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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

मेरी अनारकली

पहली बार चुदवाने में हर लड़की या औरत जरूर नखरा करती है लेकिन एक बार चुदने के बाद तो कहती है आ लंड मुझे चोद।

अब अनारकली को देखो, साली ने पूरे २ महीने से मुझे अपने पीछे शौदाई सलीम (पागल) बना कर रखा था। पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती थी। रगड़ने का तो दूर चूमा-चाटी का भी कोई मौका आता तो वो हर बार कुछ ऐसा करती कि गीली मछली की तरह मेरे हाथ से फिसल ही जाती थी।

अकेले में एक दो बार उसके अनारों को भींचने या गालों को छूने या चुम्मा लेने के अलावा मैं ज्यादा कुछ नहीं कर पाया था। पर मैंने भी सोच लिया था कि उसे प्रेम की अनारकली बना कर ही दम लूँगा। साली अपने आप को सलीम वाली अनारकली से कम नहीं समझती। मैंने भी सोच लिया था चूत मारूँ या न मारूं पर एक बार उसकी मटकती गांड जरूर मारूंगा।

आप सोच रहे होंगे अनारकली तो सलीम की थी फ़िर ये नई अनारकली कौन है। दर असल अनार हमारी नौकरानी गुलाबो की लड़की है। उसके घरवाले और मधु (मेरी पत्नी) उसे अनु और मैं अनारकली बुलाता हूँ। अनार के अनारकली बनने की कहानी आप जरूर सुनना चाहेंगे।

अनार नाम बड़ा अजीब सा है ना। दर असल जिस रात वो पैदा हुई थी उसके बाप ने उसकी अम्मा को खाने के लिए अनार लाकर दिए थे तो उसने उसका नाम ही अनार रख दिया।

अनु कोई १८-१९ साल की हुई है पर है एकदम बम्ब पटाखा पूरा ७.५ किलो आर डी एक्स। ढाई किलो ऊपर और उम्मीद से दुगना यानि ५ किलो नीचे। नहीं समझे अरे यार उसके स्तन और नितम्ब। क्या कयामत है साली। गोरा रंग मोटी मोटी आँखे, काले लंबे बाल, भरे पूरे उन्नत उरोज, भरी पर सुडोल जांघें पतली कमर। और सबसे बड़ी दौलत तो उसके मोटे मोटे मटकते कूल्हे हैं।

आप सोच रहे होंगे इसमे क्या खास बात है कई लड़कियों के नितम्ब मोटे भी होते है तो दोस्तों आप ग़लत सोच रहे हैं। अगर एक बार कोई देख ले तो मंत्रमुग्ध होकर उसे देखता ही रह जाए। खुजराहो के मंदिरों की मूर्तियों जैसी गांड तो ऐसे मटका कर चलती जैसे दीवानगी में ‘उर्मिला मातोंडकर’ चलती है। नखरे तो इतने कि पूछो मत।

अगर एक बार उसे देख लें तो ‘उर्मिला मातोंडकर’ या ‘शेफाली छाया’ को भूल जायेंगे। और फ़िर मैं तो नितम्बों का मुरीद (प्रेम पुजारी) हूँ।

कभी कभी तो मुझे शक होता है इसकी माँ गुलाबो तो चलो ठीक ठाक है, हो सकता है जवानी में थोड़ी सुंदर भी रही होगी पर बाप तो काला कलूटा है। तो फ़िर ये इंतनी गोरी चिट्टी कैसे है। लगता है कहीं गुलाबो ने भी अपनी जवानी में मेरे जैसे किसी प्रेमी भंवरे से अपनी गुलाब की कली मसलवा ली होगी।

खैर छोड़ो इन बातों को हम तो अनु के अनारकली बनने की बात कर रहे थे।

अरे नए पाठकों को अपना परिचय तो दे दूँ। मैं प्रेम गुरु माथुर। उमर ३२ साल। जानने वाले और मेरे पाठक मुझे प्रेम गुरु बुलाते हैं। मैं एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करता हूँ।

मेरे लंड का आकार लगभग ७” है। सुपारा ज्यादा बड़ा नहीं है पर ऐसे सुपाड़े और लंड गांड मारने के लिए बड़े मुफीद (उपयुक्त) होते हैं। मेरे लंड के सुपाड़े पर एक तिल भी है। पता नहीं आप जानते हैं या नहीं ऐसे आदमी बड़े चुद्दकड़ होते हैं और गांड के शौकीन।

मेरी पत्नी मधुर (मधु ) आयु २८ साल बला की खूबसूरत ३६-२८-३६ मिश्री की डली ही समझो, चुदाई में बिल्कुल होशियार। पर आप तो हम भंवरों की कैफियत (आदत) जानते ही हैं कभी भी एक फूल से संतुष्ट नहीं होते।

एक बात समझ नहीं आती साली ये पत्नियाँ पता नहीं इतनी इर्ष्यालू क्यों होती हैं जहाँ भी कोई खूबसूरत लड़की या औरत देखी और अपने मर्द को उनकी और जरा सा भी उनपर नज़रें डालते हुए देख लिया तो यही सोचती रह्रती हैं कि जरूर ये उसे चोदना चाहते हैं।

कमोबेश मधु की भी यही हालत थी। अनार को अनारकली बनाने में मेरी सबसे बड़ी दिक्कत तो मधु ही थी। मुझे तो हैरत होती है पूरी छान बीन किए बिना उसने गुलाबो को कैसे काम पर रख लिया जिसके यहाँ आर डी एक्स जैसी चीज भी है जिसका नाम अनार है।

मुझे तो कई दिनों के बाद पता चला था कि अनु बहुत अच्छी डांसर है। आप तो जानते हैं मधु बहुत अच्छी डांसर है। शादी के बाद स्कूल कार्यक्रम को छोड़ कर उसे कोई कम्पीटीशन में तो नाचने का मौका नहीं मिला पर घर पर वो अभ्यास करती रहती और अनु भी साथ होती है।

अनु तो १०-१५ दिनों में ही उससे इतना घुलमिल गई थी कि अपनी सारी बातें मधु उससे करने लग गई थी। दो दो घंटे तक पता नहीं वो सर जोड़े क्या खुसर फुसर करती रहती हैं।

वैसे तो ये कभी कभार ही आती थी और मैंने पहले कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। आप ये जरूर सोच रहे होंगे ये कैसे हो सकता है। कोई खूबसूरत फूल आस पास हो और मेरी नज़र से बच जाए ये कैसे हो सकता है। दर असल उन दिनों मेरा चक्कर अपनी खूबसूरत सेक्रेटरी से चल रहा था।

लेकिन जबसे गुलाबो बीमार हुई है पिछले एक महीने से अनार ही हमारे यहाँ काम करने आ रही है। मुझे तो बाद में पता चाल जब मधु ने बताया कि गुलाबो के फ़िर लड़की हुई है।

कमाल है ३८-४० साल की उमर में ५-६ बच्चों के होते हुए भी एक और बच्चा ? अगर माँ इतनी चुद्दकड़ है तो बेटी कैसी होगी !

माँ पर बेटी नस्ल पर घोड़ी !

ज्यादा नहीं तो थोड़ी थोड़ी !!

एक दिन जब मैं बाथरूम से निकल रहा था तो अनु अपनी चोटी हाथ में पकड़े घुमाते हुए गाना गाते लगभग तेजी से अन्दर आ रही थी_

मैं चली मैं चली देखो प्यार की गली !

मुझे रोके ना कोई मैं चली मैं चली !!

वो अपनी धुन में थी अचानक मैं सामने आ गया तो वो मुझसे टकरा गई। उसके गाल मेरे होंठो को छू गए और स्तन भी सीने से छू कर गए। मैंने उसकी चोटी पकड़ते हुए कहा “कहाँ चली मेरी अनु रानी कहीं सचमुच ससुराल तो नहीं जा रही थी?”

वो शरमा कर अन्दर भाग गई। हाय अल्लाह …. क्या कमायत है साली। मैं भी कितना गधा था इतने दिन इस आर डी एक्स पर ध्यान ही नहीं दिया।

उस दिन के बाद मैंने अनु को चोदने का जाल बुनना शुरू कर दिया। अनु ने तो मधु पर पता नहीं क्या जादू कर दिया था कि वो उसे अपनी छोटी बहन ही समझने लगी थी।

अनु भी लगभग सारे दिन हमारे घर में मंडराती रहती थी हलाँकि वो एक दो जगह पर और भी काम करती थी। मधु ने उसे अपनी पुरानी साड़ियां, चप्पल, सूट, मेक-अप का सामान आदि देना शुरू कर दिया। उसे अपनी पहनी पैंटी ब्रा और अल्लम-गल्लम चीजें भी देती रहती थी।

अनु हमारे यहाँ झाडू पोंछा बर्तन सफाई कपड़े आदि सब काम करती थी। कभी कभी रसोई में भी मदद करती थी। वो तो यही चाहती थी कि किसी तरह यहीं बनी रहे। मैं शुरूआत में जल्दी नहीं करना चाहता था।

जब वो ड्राइंग रूम में झाडू लगाती तो उसके रसभरे संतरे ब्लाउज के अन्दर से झांकते साफ़ दिख जाते थे। पर निप्पल और एरोला नहीं दिखते थे पर उसकी गोलाइयों के हिसाब से अंदाजा लगना कहाँ मुश्किल था। मेरा अंदाजा है कि एक रुपये के सिक्के से ज्यादा बड़ा उसका एरोला नहीं होगा। सुर्ख लाल या थोड़ा सा बादामी। उसकी घुंडी तो कमाल की होगी।

मधु के तो अब अंगूर बन गए है और चूसने में इतना मज़ा अब नहीं आता। पता नहीं इन रस भरे आमों को चूसने का मौका कब नसीब होगा। शुरू शुरू में मैं जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहता था। अनु इन सब से शायद बेखबर थी।

आज शायद उसने मधु की दी हुई ब्रा पहनी थी जो उसके के लिए ढीली थी। झाडू लगाते हुए जब वो झुकी तो मैंने देख लिया था। मेरी नज़रें तो बस उन कबूतरों पर टिकी रह गई। मुझे तो होश तब आया जब मेरे कानों में आवाज आई, “साहब अपने पैर उठाओ मुझे झाडू लगानी है।” अनु ने झुके हुए ही कहा।

“आंऽऽ हाँ ” मैंने झेंपते हुए कहा। मैं सोच रहा था कहीं उसने मुझे ऐसा करते पकड़ तो नहीं लिया। लेकिन उसके चेहरे से ऐसा कुछ नहीं लगा और अगर ऐसा हुआ भी है तो चलो आगाज तो अच्छा है। मेरा लंड तो पजामे के अन्दर उछल कूद मचाने लगा था। मैंने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी। पजामे के बाहर उसका उभार साफ़ नज़र आ रहा था।

मधु ने उसको समझा दिया था कि वो उसे (मधु को) दीदी बुलाया करेगी और मुझे भइया।

मै तो सोच रहा था कि जब मधु उसकी दीदी हुई तो वो मेरी साली हुई ना और मैं उसका जीजा, मुझे भइया की जगह सैयां नहीं तो कम से कम जीजू ही बुलाये। ताकि साली पर आधा हक, जो जीजू का होता ही है, मेरा भी हो जाए, पर मैं तो लड्डू पूरा खाने में विश्वास रखता हूँ। पर मधु के हिसाब से साहब ही कहलवाना ठीक था मैं मरता क्या करता।
 


मधु इस समय बाथरूम में थी। आज वो अकेले ही नहा रही थी। कोई बात नहीं कभी कभी अकेले नहाना भी सेहत के लिए अच्छा होता है। मेरा अनार से बात करने का मूड हो आया “अनु ! चाय तो पिला दो एक कप ”

“हाँ … बनाती हूँ ” अनु ने कोयल जैसी मीठी आवाज में कहते हुए मेरी और इस तरह से देखा जैसे कह रही हो चाय क्या पीनी है कुछ और भी पी लो। वो कमर पर हाथ रखे खड़ी थी चाय बनाने नहीं गई।

“अरे अनु ! आज ये तुमने ढीले ढीले कपड़े क्यों पहन रखे हैं?”

“नहीं ! ढीले कहाँ हैं? ठीक तो हैं! ” उसने अपना कुरता नीचे खींचते हुए कहा।

“अरे ये ब्रा कितनी ढीली है ! इसके स्ट्रेप्स दिख रहे हैं !” मैंने हँसते हुए कहा।

“धत … आप भी !” वो शरमा गई।

!! या अल्लाह … क्या अदा है !!

“क्यों मैंने झूठ कहा?”

“वो दीदी भी यही कह रही थी !” वो अपनी आँखें नीची किए बोली।

“तो अपने साइज़ की पहना करो न उनमें तुम बहुत सुंदर लगोगी। ”

“पर हमारे पास इतने पैसे कहाँ हैं नई ब्रा खरीदने के लिए ?”

“कोई बात नहीं इतनी सी बात मैं तुम्हारे लिए ला दूंगा म ऽऽ म् … मेरा मतलब मधु से कह दूंगा ”

“पर दीदी … पैसे .. ??”

“अरे तुम पैसों की क्यों चिंता करती हो बाद में दे देना ” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। मेरा कुतुबमीनार पजामे के अन्दर उफन रहा था और बाहर आने को मचलने लगा। मैंने जल्दी से अखबार गोद में रख लिया नहीं तो अनु जरूर देख लेती और मेरे इरादों की भनक उसे लग जाती तो आगाज (श्री गणेश) ही ख़राब हो जाता। पर मैं तो इस मामले में पूरा खिलाड़ी हूँ।

अनु रसोई में चली गई। मधु बाथरूम में थी। मेरा मन किया उसके साथ नहा ही लिया जाए। मौसम भी है, मौका भी अच्छा है और लंड भी कुतुबमीनार बना है। मैं जैसे ही उठा सामने से मधु अपने बाल तौलिए से रगड़ते हुए बाथरूम से निकल कर मेरी ओर ही आ रही थी। मैंने मधु की ओर आँख मारी और सीटी बजाने के अंदाज़ में ओये होए कहा।

मेरे इस इशारे को वो अच्छी तरह जानती थी। जब हम लोग कामातुर हैं मतलब चुदाई की इच्छा होती है इसी तरह सीटी बजाते हैं। मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो वो मुझे परे धकेलते हुए बोली,“हटो लाल बाई आ गई है।”

पहले तो मैं कुछ समझा नहीं मैंने सोचा कहीं वो गुलाबो की बात तो नहीं कर रही पर बाद में जब उसके माहवारी की और इशारे को समझा तो मेरा सारा उत्साह ही ठंडा पड़ गया। अब तो ५-६ दिन मुझे अपना हाथ जगन्नाथ ही करना पड़ेगा। मधु तो चूत और गांड पर हाथ भी नहीं फेरने देगी।

दूसरे दिन मैंने बाज़ार से २ स्टाइलिश ब्रा और काले रंग की पैंटी खरीदी। मधु सुबह जल्दी स्कूल चली जाती है। अनु रोज सुबह ८ बजे आ जाती है। हमारे लिए चाय नाश्ता बना देती है बाद में सफाई और बर्तन आदि साफ़ करती है। मैं ऑफिस के लिए कोई ९.३० बजे निकलता हूँ।

आज प्रोग्राम के मुताबिक मुझे ९.३० तक जाने की कोई जल्दी नहीं थी। मैं तो अपना जाल अच्छी तरह बुनता जा रहा था। मधु के जाते ही मैंने अनु को आवाज दी,“अरे मेरी अनारकली देखो वो मेज़ पर क्या रखा है !”

“साहब कोई पैकेट लगता है क्यों ?”

“देखो तो सही क्या है इसमें ?”

अनु ने पैकेट खोला तो उसमे से ब्रा , पैंटी और दो तीन खुशबू वाली फेस क्रीम देखकर वो खुश हो गई पर बोली कुछ नहीं।

वो कुछ नहीं बोली मेरी तरफ़ बस देखती रही। मैंने कहा- भई ये सब हमारी अनारकली के लिए है। कल मैंने तुमसे वादा किया था न।

उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।

“क्यों अच्छी है न ?”

“हाँ बहुत सुंदर है। मैं भी ऐसी ही चाहती थी ” अनजाने में उसके मुंह से निकल ही गया।

“देखो अपनी दीदी से मत कहना ”

“क्यों?”

“अरे वो तुम्हारे पैसे काट लेगी ”

“तो क्या आप नहीं काटोगे? छोड़ दोगे ?”

“तुम कहो तो नहीं काटूँगा … चोद दूंगा …पर ….?” मैंने जानबूझ कर छोड़ को चोद कहा था।

पर पता नहीं अनारकली ने ध्यान दिया या नहीं वो तो बस उन्हें देखने में ही लगी थी।

“पर एक शर्त है !” मैंने कहा।

“वो क्या ?”

“ये पहन कर मुझे भी दिखानी होगी ”

“इस्स्स्स्स्स ………………. ” अनु शरमाकर पैकेट लेकर बाहर की और भाग गई।

मेरा दिल उछलने लगा। या अल्लाह ……

आज के लिए इतना ही काफी था। मैंने बाथरूम में चला गया और कोई दो साल के बाद आज जमकर मुठ मारी तब जाकर पप्पू महाराज कुछ शांत हुए और मुझे ऑफिस जाने दिया।

अगले दो दिनों पता नहीं अनारकली काम पर क्यों नहीं आई। मैं तो डर ही गया। पता नहीं क्या हो गया। कहीं उसने घरवालों या मधु को कुछ बता तो नहीं दिया ? पर मेरी आशंका ग़लत निकली। उसे तो घर पर ही कुछ काम था। अपनी माँ और नए बच्चे से सम्बंधित।

पिछले दो तीन दिनों से मधु की माहवारी चल रही थी और मुझे चोदने नहीं दिया था। सेक्रेटरी भी नौकरी छोड़ गई थी।

आप को तो पता ही है हम लोग शनिवार की रात बड़ी मस्ती करते हैं। यह दिन मेरे लिए तो बहुत ख़ास होता है पर मधु के लिया सन्डे ख़राब करने वाला होता है। ऐसा इसलिए कि शनिवार को मैं मधु की गांड मारता हूँ बाकी दिनों तो वो मुझे गांड के सुराख पर अंगुली भी नहीं धरने देती।

हम लोगों ने आपस में तय कर रखा है की स्वर्ग के इस दूसरे द्वार यानि कि मधु की चूत की प्यारी पडोसन की मस्ती सिर्फ़ शनिवार को या होली, दीवाली, जन्मदिन या फ़िर शादी की वर्षगांठ पर ही की जायेगी।

दूसरे दिन हम लोग बाथरूम में साथ साथ नहाते हैं और अलग मौज मस्ती करते हैं। रविवार के दिन मधु जिस तरीके से टांगें चौड़ी करके चलती है कई बार तो मुझे हँसी आ जाती है और फ़िर रात को मैं चूत से भी हाथ धो बैठता हूँ।

इन दिनों मैं अपना लंड हाथ में लिए किसी चूत की तलाश में था और मुठ मार कर ही गुजारा कर रहा था। भगवन ने छप्पर फाड़ कर जैसे अनारकली को मेरे लिए भेज तो दिया था, पर जाल अभी कच्चा था।

पिछले एक डेढ़ महीने से मैं अपना जाल बुन रहा था। जल्दबाजी में टूट सकता था। और मेरे जैसे खिलाड़ी के लिए ये शर्म की बात होती की कोई चिडिया कच्चे जाल को तोड़ कर भाग जाए, मैं जल्दी नहीं करना चाहता था। पहले लोहा पूरा गरम कर लूँ फ़िर हथोड़ा मारूंगा।

आप सोच रहे होंगे एक नौकरानी को चोदना क्या मुश्किल काम है। थोड़ा सा लालच दो बाथरूम में पेशाब करने के बहने लंड के दर्शन करवाओ और पटक कर चोद दो। घर में सम्भव ना हो तो किसी होटल में ले जाकर रगड़ दो।

आप ग़लत सोच रहे हैं। अगर कोई झुग्गी बस्ती में रहने वाला कोई लौंडा लापड़ा हो या अनु की सोसायटी में रहने वाला हो तो कोई बात नहीं है जानवरों की पुँछ की तरह कभी भी लहंगा या साड़ी पेटीकोट उठाओ और ठोक दो। अब गुलाबो को ही लो ३८-४० साल की उमर में ५-६ बच्चों के होते हुए भी एक और बच्चा ?

हम जैसे तथाकथित पढ़े लिखे समझदार लोग अपने आप को मिडल क्लास समझाने वालों के लिए भला इस तरीके से इतनी आसानी से किसी और लड़की को कैसे चोदा जा सकता है। खैर आप क्यों परेशान हो रहे हैं।

आज शनिवार था। रिवाज के मुताबिक तो आज हमें रात भर मस्ती करनी थी पर अभी मधु को चौथा दिन ही था और अगले दो दिन और मुझे मुठ मार कर ही काम चलाना था। अनारकली को चोदना अभी कहाँ सम्भव था।

मैंने मधु को जब अपने खड़े लंड को दिखाया तो वो बोली “ऑफ़ ओ !आप तो ३-४ दिन भी नहीं रह सकते !”

“अरे तुम क्या जानो तीन दिन मतलब ७२ घंटे ४३२० मिनट और ……”

“बस बस अब सेकंड्स रहने दो ” मधु मेरी बात काटते हुए बोली।

प्लीज़ मेरी शहद रानी (मधु) आज तो बस मुंह में लेकर ही चूस लो या फ़िर मुठ ही मार दो अपने नाज़ुक हाथों से। मधु कई बार जब बहुत मूड में होती है मेरा लंड भी चूसती है और मुठ भी मार देती है। पर आज उसने लंड तो नहीं चूसा पर अपने हाथों में अपनी नई कच्छी लेकर मुठ जरूर मार दी। मेरा सारा वीर्य उसकी पेंटी में लिपट गया।

मधु जब हाथ धोने बाथरूम गई तो मेरे दिमाग में एक योज़ना आई। मैंने वो पेंटी गेस्ट रूम से लगे कोमन बाथरूम में डाल दी। अनारकली इसी बाथरूम में कपड़े धोती है।

दूसरे दिन रविवार था। मधु और मैं देरी से उठे थे। अनारकली रसोई में चाय बना रही थी।

चाय पीकर मधु जब बाथरूम चली गई तो मैंने अनारकली से कहा, “अनारकली तुमने जो वादा किया था उसका क्या हुआ?”

“कौन सा वादा साहब?”

“अरे इतना जल्दी भूल गई वो पैंटी और ब्रा पहन कर नहीं दिखानी??”

“ओह … वो … इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स …………..” वो एक बार फिर शरमा गई। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

“उईई माँ ………….” वो जोर से चिल्लाई। अगर मधु बाथरूम में न होती तो जरूर सुन लेती। “वो … वो … मधु … दीदी …” मैंने इधर उधर देखा इतने में तो वो रसोई की और भाग चुकी थी।

मेरा आज का आधा काम हो गया था। बाकी का आधा काम कपड़े धोते समय अपने आप हो जाएगा।

नाश्ता आदि बनने के बाद जब अनारकली बाथरूम में कपड़े धोने जाने लगी तो मेरी आँखें उसका ही पीछा कर रही थी। वो जब बाथरूम में घुसी तो मैं जानता था उसकी नज़र सीधी पेंटी पर ही पड़ी होगी। उसने इधर उधर देखा। मैं अखबार में मुंह छिपाए उसे ही देख रहा था। जैसे ही उसने दरवाजा बंद किया मैं बाथरूम की ओर भागा।

मधु अभी बेडरूम में ही थी। मैं जानता था उसे अभी आधा घंटा और लगेगा। मैंने बाथरूम के की होल से देखा तो मेरी बांछे ही खिल गई। योजना के मुताबिक ही हुआ। अनारकली ने वोही पेंटी हाथ में पकड़ रखी थी और बड़े ध्यान से उस पर लगे कम को देख रही थी।

पता नहीं उसे क्या सूझा, एक उंगली कम में डुबोई और नाक के पास लेजा कर पहले तो सुंघा फ़िर उसे मुंह में लेकर चाटा।

अपनी आँखें बंद कर ली और एक सीत्कार सी लेने लगी। फ़िर उसने अपनी सलवार उतार दी। हे भगवन उस काली पैन्टी में उसकी भरपूर जांघे बिल्कुल मक्खन मलाई गोरी चिट्टी। और २ इंच की पट्टी के दोनों ओर झांटे छोटे छोटे काले बाल। डबल रोटी की तरह फूली हुई उसकी बुर।

वो रुकी नहीं उसने पेंटी नीचे सरकाई और उसकी काले रेशमी बालों से लकदक चूत नुमाया (प्रकट) हो गई। चूत के मोटे मोटे बाहरी होंठ। अन्दर के होंठ पतले थोड़े काले और कोफी रंग के आपस में चिपके हुए। चूत का चीरा कोई ४ इंच का तो होगा। संगमरमरी जांघों के बीच दबी उसकी चूत साफ़ दिख रही थी। लाजवाब जांघें और दांई जांघ पर काला तिल।

पूरी क़यामत।

उसने धीरे से अपनी अंगुलिओं से अपनी चूत की दोनों फांकों को खोला जैसे कोई तितली अपने छोटे छोटे पंख फैलाती है, अन्दर से लाल चट्ट उसकी चूत का छेद साफ़ नज़र आने लगा।

अनु ने एक अंगुली पर थूक लगाया और फ़िर गच से अपनी चूत के नाज़ुक छेद में अन्दर डाल दी और जोर से एक सीत्कार मारी। फ़िर उसने धड़ धड़ अपनी अंगुली अन्दर बाहर करनी शुरू कर दी।

उसकी काले झांटो से भरी चूत और मोटे मोटे नितम्बों को देखकर मेरा दिल तो गाना ही गाने लगा “ये काली काली झांटे ये गोरी गोरी गांड !”

कोई १० मिनट तक वो अपनी अंगुली अन्दर बाहर करती रही। फ़िर एक किलकारी मारते हुए वो झड़ गई। अपनी अंगुली भी उसने एक बार चाटी और अचार की तरह चटकारा लेते हुए अपनी पैंटी पहन ली।

अब वहां रुकने का कोई अर्थ नहीं था। मैं दौड़ कर वापस ड्राइंग रूम में आ गया। मेरा जाल पक्का बन गया था और शिकार ने चारे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था।

आज तो छठा दिन (माहवारी का छठा) दिन … नहीं रात थी और मैं मधु को कहाँ छोड़ने वाला था। मैंने पूरी तैयारी कर ली थी। आज मैंने कस कस कर २ बार उसकी चूत मारी और एक बार गांड। मधु तो जैसे बेहोश होते होते बची। पता नहीं ये औरतें गांड मरवाने में इतना नखरा क्यों करती हैं।

गुरूजी कहते हैं “औरत के तीन छेद होते हैं और तीनो ही छेदों का मज़ा लेना चाहिए। चूत, गांड और मुंह। इसीलिए उसने मनुष्य जन्म लिया है। क्या आपने कभी दूसरे प्राणियों को गुदा मैथुन करते हुए देखा है ये गुण तो भगवन ने सिर्फ़ मनुष्य जाति को ही दिया है।”

वो कहते हैं ना “जिस आदमी ने लाहौर नहीं देखा और अपनी बीवी की गांड नहीं मारी वो समझो जीया ही नहीं।”

चलो लाहौर देखने की तो मजबूरी हो सकती है गांड मारने में कैसी लापरवाही। जो औरतें गांड नहीं मरवाती वो अगले जन्म में किन्नर या खच्चर बनती हैं और सम्भोग नहीं कर पाती। आप तो जानते ही हैं कि खच्चर सम्भोग नहीं कर सकते और किन्नर सिर्फ़ गांड ही मरवा सकते हैं सम्भोग नहीं कर सकते।

अब ये आपके ऊपर है कि अगले जन्म में आप क्या बनाना चाहते हैं और ऊपर जाकर भगवान को क्या मुंह दिखाओगे या दिखाओगी ….”

उस दिन अनारकली ने तो जैसे बम्ब ही फोड़ दिया। मधु ने बताया कि घरवाले अनु का अगले महीने गौना करने वाले हैं। हे भगवन जाल में फंसी मछली क्या इतनी जल्दी निकल जायेगी। हाथ आया शिकार छिटक जाएगा।
 
मैंने मधु से कहा,“पर अनारकली तो अभी छोटी ही है। अभी तो मुश्किल से १७-१८ की हुई होगी!” मैं जानता हूँ वो एक साथ दो दो लंड अपनी चूत और गांड में लेने लायक बन गई है पर मधु के सामने तो उसे बच्ची ही कहना ठीक था।

“अरे आप इन लोगों की परेशानी नहीं जानते। गरीब की लुगाई हरेक की भाभी होती है। जवान होने से पहले ही मोहल्ले, पड़ोस और रिश्तदारों के लौंडे लपाड़े तो क्या घर के लोग ही उनका यौन शोषण कर लेते हैं। चाचा, ताऊ, जीजा, फूफा यहाँ तक कि उसके सगे भाई और बाप भी कई बार तो नहीं छोड़ते हैं।” मधु ने बताया।

“पर अनारकली को तो ऐसी कोई समस्या थोड़े ही है। तुम गुलाबो को समझाने कि कोशिश क्यों नहीं करती ?” मैंने कहा।

“तुम नहीं जानते उसका बाप एक नम्बर का शराबी और चुद्दकड़ है। अनु बता रही थी कि कल उसकी मासी घर आई थी उसके बापू ने उसे पकड़ लिया था। मासी ने शोर मचा कर अपने आप को छुड़ाया। अनु डर रही थी कि कहीं उसे ही ना ….”

मैं तो सुनकर ही हक्का बक्का रह गया। एक और मैं अनारकली को चोदने के चक्कर में लगा था और दूसरी और उसका बाप ही उसकी वाट लगाने पर तुला था। अगर उसका गौना हो गया तो मेरी पिछले २ महीनों की सारी मेहनत बेकार चली जायेगी। मेरा तो मूड ही ख़राब हो गया।

गुरूजी कहते हैं “समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी नहीं मिलता ” पता नहीं भाग्य में कब कहाँ कैसे क्या लिखा है।

उस दिन शाम को मधु ने बताया कि उसकी मम्मी की तबियत ठीक नहीं है। भइया का फ़ोन आया था वो भी जा रहे हैं और मुझे भी जयपुर जाना पड़ेगा। अब ग्वालियर से जयपुर कोई ज्यादा दूर तो है नहीं मैंने झटपट दूसरे दिन ही उसकी रेल की टिकेट कन्फर्म करवा दी। मैंने ऑफिस में जरूरी काम का परफेक्ट बहाना बना दिया।

उसने जाते हुए अनु को मेरा ध्यान रखने को समझाया कि कब नाश्ता देना है, खाना कब देना है, क्या क्या बनाना है। बस तीन चार दिनों की बात है। मजबूरी है। किसी तरह काट लेना।

मैंने मन में भगवान का धन्यवाद किया और थोड़ी सी आशा मन में जगी कि अब अनार को अनारकली बनने का माकूल (सही) समय आ गया है।

मैंने स्टेशन पर उसे छोड़ते समय इतनी बढ़िया एक्टिंग की जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से बिछुड़ रहा हो। अगर दिलीप कुमार उस वक्त देख लेता तो कहता मधुमती में उसकी एक्टिंग भी ऐसी नहीं थी। मधु एक बार तो बोल ही पड़ी कि “वैसे भइया तो जा ही रहे हैं तुम मेरे बिना इतने उदास हो रहे हो तो मैं जाना कैंसिल कर दूँ?”

मैं घबरा गया अच्छी एक्टिंग भी कई बार महंगी पड़ जाती है। मैंने कहा “अरे बूढा शरीर है ऐसे समय में जाना जरूरी होता है। कल को कोई ऐसी वैसी बात हो गई तो हमें जिन्दगी भर पछतावा रहेगा तुम मेरी चिंता छोडो किसी तरह ३-४ दिन तुम्हारे बिना काट ही लूँगा पर लौटने में देरी कर दी तो मुझे जरूरी काम छोड़ कर भी तुम्हे लेने आना पडेगा हनी डार्लिंग !”

आप तो जानते ही है जब मुझे मधु को गोली पिलानी होती है मैं उसे हनी कहता हूँ। मधु ने मेरी और ऐसे देखा जैसे मैं कोई शहजादा सलीम हूँ और वो अनारकली जो मुझसे दूर जा रही है।

रात अनारकली के सपनों में ही बीत गई। सुबह मुझे अनारकली की मीठी आवाज ने जगाया। वो आते ही बोली “दीदी के पहुँचने का फोन आया क्या ..??”

“क्यों हम अकेले अच्छे नहीं लगते क्या ?”

“ओह … वो ..वो .. बात नहीं …” अनारकली थोड़ा झिझकते हुए बोली “आपके लिए चाय बनाऊं ?”

“नहीं पहले मेरे पास बैठो मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है ” मैंने आज पहली बार उसे बेड पर अपने पास बैठाया।

वो हैरानी से मेरी ओर देखने लगी।

“मैंने सुना है तुम्हारी शादी हो रही है?”- मैंने पूछा।

“शादी नहीं साहब गौना हो रहा है।”

“हाँ हाँ वही ! पर तुम तो अभी बहुत छोटी हो। इतनी कम उम्र में ??”

“छोटी कहाँ हूँ ! पूरी १८ की हो गई हूँ। और फ़िर गरीब की बेटी तो घरवालों, रिश्तेदारों और मोहल्ले वालों, शोहदों की नज़र में तो १०-१२ साल की भी जवान हो जाती है। हर कोई उसे लूटने खसोटने के चक्कर में रहता है।”

अनारकली ने माहौल ही संज़ीदा (गम्भीर) बना दिया। मैंने बात को अपने मतलब की ओर मोड़ते हुए कहा,“ चलो वो तो ठीक है पर तुम तो जानती हो मैं …. मेरा मतलब है मधु …. हम सभी तुम्हें कितना प्प्यऽऽ ….. चाहते हैं, तुम हम से दूर चली जाओगी” मैं हकलाता हुआ सा बोला और उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसने हाथ छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की।

मेरा जी तो कर रहा था कि कह दूँ कि मैं भी तुम्हें चोदने के चक्कर में ही तो लगा हूं, पर कह नहीं पाया।

“हाँ साहब ! मैं जानती हूँ। आप और मधु दीदी तो मुझे बहुत चाहते हो, दीदी तो मुझे छोटी बहन की तरह मानती हैं। दुःख तो मुझे भी है पर ससुराल तो एक दिन जाना ही पड़ता है ना ! क्यों ! मैं गलत तो नहीं कह रही ?”

“ ” मैं चुप रहा।

अनारकली फ़िर बोली,“साहब आप उदास क्यों होते हो ! आपको कोई और नौकरानी मिल जाएगी।”

“पर तुम्हारे जैसी कहाँ मिलेगी !”

“क्यों ऐसा क्या है मुझ में ?”

“अरे मेरी रानी तुम नहीं जानती तुम कितनी सुन्दर हो …. म्म…. मेरा मतलब है तुम हर काम कितने सुन्दर ढंग से करती हो।”

“काम का तो ठीक है पर इतनी सुन्दर कहाँ हूँ?”

“हीरे को अपनी कीमत का पता नहीं होता, कभी मेरे जैसे ज़ोहरी की नज़रों से भी तो देखो ?”

“साहब इतने सपने ना दिखाओ कि मैं उनके टूटने का गम बर्दाश्त ही ना कर पाऊँ !”

“देखो अनारकली मैं सच कहता हूँ, तुम्हारे जाने के बाद मेरा मन बहुत उदास हो जाएगा।”

“मैं जानती हूँ साहब” अनारकली ने अपनी पलकें बंद कर ली।

लोहा गरम हो गया था, जाल बिछ गया था, अब तो बस शिकार फ़ंसने ही वाला था। मैं जबरदस्त ऐक्टिंग करते हुए बोला, “ अनार मुझे लगता है हमारा पिछले जन्म का जरूर कोई रिश्ता है। कहीं तुम पिछले जन्म में अनारकली या मधुबाला तो नहीं थी ?” मैंने पासा फ़ेंका।

मैं आगे बोलने जा ही रहा था कि ” और मैं शहज़ादा सलीम ” पर मेरे ये शब्द होंठों में ही रह गए।

अनारकली बोली,“मुझे क्या मालूम बाबूजी, आप तो मुझे सपने ही दिखा रहे हैं” अनारकली की आँखें अब भी बंद थी वो कुछ सोच रही थी।

“मैं तुम्हें कोई सपना नहीं दिखा रहा बिल्कुल सच कहता हूँ मैं तुम्हें इन दो महीनो में ही कितना चाहने लगा हूँ अगर मेरी शादी नहीं हुई होती तो मैं तुम्हें ही अपनी दुल्हन बना लेता !”

“साहब मैं तो अब भी आपकी ही हूँ !”

मेरा दिल उछलने लगा। मछली फंस गई। मेरा लंड तो इस समय कुतुब मीनार बना हुआ था। एक दम १२० डिग्री पर अगर हाथ भी लगाओ तो टन्न की आवाज आए।

मैंने उसे अपनी बाहों में भर लेना चाहा पर कुछ सोच कर केवल उसकी ठुड्डी को थोड़ा सा उठाया और अपने होंठ उसकी और बढाए ही थे कि उसने अपनी आँखें खोली और मुझे अपनी ओर बढ़ते हुए देख कर अचानक उठ खड़ी हुई। मेरा दिल धक् से रह गया कहीं मछली फिसल तो नहीं जा रही।

“नहीं मेरे शहजादे इतनी जल्दी नहीं। तुम्हारे लिए हो सकता है ये खेल हो या टाइम पास का मसाला हो पर मेरे लिए तो जिन्दगी का अनमोल पल होगा। मैं इतनी जल्दबाजी में और इस तरीके से नहीं गुजारना पसंद करुँगी ”

“प्लीज़ एक बार मेरी अनारकली बस एक बार !” मैं गिड़गिड़ाया। मैं तो अपनी किल्ली ठोक देने पर उतारू था।

पर वो बोली,“सब्र करो मेरे परवाने इतनी भी क्या जल्दी है। आज की रात को हम यादगार बनायेंगे !”

“पर रात में तुम कैसे आओगी ?? तुम्हारे घरवाले ?” मैंने अपनी आशंका बताई।

“वो मुझ पर छोड़ दो। आप नहीं जानते, जब आप टूर पर कई कई दिनों के लिए बाहर जाते हो, मैं दीदी के पास ही तो सोती हूँ मेरे घरवालों को पता है ” अनारकली ने मेरे होंठों पर अंगुली रखते हुए कहा।

मैं गुमसुम मुंह बाए वहीँ खड़ा रह गया। अनारकली चाय बनने रसोई में चली गई।

मैं सोचने लगा कहीं वो मुझे मामू (चूतिया) तो नहीं बना गई ?

ये साला सक्सेना भी एक नम्बर का गधा है। (अरे यार ! हमारा पड़ोसी !). हर सही चीज ग़लत समय पर करेगा। रात को ११ बजे भजन सुनेगा और सुबह सुबह फरीदा खानम की ग़ज़ल। अब भी उसके फ्लैट (हमारे बगलवाले) से डेक पर सुन रहा है_

यूँ ही पहलू में बैठे रहो !

आज …. जाने की जिद ना ….करो !!

पर आज मुझे लगा कि उसने सही गाना सही वक्त पर लगाया है।

आज शुक्रवार का दिन था। ऑफिस में कोई ख़ास काम नहीं था। मैंने छुट्टी मार ली। दिन में अनारकली के लिए कुछ शोपिंग की। मेरा पप्पू तो टस से मस ही नहीं हो रहा था रात के इन्तजार में। एक बार तो मन किया की मुठ ही मार लूँ पर बाद में किसी तरह पप्पू को समझाया “थोड़ा सब्र करना सीखो ”

रात कोई १०.३० बजे अनारकली चुपचाप बिना कॉल बेल दबाये अन्दर आ गई और दरवाजा बंद कर दिया। मैं तो ड्राइंग रूम में उसका इन्तजार ही कर रहा था। एक भीनी सी कुंवारी खुशबू से सारा ड्राइंग रूम भर उठा।

उसके आते ही मैं दौड़ कर उससे लिपट गया और दो तीन चुम्बन उसके गालों होंठो पर तड़ा तड़ ले लिए। वो घबराई सी मुझे बस देखती ही रह गई।

“ओह .. फिर उतावलापन मेरे शहजादे हमारे पास सारी रात पड़ी है जल्दी क्या है ?”

“मेरी अनारकली अब मुझसे तुम्हारी ये दूरी सहन नहीं होती !”

“पहले बेडरूम में तो चलो !”

मैंने उसे गोद में उठा लिया और बेडरूम में आ गया। अब मेरा ध्यान उसकी ओर गया। पटियाला सूट पहने, बालों में पंजाबी परांदा (फूलों वाली चोटी), होंठों पर सुर्ख लाली। मैं तो बस उसे देखता ही रह गया। सूट में टाइट कसे हुए उसके उन्नत उरोज पतली कमर, मोटे नितम्ब मैं अपने आप को काबू में कहाँ रख पाता। मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया। उसने भी अपनी आँखें बंद कर ली।

“मेरी अनारकली !”

“हाँ मेरे शहजादे !”

“मुझे तो विश्वास ही नहीं था कि तुम आओगी। मुझे तो लग रहा है कि मैं अब भी सपना देख रहा हूँ !”

“नहीं मेरे शहजादे ! ये ख्वाब नहीं हकीकत है। ख्वाब तो मेरे लिए हैं !”

“वो क्यों ?”

“मेरा मन डर रहा है कहीं तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे। अनारकली कि किस्मत में तो दीवार में चिनना ही लिखा होता है !”

“नहीं मेरी अनारकली मै तुमसे प्यार करता हूँ तुम्हें कैसे धोखा दे सकता हूँ ” मैंने कह तो दिया पर बाद में सोचा अगर उसने पूछ लिया क्या मधु के साथ ये धोखा नहीं है तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होगा। मैंने उससे कहा “अनारकली मैं शादी शुदा हूँ अपनी बीवी को तो नहीं छोड़ सकता पर तुम्हें भी उतना ही प्यार करता रहूँगा जितना मधु से करता हूँ। ”

“मुझे यकीन है मेरे शहजादे !”

अनु जिस तरीके से बोल रही थी मैं सोच रहा था कहीं अनारकली सचमुच ‘मुग़ल-ऐ-आज़म’ तो नहीं देख कर आई है।

अब देरी करना कहाँ की समझदारी थी। मैंने पूरा नाटक करते हुए पास पड़ी एक छोटी सी डिबिया उठाई और उसमें से एक नेकलेस (सोने का) निकाला और अनारकली के गले में डाल दिया। (इस मस्त हिरणी क़यामत के लिए ५-१० हज़ार रुपये की क्या परवाह थी मुझे)

अनारकली तो उसे देखकर झूम ही उठी और पहली बार उसने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख कर चूम लिए। मैंने उसके कपड़े उतार दिए और अपना भी कुरता पाजामा उतार दिया।

उसने लाइट बंद करने को कहा तो मैंने मना कर दिया। हमारे प्यार का भी तो कोई गवाह होना चाहिए। वो बड़ी मुश्किल से मानी।

मैं सिर्फ़ चड्डी में था। अनारकली ब्रा और पैन्टी में। ये वोही ब्रा और पैन्टी थी जो मैंने उसे १०-१५ दिन पहले लाकर दी थी। वो पूरी तैयारी करके आई थी।

मैं तो उसका बदन देखता ही रह गया। मैंने उसे बाहों में भर लिया और ब्रा के हुक खोल दिए …..

एक दम मस्त कबूतर छलक कर बाहर आ गए, गोरे गोरे छोटे नाज़ुक मुलायम ! एरोला कोई १.५ या २ इन्च का गहरे गुलाबी रंग के चुचूक मटर के दाने जितने।

मैंने उनको मुँह में ले कर चूसना शुरू कर दिया। वो ज़ोर ज़ोर से सीत्कार करने लगी। मैं एक हाथ से एक अनार दबा रहा था और उसके नितम्बों पर कभी पीठ पर घुमा रहा था। उसके हाथ मेरे सिर पर और पीठ पर घूम रहे थे। कोई दस मिनट तक मैंने उसके स्तनों को चूसा होगा। अब मैंने उसकी पैन्टी उतार दी। उसने शर्म के मारे अपने हाथ चूत पर रख लिए।

मैंने कहा- “मेरी रानी ! हाथ हटाओ !”

तो वो बोली- “मुझे शर्म आती है !”

मैंने कहा,“ अगर शर्म आती है तो अपने हाथ अपनी आँखों पर रखो, इस प्यारी चीज़ पर नहीं, अब इस पर तुम्हारा कोई हक नहीं रहा। अब यह मेरी हो गई है !”

“हाँ मेरे शहज़ादे ! अब तो मैं सारी की सारी तुम्हारी ही हूँ !”

मैंने झट से उसके हाथ परे कर दिए। वाह !! क्या कयामत छुपा रखी थी उसने ! पाव रोटी की तरह फ़ूली हुई लाल सुर्ख चूत मेरे सामने थी, बिल्कुल गोरी चिट्टी! झाँटों का नाम निशान ही नहीं, जैसे आज़ ही उसने अपनी झाँट साफ़ की हो। चूत की फ़ांकें संतरे की फ़ांकों जितनी मोटी और रस भरी। अन्दर के होंठ हल्के गुलाबी और कोफ़ी रंग के आपस में जुड़े हुए। चूत का चीरा कोई चार इन्च क गहरी पतली खाई जैसे। चूत का दाना मटर के दाने जितना बड़ा सुर्ख लाल बिल्कुल अनारदाने जैसा। गोरी जांघें संगमरमर की तरह चिकनी। दांई जांघ पर एक तिल। चूत की प्यारी पड़ोसन (गाण्ड) के दर्शन अभी नहीं हुए थे क्योंकि अनारकली अभी लेटी थी और उसके पैर भींचे हुए थे।

मैंने उसके पैरों को थोड़ा फ़ैलाया तो गाण्ड का छेद भी नज़र आया। छेद बहुत बड़ा तो नहीं पर इतना छोटा भी नहीं था, हल्के भूरे रंग का बिल्कुल सिकुड़ा हुआ चिकना चट्ट्। उस छेद की चिकनाहट देख कर मुझे हैरानी हुई कि यह छेद इतना चिकना क्यों है !

बाद में मुझे अनारकली ने बताया था कि वो पूरी तैयारी करके आई थी। उसने अपनी झाँट आज़ ही साफ़ की थी और चूत और गाण्ड दोनों पर उसने मेरी दी हुई खुशबू वाली क्रीम भी लगाई थी।

मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और अपने जलते होंठ उसकी गुलाबी चूत की फ़ांकों पर रख दिए। वो जोर जोर से सीत्कारने लगी। उसकी कुँवारी चूत की महक से मेरा तन मन सब सराबोर हो गया। एक चुम्मा लेने के बाद मैंने जीभ से उसकी अन्दर वाली फ़ांकें खोली और अपनी जीभ उसके अन्दर डाल दी।

उसने अपनी दोनों जांघें ऊपर मोड़ कर मेरे गले में कैंची की तरह डाल दी और मेरे सिर के बाल पकड़ लिए। मैं मस्त हुआ उसकी चूत चूसे चाटे जा रहा था। कोई दस मिनट तक मैंने उसकी चूत चाटी होगी। वो मस्त हुई सीत्कार किए जा रही थी और बड़बड़ा रही थी,“ मेरे शहज़ादे ! मेरे सलीम ! साहब जी ! ……”

अब उसके झड़ने का वक्त नज़दीक आ रहा था, वो जोर जोर से चिल्ला रही थी और जोर से चूसो ! और जोर से चूसो ! मज़ा आ रहा है !

मेरा लण्ड चड्डी में अपना सिर धुन रहा था। मैंने एक हाथ से उसके एक संतरे को कस कर पकड़ लिया और उसे मसलने लगा। दूसरे हाथ की तर्ज़नी उंगली से उसकी नर्म चिकनी गाण्ड का छेद टटोलने लगा। जब छेद मिल गया तो मैंने तीन काम एक साथ किए। पहला उसकी एक चूची को मसलना, दूसरा चूत को पूरा मुंह में ले कर जोर से चूसना और तीसरा अपनी एक उंगली उसकी गाण्ड के छेद में डाल दी।

उसका शरीर पहले से ही अकड़ता जा रहा था, उसकी जांघें मेरे गले के गिर्द जोर से लिपटी हुई थी। उसने एक जोर की किलकारी मारी और उसके साथ ही वो झड़ गई। उसकी चूत से कोई दो चम्मच शहद जैसा खट्टा मीठा नमकीन नारियल पानी जैसे स्वाद वाला काम रस निकला जिससे मेरा मुंह भर गया। मैं उसे पूरा पी गया। फ़िर वो शांत पड़ गई। औरत को स्खलित करवाने का यह सबसे बढ़िया तरीका है, समझो ‘ राम बाण ‘ है। मधु को झड़ने में कई बार जब देर लगती है तो मैं यही नुस्खा अपनाता हूँ।

मैंने अपनी चड्डी निकाल फेंकी। मेरा शेर दहाड़े मारने लगा था। आज तो उसका जलाल देखने लायक था। ७” का मोटा गेहुंआ रंग १२० डिग्री में मुस्तैद जंग लड़ने वाले सिपाही की तरह। मैंने अनारकली से उसे प्यार करने को कहा तो वो बोली “नही आज नहीं चूस सकती !” मैंने जब इसका कारण पूछा तो वो बोली “आज मेरा शुक्रवार का व्रत है नहीं तो मैं आपको निराश नहीं करती। मैं जानती हूँ इस अमृत को पीने से आंखों की ज्योति बढ़ती है और पति की उमर, पर क्या करूं ये कुछ खट्टा सा होता है न और शुक्रवार के व्रत में खट्टा नहीं खाया पीया जाता !”
 
मैंने कहा मैं पानी मुंह में नहीं निकालूँगा बस एक बार तुम इसे मुंह में लेकर चूस लो। तो वो मान गई और अपने घुटनों के बल बैठकर मेरा लण्ड चूसने लगी। पहले उसने उसे चूमा फ़िर जीभ फिराई और बाद में अपने मुंह में लेकर चूसने लगी। मेरे लण्ड ने २-३ टुपके प्री-कम के छोड़ ही दिए पर लण्ड चूसने की लज्जत में उसे कुछ पता नहीं चला। जब मुझे लगने लगा कि अब मामला गड़बड़ हो सकता है मैंने अपना लण्ड उसके मुंह से बाहर निकाल लिया।

अब तो बस यू पी, बिहार (चूत और गाण्ड) लूटने का काम रह गया था। मैंने उसे सीधा लेटा दिया। अपनी तर्जनी अंगुली पर थूक लगाया और उसकी पहले से ही गीली चूत में गच्च से डाल दी तो वो चिहुंकी, “ऊईई …. माँ …..”

अब देर करना कहाँ की समझदारी थी मैंने झट से अपना लण्ड उसकी चूत के मुहाने पर रखा और एक जोर का धक्का लगाया। आधा लण्ड गप्प से उसकी रसीली चूत में चला गया। एक दो झटकों के साथ ही मेरा पूरा का पूरा ७” का लण्ड उसकी चूत में फिट हो गया। वो थोड़ा सा चिहुंकी पर बाद में सीत्कार के साथ आ …. उईईई ….. आँ ….. करने लगी। मुझे शक हुआ कहीं उसकी चूत पहले से चुदी तो नहीं है?

मैंने उसे पूछ ही लिया,“क्यों मेरी अनारकली ! ज्यादा दर्द तो नहीं हुआ ?”

वो मुस्कराते हुए बोली “मैं जानती हूँ कि आप क्या पूछना चाहते हैं ?”

“क्या ?”

“कि मेरी सील टूटने पर खून क्यों नहीं निकला और पहली बार लण्ड लेने पर भी मैं चीखी चिल्लाई क्यों नहीं?”

“हूँ …. हाँ ”

तो सुनिए “मेरी चूत और गाण्ड दोनों ही अन-चुदी और कुंवारी हैं और आज पहला लण्ड आपका ही उसके अन्दर गया है। पर मेरी चूत की सील पहले से ही टूटी है?”

“वो कब …. ये कैसे हुआ?” सुनकर मुझे बड़ी हैरानी हुई।

“दर असल कोई ९-१० महीने पहले एक दिन बापू ने अम्मा को बहुत बुरी तरह चोदा था। उस रात मैं और छोटे भाई बहन एक कोने में दुबके पड़े थे। हमारे घर में एक ही कमरा है न।

बापू बता रहे थे की उन्होंने कोई ११ नम्बर की गोली खाई है। (वो वियाग्रा की बात कर रही थी)

उनका गधे जैसा लण्ड कोई ८-९ इंच का तो जरूर होगा। अम्मा की दो तीन बार जमकर चुदाई की और एक बार गाण्ड मार कर उसे अधमरी करके ही उन्होंने छोड़ा था। ये जो नया कैलेंडर आया है शायद उसी रात का कमाल है। मैं जाग रही थी। मैंने पहली बार अपनी चूत में अंगुली डाल कर देखी थी। मुझे बहुत मज़ा आया। जब मैं बहुत उत्तेजित हो गई तो मैं पानी पीने के बहाने के बाहर आई और रसोई में जाकर वहाँ रखी एक मोटी ताज़ी मूली पड़ी देखी जो बापू के लण्ड के आकार की लग रही थी। मैंने उसे थोड़ा सा आगे से तोड़ा और सरसों का तेल लगाकर एक ही झटके में अपनी कुंवारी चूत में डाल दिया। मेरी दर्द के मारे चीख निकल गई और चूत खून से भर गई। मुझे बहुत दर्द हुआ। मैं समझ गई मेरी सील टूट गई है .” उसने एक ही साँस में सब कुछ बता दिया था।

फ़िर थोड़ी देर बाद बोली “अरे रुक क्यों गए धक्के क्यों बंद कर दिए?”

मैंने दनादन ४-५ धक्के कस कर लगा दिए। अब तो मेरा लण्ड दुगने उत्साह से उसे चोद रहा था। क्या मक्खन मलाई चूत थी। बिल्कुल मधु की तरह। सील टूटने के बाद भी एक दम कसी हुई।

उसकी चुदाई करते मुझे कोई २० मिनट तो हो ही गए थे। उसकी चूत इस दौरान २ बार झड़ गई थी और अब मेरा शेर भी किनारे पर आ गया था। मैंने उसे बताया कि मैं झड़ने वाला हूँ तो वो बोली अन्दर ही निकाल दो। मैंने उससे कहा कि अगर कोई गड़बड़ हो गई तो क्या होगा?

तो वो बोली “मेरे शहजादे मैं तो कब से इस अमृत की प्यासी हूँ अगर बच्चा ठहर गया तो भी कोई बात नहीं, १५ दिनों बाद गौना होने वाला है। तुम्हारे प्यार की निशानी मान कर अपने पास रख लूंगी, किसी को क्या पता चलेगा !”

और फ़िर मैंने ८-१० करारे झटके लगा दिए। मेरे लण्ड ने जैसे ही पहली पिचकारी छोड़ी ड्राइंग रूम में लगी दीवाल घड़ी ने भी टन्न टन्न १२ घंटे बजा दिए और मेरे लण्ड से भी दूसरी तीसरी चौथी ………… पिचकारियाँ निकलती चली गई। अनार अब मेरी यानी प्रेम की अनारकली बन चुकी थी।

हम लोग कोई १० मिनट इसी तरह पड़े रहे।

फ़िर अनारकली बोली “मेरे शहजादे आपने मुझे अपनी अनारकली तो बना दिया पर मेरी मांग तो भरी ही नहीं?”

मैंने अपना अंगूठा उसकी चूत में घुसा कर अपने वीर्य और चूतरस में डुबो कर उसकी मांग भर दी और उसके होंठों पर एक चुम्बन ले लिया। उसने भी नीचे झुककर मेरे पाऊँ छू लिए और मेरे गले से लिपट गई।

फ़िर हम उठाकर बाथरूम में गए और सफाई करी। सफाई करते समय मैंने देखा था उसकी चूत फूल सी गई थी और बाहर के होंठ भी सूज कर मोटे हो गए थे।

! यानि उम्मीद से दुगने ! !

उसने मेरे लण्ड पर एक चुम्मा लिया और मैंने भी उसकी चूत पर एक चुम्मा लेकर उसका धन्यवाद किया।

वो एक बार फ़िर मेरा लण्ड लेकर चूसने लगी। ५ मिनट चूसने के बाद मेरा लण्ड फ़िर खड़ा हो गया। मैंने उससे कहा “डारलिंग अब मैं तुम्हें घोड़ी बनाकर चोदना चाहता हूँ !”

तो वो बोली “अब घोड़ी बनाओ या कुतिया क्या फर्क पड़ता है पर पानी अन्दर मत छोड़ना ”

मैंने हैरानी से पूछा “क्यों एक बार तो अन्दर ले ही चुकी हो ”

तो वो बोली “ये अन्दर की बात है तुम नहीं समझोगे !”

मुझे बड़ी हैरानी हुई। मैंने उसे घोड़ी बनाकर जल्दी से लण्ड अन्दर डाला और १५-२० धक्के लगा दिए। उसके गोल गोल सिंदूरी आमों जैसे उरोज के बीच फंसा सोने का लोकेट ऐसे लग रहा था जैसे घड़ी का पेंडुलम। अनारकली तो मस्त हुई आह …. उह्ह …. उईईइ …. करती जा रही थी। मैं जोर जोर से धक्के लगा रहा था। उसकी गाण्ड ऐसे खुल और बंद हो रही थी जैसे कोई सीटी बजा रहा हो मैंने अपनी एक अंगुली पर थूक लगाया और उसकी गाण्ड में पेल दी।

अनारकली एक झटके से अलग हो गई और बोली बस अब खेल खत्म ! और वो खड़ी हो गई। उसने एक बार मेरे लण्ड को फ़िर धोया और चूम लिया।

अब मैंने उसे गोद में उठाया और फ़िर बेड पर लाकर लिटा दिया। मैं बेड पर सिराहने की ओर बैठ गया और अनारकली मेरी गोद में सर रख कर लेट गई। मैंने पूछा “मेरी जान कैसी लगी पहली चुदाई?”

“जैसा मधु दीदी ने बताया था बिल्कुल वैसी ही रही !”

अब चौंकने की बारी मेरी थी। “क्या कह रही हो? मधु को कैसे? पता क्या …. मधु …. ??”

“अरे घबराओ नहीं मेरे सैंया वो बेचारी तो सपने में भी तुम्हारे बारे में ऐसा नहीं जान सकती और सोच सकती !”

“तो फ़िर ”

“दर असल दीदी मेरे से कुछ नहीं छिपाती। वो तो मुझे अपनी छोटी बहन ही मानती हैं और जब से उन्हें मेरे गौने के बारे में पता लगा है उन्होंने मुझे चुदाई की सारी ट्रेनिंग देनी भी शुरू कर दी है।”

“क्या क्या बताया उसने?” मैंने पूछा

“सब कुछ ! सुहागरात के बारे में ! चुदाई के आसनों के बारे में ! चूत लण्ड और गाण्ड के बारे में !”

“अरे क्या उसने साफ़ साफ़ इनका नाम लिया?”

“नहीं उन्होंने तो पता नहीं कोई ‘ काम-दंड ‘,’ रस-कूप ‘ और ‘ प्रेम-द्वार ‘, ‘ प्रेम मिलन ‘ पता नहीं क्या क्या नाम ले रही थी?”

“तो फ़िर तुम क्यों इनका वैसे ही नाम नहीं लेती?”

“अरे बाबू क्या फर्क पड़ता है? चुदाई को प्रेम मिलन कहो या मधुर मिलन। छुरी खरबूजे पर पड़े या खरबूजा छुरी पर मतलब तो खरबूजे को कटना ही है। अब लण्ड को काम-दंड बोलो या चूत को बुर या प्रेम-द्वार, चुदना और फटना तो चूत को ही पड़ेगा ना? ये तो पढ़े लिखे लोगों का ढकोसला है। अपनी पत्नी या प्रेमिका को अपने शब्दजाल में फंसा कर उसे खुश करने का बहाना है कि वो उसे प्यार करता है मतलब तो चुदाई से ही है ना। अपने नंगेपन के ऊपर परदा डालने का एक तरीका है। क्या किसी कड़वी गोली के ऊपर शहद की चाशनी लगा देने से उस दवाई का असर ख़त्म हो जाएगा?”
 


अनारकली का दर्शन शास्त्र (फलसफ़ा) सुनकर मैं तो हक्का बक्का रह गया। मेरा सेक्स का सारा ज्ञान इसके आगे जैसे फजूल था। मैंने फ़िर उससे पूछा “उसने और क्या क्या बताया है?”

तो वो बोली,“बहुत कुछ …. वो तो मेरी गुरु है !”

ऐसा नहीं है कि मैं चुपचाप उसकी बातें ही सुन रहा था। मैं उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा था और वो मेरे लण्ड से खेल रही थी। उसने पाँव ऊपर उठा रखे थे और अपने नितम्बों पर धीरे धीरे मार रही थी। जब भी उसकी एड़ी नितम्ब को छूती तो उसके नितम्ब दब जाते और जोर से हिलते। मैंने जब उसके गोल गोल नितम्बों की ओर देखा और मेरा मन उसकी नरम नाज़ुक गुलाबी गाण्ड मारने को उतावला हो गया। ख़याल आते ही मेरे लण्ड ने एक ठुमका लगाया और फ़िर से चुस्त दरुस्त हो गया। अनार ने तड़ से एक चुम्मा उस पर ले ही लिया और मैंने चूत कि सुनहरी पड़ोसन के मुंह में अपनी एक अंगुली डाल दी।

अनार कली थोड़ी सी चिहुंकी “ऊईई माँ …… क्या कर रहे हो ?”

मैंने उसके होंठों पर एक चुम्मा ले लिया। मैं अभी उसे गाण्ड मरवाने के लिए कहने की सोच ही रहा था की वो बोल पड़ी “दीदी सच कहती थी !”

“क्या?”

“कि सब मर्द एक जैसे होते हैं !”

“क्या मतलब?”

“वो आपके बारे में भी एक बात कहती थी !”

“वो क्या?”

“कि तुम चूत भले ही मारो या न मारो पर गाण्ड के बहुत शौकीन हो। मैं जानती हूँ तुम गाण्ड मारे बिना नहीं मानोगे। पर मेरे शहजादे मैं उसकी भी पूरी तैयारी करके आई हूँ !”

मैं तो हक्का बक्का बस उसे देखता ही रह गया। मधु बेचारी को क्या पता कि उसने कितनी बड़ी गलती की है अनारकली को सब कुछ समझाकर। पर चलो ! मेरे लिए तो बहुत ही अच्छी बात है।

मधु डार्लिंग ! इसी लिए तो तुम को मैं इतना प्यार करता हूँ। गुरूजी ठीक कहते हैं गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है “हे अर्जुन ! इस ज्ञान को केवल पात्र मनुष्य को ही देना चाहिए !”

अनारकली से ज्यादा अच्छा पात्र भला कौन हो सकता था। अब साड़ी बातें मेरी समझ में आ गई कि ये दोनों अन्दर क्या खुसर फुसर करती रहती हैं।

“तो क्या तुम तैयार हो ?”

“नेकी और पूछ पूछ पर एक ध्यान रखना मेरी गाण्ड में अब तक दीदी कि अंगुली के सिवा कोई दूसरी चीज नहीं गई है एक दम कोरी और अनछुई है। प्यार से करना और धक्के जोर से नहीं समझे मेरे एस .एस .एस। (ट्रिपल एस)”

“ये एस .एस .एस। क्या होता है?”

“शौदाई शहजादा सलीम ”

मेरी हँसी निकल गई। शौदाई पागल प्रेमी को कहते हैं। फ़िर मैंने उससे पूछा “पर तुम तो कह रही थी कि तुमने इसकी भी तैयारी कर रखी है फ़िर डर कैसा। प्लीज़ बताओ क्या क्या तैयारी की है ?”

“दीदी बता रही थी कि गाण्ड रानी की महिमा बहुत बड़ी है। चूत तो दो चार बार चुदने से ढीली हो जाती है पर गाण्ड मर्जी आए जितनी मारो लो उतनी ही टाइट रहती है। हाँ लगातार मारते रहने से उसके चारों और काला घेरा जरूर बन जाता है। गाण्ड मरवाने से नितम्ब भी भारी और सुंदर बनते हैं। गाण्ड मारने और मरवाने का अपना ही सुख और आनंद है। पहले पहले सभी औरतों को डर लगता है पर एक बार गाण्ड मरवाने का चस्का लग जाए तो फ़िर रोज गाण्ड मरवाने को कहती है। गाण्ड मरवाने से पति और प्रेमी का प्यार बढ़ता है !”

“पर मधु तो मुझे से गाण्ड मरवाने में बहुत नखरे करती है ”

“अरे बाबू वो तो बस तुम्हें अपने ऊपर लट्टू करने का नाटक है अगर एक बार मांगने से ही गाण्ड मिल जाए तो वो मज़ा नहीं आता। जिस चीज को जितना मना करो उतना ही ज्यादा करने को मन करता है !”

“ओह …..” साली मधु की बच्ची मेरे साथ इतना नाटक। फ़िर मैंने कहा “और वो तैयारी वाली बात?”

“जो लड़की या औरत पहली बार गाण्ड मरवाने जा रही उनके लिए एक टोटका दीदी ने बताया था !”

“हूँ …. क्या ?”

“लड़की को उकडू बैठ जाना चाहिए और बोरोलीन या कोई और क्रीम की मटर के दाने जितनी मात्रा अपनी अंगुली पर लगा कर धीरे से गाण्ड के छेद पर लगा लो फ़िर उठकर खड़ी हो जाओ। अब फ़िर नीचे उसी तरह बैठ कर अपनी गाण्ड को छोटे शीशे में देखो जितनी दूर वो क्रीम फ़ैल गई है अगर लण्ड की मोटाई उतनी ही है या कम, तो डरने की कोई बात नहीं है उतना मोटा लण्ड गाण्ड रानी आसानी से झेल लेगी। हाँ एक बात और जिस दिन गाण्ड मरवाने का हो उस दिन दिन में २-३ बार कोई क्रीम वैसलीन या तेल जरूर अपनी महारानी के अन्दर लगा लेना चाहिए !”

“अरे मेरी प्यारी अनारकली तू तो सचमुच मेरी भी गुरु बन गई है मैं तो ऐसे ही अपने आप को प्रेम (लव/सेक्स) गुरु समझता रहा हूँ !”

अब स्वर्ग के दूसरे द्वार का उदघाटन करने का वक्त आ गया था। मैंने अनारकली को घुटनों के बल कुतिया स्टाइल में कर दिया। वो मेरी और देखकर मुस्कराई और फ़िर मेरे होंठों पर एक चुम्मा लेकर बोली “वैसलीन लगना न भूलना !”

“ठीक है मेरी गुरूजी !”

अनारकली की मस्त गुलाबी गाण्ड का छेद अब ठीक मेरे सामने था। उसका छोटा सा गुलाबी छेद खुल और सिकुड़ रहा था। मैंने प्यार से उस पर अपनी अंगुली फिराई और अपनी जीभ की नोक उस पर टिका कर ऊपर से नीचे घुमाई। अनारकली की किलकारी हवा में गूंज उठी। मुझे लगा कि उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया है। फ़िर मैंने बोरोलीन की ट्यूब उठाई और उसका ढक्कन खोल कर उसकी टिप अनारकली की गाण्ड के छेद के अन्दर थोड़ी सी फंसा कर आधी ट्यूब अंदर खाली कर दी।

अनारकली थोड़ा सा कुनमुनाते हुए बोली “ओह …. क्या कर रहे हो गुदगुदी होती है !”

“बस हो गया मेरी जान !” अब मैंने अपने लण्ड पर भी क्रीम लगाई और अपने लण्ड का सुपारा उसकी गाण्ड के खुलते बंद होते छेद पर टिका दिया।

अनारकली शायद हनुमान चालीसा पढने लगी।

मैंने धीरे से एक धक्का लगाया। लण्ड अन्दर जाने के बजाय फिसल गया। एक दो धक्के और लगाए पर लण्ड कभी ऊपर फिसल जाता कभी नीचे वाले छेद में घुस जाता पर गाण्ड के अन्दर नहीं गया। मैं अब तक १०-१२ लड़कियों और औरतों की गाण्ड मार चुका हूँ पर पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। चलो पहले धक्के में तो लण्ड कई बार गाण्ड के अन्दर नहीं जाता पर ऐसा क्या जादू है अनारकली की गांड में कि वो लण्ड को अन्दर नहीं जाने दे रही। माना कि उसकी गांड कि मोरी बहुत टाइट थी, कोरी और अन-चुदी थी पर ऐसा क्या था कि मेरा लण्ड पूरा खड़ा होने के बाद भी अन्दर नहीं जा रहा था।
 
अनारकली मेरी हालत पर हंसे जा रही थी। फ़िर वो बोली “क्या हुआ मेरे शहजादे प्रेम ?”

“वो …. वो ….” मैं तो कुछ बोलने की हालत में ही नहीं था। मैंने एक धक्का और लगाया पर वोही ढाक के तीन पात।

फ़िर अनारकली बोली- चलो अब एक बार और कोशिश करो। इस बार जैसे ही मैंने उसके छेद पर अपना लण्ड टिका कर जोर का धक्का मारा तो कमाल ही हो गया, मेरा लण्ड ५ इंच तक उसकी गांड में गच्च से घुस गया। अनारकली की दर्द के मारे भयंकर चीख निकल गई,“उई इ …. माँ…. आया ….. मर …. गई ईई …………..!”

और वो चीखते हुए झटके के साथ पेट के बल गिर पड़ी और मैं उसके ऊपर। जैसे ही मैं ऊपर गिरा मेरा बाकी का लण्ड भी अन्दर घुस गया। उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे। मैं चुपचाप उसके ऊपर पड़ा रहा।

कोई ४-५ मिनट के बाद वो बोली,“कोई ऐसे भी गांड मारी जाती है। मैंने आपको बताया था मेरी गांड अभी कोरी है प्यार से करना पर आप तो अपने मज़े के लिए लड़की को मार ही डालते हो !”

“ओह मुझे माफ़ कर दो मेरी रानी गलती हो गई। सॉरी प्लीज़ !” मैंने उसके गालों को चूमते हुए कहा। अब तक वो कुछ सामान्य हो गई थी।

“अब डाल दिया है तो चलो अपना काँटा निकाल ही लो। लूट लो इस स्वर्ग के दूसरे दरवाजे का मज़ा भी !” अनारकली बोली। मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने चालू कर दिए पर संभल कर।

“अनार एक बात समझ नहीं आई?”

“वो क्या?”

“पहले गांड के अन्दर क्यों नहीं जा रहा था। जब तुमने कहा तब कैसे अन्दर चला गया?”

“असल में मैंने ज्यादा समझदारी दिखाई और तुम्हें थोड़ा तड़फाने के लिए मैंने अपनी गांड को अन्दर भींच लिया था। तेल और चिकनाई लगी होने के कारण लण्ड इधर उधर फिसल रहा था। जब मैंने तुम्हें धक्का लगाने को कहा उस वक्त मैंने अपनी मोरी ढीली छोड़ कर बाहर की ओर जोर लगाया था। मुझे क्या पता था कि तुम तो निरे अनाड़ी ही निकलोगे जैसे कभी गांड मारी ही ना हो और गांड रानी कि महिमा जानते ही नहीं !”

“ओह .. माफ़ कर दो गुरूजी अब गलती नहीं होगी। तुमसे गांड मारना सीख लूँगा। वैसे एक बात बताओ तुम्हें ये ज्ञान भी मधु ने ही दिया है क्या ?”

“नहीं ये ज्ञान तो जब मैं और दीदी पिछले रविवार आश्रम गए थे वहां गुरु माताजी ने दिया था।”

अब मेरे समझ में सब कुछ आ गया कि अधकचरे ज्ञान का कितना बड़ा नुकसान होता है। इसी लिए गुरूजी कहते हैं ज्ञान पात्र को ही देना चाहिए।”

अनारकली अब फ़िर कुतिया स्टाइल में आ गई थी। मैं धक्के पर धक्के मर रहा था। उसकी गाण्ड एकदम रवाँ हो गई थी। लण्ड पूरा अन्दर बाहर हो रहा था। अनारकली को भी मज़ा आने लगा था। जब मेरा लण्ड बाहर आता तो वो उसे अन्दर की ओर खींचती और जब मैं अन्दर घुसाता तो वो बाहर की ओर जोर लगाती। वो भी “आह ह …. उ उह ह उइ इ इ ई…. वाह मेरे राज़ाऽऽऽ…. मेरे शहज़ादे और जोर से …. आह हऽऽ….. उई इ ई माँ…..” करती जा रही थी और मेरे आनन्द क तो पारावार ही नहीं था। मैंने मधु के अलावा कई लड़कियों और औरतों की गाण्ड मारी है पर सबसे खूबसूरत और कसी गाण्ड तो अनारकली की थी। रजनी (मधु की कज़न) और सुधा से भी ज्यादा।

गाण्ड का मज़ा लेते हमें कोई बीस मिनट हो गए थे। इस बीच मैं उसकी चूत में भी उंगली करता रहा और उसके संतरे भी भींचता रहा जिससे वो दो बार झड़ चुकी थी। अब मेरा भी निकलने वाला था। अनारकली की कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर अन्तिम झटके लगाने शुरू कर दिए। मैंने अनारकली से कहा,“ हिन्दुस्तान आज़ाद होने वाला है मेरी ज़ान !”

तो वो बोली,“ कोई बात नहीं मैं भी किनारे पर हूँ !” और एक मीठी सीत्कार के साथ मेरे लण्ड ने पिचकारियाँ छोड़नी शुरू कर दी। अनारकली की गाण्ड मेरे वीर्य से लबालब भर गई और मेरा तन मन आत्मा सब आनन्द से सराबोर हो गए।

हम दोनों ने एक बार फ़िर बाथरूम में जाकर सफ़ाई की और नंगे ही बैड पर लेट गए। अनारकली मेरी गोद में सिर रखे मेरे लण्ड की ओर मुँह किए लेटी थी। उसने मेरे लण्ड से फ़िर खेलना शुरू कर दिया। मैं उसके गाल और संतरों को सहला रहा था।

मैंने पूछा,“अनारकली एक बात बताओ- तुम मुझसे चुदवाने के लिए इतनी जल्दी कैसे तैयार हो गई?”

“ जल्दी कहाँ ! मुझे पूरे दो महीने लगे हैं तुम्हारे जैसे शहज़ादे को तैयार करने में !”

“क्या मतलब ?” अब मेरे चौंकने की बारी थी।

“अरे मेरे भोले राज़ा मैं तो पहले तुम्हें डी पी और डी डी ही समझती रही !” वो हंसते हुए बोली।

डी पी…. डी डी…. ये क्या बला है?” मैंने हंसते हुए पूछा।

“डी पी मतलब ढिल्लू प्रसाद (लल्लू) और डी डी मायने अपनी पत्नी का देव दास !” वो हंसते हुए बोली। “अखबार गोद में रखना तो आपने बाद में सीखा था !” उसने मेरी ओर आंख मार दी।

मैं समझ गया मधु ने मेरे पत्नी भक्त होने के बारे में बताया होगा कि मैं तो दुनिया की सबसे सुन्दर अप्सरा मधु के अलावा किसी की ओर देखता ही नहीं। मेरी जिन्दगी में उसके अलावा और कोई लड़की आइ ही नहीं। बेचारी मधु !!!

“पर मेरी बात का जवाब तो दिया ही नहीं !”

“ वो दर असल दीदी ने मेरा हाथ देख कर बताया था कि मुझे दो पतियों का योग है यानि मुझे दो पतियों का प्यार मिलेगा। यह देखो ……..” और उसने अपना बाएँ हाथ की मुट्ठी बंद करके कनिष्ठा (छोटी) उंगली के ऊपर बनी दो लाईन दिखाई। “मैंने अपनी चूत और गाण्ड बहुत सम्भाल कर रखी हैं एकदम कोरी और अनछुई। मैं तो चाहती थी कि अपना सब कुछ सुहागरात को अपने पति को ही समर्पित करूँ पर दीदी ने जब बताया कि मुझे दो पति मिलेंगे तो मैंने तय किया कि मेरे किसी भी पति के साथ कोई अनहोनी ना हो। इसीलिए मैंने आपको अपना पहला पति, अपना शहज़ादा मान लिया और चुदने को तैयार हो गई। और जहाँ तक गाण्ड मरवाने का सवाल है पता नहीं आपने देखा या नहीं, मेरी दाहिनी जांघ पर तिल है जैसा मधु दीदी और एश्वर्या राय के भी है। मैंने एक फ़िल्म में ध्यान से देखा था जिसमें उसने बिकिनी पहनी थी। ऐसी औरतों को गाण्ड मरवाने का योग भी होता है।”

“चलो मधु और तुम्हारा तो ठीक है पर एश्वर्या राय के बारे में तुम यकीन के साथ कैसे कह सकती हो? वो साला अभिषेक तो एकदम लल्लू है। वो क्या गाण्ड मारेगा?”

“तुम क्या सोचते हो सल्लू मियाँ ने बिना उसकी गाण्ड मारे छोड़ दिया होगा?” वो खिलखिला कर हंस पड़ी।

मैं हैरान हुआ उसे देखता रह गया। मुझे लगा जैसे वो १८ साल की एक अदना सी नौकरानी नहीं ५ किलो आर डी एक्स मेरे सामने पड़ा है। पता नहीं मधु ने इसे चुदाई की पूरी पी एच डी ही करवा दी है। वो मेरा लण्ड चूसे जा रही थी जो अब फ़िर फ़ुफ़कारें मारने लगा था।

“एक बात और बताऊँ?”

“नहीं मेरी अम्मा …. और कुछ नहीं !” मैंने कहा। पता नहीं ये क्या बम फ़ोड़ दे।

अभी तो मुझे प्रेम की अनारकली कह रहे थे। अब अम्मा कैसे हो गई?”

“अच्छा मेरी अनारकली, मेरी शहज़ादी ,मेरी रानी, मेरी प्यारी, मेरी प्रेम गुरू ….” और मैंने एक चुम्मा उसके गालों और होंठों पर ले लिया। मैं अपने आप को बड़ा शिकारी समझ रहा था पर अब लगता था कि मैं तो शिकार हूँ और अनारकली एक कुशल शिकारी है। मेरी हालत तो ऐसी हो रही थी जैसे मकड़ी खुद अपने ज़ाल में फ़ंस गई हो।

“पर बात तो सुननी ही पड़ेगी !” उसने कहा।

“अच्छा चलो बताओ!” मैंने उसके गालों और उरोज़ों पर अपने हाथ फ़िराने लगा और अपनी आंखें बंद कर ली। अनारकली के चूसने के कारण मेरा लण्ड फ़िर से पत्थर की तरह सख्त हो गया था।

“वो….. वो…. कई बार खड़े लण्ड को धोखा भी हो जाता है।”

“खड़े लण्ड का धोखा….. वो क्या होता है ????”

“अरे मेरे एस एस एस , जब लण्ड लोहे के डण्डे की तरह खड़ा हो और एक हसीन चूत और गाण्ड उसके सामने नंगी लेटी हो और उसकी चुदाई ना की जाए तो बेचारे लण्ड के साथ तो धोखा ही होगा ना ! वो फ़िर खुदकुशी ही करेगा ना ???” उसने आँख मारते हुए कहा और जोर से हंस पड़ी।

मैं पहले तो कुछ समझा नहीं फ़िर मैंने उसे जोर से अपनी बाहों में भींच लिया और उसके होंठ इतने जोर से काटे कि उसका खून ही निकल आया। उसने मेरा लण्ड अपनी चूत में इस तरह बंद कर लिया जैसे सलीम की अनारकली की तरह उसे दीवार में चिन दिया गया हो।
 
दो नम्बर का बदमाश

बचपने से जब भी ज़ोरों की बारिश होती या ज़ोर की बिजली कड़कती थी तो मैं डर के मारे घर में दुबक जाया करता था। पर उस रात की बारिश ने मुझे रोमांच से लबालब भर दिया था। आज भी जब ज़ोरों की बारिश होती है, और बिजली कड़कती है, मुझे एक शेर याद आ जाता है:

ऐ ख़ुदा इतना ना बरस कि वो आ ना पाएँ !

आने के बाद इतना बरस कि वो जा ना पाएँ !!

जून महीने के आख़िरी दिन चल रहे थे। मधु (मेरी पत्नी, मुधर) गर्मियों की छुट्टियों में अपने मायके गई हुई थी। मैं अकेला ड्राईंग रूम मे खिड़की के पास बैठा मिक्की के बारे में ही सोच रहा था। (मिक्की मेरे साले की लड़की है)। पिछले साल वह एक सड़क-दुर्घटना का शिकार हो गई थी और हमें रोता-बिलखता छोड़ कर चली गई थी। सच पूछो तो पिछले एक-डेढ़ साल में कोई भी दिन ऐसा न बीता होगा कि मैंने मिक्की को याद नहीं किया हो। वो तो मेरा जैसे सब कुछ लूट कर ही ले गई थी। मैं उसकी वही पैन्टी और रेशमी रुमाल हाथों में लिए बैठा उसकी याद में आँसू बहा रहा था। हर आहट पर मैं चौंक सा जाता और लगता कि जैसे मिक्की ही आ गई है।

दरवाजे पर जब कोई भी आहट सी होती है तो लगता है कि तुम आई हो

तारों भरी रात में जब कोई जुगनू चमकता है लगता है तुम आई हो

उमस भरी गर्मी में जब पुरवा का झोंका आता है तो लगता है तुम आई हो

दूर कहीं अमराई में जब भी कोई कोयल कूकती है लगता है कि तुम आई हो !!

उस दिन रविवार था। सारे दिन घर पर ही रहा। पहले दिन जो बाज़ार से ब्लू-फिल्मों की ४-५ सीडी लाया था उन्हें कम्प्यूटर में कॉपी किया था। एक-दो फ़िल्में देखी भी, पर मिक्की की याद आते ही मैंने कम्प्यूटर बन्द कर दिया। दिन में गर्मी इतनी ज्यादा कि आग ही बरस रही थी। रात के कोई १० बजे होंगे। अचानक मौसम बदला और ज़ोरों की आँधी के साथ हल्की बारिश शुरु हो गई। हवा के एक ठंडे झोंके ने मुझे जैसे सहला सा दिया। अचानक कॉलबेल बजी और लगभग दरवाज़ा पीटते हुए कोई बोला, “दीदीऽऽऽ !! … जीजूऽऽऽ.. !! दरवाज़ा जल्दी खोलो… दीदी…!!!?” किसी लड़की की आवाज थी।

मिक्की जैसी आवाज़ सुनकर मैं जैसे अपने ख़्यालों से जागा। इस समय कौन आ सकता है? मैंने रुमाल और पैन्टी अपनी जेब में डाली और जैसे ही दरवाज़े की ओर बढ़ा, एक झटके के साथ दरवाज़ा खुला और कोई मुझ से ज़ोर से टकराया। शायद चिटकनी खुली ही रह गई थी, दरवाज़ा पीटने और ज़ोर लगाने के कारण अपने-आप खुल गया और हड़बड़ाहट में वो मुझसे टकरा गई। अगर मैंने उसे बाँहों में नहीं थाम लिया होता तो निश्चित ही नीचे गिर पड़ती। इस आपा-धापी में उसके कंधे से लटका बैग (लैपटॉप वाला) नीचे ही गिर गया। वो चीखती हुई मुझसे ज़ोर से लिपट सी गई। उसके बदन से आती पसीने, बारिश और जवान जिस्म की खुशबू से मेरा तन-मन सब सराबोर होता चला गया। उसके छोटे-छोटे उरोज मेरे सीने से सटे हुए थे। वो रोए जा रही थी। मैं हक्का-बक्का रह गया, कुछ समझ ही नहीं पाया।

कोई २-३ मिनटों के बाद मेरे मुँह से निकला “क्क..कौन… अरे.. नन्न्नन.. नि.. निशा तू…??? क्या बात है… अरे क्या हुआ… तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?” ओह ये तो मधु की कज़िन निशा थी। कभी-कभार अपने नौकरी के सिलसिले में यहाँ आया करती थी, और रात को यहाँ ठहर जाती थी। पहले मैंने इस चिड़िया पर ध्यान ही नहीं दिया था।

आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि इतनी मस्त-हसीन लौण्डिया की ओर मेरा ध्यान पहले क्यों नहीं गया। इसके दो कारण थे। एक तो वो सर्दियों में एक-दो बार जब आई थी तो वह कपड़ों से लदी-फदी थी, दूसरे उसकी आँखें पर मोटा सा चश्मा। आज तो वह कमाल की लग रही थी। उसने कॉन्टैक्ट लेंस लगवा लिए थे। कंधों के ऊपर तक बाल कटे हुए थे। कानों में सोने की पतली बालियाँ। जीन्स पैन्ट में कसे नितम्ब और खुले टॉप से झलकते काँधारी अनार तो क़हर ही ढा रहे थे। साली अपने-आप को झाँसी की शेरनी कहती है पर लगती है नैनीताल या अल्मोड़ा की पहाड़ी बिल्ली।

ओह… सॉरी जीजू… मधु दीदी कहाँ हैं?… दीदी… दीदी…” निशा मुझ से परे हटते हुए इधर-उधर देखते हुए बोली।

“ओह दीदी को छोड़ो, पहले यह बताओ तुम इतनी रात गए बारिश में डरी हुई… क्या बात है??”

“वो… वो एक कुत्ता…”

“हाँ-हाँ, क्या हुआ? तुम ठीक हो?”

निशा अभी भी डरी हुई खड़ी थी। उसके मुँह से कुछ नहीं निकल रहा था। मैंने दरवाज़ा बन्द किया और उसका हाथ पकड़ कर सोफ़े पर बिठाया, फिर पूछा, “क्या बात है, तुम रो क्यों रही थीं?”

जब उसकी साँसें कुछ सामान्य हुई तो वह बोली, “दरअसल सारी मुसीबत आज ही आनी थी। पहले तो प्रेज़ेन्टेशन में ही देर हो गई थी, और फिर खाना खाने के चक्कर में ९ बज गए। कार भी आज ही ख़राब होनी थी। बस-स्टैण्ड गई तो आगरा की बस भी छूट गई।” शायद इन दिनों उसकी पोस्टिंग आगरा में थी।

मैं इतना तो जानता था कि वह किसी दवा बनाने वाली कम्पनी में काम करती है और मार्केटिंग के सिलसिले में कई जगह आती-जाती रहती है। पर इस तरह डरे हुए, रोते हुए हड़बड़ा कर आने का कारण मेरी समझ में नहीं आया। मैंने सवालिया निगाहों से उसे देखा तो उसने बताया।

“वास्तव में महाराजा होटल में हमारी कम्पनी का एक प्रेज़ेन्टेशन था। सारे मेडिकल रिप्रेज़ेन्टेटिव आए हुए थे। हमारे दो नये उत्पाद भी लाँच किए गए थे। कॉन्फ्रेन्स ९ बजे खत्म हुई और खाना खाने के चक्कर में देर हो गई। वापस घर जाने का साधन नहीं था। यहाँ आते समय रास्ते में ऑटो ख़राब हो गई। इस बारिश को भी आज ही आना था। रास्ते में आपके घर के सामने कुत्ता सोया था। बेख्याली में मेरा पैर उसके ऊपर पड़ गया और वह इतनी ज़ोर से भौंका कि मैं डर ही गई।” एक साँस में निशा ने सब बता दिया।

“अरे कहीं काट तो नहीं लिया?”

“नहीं काटा तो नहीं…! दीदी दिखाई नहीं दे रही?”

“ओह… मधु तो जयपुर गई हुई है, पिछले १० दिनों से !”

“तभी उनका मोबाईल नहीं मिल रहा था।”

“तो मुझे ही कर लिया होता।”

“मेरे पास आपका नम्बर नहीं था।”

“हाँ भई, आप हमारा नम्बर क्यों रखेंगी… हम आपके हैं ही कौन?”

“आप ऐसा क्यों कहते हैं?”

“भई तुम तो दीदी के लिए ही आती हो हमें कौन पूछता है?”

“नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।”

“इसका मतलब तुम मेरे लिए भी आती हो।” मैं भला मज़ाक का ऐसा सुनहरा अवसर कैसे छोड़ता। वो शरमा गई। उसने अपनी निगाहें नीची कर लीं। थोड़ी देर कुछ सोचती रही, फिर बोली, “ओह, दीदी तो है नहीं तो मैं किसी होटल में ही ठहर जाती हूँ!”

“क्यों, यहाँ कोई दिक्क़त है?”

“वो… वो… आप अकेले हैं और मैं… मेरा मतलब… दीदी को पता चलेगा तो क्या सोचेगी?”

“क्यों क्या सोचेगी, क्या तुम इससे पहले यहाँ नहीं ठहरी?”

“हाँ पर उस समय दीदी घर थी।”

“क्या हम इतने बुरे हैं?”

“ओह.. वो बात नहीं है।”

“तो फिर क्या बात है?”

“वो.. .वो… मेरा मतलब क्या है कि एक जवान लड़की का इस तरह ग़ैर मर्द के साथ रात में… अकेले?? मेरा मतलब?? वो कुछ समझ नहीं आ रहा।” उसने रोनी सी सूरत बनाते हुए कहा।

“ओह.. अब मैं समझा, तुम मुझे ग़ैर समझती हो या फिर तुम्हें अपने आप पर ही विश्वास नहीं है।”

“नहीं ऐसी बात तो नहीं है।”

“तो फिर बात यह है कि मैं एक हिंसक पशु हूँ, एक गुंडा-बदमाश, मवाली हूँ। तुम जैसी अकेली लड़की को पकड़कर तुम्हें खा ही जाऊँगा या कुछ उल्टा-सीधा कर बैठूँगा? क्यों है ना यही बात?”

“ओह जीजू, आप भी बात का बतंगड़ बना रहे हैं। मैं तो यह कह रही थी आपको बेकार परेशानी होगी।”

“अरे इसमे परेशानी वाली क्या बात है?”

“फिर भी एकता कपूर… मेरा मतलब वो… दीदी…?” वो कुछ सोचते हुए सी बोली।

“अरे जब तुम्हें कोई समस्या नहीं है, मुझे नहीं, तो फिर जयपुर बैठी मधु को क्या समस्या हो सकती है। और फिर आस-पड़ोस वाले किसी से कोई फिक्र नहीं करते हैं। अगर अपना मन साफ़ है तो फ़िर किसी का क्या डर? क्या मैं ग़लत कह रहा हूँ?” मैंने कहा। मैं इतना बढ़िया मौक़ा और हाथ में आई मुर्गी को ऐसे ही हवा में कैसे उड़ जाने देता।

मुझे तो लगा जैसे मिक्की ही मेरे पास सोफ़े पर बैठी है। वही नाक-नक्श, वही रूप-रंग और कद-काठी, वही आवाज़, वही नाज़ुक सा बदन, बिल्कुल छुईमुई सी कच्ची-कली जैसी। बस दोनों में फ़र्क इतना था कि निशा की आँखें काली हैं और मिक्की की बिल्लौरी थीं। दूसरा निशा कोई २४-२५ की होगी जबकि मिक्की १३ की थी। मिक्की थोड़ी सी गदराई हुई लगती थी जबकि निशा दुबली-पतली छरहरी लगती है। कमर तो ऐसी कि दोनों मुट्ठियों में ही समा जाए. छोटे-छोटे रसकूप (उरोज)। होंठ इतने सुर्ख लाल, मोटे-मोटे हैं तो उसके निचले होंठ मेरा मतलब है कि उसकी बुर के होंठ कैसे होंगे। मैं तो सोच कर ही रोमांचित हो उठा। मेरा पप्पू तो छलांगे ही लगाने लगा। उसके होठों के दाहाने (चौड़ाई) तो २.५-३ इंच का ही होगा। हे लिंग महादेव, अगर आज यह चिड़िया फँस गई तो मेरी तो लॉटरी ही लग जाएगी। और अगर ऐसा हो गया तो कल सोमवार को मैं ज़रूर जल और दूध तुम्हें चढ़ाऊँगा। भले ही मुझे कल छुट्टी ही क्यों ना लेनी पड़े। पक्का वादा।

प्रेम आश्रम वाले गुरुजी ने अपने पिछले विशेष प्रवचन में सच ही फ़रमाया था, “ये सब चूतें, गाँड और लंड कामदेव के हाथों की कठपुतलियाँ हैं। कौन सी चूत और गाँड किस लण्ड से, कब, कहाँ, कैसे, कितनी देर चुदेंगी, कोई नहीं जानता।”

“इतने में ज़ोरों की बिजली कड़की और मूसलाधार बारिश शुरु हो गई। निशा डर के मारे मेरी ओर सरक गई। मुझे एक शेर याद आ गया:

लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से !

या इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे !!

उसके भींगे बदन की खुशबू से मैं तो मदहोश ही हुआ जा रहा था। गीले कपड़ों में उसका अंग-अंग साफ दिख़ रहा था। शायद उसने मुझे घूरते हुए देख लिया था। वो कुछ सोचते हुए बोली, “मैं तो पूरी ही भीग गई।”

“मैं समझ गया, वो कपड़े बदलना या नहाना चाहती है, पर उसके पास कपड़े नहीं हैं, मेरे से कपड़े माँगते हुए शायद कुछ संकोच कर रही है। मैंने उससे कहा, “कोई बात नहीं, तुम नहा लो, मैं मधु की साड़ी निकाल देता हूँ।”

वो फिर सोचने लगी, “पर वो… वो… साड़ी तो मुझे बाँधनी नहीं आती। मैंने मन में कहा, “मेरी जान तुम तो बिना साड़ी-कपड़ों के ही अच्छी लगोगी। तुम्हें कपड़े कौन कमबख़्त पहनाना चाहता है” पर मैंने कहा -

“कोई बात नहीं, कोई पैन्ट और टॉप शर्ट या नाईटी वगैरह भी है, आओ मेरे साथ।” मैंने उसकी बाँह पकड़ी और अपने बेडरूम की ओर ले जाने लगा। आहहह… उसकी नरम नाज़ुक बाँहें मखमल जैसी मुलायम चिकनी थीं। अगर बाँहें ऐसी चिकनी हैं तो पिर जाँघें कैसी होंगी?
 
कपड़ों की आलमारी तो साड़ियों से लदी पड़ी थी। एक खाने में कुछ पैन्ट-शर्ट और टॉप आदि भी थे। मैंने उनकी ओर इशारा कर दिया। निशा ने कहा,”पर मेरी कमर तो २२ की है, मधु दीदी की पैन्ट मुझे ढीली रहेगी!”

ओह… अच्छा कोई बात नहीं, मेरे पास एक ड्रेस और है, तुम्हें पूरी आनी चाहिए, आओ मेरे साथ।” मैंने आलमारी बन्द कर दी और दूसरी अलमारी की ओर ले जाकर उसे गुलाबी रंग की एक नई बेल-बॉटम और हल्के रंग का टॉप जिस पर पीले फूल बने थे, दिखाया, साथ एक जोड़ी ब्रा और पैन्टी भी थी। ये मैंने मिक्की के पिछले जन्मदिन के लिए मधु से छुपा कर ख़रीदे थे पर उसे दे नहीं पाया था। उन्हें देखकर निशा ने कहा, “लगता है ये तो आ जाएँगे।”

उसने पैन्टी उठाई और गौर से देखते हुए बोली, “ओह… दीदी भी ऐसी ही ब्रा पहनती हैं? ये.. तो ये.. तो ओह?” वो आगे कुछ नहीं बोल पाई। बे-खयाली में उसकसे मुँह से निकल तो गया पर उसका मतलब जान कर वो शरमा गई। इस्स्स्स्स…. मुझे तो लगा जैसे किसी ने मिक्की को ही मेरे सामने खड़ा कर दिया है बस नाम का ही फ़र्क है। मिक्की की तरह शरमाने की इस जानलेवा अदा को तो मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाऊँगा।

न जाने क्या सोचकर उसने ब्रा और पैन्टी वहीं रख दी। मेरा दिल तो छलाँगें ही लगाने लगा। या अल्लाह… बिना ब्रा और पैन्टी में तो यह बिल्कुल मिक्की की तरह क़यामत ही लेगी। मैं अपने-आप पर क़ाबू कैसे रख पाऊँगा। मुझे तो डर लगने लगा कि कहीं मैं उसका बलात्कार ही ना कर बैठूँ। मेरा पप्पू तो जैसे क़ुतुबमीनार बन गया था। इतनी उत्तेजना तो आज से पहले कभी नहीं महसूस हुई थी। पप्पू तो अड़ियल टट्टू बन गया था। अचानक मेरे कानों में निशा की मीठी आवाज़ पड़ी।

“ओ जीजू, मैं नहाने जा रही हूँ।”

“हाँ-हाँ, तौलिया और शैम्पू आदि बाथरूम में हैं।” मैं तो जैसे ख़्यालों से जागा…

निशा बाथरूम में घुस गई। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। बाहर ज़ोरों की बारिश और मेरे अन्दर जलती आग, दोनों की रफ्तार एक जैसी ही तो थी। अचानक मेरे दिमाग़ में एक ख्याल दौड़ गया और होठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान। और उसके साथ ही मेरे क़दम भी बाथरूम की ओर बढ़ गए। अब आप इतने कमअक्ल तो नहीं हैं कि आप मेरी योजना ना समझे हों।

मैंने की-होल से बाथरूम के अन्दर झाँका…

निशा ने अपनी पैन्ट और शर्ट उतार दी थी। अब वो सिर्फ ब्रा पैन्टी में थी। उफ्फ… क्या मस्त हिरनी जैसी गोरी-चिट्टी नाज़ुक कमसिन कली की तरह, जैसे मिक्की ही मेरी आँखों के सामने खड़ी हो। सुराहीदार गर्दन, पतली सी कमर मानों लिम्का की बोतल को एक जोड़ा हाथ और पैर लगा दिए हों। संगमरमर सा तराशा हुआ सफाक़ बदन किसी फरिश्ते का भी ईमान डोल जाए। एक ख़ास बात: काँख (जहाँ से बाँहें शुरु होतीं हैं) और उरोजों से थोड़ा ऊपर का भाग ऐसे बना था जैसे कि गोरी-चिट्टी चूत ही बनी है। ऐसी लड़कियाँ वाकई नाज़ुक होतीं हैं और उनकी असली चूत भी ऐसी ही होती है। छोटी सी तिकोने आकार की माचिस की डिब्बी जितनी बड़ी। अगर आपने प्रियंका चोपड़ा या करीना कपूर को किसी फिल्म में बिना बाँहों के ब्लाऊज़ के देखा हो तो आपको मेरी इस बात की सच्चाई का अन्दाज़ा हो जाएगा। फिर मेरा ध्यान उसकी कमर पर गया जो २२ इंच से ज्यादा तो हर्गिज़ नहीं हो सकती। पतली-पतली गोरी गुलाबी जाँघें। और दो इंच पट्टी वाली वही टी-आकार की पैन्टी (जो मधु की पसंदीदा है)। उनके बाहर झाँटों के छोटे-छोटे मुलायम रोयें जैसे बाल। हे भगवान, मैं तो जैसे पागल ही हो जाउँगा। मुझे तो लगने लगा कि मैं अभी बाथरूम का दरवाजा तोड़कर अन्दर घुस जाऊँगा और… और…

निशा ने बड़े नाज़-ओ-अन्दाज़ से अपनी ब्रा के हुक़ खोले और दोनों क़बूतर जैसे आज़ाद हो गए। गोर गुलाबी दो सिन्दूरी आम, जैसे रस से भरे हुए हों। चूचियों का गहरा घेरा कैरम की गोटी जितना बड़ा, बिल्कुल चुरूट लाल। घुण्डियाँ तो बस चने के दाने जितने। सुर्ख रतनार अनार के दाने जैसे, पेन्सिल की नोक की तरह तीखे। उसने अदा से अपने उरोजों पर हाथ फेरा और एक दाने को पकड़ कर मुँह की तरफ किया और उस पर जीभ लगा दी। या अल्लाह… मुझे लगा जैसे अब क़यामत ही आ जाएगी। उसने शीशे के सामने घुम कर अपने नितम्ब देखे। जैसे दो पूनम के चाँद किसी ने बाँध दिए हों। और उनके बीच की दरार एक लम्बी खाई की तरह। पैन्टी उस दरार में घुसी हुई थी। उसने अपने नितम्बों पर एक हल्की सी चपत लगाई और फिर दोनों हाथों को कमर की ओर ले जाकर अपनी काली पैन्टी नीचे सरकानी शुरु कर दी।

मुझे लगा कि अगर मैंने अपनी निगाहें वहाँ से नहीं हटाईं तो आज ज़रूर मेरा हार्ट फेल हो जाएगा। जैसे ही पैन्टी नीचे सरकी हल्के-हल्के मक्के के भुट्टे के बालों जैसे रेशमी नरम छोटे-छोटे रोयें जैसे बाल नज़र आने लगे। उसके बाद दो भागों में बँटे मोटे-मोटे बाहरी होंठ, गुलाबी रंगत लिए हुए। चीरा तो मेरे अंदाज के मुताबिक ३ इंच से तो कतई ज़्यादा नहीं था। अन्दर के होंठ बादामी रंग के। लगता है साली ने अभी तक चूत (माफ़ करें बुर) से सिर्फ मूतने का ही काम लिया है। कोई अंगुल बाज़ी भी लगता है नहीं की होगी। अन्दर के होंठ बिल्कुल चिपके हुए – आलिंगनबद्ध। और किशमिश का दाना तो बस मोती की तरह चमक रहा था। गाँड की छेद तो नज़र नहीं आई पर मेरा अंदाजा है कि वो भी भूरे रंग का ही होगा और एक चवन्नी के सिक्के से अधिक बड़ा क्या होगा! दाईं जाँघ पर एक छोटा सा तिल। उफ्फ… क़यामत बरपाता हुआ। उसने शीशे में देखते हुए उन रेशमी बालों वाली बुर पर एक हाथ फेरा और हल्की सी सीटी बजाते हुए एक आँख दबा दी। मेरा पप्पू तो ऐसे अकड़ गया जैसे किसी जनरल को देख सिपाही सावधान हो जाता है। मुझे तो डर लगने लगा कि कहीं ये बिना लड़े ही शहीद न हो जाए। मैंने प्यार से उसे सहलाया पर वह मेरा कहा क्यों मानने लगा।

और फिर नज़ाक़त से वो हल्के-हल्के पाँव बढ़ाते हुए शावर की ओर बढ़ गई। पानी की फुहार उसके गोरे बदन पर पेट से होती हुई उसकी बुर के छोटे-छोटे बालों से होती हुई नीचे गिर रही थी, जैसे वो पेशाब कर रही हो। मैं तो मुँह बाए देखता ही रह गया।

वो गाती जा रही थी “पानी में जले मेरा गोरा बदन…” मैं सोच रहा था आज इसे ठण्डा मैं कर ही दूँगा, घबराओ मत। कोई १० मिनट तक वो फव्वारे के नीचे खड़ी रही, फिर उसने अपनी बुर को पानी से धोया। उसने अपनी उँगलियों से अपनी फाँकें धीरे से चौड़ी कीं जैसे किसी तितली ने अपने पंख उठाए हों। गुलाबी रंग की नाज़ुक सी पंखुड़ियाँ। किशमिश के दाने जितनी मदन-मणि (टींट), माचिस की तीली जितना मूत्र-छेद और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग का द्वार, छोटा सा लाल रतनार। मुझे लगा कि मैं तो गश खाकर गिर ही पड़ूँगा।

उसने शावर बन्द कर दिया और तौलिये से शरीर पोंछने लगी। जब वह अपने नितम्ब पोंछ रही थी, एक हल्की सी झलक उसकी नर्म नाज़ुक गाँड की छेद पर भी पड़ ही गई। उफ्फ… क्या क़यामत छुपा रखी थी उसने। अपनी बगलें पोंछने के लिए जब उसने अपनी बाहें उठाईं तो मैं देखकर दंग रह गया। काँख में एक भी बाल नहीं, बिल्कुल मक्खन जैसी चिकनी साफ सुराही गोरी चिट्टी। अब मैं उसे हुस्न कहूँ, बिजली कहूँ, पटाखा कहूँ या क़यामत…

अरश मलशियानी का एक शेर तो कहे बिना नहीं रहा जा रहा:

बला है क़हर है आफ़त है फितना है क़यामत है

इन हसीनों की जवानी को जवानी कौन कहता है?

अब उसने बिना ब्रा और पैन्टी के ही शर्ट (टॉप) और बॉटम पहनना चालू कर दिया। बेल बॉटम पहनते समय मैंने एक बार फिर उसकी चूत पर नज़र डाली। लाल चुकन्दर जितनी छोटी सी, प्यारी सी चूत जैसे मिक्की का ही डबल रोल हो। अब वहाँ रुकने का कोई मतलब नहीं रह गया था। हे भोले शंकर आज मेरी लाज रख लेना कल सोमवार है याद है ना???…
 
मैं सोफ़े पर बैठ गया। जैसी ही बाथरूम का दरवाज़ा खुला गीले बालों से टपकती शबनम जैसी बूँदे, काँपते होंठ, क़मसिन बदन, बेल-बॉटम में कसी पतली-पतली जाँघों के बीच फँसी बुर का इतिहास और भूगोल यानी चीरा और फाँकें साफ़ महसूस हो रही थी। हे भगवान क्या फुलझड़ी है, पटाखा है, या कोई बम है। एक जादुई रोशनी से जैसे पूरा ड्राईंग-रूम ही भर उठा। अचानक एक बार जोर की बिजली कड़की और एक तेज धमाके के साथ पूरे मुहल्ले की लाईट चली गई। हॉल में घुप्प अँधेरा छा गया। उसके साथ ही डर के मार निशा की चीख सी निकल गई, “जीजू, ये क्या हुआ?” वो लगभग दौड़ती हुई फिर मेरी ओर आई। इस बार वह टकराई तो नहीं पर उसकी गरम साँसें मैं अपने पास ज़रूर महसूस कर रहा था।

“लगता है कहीं शॉर्ट-सर्किट हो गया है। तुम डरो मत, यहीं ठहरो, मैं इन्वर्टर चालू करता हूँ।” मैंने दरवाज़े के पास लगा इन्वर्टर चालू किया तो हमारे बेडरूम और स्टडी-रूम की बत्ती जल उठी।

“हे भगवान सब कुछ उल्टा-सीधा आज ही होना है क्या?” निशा रूआँसे स्वर में बोली।

“क्यों क्या हुआ?”

“अब देखो ना लाईट भी चली गई।” उसने एक ठंडी साँस ली।

“पर बेडरूम में तो लाईट है ना।”

“पर मुझे तो कल के वर्कशॉप में प्रेज़ेन्टेशन के लिए प्रोजेक्ट-वर्क तैयार करना था और मेरे लैपटॉप को भी आज ही ख़राब होना था। हे भगवान…”

“कोई बात नहीं तुम स्टडी-रूम में रखे कम्प्यूटर से काम चला सकती हो।” मैंने पूछा “कितना काम है?”

“घंटा भर तो लग ही जाएगा। अच्छी मुसीबत है। मैं भी कहाँ फँस गई इस कम्पनी में।”

“क्यों क्या हुआ?”

“अब देखो ना रोज़-रोज़ का प्रेज़ेन्टेशन, मीटिंग्स, वर्कशॉप, एनालिसिस, प्रोडक्ट लाँचिंग – झमेले ही झमेले हैं इस नन्हीं सी जान पर।”

मैंने अपने मन मे कहा, ‘मेरी जान हम जैसे किसी आशिक़ का दामन थाम लो, सारे प्रोजेक्ट कर दूँगा’ पर मैंने कहा “कौन सा उत्पाद लाँच कर रही हो?”

“दो उत्पाद हैं, एक तो गर्भाधान रोकने की गोली है, महीने में सिर्फ एक गोली और दूसरा बच्चों के अँगूठा चूसने और दाँतों से नाख़ून काटने की आदत से छुटकारा दिलाने की दवाई है, जिसे नाखूनों पर लगाया जाता है।”

“हे भगवान तुम सब लोग हमारी रोज़ी-रोटी छीन लेने पर तुले हो।”

“क्या मतलब?? हम तो बिज़नेस के साथ-साथ समाज सेवा भी कर रहे हैं।” निशा ने हैरानी से पूछा वो बात-बात में ‘क्या मतलब’ ज़रूर बोलती है।

“अरे भाई साफ़ बात है, तुम गर्भधारण रोकने की दवा की मार्केटिंग करती हो तो बच्चे कहाँ से पैदा होंगे और फिर हमारे उत्पाद जैसे बच्चों का दूध, बच्चों का आहार, बच्चों के तेल, नैप्पी, पावडर, साबुन कौन खरीदेगा?”

“और वो अँगूठा चूसने की आदत छुड़ाने की दवाई?”

“वो भी हम जैसे प्रेमियों के ऊपर उत्याचार ही है।”

“क्या… मत…लब?” निशा मेरा मुँह देखने लगी।

“शादी के बाद वो आदत अपने-आप छूट जाती है… उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती। शादी के बाद भला कौन उसे अँगूठा चूसने देता है…” मैंने हँसते हुए कहा।

पहले तो मेरी बात उसे समझ ही नहीं आई, लेकिन बाद में तो वो इतने ज़ोर से शरमाई कि पूछो मत। उसने मुझे एक धक्का सा देते हुए कहा “जीजू तुम एक नम्बर के बदमाश हो।”

“नहीं, मैं दो नम्बर का बदमाश हूँ।” मैं खिलखिला कर हँस पड़ा

“जीजू मज़ाक छोड़ो, मुझे अपना प्रोजेक्ट पूरा करना है। कम्प्यूटर कहाँ है?”

“हाँ चलो मुझे भी अपना प्रोजेक्ट बनाना है।”

“अरे आपको कौन सा प्रोजेक्ट बनाना है?”

“अरे तुम नहीं जानती, मुझे एक नहीं पूरे ५ प्रोजेक्ट्स पर काम करना है” अब मैं उसे क्या बताता कि ‘मुझे तुम्हारा दूध पीना है, बुर चाटनी है, अपना लंड चुसवाना है, चुदाई करनी है, और गाँड भी मारनी है।’ हो गए ना पूरे ५ प्रोजेक्ट्स।

“ओह… पर आपके लिए तो ये मामूली सी बात है आप तो बड़े अनुभवी हैं आप तो झट से कार्यक्रम बना ही लेंगे।” वो भले मेरे इन नए उत्पादों के बारे में अभी क्या जानती थी।

“हाँ वो तो ठीक है पर मेरे पास भी समय कम बचा है, केवल २ घंटे और पूरे ५ प्रोजेक्ट्स… ख़ैर छोड़ो पूरा तो कर ही लूँगा। मुझे अपने-आप पर पूरा भरोसा है। आओ स्टडी-रूम में तुम्हें कम्प्यूटर दिखा दूँ।” और फिर हम दोनों स्टडी-रूम में आ गए।

कम्प्यूटर चाली करने के बाद उसने पेन-ड्राईव निकाली और उसे कम्प्यूटर में नीचे बने छेद में डालने की कोशिश की पर वह अन्दर नहीं गया।

“जीजू ये इस छेद में अन्दर क्यों नहीं जा रहा?”

“अरे पीछे वाली छेद में डालो, उसमें आराम से चला जाएगा।” उसने मेरी ओर थोड़े गुस्से से देखा तो मैंने कहा, “अरे भाई ये छेद ख़राब है, इसके पीछे और छेद हैं, उसमें… वो सही है तुम मज़ाक समझ रही हो।” मैंने हँसते हुए कहा।

“आप मेरा लैपटॉप ठीक कर दो ना प्लीज़” मेरी बात काटते हुए निशा बोली।

“लाओ मैं देख देता हूँ, क्या समस्या है।” मैं लैपटॉप लेकर अपने बेडरूम में आ गया। बेडरूम में पहुँच कर मैंने अपने प्रोजेक्ट के ऊपर काम करना शुरु कर दिया। इस निशा (रात) को कैसे रात की रानी बनाना है। मुझे तो उसकी चूत के साथ-साथ गाँड भी मारनी है और उसे लंड भी चुसवाना है। सबसे बड़ी बात तो उसे सेक्स के लिए तैयार करना ही मुश्किल है। समय कम और मुक़ाबला सख्त। ख़ैर मुहब्बत-ए-मर्दा, मदद-ए-ख़ुदा।

सिमरन (मेरी क्लास मेट) को चोदने में मुझे पूरे दो साल लग गई थी। अनारकली की चुदाई में दो महीने, सुधा की चुदाई में दो हफ़्ते और मिक्की की चुदाई के प्रोग्राम में दो दिन ही लगे थे। पर निशा को चुदाई और गाँड मरवाने के लिए तैयार करने में तो मेरे पास सिर्फ दो घंटे ही हैं। आज प्रेम-गुरु का असली इम्तिहान है। पूरी तैयारी करनी होगी ज़रा सी ग़लती पूरी परियोजना को ख़राब कर देगी और ये नई चिड़िया मेरे हाथों से निकल भागेगी। पर मैं ऐसा कदापि नहीं होने दूँगा। आख़िर मुझे प्रेम-गुरु ऐसे ही तो नहीं कहते हैं।

लैपटॉप में वायरस था जिसके कारण विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम की फाइलें ख़राब हो गईं थीं। ये तो मेरे बाएँ हाथ का खेल था। पर मैं इसे अभी ठीक नहीं किया। मैंने उसके बैग की जाँच की। उसमें दवाईयों के नमूने, कागज़, और मेकअप का छोटा-मोटा सामान था। मैंने बोरोलीन जैसी खुशबू वाली क्रीम की ट्यूब, वैसलीन की डिब्बी, एक छोटा सा शीशा और नैपकीन निकाल कर सिरहाने के नीचे रख लिए।

अब मुझे अपने परियोजना की पूरी तरह से तैयारी के बारे में सोचना ता। दो तीन विकल्प भी रखने थे। सही-सही क्रियान्वयन के लिए कार्यक्रम बनाना था। मज़बूत पक्ष, कमज़ोर पक्ष, मौक़े, संभावित हानियाँ सभी को ध्यान में रखकर कार्यक्रम शुरु करना था। मैंने कई विकल्पों पर विचार किया और फिर सब कुछ अपने दिमाग़ में सोच कर के फ्लो-चार्ट बनाने लगा। मुझे चुदाई का यह कार्यक्रम ३ चरणों में पूरा करना था।

मैंने एक बार स्टडी-रूम की ओर जाकर देखा। निशा कम्प्यूटर पर लगी थी। कोई ४० मिनट तो बीत ही गए थे। निशा का काम भी खत्म होने ही वाला होगा। मैंने उससे पूछा कि कितना समय और लगेगा तो उसने बताया कि कोई १५-२० मिनट और लगेंगे। मैंने दराज़ में से ऑपरेटिंग सिस्टम की सीडी ली और वापिस बेडरूम में आ गया। मैंने फाईलों को फिर से डाल दिया और वायरस स्कैन चालू कर दिया। उसका कम्प्यूटर काम करने लगा। इस काम में मुझे १०-१५ मिनट लगे। जब मैं सीडी वापिस रखने स्टडी रूम में गया तो निशा मेरा कम्प्यूटर बन्द ही करने जा रही थी। मैं दरवाजे के बाहर ही रूक कर अन्दर देखने लगा। उसने स्टार्ट मेनू पर क्लिक किया। शट डाउन पर क्लिक करने की बजाय उसने रीसेन्ट डॉक्यूमेन्ट मेनू खोला। मेरी आँखें चमकने लगीं। फिर उसने ऊपर से नीचे तक फाईलों की सूची देखी। उसकी निगाहें कुछ वीडियो फाईल पर पड़ीं। उसने राईट क्लिक करके उस फाईल का स्त्रोत देखा। अगर आप थोड़ा बहुत कम्प्यूटर जानते हों तो यह सब बातें आपको पता रहेंगी ही। ये वही फाईलें थीं जो मैंने आज सुबह ही कम्प्यूटर पर कॉपी की थी, और २-३ देखी भी थी। इस फाईल पर क्लिक करते ही फिल्म चलनी शुरु हो गई। मेरा काम हो गया था। मैं झट से उल्टे पाँव बेडरूम की ओर भागा।
 
आप शायद सोच रहे होंगे अब वापस आने का नहीं साली को पटक कर चोदने का समय था। आप ग़लत सोच रहे हैं। मैं कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती में विश्वास नहीं करता हूँ। मैं तो प्रेम का पुजारी हूँ। मैंने अब तक जितनी भी चूत या गाँड मारी है वो सभी अपने दोनों हाथों में जैसे अपनी चूत और गाँड लेकर मेरे पास आईं हैं। मैं उसे भी इसी तरह चोदना चाहता था। मैं उसे इतना गरम कर देना चाहता था कि वह ख़ुद चल कर मुझसे चूत और गाँड मारने को कहे, तभी तो चुदाई का असली मज़ा आता है। किसी को मजबूर करके चोदना तो बस पानी निकालनी वाली बात होती है।

मुझे पता था साली फिल्म के एक दो सीन ही देखेगी और फिर उसे बन्द करके मेरे बेडरूम में यह चेक करने आएगी कि मैं क्या कर रहा हूँ। कोई देख तो नहीं रहा। मैं भी इस मामले में पक्का खिलाड़ी हूँ। मैं उसके लैपटॉप को ठीक करने की पूरी एक्टिंग कर रहा था। वो चुपके से आई और एक निगाह डालते हुए दबे पाँव वापस चली गई। हे लिंग माहदेव ! तेरा लाख-लाख धन्यवाद। काले हब्शी और गोरी फिरंगी की गाँड-चुदाई और एक ४० साल की आँटी की एक १५-१६ साल के लड़के के साथ चुदाई देखकर तो मेरी रात की रानी गुलज़ार हो जाएगी। मेरे कार्यक्रम का पहला चरण सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया था।

कोई २५-३० मिनट के बाद निशा बेडरूम की ओर आई। उसकी आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे। होश उड़े हुए, चाल में लड़खड़ाहट, होंठ सूखे हुए। वो तो बस इतनी ही बोल पाई, “जीजू क्या कर रहे हो?” शायद अपनी उखड़ी साँसों पर क़ाबू पाना चाहती थी।

“बस तुम्हारा लैपटॉप ही ठीक कर रहा था। वायरस था, विंडोज़ की फाईलें ख़राब हो गईं थीं। मैंने ठीक कर दिया है। तुमने इन्टरनेट से कोई ग़लत-सलत फाईल तो नहीं खोलीं थीं?” मैंने पूछा।

अब तो उसके चेहरे का रंग देखने लायक था। “ननन… नहीं तो..”

“कोई बात नहीं पर तुम इतना घबराती क्यों हो?”

“वो.. वो बिजली कड़क रही है ना” अजीब संयोग था कि उसी समय ज़ोर से बिजली फिर कड़की थी। बाहर अब भी पानी बरस रहा था। मैं जानता था कि वो कौन सी बिजली की बात कर रही है। वो मेरे पास आकर बैठ गई।

“जीजू सोने का क्या करेंगे?” वो बोली

मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान, तुम्हें सोने कौन देगा आज की रात।’ पर मैंने कहा “भाई बिस्तर लगा है सो जाओ।”

“यहाँ?”

“क्यों क्या हुआ?”

“वो मेरा मतलब, हम दोनों एक कमरे में?”

“मैं बाहर सो जाता पर बिजली नहीं है और गेस्ट रूम में ज़हरीली मकड़ियाँ और मच्छर हैं। कभी-कभी जंगली बिल्ली भी आ जाती है। भाई मुझे बाहर डर लगता है।”

“ओह… अजीब मुसीबत में फँस गई मैं तो दीदी को भी आज ही जाना था।”

“इसमें मुसीबत वाली कौन सी बात है? क्या मधु को जंगली बिल्लियों और मकड़ियों का डर नहीं लगता?”

“वो.. वो… ऐसी बात नहीं पर… और… वो… एक ही कमरे में एक ही बिस्तर पर…?”

“क्यों अपने आप पर विश्वास नहीं है क्या?”

“नहीं ऐसी बात नहीं है पर… वो.. वो..”

“चलो मैं नीचे फर्श पर सो जाता हूँ, भले ही मुझे नींद आए या नहीं कोई बात नहीं।”

“ओहह… नहीं मैं नीचे में सो जाऊँगी।”

मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान नीचे तो तुम्हें सोना ही पड़ेगा, पर फ़र्श पर नहीं, मेरे नीचे।’ मेरी योजना बिल्कुल पक्की थी किसी चूक का सवाल ही नहीं था। मैंने उसी भोलेपन से कहा “अरे, क्यों हम भरतपुर वालों की मेहमान नवाज़ी को बट्टा लगा रही हो? अच्छा एक काम करते हैं, बीच में एक तकिया लगा देते हैं।”

वो मेरी बात पर हँस पड़ी “एक तकिये से क्या होगा?”

“तो दो लगा देते हैं।” मैंने कहा। वह कुछ सोच रही थी। उसके मन की उलझन मैं अच्छी तरह जानता था। “ओह… अभी कौन सी नींद आ रही है, चलो छोड़ो कोई और बात करो।” मैंने कहा।

हम दोनों बिस्तर पर बैठ गए। मैं बिस्तर पर टेक लगाकर बैठा था और निशा मेरे सामने बैठी थी। पैन्ट में फँसी उसकी चूत के आगे का भाग कैरम की गोटी जितनी दूर में गीला हुआ था। साली फिरंगी और आँटी की चुदाई देखकर पूरी गरम हो गई थी। उसने बात चालू की।

“जीजू इस नौकरी से पीछा छूटेगा या नहीं? नौकरी बदलने का कोई मौक़ा है या नहीं? आप तो हाथ देखकर बता देते हैं।” निशा ने हाथ आगे बढ़ा दिया। मैंने झट से उसका हाथ पकड़ लिया। निशा पहले हाथ की रेखाओं और भाग्य आदि पर विश्वास नहीं करती थी। पर जब से मधु की संगत में आई है, थोड़ा-बहुत भाग्य और सितारों को मानने लगी है।

उसका शुक्र पर्वत तो सुधा और मिक्की से भी ऊँचा था। हे भगवान आज तो तूने मेरी लॉटरी ही लगा दी। उसकी हथेली के बीच में तिल देखकर मैंने कहा “तुम्हारे हाथ में ये जो तिल है उसके हिसाब से तो तुम्हारे पास दौलत की कोई कमी नहीं है।”

“अरे जीजू आप भी मज़ाक करते हैं। कहाँ है मेरे पास दौलत?”

“अरे भाई हाथ की रेखाएँ तो यही कहतीं हैं। क्या हुस्न की दौलत कम है तुम्हारे पास?”

“जीजू आप भी…” वो शरमा गई। अच्छा… फिर बोली “मजाक छोड़ो और ढंग की बात बताओ ना।”

“मैंने उससे पूछा कि तुम्हारी उम्र कितनी है तो उसने बताया कि वह २४ की है।

“क्यों तुम भी मधु और मेरी तरह मांगलिक हो?”

“हाँ क्यों?”

“अरे भाई माँगलिक की शादी २४वीं साल में हो जाती है।”

“पर मैं तो अभी ५-७ साल शादी नहीं करूँगी।”

“भाई मंगल तो यहीं कहता है और अगले ३ साल में तुम २ बच्चों की मम्मी भी बन जाओगी।”

“जीजू आप भी एक नम्बर के बदमाश हो। मज़ाक छोड़ो, कोई ठीक बात बताओ ना।”

“अरे इसमें क्या झूठ है।” उसने अपनी आँखें टेढ़ी कीं तो मैंने कहा, “अच्छा चलो बताओ, तुम्हारे कितने ब्वॉयफ्रेण्ड हैं? कभी उनके साथ फिल्म देखती हो या नहीं?”

“नहीं मेरा तो कोई ब्वॉयफ्रेण्ड नहीं है।” उसने आँखें तरेरते हुए कहा।

“अरे फिर इस जवानी और ज़िन्दगी का क्या फ़ायदा। मैं तो अब भी अपनी गर्लफ्रेण्ड को लेकर फ़िल्म देखता हूँ।” मैंने कहा।

“क्या मतलब? क्या आप अब भी… मेरा मतलब…?”

“अरे भाई मेरी गर्लफ्रेण्ड तो मधु ही है।” मैंने हँसते हुए कहा “तुम तो जानती हो मैं मधु से कितना प्यार करता हूँ। कई बार मैं और मधु फिल्म देखने जाते हैं तो ऐसी ऐक्टिंग करते हैं कि जैसे कॉलेज से भागकर के आए हों। हमें देखकर तो बड़े-बूढ़ों के दिल पर भी साँप लोटने लग जाते हैं।”

“हाँ… हाँ मुझे पता है। मधु दीदी बताती हैं तुम तो उनके पूरे ‘मिट्ठू’ हो। वह बताती है कि आप तो शादी के इतने सालों बाद भी उनपर लट्टू ही बने हो।” उसने मेरा मज़ाक उड़ाते हुए कहा।

“तुम कहो तो तुम्हारा भी ‘मिट्ठू बन जाता हूँ।”

“मैं झाँसी की शेरनी हूँ ऐसे क़ाबू नहीं आऊँगी मिट्ठू जी?” उसने आँखें नचाते हुए कहा। मैंने मन में सोचा ‘मेरी जान आज की रात तुम जैसी मैना के मुँह से ही बुलवाऊँगी बोल मेरी मैना गंगाराम’ फिर मैंने कहा “अच्छा चलो बताओ तुम्हार वज़न कितना है?”

“उण्म्म्म्म… ४८ किलो”

“मेरे हिसाब से तो २१ किलो होना चाहिए।”

“क्या मतलब?”

“अरे भाई बहुत सीधी बात है दिल का २७ किलो तो हटा ही दो, फिर असली वज़न तो २१ किलो ही रहा ना?”

“तो आप भी मानते हैं कि हम झाँसी वालों का दिल बड़ा होता है।” उसने छाती तानते हुए कहा। सचमुच उसकी घुण्डियाँ कड़ी हो रहीं थीं।

“दिल बड़ा नहीं, पत्थर का है।”

“क्या मतलब?”

“चलो वो बाद में बताऊँगा।” मैंने बात को अपने प्रोजेक्ट की ओर मोड़ना चाहा। “देखो ये सब ज्योतिषीय गणित है। प्रकृति ने सब चीजें अपने हिसाब से बनाई हैं। सब चीजें एक सही अनुपात में होतीं हैं। उन्हें तो मानना ही पड़ेगा ना?”

“वो कैसे?”

“अब देखो ना भगवान ने हमारी नाक तुम्हारे अँगूठे जितनी बड़ी बनाई है।” उसने हैरानी से अपनी नाक पर हाथ लगाया और मेरी ओर देखने लगी।
 
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