहा था कि मुझे लगने लगा साला यह कहीं धोखा ही ना दे दे।

कामिनी ने खाना लगा दिया था और अब मैंने कामिनी को अपनी गोद में बैठा लिया।

आज कामिनी ने मेरे लिए खीर बनाई थी। हम दोनों ने एक दूसरे को खाना खिलाया और बीच-बीच में मैं उसके गालों को भी चूमता रहा और नितम्बों और उरोजों पर भी हाथ फिराता रहा।

हमने जल्दी खाना निपटाया और फिर कामिनी जूठे बर्तन लेकर रसोई में चली गई। मैं तो चाहता था कामिनी जल्दी से आ जाए और इसी सोफे पर उसे मोरनी बनाकर प्रेम का अंतिम सोपान जल्दी से जल्दी पूरा कर लूं।

दोस्तो! दिल थाम लेना अब वो मरहला आने वाला है जिसका मैं पिछले 2 महीनों से करता आ रहा था। ये दो महीने नहीं जैसे दो सदियों के बराबर था।

कामिनी हाथ मुंह धोकर रसोई से बाहर आ गई। मैं उसे अपनी बांहों में दबोचने के लिए जैसे ही सोफे से उठाने लगा कामिनी बोली- आप बैडरूम में चलो, मैं कपड़े बदलकर आती हूँ.

मैं सोच रहा था कि अब कपड़े बदलने की नहीं उतारने का समय है। पता नहीं कामिनी देर क्यों कर रही है। मैं इस समय कामिनी को किसी भी प्रकार नाराज़ नहीं करना चाहता था। मैं चुपचाप बैडरूम में आकर बिस्तर पर बैठ गया।

कोई 8-10 मिनट के बाद कामिनी ने बैडरूम में प्रवेश किया। उसने वही लाल रंग की नाइटी पहन रखी थी। यह नाइटी उसके सौन्दर्य और सांचे में ढला खूबसूरत बदन ढकने में भला कहाँ समर्थ था। उसके अंग-अंग से फूटती जवानी तो हर तरफ से अपना सौंदर्य बिखेर रही थी।

मैं अपलक उसे देखता ही रह गया। एक हाथ में उसने सुनहरे रंग का दुपट्टा भी पकड़ रखा था।

मैंने उसे अपनी बांहों में भर कर अपनी गोद में बैठा लिया। कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर ली थी। उसके अधर कुछ काँप से रहे थे और साँसें तो जैसे उसके नियंत्रण में ही नहीं थी।

मैंने उसके लरजते लबों पर अपने जलते होंठ रख दिए। फिर हमारा यह चुम्बन कोई 4-5 मिनट तो जरूर चला होगा। इस बीच मैं उसके पेट जाँघों और नितम्बों पर भी हाथ फिरता रहा। मेरा लंड अब बेकाबू होने लगा था।

“कामिनी मेरी जान! क्या तुम मेरी पूर्ण समर्पिता बनाने के लिए तैयार हो?”

“हाँ मेरे साजन मैं तो सदा से ही आपकी समर्पिता हूँ मैंने कभी आपको किसी भी चीज या क्रिया के लिए मना नहीं किया। आज मुझे पूर्ण समर्पिता बना दो।”

“कामिनी मैं तुम्हें वचन देता हूँ मैं कोई जोर जबरदस्ती नहीं करूंगा और ना ही तुम्हें कोई कष्ट होने दूंगा।”

“मेरे साजन! आपकी ख़ुशी के लिए तो मैं अपनी जान भी दे सकती हूँ उसके आगे यह कष्ट कोई मायने नहीं रखता. पर मेरी एक शर्त है?” कामिनी ने अपनी आँखें मेरी आँखों में डाल कर पूछा।

हे लिंग देव! अब रोमांच के इन अंतिम पलों में कामिनी ने यह क्या नया नाटक शुरू कर दिया। कहीं लौड़े तो नहीं लगने वाले!

“श … शर्त? क … कैसी शर्त?” मैंने हकलाते से पूछा।

“आपको मेरी एक बात माननी पड़ेगी?” साली यह कामिनी भी मधुर की संगत में रहकर उसके सारे दाव-पेंच सीख गई है और किसी भी बात को घुमा फिराकर कहने में भी माहिर हो गई है।

“ओके … बोलो।”

फिर शर्माते हुए कामिनी ने कहा “आज की रात जो भी करना है वो मैं करुँगी, आप ना तो कुछ बोलेंगे और ना ही मेरे कहे बिना कुछ करेंगे.”
 
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