अब तक,,,,,
बुलेट स्टार्ट कर के मैं गांव की तरफ चल पड़ा। मेरे ज़हन में अभी भी मानिक की बातें गूँज रही थी और मन में कई तरह के सवाल उभर रहे थे। अगर मानिकचंद्र की बात सच थी तो यकीनन उसके बाप ने पिता जी से इस बारे में बात की होगी। अब सवाल ये था कि क्या मुझे पिता जी से इस बारे में पूछना चाहिए? एक तरफ तो मैं हवेली के काम काज में कोई दिलचस्पी नहीं रखता था जबकि दूसरी तरफ ये जानना भी मैं ज़रूरी समझ रहा था। हलांकि सवाल तो ये भी था कि मैं भला इस बारे में जानना क्यों ज़रूरी समझता था? मुझे तो इससे कोई मतलब नहीं था फिर इस बारे में जानना क्यों ज़रूरी था मेरे लिए? क्या इस लिए कि मैं ये समझता था कि इस सबका का सम्बन्ध भी कहीं न कहीं प्रदीप की हत्या और मेरी फसल में आग लगने से था?
मेरे ज़हन में पिता जी की बातें गूँज उठी। जिसमे वो कह रहे थे कि कुछ लोग हमारे खिलाफ़ कुछ ऐसा करने की फ़िराक में हैं जिससे हमारा वर्चस्व ही ख़त्म हो जाए। अब सवाल ये था कि ऐसे लोग क्या ये शाहूकार ही थे? गांव के साहूकारों ने अचानक ही हमसे अपने सम्बन्ध सुधारने के बारे में क्यों सोचा और सोचा ही नहीं बल्कि इसके लिए वो दादा ठाकुर से बात भी कर चुके हैं? मेरे ज़हन में सवाल उभरा कि क्या ये किसी तरह की कोई साज़िश है जिसके तार जाने कहां कहां जुड़े हुए प्रतीत हो रहे हैं?
अब आगे,,,,,
मैं अपने ज़हन में कई सारे सवाल लिए गांव में दाखिल हुआ तो मेरी नज़र मुंशी के घर पर पड़ी। मुझे याद आया कि मैंने मुंशी की बहू को आज शाम बगीचे पर बुलाया है। अभी तो शाम होने में वक़्त था। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि आज रजनी को दबा के चोदूंगा। सरोज काकी के साथ संबंध बनाना अब मुश्किल ही था। डॉली को अब सब पता था और आज उसने इस बारे में बात कर के मुझे हिला कर भी रख दिया था। मैं इस बात से बेहद चिंतित हो उठा था कि डॉली की नज़र में अब मेरी कोई इज्ज़त नहीं रही। डॉली को हासिल करना भी जैसे अब मेरे लिए ख़्वाब ही बन कर रह गया था। डॉली एक ऐसी लड़की थी जिस पर मेरा कोई ज़ोर नहीं था। उसके सामने जाते ही मेरे अंदर का ठाकुर मानो भीगी बिल्ली बन जाता था। मैं अक्सर सोचता था कि ऐसा क्यों होता था? आख़िर मैं हर लड़कियों की तरह डॉली को भी अपने नीचे क्यों नहीं लेटा पाता? मेरे इन सवालों के जवाब मेरे पास जैसे थे ही नहीं।
मुंशी के घर के सामने से अभी मैं बुलेट से गुज़र ही जाने वाला था कि तभी मेरे कानो में मुंशी की आवाज़ पड़ी तो मैंने मोटर साइकिल की रफ़्तार को धीमी कर के रोक दिया। मुंशी ने छोटे ठाकुर कह कर पुकारा था मुझे। मैं जैसे ही उसके घर के सामने से गुज़रा था तभी वो अपने घर से निकला था और उसकी नज़र मुझ पर पड़ गई थी।
"अच्छा हुआ छोटे ठाकुर कि आप यहीं पर मिल गए मुझे।" मुंशी दौड़ कर मेरे पास आता हुआ बोला____"रघू की माँ ने बताया मुझे कि आपने मुझे मिलने के लिए कहा है तो मैं आपसे ही मिलने हवेली की तरफ जा रहा था।"
"हां मैं आया था एक डेढ़ घंटे पहले।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"मेरे पूछने पर काकी ने बताया था कि आप और रघुवीर कहीं गए हैं।"
"जी वो ठाकुर साहब के कहने पर शहर चला गया था।" मुंशी ने कहा____"कल रंगो का त्यौहार है न तो उसी सिलसिले में कुछ ज़रूरी सामान मंगवाया था ठाकुर साहब ने। ख़ैर आप बताइए किस लिए याद किया था आपने मुझे?"
"चलिए अंदर चल कर बात करते हैं।" मैंने कहने के साथ ही मोटर साइकिल को मोड़ कर मुंशी के घर के सामने खड़ी किया और फिर उतर कर मुंशी के घर की तरफ बढ़ चला।
कुछ ही देर में मैं और मुंशी घर के अंदर बैठक में आ कर बैठे गए। मुंशी ने अपने बेटे रघुवीर को आवाज़ दे कर मेरे लिए जल पान लाने को कहा तो वो जी बाबू जी कह कर अंदर चला गया।
"मैं चाहता हूं कि कल का त्यौहार हो जाने के बाद।" रघुवीर अंदर चला गया तो मैंने मुंशी से कहा____"आप कुछ कारीगर और मजदूरों को ले कर मेरे लिए एक मकान का निर्माण करवाएं।"
"मकान का निर्माण??" मेरी बात सुन कर मुंशी चौंका____"ये आप क्या कह रहे हैं छोटे ठाकुर?"
"इसमें इतना चौंकने की ज़रूरत नहीं है मुंशी जी।" मैंने सपाट भाव से कहा____"आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि मुझे हवेली में सबके बीच रहना पसंद नहीं है। इस लिए मैं चाहता हूं कि जितना जल्दी हो सके आप एक छोटे से मकान का निर्माण कार्य शुरू करवा दें। मकान उसी जगह पर बनना चाहिए जहां पर मैं गांव से निष्कासित किए जाने पर चार महीने रहा हूं।"
"यदि आपका यही हुकुम है तो मैं ज़रूर आपके इस हुकुम का पालन करुंगा।" मुंशी ने गहरी सांस ले कर कहा____"किन्तु उससे पहले मुझे इसके लिए ठाकुर साहब से भी बात करनी पड़ेगी। आप तो जानते हैं कि उनकी इजाज़त के बिना मैं कुछ नहीं कर सकता।"
"ठीक है आप पिता जी से आज ही इस बारे में बात कर लीजिए।" मैंने कहा____"लेकिन इस बात का ख़याल रहे कि अगर पिता जी इस कार्य के लिए अपनी इजाज़त नहीं भी देते हैं तब भी आपको ये कार्य करना है।"
"आप तो मुझे बहुत बड़े धर्म संकट में डाल रहे हैं छोटे ठाकुर।" मुंशी के माथे पर पसीना उभर आया____"अगर ठाकुर साहब ने मुझे उस जगह पर आपके लिए मकान बनवाने की इजाज़त नहीं दी तो मैं उनकी अवज्ञा कर के कैसे ये कार्य कर पाऊंगा?"
"आपको उनसे इस कार्य के लिए इजाज़त लेनी ही होगी।" मैंने स्पस्ट भाव से कहा____"और आप ये कैसे करेंगे ये आप जानिए। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि कल का त्यौहार होने के बाद परसों उस जगह पर मकान का निर्माण कार्य शुरू हो जाना चाहिए और अगर ऐसा न हुआ तो इसका अंजाम क्या होगा इस बारे में भी आप सोच लीजिएगा। ख़ैर अब चलता हूं मैं।"
कहने के साथ ही मैं उठ कर खड़ा हो गया। मेरी बातें सुन कर मुंशी के चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव उभर आये थे। तभी रघुवीर अंदर से थाली में कुछ खाने की चीज़ें और पानी ले कर आया तो मैंने उसे हाथ का इशारा कर के वापस भेज दिया।
मुंशी मुझे छोड़ने के लिए घर से बाहर तक आया। मैंने मोटर साइकिल स्टार्ट की और हवेली की तरफ निकल गया। साहूकारों के घर के सामने आया तो देखा दरवाज़े पर एक लड़की खड़ी थी। मुझसे नज़र मिलते ही वो अंदर की तरफ भाग गई। उसे इस तरह भागता देख मैं मुस्कुरा उठा और फिर आगे बढ़ गया।
हवेली में आ कर मैंने मोटर साइकिल खड़ी की और मुख्य दरवाज़े से अंदर दाखिल हुआ तो मेरी नज़र बाएं तरफ बड़े से बैठक में सिंघासन पर बैठे दादा ठाकुर पर पड़ी। उनके पास ही बड़े भैया और मझले ठाकुर यानी चाचा जी खड़े थे।
"वैभव सिंह।" दादा ठाकुर की कड़क आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो मैं एकदम से अपनी जगह पर रुक गया और फिर गर्दन घुमा कर उनकी तरफ देखा।
"ये क्या सुन रहे हैं हम?" मुझे अपनी तरफ देखता देख उन्होंने कड़क आवाज़ में ही कहा____"तुमने शाहूकार हरिशंकर के लड़के को मारा और उसका हाथ तोड़ दिया? क्या हम जान सकते हैं कि ऐसा क्यों किया तुमने?"
"ग़लती हो गई पिता जी।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"मुझे उसका हाथ नहीं तोड़ना चाहिए था बल्कि उसे जान से ही मार देना चाहिए था।"
"ख़ामोश।" मेरी बात सुन कर पिता जी गुस्से में गरज उठे____"तुम्हें अंदाज़ा भी है कि तुमने ऐसा कर के कितना बड़ा अपराध किया है?"
"पिता जी मैंने तो इसे रोकने की बहुत कोशिश की थी।" बड़े भैया ने ये कहा तो पिता जी उनकी तरफ देखते हुए गरजे____"तुम चुप रहो। तुम्हारी बातें हमने सुन ली हैं।" कहने के साथ ही पिता जी मेरी तरफ मुखातिब हुए____"तुम जगताप के साथ अभी हरिशंकर के घर जाओ और उससे अपने किए की माफ़ी मांगो।"
"माफ़ करना पिता जी।" मैंने आवेश में आ कर कहा____"वैभव सिंह अपना सिर कटा सकता है लेकिन उन दो कौड़ी के साहूकारों के सामने अपना सिर झुका कर उनसे माफ़ी नहीं मांग सकता।"
"तुम हमारे हुकुम को मानने से इंकार कर रहे हो?" दादा ठाकुर ने कहर भरी नज़रों से मुझे देखते हुए कहा____"इसका अंजाम जानते हो न तुम?"
"वैभव सिंह ने आज तक किसी अंजाम की परवाह नहीं की पिता जी।" मैंने जानदार मुस्कान के साथ कहा____"और ये बात आपसे बेहतर भला कौन जानता होगा?"
"जागताप।" पिता जी ने गुस्से से चाचा जी की तरफ देख।
"जी बड़े भैया।" चाचा जी एकदम से तन कर खड़े हो गए।
"इस गुस्ताख़ को।" पिता जी ने गुस्से में हर शब्द को जैसे चबाते हुए कहा____"गिन गिन कर पचास कोड़े लगाओ और इस बात का ख़याल रहे कि कोड़े का हर प्रहार इसकी ऐसी चीखें निकाले कि इसकी चीखों से हवेली का ज़र्रा ज़र्रा दहल जाए।"
"ये आप क्या कह रहे हैं बड़े भैया?" चाचा जगताप ने ब्याकुल भाव से कहा____"इसे माफ़ कर दीजिए। इसकी तरफ से मैं हरिशंकर के घर जा कर उससे माफ़ी मांग लेता हूं।"
"क्या अब तुम भी हमारा हुकुम मानने से इंकार कर रहे हो जगताप?" पिता जी ने चाचा जी को गुस्से से देखते हुए कहा तो चाचा जी जल्दी से बोल पड़े____"नहीं नहीं, मैं भला ऐसी गुस्ताख़ी कैसे कर सकता हूं बड़े भैया। मैं तो बस आपसे...!"
"हम कुछ नहीं सुनना चाहते।" पिता जी ने शख़्त भाव से कहा____"हमने जो कहा है उसका पालन करो। इस नामुराद ने जो किया है उसके लिए इसे माफ़ नहीं किया जाएगा।"
"चाचा जी।" मैंने जगताप चाचा जी को आवाज़ लगाते हुए कहा____"आप पिता जी के हुकुम का पालन कीजिए। ये मत सोचिए कि सज़ा देने वाले के दिल में रहम होगा कि नहीं और ये भी मत सोचिए कि सज़ा जायज़ भी होगी कि नहीं, क्योंकि यहाँ तो अपने मतलब के लिए भी सज़ा दे दी जाती है। यहाँ तो अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही औलाद को बली का बकरा बना दिया जाता है, और फिर ऊपर से ये सफाई दी जाती है कि जो कुछ किया गया है उससे इस ठाकुर खानदान का भला होना था। ख़ैर अब देर मत कीजिए चाचा जी, उठाइए कोड़ा और उसे मेरे जिस्म पर पूरी ताकत से बरसाइए। आपके हर प्रहार पर निकलने वाली मेरी चीखें ऐसी होनी चाहिए जिससे दादा ठाकुर के कलेजे को एक असीम सुख की अनुभूति हो।"
"देखा इस बददमीज़ को?" पिता जी ने चाचा जी की तरफ देखते हुए गुस्से में कहा____"कैसी जुबान में बात कर रहा है ये। इसे लगता है कि इसके साथ जो कुछ हुआ है वो बहुत ही ग़लत हुआ है और इसने जो कुछ आज तक किया है वो सब कुछ सही था। इससे पूछो कि इसने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कौन सा अच्छा काम किया है जिसकी वजह से ठाकुर खानदान का नाम आसमान तक ऊंचा हो गया हो? इससे पूछो जगताप कि इसने आज तक ऐसी कौन सी जिम्मेदारी निभाई है जिसके लिए हमें इस पर गर्व होना चाहिए? इससे ये भी पूछो कि इसने इस गांव की किस औरत को अपनी हवश का शिकार न बनाने से बचाया है? बड़ी बड़ी बातें करने वाला एक बार अपने खुद के गिरेहबान में भी झाँक कर देखे कि उसने आज तक कितने अच्छे अच्छे काम किए हैं?"
"मैंने तो कभी ये कहा ही नहीं कि मैं अच्छा इंसान हूं या मैंने अच्छे काम किए हैं।" मैंने भी पलटवार करने का दुस्साहस किया____"लेकिन इस हवेली में जो खुद को दूध का धुला हुआ समझते हैं उन्होंने खुद कौन सा अच्छा काम किया है? अपनी ही औलाद को बली का बकरा बना कर जंगल में मरने के लिए छोड़ दिया। मैं पूछता हूं कि अगर कोई हम ठाकुरों के खिलाफ़ किसी तरह की साज़िश ही कर रहा था तो उसके लिए क्या ज़रूरी था कि मुझे इस तरह से गांव से निष्कासित कर दिया जाए? इतने पर भी जब खुद को तसल्ली नहीं मिली तो ये भी हुकुम सुना दिया गया कि गांव का कोई भी इंसान मेरी मदद भी ना करे। वाह! बहुत खूब, इसका तो यही मतलब हुआ कि मेरे साथ ऐसा इस लिए किया गया ताकि मैं उस बंज़र ज़मीन पर रहते हुए एक दिन भूखों मर जाऊं और इस हवेली में राज करने वाले दादा ठाकुर को मेरे जैसी नालायक औलाद से मुक्ति मिल जाए।"
"चटाकककक!" जगताप चाचा ने एकदम से खींच कर मेरे गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया और फिर गुस्से में बोले____"अपनी हद में रहो वैभव सिंह। हम मानते हैं कि हमसे ग़लती हुई है मगर इसका मतलब ये नहीं कि तुम जो मन में आए बोलते ही चले जाओ। तुमने दादा ठाकुर की एक ग़लती का तो बखान कर दिया मगर तुमने खुद जो आज तक इतनी ग़लतियां की हैं उसका क्या? तुम किसी को ये सब बोलने का तभी हक़ रख सकते हो जब तुम खुद अपनी जगह सही रहो। अगर तुम खुद ग़लत हो तो तुम्हे कोई अधिकार नहीं है किसी को उसकी ग़लती का एहसास दिलाने का।"
"भाड़ में जाए ग़लती और भाड़ में जाए ग़लती का एहसास।" मैंने गुस्से में तमतमाए हुए लहजे में कहा____"मैं थूकता हूं इस हवेली पर। आपको और आपके दादा ठाकुर को मुबारक हो ये हवेली और इस हवेली का राज पाठ। वैभव सिंह को इस हवेली से कुछ नहीं चाहिए।"
"वैभव सिंह।" दादा ठाकुर गुस्से में दहाड़े मगर मैं उनकी कोई परवाह किए बिना पलटा और हवेली से बाहर निकल गया। इस वक़्त मेरे अंदर गुस्से का दावानल धधक रहा था। मन कर रहा था दुनिया के हर इंसान की जान ले लूं।