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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

जिसके लिए विश्वामित्र और नारद जैसे महा-ऋषियों का मन डोल गया वो पल अब मेरे सामने आने वाला था। पहले सुनहरे रोएँ नज़र आये और फिर दो भागो में बटा बुर का पहला नज़ारा- रक्तिम चीरा बाहरी होंठ मोटे और सुर्ख लाल गुलाबी रंगत लिए छोटे होंठ कुछ श्यामलता लिए दोनों आपस में प्रगाढ़ सहेलियों की तरह चिपके हुए और उसके नीचे सुनहरी रंग का गोल गोल गांड का छेद। आह… मैं तो बस इस दिलकश नजारे को देख कर अपनी सुध बुध ही खो बैठा।

पैंटी निकाल कर दूर फेंक दी। उसकी संगमरमरी जांघे केले के तने की तरह चिकनी और सुडोल जाँघों को मैंने कांपते हाथों से उन्हें सहलाया तो मिक्की की एक सित्कार निकल गई और उसके पैर अपने आप चौड़े होते चले गए। फिर मैंने हौले से उसके सुनहरी बालो पर हाथ लगाया।

उफ़… मक्का के भुट्टे को अगर छील कर उस पर उगे सुनहरी बालो का स्पर्श करें तो आपको मिक्की की बुर पर उगे उन छोटे छोटे रेशम से मुलायम बालों (रोएँ) का अहसास हो जायेगा। बाल ज्यादा नहीं थे सिर्फ थोड़े से उपरी भाग पर और दोनों होंठो के बाहर केवल आधी दूर तक जहां चीरा ख़त्म होता है उससे कोई दो इंच ऊपर तक। बुर जहां ख़त्म होती है उसके ठीक एक इंच नीचे जन्नत का दूसरा दरवाजा। उफ़ एक चवन्नी के आकार का बादामी रंग का गोल घेरा जैसे हंसिका मोटवानी या प्रियंका चोपड़ा ने सीटी बजाने के अंदाज में अपने होंठ सिकोड़ लिए हों।

मैने अपनी दोनों हाथों से उसकी पंखुड़ियों को थोड़ा सा चोड़ा किया। एक हलकी सी ‘पुट’ की आवाज के साथ उसकी बुर थोड़ी सी खुल गई केवल दो इंच रतनार सुर्ख लाल अनार के दाने जितनी बड़ी मदन मणि और बीच में मूत्र छेद माचिस की तिल्ली जितना बड़ा और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग गुफा का छोटा सा छेद कम रस से भरा जैसे शहद की कुप्पी हो।

मैं अब कैसे रुक सकता था। मैने बरसों के प्यासे अपने जलते होंठ उन पर रख ही दिए। एक मादक सुगंध से मेरा सारा तन मन भर उठा। मिक्की तो बस मेरा सिर पकड़े अपनी आँखें बंद किये पता नहीं कहाँ खोई हुई थी उसका पूरा शरीर काँप रहा था। और मुंह से बस हौले-हौले सीत्कार ही निक़ल रही थी।

मैने अपनी जीभ की नोक जैसी ही उसकी मदनमणि पर लगाई, मिक्की का शरीर थोड़ा सा अकड़ा और उसकी बुर ने शहद की दो तीन बूँदे मुझे अर्पित कर दी। ओह मेरे प्यार का पहला स्पर्श पाते ही उसका छोटा स्खलन हो गया। उसके हाथ और पैर दोनों अकड़े हुए थे शरीर काँप रहा था। मेरा एक हाथ उसके उरोजों को मसल रहा था और दूसरा हाथ उसके गोल गोल नितम्बों को सहला रहा था।

मैने उसकी बुर को चूसना शुरू कर दिया। मिक्की तो सातवें आसमान पर थी। लगभग दस मिनट तक मैने उसकी बुर चूसी होगी। फिर मैने उसकी बुर चूसते चूसते पास पड़ी डब्बी से थोड़ी सी वैसलीन अपने दायें हाथ की तर्जनी अंगुली पर लगाई और होले से उसकी बुर की सहेली पर फिरा दी। मिक्की ने रोमांच से एक बार और झटका खाया। अब मैने दो चीजें एक साथ की उसकी शहद की कुप्पी को जोर से चूसने के बाद उसके अनार दाने को दांतों से होले से दबाया और अपने दायें हाथ की वैसलीन से भरी अंगुली का पोर उसके प्रेम द्वार की प्यारी पड़ोसिन के सुनहरी छेद में डाल दिया।

“ऊईई… मम्म्मीईइ…जीज्जू…ऊ आह्ह्ह मुझे कुछ हो रहा है मैं मर गई… आह्ह्ह… ऊओईईइ…इ ह्हीईइ… य्याआया… !!”

मिक्की का शरीर अकड़ गया, उसने मेरे सिर के बालों को नोच लिया, और अपनी जाँघों को जोर से भींच लिया और जोर की किलकारी के साथ वो ढीली पड़ती चली गई और उसके साथ ही उसकी बुर ने कोई तीन-चार चम्मच शहद (कामरस) उंडेल दिया जिसे मैं भला कैसे व्यर्थ जाने देता, गटागट पी गया। ये उसके जीवन का पहला ओर्ग्जाम था।

कुछ पलों के बाद जब मिक्की कुछ सामान्य हुई तो मैने होले से उसे पुकारा,”मेरी मोनिका ! मेरे प्रेम की देवी ! कैसा लग रहा है ?”

“उन्ह !! कुछ मत पूछो मेरे प्रेम देव ! आज की रात बस मुझे अपनी बाहों में लेकर बस प्यार बस प्यार ही करते रहो मेरे प्रथम पुरुष !”

मैने एक बार फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया। अब बस उन पलों की प्रतीक्षा थी जिसे मधुर मिलन कहते है। मैं अच्छी तरह जानता था भले ही मिक्की अब अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार है पर है तो अभी कमसिन कच्ची मासूम कली ही ? वो भले ही इस समय सपनो के रहस्यमई संसार में गोते लगा रही है पर मधुर मिलन के उस प्रथम कठिन चरण से अभी अपरिचित है। मैं मिक्की से प्यार करता था और भला उसे कोई कष्ट हो मैं कैसे सहन कर सकता था।

शायद आप रहे कि मैंने अपना इरादा बदल लिया होगा और उसे चोदने का विचार छोड़ दिया होगा तो आप गलत सोच रहे है। मैं तो कब से उसे चोदना चाहता था। पर उसकी उम्र और किसी गड़बड़ की आशंका से डर रहा था। हाँ उसकी बातें सुनकर एक बदलाव जरूर आ गया। मुझे लगा कि मैं सचमुच उसे प्यार करने लगा हूँ। जैसे वो मेरी कोई सदियों की बिछुड़ी प्रेमिका है जिसे मैं जन्मि-जन्मानंतर तक प्यार करता रहूँगा।

फिर सब कुछ सोच विचार करने के बाद मैंने एक जोर की सांस छोड़ते हुए उसे समझाना शुरू किया,”देखो मेरी प्रियतमा ! अब हमारे मधुर मिलन का अंतिम पड़ाव आने वाला है। ये वो परम आनंद है जिसके रस में ये सारी कायनात डूबी है !”

“मैं जानती हूँ मेरे कामदेव !”

“तुम अभी नासमझ हो ! प्रथम मिलन में तुम्हें बहुत कष्ट हो सकता है !”

“तुम चिंता मत करो मेरे प्रियतम ! मैं सब सह लूंगी मैं सब जानती हूँ !”

अब मेरे चौंकने की बारी थी मैंने पुछा “तुम ये सब ??”

“मैंने मम्मी और पापा को कई बार रति-क्रीड़ा और सम्भोग करते देखा है और अपनी सहेलियों से भी बहुत कुछ सुना है।”

“अरे कऽ कऽऽ क्या बात करती हो… तुमने ?” मेरे आश्चर्य कि सीमा नहीं रही “क्या देखा है तुमने और क्या जानती हो तुम ?”

“वोही जो एक पुरुष एक स्त्री के साथ करता एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ करता एक भंवरा किसी कली के साथ करता है, सदियों से चले आ रहे इस जीवन चक्र में नया क्या है जो आप मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं … मैं… मैं… रसकूप, प्रेम द्वार, काम-दंड, रति-क्रीड़ा और मधुर मिलन जैसे शब्दों का नाम लेकर तुम्हें कैसे बताऊँ… मुझे क्षमा कर दो मेरे प्रियतम ! मुझे लाज आती है !!!”

मैं हक्का बक्का सा उसे देखता ही रह गया। आज तो ये मासूम सी दिखनेवाली लड़की न होकर अचानक एक प्रेम रस में डूबी नवयौवना और कामातुर प्रेयसी नज़र आ रही है।

बस अब बाकी क्या बचा था ??? मैंने एक बार फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया…और…।

हमारे इस मधुर (प्रेम) मिलन (इसे चुदाई का नाम देकर लज्जित न करें) के बारे में मैं विस्तार से नहीं लिख पाऊंगा। सदियों से चले आ रहे इस नैसर्गिक सुख का वर्णन जितना भी किया जाए कम है। रोमांटिक भाषा में तो पूरे ग्रन्थ भरे पड़े हैं। वात्स्यायन का कामसूत्र या फिर देशी भाषा में मस्तराम की कोई किताब पढ़ लें।

मैंने मिक्की से उसके रजोदर्शन (मासिक) के बारे में पूछा था (मैं उसे गलती से भी गर्भवती नहीं करना चाहता था) तो उसने बताया था कि उसकी अगली तारीख एक जून के आस पास है और आज तो २८ मई है ! और फिर ! दिल्ली लुट गई……………………!!!

हमें कोई दस-पन्द्रह मिनट लगे होंगे। ऐसा नहीं है कि सब कुछ किसी कुशल खिलाड़ियों के खेल की भाँति हो गया हो। मिक्की जिसे खेल समझ रही थी वास्तव में थोड़ा सा कष्ट कारक भी था। वो थोड़ा रोई-चिल्लाई भी ! पर प्रथम-मिलन के उन पलों में उसने पूरा साथ दिया। आज वो कली से फूल बनकर तृप्त हो गई थी। हम दोनों साथ साथ स्खलित हुए। उसे थोड़ा खून भी निकला था। मैंने अपने कुरते की जेब से वोही रेशमी रुमाल निकाला जो मिक्की ने मुझे बाज़ार में गिफ्ट दिया था और उसके प्रेम द्वार से चूते मेरे प्रेम-रस, मिक्की के काम-राज और रक्त का मिलाजुला मिश्रण उस अनमोल भेंट में डुबो कर साफ़ कर दिया और उसे अमूल्य निधि की तरह संभाल कर अपने पास रख लिया।

फिर हम दोनों ने बाथरूम में जाकर सफाई की। मिक्की की मुनिया पाव रोटी की तरह सूज गई थी, उसके निचले होंठ बहुत मोटे हो गए थे जैसे ऊपर वाले होंठों का डबल रोल हो। मैंने उसकी पिक्की ? बुर ? चूत ? (अरे नहीं यार मैं तो उसे मुनिया कहूँगा) पर एक चुम्बन ले लिया और मिक्की ने भी मेरे सोये पप्पू को निराश नहीं किया उसने भी एक चुम्बन उस पर ले लिया।

मैंने खिड़की का पर्दा हटा दिया। चाँद की दूधिया रोशनी से कमरा जगमगा उठा। दूर आसमान में एकम का चाँद अपनी चांदनी बरसाता हुआ हमारे इस मधुर मिलन का साक्षी बना मुस्कुरा रहा था। मिक्की मेरी गोद में सिर रखे अपनी पलकें बंद किये सो रही थी।

मैंने उदास स्वर में कहा “मिक्की मेरी जान, मेरे प्राण, मेरी आत्मा, मेरी प्रेयसी कैसी हो ?”

उस से बिछुड़ने की वेदना मेरे चहरे पर साफ़ झलक रही थी। कल मिक्की वापस चली जायेगी।

“अब मैं कली से फूल, किशोरी से युवती, मिक्की और मोना से मोनिका बन गई हूँ और मेरी पिक्की अब भोस नहीं… प्रेम रस भरा स्वर्ग द्वार बन गई है कहने को और क्या शेष रह गया है मेरे प्रेम दीवाने, मेरे प्रेम देव, मेरे प्रथम पुरुष !” मिक्की ने रस घोलती आवाज में कहा।

आप जरूर सोच रहे होंगे अजीब बात है ये बित्ते भर की +२ में पढ़ने वाली नादान अंगूठा चूसने वाली नासमझ सी लोंडिया इतनी रोमांटिक और साहित्यिक भाषा में कैसे बात कर रही है ? मैंने (लेखक ने) जरूर कहीं से ये संवाद व्ही शांता राम की किसी पौराणिक फिल्म या किसी रोमांटिक उपन्यास से उठाया होगा ?

आप सरासर गलत हैं। मैंने भी मिक्की (सॉरी अब मोनिका) से उस समय पूछा था तो उसने जो जवाब दिया था आप भी सुन लीजिये :

“क्यों मेरे पागल प्रेम दीवाने जब आप अपने आप को बहुत बड़ा ‘प्रेम गुरु’ समझते हैं, अपने कंप्यूटर पर ‘जंगली छिपकलियों’ के फोल्डर और फाइल्स को लोक और अन्लोक कर सकते है तो क्या मैं आपकी उस काले जिल्द वाली डायरी, जिसे आपने परसों स्टडी रूम में भूल से या जानबूझ कर छोड़ दिया था, नहीं पढ़ सकती ? “

हे भगवान् ? मैं हक्का बक्का आँखें फाड़े उसे देखता ही रह गया। मुझे ऐसा लगा जैसे हजारों वाट की बिजलियाँ एक साथ टूट पड़ी हैं। मैंने कथा के शुरू में आपको बताया था कि मैं उन दिनों डायरी लिखता था और ये वोही डायरी थी जिसके शुरू में मैंने अपनी सुहागरात और मधुर मिलन के अन्तरंग क्षणों को बड़े प्यार से संजोया था और उसके प्रथम पृष्ठ पर ‘मधुर प्रेम मिलन’ लिखा था। मैंने इसे बहुत ही संभाल कर रखा था और मधु को तो अब तक इसकी हवा भी नहीं लगने दी थी, न जाने कैसे उस दिन आजकल के अनुभवों के नोट्स लिखते हुए स्टडी रूम में रह गई थी।

ओह ! अब तो सब कुछ शीशे की तरह साफ़ था।

“आपको तो मेरा धन्यवाद करना चाहिए कि वो डायरी मैंने बुआजी के हाथ नहीं पड़ने दी और अपने पास रख ली नहीं तो इतना बड़ा हंगामा खड़ा होता कि आपका सारा का सारा साहित्यिक ज्ञान और प्रेम-गुरुता धरी की धरी रह जाती ?” मिक्की ने जैसे मेरे ताबूत में एक कील और ठोक दी।

“ओह थैंक यू … मिक्की ओह बा मोनिका कहाँ है वो ड़ायरी ?? लाओ प्लीज मुझे वापस दे दो !”

“ना ! कभी नहीं वो तो मैं जन्म-जन्मान्तर तक भी किसी को नहीं दूँगी, मेरे पास भी तो हमारे प्रथम मधुर मिलन के इन अनमोल क्षणों की कुछ निशानी रहनी चाहिए ना ?”

मैं क्या बोलता ?

मिक्की फिर बोली “मधुर मिलन की इस रात्रि में उदासी का क्या काम है ! आओ ! सपनों के इस संसार में इन पलों को ऐसे व्यर्थ न गंवाओ मेरे प्रियतम ! ये पल फिर मुड़ कर नहीं आयेंगे !”

और मिक्की ने एक बार फिर मेरे गले में अपनी नाज़ुक बाहें डाल दी। इस से पहले कि मैं कुछ बोलता मिक्की के जलते होंठ मेरे होंठों पर टिक गए और मैंने भी कस कर उन्हें चूमना शुरू कर दिया।

बाहर मिक्की के मामाजी (अरे यार चन्दा मामा) खिड़की और रोशनदान से झांकते हुए मुस्कुरा रहे थे।

अगली सुबह-

मिक्की के पास तो लंगड़ाकर चलने का बहाना था (टांगों के बीच में दर्द का नहीं एड़ी में दर्द का) पर मेरे पास तो सिवाए सिर दर्द के और क्या बहाना हो सकता था। मैंने इसी बहाने ऑफिस से बंक मार लिया। आज मेरी मिक्की मुझ से बिछुड़ कर वापस जा रही थी। शाम की ट्रेन थी। मेरा मन किसी चीज में नहीं लग रहा था। एक बार तो जी में आया कि मैं रो ही पडूं ताकि मन कुछ हल्का हो जाए पर मैंने अपने आप को रोके रखा। दिन भर अनमना सा रहा। मैं ही जानता हूँ मैंने वो पूरा दिन कैसे बिताया।
 
ट्रेन कोई शाम को सात बजे की थी। सीट आराम से मिल गई थी। जब गाड़ी ने सीटी बजाई तो मैं उठकर चलने लगा। मिक्की के प्यार में भीगी मेरी आत्मा, मेरा हृदय, मेरा मन तो वहीं रह गया था।

मैं अभी डिब्बे से नीचे उतरने वाला ही था कि पीछे से मिक्की की आवाज आई,”फूफाजी…! आप अपना मोबाइल तो सीट पर ही भूल आये !”

मिक्की भागती हुई आई और मुझ से लिपट गई। उसने अपने भीगे होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और किसी की परवाह किये बिना एक मेरे होंठों पर ले लिया। मैंने अपने आंसुओं को बड़ी मुश्किल से रोक पाया।

मिक्की ने थरथरती हुई आवाज में कहा,”मेरे प्रथम पुरुष ! मेरे कामदेव ! मेरी याद में रोना नहीं। अच्छे बच्चे रोते नहीं ! मैं फिर आउंगी, मेरी प्रतीक्षा करना !”

मिक्की बिना मेरी और देखे वापस अपनी सीट की और चली गई। मेरी अंगुलियाँ मेरे होंठों पर आ गई। मैं मिक्की के इस तीसरे चुम्बन का स्पर्श अभी भी अपने होंठो पर महसूस कर रहा था।

मैं डिब्बे से नीचे उतर आया। गाड़ी चल पड़ी थी। खिड़की से मिक्की का एक हाथ हिलाता हुआ नज़र आ रहा था। मुझे लगा कि उसका हाथ कुछ धुंधला सा होता जा रहा है। शायद मेरी छलछलाती आँखों के कारण। इस से पहले कि वो कतरे नीचे गिरते मैंने अपनी जेब से वोही रेशमी रुमाल निकाला जो मिक्की ने मुझे गिफ्ट किया था और हमारे मधुर मिलन के प्रेम रस से भीगा था, मैंने अपने आंसू पोंछ लिए।

मेरे आंसू और मिक्की के होंठो का रस, हमारे मधुर मिलन के प्रेम रस से सराबोर उस रस में मिल कर एक हो गए। मैं बोझिल कदमों और भारी मन से प्लेटफार्म से बाहर आ गया। मेरा सब कुछ तो मिक्की के साथ ही चला गया था।

दोस्तों सच बताना क्या अब भी आपको यही लगता है कि ये महज़ एक कहानी है ?

 
rajsharma wrote: क्या बात है भाई बड़ी मेहनत कर रहे हो वेरी गुड लगे रहो
 
नन्दोईजी नहीं लण्डोईजी

मैंने लोगों से सुना था कि किसी लड़की या औरत की खूबसूरती उसके उरोजों और नितम्बों से जानी जा सकती है। पर गुरूजी तो कुछ और ही फरमाते हैं। वो कहते हैं “चूत की सुन्दरता उसकी चौड़ाई से, गांड की सुन्दरता उसकी गहराई से और लंड की सुन्दरता उसकी लम्बाई से जानी जाती है। एक बार मैंने विशेष प्रवचन में गुरूजी से पूछा था कि चूत तो दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है तो फिर चूत की चौड़ाई से क्या अभिप्राय है तो गुरूजी ने डांटते हुए कहा था, “अरे भोले इसके लिए दोनों अंगुलियों को आड़ी नहीं सीधी यानि कि लम्बवत देखा जाता है और ये अंगुलियों जैसी, जितनी लम्बी होगी, उतनी ही सुन्दर होगी। इसीलिए चूत दो अंगुल की सुन्दर मानी जाती है। मैं जिस चौड़ाई की बात कर रहा हूँ वो चूत के नीचे दोनों जाँघों की चौड़ाई की बात है.”

गुरूजी की बातें सब के समझ में इतनी जल्दी नहीं आती। खैर अगर ऐसी चूत और गांड की बात की जाए तो मधु से भी ज्यादा सुन्दर तो सुधा है। सुधा मेरी सलहज है। अरे भई मेरी पत्नी मधु के भैय्या की प्यारी पत्नी। वो पंजाब से है ना। उन्होंने रमेश से प्रेम विवाह किया है। उम्र ३६ साल, रंग गोरा, ३८-२८-३६ ।

आप सोच रहे होंगे नितम्बों में २” की कंजूसी क्यों? पूरे ३८’ क्यों नहीं ? इसका कारण साफ़ है वो बेचारी गांड मरवाने के लिए तरसती रही है। आप तो जानते हैं गांड मरवाने से नितम्बों का आकार और सुन्दरता बढ़ती है। रमेश का जब से एक्सीडेंट हुआ है और सेक्स-क्षमता कुछ कम हुई है, वो बेचारी तो लंड के लिए तरस ही रही थी। वैसे भी रमेश को गांड मारना बिल्कुल पसंद नहीं है।

गुरूजी कहते हैं जिस आदमी ने अपनी खूबसूरत पत्नी की गांड नहीं मारी समझो वो जीया ही नहीं। उसका ये जन्म तो व्यर्थ ही गया। ऐसे ही आदमियों के लिए शायद ये गाली बनी है ‘साला चूतिया !’

सुधा मुझे नन्दोईजी कहकर बुलाती थी। लगता था जैसे उसके मुंह से लन्दोईजी ही निकल रहा हो। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर जब भी मैं अकेला होता तो पता नहीं वो जानबूझ कर ऐसा बोलती थी या उसकी बोली ही ऐसी थी मैंने गौर नहीं किया।

एक बार जब मैं और मधु उनके यहाँ गए हुए थे मैंने बातों ही बातों में उसे मज़ाक में कह दिया,“भाभी आप मुझे नन्दोईजी मत बुलाया करो !”

“क्यों क्या आपको लन्दोईजी कहना अच्छा नहीं लगता ?” उसके चेहरे पर कोई ऐसा भाव नहीं था जिससे मैं समझ सकता कि उसके मन में क्या है। यही तो कुदरत ने इन औरतों को ख़ास अदा दी है।

“नहीं ऐसी बात नहीं है, दरअसल मैं आप से छोटा हूँ और आप मुझे जी लगाकर बुलाती है तो मुझे लगता है कि मैं कोई ६० साल का बूढा हूँ। ” मैंने हंसते हुए कहा कहा।

“तो फिर कैसे … किस नाम से बुलाऊं लन्दोईजी ?”

“आप मुझे प्रेम ही बुला लिया करो !”

“ठीक है प्रेम प्यारे जी !” सुधा ने हंसते हुए कहा।

जिस अंदाज में उसने कहा था उस फिकरे का मतलब तो मैं पिछले चार पांच महीनों से सोचता ही रहा था। अब भी कभी कभी मजाक में वो लंदोईजी कह ही देती है पर सबके सामने नहीं अकेले में.

बात कोई मेरी शादी के डेढ़ दो साल के बाद की है। इतने दिनों तक तो मैं मधु की चूत पर ही मोर (लट्टू) बना रहा पर जब उसकी चूत का छेद कुछ चौड़ा हो गया तो मेरा ध्यान उसकी नाजुक कोरी नरम मुलायम गांड पर गया। वो पट्ठी गांड के नाम से ही बिदक गई। उसने अपनी कॉलेज की किसी सहेली से सुना था कि गांड मरवाने में बहुत दर्द होता है और उसकी सहेली की तो पहली ही रात में उसके पति ने इतनी जोर से गांड मारी थी कि वो खून-ओ-खून हो गई थी और डॉक्टर बुलाने की नौबत आ गई थी।

अब भला वो मुझसे इतनी जल्दी गांड कैसे मरवाती। मुझे उसे गांड मरवाने के लिए तैयार करने में पूरे ३ साल लग गए। खैर ये किस्सा अभी नहीं, बाद में अभी तो सिर्फ सुधा की बात ही करेंगे।

कहते है जहां चाह वहाँ राह। लंड और पानी अपना रास्ता खुद बना लेते हैं। मधु को पहली डिलिवरी होने वाली थी। कभी भी हॉस्पिटल ले जाना पड़ सकता था। डॉक्टरों ने चुदाई के लिए मना कर दिया था और वो गांड तो वैसे भी नहीं मारने देती थी। घर पर देखभाल के लिए सुधा (मेरी सलहज) आई हुई थी।

अक्टूबर का महीना चल रहा था। गुलाबी ठण्ड शुरू हो चुकी थी और मैं अपने लंड को हाथ में लिए मुठ मारने को मजबूर था। हमारे घर में गेस्ट-रूम के साथ लगता एक कोमन बाथरूम है। एक दिन जब मैं उस बाथरूम में मुठ मार रहा था तो मैं जोर जोर से सीत्कार कर रहा था। ‘हाईई… शहद रानीई… तुम ही अपनी चूत दे दो ! क्या अचार डालोगी हाईई … ! चूत नहीं तो गांड ही दे दो …!” अचानक मुझे लगा कि कोई चाबी-छिद्र से देख रहा है। मैं झड़ तो गया पर मैंने सोचा कौन हो सकता है। मधु तो अपने कमरे में है फिर ….। नौकरानी है या कहीं मेरी शहद रानी (सुधा) तो नहीं थी। सुधा शहद की तरह मीठी है मैं उसे शहद रानी ही कह कर बुलाता हूँ।

जब मैं बाहर निकला तो सुधा तो मधु के पास बैठी गप्प लगा रही थी। नौकरानी अभी नहीं आई थी। मैं समझ गया ये जरूर सुधा ही थी। जैसे कि आप तो जानते ही हैं कि मैं एक नंबर का चुद्दकड़ हूँ पर मेरी पत्नी और ससुराल वालों के सामने मेरी छवि एकदम पत्नी भक्त और शरीफ आदमी की है। मधु तो मुझे निरा मिट्ठू ही समझती है। हे भगवान् सुधा ने क्या समझा होगा। उसके बाद तो दिन भर मैं उससे नजरें ही नहीं मिला सका।

संयोग से दो तीन दिनों बाद ही करवा-चोथ का व्रत था। मधु की हालत ऐसी नहीं थी कि वो व्रत रख सकती थी। मैंने उसकी जगह व्रत रख लिया। सुधा का भी व्रत था। इस व्रत में दिन भर भूखा रहना पड़ता है। चाँद को देखकर ही अपना व्रत तोड़ते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ उत्तरी भारत में इस व्रत का बड़ा महत्व है। ख़ासकर राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में तो औरतें दिन में पानी तक नहीं पीती।

मेरा दोस्त गोटी (गुरमीत सिंह) बताता है कि उसकी पत्नी तो बिना लंड चूसे और चूत चुसवाये अपना व्रत तोड़ती ही नहीं है। ऐसी मान्यता है कि करवा का व्रत रखने से और लंड का पानी पीने से पहला बच्चा लड़का ही पैदा होता है। पता नहीं कहाँ तक सच है पर जिस हिसाब से पंजाब और हरियाणा में लड़के ज्यादा पैदा होते है इस बात में दम जरूर नजर आता है। अगले प्रवचन में गुरूजी से ये बात जरूर पूछूँगा।

एक खास बात तो बताना ही भूल गया। मधु भले ही उन दिनों गांड न मारने देती हो पर लंड चूसने में कोई कोताही नहीं करती थी। और मेरा वीर्य तो जैसे उसके लिए अमृत है। वो कहती है कि पति का वीर्य पीने से उनकी उम्र बढ़ती है और उसे शहद के साथ चाटने या पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है। वैसे तो ये गोली भी उसे मैंने ही पिलाई थी। पर इसी लिए तो मैं उसका मिट्ठू बना हुआ हूँ। करवाचोथ की रात चाँद देखने के बाद वो मेरा लंड चूसती है और पूरा पानी पीकर ही अपना व्रत तोड़ती है। मैं अपना व्रत उसका मधु रस (चूत रस) पीकर तोड़ता हूँ। पर मैं आज सोच रहा था कि आज तो मुझे सादा पानी पीकर और मधु को दवाई लेकर ही अपने व्रत तोड़ने पड़ेंगे।

ये कार्तिक माह का चाँद भी साला (बच्चो का मामा मेरा साला ही तो हुआ ना) रात को देर से ही उगता है बेचारी औरतों को सताने में पता नहीं इसको क्या मजा आता है। यार कम से कम हम जैसों के लिए तो पहले उग जाया करो। खैर कोई रात के ९.३० या १० बजे के आस-पास मैं छत पर चाँद देखने गया। पूर्व दिशा में चाँद ने अपनी लाली कब की बिखेरनी शुरू कर दी थी नीचे पेड़ पोधों और मकानों के कारण पता ही नहीं लगा। मैं जल्दी से सीढ़ियों से नीचे आया। मधु तो ऊपर जा नहीं सकती थी सुधा एक थाली में कुछ फूल, रोली, करवा (मिटटी का बना छोटा सा लोटा), चावल, शहद, गुड़, मिठाई आदि रख कर मेरे साथ ऊपर आ गई। हमारे घर की छत पर एक छोटा सा स्टोर बना है उसके पीछे जाकर चाँद देखा जा सकता था। हम दोनों उसके पीछे चले गए। अगर कोई सीढ़ियों से आ भी जाए तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता। सुधा ने छलनी के अन्दर से चाँद को देखकर उसे करवे से पानी अर्पित किया और फिर खड़ी खड़ी अपनी जगह पर दो बार घूम गई। इस दौरान उसका पैर थोड़ा सा डगमगाया और उसके नितम्ब मेरे पाजामे में खड़े ७” के लंड से टकरा गए। मैंने अन्दर चड्डी नहीं पहनी थी। उसने एक बार मेरी ओर देखा पर बोली कुछ नहीं। उसने चाँद के आगे अपनी मन्नत मांगनी शुरू की :

“हे चाँद देवता मेरे पति की उम्र लम्बी हो उनका स्वास्थ्य ठीक रहे…। ”

फिर थोड़ी धीमी आवाज में आगे बोली “और उनका वो सदा खड़ा और रस से भरा रहे !”

‘वो’ का नाम सुनकर मैं चोंका। मैंने जानता था ‘वो’ क्या होता है पर मैंने सुधा से पूछ ही लिया “भाभी ‘वो’ क्या हुआ ?”

“धत् …” वो इतना जोर से शरमाई जैसे १६ साल की नव विवाहिता हो।

“प्लीज बताओ ना भाभी ‘वो’ क्या ?”

“नहीं मुझे शर्म आती है !”

“प्लीज भाभी बताओ ना !”

“क्या मधु ने नहीं बताया ?”

“नहीं तो !” मैं साफ़ झूठ बोल गया।

“इतने भोले तो आप और मधु नहीं लगते ?”

“सच भाभी वो तो वो तो … मेरा मतलब है …” मेरा तो गला ही सूखने लगा और मेरा लंड तो पहले से ही १२० डिग्री पर खड़ा था पत्थर की तरह कड़ा हो गया।

“मैं सब जानती हूँ मेरे लन्दोईजी … मुझे इतनी भोली भी मत समझो !” और उसने मेरे खड़े लंड पर एक प्यारी सी चपत लगा दी। “ हाय राम ये तो बड़ा दुष्ट है !” वो हंसते हुए बोली।

अब बाकी क्या बचा रह गया था। मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया। वो भी मुझ से लिपट गई। मैंने अपने जलते हुए होंठ उसके होंठों पर रख दिए। उफ्फ्फ …। गुलाब की पंखुड़ियों जैसे नरम मुलायम होंठ। पता नहीं मैं कितनी देर उनका रस चूसता रहा। सुधा ने पजामे के ऊपर से ही मेरा लंड पकड़ रखा था और धीरे धीरे सहला रही थी। मैंने भी एक हाथ से उसकी साड़ी के ऊपर से ही उसकी चूत सहलानी शुरू कर दी, शायद उसने भी पेंटी नहीं पहनी थी। उसकी झांटों को मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था।

कोई ५ मिनट के बाद एक झटके के साथ वो अपने घुटनों के बल बैठ गई और मेरे पजामे का नाड़ा खोल कर मेरे पप्पू को बाहर निकाल लिया। मेरा लंड तो पिछले २ महीनों से प्यासा था। उसने बिना कोई देरी किये मेरा लंड एक ही झटके में अपने मुंह में ऐसे ले लिया जैसे कोई बिल्ली किसी मुर्गे की गर्दन पकड़ लेती है। मैं उसका सिर सहला रहा था। पता नहीं वो दिन भर की प्यासी थी या कई बरसों की।

उसकी चूसने की लज्जत से मैं तो निहाल ही हो गया। क्या कमाल का लंड चूसती है। हालांकि मधु को मैंने लंड चूसने की पूरी ट्रेनिंग दी है पर सुधा जिस तरीके से मेरा लंड चूस रही थी मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर लंड चुसाई का कोई मुकाबला करवा लिया जाए तो सुधा अव्वल नंबर आएगी।

वो कभी मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लेती कभी बाहर निकाल कर चाटती कभी सुपाड़े को ही मुंह में लेकर चूसती कभी उस पर अपने दांत से हौले से काट लेती। एक दो बार उसने मेरे दोनों चीकुओं (अण्डों) को भी मुंह में लेकर चूसा।

मैं तो बस आह्ह … ओईई …। ओह्ह … या …। ही करता जा रहा था। कोई ७-८ मिनट हो गए थे। मैंने उसका सिर पकड़ रखा था और उसका मुंह ऐसे चोद रहा था जैसे वो कोई चूत ही हो। वो तो मस्त हुई जोर जोर से चूसे जा रही थी। अब मुझे लगाने लगा कि मैं झड़ने के करीब हूँ तो मैंने उसे इशारा किया मैं जाने वाला हूँ तो उसने भी इशारे से कहा “कोई बात नहीं !”

मैंने उसका सिर जोर से पकड़ लिया और अपने लंड को उसके मुंह में आगे पीछे करने लगा जैसे उसका मुंह न होकर चूत या गांड हो। और फिर एक दो तीन चार पांच ….। कितनी ही पिचकारियाँ मेरे लंड ने दनादन छोड़ दी। सुधा तो जैसे निहाल ही हो गई उस अमृत को पी कर। उसका व्रत टूट गया था। उसने एक चटखारा लेकर कहा “वह मजा आ गया मेरे लन्दोईजी !”

“आपका व्रत तो टूट गया पर मेरा कैसे टूटेगा ?”

“नहीं..। अभी नहीं … बाद में… ”

पर मैं कहाँ मानने वाला था। मैंने एक झटके में उसकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर कर दिया। वाह …। चाँद की दुधिया रोशनी में उसकी काले काले घुंघराले झांटों के झुरमुट से ढकी मखमली चूत देखने लायक थी। हालांकि उसकी चूत पर बहुत सारे झांट थे लम्बे लम्बे पर उसमे छुपी हुई मोटे मोटे होंठों वाली चूत साफ़ देखी जा सकती थी। जैसे किसी गुलदस्ते में सजा हुआ एक खिला गुलाब का फूल हो एकदम सुर्ख लाल। उसकी चूत पर उगे लम्बे लम्बे झांट देख कर मुझे पाकीज़ा फिल्म का वो डायलोग याद आ गया :

“आपकी चूत पर उगी काली लम्बी घनी रेशमी झांटें देखी

इन्हें काटियेगा नहीं, चूत बे-परदा हो जायेगी ”

मैंने तड़ से एक चुम्बन उस पर ले लिया और उसके होंठ अपने मुंह में लेकर चूमने लगा। अन्दर वाले होंठ तितली के पंखों की तरह कोई दो ढाई इंच लम्बे तो जरूर होंगे। तोते की चोंच की तरह बने बीच के होंठ बहुत बड़ी चुद्दकड़ औरतों के होते है। मुझे लगा सुधा भी एक नंबर की चुद्दकड़ है। साले रमेश (मेरा साला) ने उसे ढंग से चोदा हो या नहीं पर चूत की फांकों को कमाल का चूसा होगा तभी तो इतनी बड़ी हो गई हैं।

“बस अब चलो बाकी बाद में नहीं तो मधु तुम्हारी जान निकाल देगी मेरे प्यारे नन्दोईजी अ…अरे नहीं लण्डोईजी …!” उसने हंसते हुए कहा। मैं मन मार कर प्यासा ही बिना व्रत तोड़े नीचे आ गया।
 
नीचे मधु मेरा इंतजार ही कर रही थी। सुधा रसोई में खाना लेने चली गई थी। जानबूझ कर हमें अकेला छोड़ कर। मैं किसी प्यासे भंवरे की तरह मधु से लिपट गया। मुझे पता था वो मुझे चूत तो हरगिज नहीं चूसने देगी। और इस हालत में मेरा लंड वो कैसे चूसती। उसने एक चुम्बन पजामे के ऊपर से जरूर ले लिया। मुझे तो डर लगने लगा कि ऐसी हालत में तो मेरा लंड कुतुबमीनार बन जाता है आज खड़ा नहीं हुआ कहीं मधु को कोई शक तो नहीं हो जाएगा।

पर वो कुछ नहीं बोली केवल मन ही मन चाँद देवता से मन्नत मांग रही थी “मेरे पति की उम्र लम्बी हो। उनका स्वास्थ्य ठीक रहे और उनका ‘वो ’ सदा खड़ा और रस से भरा रहे !”

मैं मुस्कुराए बिना नहीं रह सका मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया और उसने भी हौले से मुझे चूम लिया। फिर मैंने करवे के पानी में शहद मिलाया और एक घूँट पानी उसे पिलाया और बाकी का मैं पी गया। उसका व्रत टूट गया मेरा तो पहले ही टूट चुका था।

दूसरे दिन मधु को हॉस्पिटल भरती करवाना पड़ ही गया। हॉस्पिटल में पहले से ही सारी बात कर रखी थी। डॉक्टर ने बताया कि आज रात में डिलिवरी हो सकती है। जब मैंने रात में उसके पास रहने की बात कही तो डॉक्टर ने बताया कि रात में किसी के यहाँ रुकने और सोने की कोई जरुरत नहीं है आप चिंता नहीं करें। रात में इनके पास दो नर्सें सारी रात रहेंगी। कोई जरुरत हुई तो हम देख लेंगे। अन्दर से मैं भी तो यही चाहता था।

मैं और सुधा दोनों कार से घर वापस आ गए। जब हम घर पहुंचे तो रात के कोई ११.०० बज चुके थे। रास्ते में सिवा एक चुम्बन के उसने कुछ नहीं करने दिया। इन औरतों को पता नहीं मर्दों को सताने में क्या मजा आता है। बेड रूम के बाहर तो साली पुट्ठे पर हाथ ही नहीं धरने देती। खाना हमने एक होटल में ही खा लिया था वैसे भी इस खाने में हमें कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। हम तो असली खाना खाने के लिए बेकरार थे। आग दोनों तरफ लगी थी ना।

घर पहुंचते ही सुधा बाथरूम में घुस गई और मैं बेडरूम में बैठा उसका इंतजार कर रहा था। मैंने अपना पजामा खोल कर नीचे सरका दिया था अपना ७” का लंड हाथ में पकड़े बैठा उसे समझा रहा था। कोई आध-पौन घंटे के बाद एक झीनी सी नाइटी पहने सुधा बाथरूम से निकली। जैसे कोई मॉडल रैंप पर कैट-वाक करती है। कूल्हे मटकती हुए वो मेरे सामने खड़ी हो गई।

उफ़ … क्या क़यामत का बदन था गोरा रंग गीले बाल थरथराते हुए होंठ। मोटे मोटे स्तन, पतली सी कमर और मोटे मोटे गोल नितम्ब। बिलकुल तनुश्री दत्ता जैसे। काली झीनी सी नाइटी में झांकती मखमली जाँघों के बीच फंसी उसकी चूत देख कर मैं तो मंत्रमुग्ध सा उसे देखता ही रह गया। मेरे तो होश-ओ-हवास ही जैसे गुम हो गए।

“कहाँ खो गए मेरे लन्दोईजी ?”

मैंने एक ही झटके में उसे बाहों में भरकर बेड पर पटक दिया और तड़ा तड़ एक साथ कई चुम्बन उसके होंठों और गालों पर ले लिए। वो नीचे पड़ी मेरे होंठों को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी। मैं नाइटी के ऊपर से ही उसकी चूत के ऊपर हाथ फिराने लगा।

“ओह ! प्रेम थोड़ा ठहरो अपने कपड़े तो उतार लो !” सुधा बोली।

“आँ हाँ !” मैंने अपनी टांगों में फंसे पजामे को दूर फेंक कर कुरता और बनियान भी उतार दी। और सुधा की नाइटी भी एक ही झटके में निकाल बाहर की। अब बेड पर हम दोनों मादरजात नंगे थे। उसका गोरा बदन ट्यूब लाइट की रोशनी में चमक रहा था। मैंने देखा उसकी चूत पर झांटों का नाम-ओ-निशाँ भी नहीं था। अब मैं समझा उसको बाथरूम में इतनी देर क्यों लगी थी। साली झांट काट कर पूरी तैयारी के साथ आई है। झांट काटने के बाद उसकी चूत तो एक दम गोरी चट्ट लग रही थी। हाँ उसकी दरार जरूर काली थी। ज्यादा चूत मरवाने या फिर ज्यादा चुसवाने से ऐसा होता है। और सुधा तो इन दोनों ही बातों में माहिर लगती थी।

ऐसी औरतों की चुदाई से पहले चूत या लंड चुसवाने की कोई जरुरत नहीं होती सीधी किल्ली ठोक देनी चाहिए। मेरा भी पिछले दो महीने से लंड किसी चूत या गांड के लिए तरस रहा था। और जैसा कि मुझे बाद में सुधा ने ही बताया था कि जयपुर से यहाँ आते समय रात को सिर्फ एक बार ही रमेश ने उसे चोदा था और वो भी बस कोई ४-५ मिनट। वो तो जैसे लंड के लिए तरस ही रही थी। ऐसी हालत में कौन चूमा-चाटी में वक्त बर्बाद करना चाहेगा। मैंने अपना लंड उसकी चूत के मुहाने पर रख कर एक जोर का झटका मारा। गच्च की आवाज के साथ मेरा आधा लंड उसकी नरम मक्खन सी चूत में घुस गया। दो तीन धक्कों में ही मेरा पूरा लंड जड़ तक उसकी चूत में समां गया। पूरा लंड अन्दर जाते ही उसने भी नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए जैसे वो भी सदियों की प्यासी हो।

चूत कोई ज्यादा कसी नहीं लग रही थी पर जिस अंदाज में वो अपनी चूत को अन्दर से भींच कर संकोचन कर रही थी मेरा लंड तो निहाल होता जा रहा था , सुधा (शहद) के नाम की तरह उसकी चूत भी बिलकुल शहद की कटोरी ही तो थी। सुधा ने अब मेरी कमर के दोनों ओर अपनी टाँगे कस कर लपेट ली। मैं जोर जोर से धक्के लगाने लगा।

कोई १० मिनट की धमाकेदार चुदाई के बाद मैंने महसूस किया कि उसकी चूत तो बहुत गीली हो गई है और लंड बहुत ही आराम से अन्दर बाहर हो रहा था। फच फच की आवाज आने लगी थी। उसे भी शायद इस बात का अंदाजा था।

मैंने कहा- भाभी क्या आपने कभी डॉग-कैट (कुत्ता-बिल्ली) आसन में चुदवाया है। तो उसने हैरानी से मेरी ओर देखा।

मैंने कहा- चलो इसका मजा लेते हैं।

आप भी सोच रहे होंगे, यह भला कौन सा आसन है। इस आसन में प्रेमिका को पलंग के एक छोर पर घुटनों के बल बैठाया जाता है एड़ियों के ऊपर नितम्ब रखकर। पंजे बेड के किनारे के थोड़े बाहर होते हैं। फिर एक तकिया उसकी गोद में रख कर उसका मुंह घुटनों की ओर नीचे किया जाता है। इस से उसका पेट दब जाता है जिस के कारण पीछे से चूत का मुंह तो खुल जाता है पर अन्दर से टाइट हो जाती है। प्रेमी पीछे फर्श पर खडा होकर कर अपना लंड चूत में डाल कर कमर पकड़ कर धक्का लगता है। यह आसन उन औरतों के लिए बहुत ही अच्छा होता है है जिनकी चूत फुद्दी बन चुकी हो। इस आसन की एक ही कमी है कि आदमी का पानी जल्दी निकल जाता है। मोटी गांड वाली औरतों के लिए ये आसन बहुत बढ़िया है। इस आसन में गांड मरवा कर तो वे मस्त ही हो जाती हैं। गांड मरवाते समय वो हिल नहीं सकती।

वो मेरे बताये अनुसार हो गई और मैंने अपने लंड पट थूक लगाया और पीछे आकर उसकी चूत में अपना लंड डालने लगा। अब तो चूत कमाल की टाइट हो गई थी। मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए। सुधा के लिए तो नया तजुर्बा था। वो तो मस्त होकर अपने नितम्ब जोर जोर से ऊपर नीचे करने लगी। उसके फ़ुटबाल जैसे नितम्ब मेरे धक्कों से जोर जोर से हिलने लगे। उसकी गांड का छेद अब साफ़ दिख रहा था। कभी बंद होता कभी खुलता। मैंने अपनी अंगूठे पर थूक लगाया और गच्च से उसकी गांड में ठोक दिया। वो जोर से चिल्लाई “उईई माँ आ … ऑफ प्रेम क्या कर रहे हो? ओह … अभी नहीं अभी तो मुझे चूत में ही मजा आ रहा है।”

मैंने अपना अंगूठा बाहर निकाल लिया और उसके नितम्ब पर एक जोर की थपकी लगाई। उसके मुंह से अईई निकल गया और उसने भी अपने नितम्बों से पीछे धक्का लगाया। फिर मैंने उसकी कमर पकड़ कर धक्के लगाने शुरू कर दिए। ५ मिनट में ही वो झड़ गई।

अब मैंने उसे फिर चित्त लिटा दिया और उसके नितम्बों के नीचे २ तकिये लगा दिए। उसने भी अपनी टाँगें उठा कर घुटनों को छाती से लगा लिया। अब उसकी चूत तो ऐसे लग रही थी जैसे उसकी दो अंगुलियाँ आपस में जुड़ी हों। अब मुझे गुरूजी की बात समझ लगी कि चूत दो अंगुल की क्यों कही जाती है। बीच की दरार तो एकदम बंद सी हो गई थी। चूत अब टाइट हो गई थी। मैंने अपना लंड फिर उसकी चूत में ठोक दिया और उसकी मोटी मोटी जांघें पकड़ कर धक्के लगाने चालू कर दिए।

५-७ मिनट की चुदाई के बाद उसने जब अपने पैर नीचे किये तो मेरा ध्यान उसके होंठों पर गया। उसके ऊपर वाले होंठ पर दाईं तरफ एक तिल बना हुआ था। ऐसी औरतें बहुत ही कामुक होती है और उन्हें गांड मरवाने का भी बड़ा शौक होता है। मैंने उसके होंठ अपने मुंह में ले लिए और चूसना शुरू कर दिया। वो ओह … आह्ह.। उईई कर रही थी। मैं एक हाथ से उसके गोल गोल संतरों को मसल रहा था और दूसरे हाथ की एक अंगुली से उसकी मस्त गांड का छेद टटोल रहा था। अचानक मेरी अंगुली से उसका छोटा सा नरम गीले छेद टकराया तो मैंने अपनी अंगुली की पोर उसकी गांड में डाल दी। उसने एक जोर की सीत्कार ली और मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया। शायद उसका पानी फिर निकल गया था। अब उसकी चूत से फ़च फ़च की आवाज आनी शुरू हो गई थी। “ओईई माँ … मैं तो गई ….” कह कर वो निढाल सी पड़ गई और आँखें बंद कर के सुस्त पड़ गई।

अब मेरा ध्यान उसके मोटे मोटे उरोजों पर गया। कंधारी अनार जैसे मोटे मोटे दो रसकूप मेरे सामने तने खड़े थे। उसका एरोला कोई २ इंच तो जरूर होगा। चमन के अंगूरों जैसे छोटे छोटे चूचुक तो सिंदूरी रंग के गज़ब ही ढ़ा रहे थे। मैंने एक अंगूर मुंह में ले लिया और चूसने लगा। वो फिर सीत्कार करने लगी। उसकी चूत ने एक बार फिर संकोचन किया तो मैंने भी एक जोरदार धक्का लगा दिया। ओईई माँ आ ….। उसके मुंह से निकल पड़ा।

“आह्ह ….। और जोर से चोदो मुझे मैं बरसों की प्यासी हूँ। वो रमेश का बच्चा तो एक दम ढिल्लु प्रसाद है। आह … ऊईई … शाबाश और जोर से प्रेम आह … याया आ….ईई…। मैं तो मर गई …। ओईई …” लगता था वो एक बार फिर झड़ गई।

मैं भी कब तक ठहरता। मुझे भी लगने लगा कि अब रुकना मुश्किल होगा। मैंने कहा- शहद रानी मैं भी झड़ने वाला हूँ, तो वो बोली एक मिनट रुको। उसने मुझे परे धकेला और झट से डॉगी स्टाइल में हो गई और बोली “पीछे से डालो न प्लीज जल्दी करो !”
 
मैंने उसकी कमर पकड़ी और अपना फनफनाता लंड उसकी चूत में एक ही धक्के में पूरा ठोक दिया। धक्का इतना जोर का था कि उसकी घुटी घुटी सी एक चीख ही निकल गई। उसके गोल गोल उरोज नीचे पके आम की तरह झूलने लगे वो सीत्कार किये जा रहे थी। उसने अपना मुंह तकिये पर रख लिया और मेरे झटकों के साथ ताल मिलाने लगी। उसकी गोरी गोरी गांड का काला छेद खुल और बंद हो रहा था। वो प्यार से मेरे अण्डों को मसलती जा रही थी। मैंने एक अंतिम धक्का और लगाया और उसके साथ ही पिछले २५-३० मिनट से उबलता लावा फूट पड़ा। कोई आधा कटोरी वीर्य तो जरूर निकला होगा। मेरे वीर्य से उसकी चूत लबालब भर गई। अब वो धीरे धीरे पेट के बल लेट गई और मैं भी उसके ऊपर ही पसर गया। उसकी चूत का रस और मेरा वीर्य टपटप निकालता हुआ चद्दर को भिगोता चला गया।

कोई १० मिनट तक हम ऐसे ही पड़े रहे। फिर वो उठाकर बात कमरे में चली गई। मुझे साथ नहीं आने दिया। पता नहीं क्यों। साफ़ सफाई करके वो वापस बेड पर आ गई और मेरी गोद में सिर रखकर लेट गई। मैंने उसके बूब्स को मसलने चालू कर दिया।

मैंने पूछा, “क्यों शहद रानी ! कैसी लगी चुदाई ?”

“आह … बहुत दिनों के बाद ऐसा मज़ा आया है। मधु सच कहती है तुम एक नंबर के चुद्दकड़ हो। सारे कस बल निकाल देते हो। अगर कोई कुँवारी चूत तुम्हें मिल जाए तो तुम तो एक रात में ही उसका कचूमर निकाल दोगे !” और उसने मेरे सोये शेर को चूम लिया।

“क्यों रमेश भैय्या ऐसी चुदाई नहीं करते क्या ?”

“अरे छोड़ो उनकी बात वो तो महीने में एक दो बार भी कर लें तो ही गनीमत समझो !”

“पर आपकी चूत देख कर तो ऐसा लगता है जैसे उन्होंने आप की खूब रगड़ाई की है !”

“आरे बाबा वो शुरू शुरू में था, जब से उनका एक्सीडेंट हुआ है वो तो किसी काम के ही नहीं रहे। मैं तो तड़फती ही रह जाती हूँ। ”

“अब तड़फने की क्या जरुरत है ?”

“हाँ हाँ १५-२० दिन तो मजे ही मजे है। फिर ….” वो उदास सी हो गई।

“आप चिंता मत करें मैं १५-२० दिनों में ही आपकी सारी कमी दूर कर दूंगा और आपकी साइज़ भी ३८-२८-३६ से ३८-२८-३८ या ४० कर दूंगा ” मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फेरते हुए कहा तो उसने मेरे लंड को मुंह में लेकर चूसना चालू कर दिया। मैंने कहा “ऐसे नहीं मैं चित्त लेट जाता हूँ आप मेरे पैरों की ओर मुंह करके अपनी टाँगे मेरे बगल में कर लो !”

अब मैं चित्त लेट गया और सुधा ने अपने पैर मेरे सिर के दोनों ओर करके अपनी चूत ठीक मेरे मुंह से सटा दी। उसकी फूली हुई चूत की दरार कोई ४ इंच से कम तो नहीं थी। उसकी चूत तो किसी बड़े से आम की रस में डूबी हुई गुठली सी लग रही थी। और टींट तो किसमिस के दाने जितना बड़ा बिलकुल सुर्ख लाल अनार के दाने की तरह। बाहरी होंठ संतरे की फांकों की तरह मोटे मोटे। अन्दर के होंठ देसी मुर्गे की लटकती हुई कलगी की तरह कोई २ इंच लम्बे तो जरूर होंगे। साले रमेश ने इनको चूस चूस कर इस चूत का भोसड़ा ही बना कर रख दिया था। और अब किसी लायक नहीं रहा तो मुझे चोदने को मिली है। हाय जब ये कुंवारी थी तो कैसी मस्त होगी साला रमेश तो निहाल ही हो गया होगा।

सच पूछो तो उसकी चुदी हुई चूत चोद कर मुझे कोई ज्यादा मजा नहीं आया था बस पानी निकालने वाली बात थी। पर उसके नितम्बों और गांड के छेद को देखकर तो मैं अपने होश ही खो बैठा। एक चवन्नी के सिक्के से थोड़ा सा बड़ा काला छेद। एक दम टाइट। बाहर कोई काला घेरा नहीं। आप को पता होगा गांड मरवाने वाली औरतों की गांड के छेड़ के चारों ओर एक गोल काला घेरा सा बन जाता है पर शहद रानी की कोरी गांड देखकर मुझे हैरानी हुई। क्या वाकई ये अभी तक कोरी ही है। मैं तो यह सोच कर ही रोमांच से भर गया। वो मेरा लंड चूसे जा रही थी। अचानक उसकी आवाज मेरे कानों में पड़ी,“अरे लण्डोईजी क्या हुआ ! तुम भी तो अपना कल का व्रत तोड़ो ना ?” उसका मतलब चूत की चुसाई से था।

“आन … हाँ “ मैं तो उसकी गांड का कुंवारा छेद देखकर सब कुछ भूल सा गया था। मैंने उसकी चूत पर अपनी जीभ फिराई तो वो सीत्कार करने लगी और मेरा लंड फिर चूसने लगी। मैंने भी उसकी चूत को पहले चाटा फिर अपनी जीभ की नोक उसकी चूत के छेद में डाल दी। वाओ … अन्दर से पके तरबूज की गिरी जैसी सुर्ख लाल चूत का अन्दर का हिस्सा बहुत ही मुलायम और मक्खन सा था। फिर मैंने उसके किसमिस के दाने को चूसा और फिर उसके अन्दर की फांकों को चूसना शुरु कर दिया। अभी मुझे कोई २ मिनट भी नहीं हुए थे कि सुधा एक बार और झड़ गई और कोई २-३ चमच शहद से मेरा मुंह भर गया जिसे मैं गटक गया। उसकी गांड का छेद अब खुल और बंद होने लगा था। उसमे से खुशबूदार क्रीम जैसी महक से मेरा स्नायु तंत्र भर उठा। मैंने अपनी जीभ की नोक उस पर जैसे ही टिकाई उसने एक जोर की किलकारी मारी और धड़ाम से साइड में गिर पड़ी। उसकी आँखें बंद थी। उसकी साँसे तेज चल रही थी।

“क्या हुआ मेरी शहद रानी ?”

वो बिना कुछ बोले उछल कर मेरे ऊपर बैठ गई और अपने होंठ मेरे होंठों पर लगा दिए। उसकी चूत ठीक मेरे लंड के ऊपर थी। मैं अभी अपना लंड उसकी चूत में डालने की सोच ही रहा था कि वो कुछ ऊपर उठी और मेरे लंड को पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर लगा दिया और नीचे की ओर सरकने लगी। मुझे लगा कि मेरा लंड थोड़ा सा टेढ़ा हो रहा है। एक बार तो लगा कि वो फिसल ही जाएगा। पर सुधा ने एक हाथ से इसे कस कर पकड़ लिया और नीचे की ओर जोर लगाया। वह जोर लगाते हुए नीचे बैठ गई। मेरा आधा लंड उसकी नरम नाजुक कोरी गांड में धंस गया। उसके मुंह से एक हल्की सी चीख निकल गई। वो थरथर कांपने सी लगी उसकी आँखों से आंसू निकल आये।
 
मेरा आधा लंड उसकी गांड में फंसा था। २-३ मिनट के बाद जब उसका दर्द कुछ कम हुआ तो उसने अपनी गांड को कुछ सिकोड़ा। मुझे लगा जैसे किसी में मेरे लंड को ऐसे दबोच लिया है जैसे कोई बिल्ली किसी कबूतर की गर्दन पकड़ कर भींच देती है। मुझे लगा जैसे मेरे लंड का सुपाड़ा और लंड के आगे का भाग फूल गया है। मैंने उसे थोड़ा सा बाहर निकलना चाहा पर वो तो जैसे फंस ही गया था।

गांड रानी की यही तो महिमा है। चूत में लंड आसानी से अन्दर बाहर आ जा सकता है पर अगर गांड में लंड एक बार जाने के बाद उसे गांड द्बारा कुतिया की तरह कस लिया जाए तो फिर सुपाड़ा फूल जाता है और फिर जब तक लंड पानी नहीं छोड़ देता वो बाहर नहीं निकल सकता।

अब हालत यह थी कि मैं धक्के तो लगा सकता था पर पूरा लंड बाहर नहीं निकाल सकता था। आधे लंड को ही बाहर निकाला जा सकता था। सुधा ने नीचे की ओर एक धक्का और लगाया और मेरा बाकी का लंड भी उसकी गांड में समां गया। वो धीरे धीरे धक्का लगा रही थी और सीत्कार भी कर रही थी। “ओह … उई … अहह। या … ओईईई … माँ ….”

उसकी कोरी नाजुक मखमली गांड का अहसास मुझे मस्त किये जा रहा था। कई दिनों के बाद ऐसी गांड मिली थी। ऐसी गांड तो मुझे कालेज में पढ़ने वाली सिमरन की भी नहीं लगी थी और न ही निशा (मधु की कजिन) की। इतनी मस्त गांड साला रमेश चूतिया कैसे नहीं मारता मुझे ताज्जुब है।

मुझे धक्के लगाने में कुछ परेशानी हो रही थी। मैंने सुधा से कहा “शहद रानी ऐसे मजा नहीं आएगा। तुम डॉगी स्टाइल में हो जाओ तो कुछ बात बने। ”

पर बिना लंड बाहर निकाले यह संभव नहीं था। और लंड तो ऐसे फंसा हुआ था जैसे किसी कुतिया ने लंड अन्दर दबोच रखा था। अगर मैं जोर लगा कर अपने लंड को बाहर निकालने की कोशिश करता तो उसकी गांड की नरम झिल्ली और छल्ला दोनों बाहर आ जाते और हो सकता है वो फट ही जाती।

उसने धीरे से अपनी एक टांग उठाई और मेरे पैरों की ओर घूम गई। अब वो मेरे पैरों के बीच में उकडू होकर बैठी थी। मेरा पूरा लंड उसकी गांड में फंसा था। अब मैंने उसे अपने ऊपर लेटा सा लिया और फिर एक कलाबाजी खाई और वो नीचे और मैं ऊपर आ गया। फिर उसने अपने घुटने मोड़ने शुरू किये और मैं बड़ी मुश्किल से खड़ा हो पाया। अब हम डॉगी स्टाइल में हो गए थे।

अब तो हम दोनों ही सातवें आसमान पर थे। मैंने धीरे धीरे उसकी गांड मारनी चालू कर दी। आह …। असली मजा तो अब आ रहा था। मेरा आधा लंड बाहर निकालता और फिर गच्च से उसकी गांड में चला जाता। मुझे लगा जैसे अन्दर कोई रसदार चिकनाई भरी पड़ी है। जब मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि वो थोड़ी देर पहले जब अपनी चूत साफ़ कर रही थी तभी उसने गांड मरवाने का भी सोच लिया था। और क्रीम की आधी ट्यूब उसने अपनी गांड में निचोड़ ली थी। अब मेरी समझ में आया कि इतनी आसानी से मेरा लंड कैसे उसकी कोरी गांड में घुस गया था। पता नहीं साली ने कहाँ से ट्रेनिंग ली है।

“भाभी यह बाते आप मधु को क्यों नहीं समझाती !”

“मुझे पता है वो तुम्हें गांड नहीं मारने देती और तुम उससे नाराज रहते हो !”

“आपको कैसे पता ?”

“मधु ने मुझे सब बता दिया है। पर तुम फिक्र मत करो। बच्चा होने के बाद जब चूत फुद्दी बन जाती है तब पति को चूत में ज्यादा मजा नहीं आता तब उसकी पड़ोसन ही काम आती है नहीं तो मर्द कहीं और दूसरी जगह मुंह मारना चालू कर देता है। इसी लिए वो गांड नहीं मारने दे रही थी। अब तुम्हारा रास्ता साफ़ हो गया है। बस एक महीने के बाद उसकी कुंवारी गांड के साथ सुहागरात मना लेना !” सुधा हंसते हुए बोली।

“साली मधु की बच्ची !” मेरे मुंह से धीरे से निकला, पता नहीं सुधा ने सुना या नहीं वो तो मेरे धक्कों के साथ ताल मिलाने में ही मस्त थी। उसकी गांड का छेद अब छोटी बच्ची की हाथ की चूड़ी जितना तो हो ही गया था। बिलकुल लाल पतला सा रिंग। जब लंड अन्दर जाता तो वो रिंग भी अन्दर चला जाता और जब मेरा लंड बाहर की ओर आता तो लाल लाल घेरा बाहर साफ़ नजर आता।

मैं तो मस्ती के सागर में गोते ही लगा रहा था। सुधा भी मस्त हिरानी की तरह आह … उछ … उईई …। मा …। किये जा रही थी। उसकी बरसों की प्यास आज बुझी थी। उसने बताया था कि रमेश ने कभी उसकी गांड नहीं मारी अब तक अनछुई और कुंवारी थी। बस कभी कभार अंगुल बाजी वो जरूर कराती रही है। मेरे मुंह से सहसा निकल गया “चूतिया है साला ! इतनी ख़ूबसूरत गांड मेरे लिए छोड़ दी !”

मैंने अपनी एक अंगुली उसकी चूत के छेद में डाल दी। वो तो इस समय रस की कुप्पी बनी हुई थी। मैंने अपनी अंगुली अन्दर बाहर करनी शुरू कर दी। फ़च्छ … फ़च्छ. की आवाज गूंजने लगी। एक हाथ से मैं उसके स्तन भी मसल रहा था। उसको तो तिहरा मज़ा मिल रहा था वो कितनी देर ठहर पाती। ऊईई … माँ आ. करती हुई एक बार झड़ गई और मेरी अंगुली मीठे गरम शहद से भर गई मैंने उसे चाट लिया। सुधा ने एक बार जोर से अपनी गांड सिकोड़ी तो मुझे लगा मेरा भी निकलने वाला है।

मैंने सुधा से कहा- मैं भी जाने वाला हूँ !

तो वो बोली “मैं तो पानी चूत में ही लेना चाहती थी पर अब ये बाहर तो निकलेगा नहीं तो अन्दर ही निकाल दो पर ४-५ धक्के जोर से लगाओ !”
 
मुझे भला क्या ऐतराज हो सकता था। मैंने उसकी कमर कस कर पकड़ी और जोर जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए, “ले मेरी सुधा रानी ले. और ले … और ले …” मुझे लगा कि मेरी पिचकारी छूटने ही वाली है।

वो तो मस्त हुई बस ओह.। आह्ह। उईई। या ….हईई … ओईई … कर रही थी। मेरे चीकू उसकी चूत की फांकों से टकरा रहे थे। उसने एक हाथ से मेरे चीकू (अण्डों) कस कर पकड़ लिए। ये तो कमाल ही हो गया। मुझे लगता था कि मेरा निकलने वाला है पर अब तो मुझे लगा कि जैसे किसी ने उस सैलाब (बाढ़) को थोड़ी देर के लिए जैसे रोक सा दिया है। मैंने फिर धक्के लगाने शुरू कर दिए। १०-१५ धक्कों के बाद उसने जैसे ही मेरे अण्डों को छोड़ा मेरे लंड ने तो जैसे फुहारे ही छोड़ दी। उसकी गांड लबालब मेरे गर्म गाढ़े वीर्य से भर गई। वो धीरे धीरे नीचे होने लगी तो मैं भी उसके ऊपर ही पड़ गया। हम इसी अवस्था में कोई १० मिनट तक लेटे रहे। उसका गुदाज़ बदन तो कमाल का था। फिर मेरा पप्पू धीरे धीरे बाहर निकलने लगा। एक पुच की हलकी सी आवाज के साथ पप्पू पास हो गया। सुधा की गांड का छेद अब भी ५ रुपये के सिक्के जितना खुला रह गया था उसमे से मेरा वीर्य बह कर बाहर आ रहा था। मैंने एक अंगुली उसमें डाली और उस रस में डुबो कर सुधा के मुंह में डाल दी। उसने चटकारा लेकर उसे चाट लिया।

वो जब उठकर बैठी तो मैंने पूछा “भाभी एक बात समझ नहीं आई आप गांड के बजाये चूत में पानी क्यों लेना चाहती थी ?”

“अरे मेरे भोले राजा ! क्या मुझे एक सुन्दर सा बेटा नहीं चाहिए ? मैं रमेश के भरोसे कब तक बैठी रहूंगी” सुधा ने मेरी ओर आँख मारते हुए कहा और जोर से फिर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया।

इतने में मोबाइल पर मैसेज का सिग्नल आया। बधाई हो बेटा हुआ है। मैंने एक बार फिर से सुधा की चुदाई कर दी। मैं तो गांड मारना चाहता था पर सुधा ने कहा- नहीं पहले चूत में अपना डालो तो मुझे चूत मार कर ही संतोष करना पड़ा।

सुबह हॉस्पिटल जाने से पहले एक बार गांड भी मार ही ली, भले ही पानी गांड में नहीं चूत में निकाला था। यह सिलसिला तो अब रोज ही चलने वाला था जब तक उसकी गांड के सुनहरे छेद के चारों ओर गोल कला घेरा नहीं बन जाएगा तब तक।
 
क्यों हो गया ना ?



गुरूजी कहते हैं “जिन के घर शीशे के होते हैं वो लाईट जला कर मुट्ठ नहीं मारा करते ”

रात के कोई साढ़े दस बजे हैं। मैंने सभी दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर के एक ब्लू-मूवी डाल लगाई। एक ३५-३६ साल की औरत सोफे की आर्म्स पर अपनी दोनों टांगें चौड़ी किये हस्त मैथुन कर रही है, एक हाथ की अंगुली उसकी चूत में सटासट आ जा रही है और दूसरे हाथ की अंगुली उसकी गांड में। बीच बीच में वो अपनी चूत वाली अँगुली को मुंह में लेकर चटखारे ले रही है और आह …. उन्ह्ह…. की आवाज निकाल रही है।

वाह…. क्या मस्त सीन है !

मैं ड्राइंग रूम में अकेला सोफे पर बैठा हूँ बिलकुल नंगधड़ंग, पप्पू बेकाबू हुआ जा रहा है। आज तो उसका जलाल और लम्बाई देखने लायक है। अड़ियल टट्टू की तरह अकड़ा हुआ है. इतने में मोबाइल की घंटी बजती है, मैंने मोबाइल की स्क्रीन देखी पर नंबर की जगह केवल ********** आ रहे हैं. कमाल है ये कैसा और किसका नंबर हो सकता है ? …..

हेल्लो ?

हाय कैसे हो ?

आप कौन बोल रही हैं ?

क्या बेहूदा सवाल है ?

क्या मतलब ?

अच्छा क्या कर रहे थे ?

वो …. वो.. मैं …. मु …. ओह.. सॉरी…. आप कौन ?

फिर वो ही बेहूदा सवाल ?

देखिये मैं फोन बंद कर दूंगा ?

तुम्हारे बाप का राज़ है क्या ? ओह सॉरी डियर …. बुरा मत मानना ….. ओह …. कहीं मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया?

नहीं कोई बात नहीं…. पर आप क ? ………….

अच्छा कहीं मुट्ठ तो नहीं मार रहे थे ?

क्या मतलब ?

ओह फिर वही बे ….. अच्छा चलो कोई बात नहीं कभी कभी मुट्ठ मारना भी अच्छा रहता है ?

पर आप हैं कौन ?

नाम जानकर क्या करोगे ?

नहीं पहले अपना नाम बताइये !

चलो, मैं तुम्हारी एक चाहने वाली हूँ !

कोई नाम तो होगा ?

मुझे मैना कह सकते हो ?

मैना.. ? कौन मैना ?

क्या फर्क पड़ता है कोई भी हो ?

वो.. वो…. पर …. ?

अरे रुक क्यों गए …. मुट्ठ मारना चालू रखो !

आप कमाल करती हैं?

कमाल तो तुम कर रहे हो !

वो कैसे ?

अरे बाबा जिनके घर शीशे के होते हैं वो लाईट जला कर मुट्ठ नहीं मारा करते ? कम से कम खिड़की और दरवाजे तो बंद कर लिए होते !

वो.. वो.. सॉरी …. ओह.. पर खिड़की और दरवाजे तो बंद हैं ?

इसका मतलब मैं ठीक सोच और बोल रही हूँ न ? तुम वाकई मुट्ठ ही मार रहे थे ना ?

आप हद पार कर रही हैं !

तुम हद पार कहाँ करने दे रहे हो ?

मतलब ?

अच्छा चलो एक बात बताओ !

क्या ?

ये मैना कहाँ गई हुई है ?

मैना…. कौन मैना ?

ओह.. मेरे भोले मिट्ठू मैं तुम्हारी असली मैना की बात कर रही हूँ !

ओह.. मधु.. वो…. ओह.. वो हाँ वो यहाँ नहीं है !

शाबास …. एक बात और बताओ !

क्या ?

उसकी ज्यादा याद आ रही थी क्या ?

क्या मतलब ?

तुम भी एक नंबर के गैहले हो !

क्या मतलब ये गैहला क्या होता है ?

तुम निरे लोल हो अब लोल का मतलब मत पूछना !

ओह ….

अच्छा छोडो एक और बात बताओ !

क्या ?

क्या तुमने कभी मधु के साथ गधा-पचीसी खेली है ?

गधा पचीसी …. क्या मतलब ?

ओह.. लोल गधा-पचीसी बोले तो क्या तुमने मधु की गांड मारी है ?

देखिये….

ओह.. नाराज़ क्यों होते हो इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है ?

मेरी पत्नी के बारे में …. ऐसी …. बात ….

अरे फिर क्या हुआ सभी मर्द अपनी औरतों की गांड मारते ही हैं इसमें बुराई क्या है ?

पर मैं ऐसा नहीं हूँ।

आर यू श्योर ?

ओह आप बड़ी बे-शर्म हैं ?

एक बात पूछूं सच बताना ?

क्या ?

तुम ने कभी उसकी गांड मारने की कोशिश नहीं की ?

नहीं ?

ऐसा कैसे हो सकता है ?

क्या मतलब ?

इतने मस्त कूल्हे देखकर तो किसी नामर्द का भी लौड़ा उठ खडा होता है फिर तुम कैसे कह सकते हो की तुमने उसकी गांड मारने की कोशिश नहीं की ?

वो.. वो …. दरअसल….

ओह …. इसका मतलब वो तुम्हे गांड नहीं मारने देती ?

चलो ऐसा ही मान लो !

तुम भी एक नंबर के लोल हो ?

वो कैसे ?

गुरूजी कहते हैं जिस आदमी ने अपनी औरत की गांड नहीं मारी समझो उसका यह जन्म और अगला जन्म तो बेकार ही गया। अगर ऐसे मस्त नितम्बों वाली औरतों की गांड नहीं मारी जाए तो वे उभयलिंगी बन सकती हैं और अगले जन्म में तो शर्तिया वो खच्चर या किन्नर बनती हैं तो सोचो दोनों ही जन्म व्यर्थ गए या नहीं।

ओह …. नहीं आप झूठ बोल रही है ?

पर गुरूजी तो ऐसा ही कहते हैं।

ये गुरूजी कौन है ?

इसीलिए तो मैं कहती हूँ तुम एक नम्बर के लोल हो !

जरा खुल कर बताओ !

तो फिर प्रेम आश्रम में क्या गांड मरवाने जाते हो ?

वो.. वो.. आप कैसे जानती हैं ?

मैंने भी वहाँ से खास ट्रेनिंग की है चलो छोड़ो ! क्या वाकई तुम मधु की गांड मारना चाहते हो ?

चलो तुम्हारी ख़ुशी के लिए हाँ !

वो क्या कहती है ?

वो तो कहती है भला गांड भी कोई मारने की चीज है ?

साली एक नंबर की चोदू है उसे कोई पूछे तो क्या चूत केवल मूतने के लिए ही होती है ? जब चूत में लंड लिया जा सकता है तो फिर गांड में क्यों नहीं ? और तुमने उस साली की बातों पर यकीन कर लिया ?

हाँ !!

कैसे मर्द हो तुम भी ? साली को पटक कर ठोक दो किसी दिन !

ठीक है ऐसा ही करूँगा !

तुमने मुट्ठ मारना बंद तो नहीं कर दिया ?

ओह …. आ …. न्न ….ऽऽऽ

चलो शुरू हो जाओऽऽ

तुम तो मेरी क्लास टीचर की तरह मुझे हुक्म दे रही हो ?

क्या मतलब ?

वो भी ऐसे ही डांटती थी।

ओ.के. चलो शुरू हो जाओ !

ठीक है !

मैं भी सोफे पर बैठी मुट्ठ ही मार रही थी !

तुम मेरे पास चली आओ ना ?

ऐसे तो बड़े मिट्ठू बनाते हो मैना के ?

तुम मधु से इतना जलती क्यों हो ?

वो साली चीज ही ऐसी है ! हाय क्या मस्त चूतड़ हैं ! इसीलिए तो कहती हूँ उसे तो उल्टा पटक कर ही ठोकना चाहिए।

ठीक है, क्या तुम भी गांड मरवाती हो ?

हाँ कभी कभी पर मेरे पति का तो बहुत छोटा है ?

कितना बड़ा है ?

कोई ३ या ४ इंच का होगा !

बस ?

हाँ. और तुम्हारा कितना बड़ा है ?

क्या तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा ?

अबे साले पर्दा खिड़की दरवाजा सब तो बंद कर रखा है फिर कैसे दिखेगा ?

खोल दूँ क्या ?

पड़ोसी मारेंगे !

मेरा तो ७” का है

आईला ….. क्या मस्त पप्पू है ?

तुम्हारी उम्र कितनी है ?

औरतों की एज नहीं पूछी जाती ?

तो फिर क्या पूछा जाता है ?

उनकी तो साइज़ पूछी जाती है

अच्छा साइज़ ही बता दो ?

किसकी ?

चूत की और किसकी ?

धत् …. शैतान कहीं के ….. ?

ओह .. तुम तो शरमा गई …. प्लीज बताओ नाऽऽऽ !

ओह.. मेरी मुनिया तो बहुत छोटी है !

फिर भी कितनी बड़ी ?

एक माचिस की तिकोनी डिब्बी जीतनी और चीरा तो बस ३ इंच का है जैसे किसी छोटी सी परवल को बीच में से चीर दिया हो !

बस ?

हाँ

पर इतनी छोटी कैसे ?

मैंने ओपरेशन जो करवा लिया है पहले मेरी चूत का चीरा ५” का था उसमे मज़ा नहीं आता था तो मैंने उसकी सिलाई करवा ली है !

अब तो बड़ा मज़ा आता होगा ?

क्या ख़ाक मज़ा आता है ?

क्यों ?

अरे उस साले का खड़ा ही नहीं होता !

अच्छा तुम्हारी चूत कैसी है और उसका रंग कैसा है ?

होंठ संतरे की फांकों की तरह हैं पर थोड़े काले हैं पर अन्दर से एक दम गोरी गुलाबी रतनार है बिलकुल रस भरी कुप्पी की तरह. पंखुडियां बाहर से कुछ काली लगती हैं पर अन्दर से गुलाबी और बहुत पतली हैं. किसमिस का दाना तो मोटा और सुरमई है ?

क्या चुसवाती हो ?

अब तो यही करना पड़ता है !

तुम कौन से आसन में चुदवाना पसंद करती हो ?

ओह.. मैं तो चाहती हूँ की कोई मुझे पकड़ कर रगड़ दे बस..

ओफो.. फिर भी कैसे ?

दोनों टांगें को हाथों से पकड़ कर ऊपर तान दे और मोटा सा लंड गच्च से अन्दर ठोक दे या फिर …. मुझे कुत्ता बिल्ली आसन सबसे ज्यादा पसंद है।

ये भला कौन सा आसन हुआ ?

तुम आदमी हो या पजामा ?

ओह.. बताओ ना ?

इस आसन में औरत बेड के एक किनारे पर अपने पंजे थोड़े से बाहर निकल कर घुटनों के बल बैठ जाती है, अगर औरत थोडी मोटी है और ज्यादा चुद्दक्कड़ है या उसकी चूत कुछ बड़ी या ढीली है तो गोद में एक तकिया रखकर घुटनों में सर लग कर अपने नितम्ब कुछ ऊँचे कर लेती है. पीछे से उसका पार्टनर फर्श पर खडा होकर उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ कर एक ही झटके में लंड उसकी चूत में ठोक देता है बिना रहम किये. एक बार उस मैना को भी ऐसे ही ठोक कर देखो मज़ा आ जायेगा ?

ओह.. तुम तो बड़ी बे-रहम हो उस बेचारी की तो जान ही निकल जायेगी !

अबे लोल.. औरत के साथ शुरू शुरू में तो ठीक है बाद में रहम नहीं करना चाहिए. नहीं तो आदमी को लोल समझ लेती है !

ठीक है मास्टरनीजी !

मैं तो चाहती हूँ इसी तरह कोई मेरी कमर पकड़ कर एक ही झटके में अपना पूरा लंड मेरी गांड में भी ठोक दे और आधे घंटे पेलने के बाद 8-१० पिचकारी अन्दर ही छोड़ दे….बस मज़ा आ जाए !

क्या चुसवाती भी हो ?

अब तो यही करना पड़ता है वो साला तो २ मिनिट में ही टीं हो जाता है।

कमर कितनी होगी ?

कमर है ३२ इंच !

और स्तन ?

वो तो बड़े मस्त हैं ३६ साइज़ के गोल मटोल बिलकुल ठां लगती हूँ !

ठां बोले तो ?

ओह …. लोल …. कहीं के “ठां” मतलब बिलकुल बोम्ब पटाका !

कभी चुसवाये हैं ?

हाँ मैं तो खूब चुसवाती हूँ और कभी कभी खुद भी इनके चूचुक मुंह में डाल कर चूसती हूँ, बड़ा मज़ा आता है ! क्या तुम्हें मोटे वक्ष पसंद हैं ?

हाँ मैं तो रात भर चूसता रहता हूँ !

और मैना क्या करती है उस दौरान ?

वो मेरे पप्पू से खेलती रहती है !

अच्छा तुम्हारे नितम्बों का साइज़ क्या है ?

क्यों ?

ऐसे ही जानकारी के लिए !

कोई गलत इरादा तो नहीं ?

अरे नहीं ?

क्यों क्या मटकते कूल्हे तुम्हे अच्छे नहीं लगते ?

मैं तो मुरीद हूँ मोटे नितम्बों का !

तो मधु को क्यों छोड़ रखा है ?

ओह.. उसकी कमी तुम पूरी कर दो ना ?

बड़े बदमाश हो ?

ओह.. बताओ ना तुम्हारे नितम्बों का साइज़ क्या है ?

बहुत ही मस्त हैं पर साली मधु से ज्यादा सुन्दर नहीं हैं।

क्या तुम्हे गांड मरवाना पसंद है ?

ओह …. मैं तो तीनों छेदों में लेती हूँ !

दो तो सुने थे ये तीसरा छेद कौन सा हुआ ?

ओह.. लोल …. ओह.. ना रे तुम लोल नहीं पूरे गुरुघंटाल हो. अब तुम इतने लोल भी नहीं की तीसरे छेद का मतलब भी ना जानो ?

हा.. हा …. हा …..

तुम हंस रहो हो ?

तुम्हारे तो मज़े ही मज़े हैं !

अच्छा तुम्हारी मलाई निकालने में कितनी देर लगती है ?

चूत में या मुट्ठ मारने में ?

चलो दोनों में ही बता दो !
 


चूत में १५ मिनट और मुट्ठ मारने में १० मिनट !

कभी चूत चूसी है ?

हाँ एक दो बार !

चूत में आइस क्यूब डाल कर चूसी है कभी ?

नहीं ….. क्यों ?

अबे …. ओह …. छोड़ो ….. ये बताओ उस मैना को अपना लंड चुसवाया है कभी ?

हाँ वो तो दीवानी है इसकी !

एक नंबर की लंडखोर है साली ऐसे तो बड़ी छुई मुई बनी फिरती है ?

क्या तुम चूस कर मलाई का मजा नहीं लेती ?

मुझे तो मलाई बहुत पसंद है पर उस साले की तो मुश्किल से एक आधी पिचकारी ही निकलती है।

अच्छा तुम्हारी एक बार में कितनी मलाई निकलती है ?

कोई ३-४ चम्मच तो जरूर निकलती है।

तुम भी चूत का रस पीते हो ?

हाँ कभी कभी !

कैसा लगता है ?

कुछ खट्टा मीठा नमकीन सा लेसदार सा लगता है !

मधु चूत को मुनिया बना कर रखती है या नहीं ?

क्या मतलब ?

तुम लोल तो नहीं हो ?

ओह ….. बताओ ना ?

मुनिया बोले तो झांट कटे हुए एक दम चिकनी-झकास !

ओह…. हाँ उसे तो झांट बिलकुल पसंद नहीं हैं।

और तुम्हें ?

मुझे भी झांट पसंद नहीं हैं. तुम्हारा क्या हाल है ?

मैं तो अपनी मुनिया को हरदम टिच्च कर के रखती हूँ, आज ही सुबह साफ़ किये हैं, बिल्कुल चिकनी चकाचक है इस समय ! काश कोई चूस ले !

मेरे पास आ जाओ ना ?

धत्त.. बदमाश कहीं के.

अच्छा तुम्हारी गांड कैसी है ?

क्या मतलब ?

मेरा मतलब है उसकी साइज़ और रंग कैसा है ?

बड़े शैतान हो गए हो पहले तो बड़ा शरमा रहे थे ?

सब आपकी सोहबत का असर है।

मेरी गांड का छेद एक चवन्नी के सिक्के जितना बड़ा है और कमाल की बात तो ये है की वो अभी काला नहीं पड़ा है !

वो कैसे ?

अरे बुद्धू मैं ज्यादा गांड नहीं मरवाती ना ?

क्यों ?

ओह.. तुम निरे लोल हो कुछ समझते ही नहीं।

प्लीज बताओ ना ?

देखो ज्यादा गांड मरवाने से उसका रंग काला पड़ जाता है. अनचुदी और कोरी गांड की पहचान यही है की उसके चारों तरफ काला घेरा नहीं बना होता। अच्छा बताओ मधु की गांड कैसी है ?

ओह मधु की तो बहुत गोरी है.

तुम एक नंबर के फुद्दू हो ! भला ऐसी गांड को भी कोई बिना मारे छोड़ता है ? कहते हैं कि गोरी गांड और काली चूत बहुत मजेदार होती है।

क्या करूं वो देती ही नहीं !

क्या कहती है ?

कहती है बहुत दर्द होगा ?

और तुम मान लेते हो ?

तो क्या करूं ?

साली को उल्टा पटक के रगड़ दो ना ? और क्या ?

ठीक है ऐसा ही करना पड़ेगा !

मुट्ठ मार रहे हो या बंद कर दिया ?

नहीं चालू है !

लंड पर तेल लगाया है या क्रीम ?

क्यों ?

मैंने तो क्रीम लगाई है !

मैं तो थूक लगाता हूँ !

क्या चूत मारते समय भी थूक ही लगाते हो ?

हाँ मधु को इसी में मज़ा आता है !

कभी उसकी चूत में अंगुली की है ?

हाँ करता हूँ, क्या तुम भी करवाना चाहती हो ?

करवाना तो चाहती हूँ पर ….. ?

पर क्या ???

सिर्फ मेरे चाहने से क्या होता है ?

मेरे पास आ जाओ या मुझे बुला लो !

अभी नहीं मुझे थोड़ा समय दो फिर करवा लूंगी, अभी तो अपनी ही अंगुली से काम चला रही हूँ आईईईइ …..

क्या हुआ ?

मेरा तो निकालने वाला है ?

मुझे तो अभी समय लगेगा !

कितना ?

अभी तो ५-६ मिनट लगेंगे क्यों ?

मैं भी तुम्हारे साथ ही झडना चाहती हूँ

क्या तुम्हारा पति नहीं है घर पर ?

वो हुआ ना हुआ एक बराबर है !

वो कैसे ?

साले का उठता ही नहीं ?

फिर तुम कैसे काम चलाती हो ?

तुम्हारे जैसे चिकने लौंडों को याद करके काम चला लेती हूँ अईई ………

मेरी स्पीड भी बढ़ रही है !

मैं भी अंगुली तेज कर रही हूँ !

हाँ मेरा पप्पू भी बहुत जोर लगा रहा है !

क्या अभी पप्पू ही है ?

हाँ अभी काला नहीं पड़ा है ना पप्पू ही है बिलकुल गोरा चिट्टा ?

हाय राम कितना मोटा है ?

कोई १.५ इंच तो जरूर होगा !

और सुपाड़ा ?

वो तो लाल टमाटर की तरह है !

अच्छा तेल लगा लो और फिर मुट्ठ मारो !

ठीक अभी लाता हूँ !

दोनों हाथों से मार रहे हो या एक ही हाथ से काम चला रहे हो ?

एक हाथ में तो मोबाइल पकड़ रखा है !

क्या तुमने कसम खा रखी है दिमाग से काम नहीं लोगे ? एक नम्बर के लोल हो तुम मैंने कहा था ना ?

ओह …. फिर क्या करूं ?

अबे…. लोल…. मोबाइल को लाउड स्पीकर पर लगा ले मेरी तरह ? फिर दोनों हाथ फ्री.

फिर ?

दूसरे हाथ की अंगुली पर तेल या क्रीम लगा कर एक अंगुली अपनी गांड में भी तो घुसा मेरी तरह ?

उस से क्या होगा ?

चुतिया है तू एक नंबर का ?

कैसे ?

अबे मुट्ठ मारना ही नहीं आता तुम्हें ?

अच्छा तुम समझा दो ना ?

देखो मुट्ठ मरते समय एक अंगुली अगर गांड में डाल ली जाए तो मज़ा दुगना हो जाता है !

ठीक है ऐसा ही करता हूँ !

आआ….ऐ…. ईइल ….. आआआअ ……………….. उईईई ….. माअआ ……..

क्या हुआ ?

मैं तो जाने वाली हूँ !

अभी रुको ….!

नहीं मेरा तो निकालने वाला है तुम भी अपनी स्पीड बढ़ाओ ना !

क्या तुमने अपनी गांड में अंगुली डाल रखी है ?

हाँ मैं तुम्हारी तरह ….. गैहली …. आ ….. थोड़े… ही… हूँ नन् ….. आआ.ऽऽऽऽ. ईईईईईईईईईई..

मैंने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी है ….. या ……………… उईईईईईईई …. ……… मेरी.. मैना ….. मेरी….रानी शाबाश और जोर से मेरे मिट्ठू ……..या …………….. ऊईईईईईईइ

मा……………… आ …………….

उईई… मा ………. आ …………………. इस्स्स्स्स्स्स मैं तो गई ………………….

मैं भी ग …. या ऽऽ या ……………. मेरी.. मैना ….. मेरी…. बुलबुल !

क्यों हो गया ना ?

हाँ.. हो गया.. ओह.. अब तो बता दो कौन हो तुम ?

रोशनदान से देख लो ना ? लोल कहीं के ? अगली बार जब भी मुट्ठ मारो तो खिड़कियों के साथ रोशनदान भी बंद करना मत भूलना.. बाय..??

हेल्लो ….. हेल्लो ….. ओह …….. कट गया ………… टी….टी….टी…..न्न्न्न

मेरे दोस्तों और दोस्तानियो ! क्या आपका और आपकी पड़ोसन का भी हो गया ?

 
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