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ससुर ने ऑटो में जबरदस्ती मुठ मरवाई

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Guest
दोस्तों में सुषमा एक शादीशुदा औरत हूँ और मेरी उम्र 37 साल है और में मेरे पति के साथ सूरत में रहती हूँ. हमारे परिवार में मेरा एक दस साल का मेरा बच्चा है और मेरे ससुरजी और हम दोनों है. मेरे पति की उम्र लगभग 40 साल और मेरे ससुर जी की उम्र लगभग 62 साल होगी. मेरे पति को शराब पीने की काफी आदत हो गयी है, पहले तो वे शराब नहीं पीते थे पर गलत संगत के कारण उन्होंने काफी शराब पीनी शुरू कर दी है.

आज से करीब 12 साल पहले में शादी करके मेरे पति के घर आई तो में बहुत खुश थी और मेरे पति भी मुझे हमेशा बहुत खुश रखते थे और मेरे सास, ससुर भी मेरा बहुत ध्यान रखते थे, वो मुझे हमेशा अपनी बेटी की तरह रखते थे. मेरे और मेरे पति की सेक्स लाइफ भी काफी अच्छी थी, मुझे चुदवाने का बहुत शौक है और मेरे पति मुझे रोज ही चोदते थे. उनका स्टैमिना भी काफी था. पर अब शराब के कारण उनसे कुछ नहीं हो पाता. वो दो मिनट में ही झड़ जाते है. उनके लौड़े में अब सख्ती भी नहीं रही. शराब ने उनकी शक्ति ख़तम कर दी है. पर मेरी तो सेक्स की इच्छा और भी बढ़ गयी है. पर अब मेरी उम्र भी काफी है और मैं कुछ कर भी नहीं सकती तो बस अपनी ऊँगली या खीरे मूली से ही अपना काम चला रही हूँ.

मेरे ससुर बहुत अच्छे हैं. वो पहले फौज में थे, इसलिए उनका शरीर बहुत पहलवानों जैसा तकड़ा है. वो आज भी रोज कसरत करते हैं. और उन्हें कोई गलत आदत भी नहीं है तो वो अपनी उम्र से कहीं कम लगते है. पर वो बहुत शरीफ थे और मुझे अपनी बेटी की तरह ही रखते थे. लेकिन यह बात तब बिगड़ी जब मेरी सास का देहांत हो गया और दो साल पहले से मेरे ससुरजी की नज़र मुझ पर बिगड़ी.

वो अपनी नौकरी के बाद की जिंदगी जी रहे थे, इसलिए वो पूरा दिन घर पर ही रहते थे और अब वो बार बार मुझे अपनी वासना की नज़र से देखते रहते है. कई बार छत पर सुखाने रखे कपड़ो में से वो मेरी ब्रा और पेंटी से खेलते है और वो मुझे चोरी छिपे देखते है. मैंने कई बार सोचा कि अपने पति को वो सभी बातें बता दूँ कि मेरे ससुर क्या कर रहे है? लेकिन ऐसा करने से मेरा मन नहीं माना, क्योंकि इससे बाप बेटे में झगड़ा हो जाता इसलिए में चुप ही रही. वैसे भी मेरे पति को रात में जब वे घर आते हैं तो नशे के कारण कुछ पता ही नहीं चलता।

फिर कुछ दिन वैसे ही निकल गये और दिन समय निकालने के साथ साथ मेरे ससुर की हिम्मत भी अब पहले से ज्यादा बढ़ने लगी थी. अब वो मुझे चाय बनाने के लिए कहते और जब में रसोई में चाय बना रही होती तब वो मेरी मदद करने के बहाने से आ जाते और वो मुझे कोई ना कोई बहाना बनाकर छूने लगते. दोस्तों मुझे उनकी इन हरकतों पर बड़ा गुस्सा आता था, लेकिन उन्होंने तो एक बार बिल्कुल ही हद कर दी और मेरे साथ वो सब किया जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी. एक दिन की बात है मेरे पति सुबह अपनी नौकरी पर चले गये और वो मेरे लड़के को भी अपने साथ उसके स्कूल छोड़ने के लिए लेकर चले गये.

सुबह के सात बजे थे और में नहाने के लिए बाथरूम में जा ही रही थी. मैंने मेरी ब्रा, पेंटी और टावल को बाथरूम में खूंटी पर लगा दिए थे. अब में अंदर जाकर अपने एक एक करके कपड़ो को उतारने लगी और में पूरी नंगी होकर बस नीचे बैठने ही वाली थी कि तब मेरे ससुर ने मुझे एक ज़ोर से आवाज़ लगाई काँची, क्योंकि घर में मुझे प्यार से सब लोग सुषमा की जगह काँची कहते है, काँची जल्दी आओ उनकी ज़ोर की आवाज़ से में डर गयी और डर के मारे हड़बड़ाती हुई सोचने लगी कि कुछ अशुभ ना हुआ हो तो अच्छा है.

मैंने फटाफट अंदर रखी हुई मेरी मेक्सी पहनी और बाहर आई. मैंने उस समय सिर्फ़ मेक्सी पहनी हुई थी और मैंने अंदर ब्रा या पेंटी नहीं पहनी थी. मेरे पूरे बदन पर सिर्फ़ एक मेक्सी थी और वो भी बहुत पतली थी कि उसके आरपार बड़ी आसानी से देख जाए. अब मैंने बाथरूम से बाहर निकलकर देखा तो वो मुझे कहीं नजर नहीं आए. फिर मैंने बाहर जाकर देखा कि वो गार्डन में गिरे पड़े थे.

मैं उनके पास दौड़ती चली गयी और अब में उनको उठाने की कोशिश करने लगी थी कि तभी मैंने महसूस किया कि वो मेरी मेक्सी से दिखाई देने वाले मेरे बूब्स और निप्पल को देख रहे थे और में उस वजह से बहुत शरमा गयी. फिर जैसे तैसे मैंने उनको जल्दी से उठाया और उठते समय उन्होंने अपना एक हाथ मेरी गांड पर रख दिया और तब उनको छूकर महसूस हो गया था कि मैंने अंदर पेंटी भी नहीं पहनी है.

अब मैंने उनसे पूछा कि बाबूजी क्या हुआ, आप कैसे नीचे गिर गये? तब वो बोले कि बहुरानी मेरा अचानक से पैर फिसल गया और में नीचे गिर गया, माफ़ करना बहुरानी मुझे तुम्हे इस हालत में यहाँ नहीं बुलाना चाहिए था.

मैंने उनसे कहा कि बाबूजी कोई बात नहीं है, अब आप आराम कीजिए में अभी नहाकर आती हूँ, वो मुझसे कहने लगे कि बहुरानी मैं पूरा कीचड़ में हो गया हूँ इसलिए तुम बाद में नहा लेना पहले तुम मुझे स्नान कर लेने दो. दोस्तों उनकी वो बात सुनकर में पहले तो बड़ी सोच में पड़ गयी, लेकिन फिर मुझे लगा कि वो मेरे बाबूजी जैसे ही है इसलिए मैंने उनसे कहा कि हाँ ठीक है बाबूजी आप पहले जाकर स्नान कर लो और उनके बाथरूम में घुसने के बाद थोड़ी ही देर में वो बाहर निकल गये.

अब उनके बाहर निकलने के बाद में मेक्सी में अपने गुप्तांग जो छुप नहीं रहे थे, में उनको छुपाने की कोशिश करते हुए नहाने के लिए अंदर चली गयी और फिर में अपनी धुन में और सोच में ही नहाने में लगी और जब नहाने के बाद मैंने टावल को लेने के लिए अपना हाथ बढ़ाया तो मुझे ज़ोर का झटका लगा, क्योंकि वहां पर रखा हुआ टावल नहीं था.

तभी मेरे मन में शक हुआ कि यह जरुर मेरे ससुरजी की कोई नयी चाल है. फिर मैंने सोचा कि नहीं ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि वो तो जल्दी में नहाने आए थे तो हो सकता है कि ग़लती से वो मेरा टावल अपने साथ ले गए होंगे. फिर मैंने जैसे तैसे करके अपने बदन को साफ किया और फिर में अपनी पेंटी को हाथ में लेकर पहनने ही जा रही थी कि मुझे कुछ गीला सा लगा. क्योंकि मैंने वो पैंटी पहन ली थी तो वो गीला मेरी चूत पर भी लग गया.

मैंने वापस पेंटी को उतारकर देखा तो अंदर पेंटी के भाग पर कुछ चिपचिपा सा लगा हुआ था. में तुरंत समझ गयी कि मेरे ससुरजी ने मेरी पेंटी पर मुठ मारकर अपना वीर्य निकाल दिया है और वो मेरी चूत पर भी थोड़ा थोड़ा सा लग गया था. मेरी चूत पर लगा हुआ अपने ससुर का वीर्य मुझे बहुत अजीब लग रहा था. मुझे गुस्सा भी बहुत आ रहा था और अजीब सा अनुभव भी हो रहा था. यह पहली बार था कि मेरी चूत पर मेरे पति के इलावा किसी गैर मर्द का वीर्य लगा था. मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उस पेंटी को उतारकर कचरे के डब्बे में फेंक दिया और अब मैंने अपनी ब्रा को देखा तो उन्होंने उसमे भी अपने वीर्य का पानी छोड़ा हुआ था और अब मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि मेरा मन कर रहा था कि में उनका खून कर डालूं इसलिए मैंने गुस्से में आकर अपनी ब्रा को भी कचरे के डब्बे में फेंक दिया था और अब मैंने वापस उनके वीर्य वाली मेरी चूत को साफ किया और मैंने दूसरी बार नहाना शुरू किया.

उसके बाद अब में सोच रही थी कि में बाहर जाऊँ तो कैसे? क्योंकि ना तो अब मेरे पास टावल था और ना ही ब्रा, पेंटी मुझे इस बात पर बड़ा गुस्सा आ रहा था और अब थोड़ा सा पछतावा भी हो रहा था कि मैंने क्यों जल्दबाज़ी में अपनी ब्रा और पेंटी को उतारकर कचरे में फेंक दिया? तभी मुझे ना चाहते हुए भी अपने ससुरजी को आवाज़ लगानी पड़ी.

मैंने कहा कि बाबूजी आप मेरा टावल ग़लती से लेकर चले गये है, ज़रा आप मुझे दे दीजिए, लेकिन उन्होंने अपनी तरफ से मुझे कोई भी जवाब नहीं दिया और वो कुछ मिनट के बाद बोले

"हाँ बहुरानी तुम मुझे माफ़ करना में जल्दबाज़ी में अपना टावल ले जाना भूल गया था, इसलिए में तुम्हारा टावल ले आया, ठहरो में तुम्हे दूसरा टावल दे रहा हूँ."

अब मुझे उनके ऊपर इतना गुस्सा आ रहा था, लेकिन में भला कर भी क्या सकती थी? उन्होंने मुझे आवाज़ लगाकर कहा कि यह लो बहुरानी. अब मैंने बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर हाथ बाहर निकाल दिया और उन्होंने मेरे हाथ को छूते हुए मुझे टावल दे दिया. अब मैंने वो टावल देखा तो मुझे और भी ज़्यादा गुस्सा आया, क्योंकि उन्होंने जो टावल दिया था वो एकदम छोटे आकार का था और उसमें दो जगह छोटे छोटे छेद भी थे. तो में तुरंत समझ गयी कि आज यह बूढ़ा मुझे छोड़ने वाला नहीं है. फिर मैंने उस टावल से अपना शरीर साफ किया और अपने बूब्स से उस टावल को लपेट लिया.

अब मैंने देखा कि वो टावल छोटा होने की वजह से वो मेरी चूत को ठीक तरह से नहीं ढक पा रहा था और इसलिए मैंने ना चाहते हुए भी उस टावल को थोड़ा ऊपर से नीचे किया, जिसकी वजह से अब टावल मेरे निप्पल से मतलब कि मेरे आधे बूब्स दिख रहे थे और वो दो छोटे छोटे छेद मेरे कूल्हों पर थे जिसकी वजह से मेरी गांड का गोरा रंग साफ दिख रहा था.

में जल्दी से बाहर आई और अपने कमरे में चली गयी और मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया. दोस्तों मेरे बाथरूम से बाहर निकलने और रूम में जाने के बीच तक मेरे ससुर ने मेरे गोरे जिस्म के भरपूर दर्शन कर लिए थे और तब मेरी नजर उसके पाजामे पर गई. मैंने देखा कि उसका लंड तन गया था जो उसके पाजामे से साफ नजर आ रहा था. काफी बड़ा उभार था उनके पाजामे में. लगता है साले बुढऊ का लौड़ा भी काफी बड़ा है.

पूरा दिन मुझे बस ऐसे ही लगता रहा कि जैसे मेरी चूत पर मेरे ससुर का वीर्य लगा हुआ हो. बहुत ही अजीब सा अनुभव हो रहा था. हालाँकि मैंने अपनी चूत को साफ़ कर लिया था, पर फिर भी न जाने क्यों बार बार मेरा हाथ अपनी चूत पर ही जा रहा था.

बाबूजी पर गुस्सा भी आ रहा था. रात को जब मेरे पति घर आए तो उस समय मैंने उन्हे वो सभी बातें बताने के बारे में बहुत बार सोचा, लेकिन मेरे पति शराब के नशे में थे, तो मैंने सोचा कि यदि मैंने पति को यह सब कह दिया तो बाप बेटे में झगड़ा हो जायेगा और पति शराब के नशे में कुछ मारपीट न कर बैठें तो मैं उनको वो कह नहीं सकी और मुझे रोना आ गया. फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या हुआ? मैंने उनको तब भी कुछ नहीं बताया और सुबह हम जब उठे तब मैंने देखा कि मेरे पति तैयार हो रहे थे और मैंने उनसे पूछा कि आप कहाँ जा रहे हो? तब वो बोले कि ऑफिस के काम से में तीन दिनों के लिए दिल्ली जा रहा हूँ और उनके मुहं से यह बात सुनकर मेरे ऊपर जैसे आसमान गिर गया और मैंने बड़े गुस्से से कहा कि आप मुझे अभी बता रहे हो?

उन्होंने मुझसे कहा कि डार्लिंग तुम कल रात को रोने लगी थी और मुझे इसलिए तुम्हे ज्यादा परेशान नहीं करना था इसलिए मैंने तुम्हे कल रात को नहीं बताया. अब में उनसे जिद करने लगी कि मुझे भी आपके साथ आना है आप मुझे भी अपने साथ ले चलो. तो वो मेरे ऊपर गुस्सा हो गये और बोले कि क्या बच्चो जैसे कर रही हो? घर में बाबूजी हैं और हमारा बीटा भी तो है. उनके खाने पीने का क्या होगा?

अब मैं उन्हें क्या बताती कि दिक्कत तो बाबूजी से ही है. उनका ही तो खतरा है. पर मैं चुप रही. बोलती तो बोलती भी तो क्या? पति तो कुछ जानते ही ना थे. उन्होंने मुझे सुबह सुबह एक बार अपनी बाहों में ले लिया और मुझे नंगा करके किस करने लगे, लेकिन मेरा नसीब ही फूटा हुआ था. जैसे ही उन्होंने मेरी पेंटी निकाली तो वो मुझसे बोले कि तुम अपनी चूत तो साफ रखा करो, तुम्हे पता है कि मुझे बालों वाली चूत को चोदना अच्छा नहीं लगता. फिर मैंने उनसे कहा कि आज आप बार ऐसे ही कर लो में अगली बार से साफ रखूँगी, उन्होंने कहा कि नहीं और फिर उन्होंने अपना लंड मेरे मुहं में दे दिया और वो मेरे मुहं को धक्के देकर चोदने लगे. उनका लौड़ा तो पूरा टाइट खड़ा होता भी नहीं था आजकल।

कुछ देर बाद उनका सारा वीर्य मेरे मुहं में भर गया. फिर मैंने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए और उन्हे छोड़ने के लिए में बस स्टेंड तक उनके साथ चली गयी, दोस्तों मैं कुछ देर बाद वापस आ गई और अब मैं और मेरे ससुरजी घर में एकदम अकेले थे. मुझे उनसे बहुत डर लग रहा था. कि यह ठरकी बुड्ढा कहीं मेरी जबरदस्ती चुदाई ही न कर दे. पर मैं कर भी क्या सकती थी,

फिर में वापस नहाने चली गयी और मैंने पहले से ही देख लिया था कि मेरी ब्रा, पेंटी और टावल सब बराबर है या नहीं है और नहाने के बाद मैंने खाना पकाया और उसके बाद दोपहर के समय मैंने मेरे ससुरजी ने साथ में खाना खाया.

मैंने उनको कहा कि बाबूजी में अब सोने जा रही हूँ तो उन्होंने कहा कि हाँ ठीक है बहुरानी. दोस्तों रात को ज़्यादा रोने की वजह से मुझे नींद ठीक तरह से नहीं आई थी इसलिए दोपहर को कुछ देर लेटते ही मेरी आँख लग गई और मेरा लड़का स्कूल से आकर बाहर खेलने चला गया था.

तभी थोड़ी देर के बाद मुझे मेरे रूम के दरवाज़े पर किसी के खटखटाने की आवाज़ आई जिसको सुनकर में उठी और मैंने अपने आपको देखा तो गहरी नींद में मेरी साड़ी कमर तक आ गई थी और मेरी पेंटी दिख रही थी मेरी साड़ी का पल्लू नीचे फिसल गया था. और मेरे मुम्मे भी छोटे से ब्लाउज में से बाहर निकल रहे थे. बाबूजी के लिए तो पूरी जन्नत ही थी शायद. बाबूजी कमरे के दरवाजे को खटकटा तो रहे थे, पर दरवाजा अंदर से कुण्डी लगा हुआ नहीं था, तो उन्हें बाहर से ही मेरी जवानी के दर्शन हो रहे थे. बाबूजी भी ना जाने कब से खड़े मेरे अंगों और शरीर का नजारा कर रहे थे.

मैंने जल्दी से अपने कपड़े ठीक किए और अपने कमरे का दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर दरवाजे पर ससुरजी खड़े हुए थे और मैंने कहा कि आप तो उन्होंने मुझे चाय देते हुए कहा कि बहुरानी तुम आज कुछ ज़्यादा ही देर सोई हुई थी.

फिर मैंने सोचा कि आज में ही अपने आप चाय बना लूँ तो मैंने चाय बनाकर मैं पी चुका हूँ और यह तुम्हारे लिए है और मैंने चिंटू को भी दूध पिला दिया है. अब में मन ही मन में सोचने लगी कि क्या यह वही मेरे ससुर है जो पिछले दिन अपने लंड का पानी मेरी पेंटी पर डाल गये थे और आज मेरे लिए चाय बनाकर लाए है और मैंने सोचा कि आदमी कितना जल्दी रंग बदल लेता है?

अब मैंने वो चाय पीकर खत्म कि और में अपने काम में लग गयी,

दिन ऐसे ही निकल गया. मैं घर में काम कर रही थी और ससुर जी मुझ इधर उधर घूम रही अपनी बहु के गदराये शरीर को देख देख कर आँखें सेंक रहे थे.

मैंने घर का काम करने के कारण मैक्सी पहन राखी थी, ताकि थोड़ा आरामदायक रहूँ पर उसका कपडा थोड़ा पतला था तो ससुर जी को मेरे शरीर के कटाव दिखाई दे रहे थे. मैंने सोचा की मैक्सी बदल कर मोटे कपडे की पहन लूँ पर एक तो गर्मी थी और पता नहीं क्यों एक मर्द की अपने शरीर पर घुमती नजरें मुझे भी कुछ कुछ रोमांच दे रही थी, अंदर ही अंदर कहीं मुझे भी अच्छा लग रहा था. शायद शराबी पति से अपनी सेक्स जरूरतें पूरी न हो पाने के कारण मेरी भी सेक्स भूख पूरी नहीं हो रही थी, या शायद हर औरत को अच्छा लगता ही है जब कोई मर्द उस पर आकर्षित होता है. अब चाहे वो थे मेरे अपने ही ससुर पर थे तो एक मर्द ही, और मर्द भी कैसे कि जैसे कोई पहलवान जवान हो. मेरे पति से कहीं कड़ियल गबरू और मजबूत. तो कहीं न कहीं मुझे इतना बुरा भी नहीं लग रहा था. काश वे मेरे ससुर की जगह कोई और मर्द होते तो मैं भी आगे बढ़ कर उन्हें अपना जिस्म दिखाती, पर खैर जो है सो है,

वे वैसे तो ड्राइंग रूम में बैठे टीवी देखने का बहाना कर रहे थे, पर थोड़ी देर बाद किसी न किसी बहाने से वे किचन में मेरे पास आते और किसी बहाने से मुझे छूने की कोशिश करते.

हम दोनों ससुर बहु के बीच यह आँख मिचौली का खेल चल रहा था.

न चाहते हुए भी मैं अंदर कहीं आनंदित ही हो रही थी,

थोड़ी देर में आसमान में बादल आ गए. ऐसा लगता था कि कहीं बारिश न आ जाये. जब बादल गरजे तो मुझे एकदम से ध्यान आया कि ऊपर छत पर कपडे सूखने डाले हुए है,

मैंने बाबूजी को आवाज दे कर कहा

"बाबूजी! बारिश आने वाली लगता है. ऊपर छत पर कपडे सूख रहे हैं. उन्हें ले आएं, कहीं भीग न जाएँ."

बाबूजी उठ कर छत पर चले गए. जब वे गए तो मुझे एकदम ध्यान आया कि ऊपर कपड़ों में मेरे ब्रा पैंटी भी सूख रहे हैं.

हे भगवान, अब मैं क्या करू? बाबूजी तो पहले ही लौड़ा आकड़ाये घूम रहे हैं, अब उनको ही मैंने कपडे उतारने भेज दिया.

पर अब हो भी क्या सकता था. थोड़ी ही देर में बाबूजी कपडे उतार कर नीचे ले आये.

मैं तो सोच ही रही थी कि अब बाबूजी कुछ न कुछ शरारत तो करेंगे.

तभी बाबूजी कपडे लिए हुए मेरे पास किचन में आये, उनके हाथ में मेरी पैंटी थी. पैंटी भी लेस वाली और काफी सेक्सी डिज़ाइन की थी,

बाबूजी ने उसे पकड़ा हुआ था और उनकी उँगलियाँ पैंटी में जहाँ मेरी चूत होती है उस स्थान पर मसल रही थी जैसे वे मेरी पैंटी नहीं बल्कि मेरी चूत को ही मसल रहे हों.

बाबूजी को पैंटी मसलते देख कर मेरे आँखें शर्म से झुक गयीं. वो मुझे पैंटी दिखाते हुए बोले

"सुषमा! लगता है अपने छत पर किसी पडोसी के भी कपडे गिर गए हैं. यह कपडे (अभी वो भी इतने खुले न थे तो पैंटी न बोल कर कपडे शब्द ही बोल रहे थे) किसके है?"

यह बोलते हुए उन्होंने मेरी पैंटी मेरी सामने कर दी.

मैं तो शर्म से पानी पानी हो गयी. शर्माते हुए बोली

"मेरी ही हैं बाबूजी."

बाबूजी उसी तरह पैंटी को मसलते बोले

"अरे नहीं बहु. ध्यान से देखो। यह कच्छी तुम्हारी कैसे हो सकती है. यह तो बहुत छोटी सी है, तुम्हारे नाप कैसे आएगी? मुझे लगता है कि किसी पडोसी की होगी. ध्यान से देखो."

मैं जानती थी कि बाबूजी मुझे छेड़ रहे हैं. वरना उन्हें क्या पता नहीं कि पडोसी की पैंटी उड़ कर हमारी तार पर कैसे आ जायेगी. पर मुझे भी मजा सा आ रहा था. घर में सिर्फ मेरा बेटा ही था और वो भी अपने कमरे में पढ़ रहा था.

मेरी आँखों में भी शरारत की चमक आ गयी तो ना चाहते हुए भी मैं मजा करते बोली

"बाबूजी यह मेरी ही है. आप कमरे में रख दें."

ससुर जी भी बात को आगे बढ़ाते बोले

"नहीं बहु. देखो तो यह तो बहुत छोटी सी है. तुम्हारी कमर पर कैसे आ पायेगी यह?"

मैं बोली "तो आप क्या समझते हैं कि आपकी बहु इतनी मोटी है?"

बाबूजी मेरे चूतड़ों को ध्यान से देखते हुए बोले

"बहुरानी तुम मोटी तो बिलकुल नहीं हो. तुम्हारे शरीर पर तो कहीं भी फ़ालतू मांस नहीं है. तुम बहुत सूंदर हो. पर लगता तो नहीं की यह पैंटी तुम्हारी टांगों (वो चाह कर भी जांघें या चूतड़ शब्द नहीं बोल पाए) पर चढ़ भी पायेगी. यह तो तुम्हे 10% भी ढक नहीं पाती होगी. इतनी छोटी पैंटी पहनने का क्या फायदा, जब कुछ छुपा ही नहीं पाती होगी यह.कम से कम कपडा जिस काम के लिए हो उसे तो ढक पाए तो ही उसके पहनने का कोई फायदा है. मुझे तो लगता है की इतनी छोटी कच्छी (अब पहली बार उन्होंने कच्छी शब्द बोल ही दिया) तुम्हारा कुछ भी छुपा पाती होगी. "

ससुर जी का लौड़ा तन गया था और लोहे की तरह सख्त हो गया था. बाबूजी बार बार अपने लौड़े को हाथ से सेट कर रहे थे.

अब पता नहीं उनका लण्ड अकड़ गया था इसलिए उसे ठीक कर रहे थे या फिर मुझे अपना बड़ा सा लण्ड दिखा रहे थे.

जो भी हो मैं भी तिरछी नजर से उनके लौड़े को देख रही थी और मेरी चूत में भी पानी आने लग गया था और वो भी बहुत गीली हो गयी थी,

मन तो मेरा भी कर रहा था कि मैं अपनी चूत में ऊँगली कर लूँ या कम से कम मैं अपनी चूत को मैक्सी के कपडे के ऊपर से हे रगड़ कर साफ़ कर लू पर ससुर जी पास ही खड़े थे तो कुछ नहीं कर सकती थी,

अब बातचीत काफी सेक्सी हो चली थी. पैंटी से कच्छी जैसे शब्द और कुछ भी छुपा पाने जैसे शब्द से मैंने सोचा कि बात कहीं हद से आगे न बढ़ जाये तो बाबूजी को बोली.

"बाबूजी! यह कपडे मेरे ही हैं, आप इन्हे कमरे में रख दें. मुझे काम करना है. आप टीवी देखिये जा कर."

बाबूजी समझ गए कि मैं अभी शर्मा रही हूँ, तो उन्होंने भी बात को आगे ना बढ़ाते हुए फिर से एक बार मेरे चूतड़ों की तरफ देखा ।

अभी मैं सोच ही रही थी की बात ख़त्म हुई, कि बाबूजी ने कपड़ों के ढेर में से मेरी ब्रा निकाली और उसी तरह उसके मुम्मे डालने वाले कप में उँगलियाँ मसलते हुए बोले

"सुषमा बेटी! दिल तो नहीं मानता पर चलो मान लेते हैं कि वो कच्छी तुम्हारी ही है, किसी तरह तुम खींच खाँच कर उसे अपनी टांगो से ऊपर चढ़ा भी लेती होगी और जो थोड़ा बहुत वो ढक सकती है, ढक लेती होगी. पर अब यह मत कह देना की यह ब्रा भी तुम्हारी ही है. यह तो इतनी छोटी लग रही है कि तुम्हारे नाप आ ही नहीं सकती. यह तो जरूर किसी पड़ोसी के उड़ कर आ गए होंगी "

यह बोलते हुए ससुर जी शरारत से मुस्कुरा रहे थे और उनकी आँखों में चमक थी. उनकी नजरें मेरे बड़े बड़े मम्मों पर थी. और में शर्म से जमीन में गढ़ी जा रही थी.

मैं बोलती तो बोलती भी क्या. पर जवाब तो देना ही था. तो बोली

"नहीं बाबूजी यह ब्रा भी मेरी ही है. किसी और की नहीं. आप प्लीज इसे रख दीजिये."

बाबूजी फिर मेरे आगे ब्रा को लहराते बोले

"पर बहु. यह ब्रा तो मेरे हिसाब से तुम्हारे नाप से बहुत छोटी है. तुम ध्यान से देखो तुम्हारी ही है क्या?"

यानि अब बाबूजी नजरों से मेरा "नाप" चेक कर रहे थे. और जो कह रहे थे उसका मतलब था कि मेरे मम्मे मोटे और बड़े हैं.

मैं क्या बोलती. मुंह नीचे किये बोली

"बाबूजी! आप भी क्या बात ले कर बैठ गए. मैंने बोल तो दिया कि मेरे हैं सारे कपडे. आप इन्हे रख दीजिये और मुझे काम करने दें."

शायद बाबूजी को लगा की बात कुछ ज्यादा खिंच रही है और मैं नाराज न हो जॉन और बात बनने की बजाए बिगड़ न जाये तो बाहर की तरफ चल पड़े, पर चलते चलते बोले

"क्या अजीब हैं आजकल की लड़कियां भी (अब मैं 12 साल पुरानी शादीशुदा औरत थी लड़की थोड़े ही थी) न जाने कैसे इतने छोटे कपडे पहन लेती हैं कि दोनों कप को मिला कर मुश्किल से एक अंदर आ सके."

सीधा मतलब था कि मेरे मम्मे बड़े थे. मैं चुप ही रही. मैं समज रही थी, कि कुछ बोला तो बाबूजी फिर कुछ और कह देंगे.

बाबूजी ने भी मुझे चुप देखा तो चले गए.

मैंने भी चैन की सांस ली. यह पहली बार था कि बाबूजी ने जब मुझे छेड़ा तो मैंने भी उन्हें आगे से शरारत भरा ही उत्तर दिया था.

बाबूजी भी खुश लग रहे थे. उन्हें लग रहा था कि अब उनकी बहु भी रिस्पॉन्स दे रही है.

वो जा कर ड्राइंग रूम में टीवी के आगे बैठ गए.

ऐसे ही कुछ टाइम निकल गया. फिर शाम को हमने खाना खाया और बाबूजी टीवी देखने बैठ गए.

मेरा बेटा भी साथ में बैठ गया. बाबूजी ने मुझे पुकारा

"सुषमा! आओ तुम भी हमारे पास बैठ कर टीवी देख लो. बड़ा अच्छा सीरियल आ रहा है."

मेरे बेटे ने भी आने को कहा पर मैं तो जानती थी कि यदि मैं बाबूजी के पास बैठ गयी तो बाबूजी शर्तिया कुछ ना कुछ शरारत करेंगे ही, मेरे पति बाहर थे और मेरे ससुर मेरे लिए लण्ड अकड़ाये घूम रहे थे. मैं तो बस किसी तरह वक़्त निकाल रही थी इसलिए मैंने मना कर दिया. और कहा

"बाबूजी! मुझे तो नींद आ रही है, आप ही टीवी देखिये. मैं तो सोने जा रही हूँ. मैं क्या आपको दूध दे दूं."

असल में बाबूजी रात में सोने से पहले दूध पीते थे.

बाबू जी ने तुरंत बात पकड़ ली, उनके होठों पर मुस्कान थे और शायद वो मैं मेरे उनको इस तरह पूछने पर खुश थे।

वो बोले -"हाँ बहु मैं तो कब से तुम्हारा दूध पीने को तैयार हूँ. मेरा बहुत मन है दूध पीने का."

यह कहते हुए वे कमीनगी से मुस्कुरा रहे थे, अपने हाथ से अपना लौड़ा जो न जाने कब से मेरे लिए ही अकड़ कर खड़ा था को मसल रहे थे और उनकी नजरें मेरी छातियों पर ही थी. मैं समझ गयी की ससुर किस दूध को पीने की बात कर रहे हैं.

मुझे अंदर से अजीब सी अनुभूति हो रही थी. कहाँ मेरा पति था जो मुझे चोद भी नहीं पाता था अच्छी तरह और मुझ में कोई इंटरस्ट भी नहीं लेता था सिर्फ शराब में मस्त था. और यहाँ मेरे ससुर थे जिन का लण्ड मुझे देख कर ही खड़ा हो जाता था.

पर वो मेरे ससुर थे, मेरे पिता समान, मुझे उन की ऐसी हरकतें बहुत अजीब और गलत लगती थी. पर मैं करती तो करती भी क्या?

मैं बात को घुमाती हुई बोली

"बाबूजी मुझे सोने जाना है, दूध गर्म करके ला दूँ?"

बाबूजी फिर मेरी चूँचियों को देखते हुए बोले,

"बहुरानी! अगर दूध ताजा हो तो गर्म करने की जरूरत ही नहीं होती, ताजा दूध ठंडा नहीं होता, उसे तो ऐसे ही पीने में मजा आता है. और मैं तो इस तरह दूध पीता हूँ की मुझसे ज्यादा तो दूध पिलाने वाले को अच्छा लगता है."

बाबजुजी बात को बिलकुल ही साफ़ बोल रहे थे, हम दोनों ही जानते थे कि ताजा दूध तो मेरे मम्मों से ही मिल सकता है.
 
बाबूजी की सेक्सी बातें सुन कर मेरा भी मन खराब होने लगा. पर वो मेरे ससुर थे. अभी भी वो एक हाथ से अपने लौड़े को ही मसल रहे थे जैसे कोई खुजली कर रहे हों. बिलकुल बेशर्मों की तरह अपना लण्ड सेहला रहे थे मेरे सामने और उनकी आँखें मेरे मम्मों पर ही थी,

मैं बात को घुमाते और अपनी जुबान में थोड़ा गुस्सा लाते बोली।

"बाबूजी! आप क्या बात कर रही हैं. इस समय ताजा दूध कहाँ से आएगा. दूध वाला तो सुबह ही दूध लाता है."

बाबूजी बोले

"बहुरानी! तुमने दूध पूछा तो मुझे लगा कि तुम मुझे ताजा दूध पिलाने की सोच रही हो. वैसे तुम जैसा चाहो वैसा दूध पीला दो. ताजा या बासी।"

मैंने शुक्र किया की बाबूजी ने अभी कोई गलत बात नहीं बोली. इसलिए फिर पूछा

"बाबूजी आप गिलास में दूध लेंगे या कप में?"

अब यही पूछना मेरे लिए समस्या हो गयी. बाबूजी ने फिर बात को पकड़ लिया और शरारत से बोले

"सुषमा! तुम्हारी मर्जी है. जैसे तुम चाहो दूध पिला दो. मैं तो डायरेक्ट दूध वाले बर्तन पर मुंह लगा कर भी दूध पी लूँगा. तुम्हे भी अच्छा लगेगा कि कोई बर्तन भी धोना नहीं पड़ेगा, और मैं जितना दूध होगा दूध वाले बर्तन से सारा ही दूध चूस कर पी लूँगा. क्या ख्याल है."

यह सब बातें करते हुए बाबूजी अपना लौड़ा पूरी बेशर्मी से मसल रहे थे. उनकी दुध चूस कर पीने वाली दो अर्थी बातों का मैं क्या जवाब देती.

इधर मेरा बेटा जो टीवी देख रहा था, अब वो तो बच्चा था, उसको क्या मालूम उसकी माँ और दादा के बीच यह क्या बात हो रही है. हमारी बातों से उसका प्रोग्राम खराब हो रहा था तो बीच में बोला

"मम्मी! क्या शोर मचा रखा है. दूध दादाजी ने पीना है उनकी मर्जी. जैसे वो दूध पीना चाहते हैं पीला दो. आप दादाजी को किचन में ही ले जाओ और वहीँ पर उनको दूध पीला देना,यहाँ मुझे टीवी देखने दो."

यह सुन कर बाबूजी की आँखों में चमक आ गयी, उनके लण्ड ने एक जोर का झटका मारा जो मुझे उनकी धोती में से भी साफ़ दिखाई दिया. वो मुस्कुराते हुए बोले

"बहुरानी! अब तो तुम्हारे बेटे ने भी इजाजत दे दी है. तो चलें किचन में, वहीँ चल कर मैं अच्छे से ताजा दूध पी लूँगा. तुम्हे भी जरूर अच्छा लगेगा."

अब मैं क्या बोलती. बस ग़ुस्से से चुपचाप किचन में चली गयी और गिलास में दूध ला कर उनको दे दिया. बाबूजी कुछ बोलना चाहते थे पर मेरे चेहरे पास गुस्सा देख कर चुप ही रहे कि कहीं बात ही ना बिगड़ जाये.

मैं उन्हें दूध दे कर अपने कमरे में आ गयी. और कपडे बदलने लगी.

बड़ा अजीब सा लग रहा था. मैं आखिर थी तो एक औरत ही, जब भी कोई औरत देखती है कि कोई मर्द उस पर इस तरह लट्टू हो रहा है, तो चाहे वो जवान लड़की हो चाहे बूढी औरत, मन में तो उसे अच्छा लगता ही है, मैं भी अब 12 साल की ब्याहता औरत और 10 साल के बचे की माँ, एक अधेड़ औरत थी, पर मन में एक अजीब सी ख़ुशी थी कि आज भी मैं इतनी सुन्दर और आकर्षक हूँ कि मेरा अपना ससुर ही मुझ पर फ़िदा है और मुझे चोदने को कितना उत्सुक है.

मैंने बदलने के लिए अपने कपडे उतारे तो मैंने देखा कि मेरी चूचियों पर निप्पल कस गए थे और टाइट हो गए थे.

अपने आप ही मेरा हाथ अपनी चूत पर चला गया तो मैंने पाया कि मेरी चूत पूरी गीली हो गयी थी, मुझे बड़ा अजीब लगा कि मैं चाहे अपने ससुर से कोई गलत सम्बन्ध नहीं बनाना चाहती पर फिर भी उनकी दो अर्थी बातों से ही मेरी चूत में पानी आ गया है,

मैं बिस्तर पर लेट गयी और आज पहली बार अपने पति की जगह, अपने ससुर के बारे में सोचते कि वो कितने दमदार होंगे, या उनका लौड़ा कितना बड़ा होगा, यह सब सोचते सोचते ही मुझे ना जाने कब नींद आ गयी.

अगले दिन दोपहर को हम घर में बैठे थे, बाबूजी और बेटा टीवी देख रहे थे. मेरा मन उनके पास बैठने का बिलकुल नहीं था, क्योंकि बाबूजी मुझे बड़े अजीब ढंग से देखते थे और मेरे शरीर पर ही ध्यान रखते थे. मुझे यह सब ठीक नहीं लगता था. इसलिए मैं अपने कमरे में ही बैठी कुछ काम कर रही थी. थोड़ी देर बाद पता नहीं मुझे क्या हुआ कि मन कर रहा था कि मैं किसी बहाने से जा कर बाबूजी के पास बैठ जाऊँ, आखिर थी तो मैं एक औरत ही, कहीं ना कहीं मुझे भी अच्छा लगता था कि एक मर्द मेरे ऊपर इस तरह लट्टू है.

कहीं दिल में था कि बाबूजी मुझे किसी बहाने से छेड़ें और वो मुझे अंदर ही अंदर अच्छा लगता था. पर अब मैं बैठी तो अपने कमरे में थी, तो किस मुंह से खुद जा कर उनके पास बैठ जाओं. मन बाबूजी के पास जाने का हो रहा था. जब वो मुझे देखते हुए अपना मोटा सा लण्ड मसलते थे तो एक अजीब सी एहसास होता था.

तभी गली में एक आइसक्रीम वाले की आवाज आई. मेरा बेटा तो आइसक्रीम का बहुत शौकीन है. मैं भी आइसक्रीम तो खुश होकर खाती हूँ. बाबूजी को भी यह पता है. आइसक्रीमवाले की आवाज सुन कर शायद मेरे बेटे ने बाबूजी से आइसक्रीम खाने के लिए कहा. बाबूजी को भी मुझे बुलाने का बहाना मिल गया. उन्होंने मुझे जोर से आवाज दी

"सुषमा! बहुरानी आओ आइसक्रीम वाला आया है, रोहित (मेरा बेटा) भी आइसक्रीम लेने लगा है. तुम भी आओ और आइसक्रीम लेलो."

मुझे आइसक्रीम से ज्यादा ख़ुशी बाबूजी की आवाज से हुई. मैं उठ कर बहार आ गयी.

बाबूजी ने सब के लिए आइसक्रीम ली. बेटे ने कुल्फी ली और जा कर टीवी के आगे बैठ कर टीवी देखने और कुल्फी खाने लगा.

मैंने आइसक्रीम का डिब्बा लिया. बाबूजी ने मुझे कहा

"बहुरानी! यह तुम ने क्या ले लिया. मैं तो तुम्हे एक बड़ी सी चॉकोबार खिलाना चाहता हूँ. यह आइसक्रीम तो मुझे पसंद है."

चॉकोबार कहते हुए बाबूजी मेरी आंखो में आंखे डाल कर एक हाथ से अपना लौड़ा सहलाने लगे. उनका लौड़ा तो मुझे देख कर ही खड़ा होने लग गया था.

मैं समज गहि कि बाबूजी किस चॉकोबार को मुझे खिलाने की बात कर रहे थे. मैं शर्मा गयी और कुछ नहीं बोली. बाबूजी कहाँ चुप रहने वाले थे वो फिर मुझे छेड़ते हुए बोलने लगे

"सुषमा! मैं तो तुम्हे बड़ा सा चॉकोबार चूसने को देना चाहता हूँ. औरतों को कुल्फी या आइसक्रीम की बजाए चॉकोबार ज्यादा अच्छा लगता है. तुम्हारी सास को भी मैं रोज चॉकोबार ही चूसने को देता था और वो रोज बड़े मजे से चॉकोबार लेती थी. एक दिन भी वो इसके बिना नहीं रहती थी. तुम्हारी सास तो जब तक पूरी चॉकोबार को मुंह में पूरा अंदर ले कर न चूस ले उसे तो नींद ही नहीं आती थी. तुम यह आइसक्रीम छोडो और एक बार चॉकोबार चूस कर देखो."

उनकी आँखों की शरारत और एक हाथ से लण्ड सहलाने से यह तो साफ़ था कि बाबूजी मुझे अपनी चोकोबार चुसवाना चाहते हैं. बाबूजी की दो अर्थी बातों से मुझे भी कुछ कुछ अच्छा लगने लगा था. साला बुड्ढा जरा सा मौका मिलते ही दो अर्थी बातें शुरू कर देता है और उसका लण्ड भी देखो कैसे एकदम से अकड़ जाता है. मेरे शराबी पति का लौड़ा तो कितनी देर लगा कर खड़ा होता था.

पर मैं बाबूजी की बातों का क्या जवाब देती. पर थोड़ा शरारत करते और मजा लेते मैं बोली

"बाबूजी! आपका बेटा (मेरा पति) तो मुझे कभी चॉकोबार नहीं देता. कभीकभार मुझे चॉकोबार चूसने को देते हैं पर छोटी सी चॉकोबार 2 मिनट में ही मुंह में पिघल जाती है. बिलकुल मजा नहीं आता. सासुमां को क्या आइसक्रीम पसंद नहीं थी?, जो आप उसे चॉकोबार देते थे?"

अब मैं भी उनकी दो अर्थी बातों में आनंद ले रही थी, मेरी आँखों में जो शरारत की एक चमक थी उस से बाबूजी समज गए कि मैं मजे ले रही हूँ और नाराज नहीं हूँ. उधर मेरा बेटा तो अपनी कुल्फी और टीवी में ही मस्त था. तो वो भी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले

"अरे बेटी! तुम्हारी सास को तो चॉकोबार ही अच्छी लगती थी. और मैं भी उसे छोटी सी नहीं बल्कि बढ़िया और कम से कम 8 इंच बड़ी और ४ इंच मोटी बड़ी सी चॉकोबार चूसने को देता था. तुम्हारी सास मजे ले ले कर चूसती थी, वो तो पूरी चॉकोबार को मुंह में ले लेती थी, इतनी मोटी चॉकोबार चूसने के लिए उसे पूरा मुंह खोलना पड़ता था. वो कम से कम 20 मिनट तक जोर जोर से चूसती थी तब कहीं चॉकोबार उसके मुंह में पिघल कर रस छोड़ती थी."

बाबूजी ने अपने लौड़े का साइज इशारे से बता दिया था. मेरे पति का लंड तो मुश्किल से 5 इंच का था और इतना मोटा भी नहीं था. मुझे बाबूजी के अपने लण्ड को सहलाने से इतना तो आईडिया था कि उनका लौड़ा मेरे पति से बड़ा है पर उनका साइज इतना बड़ा है तो मैं तो हैरान ही हो गयी, और मेरे मुंह से अपने आप निकल गया

"बाबूजी इतना बड़ा? हे राम. सासुमा कैसे मुंह में ले पाती होंगी इतनी बड़ी चॉकोबार? और 20 मिनट तक चूसती थी, उन्हें तो बहुत मजा आता होगा. आप झूठ बोल रहे हैं."

मेरे थोड़ा खुलने से बाबूजी भी खुश हो गए और बोले

"लो. मैं कोई तुमसे झूठ थोड़े ही बोलूंगा. तुम जब चाहो तब मैं तुम्हे भी चॉकोबार चुसवा दूंगा. तुम एक बार हाँ तो करो. तुम्हारी सास को चॉकोबार बहुत अच्छा लगती थी, तुम्हे भी बहुत पसंद आएगी. जब तुम्हारी सास चॉकोबार चूसती थी तो मैं आइसक्रीम चाटता था."

मैं भी अब थोड़ा खुल कर बोलने लगी थी, मैंने कहा

"आप को आइसक्रीम पसंद है? बाबूजी?"

बाबूजी मेरी आँखों में आँखें डालते और उसी तरह अपने लण्ड को खुजलाते बोले

"हाँ बहुरानी! मैं तो आइसक्रीम चाटता था. कई बार पहले तुम्हारी सास चॉकोबार चूसती और फिर मैं आइसक्रीम चाटता था और कई बार हम इकठे ही करते यानि उधर जब वो चॉकोबार चूसती तो इधर मैं आइसक्रीम चाट ता था. मैं तो सदा आइसक्रीम में पूरी जीभ घुसा कर चाटता था. आइसक्रीम चाटने का तो मजा ही तब है जब पूरी जीभ आइसक्रीम के अंदर डाल दी हो और खूब अच्छी तरह से चाट चाट कर खाया जाए. अक्सर मेरा मुंह नाक और होंठ आइसक्रीम के रस से भर जाते थे, पर मैं अच्छी तरह से ही आइसक्रीम चाट ता था. मेरे गीले मुंह को देख कर तुम्हारी सास हंसती थी पर उसे भी मेरा आइसक्रीम चाटना बहुत पसंद था. मैं तो तब तक आइसक्रीम चाटता रहता था, जब तक सारी आइसक्रीम ख़तम न हो जाये. तुम्हारा पति भी तो ऐसे ही आइसक्रीम खाता होगा ना?"

बात चीत बहुत मादक और सेक्सी हो गयी थी, मेरी चूत से पानी चू रहा था. लगता था मेरा पानी चूत से बाहर बह कर मेरी टांगों पर आ रहा था. मन कर रहा था कि अपनी चूत जोर से खुजला लू और उसमे ऊँगली डाल लूँ पर सामने ससुर जी खड़े थे.

हम दोनों ही कोई बच्चे तो थे नहीं तो दोनों को क्लियर था कि किस चॉकोबार और किस आइसक्रीम की बात हो रही है. अब सरेआम उन्होंने मुझसे मेरी चूत की चटवाई का पूछ लिया तो मैं भी अपना दुःख उन्हें बतलाते हुए बोली

"बाबूजी! क्या बताऊँ आपके बेटे को तो आइसक्रीम चाटना बिलकुल भी पसंद नहीं है. जैसे आप बता रहे हैं उन्होंने तो कभी भी इस तरह आइसक्रीम नहीं खाई."

बाबूजी गुस्सा दिखाते बोले

"पागल है साला. आइसक्रीम चाटना तो उसका फर्ज बनता है, उसकी जगह मैं होता तो रोज तुम्हे चॉकोबार चूसने को देता और रोज जी भर के आइसक्रीम चाटता। कोई बात नहीं तुम चाहो तो मैं तुम्हारी यह कमी पूरी कर दूंगा."

बाबूजी ने अब खुले रूप से मुझे लण्ड चूसने और अपनी चूत चटवाने का इशारा कर दिया था.

मुझे बहुत शर्म आ रही थी, मैं बोलती तो बोलती भी क्या?

बस चुप चाप मुस्कुराती खड़ी रही और बाबूजी के हाथ से चॉकोबार पकड़ कर अपने मुंह में डाल कर चूसने लगी और अपने हाथ की आइसक्रीम का डिब्बा उन्हें दे दिया. बाबूजी ने जब मुझे चॉकोबार चूसते देखा तो उनके चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गयी. वो समझ गए की इशारे से उनकी बहु ने उनकी चॉकोबार (लौड़ा) चूसने की हामी भर ली है,

बाबूजी ने भी तुरंत आइसक्रीम का डिब्बा खोला और अपनी पूरी जीभ उसमे घुसेड़ दी और जीभ को आइसक्रीम में घुमा घुमा कर चाटने लगे. आइसक्रीम चाटते हुए उनकी आँखें मेरे चेहरे पर ही टिकीं थी, मानो वो मुझे समझा रहे हो कि इस तरह वो मेरी चूत में पूरी जीभ डाल कर उसे चाटना चाहते हैं.

शर्म से मेरा मुंह लाल हो गया था. मुझ से अब बाबूजी के सामने खड़ा नहीं हुआ जा रहा था. मैं चुपचाप चॉकोबार चूसती हुई और बाबूजी को देख कर मुस्कुराती हुई अपने कमरे की ओर भाग गयी और दौड़ कर कमरे में चली गयी और अंदर जा कर कमरा बंद कर लिया..

मेरा सारा बदन कामुकता से कांप रहा था. मेरी सांस धौकनी जैसे चल रही थी, काफी देर बैठ कर मैंने अपने आप को संयत किया और लेट गयी.

सारी रात मुझे बाबूजी के ही सपने आते रहे.

बस इसी तरह छेड़खानी में टाइम निकल रहा था. मैं कोई वासना की मारी औरत तो नहीं थी जो चुदवाने को मरी जा रही होऊं पर बाबूजी से छेड़छाड़ करने में मुझे भी मजा आ रहा था. कि किस तरह मेरे ससुर मुझे पटाने में लगे हुए हैं. एक औरत होने के नाते उनकी हरकतों से मेरे मन में भी कुछ कुछ हो रहा था. ना चाहते हुए भी मैं बाबूजी से खुद भी कुछ छेड़छाड़ करने लगी थी,

वैसे भी मेरे पति को गए कई दिन हो गए थे. और मुझे भी सेक्स की जरूरत तो महसूस हो ही रही थी.

फिर शाम को बाबूजी सोफे पर बैठे थे और वो सोफा किचन के दरवाजे के बिल्कुल सामने ही थे। और मैं रसोई में खाना बना रही थी, मुझे पता था कि बाबूजी सामने हैं, तो मैं जान बुज कर अपनी गांड मटका रही थी। मुझे मालूम ही था कि बाबूजी का ध्यान टीवी पर कम और किचन में काम करती उन की सूंदर जवान बहु पर ज्यादा होगा. इसलिए उन को छेड़ने के लिए मैं भी अपनी गांड को मटका रही

आज मैंने एक टाइट सी सलवार कमीज को पहना हुआ था. उस के नीचे मैंने जानबूज कर ब्रा नहीं पहनी थी. हाँ नीचे पैंटी जरूर पहन ली थी,

(आखिर पूरा नंगा होना भी ठीक नहीं था.)

मैं चाहती तो पूरे मन से नहीं थी पर इस सब से मुझे पूरा यकीन हो रहा था की बाबूजी ने अगर अपना पटाने का काम इसी तरह मुझ पर चालू रखा तो जल्दी ही बाबूजी मेरी नंगी चूत में अपना नंगा लण्ड घुसेड़ कर चोद रहे होंगे,

आज मैंने जान बूज कर ब्रा नहीं पहनी थी ताकि बाबूजी को मेरी हिलती हुई चूचीआं ठीक से दिखाई देती रहे। और मेरी पेंडुलम की तरह हिलती हुई छाती बाबूजी को ठीक से दिखाई दे जाये और बाबूजी भी मेरे ३६ इंच के मुम्मों के खूब प्यार से दर्शन कर रहे थे.

मैं काम करते समय जान भूज कर बाबूजी की तरफ कम ही देखती थी ताकि बाबूजी को यह लगे की उनकी बहु का ध्यान तो काम पर ही है और वो प्यार से और बिना किसी डर के अपनी बहु की जवानी का चक्षु चोदन कर सकें. बाबूजी भी मेरे द्वारा दिए गए इस मौके का भरपूर लाभ उठा रहे थे और मेरी जवानी के मजे लूट रहे थे.

तो अभी भी बाबूजी सोफे पर बैठे थे और टीवी देखने का नाटक कर रहे थे पर असल में वो मेरी हिलती हुई चुचीऑ देख रहे थे और मैं भी जान भुज कर उन्हें जरूरत से ज्यादा हिला रही थी। ताकि बाबूजी को पूरा मजा आये.

घर में हम तीन बच्चा, ससुर बहु ही तो थे और मेरा बेटा तो टीवी में ही मग्न था तो मैं और बाबूजी दोनों बिना किसी डर से लगे हुए थे.

मैंने पहले तो सोचा की दाल चावल बना लेती हूँ पर फिर सोचा की यदि आटा की रोटी बनाऊ तो आटा गूंधने के बहाने से बाबूजी को अपने हिलते मम्मे दिखा सकूंगी, तो मैंने आटा गूँधना शुरू कर दिया और बहाने से ज्यादा हिलना शुरु कर दिया.

अब मेरी छाती जोर जोर से इधर उधर हिल रही थी और बिना ब्रा होने के कारण बाबूजी को पूरा मजा दे रही थीं. और बाबूजी भी मौके का भरपूर लाभ उठाते हुए अपनी बहु की जवानी का रसास्वादन कर रहे थे.

मुझे भी इस तरह खाना बनाने में खूब मजा आ रहा था.

बाबूजी का भी लौड़ा लोहे की तरह खड़ा हो चुका था जिसे वो अपनी लुंगी में हाथ डाल कर मसल रहे थे।

(हाँ जी आज बाबूजी ने अपना मनपसंद पजामा न पहन कर लुंगी पहनी थी, क्योंकि लुंगी में लौड़े को चुपके से अंदर हाथ डाल कर वो सहला सकते थे और किसी को पता भी नहीं लगता। )

आज दिन में दूध पिलाने वाले बातचीत के बाद बाबूजी का होंसला भी बहुत बढ़ गया था. उन्हें मालूम हो गया था की उनकी बहु भी शायद अब इस सेक्स के खेल में पूरी तरह से शामिल ही और चुदवाने को तैयार है,

बाबूजी मुझे चोदना चाहते थे और मैं आधे मन से चुदवाने को तैयार थी ही, बस देर थी तो हमारे सामाजिक बंधनो के टूट जाने की, और मुझे लग रहा था की इस में भी अब ज्यादा देर नहीं है, खैर

काफी देर तक तो बाबूजी मेरी हिलती चूचियां देखते रहे और लुंगी के अंदर हाथ डाल कर अपना लौड़ा सहलाते रहे. पर कितनी देर ऐसा कर सकते थे.

आखिर बाबूजी के सबर का बंद टूट ही गया और वो उठ कर मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए, इतने पास थे कि मुझे उनकी साँसे अपनी गर्दन पर महसूस हो रही थी, मैं एक बार तो डर ही गयी पर चुप रही कि देखते हैं कि बाबूजी क्या करते हैं और कितनी हिम्मत तक जा सकते हैं,

मैंने कुछ नहीं कहा और बाबूजी बोले कि आज मेरी बहुरानी क्या बना रही है।

तो मैंने कहा कि दाल रोटी जो कि मेरे बाबूजी के पसंदीदा हैं।

तो वो खुश हो गए कि वाह मेरी पसंदीदा चीज़ बन रही है।

तो मैने कहा कि हां जी. अब बाबूजी को भी लगा कि मैं उनसे बात करने में झिझक नहीं रही और उनके इतना पास खड़े होने से भी नाराज नहीं हूँ तो उन्होंने भी थोड़ा होंसला किया और मेरी पीठ के पास खिसक आये. और मुझे फिर भी कोई इतराज करते न देख कर उन्होंने धीरे से अपना अकड़ा हुआ लौड़ा मेरी पीठ से सटा दिया. उनके लण्ड का गर्म गर्म एहसास अपनी पीठ पर करते ही मेरी तो जैसे सांस ही रुक गयी. पर मैंने भी पूरी हिम्मत करी और उसी तरह खड़ी खड़ी आता गूंधती रही,

बाबूजी ने जब अपने लंड का थोड़ा सा दबाव मेरी पीठ पर डाला लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा तो उनकी हिम्मत और बढ़ गई और उन्होंने अपने लौड़े का पूरा दबाब मेरी गांड पर डाल दिया.

बाबूजी का लण्ड लोहे की तरह सख्त हो चूका था. और बाबूजी ने थोड़ा हिल कर लौड़े को चूतड़ों से अब मेरी गांड की दरार में घुसा दिया और एक धक्का दे कर लौड़े को गांड की दरार में फंसा दिया.

अब घर में हम दोनों ससुर बहु ही तो थे, तो इतनी भी क्या जल्दी थी, कोई आने वाला तो था नहीं, तो मैंने सोचा की थोड़ा छेड़खानी चलने देती हूँ.

तो मैंने थोड़े गुस्से से कहा कि बाबूजी आप क्या कर रहे हैं तो उन्होंने डर कर एक दम से अपनी कमर पीछे कर ली और लौड़ा मेरी गांड में से निकल गया.

तो मैं डर गई कि कहीं वो चले ही ना जाएं, इसके लिए मैंने अपनी गांड को थोड़ा पीछे कर दिया ताकि उनको ये एहसास हो सके कि ये मेरा नकली गुस्सा है।

बाबूजी समझ गए और उन्होंने अपने लंड का दबाव फिर से और बड़ा दिया मेरी गांड पर,

मुझे तो मजा आ रहा था और मैं तो खुद तैयार थी मजे करने को बस नखरे दिखा रही थी।

फिर जब मैंने कुछ नहीं कहा उन्हें तो बाबूजी मेरे से चिपक गए और अपने हाथ मेरी कमर के चारों ओर डाल कर मुझे पकड़ लिया.

और मेरी गर्दन पर चुंबन करने लगे। मुझे परम आनंद आ रहा था।

मैंने उनसे कहा कि आआह्ह्ह... बाबूजी लगता है आपको सासु माँ की बहुत याद आ रही है तो वो बोले कि तुम्हें कैसे पता तो मैंने कहा कि तभी आप मुझे तंग कर रहे हो तो वो बोले कि नहीं मुझे तो मेरी बहु तुमपे प्यार आ रहा है

मैं:- हाँ मैं जानती हूँ यह आपका प्यार। आप अपनी बहु को कितना प्यार करते हैं मुझे मालूम है,

पाप:- अरे बहुरानी ऐसा क्यों बोलती हो. मैं तो तुमसे बहुत प्यार करता हूँ. तुम्हे थोड़े ही न भूल सकता हूँ. तू तो मुझे बहुत प्यारी है,

कहते हुए बाबूजी ने मुझे कन्धों से पकड़ लिया और मेरी गर्दन पर चूमने लगे.

मुझे बहुत आनंद आ रहा था.

बाबूजी - हाय

मैं- बाबूजी क्या हुआ?

(अस्ल में मैंने अपने चूतड़ थोड़ा पीछे को धकेल दिए थे तो बाबूजी का लण्ड मेरी गांड में और अंदर घुस गया तो बाबूजी के मुंह से आनद से आह निकल गयी थी,)

बाबूजी - अच्छा खाना में आज क्या बना रही हो?

मैं - रोटी दाल सब्जी दही आदि

बाबूजी - किस चीज़ की सब्जी??

मैं - बैगन की। आप को पसंद है??

बाबूजी - हाँ. क्या तुम्हे बैंगन पसंद हैं?

मैं - हाँ मुझे तो बहुत अच्छे लगते हैं.

बाबूजी - बैगन बहुत पसंद है और इसके इलावा और क्या क्या पसंद है?

मैं - बाबूजी मुझे खीरा भी पसंद है,

बाबूजी - कैसा बैगन और खीरा पसंद है? बैंगन लम्बा चाहिए या मोटे वाला गोल?

मैं - बाबूजी खीरा तो मुझे लगभग ७-८ इंच लम्बा और लगभग ३-४ इंच मोटा पसंद है, पर मुझे गोल वाला बैंगन पसंद नहीं। बैंगन भी मुझे लम्बा ही चाहिए. ज्यादा मोटा और गोल बैंगन मुझे सूट नहीं करता.

बाबूजी - बैंगन अधिकतम कितने साइज़ तक ले लेती हो?

मैं -आप क्या बात कर रहे हो, क्या मतलब की मैं ले लेती हूँ. सब्जी बना के खा लेती हूँ बस।

(बाबूजी ने दो अर्थी बात करी थी, ले लेती का मतलब चूत में लेना भी हो सकता था और बाजार से ले लेना भी, पर यह बात करते हुए बाबूजी शरारत से मुस्कुरा रहे थे तो उनका मतलब साफ़ ही था. मैं भी अब इस दो अर्थी बात में मजा ले रही थी,)

बाबूजी - बताओ ना प्लीज

मैं - नहीं

बाबूजी - मत बताओ जाओ

मैं - नाराज़ मत होइए।

बाबूजी - तो बताओ

मैं - बड़ी साइज़ का बैंगन और खीरा मुझे पसंद है,

बाबूजी - कितना

मैं - 7 इंच तक लम्बा चल जाता है,

बाबूजी - और मोटा?

मैं-3 इंच, इस से छोटा हो तो मजा नहीं आता.

बाबूजी :- मजा नहीं आता क्या मतलब?

मैं :- (शरारत से मुस्कुराती हुई) मतलब सब्ज़ी अच्छी नहीं बनती, आप क्या समझ रहे हैं?

बाबूजी:- अच्छा तुम्हे सब्जी सूखी पसंद है या गीली?

मैं:- मुझे तो दोनों तरह की ठीक लगती है, आपको कैसी सब्जी पसंद है?

बाबूजी:- मुझे तो रसे वाली और गीली गीली ही चीज पसंद है (अब वो सब्जी ना बोल कर चीज बोल रहे थे जो दो अर्थी शब्द था). जब तक चीज गीली न हो जाये मुझे मजा नहीं आता. कई बार तो मैं सूखी होने पर उसे अपने मुंह से चूस कर गीली कर देता हूँ. गीली को तो चाट चाट कर खाने का मजा ही अलग है, तुम्हारा क्या ख्याल है बहु?

(बाबूजी अब खुल कर दो अर्थी बातें कर रहे थे और उनका लौड़ा भी कसता जा रहा था जिसे वो बार बार मेरी चूतड़ों में घुसाने की कोशिश कर रहे थे.)

मैं :- चलो छोडो बाबूजी अब मुझे खाना बनाने दो.

बाबूजी को तो मजा आ रहा था वो चले कैसे जाते तो बात को चालू रखते हुए वो बोले

बाबूजी - (बात को घुमाते हुए) तुम्हारा पसंदीदा फल क्या है

मैं - केला और गन्ना और आपका बाबूजी?

बाबूजी - आम और तरबूज़

मैं:- मन कर रहा है क्या?

बाबूजी - आम खाने का मन कर रहा है, यदि खाने को न मिले तो चूसने में भी मुझे बड़ा मजा आता है.

मैं- अभी कहा आम मिलेगा बाबूजी

बाबूजी - आम चूसने को न सही देखने को मिल जाए तो भी चलेगा

(यह कहते हुए उनकी नजरें मेरे मोटे मोटे मम्मों पर थी, जो ब्रा न पहनी होने के कारण उन्हें बहुत अच्छे से दिखाई दे रहे थे)

मैं - वैसे आपको कैसा आम पसंद है

बाबूजी - बड़े-बड़े आम पसंद है

मैं- कचे या पक्के

बाबूजी - आंम तो जितना बड़ा हो उतना चूसने में मज़ा आता है??

मैं - बड़े साइज़ के आम या तरबूज़ संभाल लोगे बाबूजी??

बाबूजी - मौका दो फिर पता लगेगा कि कैसे निचोड़ के रस पिता हूं आमों का. तुम्हे कैसे फल पसंद है सुषमा?

अब मैं भी बहुत गर्म हो चुकी थी. तो मैंने फिर बात थोड़ा घुमा दी.

मैं - मुझे बड़ा या मोटा केला बहुत पसंद है और बड़ा या मोटा गन्ना जिसका रस पूरा भरा हो.

बाबूजी :-सुषमा! मेरा केला खाना चाहोगी,

(मैं एकदम हैरान हो गयी कि यह तो बाबूजी ने सीधा ही लण्ड खाने को बोल दिया. तो मैंने उनकी तरफ देखा हैरानी से )

बाबूजी :- मेरा मतलब है मैं यदि बाजार से केला ले आऊं तो तुम खाना चाहोगी आज रात को?

मैं:- बाबूजी आप मुझे केला दो तो सही, में तो केला खाने को बहुत उत्सुक हूँ.

इस तरह मैंने बाबूजी को साफ़ साफ़ इशारा दे दिया की मैं उनसे चुदने को तैयार हूँ. अब मैं औरत जात आखिर इस से ज्यादा और कितना खुल कर बोल सकती थी,

बाबूजी का लौड़ा मेरे यह कहते ही एकदम झटका मरने लगा.

मुझे लगा की कहीं अभी बाबूजी मुझे किचन में ही न चोद दें.

मैंने बात को घुमाते हुए फिर नाटक किया और बाबूजी को बोली।

"बाबूजी मेरे पेट पर खुजली हो रही है, मेरे हाथों में आटा लगा हुआ है, मैं अपनी पेट को खुजला नहीं सकती, आप प्लीज मेरे पेट पर थोड़ा खुजला दीजिये."

बाबूजी ने अपने हाथ मेरे कन्धों से उतार कर मेरी कमीज के अंदर आगे की तरफ से डाले और मेरे नंगे पेट पर रखे.

बाबूजी के गर्म गर्म हाथ अपने नंगे पेट पर महसूस करते ही मेरी काम अग्नि और भड़क उठी,

बाबूजी धीरे धीरे मेरे पेट को सेहला रहे थे.

हम दोनों को अच्छा लग रहा था. मैंने बाबूजी को शरमाते हुए से कहा
 
"बाबूजी खुजली थोड़ा ऊपर हो रही है, थोड़ा ऊपर कीजिये "

बाबूजी ने अपने हाथ थोड़ा ऊपर तक किये. अब उनके हाथ मेरी चूचियों से बस एक आध इंच ही दूर थे.

बाबूजी भी मेरी कमीज में देख सकते थे की मेरी चूचियों खूब हिल रही है और मैंने ब्रा नहीं पहनी,

तो बाबूजी अपना हाथ और ऊपर करने में थोड़ा झिझक रहे थे.

अब बात इतनी दूर तक आ गयी थी, तो यह तो मेरे लिए सुनहरी मौका था. मैंने सोच लिया कि जो होगा देखा जायेगा. छेड़खानी का मजा तो ले ही लेना चाहिए.

मैंने बाबूजी को फिर कहा

"अरे बाबूजी और ऊपर खुजली है,"

बाबूजी ने ज्यों ही अपने हाथ ऊपर को किये तो मेरी नंगी चूचियों बाबूजी के हाथ से टकरा गयी.

चूचियों को बाबूजी का हाथ लगते ही मैं एकदम उछल पड़ी और मेरे उछलते ही मेरी दोनों नंगी चूचियों सीधे बाबूजी की हथेलियों में आ गयी, और बाबूजी ने भी एकदम अपनेआप अपने हाथ कस लिए.

अब मेरी दोनों चूचियों बाबूजी के हाथ में थी, बाबूजी ने भी मौके का फ़ायदा उठाते हुए, मेरी चूचियों को अपनी मुठी में भर लिया।

एकदम से बाबूजी के हाथ में मेरे मम्मे आ गए तो अपने आप बाबूजी के हाथों ने मेरी मम्मों को सहला दिया. और खुदबखुद बाबूजी की उंगलिया मेरे मुम्मों के निप्पल पर आ गयी, इस से तो बाबूजी भी थोड़ा घबरा गए, क्योंकि उन्होंने जानबूझ कर तो मेरी चूचियां पकड़ी नहीं थी, वो तो मैंने ही उछल कर उनके हाथ में दे दी थी, वैसे भी उनमे अभी इतनी हिम्मत नहीं थी की सीधे ही अपनी बहु के मम्मे पकड़ लेते.

(वास्तव में जब से मैंने बाबूजी को छेड़ना चालू किया था, तो यह पहली बार था की बाबूजी के हाथ में मेरी नंगी चूचियां थी, आज पहली बार बाबूजी ने मेरी नंगी छतिया दिन के उजाले मैं और हम दोनों के पूरे होशोहवास में पड़की थी,)

बाबूजी मेरे मम्मे छोड़ने ही वाले थे की मैंने एक सेक्सी सी आह भरी आवाज़ निकाली.

बाबूजी को थोड़ा सा होंसला हुआ, की मैं नाराज़ नहीं हूँ.

तो बाबूजी ने भी हिम्मत करते हुए अपने हाथ पीछे नहीं किये और अपने हाथों में ही मेरी छातियों को पकडे रखा.

डर के कारण बाबूजी छातिओं को सेहला या दबा तो नहीं रहे थे पर बस उन पर हाथ रखे रहे.

मैंने बिना हिले जुले बाबूजी को कहा

"बाबूजी आपने मेरे पेट पर खुजली करनी थी पर आप ने तो मेरी नंगी छातियां ही पकड़ ली "

यह कहते भी मैंने अपनी छातियाँ उनके हाथों में ही रहने दी. अब तक बाबूजी का भी होंसला पूरा बढ़ चूका था.

वो भी समझ गए थे कि चाहे यह घटना जानबूझ कर हुई हो या अनजाने में पर उनकी बहु नाराज़ तो बिलकुल नहीं है,

तो बाबूजी ने मेरी चूचियां धीरे धीरे सेहलनि और अपनी हथेली से दबानी शुरू कर दी,

मैंने भी कोई इतराज जैसा न किया और चुपचाप खड़ी बाबूजी से पहली बार नंगी चूचियां दबवाने का मजा लेती रही,

बाबूजी बातचीत को जारी रखते हुए बोले

"बहुरानी! मैंने तुम्हारी छाती नहीं पकड़ी यह तो तुम्हारे उछलने से मेरे हाथों में आ गयी, और यह क्या है की तुम ब्रा नहीं पहनती हो?"

बाबूजी को सब पता था कि मैंने ब्रा नहीं पहनी हुई है पर वो तो सिर्फ बातचीत का जरिया था.

मैं उसी तरह चुपचाप खड़ी रही और बाबूजी मेरी चूचियां धीरे धीरे सहलाते और हौले हौले मसलते रहे.

मुझे अपने बाबूजी से अपनी चूचियां मसलवाने में इतना आनंद आ रहा था की मेरी तो जैसे आनंद से आँखें ही बंद हो गयी,

अब बाबूजी ने भी होंसला करके अपनी उँगलियाँ मेरे निप्पलों के इर्द गिर्द कस ली और अपने अंगूठों और ऊँगली की मदद से मेरे निप्पलों को मसलना शुरू कर दिया.

मेरे मुंह से अपने आप आह आह की आवाज़ निकल गयी पर न तो मैंने अपनी चूचियां को छुड़ाने की कोई चेष्टा की और न ही बाबूजी ने मेरी चूचियां को छोड़ा।

कहीं बाबूजी चूचियाँ मसलना छोड़ न दें तो मैंने बात को जारी रखते हुए कहा.

"बाबूजी गर्मी बहुत है. इसलिए मैं ब्रा नहीं पहनती.

बाबूजी कुछ बोले इतने में लाइट चली गयी. लाइट जाने से टीवी बंद हो गया और मेरे बेटे की आवाज़ आयी.

"मम्मी टीवी बंद हो गया."

वो उठ कर किचन में आने लगा। बाबूजी ने चरण एकदम से अपने हाथ मेरी कमीज से बाहर निकाल लिए.

आज जिंदगी में पहली बार मैंने अपने बेटे को मन ही मन गाली दी, शायद बाबूजी ने भी मन में कितनी गालियां मेरे बेटे को और बिजली विभाग को दी होंगी.

बेटा भी किचन में आ गया तो बाबूजी फ्रिज खोल कर पानी पीने का नाटक करने लगे. और फिर बाहर चले गए.

उन के चेहरे पर भरपूर मायूसी साफ़ दिखाई दे रही थी, जैसे किसी बिल्ली के आगे से मलाई से भरा हुआ कटोरा उठा लिया गया हो.

मैं भी मायूस थी, पर थोड़ी मन में तस्सल्ली भी थी, कि बात कहीं हाथ से बाहर ही न निकल जाती. और इस छेड़छाड़ का अंत न जाने कहाँ होता.

तो मैं भी एक ठंडी सांस ले कर किचन का अपना काम करने लगी.

सुबह उठ कर मैंने खाना बनाया और फिर खाना खाने के बाद बाबूजी अपने कमरे में चले गए और मैं अपने कमरे में चली गई।मुझे नींद नहीं आ रही थी मैं करीब 11 बजे बाथरूम में गई तो देखा बाबूजी के कमरे में से हलकी रोशनी आ रही थी। मैंने चाबी वाले छेद से देखा तो बाबूजी बिस्तर पर नंगे बैठे थे और अपने लंड को सहला रहे थे।

मैं समझ गयी कि बाबूजी को माँ की याद आ रही है। बाबूजी अपने लंड को अपने हाथों से ऊपर नीचे कर रहे थे।

मुझे बाबूजी पे बहुत तरस आ रहा था कि कैसे वो अपने लंड को खुद ऊपर कर रहे थे मेरा मन कर रहा था कि मैं भाग के जाऊं और उसके लंड को मुंह में ले कर चूसने लगू लेकिन मेरी तो टांग ही हिल नहीं पा रही थी.

फिर मैंने देखा कि बाबूजी के लंड ने पानी छोड़ दिया है और वो बिस्तर से नीचे उतरने लगे तो मैं जल्दी से अपने कमरे में आ गई।

सारा दिन मैंने बेड पर करवटे बदलते हुए निकाल दीया, बस ये सोचते हुए कि क्या मुझे मेरे बाबूजी का लंड मिल सकता है?

लेकिन कैसे ये ही समज मैं नहीं आ रहा था।

मैं चाहती थी कि किसी तरह मैं अपने बाबूजी को पटा लूं और उनसे चुदाई करवाऊं लेकिन कोई प्लान नहीं बना रहा था।

सुबह उठते ही मैंने सोच की मैं बाबूजी और खुद के लिए चाय बना लूं और खुद भी पेशाब कर लूं। चाय पीने के बाद मैं सफाई करने लगी.

मैं सोच रही थी की मुझे बाबूजी को सेड्यूस करने के लिए खुद ही पहल करनी पड़ेगी. तो जब मैं बाबूजी के कमरे में सफाई करने के लिए गई तो मैंने ढीली सी नाइटी पहन ली थी। और तब मैंने जान बुझ कर अपनी ब्रा भी निकाल दी. वो नाइटी मेरे घुटनो तक ही आ रही थी, पहले तो मैंने सोचा कि अपनी पैंटी भी निकाल देती हूँ. पर फिर सोचा के अभी तो शुरुआत ही है, तो अभी एकदम इतना नहीं करुँगी. तो पैंटी पहने ही मैं बाबूजी के कमरे में सफाई करने चली गयी.

तब मेरे स्तन बहुत बड़े थे और मेरे काम करने से हिल रहे थे और बहुत अच्छे से मसले जा सकते थे। खुले गले वाली नाइटी की वजह से जब मैं झुकती थी तो उसका गला बड़ा होने की वजह से मेरे स्तन साफ नजर आ जाते थे। ऊपर से मैंने अपनी ब्रा भी नहीं पहनी थी.

बाबूजी बिस्तर पर बैठे हुए थे उन्होंने पायजामा और बनियान पहननी हुई थी। मैं जान बुज कर बाबूजी की तरफ मुंह करके झुक रही थी ताकी बाबूजी मेरे स्तन एक बार देख लें लेकिन वो तो टीवी देखें मैं मस्त था इसके लिए मैंने झुके झुके ही बिना बाबूजी की तरफ देखे कहा कि बाबूजी आज क्या खाना चाहते हैं?

मैंने चोर नजर से देखा कि इस बार पहली बार बाबूजी ने मेरी तरफ देखा और उनकी नजर मेरे स्तनों पर चली गई, जो की निप्पल तक नाइटी के खुले गले से दिखाई पड़ रहे थे. बाबूजी ने पहली बार आज मेरे मम्मे इतने पास से देखे थे तो वो बार बार चोर नजर से मेरे नंगे स्तनों को निहारने लगे।

मैं सीधी हुई तो देखा कि वो पैजामे में अपने तने हुए लंड को दबाने की कोशिश कर रहे थे। मैं समझ गई कि मेरे स्तन देख कर उबका लंड अकडने लगा है। मैं फिर से झुक कर उन्हें अपने स्तन दिखाने लगी और पोछा लगाने लगी।

थोड़ी देर इसी तरह मैं बाबूजी के सामने खड़ी खड़ी झाड़ू लगाती रही और झुक कर काम करते हुए बाबूजी को अपने मम्मे दिखाती रही.

मैंने बाबूजी की तरफ नहीं देखा ताकि बाबूजी को लगे की मुझे अपने दिखाई दे रहे मम्मों का कुछ भी पता नहीं है, और वो इसी तरह चोर नजरों से मेरी छातिओं को देखते रहे. बाबूजी का लण्ड खड़ा हो गया था और वो उसे दबा दबा कर पजामे में सेट कर रहे थे. में चोर नजरों से बाबूजी की हालत देख रही थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी पर प्रगट में में ऐसा दिखावा कर रही थी की जैसे मुझे कुछ भी पता नहीं है.

खैर थोड़ी देर में कमरे की सफाई हो गयी तो मैं पानी ले कर पोंछा लगाने लगी.

मैं बैठ कर पोंछा लगा रही थी तो अब बाबूजी को मेरे मुम्मे दिखाई नहीं दे रहे थे.

मैंने बाबूजी की तरफ चोर नजरों से देखा कि बाबूजी मेरी नाइटी के गले से मेरे मुम्मों को देखने की कोशिश कर रहे थे पर मुम्मे दिखाई न देने से उन के चेहरे पर निराशा दिखाई दे रही थी. वो परेशां से लग रहे थे।

मैं मन ही मन मुस्कुरा दी कि बाबूजी अपनी बहु के मम्मे देखने के लिए कितने उतावले हो रहे हैं और फिर मैं बैठ कर पोंछा लगाते हुए अपने घुटने अपनी छाती के नीचे रख लिए जिस से मेरे मुम्मे दब जाने के कारण ऊपर को उभर गए और बाबूजी को अब मेरे मुम्मे ठीक से दिखाई दे रहे थे.

बाबूजी के चेहरे पर अब मुझे एक संतुष्टि का भाव दिखाई दे रहा था. वो टीवी देखने का नाटक करते करते मेरे मुम्मे ही देख रहे थे.

मुझे लग रहा था की मेरा तीर सही निशाने पर लग रहा है,

फिर मैंने कुछ सोचा और कमरे में सोफे के साइड में रखे एक छोटे टेबल के नीचे पोंछा लगाने का नाटक करना शुरू किया. अब मेरी पीठ बाबूजी की तरफ थी. मैंने बुड़बुड़ाना शुरू किया की सोफे के नीचे बिलकुल भी साफ़ नहीं है और बहुत मिट्टी पड़ी है, यह बोल कर मैंने झुक कर सोफे के नीचे दूर तक पोंछा लगाने का नाटक करने लगी,

मेरे ऐसे करने से मैंने अपना पिछवाड़ा (गांड ) ऊपर उठा लिया ताकि मैं दूर अंदर तक पोंछा लगा सकूँ.

मेरे ऐसा करने से मेरी नाइटी मेरी कमर तक ऊपर उठ गयी. बाबूजी की जन्नत ही हो गयी. अब बाबूजी को मेरी जाँघे दिखाई दे रही थी,

चाहे मेरी पीठ बाबूजी की ओर थी पर टीवी स्क्रीन में मुझे बाबूजी का अक्स दिखाई दे रहा था. बाबूजी को मालूम नहीं था की मैं बाबूजी की हरकतें देख सकती थी,

उन्हें तो लगा की उनकी ओर मेरी पीठ है तो वे अब टीवी से नजर हटा कर सीधे मेरे चूतड़ ही देख रहे थे.

मैंने झूकते हुए आगे दूर तक पोंछा लगाने का नाटक करते हुए अपनी चूतड़ और ऊपर उठा दी.

अब तो जैसे बाबूजी का कलेजा ही मुंह को आने वाला हो गया.

अब बाबूजी को मेरी पैंटी और उस में कसी हुई मेरी गांड बिलकुल साफ़ दिखाई दे रही थी,

बाबूजी का लौड़ा अब स्टील की रॉड बन चूका था और बाबूजी उसे बेशर्मों की तरह मसल रहे थे. उन्हें मेरे द्वारा देखे जाने का कोई डर जो नहीं था क्योंकि मेरी तो उनकी तरफ पीठ थी. हालाँकि मैं टीवी के शीशे में उनकी सारी हरकतें देख रही थी,

अब बाबूजी अपने लण्ड को तेज तेज मसल रहे थे.

बाबूजी टीवी देखते हुए सोफे पर लेट गए। वो ऐसे शो कर रहे थे जैसे बैठे बैठे वे थक गए हो और आराम से लेट कर टीवी देख सकें, पर असल में वो लेट इसलिए गए थे ताकि और नीचे से अच्छी तरह अपनी प्यारी बेटी की गांड देख सकें. मैं कुछ देर इसी तरह अपनी कमर उठा कर पोंछा लगाती रही।

और बाबूजी अपना लण्ड तेज तेज सहलाते रहे.

जल्दी ही बाबूजी के हाथ के रफ़्तार तेज हो गयी। मैं समझ सकती थी की बाबूजी का स्खलन नजदीक ही है.

बाबूजी भी भगवन से शायद प्रार्थना कर रहे थे की मैं थोड़ी देर और काम करती रहूं, ताकि यह न हो की मेरे अचानक उठ जाने से उनकी पोल ही खुल जाये. या उन्हें मुठ मारना बीच में ही छोड़ना पड़े।

भगवान ने तो पता नहीं उनकी प्रार्थना सुनी या नहीं पर मैंने जरूर सुन ली,और उसी पोज में गांड ऊपर उठाये ही पोंछा लगाती रही।

जल्दी ही बाबूजी के साँसे तेज चलने लगी और उनके अपने लण्ड को मसलने की स्पीड भी बढ़ गयी.

बाबूजी के मुँह से एक जोर की आह निकली (जो मैंने सुन तो ली पर टीवी की आवाज़ में न सुनने का नाटक किया) और बाबूजी ने जोर से अपना लौड़ा पजामे के ऊपर से ही कस के पकड़ लिया और बाबूजी तेज तेज साँसे लेते हुए झड़ने लगे. उन्होंने डर के मेरी तरफ देखा की कहीं मुझे पता तो नहीं लग गया पर मैं अनजान होने का नाटक करते हुए पोंछा ही लगाती रही,

धीरे धीरे बाबूजी का वीर्यपात ख़तम हो गया। मैंने टीवी के शीशे में देखा की बाबूजी के पजामे का आगे का सारा हिस्सा उनके लण्ड रस से भीग कर गीला हो गया था. उसे छुपाने के लिए बाबूजी ने एक तकिया उठा कर अपनी कमर में रख लिया और अपने गीले पजामे को छुपा लिया.

मैं मन ही मन मुस्कुरा रही थी, मुझे लग रहा था की मेरी मन की इच्छा पूरी हो सकती है और मुझे घर में ही एक दमदार और मोटा लण्ड चुदाई के लिए मिल सकता है,

आज का मिशन पूरा करने के बाद मैं काम ख़तम होने का नाटक करते हुए उठी और किचन की ओर चल दी,

बाबूजी झट से उठ कर बाथरूम में घुस गए, मैं समझ गयी की अपने गंदे हो चुके पजामे को बदलने गए है, पर मैं उसी तरह अनजान बनी रही,

मैं भी भाग कर अपने कमरे में चली गयी क्योंकि इतना कुछ हो जाने से मेरी भी चूत गीली हो गयी थी। उसमे खूब पानी आ गया था, मैंने जाते ही फटाफट अपनी पैंटी उतर कर तुरंत अपनी दो उँगलियाँ अपनी चूत में घुसा ली और तेज तेज अंदर बाहर करना शुरू किया.

मैं इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की आधे मिनट में ही मैं झड़ गयी।

मेरा इतना पानी निकला कि मैं बता नहीं सकती। काफी देर बाद मेरा शरीर थोड़ा कायम हुआ तो मैं उठ कर बाहर आयी.

बाबूजी उसी तरह सोफे पर बैठे टीवी देखने का नाटक कर रहे थे. मैंने भी ऐसे दिखावा किया कि कुछ भी नहीं हुआ हो.

पर दिल ही दिल में मैं बाबूजी की स्थिति पर मुस्कुरा रही थी.

कमरे से आ कर मैं आँखे बंद करके लेटी हुई थी कि तभी मुझे किसी के दरवाज़े के पास आने की आहट हुई, मैंने डरते हुए कमरे का दरवाज़ा खोल दिया. पर बाहर तो कोई नहीं था, मुझे लगा शायद मेरा ही भ्र्म होगा और निश्चिंत होकर मैं बाथरूम की तरफ़ बढ़ी. मुझे लगा कि जैसे आवाज मेरे ससुर के कमरे से आ रही थी, बाबूजी के कमरे के साथ उनका अटैच बाथरूम भी तो था. मेरे कदम जैसे जैसे उस की तरफ़ बढ़ने लगे तो मुझे भी किसी की मादक सिसकियाँ सुनाई देने लगी, चौकन्ना होकर मैं उस आवाज़ की तरफ़ धीरे धीरे चलने लगी.

ससुरजी को आसानी रहे इस लिए बाथरूम उनके कमरे के बिलकुल बग़ल में बनाया गया था, बाथरूम निकलती उन सिसकियों को सुनके मैं चौंक गयी. पहले तो मुझे लगा की शायद ससुरजी बाथरूम में फिसलकर गिर पड़े है इसीलिए उनकी कराहने की आवाजें आ रही है. पर जैसे ही मैंने दरवाज़ा हलके से खोलते हुए अंदर झाँका तो मेरे कदम लड़खड़ाने लगे, डर के मारे पसीने छूटने लगे. मेरे ससुर पुरे नंगे खड़े होकर अपना लंड हाथ में लेकर जोर जोर से मसल रहे थे, उस लंड का भयंकर रूप देख कर तो मेरी गांड चौड़ी हो गयी. चूत में भी पानी आ गया।

जैसे तैसे मैंने अपने आपको संभाला और छुपके से उनके उस लिंग को देखने लगी, पर जैसे ही मैं संभली मेरे कानों पर पड़ी उस आवाज़ ने मेरे अंदर एक अजीब सा डर और गुदगुदी होने लगी. मेरे ससुर आज अपने बहु का नाम लेकर, उसको अपने यादों में लिए अपना लंड मसल रहे थे, मेरे बारे में ससुरजी की ये वासना सोचकर ही मुझे मदहोशी होने लगी.

"सुषमा! आआह्ह्ह्हह्ह आआ उफ्फफ्फ्फ़ मेरी जानननननन ले ले मेरा लौड़ा, एक बार तो ले कर देख इसे, क्या मस्त चुत है तेरी, एक बार मेरे नीचे आ जा बस फिर तो फाड़ दूंगा तेरी चुत।" बाबूजी इस जैसी गन्दी बातें बोल बोल कर अपने लौड़े को जोर जोर से सड़का मार रहे थे.

मेरे ससुरजी का लौड़ा मेरे पति से काफी ज्यादा लम्बा और मोटा था, मेरे पति का लण्ड तो उनके मुकाबले किसी बच्चे की नुन्नी जैसा था। काले रंग में लिपटा वो मांस का टुकड़ा देख के मेरी चुदी-चुदाई चुत भी पिघलने लगी. कुछ ही देर में बाबूजी का समय समाप्तः हुवा और एक जोर की आह की आवाज के साथ उनका ढेर सारा गाढ़ी मलाई रूपी वीर्य फ़र्श पर उछल उछल कर गिरने लगा.

इस उम्र में भारी मात्रा में निकलता हुवा वीर्य देखकर मेरे दिल में उनके लंड ने घर बना लिया, लग रहा कि अभी जाऊं और सारा वीर्य चाट लूँ. ससुरजी के माथे पर पसीना छा रहा था, उसकी साँसे भी जोर जोर से चल रही थी वीर्य की आखिरी बूंद अब भी सूपड़े से निकल रही थी. उनका फुला हुवा लौड़ा एक इंच भी कमज़ोर नहीं हुवा ये देख के मुझे अंदाजा हो चूका था की आदमी पूरा मर्द है. किसी भी औरत की पूरी तस्सली करवा देंगे बाबूजी। फिर वो औरत चाहे उनकी बहु यानि कि मैं ही क्यों ना होऊं.

मेरी चूत में बाबूजी की यह हरकत देख कर आग लग गयी. पर मेरे पति तो गए हुए थे तो उस आग को भुजाने का कोई सहारा भी तो नहीं था मेरे पास.

सोच सोच कर मैं किचन में गयी, और सब्जी की टोकरी में मुझे एक खीरा दिखाई दे गया. मुझे लगा कि लण्ड नहीं तो चलो अपनी पतली सी ऊँगली से तो खीरा ही अच्छा है. तो उसी से मजे लेने के लिए मैं उसे लेकर अपने कमरे में आ गयी.

मैं चुपचाप वहां से निकल पड़ी और फिर से कमरे में आकर ससुरजी के लौड़े को याद करते हुए साड़ी के ऊपर से ही अपनी चुत मसलने लगी. कुछ देर पहले मैं मेरे पतिदेव को याद कर रही थी पर अब मेरे सपनों में मेरे ससुरजी का नंगा लौड़ा नाच रहा था. ससुरजी का मर्दाना लौड़ा यद् करके मैं सोच रही ही की मैं खुद उनके लौड़े से चुद रही हूँ और इसी कामुकता के चलते मेरा पानी अबकी बार कुछ ही पलों में निकल कर बहने लगा. मेरा हाथ मेरे ही चुतरस से चिपचिपा हो गया पर इस बार मैंने वासनांध होकर मेरे चुतरस से भीगी उंगलिओं को चाटना चालू किया.

मैं वासना में अंधी हो रही थी. मैंने मेरी साडी उतार के फेंक दी और एक छोटी सी नाइटी पहन ली, और अपनी पैंटी उतार के बेड के नीचे ही फेंक दी ब्रा तो मैंने आज पहनी ही नहीं थी जब मैंने बाबूजी को पोंछा लगाने के बहाने से मजा दिया था. ऐसा करने से मुझे अपनी चूत में खीरा करने में आसानी होती.

सामने लगे आईने में मेरा गदराया हुवा बदन देख मुझे अपने आप पर गर्व सा महसूस होने लगा, किसी भी मर्द के लौड़े में आग लगाने की ताकत थी मेरे हुस्न में. सीने पे उभरे मेरे ३६ इंच के चूंचे थोड़ी चर्बी से गदराया हुवा पेट और उसके निचे मांसल जाँघे देख मैं अपना सीना सहालने लगी. पुराणी यादों को याद करते करते कब मेरा हाथ मेरा बदन मसलने लगा मुझे भी पता ना चला.

बिस्तर पे अपना बदन डालते ही मेरी आँखे बंद हुई, जिस्म की चुदाई की माँग को बुझाने के लिए मेरी उँगलियाँ ना जाने कब मेरे चूत का बंधन पार करते हुए मेरे चुत को छूने लगी. एक हाथ से मैक्सी के ऊपर से ही चूँचियाँ मसलते हुए मैंने मेरी दो उँगलियाँ मेरे भोसड़े में घुसा दी और पुराने दिन याद करते हुए मज़ा लेने लगी.

फिर मैंने वो खीरा उठा लिया और अपनी चूत में डाल लिया। खीरा मेरे पति के लण्ड से तो बड़ा था पर बाबूजी से छोटा ही था. पर जो भी हो काम तो चलाना ही था. तो मैंने पूरा खीरा अंदर घुसेड़ लिया और अंदर बाहर करके मजा लेने लगी.

इतने दिनों से जो आग दबा कर रखी थी आज वही आग फ़िरसे भड़क उठी थी. मेरे ससुर का वो मोटा तगड़ा लौड़ा और उनके चुदाई से हो सकने वाला मीठा दर्द सोचते हुए मेरी उँगलियाँ मेरे निगोड़ी चुत पर खीरे को जोर जोर से अंदर बाहर करने लगी.

आअह्ह्ह्ह उफ्फफ्फ्फ़ बाबूजी जज्जजज माँआआआआ जैसे किलकरियाँ मेरे मुँह से निकलने लगी और बड़े दिनों से फड़फड़ाती मेरे चुत का पानी कुछ ही मिनिटों में बाहर फ़वारे की तरह उमड़ने लगा. कई दिनों बाद मेरे भोसड़ी का पानी निकलने के कारन मेरा हाथ और मेरा मैक्सी पूरा गिला हो चूका था. गीली चुत को प्यार से सहलाते हुए मेरी उखड़ी हुई सांसों को काबू करते हुए मैं ऐसे ही छत की तरफ देखते हुए लेटी रही. मुझे इतना निकलने से काफी कमजोरी महसूस हो रही थी, मैंने खीरे को बेड के साइड में टेबल पर रख दिया और चूत को सहलाते हुए लेट गयी,

शायद जब मैं झड़ी तो मेरे मुंह से कुछ आवाज निकल गयी थी और बाबूजी ने शायद उसे सुन लिया था. तो बाबूजी मेरे कमरे के बाहर आये और दरवाजा खटखटाया और आवाज दे कर पुछा

"सुषमा! बहुरानी तुम ठीक तो हो? यह आवाज कैसी थी?"

मेरा झड़ना और दरवाज़े पर थाप पड़ना लगभग एक ही समय हुवा, मैंने घबरा कर जल्दबाज़ी में मेरे कपड़े ठीक किये और बिखरे बालों के साथ दरवाज़ा खोल दी. मेरी हालत देख ससुरजी के चतुर नज़रों ने भांप लिया कि मैं कमरे में क्या गुल ख़िला रही थी. मेरी हालत ऐसे क्यों हुई है. ऊपर से निचे तक मुझे घूरते हुए ससुरजी कुटिलता से मुस्कुराने लगे, उनकी नजर मेरे बदन को आँखों से ही चोद रही थी.

हम दोनों की नज़ारे मिली तो उन्होंने ने भी ख़ुलके कहा,

"क्या बात है बेटी? ऐसे कमज़ोर क्यों दिखाई दे रही हो, कुछ ज़्यादा ही मेहनत कर ली क्या आज?

ससुर जी की द्विअर्थी बातें सुनकर मैं भी थोड़ी शर्मसार हो रही थी, उनकी आँखों में देख कर मैंने अपनी नजरें नीचे झुका ली. और मेरे मुंह से कोई शब्द ना निकला मैं ऐसे ही शर्माती खड़ी रही.

ससुरजी की आँखे मेरे उभरे हुए चूँचियों को खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी, मेरे गुब्बारें देख उनकी आँखे चमक उठी. समझ तो वो गए ही थे कि मैं क्या कर रही ही,

अपने ३६ इंच के फुले हुए मम्मे दिखाते हुए मैं बोली, "हाँ बाबूजी, आजकल सारा काम मुझे ही करना पड़ता है, आपका बेटा तो अब कुछ करने की हालत में है नहीं तो सबकुछ मुझे ही करना पड़ता है"

मेरे द्विअर्थी बातें सुनकर उन्होंने बिना कोई रोकटोक और शरम के मेरा सीना घूरने लगे, उनके पैजामे का वो भाग सहलाते हुए वो मुस्कुराने लगे. मैं अपने बेड पर बैठ गयी ताकि ससुर जी कहीं चले ही ना जाएँ और मैं उन्हें अपने बदन के अच्छे से दर्शन दे सकूँ. बाबूजी ने जब मुझे बैठते और उन्हें चले जाने के लिए बोलते ना देखा तो वो समज गए की मुझे उनका बैडरूम में रहने में कोई इतराज नहीं है, तो हिम्मत करके बाबूजी भी मेरे सामने एक कुर्सी पर बैठ गए.

मैं किसी बदचलन आवारा औरत की तरह उनको देख के मुस्कुरा रही थी और हम दोनों बिना कोई बात किये एक दूसरे समझ रहे थे.

मुझे उनके पैजामेको घूरता हुवा देख ससुरजी बोले,

"बहुरानी! तुम्हारा पति तो अभी नहीं है, अगर मुझसे कुछ काम बनता हो तो बोल दे बेटी, मैं तो हमेशा तैयार हु तेरी सेवा करने के लिए, अब बेटा नहीं तो ना सही, ससुर तो तेरा अभी जिंदा है."

ससुरजी की बातों से साफ़ पता चल रहा था की वो मुझे अपने लौड़े के निचे लिटाने के लिए व्याकुल हो रहे थे. उन्हें पता चल चुका था की उनके निक्कमे बेटे की पत्नी की जवानी अब उफ़ान पर है और उनके लौड़े से चुदवाने के लिए तड़प रही है. शायद ससुरजी ने मुझे चुत मसलते हुए भी देख लिया था और इसीलिए बाथरूम का दरवाज़ा ख़ुला छोड़कर वो जान बुझके जोर जोर से मेरा नाम लेकर सड़का मार रहे थे.ससुरजी की चलाकी देख मैं अंदर से ख़ुश हुई और मैंने भी तय कर लिया की एक ना एक दिन मैं जरूर ससुर जी लौड़े की शोभा बनूँगी.

उनकी इस चलाकी से मैं भी ख़ुश होकर बोली,

"बाबूजी, अब बस आपसे ही उम्मीद है मुझे. आप ही हो, जो मेरा काम कर सकते हो और अच्छे से कर सकते हो. पर जब कोई काम होगा आपके लायक तो जरूर बता दूंगी"

बाबूजी खुश हो गए. तभी उनकी नजर बेड के नीचे पड़ी मेरी पैंटी पर पड़ी.

उन्होंने उसे उठाते हुए कहा

"बहु! यह तुम्हारी कच्छी नीचे गिरी पड़ी है. चाहे तुमने रात में इसे उतार कर ही सोना हो पर फिर भी इसे नीचे इस तरह न फेंका करो. रात में कोई चींटी या कीड़ा इस में आ सकता है, जब तुम इसे दुबारा पहनोगी, तो वो तुम्हे तुम्हारी "उस" पर काट सकता है. सोचो तो जरा कि यदि किसी जेहरीले कीड़े ने तुम्हे वहां पर काट लिया तो क्या होगा. तुम्हे डॉक्टर के पास जाना होगा और वो तुम्हारे गुप्त अंग को देखेगा। इसलिए तुम इसे ऊपर रखा करो."

यह कहते हुए बाबूजी पैंटी को अपने हाथों में रगड़ रहे थे. अपनी गन्दी पैंटी बाबूजी के हाथ में देख कर मुझे बहुत शर्म आ रही थी. मैंने उनसे अपनी पैंटी लेने के लिए बोला "बाबूजी! मैं रात में कम से कम कपड़ों में सोती हूँ. इसीलिए इसे उतार दिया था. आप मुझे दे दीजिये, मैं आगे से ध्यान रखूंगी."

पर बाबूजी इतनी जल्दी पैंटी कहाँ देना चाहते थे, वो पैंटी को मसलते हुए बोले

"सुषमा! यह तो तुम्हारी पहनी हुई और गन्दी पैंटी है, तो इस में से यह इतनी अच्छी खुशबु कैसे आ रही है? क्या तुम पैंटी में भी कोई खुशबू लगाती हो?"
 
यह कहते हुए बाबूजी ने मेरी पैंटी को सूंघना शुरू कर दिया.

अब यह तो मेरे लिए बहुत ही कामुक दृश्य था. मेरे ससुर मेरे ही सामने मेरी पहन कर उतारी हुई पैंटी को सूंघ रहे थे और मसल रहे थे. यह देख कर मेरी चूत में तो आग लग गयी. बहुत शर्म वाला सीन था. मुझे कुछ नहीं सूज रहा था कि क्या करू और बाबूजी को अपनी पैंटी सूंघने से कैसे रोकूं.

उधर बाबूजी की तो आँखें बंद थी और वे मेरे सामने मजे से पैंटी से मेरी चूत की खुशबू सूंघ रहे थे.

मुझे बड़ा ही अजीब सा लग रहा था. मेरे ही ससुर मेरे ही सामने मेरी हो पैंटी को सूंघ रहे थे और अपना लण्ड सेहला रहे थे.

बड़ा ही कामुक दृश्य था. मैं क्या करती.

तभी बाबूजी ने मेरी पैंटी में जहाँ मेरी चूत होती है, वहां पर पैंटी गीली थी, बाबूजी उस जगह को सूंघते हुए बोले

"सुषमा बेटी! देखो यहाँ पर शायद सेंट ज्यादा लग गया है, यहाँ पर गीला भी है और सुगंध भी बहुत अधिक आ रही है."

यह कहते हुए बाबूजी ने मेरी चूत के पानी को नाक के बिलकुल पास करके सूंघना शुरू कर दिया. मैं तो शर्म से मरी ही जा रही थी.

समझ नहीं आ रहा था की इस स्थिति को किस तरह सम्भालूं.

मैंने उन के हाथ से अपनी पैंटी छीन ते हुए बोला

"बाबूजी! अरे इसमें कोई खुशबू नहीं है. पेशाब की बदबू हो सकती है. आप इसे छोड़ दें."

बाबूजी बुड़बुड़ाते से बोले

"बड़ी अजीब बात है. आजकल की औरतें कपड़ों के ऊपर तो सेंट लगाती ही थी, अब कच्छी तक में सेंट लगाने लग गयी है. क्या ज़माना आ गया है?"

मैं बोलती भी क्या बोलती बस चुप रही.

पर मेरी किस्मत में शांति कहाँ.

तभी बाबूजी की नजर टेबल पर रखे खीरे पर पड़ गयी, वो तुरंत समज गए कि उनकी बहु खीरे से मजे कर रही थी, खीरा अभी भी मेरे चूत रस से गीला चमक रहा था.

बाबूजी को मुझे छेड़ने का और मौका मिल गया. उन्होंने तुरंत वो खीरा उठा लिया और बोले

"सुषमा! क्या तुम्हे रात में भूख लगती है जो यह खीरा रखा है? रात में खीरा? मुझे बता दिया करो मैं तुम्हारी भूख मिटाने का कुछ और इंतजाम कर देता."

मैं तो शर्म से पानी पानी हो रही थी, मेरी चूत के रस से भीगा हुआ खीरा मेरे ससुर के हाथ में था.

मैं कुछ बोलती इस से पहले ही बाबूजी बोले

"बहुरानी! यह खीरा इतना गीला क्यों है? और इतना चमक क्यों रहा है? क्या तुमने इस पर कुछ लगाया है?"

यह कहते हुए उनकी नजरें मेरी चूत वाली जगह पर थी. साफ़ था कि वो सब जान रहे थे और मुझे छेड़ने के लिए बोल रहे थे. अभी मैं यह सोच ही रही थी कि क्या बोल कर बात को टालूँ तब तक बाबूजी ने अगला धमाका कर दिया और बोले

"सुषमा! इस पर तो शहद जैसी खुशबू आ रही है. क्या तुमने खीरे पर शहद लगाया है?"

यह सब बोलते बोलते बाबूजी अपने लौड़े को जो अब तक इस पैंटी और खीरे वाली बातों से खड़ा हो गया था, को सेहला रहे थे. बहुत ही कामुक दृश्य था. मैं शर्म से मरी जा रही थी, समज नहीं आ रहा था कि आज यह क्या हो रहा है. तभी बाबूजी ने खीरे को अपने मुंह में डाल लिया और उसे चाटते हुए बोले

"सुषमा! कोई बहुत ही मीठी और स्वादिष्ट चीज लगाई है तुमने इस खीरे पर. चाट कर मजा आ गया. मन कर रहा है इस खीरे को खा जाऊं, यह कहते हुए बाबूजी खीरे को चाटते रहे और उनकी नजरें मेरी आँखों में मिली रही. उनकी आँखों में वासना की चमक थी. उनका लण्ड उनकी धोती में ठुनक रहा था. जिसे वो बार बार दबा रहे थे.

मेरी चूत में भी बाबूजी की कामुक हरकतों से पानी आ गया था. मन तो कर रहा था की सब लाज शर्म त्याग कर अपनी मैक्सी उठा कर अपनी नंगी चूत बाबूजी के सामने कर दूँ और कहूं कि बाबूजी खीरा क्यों चाट रहे हो, यह रस तो आपकी बहु की चूत का रस है, आओ डायरेक्ट अपनी बहुरानी की चूत से चाट लो.

पर शर्म इतनी आ रही थी कि मेरी जुबान से बोल नहीं निकले.

बाबूजी उसी तरह खीरे पर से मेरी चूत का रस चाटते रहे और चारों तरफ से चाट चाट कर खीरे को साफ़ कर दिया. फिर खीरा मुझे देते हुए बोले

"सुष्मा! खीरे पर लगा रस बहुत ही स्वादिष्ट था. मजा आ गया चाट कर. यदि मुझे यह रस और चाटने को मिल जाये तो क्या बात है. क्या थोड़ा रस और चाट सकता हूँ?"

अब बाबूजी ने तो सीधा ही मेरी चूत चाटने का ऑफर दे दिया था. पर हाय री मेरी फूटी किस्मत चाहते हुए भी मेरे मुंह से हाँ निकल सकी, और मैं बाबूजी को बोल बैठी

"बाबूजी! प्लीज रात बहुत हो चुकी है. आप जा कर सो जाईये. मुझे भी नींद आ रही है. कल बात करेंगे. शुभ रात्रि। "

बाबूजी समझ गए कि उनकी बहु की शर्म अभी उत्तरी नहीं है. पर वो जानते थे कि आग दोनों तरफ लगी हुई है. और बेकाबू होती जा रही है. वो दिन दूर नहीं है जब वे सच में अपनी बहु का चूत रस मुंह लगा कर चाट रहे होंगे.

यह सोच कर वे उठ कर अपने कमरे में चले गए. और मैं अपनी बेवकूफी पर झल्लाते हुए और अफ़सोस करते हुए लेट गयी. आज मौका बनाया था भगवान् ने और बेकार चला गया. आज मैं बाबूजी से चुदती चुदती रह गयी.

खैर अपना ही घर है. अपने ही ससुर हैं. चुदवा कर ही रहूंगी मैं एक दिन. और मुझे भी लग रहा था कि वो दिन दूर तो नहीं है अब.

यह सोचते मेरी ना जाने कब आँख लग गयी.
 
अगले दिन दोपहर को मेरे पति का फोन आया. उन्होंने कहा की वे आज शाम की ट्रैन से रात को लगभग ८ बजे आ जायेंगे.

मैं उन के आने की खबर सुन कर खुश भी हुई की मेरे पति कई दिनों के बाद आएंगे और आज मेरी चुदाई भी होगी, क्योंकि काफी दिन हो गए थे चुदे हुए तो मेरी काम वासना भी बढ़ गयी थी.

उधर मेरे ससुर की हरकतों से मेरा चुदने का बहुत मन हो रहा था. बस दिल कर रहा था की कोई मोटा सा लौड़ा मेरे अंदर घुस जाये.

पर ना जाने क्यों मैं अपने पति के आने की खबर से कुछ अंदर ही अंदर उदास भी थी.

जाने क्यों ससुर के साथ छेड़खानी और शरारत अच्छी लग रही थी, मैं उनसे चुदने को शायद अभी मन से तैयार नहीं थी. पर उन का साथ अच्छा लग रहा था.

खैर पति के आने की खबर से मेरा बेटा भी बहुत खुश हुआ और बोला की आज पापा कई दिन के बाद आ रहे है तो हम उनको लेने स्टेशन जायेंगे.

बाबूजी भी बेटे के आने से कुछ उदास थे, उन्हें भी लग रहा था की अपनी बहु को चोद पाने का मौका अब शायद न मिले, पर वो भी क्या कर सकते थे.

तो हम रात को स्टेशन पर चले गए. हमारे पास अपनी गाडी तो थी नहीं तो ऑटो में आने जाने का सोचा.

ट्रेन रात में 8 बजे आ गयी. पति बाहर आये तो उन्हें देख कर दिल ही बुझ गया.

पति शराब में टुन्न थे. उनसे तो ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. बेटा भी उनसे मिल कर दुखी हुआ.

लगता था कि वो ट्रेन में ही शराब पीते आये थे.

खैर अब तो यह उनकी रोज की आदत बन गयी थी, बोलने या लड़ने का कोई फायदा नहीं था.

मैं तो डबल उदास हुई, पति की हालत देख कर बिलकुल भी नहीं लगता था कि वो मेरी चुदाई कर भी पाएंगे, मेरे तो जैसे सपने ही ढह गए.

बाबूजी ने ऑटो को बुलाया और घर जाने को बुक किया.

रात थी तो अँधेरा भी हो गया था. और ठण्ड भी लग रही थी. मैंने तो शाल भी ले रखी थी,

ऑटो वाले ने एक साइड से तो ऑटो को कपडे से बंद किया हुआ था ताकि ठंडी हवा ना आये और दूसरी साइड से ही सवारी के लिए खुला रखा था.

सबसे पहले तो बाबूजी औरो में घुसे। फिर मेरे पति अंदर घुसने लगे तो बाबूजी ने उसे डांट दिया और कहा कि उस से शराब की बदबू आ रही है, तो वो उनसे दूर ही बैठे.

अब मुझे ही बाबूजी से लग कर बैठना पड़ा. फिर मेरे पति बैठे और जो एक छोटा सा फट्टा ड्राइवर ने अपने पीछे सवारी के लिए लगाया होता है उस पर मेरा बेटा बैठा. ऑटो क्योंकि छोटा होता है तो हम तीनो फंस कर ही बैठे थे. मेरे जाँघे बाबूजी की टांगों से लगी हुई थी. एक तो रात का अँधेरा और उस पर ऑटो में हम चिपक कर बैठे थे. पति के पास जो बैग था वो मैंने अपनी गोद में रख लिया और उस पर मेरे बेटे ने सर रख लिया..

अब स्थिति यह थी की बाबूजी अंत में बैठे थे, और उनके साइड में ऑटो कपडे से बंद था, बाबूजी से सत कर मैं बैठी थी और किनारे पर पति थे.

बाहर से किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था. और बेटे के कारण ड्राइवर भी हमें देख नहीं सकता था.

मेरे पति तो बस ऑटो में बैठते ही, अपनी साइड के रॉड पर सर रख कर ऊँघने लगे.

एक तरह से हम दोनों बाबूजी और मैं ही जाग रहे थे.

हमारा घर लगभग १ घंटे की दूरी पर था.

ऑटो चलते हुए पांच मिनट ही हुए थे की बेटा भी मेरी गोद में ऊँघने लग गया.

बाबूजी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए उनकी आँखों में शरारत की चमक थी, मैं समज रही थी की बाबूजी के मन में कुछ तो चल रहा है. आज यह पहली बार था की बाबूजी मेरे से इतना सट कर बैठे थे. तभी बाबूजी ने अपनी टांग मेरी टांग से मिला दी.

मैंने उनकी तरफ देखा, बाबूजी दूसरी तरफ मुंह किये मुस्कुरा रहे थे.

अचानक से बाबूजी ने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया. मैं एकदम से हिल सी गयी.

मैंने हिल कर उनका हाथ हटाना चाहा तो बाबूजी ने अपना हाथ हटा कर मेरे पेट पर रख दिया.

मैं चुप रही कि देखते हैं कि बाबूजी बाबूजी क्या करते हैं, जब बाबूजी ने मुझे कुछ भी ना कहते पाया तो उन्होंने अपना हाथ मेरी कमीज के अंदर घुसा कर मेरे नंगे पेट पर रख दिया. मैं एकदम से घबरा गयी. मेरे पति मेरे पास ही बैठे थे और मेरा बेटा मेरी गोद में सो रहा था और बाबूजी यह हरकत कर रहे थे.

हालाँकि उनका हाथ कमीज के अंदर था और ऊपर से मैंने शाल भी ले राखी थी, तो किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था पर मैंने बाबूजी का हाथ पकड़ कर बाहर निकालना चाहा पर बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर ही रखा.

मैं सब के सामने ऑटो में जोर आजमाईश तो कर नहीं सकती थी, तो थोड़ी देर कोशिश करने के बाद मैं चुप कर गयी और बाबूजी का हाथ रहने दिया.

बाबूजी मेरे इस सहयोग से बहुत खुश हो गए और अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर सहलाने लगे.

अब मेरे बाबूजी को तो आप जानते ही हैं. जब मैंने अपना हाथ हटाया तो तुरंत उन्होंने मेरे पेट पर से हटा कर ऊपर मेरी छाती पर रख दिया. और मेरे मुम्मे को सीधा ही पकड़ लिया.

मैं एकदम से चिहुंक पड़ी. इधर मेरे पति मेरे पास बैठे थे, और मेरे ससुर ने जिंदगी में पहली बार मेरा मम्मा पकड़ लिया था. मैं करती भी तो क्या करती.

कुछ बोल भी तो नहीं सकती थी, मैंने अपना हाथ फिर से कमीज में डाल कर उनके हाथ को पकड़ लिया और उनकी तरफ गुस्से की नजरों से देखा.

बाबूजी मुझे देखते ही एक आँख मार दी, मैं शर्मा गयी. क्या करती. बाबूजी का हाथ कमीज के तो अंदर था ही तब तक बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे ब्रा के अंदर घुसेड़ कर मेरा नंगा मुम्मा पकड़ लिया और उसे दबाने लगे.

मेरी स्थिति बड़ी अजीब थी. पहली बार कोई गैर मर्द मेरी छाती दबा रहा था. और वो भी मेरे पति ही,

मैंने पति की तरफ देखा, वो तो शराब के नशे में ऊंघ रहे थे. मुझे बड़ा गुस्सा आया.

अब तक ससुर जी ने मेरे एक निप्पल को अपने अंगूठे और ऊँगली में दबा लिया और उसे सहलाने लगे. मेरे शरीर में तो आग ही लग गयी थी,

मैंने जोर से बाबूजी का हाथ अपने हाथ से पकड़ कर नीचे पेट की तरफ खींच दिया और ब्रा से बाहर निकाल दिया.

लेकिन उसका एक असर यह हुआ कि जो बाबूजी ने मेरी छाती हाथ में पकड़ी थी, हाथ जोर से नीचे खींचने के कारण मेरा मुम्मा भी ब्रा से बाहर निकल कर आ गया. और वो अब ब्रा से बाहर और कमीज के अंदर था.

मैंने सोचा कि उसे तो मैं बाद में अंदर कर लूंगी, पहली बाबूजी का हाथ तो रोकूं किसी तरह.

उधर बाबूजी अपने दुसरे हाथ से पता नहीं क्या कर रहे थे. वो हाथ उनके लण्ड पर था, शायद उसे मसल रहे होंगे हमेशा की तरह.

बाबूजी ने अपना हाथ जो मेरे पेट पर घूम रहा था उसे मेरी सलवार के अंदर घुसेड़ने की कोशिश की.

वो मेरी चूत पर जाना चाहते थे. मैंने सलवार के नाड़े में घुसता हुआ उनका हाथ एकदम से पकड़ लिया. बाबूजी नई दुसरे हाथ से मेरा वो हाथ जोर से पकड़ा और अपनी गोद में खींचा. जब तक मैं कुछ समझती बाबूजी ने मेरा वो हाथ अपने नंगे लौड़े पर रख दिया. (अब मैं समझी कि बाबूजी ने अपना लण्ड अपनी धोती से बाहर निकाल लिया था.)

अपना हाथ बाबूजी के गर्म गर्म लौड़े पर लगते ही मैं तो लगभग उछल ही पड़ी. बाबूजी इतनी हिम्मत करेंगे वो भी मेरे पति और बच्चे के सामने, यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था.

बाबूजी मुझे अपना लौड़ा पकड़वाना चाह रहे थे. पर मैंने जोर से अपनी मुठी बंद कर ली और अपना हाथ वापिस खींचने लगी. अब इस स्थिति में जबकि मेरे पति और बेटा पास में थे और सामने ऑटो ड्राइवर गाड़ी चला रहा था तो मैं कुछ बोल तो नहीं सकती थी. बस जोर से अपनी मुठी भींच रखी और उसे बाबूजी के लण्ड पर से वापिस खींचने लगी.

पर बाबूजी भी पुराने घाघ और पहलवान थे. उन में बहुत जोर था. उन्होंने अपने हाथ से मेरे मुठी भरे हाथ को कस के पकडे रखा और मुझे वापिस नहीं लेने दिया.

अब चलते ऑटो में मैं बाबूजी के साथ कुश्ती को कर नहीं सकती थी. बस जोर लगाती रही. बाबूजी के लाख कोशिश करने पर भी कि मैं उनके लौड़े को पकड़ लूँ, मैंने मुठी नहीं खोली.

अब मेरा सारा ध्यान मेरे इस लौड़े पर ठीके हुए हाथ पर था तो बाबूजी ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाते हुए अपना दूसरा हाथ झट से मेरी सलवार के अंदर घुसा दिया और मेरी उसे जोर से अंदर धकेलते हुए सीधे मेरी चूत पर ले आये और मेरी चूत को अपनी मुठी में भींच लिया.

मैं तो इस दोतरफा हमले से घबरा गयी. क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था.

बाबूजी ने एक हाथ से मेरी मुठी वाले हाथ को अपने अकड़े हुए लौड़े पर टिका रखा था. और दुसरे से मेरी नंगी चूत को पकड़ रखा था.

शायद आज भगवन भी मेरी तरफ नहीं था. आज मैंने कच्छी भी नहीं पहन राखी थी. और अपनी चूत को बिलकुल साफ़ भी कर रखा था. आज मेरे पति जो आ रहे थे.

पर इस का भरपूर लाभ मेरे ससुर को मिल रहा था. उन्होंने मेरी चूत को कस के अपने हाथ में पकड़ लिया.

अब मैं औरत जात करती भी तो इस समय क्या करती. और ऊपर से मेरे लाख न चाहते हुए भी मेरी चूत गीली होने लग गयी. इस साली चूत का भी अपना ही दिमाग है. यह यह नहीं देखती की उसे मसलने वाला हाथ उसके पति का है या ससुर का. बस उसे किसी की ऊँगली लगी नहीं कि चूत अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए अपना रस छोड़ने लग पड़ती है.

मैं अभी सोच ही रही थी कि क्या करूँ तभी बाबूजी ने अपनी एक ऊँगली मेरी गीली हो चुकी चूत में घुसा दी. और अपने अंगूठे को मेरी भगनासा पर रख कर उसे रगड़ना शुरू कर दिया. मेरी भगनासा उन्होंने अपने अंगूठे और पहली ऊँगली से पकड़ ली और उसे मसलने लगे और दूसरी ऊँगली मेरी भीगी चूत में सरका दी.

यह मेरे लिए सहन करने की शक्ति से अधिक था. न चाहते हुए भी मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी. जो भगवान् की दया से ऑटो के शोर में किसी ने ना सुनी,

मैंने अपने पति की तरफ डर के मारे देखा कि कहीं उन्हें तो पता नहीं चल गया पर वो तो शराब के नशे में ऑटो दे डंडे से लगे ऊँघ रहे थे और मेरा बेटा तो सो ही रहा था.

अब स्थिति मेरे काबू से बाहर हो रही थी. बाबूजी तो ऐसे बैठे थे कि जैसे उन जैसा शरीफ आदमी इस दुनिया में कोई है ही नहीं. यह तो मुझे ही पता था उनकी शराफत का, जिसकी चूत में बाबूजी की ऊँगली घुसी हुई थी और दूसरा हाथ बाबूजी के तने हुए लौड़े पर था.

मैंने बाबूजी की तरफ देखा और नजरों से उन्हें मिन्नत की, और ना में गर्दन हिला कर उन्हें हाथ बाहर करने का इशारा किया, पर बाबूजी ने तो मुझे आँख मार दी और मुस्कुरा कर मजा लेने का इशारा किया.

अब बाबूजी को दो मिनट मेरी चूत में ऊँगली करते हो गए थे. मेरी चूत बहुत गीली हो गयी थी. उधर मेरी भगनासा का दाना भी बाबूजी मसल रहे थे.

अचानक बाबूजी ने अपनी एक और ऊँगली मेरी चूत में घुसेड़ दी. बाबूजी की तो ऊँगली भी किसी छोटे मोटे लण्ड से कम थोड़े ही थी.

मेरे मुंह से एक आह की आवाज निकल गयी, दो उँगलियाँ चूत में जाते ही, मैंने अपने पति वाले साइड के हाथ से उन्हें रोकना चाहा, इसका असर यह हुआ कि मेरा ध्यान चूत वाली साइड में हो गया, और लौड़े पर रखे हाथ की मुठी अपने आप खुल गयी.

बाबूजी को ध्यान उसी पर था. ज्योंही मेरी मुठी खुली बाबूजी ने तुरंत मेरी उँगलियाँ अपने लौड़े के ऊपर लपेट दी और अपनी मुठी मेरी उँगलियों पर कस ली.

अब मेरे हाथ में उनका लण्ड पूरी मुठी में था. उनका लौड़ा इतना मोटा था कि मेरी उँगलियाँ उस पर पूरी तरह से नहीं आ पा रही थी,

मैं तो बुरी तरह फंस गयी थी, मेरी चूत में बाबूजी की दो उँगलियाँ घुसी हुई थी और हाथ में उनका लौड़ा था. जिस पर बाबूजी ने अपना हाथ रखा था ताकि मैं अपना हाथ उनके लण्ड से हटा ना सकूँ.

वैसे सच कहु तो कुछ अच्छा भी लग रहा था. इस तरह की हरकतें जवान लोग या कॉलेज के स्टूडेंट्स करते हैं, यह तो सुना था पर आज मुझे अधेड़ औरत के साथ भी ऑटो में यह छेड़खानी हो रही थी. और वो भी अपने ही ससुर के हाथों.

मन में रोमांच भी हो रहा था. मेरे पति और बेटे के सामने मेरे ससुर मेरी चूत में ऊँगली कर रहे थे. बहुत अजीब सा लग रहा था. मैंने भी बाबूजी के साथ सेक्स का सोच रखा था पर यह जो ऑटो में हो रहा है, यह तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

अब बाबूजी ने मेरे हाथ, जो उनके लण्ड पर लिपटा हुआ था को अपने हाथ जो उसके ऊपर रखा था, सो आगे पीछे करना शुरू कर दिया. धीरे धीरे सेहला रहे थे जैसे मुठ मार रहे हों. मैं शर्म से मरी जा रही थी. पर कुछ कर नहीं पा रही थी.

मैंने सोचा की बाबूजी के लण्ड को जोर से कस कर दबा देती हूँ ताकि दर्द होने से बाबूजी मेरा हाथ छोड़ देंगे, तो मैंने अपनी लण्ड पर लिपटी हुई उँगलियों से उनके लौड़े को जोर से दबा दिया.

मैं तो हैरान ही हो गयी. बाबूजी का लण्ड तो इतना सख्त था की जैसे कोई लोहे की रॉड हो. इतना टाइट कि दब तो बिलकुल नहीं पाया. और ऊपर से गर्म इतना कि जैसे आग से तप रहा हो. मेरे पति का लैंड मैंने इतने जोर से दबाया होता तो बेचारे चीख उठते, पर बाबूजी को तो मजा आया. उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए शाबाशी दी जैसे मैंने जान बूझ कर उन्हें मजा देने के लिए लौड़ा दबाया हो. और आँखों में ही ऐसे ही करने का इशारा किया.

अपनी आँखों में उन्हें देखते और शाबाशी देने से मुझे तो इतनी शर्म आ रही थी कि क्या बताऊँ, पर कुछ कर भी नहीं सकती थी,

सच कहूँ तो मझे भी अच्छा तो लग रहा था, क्योंकि आखिर थी तो मैं एक औरत ही, आप मेरी स्थिति का सोचिये तो मेरी भी कामवासना भड़क रही थी,

इधर जो बीते कुछ दिनों से बाबूजी के साथ छेड़खानी चल रही थी उसका भी हाथ था.

अब बाबूजी ने मेरी चूत में ऊँगली अंदर बाहर करने की स्पीड तेज कर दी.

पता नहीं क्यों पर अब मैं उनके हाथ को रोकने की उतनी कोशिश भी नहीं कर रही थी.

चूत एक तो इतने दिनों से चुदी नहीं थी, तो उसका गीला होना और मुझे आनंद आना तो स्वाभाविक ही था.

बाबूजी अब जोर जोर और अधिक स्पीड से उँगलियों से मेरी चूत चोद रहे थे.

पता नहीं कब अपने आप मेरी टांगें खुल कर फ़ैल गयी और बाबूजी को अपनी हरकतों के लिए और स्थान मिल गया और ऊँगली चुदाई तेजी से होने लगी.

मैंने अपना मुंह में अपनी शाल डाल ली ताकि मेरे मुंह से अपने आप निकल रही सिसकारियों की आवाज बाहर ना आ सके.

ऐसे मजे में अपने आप मेरा हाथ बाबूजी के लौड़े पर चलने लग गया. और अब बाबूजी को अपने हाथ से मेरे हाथ को हिलाने की जरूरत नहीं थी, मैं ना चाहते हुए अपने आप अब बाबूजी की मुठ मार रही थी.

बाबूजी का लौड़ा मेरे पति के लौड़े से दुगना मोटा और बहुत बड़ा था. मैंने अपनी जिंदगी में पति के इलावा यह दूसरा लण्ड पकड़ा था. लौड़ा इतना सख्त और मोटा होता है, मुझे आज ही पता चला.

बाबूजी ने जब देखा कि अब मैं अपने आप ही उनकी मुठा मार रही हूँ, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर से हटा कर मेरी चूँचियों पर रख लिया और मेरे मुम्मे दबाने सहलाने लगे.

उनका हाथ हटते ही एकबार तो मैंने सोचा कि उनका लण्ड छोड़ दूँ, पर बाबूजी की मुठ मारने में इतना अच्छा लग रहा था कि मैं उनकी मुठ मारने में लगी रही.

अब पूरी बेशर्मी से हम दोनों ससुर बहु एक दुसरे के शरीर से मजे ले रहे थे.

मैंने सोच लिया कि अब जब यह सब हो ही रहा है, और हम दोनों चाहते भी यही थे, तो एकदिन तो यह सब होना ही था. तो चलो आज हो ही जाने दो,

मैं अब पूरी स्पीड से बाबूजी की मुठ मार रही थे और बाबूजी मेरी चूत में दो उँगलियाँ अंदर बाहर कर रहे थे, किसी को कुछ दिखाई न दे इस लिए मैंने शाल को थोड़ा फैला लिया और मेरा मुठ मार रहा हाथ भी छुपा लिया.

अब हम ससुर बहु चलते ऑटो में खुल कर मजा ले रहे थे.

मैंने अपने पति की तरफ देखा तो वो नशे में खर्राटे ले रहे थे. मुझे उन पर बहुत घृणा आयी और मन ही मन गाली देते बोली

"सो ले कंजर, और कर नशा. देख तेरे सामने ही तेरा बाप तेरी बीवी की चूत में ऊँगली फेर रहाहै और तेरी बीवी अपने ससुर की मुठ मार रही है. तू सोता रह."

मैंने पूरा ध्यान बाबूजी पर किया और आनंद लेने लगी.

मैंने मुठ मारना तेज किया तो बाबूजी ने भी चूत में ऊँगली तेज कर दी और मेरे मुम्मे भी जोर से मसलने लगे. हम दोनों ससुर बहु स्वर्ग में थे.

एक तो मैं इतने दिन से चुदी नहीं थी, दुसरे रोज बाबूजी के साथ छेड़खानी और सेक्सी बातों से मैं बहुत चुदासी हो रही थी. ऊपर से यह पति बच्चे और ड्राइवर के सामने इस तरह की हरकत, मैं बता नहीं सकती कि कितना मजा आ रहा था.

दोनों ससुर बहु को मजा लेते अब काफी देर हो चुकी थी,. मेरा स्खलन भी पास ही था. लगता है बाबूजी का भी काम तमाम होने ही वाला था.

बाबूजी मेरी ओर देखते हुए बोले

"सुषमा! लगता है अपनी मंजिल दूर नहीं है, जल्दी ही अपने मुकाम पर पहुँच जायेंगे."

यह कहते हुए बाबूजी ने मेरी आँखों में देखते हुए अपने लौड़े की तरफ इशारा किया, ताकि मैं समझ जाऊ कि किस मंजिल की बात है.

मेरा भी काम होने वाला था. तो मैं भी मुस्कुराते हुए बोली

"हाँ बाबूजी! मुझे भी लगता है कि पहुँचने में मुश्किल से १-२ मिनट ही बाकी हैं. जरा तेज हाथ चलाया जाये, मतलब गाड़ी की स्पीड बढ़ा दें तो और भी जल्दी पहुँच जायेंगे.." ऑटो ड्राइवर तो अपनी ही धुन में मस्त था.

बाबूजी मेरी दोअर्थी बात पर मुस्कुरा पड़े. उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकल कर मुठ मार रहे मेरे हाथ में दे दिया. मैं जान गयी कि बाबूजी ने मुझे यह क्यों दिया है.

मैंने तुरंत वो रुमाल बाबूजी के लौड़े पर लपेट लिया और तेजी से मुठ मारना चालू किया.

बाबूजी की भी उँगलियाँ बिजली की तेजी से मेरे अंदर चल रही थी. अचानक मेरी चूत ने एक जोर का झटका खाया और मेरी चूत ने छर छर अपना पानी छोड़ना शुरू कर दिया. मैंने काफी सारी शाल अपने मुंह में दबा ली ताकि मेरी सिसकारियां उस में ही दब जाएँ.

मेरी चूत ने पहली बार बाबूजी के हाथ से पानी निकाला था तो बहुत पानी निकला. बाबूजी का पूरा हाथ भीग गया. मैंने भी जोर जोर से बाबूजी के लण्ड पर सड़का मारा और बाबूजी का भी शरीर कांपने लगा. और उनके लौड़े ने भी ढेर सा घाड़ा घाड़ा माल छोड़ दिया..

मैं तो पहले से ही तैयार थी और बाबूजी का सारा वीर्य मैंने रुमाल में ले लिया.

पर बाबूजी के लण्ड ने इतना माल निकाला की रुमाल भर जाने के बाद भी मेरे हाथ भी उस से भर गए.

थोड़ी देर बाद बाबूजी के लण्ड ने झटके मारने बंद किये, तो मैंने उसे छोड़ दिया.

मैंने रुमाल ऑटो के फर्श पर ही फेंक दिया, जिसे पैर से बाबूजी ने धकेल कर ऑटो से बाहर फेंक दिया. चलते ऑटो में और रात में किसी को पता नहीं चला.

मेरे हाथ अभी भी बाबूजी के वीर्य से ही भरे थे, मैंने उन्हें शाल से पोंछना चाहा तो इशारे से बाबूजी ने मुझे रोक दिया और मेरी सलवार से मेरे चूत रस से भीगा अपना हाथ निकाला और उसे चाटना शुरू कर दिया. और इशारे से मुझे भी अपना वीर्य भरा हाथ चाट कर साफ़ करने को कहा.

बहुत ही कामुक दृश्य था. मेरे सामने मेरे ससुर मेरे चूत रस को चाट रहे थे. और मैंने भी शर्म लिहाज छोड़ कर बाबूजी के माल को अपने हाथ से चाटना शुरू कर दिया.

बाबूजी का वीर्य बहुत ही स्वादिष्ट था. मैं सोच रही थी कि कब मुझे यह माल सीधे लौड़े से ही चूस कर चाटने को मिलेगा.

इतने में हमारा घर आ गया.

मेरे पति और बेटा भी उठ गए और हम घर में चले गए.

मैं रात में अपने पति से होने वाली संभावित चुदाई के बारे में ही सोच रही थी.
 
अगले दिन दोपहर को मेरे पति का फोन आया. उन्होंने कहा की वे आज शाम की ट्रैन से रात को लगभग ८ बजे आ जायेंगे.

मैं उन के आने की खबर सुन कर खुश भी हुई की मेरे पति कई दिनों के बाद आएंगे और आज मेरी चुदाई भी होगी, क्योंकि काफी दिन हो गए थे चुदे हुए तो मेरी काम वासना भी बढ़ गयी थी.

उधर मेरे ससुर की हरकतों से मेरा चुदने का बहुत मन हो रहा था. बस दिल कर रहा था की कोई मोटा सा लौड़ा मेरे अंदर घुस जाये.

पर ना जाने क्यों मैं अपने पति के आने की खबर से कुछ अंदर ही अंदर उदास भी थी.

जाने क्यों ससुर के साथ छेड़खानी और शरारत अच्छी लग रही थी, मैं उनसे चुदने को शायद अभी मन से तैयार नहीं थी. पर उन का साथ अच्छा लग रहा था.

खैर पति के आने की खबर से मेरा बेटा भी बहुत खुश हुआ और बोला की आज पापा कई दिन के बाद आ रहे है तो हम उनको लेने स्टेशन जायेंगे.

बाबूजी भी बेटे के आने से कुछ उदास थे, उन्हें भी लग रहा था की अपनी बहु को चोद पाने का मौका अब शायद न मिले, पर वो भी क्या कर सकते थे.

तो हम रात को स्टेशन पर चले गए. हमारे पास अपनी गाडी तो थी नहीं तो ऑटो में आने जाने का सोचा.

ट्रेन रात में 8 बजे आ गयी. पति बाहर आये तो उन्हें देख कर दिल ही बुझ गया.

पति शराब में टुन्न थे. उनसे तो ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. बेटा भी उनसे मिल कर दुखी हुआ.

लगता था कि वो ट्रेन में ही शराब पीते आये थे.

खैर अब तो यह उनकी रोज की आदत बन गयी थी, बोलने या लड़ने का कोई फायदा नहीं था.

मैं तो डबल उदास हुई, पति की हालत देख कर बिलकुल भी नहीं लगता था कि वो मेरी चुदाई कर भी पाएंगे, मेरे तो जैसे सपने ही ढह गए.

बाबूजी ने ऑटो को बुलाया और घर जाने को बुक किया.

रात थी तो अँधेरा भी हो गया था. और ठण्ड भी लग रही थी. मैंने तो शाल भी ले रखी थी,

ऑटो वाले ने एक साइड से तो ऑटो को कपडे से बंद किया हुआ था ताकि ठंडी हवा ना आये और दूसरी साइड से ही सवारी के लिए खुला रखा था.

सबसे पहले तो बाबूजी औरो में घुसे। फिर मेरे पति अंदर घुसने लगे तो बाबूजी ने उसे डांट दिया और कहा कि उस से शराब की बदबू आ रही है, तो वो उनसे दूर ही बैठे.

अब मुझे ही बाबूजी से लग कर बैठना पड़ा. फिर मेरे पति बैठे और जो एक छोटा सा फट्टा ड्राइवर ने अपने पीछे सवारी के लिए लगाया होता है उस पर मेरा बेटा बैठा. ऑटो क्योंकि छोटा होता है तो हम तीनो फंस कर ही बैठे थे. मेरे जाँघे बाबूजी की टांगों से लगी हुई थी. एक तो रात का अँधेरा और उस पर ऑटो में हम चिपक कर बैठे थे. पति के पास जो बैग था वो मैंने अपनी गोद में रख लिया और उस पर मेरे बेटे ने सर रख लिया..

अब स्थिति यह थी की बाबूजी अंत में बैठे थे, और उनके साइड में ऑटो कपडे से बंद था, बाबूजी से सत कर मैं बैठी थी और किनारे पर पति थे.

बाहर से किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था. और बेटे के कारण ड्राइवर भी हमें देख नहीं सकता था.

मेरे पति तो बस ऑटो में बैठते ही, अपनी साइड के रॉड पर सर रख कर ऊँघने लगे.

एक तरह से हम दोनों बाबूजी और मैं ही जाग रहे थे.

हमारा घर लगभग १ घंटे की दूरी पर था.

ऑटो चलते हुए पांच मिनट ही हुए थे की बेटा भी मेरी गोद में ऊँघने लग गया.

बाबूजी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए उनकी आँखों में शरारत की चमक थी, मैं समज रही थी की बाबूजी के मन में कुछ तो चल रहा है. आज यह पहली बार था की बाबूजी मेरे से इतना सट कर बैठे थे. तभी बाबूजी ने अपनी टांग मेरी टांग से मिला दी.

मैंने उनकी तरफ देखा, बाबूजी दूसरी तरफ मुंह किये मुस्कुरा रहे थे.

अचानक से बाबूजी ने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया. मैं एकदम से हिल सी गयी.

मैंने हिल कर उनका हाथ हटाना चाहा तो बाबूजी ने अपना हाथ हटा कर मेरे पेट पर रख दिया.

मैं चुप रही कि देखते हैं कि बाबूजी बाबूजी क्या करते हैं, जब बाबूजी ने मुझे कुछ भी ना कहते पाया तो उन्होंने अपना हाथ मेरी कमीज के अंदर घुसा कर मेरे नंगे पेट पर रख दिया. मैं एकदम से घबरा गयी. मेरे पति मेरे पास ही बैठे थे और मेरा बेटा मेरी गोद में सो रहा था और बाबूजी यह हरकत कर रहे थे.

हालाँकि उनका हाथ कमीज के अंदर था और ऊपर से मैंने शाल भी ले राखी थी, तो किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था पर मैंने बाबूजी का हाथ पकड़ कर बाहर निकालना चाहा पर बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर ही रखा.

मैं सब के सामने ऑटो में जोर आजमाईश तो कर नहीं सकती थी, तो थोड़ी देर कोशिश करने के बाद मैं चुप कर गयी और बाबूजी का हाथ रहने दिया.

बाबूजी मेरे इस सहयोग से बहुत खुश हो गए और अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर सहलाने लगे.

अब मेरे बाबूजी को तो आप जानते ही हैं. जब मैंने अपना हाथ हटाया तो तुरंत उन्होंने मेरे पेट पर से हटा कर ऊपर मेरी छाती पर रख दिया. और मेरे मुम्मे को सीधा ही पकड़ लिया.

मैं एकदम से चिहुंक पड़ी. इधर मेरे पति मेरे पास बैठे थे, और मेरे ससुर ने जिंदगी में पहली बार मेरा मम्मा पकड़ लिया था. मैं करती भी तो क्या करती.

कुछ बोल भी तो नहीं सकती थी, मैंने अपना हाथ फिर से कमीज में डाल कर उनके हाथ को पकड़ लिया और उनकी तरफ गुस्से की नजरों से देखा.

बाबूजी मुझे देखते ही एक आँख मार दी, मैं शर्मा गयी. क्या करती. बाबूजी का हाथ कमीज के तो अंदर था ही तब तक बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे ब्रा के अंदर घुसेड़ कर मेरा नंगा मुम्मा पकड़ लिया और उसे दबाने लगे.

मेरी स्थिति बड़ी अजीब थी. पहली बार कोई गैर मर्द मेरी छाती दबा रहा था. और वो भी मेरे पति ही,

मैंने पति की तरफ देखा, वो तो शराब के नशे में ऊंघ रहे थे. मुझे बड़ा गुस्सा आया.

अब तक ससुर जी ने मेरे एक निप्पल को अपने अंगूठे और ऊँगली में दबा लिया और उसे सहलाने लगे. मेरे शरीर में तो आग ही लग गयी थी,

मैंने जोर से बाबूजी का हाथ अपने हाथ से पकड़ कर नीचे पेट की तरफ खींच दिया और ब्रा से बाहर निकाल दिया.

लेकिन उसका एक असर यह हुआ कि जो बाबूजी ने मेरी छाती हाथ में पकड़ी थी, हाथ जोर से नीचे खींचने के कारण मेरा मुम्मा भी ब्रा से बाहर निकल कर आ गया. और वो अब ब्रा से बाहर और कमीज के अंदर था.

मैंने सोचा कि उसे तो मैं बाद में अंदर कर लूंगी, पहली बाबूजी का हाथ तो रोकूं किसी तरह.

उधर बाबूजी अपने दुसरे हाथ से पता नहीं क्या कर रहे थे. वो हाथ उनके लण्ड पर था, शायद उसे मसल रहे होंगे हमेशा की तरह.

बाबूजी ने अपना हाथ जो मेरे पेट पर घूम रहा था उसे मेरी सलवार के अंदर घुसेड़ने की कोशिश की.

वो मेरी चूत पर जाना चाहते थे. मैंने सलवार के नाड़े में घुसता हुआ उनका हाथ एकदम से पकड़ लिया. बाबूजी नई दुसरे हाथ से मेरा वो हाथ जोर से पकड़ा और अपनी गोद में खींचा. जब तक मैं कुछ समझती बाबूजी ने मेरा वो हाथ अपने नंगे लौड़े पर रख दिया. (अब मैं समझी कि बाबूजी ने अपना लण्ड अपनी धोती से बाहर निकाल लिया था.)

अपना हाथ बाबूजी के गर्म गर्म लौड़े पर लगते ही मैं तो लगभग उछल ही पड़ी. बाबूजी इतनी हिम्मत करेंगे वो भी मेरे पति और बच्चे के सामने, यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था.

बाबूजी मुझे अपना लौड़ा पकड़वाना चाह रहे थे. पर मैंने जोर से अपनी मुठी बंद कर ली और अपना हाथ वापिस खींचने लगी. अब इस स्थिति में जबकि मेरे पति और बेटा पास में थे और सामने ऑटो ड्राइवर गाड़ी चला रहा था तो मैं कुछ बोल तो नहीं सकती थी. बस जोर से अपनी मुठी भींच रखी और उसे बाबूजी के लण्ड पर से वापिस खींचने लगी.

पर बाबूजी भी पुराने घाघ और पहलवान थे. उन में बहुत जोर था. उन्होंने अपने हाथ से मेरे मुठी भरे हाथ को कस के पकडे रखा और मुझे वापिस नहीं लेने दिया.

अब चलते ऑटो में मैं बाबूजी के साथ कुश्ती को कर नहीं सकती थी. बस जोर लगाती रही. बाबूजी के लाख कोशिश करने पर भी कि मैं उनके लौड़े को पकड़ लूँ, मैंने मुठी नहीं खोली.

अब मेरा सारा ध्यान मेरे इस लौड़े पर ठीके हुए हाथ पर था तो बाबूजी ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाते हुए अपना दूसरा हाथ झट से मेरी सलवार के अंदर घुसा दिया और मेरी उसे जोर से अंदर धकेलते हुए सीधे मेरी चूत पर ले आये और मेरी चूत को अपनी मुठी में भींच लिया.

मैं तो इस दोतरफा हमले से घबरा गयी. क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था.

बाबूजी ने एक हाथ से मेरी मुठी वाले हाथ को अपने अकड़े हुए लौड़े पर टिका रखा था. और दुसरे से मेरी नंगी चूत को पकड़ रखा था.

शायद आज भगवन भी मेरी तरफ नहीं था. आज मैंने कच्छी भी नहीं पहन राखी थी. और अपनी चूत को बिलकुल साफ़ भी कर रखा था. आज मेरे पति जो आ रहे थे.

पर इस का भरपूर लाभ मेरे ससुर को मिल रहा था. उन्होंने मेरी चूत को कस के अपने हाथ में पकड़ लिया.

अब मैं औरत जात करती भी तो इस समय क्या करती. और ऊपर से मेरे लाख न चाहते हुए भी मेरी चूत गीली होने लग गयी. इस साली चूत का भी अपना ही दिमाग है. यह यह नहीं देखती की उसे मसलने वाला हाथ उसके पति का है या ससुर का. बस उसे किसी की ऊँगली लगी नहीं कि चूत अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए अपना रस छोड़ने लग पड़ती है.

मैं अभी सोच ही रही थी कि क्या करूँ तभी बाबूजी ने अपनी एक ऊँगली मेरी गीली हो चुकी चूत में घुसा दी. और अपने अंगूठे को मेरी भगनासा पर रख कर उसे रगड़ना शुरू कर दिया. मेरी भगनासा उन्होंने अपने अंगूठे और पहली ऊँगली से पकड़ ली और उसे मसलने लगे और दूसरी ऊँगली मेरी भीगी चूत में सरका दी.

यह मेरे लिए सहन करने की शक्ति से अधिक था. न चाहते हुए भी मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी. जो भगवान् की दया से ऑटो के शोर में किसी ने ना सुनी,

मैंने अपने पति की तरफ डर के मारे देखा कि कहीं उन्हें तो पता नहीं चल गया पर वो तो शराब के नशे में ऑटो दे डंडे से लगे ऊँघ रहे थे और मेरा बेटा तो सो ही रहा था.

अब स्थिति मेरे काबू से बाहर हो रही थी. बाबूजी तो ऐसे बैठे थे कि जैसे उन जैसा शरीफ आदमी इस दुनिया में कोई है ही नहीं. यह तो मुझे ही पता था उनकी शराफत का, जिसकी चूत में बाबूजी की ऊँगली घुसी हुई थी और दूसरा हाथ बाबूजी के तने हुए लौड़े पर था.

मैंने बाबूजी की तरफ देखा और नजरों से उन्हें मिन्नत की, और ना में गर्दन हिला कर उन्हें हाथ बाहर करने का इशारा किया, पर बाबूजी ने तो मुझे आँख मार दी और मुस्कुरा कर मजा लेने का इशारा किया.

अब बाबूजी को दो मिनट मेरी चूत में ऊँगली करते हो गए थे. मेरी चूत बहुत गीली हो गयी थी. उधर मेरी भगनासा का दाना भी बाबूजी मसल रहे थे.

अचानक बाबूजी ने अपनी एक और ऊँगली मेरी चूत में घुसेड़ दी. बाबूजी की तो ऊँगली भी किसी छोटे मोटे लण्ड से कम थोड़े ही थी.

मेरे मुंह से एक आह की आवाज निकल गयी, दो उँगलियाँ चूत में जाते ही, मैंने अपने पति वाले साइड के हाथ से उन्हें रोकना चाहा, इसका असर यह हुआ कि मेरा ध्यान चूत वाली साइड में हो गया, और लौड़े पर रखे हाथ की मुठी अपने आप खुल गयी.

बाबूजी को ध्यान उसी पर था. ज्योंही मेरी मुठी खुली बाबूजी ने तुरंत मेरी उँगलियाँ अपने लौड़े के ऊपर लपेट दी और अपनी मुठी मेरी उँगलियों पर कस ली.

अब मेरे हाथ में उनका लण्ड पूरी मुठी में था. उनका लौड़ा इतना मोटा था कि मेरी उँगलियाँ उस पर पूरी तरह से नहीं आ पा रही थी,

मैं तो बुरी तरह फंस गयी थी, मेरी चूत में बाबूजी की दो उँगलियाँ घुसी हुई थी और हाथ में उनका लौड़ा था. जिस पर बाबूजी ने अपना हाथ रखा था ताकि मैं अपना हाथ उनके लण्ड से हटा ना सकूँ.

वैसे सच कहु तो कुछ अच्छा भी लग रहा था. इस तरह की हरकतें जवान लोग या कॉलेज के स्टूडेंट्स करते हैं, यह तो सुना था पर आज मुझे अधेड़ औरत के साथ भी ऑटो में यह छेड़खानी हो रही थी. और वो भी अपने ही ससुर के हाथों.

मन में रोमांच भी हो रहा था. मेरे पति और बेटे के सामने मेरे ससुर मेरी चूत में ऊँगली कर रहे थे. बहुत अजीब सा लग रहा था. मैंने भी बाबूजी के साथ सेक्स का सोच रखा था पर यह जो ऑटो में हो रहा है, यह तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

अब बाबूजी ने मेरे हाथ, जो उनके लण्ड पर लिपटा हुआ था को अपने हाथ जो उसके ऊपर रखा था, सो आगे पीछे करना शुरू कर दिया. धीरे धीरे सेहला रहे थे जैसे मुठ मार रहे हों. मैं शर्म से मरी जा रही थी. पर कुछ कर नहीं पा रही थी.

मैंने सोचा की बाबूजी के लण्ड को जोर से कस कर दबा देती हूँ ताकि दर्द होने से बाबूजी मेरा हाथ छोड़ देंगे, तो मैंने अपनी लण्ड पर लिपटी हुई उँगलियों से उनके लौड़े को जोर से दबा दिया.

मैं तो हैरान ही हो गयी. बाबूजी का लण्ड तो इतना सख्त था की जैसे कोई लोहे की रॉड हो. इतना टाइट कि दब तो बिलकुल नहीं पाया. और ऊपर से गर्म इतना कि जैसे आग से तप रहा हो. मेरे पति का लैंड मैंने इतने जोर से दबाया होता तो बेचारे चीख उठते, पर बाबूजी को तो मजा आया. उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए शाबाशी दी जैसे मैंने जान बूझ कर उन्हें मजा देने के लिए लौड़ा दबाया हो. और आँखों में ही ऐसे ही करने का इशारा किया.

अपनी आँखों में उन्हें देखते और शाबाशी देने से मुझे तो इतनी शर्म आ रही थी कि क्या बताऊँ, पर कुछ कर भी नहीं सकती थी,

सच कहूँ तो मझे भी अच्छा तो लग रहा था, क्योंकि आखिर थी तो मैं एक औरत ही, आप मेरी स्थिति का सोचिये तो मेरी भी कामवासना भड़क रही थी,

इधर जो बीते कुछ दिनों से बाबूजी के साथ छेड़खानी चल रही थी उसका भी हाथ था.

अब बाबूजी ने मेरी चूत में ऊँगली अंदर बाहर करने की स्पीड तेज कर दी.

पता नहीं क्यों पर अब मैं उनके हाथ को रोकने की उतनी कोशिश भी नहीं कर रही थी.

चूत एक तो इतने दिनों से चुदी नहीं थी, तो उसका गीला होना और मुझे आनंद आना तो स्वाभाविक ही था.

बाबूजी अब जोर जोर और अधिक स्पीड से उँगलियों से मेरी चूत चोद रहे थे.

पता नहीं कब अपने आप मेरी टांगें खुल कर फ़ैल गयी और बाबूजी को अपनी हरकतों के लिए और स्थान मिल गया और ऊँगली चुदाई तेजी से होने लगी.

मैंने अपना मुंह में अपनी शाल डाल ली ताकि मेरे मुंह से अपने आप निकल रही सिसकारियों की आवाज बाहर ना आ सके.

ऐसे मजे में अपने आप मेरा हाथ बाबूजी के लौड़े पर चलने लग गया. और अब बाबूजी को अपने हाथ से मेरे हाथ को हिलाने की जरूरत नहीं थी, मैं ना चाहते हुए अपने आप अब बाबूजी की मुठ मार रही थी.

बाबूजी का लौड़ा मेरे पति के लौड़े से दुगना मोटा और बहुत बड़ा था. मैंने अपनी जिंदगी में पति के इलावा यह दूसरा लण्ड पकड़ा था. लौड़ा इतना सख्त और मोटा होता है, मुझे आज ही पता चला.

बाबूजी ने जब देखा कि अब मैं अपने आप ही उनकी मुठा मार रही हूँ, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर से हटा कर मेरी चूँचियों पर रख लिया और मेरे मुम्मे दबाने सहलाने लगे.

उनका हाथ हटते ही एकबार तो मैंने सोचा कि उनका लण्ड छोड़ दूँ, पर बाबूजी की मुठ मारने में इतना अच्छा लग रहा था कि मैं उनकी मुठ मारने में लगी रही.

अब पूरी बेशर्मी से हम दोनों ससुर बहु एक दुसरे के शरीर से मजे ले रहे थे.

मैंने सोच लिया कि अब जब यह सब हो ही रहा है, और हम दोनों चाहते भी यही थे, तो एकदिन तो यह सब होना ही था. तो चलो आज हो ही जाने दो,

मैं अब पूरी स्पीड से बाबूजी की मुठ मार रही थे और बाबूजी मेरी चूत में दो उँगलियाँ अंदर बाहर कर रहे थे, किसी को कुछ दिखाई न दे इस लिए मैंने शाल को थोड़ा फैला लिया और मेरा मुठ मार रहा हाथ भी छुपा लिया.

अब हम ससुर बहु चलते ऑटो में खुल कर मजा ले रहे थे.

मैंने अपने पति की तरफ देखा तो वो नशे में खर्राटे ले रहे थे. मुझे उन पर बहुत घृणा आयी और मन ही मन गाली देते बोली

"सो ले कंजर, और कर नशा. देख तेरे सामने ही तेरा बाप तेरी बीवी की चूत में ऊँगली फेर रहाहै और तेरी बीवी अपने ससुर की मुठ मार रही है. तू सोता रह."

मैंने पूरा ध्यान बाबूजी पर किया और आनंद लेने लगी.

मैंने मुठ मारना तेज किया तो बाबूजी ने भी चूत में ऊँगली तेज कर दी और मेरे मुम्मे भी जोर से मसलने लगे. हम दोनों ससुर बहु स्वर्ग में थे.

एक तो मैं इतने दिन से चुदी नहीं थी, दुसरे रोज बाबूजी के साथ छेड़खानी और सेक्सी बातों से मैं बहुत चुदासी हो रही थी. ऊपर से यह पति बच्चे और ड्राइवर के सामने इस तरह की हरकत, मैं बता नहीं सकती कि कितना मजा आ रहा था.

दोनों ससुर बहु को मजा लेते अब काफी देर हो चुकी थी,. मेरा स्खलन भी पास ही था. लगता है बाबूजी का भी काम तमाम होने ही वाला था.

बाबूजी मेरी ओर देखते हुए बोले

"सुषमा! लगता है अपनी मंजिल दूर नहीं है, जल्दी ही अपने मुकाम पर पहुँच जायेंगे."

यह कहते हुए बाबूजी ने मेरी आँखों में देखते हुए अपने लौड़े की तरफ इशारा किया, ताकि मैं समझ जाऊ कि किस मंजिल की बात है.

मेरा भी काम होने वाला था. तो मैं भी मुस्कुराते हुए बोली

"हाँ बाबूजी! मुझे भी लगता है कि पहुँचने में मुश्किल से १-२ मिनट ही बाकी हैं. जरा तेज हाथ चलाया जाये, मतलब गाड़ी की स्पीड बढ़ा दें तो और भी जल्दी पहुँच जायेंगे.." ऑटो ड्राइवर तो अपनी ही धुन में मस्त था.

बाबूजी मेरी दोअर्थी बात पर मुस्कुरा पड़े. उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकल कर मुठ मार रहे मेरे हाथ में दे दिया. मैं जान गयी कि बाबूजी ने मुझे यह क्यों दिया है.

मैंने तुरंत वो रुमाल बाबूजी के लौड़े पर लपेट लिया और तेजी से मुठ मारना चालू किया.

बाबूजी की भी उँगलियाँ बिजली की तेजी से मेरे अंदर चल रही थी. अचानक मेरी चूत ने एक जोर का झटका खाया और मेरी चूत ने छर छर अपना पानी छोड़ना शुरू कर दिया. मैंने काफी सारी शाल अपने मुंह में दबा ली ताकि मेरी सिसकारियां उस में ही दब जाएँ.

मेरी चूत ने पहली बार बाबूजी के हाथ से पानी निकाला था तो बहुत पानी निकला. बाबूजी का पूरा हाथ भीग गया. मैंने भी जोर जोर से बाबूजी के लण्ड पर सड़का मारा और बाबूजी का भी शरीर कांपने लगा. और उनके लौड़े ने भी ढेर सा घाड़ा घाड़ा माल छोड़ दिया..

मैं तो पहले से ही तैयार थी और बाबूजी का सारा वीर्य मैंने रुमाल में ले लिया.

पर बाबूजी के लण्ड ने इतना माल निकाला की रुमाल भर जाने के बाद भी मेरे हाथ भी उस से भर गए.

थोड़ी देर बाद बाबूजी के लण्ड ने झटके मारने बंद किये, तो मैंने उसे छोड़ दिया.

मैंने रुमाल ऑटो के फर्श पर ही फेंक दिया, जिसे पैर से बाबूजी ने धकेल कर ऑटो से बाहर फेंक दिया. चलते ऑटो में और रात में किसी को पता नहीं चला.

मेरे हाथ अभी भी बाबूजी के वीर्य से ही भरे थे, मैंने उन्हें शाल से पोंछना चाहा तो इशारे से बाबूजी ने मुझे रोक दिया और मेरी सलवार से मेरे चूत रस से भीगा अपना हाथ निकाला और उसे चाटना शुरू कर दिया. और इशारे से मुझे भी अपना वीर्य भरा हाथ चाट कर साफ़ करने को कहा.

बहुत ही कामुक दृश्य था. मेरे सामने मेरे ससुर मेरे चूत रस को चाट रहे थे. और मैंने भी शर्म लिहाज छोड़ कर बाबूजी के माल को अपने हाथ से चाटना शुरू कर दिया.

बाबूजी का वीर्य बहुत ही स्वादिष्ट था. मैं सोच रही थी कि कब मुझे यह माल सीधे लौड़े से ही चूस कर चाटने को मिलेगा.

इतने में हमारा घर आ गया.

मेरे पति और बेटा भी उठ गए और हम घर में चले गए.

मैं रात में अपने पति से होने वाली संभावित चुदाई के बारे में ही सोच रही थी.
 
घर आने तक काफी अँधेरा हो गया था. तो मेरे बेटे को भी नींद आ रही थी, सो हम सब अपने अपने कमरे में सोने के लिए चले गए.

शर्म के मारे मैं बाबूजी से आँख नहीं मिला पा रही थी,

बाबूजी मेरी तरफ देख रहे थे पर मैंने उन्हकी तरफ ध्यान नहीं दिया. बाबूजी कुछ मायूस से लग रहे थे मेरे बर्ताव के कारण.

मेरी चूत में तो बाबूजी की हरकतों से आग लगी हुई थी, मुझे जल्दी थी कि कब मैं अपने कमरे में जाऊं और मेरे पति मेरी चुदाई कर दें.

पति भी अब तक थोड़ा होश में आ चुके थे. रात में पति ने चुदाई तो करी, आखिर उन्हें भी मुझे चोदे हुए कितने दिन हो गए थे. पर ना जाने क्यों कुछ मजा नहीं आया.

पति का लण्ड हाथ में पकड़ा तो ऐसे लगा कि जैसे किसी बच्चे का लौड़ा हो. न जाने क्यों बार बार बाबूजी के लण्ड से ही मन तुलना करता रहा. और पतिदेव का लौड़ा तो बाबूजी के लण्ड के सामने कहीं ठहरता ही नहीं था.

पति भी 2 - 3 मिनट धक्के मार कर झाड़ गए। फिर मेरा मन बाबूजी के लंड पर चला गया, कितना मोटा और गर्म था. कितनी देर तक में उसे मुठ मारती रही तब कहीं जा कर उसने अपना पानी छोड़ा था. और यहाँ मेरे पति का तो दो मिनट में ही काम तमाम हो गया है.

अगले दिन भी मैं बाबूजी से कटती ही रही. मैंने उनसे कोई बात भी नहीं करि. बस उन्हें चुपचाप नाश्ता और खाना वगैरा दे दिया. मुझे मन मैं अब ग्लानि अनुभव हो रही थी. जिंदगी में मैंने पहली बार किसी दुसरे मर्द का लौड़ा पकड़ा था. और पकड़ा ही नहीं था बल्कि उनकी मुठ भी मारी थी.

चाहे यह सब बाबूजी ने जबरदस्ती किया था. पर सबसे बड़ी बात तो ऊपर से यह थी कि यह सब करने में मुझे भी मजा आया था. उन्होंने मेरी चूत में ऊँगली भी की थी और उसका भी मैंने आनंद लिया था.

मुझे यह अब बुरा लग रहा था. अपने आप पर शर्म आ रही थी.

बाबूजी भी मेरा बदला हुआ मूड देख रहे थे. उन्होंने भी कोई शरारत नहीं करि. हालाँकि शायद मेरे मन में कहीं न कहीं दबी हुई भावना थी कि बाबूजी कुछ छेड़छाड़ करें. पर वो भी शांत थे.

खैर रात में फिर वही हुआ, मेरे पति शराब पी कर आये और कुछ चुदाई ना कर सके. ऐसा ही दो तीन दिन तक चलता रहा. अब मुझे बाबूजी का वो मोटा और सख्त लण्ड ही याद आ रहा था. पर एक पतिव्रता नारी होने के कारण मन को समझा रही थी.

चौथे दिन सुबह ही जब हम अभी चाय ही पी रहे थे कि पति को फिर से ऑफिस से फोन आया कि उन्हें 3 - 4 दिन के लिए ऑफिस के काम से बाहर जाना था. पति ने मुझे उनका बैग पैक करने को बोल दिया.

मेरा तो मन बुझ गया. पर बाबूजी बड़े खुश लग रहे थे. मैं समझ सकती थी उनकी ख़ुशी का राज.

थोड़ी देर बाद पति तो चले गए और मेरा बेटा भी स्कूल चला गया.

घर में अब मैं और बाबूजी ही थे. मुझे लग रहा था कि अब बाबूजी कुछ करेंगे. पर मैं वैसे ही चुप रही और उनसे कोई बात नहीं करी.

थोड़ी देर बाद बाबूजी अपने कमरे में चले गए. और पांच मिनट बाद वापिस आये. उन्होंने मुझे चाय देने को कहा.

चाय पीने के बाद जब मैं खाली कप उठाने गयी तो उन्होंने कप में एक कागज रख दिया.

मेरा दिल धड़क गया. जैसे किसी कॉलेज के लड़की को किसी चाहने वाले ने लव लेटर दिया हो.

मैं हैरान हो गयी और धड़कते दिल से किचन में आ गयी. बाबूजी भी फिर अपने कमरे में चले गए.

किचन में आते ही मैंने वो लेटर खोला, उसे पढ़ने लगी, लिखा था.

"बहुरानी सुषमा! कुछ दिनों से हम ससुर बहु आपस में छेड़खानी कर रहे थे. मुझे लगा कि तुम मुझमे इंट्रस्ट ले रही हो. हम दोनों ने उस दिन ऑटो में भी एक दुसरे के शरीर का आनंद लिया था. और जिसमे तुमने भी खुल कर साथ दिया और मजा लिया था. पर उस दिन के बाद तुम मुझसे कट कर रह रही हो. शायद तुम उसे ठीक नहीं समझ रही. मैं भी समझ नहीं पा रहा कि तुम मुझसे वो वाला सम्बन्ध रखना चाहती हो या नहीं. तुम्हारा व्यवहार मुझे समझ नहीं आ रहा है. मैं तो तुमसे सेक्स सम्बन्ध बनाना चाहता हूँ पर मैं यह सब तुम्हारी मर्जी के बिना और जबरदस्ती नहीं करूँगा. मैं आज रात तुम्हे अपनी चॉकोबार चुसवाना चाहता हूँ और तुम्हारी आइसक्रीम भी चाटना चाहता हूँ. यदि तुम भी मुझसे प्यार करती हो और मेरे साथ यह रिश्ता चालु रखना चाहती हो तो आज हरे रंग की मैक्सी पहन लेना और यदि तुम नहीं चाहती तो कोई भी और रंग की. मैं तुम्हारा जवाब समझ जाऊंगा. यदि तुम चॉकोबार चूसना चाहती हो तो आज रात मैं तुम्हारे कमरे में आऊंगा और हरी मैक्सी अपने हाथ से उतार कर तुम्हे बताऊंगा कि एक असली मर्द क्या होता है और असली मजा क्या होता है. वर्ना मैं समझ जाऊंगा कि तुम यह सम्बन्ध ख़त्म करना चाहती हो, तो मैं तुम्हारे निर्णय से सहमत हूँ. हम आज तक जो भी कुछ हुआ उसे भूल जायेंगे और मैं आज के बाद तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं करूँगा. तुम्हारी मर्जी और साथ के बिना कुछ नहीं होगा. तो या तो आज के बाद हम एक दुसरे के शरीरों से खेलेंगे या कभी नहीं. मुझे तुम्हारे मैक्सी पहन कर दिए गए जवाब का इन्तजार रहेगा. क्या मैं आज तुम्हारी हरी मैक्सी खोलूंगा या तुम कोई और पहन कर सोऊगी? यह निर्णय मैं तुम पर छोड़ता हूँ.."

लेटर पढ़ कर मेरा दिमाग घूम गया. मेरा मन अभी पति और ससुर में डोल रहा था की बाबूजी ने यह बम फोड़ दिया.

मैं वहीँ अपना माथा पकड़ कर बैठ गयी.

एक तरफ बाबूजी जैसे जवान का साथ और दूसरी तरफ समाज की बंदिशें. मैं कहाँ जाऊँ? मैं अभी उन्हें तोड़ने को राजी शायद नहीं थी.

तब तक बाबूजी भी दुबारा ड्राइंग रूम में आ कर बैठ गए थे. यह तो पक्का था कि यदि मैं राजी न होऊं तो बाबूजी जबरदस्ती या बलात्कार नहीं करने वाले थे.

मेरा नहाने का टाइम हो रहा था. बाबूजी के भी दिल की धड़कन बढ़ रही थी.

मैं अपने कमरे में गयी और लाल रंग की मैक्सी (घर में सुविधा के लिए मैं अक्सर मैक्सी ही पहनती थी.) ले कर बाथरूम में चली गयी.

नहा कर उसे पहन कर मैं वापिस आयी. बाबूजी तो धड़कते दिल से मेरे रूम की तरफ ही देख रहे थे. जैसे किसी विद्यार्थी का रिजल्ट आने वाला हो.

मैं लाल मैक्सी पहन कर ज्योंही बाहर आयी, बाबूजी का तो मुंह ही उतर गया.

उनका मुंह बिलकुल छोटा सा हो गया जैसे किसी ने गुब्बारे में से हवा ही निकाल दी हो. बेचारे चुप ही हो गए. उनका इस तरह का मुंह देख कर मेरे दिल में भी हलचल मच गयी.

ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी आशिक़ के प्यार को मेहबूब ने ठुकरा दिया हो. बिलकुल वैसा ही हाल बाबूजी का भी था.

उनके मुंह से कोई बोल नहीं निकला, बेचारे किसी हारे हुए जुआरी की तरह उठ कर अपने कमरे में चले गए.

बाबूजी को इस तरह देख कर मुझे बड़ा दुःख हुआ. सारा दिन बाबूजी अपने कमरे में ही लेटे रहे. बस खाना खाने आये और चुपचाप खाना खा कर फिर अपने कमरे में चले गए.

बाबूजी को इस तरह देख कर मेरे दिल में भी कुछ कुछ हो रहा था. मैं सोचने लगी कि मैंने जो निर्णय लिया वो ठीक था या गलत.

क्या मुझे बाबूजी का प्यार ठुकरा देना चाहिए था या नहीं. सारा दिन मन में यही विचार चलते रहे.

शाम को मेरा बेटा भी आ गया और ड्राइंग रूम में बाबूजी को देख कर उन्हें कमरे से बुला लाया और उन्हें वहां अपने साथ बिठा कर खेलने लगा. बाबूजी भी बच्चे का मन रखने के लिए बैठ गए.,

मेरा भी मन ना जाने क्यों उदास था. रात को खाना खाने के बाद वो सोफे पर बैठे थे.

मैं किचन में बैठी सुबह से सोच रही थी. बेटे ने मुझे उनके पास आ कर बैठने के लिए आवाज दी.

मैंने किचन से ही जवाब दिया

"बेटा! मेरे ऊपर सब्जी गिर गयी है, मैं जरा नहाने जा रही हूँ. अभी आती हूँ."

यह कह कर मैं अपने कमरे में चली गयी, हुआ तो कुछ नहीं था.

मैंने अपनी अलमारी खोली और तौलिया उठाया. फिर पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैंने जैसे अपने आप एक हरे रंग की मैक्सी उठा ली और बाथरूम में घुस गयी. शायद मेरे दिल ने बाबूजी का प्यार स्वीकार कर लिया था.

आज मैं अच्छी तरह से नहाना चाहती थी. खूब मल मल कर नहाया और फिर कमरे में आ कर थोड़ा मेकअप भी किया. हरी मैक्सी के ऊपर सेंट लगाया और फिर शर्माती हुई ड्राइंग रूम मैं आ गयी.

शर्म के कारण मेरे पाँव जैसे मन भर के हो गए थे. बाबूजी ने मुझे हरी मैक्सी पहने देखा तो उनका मुंह एकदम ऐसे चमक गया जैसे कोई हजार वाट का बल्ब जल गया हो. ख़ुशी के मारे उनके मुंह से आवाज भी नहीं निकली. उनका मुंह और ख़ुशी देख कर मेरे मुंह पर भी मुस्कराहट आ गयी.

बाबूजी तो कुछ बोल ही ना पाए बस मेरी हरी मैक्सी ही देखे जा रहे थे. शर्म के कारण मैंने अपनी नजरें उन से ना मिला पायी और जमीन की तरफ देखती रही.

मेरे बेटे ने भोलेपन से पुछा

"मम्मी! आप ने मैक्सी क्यों चेंज कर ली?"

मैंने बाबूजी की तरफ देखते हुए कहा

"बेटा! मुझे लगा की मुझे हरे रंग की मैक्सी ज्यादा अच्छी लगेगी। पता नहीं क्यों मेरा इस मैक्सी को पहनने का मन किया रात में."

यह कह कर मैंने बाबूजी की तरफ देखा, उनकी ख़ुशी तो छुपाये नहीं छुप रही थी. मेरे से उनके सामने खड़ा नहीं रहा जा रहा था. मैं शर्माती हुई अपने कमरे में चली गयी.

मैं अपने कमरे में जा कर लेट गयी. बस अब इन्तजार था तो बाबुजी का.

मेरा दिल तो बहुत देर से बहुत तेज तेज धड़क रहा था. पर जब मैं अपने कमरे में जा कर लेट गयी और उनके कमरे की लाइट भी बंद कर दी तो जैसे एक एक पल एक एक दिन की तरह बीत रहा था. मन कर रहा था की बस बाबुजी जल्दी से आ जाएं बस.

मुझे नींद नहीं आ रही थी.इसी तरह रात के ११ बज गए.

अचानक मेरे कमरे के दरवाजे पर कुछ आवाज हुई. मैंने सर घुमा कर देखा तो दरवाजा धीरे धीरे खुल रहा था.

मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा की जैसे मेरा तो हार्ट अटैक ही आ जायेगा.

दरवाजे से बाबुजी खड़े थे. उन्होंने एक धोती और शर्ट पहन रखी थी, कमरे में खिड़की से बाहर से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिस से सब कुछ ठीक से दिखाई दे रहा था.

बाबुजी धीरे धीरे चलते हुए मेरे बेड के पास आ गए। उन्होंने ओर देखा, मैने अपनी आँखें बाबुजी की आँखों की तरफ की और उनकी आँखों में देखा.

मेरी आँखों में बेइंतेहा शर्मा की लाली थी. मैंने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. और मैं ओर ज्यादा देर तक बाबुजी को न देख सकी.

बाबुजी मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे थे और में उन्हें देख कर शर्मा रही मैंने बाबुजी को बैठने या लेटने के लिए कुछ न कहा और आराम से अपने बेड पर चुप चाप लेटी रही तो बाबुजी बेचारे ऐसे ही खड़े रहे.

जब मैं कुछ न बोली तो बाबुजी ने मुझे देखते हुए कहा।

"बहुरानी थोड़ा परे को तो सरक मुझे भी लेटने के लिए थोड़ी जगह दे. देख कैसे अकेली ही पूरा बेड घेर कर लेती है. मालूम है न आज हम दोनों को इस पर लेटना है, "

कहते हुए बाबुजी के होंठों पर एक शरारती सी मुस्कान थी.

मैंने फटाफट पीछे को हो कर बाबुजी के लेटने के लिए जगह बनाई।

खाली जगह में बाबुजी मेरे साथ लेट गए.

मेरा दिल धड़क रहा था. लगता था मैंने जो निर्णय कर लिया है और हम दोनों बाबुजी और बहु की जिंदगी खुशियों से भरने वाला है.

बाबुजी बिलकुल मेरे साथ ही लेटे थे. हमारे शरीरों के बीच में मुश्किल से ६ इंच का फासला था.

बाबुजी का दिल भी इतने जोर से धड़क रहा था कि उनके दिल के धड़कने की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी. शायद मेरे तेज तेज धड़कते दिल की आवाज बाबुजी को भी सुनाई दे रही हो.

यह हमारे जीवन का एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण क्षण था. जो हमारे आने वाले जीवन की दिशा बदल देने वाला था.

बाबुजी ने मुझ से प्यार से पूछा

"बहुरानी! तुम ने क्या निर्णय लिया है? एकबार फिर से बता दो ताकि कोई गलतफहमी न रहे "

जवाब में में कुछ नहीं बोली. मेरी गालें शर्म से लाल हो रही थी. शर्म से मुझसे कुछ कहा नहीं जा रहा था. बस मैंने आगे बढ़ कर अपने होंठों बाबुजी के होंठ पर रख दिए और उन्हें चूमने लगी.

मेरा का उत्तर बिलकुल स्पष्ट था.बाबुजी तो मुझे छेड़ रहे थे, आज हरी मैक्सी पहन कर मैंने उन्हें अपना निर्णय बता ही दिया था की मैं उनसे प्यार का खेल खेलने को तैयार हूँ. अब बाबुजी भी अपने होंठ खोल दिए और मेरे होंठों को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगे.

बाबुजी ने फिर अपना चेहरा पीछे किया और शरारती सी मुस्कान में कहा

"सुषमा! बताओ न तुम्हारा क्या निर्णय है. क्या मैं तुम्हारी हाँ समझूँ?"

हालाँकि अब सब स्पष्ट ही था. पर मैं तो आखिर एक औरत ही थी. मुँह से कुछ बोल कैसे सकती थी.

जब बाबुजी ने दोबारा छेड़ते हुए मेरा निर्णय पूछा तो मैंने शर्म से अपना चेहरा बाबूजी की छाती में छुपा लिया और उनसे चिपकते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर बाबुजी की लुंगी में डाल दिया और उनके तने हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया.

फिर मैंने धीमे से अपना मुँह बाबुजी के कान के पास किया और उनके लौड़े को अपने हाथ से आगे पीछे करते हुए, जैसे मैं बाबुजी का मुठ मार रही होऊं धीरे से बोली

"यह है मेरा निर्णय."

और लौड़े को जोर से दबा दिया.बाबुजी की तो जैसे चीख ही निकल गयी.

मैं अब बाबुजी के लौड़े पर अपने हाथ को तेज तेज आगे पीछे करते हुए लण्ड को प्यार से सहला रही थी, और फिर उनके कान में फिर से बोली.

"बाबुजी! मुझे बोलने में बहुत शर्म आ रही है. बस अब कुछ न बोलिये. खुद ही समझ जाइये। और अब देर ना कीजिये."

बाबुजी को भी अब देर करना बहुत मुश्किल हो रहा था. आखिर उनकी इतने दिन की मेहनत रंग ला रही थी, तो बाबुजी ने मुस्कुराते हुए मुझे कहा..

"बहु सुषमा! अपने कपडे तो खोल दो. ताकि फिर चटवाई और चुसाई का काम शुरू हो सके."

मैंने बाबुजी को कहा "बाबुजी! आपने ही तो कहा था कि आप मेरी हरी मैक्सी खोलना चाहते हैं. अब आप ही अपने हाथ से खोलिये इसे."

बाबुजी ने मुझे नीचे खड़ा कर दिया और मेरी मैक्सी खोल दी, मेरे बड़े बड़े मुम्मे बाहर आ गए क्योंकि वासना के मारे मैंने अपनी ब्रा और पैंटी पहले ही खोल दी थी.

फिर बाबूजी ने जब मुझे पूरी नंगी कर दिया तो बोले

"सुषमा! बहुरानी अब तुम्हारी बारी है. मैं समज गयी और मैंने भी अब शर्म छोड़ कर बाबूजी की कमीज उतार दी और उनकी धोती भी खोल दी.

धोती खोलते ही बाबूजी का एक अजगर जैसा बड़ा और मोटा लण्ड एकदम से बाहर आ गया.

बाबूजी ने भी मेरी तरह अपनी चड्डी पहले ही खोल रखी थी. उन्हें भी अपनी बहु को चोदने की बहुत जल्दी थी,

मैंने कई बार बाबूजी का लण्ड बाथरूम में देखा था और उसदिन तो ऑटो में मुठ भी मारी थी. पैर इतनी पास से बाबूजी का लौड़ा पहली बार देख रही थी.

क्या शानदार लण्ड था. कम से कम 9 इंच लम्बा होगा और 4 इंच मोटा होगा. मेरे पति से दुगना मोटा. इतने पास से देख कर दिल बाग़ बाग़ हो गया. अब यह पहलवानी लण्ड मेरा था. मैं समज गयी की आज मेरी चूत की खैर नहीं है.

खैर अब कुछ नहीं हो सकता था. वैसे भी जब ओखली में सर दे ही दिया तो मुसल का क्या डर?

अब तो मेरी इस मुसल से चुदाई होनी ही थी, जो होगा देखा जायेगा. राम भली करेंगे.

मैंने बाबूजी का लण्ड अपने हाथ में पकड़ लिया और उसे प्यार से मसलने और धीरे धीरे सहलाने लगी.

बाबुजी ने मुझे प्यार से कहा.

"बहुरानी! मैं तो उस दिन से तुम्हारी आइसक्रीम चाटना चाहता हूँ. तो फिर आइसक्रीम चटवाने को तैयार हो न?"

मैं शर्म से चुप हो गयी. हम दोनों ससुर बहु अब पूरे नंगे बेड पर बैठे थे. मैं उनका लण्ड सेहला रही थी, और मैंने कोई जवाब न देते हुए बाबुजी का सर अपनी गोद की ओर खींच लिया.

सर को आगे खींचने से बाबुजी समज गए कि मैं चूत चटवाना चाहती हूँ.

बाबूजी ने मुझे प्यार से बेड पर लिटा दिया और मेरी दोनों टाँगें अपने हाथ से चौड़ी कर दी. मेरी चूत बाबुजी के सामने ऐसे खुली पड़ी थी जैसे कपडे की दूकान पर कपडे के थान खुले पड़े होते हैं.

मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और बाबुजी ने मेरी चूत को अपनी उँगलियों से सहलाना शुरू कर दिया.

बाबुजी ने अपना मुंह मेरी चूत के पास लाया और मेरी चूत को सूंघते हुए बोले

"सुषमा! तुम्हारी चूत से तो बहुत अच्छी खुशबू आ रही है. इसका टेस्ट भी अच्छा होगा."

यह बोल कर बाबुजी ने चूत को सहलाना छोड़ कर अपने दोनों हाथों को पीछे ले जाकर मेरी गांड पर रख दिया और अपने मुंह को आगे कर मेरी चूत को चूम लिया।

मेरे शरीर में करंट सा दौड़ गया.

इसके बाद बाबुजी अपने दोनों हाथों को दोबारा आगे लेकर आएं और मेरी उंगलियों से मेरी गीली हो चुकी चूत की दोनों फाँकों को फैला दिया और जीभ से चूत को चाटने लगे।

मेरे मुंह से हल्की-हल्की सिसकारी निकलने लगी।

मैं भी अपने कमर को हल्का-हल्का हिलाते हुए चूत चटवाने लगी।

चूत चाटते-चाटते बाबुजी बीच-बीच में अपनी जीभ को मेरी चूत में घुसा कर हिलाने लगते थे।

मुझे तो होश ही नहीं था.

मेरी चूत बाबुजी के मुंह के ठीक सामने थी।

इसके बाद मैंने भी अपनी जाँघों को और फैला दिया और उन्हें चूत चाटने की पूरी जगह दे दी।

बाबुजी ने हाथ से मेरी चूत के दोनों फांकों को फैला दिया और अपने मुँह को मेरी दोनों गोल चिकनी जाघों के बीच लाकर जीभ निकाल कर मेरी चूत को चाटने लगे।

कुछ देर बाद वे चूत चाटने हुए ही अपने दोनों हाथ को पीछे लेजाकर मेरी गांड को सहलाने और दबाने लगे।

मैंने अभी तक ऐसा सिर्फ पॉर्न मूवी में देखा था कि कैसे ससुर अपनी बहु की चूत चाटता है और बहु अपने ससुर से चूत चटवाती है।

मगर आज मेरे ही ससुर मेरे सामने घुटनों के बाल बैठ कर अपनी बहुरानी की चूत चाट रहे थे।

यह सोच कर मैं इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गई थी कि ... चूत चटवाते हुए मुश्किल से 2-3 मिनट हुए होंगे कि मुझे ऐसा लगा कि मेरे शरीर का सारा खून चूत की तरफ जा रहा है; मेरी चूत की नसें एकदम फटने वाली हैं।

मैं तेजी से कमर हिलाने लगी और मेरे मुंह से तेज सिसकारियां निकलने लगीं- आआ आआआ आआह हहह हह हहह!

फिर अचानक मेरा शरीर एकदम अकड़ गया और मेरे मुँह से तेज़ सिसकारी निकली- आआ आआ आह हह हहह!

और मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया।

मैंने एक्साइटमेंट में बाबुजी का मुंह अपनी जांघों के बीच जोर से दबा लिया था ... बाबुजी बिना मुंह हटाये मेरी चूत का सारा पानी जीभ से चाट गये।

मैं तेजी से हांफ रही थी ... हल्की ठंडी हवा में भी मेरे माथे पर पसीने की बूंदें आ गई थीं।

उधर बाबुजी अभी भी नीचे बैठे रहे और कुछ देर के लिए ... उन्होंने अपना मुंह मेरी चूत से हटा लिया ताकि मैं अपनी सांस पर काबू कर लूं।

जब उन्हें लगा कि मैं थोड़ा नॉर्मल हूं गई हूं ... तो उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरी जांघों को फैला कर फिर से मेरी चूत चाटना शुरू कर दिया।

मैं तो जैसे आसमान में उड़ने लगी थी।

मुझे इतना मजा आ रहा था कि मदहोशी में मैंने आंख बंद कर ली और बाबुजी के सिर को पकड़ कर अपनी कमर हिला-हिला कर दोबारा से चूत चटवाने लगी।

करीब 2 मिनट की चूत चटाई से मुझ पर दोबारा चुदाई का नशा चढ़ने लगा।

मेरी चूत भर भर पानी छोड़ रही थी जिस से कि मेरी चूत के पानी से चूत और फिर भी चिकनी हो गई थी बाबुजी ने अपनी एक उंगली मेरी चूत के ऊपर रख दी मेरी चूत चिकनी होने के कारण उनकी उंगली एकदुम सटाक से मेरी चूत के अंदर चली गई जिसे वो मेरी चूत में अंदर बाहर करने लगे, क्योंकि चूत में तो बाबुजी की ऊँगली थी तो बाबुजी ने अपनी जीभ मेरी भगनासा पर रख दी, ज्योंही बाबुजी की जीभ मेरे चने के दाने पर लगी, मैं तो आनंद से उछल बाबुजी का सर अपनी चूत पर जोर से दबा दिया.

अब मेरी चूत में बाबुजी की ऊँगली घूम रही थी और मेरे स्वर्ग के बटन यानि मेरी भगनासा पर बाबुजी की जीभ। ऐसा डबल हमला मेरे पर कभी नहीं हुआ था. मैं तो जैसे आसमान में उड़ रही थी. हम ससुर बहु आज एक दुसरे के होश में मजे कर रहे थे.

जोश में मैं अपने आपको काबू में नहीं रख पा रही थी और बोली, "बाबुजी, प्लीज जल्दी कुछ करो ना। नहीं तो मैं पागल हो जाऊंगी। प्लीज"

पर बाबुजी कहा मनाने वाले थे बाबुजी ने मेरी चूत पर अपना पूरा कब्ज़ा जमा रखा था और वो मेरी चिकनी चूत बड़े प्यार से सहला रहे थे और बाबुजी खुद नीचे बैठ गए ते और अपने दोनों हाथ उन्होंने अब मेरी गांड पर रख दिए और फिर उन्होंने अपने होठ मेरी भगनासा पर रख दिए और जीभ निकल कर भगनासा को चाटने लगे और कभी मेरी भगनासा पर अपने दांत गड़ा देते मस्ती के कारण अब मुझे से बर्दाश्त करना मुश्किल था.

मैं तड़प रही थी और चिल्ला रही थी

"हाए मां, उफ कितनी गर्म है आपकी जीभ? आ आ उई"

मैं बुरी तरह से सिसकारियां निकलने लगीसी सी आह आह उई मां उई उई उफ बाबुजी ने अपनी लपलपाती हुई जीभ मेरी चूत में अंदर तक घुसा दी और जीभ से चोदने लगे.

मस्ती मैं भी पूरी तरह से गरम हो गई थी तो मैंने आगे को होकर झट से बाबुजी के सर को अपने हाथों में थाम लिया मैं बाबुजी के बालो, मैं अपनी उंगली घुमाते बाबुजी को अपनी चूत पर दबाने लगी मुझे बाबुजी के होठों से अपनी चूत की तेज सुगंध और उसके तीखे नमकीन स्वाद का एहसास हो रहा था.

बाबुजी के हाथ मेरी दोनों चूतड़ों पर थे जिसे वो बड़े ही जोर से दबा रहे थे और सहला रहे थे. मैं इतनी गरम हो उठी थी कि मुझ से अपने आप को कंट्रोल करना मुश्किल ही नहीं नामुकिन था मस्ती, मेरे मुंह से निकला है

"बाबुजी जी आप ने तो मुझे पागल कर दिया ही, कृपया जल्दी से कुछ करो नहीं तो मर जाऊंगी। कितना चाटेंगे कब से ऐसे चाट रहे ही जैसे वहा रसमलाई रखी हो. अब बस कीजिए ना."

मेरे मुंह से आवाजें निकल रही थी. शायद बाबुजी भी सिसकारियां ले रहे हों पर क्योंकि उनका मुंह तो मेरी चूत पर था तो कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

थोड़ी देर में फिर मेरा शरीर अकड़ने लगा. दूसरी बार से मेरा निकलने वाला था.

अचानक से मेरा शरीर फिर अकड़ गया और मेरी चूत ने बाबुजी के मुंह पर ही अपना अमृत छोड़ना शुरू कर दिया.

मैं आह आह आह चिल्ला रही थी और बाबुजी ने अपना मुंह मेरी चूत के बिलकुल छेद पर रख लिया था और बाबुजी मेरी चूत से निकलने वाले रस के एक एक कतरे को पी गए. बाबुजी ने चाट चाट कर मेरी चूत बिलकुल साफ़ कर दी.

मैंने बाबुजी से पूछा.

"बाबुजी आप ने तो अपनी पूरी जीभ अंदर तक डाल कर मेरी साड़ी आइसक्रीम चाट ली है. कैसी लगी अपनी बहु की आइसक्रीम?"

बाबुजी मुझे बोले

"सुषमा! मैंने तुम्हारी सास की भी बहुत आइसक्रीम चाटी है और कुछ और औरतों की भी, पर जो स्वाद और मजा तुम्हारी चूत के रस में आया, सच बोलूं तो इतनी प्यारी चूत मैंने आज तक नहीं देखी। "

मैं बहुत खुश हो गयी. मैं जोर से हांफ रही थी.

बाबुजी उठ कर खड़े हुए. उन का लौड़ा इतना सख्त हो गया था कि साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था.

मैंने अपना मजा तो ले लिया था, पर अब बाबुजी की भी बारी थी.

बाबुजी का गधे जैसा लौड़ा, जिस के लिए उनकी बहुरानी ना जाने कब से तरस रही थी फुंकारें मार रहा था.

लण्ड झटका मार रहा था और उस पर की नसें भी साफ़ दिखाई दे रही थी.

बाबूजी ने मुझे भी अपने सामने खड़ा कर लिया और फिर बाबुजी ने मेरे कन्धों पर हाथ रख कर उन्हें नीचे दबाया. मैं समझ गयी कि बाबुजी मुझे बैठने का इशारा कर रहे हैं. मैं बाबुजी के बिलकुल सामने बैठ गयी।

बाबुजी का तना हुआ लौड़ा बिल्कुल मेरी आंखो के सामने मेरे मुंह के करीब था. जो मेरी गरम सांसो से और भी उछलकूद मचा रहा था। मैंने अपनी आंखें ऊंची करके स्माइल करते हुए बाबुजी की आंखें देखीं दी. अब मेरी भी शर्म ख़त्म हो चुकी थी,

उनका काला लम्बा मोटा लंड हवा में किसी मस्त सांड की तरह झूमता मेरी आँखों के सामने था। मुझे आज उनका लंड उस रात के मुकाबले और फिर भी मोटा लग रहा था।

मैंने अपने हाथ बाबुजी के लंड पर रख दिए जैसे ही मेरा मुलायम नरम हाथ बाबुजी के लंड पर पड़ा मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मैंने कोई गरम रॉड पकड़ ली जिससे मेरा हाथ जल जाएगा।

मैं मस्ती मैं बाबुजी के लंड को अपने हाथ से सहलाने लगी जैसे ये मेरा सब से मनपसंद खिलोना हो मैं नीचे बैठी बाबुजी के लंड को सहला रही थी।

फिर बाबुजी ने मुझे कहा

"बहुरानी सुषमा! मेरा लौड़ा तुम्हारी चूत के हिसाब से काफी बड़ा है, और मोटा भी. इसे मैं जब तुम्हारी चूत में डालूंगा तो हो सकता है तुम्हे दर्द हो. तो तुम एक काम करों कि अपने बाबुजी के लण्ड को मुंह में ले कर थोड़ा चूस दो ताकि वो गीला हो जाये, तुम्हारी चूत तो पहले ही मेरे चाटने से गीली हो गयी है. लण्ड भी गीला होगा तो आसानी होगी. क्या बाबुजी का लण्ड चूस दोगी? वैसे भी मैंने तुमसे वायदा किया है कि तुम्हे एक बड़ी और मोटी सी चॉकोबार चूसने को दूंगा. क्या तुम्हे बाबूजी की चॉकोबार पसंद आयी. क्या चूसोगी इसे?"
 
अगले दिन दोपहर को मेरे पति का फोन आया. उन्होंने कहा की वे आज शाम की ट्रैन से रात को लगभग ८ बजे आ जायेंगे.

मैं उन के आने की खबर सुन कर खुश भी हुई की मेरे पति कई दिनों के बाद आएंगे और आज मेरी चुदाई भी होगी, क्योंकि काफी दिन हो गए थे चुदे हुए तो मेरी काम वासना भी बढ़ गयी थी.

उधर मेरे ससुर की हरकतों से मेरा चुदने का बहुत मन हो रहा था. बस दिल कर रहा था की कोई मोटा सा लौड़ा मेरे अंदर घुस जाये.

पर ना जाने क्यों मैं अपने पति के आने की खबर से कुछ अंदर ही अंदर उदास भी थी.

जाने क्यों ससुर के साथ छेड़खानी और शरारत अच्छी लग रही थी, मैं उनसे चुदने को शायद अभी मन से तैयार नहीं थी. पर उन का साथ अच्छा लग रहा था.

खैर पति के आने की खबर से मेरा बेटा भी बहुत खुश हुआ और बोला की आज पापा कई दिन के बाद आ रहे है तो हम उनको लेने स्टेशन जायेंगे.

बाबूजी भी बेटे के आने से कुछ उदास थे, उन्हें भी लग रहा था की अपनी बहु को चोद पाने का मौका अब शायद न मिले, पर वो भी क्या कर सकते थे.

तो हम रात को स्टेशन पर चले गए. हमारे पास अपनी गाडी तो थी नहीं तो ऑटो में आने जाने का सोचा.

ट्रेन रात में 8 बजे आ गयी. पति बाहर आये तो उन्हें देख कर दिल ही बुझ गया.

पति शराब में टुन्न थे. उनसे तो ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. बेटा भी उनसे मिल कर दुखी हुआ.

लगता था कि वो ट्रेन में ही शराब पीते आये थे.

खैर अब तो यह उनकी रोज की आदत बन गयी थी, बोलने या लड़ने का कोई फायदा नहीं था.

मैं तो डबल उदास हुई, पति की हालत देख कर बिलकुल भी नहीं लगता था कि वो मेरी चुदाई कर भी पाएंगे, मेरे तो जैसे सपने ही ढह गए.

बाबूजी ने ऑटो को बुलाया और घर जाने को बुक किया.

रात थी तो अँधेरा भी हो गया था. और ठण्ड भी लग रही थी. मैंने तो शाल भी ले रखी थी,

ऑटो वाले ने एक साइड से तो ऑटो को कपडे से बंद किया हुआ था ताकि ठंडी हवा ना आये और दूसरी साइड से ही सवारी के लिए खुला रखा था.

सबसे पहले तो बाबूजी औरो में घुसे। फिर मेरे पति अंदर घुसने लगे तो बाबूजी ने उसे डांट दिया और कहा कि उस से शराब की बदबू आ रही है, तो वो उनसे दूर ही बैठे.

अब मुझे ही बाबूजी से लग कर बैठना पड़ा. फिर मेरे पति बैठे और जो एक छोटा सा फट्टा ड्राइवर ने अपने पीछे सवारी के लिए लगाया होता है उस पर मेरा बेटा बैठा. ऑटो क्योंकि छोटा होता है तो हम तीनो फंस कर ही बैठे थे. मेरे जाँघे बाबूजी की टांगों से लगी हुई थी. एक तो रात का अँधेरा और उस पर ऑटो में हम चिपक कर बैठे थे. पति के पास जो बैग था वो मैंने अपनी गोद में रख लिया और उस पर मेरे बेटे ने सर रख लिया..

अब स्थिति यह थी की बाबूजी अंत में बैठे थे, और उनके साइड में ऑटो कपडे से बंद था, बाबूजी से सत कर मैं बैठी थी और किनारे पर पति थे.

बाहर से किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था. और बेटे के कारण ड्राइवर भी हमें देख नहीं सकता था.

मेरे पति तो बस ऑटो में बैठते ही, अपनी साइड के रॉड पर सर रख कर ऊँघने लगे.

एक तरह से हम दोनों बाबूजी और मैं ही जाग रहे थे.

हमारा घर लगभग १ घंटे की दूरी पर था.

ऑटो चलते हुए पांच मिनट ही हुए थे की बेटा भी मेरी गोद में ऊँघने लग गया.

बाबूजी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिए उनकी आँखों में शरारत की चमक थी, मैं समज रही थी की बाबूजी के मन में कुछ तो चल रहा है. आज यह पहली बार था की बाबूजी मेरे से इतना सट कर बैठे थे. तभी बाबूजी ने अपनी टांग मेरी टांग से मिला दी.

मैंने उनकी तरफ देखा, बाबूजी दूसरी तरफ मुंह किये मुस्कुरा रहे थे.

अचानक से बाबूजी ने अपना हाथ मेरी कमर पर रख दिया. मैं एकदम से हिल सी गयी.

मैंने हिल कर उनका हाथ हटाना चाहा तो बाबूजी ने अपना हाथ हटा कर मेरे पेट पर रख दिया.

मैं चुप रही कि देखते हैं कि बाबूजी बाबूजी क्या करते हैं, जब बाबूजी ने मुझे कुछ भी ना कहते पाया तो उन्होंने अपना हाथ मेरी कमीज के अंदर घुसा कर मेरे नंगे पेट पर रख दिया. मैं एकदम से घबरा गयी. मेरे पति मेरे पास ही बैठे थे और मेरा बेटा मेरी गोद में सो रहा था और बाबूजी यह हरकत कर रहे थे.

हालाँकि उनका हाथ कमीज के अंदर था और ऊपर से मैंने शाल भी ले राखी थी, तो किसी को कुछ भी दिख नहीं सकता था पर मैंने बाबूजी का हाथ पकड़ कर बाहर निकालना चाहा पर बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर ही रखा.

मैं सब के सामने ऑटो में जोर आजमाईश तो कर नहीं सकती थी, तो थोड़ी देर कोशिश करने के बाद मैं चुप कर गयी और बाबूजी का हाथ रहने दिया.

बाबूजी मेरे इस सहयोग से बहुत खुश हो गए और अपना हाथ मेरे नंगे पेट पर सहलाने लगे.

अब मेरे बाबूजी को तो आप जानते ही हैं. जब मैंने अपना हाथ हटाया तो तुरंत उन्होंने मेरे पेट पर से हटा कर ऊपर मेरी छाती पर रख दिया. और मेरे मुम्मे को सीधा ही पकड़ लिया.

मैं एकदम से चिहुंक पड़ी. इधर मेरे पति मेरे पास बैठे थे, और मेरे ससुर ने जिंदगी में पहली बार मेरा मम्मा पकड़ लिया था. मैं करती भी तो क्या करती.

कुछ बोल भी तो नहीं सकती थी, मैंने अपना हाथ फिर से कमीज में डाल कर उनके हाथ को पकड़ लिया और उनकी तरफ गुस्से की नजरों से देखा.

बाबूजी मुझे देखते ही एक आँख मार दी, मैं शर्मा गयी. क्या करती. बाबूजी का हाथ कमीज के तो अंदर था ही तब तक बाबूजी ने जोर से अपना हाथ मेरे ब्रा के अंदर घुसेड़ कर मेरा नंगा मुम्मा पकड़ लिया और उसे दबाने लगे.

मेरी स्थिति बड़ी अजीब थी. पहली बार कोई गैर मर्द मेरी छाती दबा रहा था. और वो भी मेरे पति ही,

मैंने पति की तरफ देखा, वो तो शराब के नशे में ऊंघ रहे थे. मुझे बड़ा गुस्सा आया.

अब तक ससुर जी ने मेरे एक निप्पल को अपने अंगूठे और ऊँगली में दबा लिया और उसे सहलाने लगे. मेरे शरीर में तो आग ही लग गयी थी,

मैंने जोर से बाबूजी का हाथ अपने हाथ से पकड़ कर नीचे पेट की तरफ खींच दिया और ब्रा से बाहर निकाल दिया.

लेकिन उसका एक असर यह हुआ कि जो बाबूजी ने मेरी छाती हाथ में पकड़ी थी, हाथ जोर से नीचे खींचने के कारण मेरा मुम्मा भी ब्रा से बाहर निकल कर आ गया. और वो अब ब्रा से बाहर और कमीज के अंदर था.

मैंने सोचा कि उसे तो मैं बाद में अंदर कर लूंगी, पहली बाबूजी का हाथ तो रोकूं किसी तरह.

उधर बाबूजी अपने दुसरे हाथ से पता नहीं क्या कर रहे थे. वो हाथ उनके लण्ड पर था, शायद उसे मसल रहे होंगे हमेशा की तरह.

बाबूजी ने अपना हाथ जो मेरे पेट पर घूम रहा था उसे मेरी सलवार के अंदर घुसेड़ने की कोशिश की.

वो मेरी चूत पर जाना चाहते थे. मैंने सलवार के नाड़े में घुसता हुआ उनका हाथ एकदम से पकड़ लिया. बाबूजी नई दुसरे हाथ से मेरा वो हाथ जोर से पकड़ा और अपनी गोद में खींचा. जब तक मैं कुछ समझती बाबूजी ने मेरा वो हाथ अपने नंगे लौड़े पर रख दिया. (अब मैं समझी कि बाबूजी ने अपना लण्ड अपनी धोती से बाहर निकाल लिया था.)

अपना हाथ बाबूजी के गर्म गर्म लौड़े पर लगते ही मैं तो लगभग उछल ही पड़ी. बाबूजी इतनी हिम्मत करेंगे वो भी मेरे पति और बच्चे के सामने, यह तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था.

बाबूजी मुझे अपना लौड़ा पकड़वाना चाह रहे थे. पर मैंने जोर से अपनी मुठी बंद कर ली और अपना हाथ वापिस खींचने लगी. अब इस स्थिति में जबकि मेरे पति और बेटा पास में थे और सामने ऑटो ड्राइवर गाड़ी चला रहा था तो मैं कुछ बोल तो नहीं सकती थी. बस जोर से अपनी मुठी भींच रखी और उसे बाबूजी के लण्ड पर से वापिस खींचने लगी.

पर बाबूजी भी पुराने घाघ और पहलवान थे. उन में बहुत जोर था. उन्होंने अपने हाथ से मेरे मुठी भरे हाथ को कस के पकडे रखा और मुझे वापिस नहीं लेने दिया.

अब चलते ऑटो में मैं बाबूजी के साथ कुश्ती को कर नहीं सकती थी. बस जोर लगाती रही. बाबूजी के लाख कोशिश करने पर भी कि मैं उनके लौड़े को पकड़ लूँ, मैंने मुठी नहीं खोली.

अब मेरा सारा ध्यान मेरे इस लौड़े पर ठीके हुए हाथ पर था तो बाबूजी ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाते हुए अपना दूसरा हाथ झट से मेरी सलवार के अंदर घुसा दिया और मेरी उसे जोर से अंदर धकेलते हुए सीधे मेरी चूत पर ले आये और मेरी चूत को अपनी मुठी में भींच लिया.

मैं तो इस दोतरफा हमले से घबरा गयी. क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था.

बाबूजी ने एक हाथ से मेरी मुठी वाले हाथ को अपने अकड़े हुए लौड़े पर टिका रखा था. और दुसरे से मेरी नंगी चूत को पकड़ रखा था.

शायद आज भगवन भी मेरी तरफ नहीं था. आज मैंने कच्छी भी नहीं पहन राखी थी. और अपनी चूत को बिलकुल साफ़ भी कर रखा था. आज मेरे पति जो आ रहे थे.

पर इस का भरपूर लाभ मेरे ससुर को मिल रहा था. उन्होंने मेरी चूत को कस के अपने हाथ में पकड़ लिया.

अब मैं औरत जात करती भी तो इस समय क्या करती. और ऊपर से मेरे लाख न चाहते हुए भी मेरी चूत गीली होने लग गयी. इस साली चूत का भी अपना ही दिमाग है. यह यह नहीं देखती की उसे मसलने वाला हाथ उसके पति का है या ससुर का. बस उसे किसी की ऊँगली लगी नहीं कि चूत अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए अपना रस छोड़ने लग पड़ती है.

मैं अभी सोच ही रही थी कि क्या करूँ तभी बाबूजी ने अपनी एक ऊँगली मेरी गीली हो चुकी चूत में घुसा दी. और अपने अंगूठे को मेरी भगनासा पर रख कर उसे रगड़ना शुरू कर दिया. मेरी भगनासा उन्होंने अपने अंगूठे और पहली ऊँगली से पकड़ ली और उसे मसलने लगे और दूसरी ऊँगली मेरी भीगी चूत में सरका दी.

यह मेरे लिए सहन करने की शक्ति से अधिक था. न चाहते हुए भी मेरे मुंह से सिसकारी निकल गयी. जो भगवान् की दया से ऑटो के शोर में किसी ने ना सुनी,

मैंने अपने पति की तरफ डर के मारे देखा कि कहीं उन्हें तो पता नहीं चल गया पर वो तो शराब के नशे में ऑटो दे डंडे से लगे ऊँघ रहे थे और मेरा बेटा तो सो ही रहा था.

अब स्थिति मेरे काबू से बाहर हो रही थी. बाबूजी तो ऐसे बैठे थे कि जैसे उन जैसा शरीफ आदमी इस दुनिया में कोई है ही नहीं. यह तो मुझे ही पता था उनकी शराफत का, जिसकी चूत में बाबूजी की ऊँगली घुसी हुई थी और दूसरा हाथ बाबूजी के तने हुए लौड़े पर था.

मैंने बाबूजी की तरफ देखा और नजरों से उन्हें मिन्नत की, और ना में गर्दन हिला कर उन्हें हाथ बाहर करने का इशारा किया, पर बाबूजी ने तो मुझे आँख मार दी और मुस्कुरा कर मजा लेने का इशारा किया.

अब बाबूजी को दो मिनट मेरी चूत में ऊँगली करते हो गए थे. मेरी चूत बहुत गीली हो गयी थी. उधर मेरी भगनासा का दाना भी बाबूजी मसल रहे थे.

अचानक बाबूजी ने अपनी एक और ऊँगली मेरी चूत में घुसेड़ दी. बाबूजी की तो ऊँगली भी किसी छोटे मोटे लण्ड से कम थोड़े ही थी.

मेरे मुंह से एक आह की आवाज निकल गयी, दो उँगलियाँ चूत में जाते ही, मैंने अपने पति वाले साइड के हाथ से उन्हें रोकना चाहा, इसका असर यह हुआ कि मेरा ध्यान चूत वाली साइड में हो गया, और लौड़े पर रखे हाथ की मुठी अपने आप खुल गयी.

बाबूजी को ध्यान उसी पर था. ज्योंही मेरी मुठी खुली बाबूजी ने तुरंत मेरी उँगलियाँ अपने लौड़े के ऊपर लपेट दी और अपनी मुठी मेरी उँगलियों पर कस ली.

अब मेरे हाथ में उनका लण्ड पूरी मुठी में था. उनका लौड़ा इतना मोटा था कि मेरी उँगलियाँ उस पर पूरी तरह से नहीं आ पा रही थी,

मैं तो बुरी तरह फंस गयी थी, मेरी चूत में बाबूजी की दो उँगलियाँ घुसी हुई थी और हाथ में उनका लौड़ा था. जिस पर बाबूजी ने अपना हाथ रखा था ताकि मैं अपना हाथ उनके लण्ड से हटा ना सकूँ.

वैसे सच कहु तो कुछ अच्छा भी लग रहा था. इस तरह की हरकतें जवान लोग या कॉलेज के स्टूडेंट्स करते हैं, यह तो सुना था पर आज मुझे अधेड़ औरत के साथ भी ऑटो में यह छेड़खानी हो रही थी. और वो भी अपने ही ससुर के हाथों.

मन में रोमांच भी हो रहा था. मेरे पति और बेटे के सामने मेरे ससुर मेरी चूत में ऊँगली कर रहे थे. बहुत अजीब सा लग रहा था. मैंने भी बाबूजी के साथ सेक्स का सोच रखा था पर यह जो ऑटो में हो रहा है, यह तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

अब बाबूजी ने मेरे हाथ, जो उनके लण्ड पर लिपटा हुआ था को अपने हाथ जो उसके ऊपर रखा था, सो आगे पीछे करना शुरू कर दिया. धीरे धीरे सेहला रहे थे जैसे मुठ मार रहे हों. मैं शर्म से मरी जा रही थी. पर कुछ कर नहीं पा रही थी.

मैंने सोचा की बाबूजी के लण्ड को जोर से कस कर दबा देती हूँ ताकि दर्द होने से बाबूजी मेरा हाथ छोड़ देंगे, तो मैंने अपनी लण्ड पर लिपटी हुई उँगलियों से उनके लौड़े को जोर से दबा दिया.

मैं तो हैरान ही हो गयी. बाबूजी का लण्ड तो इतना सख्त था की जैसे कोई लोहे की रॉड हो. इतना टाइट कि दब तो बिलकुल नहीं पाया. और ऊपर से गर्म इतना कि जैसे आग से तप रहा हो. मेरे पति का लैंड मैंने इतने जोर से दबाया होता तो बेचारे चीख उठते, पर बाबूजी को तो मजा आया. उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए शाबाशी दी जैसे मैंने जान बूझ कर उन्हें मजा देने के लिए लौड़ा दबाया हो. और आँखों में ही ऐसे ही करने का इशारा किया.

अपनी आँखों में उन्हें देखते और शाबाशी देने से मुझे तो इतनी शर्म आ रही थी कि क्या बताऊँ, पर कुछ कर भी नहीं सकती थी,

सच कहूँ तो मझे भी अच्छा तो लग रहा था, क्योंकि आखिर थी तो मैं एक औरत ही, आप मेरी स्थिति का सोचिये तो मेरी भी कामवासना भड़क रही थी,

इधर जो बीते कुछ दिनों से बाबूजी के साथ छेड़खानी चल रही थी उसका भी हाथ था.

अब बाबूजी ने मेरी चूत में ऊँगली अंदर बाहर करने की स्पीड तेज कर दी.

पता नहीं क्यों पर अब मैं उनके हाथ को रोकने की उतनी कोशिश भी नहीं कर रही थी.

चूत एक तो इतने दिनों से चुदी नहीं थी, तो उसका गीला होना और मुझे आनंद आना तो स्वाभाविक ही था.

बाबूजी अब जोर जोर और अधिक स्पीड से उँगलियों से मेरी चूत चोद रहे थे.

पता नहीं कब अपने आप मेरी टांगें खुल कर फ़ैल गयी और बाबूजी को अपनी हरकतों के लिए और स्थान मिल गया और ऊँगली चुदाई तेजी से होने लगी.

मैंने अपना मुंह में अपनी शाल डाल ली ताकि मेरे मुंह से अपने आप निकल रही सिसकारियों की आवाज बाहर ना आ सके.

ऐसे मजे में अपने आप मेरा हाथ बाबूजी के लौड़े पर चलने लग गया. और अब बाबूजी को अपने हाथ से मेरे हाथ को हिलाने की जरूरत नहीं थी, मैं ना चाहते हुए अपने आप अब बाबूजी की मुठ मार रही थी.

बाबूजी का लौड़ा मेरे पति के लौड़े से दुगना मोटा और बहुत बड़ा था. मैंने अपनी जिंदगी में पति के इलावा यह दूसरा लण्ड पकड़ा था. लौड़ा इतना सख्त और मोटा होता है, मुझे आज ही पता चला.

बाबूजी ने जब देखा कि अब मैं अपने आप ही उनकी मुठा मार रही हूँ, तो उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर से हटा कर मेरी चूँचियों पर रख लिया और मेरे मुम्मे दबाने सहलाने लगे.

उनका हाथ हटते ही एकबार तो मैंने सोचा कि उनका लण्ड छोड़ दूँ, पर बाबूजी की मुठ मारने में इतना अच्छा लग रहा था कि मैं उनकी मुठ मारने में लगी रही.

अब पूरी बेशर्मी से हम दोनों ससुर बहु एक दुसरे के शरीर से मजे ले रहे थे.

मैंने सोच लिया कि अब जब यह सब हो ही रहा है, और हम दोनों चाहते भी यही थे, तो एकदिन तो यह सब होना ही था. तो चलो आज हो ही जाने दो,

मैं अब पूरी स्पीड से बाबूजी की मुठ मार रही थे और बाबूजी मेरी चूत में दो उँगलियाँ अंदर बाहर कर रहे थे, किसी को कुछ दिखाई न दे इस लिए मैंने शाल को थोड़ा फैला लिया और मेरा मुठ मार रहा हाथ भी छुपा लिया.

अब हम ससुर बहु चलते ऑटो में खुल कर मजा ले रहे थे.

मैंने अपने पति की तरफ देखा तो वो नशे में खर्राटे ले रहे थे. मुझे उन पर बहुत घृणा आयी और मन ही मन गाली देते बोली

"सो ले कंजर, और कर नशा. देख तेरे सामने ही तेरा बाप तेरी बीवी की चूत में ऊँगली फेर रहाहै और तेरी बीवी अपने ससुर की मुठ मार रही है. तू सोता रह."

मैंने पूरा ध्यान बाबूजी पर किया और आनंद लेने लगी.

मैंने मुठ मारना तेज किया तो बाबूजी ने भी चूत में ऊँगली तेज कर दी और मेरे मुम्मे भी जोर से मसलने लगे. हम दोनों ससुर बहु स्वर्ग में थे.

एक तो मैं इतने दिन से चुदी नहीं थी, दुसरे रोज बाबूजी के साथ छेड़खानी और सेक्सी बातों से मैं बहुत चुदासी हो रही थी. ऊपर से यह पति बच्चे और ड्राइवर के सामने इस तरह की हरकत, मैं बता नहीं सकती कि कितना मजा आ रहा था.

दोनों ससुर बहु को मजा लेते अब काफी देर हो चुकी थी,. मेरा स्खलन भी पास ही था. लगता है बाबूजी का भी काम तमाम होने ही वाला था.

बाबूजी मेरी ओर देखते हुए बोले

"सुषमा! लगता है अपनी मंजिल दूर नहीं है, जल्दी ही अपने मुकाम पर पहुँच जायेंगे."

यह कहते हुए बाबूजी ने मेरी आँखों में देखते हुए अपने लौड़े की तरफ इशारा किया, ताकि मैं समझ जाऊ कि किस मंजिल की बात है.

मेरा भी काम होने वाला था. तो मैं भी मुस्कुराते हुए बोली

"हाँ बाबूजी! मुझे भी लगता है कि पहुँचने में मुश्किल से १-२ मिनट ही बाकी हैं. जरा तेज हाथ चलाया जाये, मतलब गाड़ी की स्पीड बढ़ा दें तो और भी जल्दी पहुँच जायेंगे.." ऑटो ड्राइवर तो अपनी ही धुन में मस्त था.

बाबूजी मेरी दोअर्थी बात पर मुस्कुरा पड़े. उन्होंने अपनी जेब से रुमाल निकल कर मुठ मार रहे मेरे हाथ में दे दिया. मैं जान गयी कि बाबूजी ने मुझे यह क्यों दिया है.

मैंने तुरंत वो रुमाल बाबूजी के लौड़े पर लपेट लिया और तेजी से मुठ मारना चालू किया.

बाबूजी की भी उँगलियाँ बिजली की तेजी से मेरे अंदर चल रही थी. अचानक मेरी चूत ने एक जोर का झटका खाया और मेरी चूत ने छर छर अपना पानी छोड़ना शुरू कर दिया. मैंने काफी सारी शाल अपने मुंह में दबा ली ताकि मेरी सिसकारियां उस में ही दब जाएँ.

मेरी चूत ने पहली बार बाबूजी के हाथ से पानी निकाला था तो बहुत पानी निकला. बाबूजी का पूरा हाथ भीग गया. मैंने भी जोर जोर से बाबूजी के लण्ड पर सड़का मारा और बाबूजी का भी शरीर कांपने लगा. और उनके लौड़े ने भी ढेर सा घाड़ा घाड़ा माल छोड़ दिया..

मैं तो पहले से ही तैयार थी और बाबूजी का सारा वीर्य मैंने रुमाल में ले लिया.

पर बाबूजी के लण्ड ने इतना माल निकाला की रुमाल भर जाने के बाद भी मेरे हाथ भी उस से भर गए.

थोड़ी देर बाद बाबूजी के लण्ड ने झटके मारने बंद किये, तो मैंने उसे छोड़ दिया.

मैंने रुमाल ऑटो के फर्श पर ही फेंक दिया, जिसे पैर से बाबूजी ने धकेल कर ऑटो से बाहर फेंक दिया. चलते ऑटो में और रात में किसी को पता नहीं चला.

मेरे हाथ अभी भी बाबूजी के वीर्य से ही भरे थे, मैंने उन्हें शाल से पोंछना चाहा तो इशारे से बाबूजी ने मुझे रोक दिया और मेरी सलवार से मेरे चूत रस से भीगा अपना हाथ निकाला और उसे चाटना शुरू कर दिया. और इशारे से मुझे भी अपना वीर्य भरा हाथ चाट कर साफ़ करने को कहा.

बहुत ही कामुक दृश्य था. मेरे सामने मेरे ससुर मेरे चूत रस को चाट रहे थे. और मैंने भी शर्म लिहाज छोड़ कर बाबूजी के माल को अपने हाथ से चाटना शुरू कर दिया.

बाबूजी का वीर्य बहुत ही स्वादिष्ट था. मैं सोच रही थी कि कब मुझे यह माल सीधे लौड़े से ही चूस कर चाटने को मिलेगा.

इतने में हमारा घर आ गया.

मेरे पति और बेटा भी उठ गए और हम घर में चले गए.

मैं रात में अपने पति से होने वाली संभावित चुदाई के बारे में ही सोच रही थी.
 
अँधा क्या चाहे दो आँखें. और सुषमा क्या चाहे- बाबुजी का लण्ड।

मैंने बाबुजी के लण्ड को हाथ में पकडे बाबुजी की तरफ देखा और शर्म के कारण मेरे मुंह से हाँ तो नहीं निकल सकी और मैंने हाँ में गर्दन हिलाते हुए, बाबुजी के लण्ड को अपनी तरफ खींचा और अपना मुंह भी आगे किया.

तभी बाबुजी ने अपना एक हाथ बढ़ाया और मेरे कंधे पर रख कर धीरे से बोले- इसे मुंह में लो बेटा!

बाबुजी की आवाज उत्तेजना में हल्का सा कांप रही थी ऐसा लग रहा था जैसे नशे में बोल रहे हों।

वैसे मैं तो खुद भी यही चाह रही थी।

मैं बाबुजी के सामने घुटनों के बल बैठ गई और उनके लंड की चमड़ी को पूरा पीछे खींच कर सुपारे को मुंह में भर कर चूसने लगी।

मैंने लंड चूसते हुए हुए ऊपर देखा तो बाबुजी अपने एक हाथ को अपनी कमर पर रखे हुए थे और मुझे देखते हुए अपनी कमर को हल्का-हल्का हिलाते हुए मजे से लंड चुसवा रहे थे।

उनका एक हाथ मेरे सिर पर था जिसे वे हल्का सा अपने लंड पर दबा रहे थे.

मुझे लग रहा था कि वे भी शायद अपनी किस्मत पर फूले नहीं समा रहे होंगे कि उनकी मस्त जवान बहुरानी नंगी बैठी अपने ही ससुर का लंड चूस रही है।

जिस तरह बाबुजी अपने कमर हिलाने की स्पीड बढ़ा कर लंड मेरे मुंह में तेजी से आगे पीछे कर रहे थे ... मुझे लग रहा था कि वे जल्दी ही झड़ने वाले हैं.

मैं भी लंड के सुपारे को तेजी से अपने सर आगे पीछे कर चूसने लगी थी।

अभी मुश्किल से 2 मिनट भी नहीं हुए थे कि उनके मुंह से हल्की-हल्की सिसकारी निकलने लगी और वे तेजी से अपनी कमर को हिलाने लगे.

आआआ आहह हहह ... बहुरानी आआ ... और फिर अचानक उनका शरीर एकदम अकड़ गया और उनके मुँह से तेज सिसकारी निकली- आआआ आआह हह हहह!

और दो-तीन तेज झटके देते हुए मेरे मुंह में अपने लंड का सारा पानी निकाल दिया।

मैंने भी लंड का सारा नमकीन पानी पी लिया।

बाबुजी खड़े-खड़े तेजी से हांफ रहे थे ... उनका लंड एकदम ढीला हो गया था.

मगर मैंने अभी भी बाबुजी के लंड को मुंह से नहीं निकाला था और उनके ढीले हो चुके लंड को भी मुंह में लेकर चुपचाप उसी तरह घुटनों की बल बैठी रही।

मैं जान रही थी कि अगर मैं इस तरह बाबुजी के झड़ जाने के बाद खड़ी हो गई तो आज चूत में लंड लेने का सपना अधूरा रह जाएगा और फिर चूत चुदवाने के लिए मुझे दोबारा कोई दूसरा प्लान बनाना पड़ेगा।

वहीं मेरी चूत में फिर से खुजली शुरू हो चुकी थी जो अब लंड से ही शांत होने वाली थी।

इसीलिए जब बाबुजी थोड़े नॉर्मल हुए तो मैंने उनके ढीले पड़ चुके लंड को दोबारा चूसना शुरू कर दिया.

बाबुजी भी मजे से दोबारा कमर हिला-हिला कर लंड चुसवाने लगे.

करीब 2 मिनट तक लंड चुसाई के बाद ही बाबुजी का लंड दोबारा होकर टाइट खड़ा हो गया।

फिर कुछ देर और लंड को चूसने के बाद मैंने लण्ड को मुंह से निकाला और उसे हाथ से पकड़ कर हिलाने लगी और खड़ी हो गई।

मैं अभी तक लंड को हाथ से पकड़े हुई थी।

मेरी चूत एकदम पनिया चुकी थी और मुझ पर दोबारा मदहोशी छाने लगी थी.

मेरा बेटा तो अपने कमरे मे आराम से सो रहा था. और इधर हम दोनों ससुर बहु अपने मजे कर रहे थे.

अब चुदाई का टाइम था,

बाबूजी ने मेरी आँखों में प्यार से देखते हुए पूछा

"सुषमा! तो अब फिर क्या ख्याल है. हो जाये?"

मैंने शरारत से पूछा

"अब सब कुछ हो तो गया है. और क्या हो जाये?"

बाबूजी मुस्कुराते हुए बोले

"बहुरानी! यह तो अभी ट्रेलर था. असली फिल्म तो अभी बाकी है. अभी तो तुम्हे इस लौड़े का असली मजा आएगा. तो फिर चुदाई के लिए तैयार हो ना?"

मैंने शर्माते हुए अपनी गर्दन हिला दी और बेड पर लेट गयी और बाबूजी को अपने पास आने का इशारा किया.

बाबूजी अपना लौड़ा हाथ में पकडे हुए मेरे पास आये. और बोले

"तो चलो बहुरानी अब वो करते हैं जिस के लिए हम दोनों इतने दिनों से तरस रहे थे."

मैंने भी बाबूजी को मुस्कुराते कहा

"बाबूजी! तो फिर जल्दी आईये ना. अब और क्यों तरसा रहे हो आप। "

बस फिर क्या था बाबूजी नंगे ही मेरे पास बैठ गए.
 
अब काफी देर हो रही थी. मैं ज्यादा समय नहीं लेना चाहती थी क्योंकि मेरी चूत को बाबूजी के लण्ड के लिए तरस रही थी. चुदाई को मरी जा रही थी मैं.

तो मैंने बाबुजी को कहा

"बाबुजी! अब तो आप का लौड़ा गीला हो गया है. प्लीज देर न लगाएं और इसे जल्दी से मेरे अंदर डाल दें."

बाबुजी समझ गए की उनकी बहुरानी चुदाई के लिए तैयार है. तो उन्होंने कहा

"सुषमा! ऐसा करो की तुम बेड के किनारे पर हाथ रख कर घोड़ी बन जाओ और मैं पीछे से तुम्हारी चूत मैं लण्ड घुसाता हूँ. "

मैं तो आज चुदवाने के लिए हर आसन में तैयार थी. बस लौड़ा मेरे अंदर घुसना चाहिए था.

बाबूजी ने मेरी नंगी छातियां हाथ में ले ली और उन्हें चूसने लगे. मैंने पूछा कि अभी तो आप मुझे घोड़ी बनने को कह रहे थे अब यह चूसना क्यों शुरू कर दिया तो बाबूजी बोले

"सुषमा! ऐसा है कि तुम्हारी चूत अभी मेरे लण्ड के लिए छोटी है.मेरा लण्ड बहुत मोटा है, इसे अंदर करने के लिए जोर लगाना पड़ेगा. यदि मैं तुम्हारी चूचिया चाटूँगा तो अपने आप मेरा लौड़ा सख्त हो जायेगा और आराम से घुस जायेगा. और तुम्हारी चूत भी गीली हो जाएगी इस तरह तुम्हे अच्छा भी बहुत लगेगा. "

मैं समझ गयी कि बाबुजी पूरा नंगा करके मुम्मे चूसते हुए मुझे चोदना चाहते हैं. अब हम दोनों बाप बहुरानी पूरे नंगे थे।

बाबुजी मुस्कुरा पड़े. मुझे बहुत शर्म आयी और मैंने अपना चेहरा नीचे झुका लिया.

बाबुजी ने प्यार से अपनी एक ऊँगली मेरी ठोड़ी के नीचे रख कर मेरा चेहरा ऊपर किया और मेरी आँखों में देखा.

मैं चाहे खुद बाबुजी से चुदवाने को मरी जा रही थी पर अब जब चुदाई का असली टाइम आया तो शर्म आ रही थी,

मैंने आँखें बंद कर ली. बाबुजी मुझे प्यार से बोले

"सुषमा! शर्मा क्यों रही है. मेरी तरफ देख तो सही. "

मैंने अपनी आँखें खोली. सामने बाबुजी मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे.

मुझे इतनी शर्म आयी की मैंने झट से आगे बढ़ कर बाबुजी को आलिंगन में ले लिया और अपना चेहरा उनकी नंगी छाती में छुपा लिया.

और बाबुजी के अकड़े हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ कर हिलाते हुए कहा

"बाबुजी! मुझे अजीब सा लग रहा था. प्लीज मुझे तड़पाओ मत और जल्दी से इस को मेरे अंदर घुसा दो "

बाबुजी ने अपना एक हाथ मेरी नंगी चूची पर रख दिया और उसे मसलने लगे.

बाबुजी ने मुझे थोड़ा अलग किया और मेरी दोनों चूचिओं को देखने लगे मुझे शर्म तो आ रही थी पर क्या करती।

बाबुजी कुछ देर मेरी इन नंगी चुचियों को देखते रहे और फिर उन्होंने अपने दोनों हाथ मेरी चुचियों पर रख दिए और मेरी चुचियों को अपनी मुट्ठी में भर कर पहले धीरे-धीरे और फिर से जोर-जोर से मसलने लगे। मुँह से तो "सी सी आह आह उई मां उई उई उफह्हह्हह्हह्ह मर गई, दर्द हो रहा है, मर गयी" की आवाजें निकलने लगी.

मैं चीखी "सी सी आह आह उई मां उई उई उफ बाबूजी, आराम से करो मुझे बहुत दर्द हो रहा है" तो बाबुजी ने मेरी गुलाबी निप्पल को अपनी दोनों उंगली मैं दबा कर जोर-जोर से मसलने लगे।

मैं दर्द से और कुछ मजे से चिल्ला रही थी पर मुझे उस दर्द मैं भूलभुलैया का एहसास हो रहा था कुछ देर इसी तरह मेरे निप्पल और चुचियों को मसलने के बाद बाबुजी झुके और उन्हें ने अपना मुंह मेरी चुची पर लगा दिया.

और मेरे गुलाबी निप्पल को अपने दांतों के बीच दबा लिया बाबुजी अब मेरे निपल्स को अपने दांतों के बीच दबा कर खिंचने लगे और कभी मेरी पूरी चुची जितनी बाबुजी के मुँह में आ सकती थी उसे दबा कर ऐसे चूसने लगे मर्द जब चुची चुस्ता ही तो इतना मजा आता है कि क्या बताऊँ।"

बाबुजी बारी बारी से बदल कर मेरी दोनों चुचियों को चूस रहे थे जबकी मेरा हाथ बाबुजी के सर पर था.

और मैं अपने बाबुजी अपनी चुचिया चुसवाते उनके सर के बालो में अपनी उंगली फिर रही थी। बाबुजी तो मेरी चूचियों को ऐसे चूस रहे थे वो मेरी चूची ना हो कर कोई मीठा रसीला आम हो अब तो बाबुजी मेरी दोनों चूचियों को अपने हाथो मैं दबा कर बारी से अपने होठों पर दबा कर चूसने लगे मेरे चूची को अपने दांतो से खींचने लगे.

मैं तो बस मैं ठे दर्द से आअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह है कर रही थी और मस्ती मैं अपने हाथ बाबुजी के बालो मैं चला रही थी और कभी उनको अपनी चुचियों पर भींच रही थी। बाबुजी अपने होठों का जोश मेरी चुचियों पर कर रहे थे जिस से मेरी चूत भी बे हिसाब पानी छोड़ रही थी, अब बाबुजी ने इसी तरह चूसते चूसते मुझे चादर पर लिटा लिया. और खुद भी साथ में लेट कर मेरे मुम्मे चूसते रहे.

उस समय मैं इतनी चुदासी हो चुकी थी कि मुझे ऐसा लग रहा था कि अगर बाबुजी कुछ देर करते और इसी तरह मेरी चुचियों से खेलते रहे तो कहीं मुझ से अपने ऊपर कण्ट्रोल ख़त्म न हो जाये और मैं खुद ही उनका लण्ड पकड़ कर अपनी चूत में घुसेड़ लूँ और चोदने के लिए ना बोल दूं इसलिए मैंने अपनी दोनों बाहें फैला दीं, चादर को कस कर अपने दोनों हाथों से थाम लिया।

पर अब मुझ से कंट्रोल करना मुश्किल लग रहा था, जिसका सबूत मेरी गांड अब मूव हो कर खुद ऊपर नीचे हो रही थी। बाबुजी की बार मेरी चूची चुस्ते ऊपर उठ कर मेरे होठों को चूसने लगते तो मेरी साँसें तेज चलने लगती और मैंने बाबुजी को अपनी बाहो में कस लिया और आलिंगन में कामुक आवाज बोली

"बाबुजी! क्या कर रहे है बस कीजिए ना."

मैं किसी मछली की बहुत तड़प रही थी और बेड पर अपनी दोनों बाहें फैला अपनी मुट्ठी मैं चद्दर को भींच कर कस कर चिल्ला रही थी "आआआह्हह्हह्ह जीइइइइइइइ ये क्या कर रही है है गुदगुदी हो रही है आआआआह्हह्हह्ह धीरेईईईईईई रुक जइए ना बाबूजी जीईईईईईईईईईईईईई रुक जाइए ना बस भी कजिए आआआआआआह्हह्हह्ह."

पर बाबुजी वो अब कहां रुकने वाले थे। मैं भी बाबुजी का जोश बढ़ाने के लिए उनका साथ दे रही थी और बाबुजी मेरे ऊपर चढ़े अपने मुँह को मेरे मुँह में डाले मेरी चुचियों को दबा रहे थे. कुछ देर इसी तरह मेरी चूचियां चूसते रहे।

मैं काम उत्तेजना में "सी आह आह उई मां उई" करने लगी और बोली

"बाबुजी मुझे कुछ हो रहा है प्लीज कुछ करो."

बाबुजी ने कहा

"क्या करूं, मैं तो तैयार ही हूँ. बताओ न क्या करें?"

मैं बोली

"मुझे शर्म आती है प्लीज करो ना."

बाबुजी बोले

"जब तक खुलकर नहीं बोलोगी तो मुझे कैसे पता चलेगा कि क्या करना हैं. ऐसे शर्म से तुम्हे भी मजा नहीं आएगा ।"

तो मैं बोली

"बाबुजी अब रहा नहीं जाता। जल्दी से अपना यह हथियार मेरी चूत में डाल दो। ठोक दो उसे मेरे अंदर ही, मुझे चोदो।"

बाबुजी बोले

"सुषमा! क्या कहा? जरा और खुलकर बोल मुझे सुनाई नहीं दिया."

वो मुस्कुरा रहे थे।

मैं बोली

"मुझे चोदो बाबुजी, घुसेड़ दो. अपना लंड मेरी बुर में और अपनी सुषमा की चूत मार लो, अपनी बहुरानी को प्यार से चोदना, दर्द मत देना, मेरे बाबुजी आई लव यू।"

मुझे पता नहीं लग रहा था की कामवासना की आग में जल रही मैं कह क्या रही हूँ. दिमाग काम ही नहीं कर रहा था.

मैं तो जैसे पागल ही हो रही थी. बाबुजी का गधे जैसा मोटा लंड मैंने अपने हाथ में पकड़ लिया।

हे राम क्या शाही लंड था बाबुजी का और मेरा एक हाथ अपनी चूत पर चला गया

मेरी चूत पानी छोड़ रही थी, और अपनी चूत को सहलाने लगी

सब से बड़ी बात उनकी टांगों के बीच किसी शेर की तरह दहाड़ता लंड जिसकी तो मेरी दीवानी हो चुकी थी मेरी नज़र बाबुजी के घोड़े जैसे लंड पर टिक गयी.

आंखो के सामने मुझे मेरे बाबुजी ही बाबुजी दिखायी दे रहे थे। उनका वो मजबूत गठेला शरीर, मजबूत कंधे, उनका चौड़ा सीना और सीना के घने बाल और सब से बड़ी बात उनकी टांगों के बीच किसी शेर की तरह दहाड़ता लंड जिसकी तो मेरी चूत दीवानी हो चुकी थी.

सच मेरे बाबुजी का क्या शाही लंड था अब इस शाही लंड पर मेरा नाम लिखा था आज मेरी चूत की आग को बाबुजी अपने उसी शाही लंड से चूत के अंदर डालकर मेरी चूत के अकड़ को ठंडा कर रहे होंगे.

मेरे अंदर भयानक आग लगी हुई

सोचने लगी कि बाबुजी मुझे कैसे और किस पोजीशन में चोदेंगे। और मैं बाबुजी का साथ कितना दूंगी

आज मैंने विशेष तौर पर चूत की सफाई की थी. मेरी चूत जहां पहले थोड़े सी रेशमैं जुल्फी थी वहां अब सफाचट मैदान बन चुका था। अब मेरी पिच बाबुजी के द्वारा बल्लेबाज़ी करने के लिए पूरी तरह से तैयार करा दी

अब कुछ ही मिनट की बात है बाबुजी किसी भंवरे की तरह मेरी जवानी का रस चूस कर मुझे कलीसे फूल बनाने वाले थे जिस तरह मेरे बाबुजी से मिलन को बेकरारी थी उसी तरह मेरी चूत भी अपने लिंग महाराज से मिलने को बेकरार थी.

सुबह से मेरी चूत बाबुजी के लंड के स्वागत के लिए पलकें बिछाईं थी मेरी चूत मेरी हल्की हल्की सुरसुराहट हो रही थी सुबह से..

बाबुजी ने अपनी नज़र मेरे चेहरे पर गड़ा दी। बाबुजी ने अपना हाथ मेरे चेहरे पर रख और मेरा चेहरा उठा कर बोले, मेरी आँखों ने देखा तो मैंने शर्म और डरे से बाबुजी की आँखों से देखा तो बाबुजी बोले।

"सुषमा! आज तो तुम बिना कपड़ों के बिलकुल एकदम स्वर्ग की अप्सरा लग रही हो। "

बाबुजी बोले

" हम दोनो में शर्म का क्या काम, मेरी बेटी। मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ. अगर तुम भी मुझसे प्यार करती हो तो मेरी आंखो में देख कर बोलो।"

तो मैंने बाबुजी की आंखो मैं देख कर कहा

"बाबूजी मुझे शर्म आती है. पर बाबुजी आई लव यू."

और तेजी से ये बोल कर अपना मुंह बाबुजी की छाती में छुपा लिया और बाबुजी ने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया और मुझे सहलाने लगे।

मेरे बाबुजी के सीने से चिपकी हुई थी अलग ही दुनिया मेरी थी। कुछ देर इसी तरह मुझे अपने सीने से चिपकाया रहने के बाद बाबुजी ने फिर से मेरा चेहरा हाथ में लिया, अब मेरे होंठ बाबुजी के होंठों के बिल्कुल पास थे बाबुजी की गरम सांसे मेरे चेहरे पर पड रही थी कि बाबुजी ने अपने होठों को मेरे होठों की और बढाया ही था कि मैंने शर्म से मुंह घुमालिया।

बाबुजी ने फिर से अपने होठों को मेरे होंठों की और बड़ा दिया। मैं अब बाबुजी को रोक नहीं सकती थी बाबुजी ने अपने होठों से मेरे होठों को लॉक कर दिया.

और मेरे उपर वाला होंठअपने होंठों मैं दबा कर चूसने लगे तो मैं भी बाबुजी के होंठों को चूसने में उनका साथ देने लगी।

बाबुजी के इस तरह मेरे होठों को चूसने से मेरे होठों एक दम बिना लिपस्टिक के गुलाबी हो गए. लेकिन बाबुजी थे जो आज ही मेरे होठों का सारा रस निचोड़ लेना चाहते था बाबुजी ने फिर से मेरे होठों को अपने होठों से पकड़ लिया.

मेरी नाक बाबुजी की नाक से और बाबुजी की जीभ मेरी जीभ से लड़ रही थी कि तभी बाबुजी ने मेरी जीभ को अपने होठों पर दबा कर खींच लिया और जीभ को चूसने लगे मेरी सांसे और भी तेज चलने लगी थी.

जिस तरह से बाबुजी मेरे होठों को मेरी जिह्वा को चूस रहे थे मैं जान गई थी कि आज की रात बाबुजी मेरे बदन के हर अंग को ऐसे ही चूसेंगे। मेरा चुदने का वक्त आ गया था। बाबुजी तो मेरे होठों का सारा रस ही चूस जाना चाहते हो।

बाबुजी इतनी मस्ती और अच्छी तरह से मेरे होठों का रस चूस रहे थे जैसा कोई भंवरा किसी कली का रस चूस रहा हो। बाबुजी के दवारा इस तरह अपने होठों का रस चूस लिए जाने से मुझे बहुत आनंद आ रहा था और मैंने अपनी दोनो बाहें बाबुजी के गले में डाल दी। मेरे और बाबुजी दोनों के होंठबुरी तरह से चिपके हुए थे।

बाबुजी मेरे होंठको चूस रहे थे और उनके कठौर हाथ मेरी पीठ सहला रहे थे

आज मुझे एक नया ही एहसास हो रहा था कि पूरे बदन मेरी गुदगुदी सी हो रही थी। मेरे प्यारे बाबुजी ने अपनी जीभ मेरे मेरे मुँह में डाल दी अब उनकी जीभ मेरी जीभ से टकरा रही थी तो उनको ने मेरी जीभ को अपने होठों पर दबा लिया और मेरी जीभ को चूसने लगे।

यहाँ सिर्फ हमारे चुम्बनो की आवाज ही गूंज रही थी। मेरे और बाबुजी के होंठएक दूसरे के होठों से ऐसे चिपके थे कि जैसे उनको फेविकोल से चिपका दिया हो। बाबुजी मेरे होठों को बुरी तरह से चूस रहे थे और मैं उनकी बांहों मैं मचल रही थी मस्ती से पागल हो रही थी

मेरे से अब सहन करना मुश्किल हो रहा था. मैंने अपने हाथ में पकडे हुए बाबुजी के लण्ड को अपनी चूत पर टिका दिया. बाबुजी का लण्ड बहुत गर्म था.

मेरी चूत से भी बहुत पानी चू रहा था. चूत इतनी गीली हो गयी थी कि लौड़ा बिना तेल या किसी चिकनाई के भी घुस सकता था.

मैं बाबुजी के लण्ड के सुपाडे को अपनी चूत की दरार में रगड़ने और घिसने लगी.

बाबुजी समझ रहे थे कि उनकी बहु बहुत प्यासी हो चुकी है. वो शायद इसी समय का इन्तजार कर रहे थे. क्योंकि वो जानते थे कि उनका लण्ड बहुत मोटा और बड़ा है. मैं अपने बाबुजी से पहली बार चुदने वाली हूँ तो मैं उनका लौड़ा सहन नहीं कर पाऊँगी. क्योंकि मुझे अभी तक इतने मोटे लौड़े की आदत नहीं है. मेरे पति का लौड़ा तो बाबूजी के लण्ड के मुकाबले बहुत छोटा था.

इसीलिए बाबुजी चाहते थे कि मेरी वासना हद से ज्यादा बढ़ जाए और चूत बिलकुल गीली हो जाये तो ही चुदाई करनी चाहिए उन्हें.

उस समय तो बाबुजी का लंड किसी पागल सांड की तरह दिख रहा था जो किसी लहलहाते खेत के पास खड़ा हो कर उस खेत को उजाड़ने के लिए तैयार हो। बाबुजी मेरी दोनों टांगों के बीच थे और उनका घोड़े के जैसा लंड मेरे तालाब में उतर कर मेरे तालाब की गहराई को मापने के लिए मचल रहा था।

बाबुजी का घोड़े के लंड जैसा लंड मेरे तालाब की गहराई में उतर कर ये देखना चाहता था कि मेरे तालाब में कितना पानी है।

मैं उनके सुपाडे को चूत में रगड़ रही थी. और बाबुजी ने मेरी दोनों टांगों को अपने हाथ से पकड़ कर पूरी तरह से खोल दिया.

बाबुजी के लंड का सुपाड़ा अपनी नई नवेली रानी के साथ चुम्मा चाटी कर रहा था उसे बेहला फुसला रहा था। बाबुजी के लौड़े का गरम गरम स्पर्श अपनी चूत पर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने मेरी चूत पर कोई गरम गरम लोहे की रॉड रख दी हो.

मैं बुरी तरह से डर भी रही थी क्योंकि अब मेरी चूत का बाजा बजने वाला था.

तभी बाबुजी ने हल्का सा धक्का मारा। भला बाबुजी का बांस जैसा हथियार इतनी आसान से कहां जाता, बाबुजी ने फिर से अपने लंड को मेरी चूत पर रख कर धक्का मारा पर इस बार भी वो मेरी चूत मैं ना जा कर एक साइड की ओर मुड़ गया.

तो बाबुजी मेरी तरफ देख शैतानी से मुस्कुराते हुए बोले

"सुषमा! यह एक मेहमान तुम्हारी चौखट पर आया खड़ा है. बेचारे की नजर कमजोर है और उसकी एक ही आँख है. इसलिए वो तुम्हारे घर में नहीं जा पा रहा. तुम उसे थोड़ा रास्ता बता दोगी ताकि वो अंदर आ सके?"

मैं भी बाबुजी को शरारत से बोली

"बाबुजी! आप के मेहमान का मेरे घर के अंदर स्वागत है. उसे अंदर भेज दीजिये मैं तो उसका कब से इन्तजार कर रही हूँ.."

बाबुजी बोले

"बेटी! तुम एक काम करो कि उसको पकड़ कर घर के दरवाजे पर रखो मैं उसे धक्का दे कर अंदर भेज देता हूँ. तुम अपने हाथ से पकड़कर अच्छे से लगा कर रखो मैं धक्का मारता हूं। ठीक है?"

तो मैंने शर्माते हुए बाबुजी से कहा,

"जी बाबुजी! आपका यह मेहमान तो बहुत मोटा है और घर का दरवाजा बहुत तंग है, ये अंदर नहीं जाएगा।"

तो बाबुजी बोले

"सुषमा! तुम ऐसे पकड़ कर गेट पर रखो तो सही. यह अंदर चला जाएगा।( फिर बाबुजी मेरी आंखो में देख मुस्कुराहट से बोले), चला जाएगा सब औरतों के अंदर चला जाता है तो क्या तुम्हारे अंदर नहीं जाएगा रही बात मोटे की जितना मोटा है उतना ही तो मजा देता है। तुम अंदर तो आने दो इसे."

मैं बाबुजी के लौड़े की मोटाई से थोड़ा सा डरी थी कि ये 9 इंच का और इतना मोटा मेरे अंदर कैसे जायेगा."

मैं बाबुजी के गले लग कर कान में बोली

"बाबुजी प्लीज़ आराम से चोदना, मेरी रसभरी चूत केवल आपले बेटे के छोटे से लण्ड से चुदी है, मैं आपके लण्ड के हिसाब से तो कली हूं, मेरे प्यारे बाबुजी आपका लंड बहुत मोटा और लम्बा है इस कली को मसल कर बर्बाद न करना,"

बाबुजी ने मेरे होंठों को अपने मुंह में भर लिया और कहा

"बहुरानी तुम बिलकुल भी चिंता न कर. एक बार इसे अंदर करने दे फिर इस मज़े को तू जीवन में कभी नहीं भूलेगी, थोड़ा सा दर्द होगा पर उसे झेल जा सुषमा."

फिर मैंने होंसला करते हुए बाबुजी के लण्ड को अपने हाथ में पकड़ लिया और उसके सुपाडे को अपनी चूत के छेद पर रख दिया. बाबुजी का सुपाड़ा मोटे टमाटर जैसा था उसने चूत को पूरा ढक लिया था मैं मचलने लगी, बाबुजी ने थोड़ा सा लंड का दबाव चूत पर दिया.

बाबुजी का लण्ड चूत में नहीं जा रहा था, मैं कसमसाने लगी लंड बाहर छिटक जा रहा था।

बाबुजी ने कहा

"सुषमा! लण्ड का सर थोड़ा मोटा है. इसलिए अंदर नहीं घुस रहा. तुम एक करो कि मैं तुम्हारी टाँगे उठाकर अपने कन्धों पर रख लेता हूँ, तुम थोड़ा थूक अपनी चूत और मेरे लौड़े पर लगा दो. इस से थोड़ी चिकनाई हो जाएगी.

बाबुजी ने मेरी टांगें अपने कन्धों पर रख ली. अब मैं बिलकुल फस गयी थी. चाह कर भी हिल नहीं सकती थी. खैर जो होगा देखा जायेगा सोच कर मैंने थोड़ा थूक अपनी उँगलियों में लेकर अपनी चूत के छेद पर लग लिया और थोड़ा बाबुजी के सुपाडे पर लगा दिया। फिर मैंने लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत की कसी हुई दरार में घिसने लगी।

जब चूत खूब चिकनी हो गई.तो बाबुजी ने मेरी चूत पर अपने सुपाड़े को दबाया. सुपाड़ा छोटे से मुलायम छेद को फ़ैलाने लगा, चूत की दीवारें साइड में खुलने लगी. और मैं दर्द से कसमसाने लगी. बाबुजी से भी अब रुकना मुश्किल हो रहा था तो उन्होंने मेरी चूत में कस कर एक धक्का मारा. पर चूत बाबुजी के लण्ड के हिसाब से इतनी छोटी थी की आधा सुपाड़ा ही अंदर घुस पाया.

मैं चिल्लाई " आ आ सी सी बाबुजी आराम से. सी सी आह आह उई मां उई उई उफबाबुजी आराम से करो बहुत दर्द हो रहा है आ आह। "

बाबुजी मेरे ऊपर लेट गये और मेरी बालों में उंगलियां डाल कर सहलाने और किस करने लगे.

मेरी तो आँखों में आंसू आ गए थे.

फिर बाबुजी मेरी चूची को मुंह में भर कर चूसने लगे, जिस से मेरा दर्द कुछ कम हुआ तो मैंने बाबुजी की आंखों में देखा। बाबुजी ने शरारत से मुझे आँख मार दी. मैं तो शरमा गई.

बाबुजी ने पूछा "कैसा लग रहा है?"

मैं हल्के से मुस्कुरा दी बाबुजी ने पूछा "अब और डालूं अंदर?"

मैंने शरमाते हुए हाँ में इशारा किया और मैंने बाबुजी के लण्ड को पकड़ कर धीरे से अंदर की तरफ दबाया तो सुपाड़ा धीरे धीरे रास्ता पकड़ कर अंदर जाने लगा मेरी चूत का छेद धीरे-धीरे फैलने लगा।

मुझे दर्द होने लगा. "सी सी आह आह उई मां उई उई उफ बाबुजी आराम से करो बहुत दर्द हो रहा है आ आह."

मेरी आँखों में से आंसू बहने लगे. मेरी आंखों फैलने लगी, मैं मुठ्ठी में चादर भींच कर दर्द को सहने लगी, बाबुजी ने लंड धीरे से बाहर निकाल लिया और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। मुझे फिर से दर्द हुआ। बाबुजी मेरे ऊपर ही लेट गए और आराम से बोले

"सुषमा! तुम्हारी चूत में पहली बार चोद रहा हूँ तो दर्द हो रहा है. पर तुम कोई चिंता न करो. तुम मेरी बहुत ही प्यारी बहुरानी हो. मैं तुम्हे दर्द देने का तो सोच भी नहीं सकता. बहुत ही आराम से चोदुँगा तुम्हे. ताकि तुम्हे अच्छा भी लगे और मजा भी आये."

मैं बोली "आई लव यू बाबुजी, आप मुझे कितने आराम से चोद रहे हो फिर भी दर्द हो रहा है."

बाबुजी ने कहा "सुषमा! तुम्हारी चूत में पहली बार है इसलिए दर्द हो रहा है. थोड़ी देर बाद बहुत मजा आयेगा आज के बाद सिर्फ मज़े ही मज़े हैं. बस आज थोड़ा सा दर्द सहन कर लो अपने बाबुजी के लिए.."

मैंने बाबुजी को चूमते हुए कहा

"बाबुजी आप के लिए तो मैं जान भी दे सकती हूँ. दर्द तो क्या चीज है,"

बाबुजी खुश हो गए और बाबुजी ने लंड धीरे से बाहर निकाल लिया और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ाया। अब उनका सुपाड़ा थोड़ा और अन्दर जा चुका था.

बाबुजी ने फिर लंड बाहर निकाल कर फिर हल्के से धक्का लगाया अब लंड 2 इंच घुस चूका था लंड की मोटाई से रसभरी चूत का छेद बहुत फैल कर, बाबुजी के लंड पर कस गया था.

मैं धीरे-धीरे चीख रही थी "सी सी आह आह उई मां उई उई उफ बाबुजी, आराम से करो मैं मर जाऊंगी उई मां आ बहुत दर्द हो रहा है आ आह."

मैं पीछे खिसकने लगी.और बोली- "आआ ह्ह्ह बाबुजी... आराम से डालो, मुझे दर्द हो रहा है मैं मर जाऊंगी बाबुजी सी सी आ आह आ उई मां आराम से करो'

बाबुजी मेरी चूचियों को सहलाने लगे और निप्पल को दांतों और जीभ से कुरेदने लगे जिससे मैं वो दर्द को सहन कर लूँ.

बाबुजी के मेरी चूची चूसने से मेरा दर्द कुछ कम हुआ तो बाबुजी ने मेरी आंखों में देख कर पूछा

"कैसा लग रहा है?"

मैं हल्के से मुस्कुरा दी बोली "हाय बाबुजी बहुत ही अच्छा लग रहा है. आई लव यू, बस आप आराम से करो मुझे बहुत दर्द हो रहा है."

बाबुजी ने मुस्कुराते हुए पूछा "सुषमा! अब और अंदर डालूं?"

मैंने शरमाते हुए हाँ में गर्दन हिलाई और मुस्कुरा कर बाबुजी को चूमने लगी.

फिर बाबुजी ने धीरे से अंदर की तरफ दबाया तो लण्ड लगभग दो इंच और अंदर घुस गया।

मैं जोर से चीखी "सी सी आह आह उई मां उई उई उफ बाबुजी। आराम से करो मुझे बहुत दर्द हो रहा है."

बाबुजी तो अनुभवी जानते थे कि मैं पहली बार उनका मोटा लण्ड ले रही हूँ तो चाहे वो कितनी भी कोशिश करें दर्द तो होना ही है.

इसलिए बाबुजी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रखे और मेरे मुंह को बंद करते हुए एक जोर का धक्का मारा। धक्का इतना जोरदार था कि बाबुजी का लौड़ा आधा अंदर घुस गया. मेरी तो चीख निकल गयी. मेरी चीख इतनी तेज थी कि यदि बाबुजी ने मेरे मुंह को बंद न किया होता तो शायद मेरे बेटे की भी नींद खुल जाती और वो अपनी माँ को बचाने दौड़ा चला आता."

मैं रोती रही और मेरे आंसू बहते रहे. बाबुजी मेरे आंसुओं को प्यार से चूमते और चाटते रहे.

थोड़ी देर बाद बाबुजी ने पुछा

"सुषमा! बहुरानी, कुछ दर्द कम हुआ क्या? आई लव यू बहुरानी, थोड़ा सा बर्दास्त करो तभी तुमको मजा आएगा।"

मैं सिसकते हुए बोली "आहहह.. आ ह ह् आऊ.. आ ...आऊच सी ....सी.. बाबुजी बहुत दर्द हो रहा है, मेरी चूत फट जायेगी, मैं मर जाऊंगी प्लीज़ रुक कर करो।

बाबुजी रुक कर मेरी चूचियों को पीने लगे और एक हाथ से निप्पल मसलने लगे जिससे मुझे थोड़ा सा आराम आया. मेरी चूत में पानी निकलने लगा जिससे चिकनाहट बढ़ गई 1 मिनट बाद बाबुजी ने मेरी आंखों में देखा और धीरे से कहा

"बेटी! कैसा लग रहा है?"

मैं मुस्कुराते हुए बोली

"बाबुजी आई लव यू,आई लव यू बाबुजी पर आपने तो मेरी जान ही निकाल दी, पर अब दर्द कम है और हल्की सी गुदगुदी हो रही है."

बाबुजी ने पूछा "अब और करूं?"

मैं बोली "नहीं बाबुजी इतना ही रहने दो. आज इतना ही ठीक है. अगली बार चाहे पूरा अंदर कर लेना। वैसे बाबुजी अभी कितना अंदर है? "

बाबुजी कहा

"खुद ही हाथ लगा कर देख लो."

मैंने हाथ लगा कर देखा और बोला कि अभी तो केवल 5 इंच घुसा है अभी 4 इंच बाहर है.

तभी बाबुजी ने मेरी चूचियाँ मुंह में ले कर चूसने शुरू कर दी. अब दो ही मिनट में मेरा दर्द ख़तम हो मैं धीरे धीरे सिसकारियां मारने लगी.

अनुभवी बाबुजी समझ गए की अब मौका है. उन्होंने साइड में पड़ी मेरी पैंटी उठा कर मेरे मुंह पर रख दी और जब समझ पाती, उन्होंने अपने चूतड़ों को कस कर अपनी पूरी ताकत लगा कर शायद अपने जीवन का सबसे तगड़ा धक्का मारा।

मेरी चूत बेचारी तो उस धक्के को सहन नहीं कर पायी और उसने लौड़े को रास्ता दे दिया. बाबुजी का लण्ड अपने रस्ते की सारी रुकावटों को तोड़ता हुआ जड़ तक अंदर घुस गया. पूरा लौड़ा मेरी चूत में घुस गया और बाबुजी की जांघें मेरे चूतड़ों से आ कर मिल गयी जैसे दो प्रेमी आपस में गले मिल रहे हों.

मेरे फिर से चीख निकल गयी और इतना दर्द हुआ कि मैं बता नहीं सकती.

मैंने अपने नाखून बाबुजी की नंगी पीठ में घड़ा दिए और दर्द के मारे इतनी जोर से उनकी पीठ में नाखून मारे कि बाबुजी की पीठ में खून निकल आया.

मैंने अपने मुंह में भरी अपनी पैंटी को निकाल फेंका और रोने लगी. मैं चिल्लाते हुए बोल रही थी.

"ओह बाबुजी! मैं मर गयी. बाबुजी चुद गयी आपकी सुषमा. फट गयी मेरी चूत, चीथड़े चीथड़े हो गयी है. अरे माँ कोई तो बचा लो मुझे, फाड् दी बाबुजी ने अपनी बहुरानी की नाजुक सी चूत। घुसा दिया बाबुजी ने घोड़े जैसा लण्ड मेरी कमसिन मुनिया में. हाय मैं क्या करूँ, बचा लो कोई मुझे, बाबुजी निकाल लो अपना लौड़ा, मुझे नहीं चुदवाना आपसे। "

रोते रोते मेरी आँखें आंसू बहा रही थी और मैं बाबुजी को लौड़ा निकालने की बिनती कर रही थी. पर आज पहली बार बाबुजी मेरी मुश्किल से बेखबर लग रहे थे. उनपे तो मेरे आंसुओ या मेरे रोने का जैसे कोई असर ही नहीं हो रहा था.
 
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