• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

शैतान से समझौता

S

StoryPublisher

Guest
शैतान से समझौता

लेखिका वर्षा

"आआआहहह ह ह ह ...."

रोकते रोकते भी उसके मुंह से एक दर्द भरी चीख निकल ही गई। वो एक गंदा सा कम रौशनी वाला कमरा था। जून का उमस भरा दिन था पर खिड़की और दरवाज़े बंद थे यहां तक की पर्दे भी लगे हुए थे। छत से एक मरघिल्ला सा बल्ब लटक रहा था जिसकी रौशनी उस कमरे के लिये पर्याप्त नहीं थी।

बल्ब के नीचे एकचरमराता सा बिस्तर था जिस पर मटमैली सी चादर बिछी थी जहां वो निढाल पड़ी थी।

उसके मुंह से फिर एक घुटी हुई चीख निकली।

नहीं! उसे खुद पर काबू रखना होगा वरना कोई उसकी आवाज़ सुन लेगा। आखिर इतना तंग मोहल्ला है ये!

पर और कितनी देर?? दो दिन तो हो गए थे उसे यहां आए हुए।

दर्द की एक और लहर उठी। उसने जल्दी से एक तकिये का कोना मुंह में भर लिया। वो हिम्मत करके जरा सा उठी और बगल की दराज़ से एक चौड़े फल वाला चाकू निकाल लिया।

अब किसी भी पल!! उसे तैयार रहना होगा!!

अब तक का सबसे भयंकर दर्द का ज्वार आया और...

ये हो गया!

वो पसीने पसीना हो चुकी थी और बुरी तरह हांफ रही थी।

वो कितनी देर तो निढाल पड़ी रही। फिर उसे थोड़ा अजीब लगा.…कोई आवाज़ क्यों नहीं आ रही???

वो हिम्मत करके उठ के बैठ गई और चाकू को मज़बूती से पकड़ लिया। पर जब उसकी नजर सामने बिस्तर पर पड़ी तो उसका चाकू वाला हाथ हवा में ही रुक गया और उसकी सांसे भी!!

....ये तो लड़की है..कितनी सुंदर..बिलकुल..

"नहीं...ये मैं क्या कर रही हूं..मुझे मजबूत होना होगा...

उसने चाकू वाला हाथ उपर उठाया..जबड़े भींचे हुए थे..आंखें बंद की और एक झटके से....

चाकू कमरे के पार फेंक दिया और फूट फूट कर रोने लगी।

"नहीं..ये मुझसे नहीं हो पाएगा" वो बहुत देर तक सुबकती रही।

सुबह हो चुकी थी। उसने रात भर सोचने के बाद फैसला कर लिया था। वो यहां से चली जाएगी और खुद के होने के सारे निशान मिटा देगी। अब तक जो भी हुआ..उसने जो कुछ भी किया...पर अब वो सिर्फ एक मां है और कुछ नहीं।

उसने पास रखी दराज से एक घिसापिटा सा कागज निकाला और उस पर एक चिट्ठी लिखने लगी....

"जानती हूं तुम मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगे...

उसने लिखना शुरू किया।

,

"......और यही सबके हक़ में सही होगा, अलविदा।

उसने चिट्ठी लिखनी खत्म की। उसे एक बार पूरा पढ़ा और वहीं मेज पर एक पुराने घुन लगे लकड़ी के फूलदान के नीचे दबा दिया। अब जल्द ही इस जगह को छोड़ना होगा।

उसने अपनी एक दिन की बच्ची को गोद में उठाया और बाहर का दरवाज़ा खोला। हल्की बारीश होने लगी थी। उसने एक लंबी सांस ली और चल पड़ी...न जाने कहां!
 
* * * सात सालों बाद * * *

रात के लगभग पौने दस बज रहे थे। जंगल के बीच से एक मालवाहक ट्रक गुज़र रहा था। अचानक ड्राईवर ने देखा कि सामने से एक लहराती हुई नियंत्रण खो चुकी,यात्रियों से भरी बस आ रही है!! उसकी लाख कोशिशों के बावजूद वो बस, ट्रक से आ भिड़ी। पर वक्त रहते ड्राईवर और उसका हेल्पर ट्रक से कूद गए थे।

कराहते हुए सड़क के किनारे से ड्राईवर उठा। वो एक पेड़ से टकरा गया था। उसने पहले सुनिश्चित किया कि उसका हेल्पर सुरक्षित था फिर ट्रक की तरफ पलटा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। ऐसा भयानक एक्सीडेंट!!

कई क्षत विक्षत शरीर टूटी हुई बस से बाहर लटक रहे थे। बस की छत के तो मानो पखच्चे ही उड़ गए थे। कराहें और चीखें अब कम होती जा रही थी...लोग दम तोड़ रहे थे...

"भाईजी! लगता नहीं कोई बचा होगा" हेल्पर सदमें से देखता हुआ बोला।

"तू पुलिस को फोन लगा..टावर है यहां पर..आगे बाईस किलोमीटर बाद एक कस्बा है.." ड्राइवर बोला और वहीं रोड पर बैठ गया । उसका खून बह रहा था। तभी....

जोर से भड़भड़ाने की आवाज़ आई! जैसे कोई उस क्षतिग्रस्त बस ,

के जाम हो चुके गेट को पीट रहा हो...

"लगता है किसी को मदद चाहीये.." ड्राईवर उठता हुआ बोला। वो बस की तरफ बढ़ने लगा पर तभी बस का टूटा हुआ दरवाजा भड़ाक से आवाज करता सड़क पर आ गिरा।

पूरे चांद की रात थी और क्षतिग्रस्त ट्रक की एक लाईट अभी भी जल रही थी जिसकी रौशनी में साफ दिखा कि एक छ: -सात साल की लड़की बस से बाहर सड़क पर कूदी। न जाने क्यूं तभी वातावरण में सैकड़ों सियारों के रोने की ध्वनी गूंजने लगी। उस लड़की गर्दन खतरनाक तरीके से उसके कंधे पर झूल रही थी मानो

....... टूट गई हो...हे भगवान!!!!

ड्राईवर और हेल्पर दोनों हड़बड़ा गए। वो लड़की बुरी तरह से टूटी फूटी और घायल थी उसकी फ्राॅक पर खून बिखरा हुआ था। पर वो आराम से किसी जानवर की तरह सड़क पर रेंगने लगी। फिर वो कोशिश करके खड़ी हुई और ऐसे अपने शरीर को एंठने लगी मानो अंगड़ाई ले रही हो‌

अजीब सी चटर-पटर की आवाजें आई और लड़की का एक हाथ और एक पैर जुड़ गया जो थोड़ी देर पहले टूट कर लटक रहा था।

ड्राईवर और हेल्पर की घिग्घी बंध चुकी थी। दोनो कोरस में हनुमान चालीसा पढ़ने लगे।

उस लड़की ने दोनो हाथों से अपना सर पकड़ा और उसे दाएं बाएं घुमाने लगी जैसे उसे कंधों पर एडजस्ट कर रही हो फिर स्थिर हो गई।

उसकी टूटी चुकी गर्दन भी जुड़ गई थी!

फिर जैसे उसे अहसास हुआ कि उसे कोई देख रहा था वो पलटी और उसने ड्राईवर और उसके हेल्पर को देख लिया। वो उनकी ओर डरावने अंदाज में बढ़ने लगी....

वो दोनो सड़क पर खड़े थर थर कांप रहे थे और एक दूसरे को कस कर पकड़े हुए थे। वो लड़की पास आ रही थी उसके चेहरे पर ऐसा ,

भाव था जैसे उन दोनो ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया हो! वो उनके पास आ कर स्थिर हो गई और जोर जोर से सांस खीचने लगी...उन दोनों को ये अजीब और अटपटा एहसास हो रहा था कि मानो वो उनका डर सूंघ रही हो...

तभी सड़क किसी वाहन की रौशनी में नहा गई। वो लड़की पलटी और लगभग बारह फीट की छलांग मार कर सड़क किनारे एक पेड़ पर बैठ गई। थोड़ा इंतजार किया फिर और अंदर वाले पेड़ पर कूद गई..इसी तरह वो उस जंगल में गायब हो गई....

पुलिस और कुछ आस पास के लोग वहां पहुच चुके थे। उस भयानक एक्सीडेंट का नज़ारा किसी को भी विचलित कर सकता था।

"अरे ये क्या!!!!" एक कांस्टेबल जोर से चिल्लाया। सब दुर्घटनाग्रस्त ट्रक और बस से दूर उस कांस्टेबल के पास आये और बुरी तरह चौंक पड़े..कुछ की तो चीख भी निकल गई!

सामने सड़क पर ट्रक का ड्राईवर बैठा था और उसने एक हाथ से हेल्पर की कालर पकड़ रखी थी और बार बार उसका सर कठोर सड़क पर पटक रहा था जो कि कब का मर चुका था। ट्रक ड्राईवर अब भी उस जगह को देख रहा था जहां वो लड़की गायब हुई थी....

उस ट्रक वाले हादसे को डेढ़ साल बीत चुका था। सहज ही मान लिया गया था कि ये उस "बेवड़े" और अब पागल हो चुके ट्रक ड्राईवर की करतूत थी।

फिलहाल पुलिस कंट्रोल रूम के पास एक और हादसे की खबर आई थी जो शहर के बाहर एक घाटी में हुआ था। एक पुलिस की जीप तेज गति से घटना स्थल की ओर भागी जा रही थी।

"क्या पोजीशन है" जीप से कूदता एक तीन सितारों वाला इंस्पेक्टर बोला।

"स्कूल बस थी साहेब" एक आदमी भर्राए गले से बोला.."पिकनिक के लिये जा रही थी अचानक रेलिंग तोड़ के नीचे ,

खाईं में जा गिरी" वो दुख से बोला।

वो एक पहाड़ी रास्ता था जहां बाएं तरफ पहाड़ और दाई ओर खाईं थी। इंस्पेक्टर ने थोड़ा झुक कर देखा। नीचे जल रही बस के अवशेष दिख रहे थे। आसपास लोगों की आहें और सिसकारीयां सुनाई दे रही थीं।
 
"वो क्या है?" इंस्पेक्टर चौंकता सा बोला। वो जहां खड़ा था वहां से लगभग बीस फीट ने उसे किसी गुलाबी रंग की चीज की झलक दिखी। वो थोड़ा और झुका।

"साहब संभल के" पीछे से कोई चिल्लाया।

"वहां कोई है" इंस्पेक्टर रोमांचित हो कर बोला "शायद बस का ही कोई बच्चा..वहां फंसा हुआ है..उसे बचाना होगा"

आनन फानन में एक रस्सी लाई गई जिसका एक सिरा जीप पर बांधा गया और दूसरा वो इंस्पेक्ट खुद अपनी कमर पे बांधने लगा। रस्सी के सहारे लटकता हुआ वो नीचे पहुंचा।

वहां एक खोह जैसी जगह थी जिसमें स्कूल की एक बच्ची बैठी हुई थी।

"बेटा! आप ठीक हो" इंस्पेक्टर बोला। वो लड़की उसकी तरफ घूमी और न जाने क्यों इंस्पेक्टर बुरी तरह चौंक गया।

रस्सी उसके हाथों से छूटती छूटती बची।

वो एक लगभग आठ नौ साल की सुंदर सी बच्ची थी जिसके सुनहरे लंबे बाल थे। उसके हाथ में एक पज़ल गेम था जिससे वो लापरवाही से घुमा रही थी।

वो बिलकुल भी डरी हुई नहीं लग रही थी!

"मेरे पास आओ...आ जाओ" इंस्पेक्टर ने हाथ बढ़ाया। वो लड़की थोड़ा देर कुछ सोचती रही फिर उसने भी हाथ बढ़ा दिया। लोगो ने इंस्पेक्टर साहब का तालीयों से स्वागत किया जब वो उस बच्ची को ले कर सुरक्षित उपर आ गए। कम से कम एक जान तो बच गई।

,

उन्हें नहीं मालूम था कि वो तो कभी खतरे में थी ही नहीं!

इंस्पेक्टर अपने आॅफिस में बैठा था। वो लड़की भी वहीं पास ही बैठी खेल रही थी। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो अभी चंद घंटे पहले उस बस में बैठी थी जो जल कर खाक हो चुकी थी। इंस्पेक्टर बार बार कनखियों से उस लड़की को देख रहा था। पता नहीं क्या जादा डरावना था वो एक्सीडेंट या उसके प्रति लड़की का यू हल्का व्यवहार!

एक सब इंस्पेक्टर वहां आया।

"सारे बच्चों के पैरेंट्स को खबर कर दी गई है...बुरा हुआ सर! बहुत बुरा!" वो बोला। पर वो इंस्पेक्टर तो उस लड़की को ही घूरे जा रहा था। सब इंसपेक्टर लड़की के पास पहुंचा।

"हलो बेटा! क्या नाम है आपका?" वो मुस्कुराता सा बोला।

"अर्शिया" वो बच्ची लापरवाही से बोली वो अभी भी अपने गेम में गुम थी।

"अच्छा अर्शिया..आपको याद है आज मार्निंग में क्या हुआ जब आप बस में थीं? आपके सारे फ्रैंड्स....."

"वो मेरे फ्रैंड्स नहीं थे..." अबकि बार वो सीधे उसकी तरफ देखते हुए थोड़ा नापसंदगी से बोली।

"ओके...ओके...पर क्या आपको मालूम है कि....

"वो मेरी हंसी उड़ा रहे थे...मुझे ये पसंद नहीं" वो अब भी सीधा सब इंस्पेक्टर की आंखों में देख रही थी।

तभी दरवाजा खुला और एक घबराया हुआ व्यक्ति अंदर आया।

"अर्शिया! अर्शिया बेटा!! अर्शु...." उसने भाग कर उस लड़की को गले लगा लिया और रोने लगा। फिर वो इंस्पेक्टर की तरफ मुड़ा..

"मैं मनोज वर्मा...ये मेरी बच्ची है। समझ नहीं आ रहा किन शब्दों में आपका धन्यवाद करूं" वो हाथ जोड़ता सा बोला। "आपने अपनी ,

जान खतरे में डाल कर...." उसका गला भर आया।

"इट्स ओके...इंस्पेक्टर बोला "मैं ने बस अपनी ड्यूटी पूरी की है" वो मशीनी अंदाज़ में बोला उसका दिमाग अब भी उस बच्ची में ही उलझा हुआ था।

वो अपने पिता के साथ जा चुकी थी। पर इंसपेक्टर अब भी उसी के बारे में सोच रहा था। कितनी अजीब थी वो!

उसके अजीब होने से भी जादा उसे इस बात पर हैरानी हो रही थी कि वो उसे जानी पहचानी लग रही थी। जैसे उसने पहले उसे देखा हो.. ‌पर कहां !!

"सर! नौ बज रहे हैं..." सब इंस्पेक्टर थोड़ा संकोच से बोला।

"हां, तो?" इंस्पेक्टर बेध्यानी से बोला "क्या हुआ?"

"सर...वो आपको कहीं जाना था...तो...

"इंसपेक्टर ने चौंक कर सर उठाया...घड़ी देखा...

"ओहहहह ...जीप निकालो फौरन" वो सब इंस्पेक्टर से बोला।

जीप सरसराती हुई चली जा रही थी। शहर से थोड़ा बाहर एक छोटा, खूबसूरत सा फार्महाउस था। वो जीप से नीचे उतरा। सब इंस्पेक्टर अर्जुन भी साथ था। वहां कोई पार्टी चल रही थी। काफी भीड़ थी पर उसकी नज़रें तो किसी को ढूंढ रही थीं ....और वो दिख गई!! वो वहां लोगों से घिरी हुई।

वो हमेशा से ही उसकी खूबसूरती का कायल था पर आज वो गज़ब ढा रही थी। हल्का रेशमी गाऊन और खुले बाल!

इंस्पेक्टर विनय...धड़कते दिल से उसके पास पहुंचा...
 
"बहुत खूबसूरत लग रही हो..दिया" वो उस पर से नज़रें नहीं हटा पा रहा था।

"और तुम!!!??" दिया गुस्से से बोली..."अपनी ही सगाई में कोई वर्दी पहन के आता है क्या! लोग ठहाके लगाने लगे...

,

दिया और विनय की मुलाकात दो-ढाई साल पहले हुई थी। उस वक्त दिया अपनी ज़िंदगी के मुश्किल दौर से गुज़र रही थी। फिर बाद में दिया और विनय ने मिल कर एक कस्बे को "मुर्दों की ट्रेन" के आतंक से मुक्त किया था। वो अजीब सी खौफ़नाक रहस्यमयी ट्रेन थी जो हर रात उस स्टेशन पर आती थी।

घर वापसी के सफर के दौरान ही विनय ने दिया को प्रपोज़ कर दिया था। और दो साल की रीलेशनशिप के बाद आज उन दोनों की सगाई थी।

दिया नकली गुस्सा दिखाती हाथ बाध कर खड़ी थी।

"अब जाने दो न दीदी...इस बार भी ये बिलकुल वक्त पर ही पहुंचे हैं" विष्णु बोला जो कि उसी कस्बे से था और आज खास उन दोनो को शुभकामनाएं देने पहुंचा था। सभी हंसने लगे।

दिया विनय को देखते हुए मुस्कुराई...विनय भी जवाब में मुस्कुराया और एक झिलमिलाती सी अंगूठी उसे पहना दी। दिया ने भी विनय को अंगूठी पहना दी। बधाईयों की बौछार होने लगी। लोग तालीयां बजा रहे थे।

पर दिया और विनय अपने में ही गुम थे! जो भी उस खूबसूरत जोड़े को देखता एक ही बात बोलता...

"नज़र ना लगे....

किसी का ध्यान नहीं गया की फार्म हाउस की अंधेरी छत पर कोई खड़ा उन दोनों को घूर रहा था...हल्के अंधेरे में दो आंखें चमक रही थीं...वो अर्शिया थी

नज़र तो लग चुकी थी.....
 
वो एक भव्य दोमंजिला कोठी थी। जहां थोड़ी अफरा तफरी का महौल था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई आयोजन होने वाला था..या हो चुका था।

"यहां आओ..सुनो!" वो एक नौकर से बोला। नौकर भी वर्दी वाले साहब को देख थोड़ा सकपकाया।

"जी साहब! बोलीये.." वो बोला

"क्या हो रहा है यहां?"

"साहब पूजा रखवाई थी घर में। वो अर्शिया बेबी सलामत लौट आई थी न उस बस हादसे से इसी लिये। पर पता नहीं कैसे मैडम का पैर फिसल गया सीढ़ीयों से... और पूजा नहीं हो पाई... सब लोग हास्पीटल गए हैं"

विनय अब हास्पीटल जा रहा था। पिछले तीन दिन से वो उस रहस्यमयी बच्ची अर्शिया के बारे में ही सोच रहा था जिसका चेहरा उसे जाना पहचाना सा लग रहा था। अब उसे मनोज वर्मा और उसकी पत्नी से मिलना ही था जो कि उस बच्ची के माता पिता थे।

"अरे सर आप यहां!" मनोज हैरानी से बोला।

"हां पुलिस अभी भी छानबीन कर रही है, उस एक्सीडेंट के कारण का पता लगा रही है। मुझे अर्शिया से बात करनी थी"

"जरूर.. वो अंदर अपनी मां के पास है"

"आपकी पत्नी अब कैसी हैं"

"ठीक ही है न जाने कैसे सीढ़ीयों से फिसल गई। बेटी की सलामती के लिये पूजा रखवाई थी। बहुत बड़ा हादसा जो टल गया..नहीं तो हम..हम दुबारा नहीं बरदाश्त कर पाते" उसकी आंखें नम हो गई।

"दोबारा???" विनय ने पूछा।

उसने विनय को अपने मोबाईल पर एक तीन-चार साल की बच्ची की फोटो दिखाई।

"ये अर्शिया है...हमारी अपनी बच्ची! पांच साल पहले एक हादसे में इसकी मौत हो गई थी.." वो भर्राए गले से बोला।

"क्या???" विनय हड़बड़ाया.."तो फिर वो लड़की..!!"

"..... मेरी पत्नी और मैं उस दुख से उबर ही नहीं पा रहे थे। हमारे आपसी रिश्ते भी खराब हो रहे थे। फिर एक दिन हमें एक पार्टी में ये बच्ची भटकती हुई मिली। अनाथ थी उसे चोट भी आई थी..हम उसे अपने साथ शहर ले आए। पर उसका कोई नहीं था..न जाने क्यूं उससे एक जुड़ाव सा लगने लगा और हमने सारी औपचारिकताओं के बाद उसे गोद ले लिया और उसे अपनी बच्ची का नाम दिया "अर्शिया"!

तो ये लड़की उनकी अपनी संतान नहीं थी!

अब विनय की कोई खास ईच्छा नहीं थी मिसेज वर्मा से मिलने की।

,

"पापा!" अर्शिया जाने कब वहां आ गई थी जैसे हवा से प्रगट हुई हो।

"हां बेटा!"

"ममा आपको बुला रही हैं" वो अपने पिता से बोल रही थी पर उसकी नज़रे विनय पर ही स्थिर थी

वो पलकें नहीं झपकाती थी...

"आप बहुत ब्रेव हैं" वो मुस्कुराती सी बोली।

जवाब में विनय भी मुस्कुराया।

"मुझे ब्रेव लोग पसंद हैं"

विनय सवालीया नज़रों से उसे घूरने लगा।

कुछ तो अजीब था!

"डरपोक लोगों के साथ मज़ा ही नहीं आता...वो कमजोर होते हैं न" वो मानो खुद से बड़बड़ा रही हो। विनय उसे गौर से देख रहा था। क्या ये सब सिर्फ एक नौ साल की बच्ची की बे सिर पैर की बातें थीं? या इन सबका कुछ मतलब था!

"पर कोई भी पूरी तरह बहादुर तो नहीं होता न.. हर कोई किसी न किसी बात से तो डरता ही है...आप किस चीज़ से डरते हैं...'अंकल'?" वो विनय को घूरती हुई बोली। उसकी आंखों में देखते वक्त विवेक को लग रहा था मानो उसकी स्कैनिंग हो रही हो।

"जब मैं स्कूल में था तो स्कूल से घर आते वक्त अक्सर एक पागल कुत्ता मुझे देख कर भौंकता था। वो भयानक था, बड़ा सा काले रंग का! एक बार तो वो बस मुझे काटने ही वाला था...मुश्किल से बचा!" विनय हल्के मूड में बोला..."बस वही मेरी जिंदगी का पहला और आखरी डर था" विनय ने बात खत्म की। अर्शिया अब भी उसे संदेह से घूरे जा रही थी।

"अच्छा है कि अब आप नहीं डरते..ब्रेव मैन!" वो बोली और पलट ,

के वापस जाने लगी।

विनय को लगा ये उसका वहम ही था या शायद अर्शिया की आखिरी लाईन में कुछ चैलेंज का पुट था!

"कहां गुम हो? मैं ही बोली जा रही हूं इतनी देर से.." दिया झुंझलाई। वो विनय के साथ एक रोमांटिक डिनर डेट पर थी।

"अरे कुछ नहीं बस...मैं तो तुम्हें ही देख रहा था"

"अच्छा सुनो.." वो गंभीर स्वर में बोली "तुम्हें कुछ बताना था.."

विनय ने उसे बोलने का इशारा किया। वो विनय की आंखों में देखती हुई बोली..."हमारी शादी होने जा रही है..मैं तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहती...मेरा एक ब्वायफ्रैंण्ड..."

"दिया.." विनय उसकी बात काटता हुआ बोला "मुझे नहीं सुनना..वो जो भी था तुम्हारा पास्ट था। हम अभी क्या हैं ये मायने रखता है...ओके?"

दिया ने सहमति में सर हिलाया। उसका बहुत मन हो रहा था कि वो विनय से भी उसके पास्ट के बारे में पूछे। वो बस उसे अच्छी तरह जानना चाहती थी। पर विनय ने बात ही खत्म कर दी।

दिया को उसके घर ड्राप करके विनय अपने घर आ गया। वो बहुत अच्छे मूड में था। दिया के साथ गुज़ारा हर पल उसके लिये बेशकीमती था। उसने गाड़ी पार्क की और लाॅक करने लगा तभी...

उसे अपने पीछे एक तेज तीखी गुर्राहट सुनाई दी....

वो पलटा और थमक के खड़ा हो गया।

सामने एक भयानक बड़ा सा काला कुत्ता खड़ा था!!!
 
विनय कुछ सोचता इसके पहले उसका चौकिदार आ गया और उस कुत्ते को भगा दिया। दिया के साथ डिनर के बाद से वो अर्शिया को भूल ही गया था। पर अब मन में अजीब अजीब खयाल आ रहे थे।

आज ही उसने उस रहस्यमयी बच्ची को अपने बचपन के उस काले

कुत्ते वाली घटना के बारे में बताया था और आज ही एक भयानक काला कुत्ता उसे दिख भी गया! क्या ये महज संयोग था? या कुछ और?

"मैं कुछ जादा ही सोच रहा हूं" उसने खुद को समझाया। वो काफी देर तक दिया से चैट पर बातें करता रहा फिर सो गया।

देर रात उसकी नींद खुली! एक बहुत धीमी ठकठकाने की आवाज़ आ रही थी। वो लिविंग रूम में आ गया।वहां सब शांत था। अंधेरा था। उसने देखा ड्राईंग रूम की बत्ती जल रही थी और वो "ठक ठक" करती आवाज़ भी वहीं से आ रही थी। वो ड्राईंग रूम में पहुंचा और....उसके सदमें की कोई सीमा नहीं थी....

ये नहीं हो सकता...तुम तो मर चुके हो..

सोफे पर उसका सौतेला शराबी बाप बैठा था जो कि कब का मर चुका था। उसके एक हांथ में बेंत थी जिससे वो सामने मेज को ठकठका रहा था। उसने सर उठाया और सीधा विनय की आंखों में देखा...

विनय मानो जड़ हो चुका था! वो तो भूल ही गया था कि सामने बैठे इस इंसान ने उसे कितनी यातनाएं दी थी! उसका बचपन खराब किया था..उसे मारा पीटा था..बचपन में इसके डर से कई बार तो वो घर ही नहीं आता था...

वो सोफे से उठ खड़ा हुआ और गुस्से से घूरता, दांत किटकिटाता हुआ विनय की तरफ बढ़ने लगा...वो बेंत हवा में लहरा रहा था....

विनय का दिमाग शून्य हो चुका था। अचानक उसके सीने में दहशत की ठंडी लहरें उठने लगीं। अब वो उसे मारेगा...तो वो क्या करे? मां को आवाज़ दे? नहीं नहीं...मां आ गई तो ये उसे भी मारेगा...भाग जाता हूं..मैं यहां खड़ा क्यों हूं! मुझे भागना होगा... पर रुको!

"तुम मर चुके हो.." विनय कड़वाहट से बोला और पत्थर की तरह स्थिर खड़ा हो गया .."अब मैं नहीं भागूंगा..तुम मेरा कुछ नहीं

बिगाड़ सकते..."

वो अब विनय के बिलकुल नज़दीक आ चुका था..

उसके सौतेले बाप ने बेंत वाला हाथ उठाया विनय ने आंखें बंद कर ली "नहीं ये सच नहीं है....

उसने आंखे खोली उसका बाप गायब हो चुका था। उसने एक लंबी सांस ली..जाने क्या हो रहा था। अपने बेडरूम में जाने के लिये वो पलटा और चिहुंक के खड़ा हो गया।

पीछे उसका बाप खड़ा था और अब उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कुराहट थी।

अचानक उसके चेहरे से.. शरीर से नीली लपटें उठने लगीं। वो जलने लगा और दोनो हाथ फैलाये विनय की तरफ बढ़ने लगा.... "तुम्हें, मुझे बचाना चाहीये था...विनय.." विनय को एक तीखी फुसफुसाहट सुनाई दी जो उस जलते हुए शरीर से आ रही थी...वो बढ़ा चला आ रहा था....

विनय ने भाग के ड्राईंग रूम का बाहरी दरवाज़ा खोला और बाहर आ कर एक झटके से उसे बंद कर दिया। वो उस दरवाजे पर टिक कर जोर जोर सें सांसें लेने लगा। उसके अंदर डर, दर्द, अपराधबोध और पछतावे का एक मिला जुला अहसास था जो घुमड़ रहा था।

ये सब क्या हो रहा है.... वो खीजता सा बोला।

उसकी विधवा मां ने गलती से एक शराबी और खुंदकी इंसान से दुबारा शादी कर ली थी। उस हैवान को विनय को टाॅर्चर करने में बहुत मज़ा आता था जो उस वक्त महज़ सात साल का बच्चा था। वो शराबी एक स्टेशन मास्टर था। एक बार उसकी पोस्टिंग ऐसी जगह हो गई थी जहां स्टेशन पर रात के वक्त एक खतरनाक "मुर्दों की ट्रेन" आती थी। एक रात विनय के देखते देखते उसका बाप उन मुर्दोंं का शिकार हो कर जल गया था। और विनय ने एक चाय की

दुकान में छुप कर अपनी जान बचाई थी!
 
विनय वो सब भुला चुका था पर आज वो जानी पहचानी सी दहशत फिर से दिलो दिमाग पर हावी होने लगी थी।

उसने आंखें खोलीं और सामने एक और हौलनाक नज़ारा उसका इंतज़ार कर रहा था...

वो अपने घर के बरामदे में नहीं बल्कि उसी चाय की दुकान में खड़ा था। जहां वो उस रात छिप गया था। उसने हैरानी से सब तरफ नज़रें दौड़ाई। सब कुछ तो वैसा ही था!

वो बाहर आ गया और पलट कर घूरने लगा। कई बार पलकें झपकाई और देखा। वो अपने घर को नहीं बल्कि उस चाय दुकान को घूर रहा था। तभी! उसे अपने पीछे किसी के होने का एहसास हुआ..वो पलटा और..बस..देखता रह गया.....

सामने सैकड़ों की तादाद में जले हुए मुर्दे खड़े थे। काले चितकबरे डरावने से! सब अपनी मटमैली सफेद आंखों से उसे ही घूर रहे थे। विनय को उनके पीछे के लाल रंग की पुराने ज़माने की ट्रेन की झलक भी मिल रही थी।

अचानक वो मुर्दे अपनी जगह से खिसकने लगे। कोई पीछे से, उनके बीच से निकलता हुआ सामने आ रहा था जिसे वो जगह दे रहे थे।

वो दिया थी!!!

"दि..या..वो फंसी हुई आवाज़ में बोला.."तुम..ये..

दिया बिलकुल उसके सामने आ कर खड़ी हो गई थी। उसने दुल्हन वाला लिबास पहन रखा था। उसका चेहरा भावहीन था मानो वो नींद में चल रही हो।

"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया..." वो गूंजती हुई आवाज में बड़े ही भावहीन लहजे में बोली।

,

"तुमने मुझे धोखा दिया...झूठ बोला.." वो फिर सपाट लहजे में बोली।

विनय बेचारगी से सर हिलाने लगा..उसका चेहरा दर्द से सफेद पड़ गया था।

"दिया मेरी बात सुनो..दिया! मैं सब बताने ही वाला था...

"अब इन सबका कोई फायदा नहीं विनय..मैं जा रही हूं..भूल जाओ मुझे..." दिया बोली और पलट कर चल दी। सारे मुर्दे भी उसके पीछे चल दिये। वो वापस उसी ट्रेन में जा रहे थे। उसे दिया उनके बीच अब दिख भी नहीं रही थी। पुराने जमाने का भाप वाला इंजन चालू हो गया।

"दिया रूक जाओ दिया...दिया मेरी बात सुनो... विनय ज़ोर से चिल्लाया...

ट्रेन आगे बढ़ रही थी...

"नहीं दिया!!!! दिया!!..." वो पूरी ताकत से चिल्लाया....

किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो चिहुंक के पलटा। वो उसका नौकर था।

"साहब! क्या हुआ साहब? आप इतनी रात गए घर से बाहर..? सब खैरीयत तो है???

विनय हड़बड़ाया...चारों तरफ देखने लगा। वो अपने घर के लान में खड़ा था।

वो ट्रेन ? वो मुर्दे? और दिया ? वो सब क्या था!!!!!

उसने हाथ से अपना माथा पोछा। वो पसीने में भीग चुका था। उसका नौकर भी घबराया सा लग रहा था।

"साहब आप चीख रहे थे..?"

"तुम जाओ यहां से..मैं ठीक हूं" विनय बोला और जल्दी से घर के अंदर आ गया।

,

वो अपने ड्राईंग रूम में बैठा था जहां अभी कुछ ही देर पहले उसने अपने शराबी बाप को देखा था। वो अब काफी संभल चुका था। तभी जोर से फोन की घंटी बजी जो रात के सन्नाटे में और भी तेज सुनाई दी। विनय ने फ़ोन उठाया

"हैलो?"

पहले तो कोई आवाज़ नहीं आई फिर ऐसी आवाज आने लगी जैसे लाईन डिस्टर्ब थी।

"हैलो..कौन है??" विनय थोड़ा चिल्लाते हुए बोला।

अब किसी के फुसफुसाने की आवाज आई। न जाने उस फुसफुसाहट में ऐसा क्या था! विनय के रोंगटे खड़े होने लगे।

फिर एक तीखी फुसफुसाहट का स्वर उभरा...

"तुमने झूठ बोला था....

तुम बस उस काले कुत्ते से डरते हो..

तुम्हारे और भी डर हैं जो कि जादा...डरावने हैं..हैं न?"

"कौन हो तुम" विनय सहमी सी आवाज़ में बोला।

"मुझे सब पता है...."

और एक तीखी हंसी का स्वर सुनाई दिया जैसे बहुत सी जंज़ीरें आपस में टकरा रही हों... जिसे सुन कर विनय को लगा मानो किसी बर्फ के टुकड़े ने उसके दिल को भेद दिया हो।

वो भयानक रात किसी तरह गुज़र गई थी। विनय अपने आफिस में बैठा था। वैसा ही मुस्तैद! उसे देख कर कोई नहीं बता सकता था कि पिछली रात उस पर कैसी बीती थी। तभी एक कांस्टेबल आया और उसे एक कागज़ दे गया।

वो उसकी टेलीफोन लाईन का रिकार्ड था।

उसने देखा कि उसमें पिछली रात 2:45 बजे की कोई काल दर्ज ,

नहीं थी!!

फिर फोन पर वो आवाज़ किसकी थी!

उसका अतीत बहुत ही दुखद था। जिससे लड़ते जूझते वो यहां तक पहुंचा था। पर इस बारे में उसने कभी किसी से बात नहीं की थी यहां तक की दिया से भी नहीं! फिर पिछली रात के वो सारे विज़न्स! वो डरता नहीं था पर इन सबसे गुज़रने के बाद उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई पुराना घाव खुल गया हो...

अब उसे पूरा यकीन था कि इन सबके पीछे अर्शिया ही है। स्कूल बस का एक्सीडेंट हो जाना और सिर्फ उसका बच जाना कल तक उसे बहुत सामान्य लग रहा था। पर कुछ गड़बड़ जरूर थी। उसे अर्शिया की बात याद आई...

"वो मेरी हंसी उड़ा रहे थे और मुझे ये पसंद नहीं...

फिर उसे वर्मा परिवार के नौकर की बातें याद आईं। "घर में पूजा होने वाली थी"...हो तो नहीं पाई!!

"नहीं! वो बच्ची सामान्य नहीं है और शायद दूसरों के लिये खतरा भी है! सब पता करना होगा..वो कहां से आई है? कौन है? उसके असली माता पिता कौन है?" विनय ने मन ही मन सोचा...

पर वो नहीं जानता था कि खुद अर्शिया भी यही चाहती थी!
 
इंस्पेक्टर विनय ने मनोज वर्मा के आफिस में कदम रखा। मनोज वर्मा अर्शिया नाम की रहस्यमयी बच्ची का पिता था जिसने उस बच्ची को गोद लिया था। लगभग एक हफ्ते पहले विनय ने उस बच्ची की जान बचाई थी(कम से कम उसे तो यही लगता था) तब से विनय का दिमाग उसी बच्ची में उलझा हुआ था। दो दिन पहले जब वो उस बच्ची से मिला था उसी रात उसे बहुत ही डरावने विज़न्स आए थे और वो ठान चुका था कि वो उस बच्ची के बारे में सब पता लगा कर रहेगा।

"अरे आप! फिर से?" मनोज वर्मा थोड़ी नापसंदगी से बोला।

"हां मैं" विनय थोड़ा कठोर स्वर में बोला "ऐनी प्राबलम?"

"मुझे लगा पूछताछ पूरी हो चुकी है, आप अर्शिया से मिले तो थे दो दिन पहले" वो असंतोष से बोला।

"हां पर आज मैं अर्शिया से नहीं आपसे मिलने आया हूं..."

"बैठीये" वो अनमने ढंग से बोला

"तो अर्शिया आपको एक पार्टी में मिली थी? राईट?" विनय ने पूछा।

"इन सबका उस स्कूल बस हादसे से क्या लेना देना?" वो बोला।

विनय ने उसे घूर कर देखा।

"हां वो..मेरे एक क्लाइन्ट की मैरीज एनिवर्सरी की पार्टी थी"

"कहां?" विनय ने पूछा

"भाटिया फार्म हाउस। मिस्टर जयंत भाटिया, मेरे क्लाइंन्ट हैं। यहां से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर रिंग रोड पर उनका फार्म हाऊस है..आलीशान! उसी पार्टी में वो बेचारी बच्ची भटक रही थी। उसने जरा सा खाना क्या चुरा लिया इवेंट मैनेजर ने उसे बहुत डांटा। फिर मेरी रिक्वेस्ट पर मिस्टर भाटिया ने उसे वहीं रूकने दिया। फिर हम उसे घर ले आए आगे तो मैं आपको बता ही चुका हूं"

"तारीख क्या थी तब?" विनय ने पूछा।

"बीस फरवरी"

विनय उसे गौर सा देखता हुआ बोला.."आपके घर में सबकुछ सामान्य है? उस लड़की के आने के बाद से??"

वो साफ साफ परेशान दिखने लगा।

"वो..वो मेरी बीवी उसे पसंद नहीं करती" वो धीरे से बोला।

"क्यों?" विनय ने पूछा।

"बोलते हुए अजीब लग रहा है...पर वो उससे..शायद डरती.."

बाकि की बात उसके मुंह में ही रह गई। विनय चौंकते हुए इतनी तेजी से उठा कि उसकी कुर्सी पीछे गिर गई।

"क्या हुआ?" वो हकबकाया सा पूछा।

मनोज वर्मा जहां बैठा था उसके पीछे एक खिड़की थी। सामने बैठे विनय का पूरा ध्यान मनोज वर्मा पर था..एक सेकेंड को उसकी नज़र खिड़की पर पड़ी तो वो उछल पड़ा।

वहां अर्शिया का अंदर झांकता हुआ चेहरा था!!

"क्या हुआ इंस्पेक्टर?" मनोज वर्मा ने दुबारा पूछा। अर्शिया अब नहीं दिख रही थी। पर विनय धाड़ धाड़ बजते दिल के साथ धीरे धीरे खिड़की के पास आया और वहां से बाहर देखने लगा।

,

वो नौवी मंज़िल की खिड़की थी जो रोड की तरफ खुलती थी जिसके नीचे न कोई सीढ़ी थी और न ही बालकनी!!

वो वहां कैसे पहुंची!!!

"सर आज से लगभग डेढ़ साल पहले बीस फरवरी की रात रिंग रोड पर एक भयानक एक्सीडेंट हुआ था। ट्रक और बस की भिड़ंत हुई थी..बस के सारे यात्री और ट्रक के हेल्पर की आॅन द स्पाट डेथ हो गई थी। वो एक्सीडेंट की लोकेशन भाटीया फार्म हाऊस से तेरह किलोमीटर की दूरी पर है। सर इस एक्सीडेंट के अलावा उस डेट के आस पास भाटीया फार्महाउस से रीलेटेड कोई और खास बात नहीं है" सब इंसपेक्टर अर्जुन बोला।

विनय अपने आफिस में बैठा था जब उसके सब इंस्पेक्टर ने उसे ये जानकारी दी।

"हम्म्म..." विनय आह भरता सा बोला... "तो एक और एक्सीडेंट!!

विनय उस ट्रक ड्राईवर से भी मिलने गया जो कि अब पागल हो चुका था और सरकारी पागलखाने में था। उससे भी कुछ खास पता नहीं चला। बस उसे हर जगह 'एक बच्ची' दिखाई देने लगी थी। इन सबमें तीन दिन बरबाद हुए। विनय वापस लौट रहा था। शाम हो रही थी। उसने दिया से मिलने का सोचा जो उसकी मंगेतर थी।

"ओ...हो! याद आ गई मेरी!" वो थोड़ी नाराज़गी दिखाती हुई बोली। विनय बस अभी उसके फ्लैट पे पहुंचा ही था। शाम हो रही थी। दिया दूर खड़ी उसे घूर रही थी। विनय आगे बढ़ा और उसे बाहों में भर लिया। दिया भी मुस्कुराती हुई उससे लिपट गई। तीन दिनों में पहली बार उसे थोड़ा सुकून महसूस हुआ।

"मम्मी!!!" दिया अचानक चिल्लाई। विनय ने हड़बड़ा कर उसे छोड़ दिया और पलट कर देखने लगा। वहां कोई नहीं था। दिया शरारत से हंसने लगी।

"आज तुम डिनर के लिये रुक रहे हो। मम्मी पापा एक महीने के ,

लिये बाहर गए हैं.." दिया किचन में जाती हुई बोली।

"फिर डिनर क्यों...रात में भी यहीं रुक जाता हूं" विनय डाईनिंग टेबल की एक कुर्सी पर बैठता हुआ शरारत से बोला। जवाब में दिया ने उस पर ग्लास फेंका जो कि उसने लपक लिया। तभी विनय की नज़र टेबल पर पड़े एक बड़े से सफेद कागज़ पर पड़ी। उसने उसे उठा लिया। वो विनय का ही पेंसील स्केच था!

"तुमने मेरी बाइसेप्स कुछ जादा ही नहीं बना दी..इतने के लिये तो मुझे हर रोज़ हंड्रेड डीप्स एक्स्ट्रा मारने होंगे"

"मुझे स्केचिंग कहां आती है.." दिया कमरे में आई। उसके हाथों में काॅफी के दो मग थे।

"वो तो अर्शिया ने बना दिया...
 
विनय के हाथ से वो स्केच छूट गया। उसे लगा जैसे उसका दिल गले में आकर धड़कने लगा हो। अचानक दिया के मुंह से अर्शिया का नाम सुन कर वो दहल गया।

"अर..शिया..?" वो अनिश्चितता से बुदबुदा।

"अरे हां तुमको कैसे मालूम होगा! तुम तो बाहर थे दो तीन दिन से...बेचारी बच्ची! उसके बाप ने, कोई मनोज वर्मा है उसकी मां अमृता पर जानलेवा हमला किया फिर वो अर्शिया के भी पीछे पड़ गया। वो तो पड़ोसीयों ने बचा लिया वरना अनहोनी हो जाती" वो गंभीर स्वर में बोली।

"तो अब अर्शिया कहां है?" विनय ने पूछा पर वो जवाब सुनने से घबरा रहा था..

"फिलहाल हमारे ही आॅरफनेज(अनाथआश्रम) में और कहां..मैंने बात की है उससे। बहुत ही प्यारी है..."

दिया एक एनजीओ की एक्टिव मेंम्बर थी जो अनाथ बच्चों के लिये काम करता था।

"तुमने बात की उससे?" विनय ने कोशिश की कि उसकी घबराहट उसके चेहरे पर न दिखे।

,

"हां बहुत सारी" दिया अपने काॅफी के मग से खिलवाड़ करती हुई आराम से बोली।

"वो आॅरफनेज में नई थी न और अकेली भी तो मुझे उसे कंफर्टेबल तो करना ही था न..."

विनय को याद आया कि जब वो अर्शिया से मिलकर लौटा था तो उस रात उसकी क्या हालत हुई थी....

"मैं आज रात यहीं रुक रहा हूं.." वो जल्दी से बोला

दिया को काफी पीते हुए जोर का ठसका लगा।

"व्हाट!!! आर यू मैड!!" वो हैरानी से बोली

"एम सीरीयस" विनय गंभीर आवाज़ में बोला।

दिया ने अपनी बाहें उसके गलें में डाल दी

"क्या इरादे हैं दरोगाजी!!!" वो मुदित स्वर में बोली...

रात के दो बज रहे थे। दिया अपने कमरे में आराम से सो रही थी। बाहर लीविंग रूम में सोफे पर विनय लेटा हुआ था। पर उसकी आंखों नींद का नामो निशान न था....

अर्शिया अब दिया तक पहुंच गई थी!!

सैकड़ों अनाथ आश्रम होंगें इस शहर में पर उसे दिया के पास ही आना था!! क्यों?

वो बेचैनी से करवट बदला।

अच्छा खासा मनोज वर्मा! पेशे से लीगल एडवाईज़र! अचानक पागल हो गया और अपनी ही पत्नी पर हमला कर बैठा! ये अर्शिया की ही करतूत होगी...वो लड़की कुछ भी कर सकती है...
 
उस रात जो हुआ था उसका अंदाजा लगाना अब जादा मुश्किल नहीं था। जरूर अर्शिया ही उस ट्रक-बस हादसे की जिम्मेदार थी। ,

फिर वो भटकती हुई भाटिया फार्महाउस जा पहुंची जो पास ही था। जहां उसे मनोज वर्मा और उसकी पत्नी मिले गए।

बड़ी सज़ा मिली उन बेचारों को एक "बेचारी अनाथ बच्ची" पर दया दिखाने की!

वो उठ कर बैठ गया। नहीं! चाहे कुछ भी हो जाए। वो दिया पर आंच नहीं आने देगा। वो कल सुबह ही दिया से बात करेगा और उसे सबकुछ समझा देगा। अर्शिया किसी जहरीली मकड़ी की तरह उसके ईर्दगिर्द जाले बुन रही थी और वो उसमें फंसता ही जा रहा था...पहले उसके खुद के दिमाग से खिलवाड़ और अब वो दिया तक आ पहुंची थी।और अब जरूरी हो गया था कि अर्शिया के असली मां बाप का पता चले....

तभी बाहर रोड पर कोई वाहन गुजरा जिसकी तेज़ लाईट लीविंग रूम की बालकनी पर पड़ी। विनय चौंक गया।

बालकनी के पर्दों के पीछे एक लंबा काला साया खड़ा था!!!

विनय ने साईड टेबल से अपनी सर्विस रिवाल्वर उठा ली उसका सेफ़्टी कैच हटाया और धीरे धीरे बाल्कनी की तरफ बढ़ने लगा...उसने बालकनी का दरवाज़ा खोला और धीरे से बाहर आया। वहां कोई नहीं था। उसने आस पास चेक किया।

यहीं तो था कोई!! कहां गया!

विनय सोच ही रहा था कि अंदर से फोन की घंटी सुनाई दी। विनय वापस लीविंग रूम में आ गया।

इस वक्त कौन होगा!!

"हैलो!..उसने फोन उठाया और.... एक जानी पहचानी सी दहशत फिर से उसे जकड़ने लगी...

फोन पर फिर से तीखी फुसफुसाहटें सुनाई दे रही थीं जैसे बहुत से ,

लोग आपस में फुसफुसा कर बातें कर रहे हों!

फिर उसे एक साफ...तीखी..कर्कश..फुसफुसाहट सुनाई दी...

"तुम्हें क्या लगता है...साथ रह कर बचा लोगे उसे??

विनय फोन पकड़े पकड़े जड़ हो गया था। वो सांस लेना तक भूल चुका था...

....."और तब क्या होगा जब वो अकेली होगी...

फिर एक हंसी का स्वर उभरा..मानो सैकड़ों जंजीरें आपस में टकरा रही हों.....

एक पल बाद विनय थोड़ा संभला फोन वापस पटका और भाग के दिया के रूम में पहुंचा।

वो दीन दुनिया से बेखबर आराम से सोई पड़ी थी। विनय उसके पास ही एक ईज़ी चेयर पर बैठ गया।

"गुड मार्निंगगग....वो अंगड़ाई लेती हुई मुस्कुराई। सुबह हो गई थी।

"जल्दी उठ गए?" दिया ने पूछा

"हां बस..अभी उठा" विनय बोला। उसने नहीं बताया कि वो रात भर उसके पास बैठा उंघता रहा।

कुछ देर बाद दोनों डाईनिंग टेबल पर चाय के साथ बैठे थे। विनय सोच ही रहा था कि वो कैसे अपनी बात शुरू करे...तभी उसका मोबाईल बजा। कंट्रोलरूम से फोन था। विनय बात करता हुआ खड़ा हो गया।

...ओके ओके...यूनीट तैयार करो मैं बस पहुंच ही रहा हूं.."

वो दिया की तरफ मुड़ा। वो हैरान दिख रही थी।

"दिया मुझे तुरंत पहुंचना होगा। सुनो..मेरी बात ध्यान से सुनो..उस..उस लड़की से दूर रहो..ठीक है! अर्शिया से दूर रहो और हो सके तो उसे दूसरे बच्चों से भी दूर रखो"

"क्या?" दिया अचकचाई "पर हुआ क्या?"

,

"पूरी बात बताने का वक्त नहीं मुझे तुरंत कहीं जाना है पर..." उसने दिया का हाथ अपने हाथों में ले लिया.."प्रामिस मी कि तुम आज उस से दूर रहोगी..मैं शाम को लौट कर तुम्हें सब बताता हूं"

"ओक रिलैक्स" वो उसका हाथ दबाती हुई बोली।

विनय ने एक बार उसे गले लगाया फिर जल्दी से चला गया। उसके आधे चाय को छोड़े हुए कप को देखती दिया सोच रही थी... ये अर्शिया को कैसे जानता है!
 
Back
Top