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सबूत प्यार का

अध्याय - 09

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अब तक,,,,,

"प्रणाम छोटे ठाकुर।" बग्घी मेरे पास आई तो बग्घी चला रहे उस आदमी ने मुझसे बड़े अदब से कहा____"ठाकुर साहब ने आपको लाने के लिए मुझे भेजा है।"

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी काका।" मैंने सपाट लहजे में कहा____"ईश्वर ने मुझे दो पैर दिए हैं जो कि अभी सही सलामत हैं। इस लिए मैं पैदल ही घर आ जाता।"

"ऐसा कैसे हो सकता है छोटे ठाकुर?" उस आदमी ने कहा_____"ख़ैर छोड़िये, लाइए ये थैला मुझे दीजिए।"

बग्घी से उतर कर वो आदमी मेरे पास आया और थैला लेने के लिए मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ाया तो मैंने उसे ख़ामोशी से थैला दे दिया जिसे ले कर वो एक तरफ हट गया। मैं जब बग्घी में बैठ गया तो वो आदमी भी आगे बैठ गया और फिर उसने घोड़ों की लगाम को हरकत दी तो घोड़े आवाज़ करते हुए चल दिए।

अब आगे,,,,,

सारे रास्ते मेरे ज़हन में कई तरह के ख़याल आते जाते रहे। कभी मैं ये सोचता कि प्रदीप काका के हत्यारे का पता कैसे लगाऊंगा और प्रदीप काका के बाद सरोज काकी और डॉली का क्या होगा तो कभी ये सोचने लगता कि जब मैं घर पहुंच जाऊंगा तब सब लोग मुझे देख कर क्या कहेंगे? ख़ास कर पिता जी जब मुझे देखेंगे तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी?

आस पास के गांवों में मेरा गांव सबसे बड़ा गांव था। ज़्यादातर मेरे ही गांव में मेरे पिता जी के द्वारा आस पास के गांवों की हर समस्या का फैसला होता था। गांव में कुछ शाहूकार लोग भी थे जो पिता जी की चोरी से ग़रीबों पर नाजायज़ रूप से जुल्म करते थे। ग़रीब लोग उनके डर से उनकी शिकायत पिता जी से नहीं कर पाते थे। यूं तो शाहूकार हमेशा हमसे दब के ही रहे थे किन्तु न‌ई पीढ़ी वाली औलाद अब सिर उठाने लगी थी।

गांव के एक छोर पर हमारी हवेली बनी हुई थी। दादा पुरखों के ज़माने की हवेली थी वो किन्तु अच्छी तरह ख़याल रखे जाने की वजह से आज भी न‌ई नवेली दुल्हन की तरह चमकती थी। हवेली के सामने एक विशाल मैदान था और छोर पर क़रीब पन्द्रह फ़ीट ऊंचा हाथी दरवाज़ा था। जगह जगह हरे भरे पेड़ पौधे और फूल लगे हुए थे जिससे हवेली की सुंदरता और भी बढ़ी हुई दिखती थी। हवेली के अंदर विशाल प्रांगण के एक तरफ कई सारी जीपें खड़ी थी और दूसरी तरफ कुछ बग्घियां खड़ी हुईं थी। जहां पर रास्ता सही नहीं होता था वहां पर बग्घी से जाया जाता था।

(दोस्तों, यहाँ पर मैं अपने ठाकुर खानदान का एक छोटा सा परिचय देना चाहूंगा ताकि कहानी को आगे चल कर पढ़ने और समझने में थोड़ी आसानी रहे।)

☆ ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह (दादा ठाकुर/इनका स्वर्गवास हो चुका है)

☆ इन्द्राणी सिंह (दादी माँ/इनका भी स्वर्गवास हो चुका है।)

ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह के पहले जो थे उनका इस कहानी में कोई विवरण नहीं दिया जायेगा क्योंकि उनका कहानी में कोई रोले नहीं है। इस लिए वर्तमान के किरदारों को जोड़ने के लिए दादा ठाकुर से परिचय शुरू करते हैं।

ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह को यूं तो चार बेटे थे किन्तु सबसे बड़े और तीसरे नंबर वाले उनके बेटे बहुत पहले ईश्वर को प्यारे हो चुके थे। उनकी मौत कैसे हुई थी ये बात ना तो मुझे पता है और ना ही मैंने कभी पता करने की कोशिश की थी। ख़ैर दो तो ईश्वर को प्यारे हो गए किन्तु जो दो बचे हैं उनका परिचय इस प्रकार है।

☆ ठाकुर प्रताप सिंह (मेरे पिता जी/दादा ठाकुर)

☆ सुगंधा सिंह (मेरी माँ/बड़ी ठकुराइन)

मेरे माता पिता की दो ही संतानें हैं।

(१) ठाकुर अभिनव सिंह (मेरे बड़े भाई)

रागिनी सिंह (मेरी भाभी और बड़े भाई की पत्नी)

(२) ठाकुर वैभव सिंह (मैं)

☆ ठाकुर जगताप सिंह (मेरे चाचा जी/मझले ठाकुर)

☆ मेनका सिंह (मेरी चाची/छोटी ठकुराइन)

मेरे चाचा और चाची के तीन बच्चे हैं जो इस प्रकार हैं।

(१) ठाकुर विभोर सिंह (चाचा चाची का बड़ा बेटा)

(२) कुसुम सिंह (चाचा चाची की बेटी)

(३) ठाकुर अजीत सिंह (चाचा चाची का छोटा बेटा)

मेरे चाचा जी ज़मीन ज़ायदाद और खेती बाड़ी का सारा काम काज सम्हालते हैं। उनकी निगरानी में ही सारा काम काज होता है।

☆ चंद्रकांत सिंह (मेरे पिता जी का मुंशी)

☆ प्रभा सिंह (मुंशी की पत्नी)

मुंशी चंद्रकान्त और प्रभा को दो संताने हैं जो इस प्रकार हैं।

(१) रघुवीर सिंह (मुंशी का बेटा)

रजनी सिंह (रघुवीर की बीवी और मुंशी की बहू)

(२) कोमल सिंह (मुंशी की बेटी)

दोस्तों, तो ये था मेरे ठाकुर खानदान का संक्षिप्त परिचय। मुंशी चंद्रकान्त का परिचय भी दे दिया है क्योंकि कहानी में उसका और उसके परिवार का भी रोल है।

"छोटे ठाकुर।" मैं सोचो में गुम ही था कि तभी ये आवाज़ सुन कर मैंने बग्घी चला रहे उस आदमी की तरफ देखा, जबकि उसने आगे कहा____"हम हवेली पहुंच गए हैं।"

उस आदमी की ये बात सुन कर मैंने नज़र उठा कर सामने देखा। मैं सच में हवेली के विशाल मैदान से होते हुए हवेली के मुख्य दरवाज़े के पास आ गया था। चार महीने बाद हवेली में आया था। बग्घी में बैठे बैठे मैं कुछ पलों तक हवेली को देखता रहा उसके बाद बग्घी से नीचे उतरा। हवेली में आस पास मौजूद दरबान लोगों ने मुझे देखते ही अदब से सिर झुका कर मुझे सलाम किया।

मैं अभी बग्घी से नीचे उतरा ही था कि तभी हवेली के मुख्य दरवाज़े से निकल कर मेरी माँ और भाभी मेरी तरफ आईं। उनके साथ में मेरी चाची मेनका और उनकी बेटी कुसुम भी थी। सभी के चेहरे खिले हुए थे और होठों पर गहरी मुस्कान थी। माँ के हाथों में आरती की थाली थी जिसमे एक दिया जल रहा था। मेरे पास आ कर माँ ने मेरी आरती उतारी और थाली से कुछ फूल उठा कर मेरे ऊपर डाल दिया।

"आपको पता है ना कि मुझे ये सब पसंद नहीं है।" मैंने माँ से सपाट लहजे में कहा_____"फिर ये सब क्यों माँ?"

"तू एक माँ के ह्रदय को नहीं समझ सकता बेटे।" मैंने झुक कर माँ के चरणों को छुआ तो माँ ने मेरे सर पर अपना हाथ रखते हुए कहा____"ख़ैर, हमेशा खुश रह और ईश्वर तुझे सद्बुद्धि दे।"

मां से आशीर्वाद लेने के बाद मैंने मेनका चाची का आशीर्वाद लिया और फिर रागिनी भाभी के पैरों को छू कर उनका आशीर्वाद भी लिया। कुसुम दौड़ कर आई और मेरे सीने से लग गई।

"कैसी है मेरी बहना?" मैंने उसे खुद से अलग करते हुए पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा____"अब आप आ गए हैं तो अच्छी ही हो गई हूं।"

"चल अंदर चल।" माँ ने कहा तो हम सब हवेली के अंदर की तरफ चल पड़े।

हवेली के अंदर आ कर मैं एक कुर्सी पर बैठ गया। मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई मगर पिता जी और चाचा जी कहीं नज़र न आये मुझे और ना ही मेरा बड़ा भाई नज़र आया। चाचा जी के दोनों बेटे भी नहीं दिखे मुझे।

"बाकी सब लोग कहां हैं माँ?" मैंने माँ से पूछा____"कोई दिख नहीं रहा मुझे।"

"तेरे पिता जी तो शाम को ही किसी ज़रूरी काम से कहीं चले गए थे।" माँ ने कहा____"तेरे चाचा जी दो दिन पहले शहर गए थे किसी काम से मगर अभी तक नहीं आए और तेरा भाई दोपहर को विभोर और अजीत के साथ पास के गांव में अपने किसी दोस्त के निमंत्रण पर गया है।"

"भइया मैंने आपका कमरा साफ़ करके अच्छे से सजा दिया है।" पास में ही खड़ी कुसुम ने कहा____"बड़ी माँ ने मुझे बता दिया था कि आज शाम को आप आ जाएंगे इस लिए मैंने आपके कमरे की साफ़ सफाई अच्छे से कर दी थी।"

"जब से मेरे द्वारा इसे ये पता चला है कि तू आज शाम को आ जाएगा।" माँ ने कहा____"तब से ये पूरी हवेली में ख़ुशी के मारे इधर से उधर नाचती फिर रही है।"

"हां तो नाचने वाली बात ही तो है न बड़ी मां।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"चार महीने बाद मेरे भैया आने वाले थे। ताऊ जी के डर से मैं अपने भैया से मिलने भी नहीं जा सकी कभी।" कहने के साथ ही कुसुम मेरी तरफ पलटी और फिर मासूमियत से बोली____"भइया आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं ना?"

"तू खुद ही सोच।" मैंने कहा____"कि मुझे नाराज़ होना चाहिए कि नहीं?"

"बिल्कुल नाराज़ होना चाहिए आपको।" कुसुम ने दो पल सोचने के बाद झट से कहा____"इसका मतलब आप नाराज हैं मुझसे?"

"तुझसे ही नहीं बल्कि सबसे नाराज़ हूं मैं।" मैंने कुर्सी से उठते हुए कहा____"और ये नाराज़गी इतनी जल्दी ख़त्म होने वाली नहीं है। ख़ैर बाद में बात करुंगा।"

कहने के साथ ही मैं किसी की कुछ सुने बिना ही अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। चाची और भाभी रसोई में चली गईं थी। इधर मेरी बातें सुनने के बाद जहां माँ कुछ सोचने लगीं थी वहीं कुसुम के चेहरे पर मायूसी छा गई थी।

हवेली दो मंजिला थी और काफी बड़ी थी। हवेली के ज़्यादातर कमरे बंद ही रहते थे। हवेली के निचले भाग में एक तरफ पिता जी का कमरा था जो कि काफी आलीशान था। दूसरी तरफ निचले ही भाग में चाचा जी का कमरा था। हवेली के अंदर ही एक मंदिर था। हवेली के ऊपरी भाग पर सबसे किनारे पर और सबसे अलग मेरा कमरा था। मेरे कमरे के आस पास वाले सभी कमरे बंद ही रहते थे। दूसरे छोर में एक तरफ बड़े भैया और भाभी का कमरा था। उसके दूसरी तरफ के दो अलग अलग कमरे चाचा जी के दोनों बेटों के थे और उन दोनों के सामने वाला एक कमरा कुसुम का था।

मैं शुरू से ही सबसे अलग और एकांत में रहना पसंद करता था। हवेली के सभी लोग जहां पिता जी की मौजूदगी में एकदम चुप चाप रहते थे वहीं मैं अपने ही हिसाब से रहता था। मैं जब चाहे तब अपनी मर्ज़ी से कहीं भी आ जा सकता था। ऐसा नहीं था कि मैं किसी का आदर सम्मान नहीं करता था बल्कि वो तो मैं बराबर करता था किन्तु जब मुझ पर किसी तरह की पाबंदी लगाने वाली बात आती थी तब मेरा बर्ताव उग्र हो जाता था और उस सूरत में मैं किसी की एक नहीं सुनता था। फिर भले ही चाहे कोई मेरी जान ही क्यों ना लेले। कहने का मतलब ये कि मैं अच्छा तभी बना रह सकता था जब कोई मुझे किसी बात के लिए रोके टोके न और जैसे ही किसी ने रोक टोंक लगाईं वैसे ही मेरा पारा चढ़ जाता था। मुझे अपने ऊपर किसी की बंदिश ज़रा भी पसंद नहीं थी। मेरे इसी स्वभाव के चलते मेरे पिता जी मुझसे अक्सर नाराज़ ही रहते थे।

कमरे में आ कर मैंने थैले को एक कोने में उछाल दिया और पलंग पर बिछे मोटे मोटे गद्दों पर धम्म से लेट गया। आज चार महीने बाद गद्देदार बिस्तर नसीब हुआ था। कुसुम ने सच में बहुत अच्छे से सजाया था मेरे कमरे को। हम चार भाइयों में वो सबसे ज़्यादा मेरी ही लाडली थी और जितना ज़ोर उसका मुझ पर चलता था उतना किसी दूसरे पर नहीं चलता था। उसके अपने सगे भाई उसे किसी न किसी बात पर डांटते ही रहते थे। हालांकि एक भाई अजीत उससे छोटा था मगर ठाकुर का खून एक औरत ज़ात से दब के रहना हर्गिज़ गवारा नहीं करता था।

हवेली मेरे लिए एक कै़दखाना जैसी लगती थी और मैं किसी क़ैद में रहना बिलकुल भी पसंद नहीं करता था। यूं तो हवेली में काफी सारे नौकर और नौकरानियाँ थी जो किसी न किसी काम के लिए यहाँ मौजूद थे किन्तु अपनी तबियत ज़रा अलग किस्म की थी। हवेली में रहने वाली ज़्यादातर नौकरानियाँ मेरे लंड की सवारी कर चुकीं थी और ये बात किसी से छुपी नहीं थी। बहुत सी नौकरानियों को तो हवेली से निकाल भी दिया गया था मेरे इस ब्यभिचार के चक्कर में। मेरा बड़ा भाई अक्सर इस बात के लिए मुझे बुरा भला कहता रहता था मगर मैं कभी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देता था। चाचा जी के दोनों लड़के मेरे भाई के साथ ही ज़्यादातर रहते थे। शायद उन्हें ये अच्छी तरह से समझाया गया था कि मेरे साथ रहने से वो ग़लत रास्ते पर चले जाएंगे।

हवेली के अंदर मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार से बात करने वाला अगर कोई था तो वो थी चाचा चाची की लड़की कुसुम। वैसे तो माँ और चाची भी मुझसे अच्छे से ही बात करतीं थी मगर उनकी बातों में उपदेश देना ज़्यादा शामिल होता था जो कि अपने को बिलकुल पसंद नहीं था। रागिनी भाभी भी मुझसे बात करतीं थी किन्तु वो भी माँ और चाची की तरह उपदेश देने लगतीं थी इस लिए उनसे भी मेरा ज़्यादा मतलब नहीं रहता था। दूसरी बात ये भी थी कि उनकी सुंदरता पर मैं आकर्षित होने लगता था जो कि यकीनन ग़लत बात थी। मैं अक्सर इस बारे में सोचता और फिर यही फैसला करता कि मैं उनसे ज़्यादा बोल चाल नहीं रखूंगा और ना ही उनके सामने जाऊंगा। मैं पक्का औरतबाज़ था लेकिन अपने घर की औरतों पर मैं अपनी नीयत ख़राब नहीं करना चाहता था इसी लिए मैं हवेली में बहुत कम ही रहता था।

हवेली में पिता जी का शख़्त हुकुम था कि हवेली में काम करने वाली कोई भी नौकरानी मेरे कमरे में नहीं जाएगी और ना ही मेरे कहने पर कोई काम करेगी। अगर मैं किसी के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करूं तो इस बात की सूचना फ़ौरन ही उन तक पहुंचाना जैसे हर किसी का पहला और आख़िरी कर्त्तव्य था। मेरे कमरे की साफ़ सफाई या तो कुसुम करती थी या फिर मां। कहने का मतलब ये कि हवेली में मेरी छवि बहुत ही ज़्यादा बदनाम किस्म की थी।

अभी मैं इन सब बातों को सोच ही रहा था कि कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई जिससे मेरा ध्यान टूटा और मैंने दरवाज़े की तरफ देखा। दरवाज़े पर कुसुम खड़ी थी। उसे देख कर मैं बस हलके से मुस्कुराया और उसे अंदर आने का इशारा किया तो वो मुस्कुराते हुए अंदर आ गई।

"वो मैं ये पूछने आई थी कि आपको कुछ चाहिए तो नहीं?" कुसुम ने कहा____"वैसे ये तो बताइये कि इतने महीनों में आपको कभी अपनी इस बहन की याद आई कि नहीं?"

"सच तो ये था बहना।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"मैं किसी को याद ही नहीं करना चाहता था। मेरे लिए हर रिश्ता और हर ब्यक्ति जैसे रह ही नहीं गया था। मुझे हर उस ब्यक्ति से नफ़रत हो गई थी जिससे मेरा ज़रा सा भी कोई रिश्ता था।"

"हां मैं समझ सकती हूं भइया।" कुसुम ने कहा____"ऐसे में तो यही होना था। मैं तो हर रोज़ बड़ी माँ से कहती थी कि मुझे अपने वैभव भैया को देखने जाना है मगर बड़ी माँ ये कह कर हमेशा मुझे रोक देती थीं कि अगर मैं आपको देखने गई तो दादा ठाकुर गुस्सा करेंगे।"

"और सुना।" मैंने विषय बदलते हुए कहा____"मेरे जाने के बाद यहाँ क्या क्या हुआ?"

"होना क्या था?" कुसुम ने झट से कहा____"आपके जाते ही बड़े भैया तो बड़ा खुश हुए थे और उनके साथ साथ विभोर भैया और अजीत भी बड़ा खुश हुआ था। सच कहूं तो आपके जाने के बाद यहाँ का माहौल ही बदल गया था। भैया लोग तो खुश थे मगर बाकी लोग ख़ामोश से हो गए थे। दादा ठाकुर तो किसी से बात ही नहीं करते थे। उनके इस ब्योहार से मेरे पिता जी भी चुप ही रहते थे। किसी किसी दिन दादा ठाकुर से बड़ी माँ आपके बारे में बातें करती थी तो दादा ठाकुर ख़ामोशी से उनकी बातें सुनते और फिर बिना कुछ कहे ही चले जाते थे। ऐसा लगता था जैसे वो गूंगे हो गए हों। मेरा तो पूछिए ही मत क्योंकि आपके जाने के बाद तो जैसे मुझ पर जुल्म करने का बाकी भाइयों को प्रमाण पत्र ही मिल गया था। वो तो भाभी थीं जिनके सहारे मैं बची रहती थी।"

"तुझे मेरे लिए एक काम करना होगा कुसुम।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"करेगी ना?"

"आप बस हुकुम दीजिये भइया।" कुसुम ने मेरे पास आते हुए कहा____"क्या करना होगा मुझे?"

"तुझे मेरे लिये।" मैंने धीमी आवाज़ में कहा____"यहां पर हर किसी की जासूसी करनी होगी। ख़ास कर दो लोगों की। बोल करेगी ना?"

"क्या ऐसा कभी हुआ है भैया कि आपके कहने पर मैंने कोई काम ना किया हो?" कुसुम ने कहा____"आप बताइए किन दो लोगों की जासूसी करनी है मुझे और क्यों करनी है?"

"तुझे दादा ठाकुर और ठाकुर अभिनव सिंह की जासूसी करनी है।" मैंने कहा____"ये काम तुझे इस तरीके से करना है कि उनको तुम्हारे द्वारा जासूसी करने की भनक तक ना लग सके।"

"वो तो ठीक है भइया।" कुसुम ने उलझन भरे भाव से कहा____"मगर आप इन दोनों की जासूसी क्यों करवाना चाहते हैं?"

"वो सब मैं तुझे बाद में बताऊंगा कुसुम।" मैंने कहा_____"हालाँकि मेरा ख़याल है कि जब तू इन सबकी जासूसी करेगी तो तुझे भी अंदाज़ा हो ही जायेगा कि मैंने तुझे इन लोगों की जासूसी करने के लिए क्यों कहा था?"

"चलिए ठीक है मान लिया।" कुसुम ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन मुझे ये तो बताइए कि मुझे जासूसी करते हुए पता क्या करना है? आख़िर मुझे भी तो पता होना चाहिए ना कि मैं जिनकी जासूसी करने जा रही हूं उनसे मुझे जानना क्या है?"

"तुझे बस उनकी बातें सुननी है।" मैंने सपाट भाव से कहा____"और उनकी बातें सुन कर वो सब बातें हूबहू मुझे आ कर सुरानी हैं।"

"लगता है आप मेरी पिटाई करवाना चाहते हैं उन सबसे।" कुसुम ने मासूमियत से कहा____"क्योंकि अगर उन्हें पता चल गया कि मैं उनकी बातें चोरी छुपे सुन रही हूं तो दादा ठाकुर तो शायद कुछ न कहें मगर वो तीनों भाई तो मेरी खाल ही उधेड़ देंगे।"

"ऐसा कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा____"मेरे रहते तुझे कोई हाथ भी नहीं लगा सकता।"

"हां ये तो मुझे पता है।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"ठीक है, तो मैं आज से ही जासूसी के काम में लग जाती हूं। कुछ और भी हो तो बता दीजिए।"

"और तो फिलहाल कुछ नहीं है।" मैंने कहा____"अच्छा ये बता भाभी मुझसे नाराज हैं क्या?"

"जिस दिन वो आपसे मिल कर आईं थी।" कुसुम ने कहा____"उस दिन वो बहुत रोईं थी अपने कमरे में। बड़ी माँ ने उनसे जब सब पूछा तो उन्होंने बता दिया कि आपने उन्हें क्या कहा था। उनकी बातें सुन कर बड़ी माँ को भी आप पर गुस्सा आ गया था। उधर भाभी ने तो दो दिनों तक खाना ही नहीं खाया था। हम सब उन्हें कितना मनाए थे मगर वो अपने कमरे से निकलीं ही नहीं थी। मुझे लगता है भैया कि आपको उनके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए था। भला इस सबमें उनकी क्या ग़लती थी? उन्हें तो किसी ने कहा भी नहीं था कि वो आपसे मिलने जाएं। बल्कि वो तो काफी समय से खुद ही कह रहीं थी कि उन्हें आपसे मिलने जाना है। मुझसे भी कई बार कहा था उन्होंने मगर दादा ठाकुर के डर से मैं उनके साथ नहीं जा सकती थी। उस दिन उन्होंने जब देखा कि हवेली में माँ और बड़ी माँ के सिवा कोई नहीं है तो वो चुप चाप पैदल ही हवेली से निकल गईं थी। मुझसे कहा कि वो मंदिर जा रही हैं। हालांकि मैं समझ गई थी कि वो आपके पास ही जा रहीं थी पर मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा।"

"इसका मतलब मुझे भाभी से माफ़ी मांगनी चाहिए?" मैंने गहरी सांस ले कर कहा।

"हां भइया।" कुसुम ने सिर हिलाया____"आपको भाभी से माफ़ी मांगनी चाहिए। आपको पता है एक दिन बड़े भैया उन पर बहुत गुस्सा कर रहे थे।"

"क्यो?" मैंने पूछा।

"वो इस लिए कि भाभी उनसे कह रही थी कि कैसे भाई हैं वो?" कुसुम ने कहा____"जो अपने छोटे भाई के लिए ज़रा भी चिंतित नहीं हैं। जबकि इतने महीने में उन्हें कम से कम एक बार तो आपसे मिलने जाना ही चाहिए था। भाभी की इन बातों से बड़े भैया उन पर बहुत गुस्सा हुए थे और फिर गुस्से में हवेली से चले गए थे।"

कुसुम की बातें सुन कर मैं एकदम से सोचने पर मजबूर हो गया था। इन चार महीनों में मेरे घर का कोई भी सदस्य मुझसे मिलने नहीं आया था किन्तु भाभी अपनी इच्छा से मुझसे मिलने आईं थी जबकि उन्होंने मुझसे ये कहा था कि माँ जी ने उन्हें भेजा था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि भाभी मेरे लिए इतना चिंतित क्यों थी? क्या ये सिर्फ एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी या फिर इसके पीछे कोई दूसरी वजह थी? ख़ैर जो भी वजह रही हो मगर ये तो सच ही था ना कि वो मुझसे मिलने आईं थी और मैंने उन्हें बुरा भला कह कर अपने पास से जाने को बोल दिया था। मेरे मन में ख़याल उभरा कि मुझे भाभी के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था। कुसुम की बातों से मुझे पता चला कि वो भाई से भी मेरे बारे में बातें करती थी जिस पर मेरा बड़ा भाई उन पर गुस्सा करता था।
 
कुसुम को मैंने जाने को बोल दिया तो वो कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैं काफी देर तक भाभी के बारे में सोचता रहा। कुछ देर बाद मैं उठा और भाभी के कमरे की तरफ बढ़ चला। मेरा ख़याल था कि वो शायद इस वक़्त अपने कमरे में ही होंगी। बड़े भाई के आने से पहले मैं उनसे मिल लेना चाहता था।

मैं भाभी के कमरे में पंहुचा तो देखा भाभी कमरे में नहीं थीं। रात हो गई थी और मुझे याद आया कि इस वक़्त सब खाना पीना बनाने में लगी होंगी। मैं नीचे गया और कुसुम को आवाज़ लगाईं तो वो मेरे पास भाग कर आई। मैंने कुसुम से कहा कि वो भाभी को बता दे कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं इस लिए वो ऊपर आ जाएं। मेरी बात सुन कर कुसुम सिर हिला कर चली गई जबकि मैं वापस भाभी के कमरे की तरफ बढ़ चला।

भाभी के कमरे में रखी एक कुर्सी पर मैं बैठा उनके आने का इंतज़ार कर रहा था। मेरे मन में कई सारी बातें भी चलने लगीं थी और मेरे दिल की धड़कनें अनायास ही तेज़ हो गईं थी। थोड़ी देर में मुझे कमरे के बाहर पायलों की छम छम बजती आवाज़ सुनाई दी। मेरी धड़कनें और भी तेज़ हो गईं। तभी कमरे के दरवाज़े से भाभी ने कमरे में प्रवेश किया। भाभी का चेहरा रामानंद सागर कृत श्री कृष्णा की जामवंती जैसा था। भाभी जैसे ही कमरे में दाखिल हुईं तो मैं फ़ौरन ही कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया जबकि वो मुझे देख कर कुछ पल के लिए रुकीं और फिर कमरे में रखे बिस्तर पर बैठ गईं।

"आज सूर्य पश्चिम से कैसे उदय हो गया वैभव?" भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"आज छोटे ठाकुर ने अपनी भाभी से मिलने का कष्ट क्यों किया?"

"मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी।" मैंने गर्दन झुका कर धीमी आवाज़ में कहा____"मैं उस दिन के अपने बर्ताव के लिए आपसे माफ़ी मांगने आया हूं।"

"बड़ी हैरत की बात है।" भाभी ने जैसे ताना मारते हुए कहा____"किसी के भी सामने न झुकने वाला सिर आज अपनी भाभी के सामने झुक गया और इतना ही नहीं माफ़ी भी मांग रहा है। कसम से देवर जी यकीन नहीं हो रहा।"

"आपको जो कहना है कह लीजिए भाभी।" मैंने गर्दन को झुकाए हुए ही कहा____"किन्तु मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं अपने उस दिन के बर्ताव के लिए बेहद शर्मिंदा हूं।"

"नहीं तुम शर्मिंदा नहीं हो सकते वैभव।" भाभी की आवाज़ मेरे करीब से आई तो मैंने गर्दन सीधी कर के उनकी तरफ देखा। वो बिस्तर से उठ कर मेरे पास आ गईं थी, फिर बोलीं____"इस हवेली में दादा ठाकुर के बाद एक तुम ही तो हो जिसमें ठाकुरों वाली बात है। तुम इस तरह गर्दन झुका कर शर्मिंदा नहीं हो सकते।"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं भाभी की बातें सुन कर बुरी तरह हैरान हो गया था।

"मैं वही कह रही हूं वैभव।" भाभी ने कहा____"जो सच है। माना कि कुछ मामलों में तुम्हारी छवि दाग़दार है किन्तु हक़ीक़त यही है कि तुम दादा ठाकुर के बाद उनकी जगह लेने के क़ाबिल हो।"

"मुझे उनकी जगह लेने में कोई दिलचस्पी नहीं है भाभी।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"पिता जी के बाद बड़े भैया ही उनकी जगह लेंगे। मैं तो मस्त मौला इंसान हूं और अपनी मर्ज़ी का मालिक हूं। इस तरह के काम काज करना मेरी फितरत में नहीं है। ख़ैर मैं आपसे अपने उस दिन के बर्ताव के लिए माफ़ी मांगने आया हूं इस लिए आप मुझे माफ़ कर दीजिए।"

"उस दिन तुम्हारी बातों से मेरा दिल ज़रूर दुखा था वैभव।" भाभी ने संजीदगी से कहा____"किन्तु मैं जानती हूं कि जिन हालात में तुम थे उन हालातों में तुम्हारी जगह कोई भी होता तो वैसा ही बर्ताव करता। इस लिए तुम्हें माफ़ी मांगने की ज़रूरत नहीं है। बल्कि मैं तो खुश हू कि जो इंसान मेरे सामने आने से भी कतराता था आज वो मुझसे मिलने आया है। मैंने तो हमेशा यही कोशिश की है कि इस हवेली की बहू के रूप में हर रिश्ते के साथ अपने फ़र्ज़ और कर्त्तव्य निभाऊं किन्तु मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि तुम हमेशा मुझसे किनारा क्यों करते रहते थे? अगर कोई बात थी तो मुझसे बेझिझक कह सकते थे।"

"माफ़ कीजिएगा भाभी।" मैंने कहा____"किन्तु कुछ बातों के लिए सामने वाले से किनारा कर लेने में ही सबकी भलाई होती है। आपसे कभी कोई ग़लती नहीं हुई है इस लिए आप इस बात के लिए खुद को दोष मत दीजिए।"

"भला ये क्या बात हुई वैभव?" भाभी ने मेरी आँखों में झांकते हुए कहा____"अगर तुम खुद ही मानते हो कि मुझसे कोई ग़लती नहीं हुई है तो फिर तुम मुझसे किनारा कर के क्यों रहते हो? आख़िर ऐसी कौन सी वजह है? क्या मुझे नहीं बताओगे?"

"कुछ बातों पर बस पर्दा ही पड़ा रहने दीजिए भाभी।" मैंने बेचैनी से कहा____"और जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दीजिए। अच्छा अब मैं चलता हूं।"

इससे पहले कि भाभी मुझे रोकतीं मैं फ़ौरन ही कमरे से निकल कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। अब भला मैं उन्हें क्या बताता कि मैं उनसे किस लिए किनारा किये रहता था? मैं उन्हें ये कैसे बताता कि मैं उनकी सुंदरता से उनकी तरफ आकर्षित होने लगता था और अगर मैं खुद को उनके आकर्षण से न बचाता तो जाने कब का बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता।

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अब तक,,,,,

"कुछ बातों पर बस पर्दा ही पड़ा रहने दीजिए भाभी।" मैंने बेचैनी से कहा____"और जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दीजिए। अच्छा अब मैं चलता हूं।"

इससे पहले कि भाभी मुझे रोकतीं मैं फ़ौरन ही कमरे से निकल कर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। अब भला मैं उन्हें क्या बताता कि मैं उनसे किस लिए किनारा किये रहता था? मैं उन्हें ये कैसे बताता कि मैं उनकी सुंदरता से उनकी तरफ आकर्षित होने लगता था और अगर मैं खुद को उनके आकर्षण से न बचाता तो जाने कब का बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता।

अब आगे,,,,,

अपने कमरे में आ कर मैं फिर से बिस्तर पर लेट गया था। मेरे ज़हन में भाभी की बातें गूँज रहीं थी। भाभी ने आज पहली बार मुझसे ऐसी बातें की थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा था कि मुझमे ठाकुरों वाली बात है और मैं पिता जी के बाद उनकी जगह सम्हाल सकता था? पिता जी के बाद उनकी जगह सिर्फ मेरा बड़ा भाई ही ले सकता था जबकि भाभी ने इस बारे में कोई बात ही नहीं की थी बल्कि उन्होंने तो साफ लफ्ज़ों में यही कहा था कि पिता जी के बाद मैं ही उनकी जगह ले सकता हूं। आख़िर ऐसा क्यों कहा होगा भाभी ने? उनके मन में भाई के लिए ऐसी बात क्यों नहीं थी?

काफी देर तक मैं इन सब बातों के बारे में सोचता रहा। इस बीच मेरे ज़हन से सरोज काकी और डॉली का ख़याल जाने कब का गायब हो चुका था। ख़ैर रात में कुसुम मुझे खाना खाने के लिए बुलाने आई तो मैंने उससे पूछा कि खाना खाने के लिए कौन कौन हैं नीचे तो उसने बताया कि बड़े भैया विभोर और अजीत अपने दोस्त के यहाँ से खा के ही आये हैं इस लिए वो अपने अपने कमरे में ही हैं। पिता जी और चाचा जी अभी हवेली नहीं लौटे हैं। कुसुम की बात सुन कर मैं उसके साथ ही नीचे आ गया। कुसुम से ही मुझे पता चला था कि बड़े भैया लोग आधा घंटा पहले आए थे। मैं ये सोच रहा था कि मेरा बड़ा भाई तो चलो ठीक है नहीं आया मुझसे मिलने लेकिन विभोर और अजीत तो मुझसे मिलने आ ही सकते थे। आख़िर मैं उन दोनों से बड़ा था।

मैंने एकदम से महसूस किया कि मैं अपने ही घर में अपनों के ही बीच अजनबी सा महसूस कर रहा हूं। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि इस घर का बेटा चार महीने बाद भारी कष्ट सह के हवेली लौटा था और जिसके स्वागत के लिए हवेली के हर सदस्य को पूरे मन से तत्पर हो जाना चाहिए था। इसका मतलब तो यही हुआ कि मेरे यहाँ लौटने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था। मुझे ज़रा सा भी महसूस नहीं हो रहा था कि मेरे यहाँ आने से किसी को कोई ख़ुशी हुई है। माँ तो चलो माँ ही थी और मैं ये नहीं कहता कि उन्हें मेरे लौटने से ख़ुशी नहीं हुई थी किन्तु बाकी लोगों का क्या? ये सब सोचते ही मेरे तन बदन में जैसे आग लग गई। बड़ी बड़ी बातें करने वाले वो कौन लोग थे जो मुझे लेने के लिए मेरे पास आए थे?

खाने के लिए मैं आसन पर बैठ चुका था किन्तु ये सब सोचने के बाद मेरे अंदर फिर से आग भड़क चुकी थी और मेरा मन कर रहा था कि अभी के अभी किसी का खून कर दूं। मैं एक झटके में आसन से उठ गया। माँ थोड़ी ही दूरी पर कुर्सी में बैठी हुईं थी जबकि कुसुम और भाभी रसोई में थीं। मैं जैसे ही झटके से उठ गया तो माँ ने चौंक कर देखा मेरी तरफ।

"क्या हुआ बेटा?" फिर उन्होंने पूछा____"तू ऐसे उठ क्यों गया?"

"मेरा पेट भर गया है मां।" मैंने शख़्त भाव से किन्तु अपने गुस्से को काबू करते हुए कहा____"और आपको मेरी कसम है कि मुझसे खाने के लिए मत कहियेगा और ना ही मुझसे किसी तरह का सवाल करियेगा।"

"पर बेटा हुआ क्या है?" माँ के चेहरे पर घनघोर आश्चर्य जैसे ताण्डव करने लगा था।

"जल्दी ही आपको पता चल जाएगा।" मैंने कहा और सीढिया चढ़ते हुए ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

मेरे जाने के बाद कुर्सी पर बैठी माँ जैसे भौचक्की सी रह गईं थी। उन्हें कुछ समझ में नहीं आया था कि अचानक से मुझे क्या हो गया था जिसके चलते मैं बिना खाए ही अपने कमरे में चला गया था। मेरी और माँ की बातें रसोई के अंदर मौजूद चाची के साथ साथ भाभी और कुसुम ने भी सुनी थी और वो सब फ़ौरन ही रसोई से भाग कर इस तरफ आ गईं थी।

"अरे! वैभव कहां गया दीदी?" मेनका चाची ने हैरानी से पूछा।

"वो अपने कमरे में चला गया है।" माँ ने कहीं खोए हुए भाव से कहा____"मैं समझ नहीं पा रही हूं कि अचानक से उसे हुआ क्या था जिसकी वजह से वो उठ कर इस तरह चला गया और मुझे अपनी कसम दे कर ये भी कह गया कि मैं उसे खाने के लिए न कहूं और ना ही उससे कोई सवाल करूं।"

"बड़ी अजीब बात है।" चाची ने हैरानी से कहा____"पर मुझे लगता है कुछ तो बात ज़रूर हुई है दीदी। वैभव बिना किसी वजह के इस तरह नहीं जा सकता।"

"कुसुम तू जा कर देख ज़रा।" माँ ने कुसुम से कहा____"तू उससे पूछ कि वो इस तरह क्यों बिना खाए चला गया है? वो तेरी बात नहीं टालेगा इस लिए जा कर पूछ उससे।"

"ठीक है बड़ी मां।" कुसुम ने कहा____"मैं भैया से बात करती हूं इस बारे में।"

कुसुम कुछ ही देर में मेरे कमरे में आ गई। मैं बिस्तर पर आँखे बंद किये लेटा हुआ था और अपने अंदर भड़कते हुए भयंकर गुस्से को सम्हालने की कोशिश कर रहा था।

कुसुम मेरे पास आ कर बिस्तर में ही किनारे पर बैठ गई। इस वक़्त मेरे अंदर भयानक गुस्सा जैसे उबाल मार रहा था और मैं नहीं चाहता था कि मेरे इस गुस्से का शिकार कुसुम हो जाए।

"तू यहाँ से जा कुसुम।" मैंने शख़्त भाव से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"इस वक़्त मैं किसी से बात करने के मूड में नहीं हूं।"

"मैं इतना तो समझ गई हूं भैया कि आप किसी वजह से बेहद गुस्सा हो गए हैं।" कुसुम ने शांत लहजे में कहा___"किन्तु मैं ये नहीं जानती कि आप किस वजह से इतना गुस्सा हो गए कि बिना कुछ खाए ही यहाँ चले आए? भला खाने से क्या नाराज़गी भैया?"

"मैंने तुझसे कहा न कि इस वक़्त मैं किसी से बात करने के मूड में नहीं हूं।" मैंने इस बार उसे गुस्से से देखते हुए कहा____"एक बार में तुझे कोई बात समझ में नहीं आती क्या?"

"हां नहीं आती समझ में।" कुसुम ने रुआंसे भाव से कहा____"आप भी बाकी भाइयों की तरह मुझे डांटिए और मुझ पर गुस्सा कीजिए। आप सबको तो मुझे ही डांटने में मज़ा आता है ना। जाइए नहीं बात करना अब आपसे।"

कुसुम ये सब कहने के साथ ही सिसकने लगी और चेहरा दूसरी तरफ कर के मेरी तरफ अपनी पीठ कर ली। उसके इस तरह पीछा कर लेने से और सिसकने से मेरा गुस्सा ठंडा पड़ने लगा। मैं जानता था कि मेरे द्वारा उस पर इस तरह गुस्सा करने से उसे दुःख और अपमान लगा था जिसकी वजह से वो सिसकने लगी थी। दुःख और अपमान इस लिए भी लगा था क्योंकि मैं कभी भी उस पर गुस्सा नहीं करता था बल्कि हमेशा उससे प्यार से ही बात करता था।

"इधर आ।" फिर मैंने नरम लहजे में उसे पुकारते हुए कहा तो उसने मेरी तरफ पलट कर देखा। मैंने अपनी बाहें फैला दी थी जिससे उसने पहले अपने दुपट्टे से अपने आँसू पोंछे और फिर खिसक कर मेरे पास आ कर मेरी बाहों में समा ग‌ई।

"आप बहुत गंदे हैं।" उसने मेरे सीने से लगे हुए ही कहा____"मैं तो यही समझती थी कि आप बाकियों से अच्छे हैं जो मुझ पर कभी भी गुस्सा नहीं कर सकते।"

"चल अब माफ़ कर दे ना मुझे।" मैंने उसके सिर पर हांथ फेरते हुए कहा____"और तुझे भी तो समझना चाहिए था न कि मैं उस वक़्त गुस्से में था।"

"आप चाहे जितने गुस्से में रहिए।" कुसुम ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मगर आप मुझ पर गुस्सा नहीं कर सकते। ख़ैर छोड़िये और ये बताइए कि किस बात पर इतना गुस्सा हो गए थे आप?"

"ये हवेली और इस हवेली में रहने वाले लोग मुझे अपना नहीं समझते कुसुम।" मैंने भारी मन से कहा____"मैं ये मानता हूं कि मैंने आज तक हमेशा वही किया है जो मेरे मन ने कहा और जो मैंने चाहा मगर मेरी ग़लतियों के लिए मुझे घर गांव से ही निष्कासित कर दिया गया। मैंने चार महीने न जाने कैसे कैसे दुःख सहे। इन चार महीनों में मुझे ज़िन्दगी के असल मायने पता चले और मैं बहुत हद तक सुधर भी गया। सोचा था कि अब वैसा नहीं रहूंगा जैसा पहले हुआ करता था मगर शायद मेरे नसीब में अच्छा बनना लिखा ही नहीं है कुसुम।"

"ऐसा क्यों सोचते हैं आप?" कुसुम ने लरज़ते हुए स्वर में कहा___"मेरी नज़र में तो आप हमेशा से ही अच्छे थे। कम से कम आप ऐसे तो थे कि जो भी करते थे उसका पता सबको चलता था मगर कुछ लोग तो ऐसे भी हैं भैया जो ऐसे काम करते हैं जिनके बारे में दूसरों को भनक तक नहीं लगती और मज़ेदार बात ये कि उस काम को भी वो लोग गुनाह नहीं समझते।"

"ये क्या कह रही है तू?" मैंने चौंक कर कुसुम की तरफ देखा। कुसुम मेरे सीने पर ही छुपकी हुई थी और उसके सीने का एक ठोस उभार मेरे बाएं सीने पर धंसा हुआ था। हालांकि मेरे ज़हन में उसके प्रति कोई ग़लत भावना नहीं थी। मैं तो इस वक़्त उसकी इन बातों पर चौंक गया था। उधर मेरे पूछने पर कुसुम ऐसे हड़बड़ाई थी जैसे अचानक ही उसे याद आया हो कि ये उसने क्या कह दिया है मुझसे।

"कुछ भी तो नहीं।" फिर उसने मेरे सीने से उठ कर बात को बदलते हुए कहा____"वो मैं तो दुनियां वालों की बात कर रही थी भ‌इया। इस दुनियां में ऐसे भी तो लोग हैं ना जो गुनाह तो करते हैं मगर सबसे छुपा कर और सबकी नज़र में अच्छे बने रहते हैं।"

"तू मुझसे कुछ छुपा रही है?" मैंने कुसुम के चेहरे पर ग़ौर से देखते हुए कहा____"मुझे सच सच बता कुसुम कि तू किसकी बात कर रही थी?"

"आप भी कमाल करते हैं भइया।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैंने गंभीर हो कर इतनी गहरी बात क्या कह दी आप तो एकदम से विचलित ही हो ग‌ए।"

कुसुम की इस बात पर मैं कुछ न बोला बल्कि ध्यान से उसकी तरफ देखता रह गया था। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि आज से पहले तो कभी कुसुम ने ऐसी गंभीर बातें मुझसे नहीं कही थी फिर आज ही उसने ऐसा क्यों कहा था? आख़िर उसकी बातों में क्या रहस्य था?

"इतना ज़्यादा मत सोचिये भइया।" मुझे सोचो में गुम देख उसने कहा____"सच एक ऐसी शय का नाम है जो हर नक़ाब को चीर कर अपना असली रूप दिखा ही देता है। ख़ैर छोड़िये इस बात को और ये बताइए कि क्या मैं आपके लिए यहीं पर खाना ले आऊं?"

"मुझे भूख नहीं है।" मैंने बिस्तर के सिरहाने पर अपनी पीठ टिकाते हुए कहा____"तू जा और खा पी कर सो जा।"

"अगर आप नहीं खाएँगे तो फिर मैं भी नहीं खाऊंगी।" कुसुम ने जैसे ज़िद की___"अब ये आप पर है कि आप अपनी बहन को भूखा रखते हैं या उसके पेट में उछल कूद मचा रहे चूहों को मार भगाना चाहते हैं।"

"अच्छा ठीक है जा ले आ।" मैंने हलके से मुस्कुराते हुए कहा____"हम दोनों यहीं पर एक साथ ही खाएँगे।"

"ये हुई न बात।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं अभी खाने की थाली सजा के लाती हूं।"

कहने के साथ ही कुसुम बिस्तर से नीचे उतर कर कमरे से बाहर चली गई। उसके जाने के बाद मैं फिर से उसकी बातों के बारे में सोचने लगा। आख़िर क्या था उसके मन में और किस बारे में ऐसी बातें कह रही थी वो? सोचते सोचते मेरा दिमाग़ चकराने लगा किन्तु कुछ समझ में नहीं आया। मेरे पूछने पर उसने बात को बड़ी सफाई से घुमा दिया था।
 
मेरा स्वभाव तो बचपन से ही ऐसा था किन्तु जब से होश सम्हाला था और जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा था तब से मैं कुछ ज़्यादा ही लापरवाह और मनमौजी किस्म का हो गया था। मैंने कभी इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा था कि मेरे आगे पीछे जो बाकी लोग थे उनका जीवन कैसे गुज़र रहा था? बचपन से औरतों के बीच रहा था और धीरे धीरे औरतों में दिलचस्पी लेने लगा था। दोस्तों की संगत में मैं कम उम्र में ही वो सब जानने समझने लगा था जिसे जानने और समझने की मेरी उम्र नहीं थी। जब ऐसे शारीरिक सुखों का ज्ञान हुआ तो मैं घर की नौकरानियों पर ही उन सुखों को पाने के लिए डोरे डालने लगा था। बड़े खानदान का बेटा था जिसके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी और जिसका हर कहा मानना जैसे हर नौकर और नौकरानी का फर्ज़ था। बचपन से ही निडर था मैं और दिमाग़ भी काफी तेज़ था इस लिए हवेली में रहने वाली नौकरानियों से जिस्मानी सुख प्राप्त करने में मुझे ज़्यादा मुश्किल नहीं हुई।

जब एक बार जिस्मों के मिलन से अलौकिक सुख मिला तो फिर जैसे उस अलौकिक सुख को बार बार पाने की इच्छा और भी तीव्र हो गई। जिन नौकरानियों से मेरे जिस्मानी सम्बन्ध बन जाते थे वो मेरे और दादा ठाकुर के भय की वजह से हमारे बीच के इस राज़ को अपने सीने में ही दफ़न कर लेतीं थी। कुछ साल तो ऐसे ही मज़े में निकल गए मगर फिर ऐसे सम्बन्धों का भांडा फूट ही गया। बात दादा ठाकुर यानी मेरे पिता जी तक पहुंची तो वो बेहद ख़फा हुए और मुझ पर कोड़े बरसाए गए। मेरे इन कारनामों के बारे में जान हर कोई स्तब्ध था। ख़ैर दादा ठाकुर के द्वारा कोड़े की मार खा कर कुछ समय तक तो मैंने सब कुछ बंद ही कर दिया था मगर उस अलौकिक सुख ही लालसा फिर से ज़ोर मारने लगी थी और मैं औरत के जिस्म को सहलाने के लिए तथा उसे भोगने के लिए जैसे तड़पने लगा था। अपनी इस तड़प को मिटाने के लिए मैंने फिर से हवेली की एक नौकरानी को फंसा लिया और उसके साथ उस अलौकिक सुख को प्राप्त करने लगा। इस बार मैं पूरी तरह सावधान था कि मेरे ऐसे सम्बन्ध का पता किसी को भी न चल सके मगर दुर्भाग्य से एक दिन फिर से मेरा भांडा फूट गया और दादा ठाकुर के कोड़ों की मार झेलनी पड़ गई।

दादा ठाकुर के कोड़ों की मार सहने के बाद मैं यही प्रण लेता कि अब दुबारा ऐसा कुछ नहीं करुंगा मगर हप्ते दस दिन बाद ही मेरा प्रण डगमगाने लगता और मैं फिर से हवेली की किसी न किसी नौकरानी को अपने नीचे सुलाने पर विवश कर देता। हालांकि अब मुझ पर निगरानी रखी जाने लगी थी मगर अपने लंड को तो चूत का स्वाद लग चुका था और वो हर जुल्म ओ सितम सह कर भी चूत के अंदर समाना चाहता था। एक दिन ऐसा आया कि दादा ठाकुर ने हुकुम सुना दिया कि हवेली की कोई भी नौकरानी मेरे कमरे में नहीं जाएगी और ना ही मेरा कोई काम करेगी। दादा ठाकुर के इस हुकुम के बाद मेरे लंड को चूत मिलनी बंद हो गई और ये मेरे लिए बिलकुल भी ठीक नहीं हुआ था।

वैसे कायदा तो ये था कि मुझे उसी समय ये सब बंद कर देना चाहिए था जब दादा ठाकुर तक मेरे ऐसे सम्बन्धों की बात पहली बार पहुंची थी। कायदा तो ये भी था कि ऐसे काम के लिए मुझे बेहद शर्मिंदा भी होना चाहिए था मगर या तो मैं बेहद ढीठ किस्म का था या फिर मेरे नसीब में ही ये लिखा था कि इसी सब के चलते आगे मुझे बहुत कुछ देखना पड़ेगा और साथ ही बड़े बड़े अज़ाब सहने होंगे। हवेली में नौकरानियों की चूत मिलनी बंद हुई तो मैंने हवेली के बाहर चूत की तलाश शुरू कर दी। मुझे क्या पता था कि हवेली के बाहर चूतों की खदान लगी हुई मिल जाएगी। अगर पता होता तो हवेली के बाहर से ही इस सबकी शुरुआत करता। ख़ैर देर आए दुरुस्त आए वाली बात पर अमल करते हुए मैं हवेली के बाहर गांव में ही किसी न किसी लड़की या औरत की चूत का मज़ा लूटने लगा। कुछ तो मुझे बड़ी आसानी से मिल जातीं थी और कुछ के लिए जुगाड़ करना पड़ता था। कहने का मतलब ये कि हवेली से बाहर आनंद ही आनंद मिल रहा था। छोटे ठाकुर का पद मेरे लिए वरदान साबित हो रहा था। कितनों की तो पैसे दे कर मैंने बजाई थी मगर बाहर का ये आनंद भी ज़्यादा दिनों तक मेरे लिए नहीं रहा। मेरे कारनामों की ख़बर दादा ठाकुर के कानों तक पहुंच गई और एक बार फिर से उनके कोड़ों की मार मेरी पीठ सह रही थी। दादा ठाकुर भला ये कैसे सहन कर सकते थे कि मेरे इन खूबसूरत कारनामों की वजह से उनके नाम और उनके मान सम्मान की धज्जियां उड़ जाएं?

कहते हैं न कि जिसे सुधरना होता है वो एक बार में ही सुधर जाता है और जिसे नहीं सुधारना होता उस पर चाहे लाख पाबंदिया लगा दो या फिर उसको सज़ा देने की इन्तेहाँ ही कर दो मगर वो सुधरता नहीं है। मैं उन्हीं हस्तियों में शुमार था जिन्हें कोई सुधार ही नहीं सकता था। ख़ैर अपने ऊपर हो रहे ऐसे जुल्मों का असर ये हुआ कि मैं अपनों के ही ख़िलाफ़ बागी जैसा हो गया। अब मैं छोटा बच्चा भी नहीं रह गया था जिससे मेरे अंदर किसी का डर हो, बल्कि अब तो मैं एक मर्द बन चुका था जो सिर्फ अपनी मर्ज़ी का मालिक था।

"अब आप किन ख़यालों में खोये हुए हैं?" कुसुम की इस आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा और मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने आगे कहा____"ख़यालों से बाहर आइए और खाना खाइए। देखिए आपके मन पसंद का ही खाना बनाया है हमने।"

कुसुम हाथ में थाली लिए मेरे बिस्तर के पास आई तो मैं उठ कर बैठ गया। मेरे बैठते ही कुसुम ने थाली को बिस्तर के बीच में रखा और फिर खुद भी बिस्तर पर आ कर मेरे सामने बैठ गई।

"चलिए शुरू कीजिए।" फिर उसने मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा____"या फिर कहिए तो मैं ही खिलाऊं आपको?"

"अपने इस भाई से इतना प्यार और स्नेह मत कर बहना।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"अगर मैं इतना ही अच्छा होता तो मेरे यहाँ आने पर मेरे बाकी भाई लोग खुश भी होते और मुझसे मिलने भी आते। मैं उनका दुश्मन तो नहीं हूं ना?"

"किसी और के खुश न होने से या उनके मिलने न आने से।" कुसुम ने जैसे मुझे समझाते हुए कहा____"आप क्यों इतना दुखी होते हैं भैया? आप ये क्यों नहीं सोचते हैं कि आपके आने से मैं खुश हूं, बड़ी माँ खुश हैं, मेरी माँ खुश हैं और भाभी भी खुश हैं। क्या हमारी ख़ुशी आपके लिए कोई मायने नहीं रखती?"

"अगर मायने नहीं रखती तो इस वक़्त मैं इस हवेली में नहीं होता।" मैंने कहा____"बल्कि इसी वक़्त यहाँ से चला जाता और इस बार ऐसा जाता कि फिर लौट कर कभी वापस नहीं आता।"

"आप मुझसे बड़े हैं और दुनियादारी को आप मुझसे ज़्यादा समझते हैं।" कुसुम ने कहा____"इस लिए आप ये जानते ही होंगे कि इस दुनिया में किसी को भी सब कुछ नहीं मिल जाया करता और ना ही हर किसी का साथ मिला करता है। अगर कोई हमारा दोस्त बनता है तो कोई हमारा दुश्मन भी बनता है। किसी बात से अगर हम खुश होते हैं तो दूसरी किसी बात से हम दुखी भी होते हैं। ये संसार सागर है भ‌इया, यहाँ हर चीज़ के जोड़े बने हैं जो हमारे जीवन से जुड़े हैं। एक अच्छा इंसान वो है जो इन जोड़ों पर एक सामान प्रतिक्रिया करता है। फिर चाहे सुख हो या दुःख।"

"इतनी गहरी बातें कहा से सीखी हैं तूने?" कुसुम की बातें सुन कर मैंने हैरानी से उससे पूछा।

"वक्त और हालात सब सिखा देते हैं भइया।" कुसुम ने हलकी मुस्कान के साथ कहा____"मुझे आश्चर्य है कि आप ऐसे हालातों में भी ये बातें सीख नहीं पाए या फिर ये हो सकता है कि आप ऐसी बातों पर ध्यान ही नहीं देना चाहते।"

"ये तो तूने सच कहा कि ऐसी बातें वक़्त और हालात सिखा देते हैं।" मैंने कुसुम की गहरी आँखों में झांकते हुए कहा____"किन्तु मैं ये नहीं समझ पा रहा हूं कि तुझे ऐसी बातें कैसे पता हैं, जबकि तू ऐसे हालातों में कभी पड़ी ही नहीं?"

"ऐसा आप सोचते हैं।" कुसुम ने थाली से रोटी का एक निवाला तोड़ते हुए कहा____"जबकि आपको सोचना ये चाहिए था कि अगर मुझे ऐसी बातें पता हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि मैंने भी ऐसे हालात देखे ही होंगे। ख़ैर छोड़िए इस बात को और अपना मुँह खोलिए। खाना नहीं खाना है क्या आपको?"

कुसुम ने रोटी के निवाले में सब्जी ले कर मेरी तरफ निवाले को बढ़ाते हुए कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए अपना मुँह खोल दिया। उसने मेरे खुले हुए मुख में निवाला डाला तो मैं उस निवाले को चबाने लगा और साथ ही उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने भी लगा। चार महीने पहले जिस कुसुम को मैंने देखा था ये वो कुसुम नहीं लग रही थी मुझे। इस वक़्त जो कुसुम मेरे सामने बैठी हुई थी वो पहले की तरह चंचल और अल्हड़ नहीं थी बल्कि इस कुसुम के चेहरे पर तो एक गंभीरता झलक पड़ती थी और उसकी बातों से परिपक्वता का प्रमाण मिल रहा था। मैं सोचने लगा कि आख़िर इन चार महीनों में उसके अंदर इतना बदलाव कैसे आ गया था?

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अध्याय - 11

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अब तक,,,,,

कुसुम ने रोटी के निवाले में सब्जी ले कर मेरी तरफ निवाले को बढ़ाते हुए कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए अपना मुँह खोल दिया। उसने मेरे खुले हुए मुख में निवाला डाला तो मैं उस निवाले को चबाने लगा और साथ ही उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने भी लगा। चार महीने पहले जिस कुसुम को मैंने देखा था ये वो कुसुम नहीं लग रही थी मुझे। इस वक़्त जो कुसुम मेरे सामने बैठी हुई थी वो पहले की तरह चंचल और अल्हड़ नहीं थी बल्कि इस कुसुम के चेहरे पर तो एक गंभीरता झलक पड़ती थी और उसकी बातों से परिपक्वता का प्रमाण मिल रहा था। मैं सोचने लगा कि आख़िर इन चार महीनों में उसके अंदर इतना बदलाव कैसे आ गया था?

अब आगे,,,,,

"क्या बात है।" अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी कमरे के दरवाज़े से ये आवाज़ सुन कर मैंने और कुसुम ने दरवाज़े की तरफ देखा। दरवाज़े पर रागिनी भाभी खड़ीं थी। हम दोनों को अपनी तरफ देखते देख भाभी ने मुस्कुराते हुए आगे कहा____"भाई बहन के बीच तो बड़ा प्यार दिख रहा है आज।"

"तो क्या नहीं दिखना चाहिए भाभी?" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा तो रागिनी भाभी मुस्कुराते हुए हमारे पास आईं और अपने दोनों हाथो में लिए हुए पानी से भरे जग और गिलास को बिस्तर में ही एक तरफ रख दिया और फिर बोलीं____"मैंने ऐसा तो नहीं कहा और ना ही मैं ऐसा कहूंगी, बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि भाई बहन के बीच ये प्यार हमेशा ऐसे ही बना रहे मगर...!"

"मगर क्या भाभी?" कुसुम ने सवालिया निगाहों से उनकी तरफ देखते हुए पूछा।

"मगर ये कि दोनों भाई बहन अपने प्यार में।" भाभी ने अपनी उसी मुस्कान के साथ कहा____"अपनी इस बेचारी भाभी को मत भूल जाना। आख़िर हमारा भी तो कहीं कोई हक़ होगा। क्यों देवर जी?"

"ज..जी जी क्यों नहीं।" भाभी ने अचानक से मुझसे पूछा तो मैंने हड़बड़ा कर यही कहा जिससे भाभी के होठों की मुस्कान और गहरी हो गई जबकि कुसुम ने भाभी के बोलने से पहले ही कहा____"आपके असली हक़दार तो आपके कमरे में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं भाभी।"

"चुप बेशरम।" भाभी ने आँखे दिखाते हुए कुसुम से कहा____"मैं तो अपने देवर जी से अपने हक़ की बात कर रही थी।"

भाभी की ये बात सुन कर मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा। आज ये दूसरी बार था जब उनकी बातों से मैं हैरान हुआ था। आज से पहले भाभी ने कभी मुझसे इस तरह हैरान कर देने वाली बातें नहीं की थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उनके मन में आख़िर चल क्या रहा है?

"बड़े भैया को अगर पता चल गया कि आप अपने देवर जी के कमरे में हैं और उनसे हक़ की बात कर रही हैं।" कुसुम की इस बात से मेरा ध्यान उसकी तरफ गया____"तो आज फिर वो आप पर गुस्सा हो जाएंगे।"

"मैं भी एक ठाकुर की बेटी हूं और मेरे अंदर भी ठाकुरों का खून दौड़ रहा है कुसुम।" भाभी ने पुरे आत्मविश्वास के साथ कहा____"इस लिए मैं किसी के गुस्से की परवाह नहीं करती और ना ही मैं किसी के गुस्से से डरती हूं।"

"वाह! क्या बात है भाभी।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"आज तो आप अलग ही रूप में नज़र आ रही हैं। कोई ख़ास बात है क्या?"

"ख़ास बात तो कुछ नहीं है मेरी प्यारी ननद रानी।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ डालने के बाद मुस्कुराते हुए कहा____"मन में बस ये ख़याल आ गया कि कुछ बातों में मुझे भी अपने देवर जी जैसा होना चाहिए।"

रागिनी भाभी की बातें मुझे झटके पे झटके दे रहीं थी। दो साल पहले उनकी शादी मेरे बड़े भाई से हुई थी और तब से मैं उन्हें जानता था कि वो इतना खुल कर किसी से नहीं बोलतीं थी। ख़ास कर मुझसे तो बिलकुल भी नहीं। ये अलग बात है कि उन्हें मुझसे बोलने का मौका ही नहीं मिल पाता था क्योकि मैं उनसे हमेशा दूर दूर ही रहता था।

"अच्छा ऐसी बात है क्या?" कुसुम ने हंसते हुए कहा____"ज़रा मुझे भी तो बताइए भाभी कि ऐसी किन बातों में आप भैया जैसी होने की बात कह रही हैं?"

"किसी चीज़ की परवाह न करना।" भाभी ने एक बार फिर मेरी तरफ देख कर कुसुम से कहा____"और ना ही किसी से डरना।"

"अच्छा तो आप ऐसा समझती हैं कि भैया को किसी चीज़ की परवाह नहीं होती?" कुसुम ने मेरी तरफ नज़र डालते हुए कहा____"और ना ही वो किसी से डरते हैं?"

"अब तक तो ऐसा ही समझती थी मैं।" भाभी ने अजीब भाव से कहा____"पर लगता है अब ऐसा नहीं है। देवर जी में अब बदलाव आ गया है कुसुम। वो अब चीज़ों की परवाह करने लगे हैं और शायद हर किसी से डरने भी लगे हैं।"

"ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" कुसुम ने इस बार हैरानी से कहा____"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आया।"

"जाने दो कुसुम।" भाभी ने कहा____"मुझे लगता है कि देवर जी को मेरा यहाँ आना पसंद नहीं आ रहा है। अच्छा अब तुम दोनों आराम से खाओ, मैं जा रही हूं यहां से।"

इससे पहले कि कुसुम उनसे कुछ कहती वो मेरी तरफ देखने के बाद पलटीं और कमरे से बाहर चली गईं। उन्हें इस तरह जाते देख जाने क्यों मैंने राहत की सांस ली। इधर उनके जाने के बाद कुसुम ने मेरी तरफ देखा और फिर थाली से रोटी का टुकड़ा तोड़ने लगी।

"क्या आपको समझ में आया कि भाभी क्या कह रहीं थी?" कुसुम ने निवाले को अपने मुँह में डालने के बाद कहा____"आज उनका लहजा बदला बदला सा लग रहा था मुझे।"

"मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देता।" मैंने बात को टालने की गरज़ से कहा____"चुप चाप खाना खाओ और हां अपने उस काम पर भी ध्यान दो जिसके लिए मैंने कहा है तुझसे।"

"ठीक है भइया।" कुसुम ने कहा और फिर उसने चुप चाप खाना खाना शुरू कर दिया। उसके साथ मैं भी ख़ामोशी से खाने लगा था और साथ ही भाभी की बातों के बारे में सोचता भी जा रहा था।

खाना खाने के बाद कुसुम थाली ले कर कमरे से चली गई। उसके जाने के बाद मैंने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और बिस्तर पर लेट गया। भाभी का बर्ताव मुझे बहुत अजीब लगा था। वो बातें भले ही कुसुम से कर रहीं थी किन्तु वो सुना मुझे ही रहीं थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर वो मुझसे चाहती क्या हैं? इतना तो उन्होंने मुझसे भी कहा था कि दादा ठाकुर के बाद मैं उनकी जगह ले सकता हूं मगर उनके ऐसा कहने के पीछे क्या वजह थी ये नहीं बताया था उन्होंने। हलांकि मैंने उनसे इसकी वजह पूछी भी नहीं थी।

चार महीने बाद हवेली में लौट कर आया था और आते ही हवेली के दो लोगों ने मुझे हैरान किया था और सोचने पर भी मजबूर कर दिया था। मेरे भाइयों का बर्ताव भी पहले की अपेक्षा कुछ ज़्यादा ही बदला हुआ था। कुछ तो ज़रूर चल रहा था यहाँ मगर क्या इसका पता लगाना जैसे अब ज़रूरी हो गया था मेरे लिए। अब सवाल ये था कि इस सबके बारे में पता कैसे करूं? हलांकि मैंने कुसुम को जासूसी के काम में लगा दिया था किन्तु सिर्फ उसके भरोसे नहीं रह सकता था मैं। यानी मुझे खुद कुछ न कुछ करना होगा।

मैने महसूस किया कि यहाँ आते ही मैं एक अलग ही चक्कर में पड़ गया था जबकि यहाँ आने से पहले मेरे ज़हन में सिर्फ यही था कि मैं प्रदीप काका के हत्यारे का पता लगाऊंगा और उसके परिवार के बारे में भी सोचूंगा। प्रदीप काका की हत्या का मामला भी मेरे लिए एक रहस्य जैसा बना हुआ था जिसके रहस्य का पता लगाना मेरे लिए ज़रूरी था क्योंकि उसी मामले से मेरी फसल में आग लगने का मामला भी जुड़ा हुआ था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मेरी फसल को इस तरह से किसने आग लगाईं होगी? क्या फसल में आग लगाने वाला और प्रदीप काका की हत्या करने वाला एक ही ब्यक्ति हो सकता है? सवाल बहुत सारे थे मगर जवाब एक का भी नहीं था मेरे पास।

चार महीने पहले अच्छी खासी ज़िन्दगी गुज़र रही थी अपनी। बेटीचोद किसी बात की चिंता नहीं थी और ना ही मैं किसी के बारे में इतना सोचता था। हर वक़्त अपने में ही मस्त रहता था मगर महतारीचोद ये शादी वाला लफड़ा क्या हुआ अपने तो लौड़े ही लग गए। मेरे बाप ने खिसिया कर मुझे गांव से निष्कासित कर दिया और फिर तो जैसे चक्कर पे चक्कर चलने का दौर ही शुरू हो गया। बंज़र ज़मीन में किसी तरह गांड घिस घिस के फसल उगाई तो मादरचोद किसी ने प्रदीप काका को ही टपका दिया। उसमे भी उस बुरचटने का पेट नहीं भरा तो बिटियाचोद ने मेरी फसल को ही आग लगा दी। एक बार वो भोसड़ी वाला मुझे मिल जाए तो उसकी गांड में बिना तेल लगाए लंड पेलूंगा।

अपने ही ज़हन में उभर रहे इन ख़यालों से जैसे मैं बुरी तरह भन्ना गया था। किसी तरह खुद को शांत किया और सोने के बारे में सोच कर मैंने अपनी आँखे बंद कर ली मगर इसकी माँ का मादरचोद नींद ही नहीं थी आँखों में। मैंने महसूस किया कि मुझे मुतास लगी है इस लिए अपनी मुतास को भी गाली देते हुए मैं बिस्तर से नीचे उतरा और कमरे का दरवाज़ा खोल कर बाहर आ गया।

कमरे के बाहर हल्का अँधेरा था किन्तु हवेली के चप्पे चप्पे से वाक़िफ मैं आगे बढ़ चला। कुछ ही देर में मैं दूसरे छोर के पास बनी सीढ़ी के पास पहुंच गया। हवेली में मूतने के लिए नीचे जाना पड़ता था। पुरखों की बनाई हुई हवेली में यही एक ख़राबी थी। ख़ैर दूसरे छोर पर मैं पंहुचा तो अचानक मेरे ज़हन में एक ख़याल उभरा जिससे मैंने बाएं तरफ दिख रही राहदारी की तरफ पलटा। कुछ देर रुक कर मैंने इधर उधर देखा और फिर दबे पाँव एक कमरे की तरफ बढ़ चला। हवेली में इस वक़्त गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। मतलब साफ़ था कि इस वक़्त हर कोई अपने अपने कमरे में सोया हुआ था।

मैं जिस कमरे के दरवाज़े के पास पहुंच कर रुका था वो कमरा मेरे बड़े भाई और भाभी का था। भैया भाभी के कमरे के बगल से बने दो कमरों में ताला लगा हुआ था जबकि बाद के दो अलग अलग कमरे विभोर और अजीत के थे और उन दोनों कमरों के सामने वाला कमरा कुसुम का था। हवेली के दूसरे छोर पर जो कमरे बने हुए थे उनमे से एक कमरा मेरा था। जैसा कि मैंने पहले ही बताया था कि मैं सबसे अलग और एकांत में रहना पसंद करता था।

भैया भाभी के कमरे के दरवाज़े के पास रुक कर मैंने इधर उधर का बारीकी से जायजा लिया और फिर सब कुछ ठीक जान कर मैं झुका और दरवाज़े के उस हिस्से पर अपनी आँख सटा दी जहां पर दरवाज़े के दो पल्लों का जोड़ था। हलांकि मुझे मान मर्यादा का ख़्याल रख कर ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि कमरे के अंदर भैया भाभी थे और वो किसी भी स्थिति में हो सकते थे। लेकिन मैंने फिर भी देखना इस लिए ज़रूरी समझा कि मुझे अब अपने सवालों के जवाब तलाशने थे।

दरवाज़े के जोड़ पर थोड़ी झिरी तो थी किन्तु अंदर से पर्दा खिंचा हुआ था जिससे कमरे के अंदर का कुछ भी नहीं देखा जा सकता था। ये देख कर मैंने मन ही मन पर्दे को गाली दी और फिर आँख की जगह अपना एक कान सटा दिया उस हिस्से में और अंदर की आवाज़ सुनने की कोशिश करने लगा। काफी देर तक कान सटाने के बाद भी मुझे अंदर से कुछ सुनाई नहीं दिया जिससे मैं समझ गया कि भैया भाभी अंदर सोए हुए हैं। मैं मायूस सा हो कर दरवाज़े हटा और वापस सीढ़ियों की तरफ चल दिया। अभी मैं दो क़दम ही चला था कि मैं कुछ ऐसी आवाज़ सुन कर ठिठक गया जैसे किसी कमरे का दरवाज़ा अभी अभी खुला हो। इस आवाज़ को सुन कर दो पल के लिए तो मैं एकदम से हड़बड़ा ही गया और झट से आगे बढ़ कर दीवार के पीछे खुद को छुपा लिया।

अपनी बढ़ चुकी धड़कनों को नियंत्रित करते हुए मैंने दीवार के पीछे से अपने सिर को हल्का सा निकाला और राहदारी की तरफ देखा। हल्के अँधेरे में मेरी नज़र विभोर के कमरे के पास पड़ी। बड़े भैया विभोर के कमरे से अभी अभी निकले थे। ये देख कर मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि इस वक़्त बड़े भैया विभोर के कमरे में क्यों थे? अभी मैं ये सोच ही रहा था कि मैंने देखा बड़े भैया विभोर के कमरे से राहदारी में चलते हुए अपने कमरे की तरफ आये और फिर अपने कमरे के दरवाज़े को हल्का सा धक्का दिया तो दरवाज़ा खुल गया। दरवाज़ा खोल कर वो चुप चाप कमरे में दाखिल हो ग‌ए। मैंने साफ देखा कि कमरे के अंदर अँधेरा था। अंदर दाखिल होने के बाद बड़े भैया ने दरवाज़ा बंद कर लिया।

दीवार के पीछे छुपा खड़ा मैं सोच में पड़ गया था कि रात के इस वक़्त बड़े भैया विभोर के कमरे से क्यों आये थे? आख़िर इन तीनों भाइयों के बीच क्या खिचड़ी पक रही थी? तीनों भाइयों के बीच इस लिए कहा क्योंकि आज कल वो तीनों एक साथ ही रह रहे थे। कुछ देर सोचने के बाद मैं दीवार से निकला और सीढ़ियों से उतरते हुए नीचे आ गया। अँधेरा नीचे भी था किन्तु इतना भी नहीं कि कुछ दिखे ही नहीं। मैं गुसलखाने पर गया और मूतने के बाद वापस अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। थोड़ी देर के लिए मेरे मन में ये ख़याल आया कि एक एक कर के सबके कमरों में जाऊं और जानने का प्रयास करूं कि किस कमरे में क्या चल रहा है किन्तु फिर मैंने अपना ये ख़याल दिमाग़ से झटक दिया और अपने बिस्तर में आ कर लेट गया। सोचते सोचते ही नींद आ गई और मैं घोड़े बेच कर सो गया।

सुबह मेरी आँख कुसुम के जगाने पर ही खुली। मैं जगा तो उसने बताया कि कलेवा बन गया है इस लिए मैं नित्य क्रिया से फुर्सत हो कर आऊं। मेरे पूछने पर उसने बताया कि दादा ठाकुर और उसके पिता जी देर रात आ गए थे।

"दादा ठाकुर ने कहा है कि वो आपको नास्ते की मेज पर मिलेंगे।" कुसुम ने पलट कर जाते हुए कहा____"इस लिए जल्दी से आ जाइयेगा।"

इतना कह कर कुसुम चली गई और इधर उसकी बात सुन कर मेरे दिल की धड़कनें अनायास ही तेज़ हो ग‌ईं। दादा ठाकुर यानी कि मेरे पिता ने कुसुम के द्वारा मुझे बुलाया था नास्ते पर। उस दिन के बाद ये पहला अवसर होगा जब मैं उनके सामने जाऊंगा। ख़ैर अब क्योंकि दादा ठाकुर ने बुलावा भेजा था तो मुझे भी अब फ़ौरन उनके सामने हाज़िर होना था। हलांकि इसके पहले मैं अक्सर उनके बुलाने पर देर से ही जाता था। अपनी मर्ज़ी का मालिक जो था किन्तु अब ऐसा नहीं था। अब शायद हालात बदल गए थे या फिर मैं अपनी मर्ज़ी से ही कुछ सोच कर फ़ौरन ही उनके सामने हाज़िर हो जाना चाहता था।

नित्य क्रिया से फ़ारिग होने के बाद मैं नहा धो कर और दूसरे कपड़े पहन कर नीचे पहुंचा। मेरे दिल की धड़कनें ये सोच कर बढ़ी हुईं थी कि दादा ठाकुर जाने क्या कहेंगे मुझसे। नीचे आया तो देखा बड़ी सी मेज के चारो तरफ रखी कुर्सियों पर हवेली के दो प्रमुख मर्द बैठे थे और उनके दाएं बाएं तरफ मेरा बड़ा भाई ठाकुर अभिनव सिंह विभोर और अजीत बैठे हुए थे। दादा ठाकुर मुख्य कुर्सी पर बैठे हुए थे जबकि मझले ठाकुर यानी चाचा जी उनके सामने वाली दूसरी मुख्य कुर्सी पर बैठे हुए थे। लम्बी सी मेज में उन सबके सामने थालियां रखी हुईं थी और थालियों के बगल से पीतल के मग और गिलास में पानी भरा हुआ रखा था।

मैं आया तो सबसे पहले दादा ठाकुर के पैरों को छू कर उन्हें प्रणाम किया जिस पर उन्होंने बस अपने दाहिने हाथ को हल्का सा उठा कर मानो मुझे आशीर्वाद दिया। वो मुख से कुछ नहीं बोले थे, हलांकि अपनी तो बराबर गांड फटी पड़ी थी कि जाने वो क्या कहेंगे। ख़ैर जब उन्होंने कुछ नहीं कहा तो मैं मझले ठाकुर यानी चाचा जी के पास गया और उनके भी पैर छुए। मझले ठाकुर ने सदा खुश रहो कह कर मुझे आशीर्वाद दिया। वातावरण में तो एकदम से सन्नाटा छाया हुआ था जो कि दादा ठाकुर के रहने से हमेशा ही छाया रहता था। ख़ैर उसके बाद मेरी नज़र मेरे बड़े भाई पर पड़ी और मैं उनके पास जा कर उनके भी पैर छुए जिसके जवाब में वो कुछ नहीं बोले।

"बैठो इस तरफ।" दादा ठाकुर ने अपने दाहिने तरफ रखी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए मुझसे कहा तो मैं ख़ामोशी से उस कुर्सी पर बैठ गया। यहाँ पर गौर करने वाली बात थी कि मैंने अपने से बड़ों के पैर छू कर उनका आशीर्वाद लिया था जबकि विभोर और अजीत जो मुझसे छोटे थे वो अपनी जगह पर जड़ की तरह बैठे रहे थे। उन दोनों ने मेरे पैर छूने की तो बात दूर बल्कि मुझे देख कर अपने हाथ तक नहीं जोड़े थे। दादा ठाकुर और मझले ठाकुर न होते तो इस वक़्त मैं उन दोनों को ऐसे दुस्साहस की माकूल सज़ा देता। ख़ैर अपने गुस्से को अंदर ही जज़्ब कर लिया मैंने।

कुसुम और भाभी रसोई से आ कर हम सबको नास्ता परोसने लगीं। दादा ठाकुर ने सबको नास्ता शुरू करने का इशारा किया तो हम सबने नास्ता करना शुरू कर दिया। नास्ते के दौरान एकदम ख़ामोशी छाई रही। ये नियम ही था कि खाना खाते वक़्त कोई बात नहीं कर सकता था। ख़ैर नास्ता ख़त्म हुआ तो दादा ठाकुर के उठने के बाद हम सब भी अपनी अपनी जगह से उठ ग‌ए। हम सब जैसे ही उठे तो दादा ठाकुर ने मुझे बैठक में आने को कहा।

"अब से ठीक एक घंटे बाद तुम्हें हमारे साथ कहीं चलना है" बैठक में रखी एक बड़ी सी गद्देदार कुर्सी पर बैठे दादा ठाकुर ने अपनी प्रभावशाली आवाज़ में मुझसे कहा____"इस लिए हवेली से कहीं जाने का कार्यक्रम न बना लेना। अब तुम जा सकते हो।"

दादा ठाकुर की इस बात पर मैंने हाँ में सिर हिलाया और पलट कर वापस अपने कमरे की तरफ चला गया। अपने कमरे की तरफ जाते हुए मैं सोच रहा कि पिता जी ने मुझसे बाकी किसी बारे में कुछ नहीं कहा। क्या वो उन सबके बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहते थे या फिर उनके मन में कुछ और ही चल रहा है? वो अपने साथ मुझे कहां ले जाने की बात कह रहे थे? हलांकि ऐसा पहले भी वो कहते थे किन्तु पहले मैं अक्सर ही हवेली से निकल जाता था और पिता जी का गुस्सा मेरे ऐसा करने पर आसमान छूने लगता था, जिसकी मुझे कोई परवाह नहीं होती थी किन्तु आज मैं उनके कहे अनुसार हवेली में ही रहने वाला था।

अपने कमरे में आ कर मैं बिस्तर पर लेटा यही सोच रहा था कि दादा ठाकुर मुझे अपने साथ कहां ले जाना चाहते होंगे? मैंने इस बारे में बहुत सोचा मगर मुझे कुछ समझ नहीं आया। थक हार कर मैंने यही सोचा कि अब तो इस बारे में उनके साथ जा कर ही पता चलेगा।

मैं अब बहुत कुछ करना चाहता था और बहुत सारी चीज़ों का पता भी लगाना चाहता था किन्तु ये सब मेरे अनुसार होता नज़र नहीं आ रहा था। हवेली में मेरे लिए जैसे एक बंधन सा हो गया था। हलांकि मुझे यहाँ आए अभी एक दिन ही हुआ था किन्तु मैं चाहता था कि जो भी काम हो जल्दी हो। मैं किसी बात के इंतज़ार नहीं कर सकता था मगर मेरे बस में तो जैसे कुछ था ही नहीं।

सोचते सोचते कब एक घंटा गुज़र गया पता ही नहीं चला। कुसुम मेरे कमरे में आई और उसने कहा कि दादा ठाकुर ने मुझे बुलाया है। मैंने उसे एक गिलास पानी पिलाने को कहा और बिस्तर से उतर कर आईने के सामने आया। आईने में खुद को देखते हुए मैंने अपने बाल बनाए और फिर कमरे से बाहर निकल गया। नीचे आया तो कुसुम ने मुझे पानी से भरा गिलास पकड़ाया तो मैंने पानी पिया और फिर बाहर बैठक में आ गया जहां पिता जी अपनी बड़ी सी कुर्सी पर बैठे थे और उनके सामने मुंशी चंद्रकांत खड़ा था। मुझे देख कर मुंशी ने अदब से सिर नवाया तो मैं कुछ न बोला।

"अब आप जाइए मुंशी जी।" मुझे आया देख पिता जी ने मुंशी से कहा_____"हम इस बारे में लौट कर बात करेंगे।"

"जी बेहतर ठाकुर साहब।" मुंशी ने सिर को झुका कर कहा और फिर दादा ठाकुर को प्रणाम करके हवेली से बाहर निकल गया।

मुंशी के जाने के बाद बैठक में मैं और पिता जी ही रह गए थे और मेरी धड़कनें इस अकेलापन की वजह से कुछ बढ़ गईं थी। मैं अभी भी यही सोच रहा था कि पिता जी मुझे अपने साथ कहां ले कर जाने वाले हैं?

"तुम्हारे पीछे दीवार में लगी कील पर जीप की चाभी टंगी हुई है।" पिता जी की भारी आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा____"उसे लो और जा कर जीप निकालो। हम आते हैं थोड़ी देर मे।"

पिता जी के कहने पर मैंने पलट कर दीवार में टंगी जीप की चाभी निकाली और हवेली से बाहर की तरफ बढ़ गया। पिता जी के साथ मैं पहले भी कई बार जीप में जा चुका था किन्तु पहले भी मैं तभी जाता था जब मेरा मन करता था वरना तो मैं किसी न किसी बहाने से रफू चक्कर ही हो जाया करता था लेकिन आज की हर बात जैसे अलग थी।
 
मैं हवेली से बाहर आया और कुछ ही दूरी पर खड़ी जीप की तरफ बढ़ चला। मेरे ज़हन में अभी भी यही सवाल था कि पिता जी मुझे अपने साथ कहां लिए जा रहे हैं? मैंने तो आज के दिन के लिए कुछ और ही सोच रखा था। ख़ैर जीप में चालक की शीट पर बैठ कर मैंने चाभी लगा कर जीप को स्टार्ट किया और उसे आगे बढ़ा कर हवेली के मुख्य द्वार के सामने ले आया। कुछ ही देर में पिता जी आए और जीप में मेरे बगल से बैठते ही बोले चलो तो मैंने बिना कोई सवाल किए जीप को आगे बढ़ा दिया।

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अब तक,,,,,

मैं हवेली से बाहर आया और कुछ ही दूरी पर खड़ी जीप की तरफ बढ़ चला। मेरे ज़हन में अभी भी यही सवाल था कि पिता जी मुझे अपने साथ कहां लिए जा रहे हैं? मैंने तो आज के दिन के लिए कुछ और ही सोच रखा था। ख़ैर जीप में चालक की शीट पर बैठ कर मैंने चाभी लगा कर जीप को स्टार्ट किया और उसे आगे बढ़ा कर हवेली के मुख्य द्वार के सामने ले आया। कुछ ही देर में पिता जी आए और जीप में मेरे बगल से बैठते ही बोले चलो तो मैंने बिना कोई सवाल किए जीप को आगे बढ़ा दिया।

अब आगे,,,,,

मैं ख़ामोशी से जीप चलाते हुए गांव से बाहर आ गया था। मेरे कुछ बोलने का तो सवाल ही नहीं था किन्तु पिता जी भी ख़ामोश थे और उनकी इस ख़ामोशी से मेरे अंदर की बेचैनी और भी ज़्यादा बढ़ती जा रही थी। मैं जीप तो ख़ामोशी से ही चला रहा था किन्तु मेरा ज़हन न जाने क्या क्या सोचने में लगा हुआ था।

"हम शहर चल रहे हैं।" गांव के बाहर एक जगह दो तरफ को सड़क लगी हुई थी और जब मैंने दूसरे गांव की तरफ जीप को मोड़ना चाहा तो पिता जी ने सपाट भाव से ये कहा था। इस लिए मैंने जीप को दूसरे वाले रास्ते की तरफ फ़ौरन ही घुमा लिया।

"हम चाहते हैं कि अब तक जो कुछ भी हुआ है।" कुछ देर की ख़ामोशी के बाद पिता जी ने कहा____"उस सब को भुला कर तुम एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करो और कुछ ऐसा करो जिससे हमें तुम पर गर्व हो सके।"

पिता जी ये कहने के बाद ख़ामोश हुए तो मैं कुछ नहीं बोला। असल में मैं कुछ बोलने की हालत में था ही नहीं और अगर होता भी तो कुछ नहीं बोलता। इस वक़्त मैं सिर्फ ये जानना चाहता था कि पिता जी मुझे अपने साथ शहर किस लिए ले जा रहे थे?

"तुम जिस उम्र से गुज़र रहे हो।" मेरे कुछ न बोलने पर पिता जी ने सामने सड़क की तरफ देखते हुए फिर से कहा____"उस उम्र से हम भी गुज़र चुके हैं और यकीन मानो हमने अपनी उस उम्र में ऐसा कोई भी काम नहीं किया था जिससे कि हमारे पिता जी के मान सम्मान पर ज़रा सी भी आंच आए। शोलों की तरह भड़कती हुई ये जवानी हर इंसान को अपने उम्र पर आती है लेकिन इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि हम जवानी के उस जोश में अपने होशो हवास ही खो बैठें। किसी चीज़ का बस शौक रखो नाकि किसी चीज़ के आदी बन जाओ। उम्र के हिसाब से हर वो काम करो जो करना चाहिए लेकिन ज़हन में ये ख़याल सबसे पहले रहे कि हमारे उस काम से ना तो हमारे मान सम्मान पर कोई दाग़ लगे और ना ही हमारे खानदान की प्रतिष्ठा पर कोई धब्बा लगे। हम इस गांव के ही नहीं बल्कि आस पास के गांवों के भी राजा हैं और राजा का फर्ज़ होता है अपने आश्रित अपनी प्रजा का भला करना ना कि उनका शोषण करना। अगर हम ही उन पर अत्याचार करेंगे तो प्रजा बेचारी किसको अपना दुखड़ा सुनाएगी? जो ख़ुशी किसी को दुःख पहुंचा कर मिले वो ख़ुशी किस काम की? कभी सोचा है कि दो पल की ख़ुशी के लिए तुमने कितनों का दिल दुखाया है और कितनों की बद्दुआ ली है? मज़ा किसी चीज़ को हासिल करने में नहीं बल्कि किसी चीज़ का त्याग और बलिदान करने में है। असली आनंद उस चीज़ में है जिसमे हम किसी के दुःख को दूर कर के उसे दो पल के लिए भी खुश कर दें। जब हम किसी के लिए अच्छा करते हैं या अच्छा सोचते हैं तब हमारे साथ भी अच्छा ही होता है। अपनी प्रजा को अगर थोड़ा सा भी प्यार दोगे तो वो तुम्हारे लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देंगे।"

पिता जी ने लम्बा चौड़ा भाषण दे दिया था और मैं ये सोचने लगा था कि क्या यही सब सुनाने के लिए वो मुझे अपने साथ ले कर आए हैं? हलांकि उनकी बातों में दम तो था और यकीनन वो सब बातें अपनी जगह बिलकुल ठीक थीं किन्तु वो सब बातें मेरे जैसे इंसान के पल्ले इतना जल्दी भला कहां पड़ने वाली थी? ख़ैर अब जो कुछ भी था सुनना तो था ही क्योंकि अपने पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं था।

"ख़ैर छोडो इन सब बातों को।" पिता जी ने मेरी तरफ एक नज़र डालते हुए कहा____"तुम अब बच्चे नहीं रहे जिसे समझाने की ज़रूरत है। वैसे भी हमने तो अब ये उम्मीद ही छोड़ दी है कि हमारी अपनी औलाद कभी हमारी बात समझेगी। एक पिता जब अपनी औलाद को सज़ा देता है तो असल में वो खुद को ही सज़ा देता है क्योंकि सज़ा देने के बाद जितनी पीड़ा उसकी औलाद को होती है उससे कहीं ज़्यादा पीड़ा खुद पिता को भी होती है। तुम ये बात अभी नहीं समझोगे, बल्कि तब समझोगे जब तुम खुद एक बाप बनोगे।"

पिता जी की बातें कानों के द्वारा दिलो दिमाग़ में भी उतरने लगीं थी और मेरे न चाहते हुए भी वो बातें मुझ पर असर करने लगीं थी। ये समय का खेल था या प्रारब्ध का कोई पन्ना खुल रहा था?

"हम तुम्हें ये समझाना चाहते हैं कि आज कल समय बहुत ख़राब चल रहा है।" थोड़ी देर की चुप्पी के बाद पिता जी ने फिर कहा____"इस लिए सम्हल कर रहना और सावधान भी रहना। गांव के साहूकारों की नई पौध थोड़ी अलग मिजाज़ की है। हमें अंदेशा है कि वो हमारे ख़िलाफ़ कोई जाल बुन रहे हैं और निश्चय ही उस जाल का पहला मोहरा तुम हो।"

पिता जी की ये बात सुन कर मैं मन ही मन बेहद हैरान हुआ। मन में सवाल उभरा कि ये क्या कह रहे हैं पिता जी? मेरे ज़हन में तो साहूकारों का ख़याल दूर दूर तक नहीं था और ना ही मैं ये सोच सकता था कि वो लोग हमारे ख़िलाफ़ कुछ सोच सकते हैं।

"हम जानते हैं कि तुम हमारी इन बातों से बेहद हैरान हुए हो।" पिता जी ने कहा____"लेकिन ये एक कड़वा सच हो सकता है। ऐसा इस लिए क्योंकि अभी हमें इस बात का सिर्फ अंदेशा है, कोई ठोस प्रमाण नहीं है हमारे पास। हलांकि सुनने में कुछ अफवाहें आई हैं और उसी आधार पर हम ये कह रहे हैं कि तुम उनके जाल का पहला मोहरा हो सकते हो। हमें लगता है कि प्रदीप की हत्या किसी बहुत ही सोची समझी साज़िश का नतीजा है। प्रदीप की हत्या में तुम्हें फसाना भी उनकी साज़िश का एक हिस्सा है। हमें हमारे आदमियों ने सब कुछ बताया था इस लिए हम दरोगा से मिले और उससे इस बारे में पूछतांछ की मगर उसने भी फिलहाल अनभिज्ञता ही ज़ाहिर की। हलांकि उसने हमें बताया था कि प्रदीप का भाई जगन उसके पास रपट लिखवाने आया था। जगन के रपट लिखवाने पर दरोगा प्रदीप की हत्या के मामले की जांच भी करने जाने वाला था मगर हमने उसे जाने से रोक दिया। हम समझ गए थे कि प्रदीप की हत्या का आरोप तुम पर लगाया जायेगा इसी लिए हमने दरोगा को इस मामले को हाथ में लेने से रोक दिया था। हम ये तो जानते थे कि तुमने कुछ नहीं किया है मगर शक की बिना पर दरोगा तुम्हें पकड़ ही लेता और हम ये कैसे चाह सकते थे कि ठाकुर खानदान का कोई सदस्य पुलिस थाने की दहलीज़ पर कदम भी रखे।"

"तो आपके कहने पर दरोगा जगन काका के रपट लिखवाने पर भी नहीं आया था?" मैंने पहली बार उनकी तरफ देखते हुए कहा____"आपको नहीं लगता कि ऐसा कर के आपने ठीक नहीं किया है? अगर प्रदीप काका की हत्या का आरोप मुझ लगता तो लगने देते आप। दरोगा तो वैसे भी हत्या के मामले की जांच करता और देर सवेर उसे पता चल ही जाता कि हत्या मैंने नहीं बल्कि किसी और ने की है।"

"तुम क्या समझते हो कि हमने दरोगा को प्रदीप की हत्या की जांच करने से ही मना कर दिया था?" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"हमने तो उसे सिर्फ प्रदीप के घर न जाने के लिए कहा था। बाकी प्रदीप की हत्या किसने की है इसका पता लगाने के हमने खुद उसे कहा था और वो अपने तरीके से हत्या की जांच भी कर रहा है।"

"फिर भी आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था।" मैंने सामने सड़क की तरफ देखते हुए कहा____"और दरोगा को प्रदीप काका के घर आने के लिए क्यों मना किया आपने? जबकि आपके ऐसा करने से जगन काका मेरे मुँह में ही बोल रहे थे कि मैंने ही दरोगा को उनके भाई की हत्या की जांच न करने के लिए पैसे दिए होंगे।

"जैसा हम तुमसे पहले ही कह चुके हैं कि आज कल हालात ठीक नहीं हैं और तुम्हें खुद बहुत सम्हल कर और सावधानी से रहना होगा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"हम ये जानते हैं कि तुमने प्रदीप की हत्या नहीं की है और हम ये भी जानते हैं कि प्रदीप की किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं हो सकती जिसके लिए कोई उसकी हत्या ही कर दे किन्तु इसके बावजूद उसकी हत्या हुई। कोई ज़रूरी नहीं कि उसकी हत्या करने के पीछे उससे किसी की कोई दुश्मनी ही हो बल्कि उसकी हत्या करने की वजह ये भी हो सकती है कि हमारा कोई दुश्मन तुम्हें उसकी हत्या के जुर्म में फंसा कर जेल भेज देना चाहता है। यही सब सोच कर हमने दरोगा को सामने आने के लिए नहीं कहा बल्कि गुप्त रूप से इस मामले की जांच करने को कहा था।"

"अगर ऐसी ही बात थी तो आपको दरोगा के द्वारा मुझे जेल ले जाने देना था।" मैंने कहा____"अगर कोई हमारा दुश्मन है तो इससे वो यही समझता कि वो अपने मकसद में कामयाब हो गया है और फिर हो सकता था कि वो मेरे जेल जाने के बाद खुल कर सामने ही आ जाता और तब हमें भी पता चल जाता कि हमारा ऐसा वो कौन दुश्मन था जो हमसे इस तरह से अपनी दुश्मनी निकालना चाहता था?"

"हमारे ज़हन में भी ये ख़याल आया था।" पिता जी ने कहा____"किन्तु हम बता ही चुके हैं कि हम ये हरगिज़ नहीं चाह सकते थे कि ठाकुर खानदान का कोई भी सदस्य पुलिस थाने की दहलीज़ पर कदम रखे। रही बात उस हत्यारे की तो उसका पता हम लगा ही लेंगे। तुम्हें इसके लिए परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम सिर्फ ये चाहते हैं कि तुम पिछला सब कुछ भुला कर एक नए सिरे अपना जीवन शुरू करो। हर चीज़ की एक सीमा होती है बेटा। इस जीवन में इसके अलावा भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे करना और निभाना हमारा फ़र्ज़ होता है।"

"क्या आप बताएंगे कि मुझे आपने घर गांव से क्यों निष्कासित किया था?" मैंने हिम्मत कर के उनसे वो सवाल पूछ ही लिया जो हमेशा से मेरे ज़हन में उछल कूद कर रहा था।

"कभी कभी इंसान को ऐसे काम भी करने पड़ जाते हैं जो निहायत ही ग़लत होते हैं।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"हमने भी ऐसा कुछ सोच कर ही किया था। हम खुद जानते थे कि हमारा ये फैसला ग़लत है किन्तु कुछ बातें थी ऐसी जिनकी वजह से हमें ऐसा फैसला करना पड़ा था।"

"क्या मैं ऐसी वो बातें जान सकता हूं?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"जिनकी वजह से आपने मुझे गांव से निष्कासित कर के चार महीनों तक भारी कष्ट सहने पर मजबूर कर दिया था।"

"तुम्हें इतने कष्ट में डाल कर हम खुद भी भारी कष्ट में थे बेटा।" पिता जी ने गंभीरता से कहा____"लेकिन ऐसा हमने दिल पर पत्थर रख कर ही किया था। हमें हमारे आदमियों के द्वारा पता चला था कि कुछ अंजान लोग हमारे ख़िलाफ़ हैं और वो कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे कि हमारा समूचा वर्चस्व ही ख़त्म हो जाए। इसके लिए वो लोग अपने जाल में तुम्हें फ़साने वाले हैं। ये सब बातें सुन कर हम तुम्हारे लिए चिंतित हो उठे थे किन्तु कुछ कर सकने की हालत में नहीं थे हम क्योंकि हमारे आदमियों को भी नहीं पता था कि ऐसे वो कौन लोग थे। उन्होंने तो बस ऐसी बातें आस पास से ही सुनी थीं। हमें यकीन तो नहीं हुआ था किन्तु कुछ समय से जैसे हालात हमें समझ आ रहे थे उससे हम ऐसी बातों को नकार भी नहीं सकते थे इस लिए हमने सोचा कि अगर ऐसी बात है तो हम भी उनके मन का ही कर देते हैं। इसके लिए हमने तुम्हारी शादी का मामला शुरू किया। हमें पता था कि तुम अपनी आदत के अनुसार हमारा कहा नहीं मानोगे और कुछ ऐसा करोगे जिससे कि एक बार फिर से गांव समाज में हमारी इज्ज़त धूल में मिल जाए। ख़ैर शादी की तैयारियां शुरू हुईं और इसके साथ ही हमने एक लड़का और देख लिया ताकि जब तुम अपनी आदत के अनुसार कुछ उल्टा सीधा कर बैठो तो हम किसी तरह अपनी इज्ज़त को मिट्टी में मिलने से बचा सकें। शादी वाले दिन वही हुआ जिसका हमें पहले से ही अंदेशा था। यानी तुम एक बार फिर से हमारे हुकुम को ठोकर मार कर निकल गए। ख़ैर उसके बाद हमने उस लड़की की शादी दूसरे लड़के से करवा दी और इधर तुम पर बेहद गुस्सा होने का नाटक किया। दूसरे दिन गांव में पंचायत बैठाई और तुम्हें गांव से निष्कासित कर देने वाला फैसला सुना दिया। ऐसा करने के पीछे यही वजह थी कि हम तुम्हें अपने से दूर कर दें ताकि जो लोग तुम्हें अपने जाल में फांसना चाहते थे वो तुम्हें अकेला और बेसहारा देख कर बड़ी आसानी से अपने जाल में फांस सकें। इधर ऐसा करने के बाद हमने अपने आदमियों को भी हुकुम दे दिया था कि वो लोग गुप्त रूप से तुम पर भी और तुम्हारे आस पास की भी नज़र रखें। पिछले चार महीने से हमारे आदमी अपने इस काम में लगे हुए थे किन्तु जैसा हमने सोचा था वैसा कुछ भी नहीं हुआ।"

"क्या मतलब?" मैंने चौंक कर उनकी तरफ देखा।

"मतलब ये कि जो कुछ सोच कर हमने ये सब किया था।" पिता जी ने कहा____"वैसा कुछ हुआ ही नहीं। हमें लगता है कि उन लोगों को इस बात का अंदेशा हो गया था कि हमने ऐसा कर के उनके लिए एक जाल बिछाया है। इस लिए वो लोग तुम्हारे पास गए ही नहीं बल्कि कुछ ऐसा किया जिससे हम खुद ही उलझ कर रह ग‌ए।"

"कहीं आपके कहने का मतलब ये तो नहीं कि उन्होंने प्रदीप की हत्या कर के उस हत्या में मुझे फंसाया?" मैंने कहा____"और दूसरे गांव के लोगों के बीच मेरे और आपके ख़िलाफ़ बैर भाव पैदा करवा दिया?"

"बिल्कुल।" पिता जी ने मेरी तरफ प्रशंशा की दृष्टि से देखते हुए कहा____"हमे बिलकुल यही लगता है और यही वजह थी कि हमने दरोगा को प्रदीप की हत्या के मामले की जांच गुप्त रूप से करने को कहा। हलांकि जैसा तुमने इस बारे में उस वक़्त कहा था वैसा ख़याल हमारे ज़हन में भी आया था किन्तु हम दुबारा फिर से तुम्हें चारा बना कर उनके सामने नहीं डालना चाहते थे। क्योंकि ज़रूरी नहीं कि हर बार वैसा ही हो जैसा हम चाहते हैं। ऐसा करने से इस बार तुम्हारे लिए सच में कोई गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता था।"

पिता जी के ऐसा कहने के बाद इस बार मैं कुछ न बोल सका। असल में मैं उनकी बातें सुन कर गहरे विचारों में पड़ गया था। पिता जी की बातों ने एकदम से मेरा भेजा ही घुमा दिया था। मैं तो बेवजह ही अब तक इस बारे में इतना कुछ सोच सोच कर कुढ़ रहा था और अपने माता पिता के लिए अपने अंदर गुस्सा और नफ़रत पाले बैठा हुआ था जबकि जो कुछ मेरे साथ हुआ था उसके पीछे पिता जी का एक ख़ास मकसद छुपा हुआ था। भले ही वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हुए थे किन्तु ऐसा कर के उन्होंने इस बात का सबूत तो दे ही दिया था कि उन्होंने मुझे मेरी ग़लतियों की वजह से निष्कासित नहीं किया था बल्कि ऐसा करने के लिए वो एक तरह से बेबस थे और ऐसा करके वो खुद भी मेरे लिए अंदर से दुखी थे। मुझे समझ नहीं आया कि अब मैं अपनी उन बातों के लिए पिता जी से कैसे माफ़ी मांगू, जो बातें मैंने उनसे उस दिन खेत में कही थीं।

मेरे ज़हन में उस दिन की माँ की कही हुई वो बातें उभर कर गूँज उठी जब उन्होंने मुझसे कहा था कि इंसान को बिना सोचे समझे और बिना सच को जाने कभी ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए जिससे कि बाद में अपनी उन बातों के लिए इंसान को पछतावा होने लगे। तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि माँ को पहले से ही इस सबके बारे में पता था? उनकी बातों से तो अब यही ज़ाहिर होता है लेकिन उन्होंने मुझसे इस बारे में उसी दिन साफ़ साफ़ क्यों नहीं बता दिया था? मैंने महसूस किया कि मैं ये सब सोचते हुए गहरे ख़यालों में खो गया हूं।

"क्या अब हम तुमसे ये उम्मीद करें कि तुम एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करोगे?" पिता जी की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा____"और हां अगर अब भी तुम्हें लगता है कि हमने तुम्हारे साथ कुछ ग़लत किया है तो तुम अब भी हमारे प्रति अपने अंदर नफ़रत को पाले रह सकते हो।"

"मैं सोच रहा हूं कि क्या ज़रूरत है नए सिरे से जीवन को शुरू करने की?" मैंने सपाट भाव से कहा____"मैं समझता हूं कि मेरे भाग्य में यही लिखा है कि मैं पहले की तरह अब भी आवारा ही रहूं और अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़े रखूं।"

"आख़िर किस मिट्टी के बने हुए हो तुम?" पिता जी ने इस बार शख़्त भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तुम समझते क्यों नहीं हो कि तुम कितनी बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हो? आख़िर कैसे समझाएं हम तुम्हें?"

"मैं किसी भी तरह के बंधन में रहना पसंद नहीं करता पिता जी।" मैंने उस शख़्स से दो टूक भाव से कहा जिस शख़्स से ऐसी बातें करने की कोई हिम्मत ही नहीं जुटा सकता था____"आपको मेरी फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। ये तो आप भी जानते हैं ना कि इस संसार में जिसके साथ जो होना लिखा होता है वो हो कर ही रहता है। विधाता के लिखे को कोई नहीं मिटा सकता। अगर आज और इसी वक़्त मेरी मौत लिखी है तो वो हो कर ही रहेगी, फिर भला बेवजह मौत से भागने की मूर्खता क्यों करना?"

"आख़िर क्या चल रहा है तुम्हारे दिमाग़ में?" पिता जी ने अचानक ही अपनी आँखें सिकोड़ते हुए कहा____"कहीं तुम...?"

"माफ़ कीजिए पिता जी।" मैंने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा____"वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा आप चाहते हैं। वैसे हम शहर किस लिए जा रहे हैं?"

मेरी बातें सुन कर पिता जी हैरत से मेरी तरफ वैसे ही देखने लगे थे जैसे इसके पहले वो मेरी बातों पर हैरत से देखने लगते थे। यही तो खूबी थी ठाकुर वैभव सिंह में। मैं कभी वो करता ही नहीं था जो दूसरा कोई चाहता था बल्कि मैं तो हमेशा वही करता था जो सिर्फ और सिर्फ मैं चाहता था। मेरी बातों से किसी का कितना दिल दुःख जाता था इससे मुझे कोई मतलब नहीं होता था मगर क्या सच में ऐसा ही था???

"मैं हवेली में नहीं रहना चाहता पिता जी।" दादा ठाकुर को ख़ामोश देख मैंने धीरे से कहा____"बल्कि मैं उसी जगह पर रहना चाहता हूं जहां पर मैंने चार महीने भारी कष्ट सह के गुज़ारे हैं।"

"तुम्हें जहां रहना हो वहां रहो।" पिता जी ने गुस्से में कहा____"हमे तो आज तक ये समझ में नहीं आया कि तुम जैसी बेगै़रत औलाद दे कर भगवान ने हमारे ऊपर कौन सा उपकार किया है?"

"भगवान को क्यों कोसते हैं पिता जी?" मैंने मन ही मन हंसते हुए पिता जी से कहा____"भगवान के बारे में तो सबका यही ख़याल है कि वो जो भी देता है या जो कुछ भी करता है सब अच्छा ही करता है। फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं?"

"ख़ामोशशश।" पिता जी इतनी ज़ोर से दहाड़े कि डर के मारे मेरे हाथों से जीप की स्टेरिंग ही छूट गई थी। मैं समझ गया कि अब पिता जी से कुछ बोलना बेकार है वरना वो अभी जीप रुकवाएंगे और जीप की पिछली शीट पर पड़ा हुआ कोड़ा उठा कर मुझे पेलना शुरू कर देंगे।

उसके बाद सारे रास्ते हम में से किसी ने कोई बात नहीं की। सारा रास्ता ख़ामोशी में ही गुज़रा और हम शहर पहुंच गए। शहर में पिता जी को तहसीली में कोई काम था इस लिए वो चले गए जबकि मैं जीप में ही बेपरवाह सा बैठा रहा। क़रीब एक घंटे में पिता जी वापस आए तो मैंने जीप स्टार्ट की और उनके कहने पर वापस गांव के लिए चल पड़ा।

आज होलिका दहन का पर्व था और हमारे गांव में होली का त्यौहार बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। ख़ैर वापसी में भी हमारे बीच ख़ामोशी ही रही। आख़िर एक घंटे में हम हवेली पहुंच गए।

पिता जी जीप से उतर कर हवेली के अंदर चले गए और मैं ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कुसुम नज़र आई तो मैंने उसे एक गिलास पानी लाने को कहा तो वो जी भैया कह कर पानी लेने चली गई। अपने कमरे में आ कर मैं अपने कपड़े उतारने लगा। धूप तेज़ थी और मुझे गर्मी लगी हुई थी। मैंने शर्ट और बनियान उतार दिया और कमरे की खिड़की खोल कर बिस्तर पर लेट गया।
 
आज कल गांव में बिजली का एक लफड़ा था। बिजली विभाग वाले बिजली तो दे रहे थे लेकिन बिजली धीमी रहती थी जिससे पंखा धीमी गति से चलता था। ख़ैर मैं आँखें बंद किए लेटा हुआ था और ऊपर पंखा अपनी धीमी रफ़्तार से मुझे हवा देने का अपना फ़र्ज़ निभा रहा था। आँखे बंद किए मैं सोच रहा था कि आज पिता जी से मैंने जो कुछ भी कहा था वो ठीक था या नहीं? अब जब कि मैं जान चुका था कि मुझे गांव से निष्कासित करने का उनका फ़ैसला उनके एक ख़ास मकसद का हिस्सा था इस लिए एक अच्छे बेटे के रूप में मेरा उन पर गुस्सा करना या उन पर नाराज़ रहना सरासर ग़लत ही था किन्तु ये भी सच था कि मैं इस सबके लिए हवेली में क़ैद हो कर नहीं रह सकता था। माना कि पिता जी ने दरोगा को गुप्त रूप से प्रदीप काका की हत्या की जांच करने को कह दिया था लेकिन मुझे इससे संतुष्टि नहीं हो रही थी। मैं अपनी तरफ से खुद कुछ करना चाहता था जो कि हवेली में रह कर मैं नहीं कर सकता था। मैं एक आज़ाद पंछी की तरह था जो सिर्फ अपनी मर्ज़ी से हर काम करना पसंद करता था।

"लगता है आपको नींद आ रही है भइया।" कुसुम की आवाज़ से मेरा ध्यान टूटा तो मैंने आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा, जबकि उसने आगे कहा____"या फिर अपनी आँखें बंद कर के किसी सोच में डूबे हुए थे।"

"क्या तूने कोई तंत्र विद्या सीख ली है?" मैंने उठते हुए उससे कहा____"जो मेरे मन की बात जान लेती है?"

"इतनी सी बात के लिए तंत्र विद्या सीखने की क्या ज़रूरत है भला?" कुसुम ने पानी का गिलास मुझे पकड़ाते हुए कहा____"जिस तरह के हालात में आप हैं उससे तो कोई भी ये अंदाज़ा लगा के कह सकता है कि आप किसी सोच में ही डूबे हुए थे। दूसरी बात ये भी है कि आप दादा ठाकुर के साथ शहर गए थे तो ज़ाहिर है कि रास्ते में उन्होंने आपसे कुछ न कुछ तो कहा ही होगा जिसके बारे में आप अब भी सोच रहे थे।"

"वाह! तूने तो कमाल कर दिया बहना।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"क्या दिमाग़ लगाया है तूने। ख़ैर ये सब छोड़ और ये बता कि जो काम मैंने तुझे दिया था वो काम तूने शुरू किया कि नहीं या फिर एक काम से सुन कर दूसरे कान से उड़ा दिया है?"

हलांकि पिता जी की बातों से अब मैं सब कुछ जान चुका था इस लिए कुसुम को अपने भाई या अपने पिता जी की जासूसी करने के काम पर लगाना फ़िज़ूल ही था किन्तु पिछली रात मैंने बड़े भैया को विभोर के कमरे से निकलते देखा था इस लिए अब मैं ये जानना चाहता था कि आख़िर तीनों भाइयों के बीच ऐसा क्या चल रहा था उतनी रात को?

"आप तो जानते हैं भैया कि ये काम इतना आसान नहीं है।" कुसुम ने मासूम सी शक्ल बनाते हुए कहा____"मुझे पूरी सावधानी के साथ ये काम करना होगा इस लिए मुझे इसके लिए ख़ास मौके का इंतज़ार करना होगा ना?"

"ठीक है।" मैंने पानी पीने के बाद उसे खाली गिलास पकड़ाते हुए कहा____"तू मौका देख कर अपना काम कर। वैसे आज होलिका दहन है ना तो यहाँ कोई तैयारी वग़ैरा हुई कि नहीं?"

"पिता जी सारी तैयारियां कर चुके हैं?" कुसुम ने कहा____"आज रात को वैसे ही होली जलेगी जैसे हर साल जलती आई है लेकिन आप इसके बारे में क्यों पूछ रहे हैं? आपको तो इन त्योहारों में कोई दिलचस्पी नहीं रहती ना?"

"हां वो तो अब भी नहीं है।" मैंने बिस्तर से उतर कर दीवार पर टंगी अपनी शर्ट को निकालते हुए कहा____"मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था तुझसे। ख़ैर अब तू जा। मुझे भी एक ज़रूरी काम से बाहर जाना है।"

"भाभी आपके बारे में पूछ रहीं थी?" कुसुम ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"शायद उन्हें कोई काम है आपसे। इस लिए आप उनसे मिल लीजिएगा।"

"उन्हें मुझसे क्या काम हो सकता है?" मैंने चौंक कर कुसुम की तरफ देखते हुए कहा____"अपने किसी काम के लिए उन्हें बड़े भैया से बात करनी चाहिए।"

"अब भला ये क्या बात हुई भैया?" कुसुम ने अपने दोनों हाथों को अपनी कमर पर रखते हुए कहा___"हर काम बड़े भैया से हो ये ज़रूरी थोड़ी ना है। हो सकता है कि कोई ऐसा काम हो उन्हें जिसे सिर्फ आप ही कर सकते हों। वैसे वो तीनो इस वक़्त हवेली में नहीं हैं इस लिए आप बेफ़िक्र हो कर भाभी से मिल सकते हैं।"

"तू क्या समझती है मैं उन तीनों से डरता हूं?" मैंने शर्ट के बटन लगाते हुए कहा____"मुझे अगर किसी से मिलना भी होगा ना तो मैं किसी के होने की परवाह नहीं करुंगा और ये बात तू अच्छी तरह जानती है।"

"हां जानती हूं।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"इस हवेली में दादा ठाकुर के बाद एक आप ही तो ऐसे हैं जो सच मुच के ठाकुर साहब हैं।"

"अब तू मुझे चने के झाड़ पर न चढ़ा समझी।" मैंने कुसुम के सिर पर एक चपत लगाते हुए कहा____"अब जा तू और जा कर भाभी से कह कि मैं उनसे मिलने आ रहा हूं।"

"आपने तो मुझे एकदम से डाकिया ही बना लिया है।" कुसुम ने फिर से बुरा सा मुँह बना कर कहा____"कभी इधर संदेशा देने जाऊं तो कभी उधर। बड़े भाई होने का अच्छा फायदा उठाते हैं आप। आपको ज़रा भी मुझ मासूम पर तरस नहीं आता।"

"इस हवेली में एक तू ही है जिस पर तरस ही नहीं बल्कि प्यार भी आता है मुझे।" मैंने कुसुम के चेहरे को सहलाते हुए कहा____"बाकियों की तरफ तो मैं देखना भी नहीं चाहता।"

"हां अब ये ठीक है।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा___"अब जा रही हूं भाभी को बताने कि आप आ रहे हैं उनसे मिलने, इस लिए वो जल्दी से आपके लिए आरती की थाली सजा के रख लें...हीहीहीही।"

"तू अब पिटेगी मुझसे।" मैंने उसे आँखें दिखाते हुए कहा____"बहुत बोलने लगी है तू।"

मेरे ऐसा बोलने पर कुसुम शरारत से मुझे अपनी जीभ दिखाते हुए कमरे से बाहर चली गई। उसकी इस शरारत पर मैं बस हल्के से मुस्कुराया और फिर ये सोचने लगा कि अब भाभी को भला मुझसे क्या काम होगा जिसके लिए वो मुझसे मिलना चाहती हैं?

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अब तक,,,,,

"इस हवेली में एक तू ही है जिस पर तरस ही नहीं बल्कि प्यार भी आता है मुझे।" मैंने कुसुम के चेहरे को सहलाते हुए कहा____"बाकियों की तरफ तो मैं देखना भी नहीं चाहता।"

"हां अब ये ठीक है।" कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा___"अब जा रही हूं भाभी को बताने कि आप आ रहे हैं उनसे मिलने, इस लिए वो जल्दी से आपके लिए आरती की थाली सजा के रख लें...हीहीहीही।"

"तू अब पिटेगी मुझसे।" मैंने उसे आँखें दिखाते हुए कहा____"बहुत बोलने लगी है तू।"

मेरे ऐसा बोलने पर कुसुम शरारत से मुझे अपनी जीभ दिखाते हुए कमरे से बाहर चली गई। उसकी इस शरारत पर मैं बस हल्के से मुस्कुराया और फिर ये सोचने लगा कि अब भाभी को भला मुझसे क्या काम होगा जिसके लिए वो मुझसे मिलना चाहती हैं?

अब आगे,,,,,

कुसुम के जाने के बाद मैं भाभी के बारे में कुछ देर तक सोचता रहा और फिर जब मुझे लगा कि कुसुम ने भाभी को मेरे आने के बारे में बता दिया होगा तो मैं कमरे से निकल कर लम्बी राहदारी से होते हुए दूसरे छोर पर बने भाभी के कमरे की तरफ आ गया। इन चार महीनों में ये भी एक बदलाव ही हुआ था कि जिस भाभी से मैं हमेशा दूर दूर ही रहता था वो अब मेरे सामने आ रहीं थी। अपने गांव की ही नहीं बल्कि आस पास के गांवों की भी जाने कितनी ही लड़कियों और औरतों से मैं मज़े ले चुका था मगर मैं ये हरगिज़ नहीं चाहता था कि मेरी नीयत भाभी के रूप सौंदर्य की वजह से उन पर ख़राब हो जाए।

मैं अभी भाभी के कमरे के पास ही पंहुचा था कि भाभी मुझे सीढ़ियों से ऊपर आती हुई दिखीं तो मैं दरवाज़े के पास ही रुक गया। सुर्ख रंग की साड़ी में भाभी गज़ब ढा रहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे उनके चेहरे पर चन्द्रमा का नूर चमक रहा हो। दूध में हल्का केसर मिले जैसा गोरा सफ्फाक बदन उनकी साड़ी से झलक रहा था। पेट के पास उनकी साड़ी थोड़ा सा हटी हुई थी जिससे उनका एकदम सपाट और रुई की तरह मुलायम पेट चमकता हुआ दिख रहा था। अचानक ही मुझे ख़याल आया कि मेरी नज़र उनके बेदाग़ पेट पर जम सी गई है और मेरी धड़कनें पहले से तेज़ हो चली हैं तो मैंने झट से अपनी नज़रें उनके पेट से हटा ली। मुझे अपने आप पर ये सोच कर बेहद गुस्सा भी आया कि मैंने उनकी तरफ देखा ही क्यों था।

भाभी जब चल कर मेरे क़रीब आईं तो मुझे देख कर वो हल्के से मुस्कुराईं। उनकी मुस्कान ऐसी थी कि बड़े से बड़ा साधू महात्मा भी उन पर मोहित हो जाए, मेरी भला औकात ही क्या थी? भाभी की मुस्कान पर मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि चुप चाप ख़ामोशी से दरवाज़े से एक तरफ हट गया। मेरे एक तरफ हट जाने पर वो मेरे सामने से निकल कर कमरे के दरवाज़े को अपने हाथों से खोला और कमरे के अंदर दाखिल हो ग‌ईं। मेरे मन में अब भी यही सवाल था कि उन्होंने मुझसे मिलने के लिए कुसुम से क्यों कहा होगा? ख़ैर उन्होंने कमरे के अंदर से मुझे आवाज़ दी तो मैं कमरे के अंदर चला गया।

"कहीं जा रहे थे क्या देवर जी?" मैं जैसे ही अंदर पंहुचा तो रागिनी भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।

"हां वो ज़रूरी काम से बाहर जा रहा था।" मैंने खड़े खड़े ही सपाट भाव से कहा____"कुसुम ने बताया कि आप मुझसे मिलना चाहतीं थी? कोई काम था क्या मुझसे?"

"क्या बिना कोई काम के मैं अपने देवर जी से नहीं मिल सकती?" मेरे पूछने पर भाभी ने उल्टा सवाल करते हुए कहा तो मैंने कहा____"नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है।"

"देखो वैभव मैं ये तो नहीं जानती कि तुम मेरे सामने आने से हमेशा कतराते क्यों रहते हो?" भाभी ने कहा____"किन्तु मैं तुमसे बस यही कहना चाहती हूं कि जो कुछ हुआ है उसे भूल कर एक नई शुरुआत करो। हम सब यही चाहते हैं कि तुम दादा ठाकुर के साथ रहो और उनका कहना मानो। तुम सोच रहे होंगे कि मैं तुम्हें इसके लिए इतना ज़ोर क्यों दे रही हूं तो इसका जवाब यही है कि सबकी तरह मैं भी यही चाहती हूं कि दादा ठाकुर के बाद तुम उनकी जगह सम्हालो।"

"मुझे दादा ठाकुर बनने का कोई शौक नहीं है।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"कल भी मैंने आपसे यही कहा था और हर बार यही कहूंगा। पिता जी के बाद उनकी जगह उनका बड़ा बेटा ही सम्हालेगा और यही नियम भी है। मैं इस सबसे दूर ही रहना चाहता हूं। अगर आपने मुझसे इसी बात के लिए मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी तो मेरा जवाब आपको मिल चुका है और अब मुझे जाने की इजाज़त दीजिए।"

"क्या तुमने इस बारे में एक बार भी नहीं सोचा वैभव कि मैं तुम्हें इसके लिए इतना ज़ोर दे कर क्यों कह रही हूं?" भाभी ने जैसे उदास भाव से कहा___"क्या मुझे ये पता नहीं है कि दादा ठाकुर का उत्तराधिकारी उनका बड़ा बेटा ही होगा?"

"मैं फ़ालतू चीज़ों के बारे में सोचना ज़रूरी नहीं समझता।" मैंने कहा____"मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि जिसका जिस चीज़ में अधिकार है उसको वही मिले। मुझे बड़े भैया के अधिकार को छीनने का ना तो कोई हक़ है और ना ही मैं ऐसा करना चाहता हूं।"

"अधिकार उसे दिया जाता है वैभव जो उसके लायक होता है।" भाभी ने सहसा शख़्त भाव से कहा____"तुम्हारे बड़े भैया इस अधिकार के लायक ही नहीं हैं।"

"बड़े आश्चर्य की बात है।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा____"आप अपने ही पति के बारे में ऐसा कह रही हैं?"

"मैं किसी की पत्नी के साथ साथ इस हवेली की बहू भी हूं वैभव।" भाभी ने पुरज़ोर लहजे में कहा____"और हवेली की बहू होने के नाते मेरा ये फ़र्ज़ है कि मैं उसी के बारे में सोचूं जिसमे सबकी भलाई के साथ साथ इस हवेली और इस खानदान की मान मर्यादा पर भी कोई आंच न आए।"

"तो आप ये समझती हैं कि बड़े भैया इस अधिकार के लायक नहीं हैं?" मैंने गहरी नज़र से उन्हें देखते हुए कहा____"क्या मैं जान सकता हूं कि आप ऐसा क्यों समझती हैं?"

"इसके उत्तर में मैं बस यही कहूंगी वैभव कि वो अपने इस अधिकार के लायक नहीं है।" भाभी ने नज़रे नीचे कर के कहा____"अगर ऐसा न होता तो मैं तुमसे इसके लिए कभी नहीं कहती और इतना ही नहीं बल्कि दादा ठाकुर खुद भी तुमसे ऐसा न कहते।"

"आपको कैसे पता कि पिता जी ने मुझसे इसके लिए क्या कहा है?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखते हुए पूछा था।

"मुझे माँ जी से पता चला है।" भाभी ने कहा____"और माँ जी से दादा ठाकर ने खुद इस बारे में बताया था कि उन्होंने तुमसे उस दिन खेत में क्या क्या कहा था।"

भाभी की बात सुन कर मैं तुरंत कुछ न बोल सका था बल्कि इस सोच में पड़ गया था कि आख़िर ऐसी क्या बात है जिससे पिता जी और भाभी बड़े भैया के बारे में ऐसा कहते हैं?

"फिर तो आपको ये भी पता होगा कि पिता जी ने मुझे किस वजह से गांव से निष्कासित किया था?" मैंने कुछ सोचते हुए भाभी से कहा____"और अगर पता है तो आप जब उस दिन मुझसे मिलने आईं थी तो मुझे इस बारे में बताया क्यों नहीं था?"

"मेरे बताने से क्या तुम्हारे अंदर का गुस्सा और नफ़रत दूर हो जाती?" भाभी ने कहा____"नहीं देवर जी कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें उचित समय पर सही आदमी से ही पता चलें तो बेहतर होता है। मुझे यकीन है कि आज जब तुम दादा ठाकुर के साथ शहर गए थे तब ज़रूर तुम्हारे और उनके बीच इस बारे में बातें हुई होंगी और जब तुम्हें असलियत का पता चला होगा तो तुम्हे फ़ौरन ही समझ आ गया होगा कि वो सही थे या ग़लत?"

"जो भी हो।" मैंने कहा____"पर इसके लिए उन्होंने मुझे बली का बकरा ही तो बनाया ना? चार महीने मैंने कैसे कैसे कष्ट सहे हैं उसका हिसाब कौन देगा? अपने मतलब के लिए मेरे साथ ऐसा करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था।"

"ये तुम कैसी बातें कर रहे हो वैभव?" मेरी बात सुन कर भाभी ने हैरानी से कहा____"तुम दादा ठाकुर के बारे में ऐसा कैसे कह सकते हो? वो तुम्हारे पिता हैं और तुम पर उनका पूरा अधिकार है। ऐसी बातें कर के तुमने अच्छा नहीं किया देवर जी। तुम जैसे भी थे लेकिन कम से कम मैं तुम्हें कुछ मामलों में बहुत अच्छा समझती थी।"

"मैं हमेशा से ही बुरा था भाभी।" मैंने कहा____"और बुरा ही रहना चाहता हूं। आपको मुझे अच्छा समझने की ग़लती नहीं करनी चाहिए।"

"मुझे समझ नहीं आ रहा कि तुम ऐसी बातें क्यों करते हो?" भाभी ने बेचैन भाव से कहा____"आख़िर ऐसी क्या वजह है कि तुम हम सबसे खुद को अलग रखते हो? क्या हम सब तुम्हारे दुश्मन हैं? क्या हम सब तुमसे प्यार नहीं करते?"

"चलता हूं भाभी।" मैंने हाथ जोड़ कर उन्हें प्रणाम करते हुए कहा____"माफ़ कीजिएगा पर मुझे इस सब में कोई दिलचस्पी नहीं है।"

"तुम ऐसे नहीं जा सकते वैभव।" भाभी ने जैसे हुकुम देने वाले लहजे में कहा____"तुम्हें बताना होगा कि तुम ऐसा क्यों करते हो?"

"मैं आपकी बहुत इज्ज़त करता हूं भाभी।" मैंने सपाट भाव से कहा____"और मेरे अंदर आपके प्रति कोई बैर भाव नहीं है और मैं चाहता हूं कि ऐसा हमेशा ही रहे। मैं अपने ऊपर किसी की बंदिशें पसंद नहीं करता और ना ही मैं किसी के इशारे पर चलना पसंद करता हूं। आपने मुझसे मिलने की इच्छा ज़ाहिर की तो मैंने आपसे मिल लिया और आपकी बातें भी सुन ली। अब मुझे जाने की इजाज़त दीजिए।"

भाभी मेरी बातें सुन कर मेरी तरफ देखती रह गईं थी। शायद वो ये समझने की कोशिश कर रहीं थी कि मैं किस तरह का इंसान हूं। जब उन्होंने कुछ नहीं कहा तो मैंने उन्हें एक बार फिर से प्रणाम किया और पलट कर कमरे से बाहर निकल गया।

भाभी से ऐसी बेरुख़ी में बातें करना मेरे लिए बेहद ज़रूरी था क्योंकि जब से मैं यहाँ आया था तब से उनका बर्ताव मेरे लिए बदला बदला सा लगने लगा था और मैं नहीं चाहता था कि वो मेरे क़रीब आने की कोशिश करें। मैं जानता था कि वो अपनी जगह सही हैं मगर उन्हें नहीं पता था कि मेरे अंदर क्या था।

सीढ़ियों से उतर कर नीचे आया तो माँ मुझे मिल ग‌ईं। मुझे हवेली से बाहर जाता देख उन्होंने मुझसे पूछ ही लिया कि मैं कहा जा रहा हूं तो मैंने चलते चलते ही कहा कि ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूं। वो जानती थी कि मुझे इस तरह किसी की टोका टोकी पसंद नहीं थी।

"शाम को जल्दी घर आ जाना बेटा।" पीछे से माँ की मुझे आवाज़ सुनाई दी____"तुझे पता है ना कि आज होलिका दहन है इस लिए मैं चाहती हूं कि शाम को तू भी हमारे साथ ही रहे।"

"जी बेहतर।" कहने के साथ ही मैं मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल गया।

हवेली से बाहर आ कर मैं उस तरफ बढ़ चला जहां पर गाड़ियां रखी होतीं थी। आस पास मौजूद दरबान लोग मुस्तैदी से खड़े थे और मुझे देखते ही उन सबकी गर्दन अदब से झुक गई थी। वो सब मेरे बारे में अच्छी तरह जानते थे कि मैं हवेली के बाकी लड़को से कितना अलग था और किसी की ज़रा सी भी ग़लती पर मैं कितना उग्र हो जाता था। इस लिए मेरे सामने हवेली का हर दरबान पूरी तरह मुस्तैद हो जाता था।

मैने अपनी दो पहिया मोटर साइकिल निकाली और उसमे बैठ कर उसे स्टार्ट किया। मोटर साइकिल के स्टार्ट होते ही वातावरण में बुलेट की तेज़ आवाज़ गूँज उठी। मैं बुलेट को आगे बढ़ाते हुए हवेली के हाथी दरवाज़े से हो कर बाहर निकल गया।

जैसा कि मैंने बताया था हवेली गांव के आख़िरी छोर पर सबसे अलग बनी हुई थी। हवेली से निकलने के बाद थोड़ी दूरी से गांव की आबादी शुरू होती थी। कच्ची सड़क के दोनों तरफ कच्चे मकान बने हुए थे। गांव के साहूकारों के घर दूसरे छोर पर थे और उनके मकान पक्के बने हुए थे। हमारे बाद गांव में वही संपन्न थे। हमारी ज़मीन बहुत थी जो दूसरे गांवों तक फैली हुई थी।

गांव से बाहर जाने के लिए साहूकारों के घर के सामने से गुज़ारना पड़ता था। साहूकारों के पास भी बहुत ज़मीनें थी और बहुत ज़मीनें तो उन्होंने ग़रीब लोगों को कर्ज़ा दे कर उनसे हड़प ली थी। ठाकुरों के साथ साहूकारों के सम्बन्ध हमेशा से ही थोड़े तनाव पूर्ण रहे थे किन्तु हमारी ताकत के सामने कभी उन लोगों ने अपना सिर नहीं उठाया था। हलांकि साहूकारों की नई पीढ़ी अब मनमानी पर उतर आई थी।

मैं बुलेट से चलते हुए साहूकारों के सामने से निकला तो मेरी नज़र सड़क के किनारे पर लगे पीपल के पेड़ के नीचे बने बड़े से चबूतरे पर बैठे साहूकारों के कुछ लड़कों पर पड़ी। वो सब आपस में बातें कर रहे थे लेकिन मुझे देखते ही चुप हो गए थे और मेरी तरफ घूरने लगे थे। साहूकारों के इन लड़कों से मेरा छत्तीस का आंकड़ा था और वो सब मेरे द्वारा कई बार पेले जा चुके थे।

मैं उन सबकी तरफ देखते हुए मुस्कुराया और फिर निकल गया। मैं जानता था कि मेरे मुस्कुराने पर उन सबकी झांठें तक सुलग गईं होंगी किन्तु वो मेरा कुछ नहीं उखाड़ सकते थे। ऐसा नहीं था कि उन्होंने मेरा कुछ उखाड़ने का कभी प्रयास ही नहीं किया था बल्कि वो तो कई बार किया था मगर हर बार मेरे द्वारा पेले ही गए थे।

बुलेट से चलते हुए मैं कुछ ही देर में मुंशी चंद्रकांत के घर पहुंच गया। मुंशी चंद्रकांत का घर पहले साहूकारों के पास ही था लेकिन साहूकार उसे अक्सर किसी न किसी बात पर परेशान करते रहते थे जिसकी वजह से दादा ठाकुर ने मुंशी के लिए गांव से बाहर हमारी ही ज़मीन पर एक बड़ा सा पक्का मकान बनवा दिया था और साहूकारों को ये शख़्त हिदायत दी गई थी कि अब अगर उनकी वजह से मुंशी चंद्रकांत को किसी भी तरह की परेशानी हुई तो उनके लिए अच्छा नहीं होगा। दादा ठाकुर की इस हिदायत के बाद आज तक अभी ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। मुंशी ने अपना पहले वाला घर पिता जी के ही कहने पर एक ग़रीब किसान को दे दिया था।

बुलेट की आवाज़ सुन कर मुंशी के मकान का दरवाज़ा खुला तो मेरी नज़र दरवाज़े के पार खड़ी मुंशी की बहू रजनी पर पड़ी। उसे देखते ही मेरे होंठों पर मुस्कान फैल गई और यही हाल उसका भी हुआ। मैंने बुलेट को बंद किया और उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ चला।

कुछ ही पलों में मैं रजनी के पास पहुंच गया। रजनी मुस्कुराते हुए मुझे ही देख रही थी और जैसे ही मैं उसके क़रीब पहुंचा तो वो दरवाज़े के अंदर की तरफ दो क़दम पीछे को हो ग‌ई। मैं मुस्कुराते हुए दरवाज़े के अंदर आया और फिर झट से दरवाज़ा बंद कर के रजनी को अपनी बाहों में कस लिया।

"ये क्या कर रहे हैं छोटे ठाकुर?" रजनी ने मेरी बाहों से निकलने की कोशिश करते हुए धीमी आवाज़ में कहा____"मां जी अंदर ही हैं और अगर वो इस तरफ आ गईं तो गज़ब हो जाएगा।"

"आने दे उसे।" मैंने रजनी को पलटा कर उसकी पीठ अपनी तरफ करते हुए कहा____"उसे भी तेरी तरह अपनी बाहों में भर कर प्यार करने लगूंगा।"

"अच्छा जी।" रजनी ने मेरे पेट में अपनी कोहनी से मार कर कहा____"क्या मुझसे आपका मन भर गया है जो अब मेरी बूढ़ी सास को भी प्यार करने की बात कह रहे हैं?"

"बूढ़ी वो तेरी नज़र में होगी।" मैंने रजनी की बड़ी बड़ी चूचियों को मसलते हुए कहा तो उसकी सिसकी निकल गई, जबकि मैंने आगे कहा____"मेरे लिए तो वो तेरी तरह कड़क माल ही है। तूने अभी देखा ही नहीं है कि तेरी सास कैसे मेरे लंड को मुँह में भर कर मज़े से चूसती है।"

"आप बहुत वो हैं।" रजनी ने अपना हाथ पीछे ले जा कर पैंंट के ऊपर से ही मेरे लंड को सहलाते हुए कहा____"हम दोनों के मज़े ले रहे हैं मगर कभी ये नहीं सोचा कि अगर किसी दिन हमारा भांडा फूट गया तो हमारा क्या होगा?"

"मेरे रहते तुम दोनों को चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है।" मैंने रजनी के ब्लॉउज में हाथ डाल कर उसकी एक चूची को ज़ोर से मसला तो इस बार उसकी सिसकी ज़ोर से निकल गई____"ख़ैर ये सब छोड़ और आज शाम को बगीचे में मिल। चार महीने हो गए तुझे चोदे हुए और अब मुझसे रहा नहीं जा रहा।"

"मैं भी तो आपसे चुदवाने के लिए तब से ही तड़प रही हूं।" रजनी ने मेरे लंड को तेज़ तेज़ सहलाते हुए कहा जिससे मेरा लंड पैंट के अंदर ही किसी नाग की तरह फनफना कर खड़ा हो गया था, उधर रजनी ने आगे कहा____"रात में जब वो करते हैं तो मुझे ज़रा भी मज़ा नहीं आता। तब आपकी याद आती है और फिर सोचती हू कि उनकी जगह पर काश आप होते तो कितना मज़ा आता।"

"तेरा पति तो साला नपुंसक है।" मैंने एक हाथ से रजनी की चूंत को उसकी साड़ी के ऊपर से ही मसलते हुए कहा जिससे वो कसमसाने लगी____"उसमे तो दम ही नहीं है अपनी बीवी को हचक के चोदने का। ख़ैर तू आज शाम को बगीचे में उसी जगह पर मिल जहां पर हम हमेशा मिला करते थे।"

"ठीक है मैं समय से पहुंच जाऊंगी वहां।" रजनी ने मेरे लंड से अपना हाथ हटाते हुए कहा____"अब छोड़िए मुझे। कहीं माँ जी ना आ जाएं। आपसे कितनी बार कहा है कि एक बार मुझे भी उनके साथ करते हुए दिखा दीजिए मगर आप सुनते कहा हैं मेरी? क्या आपका मन नहीं करता कि आप हम दोनों सास बहू को एक साथ चोदें?"

"मन तो करता है मेरी जान।" मैंने रजनी के होठों को चूमने के बाद कहा___"मगर ऐसा मौका भी तो मिलना चाहिए। ख़ैर तू चिंता न कर। इस बार मौका मिला तो तुझे और तेरी सास दोनों को ही एक साथ पेलूंगा।"

मेरी बात सुन कर रजनी के चेहरे पर ख़ुशी की चमक उभर आई। अभी हम बात ही कर रहे थे कि तभी अंदर से रजनी की सास और मुंशी की बीवी प्रभा की आवाज़ हमारे कानों में पड़ी। रजनी की सास रजनी को आवाज़ दे कर पूछ रही थी कि कौन आया है बाहर?
 
प्रभा की इस आवाज़ पर मैं रजनी को छोड़ कर अंदर की तरफ चल दिया जबकि रजनी वहीं पर खड़ी हो कर अपनी साड़ी और ब्लॉउज को ठीक करने लगी थी। कुछ ही देर में मैं अंदर आँगन में आया तो देखा प्रभा अपने हाथ में सूपा लिए इस तरफ ही आ रही थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही पहले तो वो चौंकी फिर मुस्कुराने लगी।

मुंशी की बीवी प्रभा इस उम्र में भी गज़ब का माल लगती थी। गठीला जिस्म था उसका और जिस्म में झुर्रियों के कही निशान तक नहीं थे। उसके सीने पर दो भारी भरकम खरबूजे जैसी चूचियां थी जो तंग ब्लॉउज की वजह से ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर उछाल पड़ने को आतुर थे। प्रभा थोड़ी सांवली थी किन्तु लंड की सवारी वो अपनी बहू से कहीं ज़्यादा पूरे जोश से करती थी।

"क्या बात है।" फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा____"आज छोटे ठाकुर हमारे घर में कैसे? कहीं रास्ता तो नहीं भूल गए?"

"मुंशी काका कहां हैं?" रजनी को पीछे से आता देख मैंने प्रभा से कहा____"मुझे उनसे कुछ ज़रूरी काम है।"

"वो तो इस वक़्त यहाँ नहीं हैं।" प्रभा ने कहा____"दोपहर को रघू के साथ कहीं गए थे और अब तक नहीं लौटे। ख़ैर आप मुझे बताइए क्या काम था उनसे?"

"उनसे कहना मुझसे आ कर मिलें।" मैंने ठाकुरों वाले रौब में कहा____"और ये भी कहना कि मुझसे मिलने में उन्हें देरी नहीं होनी चाहिए।"

"जी बिलकुल छोटे ठाकुर।" प्रभा ने सिर हिलाते हुए कहा___"अरे! आप खड़े क्यों हैं बैठिए ना।"

प्रभा ने हाथ में लिए हुए सूपे को एक तरफ रखा और आँगन के एक कोने में रखी चारपाई को बिछा दिया। मैं जा कर चारपाई में बैठ गया। हलांकि अब मैं यहाँ रुकना नहीं चाहता था किन्तु मैं एक बार प्रभा की बेटी कोमल को भी देख लेना चाहता था। पिछली बार जब मैं उससे मिला था तब मैं उसे पटाने में लगभग कामयाब हो ही गया था। उसके बाद पिता जी ने गांव से निष्कासित कर देने का फैसला सुना दिया था तो मेरी गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई थी।

अभी मैं इधर उधर देख ही रहा था कि तभी रजनी लोटा और गिलास में पानी ले कर आई और मेरी तरफ गिलास बढ़ाया तो मैंने उसके हाथ से गिलास ले लिया। पानी पीते हुए मैंने रजनी की तरफ देखा तो उसके होठों पर बड़ी जानदार मुस्कान उभरी हुई थी।

"मां जी आपने पिता जी से कहा क्यों नहीं कि वो वापसी में कोमल को भी साथ ले आएंगे?" रजनी ने पलट कर प्रभा की तरफ देखते हुए कहा____"और कितने दिन वो मौसी जी के यहाँ रहेगी?"

"मुझे उनसे ये कहने का ख़याल ही नहीं आया बहू।" प्रभा ने कहा____"कल से पूरा एक महीना हो जायेगा कोमल को यहाँ से गए हुए। मैंने तो जीजा जी से कहा भी था कि वो उसे दस पंद्रह दिन में भेज देंगे मगर लगता है कि उन्हें फसलों की कटाई के चलते कोमल को भेजने का समय ही नहीं मिल रहा होगा।"

प्रभा की बात सुन कर रजनी बोली तो कुछ न लेकिन वो तिरछी नज़रों मेरी तरफ देख कर मुस्कुराई ज़रुर। मैं समझ गया कि शायद उसे अपनी ननद के बारे में पता चल गया है और उसने जब मुझे इधर उधर देखते हुए देखा था तो शायद वो समझ गई थी कि मैं किसे देखने की कोशिश कर रहा हूं। रजनी अपनी सास की ही तरह बहुत चालाक थी। ख़ैर अब जबकि मुझे पता चल चुका था कि कोमल अपनी मौसी के यहाँ है तो अब यहाँ मेरे रुकने का सवाल ही नहीं था। इस लिए मैं चारपाई से उठा और रजनी की सास से चलने को कहा तो उसने इशारे से ही सिर हिला दिया। मैंने आँखों के इशारे से रजनी को एक बार फिर ये बताया कि वो आज शाम को बगीचे वाले अड्डे पर मिले।

मुंशी के घर से मैं बुलेट में बैठ कर चल पड़ा। अब मेरी मंज़िल प्रदीप काका का घर थी। मैं प्रदीप काका के घर जा कर देखना चाहता था कि वहां का माहौल कैसा है और उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं है? ये सोच कर मैं दूसरे गांव की तरफ बढ़ चला। मैं मुख्य सड़क से न जा कर उसी रास्ते से चल पड़ा जिस रास्ते से मैं पिछले दिन बग्घी में बैठ कर अपने झोपड़े से आया था।

फागुन का महीना चल रहा था और हर जगह खेतों में गेहू की कटाई चालू थी। पगडण्डी के दोनों तरफ हमारी ही ज़मीन थी और हमारे खेतों पर मजदूर गेहू की कटाई में लगे हुए थे। बुलेट की आवाज़ सुन कर उन सबका ध्यान मेरी तरफ गया तो सबने मुझे पहचान कर अदब से सिर नवाया जबकि मैं बिना उनकी तरफ देखे बढ़ता ही चला जा रहा था। कुछ दूरी से खेत समाप्त हो जाते थे और बंज़र ज़मीन शुरू हो जाती थी। बंज़र ज़मीन के उस पार जंगल लगा हुआ था।

कुछ ही देर में मैं अपने झोपड़े के पास पहुंच गया। झोपड़े के पास बुलेट को खड़ी कर के मैंने कुछ देर झोपड़े का और आस पास का जायजा लिया और फिर से बुलेट में बैठ कर चल दिया। अब मैं प्रदीप काका के घर जा रहा था।

कुछ ही देर में प्रदीप काका के घर के सामने पहुंच कर मैंने बुलेट खड़ी की। पेड़ के पास बने चबूतरे पर आज कोई नहीं बैठा था और ना ही आस पास कोई दिख रहा था। प्रदीप काका का घर वैसे भी गांव से हट कर बना हुआ था, जहां पर प्रदीप काका के खेत थे। ये बुलेट की तेज़ आवाज़ का ही असर था कि कुछ ही पलों में प्रदीप काका के घर का दरवाज़ा खुल गया और मेरी नज़र दरवाज़े के उस पार खड़ी डॉली पर पड़ी। इस वक़्त डॉली जिस रूप में मुझे दिख रही थी उससे मैं उसकी तरफ एकटक देखता रह गया था, जबकि वो भी मुझे बुलेट जैसी मोटर साइकिल में आया देख अपलक देखने लगी थी। कुछ पलों तक तो वो मुझे अपलक ही देखती रही फिर जैसे उसे कुछ याद आया तो वो बिना कुछ कहे ही वापस अंदर की तरफ पलट गई। उसका इस तरह से पलट कर घर के अंदर चले जाना पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगा मुझे।

मैं आगे बढ़ा और दरवाज़े से अंदर दाखिल हो गया। प्रदीप काका का घर मिटटी का बना हुआ था और घर के सामने थोड़ा सा मैदान था। घर के सामने मिट्टी की एक ही दीवार थी जिसमे लकड़ी का दरवाज़ा लगा हुआ था। दरवाज़े से अंदर जाते ही बड़ा सा आँगन था। आँगन के बाईं तरफ भी मिट्टी की ही एक दीवार थी जिसमे दरवाज़ा लगा हुआ था और उस दरवाज़े से घर के पीछे की तरफ जाना होता था। घर के पीछे एक कुआं था और उसी कुएं के बगल से सरोज काकी ने सब्जियों की एक छोटी सी बगिया लगा रखी थी। आँगन के सामने तरफ और दाएं तरफ दो दो दीवारों के हिसाब से चार कमरे बने हुए थे। सामने वाली दीवार के आगे तरफ क़रीब सात या आठ फ़ीट की एक दीवार बढ़ा कर रसोई बनाई गई थी और उसी रसोई की बढ़ी हुई दीवार के सामानांतर से लकड़ी की मोटी मोटी थून्ही ज़मीन में गाड़ कर और ऊपर से खपरैल चढ़ा कर बरामदा बनाया गया था।
 
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