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Adultery गुरुजी के आश्रम में रश्मि के जलवे

फिर मैंने मोती को नीचे रख दिया. पर वो नीचे भी शांत नही बैठा और मेरी टांगों को सूंघने लगा. कुछ ही देर में सूंघते सूंघते उसने अपना सर मेरी साड़ी के अंदर घुसा दिया. अब ये मेरे लिए बड़ी अजीब स्थिति हो गयी थी. विकास को भी आश्चर्य हुआ और उसने मेरे नितंबों को दबाना बंद कर दिया.

शर्माजी – मोती , क्या कर रहा है ?

लेकिन मोती अपने मालिक की बात नही सुन रहा था. साड़ी के अंदर मेरी टाँगों पर उसकी गीली नाक मैंने महसूस की.

“आउच….”

शर्माजी – क्या हुआ बेटी ?

मुझे कुछ जवाब देने की ज़रूरत नही थी , मोती ने अपना सर मेरी दोनों टाँगों के बीच साड़ी के अंदर घुसा दिया था ये सबको पता था. मोती अब मेरी जांघों पर जीभ लगाकर पसीने की बूंदे चाट रहा था. उसकी खुरदूरी गीली जीभ से मुझे गुदगुदी और अजीब सी सनसनी हो रही थी.

“ऊऊहह…...आआहह…..प्लीज़ इसे बाहर निकालो. “

शर्माजी – बेटी , घबराओ नही. मैं इसे बाहर निकलता हूँ.

विकास – मैडम , हिलो नही, मोती वहाँ काट भी सकता है.

शर्माजी – मोती , मोती चल बाहर आजा …..आजा…..

लेकिन मोती शर्माजी की नही सुन रहा था. वो पेटीकोट के अंदर मेरी नंगी जांघों के निचले हिस्से पर अपनी गीली नाक और जीभ लगाने में व्यस्त था. अपनी त्वचा पर उसकी नाक और जीभ लगने से मेरे बदन में कंपकपी हो रही थी और उत्तेजना आ रही थी. मेरी चूत से रस बहने लगा था.

शर्माजी – बेटी , मोती मेरी नही सुन रहा. तुम अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर करो तो मैं इसका सर बाहर निकालूँ.

“प्लीज़ कुछ भी करो पर इसे जल्दी बाहर निकालो…..ऊऊओह…....”

मोती अपनी नाक ऊपर को खिसकाते जा रहा था. उसकी जीभ लगने से मेरी जांघें गीली हो गयी थीं. और ठंडी नाक लगने से अजीब गुदगुदी हो रही थी.

शर्माजी – ठीक है. तुम शांत रहो बेटी. मैं तुम्हारी साड़ी उठाकर मोती को बाहर निकाल देता हूँ.

वो ऐसे कह रहा था जैसे मैंने उसे अपनी साड़ी उठाने की अनुमति दे दी हो.

अब उन दोनों मर्दों के सामने मेरी हालत खराब हो गयी थी. मेरा सीट पर बैठना मुश्किल हो गया था. बदमाश मोती की हरकतों से मेरे बदन में कंपकपी दौड़ जा रही थी. ऊऊहह…..आअहह……करते हुए मैं अपना बदन इधर से उधर हिला रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे कोई मर्द मेरी जांघों को चाट रहा हो और मैं सिसकारियाँ ले रही हूँ. बिल्कुल वैसी ही हालत थी मेरी.

फिर शर्माजी थोड़ा झुका और साड़ी के साथ पेटीकोट को ऊपर उठाने लगा. मेरी हालत देखकर विकास ने अपने बाएं हाथ से मेरा बायां हाथ पकड़ लिया और दाएं हाथ को पीछे से ले जाकर मेरा दायां कंधा पकड़ लिया. उसकी बाँहों का सहारा मिलने से मैं पीछे को उसके बदन पर ढल गयी . इस बात का उसने पूरा फायदा उठाया और मेरी दायीं चूची पर हथेली रख दी. शर्माजी ना देख पाए इसलिए उसने साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ डाला और ब्लाउज के बाहर से मेरी चूची सहलाने लगा.

शर्माजी ने मेरी गोरी टाँगों को नंगा करने में ज़रा भी देर नही की और साड़ी को पेटीकोट के साथ घुटनों तक उठा दिया. शर्माजी के साड़ी ऊपर उठाने से मोती और भी ऊपर नाक घुसाने को कोशिश करने लगा. शर्माजी भी अब अपनी उमर का लिहाज भूलकर मौके का फायदा उठाने में लगा था. मेरी साड़ी उठाने के बहाने वो मेरी टाँगों पर हाथ फिराने लगा. मोती को बाहर निकालने में उसकी कोई दिलचस्पी नही थी. अब वो मेरी नंगी जांघों को देखने के लिए जबरदस्ती मेरी साड़ी को घुटनों से ऊपर उठाने लगा.

चूँकि मोती मेरी टाँगों के बीच था इसलिए मेरी टाँगें फैली हुई थीं. अब साड़ी को और ऊपर करना शर्माजी के लिए मुश्किल हो रहा था. लेकिन बुड्ढे को जोश चढ़ा हुआ था. उसने मेरे नितंबों के नीचे हाथ डाला और दायीं जाँघ को थोड़ा ऊपर उठाकर साड़ी ऊपर करने के लिए पूरी जान लगा दी.

“आउच…..प्लीज़ मत करो….”

अब उस हरामी बुड्ढे की वजह से मेरी दायीं जाँघ बिल्कुल नंगी हो गयी थी. मोती अब साड़ी उठने से ढका हुआ नही था पर शर्माजी ने मुझे कोई मौका नही दिया और विकास की तरफ से भी साड़ी ऊपर उठा दी. अब मेरी साड़ी और पेटीकोट पूरी ऊपर हो चुकी थी. वो तो मैंने पैंटी पहनी हुई थी वरना उस चलते हुए ऑटो में मेरी नंगी चूत दिख गयी होती.

मैं मत करो कहती रही , लेकिन ना विकास रुका , ना शर्माजी और ना ही मोती.

साड़ी पूरी ऊपर हो जाने से मोती मेरी पैंटी को सूंघ रहा था. मेरी जांघें उसकी लार से गीली हो गयी थीं. मैं अपने दाएं हाथ से अपनी जांघों को पोंछने लगी क्यूंकी बायां हाथ विकास ने पकड़ा हुआ था. शर्माजी ने मुझे एक बेशरम औरत की तरह कमर तक नंगा कर दिया था. मैं औरत होने की वजह से स्वाभाविक रूप से मत करो कह रही थी पर उन तीनो की हरकतों से मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. मेरी चूत से रस बह रहा था. मोती मेरे घुटनों पर पैर रखकर पैंटी में नाक लगाकर रस सूंघ रहा था.

विकास पहले साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ डालकर धीरे से मेरी चूची सहला रहा था. पर अब मुझे उस हालत में देखकर वो भी पूरा फायदा उठाने लगा. उसने अपने दाएं हाथ से मेरी दायीं चूची को अंगुलियों में पकड़ लिया और ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. मैं उसके बदन पर सहारे के लिए ढली हुई थी. उसके ज़ोर ज़ोर से चूची दबाने से मेरे लिए सांस लेना मुश्किल हो गया. मेरा बायां हाथ उसने अपने हाथ में पकड़ा हुआ था , मैं उस हालत में उत्तेजना से तड़प रही थी.

शर्माजी उस चलते हुए ऑटो में मुझे नंगा करने पर तुला हुआ था. सब शरम लिहाज छोड़कर वो बुड्ढा अब मेरी नंगी मांसल जांघों को अपने हाथों से मसल रहा था. मैं अपने दाएं हाथ से मोती की लार अपनी जांघों से पोंछने की कोशिश कर रही थी. शर्माजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने दूसरे हाथ से मेरी जांघों को पोंछने लगा. उसके खुरदुरे हाथों का मेरी मुलायम और चिकनी जांघों पर स्पर्श मुझे पागल कर दे रहा था. वो अपने हाथ को मेरे घुटनों से पैंटी तक लार पोंछने के बहाने से फिरा रहा था. उसकी अंगुलियां मेरी पैंटी को छू रही थीं. मोती की ठंडी नाक भी मुझे अपनी पैंटी के ऊपर महसूस हो रही थी. वो तो गुरुजी का पैड चूत के ऊपर लगा हुआ था वरना शर्माजी की अंगुलियां और मोती की नाक मेरी चूत को छू देती.

ऑटो धीमे चल रहा था और अंदर तीनो ने मेरा बुरा हाल कर रखा था. अब मैं कोई विरोध भी नही कर सकती थी क्यूंकी एक एक हाथ दोनों ने पकड़ रखा था. मोती अब मेरी नंगी जांघों पर बैठकर पैंटी सूंघ रहा था और कभी नाक ऊपर उठाकर मेरी चूचियों पर लगा देता.

शर्माजी मेरी जांघों पर हाथ फिराने के बाद फिर से मेरी साड़ी के पीछे पड़ गया. उसने मेरे नितंबों को सीट से थोड़ा ऊपर उठाकर साड़ी और पेटीकोट को मेरे नीचे से ऊपर खींच लिया. अब कमर से नीचे मैं पूरी नंगी थी सिवाय एक छोटी सी पैंटी के. पैंटी भी पीछे से सिकुड़कर नितंबो की दरार में आ गयी थी. जब साड़ी और पेटीकोट मेरे नीचे से निकल गये तो मुझे अपने नितंबों पर ऑटो की ठंडी सीट महसूस हुई. मेरे बदन में कंपकपी की लहर सी दौड़ गयी. और चूत से रस बहाते हुए मैं झड़ गयी.

“ऊऊओ…. आह…....प्लीज़……ये क्या कर रहे हो ?”

अब बहुत हो गया था. सिचुयेशन आउट ऑफ कंट्रोल होती जा रही थी. मुझे विरोध करना ही था. पर मुझे सुनने वाला कौन था.

“कम से कम मोती को तो हटा दो.”

शर्माजी और उसके मोती की वजह से मुझे ओर्गास्म आ गया. विकास ने मुझे सहारा देते हुए पकड़े रखा था लेकिन मेरी दायीं चूची पूरी निचोड़ डाली थी. मेरी साड़ी का पल्लू ब्लाउज के ऊपर दायीं तरफ को खिसक गया था. विकास ने अपना हाथ छिपाने के लिए पल्लू को दायीं चूची के ऊपर रखा था. अब मोती अपनी नाक ऊपर करके मेरी चूचियों पर लगा रहा था.

शर्माजी ने अब मेरा हाथ छोड़ दिया और अपना बायां हाथ मेरे पीछे ले गया. मैंने सोचा पीछे सीट पर हाथ रख रहा है पर वो तो नीचे मेरी पैंटी की तरफ हाथ ले गया. फिर अपने दाएं हाथ से उसने मुझे थोड़ा खिसकाया और अपनी बायीं हथेली मेरे नितंबों के नीचे डाल दी.

“आउच….”

अब मैं शर्माजी की हथेली के ऊपर बैठी थी और ऑटो को लगते हर झटके के साथ मेरे नितंबों और सीट के बीच में उसकी हथेली दब जा रही थी. ऐसा अनुभव तो मुझे कभी नही हुआ था. पर सच बताऊँ तो मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. मेरी पैंटी बीच में सिकुड़ी हुई थी , एक तरह से पूरे नंगे नितंबों के नीचे उसकी हथेली का स्पर्श मुझे पागल कर दे रहा था. मेरी चूत से रस निकल कर पैंटी पूरी गीली हो गयी थी. मोती भी अपने मालिक की तरह मेरे पीछे पड़ा था. अब वो मेरी बायीं चूची को , जिसके ऊपर से साड़ी का पल्लू हट गया था, ब्लाउज के ऊपर से चाट रहा था.

“विकास मोती को हटाओ. मुझे वहाँ पर काट लेगा तो….”

मुझे बहुत मस्ती चढ़ी हुई थी. इन तीनो की हरकतों से मैं कामोन्माद में थी. शर्माजी की हथेली का मेरे नंगे नितंबों पर स्पर्श मुझे रोमांचित कर दे रहा था.

शर्माजी – बेटी , फिकर मत करो. मैं तुम्हें बचा लूँगा.

शर्माजी ने मोती के मुँह के आगे अपनी दूसरी हथेली लगाकर मेरी बायीं चूची ढक दी. उसके लिए तो बहाना हो गया. अब मोती की जीभ और मेरे ब्लाउज के बीच उसकी हथेली थी. उसने अपनी हाथ से मेरी चूची को पकड़ा और ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया. अब दोनों चूचियों को दो मर्द दबा रहे थे और मोती चुपचाप देख रहा था.

“ऊऊऊहह………आआआहह……....मत करो प्लीज़ईईई…..”

मुझे एक और ओर्गास्म आ गया.

शर्माजी और विकास दोनों ने मेरी एक एक चूची पकड़ी हुई थी और शर्माजी दूसरे हाथ से मेरे नितंबों को मसल रहा था. विकास ने अब मेरा हाथ छोड़ दिया और अपना बायां हाथ आगे ले जाकर मेरी पैंटी को छूने लगा. दोनों मर्द मेरी हालत का फायदा उठाने में कोई कसर नही छोड़ रहे थे. शर्माजी की भारी साँसें मुझे अपने कंधे के पास महसूस हो रही थी , अपनी उमर के लिहाज से उसके लिए भी शायद ये बहुत ज़्यादा हो गया था.

गुरुजी के दिए पैड को मैंने चूतरस से पूरी तरह भिगो दिया था. और अब मैं निढाल पड़ गयी थी. विकास ने अपना हाथ मेरी दायीं चूची से हटा लिया. पर शर्माजी का मन अभी नही भरा था. वो अभी भी मेरी बायीं चूची को दबा रहा था. मेरे नितंबों की गोलाई नापता हुआ हाथ भी उसने नही हटाया था. आज तक किसी ने भी ऐसे मेरे नंगे नितंबों को नही मसला था.

तभी ड्राइवर ने बताया की अब हम मेन रोड पर आ गये हैं. खुशकिस्मती से वो हमें नही देख सकता था क्यूंकी उसकी सीट के पीछे भी समान भरा हुआ था.

शर्माजी – बेटी , अपनी साड़ी ठीक कर लो , नही तो सामने से आते ऑटोवालों का एक्सीडेंट हो जाएगा.

उसकी बात पर विकास हंस पड़ा. मैं भी मुस्कुरा दी , पूरी बेशरम जो बन गयी थी. मैंने अपने कपड़ों की हालत को देखकर एक लंबी सांस ली. मुझे हैरानी हो रही थी की इतनी उत्तेजना आने के बाद भी मुझे चुदाई की बहुत इच्छा नही हुई. मैंने सोचा शायद गुरुजी की जड़ी बूटी का असर हो . क्यूंकी नॉर्मल सिचुयेशन में कोई भी औरत अगर इतनी ज़्यादा एक्साइटेड होती तो बिना चुदाई किए नही रह पाती.

उत्तेजना खत्म होने के बाद मैं अब होश में आई और कपड़े ठीक करने लगी, पर साड़ी अटकी हुई थी क्यूंकी बुड्ढे का हाथ अभी भी मेरे नितंबों के नीचे था. मैं एक जवान शादीशुदा औरत , एक अंजाने आदमी की हथेली में बैठी हूँ , क्या किया मैंने ये, अब मुझे बहुत शरम आई. मैंने अपने नितंबों को थोड़ा सा ऊपर उठाया और बुड्ढे ने अपना हाथ बाहर निकाल लिया. फिर उसने मोती को मेरी गोद से नीचे उतार दिया.

मैंने जल्दी से साड़ी नीचे की और अपनी नंगी जांघों और टाँगों को ढक दिया , जो इतनी देर से खुली पड़ी थीं. फिर मैंने ब्लाउज के ऊपर साड़ी के पल्लू को ठीक किया और इन दोनों मर्दों के हाथों से बुरी तरह निचोड़ी गयी चूचियों को ढक दिया. उसी समय मैंने देखा शर्माजी अपनी धोती में लंड को एडजस्ट कर रहा है. शायद मुझे चोद ना पाने के लिए उसे सांत्वना दे रहा होगा.

शर्माजी – बेटी , तुम्हारा ब्लाउज गीला हो गया है, शायद दूध निकल आया है. रुमाल दूं पोंछने के लिए ?

“नही नही. ये दूध नही है. मोती ने जीभ से गीला कर दिया.”

विकास – मैडम को अभी बच्चा नही हुआ है. उसी के इलाज़ के लिए तो गुरुजी की शरण में आई है.

शर्माजी – ओह सॉरी बेटी. लेकिन गुरुजी की कृपा से तुम ज़रूर माँ बन जाओगी.

मैंने मन ही मन सोचा, माँ तो पता नही लेकिन अगर अंजाने मर्दों को ऐसे ही मैंने अपने बदन से छेड़छाड़ करने दी तो मैं जल्दी ही रंडी ज़रूर बन जाऊँगी.

फिर हम आश्रम पहुँच गये. शर्माजी और उसके मोती से मेरा पीछा छूटा. लेकिन ऑटो से उतरते समय मुझे उतरने में मदद के बहाने उसने एक आखिरी बार अपने हाथ से , साड़ी के बाहर से मेरे नितंबों को दबा दिया.

ऑटो के जाने के बाद मैं और विकास अकेले रह गये. ऑटो में जो हुआ उसकी शरम से मैं विकास से आँखें नही मिला पा रही थी और तुरंत अपने कमरे में चली गयी. मुझे नहाने की सख्त ज़रूरत थी , पूरा बदन चिपचिपा हो रखा था. मैं सीधे बाथरूम में घुसी और फटाफट अपने कपड़े उतार दिए. मेरी पैंटी हमेशा की तरह नितंबों की दरार में फंसी हुई थी उसे भी निकाल फेंका.

तभी मैंने देखा मेरे ब्लाउज का तीसरा हुक टूट कर लटक गया है. वहाँ पर थोड़ा कपड़ा भी फट गया था. ऑटो में मुझे दिखा नही था. ज़रूर विकास के लगातार चूची दबाने से ब्लाउज फटा होगा. इतना मेरी चूचियों को तो किसी ने नही निचोड़ा जितना उस ऑटो में विकास ने निचोड़ा था. ब्लाउज तो फटना ही था. गोपालजी से ठीक करवाना पड़ेगा. मेरी ब्रा भी पसीने से भीग गयी थी. ब्रा का स्ट्रैप सही सलामत है यही गनीमत रही वरना इसको भी बहुत निचोड़ा था उन दोनों ने.

सब कपडे फटाफट उतारकर मैं नंगी हो गयी. पैंटी से गीला पैड निकालकर मैंने एक कोने में रख दिया और नहाने लगी. दिन भर जो मेरे साथ हुआ था , पहले टेलर की दुकान में , फिर मेले में और फिर ऑटो में , उससे मेरे मन में एक अपराधबोध हो रहा था. मैंने देर तक नहाया जैसे उस गिल्ट फीलिंग को बहा देना चाहती हूँ.

उसके बाद कुछ खास नही हुआ. परिमल मेरे कमरे में आया और पैड ले गया. बाद में डिनर भी लाया. मंजू भी आई और मेले के बारे में पूछने लगी. उसके चेहरे की मुस्कुराहट बता रही थी की जो कुछ मेरे साथ हुआ उसे सब पता है. समीर गोपालजी के भेजे हुए दो एक्सट्रा ब्लाउज लेकर आया और ये भी बता गया की सुबह 6:30 पर गुरुजी के पास जाना होगा.

एक ही दिन में इतना सब कुछ होने के बाद मैं बुरी तरह थक गयी थी. दो दो बार मैंने पैड पूरे गीले कर दिए थे. तीन मर्दों ने मेरे बदन को हर जगह पर निचोड़ा था.

डिनर के बाद मैं सीधे बेड पर लेट गयी. मुझे अपने बदन में इतनी गर्मी महसूस हो रही थी की मैंने अपनी नाइटी पेट तक उठा रखी थी , अंदर से ब्रा पैंटी कुछ नही पहना था. ऐसे ही आधी नंगी लेटी हुई जल्दी ही मुझे गहरी नींद आ गयी. रात में मुझे अजीब से सपने आए , साँप दिखे , शर्माजी और उसका मोती भी सपने में दिखे.

Phir maine moti ko niche rakh diya. Par wo niche bhi shant nahi baitha aur meri tango ko sunghne laga. Kuch hi der mein sunghte sunghte usne apna sar meri sari ke andar ghusa diya. Ab ye mere liye badi ajeeb sthiti ho gayi thi. vikas ko bhi ascharya hua aur usne mere nitambon ko dabana band kar diya.

Sharmaji – Moti , kya kar raha hai ?

Lekin moti apne malik ki baat nahi sun raha tha. Saree ke andar meri tangon par uski gili naak maine mehsoos ki.

“ouch…”

Sharmaji – kya hua beti ?

Mujhe kuch jawab dene ki jarurat nahi thi , moti ne apna sar meri dono tango ke beech saree ke andar ghusa diya tha ye sabko pata tha. moti ab meri janghon par jeebh lagakar pasine ki boonde chat raha tha. uski khurduri gili jeebh se mujhe gudgudi aur ajeeb si sansani ho rahi thi.

“oooohhh….aaaahh….please ise bahar nikalo. “

Sharmaji – beti , ghabrao nahi. Mai ise bahar nikalta hun.

Vikas – Madam , hilo nahi, moti wahan kaat bhi sakta hai.

Sharmaji – moti , moti chal bahar aaja. …..aaja…

Lekin moti sharmaji ki nahi sun raha tha. wo petticoat ke andar meri nangi jangho ke nichle hisse par apni gili naak aur jeebh lagane mein vyast tha. apni twacha par uski naak aur jeebh lagne se mere badan mein kanpkapi ho rahi thi aur uttezna aa rahi thi. meri choot se ras behne laga tha.

Sharmaji – beti , moti meri nahi sun raha. Tum apni saree thodi upar karo to mai iska sar bahar nikalu.

“please kuch bhi karo par ise jaldi bahar nikalo……ooooohhhh……..”

Moti apni naak upar ko khiskate ja raha tha. uski jeebh lagne se meri janghe gili ho gayi thi. aur thandi naak lagne se ajeeb gudgudi ho rahi thi.

Sharmaji – theek hai. Tum shant raho beti. Mai tumhari saree uthakar moti ko bahar nikal deta hun.

Wo aise keh raha tha jaise maine use apni saree uthane ki anumati de di ho.

Ab un dono mardon ke samne meri halat kharab ho gayi thi. mera seat par baithna mushkil ho gaya tha. badmash moti ki harkaton se mere badan mein kanpkapi daud ja rahi thi. oooohhh….aaahhh…karte hue mai apna badan idhar se udhar hila rahi thi. aisa lag raha tha jaise koi mard meri jangho ko chat raha ho aur mai siskariyan le rahi hun. Bilkul waisi hi halat thi meri.

Phir Sharmaji thoda jhuka aur saree ke sath petticoat ko upar uthane laga. Meri halat dekhkar vikas ne apne baye hath se mera baya hath pakad liya aur daye hath ko piche se le jakar mera daya kandha pakad liya. Uski banho ka sahara milne se mai piche ko uske badan par dhal gayi . is baat ka usne poora fayda uthaya aur meri dayi chuchi par hatheli rakh di. sharmaji na dekh paye isliye usne saree ke pallu ke andar hath dala aur blouse ke bahar se meri chuchi sehlane laga.

Sharmaji ne meri gori tango ko nanga karne mein jara bhi der nahi ki aur saree ko petticoat ke sath ghutno tak utha diya. Sharmaji ke saree upar uthane se moti aur bhi upar naak ghusne ko koshish karne laga. Sharmaji bhi ab apni umar ka lihaj bhoolkar mauke ka fayda uthane mein laga tha. meri saree uthane ke bahane wo meri tangon par hath firane laga. Moti ko bahar nikalne mein uski koi dilchaspi nahi thi. ab wo meri nangi janghon ko dekhne ke liye jabardast meri saree ko ghutno se upar uthane laga.

Chunki moti meri tango ke beech tha isliye meri tange faili hui thi. ab saree ko aur upar karna sharmaji ke liye mushkil ho raha tha. lekin buddhe ko josh chada hua tha. usne mere nitambon ke niche hath dala aur dayi jangh ko thoda upar uthakar saree upar karne ke liye poori jaan laga di.

“ouch…please mat karo…”

Ab us harami buddhe ki wajah se meri dayi jangh bilkul nangi ho gayi thi. moti ab saree uthne se dhaka hua nahi tha par sharmaji ne mujhe koi mauka nahi diya aur vikas ki taraf se bhi saree upar utha di. ab meri saree aur petticoat poori upar ho chuki thi. wo to maine panty pahni hui thi warna us chalte hue auto mein meri nangi choot dikh gayi hoti.

Mai mat karo kehti rahi , lekin na vikas ruka , na sharmaji aur na hi moti.

Saree poori upar ho jane se moti meri panty ko sungh raha tha. meri janghe uski laar se gili ho gayi thi. mai apne daye hath se apni jangho ko pochne lagi kyunki baya hath vikas ne pakda hua tha. sharmaji ne mujhe ek besharam aurat ki tarah kamar tak nanga kar diya tha. mai aurat hone ki wajah se swabhavik roop se mat karo keh rahi thi par un tino ki harkaton se meri uttezna badti ja rahi thi. meri choot se ras beh raha tha. moti mere ghutno par pair rakhkar panty mein naak lagakar ras sungh raha tha.

Vikas pehle saree ke pallu ke andar hath dalkar dhire se meri chuchi sehla raha tha. par ab mujhe us halat mein dekhkar wo bhi poora fayda uthane laga. Usne apne daye hath se meri dayi chuchi ko anguliyon mein pakad liya aur jor jor se dabane laga. Mai uske badan par sahare ke liye dhali hui thi. uske jor jor se chuchi dabane se mere liye sans lena mushkil ho gaya. mera baya hath usne apne hath mein pakda hua tha , mai us halat mein uttezna se tadap rahi thi.

Sharmaji us chalte hue auto mein mujhe nanga karne par tula hua tha. sab sharam lihaj chodkar wo buddha ab meri nangi mansal jangho ko apne hathon se masal raha tha. mai apne daye hath se moti ki laar apni jangho se pochne ki koshish kar rahi thi. sharmaji ne mera hath pakad liya aur apne dusre hath se meri jangho ko pochne laga. Uske khurdure hathon ka meri mulayam aur chikni jangho par sparsh mujhe pagal kar de raha tha. wo apne hath ko mere ghutno se panty tak laar pochne ke bahane se fira raha tha. uski anguliyan meri panty ko chu rahi thi. moti ki thandi naak bhi mujhe apni panty ke upar mehsoos ho rahi thi. wo to guruji ka pad choot ke upar laga hua tha warna sharmaji ki anguliyan aur moti ki naak meri choot ko chu deti.

Auto dhime chal raha tha aur andar tino ne mera bura haal kar rakha tha. ab mai koi virodh bhi nahi kar sakti thi kyunki ek ek hath dono ne pakad rakha tha. moti ab meri nangi jangho par baithkar panty sungh raha tha aur kabhi naak upar uthakar meri chuchiyon par laga deta.

Sharmaji meri janghon par hath firane ke baad phir se meri saree ke piche pad gaya. usne mere nitambon ko seat se thoda upar uthakar saree aur petticoat ko mere niche se upar khinch liya. Ab kamar se niche mai poori nangi thi shivay ek choti si panty ke. Panty bhi piche se sikudkar nitambo ki darar mein aa gayi thi. jab saree aur petticoat mere niche se nikal gaye to mujhe apne nitambon par auto ki thandi seat mehsoos hui. Mere badan mein kanpkapi ki lehar si daud gayi. aur choot se ras bahate hue mai jhad gayi.

“ooooohhh…….please……ye kya kar rahe ho ?”

Ab bahut ho gaya tha. situation out of control hoti ja rahi thi. mujhe virodh karna hi tha. par mujhe sunne wala kaun tha.

“kam se kam moti ko to hata do.”

Sharmaji aur uske moti ki wajah se mujhe orgasm aa gaya. vikas ne mujhe sahara dete hue pakde rakha tha lekin meri dayi chuchi poori nichod dali thi. meri saree ka pallu blouse ke upar dayi taraf ko khisak gaya tha. vikas ne apna hath chipane ke liye pallu ko dayi chuchi ke upar rakha tha. ab moti apni naak upar karke meri chuchiyon par laga raha tha.

Sharmaji ne ab mera hath chod diya aur apna baya hath mere piche le gaya. maine socha piche seat par hath rakh raha hai par wo to niche meri panty ki taraf hath le gaya. phir apne daye hath se usne mujhe thoda khiskaya aur apni bayi hatheli mere nitambon ke niche daal di.

“ouch…”

Ab mai Sharmaji ki hatheli ke upar baithi thi aur auto ko lagte har jhatke ke sath mere nitambon aur seat ke beech mein uski hatheli dab ja rahi thi. aisa anubhav to mujhe kabhi nahi hua tha. par sach bataun to mujhe bahut maza aa raha tha. meri panty beech mein sikudi hui thi , ek tarah se poore nange nitambon ke neeche uski hatheli ka sparsh mujhe pagal kar de raha tha. meri choot se ras nikal kar panty poori gili ho gayi thi. moti bhi apne malik ki tarah mere piche pada tha. ab wo meri bayi chuchi ko , jiske upar se saree ka pallu hat gaya tha, blouse ke upar se chat raha tha.

“vikas moti ko hatao. Mujhe wahan par kaat lega to…”

Mujhe bahut masti chadi hui thi. in tino ki harkaton se mai kamonmaad mein thi. sharmaji ki hatheli ka mere nange nitambon par sparsh mujhe romanchit kar de raha tha.

Sharmaji – beti , fikar mat karo. Mai tumhe bacha lunga.

Sharmaji ne moti ke munh ke aage apni dusri hatheli lagakar meri bayi chuchi dhak di. uske liye to bahana ho gaya. ab moti ki jeebh aur mere blouse ke beech uski hatheli thi. usne apni hath se meri chuchi ko pakda aur jor se dabana suru kar diya. Ab dono chuchiyon ko do mard daba rahe the aur moti chupchap dekh raha tha.

“oooooohhh……aaaaaahhhh………..mat karo pleaseeeeeeeee…”

Mujhe ek aur orgasm aa gaya.

Sharmaji aur vikas dono ne meri ek ek chuchi pakdi hui thi aur sharmaji dusre hath se mere nitambon ko masal raha tha. vikas ne ab mera hath chod diya aur apna baya hath aage le jakar meri panty ko chune laga. Dono mard meri halat ka fayda uthane mein koi kasar nahi chod rahe the. sharmaji ki bhari sanse mujhe apne kandhe ke pass mehsoos ho rahi thi , apni umar ke lihaj se uske liye bhi sayad ye bahut jyada ho gaya tha.

Guruji ke diye pad ko maine chootras se poori tarah bhigo diya tha. aur ab mai nidhal pad gayi thi. vikas ne apna hath meri dayi chuchi se hata liya. Par sharmaji ka man abhi nahi bhara tha. wo abhi bhi meri bayi chuchi ko daba raha tha. mere nitambon ki golayi naapta hua hath bhi usne nahi hataya tha. aaj tak kisi ne bhi aise mere nange nitambon ko nahi masla tha.

Tabhi driver ne bataya ki ab hum main road par aa gaye hain. Khuskismati se wo hamein nahi dekh sakta tha kyunki uski seat ke piche bhi samaan bhara hua tha.

Sharmaji – beti , apni sari theek kar lo , nahi to samne se aate autowalon ka accident ho jayega.

Uski baat par vikas hans pada. Mai bhi muskura di , poori besharam jo ban gayi thi. maine apne kapdon ki halat ko dekhkar ek lambi sans li. Mujhe hairani ho rahi thi ki itni uttezna aane ke baad bhi mujhe chudai ki bahut iccha nahi hui. Maine socha sayad guruji ki jadi buti ka asar ho . kyunki normal situation mein koi bhi aurat agar itni jyada excited hoti to bina chudai kiye nahi reh pati.

Uttezna khatam hone ke baad mai ab hosh mein aayi aur kapde theek karne lagi, par saree atki hui thi kyunki buddhe ka hath abhi bhi mere nitambon ke niche tha. mai ek jawan shadisuda aurat , ek anjane aadmi ki hatheli mein baithi hoon , kya kiya maine ye, ab mujhe bahut sharam aayi. Maine apne nitambon ko thoda sa upar uthaya aur buddhe ne apna hath bahar nikaal liya. Phir usne moti ko meri god se niche utar diya.

Maine jaldi se saree niche ki aur apni nangi janghon aur tangon ko dhak diya , jo itni der se khuli padi thi. phir maine blouse ke upar saree ke pallu ko theek kiya aur in dono mardon ke hathon se buri tarah nichodi gayi chuchiyon ko dhak diya. Usi samay maine dekha sharmaji apni dhoti mein lund ko adjust kar raha hai. sayad mujhe chod na pane ke liye use santwna de raha hoga.

Sharmaji – beti , tumhara blouse gila ho gaya hai, sayad doodh nikal aaya hai. rumal dun pochne ke liye ?

“nahi nahi. Ye doodh nahi hai. moti ne jeebh se gila kar diya.”

Vikas – Madam ko abhi baccha nahi hua hai. usi ke ilaaz ke liye to guruji ki sharan mein aayi hai.

Sharmaji – oh sorry beti. Lekin guruji ki kripa se tum jaroor maa ban jaogi.

Maine man hi man socha, Maa to pata nahi lekin agar anjane mardon ko aise hi maine apne badan se chedchad karne di to mai jaldi hi randi jaroor ban jaungi.

Phir hum ashram pahunch gaye. Sharmaji aur uske moti se mera picha chuta. Lekin auto se utarte samay mujhe utarne mein madad ke bahane usne ek aakhiri baar apne hath se , saree ke bahar se mere nitambon ko daba diya.

Auto ke jane ke baad mai aur vikas akele reh gaye. Auto mein jo hua uski sharam se mai vikas se aankhe nahi mila pa rahi thi aur turant apne kamre mein chali gayi. mujhe nahane ki sakht jarurat thi , poora badan chipchipa ho rakha tha. sidhe bathroom mein ghusi aur fatafat apne kapde utar diye. Meri panty hamesha ki tarah nitambon ki darar mein fansi hui thi use bhi nikal fenka.

Tabhi maine dekha mere blouse ka tisra hook tut kar latak gaya hai. wahan par thoda kapda bhi fat gaya tha. auto mein mujhe dikha nahi tha. jarur vikas ke lagataar chuchi dabane se blouse fata hoga. Itna meri chuchiyon ko to kisi ne nahi nichoda jitna us auto mein vikas ne nichoda tha. blouse to fatna hi tha. gopalji se theek karwana padega. Meri bra bhi pasine se bheeg gayi thi. bra ka strap sahi salamat hai yahi ganimat rahi warna isko bhi bahut nichoda tha un dono ne.

Sab kapde fatafat utarkar mai nangi ho gayi. Panty se gila pad nikalkar maine ek kone mein rakh diya aur nahane lagi. din bhar jo mere sath hua tha , pehle tailor ki dukaan mein , phir mele mein aur phir auto mein, usse mere man mein ek apradhbodh ho raha tha. maine der tak nahaya jaise us guilt feeling ko baha dena chahti hun.

Uske baad kuch khas nahi hua. Parimal mere kamre mein aaya aur pad le gaya. baad mein dinner bhi laya. Manju bhi aayi aur mele ke baare mein puchne lagi. uske chehre ki muskurahat bata rahi thi ki jo kuch mere sath hua use sab pata hai. Sameer gopalji ke bheje hue do extra blouse lekar aaya aur ye bhi bata gaya ki subah 6:30 par guruji ke pass jana hoga.

Ek hi din mein itna sab kuch hone ke baad mai buri tarah thak gayi thi. do do baar maine pad poore gile kar diye the. teen mardon ne mere badan ko har jagah par nichoda tha.

Dinner ke baad mai sidhe bed par let gayi. mujhe apne badan mein itni garmi mehsoos ho rahi thi ki maine apni nighty pet tak utha rakhi thi , andar se bra panty kuch nahi pahna tha. aise hi aadhi nangi leti hui jaldi hi mujhe gehri nind aa gayi. raat mein mujhe ajeeb se sapne aaye , saanp dikhe , sharmaji aur uska moti bhi sapne mein dikhe.

 


सुबह किसी के दरवाज़ा खटखटाने से मेरी नींद खुली. मैंने अपनी नाइटी नीचे को खींची और बेड से उठ गयी. दरवाज़ा खोला तो बाहर मंजू खड़ी थी. उसने कहा, तैयार होकर आधे घंटे में गुरुजी के कमरे में आ जाओ.

मैं बाथरूम चली गयी और नहा लिया. आश्रम से मिली हुई नयी साड़ी पहन ली और गोपालजी का भेजा हुआ ब्लाउज पहन लिया. ये वाला ब्लाउज फिट आ रहा था. मैंने पेटीकोट के अंदर पैंटी नही पहनी . पैड लगाने के लिए फिर से नीचे करनी पड़ती है, बाद में पहनूँगी. नहा धो के मैं तरोताजा महसूस कर रही थी. फिर मैं गुरुजी के कमरे में चली गयी.

गुरुजी पूजा कर रहे थे. उस कमरे में अगरबत्तियों के जलने से थोड़ा धुआँ हो रखा था. गुरुजी अभी अकेले ही थे. मुझे उनकी पूजा खत्म होने तक 5 मिनट इंतज़ार करना पड़ा.

गुरुजी – जय लिंगा महाराज. रश्मि , मुझे बताओ तुम्हारा कल का दिन कैसा रहा ?

“जय लिंगा महाराज. जी वो ….मेरा मतलब…...”

मैं क्या बोलती ? यही की अंजाने मर्दों ने मेरे बदन को मसला , मेरी चूचियों को जी भरके दबाया , मेरी नंगी जांघों और नितंबों पर खूब हाथ फिराए और मैंने एक बेशरम औरत की तरह से इन सब का मज़ा लिया ?

गुरुजी शायद मेरी झिझक समझ गये.

गुरुजी – ठीक है रश्मि. मैं समझता हूँ की तुम एक हाउसवाइफ हो और नैतिक रूप से तुम्हारे लिए इन हरकतों को स्वीकार करना बहुत कष्टदायी रहा होगा. तुम्हें ये सब ग़लत लगा होगा और अपराधबोध भी हुआ होगा. लेकिन तुम्हारे गीले पैड देखकर मुझे अंदाज़ा हो गया की तुमने इसका कितना लुत्फ़ उठाया.

“जी , मुझे दोनों बार ज़्यादा स्खलन हुआ था.”

गुरुजी – ये तो अच्छी बात है रश्मि. देखो , मैं चाहता हूँ की तुम इस बारे में कुछ मत सोचो. अभी नैतिक अनैतिक सब भूल जाओ और जो मैंने तुम्हें लक्ष्य दिया है , दिन में दो बार स्खलन का , सिर्फ़ उस पर ध्यान दो. आज भी कल के ही जैसे , जो परिस्थिति तुम्हारे सामने आए तुमने उसी के अनुसार अपना रेस्पॉन्स देना है. जो हो रहा है, उसे होने देना, कहाँ हूँ , किसके साथ हूँ , ये मत सोचना. दिमाग़ को भटकने मत देना और खुद को परिस्थिति के हवाले कर देना.

“गुरुजी , मैं कुछ पूछ सकती हूँ ?”

गुरुजी – मुझे मालूम है तुम क्या पूछना चाहती हो. यही की तुम्हें कामस्खलन हुआ लेकिन संभोग की तीव्र इच्छा नही हुई. यही पूछना चाहती थी ना तुम ?

मैंने अपना सर हिला दिया क्यूंकी बिल्कुल यही प्रश्न मेरे दिमाग़ में था.

गुरुजी – ये जड़ी बूटी जो मैंने तुम्हें दवाई के रूप में दी हैं उसी की वजह से तुम्हें बहुत कामोत्तेजित होते हुए भी संभोग की तीव्र इच्छा नही हुई. मुझे बस तुम्हारे स्खलन की मात्रा मापनी है और कुछ नही. उसके लिए तुम्हें थोड़ा कम्प्रोमाइज ज़रूर करना पड़ रहा है , बस इतना ही.

“गुरुजी ‘थोड़ा’मत कहिए. मुझे इसके लिए बहुत ही बेशरम बनना पड़ रहा है.”

गुरुजी – हाँ , मैं समझ रहा हूँ रश्मि. लेकिन तुम्हारे उपचार के लिए मेरा ये जानना भी तो ज़रूरी है ना. स्खलन की मात्रा से तुम्हारे गर्भवती होने की संभावना के बारे में पता लगेगा.

गुरुजी कुछ पल चुप रहे.

गुरुजी – मैं चाहता हूँ की आज तुम शिवनारायण मंदिर में पूजा के लिए जाओ. विकास तुम्हें वहाँ ले जाएगा. शाम को आरती के लिए मुक्तेश्वरी मंदिर चली जाना.

“ ठीक है गुरुजी.”

गुरुजी – जय लिंगा महाराज.

“जय लिंगा महाराज.”

उसके बाद मैं कमरे से बाहर आ गयी. मुझे आज फिर से ऐसा महसूस हुआ की ज़मीन में बैठे हुए गुरुजी की नज़रें पीछे से मेरे लहराते हुए बड़े नितंबों पर हैं. मैंने आज पैंटी नही पहनी थी , शायद इसलिए थोड़ी सतर्क थी.

फिर मैं अपने कमरे में आ गयी. आज पूजा के लिए जाना था इसलिए मैंने नाश्ता नही किया. कुछ देर बाद मैं कमरे से बाहर आ गयी और आश्रम में टहलने लगी. थोड़ी देर मंजू से गप मारी , फिर मंदिर जाने के लिए तैयार होने कमरे में आ गयी.

मैंने बाहर जाने से पहले दवाई खा ली और पैंटी के अंदर नया पैड लगा लिया.

तभी विकास आ गया.

विकास – मैडम , आप तैयार हो ?

“हाँ . मंदिर कितना दूर है ?

कल की घटना के बावज़ूद हम दोनों एक दूसरे के साथ नॉर्मली बिहेव करने की कोशिश कर रहे थे. आज विकास शेव करके आया था. हैंडसम लग रहा था. कल मैं काफ़ी देर तक उसके साथ थी. अब मुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था. आश्रम में एक वही था जिसके साथ मैं इतना घुल मिल गयी थी.

विकास – ज़्यादा दूर नही है . हम बस से जाएँगे. 10 मिनट लगेंगे.

हम खेतों के बीच पैदल रास्ते से जाने लगे. आज विकास मेरे काफ़ी नज़दीक़ चल रहा था. कभी कभी जब मेरी चाल धीमी हो जाती थी तो मैं उसके साथ चलने के लिए उसका हाथ पकड़ ले रही थी. मुझे पता नही क्या हो रहा था लेकिन उसका साथ मुझे अच्छा लग रहा था. उसके साथ होने से मन में एक खुशी सी होती थी.

फिर हम मेन रोड में पहुँच गये और वहाँ से हमें बस मिल गयी. बस में थोड़ी भीड़भाड़ थी. हम बस में चढ़ गये और विकास मेरे पीछे खड़ा हो गया. विकास आज सही मायनों में मुझे प्रोटेक्ट कर रहा था. और मैं भी ज़रूरत से ज़्यादा ही उसकी मदद ले रही थी. जैसे की जब हम भीड़ के बीच लोगों को हटाते हुए अपने लिए जगह बना रहे थे तो मैं उसका हाथ पकड़े हुए थी. मैंने सपोर्ट के लिए अपने सर के ऊपर रॉड को एक हाथ से पकड़ा हुआ था. विकास ने भी वहीं पर पकड़ा हुआ था उसका हाथ मेरे हाथ से बार बार छू जा रहा था. बस के झटकों से बचने के लिए मैंने उसके गठीले बदन का सहारा लिया हुआ था. मेरे बड़े नितंब उसके पैंट पर दब रहे थे. लेकिन आज विकास बहुत तमीज़ से पेश आ रहा था. शायद सफ़र छोटा होने की वजह से. क्यूंकी जल्दी ही मंदिर आ गया.

मंदिर में और भी लोग बस से उतरे. अब उतरते समय विकास मेरे आगे था मेरी बड़ी चूचियाँ उसकी पीठ से दब गयीं. मैंने भी कोई संकोच नही किया और उसकी पीठ से अपनी छाती चिपका दी. विकास थोड़ा पीछे को मुड़ा और मुझे देखकर मुस्कुराया. शायद वो समझ गया होगा मैं उसे अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसा कर रही हूँ.

बस से उतरने के बाद मेरा मन विकास के साथ समय बिताने को हो रहा था , मंदिर जाने को मैं उत्सुक नही थी. लेकिन विकास सीधे मंदिर की तरफ बढ़ रहा था.

“विकास , मैं कुछ बोलूँ ?”

विकास – ज़रूर मैडम.

“मेरा मंदिर जाना ज़रूरी है क्या ? मेरा मतलब अगर ना जाऊँ तो ?”

विकास – हाँ मैडम. आपको मंदिर जाना होगा. ये गुरुजी का आदेश है. और उनके हर आदेश का कोई उद्देश्य और लक्ष्य होता है. ये बात तो अब आप भी जानती हो.

“हाँ मैं जानती हूँ. लेकिन मेरा मतलब…..अगर हम ….. मैं ये कहना चाह रही हूँ की …..”

विकास – मैडम , आपको कुछ कहने की ज़रूरत नही. आप मंदिर में जाओ और पूजा करके आओ.

“लेकिन विकास . मैं चाहती हूँ की…….मैं कैसे कहूँ ?”

विकास – मैडम, आपको कहने की ज़रूरत नही. मैं समझ रहा हूँ.

“तुम बिल्कुल बुद्धू हो. अगर तुम समझते तो अभी मुझे मंदिर जाने को नही कहते.”

विकास – मैडम, अभी आप पूजा करो. शाम को गुरुजी ने आपको मुक्तेश्वरी मंदिर ले जाने को कहा है, मैं आपको वहाँ नही ले जाऊँगा.

“पक्का ? वादा करो ?”

विकास – हाँ मैडम. वादा रहा.

अब मैं खुश थी की विकास मेरी मर्ज़ी के आगे कुछ तो झुका. आज मुझे गुरुजी के आदेशानुसार दो बार ओर्गास्म लाने थे और सच बताऊँ तो मैं चाहती थी की उनमें से एक तो विकास से आए.

फिर हम मंदिर पहुँच गये.

“हे भगवान ! इतनी लंबी लाइन !”

विकास – हाँ मैडम. यहाँ लंबी लाइन लगी है. ‘गर्भ गृह’में देवता के दर्शन में काफ़ी समय लगेगा.

विकास और मैं लाइन में नही लगे. विकास मुझे मंदिर के पीछे ले गया. वहाँ एक आदमी हमारा इंतज़ार कर रहा था. विकास ने उससे कुछ बात की और फिर मेरा परिचय कराया.

विकास – ये पांडे जी हैं.

पांडे जी – मैडम आप लाइन की चिंता मत करो. असल में नियम ये है की एक बार में एक ही व्यक्ति गर्भ गृह के अंदर पूजा कर सकता है , इसलिए ज़्यादा समय लग जाता है.

“अच्छा.”

फिर विकास वहाँ से चला गया.

पांडे जी करीब 40 बरस का होगा. मजबूत बदन , बिना शेव किया हुआ चेहरा , हाथों में भी उसके बहुत बाल थे. मुझे लगा ज़रूर इसका बदन ज़्यादा बालों वाला होगा. साफ कहूं तो मुझे बालों वाले मर्द पसंद हैं. खुशकिस्मती से मेरे पति के भी ऐसी ही बाल हैं.

पांडे जी सफेद धोती और सफेद कमीज़ पहने था. एक लड़का भी वहीं पर खड़े होकर हमारी बात सुन रहा था. 18 बरस का रहा होगा.

पांडे जी – छोटू , तू लाइन को सम्हालना और फिर जल्दी नहा भी लेना. मैडम , आप मेरे साथ आओ. धूप में लाइन में खड़े होने की ज़रूरत नही है. जब लाइन मंदिर के अंदर पहुँच जाएगी फिर लग जाना.

छोटू चला गया और मैं पांडे जी के पीछे चली गयी. वहाँ छोटी झोपड़ीनुमा ढाँचे मंदिर के पंडों के लिए बने हुए थे.

पांडे जी मुझे एक झोपड़ी के आँगन में ले गया. वहाँ एक पेड़ से दो गाय बँधी हुई थीं. धूप से आकर वहाँ छाया में मुझे राहत महसूस हुई. पांडे जी ने मुझसे वहाँ रखी खटिया में बैठने को कहा.

Subah kisi ke darwaza khatkhatane se meri nind khuli. Maine apni nighty niche ko khinchi aur bed se uth gayi. darwaza khola to bahar manju khadi thi. usne kaha, tayyar hokar aadhe ghante mein Guruji ke kamre mein aa jao.

Mai bathroom chali gayi aur naha liya. Ashram se mili hui nayi saree pahan li aur Gopalji ka bheja hua blouse pahan liya. Ye wala blouse fit aa raha tha. maine petticoat ke andar panty nahi pehni . Pad lagane ke liye phir se niche karni padti hai, baad mein pahnungi. Naha dho ke mai tarotaja mehsoos kar rahi thi. phir mai Guruji ke kamre mein chali gayi.

Guruji pooja kar rahe the. us kamre mein agarbattiyon ke jalne se thoda dhuan ho rakha tha. guruji abhi akele hi the. mujhe unki pooja khatam hone tak 5 minute intzaar karna pada.

Guruji – Jai Linga Maharaj. Rashmi , mujhe batao tumhara kal ka din kaisa raha ?

“Jai Linga Maharaj. Ji wo ….mera matlab…….”

Mai kya bolti ? yahi ki anjane mardon ne mere badan ko masla , meri chuchiyon ko jee bharke dabaya , meri nangi jangho aur nitambon par khoob hath firaye aur maine ek besharam aurat ki tarah se in sab ka maza liya ?

Guruji sayad meri jhijhak samajh gaye.

Guruji – theek hai Rashmi. Mai samajhta hun ki tum ek housewife ho aur naitik roop se tumhare liye ye in harkaton ko swikaar karna bahut kashtdayi raha hoga. Tumhe ye sab galat laga hoga aur apradhbodh bhi hua hoga. Lekin tumhare gile pad dekhkar mujhe andaza ho gaya ki tumne iska kitna lutf uthaya.

“ji , mujhe dono baar jyada skhlan hua tha.”

Guruji – ye to acchi baat hai Rashmi. Dekho , mai chahta hun ki tum is baare mein kuch mat socho. Abhi naitik anaitik sab bhool jao aur jo maine tumhe lakshya diya hai , din mein do baar skhlan ka , sirf us par dhyan do. Aaj bhi kal ke hi jaise , jo parishthiti tumhare samne aaye tumne usi ke anusaar apna response dena hai. jo ho raha hai, use hone dena, kahan hun , kiske sath hun , ye mat sochna. Dimag ko bhatakne mat dena aur khud ko paristhiti ke hawale kar dena.

“Guruji , mai kuch puch sakti hun ?”

Guruji – mujhe malum hai tum kya puchna chahti ho. Yahi ki tumhe kaamskhlan hua lekin sambhog ki tivra iccha nahi hui. yahi puchna chahti thi na tum ?

Maine apna sar hila diya kyunki bilkul yahi prasn mere dimag mein tha.

Guruji – ye jadi buti jo maine tumhe dawai ke roop mein di hain usi ki wajah se tumhe bahut kamottezit hote hue bhi sambhog ki tivra iccha nahi hui. Mujhe bas tumhare skhlan ki matra mapni hai aur kuch nahi. Uske liye tumhe thoda compromise jaroor karna pad raha hai , bas itna hi.

“Guruji ‘thoda’ mat kahiye. Mujhe iske liye bahut hi besharam banna pad raha hai.”

Guruji – haan , mai samajh raha hun Rashmi. Lekin tumhare upchaar ke liye mera ye janna bhi to jaroori hai na. Skhlan ki matra se tumhare garbhwati hone ki sambhavna ke baare mein pata lagega.

Guruji kuch pal chup rahe.

Guruji – mai chahta hun ki aaj tum Shivnarayan mandir mein pooja ke liye jao. Vikas tumhe wahan le jayega. sham ko aarti ke liye mukteswari mandir chali jana.

“ theek hai Guruji.”

Guruji – Jai Linga Maharaj.

“Jai Linga Maharaj.”

Uske baad mai kamre se bahar aa gayi. mujhe aaj phir se aisa mehsoos hua ki jameen mein baithe hue Guruji ki nazren piche se mere lehrate hue bade nitambon par hain. Maine aaj panty nahi pahni thi , sayad isliye thodi satark thi.

Phir mai apne kamre mein aa gayi. aaj pooja ke liye jana tha isliye maine nashta nahi kiya. kuch der baad mai kamre se bahar aa gayi aur ashram mein tahlne lagi. thodi der manju se gupp mari , phir mandir jaane ke liye tayyar hone kamre mein aa gayi.

Maine bahar jane se pahle dawai kha li aur panty ke andar naya pad laga liya.

Tabhi vikas aa gaya.

Vikas – Madam , aap tayyar ho ?

“haan . Mandir kitna door hai ?

Kal ki ghatna ke bavzood hum dono ek dusre ke sath normally behave karne ki koshish kar rahe the. aaj vikas shave karke aaya tha. handsome lag raha tha. kal mai kaafi der tak uske sath thi. ab mujhe uska sath accha lagne laga tha. ashram mein ek wahi tha jiske sath mai itna ghul mil gayi thi.

Vikas – jyada door nahi hai . hum bus se jayenge. 10 minute lagenge.

Hum kheton ke beech paidal raste se jane lage. Aaj vikas mere kafi nazdeeq chal raha tha. kabhi kabhi jab meri chaal dhimi ho jati thi to mai uske sath chalne ke liye uska hath pakad le rahi thi. mujhe pata nahi kya ho raha tha lekin uska sath mujhe accha lag raha tha. uske sath hone se man mein ek khushi si hoti thi.

Phir hum main road mein pahunch gaye aur wahan se hamein bus mil gayi. bus mein thodi bheedbhad thi. hum bus mein chad gaye aur vikas mere piche khada ho gaya. vikas aaj sahi mayno mein mujhe protect kar raha tha. aur mai bhi jarurat se jyada hi uski madad le rahi thi. jaise ki jab hum bheed ke beech logo ko hatate hue apne liye jagah bana rahe the to mai uska hath pakde hue thi. maine support ke liye apne sar ke upar rod ko ek hath se pakda hua tha. vikas ne bhi wahin par pakda hua tha uska hath mere hath se baar baar chu ja raha tha. bus ke jhatkon se bachne ke liye maine uske gathile badan ka sahara liya hua tha. mere bade nitamb uske pant par dab rahe the. lekin aaj vikas bahut tameez se pesh aa raha tha. sayad safar chota hone ki wajah se. kyunki jaldi hi mandir aa gaya.

Mandir mein aur bhi log bus se utare. Ab utarte samay vikas mere aage tha meri badi chuchiyan uski peeth se dab gayi. maine bhi koi sankoch nahi kiya aur uski peeth se apni chati chipka di. vikas thoda piche ko muda aur mujhe dekhkar muskuraya. Sayad wo samajh gaya hoga mai use apni taraf akarshit karne ke liye aisa kar rahi hun.

Bus se utarne ke baad mera man vikas ke sath samay bitane ko ho raha tha , mandir jane ko mai utsuk nahi thi. lekin vikas sidhe mandir ki taraf bad raha tha.

“vikas , mai kuch bolu ?”

Vikas – jaroor Madam.

“mera mandir jana jaruri hai kya ? mera matlab agar na jaun to ?”

Vikas – haan madam. Aapko mandir jana hoga. Ye guruji ka aadesh hai. aur unke har aadesh ka koi uddeshya aur lakshya hota hai. ye baat to ab aap bhi jaanti ho.

“haan mai janti hun. Lekin mera matlab……agar hum …..mai ye kehna chah rahi hun ki….”

Vikas – Madam , aapko kuch kehne ki jarurat nahi. Aap mandir mein jao aur pooja karke aao.

“lekin vikas . mai chahti hun ki……mai kaise kahun ?”

Vikas – Madam, aapko kehne ki jarurat nahi. Mai samajh raha hun.

“tum bilkul buddhu ho. Agar tum samjhte to abhi mujhe mandir jane ko nahi kehte.”

Vikas – Madam, abhi aap pooja karo. Sham ko Guruji ne aapko mukteswari mandir le jane ko kaha hai, mai aapko wahan nahi le jaunga.

“pakka ? vada karo ?”

Vikas – haan Madam. Vaada raha.

Ab mai khush thi ki vikas meri marzi ke aage kuch to jhuka. Aaj mujhe Guruji ke aadeshanushar do bar orgasm lane the aur sach bataun to mai chahti thi ki unme se ek to vikas se aaye.

Phir hum mandir pahunch gaye.

“hey bhagwan ! itni lambi line !”

Vikas – haan Madam. Yahan lambi line lagi hai. ‘garbha griha’ mein devta ke darshan mein kafi samay lagega.

Vikas aur mai line mein nahi lage. Vikas mujhe mandir ke piche le gaya. wahan ek aadmi hamara intzaar kar raha tha. vikas ne usse kuch baat ki aur phir mera parichay karaya.

Vikas – ye Pande ji hain.

Pande ji – Madam aap line ki chinta mat karo. Asal mein niyam ye hai ki ek baar mein ek hi vyakti garbha griha ke andar pooja kar sakta hai , isliye jyada samay lag jata hai.

“accha.”

Phir vikas wahan se chala gaya.

Pande ji kareeb 40 baras ka hoga. majboot badan , bina shave kiya hua chehra , hathon mein bhi uske bahut baal the. mujhe laga jaroor iska badan jyada baalon wala hoga. Saaf kahun to mujhe balon wale mard pasand hain. Khuskismati se mere pati ke bhi aisi hi baal hain.

Pande ji safed dhoti aur safed kameez pahne tha. ek ladka bhi wahin par khade hokar hamari baat sun raha tha. 18 baras ka raha hoga.

Pande ji – chotu , tu line ko samhalna aur phir jaldi naha bhi lena. Madam , aap mere sath aao. Dhoop mein line mein khade hone ki jarurat nahi hai. jab line mandir ke andar pahunch jayegi phir lag jana.

Chotu chala gaya aur mai pande ji ke piche chali gayi. wahan choti jhopdinuma dhanche mandir ke pandon ke liye bane hue the.

Pande ji mujhe ek jhopdi ke aangan mein le gaya. wahan ek ped se do gaay bandhi hui thi. Dhoop se aakar wahan chaya mein mujhe rahat mehsoos hui. Pande ji ne mujhse wahan rakhi khatiya mein baithne ko kaha.

 
पांडे जी मुझे एक झोपड़ी के आँगन में ले गया. वहाँ एक पेड़ से दो गाय बँधी हुई थीं. धूप से आकर वहाँ छाया में मुझे राहत महसूस हुई. पांडे जी ने मुझसे वहाँ रखी खटिया में बैठने को कहा.

खटिया रस्सियों से बनी हुई थी. मैं खटिया में बैठ गयी. बैठने के कुछ ही देर में वो सख़्त रस्सियां मेरे मुलायम नितंबों में चुभने लगीं. मुझे अनकंफर्टेबल फील होने लगा और मैंने साड़ी के अंदर पैंटी को नितंबों पर फैलाने की कोशिश की पर उस बैठी पोज़िशन में पैंटी खिंच नही रही थी. थोड़ी राहत पाने के लिए मैं अपने वजन को कभी एक नितंब कभी दूसरे नितंब में डालने लगी. इससे एक नितंब दबता और दूसरे में आराम हो रहा था. खटिया की रस्सी इतनी सख़्त थी की मेरी साड़ी और पेटीकोट के बाहर से भी चुभ रही थी. मैं शरम की वजह से पांडेज़ी से भी कुछ नही कह पा रही थी.

पांडे जी – मैडम , खटिया में ठीक से नही बैठ पा रही हो क्या ?

मैंने बता दिया की रस्सी चुभ रही है.

पांडे जी – मैडम , मैं आपकी परेशानी समझ सकता हूँ. आपको खटिया में बैठने की आदत नही है ना इसलिए रस्सी आपके मुलायम बदन में चुभ रही है.

पांडेज़ी ने मेरे बदन के ऊपर कमेंट कर दिया , मैं चुप रही.

वो एक चादर ले आया. खटिया नीची थी और मेरे बैठने से रस्सियां और भी नीचे झूल गयी थीं. जब पांडेज़ी चादर ले आया तो मैं खटिया से उठने लगी. नीचे को धँसी रस्सियों से उठते समय मेरा पल्लू कंधे से गिर गया . मैंने जल्दी से अपनी छाती को पल्लू से ढक दिया फिर भी तब तक पांडेज़ी को मेरी बड़ी चूचियों के ऊपरी हिस्से और क्लीवेज का नज़ारा दिख गया. क्यूंकी वो ठीक मेरे सामने खड़ा था और मैं झुकी पोज़िशन से ऊपर को उठ रही थी तो उसे ऊपर से साफ दिख रहा होगा. पल्लू ब्लाउज के ऊपर करते समय मैंने देखा की मेरी बायीं चूची के ऊपर का ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है. मैंने ब्लाउज के अंदर अँगुलियाँ डालकर स्ट्रैप को ब्लाउज से ढक दिया . ये सब मुझे एक अंजाने मर्द के सामने करना पड़ा. और इस दौरान स्वाभाविक रूप से पांडेज़ी की निगाहें मेरी चूचियों पर ही थी.

जब पांडेज़ी खटिया में चादर बिछा रहा था , तब मैंने अपनी पैंटी को नितंबों पर खींच लिया. मेरे नितंब रस्सी चुभने से दर्द कर रहे थे, इसलिए दोनों हाथों से नितंबों को थोड़ा मला और दबा दिया , ताकि उनमें रक्त संचार ठीक से हो जाए. मैंने सोचा मुझे कोई नही देख रहा है क्यूंकी पांडेज़ी तो चादर बिछा रहा था पर मुझे पता नही चला की वो लड़का छोटू वापस आ गया है और ठीक मेरे पीछे खड़ा है. जब मेरी नज़र उस पर पड़ी तो मुझे बड़ी शरम महसूस हुई. मैं अपने नितंबों को दबा रही थी और इसने सब देख लिया वो भी ठीक मेरे पीछे खड़े होकर. मैंने देखा वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था और बार बार मेरे उभरे हुए नितंबों को ही देख रहा था. वैसे तो वो 18 बरस का छोटा लड़का था पर शरम से मैं उससे आँखें नही मिला पा रही थी.

अगर कोई मर्द ऐसे देख ले तो कोई भी औरत बहुत शर्मिंदगी महसूस करेगी. मेरे दिमाग़ में वो सीन दोहराने लगा की इस लड़के को क्या नज़ारा दिखा होगा. सबसे पहले मैंने नितंबों पर साड़ी फैलाई थी जो बैठने से दब गयी थी. फिर मैंने अपनी अंगुलियों से पैंटी के कोने ढूंढे जो नितंबों की दरार में सिकुड गये थे , और फिर पैंटी को नितंबों पर फैलाने की कोशिश की. ऐसा करने के लिए मैं थोड़ा आगे को झुक गयी थी और मेरे गोल नितंब पीछे को उभर गये थे, उसके बाद मैंने दोनों नितंबों को हाथों से थोड़ा मल दिया था. ये सब उस लड़के ने मेरे पीछे खड़े होकर देख लिया.

फिर मैं चादर बिछी खटिया में बैठ गयी. पांडेज़ी झोपड़ी के अंदर गया और कुछ देर बाद एक थाली लेकर आया जिसमें पूजा का समान था.

पांडे जी – छोटू तू जल्दी से नहा ले , तब तक मैं मैडम की थाली के लिए दूध लेकर आता हूँ.

खटिया से कुछ ही फीट दूर एक नल लगा था , छोटू वहाँ नहाने की तैयारी करने लगा. पांडेज़ी भी पेड़ के पास गाय से दूध लाने चला गया , वो पेड़ खटिया से तकरीबन 10 – 12 फीट दूर होगा. छोटू एक शर्ट और निक्कर ( हाफ पैंट ) पहने था. उसने शर्ट उतार दी और कमर में एक तौलिया लपेट कर निक्कर उतार दिया.

पांडे जी – छोटू तौलिया गीला मत कर.

छोटू – फिर नहाऊँ कैसे ?

पांडे जी –ऐसे ही नहा ले. मैडम से क्यूँ शरमा रहा है ?

छोटू चुप रहा.

पांडे जी – मैडम देखो छोटा ही तो है. आपके सामने नहाने में शरमा रहा है.

मैं धीरे से हँसी और कुछ कहने वाली थी तभी……

पांडे जी – अरे यार मैडम क्या छोटी लड़की है तेरी दोस्त रूपा की जैसी , जो तू शरमा रहा है ? मैडम ने तो तेरे जैसे कितने लड़के अपने सामने नहाते हुए देखे होंगे. है ना मैडम ?

मैंने उसकी बकवास को इग्नोर कर दिया और चुप रही. फिर पांडेज़ी एक बर्तन में गाय से दूध निकालने लगा.

“छोटू तुम नहा लो. मुझे कोई प्राब्लम नही है.”

मैंने छोटू से नहाने को कह दिया पर मैं छोटू और पांडेजी के बीच बातचीत को ठीक से समझी नही थी. ये तो मैं सपने में भी नही सोच सकती थी की पांडेज़ी छोटू से मेरे सामने नंगा नहाने को कह रहा है. मुझे क्या पता था की उसने निक्कर के अंदर अंडरवियर ही नही पहना है.

छोटू – ठीक है मैडम , आपको कोई दिक्कत नही तो मैं नहा लेता हूँ. पर रूपा आई तो मुझे बता देना.

“ये रूपा कौन है ?”

पांडे जी – रूपा पास वाले झोपडे में रहती है मैडम. इसकी दोस्त है.

पांडेज़ी और मैं हल्का सा हंस पड़े.

अब छोटू ने बेधड़क अपना तौलिया उतार दिया. वो मुझसे कुछ ही फीट दूर था और शायद जानबूझकर अब उसने मेरी तरफ मुँह कर लिया था. उसको नंगा देखकर मैं हैरान रह गयी. उसका लंड तना हुआ था, शायद जब मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे नितंबों को देख रहा होगा तभी से तन गया होगा. अब मेरा ध्यान बार बार उसके लंड पर ही जाए. इधर उधर देखूं तो भी नज़र फिर वही चली जा रही थी. वो अपने बदन में पानी डालने लगा. उसका लंड केले के जैसे हवा में खड़ा था. लंड के आस पास बहुत कम बाल थे.

उस लड़के को मेरे इतने नज़दीक़ नंगा नहाते देख , अब मेरी साँसें भारी हो गयी थीं और मेरे निप्पल तन गये थे. वो बेशरम मेरी तरफ मुँह करके अपने खड़े लंड को मल मल कर साबुन लगा रहा था. उसके ज़रा सा भी बदन हिलाने से उसका लंड हवा में नाच जैसा कर रहा था और ये देखकर मेरे दिल की धड़कनें बढ़ जा रही थी. स्वाभाविक कामोत्तेजना से मेरी टाँगें थोड़ी खुलने लगी और मुझे अपने ऊपर कंट्रोल करना पड़ा.

पांडे जी – ऐ छोटू , बदन में ठीक से साबुन लगा.

छोटू – अब इससे ठीक कैसे लगाऊँ ?

पांडे जी – रुक , मैं लगा देता हूँ.

पांडे जी ने दूध का बर्तन मेरे सामने लाकर रख दिया.

पांडे जी – मैडम ,मैं इसको ठीक से साबुन लगाता हूँ. आप अपने दूध पर नज़र रखना.

पांडेज़ी मुस्कुराते हुए बोला. मैं सोचने लगी, ‘अपने दूध’से इसका क्या मतलब है ?

फिर पांडे जी छोटू के पास गया और उसके बदन पर साबुन लगाने लगा. उसने छोटू के ऊपरी बदन पर बस थोड़ी ही देर मला और फिर उसके लंड पर आ गया. एक हाथ में उसने छोटू का लंड पकड़ा और दूसरे हाथ से उसकी गोलियों को सहलाने लगा. लंड पर साबुन क्या लगा रहा था एक तरह से मूठ मार रहा था. ये सीन देखकर मेरे हाथ अपनेआप ही मेरी चूचियों पर चले गये और मेरी जाँघें साड़ी के अंदर अलग अलग हो गयीं. मुझे लगा अगर थोड़ी देर और पांडेज़ी वैसा करता तो छोटू पक्का झड़ जाता. शुक्र है जल्दी ही ये खत्म हो गया और फिर छोटू ने तौलिया से अपना नंगा बदन पोंछ लिया. उसने एक दूसरी शर्ट और निक्कर पहन लिया.

पांडेज़ी हाथ धोकर मेरे पास आया. उसने पूजा की थाली में रखे एक छोटे से कटोरे में दूध डाला.

पांडे जी – मैडम, देखो कितना गाढ़ा दूध है.

“हाँ, इसमें पानी नही मिला है ना, जैसे हमको शहर में मिलता है.”

पांडे जी – नही मैडम. ये बिल्कुल शुद्ध है , चूची के दूध जैसा शुद्ध .

मेरी तनी हुई चूचियों की तरफ देखते हुए उसने कहा.

मैं उसकी बात के जवाब में कुछ नही बोल पाई. कहाँ की तुलना कहाँ कर रहा था.

छोटू अब तक तैयार हो गया था. अब हम मंदिर की तरफ चल पड़े. मेरे हाथ में पूजा की थाली थी.

“पांडे जी , लाइन में खड़ी सभी औरतों के माथे पर कुमकुम क्यूँ लगा है ?”

पांडे जी – मैडम , ये मंदिर का रिवाज़ है. आपको भी लगेगा. मैडम, अब इस लंबी लाइन में खड़े होने की तकलीफ़ झेलनी पड़ेगी. यहाँ सबको लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, हमको भी. चल छोटू लाइन में लग जा.

लाइन अब मंदिर की छत के नीचे थी. हम उस लंबी लाइन में लग गये. यहाँ पर जगह कम थी. एक पतले गलियारे में औरत और आदमी एक ही लंबी लाइन में खड़े थे. वो लोग बहुत देर से लाइन में खड़े थे इसलिए थके हुए , उनींदे से लग रहे थे. मेरे आगे छोटू लगा हुआ था और पांडेज़ी पीछे खड़ा था. उस छोटी जगह में भीड़भाड़ की वजह से दोनों से मेरा बदन छू जा रहा था.

Pande ji mujhe ek jhopdi ke aangan mein le gaya. wahan ek ped se do gaay bandhi hui thi. Dhoop se aakar wahan chaya mein mujhe rahat mehsoos hui. Pande ji ne mujhse wahan rakhi khatiya mein baithne ko kaha.

Khatiya rassiyon se bani hui thi. mai khatiya mein baith gayi. baithne ke kuch hi der mein wo sakht rassiyan mere mulayam nitambon mein chubhne lagi. mujhe uncomfortable feel hone laga aur maine saree ke andar panty ko nitambon par failane ki koshish ki par us baithi position mein panty khich nahi rahi thi. thodi rahat pane ke liye mai apne wajan ko kabhi ek nitamb kabhi dusre nitamb mein dalne lagi. isse ek nitamb dabta aur dusre mein aaram ho raha tha. khatiya ki rassi itni sakht thi ki meri saree aur petticoat ke bahar se bhi chubh rahi thi. mai sharam ki wajah se pandeji se bhi kuch nahi keh pa rahi thi.

Pande ji – Madam , khatiya mein theek se nahi baith pa rahi ho kya ?

Maine bata diya ki rassi chubh rahi hai.

Pande ji – Madam , mai aapki pareshani samajh sakta hun. Aapko khatiya mein baithne ki aadat nahi hai na isliye rassi aapke mulayam badan mein chubh rahi hai.

Pandeji ne mere badan ke upar comment kar diya , mai chup rahi.

wo ek chadar le aaya. Khatiya nichi thi aur mere baithne se rassiyan aur bhi niche jhul gayi thi. jab pandeji chadar le aaya to mai khatiya se uthne lagi. niche ko dhansi rassiyon se uthte samay mera pallu kandhe se gir gaya . maine jaldi se apni chati ko pallu se dhak diya phir bhi tab tak pandeji ko meri badi chuchiyon ke upari hisse aur cleavage ka nazara dikh gaya. kyunki wo theek mere samne khada tha aur mai jhuki position se upar ko uth rahi thi to use upar se saaf dikh raha hoga. Pallu blouse ke upar karte samay maine dekha ki meri bayi chuchi ke upar ka bra ka strap dikh raha hai. maine blouse ke andar anguliyan dalkar strap ko blouse se dhak diya . ye sab mujhe ek anjane mard ke samne karna pada. Aur is dauran swabhawik roop se pandeji ki nigahe meri chuchiyon par hi thi.

jab pandeji khatiya mein chadar bicha raha tha , tab maine apni panty ko nitambon par khinch liya. Mere nitamb rassi chubhne se dard kar rahe the, isliye dono hathon se nitambon ko thoda mala aur daba diya , taki unme rakt sanchar thekk se ho jaye. Maine socha mujhe koi nahi dekh raha hai kyunki pandeji to chadar bicha raha tha par mujhe pata nahi chala ki wo ladka chotu wapas aa gaya hai aur theek mere piche khada hai. jab meri nazar us par padi to mujhe badi sharam mehsoos hui. mai apne nitambon ko daba rahi thi aur isne sab dekh liya wo bhi theek mere piche khade hokar. Maine dekha wo mujhe dekhkar mushkura raha tha aur baar baar mere ubhre hue nitambon ko hi dekh raha tha. waise to wo 18 baras ka chota ladka tha par sharam se mai usse aankhe nahi mila pa rahi thi.

agar koi mard aise dekh le to koi bhi aurat bahut sharmindagi mehsoos karegi. Mere dimag mein wo scene dohrane laga ki is ladke ko kya nazara dikha hoga. Sabse pehle maine nitambon par saree failai thi jo baithne se dab gayi thi. phir maine apni anguliyon se panty ke kone dhondhe jo nitambon ki darar mein sikud gaye the , aur phir panty ko nitambon par failane ki koshish ki. Aisa karne ke liye mai thoda aage ko jhuk gayi thi aur mere gol nitamb piche ko ubhar gaye the, uske baad maine dono nitambon ko hathon se thoda mal diya tha. ye sab us ladke ne mere piche khade hokar dekh liya.

Phir mai chadar bichi khatiya mein baith gayi. pandeji jhopdi ke andar gaya aur kuch der baad ek thali lekar aaya jisme pooja ka samaan tha.

Pande ji – chotu tu jaldi se naha le , tab tak mai madam ki thali ke liye doodh lekar aata hun.

Khatiya se kuch hi feet dur ek nal laga tha , chotu wahan nahane ki tayyari karne laga. Pandeji bhi ped ke pass gaay se doodh lane chala gaya , wo ped khatiya se takreban 10 – 12 feet dur hoga.chotu ek shirt aur nikkar (half pant ) pehne tha. usne shirt utar di aur kamar mein ek taulia lapet kar nikkar utar diya.

Pande ji – chotu taulia gila mat kar.

Chotu – phir nahaun kaise ?

Pande ji –aise hi naha le. Madam se kyun sharma raha hai ?

Chotu chup raha.

Pande ji – Madam dekho chota hi to hai. aapke samne nahane mein sharma raha hai.

Mai dhire se hansi aur kuch kehne wali thi tabhi……

Pande ji – are yaar Madam kya choti ladki hai teri dost Rupa ki jaisi , jo tu sharma raha hai ? Madam ne to tere jaise kitne ladke apne samne nahate hue dekhe honge. Hai na Madam ?

Maine uski bakwas ko ignore kar diya aur chup rahi. Phir Pandeji ek bartan mein gaay se doodh nikalne laga.

“chotu tum naha lo. Mujhe koi problem nahi hai.”

Maine chotu se nahane ko keh diya par mai chotu aur pandeyji ke beech baatcheet ko theek se samjhi nahi thi. ye to mai sapne mein bhi nahi soch sakti thi ki pandeji chotu se mere samne nanga nahane ko keh raha hai. mujhe kya pata tha ki usne nikkar ke andar underwear hi nahi pahna hai.

Chotu – theek hai Madam , aapko koi dikkat nahi to mai naha leta hun. Par Rupa aayi to mujhe bata dena.

“ye Rupa kaun hai ?”

Pande ji – Rupa pass wale jhopde mein rehti hai Madam. iski dost hai.

Pandeji aur mai halka sa hans pade.

Ab chotu ne bedhadak apna taulia utar diya. Wo mujhse kuch hi feet dur tha aur sayad jaanboojhkar ab usne meri taraf munh kar liya tha. usko nanga dekhkar mai hairaan reh gayi. uska lund tana hua tha, sayad jab mere piche khada hokar mere nitambon ko dekh raha hoga tabhi se tan gaya hoga. Ab mera dhyan baar baar uske lund par hi jaye. Idhar udhar dekhun to bhi nazar phir wahi chali ja rahi thi. wo apne badan mein pani dalne laga. Uska lund kele ke jaise hawa mein khada tha. lund ke aas pass bahut kam baal the.

us ladke ko mere itne nazdeeq nanga nahate dekh , ab meri sanse bhari ho gayi thi aur mere nipple tan gaye the. wo besharam meri taraf munh karke apne khade lund ko mal mal kar sabun laga raha tha. uske jara sa bhi badan hilaane se uska lund hawa mein nach jaisa kar raha tha aur ye dekhkar mere dil ki dhadkane bad ja rahi thi. swabhawik kamottezna se meri tange thodi khulne lagi aur mujhe apne upar control karna pada.

Pande ji – aie chotu , badan mein theek se sabun laga.

Chotu – ab isse theek kese lagaun ?

Pande ji – Ruk , mai laga deta hun.

Pande ji ne doodh ka bartan mere samne lakar rakh diya.

Pande ji – Madam ,mai isko theek se sabun lagata hun. Aap apne doodh par nazar rakhna.

Pandeji muskurate hue bola. Mai sochne lagi, ‘apne doodh’ se iska kya matlab hai ?

Phir Pande ji chotu ke pass gaya aur uske badan par sabun lagane laga. Usne Chotu ke upari badan par bas thodi hi der mala aur phir uske lund par aa gaya. ek hath mein usne chotu ka lund pakda aur dusre hath se uski goliyon ko sehlane laga. Lund par sabun kya laga raha tha ek tarah se muth maar raha tha. ye scene dekhkar mere hath apneaap hi meri chuchiyon par chale gaye aur meri janghe saree ke andar alag alag ho gayi. mujhe laga agar thodi der aur pandeji waisa karta to chotu pakka jhad jata. Shukra hai jaldi hi ye khatam ho gaya aur phir chotu ne tauliya se apna nanga badan poch liya. Usne ek dusri shirt aur nikkar pahan liya.

Pandeji hath dhokar mere pass aaya. Usne pooja ki thali mein rakhe ek chote se kataure mein doodh dala.

Pande ji – Madam, dekho kitna gada doodh hai.

“haan, isme pani nahi mila hai na, jaise humko sahar mein milta hai.”

Pande ji – nahi Madam. Ye bilkul suddh hai , chuchi ke doodh jaisa suddh .

Meri tani hui chuchiyon ki taraf dekhte hue usne kaha.

Mai uski baat ke jawab mein kuch nahi bol payi. Kahan ki tulna kahan kar raha tha.

Chotu ab tak tayyar ho gaya tha. ab hum mandir ki taraf chal pade. Mere hath mein pooja ki thali thi.

“Pande ji , line mein khadi sabhi aurton ke mathe par kumkum kyun laga hai ?”

Pande ji – Madam , ye mandir ka riwaz hai. aapko bhi lagega. Madam, ab is lambi line mein khade hone ki takleef jhelni padegi. Yahan sabko line mein khada rehna padta hai, humko bhi. chal chotu line mein lag ja.

Line ab mandir ki chat ke neeche thi. hum us lambi line mein lag gaye. Yahan par jagah kam thi. ek patle galiyare mein aurat aur aadmi ek hi lambi line mein khade the. wo log bahut der se line mein khade the isliye thake hue , unide se lag rahe the. mere aage chotu laga hua tha aur pandeji piche khada tha. us choti jagah mein bheedbhad ki wajah se dono se mera badan chu ja raha tha.

 
लाइन अब मंदिर की छत के नीचे थी. हम उस लंबी लाइन में लग गये. यहाँ पर जगह कम थी. एक पतले गलियारे में औरत और आदमी एक ही लंबी लाइन में खड़े थे. वो लोग बहुत देर से लाइन में खड़े थे इसलिए थके हुए , उनींदे से लग रहे थे. मेरे आगे छोटू लगा हुआ था और पांडेजी पीछे खड़ा था. उस छोटी जगह में भीड़भाड़ की वजह से दोनों से मेरा बदन छू जा रहा था.

पांडेजी मुझसे लंबा था और ठीक मेरे पीछे खड़ा था. मुझे ऐसा लगा की वो मेरे ब्लाउज में झाँकने की कोशिश कर रहा है. लाइन में लगने के दौरान मेरा पल्लू थोड़ा खिसक गया था इससे मेरी गोरी छाती का ऊपरी हिस्सा दिख रहा था. मैंने पूजा की बड़ी थाली दोनों हाथों से पकड़ रखी थी तो मैं पल्लू ठीक नही कर पाई और पांडेजी की तांकझांक को रोक ना सकी.

तभी एक पंडा एक कटोरे में कुमकुम लेकर आया और मेरे माथे में कुमकुम का टीका लगा गया.

लाइन में धक्कामुक्की हो रही थी . पांडेजी इसका फायदा उठाकर मुझे पीछे से दबा दे रहा था. मेरा पल्लू भी अब कंधे से सरक गया था और कुछ हिस्सा बाँह में आ गया था. मेरे ब्लाउज का ऊपरी हिस्सा अब पल्लू से ढका नही था. मेरी बड़ी चूचियों का ऊपरी हिस्सा पांडेजी को साफ दिखाई दे रहा था. मुझे पूरा यकीन है की उसे ये नज़ारा देखकर बहुत मज़ा आ रहा होगा.

मुझे कुछ ना कहते देख , पांडेजी की हिम्मत बढ़ गयी. पहले तो जब लाइन में धक्के लग रहे थे तब पांडेजी मुझे पीछे से दबा रहा था पर अब तो वो बिना धक्का लगे भी ऐसा कर रहा था. मेरे बड़े मुलायम नितंबों में वो अपना लंड चुभा रहा था. कुछ देर बाद वो अपनी जाँघों के ऊपरी भाग को मेरी बड़ी गांड पर ऊपर नीचे घुमाने लगा. मैं घबरा गयी और इधर उधर देखने लगी की कोई हमें देख तो नही रहा. पर उस पतले गलियारे में अगल बगल कोई ना होने से सिर्फ़ पीछे से ही किसी की नज़र पड़ सकती थी. सभी लोग दर्शन के लिए अपनी बारी आने की चिंता में थे. मेरे आगे खड़ा छोटू कोई गाना गुनगुना रहा था , उसे कोई मतलब नही था की उसके पीछे क्या चल रहा है.

पांडेजी – मैडम, आज बहुत भीड़ है. दर्शन में समय लगेगा.

“कर ही क्या सकते हैं. कम से कम धूप में तो नही खड़ा होना पड़ रहा है. यहाँ गलियारे में कुछ तो राहत है.”

पांडेजी – हाँ मैडम ये तो है.

लाइन बहुत धीरे धीरे आगे खिसक रही थी. और अब हम जहाँ पर खड़े थे वहाँ पतले गलियारे में दोनों तरफ दीवार होने से रोशनी कम थी और लाइट का भी कोई इंतज़ाम नही था. पांडेजी ने इसका फायदा उठाने में कोई देर नही लगाई. पांडेजी का चेहरा मेरे कंधे के पास था मेरे बालों से लगभग चिपका हुआ. उसकी साँसें मुझे अपने कान के पास महसूस हो रही थी. खुशकिस्मती से मेरे ब्लाउज की पीठ में गहरा कट नही था इससे मेरी पीठ ज़्यादा एक्सपोज़ नही हो रही थी. एक पल को मुझे लगा की पांडेजी की ठुड्डी मेरे कंधे पर छू रही है. उसी समय छोटू ने भी मुझे आगे से धक्का दिया. मुझे अपनी थाली गिरने से बचाने के लिए थोड़ी ऊपर उठानी पड़ी.

छोटू – सॉरी मैडम, आगे से धक्का लग रहा है.

“कोई बात नही. अब मुझे इसकी कुछ आदत हो गयी है.”

अब छोटू मुझे पीछे को दबाने लगा और उन दोनों के बीच मेरी हालत सैंडविच जैसी हो गयी. फिर पांडेजी ने मेरे सुडौल नितंबों पर हाथ रख दिया. उसने शायद मेरा रिएक्शन देखने के लिए कुछ पल तक अपने हाथ को बिना हिलाए वहीं पर रखा. औरत की स्वाभाविक शरम से मैंने थोड़ा खिसकने की कोशिश की पर आगे से छोटू पीछे को दबा रहा था तो मेरे लिए खिसकने को जगह ही नही थी. कुछ ही पल बाद पांडेजी के हाथ की पकड़ मजबूत हो गयी. वो मेरे नितंबों की सुडौलता और उनकी गोलाई का अंदाज़ा करने लगा. मेरी साड़ी के बाहर से ही उसको मेरे नितंबों की गोलाई का अंदाज़ा हो रहा था. उसकी अँगुलियाँ मेरे नितंबों पर घूमने लगी और जब भी पीछे से धक्का आता तो वो नितंबों को हाथों से दबा देता.

अचानक छोटू मेरी तरफ मुड़ा और फुसफुसाया.

छोटू – मैडम, ये जो आदमी मेरे आगे खड़ा है , इससे पसीने की बहुत बदबू आ रही है. मेरा मुँह इसकी कांख के पास पहुँच रहा है . मुझसे अब सहन नही हो रहा.

मैं उसकी बात पर मुस्कुरायी और उसको दिलासा दी.

“ठीक है. तुम ऐसा करो मेरी तरफ मुँह कर लो और ऐसे ही खड़े रहो. इससे तुम्हें उसके पसीने की बदबू नही आएगी.”

छोटू मेरी बात मान गया और मेरी तरफ मुँह करके खड़ा हो गया. पर इससे मेरे लिए परेशानी बढ़ गयी. क्यूंकी छोटू की हाइट कम थी तो उसका मुँह ठीक मेरी तनी हुई चूचियों के सामने पहुँच रहा था. पीछे से पांडेजी मुझे सांस भी नही लेने दे रहा था. अब वो दोनों हाथों से मेरे नितंबों को मसल रहा था. एक बार उसने बहुत ज़ोर से मेरे मांसल नितंबों को निचोड़ दिया. मेरे मुँह से ‘आउच’ निकल गया.

छोटू – क्या हुआ मैडम ?

“वो…..वो …..कुछ नही.. …लाइन में बहुत धक्कामुक्की हो रही है.”

छोटू ने सहमति में सर हिला दिया. उसके सर हिलाने से उसकी नाक मेरी बायीं चूची से छू गयी. अब आगे से धक्का आता तो उसकी नाक मेरी चूची पर छू जाती. मैंने हाथ ऊँचे करके पूजा की थाली पकड़ रखी थी ताकि धक्के लगने से गिरे नही तो मैं अपना बचाव भी नही कर पा रही थी. छोटू को शायद पता नही चल रहा होगा पर उसकी नाक मेरे ब्लाउज के अंदर चूची के निप्पल पर छू जा रही थी. मेरे पति ने कभी भी ऐसे अपनी नाक से मेरे निप्पल को नही दबाया था. छोटू के ऐसा करने से मैं उत्तेजित होने लगी. मेरे निप्पल एकदम से तन गये. शायद पांडेजी के नितंबों को दबाने से भी ज़्यादा मुझे छोटू की ये हरकत उत्तेजित कर दे रही थी.

पांडेजी मेरे नितंबों को दबाकर अब संतुष्ट हो गया लगता था. उसकी अँगुलियाँ साड़ी के बाहर से मेरी पैंटी के सिरों को ढूंढने लगी. मेरे नितंबों पर उसको पैंटी मिल नही रही थी क्यूंकी वो तो हमेशा की तरह सिकुड़कर बीच की दरार में आ गयी थी. पर उसकी घूमती अंगुलियों से मेरी चूत पूरी गीली हो गयी. अब पांडेजी मेरे नितंबों के बीच की दरार में अँगुलियाँ घुमा रहा था और आख़िरकार उसको पैंटी के सिरे मिल ही गये. वो दो अंगुलियों से पकड़कर पैंटी के सिरों को दरार से उठाने की कोशिश करने लगा. उसकी इस हरकत से मैं बहुत उत्तेजित हो गयी. अब ऐसे कोई मर्द अँगुलियाँ फिराएगा तो कोई भी औरत उत्तेजना महसूस करेगी ही.

मैंने शरमाकर फिर से इधर उधर देखा पर किसी को देखते हुए ना पाकर थोड़ी राहत महसूस की. वहाँ पर थोड़ी रोशनी भी कम थी तो ये भी राहत वाली बात थी. आगे से छोटू को धक्के लगे तो सहारे के लिए उसने मेरी कमर पकड़ ली. दो तीन बार ज़ोर से उसका मुँह मेरी चूचियों पर दब गया. उसने माफी मांगी और मेरी चूचियों से मुँह दूर रखने की कोशिश करने लगा. पर मैं जल्दी ही समझ गयी की ये लड़का छोटू है बहुत बदमाश, सिर्फ़ नाम का छोटू है. क्यूंकी अब अपना मुँह तो उसने दूर कर लिया पर सहारे के लिए दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़ ली , मेरे बदन को हाथों से छूने का मौका उसे मिल गया.

मुझे लगा आगे पीछे से इन दोनों की ऐसी हरकतों से जल्दी ही मुझे ओर्गास्म आ जाएगा. पर मुझे ये उत्सुकता भी हो रही थी की ये दोनों मेरे साथ किस हद तक जा सकते हैं , ख़ासकर ये छोटू.

छोटू ने ब्लाउज और साड़ी के बीच की नंगी कमर पर अपने हाथ रखे थे. उसकी अँगुलियाँ और हथेली मुझे अपने बदन पर ठंडी महसूस हो रही थी क्यूंकी उसने अभी ठंडे पानी से नहाया था. कुछ देर तक उसने अपने हाथ नही हिलाए. फिर धीरे धीरे नीचे को खिसकाने लगा. अब उसके हाथ साड़ी जहाँ पर फोल्ड करते हैं वहाँ पर पहुँच गये. मेरी नंगी त्वचा पर उसके ठंडे हाथों के स्पर्श से मैं बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी. मुझे ऐसा मन हो रहा था की थाली को फेंक दूं और छोटू का सर पकड़कर उसका मुँह अपनी चूचियों पर ज़ोर से दबा दूं.

पांडेजी को अच्छी तरह से पता था की मैं भले ही कोई रिएक्शन नही दे रही हूँ पर उसकी हरकतों से बेख़बर नही हूँ. उसकी अंगुलियों ने मेरी पैंटी के सिरों को पकड़ा , खींचा फिर खींचकर फैला दिया. अब वो इस खेल से बोर हो गया लगता था. कुछ देर तक उसके हाथ शांत रहे. मुझे लग रहा था अब ये कुछ और खेल शुरू करेगा और ठीक वैसा ही हुआ. सभी मर्दों की तरह अब वो मेरी रसीली चूचियों के पीछे पड़ गया.

हम उस पतले गलियारे में दीवार का सहारा लेकर खड़े थे. मैंने महसूस किया की पांडेजी ने अपना दायां हाथ दीवार और मेरे बीच घुसा दिया और मेरी कांख को छू रहा है. मुझे बड़ी शरम आई क्यूंकी अभी तक तो जो हुआ उसे कोई नही देख रहा था पर अब अगर पांडेजी मेरी चूचियों को छूता है तो छोटू देख लेगा क्यूंकी छोटू मेरी तरफ मुँह किए था. मुझे कुछ करना होगा. लेकिन उन दोनों मर्दों के सामने मैं एक गुड़िया साबित हुई. उन दोनों ने मुझे कोई मौका ही नही दिया और उनकी बोल्डनेस देखकर मैं अवाक रह गयी.

अब लाइन जहाँ पर खिसक गयी थी वहाँ और भी अंधेरा था जिससे उन दोनों की हिम्मत और ज़्यादा बढ़ गयी. एक तरह से उन दोनों ने मुझ पर दोहरा आक्रमण कर दिया. छोटू अपने हाथ मेरी कमर से खिसकाते हुए साड़ी के फोल्ड पर ले आया था और अब एक झटके में उसने अपना दायां हाथ मेरी नाभि के पास लाकर साड़ी के अंदर डाल दिया. उसकी इस हरकत से मैं ऐसी भौंचक्की रह गयी की मेरी आवाज़ ही बंद हो गयी. क्या हो रहा है , ये समझने तक तो छोटू ने एक झटके में अपना हाथ साड़ी के अंदर घुसा दिया. उसकी इस हरकत से मैं उछल गयी और मेरी बाँहें और भी ऊपर उठ गयी. मेरी बाँह उठने का पांडेजी ने पूरा फायदा उठाया और मेरी कांख से अपना हाथ खिसकाकर मेरी दायीं चूची को ज़ोर से दबा दिया.

“आआआअहह……..” मैं बुदबुदाई. पर मैं ज़ोर से आवाज़ नही निकाल सकती थी , मुझे अपनी आवाज़ दबानी पड़ी. क्यूंकी छोटू का हाथ मेरी साड़ी के अंदर था और पांडेजी का हाथ मेरे ब्लाउज के ऊपर था. अगर लोगों का ध्यान हमारी तरफ आकर्षित हो जाता तो मुझे बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ती.

अब तो मुझे कुछ करना ही था. भले ही वहाँ कुछ अंधेरा था पर हम अकेले तो नही थे. आगे पीछे सभी लोग थे. मुझे शरम और घबराहट महसूस हुई. मैंने दाएं हाथ में थाली पकड़ी और बाएं हाथ को अपनी नाभि के पास लायी और छोटू का हाथ साड़ी से बाहर खींचने की कोशिश करने लगी. मैं अपनी जगह पर खड़े खड़े कुलबुला रही थी और कोशिश कर रही थी की लोगों का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित ना हो. लेकिन तभी छोटू ने नीचे को एक ज़ोर का झटका दिया और मैं एक मूर्ति के जैसे जड़वत हो गयी. शर्मिंदगी से मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और मेरे दाँत भींच गये . मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी . हालाँकि बहुत कामोत्तेजित हो गयी थी.

छोटू का हाथ मेरी साड़ी में अंदर घुस गया था और अब मेरी चूत के ऊपरी हिस्से को पैंटी के ऊपर से छू रहा था. उस अंधेरे गलियारे में वो लड़का छोटू मेरे सामने खड़े होकर करीब करीब मेरा रेप कर दे रहा था. अब वो अपना हाथ मेरी पैंटी के ऊपर नीचे करने लगा. कुछ पल तक मेरी आँखें बंद रही और मेरे दाँत भिंचे रहे. उसके माहिर तरीके से हाथ घुमाने से मुझे ऐसा लगा की छोटू शायद पहले भी कुछ औरतों के साथ ऐसा कर चुका है. ज़रूर वो इस बात को जानता होगा की अगर तुम्हारा हाथ किसी औरत की चूत के पास पहुँच जाए तो फिर वो कोई बखेड़ा नही करेगी.

पांडेजी का हाथ मेरी दायीं चूची को कभी मसल रहा था , कभी दबा रहा था , कभी उसका साइज़ नापने की कोशिश कर रहा था , कभी निप्पल को ढूंढ रहा था. अब मैं पूरी तरह से कामोत्तेजित होकर गुरुजी के दिए पैड को चूतरस से भिगो रही थी.

अब मुझे अपनी आँखें खोलनी ही थी. मैं ऐसे कैसे लाइन में खड़ी रह सकती थी ये कोई मेरा बेडरूम थोड़ी था यहाँ और लोग भी तो थे. मैं कमजोर से कमजोर होते जा रही थी. थाली पर भी मेरी पकड़ कमजोर हो गयी थी , मैं तो ठीक से खड़ी भी नही हो पा रही थी. ये दो मर्द मेरी जवानी को ऑक्टोपस के जैसे जकड़े हुए थे. पांडेजी मेरी गोल गांड पर हल्के से धक्के लगा रहा था जैसे मुझे पीछे से चोद रहा हो. मैं इतनी कमज़ोर महसूस कर रही थी की विरोध करने लायक हालत में भी नही थी. और सच बताऊँ तो उन दोनों मर्दों के मेरे बदन को मसलने से मुझे जो आनंद मिल रहा था उसे मैं बयान नही कर सकती. मैं चुपचाप खड़ी रही और छोटू के हाथ का अपनी पैंटी पर छूना, पांडेजी के मेरे भारी नितंबों पर धक्के और मेरी दायीं चूची पर उसका मसलना महसूस करती रही. सहारे के लिए मैं पीछे पांडेजी के ऊपर ढल गयी थी.

छोटू अब मेरी पैंटी के कोनो से झांट के बालों को छू रहा था. आज तक मेरे पति के अलावा किसी ने वहाँ नही छुआ था. मैं कामोन्माद में तड़पने लगी. वो तो खुश-किस्मती थी की मेरे पेटीकोट का नाड़ा कस के बँधा हुआ था और अब उसका हाथ और नीचे नही जा पा रहा था क्यूंकी हथेली का अंतिम हिस्सा मोटा होता है तो वहाँ पर उसका हाथ पेटीकोट के टाइट नाड़े में अड़ गया था. मेरी चूत से बहुत रस बह रहा था और कमज़ोरी से सहारे के लिए मेरा सर पांडेजी की छाती से टिक गया था. मुझे मालूम था की मेरे ऐसे सर टिकाने से मैं उन्हें और भी मनमानी की खुली छूट दे रही हूँ पर मैं बहुत कमज़ोरी महसूस कर रही थी. पांडेजी तो इससे बहुत उत्साहित हो गया क्यूंकी उसे मालूम पड़ गया था की उनकी हरकतों से मुझे बहुत मज़ा आ रहा है.

अब पांडेजी अपने बाएं हाथ से मेरे नितंबों को दबाने लगा और दायां हाथ तो पहले से ही मेरी दायीं चूची और निप्पल को निचोड़ रहा था. मेरे निप्पल भी अब अंगूर के दाने जितने बड़े हो गये थे. पता नही पांडेजी के पीछे खड़े आदमी को ये सब दिख रहा होगा या नही. भले ही वहाँ थोड़ा अंधेरा था पर उसकी खुलेआम की गयी हरकत किसी ने देखी या नही मुझे नही मालूम. अब लाइन गलियारे के अंतिम छोर पर थी और यहाँ दिन में भी बहुत अंधेरा था. हवा आने जाने के लिए कोई खिड़की भी नही थी वहाँ पर. कुछ फीट की दूरी पर एक दरवाज़ा था जो मैं समझ गयी की मंदिर के गर्भ ग्रह का था. उसे देखकर मैंने अपनी भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश की पर मैं ऐसा ना कर सकी. मैं इतनी कामोत्तेजित हो चुकी थी की मेरा ध्यान कहीं और लग ही नही पा रहा था. सिर्फ़ अपने बदन को मसलने से मिलते आनंद पर ही मेरा ध्यान था.

छोटू जल्दी ही समझ गया की अब उसका हाथ और नीचे नही जा पा रहा तो उसने मेरी साड़ी के अंदर से हाथ बाहर निकाल लिया. ये मेरे लिए बहुत ही राहत की बात थी.

 
छोटू जल्दी ही समझ गया की अब उसका हाथ और नीचे नहीं जा पा रहा तो उसने मेरी साड़ी के अंदर से हाथ बाहर निकाल लिया. ये मेरे लिए बहुत ही राहत की बात थी. लेकिन अब उसका इरादा कुछ और था. वो थोड़ा झुका और मेरी साड़ी के निचले सिरों को पकड़कर मेरी टाँगों के ऊपर साड़ी खिसकाने लगा. मैं उसको रोक नहीं पायी क्यूंकी उस लड़के की बदमाशी से मुझे बहुत मज़ा आ रहा था. बिना समय लगाए छोटू ने मेरे घुटनों तक साड़ी ऊपर खिसका दी और एक अनुभवी मर्द की तरह मेरी मांसल जांघों को अपने हाथों से मसलने लगा.

पांडेजी भी मौके का फायदा उठाने में पीछे नहीं रहा. उसने तुरंत अपना बायां हाथ मेरी जाँघ में रख दिया और वो मेरी साड़ी को कमर तक उठाने की जल्दी में था. पांडेजी थोड़ा बायीं तरफ खिसक गया ताकि पीछे से किसी की नज़र मेरी नंगी टाँगों पर ना पड़े. बाहर से कोई देखे तो उसे मेरी साड़ी नॉर्मल दिखती पर अगर ध्यान से देखे तो मेरी साड़ी ऊपर उठी हुई दिखती. साड़ी के अंदर उन दोनों मर्दों के हाथ मेरी जांघों पर थे. मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी की ऐसी हालत में एक मंदिर में खड़ी होऊँगी और दो अंजाने मर्द मेरी टाँगों पर ऐसे हाथ फिराएँगे.

पांडेजी ने ज़बरदस्ती मेरी साड़ी और पेटीकोट को कमर तक उठा दिया. मेरी टाँगें और जाँघें पूरी नंगी हो गयीं.

“आउच…...प्लीज़ मत करो.”

मैं धीरे से बुदबुदाई ताकि कोई और ना सुन ले.

पांडेजी शायद बहुत उत्तेजित हो गया था. उसने मेरी दायीं चूची के ऊपर से अपना हाथ हटा लिया था और दोनों हाथों से मेरी साड़ी ऊपर खींचने लगा. मैं घबरा गयी क्यूंकी उन दोनों ने मुझे नीचे से नंगी कर दिया था. छोटू खुलेआम मेरे नंगे नितंबों को दबा रहा था. मेरे एक हाथ में थाली थी . मैंने बाएं हाथ से पांडेजी को रोकने की कोशिश की और अपनी साड़ी नीचे करने की कोशिश की पर वो मेरे पीछे खड़ा था और उसके लिए मेरी साड़ी को ऊपर खींचना आसान था , मेरे विरोध से उसे कुछ फ़र्क नहीं पड़ा.

“पांडेजी आप हद से बाहर जा रहे हो. अब बंद करो ये सब. लोगों के बीच में मैं ऐसे नहीं खड़ी रह सकती.”

मैं मना करने लगी पर उसने जवाब देना भी ज़रूरी नहीं समझा. उसकी ताक़त के आगे मेरा बायां हाथ क्या करता. उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी की मैं साड़ी नीचे नहीं कर पायी. मैं बिल्कुल असहाय महसूस कर रही थी. मेरी कमर तक साड़ी उठाकर उन दोनों ने मुझे नीचे से नंगी कर दिया था.

“पांडेजी रुक जाओ. अब बहुत हो गया.”

पांडेजी – चुपचाप खड़ी रहो वरना मैं तुम्हारी ये हालत सबको दिखा दूँगा.

उसकी धमकी सुनकर मैं शॉक्ड रह गयी. ऐसा लग रहा था कुछ ही पलों में ये आदमी बदल गया है.

“लेकिन….”

पांडेजी – लेकिन वेकिन कुछ नहीं मैडम. अगर तुमने शोर मचाया तो मैं यहाँ अंधेरे से निकालकर तुमको इस हालत में सबके सामने धूप में ले जाऊँगा. इसलिए चुपचाप रहो.

“लेकिन मैं गुरुजी के आश्रम से आई हूँ….”

पांडेजी – भाड़ में गया गुरुजी. अगर एक शब्द भी और बोला ना तो मैं तुम्हारी पैंटी नीचे खींच दूँगा और सबके सामने ले जाकर खड़ी कर दूँगा. समझी ?

मैं समझ नहीं पा रही थी की क्या करूँ. एक तरफ तो उनके मसलने और मुझे ऐसे नंगी करने से मैं बहुत कामोत्तेजित हो रखी थी. लेकिन अब पहली बार मैं डरी हुई भी थी. मैंने शांत रहने की कोशिश की ताकि कोई बखेड़ा ना हो और लोगों का ध्यान मेरी इस हालत पर ना जाए. एक 28 साल की शादीशुदा औरत के लिए मंदिर की लाइन में ज़बरदस्ती ऐसे अधनंगी खड़ी रहना, ये तो बहुत हो गया था, पर मैंने अपने मन को दिलासा दी और शांत रहने की कोशिश की.

लाइन बहुत धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी. पांडेजी ने मेरी साड़ी और पेटीकोट को ऊपर मोडकर कमर में घुसा दिया था. और मैं इसी हालत में अधनंगी होकर बेशर्मी से लाइन में आगे चल रही थी. ठंडी हवा मेरी नंगी टाँगों में महसूस हो रही थी. उनके ऐसे ज़बरदस्ती मुझे अधनंगी करने से मैं आगे चलते हुए शरम से मरी जा रही थी. अपमानित महसूस करके आश्रम में आने के बाद पहली बार मेरी आँखों में आँसू आ गये . इससे पहले जो भी हुआ था उसमें मर्दों के मेरे बदन को छूने का मैंने भी पूरा मज़ा लिया था. पर यहाँ पांडेजी मुझसे ज़बरदस्ती कर रहा था. और मैं असहाय महसूस कर रही थी.

छोटू की नज़रें मेरी नग्नता पर ही थी. उस अधनंगी हालत में मेरे लाइन में खड़े होने और चलने का वो मज़ा ले रहा था. छोटू और पांडेजी मेरी नंगी मांसल जांघों और नितंबों पर मनमर्ज़ी से हाथ फिरा रहे थे.

अचानक मुझे महसूस हुआ पांडेजी ने धोती से अपना लंड बाहर निकालकर मेरे नंगे नितंबों पर छुआ दिया. मैंने एकदम से चौंक कर पीछे को सर घुमाया और मेरी आँखें बड़ी होकर फैल गयीं.

“उफ…..कितना बड़ा लंड “ मैंने मन ही मन कहा.

पांडेजी का लंड बहुत बड़ा था. कोई भी औरत उसके लंड को देखकर चौंके बिना नहीं रहती. पांडेजी अपने लंड को मेरे नंगे नितंबों पर छुआने लगा. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की लाइन में हमारे आगे और पीछे लोग हैं लेकिन अंधेरे और पतले गलियारे की वजह से कोई नहीं देख पा रहा था की मेरे साथ क्या हो रहा है. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था की अब आगे मेरे साथ वो दोनों क्या करने वाले हैं. मेरे नंगे नितंबों पर गरम लंड के छूने से ही मैं गीली होने लगी और अब मेरे डर की जगह कामोत्तेजना ने ले ली.

फिर पांडेजी ने एक झटका दिया और लंड को मेरी गांड की दरार में घुसाने लगा.

“ऊऊओह…..”

मैं कामोत्तेजना से तड़पने लगी. पांडेजी मेरे कान में मुँह लगाकर मेरे जवान बदन और बड़े नितंबों के बारे में अनाप शनाप बोलने लगा. वो मेरी गांड की दरार में ज़ोर से लंड घुसा रहा था पर खुशकिस्मती से लंड अंदर नहीं जा पा रहा था क्यूंकी मैंने पैंटी पहनी हुई थी. फिर वो मेरे मुलायम नितंबों को अपने तने हुए मोटे लंड से दबाने लगा. मेरे आँखें फैल गयी और उत्तेजना से मैंने छोटू का हाथ पकड़ लिया. मेरे मुलायम नितंबों में पांडेजी का लोहे जैसा सख़्त लंड बहुत चुभ रहा था. मैं बहुत ही उत्तेजित हो गयी . वो पीछे से धक्के लगाने लगा जैसे मुझे चोद रहा हो. मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और मज़ा लेने लगी. छोटू ने मुझसे अपना हाथ छुड़ा लिया और मेरी दायीं चूची पकड़ ली. अब वो ज़ोर ज़ोर से चूची को दबाने लगा. मुझे लगा अगर ये ऐसे ही चूची दबाएगा तो मेरे ब्लाउज के सारे बटन तोड़ देगा. पांडेजी मेरे सुडौल नंगे नितंबों में हर जगह अपने लंड को चुभा रहा था , सिर्फ़ गांड के बीच की दरार पैंटी से ढकी हुई थी.

मेरा बदन भी पांडेजी के धक्कों की ताल से ताल मिलाकर हिलने लगा. मेरे होंठ खुल गये , मुझे उन पर चुंबन की इच्छा होने लगी. अब मैं हल्की सिसकारियाँ लेने लगी और उत्तेजना से छोटू को अपने बदन से भींच लिया. मेरी चूत रस से पूरी गीली हो चुकी थी. मुझे लगा इन दोनों की छेड़खानी से मुझे ओर्गास्म आने ही वाला है. मैंने छोटू को अपने बदन से चिपका लिया था . उसका मुँह मेरी तनी हुई चूचियों पर दब रहा था. अब छोटू ने मेरे बाएं हाथ को पकड़ा और अपने निक्कर पर लगा दिया. उसने झट से अपने निक्कर की ज़िप खोली और मेरा हाथ निक्कर के अंदर डाल दिया.

“आआआआअहह…….ऊऊहह…..”

मैं सिसकारियाँ ले रही थी. मैंने छोटू का तना हुआ लंड हाथ में पकड़ा हुआ था और पांडेजी का मोटा लंड मेरी मुलायम गांड को मसल रहा था. उत्तेजना से मैं छोटू के लंड को अपनी अंगुलियों से सहलाने लगी. मैं बहुत कामोत्तेजित हो गयी थी और एक रंडी की तरह व्यवहार कर रही थी. कामोन्माद से मेरा बदन तड़प रहा था और अब मेरी चूत से बहुत रस बहने लगा. पांडेजी और छोटू की कामातुर नज़रों के सामने ही मुझे ओर्गास्म आ गया और मैं लाइन में खड़े खड़े झड़ने लगी. मुँह से सिसकारियाँ ज़ोर से ना निकले इसके लिए मुझे अपना मुँह पांडेजी के चौड़े कन्धों से चिपटाना पड़ा. ये अश्लील दृश्य कुछ पल तक चलता रहा जब तक की मैं पूरी तरह झड़ नहीं गयी.

जब मेरा ओर्गास्म खत्म हो गया तो मैं होश में आई. मुझे इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी की मैं छोटू और पांडेजी से आँखें नहीं मिला पा रही थी.

पांडेजी – हाँ अब तुम एक अच्छी लड़की के जैसे व्यवहार कर रही हो.

मैंने अपने कान में पांडेजी की फुसफुसाहट सुनी. उसने फुसफुसाते हुए कुछ गंदे कमेंट्स भी किए. अब हम गर्भ गृह के पास पहुँच गये थे.

“पांडेजी अब लोग देख लेंगे. मुझे कपड़े ठीक करने दो.”

पांडेजी ने कोई जवाब नहीं दिया और मेरी कमर से साड़ी और पेटीकोट को निकालकर नीचे कर दिया. आख़िरकार अब मैं पूरी ढकी हुई थी. छोटू ने भी आगे को मुँह कर लिया और पांडेजी ने अपनी धोती ठीक कर ली. पलक झपकते ही सब कुछ नॉर्मल लग रहा था. लेकिन जो कुछ हुआ था उससे मैं अभी भी हाँफ रही थी.

कुछ ही देर में हमारी बारी आ गयी और मैं ‘गर्भ गृह ‘ के अंदर चली गयी. वो दोनों भी मेरे साथ ही अंदर घुस गये और कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया. अब हम देवता के सामने खड़े थे. मैं इतनी गिल्टी फील कर रही थी की देवता की तरफ नहीं देख पा रही थी. मेरे लिए उस हालत में पूजा करना तो नामुमकिन था.

पांडेजी – मैडम, मुझे नहीं लगता की इस हालत में तुम पूजा कर पाओगी.

“हाँ, मैं पूजा करने की हालत में नहीं हूँ.”

पांडेजी – लेकिन तुम मुझे तो कुछ करने दे सकती हो.

“क्या ?????”

पांडेजी – मैडम, तुम्हारा काम तो हो गया. लेकिन अभी मेरा नहीं हुआ है.

“क्या मतलब ?”

पांडेजी – मतलब ये की तुम्हारा ओर्गास्म तो निकल गया. मेरा क्या मैडम ?

उसकी बात से मैं अवाक रह गयी . कुछ कहती इससे पहले ही छोटू ने मेरे हाथ से पूजा की थाली ली और एक तरफ रख दी. पांडेजी भी मेरे एकदम नज़दीक़ आ गया.

“लेकिन……तुम…....तुम ऐसा नहीं कर सकते……”

पांडेजी – मैडम , अगर तुम शोर मचाओगी तो फिर मैं क्या कर सकता हूँ तुम अच्छी तरह से जानती हो.

वो फिर से मुझे रौबीली आवाज़ में धमकाने लगा.

“ लेकिन प्लीज़ समझने की कोशिश करो. मैं शादीशुदा हूँ और वैसी औरत नहीं हूँ जैसी तुम समझ रहे हो.”

पांडेजी – मैं जानता हूँ की तुम रंडी नहीं हो . इसीलिए मैं तुम्हें अपने बिस्तर पर नहीं ले गया. समझी ?

मेरी समझ में नहीं आ रहा था की अब क्या करूँ ? मैं मन ही मन गुरुजी और विकास को कोसने लगी की उन्होने मुझे यहाँ भेज दिया.

पांडेजी – हमारे पास समय नहीं है. छोटू इसे यहाँ ला.

पांडेजी देवता के पीछे जाकर वहाँ आने का इशारा कर कर रहा था , वहाँ छोटी सी जगह थी. छोटू जल्दी से मेरे पीछे आया और मेरे हाथ पकड़े और मुझे खींचते हुए देवता के पीछे ले गया. पांडेजी ने मुझे सामने से आलिंगन में कस लिया , मेरी तनी हुई चूचियाँ उसकी छाती से दब गयी. मैं अपने को छुड़ाने की कोशिश कर रही थी पर ज़्यादा कुछ नहीं कर पा रही थी , क्यूंकी छोटू ने मेरे हाथ पीछे को पकड़े हुए थे.

पांडेजी मेरे नितंबों को दोनों हाथों से पकड़कर दबा रहा था और मेरी गर्दन और कंधे में अपना चेहरा रगड़ रहा था. मुझे थोड़ी हैरानी हुई की पांडेजी ने मेरे होठों और गालों को चूमने की कोशिश नहीं की , जैसा की मर्दों का स्वभाव होता है. उसने मुझे अपने बदन से चिपकाए रखा.

मैं चिल्ला भी नहीं सकती थी क्यूंकी इससे लोगों के सामने और भी अपमानित होना पड़ता. तो मैंने उसकी छेड़खानी का आनंद उठाने की कोशिश की. मुझे अभी कुछ ही मिनट पहले बहुत तेज ओर्गास्म आया था लेकिन पांडेजी के मेरे बदन को छूने से मैं फिर से कामोत्तेजित होने लगी. मेरी उछलती हुई बड़ी चूचियाँ उसकी चौड़ी छाती में दब रही थीं और उनकी सुडौलता और गोलाई उसे महसूस हो रही होगी. मेरे हाथ पीछे छोटू ने पकड़े हुए थे पर मैं अपने पैरों को हिलाकर विरोध करने की कोशिश कर रही थी पर पांडेजी ने मुझे मजबूती से जकड़ रखा था.

थोड़ी देर तक मेरे सुडौल नितंबों और चूचियों को दबाने , मसलने और सहलाने के बाद उसने मुझे छोड़ दिया. उसके ऐसे मुझे अधूरा उत्तेजित करके छोड़ देने से मुझे हैरानी भी हुई और इरिटेशन भी हुई. लेकिन जल्दी ही मुझे उसके इरादे का पता चल गया. वो मेरे पीछे आया , अपनी धोती खोल दी और दोनों हाथों से एक झटके में मेरी साड़ी और पेटीकोट मेरी कमर तक ऊपर उठा दी. एक बार फिर से उन्होंने मुझे बेशर्मी से नीचे से नंगी कर दिया. अब छोटू ने मुझे सामने से आलिंगन कर लिया और पांडेजी ने मेरे हाथ पीछे को पकड़ लिए. अब पांडेजी अपने तने हुए मोटे लंड को मेरी गांड में चुभाने लगा. दो मर्दों ने आगे पीछे से मेरे बदन को जकड़ लिया था. मुझे कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था और मैं हांफने लगी. उन दोनों मर्दों के बीच दबने से मैं स्वाभाविक रूप से कामोत्तेजित होने लगी.

मैंने अब उन दोनों के आगे समर्पण कर दिया. छोटू मुझे कस के पकड़े हुए था और मैं भी अपनी रसीली चूचियों को उसके मुँह में दबा रही थी. वो मेरे ब्लाउज के बाहर से ही चूचियों पर दाँत गड़ा रहा था. पांडेजी पीछे से धक्के लगाए जा रहा था और उसका मोटा सख़्त लंड मेरे मुलायम नितंबों को गोद रहा था. मुझे बहुत मज़ा मिल रहा था. पर दो मिनट में ही पांडेजी चरम पर पहुँच गया और उसने मेरे नंगे नितंबों पर वीर्य छोड़ दिया.

छोटू को अपने से बड़ी उमर की जवान औरत को बिना किसी रोकटोक के आलिंगन करने में बहुत मज़ा आ रहा था. उसने मुझे सभी गुप्तांगों पर छुआ. पांडेजी ने मेरे हाथ पीछे को पकड़े हुए थे इसलिए मैं छोटू को रोक नहीं पायी. उसने मुझे ब्लाउज के ऊपर से छुआ , मेरी ब्रा के स्ट्रैप को छुआ , मेरी पैंटी के ऊपर से छुआ , पैंटी के कपड़े को बाहर को खींचकर अंदर झाँका और यहाँ तक की मेरे प्यूबिक हेयर्स (झांट के बालों ) को भी खींचा.

पांडेजी ने मेरे नितंबों पर वीर्य गिरा दिया था. फिर उसने अपनी धोती से मेरे नितंबों को पोंछ दिया. उतने समय तक मेरी साड़ी कमर तक ऊपर उठी हुई थी और मैं बेशर्मी से अधनंगी खड़ी थी. शुक्र है की ये सब देवता के पीछे हो रहा था.

आधे घंटे बाद विकास आ गया. वापसी में रास्ते भर गुस्से से मैं उससे कुछ नहीं बोली. मैं विकास से इस बात पर बहुत गुस्सा थी की मुझे पांडेजी जैसे आदमी के पास भेजा.

आश्रम में अपने कमरे में आकर मैंने देर तक नहाया और फिर लंच करने के बाद मैंने बेड में आराम किया.

 
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