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शीला की लीला (५५ साल की शीला की जवानी)

उस रात.. खरीदी हुई ब्रा ट्राय करते वक्त वैशाली ने पीयूष को बहोत याद किया.. काफी सारे हॉट मेसेज भेजें चैट पर.. सुबह जल्दी उठना था इसलिए दोनों ने एक दूसरे को गुड नाइट विश किया और सो गए..

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सुबह के साढ़े नौ बजे वो सब निकल गए.. रास्ते से पिंटू को भी ले लिया.. मदन अब शीला और वैशाली के साथ पीछे बैठ गया और पिंटू पीयूष के साथ.. ड्राइव करते हुए पीयूष पिंटू के साथ बातें कर रहा था.. पीछे बैठी वैशाली भी उनकी बातों में जुड़ रही थी.. अब वैशाली पिंटू के साथ काफी साहजीक हो चुकी थी..

रास्ते में एक बढ़िया से होटल में लंच लेने के बाद तीनों दोपहर के ढाई बजे मौसम के घर पहुंचे..

घर में प्रवेश करने से पहले.. ऊपर के मजले की बालकनी से मौसम ने पीयूष की तरफ देखा.. पीयूष और मौसम की आँखें चार हुई.. यादों के.. ख्वाबों के.. वादों के.. अनगिनत विचारों से दोनों के मन और दिल तरबतर थे.. कल मौसम की सगाई थी..

शीला के आते ही पूरा घर जैसे खुशी से जगमगा उठा था.. सुबोधकांत तैयारिओ में व्यस्त थे.. अब तक पीयूष इस घर का इकलौता दामाद होने का लुत्फ उठा रहा था लेकिन अब उसका ये एकाधिकार खत्म होने वाला था..

पिंटू तो गाड़ी से उतरकर अपने घर चला गया.. क्योंकि वो तो इसी शहर में रहता था.. हालांकि एक बार वैशाली ने उसे रुकने के लिए आग्रह जरूर किया पर पिंटू ने बड़ी ही नम्रता से इनकार करते हुए कहा की वो कल सगाई के वक्त पहुँच जाएगा

वैशाली दौड़कर ऊपर के कमरे में गई.. जहां मौसम और फाल्गुनी तैयारी में जुटे हुए थे.. वैशाली को देखकर दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा.. दोनों को देखकर वैशाली भी भावुक हो गई.. तीनों एक दूसरे से गले मिलें..

फाल्गुनी: "वैशाली.. माउंट आबू की तरह आज रात को भी हम तीनों साथ ही सो जाएंगे.. "

मौसम: "वैसे भी आज महंदी की रात है.. देर तक जागना पड़ेगा.. और हम तीनों के सोने का इंतेजाम मेरे कमरे में ही किया गया है"

तीनों बातों में मशरूफ़ थी तभी मौसम के मोबाइल की रिंग बजी.. पीयूष का फोन था.. मौसम ने वैशाली और फाल्गुनी के सामने ही नॉर्मल-फॉर्मल बातचीत करके फोन रख दिया.. पर वैशाली के ध्यान में ये बात आई की फोन रखने के बाद मौसम एकदम से गंभीर हो गई थी

फाल्गुनी हर थोड़ी देर के बाद पानी या नाश्ता लाने के बहाने नीचे जाती और सुबोधकांत को अपना सुंदर सा मुखड़ा दिखाकर.. प्यार का एग्रीमेंट रीन्यू कर आती..

साढ़े आठ बजे सब ने डिनर खतम किया.. नौ बजे तक बातें करने के बाद सब सोने की तैयारी करने लगे.. शीला के भरे भरे पयोधरों ने मौसम के घर को जीवंत बना दिया था.. जैसे परवाने ने पूरे गुलशन को जवान कर दिया हो.. शीला को पता था की सुबोधकांत की नजर उस पर ही टिकी हुई थी.. और उसे अच्छा भी लग रहा था.. पिछली बार जब वो यहाँ आई थी तब जिस तरह सुबोधकांत ने उसे घोड़ी बनाकर गराज में चोद दिया था.. वो याद आ गया उसे..!!

पीयूष और सुबोधकान्त ऊपर के मजले में बने दूसरे बेडरूम में सोने वाले थे.. बगल वाले कमरे में फाल्गुनी, वैशाली और मौसम थे.. साथ में तीसरा कमरा जहां पर मदन और शीला की व्यवस्था की गई थी.. कविता अपनी मम्मी के साथ नीचे के कमरे में सोने वाली थी.. जानबूझकर कविता ने ऐसा सेटिंग किया था क्योंकी उसे पता था की मम्मी तो दस मिनट में सो जाएगी.. फिर वो आराम से बाहर झूले पर बैठे बैठे पिंटू से बात कर सकेगी..

महंदी लगाने वाली लड़की ग्यारह बजे आने वाली थी.. उसका इंतज़ार करते करते वैशाली, मौसम और फाल्गुनी बातें कर रहे थे.. कविता नीचे किचन का काम निपटा रही थी..

फाल्गुनी: "मौसम, तू आज अचानक इतनी सिरियस क्यों हो गई है?? कल तो तेरी सगाई है.. वहाँ भी ऐसा उतरा हुआ मुंह लेकर जाएगी तो तरुण को लगेगा की तू उससे खुश नहीं है"

मौसम: "नहीं यार.. ऐसा कुछ नहीं है.. "

वैशाली: "वो नहीं बताएगी फाल्गुनी.. शायद तरुण ने उसे बूब्स पर काट लिया है इसलिए दर्द के कारण वो अपसेट है.. !!"

मौसम: "अरे यार ऐसा कुछ भी नहीं है.. उस बेचारे ने तो देखें तक नहीं है..काटने की तो बात ही दूर है.."

फाल्गुनी ने मज़ाक करते हुए कहा "अच्छा तो इसलिए अपसेट है की अब तक वो देख नहीं पाया??"

इस मज़ाक मस्ती भारी बातचीत के बीच.. वैशाली नहाने के लिए बाथरूम में चली गई..

मौसम अब फाल्गुनी के एकदम करीब आकर बैठ गई और एकदम धीमी आवाज में बोली "फाल्गुनी, मुझे तुझसे कुछ बात करनी है.. एकदम टॉप सीक्रेट है.. वैशाली को भी नहीं पता चलना चाहिए"

फाल्गुनी: "अच्छा.. तो तू इसलिए टेंशन में लग रही थी.. !! क्या बात है मौसम.. ?? मैं किसी को नहीं बताऊँगी.. "

मौसम ने गला साफ किया.. मुश्किल बात की शुरुआत करने का ये एक तरीका है.. बात करने से पहले गला साफ करना.. बात का महत्व और बात करने वाले की हिम्मत/डर दर्शाता है

फाल्गुनी बेसब्री से मौसम की बात कहने का इंतज़ार कर रही थी.. उसे इतना तो पता चल गया की वो जो कुछ भी कहने वाली थी वो बड़ा ही स्फोटक था.. कहीं मौसम को उसके और अंकल के संबंध के बारे में तो पता नहीं चल गया?? सोचकर ही फाल्गुनी मौसम से भी ज्यादा गंभीर हो गई.. उसका दिल बड़ी जोरों से धड़कने लगा..

मौसम: "अब तुझे कैसे बताऊँ.. !! यार तू किसी को बताना मत.. वरना बहोत सारी ज़िंदगीयां बर्बाद हो जाएगी.. "

फाल्गुनी: "अब तू कुछ बता तो मुझे पता चलें"

मौसम: "बात दरअसल ऐसी है की.. (फाल्गुनी की हथेली अपने हाथ में लेकर दबाते हुए).. मैं पीयूष जीजू को लाइक करती हूँ.. हम जब माउंट आबू गए थे.. तब राजेश सर ने मुझे और जीजू को गिफ्ट लेने भेजा था.. तब जीजू ने मुझे प्रपोज किया था.. घर से दूर आजाद माहोल में.. मैं भी अपने होश गंवा बैठी और उन्हें रोका नहीं.. उन्हों ने मुझे किस किया था और मेरे दबाए भी थे.. "

फाल्गुनी: "ओ बाप रे.. फिर क्या हुआ?"

मौसम: "यार जीजू मेरे पीछे पागल हो गए है.. और सच कहूँ तो मैं भी उन्हें बहोत पसंद करती हूँ.. मैंने अपने आप को समझाने की और रोकने की बहोत कोशिश की पर.. जीजू के साथ एक बार सेक्स करने की मुझे बहोत इच्छा है पर चांस नहीं मिलता"

फाल्गुनी: 'उसमें मैं कैसे तेरी मदद करूँ?" मौसम, आई एम सॉरी पर तेरे गलत कामों में.. अगर मैंने तेरा साथ दिया तो कविता दीदी के साथ कितना बड़ा धोखा होगा.. !!"

मौसम: "मुझे पता है यार.. पर मैं जीजू को प्रोमिस कर चुकी हूँ की सगाई से पहले मैं उनके साथ एक बार सेक्स करूंगी.. तब मुझे कहाँ पता था की इतनी जल्दी सगाई हो जाएगी.. !! और सगाई के बाद मैं ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिससे तरुण की नज़रों में गिर जाऊँ.. तू मेरी सहेली है इसलिए तेरी मदद चाहती हूँ.. तू महंदी वाली उस लड़की के घर लेने जाने के बहाने वैशाली को साथ ले जा.. पापा तेरे साथ आएंगे कार लेकर.. उस लड़की का घर तूने देखा ही है.. पर उलटे सीधे रास्ते ले जाकर ऐसा कुछ कर की तुम लोगों को लौटने में एक घंटा लग जाए.. तब तक मैं अपना काम निपटा लूँगी"

फाल्गुनी: "यार मैं तेरी मदद करना तो चाहती हूँ.. पर तूने एक पल के लिए भी कविता दीदी के बारे में नहीं सोचा??"

फाल्गुनी की बातें सुनकर मौसम को अब गुस्सा आ रहा था.. बड़ी सती-सावित्री बन रही थी.. !!

मौसम: "फाल्गुनी तू मेरी मदद नहीं कर सकती तो कोई बात नहीं.. पर मुझे रोकने की कोशिश बिल्कुल मत करना.. मैं कितना तड़प रही हूँ.. तुझे क्या पता.. !! जीजू का स्पर्श मुझे रोज याद आकर सताता है.. "

फाल्गुनी: "तो तू मास्टरबेट कर ले ना..!! वैसे भी आज रात को हम तीनों साथ ही सोने वाले है.. तब जितना मर्जी मजे कर लेना.. सारी आग बुझा लेंगे हम तीनों.. पर कविता दीदी से ऐसा धोखा करने के लिए मेरा मन तो नहीं मान रहा"

अब मौसम अपना आपा खो बैठी

मौसम: "तेरे मुंह से ऐसी बातें अच्छी नहीं लगती, फाल्गुनी.. मेरे बाप के साथ सेंकड़ों बार चुदवाते वक्त तुझे मेरी मम्मी का कभी विचार नहीं आया था??"

स्तब्ध हो गई फाल्गुनी.. !! उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया..

फाल्गुनी: "ये तू क्या बक रही है?? तुझे शर्म भी नहीं आती ऐसा आरोप लगाते हुए.. !!"

मौसम: "बहोत हुआ तेरा नाटक, फाल्गुनी.. मुझे सब पता है.. मैंने अपनी इन सगी आँखों से तुझे और वैशाली को पापा के साथ चुदाई करते.. उनकी ऑफिस में देखा है!!"

फाल्गुनी के पैरों तले से धरती खिसक गई.. भांडा फूट चुका था.. वो मौसम से नजरें नहीं मिला पा रही थी.. झूठ बोलने वाले का जब भंडाफोड़ होता है तब उनका चेहरा देखने लायक होता है.. वो आँखें झुकाकर सुनती रही.. और फिर इतना ही बोली "मौसम, तेरे पास एक घंटे का समय है.. हो जाएगा एक घंटे में सब?"

मौसम: "जैसा मैंने कहा.. तू वैशाली और पापा को लेकर गाड़ी में जाएगी.. फिर तू रास्ता भूल जाने का नाटक करना.. आधा घंटा गाड़ी में दोनों को यहाँ वहाँ घुमाना.. फिर महंदी वाली के घर उसे लेने पहुँच जाना.. जब तक मैं कॉल न करूँ.. तू उन लोगों के लेकर वापिस मत आना.. तेरा नाम सुनते ही पापा आने से मना नहीं करेंगे.. उसी बहाने तुझे और वैशाली को पापा का लंड चूसने का मौका भी मिल जाएगा" चेहरे पर घिन और थोड़ी सी नफरत के भाव के साथ मौसम ने कहा

मौसम के मुंह से अपने पापा के बारे में ऐसी बात सुनकर फाल्गुनी अंदर से हिल गई.. वो जवाब देने की स्थिति में नहीं थी..

काफी देर तक चुप्पी साधे रखने के बाद फाल्गुनी ने मौसम से पूछा "जब तुझे पहले से ही सब कुछ पता था तो इतने दिनों तक खामोश क्यों रही?"

मौसम: "वो सब बातें करने का अभी वक्त नहीं है.. वैसे मुझे अभी भी तुझसे कई सवालों के जवाब लेने है.. पर अभी नहीं.. अभी तो मुझे अपना प्रोमिस पूरा करना है.. तू अब जा फटाफट.. आज अगर ये मौका चूक गई तो फिर जीवन भर पछतावा रहेगा मुझे.. तू कुछ भी कर.. अपना दिमाग लगा.. और कम से कम एक घंटे के लिए मुझे प्रायवसी देना.. और हाँ.. वैशाली को इस बारे में पता नहीं चलना चाहिए.. वो कविता दीदी की सहेली है.. कहीं दीदी को बता देगी तो मुझसे कभी बात नहीं करेगी.. "

तभी बाथरूम का दरवाजा खुला.. अंदर से वैशाली बाहर निकली.. कमर के ऊपर सम्पूर्ण टॉप-लेस वैशाली ने केवल कमर पर तौलिया बांध रखा था.. उसके विशाल स्तन झूल रहे थे..


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देखकर ही पता चलता था की उन्हें आज तक कई लोगों ने रगड़ा होगा.. माउंट आबू की उस रात को तीनों ने जो लेस्बियन हनीमून का आनंद लिया था.. उसके बाद तीनों के बीच शर्म की सारी दीवारें ढह चुकी थी.. बिना ब्रा पहने ही वैशाली ने टीशर्ट चढ़ा दिया और अपने स्तनों के लाइव-शो पर पर्दा डाल दिया.. पर टीशर्ट में ढंके हुए मदमस्त बबले और भी खतरनाक लग रहे थे..

मौसम वैशाली के करीब गई और उसको कमर से पकड़कर बोली "बड़ी हॉट लग रही है तू.. !!"

वैशाली: "हॉट तो मैं पहले से हूँ.. जरूरत तो मुझे ठंडा होने की है.. जब नीचे आग लगती है तब हाहाकार मच जाता है.. तुझे भी जल्द ही इस बारे में पता लग जाएगा.. वैसे तुम दोनों कब से क्या खुसुर-पुसुर कर रही थी??"

मौसम: "अरे यार.. वो महंदी वाली लड़की को फोन किया था.. उसका स्कूटर खराब हो गया है.. और इतनी रात को वो ऑटो से आने में डर रही है.. फाल्गुनी ने उसका घर देखा हुआ है.. तो मैंने सोचा पापा को साथ ले जाकर, तुम और फाल्गुनी उसे घर से ले आओ.. फाल्गुनी ने उसका घर देखा हुआ है"

वैशाली: "ये बढ़िया काम किया.. जब घर में गाड़ी हो तब किसी बात के लिए क्यों झिझकना? फाल्गुनी तू अंकल को बता दे.. हम लोग अभी निकल जाते है.. " वैशाली ने मौसम का काम आसान कर दिया.. फाल्गुनी सुबोधकांत को बुलाने चली गई

ऐसा सुनहरा मौका मिलते ही, सुबोधकांत तुरंत तैयार हो गए.. वैशाली और फाल्गुनी उनकी गाड़ी में चले गए

मौसम ने तुरंत पीयूष को अपने कमरे में बुला लिया.. जैसे ही पीयूष अंदर आया.. मौसम ने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया और पीयूष से लिपट पड़ी.. एक जबरदस्त लीप किस करते हुए दोनों एकाकार हो गए.. आवेश से गले लगने के कारण.. मौसम के बिना ब्रा के स्तन पीयूष की छाती से दबकर चपटे हो गए.. वह नरम और गद्देदार स्पर्श तो पीयूष की कमजोरी थी.. जबरदस्त उत्तेजना के बीच जरा सा भी समय बर्बाद किए बगैर.. पीयूष ने मौसम की शॉर्ट्स में हाथ डाल दिया और उसकी कुंवारी कमसिन चूत को सहलाने लगा..


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अब तक मौसम यही समझती थी की उत्तेजना को शांत करने के लिए किस और सहलाने से काम बन जाता होगा.. उसे कहाँ पता था की यह आग बुझाने के लिए तो गुप्तांगों को रगड़ रगड़कर तहस-नहस कर देना पड़ता है तब जाकर ये उत्तेजना शांत होती है..

"ओहह जीजू.. मुझे कुछ हो रहा है" मौसम ने पीयूष के कान में कहा

"मेरी जान.. उसे ही तो प्यार कहते है.. कुछ कुछ होने में ही बहोत कुछ होता है.. आह्ह मौसम.. तेरे ये बूब्स कितने कडक है यार.. !! तुझे तो पता ही है की मुझे ये कितने पसंद है.. !! मेरे इन पसंदीदा दोनों यारों के लिए मैं गिफ्ट लाया हूँ.. ये देख" कहते हुए पीयूष ने अपनी जेब से स्टाइलिश ब्रा निकाली जो उसने पिछले दिन खरीदी थी.. १२५० रुपये का चुना लगवाकर..

"वाऊ जीजू.. कितनी मस्त है.. !! वैसे तो मुझे व्हाइट रंग की ज्यादा पसंद है.. पर कोई बात नहीं.. ये लाल रंग तरुण का फेवरिट है.. उसे पसंद आएगा.. !! मौसम ने नादानी में कही बात.. पीयूष को कितनी तकलीफ पहुंचाएगी ये उसे पता नहीं था.. ऐसी स्थिति में तरुण का नाम सुनकर पीयूष को एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके खड़े लंड पर तेजाब डाल दिया हो.. !!

तरुण के विचारों को दिमाग से हटाकर पीयूष ने वह ब्रा मौसम को पहना दी.. एकदम परफेक्ट फिट आ गई मौसम के स्तनों की गोलाइयों पर..

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दोनों ब्रा के कप को हाथों से दबाते हुए पीयूष ने कहा "यार, तेरे बूब्स तो मुझे पागल बना रहे है.. !!"

"आज की रात के लिए यह दोनों आपके ही है जीजू.. कल से ये तरुण के होकर रह जाएंगे.. " फिर से तरुण का नाम सुनकर पीयूष का मुंह कड़वा हो गया.. पर आज वो बेकार के विचारों मे समय गंवाना नहीं चाहता था.. ये हुस्न का जाम अब उसके लबों के बिल्कुल करीब था.. किसी भी प्रकार की गलती की गुंजाइश नहीं थी..

मौसम के गुलाबी अधरों को जीभ से चाटते हुए एकदम रोमेन्टीक अंदाज में पीयूष ने कहा "कितने वक्त के बाद जाकर तू आखिर मिली है तू.. तुझे याद कर रहे इस लंड को मैं रोज समझाता था.. देख तो जरा.. तेरी चूत की जुदाई में बेचारा कैसे आँसू बहा रहा है.. !!" अपनी शॉर्ट्स से लंड बाहर निकालकर.. सुपाड़े की नोक पर लगी उत्तेजना की बूंदों को दिखाते हुए मौसम के हाथ में थमा दिया..

"ओह्ह जीजू.. पहले मुझे जी भरकर किस तो कर लेने दीजिए.. मैं आपकी किस को बहोत मिस कर रही थी.. " कहते हुए मौसम ने पीयूष के होंठों पर अपने होंठ रख दीये.. प्यार का इजहार करने का सब से पुराना तरीका है ये..


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मौसम के मदमस्त कुँवारे संतरों को हाथों से मसलते हुए पीयूष ने काफी देर तक उसके होंठों को चूसा.. उस दौरान.. अपने पैरों के बीच गरम गरम लंड का स्पर्श होते ही मौसम के कुँवारे बदन में अजीब सी सिहरन उठने लगी.. आँखें बंद हो गई उसकी.. मौसम के उरोज पहले से भी ज्यादा सख्त हो गए.. उसने आँख बंद की.. तो उसे वो सीन याद आ गया.. जब फाल्गुनी उसके पापा का लंड चूस रही थी.. कितनी मस्ती से चूस रही थी.. कैसा लगता होगा लंड चूसने में.. ?? मुझे भी चूसना है.. पर जीजू से कैसे कहूँ.. माउंट आबू में वैशाली ने कहा था की जब हम लंड चूसते है तब हमारे पार्टनर को बहोत मज़ा आता है..

अनगिनत सवालों के बीच घिरी हुई मौसम की विचारधारा तब टूटी जब उसकी ब्रा की कटोरी ऊपर करके पीयूष उसके स्तन को चूसने लगा.. निप्पल पर लार की ठंडक और जीभ की गर्मी.. दोनों का एक साथ एहसास होने लगा..

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मौसम ने उत्तेजित होकर पीयूष का लोडा पकड़ लिया..


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मौसम के स्तनों को चूसते हुए पीयूष ने एक झटके में उसकी चड्डी उतारकर कमर से नीचे नंगा कर दिया.. और अपनी दो उंगली जैसे ही उसकी रिस रही बुर में डाली.. मौसम ऐसे मचलने लगी जैसे मदारी के बिन बजाते ही नागिन नाच रही हो.. !! सख्त लंड को चूसने के लिए मौसम बेकरार हो रही थी.. पर उसे बोलने में शर्म आ रही थी...

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आखिर उसने तय किया की जीजू सामने से कहेंगे तो ही मुंह में लूँगी.. पर शादी से पहले ये अनुभव करने का ये आखिरी मौका था.. और आज वो अपनी ज़िंदगी पूरी तरह जी लेना चाहती थी.. वो अब भी पीयूष के लाल सुपाड़े को तांक रही थी..

"मौसम, मेरी एक रीक्वेस्ट है.. अगर तुझे ऐतराज ना हो तो.. !!" पीयूष ने कहा

"आज किसी चीज का कोई बंधन मत रखना जीजू.. आपकी सारी रीक्वेस्ट मैं आज पूरी कर दूँगी.. आप सिर्फ कहिए एक बार.. हो जाएगा"

"तुझे ऑरल सेक्स के बारे में पता है?"

मौसम समझ गई की जीजू भी उसके मुंह में लंड देना चाहते है पर झिझक रहे है..

मौसम: "ओह जीजू.. वो सब तो मुझे नहीं पता.. पर आपकी जो इच्छा हो मैं पूरा करूंगी"

पीयूष: "पर मुझे लगता है की सुनकर तू नाराज हो जाएगी"

मौसम सोच रही थी.. की जीजू को कैसे समझाऊँ?? की आपका लंड चूसने के लिए तो मैं मर रही हूँ.. पर बोल नहीं पा रही

बहोत मन होने के बावजूद पीयूष ने कहा नहीं.. उसे डर था की लंड चुसवाने के चक्कर में कहीं कुंवारी चूत की चुदाई का मौका हाथ से ना निकल जाए.. !!

कुंवारी लड़की के संग चुदाई.. ये जरा पेचीदा मामला है.. सेक्स के अलावा भी उसमे बहोत कुछ होता है.. एक लड़की.. यौवन के द्वार तक पहुँचने तक.. अपनी इज्जत को जान की तरह संभालती है.. छाती से दुपट्टा सरक जाए तो भी शर्म से पानी पानी हो जाने वाली मुग्धा जब पहली बार अपने प्रेमी के सामने नंगी होती है.. तब बहोत कुछ होता है.. वो क्षण होती है विश्वास की.. समर्पण की.. प्रेम की.. पराकाष्ठा की.. जीवन में प्रथम बार किसी पुरुष के सामने नग्न हुई मौसम के सौन्दर्य में.. कौमार्य की खुमारी छलक रही थी.. उसके स्तनों का वैभव और कुँवारे बदन का जादू पीयूष को पागल कर रहा था..



2021


मौसम की चूत में उंगली अंदर बाहर करते हुए पीयूष उसके स्तनों को मसलता जा रहा था.. मौसम पीयूष के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर हिलाते हुए इतनी बेकाबू हो गई की सिसकते हुए बोली "ओह्ह जीजू.. अब मैं और सह नहीं पाऊँगी.. जल्दी कुछ करो.. आह्ह.. !! नीचे कुछ कुछ हो रहा है "

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पीयूष और तेजी से अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगा और उसके साथ ही मौसम ऑन ध स्पॉट झड़ गई.. ठंडी हो गई वो.. उसकी सांसें अब नियंत्रित होते देख पीयूष समझ गया.. की ठंडी होने के बाद मौसम फिर से शरीफ बन जाएगी.. जब चूत में खुजली उठी हो तब समय, स्थान दिन या रात न देखकर, गांड उछाल उछालकर चुदवाने वाली स्त्री.. खुजली शांत होते ही एकदम शालीन और संस्कारी बन जाती है..

थोड़ी ही देर में मौसम नॉर्मल हो गई.. उसके हाथ में जो पीयूष का लंड था वो और कडक हो गया पर मौसम की पकड़ ढीली हो गई.. वह एकदम धीमी आवाज में बोली "जीजू.. अब जो करना है जल्दी जल्दी करो... ताकि मेरा प्रोमिस पूरा हो जाएँ और टेंशन खतम हो"


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पीयूष ने मौसम को बेड पर लिटा दिया और उसकी दोनों जांघों के बीच पोजीशन ले ली.. जंघाओं को चौड़ी करके.. कामरस से लथबथ चूत के वर्टिकल होंठों क ओ उंगलियों से अलग किया.. अंदर का लाल लसलसित हिस्सा देखकर पीयूष से रहा नहीं गया और उसने झुककर मौसम की चूत को चूम लिया.. और उसके साथ ही मौसम का शरीर फिरसे तपने लगा.. वो ऐसे कांपने लगी जैसे उसे बुखार चढ़ गया हो.. लंड के कडक सुपाड़े को चूत पर रगड़कर.. मौसम को लंड के आक्रामक प्रहारों के लिए तैयार कर रहा था पीयूष

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"आई लव यू, मौसम" कहते ही पीयूष ने कसकर धक्का लगाया और मौसम की चूत में आधा लंड उतार दिया.. फिंगरिंग से स्निग्ध हो रखी चूत को ज्यादा दर्द तो नहीं हुआ.. पर वो प्रहार उसकी अपेक्षा से अधिक तीव्र था इसलिए मौसम दर्द और डर से सिसक पड़ी.. "ऊई माँ.. जीजू.. जरा आराम से.. और थोड़ा जल्दी करना.. कहीं कोई आ न जाएँ"

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पीयूष अब अपना आपा खो चुका था.. कुंवारी लड़की की चूत में आधा लंड घुसेड़कर भला कौन अपने आप पर काबू रख पाएगा.. !! पीयूष ने मौसम की चूत का उद्धार कर दिया.. ज़िंदगी का पहला पुरुष सहवास.. मौसम को ऐसा लग रहा था.. जैसे पहली बरसात.. !! उसकी चूत से उत्तेजना और सुख का झरना सा बहने लगा था.. जैसे जैसे पीयूष उसकी चूत में लंड अंदर बाहर करता गया वैसे वैसे मौसम, कली से खिलकर फूल बनती गई.. पीयूष को मौसम के स्तन खास तौर पर पसंद थे.. इसलिए इस सम्पूर्ण संभोग के दरमियान उसने एक बार भी अपने हाथ मौसम के स्तनों से नहीं हटाए.. वो इतनी सख्ती से मौसम के कडक संतरों को मसल रहा था की मौसम को दर्द होने लगा.. मौसम की अब स्त्री-जीवन की शुरुआत हो चुकी थी.. इसलिए संभोग का दर्द सहना अब आवश्यक था.. और इसी दर्द में ही बेइंतहाँ आनंद मिलने वाला था.. !!

मौसम के ऊपर हुमच हुमच कर कूद रहा पीयूष.. बार बार नीचे झुककर मौसम की छोटी सी निप्पलों को चूस लेता.. तब मौसम को पहली बार एहसास हुआ की.. क्यों वैशाली और फाल्गुनी.. उसके पापा के साथ ये सब करने के लिए इतने उत्सुक रहते थे.. !! कितना मज़ा आ रहा था.. !! उसने आज ये साहस न किया होता तो वह भी इस अलौकिक आनंद से वंचित रह जाती.. !!



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पीयूष अपनी मंजिल के आखिरी पड़ाव पर पहुँच गया था और उसकी धक्के लगाने की स्पीड चार गुना बढ़ चुकी थी.. मौसम को पता नहीं चल पा रहा था की अचानक पीयूष के हाव भाव.. धक्कों की गति.. बदल क्यों गई.. !! उसके लिए यह सब नया नया था.. यह पहली बार था की कोई पुरुष उसके ऊपर चढ़कर.. चूत में लंड डालकर.. धक्के लगाते हुए झड़ने की कगार पर था.. जो कुछ भी चल रहा था उसमें उसे बहोत मज़ा आ रहा था.. उसकी चूत ने अब तक ढेर सारा रस छोड़ दिया था.. बार बार उसकी चूत ने स्खलित होकर कुल्ले कर दीये थे.. आखिर थक कर वो सुस्त हो गई.. तब पीयूष ने चूत से लंड को बाहर खींच निकाला और मौसम के पेट पर.. वीर्य की जोरदार पिचकारी मार दी.. मौसम के ये द्रश्य अभिभूत कर गया.. !! गाढ़े वीर्य की गरमागरम पिचकारी जिस्म को छूते ही मौसम सिहर उठी..

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"ओह्ह जीजू.. आई लव यू.. " आज पहली बार मौसम ने खुलकर पीयूष को "लव यू" कहा था.. कडक लोड़े को वीर्य की बौछार करते देखने का पहला अनुभव मौसम के लिए बेहद उत्तेजक रहा था.. लंड की रचना से एक तो वो अनजान थी.. नरम लंड कैसे सख्त हो जाता है.. और सख्त होकर फिर से नरम क्यों हो जाता है.. ये सब जिज्ञासा संतुष्ट होना अभी बाकी था.. ऐसी सूरत में.. वीर्या का फव्वारा उसके स्तन तक उड़ता देख वो इतनी खुश हो गई की उसने पीयूष को खींचकर अपने गले लगा लिया..

थोड़ी देर तक उसी स्थिति में रहने के बाद दोनों पूर्ववत होने लगे.. उठकर दोनों ने कपड़े पहने.. और नॉर्मल होकर बेड पर बैठ गए..

मौसम ने फाल्गुनी को मेसेज किया "और कितनी देर लगेगी? मुझे तो नींद आ रही है.. !!"

जब फाल्गुनी ने ये मेसेज अपने मोबाइल पर पढ़ा तब वैशाली आगे की सीट पर बैठे बैठे झुककर सुबोधकांत का लंड चूस रही थी..


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और फाल्गुनी पीछे बैठे बैठे सुबोधकांत की छाती के घुँघराले बालों में हाथ फेर रही थी.. फाल्गुनी ने मेसेज पर रिप्लाय दिया "हम महंदी वाली के घर बस पहुँचने ही वाले है.. फिर घर आने में दस मिनट ही लगेंगे" परोक्ष तरीके से उसने मौसम को बता दिया की उसके पास सिर्फ उतना ही समय था..

नीचे के कमरे में.. रमिलाबहन के सो जाते ही.. कविता सरककर किचन से सटे स्टोररूम का दरवाजा अंदर से बंद कर.. पिंटू से बातें करने में व्यस्त थी.. उसे कहाँ अंदाजा था की ऊपर के मजले पर उसका पति पीयूष.. उसकी कुंवारी बहन को सेक्स के पाठ पढ़ा चुका था.. उसे तो ये भी पता नहीं था की उसके पापा, वैशाली और फाल्गुनी बाहर गए हुए थे.. वो तो यही सोच रही थी की पीयूष उसके पापा के साथ एक कमरे में है.. और दूसरे कमरे में मौसम के साथ वैशाली और फाल्गुनी बैठे है.. !!

जैसे ही सुबोधकांत की गाड़ी घर पहुंची.. गाड़ी की आवाज सुनकर पीयूष खड़ा हुआ और चुपचाप दूसरे कमरे में जाकर लेट गया.. मौसम ने अपने कपड़े ठीक किए और बेड के चादर की सिलवटें भी साफ कर दी.. चुदाई के सारे सबूत मिटा दीये उसने..
 
राजेश और मदन की रसप्रद चर्चा पर.. कॉकटेल और बार्बी के आने से कोई ब्रेक नहीं लगी.. उन्हों ने अपनी बात जारी रखी

राजेश: "मेक.. एक काम करते है.. आज रात हम एक कमरे में ही सोते है.. चुदाई भी साथ में करेंगे"

मदन खुश हो गया "क्या सच में? मज़ा आएगा.. इसी बहाने रीहर्सल भी हो जाएगा.."

शीला और रेणुका के साथ साथ बार्बी भी अब मदन और राजेश के लंड के साथ खेलने लगी..

तभी रोमा ने अपनी पुच्ची में उंगली करते हुए एनाउंस किया "जो जिसके साथ सोना चाहता है वो अब उसे लेकर अपने अपने कमरे में जा सकता है.. इन्जॉय एवरीबड़ी"

मदन और राजेश खड़े थे थे.. वहीं कॉकटेल और बार्बी भी साथ थे.. शीला, रेणुका और बार्बी भी लंड छोड़कर खड़ी हो गई.. तीनों एक दूसरे के कमर में हाथ डालकर चलने लगी.. उस दौरान शीला ने बार्बी के कान में कुछ कहा.. और बार्बी ने जवाब में शीला के गालों को चूम लिया.. वो शीला का हाथ छुड़ाकर चली गई.. और हेमंत को बुला लाई.. हेमंत भी किसी दूसरी पार्टनर के साथ मजे कर रहा था.. मदन और राजेश के लंड मुरझाकर झूल रहे थे..

अब फाइनल जोड़ी बनाकर.. सब अपने अपने कमरे की ओर जाने लगे.. देखते ही देखते हॉल खाली होने लगा..

हॉल में अब सिर्फ इतने लोग बचे थे..

बँटी उर्फ हेमंत और बार्बी..

जो कॉकटेल की बीवी थी और उसका पति उसे स्वेच्छाचार के लिए यहाँ लेकर आया था.. दिखने में मस्त थी.. और शौकीन.. अमरूद जैसी चूचियाँ थी.. खींच मसलकर लंबी की हुई क्लिटोरिस थी.. और मस्त गांड.. कुल मिलाकर चोदने के लिए बढ़िया थी

सुनंदा (शीला) और मेक (मदन)

कामिनी (रेणुका) और कॉकटेल (?)

राजेश अकेला बच गया

परेशान होते हुए राजेश ने कहा "अरे यार.. आप लोगों ने तो मुझे ही बाहर निकाल दिया??" शीला और रेणुका भी अचंभित हो गई.. यहाँ पर सिर्फ कपल को एंट्री थी.. और सब जोड़ियों में बाहर गए थे.. फिर एक चूत कम कैसे पड़ गई?? कहीं कोई ताकतवर लंड दो चूतों को तो साथ नहीं ले गया?? नहीं ऐसा नहीं हो सकता था..

राजेश शर्म से पानी पानी हो रहा था.. क्या करता?? अब पूरी रात खुद ही हिलाना पड़ेगा क्या? इतनी दूर आकर क्या फायदा जब मूठ ही मारना हो..!! निराश हो गया राजेश.. उसका चेहरा देखकर रेणुका को उस पर तरस आ गया.. मेरा पति मूठ मारे और मैं दूसरे कमरे में चुदवाऊँ.. !! ऐसा नहीं हो सकता.. पर करे तो करे क्या.. !! पूरा प्रोग्राम राजेश ने ही बनाया था और अब वही लटक गया.. !! उसका हाल ऐसा हो गया की बाराती सारे बस में बैठ गए और अब दूल्हे के बैठने के लिए ही जगह नहीं बची..

शीला ने सोचा की हेमंत को जरूर पता होगा की कहाँ गड़बड़ हुई है.. उसने तुरंत हेमंत के कान में कहा "भेनचोद.. इसके लिए चूत का बंदोबस्त कर.. नहीं तो ये किसी को चोदने नहीं देगा.. " इतना कहकर शीला वापिस मदन के बगल में आकर खड़ी हो गई.. सब जा चुके थे.. राजेश की वजह से यह छह लोग अटक पड़े थे..

मदन: "तू चिंता मत कर रॉकी.. मेरे साथ चल यार.. इस रांड को तो एक साथ पचास मर्द भी कम पड़ेंगे.. क्यों बेबी..!! ये साथ आए तो तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है ना.. !! हम दोनों सेंडविच स्टाइल में तुझे बीच में दबाकर चोदेंगे.. !! पीछे कभी लिया है पहले?"

शीला ने गर्दन हिलाते हुए "हाँ" का इशारा किया.. एक साथ दो मर्दों से.. और वो भी एक उसका पति और दूसरा राजेश.. इस कल्पना मात्र से ही शीला रोमांचित हो गई.. उसे डर सिर्फ एक ही बात का था.. दोनों से चुदवाते वक्त कहीं उसकी असलियत बाहर न आ जाएँ.. पर अब तो उसने हाँ बोल दिया था.. शीला को सकपकाया देख रेणुका बड़ी खुश हुई.. की चलो आज शीला को राजेश का लंड चखने का अवसर मिल ही जाएगा..

लेकिन किसी की खुश ज्यादा देर तक नहीं टिकी.. थोड़ी सी मोटी.. और ४५ के करीब उम्र वाली औरत उनके पास चलते हुए आई.. और बोली

"हाई.. मेरा नाम स्टेफी है.. माफ कीजिएगा.. कन्फ्यूजन की वजह से मैं बाहर निकल गई थी.. फिर पता चला की साथी चुनना तो बाकी था.. चलिए.. कौन आएगा मेरे साथ?"

चरबीदार जिस्म.. और मध्यम कद के स्तनों वाली वह स्त्री ब्रा और पेन्टी पहने हुए थे.. पारदर्शक ब्रा से उसकी बादामी रंग की निप्पलें साफ नजर आ रही थी..

देखकर उसे समझ आया की केवल राजेश ही था जो अकेला था

उसने राजेश से कहा "अब तो आप अकेले नहीं है.. हमारी जोड़ी बन गई है.. आप किस्मत वाले हो.. जो मैं आपको मिली.. मैंने अब तक अपने पति के अलावा किसी को भी अपने शरीर पर हाथ लगाने नहीं दिया है" राजेश को स्टेफी की जिस्म में वैशाली की झलक नजर आई.. और उसने तुरंत उसके आमंत्रण का स्वीकार कर लिया.. और स्टेफी की कमर में हाथ डाल दिया..

अब प्रॉब्लेम सुलझ चुका था.. सब की जोड़ियाँ बन गई थी.. सारे जोड़ें एक दूसरे के साथ छेड़खानियाँ करते हुए हॉल से बाहर निकलकर लॉबी में आ गए.. बेहद उत्तेजक माहोल था..

मदन: "एक घंटे बाद मेरे कमरे में मिलते है"

राजेश स्टेफी को लेकर मदन के साथ वाले कमरे में घुस गया.. और उसकी तरह बाकी जोड़ें भी अपने अपने कमरे में चले गए

शीला और मदन कमरे के अंदर भी मास्क पहने हुए थे.. और चोदने के लिए उतावले हो रहे थे.. कैसी स्थिति थी.. !!! घर की खिचड़ी से परेशान होकर महंगे रेस्टोरेंट में जाएँ.. और वहाँ कोई अटपटे नाम वाली आइटेम ऑर्डर करने के बाद जब वो आए और पता चले की यह भी खिचड़ी ही है..!! तो क्या हाल होगा.. !! बिल्कुल वही हाल मदन का था पर उसे अभी पता नहीं था.. यहाँ पर भी.. आइटम घर वाली ही थी.. सिर्फ नाम अलग था.. फव्वारे का पानी कितना भी उछल ले.. आखिर गिरता वहीं है जहां से वो निकला था.. राजेश के साथ बेंगलोर जाने का झूठ बोलकर वो इस क्लब में नई चूत चोदने आया था.. काफी पैसे खर्च कर भाड़े की रांड भी साथी बनाकर लाया था.. और आखिर उसके हाथ उसकी पत्नी ही लगी.. !!

सच में.. पति और पत्नी का रिश्ता जनम जनम का होता है.. पत्नी को घर छोड़कर रांड को चोदने गए पति को ये पता नहीं होता की वह सिर्फ अपनी पत्नी के शरीर को ही छोड़कर आया है.. उसके दिल-ओ-दिमाग पर तब भी वही छाई हुई रहती है.. रांड की चूत में धक्के लगाते हुए भी बार बार उसी का खयाल दिमाग में आता है.. प्रत्यक्ष नहीं तो परोक्ष रूप से.. पत्नी कभी पति का साथ छोड़ती ही नहीं है.. उसी रांड को चोदने के बाद जब पानी निकल जाए तब पति सोचता है, यार बेकार में पाँच हजार ले गई.. !! इसे अच्छा तो घर पर ही पत्नी को चोद लेता.. दो हजार की साड़ी लेकर गया होता तो कितना खुश हो जाती?? यह विचार यही दर्शाते है की पत्नियों का कितना प्रभाव होता है अपने पतियों के दिमाग पर.. और बाहर कितना भी मुंह मार लो.. लौटकर आखिर घर पर ही आना पड़ता है.. कितनी भी आकर्षक वेश्या क्यों न हो.. एक बार पानी निकल जाने के बाद पत्नी की ही याद आती है.. इसे चाहें विचारों का ऑर्गेज़्म ही कह लो.. !!

शीला मन ही मन मुस्कुरा रही थी.. वो सोच रही थी की अभी अगर मैं मास्क उतार दूँ.. तो मदन का चेहरा कैसा हो जाएगा?? पर वो ऐसा करना नहीं चाहती थी.. अभी तो मजे लूटने बाकी थे..

नाइटलैम्प की बारीक रोशनी में वो मदन को सहलाती रही.. और मदन के लंड को मुठ्ठी में पकड़कर मजबूती से हिलाते रही.. अपने उन्नत स्तनों से उसने मदन का इतना बढ़िया ब्रेस्ट-मसाज किया की मदन के मुंह से निकल गया "तुम बिल्कुल मेरी पत्नी की तरह ही सब हरकतें कर रही हो"


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शीला के दिमाग में.. चाबुक जैसे कई सवाल थे.. पर अभी पूछना मुमकिन नहीं था.. इसलिए.. अपने मुंह को बंद रखने के लिए.. मदन का लंड मुंह में ले लिया..

मदन के कूल्हें और जांघों पर शीला काटने लगी.. और उसके आँड़ों को मुठ्ठी में पकड़कर दबाने लगी.. मदन भी शीला की भोस में उंगली डालकर अंदर बाहर करने लगा.. शीला को एक उंगली से फिंगर-फकिंग बिल्कुल पसंद नहीं था.. उसके जननांग की गहराई-चौड़ाई को देखते हुए.. उसे कम से कम तीन उँगलियाँ चाहिए थी.. लेकिन वो कुछ नहीं बोली.. उल्टा वो अपनी सांसें तेज करते हुए ऐसा जताने लगी जैसे उसे बहोत मज़ा आ रहा हो..



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मदन अब उत्तेजित होकर शीला के बदन पर टूट पड़ा.. और दोनों अतिशय कामुक होकर आदर्श संभोग में रत हो गए..

उसी दौरान दरवाजे पर दस्तक पड़ी.. बिना किसी संकोच के मदन नग्नावस्था में ही खड़ा हुआ.. और अपना खड़ा लंड झुलाते हुए दरवाजा खोल दिया.. कॉकटेल और कामिनी (रेणुका) सामने खड़े थे.. और उनके पीछे बँटी(हेमंत) और बार्बी (कॉकटेल की पत्नी) तथा रॉकी (राजेश) और स्टेफी भी खड़े हुए थे.. वह तीनों जोड़ें.. संभोग का एक एक राउन्ड खतम कर.. मदन और शीला के साथ ग्रुप सेक्स के मजे लेने आए थे

मदन ने सब का स्वागत किया.. और सारे लोग अंदर आ गए.. कॉकटेल बेड के साथ लगे सोफ़े पर बैठा.. और नग्न रेणुका उसकी गोद में ही लेट गई.. और उसके मोटे लंड को चाटने लगी.. राजेश भी स्टेफी के गद्देनुमा स्तनों का तकिया बनाकर बैठ गया.. स्टेफी के मांसल स्तन और उसकी गुलाबी निप्पल जबरदस्त लग रहे थे.. स्टेफी भी राजेश के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए परिस्थिति का जायजा ले रही थी..



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राजेश और मदन अगल बगल में बैठे थे.. राजेश ने शीला के बोल पकड़कर दबाते हुए कहा "यार मेक.. इस सुनंदा के बूब्स बिल्कुल शीला भाभी जैसे है.. कब से बार बार उस पर ही नजर चली जाती है मेरी.. दबा तो सुनंदा के रहा हूँ मगर दिल में खयाल शीला भाभी का ही है.. उफ्फ़ ऐसा लगता जैसे मेरी शीला भाभी के ही बबले मसल रहा हूँ.. "

राजेश की बात सुनकर शीला की चूत और राजेश का लंड दोनों जबरदस्त प्रभावित हुए.. शीला के चूत ने अपना पानी बहाना शुरू कर दिया और पूरे कमरे में उसके चूत के शहद की मस्की गंध फैलने लगी.. ये देखते ही मदन ने शीला की चूत चाटना शुरू कर दिया.. हालांकि मदन को सुनंदा की भोस की गंध काफी जानी-पहचानी सी महसूस हुई.. पर हवस का सुरूर कुछ ऐसे छाया हुआ था की दिमाग उस बारे में ज्यादा सोच ही नहीं रहा था..


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शीला और मदन की इन हरकतों को देखकर उत्तेजित हेमंत.. बार्बी के बदन पर टूट पड़ा.. तो इस तरफ रेणुका कॉकटेल के साथ मशरूफ़ थी.. उसे यह भी परवाह नहीं थी की राजेश क्या कर रहा था.. राजेश स्टेफी के कामुक जिस्म पर चढ़कर ग़बागब चोदने लगा.. स्टेफी ने अपने जीवन में ऐसा आनंद कभी महसूस नहीं किया था.. आज तक वो यही सोचती रहती थी की आखिर लोग सेक्स के लिए इतने पैसे क्यों खर्च कर रहे होंगे.. !! आज पता चल गया.. !!
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इस रोमांचक माहोल में वो अब तक दो बार झड़ चुकी थी.. ऐसा नहीं था की उसके जिस्म को सिर्फ राजेश ही छु रहा था.. एक कमरे में चार जोड़ें एक साथ जब संभोग में व्यस्त हो.. तब अन्य लोगों का स्पर्श हो जाना सामान्य था.. अन्य साथी भी मौका मिलते ही स्टेफी के गदराए जिस्म का आनंद ले लेते थे.. मदन और हेमंत अब तक कई बार स्टेफी के स्तन युग्म का मर्दन कर चुके थे.. और कॉकटेल ने नजदीक आकर स्टेफी की गुलाबी निप्पल को मुंह में लेकर चूस लिया था..


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अब मदन ने शीला को चार पैरों पर कर दिया.. और अपनी पसंदीदा डोंगी स्टाइल में चोदने के लिए तैयार हो गया.. शीला के विशाल कूल्हों के बीच सेट होकर.. उसने अपने लंड को लार से गीला किया.. फिर अपने सुपाड़े को शीला के भोसड़े के प्रवेशद्वार पर रख दिया.. एक जोरदार धक्का लगाते हुए उसने अपना पूरा लंड अंदर धकेल दिया तब शीला की करारी आह्ह निकल गई.. धनाधन धक्के लगाने लगा मदन.. !! मदन के हर धक्के के साथ शीला के नारियल जैसे स्तन हवा में झूलने लगे..

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जैसे जैसे मदन शॉट लगाता जा रहा था.. वैसे वैसे उसका शक बढ़ रहा था की सुनंदा ही शीला थी.. पर उसका दिमाग यह मानने को तैयार ही नहीं था.. ऐसा कैसे हो सकता है भला.. !! शीला यहाँ कैसे आ सकती थी.. !! इसी सोच के वजह से मदन के दिमाग का शक आगे बढ़ नहीं पा रहा था.. ताज्जुब केवल इस बात का था की शीला और सुनंदा में इतनी समानता कैसे हो सकती है?? इस आसन में वो अनगिनत बार शीला को चोद चुका था.. और सुनंदा को उसी स्टाइल में चोदते वक्त.. अविरत ये महसूस हो रहा था की वह शीला ही थी.. !! दिमाग घूम रहा था मदन का.. !!

कॉकटेल के लंड से अपनी अंगूर जैसी क्लिटोरिस को रगड़ते हुए रेणुका.. मदन के लोड़े को शीला के भोसड़े में अंदर बाहर होते हुए देख रही थी.. थप-थप की आवाज़ें गूंज रही थी.. जब मदन का पूरा लंड शीला की भोस में समा जाता.. तब शीला और मदन की जांघें एक दूसरे से टकरा रही थी.. शीला को देखकर.. रेणुका भी डोंगी स्टाइल में तैयार हो गई.. और पलट कर पीछे खड़े कॉकटेल को.. खुद पर आरूढ़ होने का आमंत्रण देने लगी..



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शीला और रेणुका के स्तनों को लटकते देख.. हेमंत शीला के नीचे लेट गया.. और उसके मदमस्त स्तनों के तले दबने का अनूठा अनुभव करने लगा.. ये देखकर बार्बी भी रेणुका और शीला के बगल में घोड़ी बनकर रेडी हो गई.. फिर स्टेफी क्यों पीछे रहती.. वह भी आकर इन चारों औरतों को कंपनी देने लगी..

एक ही बिस्तर पर चारों औरतें डोंगी स्टाइल में थी.. शीला और रेणुका के पीछे मदन और कॉकटेल लगे हुए थे.. और बार्बी तथा स्टेफी का गेम बजा रहे थे बँटी(हेमंत) और रॉकी (राजेश)


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20 मिनट के भयंकर संभोग के बाद.. सब से पहले बार्बी की चूत में आत्मसमर्पण कर दिया.. वो झड़कर नीचे ढह गई.. पर उसकी चूत में घुसा हुआ हेमंत का लंड अभी भी इस्तीफा देने के मूड में नहीं था.. लेकिन बार्बी अब बेड पर लेट चुकी थी.. और हेमंत का लंड बाहर निकल गया था.. झड़ने के लिए बेकरार हेमंत अपना लंड पकड़कर शीला की अदालत में हाजिर हो गया.. शीला ने बड़े ही प्यार से उसका लंड मुंह में ले लिया और ऐसा चूसा.. जो काम बार्बी की चूत न कर पाई.. वह काम शीला के मुंह ने कर दिखाया.. शीला के मुंह में ही हेमंत के लंड का वीर्य-विसर्जन हो गया.. "आह्ह आह्ह.. " की कराहों के साथ हेमंत थरथराते हुए झड़ रहा था.. आखिर एक दमदार धक्का लगाते हुए हेमंत ने अपना लंड जड़ तक शीला के मुंह में घुसेड़ दिया..

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अब शीला ने मदन के लंड को अपनी चूत के होंठों के बीच दबोचे रखा था.. और हेमंत के लंड को आगे के होंठों से मजे दे रही थी.. एक साथ दो दो लंडों का आनंद लूट कर शीला की हवस बेकाबू हो गई.. अपने चूतड़ को उठाते हुए.. वो जितना हो सकें उतना मदन के लंड को गहराई तक अंदर लेने की भरसक कोशिशें कर रही थी..


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शीला धीरे धीरे अपने ऑर्गेज़्म की ओर बढ़ रही थी.. अमूमन झड़ने के करीब आते ही.. उसे अनाब-शनाब बकने की आदत थी.. पर आज उसे अपने आप पर काबू रखना पड़ा.. क्यों की अगर वो अपना मुंह गलती से भी खोलती.. तो उसका भांडा फूट जाता.. मदन को झड़ते वक्त.. शीला की अश्लील बातें और गालियां सुनने की आदत थी.. उसके लंड ने पिचकारी तो मारी पर शीला के साथ जो मज़ा आता था वो नहीं आया.. ऑर्गेज़्म अधूरा सा लग रहा था शीला के बगैर.. दूसरी तरफ शीला की हालत भी कुछ खास नहीं थी.. बिना चीखें चिलाएं.. चुदने में उसे कुछ मज़ा नहीं आया था.. वो तो मुक्त गगन में उड़ने वाली पंछी थी.. बंधन में रहना उसे कतई पसंद नहीं था..

बार्बी के बगल में शीला भी पस्त होकर गिर गई.. राजेश का लंड अपनी चूत में लेकर बेहद खुश स्टेफी.. समागम की आखिरी क्षणों में चीखते हुए चुदवा रही थी.. क्योंकि राजेश ने उसकी गांड को टारगेट किया था.. चूत को चोदते वक्त उसने अपना अंगूठा उसकी गांड के छेद में घुसा दिया था और उसे चौड़ा कर रहा था.. पहली बार पराए लंड से चुद रही स्टेफी की गांड में जब राजेश ने उंगली की तब वह उत्तेजना के नए शिखरों पर पहुँच गई.. लेकिन उसके बाद... जिस तरह ये नेता लोग.. शुरू शुरू में काफी विनम्र पेश आते है.. और चुनाव खतम होते ही अपना असली रंग प्रकट करते है.. बिल्कुल वैसे ही.. राजेश ने एक ही धक्के में अपना लंड स्टेफी की गांड में डालकर.. उसकी गांड का हजीरा बना दिया..


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बगल में ही कॉकटेल, रेणुका को चोद रहा था.. और राजेश-स्टेफी को देखकर.. उसे भी गांड के टाइट छिद्र का मजे लेने का मन किया.. और थूक लगाकर.. रेणुका की गांड में लंड पेलकर, बेचारी को रुला दिया.. !!


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आँख में आँसू आ जाने के बावजूद.. मास्क के कारण अपनी पीड़ा को छुपने में सक्षम रही रेणुका.. !! मुंह से आवाज निकाल नहीं सकती थी वो.. स्टेफी और कामिनी (रेणुका) के दर्द से अनजान.. दोनों पुरुष सांड की तरह उनकी गांड चोद रहे थे.. कहते है ना "दर्द का हद से गुजर जाना.. खुद ही दवा बन जाता है" उसी नाते कुछ देर पश्चात.. दोनों के छेद.. लंड घुसाई से अनुकूल होकर.. मजे लेने लगे.. और दोनों के गांड के छेद में.. आखिर राजेश और कॉकटेल के लंड.. विसर्जित हो गए.. !!

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स्खलन के बाद.. लंड गांड के छेद में फंस गए थे.. यह तो अच्छा हुआ की स्खलित होकर दोनों के लंड मुरझा गए थे.. और वीर्य छूटने की वजह से.. छेद गीला हो गया था.. इसलिए उनके लंड आसानी से बाहर निकल आयें.. वरना संभोग-रत कुत्ते और कुत्तिया की तरह दोनों के जननांग चिपक जाते.. लंड तो आसानी से निकल गए.. पर फिर भी.. स्टेफी और रेणुका को गांड की दीवारों पर घर्षण के कारण भयंकर जलन हो रही थी..

एक जबरदस्त चुदाई का राउन्ड सम्पन्न हुआ था.. रात के बारह बज रहे थे.. चारों जोड़ें.. स्खलित होकर ऐसे पस्त पड़े थे.. जैसे प्लेन क्रेश होने के बाद.. जमीन पर लाशें बिखरी पड़ी हो.. !!

लगभग आधे घंटे के विराम के बाद.. कॉकटेल ने सिगरेट सुलगाई.. और फिर बाकी लोगों को भी सिगरेट ओफर की.. सब ने पैकेट से एक एक सिगरेट ली और बिंदास फूंकने लगे.. इन सब में.. केवल राजेश और मदन ही एक दूसरे से बातें कर रहे थे.. शीला और रेणुका के लिए आपस में बात करना.. या फिर बार्बी या स्टेफी से बात करना मुमकिन नहीं था.. क्योंकी उनकी पहचान खुल जाने का पूरा डर था.. और इन सब की मौजूदगी में.. हेमंत ने भी चुप रहना ही ठीक समझा.. क्योंकी वैसे देखने जाए तो.. यह सब इस होटल के कस्टमर थे.. और वो केवल एक मुलाजिम था.. !!

कभी कभी स्टेफी बात कर लेती थी मदन और राजेश से.. पता नहीं क्यों.. पर कॉकटेल भी बिल्कुल खामोश था.. उसका व्यक्तित्व शुरू से ही काफी रहस्यमयी था.. वैसे किसी को उसे जानने में खास दिलचस्पी थी भी नहीं.. केवल रेणुका के सिवा.. वो इस कॉकटेल के बारे में जरूर जानना चाहती थी.. जिसने आज पहली बार उसकी गांड छेद दी थी.. वैसे राजेश ने कई बार उसकी गांड मारने का प्रयास किया था.. पर दर्द के चलते वो दोनों आगे बढ़े नहीं थे.. पर आज उसे ये अनोखे एहसास ने उसकी हिम्मत खोल दी थी.. दर्द बहोत हुआ था पर मज़ा भी आया था.. वैसे देखने जाए तो दर्द और आनंद.. एक ही सिक्के के दो पहलू है.. !!

शीला के लिए गांड मरवाना कोई नई बात नहीं थी.. वो अन्य मर्दों से और मदन से काफी बार मरवा चुकी थी.. वो तो अक्सर मदन से कहती "यार, एक ही छेद पर हमेशा क्यों जुल्म करते रहते हो.. !! सभी छेद को बराबर बराबर इस्तेमाल कर.. तो टाइट भी रहेंगे और ज्यादा मज़ा भी आएगा.. !!" मदन और शीला तो कई बार एनल सेक्स का आनंद लेते थे..

अपनी गांड मरवाने के बाद रेणुका को एहसास हुआ की कॉकटेल का लंड राजेश से मोटा तो था ही.. ऑर्गेज़्म से थक कर सब कमरे में रिलेक्स कर रहे थे.. तभी..

कमरे के बाहर लॉबी में.. काफी असामान्य चहल-पहल की आवाज़ें सुनाई देने लगी.. !!! और उन आवाजों में डर और व्यग्रता के भाव स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ रहे थे.. सब के चेहरे एकदम से गंभीर हो गए.. एक दूसरे की तरफ देखते हुए.. सब की आँखों में बस एक ही प्रश्न था.. की आखिर ऐसा क्या हो गया था.. !!!!

अचानक बाहर से किसी की चिल्लाने की आवाज आई "भागों... पुलिस की रैड पड़ी है.. !!!!"
 
कमरे के बाहर लॉबी में.. काफी असामान्य चहल-पहल की आवाज़ें सुनाई देने लगी.. !!! और उन आवाजों में डर और व्यग्रता के भाव स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ रहे थे.. सब के चेहरे एकदम से गंभीर हो गए.. एक दूसरे की तरफ देखते हुए.. सब की आँखों में बस एक ही प्रश्न था.. की आखिर ऐसा क्या हो गया था.. !!!!

अचानक बाहर से किसी की चिल्लाने की आवाज आई "भागो... पुलिस की रैड पड़ी है.. !!!!"

पुलिस...!!!! तीन अक्षर का यह शब्द.. इंसान को हमेशा से डराता आया है.. !!

बाप रे... !!! पुलिस... !!!! मर गए... !!! अब कल के अखबार में.. फ़ोटो के साथ नाम आना तय हो चुका था.. !! सब की गांड फटकर फ्लावर हो रही थी..

हाथ से अपना सर पटकते हुए मदन ने कहा "माँ चुद गई यार.. हम तो घर पर झूठ बोलकर निकले थे.. अब क्या होगा..??? !!"

घबरा रहें कॉकटेल ने कहा "मैंने भी घर पर झूठ बोला है की एक पुराने दोस्त की मृत्यु हो गई है और उसकी अंतिम क्रिया में शामिल होने जा रहा हूँ " पहली बार सब ने कॉकटेल को बोलते हुए सुना.. आवाज जानी पहचानी जरूर लग रही थी.. पर अभी किसी का ध्यान उस ओर गया ही नहीं.. !!

"पुलिस की रैड है.. आप सब लोग अपने अपने कमरे में चले जाइए.. " काफी डरे हुए हेमंत ने कहा.. सब अपने कपड़े ढूँढने लगे.. जिसके हाथ में जो आया वो लेकर अपना शरीर छुपाते हुए.. सब अपने अपने कमरे की ओर भागे.. !!

जल्दबाजी में.. राजेश के कमरे में स्टेफी के बदले रेणुका चली गई.. और स्टेफी कॉकटेल के सामने वाले कमरे में.. उसके साथ घुस गई.. हेमंत और बार्बी अपने कमरे में दुबक कर बैठ गए.. !!

यह कोई अफवाह नहीं थी.. सचमुच पुलिस की रैड पड़ी थी.. चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ था.. रात के एक बजे पुलिस ने किसी अनजान खबर पर एक्शन लिया और इस बहोत बड़े सेक्स रैकिट का पर्दाफाश कर दिया था.. ज्यादातर सदस्य काफी अमीर और बड़ी बड़ी पहचान वाले थे.. उन सब को यकीन था की वह अपने पैसे के दम पर.. या किसी न किसी की सिफारिश के जोर पर बच जाएंगे.. पर दो ही दिन पहले प्रमोट हुए इंस्पेक्टर खान ने किसी की एक न सुनी.. वो हर कमरे में खुद जाकर तलाशी ले रहे थे.. जिन लोगों ने अपने फर्जी नाम बताकर रूम बुक किए थे.. उन सब को थाने ले जाने का आदेश दिया था इंस्पेकटर ने.. एक के बाद एक कपल.. चुपचाप पुलिस की वैन में बैठने लगे.. ईमानदार इन्स्पेक्टर के आगे.. ना पैसों की गर्मी चली और ना ही किसी की सिफारिश.. !!

होटल के प्रत्येक कमरे में जाकर इन्स्पेक्टर सब की पूछताछ कर रहे थे.. उसके साथ चार कॉन्स्टेबल भी थे.. शीला और मदन के कमरे के दरवाजे पर दस्तक पड़ी.. शीला ने इशारे से मदन को बाथरूम में छुप जाने को कहा.. और अपने उत्तेजक शर्ट और मेक्सी की बिना परवाह किए.. मास्क उतारकर.. बड़ी ही बेफिक्री से दरवाजा खोला

"हैलो मैडम.. मेरा नाम इन्स्पेक्टर खान है.. यह एक तहकीकात है.. और आपको हमें सहकार देना होगा"

"आइए सर.. !!" शीला ने जग से पानी भरकर ग्लास इन्स्पेक्टर को देते हुए कहा "बैठिए ना.. !! वैसे बात क्या है?? और इतनी रात गए आप लोग क्यों आए है?? और आप किस प्रकार के सहकार की बात कर रहे है?"

इन्स्पेक्टर: "देखिए मैडम.. बात दरअसल यह है की... !!"

शीला: "जी, मेरा नाम शीला है.. !!"

इन्स्पेक्टर: "थेंकस मिसिस शीला.. आप ये बताइए.. की आप किसके साथ यहाँ रूम में ठहरी हुई है?"

शीला: "जी, मेरे पति के साथ.. हम और हमारे दोस्त.. मिसिस रेणुका और राजेश.. जो बगल के कमरे में ठहरे हुए है.. हम लोग घूमने निकले थे.. पर वापिस आते वक्त हमें मजबूरन यहाँ रुकना पड़ा.. !!"

इन्स्पेक्टर: "ओह अच्छा.. तो कहाँ है आप के पति?"

शीला: "जी, वो टॉइलेट में है... अभी आ जाएंगे.. दरअसल उन्हें होटल का खाना राज नहीं आता.. इसलिए उन्हें लूज मोशन हो गए है"

उस दौरान शीला ने बड़ी ही चतुराई से रेणुका को कॉल कर.. फोन टेबल पर ही छोड़ दिया.. ताकि रेणुका, उसकी और इन्स्पेक्टर की बातें सुन ले.. और फिर बात करने में कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए

शीला: "सर आपको एतराज न हो तो मैं हमारे दोस्त रेणुका और राजेश को भी यही बुला लूँ?? ताकि आप पूछताछ कर सकें और तसल्ली हो जाए.. आप का समय भी बच जाएगा"

इन्स्पेक्टर: "सॉरी मैडम.. पर ये देखिए.. होटल के रजिस्टर में यह कमरा किसी मिस्टर मेक के नाम से बुक किया गया है"

शीला: "सर, इस बारे में तो मुझे कुछ नहीं पता.. हम तो एक घंटे पहले ही यहाँ पहुंचे है.. और अभी तक हमने चेक-इन की विधि भी नहीं की है.. क्यों की मेरे पति को इतने लूज मोशन हो रहे थे.. की यह सब कार्यवाही का समय ही नहीं था.. वैसे भी रात के बारह बजे थे.. इसलिए हमने सोचा की रजिस्ट्रेशन हम सुबह कर लेंगे.. !!!"

बाहर हो रही बातचीत सुनकर.. मदन को वाकई में पतले दस्त हो गए.. अंदर से आ रही पैखाने की गरजदार आवाज़ें सुनकर.. इन्स्पेक्टर को भी विश्वास हो गया शीला की बातों पर.. कोई इंसान झूठ बोल सकता है.. पर लूज मोशन्स की आवाज़े निकालना मुमकिन नहीं है.. इन्स्पेक्टर की नजरें कब से शीला की मादक क्लीवेज पर चिपक गई थी..

इन्स्पेक्टर: "ठीक है मैडम.. आपके पति ठीक से रिलेक्स हो जाए तब तक हम आपके दोस्तों की पूछताछ कर लेते है.. "

शीला: "जी जरूर सर.. वो मेरी सहेली रेणुका.. पुलिस को देखकर बहोत डर जाती है.. आप समझ सकते हो सर.. !!"

इन्स्पेक्टर: "कोई बात नहीं.. चलिए.. हम उनके रूम में चलते है"

शीला: "सर, अगर उन दोनों को यहीं बुला ले तो?? क्या है की मेरे पति की तबीयत के चलते.. मेरा यहाँ रहना जरूरी है..!! इस तरह.. आपकी पूछताछ भी हो जाएगी.. और मेरे पति को किसी चीज की जरूरत पड़ी तो मैं संभाल भी सकूँगी.. !!"

इन्स्पेक्टर: "ठीक है मैडम.. बुलाइए उन दोनों को इधर.. !!"

पुलिस का नाम सुनते ही.. मदन को सच में लूज मोशन हो गए.. उसका दिमाग सुन्न हो गया था.. कुछ सूझ नहीं रहा था.. एक साथ सेंकड़ों सवाल दिमाग में घूमने लगे थे.. उन सब सवालों में.. सब से बड़ा सवाल था.. शीला यहाँ पहुंची कैसे????

इंस्पेक्टर खान ने हवालदार को इशारा करते ही वो दूसरे कमरे से रेणुका और राजेश को बुला लाया.. दोनों बेहद घबराए हुए थे.. इंस्पेक्टर ने एक दो मामूली से सवाल किए जिसके जवाब देने में ही दोनों की फट गई.. तुरंत शीला ने बाजी अपने हाथ में ले ली और मामले को संभाल लिया.. उस दौरान मदन भी टॉइलेट से बाहर निकल आया.. उसके चेहरे का नूर गायब हो चुका था..

एक रात मजे करने की कितनी बड़ी किंमत चुकानी पड़ रही थी.. !!

थोड़े और सवाल करने के बाद.. इन्स्पेक्टर ने चारों के आइडेंटिटी प्रूफ मांगें.. चेक करने पर उन्हें तसल्ली हो गई की वह वाकई पति पत्नी ही थे..

इन्स्पेक्टर: "आप सब को डिस्टर्ब करने के लिए माफी चाहता हूँ.. पर आप समझ सकते है की यह हमारी जिम्मेदारी का हिस्सा है.. " फिर मदन की ओर मुड़कर उन्हों ने कहा "मिस्टर, आप तुरंत किसी डॉक्टर को ढूंढकर दवाई ले लीजिए.. फूड-पॉइजन का मामला हो सकता है..!!"

इन्स्पेक्टर के जाते ही सब को ऐसा महसूस हुआ जैसे छाती पर से एक टन का वज़न कम हो गया हो..!! राजेश और मदन तो रेणुका-शीला से नजरें तक नहीं मिला पा रहे थे.. चारों गुमसुम थे..

आखिर माहोल को स्वाभाविक बनाने के लिए.. शीला ने टेबल से पैकेट उठाकर सिगरेट जलाई.. और एक कश खींचकर सिगरेट रेणुका के हाथों में थमा दी.. मदन और राजेश की सिट्टी-पीट्टी गूम हो गई थी.. जैसे पुलिस थाने में उन्हें रिमांड पर लिया गया हो और इंस्पेक्टर थर्ड डिग्री आजमाने की तैयारी में हो.. कुछ ऐसा ही माहोल था..

मदन और राजेश, अपनी बीवियों को पराये मर्दों से चुदते हुए देखने के बावजूद कुछ बोल पाने की स्थिति में न थे.. क्यों की आज अगर शीला और रेणुका यहाँ नहीं होती तो क्या होता.. यह सोचकर ही दोनों कांप उठते थे..!!

अब सारा टेंशन दूर हो चुका था.. पर फिर भी मदन और राजेश बहोत घबराए हुए थे.. पुलिस का टेंशन खत्म हो चुका था.. पर अब बीवियों की अदालत में दोनों की पेशी होने वाली थी..

शीला चलते चलते मदन के सामने खड़ी होकर उसे देखती रही.. बेहद प्रभावशाली लग रही थी शीला.. अभी भी उसने वो गोल्डन शर्ट, बिना ब्रा के पहन रखा था.. जिसके ऊपर के दो बटन खुले हुए थे.. जिसमें से उसकी नशीली क्लीवेज की झलक नजर आ रहा थी..

शीला: "क्यों राजेश?? तुझे अपने दोस्त की बीवी को नंगा देखने का बड़ा मन था ना.. !!!"

राजेश ने नजरें झुका दी.. वो किसी भी तरह की सफाई देने की स्थिति में न था.. उसने शीला के बारे में जो भी इच्छाएं मदन के सामने जताई थी.. वो सब शीला और रेणुका सुन चुके थे..!! शीला के चमकीले सुनहरे शर्ट के दो खुले बटन से झलक रहे स्तनों के उभार.. और तेज ए.सी. की ठंडी हवा के कारण शर्ट के महीन कपड़े से उभरी हुई निप्पल का नजारा देखते हुए राजेश का गला सूख रहा था.. वो उभार.. वो जोबन.. वो कातिल हुस्न.. नज़ारे को और मादक बनाते हुए शीला ने अपना एक पैर बेड के ऊपर रखकर.. अपनी मेक्सी को जांघों तक उठाए रखा था.. उसका गोरा चमकता हुए घुटना भी बड़ा ही आकर्षक लग रहा था.. सफेद संगेमर्मरी जांघें.. ऐसा नजारा था की देखने वाला सिर्फ उसकी जांघों की सिलवटों पर अपना सुपाड़ा रगड़कर ही अपना पानी गिरा सकता था



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शीला का अर्ध-नग्न बदन अच्छे-अच्छों का खून गरम करने के लिए काफी था.. दो बड़े बड़े वक्षों वाली.. कामुक मादक गदराई औरत... बेफिक्री से सिगरेट फूंकते हुए धुएं के छल्ले बना रही थी.. अद्भुत द्रश्य था.. !! शीला के शर्ट को ध्यान से देखने पर.. वो शर्ट कई जगह से फटा नजर आ रहा था.. सूखे हुए वीर्य के कई धब्बे भी उसपर मौजूद थे.. पार्टी में एक साथ २०-२५ लोगों ने मिलकर उसे रौंदा था.. यह पूरा नजारा देखकर.. राजेश का लंड उसके बरमूडा में हरकत करने लगा.. और उसकी चड्डी में.. सब की नज़रों के सामने ही उभार बनाने लगा.. ऐसी गंभीर स्थिति में भी अपने लंड को नाचते देखकर राजेश को गुस्सा आ रहा था.. वो मन ही मन अपने लंड को कोस रहा था.. साले, तेरे चक्कर में आज इज्जत की मैया चुद जाती.. बाल बाल बचे है.. अब तो शांति से बैठ, मेरे भाई.. !!!

शीला ने रेणुका की ओर देखकर इशारा किया.. दोनों बिना कुछ कहें, उठ खड़े हुए.. और बगल के कमरे में जाकर सो गए.. राजेश और मदन एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे.. दोनों में से किसी को पता नहीं था की उन दोनों ने ऐसा क्यों किया... !!

सर पर हाथ रखकर मदन ने कहा "यार राजेश, मुसीबत खतम होने का नाम ही नहीं ले रही है.. !!"

राजेश का चेहरा भी बासी बासुंदी जैसा हो गया था.. दोनों बैठे बैठे अपनी किस्मत और अपने लंड को गालियां दे रहे थे..

दूसरे कमरे में...

रेणुका: "मुझे समझ नहीं आया शीला, आखिर तुमने वहाँ से निकल जाने के लिए क्यों कहा?? पतियों की अदला-बदली कर चुदवाने का मस्त मौका था यार.. !!

शीला; "नहीं... आज नहीं.. आज तो उन दोनों घोंचूओ को उदास ही पड़े रहने दे.. हम दोनों है ना.. !! एक दूसरे से खेलकर अपनी प्यास बुझा लेंगे आज की रात.. पर वो दोनों क्या करेंगे?? तड़पने दे सालों को.. !!!"

रेणुका: "बाप रे शीला.. बड़ी जालिम है रे तू.. पता है..!! ये तेरे बबले देखकर, राजेश का लंड खड़ा हो गया था.. !!"

शीला: "हाँ, देखा था मैंने.. पर तब अगर मैं उस लंड के मजे लेने जाती.. तो वो दोनों भी मूड में आ जाते.. मैं चाहती हूँ की सिर्फ एक रात के लिए उन दोनों को अपराधभाव से पीड़ित होने दु.. घर जाकर भी आसानी से नहीं मानना है.. एक एक पल तड़पाना है.. ऐसा करना है की वो दोनों हमारे पैरों पर गिरकर गिड़गिड़ाएं.. भीख मांगें.. ऐसा करने से हमारा पक्ष मजबूत होगा.. और फिर हम अपनी मनमानी कर सकेंगे"

शीला और रेणुका बेड पर लेटे लेटे सिगरेट फूँक रही थी.. और साथ ही साथ, एक दूसरे के स्तनों से खेलते हुए बातें कर रही थी.. शीला का शर्ट नीचे कर उसका स्तन बाहर निकालकर.. उसकी निप्पल चूसते हुए रेणुका ने पूछा


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रेणुका: "अरे शीला.. उस रबर के लंड वाली औरत का क्या हुआ होगा फिर??"

शीला: "अरे हाँ यार.. वो तो अपनी कोई लेस्बियन साथी को लेकर आई थी ना.. चल उसे ढूंढते है.. !!"

रेणुका: "अरे यार.. इतनी रात को कहाँ ढूँढेंगे?? एक एक कमरे पर जाकर दस्तक तो नहीं दे सकते है ना..!! और हमारे हक के दो दो लंड बगल के कमरे में पड़े है.. तब उस रबर के लंड से चुदवाने में क्या फायदा??

शीला: "तू चिंता मत कर.. हम दोनों बिना लंड के भी मजे करेंगे.. वैसे भी आज रात हमने कितने लंड देख लिए.. चूस लिए.. और खेल भी लिए.. मुझे थोड़ी जिज्ञासा इस लिए हो रही है क्यों की वो हेमंत कह रहा था की वो रबर के लंड वाली विकृत और काफी आक्रामक है.. देखें तो सही.. वो क्या चीज है.. कुछ नया देखने और जानने को मिलेगा.. चल.. चलते है"

रेणुका: "शीला, मुझे चलने में कोई दिक्कत नहीं है.. मैं बस यही कह रही हूँ की रात के तीन बजे किसी का दरवाजा खटखटाना मुनासिब होगा?"

शीला: "वो सब तू मुझ पर छोड़ दे.. चल कपड़े पहन ले.. "

अब रेणुका के पास, शीला के साथ जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था.. उसने तुरंत कपड़े पहन लीये.. और तैयार हो गई..

दोनों कमरे से बाहर निकलें.. रात के तीन बज रहे थे और पूरी लॉबी में नीरव शांति थी.. चार पाँच कमरों के दरवाजे खटखटाते हुए आखिर वह दोनों अपनी मंजिल पर पहुँच ही गई..

दरवाजा खोलने वाली उस औरत ने जल्दबाजी में गाउन पहन लिया था.. और उस पारदर्शी गाउन से रबर का लंड साफ नजर आ रहा था..


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शीला को तो वो देखते ही पहचान गई.. बिना किसी संकोच या औपचारिकता के शीला कमरे के अंदर घुस गई.. रेणुका को अपने पीछे खींचते हुए..!!

फिर तीन बजे से पाँच बजे तक.. चारों औरतों ने मिलकर.. उस रबर के लंड से भरपूर चुदाई कर उसकी धज्जियां उड़ा दी.. अपने भोसड़ों की आग बुझाकर.. रेणुका और शीला चुपचाप कमरे में वापिस लौट आई.. शीला के साहस के कारण रेणुका को इस अनूठे अनुभव का आनंद मिला था और इसलिए अब वह शीला के गहरे प्रभाव के तले दब चुकी थी..


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पूरी रात की इन गतिविधियों के बाद रेणुका बेड पर लेटकर आराम करने जा ही रही थी की तब शीला ने उसका हाथ पकड़कर कहा

शीला: "चल रेणु.. मदन और राजेश के जागने से पहले हमें होटल छोड़ देनी है.. हम उनके साथ बात भी नहीं करेंगे और उन्हें बताएंगे भी नहीं"

आज की रात के अनुभव के बाद, रेणुका इतना तो जान ही गई थी की शीला की बुद्धि उससे सौ गुना ज्यादा तेज थी.. शीला के साथ निरर्थक बहस करने का कोई मतल नहीं था..

दोनों फटाफट बाथरूम में घुसी.. और एक साथ नहाने लगी.. बाहर निकलकर कपड़े पहने.. और चेक-आउट कर दोनों निकल गई.. मदन और राजेश तब अपने कमरे में खर्राटे लेकर सो रहे थे..

सुबह सात बजे राजेश की आँख खुली.. आँखें मलते हुए जब उसका दिमाग थोड़ा जागृत हुआ.. तब कल की डरावनी यादें ताज़ा हो गई.. !! और वो बेड पर स्प्रिंग की तरह उछल गया.. उसने झकझोर कर मदन को जगाया..

राजेश: "अरे यार मदन.. उठ जा यार.. चल यहाँ से जल्दी निकल जाते है.. मुझे तो यहाँ अब एक पल और रहने में भी डर लग रहा है!!"

मदन तुरंत जाग गया.. दोनों ने कपड़े पहने और बगल वाले कमरे में देखने गए.. वो कमरा खुला था और अंदर कोई नहीं था.. मतलब साफ था.. दोनों निकल चुकी थी.. उदास होकर सामान लेकर दोनों रीसेप्शन पर पहुंचे.. चेक-आउट कर दोनों बाहर निकलें.. गाड़ी में बैठकर दोनों की सांसें तब तक पूर्ववत नहीं हुई जब तक की वो शहर से बाहर नहीं निकल गए..
 
मदन तुरंत जाग गया.. दोनों ने कपड़े पहने और बगल वाले कमरे में देखने गए.. वो कमरा खुला था और अंदर कोई नहीं था.. मतलब साफ था.. दोनों निकल चुकी थी.. उदास होकर सामान लेकर दोनों रीसेप्शन पर पहुंचे.. चेक-आउट कर दोनों बाहर निकलें.. गाड़ी में बैठकर दोनों की सांसें तब तक पूर्ववत नहीं हुई जब तक की वो शहर से बाहर नहीं निकल गए..

उस दौरान, रेणुका और शीला, बड़े ही आराम से मस्ती करते हुए गाड़ी में अपने शहर की ओर जा रहे थे.. देखते ही देखते दोनों रेणुका के घर पहुँच गए.. शीला ऑटो लेकर घर पहुंची.. तब वैशाली ऑफिस जा चुकी थी.. रेणुका और शीला के बीच.. गाड़ी में जो गुफ्तगू हुई, वो जबरदस्त थी..!!

सुबह के दस बज गए थे.. पिछली रात के संस्मरणों के बारे में सोचते हुए शीला रोजमर्रा के काम में मशरूफ़ हो गई...

दोपहर तीन बजे के करीब मदन घर पहुंचा.. उसका चेहरा इतना उदास था, जैसे कोई उसके गोटे चुराकर भाग गया हो.. !! शीला ने उसका ऐसे स्वागत किया जैसे कल रात कुछ हुआ ही न हो.. एकदम स्वाभाविक व्यवहार दिखाया उसने.. !!

मदन धीरे धीरे चलते हुए सोफ़े पर जा बैठा.. शीला उसके लिए पानी का ग्लास लेकर आई..

यहाँ आने से पहले मन ही मन मदन सोच रहा था की घर पहुंचते ही शीला उसकी बैंड बजा देगी.. पर ये तो बिल्कुल उल्टा ही हो रहा था.. !! हाथ में ग्लास थमाकर शीला कोई गीत गुनगुनाते हुए किचन में चली गई.. थोड़ी देर के बाद अदरख की खुश्बू से पता चला की अंदर मस्त मसालेदार चाय बन रही थी..

हाथ में दो बड़े चाय से भरे मग लेकर शीला बाहर आई.. एक मग मदन को दिया और मदन के करीब सोफ़े पर बैठ गई..

मदन की हालत इतनी खस्ता थी की खिड़की के बाहर अपने बरामदे में झुककर झाड़ू लगा रही कविता के लटकते बबले देखने का भी मन नहीं हो रहा था उसे..

अपनी आँखें मटकाते हुए बड़े ही शरारती अंदाज में शीला ने मदन से पूछा "कैसी रही मीटिंग?"

मदन ने जवाब नहीं दिया..

मदन को इस स्थिति में देखकर शीला बेहद खुश हुई.. सशक्त और प्रभावशाली महिलाएं अपनी शक्ति और प्रभाव को पुरुषों पर हमेशा स्थापित करना चाहती हैं.. ऐसी महिलाएं अपनी स्थिति और अधिकार को तब महसूस करती हैं, जब वे अपने पुरुषों को कमजोर या उनके दायित्वों के तले दबा हुआ देखती हैं.. ऐसे सूरत में, महिलाएं आम तौर पर पुरुषों को नियंत्रण में रखने का आनंद महसूस करती हैं, और यह शक्ति का असमान वितरण उनके आत्म-सम्मान और संतुष्टि का हिस्सा बन जाता है..!!

मदन को ओर उंगली करने के लिए उसने उसे कुहनी मारकर कविता की तरफ इशारा करते हुए कहा "वो देख.. कविता के भी उस बार्बी जैसे ही है.. बुला ले उसे आज रात को.. !! तो क्या है, की तुझे झूठ बोलकर दोबारा इतने दूर जाना नहीं पड़ेगा"

मदन: "प्लीज यार शीला.. कविता के लिए ऐसा मत बोल.. उसमें उस बेचारी का क्या दोष?"

शीला: "बात तो तेरी सही है मदन.. पर क्या करूँ?? घूम फिरकर वही सारी बातें याद आ जाती है.. कल जब रेणुका तेरा लंड चूस रही थी.. तब तेरी उत्तेजना जबरदस्त बढ़ गई थी.. मैंने अपनी आँखों से देखा है इसलिए मुकर मत जाना.. वरना मर गया आज तो.. !!"

रेणुका की बात छेड़कर शीला क्या कहना चाह रही थी इसके बारे में मदन सोचता उससे पहले शीला ने और एक बाउंड्री मार दी..

शीला: "बिना मुझ से पूछे.. तुम दोनों ने आपस में ही बीवियाँ बदलने का तय कैसे कर लिया????"

मदन: "अरे यार.. तू ही तो कहती थी.. की तुझे ग्रुप सेक्स करना है.. बी.पी. देखते हुए तू कितनी गरम हो जाती थी और ऐसी बातें किया करती थी.. !! भूल गई क्या??"

शीला: "मदन, चल अंदर चलकर बात करते है"

मदन: "नहीं.. यही पर ही ठीक है.. " मदन जानता था की अंदर बेडरूम में ले जाने का बाद शीला कुछ भी कर सकती थी.. उसे वो जोखिम लेना ही नहीं था..

चाय खत्म हो गई.. पर दोनों की गरमागरम बातें खत्म नहीं हुई.. बड़ी मुश्किल से मदन ने शीला से अपनी जान छुड़ाते हुए कहा

मदन: "मैं थोड़ी देर बाहर जाकर आता हूँ"

शीला ने उसे रोका नहीं.. और वो चला गया.. शीला सोफ़े पर बैठे बैठे आगे की रणनीति सोच रही थी तभी मदन के फोन की रिंग बजी.. जल्दबाजी में मदन फोन ले जाना ही भूल गया था.. !!

शीला ने फोन हाथ में लिया.. स्क्रीन पर रेणुका का नाम नजर आ रहा था.. शीला ने फोन उठाया और कुछ बात की.. फोन काटकर उसने राजेश को फोन लगाया..

राजेश: "हैलो भाभी जी, कैसी है आप?" बड़ी ही विनम्रता से राजेश ने कहा

शीला: "अरे वाह.. कितने भोले बन रहे हो.. इतने भोले राजेश से मुझे कोई बात नहीं करनी.. रखती हूँ" बड़ी शातिर थी शीला

राजेश: "अरे नहीं नहीं भाभी.. कहिए, क्या काम था? वो तो.. कल रात के बाद.. आप से बात करने में थोड़ा संकोच हो रहा था इसलिए.. वरना आप के सामने भला कौन भोला बनकर रहना चाहेगा.. !!"

शीला ने मुस्कुराकर कहा "अच्छा.. !!! मैं तो समझ रही थी की मैं बूढ़ी हो चुकी हूँ"

राजेश: "भाभी जी, शराब जितनी पुरानी हो उतना ही ज्यादा मज़ा देती है"

शीला: "तो क्या मैं शराब हूँ? तब तो मुझ पर भी सरकार को रोक लगा देनी चाहिए"

राजेश: "खुलेआम मजे लेने पर तो वैसे भी रोक ही है ना.. फिर वो शराब हो या आप.. !! पर चुपके चुपके क्या कुछ नहीं हो सकता.. !! कल रात को ही आपने सारे नज़ारे देख लिए है"

शीला: "राजेश, एक बात कहूँ.. पर किसी को बताना मत"

राजेश: "हाँ कहिए भाभी.. "

शीला: "नहीं ऐसे नहीं.. पहले वादा करो को आप किसी को नहीं बाताओगे.. रेणुका को भी नहीं.. यह बात सिर्फ हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिए"

राजेश: "बात क्या है भाभी? कुछ सीक्रेट है क्या? वैसे सीक्रेट बात हो या काम.. दोनों में ही मज़ा आता है.. जल्दी कहिए"

शीला: "पहले वादा करो किसी को नहीं बताओगे"

राजेश: "ठीक है, वादा करता हूँ"

शीला: "कैसे कहूँ... मुझे तो शर्म आती है.. राजेश.. कल तुम बहोत ही हार्ड थे.. तुम्हारा वो... उसकी तस्वीर मेरी आँखों के सामने से हट ही नहीं रही है"

सुनते ही राजेश का लंड ऐसे खड़ा हो गया जैसे अभी अभी वियाग्रा के साथ रेड-बुल के दो टीन पी लिए हो.. !! ऐसी उत्तेजना का अनुभव उसने इससे पहले सिर्फ एक ही बार किया था.. माउंट आबू में बियर पीने के बाद जब टॉइलेट में वैशाली ने उसे अंदर खींचकर उसका लंड पकड़ लिया था..!!

शीला: "राजेश, आप मेरे बारे में कुछ बुरा मत सोचिएगा.. आप दोनों जो अंदर अंदर स्वैपिंग करने की बात कर रहे थे.. उसके लिए रेणुका तैयार हो जाती.. शायद मैं भी तैयार हो जाती.. पर मदन कभी भी तैयार नहीं होगा.. मुझसे इतनी मोहब्बत करता है वो.. मुझे किसी और की बाहों में वो देख ही नहीं पाएगा.. !!"

राजेश: "अरे भाभी.. वो सब बातें तो हम सिर्फ मज़ाक मज़ाक में कर रहे थे.. आप उसे सिरियसली मत लीजिए.. चाहे आप हो या रेणुका.. अपने पति के दोस्त के साथ ऐसा करने की कौन भला सोचेगा??"

शीला: "सोच तो कोई भी सकता है.. कुछ भी नामुमकिन नहीं होता.. पति की जानकारी में ये करना जरूर मुश्किल है.. पर उससे छुपाकर तो हो ही सकता है"

सुनकर राजेश के होश उड़ गए "आप क्या कह रही हो भाभी????"

शीला: "प्लीज राजेश.. ये तो अच्छा हुआ की मदन अपना फोन भूल गया तो मैं उसके फोन से ये बात कह रही हूँ.. वरना मेरी ये इच्छा अधूरी ही रह जाती.. सामने से तो ऐसा कहने की मेरी हिम्मत कभी नहीं होती.. पर आज जब मौका मिल ही गया तो मैं उसे छोड़ना भी नहीं चाहती.. मुझे कहने दीजिए.. जब से मैंने तुमको इतना हार्ड होते हुए देखा है.. तब से मेरे रोम रोम में बस तुम्हारी ही याद बसी हुई है.. जो हरदम मुझे मजबूर कर रही है की उस हार्डनेस का अनुभव किए बगैर मैं रह नहीं पाऊँगी.. सिर्फ एक बार.. प्लीज मुझे चांस दो.. आई लव यू राजेश"

स्तब्ध हो गया राजेश.. !! ये क्या खेल खेल रही थी शीला उसके साथ.. !! शीला ने आई लव यु तक बोल दीया?? कोई इतनी जल्दी कैसे किसी से प्रेम कर सकता है?? शीला जबरदस्त गरम औरत थी उसमें कोई दो राय नहीं थी.. पर जैसे भी थी.. थी तो वो उसके दोस्त की बीवी.. मदन के साथ ऐसा धोखा मैं कैसे कर सकता हूँ??

धोखा..!! यह शब्द याद आते ही राजेश के दिल ने उसे एक मजबूत लात लगाकर मैदान के बाहर फेंक दिया.. धोखा देने में अब बाकी ही क्या बचा था?? और मदन भी तो रेणुका की चूत चाट ही चुका था.. !! वो भी मेरे नज़रों के सामने.. !! तो अब धोखे वाली बात के बारे में सोचने का कोई मतलब ही नहीं था.. और मैं कहाँ शीला पर कोई जबरदस्ती कर रहा हूँ?? या उसे फुसला रहा हूँ? ना ही मैं उसे कोई धोखा दे रहा हूँ.. जब वो ही सामने से चलकर आ रही है तो... !!

शीला: "क्या सोच रहे हो राजेश?? यही ना.. की मैं कितनी गिरी हुई और घटिया किस्म की औरत हूँ.. !!"

राजेश चुप ही रहा

शीला: "अब तुम मुझे घटिया समझो या गिरी हुई समझो.. पर मैं अपनी इच्छा को अधूरी छोड़ने वालों में से नहीं हूँ.. मुझे तो कल रात को ही तुम्हारा हार्ड पेनीस देखकर, उसे अंदर लेने का मन कर रहा था.. पर सच कहूँ तो मदन की मौजूदगी में.. मैं खुलकर मज़ा न ले पाती.. मुझे एकांत चाहिए.. सिर्फ तुम और मैं अकेले.. दुनिया का कोई एक ऐसा कोना जहां पर हम दोनों के अलावा और कोई न हो.. ऐसे माहोल में.. मैं मुक्त होकर तुम्हारे साथ इन्जॉय करना चाहती हूँ.. प्लीज मुझे निराश मत करना.. मैं मर रही हूँ तुम्हारी सख्ती को अपने अंदर महसूस करने के लिए.. !!"

राजेश के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे.. शीला ने तो उसे प्रपोज ही कर दिया.. !! अब क्या जवाब दें.. !!

फोन पर बात करते हुए राजेश गाड़ी ड्राइव कर रहा था.. अपने घर की ओर.. वो घर पहुंचकर रेणुका के साथ अपने संबंधों को वापिस दुरस्त करना चाहता था.. दूध फट तो चुका था.. अब उससे जितना जल्दी पनीर बना लिया जाए उतना अच्छा.. !! और इसी बीच शीला का फोन आ गया.. गाड़ी चलाते हुए उसका लंड खड़ा हो गया था.. शीला की बातों ने उसके लंड को फिर बैठने ही नहीं दिया.. ऐसा हाल हो गया की गाड़ी चलाते चलाते ही उसने अपना लंड बाहर निकाला और मूठ लगाने लगा..

राजेश: "ओह्ह भाभी.. अपना तो मेरा हाल कल रात जैसा कर दिया.."

शीला: "तो फिर आ जाओ.. मदन बाहर गया है.. घर पर कोई नहीं है"

राजेश: "और कहीं वो आ गया तो?"

शीला: "एक काम करती हूँ.. उसे फोन करके पूछ लेती हूँ.. की कब लौटने वाला है"

राजेश: "पर कैसे पूछोगी? फोन तो उसका घर पर ही है"

शीला: "जाने दो.. लगता है तुम्हारी हिम्मत नहीं हो रही है"

राजेश: "ऐसा नहीं है भाभी... पर.. !!!"

शीला ने नाराज होकर कहा "मदन लौट आया है" और उसने फोन काट दिया

फोन रखने के बाद शीला को अफसोस हो रहा था की आखिर वासना की बाढ़ में बहकर उसने राजेश से ऐसी बात की ही क्यों?? अब वो क्या सोचेगा मेरे बारे में??

शीला की बातों से बेहद उत्तेजित होकर.. राजेश ने रोड के किनारे गाड़ी पार्क कर दी.. और मूठ लगाते हुए अपने रुमाल में पिचकारी मार ली.. और फिर घर की ओर निकल गया

घर के गंभीर वातावरण को देखते हुए अब वहाँ किसी उत्तेजक घटना के घटने की कोई संभावना नहीं थी.. जैसा राजेश ने सोचा था.. रेणुका मुंह फुलाकर बैठी हुई थी.. और उससे बात करने के मूड में नहीं थी.. और वो स्वाभाविक भी था.. इसलिए राजेश को कोई ताज्जुब नहीं हुआ..

उस रात उन दोनों के बीच कुछ खास नहीं हुआ.. पर बगल में सो रहे दोनों के दिमाग में पिछली रात की घटनाएं घूम रही थी.. रेणुका मदन के लंड को याद कर रही थी.. जब की राजेश के दिमाग में शीला ने आज दोपहर को कही हुई बातें बार बार आ रही थी..

इस तरफ मदन और शीला के हाल भी कुछ ऐसे ही थे.. शीला पार्टी के सारे लंड याद कर रही थी.. जब की मदन के दिमाग में रेणुका का छरहरा बदन घूम रहा था..

राजेश सोते सोते सोच रहा था.. आह्ह.. आज शीला भाभी ने मेरे लंड की तारीफ की.. मुझे खुला निमंत्रण तक दे दिया.. !! याद करते ही राजेश के मुंह से एक सिसकी निकल गई.. जो बगल में लेटकर उत्तेजना से झुलस रही रेणुका ने स्पष्ट रूप से सुना.. पर वह कुछ बोली नहीं.. वो मन ही मन सोच रही थी की अगर कल रात पुलिस की रैड न पड़ी होती.. तो वो और शीला अपनी पहचान अंत तक छुपाने में कामयाब रहते.. और रात का पूरा लुत्फ उठा पाते.. खैर फिर जो हुआ वो कल्पनातीत था.. भला हो शीला का.. जिसने अपनी सही पहचान बताकर सबको बचा लिया.. वरना आज सब के सब जैल की सलाखों के पीछे होते.. बाप रे.. !! समाज में क्या इज्जत रह जाती.. !! हाथ में नाम और पता लिखा हुआ बोर्ड थमाकर पुलिस वाले तस्वीर खींचते और अखबार वाले उसे पहले पन्ने पर छाप देते.. !!!

इस तरफ शीला करवट लेकर अपनी निप्पल को मसल रही थी.. उससे अब यह उत्तेजना बर्दाश्त नहीं हो रही थी.. हेमंत के जवान ताजे लंड ने उसे जो मजे दीये थे.. उसे याद करते हुए वह बहोत गर्म हो गई.. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका पूरा बदन बुखार से तप रहा हो.. ऊपर से, राजेश को लंड को चूसने पर जो शानदार किक मिली थी वो स्खलित होने के लिए काफी थी.. राजेश के लंड की याद आते ही शीला के भोसड़े में हवस की आग लग गई.. कुछ भी हो जाए.. एक बार तो वो लंड अंदर लेना ही है.. !! पर वो साला एक नंबर का डरपोक है.. क्या किया जाए?? मदन शहर से कहीं बाहर चला जाएँ तो फिर बढ़िया मौके का सेटिंग हो सकता है.. पर वैशाली तो घर पर ही होगी.. उसका क्या करें?? राजेश के घर पर रेणुका हर वक्त रहती थी.. ऑफिस मे पीयूष और पिंटू दोनों उसे पहचानते थे.. और यहाँ घर पर वैशाली और मदन का टेंशन.. ऊपर से.. कविता और अनुमौसी के नज़रों से बचाकर कुछ भी करना नामुमकिन सा था..

सोचते सोचते शीला अपनी चूत को कुरेदती रही.. और ऐसा सोचती रही की जैसे राजेश का लंड अंदर घुस रहा हो.. थोड़ी देर में ही उसकी चूत ने शहद टपका दिया.. और वो सो गई..

दूसरी सुबह, लगभग ग्यारह बजे के आसपास.. मदन पर राजेश का फोन आया.. दोनों ने काफी देर तक लंबी बातचीत की.. शीला बगल मे ही बैठी थी.. पर उस रात की घटना के बाद मदन की हिम्मत नहीं हो रही थी की वो खड़ा होकर, शीला से दूर जाकर बात करें.. उस रात के बारे में अब तक शीला और मदन के बीच खुल कर बात हुई भी नहीं थी.. !! आखिर मदन ने "बाद में बात करते है" कहते हुए फोन रख दिया..

शीला ने कुछ पूछा नहीं.. उसने उठकर डाइनिंग टेबल पर खाना लगा दिया.. मदन ने भी चुपचाप पालतू कुत्ते की तरह खाना खा लिया.. और शीला को बिना कुछ बताएं बाहर चला गया.. वो जितना हो सकें.. शीला के वाक्य-बाणों से दूर रहना चाहता था..

मदन ने बाहर निकलते ही राजेश को फोन किया.. और सीधा उसकी ऑफिस पहुँच गया.. पापा को देखकर वैशाली बहुत ही खुश हो गई.. काफी देर तक मदन और वैशाली की बातें चली.. बड़े ही उत्साह से वैशाली ने अपने काम के बारे मे बताया..

मदन ने राजेश की चेम्बर में प्रवेश किया.. राजेश ने बेल बजाकर प्युन को बुलाया और दो कप कॉफी मँगवाई.. और दोनों बातों में मशरूफ़ हो गए

राजेश: "मदन यार.. घर पर सब कैसा है?? मेरी तो वाट लगी पड़ी है.. !!"

मदन: "मेरा भी हाल कुछ ऐसा ही है.. तेरी भाभी तो मुझसे सीधे मुंह बात भी नहीं करती.. अपने ही घर में बेघर की तरह जी रहा हूँ.. बस खाना खाकर कोने में पड़ा रहता हूँ.. एक रात के मजे की इतनी बड़ी किंमत चुकानी पड़ेगी ये अंदाजा नहीं था.. बहोत बड़ी गलती हो गई.. तुझे क्या लगता है?"

राजेश: "बिल्कुल सच कहा तूने यार.. पर सोच.. अगर वहाँ हमारी बीवियाँ और पुलिस न आए होते तो कितना मज़ा आता.. !!"

मदन: "वो सब तो ठीक है यार.. पर ये सोच.. हो सकता है पुलिस को अपने सूत्रों से खबर मिली हो और उन्हों ने रैड कर दी.. पर मेरा दिमाग तो यह सोचकर खराब हुआ जा रहा है की हमारी बीवियों को इस बारे में कैसे और कहाँ से पता चला?? और वो दोनों वहाँ पहुंची कैसे??"

राजेश: "तुझे क्या लगता है मदन.. हम जो कुछ भी करते है.. उसका हमारी पत्नियों को पता नहीं चलता.. !! सब पता चलता है.. अगर हम न भी बताएं तो वो हमारी हरकतों से भांप लेती है की कहीं कुछ गलत हो रहा है.. उसे ही तो औरतों की छठी इंद्रिय कहा गया है.. असल मे.. वह लोग बहुत कुछ जानते हुए भी अनजान बने रहते है.. "

मदन: "नहीं यार.. मैं नहीं मानता.. !!"

राजेश: "ऐसा ही होता है मदन.. तू माने या ना मानें.. हकीकत यही है.. जब तक औरतों को अपनी सलामती या इज्जत पर कोई आंच आती न दिखे.. तब तक वो सब कुछ सह लेती है.. पर उन्हें जरा सा भी शक हुआ या डर लगा की मामला बिगड़ रहा है.. वह तुरंत ही सक्रिय हो जाती है.. और फिर वो किस हद तक जा सकती है, वो तो हम दोनों ने अपनी आँखों से देख ही लिया है"

मदन: "हाँ यार.. पर ताज्जुब इस बात का है.. की वो दोनों पुलिस से भी पहले पहुँच चुके थे.. उस हिसाब से उनका नेटवर्क तो पुलिस से भी ज्यादा मजबूत हुआ.. !!"

दोनों बातें कर रहे थे उस वक्त वैशाली कॉफी के तीन कप लेकर चेम्बर के अंदर आई.. राजेश और मदन ने बड़ी ही सफाई से अपनी बात बदल दी और क्रिकेट के बारे में बातें करने लगे..

टेबल पर तीनों कप रखकर वैशाली बैठ गई.. राजेश, मदन की मौजूदगी में ही वैशाली के विशाल तंदूरस्त स्तन-युग्म को देख रहा था.. जिस तरह से वो चलकर अंदर आई.. टाइट टी-शर्ट के अंदर दबी हुई चूचियाँ तालबद्ध लय में ऊपर नीचे हो रही थी.. एक पल के लिए मदन का इमान भी डोल गया पर उसने उस घृणास्पद विचार को रोक लिया..

वैशाली: "सॉरी पापा.. मैं आप लोगों को डिस्टर्ब कर रही हूँ.. पर मुझे आप से कुछ जरूरी बात करनी है.. !!"

मदन: "हाँ बोल न बेटा.. !!"

बाप-बेटी की बातचीत बड़े ध्यान से सुनते हुए राजेश अब भी वैशाली के कटीले बबलों को ताड़ रहा था

वैशाली: "दरअसल अभी मौसम का फोन आया था.. उसने मुझे और कविता को अर्जेंट उसके घर बुलाया है.. दो दिनों के लिए.. वो फोन पर बहोत ही रो रही थी.. !!"

राजेश: "तब तो बात जरूर बहोत गंभीर होगी.. !!"

मदन: "उसने कारण बताया या नहीं?? कुछ ज्यादा गंभीर बात हो तो हम भी चलें तुम लोगों के साथ"

वैशाली: "और तो कुछ नहीं बताया पर इतना बोली की उसके मंगेतर तरुण के बीच बहोत बड़ा प्रॉब्लेम हुआ है.. और तरुण सगाई तोड़ना चाहता है"

यह सुनकर राजेश और मदन दोनों चोंक गए

राजेश: "क्या?? ऐसे कैसे सगाई तोड़ सकता है?? कोई मज़ाक है क्या?? पर कुछ तो हुआ होगा उन दोनों के बीच... कुछ बताया मौसम ने?"

वैशाली: "वो फोन पर कुछ भी बताने को राजी नहीं है.. अब तो वहाँ जाकर ही कुछ पता चलेगा की मामले आखिर क्या है.. !!"

मदन: "ये आजकल के बच्चे भी ना.. सगाई-शादी जैसे गंभीर संबंधों को भी गुड्डे-गुड्डियों का खेल ही समझते है.. जब मर्जी की तब कर लिया.. और मन भर गया तो फेंक कर खड़े हो गए.. अरे भाई.. ऐसे थोड़े ही होता है.. !!"

राजेश: "बिल्कुल सही कहा तूने, मदन.. !! सच में.. मुझे तो अब अभी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा"

मदन: "वैशाली बेटा.. तुझे जाना ही चाहिए.. मौसम की इस स्थिति को सहेलियाँ ही बेहतर समझ सकेगी और अच्छे से हेंडल भी कर सकेगी.. माँ-बाप इसमें ज्यादा कुछ कर नहीं सकते.. उन बेचारों पर तो आसमान टूट पड़ा होगा यह सुनकर... !!"

वैशाली: "ठीक है पापा.. मैं अभी घर को निकलती हूँ.. कविता से भी बात करनी होगी.."

मदन: "ठीक है बेटा.. "

वैशाली ने राजेश की ओर मुड़कर कहा "सर, आज का काम तो मैंने खतम कर दिया है.. अब वापिस आने में एक दो दिन लग सकते है.. तो क्या मैं जा सकती हूँ?"

राजेश: "अरे वैशाली.. यह भी कोई पूछने की बात है?? तू ऑफिस की चिंता मत कर और जा.." राजेश ने ड्रॉअर खोलकर पाँच सौ के दस नोट निकालकर वैशाली को दीये और कहा "ये साथ में रखना.. काम आएंगे"

मदन: "अरे राजेश, क्या कर रहा है यार तू.. उसे जरूरत होगी तो मुझसे ले लेगी.. तू क्यों दे रहा है??"

राजेश: "मुझे पता है की तू उसे दे ही सकता है.. पर अब एक बात समझ ले.. वैशाली को अपने पैरों पर खड़े होना होगा.. और उसमें हम सब उसकी मदद करेंगे.. वो अपनी तनख्वाह से खुद के खर्चे संभालेगी.. हाँ, उसे कभी कुछ भी ज्यादा जरूरत हुई तो हम सब है ना.. !! बाकी उसे अपने हिस्साब से ही जीने दे.. उससे उसका मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ेगा... वैशाली, तुम निकलो.. वहाँ जाकर इस प्रॉब्लेम का सही कारण ढूँढने की कोशिश करना.. और पता चले तो अपने पापा को तुरंत बताना.. हो सकता है हम लोग इसमें कुछ मदद कर सकें.. "

वैशाली: "ओके सर.. थेंकस..!!" कहते हुए वैशाली उठकर चली गई.. मुड़कर जाती हुई वैशाली के मटकते नितंब देखकर राजेश की दिल मे जबरदस्त सुरसुरी सी होने लगी..

वैशाली ने बाहर निकलकर ऑटो पकड़ी और तुरंत घर पहुँच गई.. ऑटो में बैठे बैठे उसने पिंटू को सारी बात फोन पर बता दी.. धीरे धीरे पिंटू अब.. किसी और की हो चुकी कविता से ज्यादा वैशाली के प्रति अपना ध्यान केंद्रित कर रहा था.. पिंटू का टूटा हुआ दिल.. और वैशाली का बर्बाद हो चुका वैवाहिक जीवन.. दोनों एक दूजे के लिए आदर्श विकल्प थे.. पर जब जब पिंटू के दिमाग में कविता का विचार आता.. तब उसे लगता की वो कविता का स्थान और किसी को भी नहीं दे पाएगा.. यही सोचकर वो वैशाली से पर्याप्त दूरी बनाए रखता था.. एक बार तो उसे दिमाग में भी आया.. की वो भी वैशाली के साथ जाएँ.. उसी बहाने वह घर भी जा सकेगा और वैशाली के साथ कुछ समय बिताने का मौका भी मिल जाएगा.. पर जैसे ही उसे पता चला की वैशाली तो कविता के साथ जा रही है.. उसने वो प्लान केन्सल कर दिया.. !!

वैशाली घर पहुंची.. शीला घर पर अकेली थी.. वैशाली को इतना जल्दी घर आया देख उसे ताज्जुब हुआ..

शीला: "क्या हुआ बेटा?? तबीयत तो ठीक है ना तेरी??"

वैशाली: "मम्मी, मुझे कुछ नहीं हुआ है.. तुम कविता को यहाँ बुलाओ.. मुझे काम है उसका.."

शीला: "अरे पर हुआ क्या? क्या काम है उसका? तू ही क्यों नहीं चली जाती उसके घर? सब ठीक तो है ना??"

वैशाली: "कुछ भी ठीक नहीं है मम्मी.. मौसम का फोन था.. तरुण सगाई तोड़ना चाहता है.. बहुत रो रही थी बेचारी.. मुझे और कविता को वहाँ बुला रही है"

शीला स्तब्ध होकर बोली "क्या??? ऐसा कैसे हो सकता है? अभी पंद्रह दिन ही तो हुए है सगाई को.. !!"

वैशाली: "पता नहीं मम्मी.. शायद कविता को कुछ पता हो इसके बारे में.. मौसम ने इतना ही कहा की मैं उसकी दीदी को लेकर तुरंत वहाँ आ जाऊ"

शीला गहरी सोच में पड़ गई.. ऐसा तो क्या हो गया अचानक??

शीला ने फोन करके कविता को बुलाया.. कविता तुरंत आ गई.. उसे तो इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं था.. वो तो बेचारी सुनकर ही फुट फुटकर रोने लगी..

शीला और वैशाली ने बड़ी मुश्किल से उसे शांत किया और पानी पिलाया

शीला: "हिम्मत रख कविता.. जो होना था सो हो गया.. अच्छा हुआ की शादी से पहली ही हो गया.. वरना मौसम का हाल भी मेरी वैशाली जैसा हो जाता.. !!" और फिर अचानक शीला को याद आया और उसने वैशाली की ओर मुड़ कर देखा और कहा "अरे हाँ बेटा.. देख ये नोटिस आई है.. २५ तारीख को कोर्ट में सुनवाई है.. तुझे अपने पापा के साथ जाना है.. उससे पहले एक बार देसाई अंकल से मिल लेना"

वैशाली: "२५ तारीख को अभी बहोत देर है मम्मी.. फिलहाल मौसम को संभालना बहोत जरूरी है.. मैं सोच रही हूँ की मैं और कविता वहाँ चले जाते है"

शीला: "मुझे कोई प्रॉब्लेम नहीं है बेटा.. पर तुम दोनों अकेले कैसे जाओगी?"

वैशाली: "क्या मम्मी तुम भी!! दकियानूसी बातें कर रही हो.. हम अपने आप को संभाल सकती है.. "

शीला: "एक बार पापा से पूछ ले"

वैशाली: "मैंने उनसे पूछ लिया है.. वो ऑफिस पर ही थे.. उनसे भी पूछ लिया और राजेश सर की भी पर्मिशन ले ली है.. दोनों ने कहा की मुझे जाना चाहिए"

अब शीला के पास और कोई बहाना नहीं था.. वो बोली "ठीक है.. पर संभाल कर जाना.. ज़माना बहोत खराब है"

कविता उदास होकर घर चली गई.. जब वो आई तब उछलती हुई आई थी.. और जब जा रही थी तब उसके पैरों में से जान ही निकल गई थी

कविता ने घर आकर रोते हुए सारी बात अनुमौसी को बताई.. सुनकर मौसी का पारा सातवे आसमान पर चढ़ गया

अनुमौसी: "उस नालायक में हमारी मौसम को संभालने की ताकत ही नहीं होगी.. वरना क्या कमी है मौसम में?? वही लायक नहीं था मौसम के.."

शाम को पीयूष घर लौटा.. वो पूरा दिन ऑफिस के काम के सिलसिले में बाहर था इसलिए उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था.. जब कविता ने उसे सारी बात बताई तब वो भी बेहद चोंक गया.. एक पल के लिए तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ..

थोड़ी देर सोचकर पीयूष ने कहा "कल हम दोनों तेरे घर चलते है.. मैं तरुण को समझाऊँगा.. वो पढ़ा लिखा है.. शायद मेरी बात मान जाए.. वैसे मौसम ने तुझे कब बताया इस बारे में? फोन किया था उसने तुझे?"

कविता: "मुझे नहीं.. वैशाली को फोन किया था"

पीयूष: "वैशाली को क्यों फोन किया?? तुझे नहीं कर सकती थी?"

अनुमौसी: "अरे बेटा.. वैशाली को फोन किया हो या कविता को.. क्या फरक पड़ता है?? शायद वो बेचारी कविता को सदमा पहुंचाना न चाहती हो इसलिए वैशाली को फोन किया होगा.. अब तू और कविता वहाँ जाओ.. और हो सके तो उस गधे के बच्चे को समझाओ.. और ना समझे तो कान पकड़कर मेरे पास लेकर आना.. दो चपेड़ लगाकर सीधा कर दूँगी उसे.. !!"

उस रात को बेडरूम में कविता और पीयूष के बीच तरुण और मौसम को लेकर काफी चर्चा हुई.. पीयूष ने मौसम को फोन भी लगाया पर वो बात करने की स्थिति में नहीं थी.. मौसम की माँ, रमिला बहन ने रोते रोते बस इतना ही कहा.. की मौसम ने खाना पीना सब छोड़ दिया है.. बस पूरा दिन रोती रहती है..

वैशाली, कविता और पीयूष दूसरी सुबह बस से मौसम के घर पहुँच गए.. कविता को देखते ही मौसम उसके गले मिलकर बहोत रोई.. पीयूष भी मौसम को गले लगकर सांत्वना देना चाहता था पर माहोल की गंभीरता देखते हुए उसे ऐसा करना योग्य नहीं लगा.. एकाध घंटे के बाद.. सब रोना धोना खत्म करके सब नॉर्मल हुआ.. कविता ने अपनी माँ और मौसम को हिम्मत देकर शांत किया..

शाम को पाँच बजे पीयूष चाय पीने के बहाने बाहर निकला.. तब वैशाली, मौसम और फाल्गुनी, कमरे में बैठकर बातें कर रही थी.. पीयूष का दिल कर रहा था की वो मौसम को भी बाहर ले जाए और प्यारे से सब पूछे.. पर ये मुमकिन न था..

चाय की टपरी पर बैठे बैठे पीयूष बड़ी ही गंभीरता से सोच रहा था.. ऐसा तो क्या हुआ होगा तरुण और मौसम के बीच?? मौसम को पाकर तो तरुण धन्य हो जाना चाहिए था.. कुछ तो कारण होगा.. और उस कारण को जानना बेहद ही जरूरी था..

चाय पीने के बाद सोचते सोचते चलता हुआ पीयूष.. बस अड्डे पर पहुँच गया.. सामने ही बस पड़ी थी.. जिस पर उस शहर का नाम लिखा था जहां तरुण रहता था.. थोड़ा सा सोचकर पीयूष उस बस में चढ़ गया.. !!!

बस की सीट पर बैठते ही पीयूष ने कविता को फोन लगाया

पीयूष: "मैं तरुण से मिलने जा रहा हूँ.. किसी को बताना मत.. कोई मेरे बारे में पूछे तो बताना की कंपनी का अर्जेंट काम निकल गया इसलिए गया है और कल तक लौट आएगा.. वैसे मौसम ने कुछ बताया?? "

कविता: "नहीं यार.. वो तो उस बारे में कुछ बोल ही नहीं रही.. एक ही रट लगाए बैठी है.. की उन दोनों के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है.. अरे, दोनों के बीच परसों आधी रात तक बात भी हुई थी.. और फिर अचानक क्या हो गया.. दूसरे दिन सुबह दस बजे फोन करके उसने रिश्ता तोड़ दिया"

पीयूष: "ठीक है.. मैं जाकर खुद पूछता हूँ.. तब तक तुम दोनों मौसम और मम्मी जी को संभालना"

कविता: "ओके.. संभलकर जाना"

पीयूष ने फोन रख दिया.. 2 घंटे के सफर के बाद पीयूष तरुण के शहर पहुंचा.. उसने तरुण को फोन लगाया.. तरुण को उसके फोन से कोई खास ताज्जुब नहीं हुआ.. उसने पीयूष को एक रेस्टोरेंट का पता दिया और वहाँ पहुँचने के लिए कहा

ढूंढते ढूंढते एक घंटे के बाद पीयूष उस बताए हुए पते पर पहुंचा..

वहाँ एक टेबल पर बैठे तरुण को देखते ही वो उसके पास पहुंचा.. और खड़े खड़े ही सवाल जवाब शुरू कर दीये

पीयूष: "तरुण, ये मैं क्या सुन रहा हूँ?" पीयूष की आवाज में आश्चर्य, मायूसी और क्रोध का मिश्रण था

तरुण ने जवाब नहीं दिया..

पीयूष: "देख तरुण.. तो इतना पढ़ा लिखा है.. मैं ना तो तुझे कोई सलाह या मशवरा दूंगा या फिर ना ही तुझे अपना निर्णय बदलने के लिए फोर्स करूंगा.. अपनी ज़िंदगी के फैसले खुद से करने का तुझे पूरा हक है.. मैं तो बस सगाई तोड़ने का कारण जानने के लिए आया हूँ.."

तरुण: "पीयूष भैया.. कुछ बातें ऐसी होती है जिसकी चर्चा करने से केवल नफरत और घृणा ही बढ़ती है.. और मैं नहीं चाहता की मैं आप से ऐसी कोई बात करूँ जिसे किसी की ज़िंदगी तबाह हो जाए.. "

पीयूष: "तू मुझे खुलकर बता सकता है.. यकीन मान.. तू जो भी बताएगा वह बात सिर्फ मुझ तक ही रहेगी.. अगर तेरी इच्छा न हो तो असली कारण में किसी को नहीं बताऊँगा.. कोई और ही कारण बताकर सब को मना लूँगा.. सिर्फ यही जानने के लिए मैं इतनी दूर आया हूँ.. इतना तो मुझे जानने का हक है ना.. !!"

तरुण: "अब अगर आप सुनना ही चाहते है तो सुनिए.. !! आपके ससुराल के सभी पात्र चारित्रहीन है.. !!"

सुनकर पीयूष के पैरों तले से धरती खिसक गई.. कहीं ऐसे मेरे और मौसम के संबंधों के बारे में तो नहीं पता चल गया.. !! अपने चेहरे के डर को बड़ी मुश्किल से छुपाते हुए पीयूष ने चकित होने के भाव धारण करते हुए कहा

पीयूष: "क्या बात कर रहा है तू तरुण?? मेरी शादी को इतना समय हो गया पर मुझे तो कभी कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ.. !!"

तरुण: "अब मुझे जो जानने मिला है.. उसे बताने के लिए मेरी जुबान नहीं चलेगी.. इसलिए सारी बातें मैं इस कागज पर लिखकर लाया हूँ" कहते हुए तरुण ने एक फोल्ड किया हुआ कागज पीयूष के हाथ में थमा दिया..

खोलकर पढ़ते ही पीयूष के होश उड गए.. !!!!! अब आगे कुछ भी बोलने-पूछने की आवश्यकता नहीं थी.. वो तरुण से हाथ मिलाकर खड़ा हो गया.. तरुण ने काफी आग्रह किया की वो कुछ खाकर जाए.. पर अब पीयूष के गले से एक निवाला तक उतरना मुमकिन नही था..

जाते जाते पीयूष ने तरुण के कंधे पर हाथ रखकर कहा "तरुण, तेरी और मौसम की जोड़ी बहोत प्यारी लगती है.. किसी और के गुनाह की सजा तू मौसम को दे, ये किस हद तक लाज़मी है?? जो कुछ तुझे जानने को मिला है वह सच ही होगा ऐसा मैं मानता हूँ.. पर इसमें मौसम बेचारी की क्या गलती??"

तरुण: "पीयूष भैया.. परिवार में कुछ भी ऊपर-नीचे या उल्टा-सुलटा हो तो उसका असर सारे सदस्यों पर पड़ता ही है.. ये तो आप भी मानेंगे.. मौसम का दोष सिर्फ इतना ही है की वो ऐसे परिवार की सदस्य है.. आप से हाथ जोड़कर विनती है की मुझे मनाने की कोशिश बिल्कुल मत करना.. मेरे मम्मी-पापा और परिवार के बाकी लोग अब इस रिश्ते के खिलाफ है.. और उन सब को नाराज कर मैं भी सुखी नहीं रह पाऊँगा.. मेरी और से आप मौसम से माफी मांग लेना.. और कहना की तरुण ने तुझे आगे की ज़िंदगी के लिए "ऑल ध बेस्ट" क यहा है.. और अब तरुण तुम्हारी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है और न कभी होगा.. शायद मौसम मेरी किस्मत में ही नहीं थी.. अब इस बारे में, मैं और बात नहीं करना चाहता भैया.. प्लीज..!!" कहते हुए नम आँखों के साथ तरुण खड़ा होकर रेस्टोरेंट से चला गया.. !!!!

पीयूष स्तब्ध होकर तरुण को जाते हुए देखता रहा.. मायूस होकर वह ऑटो से बस स्टेशन पहुंचा.. अगली बस रात के दस बजे थी.. डॉ घंटों की देरी थी.. अब अनजान शहर मे इतना वक्त खाली बैठे क्या करेगा.. !! बहुत जोरों की भूख लगी थी.. केंटीन में बैठकर उसने भरपेट खाना खाया और फिर बुक-स्टॉल से एक अखबार और एक बुक खरीदकर बैठे बैठे बस का इंतज़ार करने लगा

तभी कविता का फोन आया

फोन उठाकर पीयूष ने कहा "हाँ कविता.. मैं वापिस आ रहा हूँ"

कविता: "मिल भी लिया और बात भी हो गई??"

पीयूष: "हाँ मिल लिया मैंने तरुण से"

कविता: "पाज़िटिव या नेगटिव?" कविता ने इशारे से पूछा

पीयूष ने गहरी सांस छोड़कर कहा "नेगटिव" सच कहने के अलावा और कोई चारा नहीं था.. आज नहीं तो कल सच सामने आने ही वाला था.. फिर उससे मुंह छुपाकर क्या फायदा.. !!

कविता का मुंह लटक गया.. वो देखकर ही वैशाली समझ गई की पीयूष की मुलाकात का नतीजा क्या निकला होगा.. आदमी का चेहरा ही सब से बेहतरीन आईना होता है.. खुशी, नफरत, गुस्सा, प्रेम या गंभीरता.. इंसान के अंदर के भावों को निष्कर्ष बड़ी खूबी से बता देता है चेहरा.. !! अच्छा हुआ उस वक्त मौसम या उसकी माँ वहाँ मौजूद नहीं थे..

कविता ने आगे कुछ पूछा नहीं और कहा "बस स्टेंड पर उतरकर मुझे फोन करना.. मैं पापा को लेने भेज दूँगी.. आधी रात को तुझे ऑटो नहीं मिलेगा"

पीयूष: "मुझे एक बज जाएगा पहुंचते पहुंचते.. !!"

कविता: "हाँ ठीक है.. तूने खाना खाया?"

पीयूष: "हाँ खा लिया है.. तू मेरी चिंता मत कर..!!"

बस का समय होते ही पीयूष बैठ गया.. और पूरे दिन की थकान के कारण सो गया.. आँख खुली तो स्टेशन आ गया था.. रात का एक बजा था.. और पीयूष कविता को डिस्टर्ब करना नहीं चाहता था.. घर जाकर मौसम को कैसे सांझाए यह सोचते सोचते वो कविता के घर की तरफ चल दिया.. जिस तरुण के लेकर पीयूष के मन में बेहद ईर्ष्या थी.. उसी तरुण पर आज उसे सहानुभूति हो रही थी.. !!

मन की भावनाएं बड़ी विचित्र होती है... कब किसी के लिए कौनसे जज़्बात पैदा हो जाए.. कहा नहीं जा सकता.. फिर वो एक तरफा प्रेम हो.. या नफरत.. ईर्ष्या हो या क्रोध.. !!

सोचते सोचते आधे घंटे बाद वो घर पहुँच गया.. उसने डोरबेल बजाई.. थोड़ी देर के बाद कविता ने दरवाजा खोला.. घर पर सब सो चुके थे

कविता: "तूने फोन क्यों नहीं किया?"

पीयूष: "बेकार में सबके नींद खराब होती.. और वैसे स्टेशन उतना दूर भी नहीं है.. चलते चलते पहुँच गया"

पानी पीने के बाद पीयूष ने कविता को बताया की तरुण का पूरा परिवार अब इस रिश्ते को रखना नहीं चाहता था.. प्रॉब्लेम सिर्फ तरुण और मौसम के बीच होता तो शायद सुलझ भी जाता.. पर बात अब बहोत आगे बढ़ चुकी थी

चोंक उठी कविता ने कहा "अरे पर अचानक बात यहाँ तक कैसे पहुँच गई? दो दिन पहले तक तो सब ठीक था.. वजह बताई की नहीं तरुण ने?"

पीयूष: "हम्म.. न.. नहीं.. कुछ नही बताया" इतने समय से साथ रह रही कविता समझ गई की पीयूष सच नहीं बोल रहा था.. या शायद बोल नहीं पा रहा था.. हो सकता है की पीयूष अभी न बताना चाहता हो.. पर जब दोनों अकेले बेडरूम में होंगे तब वह सच बता ही देगा.. अभी फिलहाल उस पर जबरदस्ती करने का कोई मतलब नहीं था..

कविता: "जो हो गया सो हो गया.. अभी बात करने से हकीकत बदल तो नहीं जाएगी.. !! तू थक गया होगा.. हाथ मुंह धोकर फ्रेश हो जा.. मैं खाना लगाती हूँ.. !!

पीयूष डाइनिंग टेबल पर बैठ गया.. कविता ने खाने की थाली लगा दी.. और अंदर रोटियाँ बेलने लगी.. तभी मौसम ऊपर से उतरकर नीचे आई और पीयूष के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई..

जंग में हारे हुए योद्धा जैसा पीयूष.. मौसम से नजरें नहीं मिला पा रहा था.. बात को बदलने के इरादे से पीयूष ने कहा

पीयूष: "ओ हाय बेबी.. अभी भी जाग रही? नींद नहीं आ रही?"

मौसम ने उदास होकर कहा "कैसी नींद जीजू.. !!"

रोटी का गरम फुल्का लेकर कविता ने पीयूष की प्लेट में रखते हुए कहा " देख मौसम.. तू कितनी भी चिंता कर ले.. कितना भी जाग ले.. इस समस्या का हल अभी तो मिलने नहीं वाला.. चिंता होना जायज है पर चिंता किसी भी प्रॉब्लेम का हल नहीं है.. और मान ले की यह रिश्ता सच में हमेशा के लिए टूट जाता है.. तो इससे तेरी ज़िंदगी रुक थोड़ी न जाएगी??"

पीयूष: "मौसम.. किसी प्रॉब्लेम का जब हल न हो तो उसे वास्तविकता समझ कर स्वीकार लेना चाहिए.. तुझे यह मान लेना होगा की तरुण अब तेरे जीवन का हिस्सा नहीं है.. सदमा लगना स्वाभाविक है.. यह मैं समझ सकता हूँ.. पर अब तुझे ही तय करना है की इस बात को पकड़कर तू हमेशा के लिए दुखी रहना चाहती है या सब कुछ भूलकर आगे बढ़ना चाहती है.. !!"

मौसम: "जीजू.. मैंने तो हकीकत का स्वीकार कर ही लिया है.. की तरुण अब मेरा नहीं है.. मुझे तो सिर्फ यह जानना है की उसे ऐसा कदम आखिर क्यों उठाना पड़ा?? मैं क्या इतनी गई-गुजरी हुई जो वो मुझे बिना कोई वजह बताएं ही रिश्ता तोड़ दें??"

कविता: "वक्त आने पर सब पता चलेगा मौसम.. तू चिंता मत कर.. सच हमेशा सामने आ ही जाता है.. हो सकता है.. तरुण के साथ ही कोई प्रॉब्लेम हुई हो.. जो वो तुझे बता न पा रहा हो"

सुनकर मौसम का गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ.. उसे बस यही जानना था की तरुण के इस कदम के पीछे असली कारण क्या था

मौसम: "जीजू.. मैं यहाँ के वातावरण से तंग आ गई हूँ.. मैं कुछ दिन आपके यहाँ आकर रहना चाहती हूँ.. ताकि मेरे दिमाग से तरुण के विचारों को हटा सकूँ.. यहाँ रहूँगी तो पूरा दिन उसी के बारे में सोचती रहूँगी.. ऊपर से मम्मी का उदास चेहरा मुझसे देखा नहीं जाता.. प्लीज दीदी.. कल हम जितना हो सकें उतना जल्दी निकल जाते है यहाँ से.. !!"

पीयूष: "हाँ हाँ.. क्यों नहीं.. वैसा ही करेंगे.. दरअसल मैं सामने से तुझे यह कहने ही वाला था.. तू हमारे साथ चल.. सब ठीक हो जाएगा.. हम सब है ना तेरे साथ.. फिर किस बात की फिक्र.. !!"

मौसम: "ओके जीजू.. थेंकस.. गुड नाइट"

इतना कहते ही मौसम को फिर से रोना आ गया.. और वो भागकर अपने कमरे की और चली गई.. जाते जाते उसके रोने की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थी..

कविता: "पीयूष, अब मुझे तो बता.. !! तरुण ने आखिर सगाई क्यों तोड़ दी??" सीधा सवाल किया कविता ने

पीयूष सोच में पड़ गया.. अब क्या बताएं कविता को?

पीयूष: "कविता, जब किसी बात को निकालने पर काफी सारे लोगों का अहित होना हो.. तब उसे न निकालना ही बेहतर होगा.. चल.. कल जल्दी उठना है.. सो जाते है.. सुबह ६ बजे की बस से निकल जाएंगे"

थोड़े घंटों की नींद लेने के बाद.. कविता, वैशाली, मौसम और पीयूष जाने के लिए तैयार हो गए.. सुबोधकांत उन्हें बस स्टेशन तक छोड़ने आए.. पहली बस मे काफी भीड़ थी.. इसलिए दूसरी बस की राह देखने लगी.. दूसरी बस का भी वही हाल था.. आखिर सुबोधकांत ने सब को अपनी गाड़ी में ही छोड़ आने का फैसला किया

कार तेजी से सड़क पर चल रही थी और उतनी ही तेजी से कविता और मौसम के दिमाग में विचार भी चल रहे थे.. गाड़ी चलाते हुए सुबोधकांत एकदम खामोश थे..

२ घंटों के सफर के बाद वो लोग पहुँच गए.. घर के अंदर घुसते ही मौसम अनुमौसी से गले मिलकर रोने लगी.. अनुमौसी ने अपने अनुभवयुक्त शब्दों से उसे सांत्वना दी..

मौसम कविता की मदद करने किचन में गई.. उस दौरान कविता ने उसे तरुण के बारे में.. उनके संबंधों के बारे में काफी कुछ पूछा.. पर उसे ऐसी कोई हिंट न मिली जिससे की वो किसी बात का अंदाजा लगा पाती

दोपहर के बाद पीयूष ऑफिस चला गया.. काम भी देखना जरूरी था..

थोड़ी देर के बाद, शीला और मदन भी मौसी के घर आ गए.. सुबोधकांत से मिलकर दोनों उनके साथ बैठे.. सुबोधकांत ने मौसम और तरुण की सगाई टूटने के बारे में बताया.. जिसके बारे में वह दोनों पहले से ही जानते थे.. थोड़ी देर की बातों के बाद.. सब एकदम चुपचाप बैठे थे

कविता और मौसम चाय लेकर आए..

चाय एक घूंट में खत्म करते ही.. सुबोधकांत ने अपनी घड़ी की ओर देखकर कहा "अब मुझे निकलना चाहिए"

कविता: "पापा, दोपहर तो हो ही चुकी है.. आप खाना खाकर ही जाइए"

सुबोधकांत: "नहीं बेटा.. अचानक यहाँ आना हुआ इसलिए मेरे कई काम रुकें पड़े है.. मुझे जाना ही होगा.. " बार बार अपनी घड़ी की ओर देख रहें सुबोधकांत तो कविता ने और नहीं रोका

अचानक शीला की नजर सुबोधकांत की गोल्डन केस वाली राडो घड़ी पर गई.. और ध्यान से देखते ही उसकी सांसें थम गई.. !!!

याद आते ही बेहद चोंक गई शीला.. अरे बाप रे... ये तो कॉकटेल है.. !! बिल्कुल यही घड़ी कॉकटेल ने भी पहन रखी थी.. ध्यान से देखने पर सुबोधकांत का शरीर, बोल-चाल सब कुछ कॉकटेल से मेल खा रहा था.. उसका लंड भी जाना-पहचाना सा क्यों लग रहा था वो अब पता चला शीला को.. सुबोधकांत के घर के गराज में एक बार चूस चुकी थी उनका लंड.. इसीलिए जब होटल में वह लंड दोबारा देखा तब हल्की सी भनक तो लगी थी पर याद नहीं आ रहा था.. !! शीला के पूरे बदन में झनझनाहट से छा गई.. हाँ, वो कॉकटेल ही था.. जिसका लंड मैंने और रेणुका दोनों ने दिल खोल कर चूसा था.. हे भगवान.. कहीं सुबोधकांत ने हमें पहचान तो नहीं लिया होगा.. !!!

मदन को वहीं बैठा छोड़कर शीला घबराकर घर वापिस आ गई..
 
अचानक शीला की नजर सुबोधकांत की गोल्डन केस वाली राडो घड़ी पर गई.. और ध्यान से देखते ही उसकी सांसें थम गई.. !!!

याद आते ही बेहद चोंक गई शीला.. अरे बाप रे... ये तो कॉकटेल है.. !! बिल्कुल यही घड़ी कॉकटेल ने भी पहन रखी थी.. ध्यान से देखने पर सुबोधकांत का शरीर, बोल-चाल सब कुछ कॉकटेल से मेल खा रहा था.. उसका लंड भी जाना-पहचाना सा क्यों लग रहा था वो अब पता चला शीला को.. सुबोधकांत के घर के गराज में एक बार चूस चुकी थी उनका लंड.. इसीलिए जब होटल में वह लंड दोबारा देखा तब हल्की सी भनक तो लगी थी पर याद नहीं आ रहा था.. !! शीला के पूरे बदन में झनझनाहट से छा गई.. हाँ, वो कॉकटेल ही था.. जिसका लंड मैंने और रेणुका दोनों ने दिल खोल कर चूसा था.. हे भगवान.. कहीं सुबोधकांत ने हमें पहचान तो नहीं लिया होगा.. !!!

मदन को वहीं बैठा छोड़कर शीला घबराकर घर वापिस आ गई..

घर पहुंचकर सब से पहला काम उसने रेणुका को फोन करने का किया

रेणुका: "हाँ बोल शीला.. !!"

शीला: "यार एक जबरदस्त भांडा फूटा है आज तो.. !!"

रेणुका: "यार शीला.. जब से तू मेरी ज़िंदगी में आई है तब से रोज कुछ न कुछ धमाकेदार हो रहा है मेरे साथ.. अब क्या हुआ, ये भी बता दे"

शीला: "यार वो कॉकटेल था ना.. होटल में तेरा पार्टनर.. !!"

रेणुका: "हाँ, वो मस्त मोटे लंड वाला.. पार्टनर मेरा था और सब से ज्यादा तूने ही उसका लंड चूसा था.. !!"

शीला: "पता है वो कौन था??? मौसम का बाप, सुबोधकांत.. !!!!"

रेणुका: "क्या............!!!!!! क्या बक रही है तू??? जानती हूँ की तुझे उनसे चुदवाने की बड़ी ही चूल थी.. सगाई वाले दिन भी तू फ्लर्ट कर रही थी उनसे.. पर उसका मतलब ये नहीं की तू उनका नाम ऐसे जोड़ दे.. !! कुछ भी मत बोल"

शीला: "देख रेणुका.. अभी मदन आता ही होगा.. इसलिए लंबी बात नहीं हो सकती.. ये तो चांस मिला इसलिए मैंने तुझे बता दिया.. !!"

रेणुका: "पर तुझे ये पता कैसे चला.. ये तो बता.. !!!!"

शीला: "यार, एक बेड न्यूज़ है.. तुझे बताना ही भूल गई.. मौसम के साथ तरुण ने सगाई तोड़ दी है.. मौसम बहोत डिस्टर्ब थी तो कुछ दिनों के लिए यहाँ कविता के घर रहने चली आई है"

रेणुका: "हाँ, मुझे राजेश ने कुछ देर पहले बताया... बहुत बुरा हुआ उस बेचारी के साथ"

शीला: "मौसम को छोड़ने उसके पापा सुबोधकांत आए थे.. और तभी मेरा ध्यान उनकी घड़ी पर गया.. याद है.. !! कॉकटेल ने वो महंगी वाली घड़ी पहन रखी थी.. !! गोल्डन चैन वाली.. !!"

रेणुका: "हाँ बड़े अच्छे से याद है.. !!"

शीला: "बस, वही घड़ी मैंने सुबोधकांत की कलाई पर देखी"

रेणुका: "पागलों जैसी बात मत कर.. ऐसी एक ही घड़ी थोड़ी नआ होगी पूरी दुनिया मैं.. !!"

शीला: "अरे पगली.. घड़ी तो सिर्फ कड़ी थी.. फिर मैंने उनके शरीर के दिलडॉल, त्वचा का रंग.. आवाज.. सब मिलाकर देखा.. सुबोधकांत ही कॉकटेल है.. मुझे तो पक्का यकीन है"

रेणुका: "ओके बाबा.. चल रखती हूँ फोन"

शीला: "ओके बाय.. !!"

फोन काटकर शीला किचन में प्लेटफ़ॉर्म के आगे अपनी चूत खुजाते हुए सुबोधकांत के लंड को याद करने लगी.. जैसे शरीर के अंगों से उन्हें पहचान लिया.. वैसे हो सकता है की सुबोधकांत ने भी उसे पहचान लिया हो.. !! और कुछ याद रहे न रहे.. पर एक बार जिसने शीला के खुले हुए बबले देखें हो.. मरते दम तक नहीं भूल सकता..!!

इस तरफ रेणुका, शीला का फोन काटते ही, गहरी सोच मे पड़ गई.. थोड़ा सा विचार करने के बाद उसने सीधा सुबोधकांत को फोन लगाया.. सगाई के दौरान उसने घर के बाहर गार्डन में बातें करते हुए उनका नंबर लिया था

रेणुका: "हैलो... पहचाना.. ??"

सुबोधकांत: "हम्म..म..म..म..म..म.. सॉरी.. आवाज सुनी सुनी सी लगती है.. पर याद नहीं आ रहा.. वैसे इतना कह सकता हूँ की बड़ी सुरीली आवाज है आपकी.. "

रेणुका शरमाकर बोली "ओह थेंकस.. रेणुका बोल रही हूँ.. मुझे पता चला की आप शहर में आए हुए हो.. मुझे आपसे अर्जेंट मिलना था.. सिर्फ दस मिनट के लिए"

सुबोधकांत: "दस मिनट क्यों.. !! पूरा दिन आपके साथ गुजारने के लिए तैयार हूँ.. बस आपको राजेश को संभालना होगा.. आप के साथ सिर्फ दस मिनट गुजारने पर थोड़े ही मेरा मन भरेगा.. !!"

रेणुका ने हंसकर कहा "क्या आप भी.. पहले दस मिनट के लिए तो मिलिये.. फिर पूरा दिन साथ बिताने की प्लानिंग करेंगे.. !!"

सुबोधकांत: "सिर्फ दस मिनट में कुछ मज़ा आएगा नहीं.. वैसे मैं आपकी ऑफिस वाली सड़क से ही गुजर रहा हूँ.. अगर मिलना हो तो अभी मिल सकते है"

रेणुका: "क्या सच में.. !! ओके.. एक काम कीजिए.. उसी सड़क पर आगे एक पेट्रोल-पंप है.. वहाँ से टर्न लेकर बगल वाली सड़क पर आप मेरा इंतज़ार कीजिए.. मैं वहाँ पहुँच रही हूँ.. वैसे मैं आप से पहले पहुँच जाऊँगी"

रेणुका ने फटाफट कपड़े बदले.. और कार की चाबी लेकर बाहर निकली.. तभी उसे अंदाजा हुआ की इस वक्त बहोत ट्राफिक होगा और उतना समय था नहीं.. इसलिए फिर वह अपना एक्टिवा लेकर निकल गई

पंप पर पहुंचकर वो एक्टिवा में पेट्रोल भरवा रही थी.. तभी सुबोधकांत अपनी लंबी गाड़ी लेकर वहाँ पहुंचे.. रेणुका ने एक्टिवा बगल वाले कॉम्प्लेक्स के बाहर पार्क कर दिया.. और चुपचाप गाड़ी में आकर बैठ गई..

सुबोधकांत ने गाड़ी भगा दी.. काले कांच वाली खिड़कियों से बाहर से कोई उन्हें देख नहीं सकता था.. रेणुका की नजर सब से पहले सुबोधकांत की कलाई पर बंधी गोल्डन राडो घड़ी पर गई.. अब उसे शीला की बात पर यकीन हो गया.. सुबोधकांत ही कॉकटेल था.. !!! उसे याद आ गया की किस तरह उसने और शीला ने मिलकर उसका लंड चूसा था.. और कॉकटेल ने उसके बबलों का दबा दबाकर कचूमर निकाल दिया था..

सुबोधकांत का ध्यान आगे सड़क पर था तब रेणुका ने अपने टॉप में हाथ डालकर.. स्तन बाहर निकाले और सुबोधकांत की और देखकर कहा "हैलो, मिस्टर कॉकटेल.. !!"


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सुबोधकांत ने चकराकर रेणुका की और देखा और एकदम से ब्रेक मार दी.. पीछे आ रही गाड़ी वाले ने सुबोधकांत की माँ को संबोधित करते हुए एक गाली दी और फिर ओवरटेक करते हुए आगे चला गया..

सुबोधकांत को दिन में तारे नजर आने लगे.. बेचारे पहली गेंद पर ही क्लीन बोल्ड हो गए.. !! वो सोचने लगे.. उस होटल से पकड़े जाने पर.. अखबार में मेरा नाम क्या आ गया.. रेणुका को पता भी चल गया.. !! वो तो ठीक है पर उसे मेरा नकली नाम कैसे पता चला?? अखबार वालों ने वो तो नहीं छापा था..!!

असमंजस में डूबे हुए सुबोधकांत की सारी शंकाओं का समाधान कर दिया रेणुका ने..

"मुझे राजेश ने बताया.. की आप भी थे उस दिन पार्टी में.. मुझे और शीला को ऐसा सब पसंद नहीं है इसलिए मदन और राजेश किसी और को लेकर वहाँ आए थे.. और आप भी वहाँ थे.. दूसरे दिन राजेश ने मुझे बताया की उन्होंने वहाँ खूब मजे किए और आपने भी बहोत इन्जॉय किया था" अपनी हकीकत छुपाते हुए आधा सच बताया रेणुका ने

सुबोधकांत सोच रहे थे.. लगता है रेणुका को पुलिस की रैड के बारे में पता नहीं है शायद...!!

सुबोधकांत ने रेणुका की जांघ पर हाथ फेरते हुए कहा "रेणुका जी.. राजेश एक नंबर का बेवकूफ है.. घर पर ही इतनी नशीली आइटम हो तो फिर बाहर मुंह मारने की क्या जरूरत.. !! वैसे अगर आपको एतराज न हो तो क्या मैं आपको एक किस कर सकता हूँ??" रेणुका के मस्त स्तन की गुलाबी निप्पल को देखकर लार टपकाते हुए उसने कहा

रेणुका: "मुझे एतराज है.. मैं क्यों करने दु आपको किस??"

सुबोधकांत: "तो फिर मुझे मिलने क्यों बुलाया?? और यहाँ गाड़ी में इस तरह आपके बूब्स खोलकर बैठने का मैं क्या मतलब समझूँ???"


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रेणुका: "मतलब?? जो भी आँखों के सामने नजर आए उन सारी चीजों पर आपका हक हो गया??" रेणुका भी सुबोधकांत के मजे ले रही थी

सुबोधकांत: "वो आप जो भी समझें.. आप कार में मेरे साथ इतनी नजदीक बैठी हो.. और आपका थोड़ा सा प्रसाद भी मुझे नसीब न हो तो कैसे चलेगा.. !! वैसे आपको बता दूँ.. मैंने मेरी लाइफ में किसी के साथ भी जबरदस्ती नहीं की है.. जरूरत ही नहीं पड़ी.. जो प्यार से नहीं मिला वो मैंने खरीद कर हासिल कर लिया है.. और पैसे देकर न मिले उसे मैंने गिफ्ट्स देकर मना लिया.. अब आप बताइए.. आपको कौन सा ट्रांजेक्शन ज्यादा पसंद है??"

सुबोधकांत की सीधी बात से रेणुका इंप्रेस हो गई.. वैसे औरत को हासिल करने के कितने सारे तरीके होते है.. !! प्यार से.. कीमत चुकाकर.. धोखा देकर.. तारिफ करके.. झूठी कसमें खाकर.. विश्वास जीतकर.. महंगी गिफ्ट देकर.. वगैरह वगैरह..

रेणुका की नजर अपनी गोल्डन घड़ी पर बार बार जाते हुए देख.. सुबोधकांत को गलतफहमी हुई.. उसने अपनी घड़ी उतारकर रेणुका को देते हुए कहा "लीजिए रेणुकाजी, मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट.. !!"

रेणुका की जांघ पर घड़ी रखते हुए सुबोधकांत ने जांघों को दबा दिया.. और फिर उनका हाथ दोनों जांघों के बीच घुसने लगा..

एक बार के लिए रेणुका सकते में पड़ गई.. बार बार घड़ी की तरफ तांकने का गलत मतलब समझे थे सुबोधकांत.. पर अभी वो किसी भी तरह की सफाई देने के मूड में नहीं थी

रेणुका: "मैं आपकी जेन्ट्स घड़ी क्यों पहनु? दे देकर आपने कैसी गिफ्ट दी एक महिला को?"

सुबोधकांत: "अगर मुझे पहले से पता होता तो बढ़िया सी गिफ्ट लेकर आता आपके लिए.. आपके जैसी सुंदर महिलाओ को गिफ्ट देना का मुझे बड़ा शौक है.. वैसे आप कब से मेरी घड़ी की तरफ देख रही थी तो मुझे लगा आपको पसंद आ गई होगी.. इसलिए.. अगर पसंद न हो तो आप रिजेक्ट कर सकती हो.. !!"

रेणुका: "नहीं नहीं.. गिफ्ट का अस्वीकार करके मैं आपका अपमान नहीं करूंगी.. मुझे आपकी भेंट कुबूल है.. " कहते हुए रेणुका ने शरारती अंदाज में उस घड़ी को अपने दोनों स्तनों के बीच की खाई में डाल दिया..

सुबोधकांत: "अगली बार जब मैं आपके लिए गिफ्ट ले कर आऊँगा.. तब आपकी इस खास जेब में अपने हाथों से गिफ्ट रखूँगा"

सुनकर रेणुका शरमा गई..

रेणुका: "जरूर.. मैं मना नहीं करूंगी"

सुबोधकांत: "कब से आप सिर्फ बूब्स के ही दर्शन करवा रही हो.. नीचे वाले खजाने को क्यों छुपा रखा है??"

रेणुका: "यहाँ खुली सड़क पर कपड़े उतारने में डर लग रहा है.. "

सुबोधकांत ने रेणुका की सीट के नीचे के लिवर को खींचा.. और पूरी सीट फ्लेट हो गई.. एकदम सीधी.. बिस्तर की तरह.. और सीट के साथ रेणुका भी अचानक से लेट गई..

सुबोधकांत: "अब कोई नहीं देखेगा.. "

रेणुका ने अपनी साड़ी और पेटीकोट जांघों तक उठा लिया.. और जानबूझकर भारी सांसें लेने लगी..

सुबोधकांत: "आह्ह.. जबरदस्त है आपके बूब्स.. और ये गोरी जांघें.. देखकर मज़ा आ गया.. जरा पेन्टी भी नीचे सरका दीजिए तो और मज़ा आएगा"

रेणुका: "अभी नहीं.. नेक्स्ट टाइम.. अभी तो किसिंग-प्रेसींग के अलावा और कुछ नहीं" कहते हुए रेणुका ने सीट का लीवर खींचकर सीट को पूर्ववत कर दिया.. और दोनों स्तनों को वापिस टॉप के अंदर डाल डीईए

सुबोधकांत: "यार, तड़पा क्यों रही है.. थोड़ी देर और देख लेने देती.. मैं हाथ भी नहीं लगाऊँगा"

रेणुका: "प्लीज सुबोधकांत जी.. फिर मैं अपना कंट्रोल खो बैठूँगी तो यहीं पर सबकुछ करना पड़ेगा.. और अभी ये पोसीबल नहीं है.. इसलिए मना कर रही हूँ.. वरना मेरी खुद भी बहोत इच्छा है"

सुबोधकांत ने रेणुका को कंधे से पकड़कर खींचा और उसके होंठों पर जोरदार किस कर दिया.. रेणुका का पूरा शरीर गरम हो गया



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अचानक रेणुका का हाथ सुबोधकांत के लंड पर चला गया और वह अपनी हथेली से उसे दबाने लगी.. देखते ही देखते पेंट के अंदर लंड एकदम सख्त हो गया.. इतना सख्त की उसे पेंट के अंदर बंद रखना मुश्किल हो रहा था..

रेणुका: "ओह्ह.. कितना हार्ड हो गया ये तो.. एक बार बाहर तो निकालो इसे.. बेचारे का दम घूंट जाएगा अंदर!!"

बिना एक सेकंड गँवाए सुबोधकांत ने अपनी चैन खोलकर लंड बाहर निकाल दिया..

सुबोधकांत: "तसल्ली से देख लीजिए.. और बताइए.. कैसा लगा?? राजेश के लंड से तो मोटा ही है !!" रेणुका के कंधे से होते हुए उन्हों ने उसके स्तन को पकड़कर दबाना शुरू कर दिया.. स्तन को दबाते हुए उनका लंड झटके खाने लगा


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रेणुका ने स्माइल देते हुए कहा "आप दबा यहाँ रहे हो और असर यहाँ हो रहा है"

सुबोधकांत: "यही तो है इसके सख्त होने का कारण.. !!"

रेणुका अब उत्तेजित हो गई थी.. उसने सामने से सुबोधकांत को चूमते हुए कहा "सुबोधकांत जी, अभी तो हम कार में है.. इसलिए ज्यादा कुछ करना मुमकिन नहीं होगा.. देर भी हो रही है.. आप मुझे वापिस पेट्रोल-पंप पर छोड़ दीजिए.. आपको मैं घर पर बुलाऊँगी जब राजेश टूर पर हो तब.. फिर तसल्ली से करेंगे दोनों.. !!"

सुबोधकांत: "वो तो ठीक है रेणु.. पर क्या तुम अभी मेरे लंड को एक किस भी नहीं दोगी?? जिस तरह मुझे समझा रही हो.. वैसे ही इसे भी समझा दो ताकि यह शांत होकर बैठ जाए.. और कब तक ये "आप-आप" कहती रहोगी??"

रेणुका ने झुककर सुबोधकांत के लंड के टोपे को चूम लिया.. सिर्फ चूमने से उसका दिल नहीं भरा.. सुने लंड को जड़ से पकड़कर एक झटके में.. मुंह के अंदर ले लिए.. उसका पूरा मुंह सुबोधकांत के तगड़े लंड से भर गया.. उस गरम लोडे को रेणुका ने तेजी से चूसना शुरू कर दिया..




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सुबोधकांत सिसकने लगे "यार, तुम बिल्कुल उसी तरह चूसती हो जिस तरह उस पार्टी में मेरी पार्टनर चूस रही थी.. आह्ह... ओह्ह.. रेणु मेरी जान.. मस्त चूसती है यार तू" कहते हुए सुबोधकांत के लंड ने लस्सेदार वीर्य रेणुका के मुंह में छोड़ दिया.. उसका पूरा मुंह वीर्य से भर गया.. वीर्य का विचित्र स्वाद रेणुका को पसंद तो नहीं था.. पर नया लंड चूत के अंदर लेने का मौका मिलेगा इसी आशा में वह सारा वीर्य निगल गई.. और लंड को ऐसे चूसा की जब मुंह से बाहर निकाला तब उसे साफ करने की जरूरत ही न रही.. ऐसे साफ कर दिया चूस कर..


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सुबोधकांत ने यू-टर्न लिया और वापिस पेट्रोल पंप के पास आकर गाड़ी रोक दी.. गाड़ी से उतरकर.. बगैर पीछे देखे.. रेणुका अपना एक्टिवा लेकर घर भागी.. घर पहुंचकर उसने सब से पहला काम.. सुबोधकांत की दी हुई घड़ी को छुपाने का किया.. और फिर बेडरूम मे जाकर लेट गई.. और बड़े ही आराम से, सुबोधकांत के तगड़े लंड को याद करते हुए.. उंगली करते करते झड़ गई.. !!

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झड़ने के बाद रेणुका की धड़कनें कुछ शांत हुई.. उसने शीला को फोन लगाया और सारी बात बताई.. सिवाय उस घड़ी वाली गिफ्ट के.. शीला और रेणुका के बीच काफी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी.. राजेश और मदन की तरह..
 
सुबोधकांत ने यू-टर्न लिया और वापिस पेट्रोल पंप के पास आकर गाड़ी रोक दी.. गाड़ी से उतरकर.. बगैर पीछे देखे.. रेणुका अपना एक्टिवा लेकर घर भागी.. घर पहुंचकर उसने सब से पहला काम.. सुबोधकांत की दी हुई घड़ी को छुपाने का किया.. और फिर बेडरूम मे जाकर लेट गई.. और बड़े ही आराम से, सुबोधकांत के तगड़े लंड को याद करते हुए.. उंगली करते करते झड़ गई.. !!

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झड़ने के बाद रेणुका की धड़कनें कुछ शांत हुई.. उसने शीला को फोन लगाया और सारी बात बताई.. सिवाय उस घड़ी वाली गिफ्ट के.. शीला और रेणुका के बीच काफी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी.. राजेश और मदन की तरह..

कुछ दिनों बाद.. राजेश को एक काम के सिलसिले में मुंबई जाना हुआ.. तीन दिनों के लिए.. इस बार तो रेणुका ने उसे अपने सर की कसम खिलाकर तसल्ली कर ली थी.. की वो वाकई बिजनेस के सिलसिले में ही जा रहा था.. वैसे उस रात पार्टी में जो हुआ.. उसके बाद रेणुका को यकीन था की राजेश अब उसे बिना बताए ऐसा कुछ नहीं करेगा..

राजेश के जाने के बाद.. खुला मैदान मिलते ही रेणुका खुश हो गई.. उसने सुबह सुबह ही सुबोधकांत को फोन करके बुला लिया.. सुबोधकांत ने दोपहर ढाई बजे पहुँचने का वादा किया..

फिर रेणुका ने अब सुबोधकांत को फोन किया और अपने घर बुला लिया.. सुबोधकांत ने कहा की वो अभी निकल रहा है और कुछ ही घंटों में पहुँच जाएगा.. अब रेणुका ने शीला को फोन करके यह कहा की एक नया मुर्गा फसाया है चुदाई करने के लिए... पर सुबोधकांत का नाम नहीं बताया..!!

नया लंड लेने के विचार मात्र से शीला के पूरे शरीर में खलबली सी मच गई.. पर प्रश्न यह था की वो मदन को क्या बोलकर घर से निकलें?? आखिर वह बिना कुछ कहें बाहर निकल गई.. और थोड़ी देर बाद मदन को फोन किया और बताया की उसे अपनी कोई पुरानी सहेली मिल गई है और वो उसके घर जा रही है.. आने में देर हो जाएगी

शीला सीधे रेणुका के घर पहुँच गई..

शीला: "क्या बात है मेरी जान.. आज तो तूने मेरे भोसड़े को तृप्त करने का प्लान बना लिया..!! बता तो सही, आखिर किस लंड को पटाया है तूने.. !!"

रेणुका ने मुस्कुराकर कहा "थोड़ा सा धीरज धरो शीला रानी.. आज तुम्हें ऐसे लंड से चुदने का मौका मिलेगा जिसकी प्रतीक्षा तुम्हें कब से थी.. !! मिलकर मजे करेंगे.. मैं चाहती तो अकेले ही मजे कर सकती थी.. पर मैंने ऐसा नहीं किया.. ये तू भी याद रखना.. !!!"

दोनों बेडरूम मे जा पहुंची.. बड़ा सा बेड देखते ही शीला ने एक ही पल मे अपनी साड़ी उतार फेंकी.. और अपना घाघरा उठाकर बेड पर लेट गई.. उसकी नरम गोरी गुंदाज जांघों को देखकर रेणुका सिसक पड़ी..

रेणुका: "यार, अपना खजाना दिखाकर मुझे ऐसे ललचा मत.. वरना उस लंड के आने से पहले मैं ही तुझ पर टूट पड़ूँगी"

शीला ने अपने ब्लाउज के हुक खोलते हुए कहा "तो आजा ना मेरी जान.. किसने रोका है.. वैसे वो मज़ा तो नहीं आएगा जो लंड से मिलता है.. अरे हाँ.. मैं तो भूल ही गई.. तेरे पास वो रबर का मूसल जैसा लंड था ना.. वो लेकर आ..!! जब तक वो मेहमान नहीं आ जाता, तब तक उसी से काम चला लेते है.. याद है उस रात.. होटल मे.. वो डिल्डो वाली औरत के साथ हमने कितने मजे किए थे.. !!"

रेणुका एक पल के लिए सोच मे पड़ गई.. वो डिल्डो तो उसने वैशाली को दे दिया था.. पर शीला को कैसे बताती.. !!

रेणुका: "अरे यार.. मेरी उंगली क्या किसी डिल्डो से कम है.. !! तुझे ऐसा मज़ा दूँगी की तू उस रबर के नकली लंड को भूल जाएगी.. "

रेणुका ने टॉप के साथ अपनी ब्रा भी उतार दी.. और फटाफट अपने ट्रैक-पेंट को पेन्टी के साथ उतारते हुए नंगी हो गई.. शीला अब भी ब्रा और पेटीकोट मे थी.. रेणुका बेड पर होते हुए शीला के पास आकर लेट गई.. और शीला की ब्रा के अंदर हाथ डालकर उसके स्तनों से खेलने लगी


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रेणुका: "यार सच मे.. तेरे बबलों का कोई मुकाबला ही नहीं है.. कितने बड़े है यार.. !!! मैं एक औरत होकर भी इन्हें छूकर पागल हो जाती हूँ.. तो मर्दों का क्या हाल होता होगा.. !!"

शीला ने अपनी ब्रा उतारकर अपने मदमस्त खरबूजों को आजाद कर दिया.. ताकि रेणुका आसानी से उनके साथ खेल सकें.. रेणुका ने अपना सर शीला की गोद मे रख दिया.. उन बड़े बड़े स्तनों के नीचे उसका चेहरा ऐसे दब गया की उसे शीला का मुंह भी नजर नहीं आ रहा था


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शीला के एक स्तन को अपनी दोनों हथेलियों में पकड़कर उसकी एक इंच लंबी निप्पल को मसलते ही शीला कराहने लगी.. शीला ने अपनी निप्पल पकड़ी और उसे जबरन रेणुका के मुंह मे डाल दी.. रेणुका चटकारे लगाते हुए उसकी निप्पल चूसने लगी

रेणुका के मुंह के गरम स्पर्श से शीला सिहरने लगी.. उसने अपना एक हाथ रेणुका की चूत पर रख दिया.. और चूत के होंठों के बीच अपनी उंगली फेरने लगी.. जवाब मे रेणुका अपनी कमर हिलाकर उसके स्पर्श का अभिवादन करने लगी.. कुछ ही पलों मे रेणुका की चूत पूर्णतः गीली हो गई.. उसकी गीली पुच्ची मे उंगली डालकर शीला ने बाहर निकाली और सूंघने लगी.. बड़ी ही मस्त मस्की सी गंध सूंघकर शीला बेहद उत्तेजित हो गई.. !!!


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उसने अब रेणुका को अपनी गोद से हटाया और उसे बेड पर लेटा दिया.. शीला बेड पर खड़ी हो गई और अपने पेटीकोट का नाड़ा खोलने लगी.. गांठ खींचते ही उसका पेटीकोट शीला के पैरों के इर्दगिर्द ढेर बनकर गिर गया.. पेन्टी तो आज उसने पहनी ही नहीं थी.. अपनी चरबीदार भोसड़े को हथेली से खुजाते हुए.. अपने दोनों पैर रेणुका के चेहरे के दोनों तरफ जमा लिए.. और अपनी कमर को धीरे धीरे नीचे ले जाकर.. चूत को रेणुका के मुंह के सामने लाकर रख दिया..

शीला का गुफा जैसा भोसड़ा अपने मुंह के सामने देख, रेणुका को और अधिक मार्गदर्शन की जरूरत नहीं पड़ी.. भांप छोड़ रहे उस छेद को ताज्जुब के साथ देखती रही रेणुका.. यह वही भोसड़ा है जिसमे शीला ने अच्छे अच्छे लंडों को समा लिया था.. अपनी दो उंगलियों से चूत के होंठों की परतों को अलग करते ही.. अंदर का गीला गुलाबी हिस्सा नजर आने लगा..


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शीला से अब और बर्दाश्त नहीं हुआ.. उसने अपना गरम छेद रेणुका के होंठों पर दबा दिया.. एक पल के लिए रेणुका का दम घुटने लगा.. उसने शीला की जांघों को अपनी हथेली से थोड़ा सा ऊपर उठा दिया ताकि उसे चाटने मे आसानी हो..

शीला का भोसड़ा अपना रस बहा रहा था.. उस रस को बड़े ही चाव से चाटते हुए रेणुका ने अपनी जीभ अंदर तक डाल दी.. एक पल के लिए उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने गरम अंगारे पर अपनी जीभ रख दी हो.. !! शीला अपने चूतड़ों को आगे पीछे करते हुए.. रेणुका की जीभ का घर्षण मजे लेते हुए महसूस कर रही थी..

रेणुका की तंग चूचियों की तीखी नोक पर अपनी गांड रगड़ते हुए.. शीला बदहवास होकर अपना भोसड़ा चटवा रही थी.. अपने स्तनों को खुद ही मसलते हुए वह इतनी उत्तेजित हो गई की पागलों की तरह अपनी निप्पल खींचने लगी.. रेणुका ने शीला की जामुन जैसी क्लिटोरिस को अपनी जीभ से कुरेदकर उसे स्खलित करने की कगार पर ले गई..


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पगलाई हुई घोड़ी की तरह शीला रेणुका के चेहरे पर सवार होकर ऐसे हिल रही थी जैसे उसके प्राण निकल जाने वाले हो.. !! रेणुका के सर को बालों से पकड़कर शीला ने अपने सुराख को उसके मुंह पर जोर से दबा दिया और चीखकर झड़ गई.. उसकी योनि का शहद रेणुका के पूरे चेहरे पर लिप्त था.. कुछ देर तक उसी स्थिति मे रहने के बाद.. शीला रेणुका के चेहरे के ऊपर से उतरी और उसे अपनी गिरफ्त से मुक्त किया..

थक कर शीला बेड पर लेट गई.. अब रेणुका की बारी थी.. वो शीला के जिस्म पर सवार हो गई.. और उसकी छाती पर सर रखकर उसके मम्मों को चूसने-चाटने लगी.. इस दौरान वो अपनी चूत को शीला के चरबीदार पेट पर रगड़ रही थी..

शीला ने अपनी टांगें फैलाई और रेणुका उसकी जांघों के बीच ऐसे सेट हो गई की दोनों की चूतें आराम से छु सकें.. अब वो अपनी कमर हिलाते हुए अपनी चूत को शीला के भोसड़े के साथ रगड़ने लगी.. कुछ ही पलों मे रेणुका का ऑर्गजम आ गया.. और वो शीला के बड़े बड़े स्तनों के ऊपर ढेर होकर गिर गई


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काफी देर तक उसी अवस्था में दोनों पड़े रहे.. और अपनी साँसे नॉर्मल होने का इंतज़ार करते रहे..

कुछ देर बाद.. शीला उठी.. और नंगे बदन ही किचन मे चली गई.. दोनों के लिए कॉफी बनाने..

थोड़ी देर मे कॉफी के दो मग लेकर वो बेडरूम मे आई तब रेणुका प्लास्टिक के हेर-ब्रश को अपनी गीली चूत में घुसेड़ रही थी..


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शीला: "मेरे आने का तो इंतज़ार करती.. !! चल अब छोड़ वो सब.. और कॉफी पी" शीला रेणुका के करीब आई उसे मग देने के लिए..

रेणुका ने एक के बदले दोनों मग शीला के हाथों से ले लिए.. और बगल वाले टेबल पर रख दिए.. शीला को समझ नहीं आया की उसने ऐसा क्यों किया.. वो और कुछ सोच पाएं उससे पहले रेणुका ने उसे खींचकर अपने शरीर के ऊपर ले लिया..

शीला: "अरे क्या कर रही है पागल.. !!"

रेणुका: "यार.. मैंने तेरी चाटकर ठंडी कर दी.. अब तू मेरी चाट दे.. "

शीला बिना एक पल गँवाए.. अपने जिस्म को थोड़ा सा नीचे ले गई.. और रेणुका की जांघें फैलाकर उसकी गोरी-गुलाबी मुनिया के होंठ खोलकर सूंघने लगी.. उसे रेणुका की चूत की गंध बड़ी पसंद थी..

अलग अलग औरतों की योनियों की भिन्न भिन्न गंध होती है.. यह गंध उस औरत की स्वास्थ्य स्थिति, हॉर्मोनल बदलाव, साफ-सफाई और खानपान पर निर्भर करती है। यह गंध उत्तेजित भी कर सकती है और अगर तेज या दुर्गंधमय हो तो संभोग साथी को परेशान भी कर सकती है.. आम तौर पर एक स्वस्थ योनि से हल्की और प्राकृतिक गंध आती है.. कुछ औरतों की योनियाँ मछली जैसी या फिर बड़ी दुर्गंध वाली भी होती है.. जो किसी इन्फेक्शन के कारण या योग्य साफ-सफाई न रखने के कारण हो सकती है.. कुछ औरतों की योनियाँ मिठास भरी.. फलों जैसी गंध वाली भी होती है..!!

रेणुका आँखें बंद कर शीला की जीभ अपनी चूत मे अंदर बाहर होते हुए महसूस कर रही थी.. उसे इतना मज़ा आ रहा था की वो अपने पैर पटक रही थी.. शीला ने दो उंगलियों से जैसे ही चुटकी मे लेकर उसकी क्लिटोरिस दबाई.. रेणुका की चूत ने पानी छोड़ दिया.. वो बुरी तरह हांफने लगी.. और कुछ ही पलों मे शांत हो गई.. लेकिन शीला अंत तक उसका सारा रस चाटती ही रही.. जब तक रेणुका की चूत को पूरी तरह साफ नहीं कर दिया.. शीला ने चाटना बंद नहीं किया..


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आखिर शीला मुस्कुराकर खड़ी हुई.. और रेणुका के बगल मे लेट गई.. पास पड़े टेबल से उसने अपनी कॉफी का मग उठाकर एक घूंट पिया

शीला: "साली, तेरे चक्कर मे ये कॉफी ठंडी हो गई"

रेणुका: "भाड़ मे गई तेरी कॉफी.. मेरी चूत को ठंडा करना ज्यादा जरूरी था.. !!"

दोनों सहेलियाँ हँसते हुए एक दूसरे के जिस्म से खेलती रही..

अब नए लंड से चुदवाने के लिए दोनों ही उतावली हो रही थी..

जिस्म की आग थोड़ी ठंडी करने के बाद.. दोंनो निर्वस्त्र अवस्था में रेणुका के बेड पर लेटी हुई थी..

शीला: "यार बता तो सही की आखिर वो है कौन? और कितने बजे आने वाला है?"

रेणुका: "लगता है वो ट्राफिक में फंस गया है.. उसने कहा था की ढाई बजे तक आ जाएगा.. अभी तीन बज रहे है.. "

शीला: "क्या यार.. !! जो आदमी चोदने के लिए समय पर नहीं पहुँच सकता.. वो किसी काम का ही नहीं.. !! मुझे नहीं लगता की वो आएगा.. !!"

रेणुका: "आएगा.. जरूर आएगा"

शीला: "तूने उसका लंड देखा क्या??"

रेणुका: "देखा भी है और चूसा भी है"

शीला: "चूसा है मतलब अंदर भी डलवाया ही होगा.. मुझे खिलाने से पहले तू खुद चख चुकी है.. एक नंबर की चुदैल है तू.. !!"

रेणुका ने हँसते हँसते शीला के मादक बबलों को दबाते हुए कहा "नहीं डलवाया है यार.. भरी दोपहर में.. गाड़ी के अंदर खुली सड़क पर कैसे चुदवाती?? ऊपर ऊपर से ही किया था सब.. उसने मेरे मुंह के अंदर पिचकारी भी मारी थी"

शीला: "तो आज पहले मैं उसका मुंह में लूँगी.. तू उसे छूना भी मत.. तुझे सिर्फ देखना है"

रेणुका: "अरे हाँ मेरी माँ.. पहले उसे आ तो जाने दे.. पता नहीं कहाँ रह गया.. !! फोन कर के पूछूँ?"

शीला: "नहीं यार.. वो किसी तकलीफ में होगा वरना वही सामने से फोन कर देता ना तुझे.. !! थोड़ा इंतज़ार करते है.. अगर और थोड़ी देर में नहीं आया तो मुझे वापिस घर जाना होगा.. मदन से झूठ बोलकर आई हूँ.. वो कब आएगा.. कब हम दोनों करवाएंगे और कब मैं घर पहोचुंगी.. और यार.. तुझे तो पता है.. मुझे जल्दबाजी में करवाने में मज़ा ही नहीं आता.. अगर वो थोड़ी देर में आ गया तो मैं पहली करवा लूँगी और घर के लिए निकल जाऊँगी.. फिर तू आराम से पैर फैलाकर चुदवाना.. !!"

रेणुका: "एक काम करते है.. तेरे फोन से उसे फोन लगाते है.. पता तो चले क्या प्रॉब्लेम है.. !! पता चला तो ठीक वरना रोंग नंबर कहकर फोन कट कर देंगे"

शीला: "ठीक है.. !!" कहते हुए उसने अपने पर्स से फोन निकाला.. स्क्रीन पर नजर जाते ही उसके होश उड़ गए.. २० मिसकॉल थे मदन के.. अरे बाप रे.. !! इसे अचानक कौनसी मौत आ गई.. !! पहले तो कभी उसने इतने मिसकॉल नहीं किए.. !! शीला बहोत ही घबरा गई

रेणुका: "अरे फोन लगाकर पूछ ले.. जो भी होगा पता चल जाएगा"

शीला: "यार.. मुझे बहोत डर लग रहा है.. वो बहोत गुस्सा करेगा.. एक काम कर.. तू अपने फोन से कॉल लगाकर पूछ.. ये मत बताना की हम दोनों साथ है"

रेणुका उठकर बेडरूम गई अपना फोन लेने.. फोन उठाते ही वो चकित रह गई.. राजेश के आठ मिसकॉल थे..!! अपनी हवस बुझाने के चक्कर में दोनों ने फोन साइलन्ट मोड पर रखे हुए थे..

मदन को फोन लगाने से पहले रेणुका ने राजेश को फोन लगाया

रेणुका को अपेक्षा थी की फोन उठाते ही राजेश उस पर बुरी तरह भड़केगा.. पर राजेश ने ऐसा कुछ नहीं कहा.. राजेश ने जो कहा वो सुनकर रेणुका के चेहरे का रंग उड़ गया.. होश उड़ गए.. थर थर कांपने लगी वो... !!!

देखकर ही शीला को अंदाज लग गया की कुछ बहोत बड़ी गड़बड़ हुई थी.. !!

शीला: "क्या हुआ रेणुका?"

रेणुका स्तब्ध खड़ी रही.. जैसे उसकी आवाज ही छीन गई थी.. थोड़ी देर तक आँखें बंद कर वो नॉर्मल होने की कोशिश करती रही.. और फिर तुरंत उठकर कपड़े पहनने लगी..

शीला: "क्या कर रही है यार.. !!! कुछ बताएगी भी की क्या हुआ??? और मदन को फोन कर तो मुझे आगे दिमाग चलाने का पता चले"

घबराई हुई रेणुका ने कहा "शीला, तू अभी घर जाने के लिए निकल.. हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है.. राजेश कभी भी घर पहुँच सकता है.. आता ही होगा.. जल्दी निकल वरना हमारा सारा भांडा फुट जाएगा.. !!"

शीला: "अरे यार.. फिर वो तेरा नया लंड आ गया तो क्या करेगी??"

रेणुका ने शीला को लगभग धकेलते हुए कहा "वो अब नहीं आएगा.. तू जा यहाँ से.. !!"

शीला आगे कुछ पूछती उससे पहले रेणुका बाथरूम मे चली गई.. शीला को भी महसूस हुआ की कुछ बहोत बड़ा कांड हो गया था.. शीला ने तुरंत कपड़े पहने और दरवाजे की ओर जा ही रही थी की तभी डोरबेल बजी..

घबराकर शीला बाथरूम के दरवाजे के पास आकर रेणुका से बोली "यार लगता है राजेश आ गया.. अब क्या करें?"

रेणुका तुरंत बाहर निकली.. और शीला को हाथ से खींचते हुए किचन के रास्ते पीछे वाले दरवाजे पर ले गई.. शीला को रवाना कर वो भागी भागी मुख्य दरवाजे पर आई.. दरवाजा खोलते ही अपना बेग लेकर राजेश ने प्रवेश किया.. और धम्म से सोफ़े पर बैठ गया.. और सर पर हाथ रखकर सोचने लगा..

राजेश के अंदर जाने के बाद.. शीला चुपके से पीछे के रास्ते बाहर निकली.. और लगभग भागते हुए मुख्य सड़क पर आ गई.. तुरंत ऑटो में बैठकर उसने अपने घर का पता दिया.. ऑटो चल पड़ी और साथ ही साथ शीला के दिमाग में विचार भी चलने लगे.. क्या करू? मदन को क्या कहूँगी?? कैसे समझाऊँगी?? इतने मिसकॉल के बाद भी क्यों उसने फोन नहीं किया उसकी क्या सफाई देगी?? क्या हुआ होगा?? रेणुका इतनी घबराई हुई सी क्यों थी? मदन ने इतने सारे मिसकॉल क्यों किए होंगे?

देखते ही देखते ऑटो शीला के घर के बाहर पहुँच गई.. पैसे चुकाने के बाद शीला ने सब से पहले अपना मोबाइल स्विचऑफ कर पर्स में रख दिया.. और बेफ़िकर होकर घर में ऐसे घुसी जैसे उसे कुछ पता ही न हो.. !!

उसे देखते ही मदन उस पर टूट पड़ा..

मदन: "दिमाग नाम की कोई चीज है भी या नहीं.. !! कब से तुझे फोन कर रहा हूँ.. उठाया क्यों नहीं?? कोई ईमर्जन्सी हो तब फोन ही न उठाओ तो फोन रखने का क्या मतलब?? अब सुन.. सुबोधकांत का एक्सीडेंट हुआ है.. मैं और राजेश वहाँ जा रहे है.. बाद मैं फोन पर बात करेंगे.. अगर तू उठाएगी तो.. !!"

शीला: "इतना गुस्सा करने से पहले मेरी बात तो सुन ले.. मेरा फोन रास्ते में कहीं गिर गया है.. मैं पिछले एक घंटे से अपना फोन ही ढूंढ रही थी.. वरना तेरा फोन मैं क्यों नहीं उठाती? और सुबोधकांत जी के साथ अचानक ये क्या हो गया?? अभी थोड़े दिन पहले ही तो गए थे यहाँ से.. !!"

मदन: "मुझे क्या पता यार.. वहाँ जाकर पता चलेगा.. मैं और राजेश अभी निकल रहे है.. वो बस आता ही होगा.. वहाँ जाकर पता चलेगा की क्या हुआ, क्यों हुआ.. कितनी चोट आई है.. वगैरह वगैरह.. !!"

शीला: "मदन, कविता और मौसम को अभी बताना है या थोड़ा इंतज़ार करें?"

मदन: "अभी नहीं.. पहले वहाँ जाकर देख तो लें की क्या हाल है.. !!"

तभी बाहर गाड़ी का हॉर्न बजा.. मदन तुरंत बाहर निकला और गाड़ी में बैठ गया.. राजेस ने तेजी से गाड़ी दौड़ा दी

मदन: "तुझे किसने बताया इसके बारे में?"

राजेश: "मुझे रमिलाबहन का फोन आया था.. मैं तो एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाइट का इंतज़ार कर रहा था तभी फोन आया.. उन्हों ने सब से पहले पीयूष को फोन किया पर उसका लगा नहीं.. कविता के घर पर किसी ने उठाया नहीं.. !! वो कह रही थी की पुलिस वालों ने सुबोधकांत की डायरी से घर का नंबर लेकर फोन किया और बताया की हमारे शहर के बाहर वाली हाइवे पर एक्सिडन्ट हुआ है.. !!"

फूल स्पीड से राजेश की गाड़ी बाहर हाइवे पर निकल गई.. थोड़ा आगे जाते ही रोड पर उलटी पड़ी हुई गाड़ी नजर आई.. गाड़ी का रंग देखकर दोनों समझ गए की वह सुबोधकांत की ही गाड़ी थी.. पास ही में पुलिस की पी.सी.आर गाड़ी खड़ी थी और दो पुलिसवाले वहाँ खड़े रहकर ट्राफिक का नियमन कर रहे थे.. एक्सीडेंट में तहस नहस होकर उलटी पड़ी गाड़ी को देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी..

भीड़ को चीरते हुए राजेश और मदन अंदर घुसे और गाड़ी के पास जाकर, वहाँ खड़े पुलिस वाले से कहा "साहब, ये जिसका एक्सीडेंट हुआ है, हम उनके रिश्तेदार है.. उन्हें कौन सी अस्पताल ले गए है?? कितनी चोट आई है उनको?"

"बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए सरकारी अस्पताल ले गए है" बड़ी ही रूखी आवाज में उस पुलिस वाले ने कहा

यह सुनते ही.. राजेश और मदन दोनों के पैर ठंडे पड़ गए..!!!!

राजेश ने सब से पहला काम यह किया की गाड़ी के अंदर जो भी कीमती और जरूरी चीजें थी उन्हें ढूंढ कर बाहर निकाला.. एक फ़ाइल थी.. कार स्प्रे की बोतल, सुबोधकांत का मोबाइल.. सबकुछ अपने साथ ले लिया.. गनीमत थी की उस पुलिस वाले की नजर ट्राफिक पर थी इसलिए उसे किसी ने रोका नहीं

मदन का चेहरा फीका पड़ गया था, उसने कहा "यार, रमिलाबहन को कैसे यह समाचार देंगे?? मुझसे तो कहा ही नहीं जाएगा"

राजेश: "पीयूष और कविता को भी यह बताना पड़ेगा"

तभी राजेश के मोबाइल पर पीयूष का फोन आया

पीयूष: "सर, मेरे ससुरजी का एक्सीडेंट हुआ है.. अभी मेरी सास का फोन आया था.. मुझे वहाँ जाना होगा.. !!"

राजेश: "पीयूष, अब मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुन.. हम एक्सीडेंट वाली जगह पर पहुँच चुके है.. बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ रहा है की सुबोधकांत जी अब इस दुनिया में नहीं रहे.. उनकी बॉडी पोस्टमॉर्टम के लिए सरकारी अस्पताल ले गए है.. तू एक काम कर.. अपने ससुराल पहुँचने का बंदोबस्त कर.. और हाँ.. कविता और मौसम को भी साथ ले जाना.. यहाँ की चिंता मत कर.. और पैसों की जरूरत हो तो हमारे एकाउंटेंट से ले लेना.. !! हम अस्पताल से बॉडी लाने की कार्यवाही संभाल लेंगे"

मदन ने घर की लेंडलाइन पर शीला को फोन किया.. यह समाचार देने के लिए.. पर शीला ने पहले ही मौसम और कविता की जोर जोर से रोने की आवाज सुनकर अंदाज लगा ही लिया था..

राजेश: "हमे जल्दी अस्पताल पहुँच जाना चाहिए.. इन सरकारी कामों में बहोत वक्त लग जाता है..!!

सिविल अस्पताल के पी.एम. रूम के बाहर, राजेश और मदन बॉडी मिलने का इंतज़ार कर रहे थे.. अभी बॉडी मिलने में आधे घंटे की देर थी..

मदन: "यार, सुबह से चाय नहीं पी है.. सर फटा जा रहा है.. मैं जाकर चाय लेकर आता हूँ"

राजेश: "ओके.. "

मदन के जाने के बाद, राजेश ने अपनी जेब से सुबोधकांत का मोबाइल निकाल.. और जिज्ञासावश देखने लगा.. अंदर देखते ही सब से पहला झटका उसे तब लगा जब उसने देखा की सुबोधकांत को आखिरी बार रेणुका ने फोन किया था.. !!!!! रेणुका को क्या जरूरत पड़ी होगी सुबोधकांत को फोन करने की?? और उनकी गाड़ी की दिशा देखते हुए लग रहा था की वो इसी शहर में आ रहे थे.. !! कहीं सुबोधकांत और रेणुका के बीच... नहीं नहीं.. ऐसा नहीं हो सकता.. !!

दिमाग से खराब विचारों को झटकते हुए राजेश ने व्हाट्सप्प के मेसेज पढ़ना शुरू किया.. जितना वो पढ़ता गया, उतना ही उसका आश्चर्य और सदमा बढ़ता गया.. फाल्गुनी के साथ सुबोधकांत की चैट के मेसेज पढ़कर उसके पैरों तले से धरती खिसक गई.. !! मेसेज में सुबोधकांत द्वारा की गई चूत चटाई की तारीफ.. उनके लंड के गुण-गान.. और काफी अन्य सारे मेसेज थे.. उतना ही नहीं.. एक मेसेज में तो फाल्गुनी ने सुबोधकांत को यह पूछा था की उन्हें उसके साथ ज्यादा मज़ा आता है या वैशाली के साथ.. !! मतलब साफ था.. सुबोधकांत के काम-संबंध फाल्गुनी और वैशाली दोनों के साथ थे.. और वो भी काफी लंबे अरसे से.. !!

तभी सामने से मदन हाथ में चाय के दो कप लेकर आता नजर आया.. राजेश ने तुरंत व्हाट्सप्प चेट डिलीट कर दी और कॉल-लॉग भी साफ कर दीये.. कितने भी चौंकाने वाले सच क्यों न बाहर आ जाए.. अब क्या फ़र्क पड़ेगा.. !!! जब गुनहगार ही इस दुनिया को छोड़कर जा चुका हो.. फिर उन हकीकतों को उजागर करके.. अन्य लोगों को जीवन में नाहक का भूकंप लाने का क्या मतलब.. !!

राजेश को सुबोधकांत के मृत्यु से जितना सदमा नहीं लगा था.. उसे ज्यादा धक्का उस बात से लगा था की रेणुका और सुबोधकांत के बीच.. उनके एक्सीडेंट से पहले दो तीन बार बातचीत हुई थी.. राजेश की जानकारी अनुसार, रेणुका और सुबोधकांत की ऐसी कोई खास जान-पहचान थी नहीं की वो इतनी बातें करते.. ना ही रेणुका ने सुबोधकांत से बात होने के बारे में कोई जिक्र किया था.. !! साथ ही साथ.. सुबोधकांत के वैशाली और फाल्गुनी के साथ जिस्मानी संबंधों के बारे में जानकर राजेश को इतना तो यकीन हो गया था की सुबोधकांत कितने रंगीन मिजाज थे.. !!

राजेश के विचार रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.. फाल्गुनी ने खुलेआम वैशाली के साथ सुबोधकांत के संबंधों का उल्लेख किया था.. तो क्या फाल्गुनी की नज़रों के सामने ही सुबोधकांत ने वैशाली को चोदा होगा.. ?? हो सकता है की सुबोधकांत और वैशाली को फाल्गुनी ने रंगेहाथों पकड़ लिया हो.. और फिर वो भी शामिल हो गई हो.. !!

राजेश ने मोबाइल वापिस अपनी जेब में रख दिया..

दो घंटों के बाद उन्हें सुबोधकांत की बॉडी मिली.. एम्बुलेंस में बॉडी रखकर मदन आगे की सीट पर बैठ गया.. और राजेश बॉडी के साथ पीछे बैठा था.. पूरे रास्ते मे उसने सुबोधकांत के फोन का पोस्टमॉर्टम जारी रखा और जो जानने मिला वो बेहद चौंकाने वाला था.. !!
 
सुबोधकांत की बॉडी घर पहुंचते ही पूरे घर में मातम छा गया.. कविता, मौसम और रमिलाबहन चीख चीखकर रो रही थी.. रेणुका और शीला भी पहुँच चुके थे.. जब घर से अर्थी निकली तब सब की आँखें नम हो गई थी.. शमशान ले जाकर अंतिम संस्कार की विधि पूर्ण की गई..

घर की महिलाओं को इस नाजुक दौर में संभालने के लिए, रेणुका और शीला रुक गए.. मदन और राजेश वापिस लौट गए..

कहते है.. समय बड़े से बड़े जख्म को भर देता है.. मौसम की नादान ज़िंदगी को पिता के मौत के सदमे ने.. एकदम से परिपक्व बना दिया था.. बड़ी बहन होने के नाते कविता ने भी उसे काफी हद तक संभाल लिया था..

पिता के निधन के बाद, मौसम एकदम चुप सी रहती थी.. खोई हुई सी.. बाप के मरने के बाद.. बच्चे एकदम से बड़े हो जाते है.. इतने गंभीर, की देखकर ही लगें.. अब उन्हें ज़िंदगी जीने में और खुद को संभालने में कोई दिक्कत नहीं आएगी..

चार दिन बाद.. एक बड़े से हॉल में, सुबोधकांत को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रार्थना-सभा रखी गई थी.. सारे लोगों के बीच हेमंत भी मौजूद था.. जिसे देखकर, सफेद साड़ी में सज्ज शीला और रेणुका, दोनों शर्म से पानी पानी हो गई..

प्रार्थना सभा खत्म होने के बाद, सब मौसम के घर इकठ्ठा बैठे थे.. सब से बड़ा प्रश्न यह था की सुबोधकांत के बिजनेस का क्या किया जाए?? इतना लंबा चौड़ा काम था उनका.. सिर्फ मुलाजिमों के भरोसे नहीं छोड़ सकते थे.. इसका उत्तर स्वाभाविक था.. पीयूष को ही यह जिम्मेदारी निभानी थी.. जरूरत पड़ने पर वो राजेश की मदद भी ले सकता था..

इन सारी चर्चाओं के दौरान, फाल्गुनी ने मौसम के कान में चुपके से कुछ कहा.. सब का ध्यान उन दोनों के तरफ था..

मौसम ने झिझकते हुए राजेश से कहा "अंकल, पापा ने जो घड़ी पहनी थी वो आपको कहीं मिली क्या?? फाल्गुनी का कहना है की उसके पापा और मेरे पापा दोनों ने अपने लिए ऐसी दो घड़ियाँ साथ में इम्पोर्ट की थी.. करीब तीन लाख की थी..!!"

यह सुनते ही रेणुका का दिल बैठ गया.. और रोंगटे खड़े हो गए.. !! क्यों न होते.. उसके ब्लाउज के अंदर दोनों बबलों के बीच ही तो उसने वो घड़ी रखी थी.. जो सुबोधकांत ने उसे गिफ्ट की थी.. अभी भी उसे छुपाकर रखा हुआ था उसने अपने वॉर्डरोब में.. !! एक पल के लिए तो उसे जैसे चक्कर सा आने लगा.. बड़ी ही मुश्किल से उसने अपने आप को संभाला..

मदन: "मौसम, मैं और राजेश दोनों वहाँ मौजूद थे.. वहाँ पर जो कुछ भी मिला वो सब हम साथ ले आए थे.. लेकिन जब हम पहुंचे तब सुबोधकांत जी की बॉडी वहाँ से ले जा चुके थे.. हो सकता है की अस्पताल में किसी ने निकाल ली हो.. !! या फिर एक्सीडेंट के स्थल पर ही किसी आने जाने वाले ने हाथ साफ कर लिया हो.. !!"

राजेश: "बिल्कुल सही कहा मदन ने... और वैसे.. एक चलता फिरता आदमी हम सब के बीच से चला गया.. फिर एक घड़ी के लिए क्या रोना भला.. !!"

सुबोधकांत का जिक्र होते ही सारी महिलायें फिर से रोने लगी.. खासकर रमिलाबहन, कविता और मौसम.. !! शीला और रेणुका ने रमिला बहन को अच्छे से संभाला हुआ था.. तो दूसरी तरफ वैशाली कविता और मौसम का ध्यान रख रही थी..

सब से बुरा हाल फाल्गुनी का था.. अंदर से बेहद व्यथित होने के बावजूद वो अपना दुख व्यक्त नहीं कर पा रही थी.. सुबोधकांत के संग, छोटी मोटी छेड़खानियों और अश्लील बातों का दौर कब संभोग से होते हुए प्यार में बदल गया.. फाल्गुनी को पता ही नहीं चला था.. !! उनके साथ बिताया एक एक पल उसे सता रहा था.. छोटी सी छोटी बातों पर भी अब सिर्फ यादों का लेबल लग चुका था.. फाल्गुनी के दिल के दर्द को सिर्फ दो लोग ही ठीक से समझ पा रहे थे.. मौसम और वैशाली.. क्यों की वह दोनों उनके संबंधों के बारे में भलीभाँति अवगत थे.. फाल्गुनी जब रात को बिस्तर पर लेटती.. तब अपने आप से अकेले ही बातें करती रहती.. सुबोधकांत जा चुके थे और कभी वापिस लौटकर नहीं आने वाले थे, यह जाने के बावजूद, वह अकेले में उनको संभोदहित करते हुए बातचीत करती रहती.. कोई डॉक्टर शायद इसे मानसिक रोग का नाम देगा.. पर यह दुख तो वही जाने जिसने अपने जीवन के हमसफ़र को गंवाया हो.. !!

जाने वाला.. और लौटकर कभी भी वापिस न आने वाला व्यक्ति.. जाने के बाद भी करीब महसूस हो.. उसे ही तो प्रेम कहते है..!! फाल्गुनी की हालत ऐसी थी की ना वो बता सकती थी और ना जता सकती थी.. अंकल के साथ सेक्स से ज्यादा उसे उनके साथ की रोमेन्टीक और प्यार भरी बातें ज्यादा याद आ रही थी.. उसके मोबाइल में अभी भी कितने सारे मेसेज, तस्वीरें और विडिओ थे जो उसे अंकल की याद दिलाते रहते थे.. यह मेसेज कोई पढ़ लेगा तो कितनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी.. यह जानते होने के बावजूद वह उसे डिलीट करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी

इसी कारणवश ही तो लोग, बेजान प्रेमपत्रों को सालों तक संभालकर रखते है.. !! स्फोटक प्रेमपत्र अगर अपनी पत्नी/पति के हाथ लग जाए तो वैवाहिक जीवन का सत्यानाश हो जाएगा.. यह जानने के बावजूद.. लोग उन यादों को कितना संभालकर अपने पास रखते है.. !! सालों बाद उन खतों को पढ़ते ही पुरानी यादें जीवंत हो जाती है.. !!

रमिलाबहन को उनके रिश्तेदारों के हवाले छोड़कर शीला-मदन और रेणुका-राजेश वापिस लौट आए.. कुछ दिनों बाद पीयूष और कविता भी वापिस चले गए..

जैसे जैसे दिन बीतते गए.. सब कुछ सामान्य होता गया..

मौसम और कविता के रो रोकर आँसू सूख चुके थे.. अपने पिता की मौत की कड़वी वास्ताविकता को दोनों ने स्वीकार लिया था..

शीला से कई ज्यादा बड़ा सदमा रेणुका को लगा था.. सुबोधकांत के देहांत से.. उनका संबंध अभी अभी शुरू हुआ था.. और उनकी दी हुई गिफ्ट भी रेणुका के पास सुरक्षित पड़ी थी..

सुबोधकांत के अकाल मृत्यु को तीन महीने बीत चुके थे.. तमाम जिंदगियाँ अपनी राह पर सरपट चलने लगी थी.. जो सब से बड़ा बदलाव आया वो यह था की सुबोधकांत के बिजनेस को संभालने के लिए पीयूष और कविता को यहाँ शिफ्ट होना पड़ा.. अनुमौसी और चिमनलाल को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी.. क्यों की उन्हें वह समय याद था जब पीयूष के पास कोई नौकरी नहीं थी और वो मारा मारा फिर रहा था.. ससुर का इतना बड़ा धंधा अपने बेटे के हाथ में आता देख.. दोनों ने खुशी खुशी हाँ कह दी..

सिर्फ एक साल में पीयूष ने रमिलाबहन के घर के नजदीक एक बड़ा सा बंगला खरीद लिया.. सुबोधकांत के बिजनेस को पीयूष ने बड़े अच्छे से संभाल लिया था.. अब उसने अपने मम्मी पापा.. यानि.. अनुमौसी और चिमनलाल को भी साथ रहने बुला लिया.. शीला और मदन ने एक बहोत अच्छे पड़ोसी गंवा दीये.. वैशाली ने अपना पुराना प्रेमी गंवा दिया.. और कविता ने अपनी सहेली.. हालांकि वैशाली को अब पिंटू के रूप में जबरदस्त विकल्प मिल गया था.. जिसके संपर्क में आने के बाद, वो संजय की कड़वाहट भरी यादों को भूलती जा रही थी.. समय समय पर कोर्ट में तलाक के केस के अनुसंधान में हाजरी देने जाना पड़ता था.. जब जब कोर्ट जाकर संजय का चेहरा देखना पड़ता.. तब दो-तीन दिनों तक वैशाली बहोत ही अस्वस्थ रहती.. पर पिंटू उस दौरान.. वैशाली के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताकर उसे नॉर्मल कर देता.. वैशाली और पिंटू के बीच इतनी अच्छी दोस्ती हो चुकी थी.. की पिंटू के बगैर वैशाली को एक पल नहीं चलता था.. पिंटू और वैशाली को इतना करीब आते देखकर शीला मन ही मन खुश हो रही थी..

आखिर एक दिन कोर्ट ने फैसला सुना दिया.. वैशाली और संजय का कानूनन तलाक हो गया.. !! उस दिन मदन, शीला और पिंटू के सामने वैशाली खूब रोई.. बहोत रोई.. मदन और शीला को इतना दुख हो रहा था अपनी बेटी को इस हाल में देखकर.. वैशाली के बिना किसी दोष के इतना दर्द सहने की नोबत आने पर.. शीला और मदन को दुख होना स्वाभाविक था.. लेकिन उसी दिन कुछ ऐसा हुआ.. जिसके कारण वैशाली अपना सारा गम भूल गई..

पिंटू ने उसी शाम.. शीला और मदन के पास जाकर वैशाली का हाथ मांगा.. !! पिंटू वैशाली को इतना व्यथित नहीं देख सकता था.. वो उन तीनों को इस दुखभरे दौर से बाहर निकालना चाहता था.. और वैशाली भी उसे पसंद थी.. वैशाली मदन की तरफ देखने लगी.. मदन ने आँखें झुकाकर अपनी सहमति दे दी.. शीला ने भी हामी भरी.. और वैशाली पिंटू के कंधे पर सर रखकर रोने लगी..

उस दिन के बाद.. वैशाली और पिंटू को खुली छूट मिल गई.. वह दोनों देर रात तक भटकते रहते और खूब मजे करते.. अब तक पिंटू ने वैशाली को गलत तरीके से स्पर्श नहीं किया था. हाँ कभी कभार मस्ती मस्ती में उसके कंधे पर हाथ रखा था सिर्फ.. कभी कभी वैशाली बहोत उत्तेजित हो जाती.. और सामे से पिंटू से लिपट पड़ती.. वैशाली के तोप के गोले जैसे स्तन अपनी छाती से दबते ही पिंटू को अपने आप पर अंकुश रखने में बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ता.. पर वो वैशाली को समझाता की वो खुद पर थोड़ा कंट्रोल रखें..

कविता और पीयूष को वैशाली और पिंटू के इन नए संबंधों के बारे में जानकारी नहीं थी.. पीयूष-कविता के शिफ्ट हो जाने के बाद.. दोनों परिवारों में काफी कम संपर्क होता था.. बस कभी कभार फोन पर बातें हो जाती थी.. नए शहर में जाकर.. पीयूष शीला भाभी के भारी भरकम जोबन को.. उनके गोरे चिट्टे शरीर के सौन्दर्य को.. उनके बड़े बड़े बबलों को बहोत मिस करता था.. रोज सुबह वो घर की छत पर जाकर झाड़ू लगा रही शीला भाभी की मदमस्त गांड के दर्शन करता.. और झुकी हुई भाभी के दोनों स्तनों की बीच की गहरी खाई को देखकर आहें भरता था.. शीला भाभी के संग बिताएं उत्तेजक लम्हे याद करते ही पीयूष का लंड खड़ा हो जाता.. अब वह सब कुछ याद बनकर रह गया था..

लेकिन पीयूष को अब भी मौसम का सहारा था.. मौसम उसकी जान थी.. पर मौसम अभी भी अपने पिता के निधन के दुख से पूरी तरह उभरी नहीं थी.. और तरुण की यादों को भुला रही थी.. इसलिए पीयूष अभी मौसम के शरीर तक पहुँचने में झिझक रहा था.. पर अब भी दोनों के दिल का प्यार, परिंदों की तरह पर फड़फड़ा रहा था.. पीयूष सही समय का इंतज़ार कर रहा था.. मौसम का जोबन.. उसके कडक अमरूद जैसे स्तन.. उसका गोरा मुखड़ा.. टाइट चूत.. लचकती पतली कमर..!! देखते ही पीयूष का लंड गन्ने की तरह कडक हो जाता.. अपनी सारी हवस उसे कविता की बुर में ही उतार देनी पड़ती थी..और कोई चारा नहीं था..

कविता के पीयूष संग शिफ्ट हो जाने के बाद.. पिंटू ने भी वहाँ जाना बहोत कम कर दिया था.. वो अपना सारा समय यही बिताता था..

अब मौसम और फाल्गुनी, एक दूसरे के सहारे जीवन जी रहे थे.. अब बिना किसी मर्द के, उन्होंने खुश रहना सिख लिया था.. माउंट आबू में वैशाली ने दी हुई ट्रैनिंग अब काम आ रही थी.. लेस्बियन सेक्स का भरपूर आनंद लेने लगी थी दोनों.. !!

एक दिन शाम को मौसम ने फाल्गुनी को फोन किया

फाल्गुनी: "हाँ बोल मौसम.. मैं भी तुझे ही याद कर रही थी.. कहाँ थी इतने दिनों से?? खुद ही अपने आप को ठंडा कर लेती है क्या?"

मौसम: "अरे नहीं यार.. मन तो मेरा भी बहोत कर रहा है.. पर पिछले चार दिनों से पिरियड्स चल रहे थे इसलिए शांत बैठी थी.. तू कहाँ गायब थी?"

फाल्गुनी: "भूल गई.. ?? हम दोनों की पिरियड्स की तारीख एक ही तो है.. !! आज ही लाइन क्लियर हुई है.. बहोत मन कर रहा है यार.. आ जाऊँ??"

मौसम: "तुझे बुलाने के लिए ही तो मैंने फोन किया है"

फाल्गुनी: "यार, सच कहूँ तो.. अब उंगली डालकर डालकर तंग आ गई हूँ.. असली जैसा मज़ा ही नहीं आता..!!"

मौसम: "अब असली माल तो मिलने से रहा.. जो है उसी से काम चलाना पड़ेगा.. !! तू ये सब छोड़ और यहाँ आजा"

आधे घंटे के बाद फाल्गुनी और मौसम दोनों साथ बिस्तर पर थे.. अपनी चूतों को एक दूसरे के साथ रगड़ते हुए चूम रहे थे.. काफी देर तक एक दूजे के होंठों को चूसने के बाद मौसम के स्तनों को दबाते हुए फाल्गुनी ने कहा "यार, तुझे एक इम्पॉर्टन्ट बात बताना भूल ही गई.. !! पिछले कई दिनों से वो राजेश अंकल का फोन आ रहा है.. मुझे मिलने के लिए बुला रहे है.. मुझे बड़ा ही अटपटा सा लगा.. लास्ट दो-तीन बार के कॉल तो मैंने उठाए ही नहीं"

मौसम ने फाल्गुनी की निप्पल से खेलते हुए कहा "वो क्यों भला तुझे फोन कर रहे है?"


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फाल्गुनी: "पता नहीं यार.. अकेले मिलने के लिए बुला रहे है.."

मौसम: "तो डरने की क्या बात है इसमें.. ?? चल इस शनिवार को चले जाते है.. उसी बहाने वहाँ भी सबसे मिलना हो जाएगा.. !!"

फाल्गुनी: "यार ये पिरियड्स के बाद बहोत खुजली होती है" मौसम का हाथ पकड़कर अपनी चूत पर रगड़ते हुए फाल्गुनी ने कहा

फाल्गुनी की चूत का गरम स्पर्श मिलते ही उत्तेजित होकर मौसम ने फाल्गुनी के स्तनों को दबाते हुए कहा "फाल्गुनी, तूने तो पापा का लंड बहोत सारी बार लिया था.. तुझे याद तो बहोत आती होगी उनकी.. !!"


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फाल्गुनी: "हाँ यार.. बहोत याद आता है.. इतना जबरदस्त चाटते थे वो.. !! आज भी उनके साथ वाले फ़ोटोज़ और विडिओ देखकर रात को याद कर लेती हूँ"

मौसम: "फाल्गुनी, जैसे तेरे मोबाइल में पापा के फ़ोटो और विडिओ है.. वैसे ही शायद उनके मोबाइल में भी होंगे.. "

फाल्गुनी: "अरे हाँ यार.. ये तो मेरे दिमाग में ही नहीं आया था.. कहाँ है उनका मोबाइल?? लेकर आ.. देखें तो सही.. !!" थोड़े से चिंतित स्वर में फाल्गुनी ने कहा.. फिर उसे विचार आया "कहीं ऐसा तो नहीं की राजेश अंकल इसी कारण मुझे अकेले मिलने बुला रहे हो.. !!"

मौसम: "पर उन्हें इस बारे में कैसे पता चलेगा??"

फाल्गुनी: "अंकल के एक्सीडेंट के बाद उनका फोन कई दिनों तक राजेश अंकल के पास था.. हो सकता है उन्हें फोन से ऐसा कुछ मिला हो"

मौसम: "रुक एक मिनट.. मैं लेकर आती हूँ" मौसम भागकर गई और सुबोधकांत का मोबाइल ले आई.. जाहीर सी बात थी की मोबाइल स्विच ऑफ था.. बैटरी डाउन थी..

मौसम: "इसे चार्ज करना पड़ेगा.. फिर मैं खुद चेक कर लूँगी.. तब तक हम अपना काम तो खतम करें.. मम्मी आ जाएगी तो सब अधूरा रह जाएगा.. बहोत दिनों से तरस रही हूँ.. अंदर तो जैसे हजारों चीटीयां एक साथ रेंग रही हो ऐसा महसूस हो रहा है.. ऐसा मन करता है की अंदर कुछ डालकर जोर से घिसूँ.. ताकि ये खुजली शांत हो जाए.. "

फाल्गुनी: "यार, मुझे तो डर लग रहा है.. कहीं राजेश अंकल को सब पता तो नहीं चल गया होगा ना.. !!"

मौसम: "तू वो चिंता छोड़.. मैं सब पता कर लूँगी.. यार.. आज तेरे बूब्स इतने टाइट क्यों लग रहे है?? दबाने से दब भी नहीं रहे"


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फाल्गुनी वापिस सुबोधकांत की यादों में खो गई.. "मौसम, तेरे पापा के हम दोनों के लेकर बहोत सारे सपने थे.. वो तो मुझे वर्ल्ड टूर पर ले जाना चाहते थे.. और तुम सब से दूर ले जाकर.. कुछ दिनों के लीये मुझे पत्नी बनाकर रखना चाहते थे.."

मौसम: "हम्म.. पापा मम्मी से संतुष्ट नहीं थे.. इसलिए तेरी ओर आकर्षित हुए थे.. मेरी मम्मी है ही ऐसी सीधी-साधी.. !!"

फाल्गुनी: "मौसम, अंकल के साथ बिताई एक एक पल मुझे भुलाये नहीं भूलती.. उनकी बातें.. उनका स्पर्श.. उनका लंड.. चाटने की कला.. उनकी चुदाई.. आह्ह.. !! आज जो तुझे मेरे बॉल इतने टाइट लग रहे है.. उसका कारण भी उनका स्पर्श ही है.. वो जब मेरे बूब्स को देखते तब झपट पड़ते.. इतनी जोर से दबाते की मेरी आँखों में पानी आ जाता.. बहोत पसंद थे अंकल को मेरे बूब्स.. जब मौका मिलता वो इन्हें दबा लेते.. अब इन्हें कोई दबाकर नरम करने वाला नहीं रहा इसलिए इतने टाइट हो गए है"

मौसम: "क्यों, मैं तो तेरे रोज दबाती हूँ"

फाल्गुनी: "तेरे स्पर्श में और एक मर्द के स्पर्श में.. आसमान जमीन का अंतर है, मौसम.. !! तुझे जब पीयूष जीजू ने चोदा था तब कितना मज़ा आया था?? ऐसा मज़ा मेरे साथ कभी आ सकता है.. !! नहीं ना.. !! बिल्कुल वैसे ही.. मौसम, तुझसे एक बात कहूँ?" मौसम के नंगे स्तनों पर लगी छोटी सी निप्पल को चाटते हुए फाल्गुनी ने कहा.. फाल्गुनी के स्पर्श से मौसम सिहरने लगी.. आँखें बंद कर भारी सांसें लेने लगी मौसम..


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मौसम: "हाँ बोल क्या बात है?"

फाल्गुनी: "तेरे पापा को... तेरे बूब्स भी बहोत पसंद थे.. मेरे बॉल दबाते हुए वो अक्सर कहते.. जब तेरे बूब्स दबाता हूँ तब ऐसा ही सोचता हूँ की मैं मौसम के बूब्स दबा रहा हूँ"

फाल्गुनी की बात सुनते ही मौसम ने एक गहरी सांस छोड़ी और अपनी कमर को ऊपर नीचे करने लगी.. उसकी चूत लंड मांग रही थी.. फाल्गुनी की उंगलियों से अब उसका गुजारा नहीं होने वाला था

मौसम: "फाल्गुनी, तेरा ये सब पापा के साथ कैसे शुरू हुआ वो तूने सगाई की पिछली रात बताया था.. पर आज जरा विस्तार से बता.. और तुम लोग तो सेंकड़ों बार मिले थे.. मुझे सब कुछ जानना है.. तेरी चूत के दरवाजे तक पापा का लंड कैसे पहुंचा.. सब कुछ डीटेल में बता"

फाल्गुनी: 'यार, मुझे पता नहीं था उस वक्त की मज़ाक मज़ाक में शुरू की हुई हरकतें इतनी आगे तक पहुँच जाएगी.. जैसा मैंने कहा था की हम दोनों मेसेज पर चैट करते थे.. और फिर एकबार उनकी ऑफिस पर मिलना हुआ था.. उस दिन के बाद काफी समय तक हम मिले ही नहीं थे.. कई बार जब मैं अकेली होती थी तब मन करता था की अंकल मुझे ऑफिस बुलाए और हम वही खेल फिर से खेलें.. पर लंबे अरसे तक तेरे पापा ने मुझे ऑफिस बुलाया ही नहीं"

मौसम: "शायद इसलिए की ऑफिस पर इतने सारे लोगों का आना जाना पूरा दिन लगा रहता है.. और शाम के समय वो फोन करते हुए डरते होंगे क्योंकि उन्हें पता था की शाम को हम दोनों साथ में ही रहती है"

फाल्गुनी: "अंकल ने मुझे अपनी बातों से ऐसा मोहित कर लिया था की मैं खुद सामने से चलकर अपने प्यार का इजहार कर आई थी"

मौसम: "मतलब?? तूने पापा को प्रपोज किया था??"

फाल्गुनी: "बात दरअसल ऐसी थी की काफी दिनों से हम दोनों की अंदर अंदर छेड़खानियाँ तो चल ही रही थी.. उस दिन उनकी ऑफिस से आने के बाद.. मोबाइल पर गंदे और नंगे मेसेज का दौर शुरू हो गया था.. मुझे भी ऐसे "लंड - चूत" जैसे शब्द लिखे मेसेज पढ़ने में बहोत मज़ा आ रहा था.. खासकर जब रात को मैं बिस्तर पर लेटती तब मेरी हालत खराब हो जाती.. फिर एक दिन तू और तेरी मम्मी मार्केट गई थी और मैं तेरे घर आई.. तब अंकल अकेले थे और मैं तेरे बेडरूम में तेरा इंतज़ार कर रही थी.. अंकल बाथरूम में नहाने गए हुए थे.. उसी वक्त उनका मोबाइल बजाय.. मैंने ड्रॉइंगरूम से उनका फोन उठाया और भागकर बाथरूम की तरफ उन्हें देने गई.. तभी वो गीला कपड़ा लपेटकर बाहर निकलें.. गीला रुमाल उनके लंड पर चिपक गया था और उसका आकर स्पष्ट दिखाई दे रहा था.. तूने फ़ोटो में तो देखा ही है.. कितना मोटा था उनका..!! याद है मौसम.. हम अक्सर बातें करते थे की लड़कों का पेनीस कैसा होगा.. !! ऐसे में तेरे पापा का इतना तगड़ा हथियार देखकर मेरे तो होश उड़ गए.. मेरी नजर ही वहाँ से हट नहीं रही थी.. एकटक मैं उनके लंड को तांक रही थी.. देखने में ऐसे मशरूफ़ हो गई की मुझे पता ही नहीं चला की अंकल का फोन खत्म हो चुका था और वो मुझे.. अपने लंड को घूरते हुए देख रहे थे.. तब वो जानबूझकर अपना हाथ लंड के पास ले गए और सहलाने लगे.. जैसे अनजाने में खुजा रहे हो वैसे.. मैं होश खोकर उनके लंड का उभरा हुआ आकार देखती ही रही.. और मुझे देखता हुआ देखकर उनका लंड और सख्त होने लगा.. उभार का आकार बड़ा हो रहा था.. अचानक मुझे हकीकत का एहसास हुआ और मैंने उनकी तरफ देखा.. वो मेरे बूब्स को देख रहे थे.. उस दिन.. लगभग पंद्रह मिनटों तक तेरे पापा ने मुझे बिना स्पर्श किए सिर्फ अपनी हरकतों से मुझे बहोत मजे दीये.. और इनकी बातें.. आहाहाहा.. किसी का भी मन मोह ले.. वो मुझे कहने लगे.. फाल्गुनी बेटा.. तू अब जवान हो गई है.. तू और मौसम किसी लड़के को लाइन मारते ही होंगे ना.. मैंने जवाब नहीं दिया.. मेरे गले से आवाज ही नहीं निकल रही थी.. ज़िंदगी में पहली बार परिपक्व लंड को इतने करीब से देखा था.. !!! शर्म भी बहोत आ रही थी"

मौसम: "तो फिर तू वहाँ से चली क्यों नहीं गई?"

फाल्गुनी: "उनका लंड देखने के बाद.. मेरा तो दिमाग ही काम करना बंद हो गया था.. पैर जमीन से चिपक गए थे.. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे शरीर की सारी शक्ति खींच ली गई हो"

फाल्गुनी की बातें सुनकर मौसम अत्यंत कामुक हो गई थी.. फाल्गुनी की चूत में दो उँगलियाँ डालकर धीरे धीरे अंदर बाहर करते हुए वो बोली "हाँ फिर आगे क्या हुआ.. यार सुनने में बड़ा मज़ा आ रहा है मुझे तो.."

फाल्गुनी: "मैं उनके पेनीस को घूरती रही.. फिर अंकल ने मुझ से कहा... बेटा.. तुझे देखना है??"

मौसम: "आह्ह फाल्गुनी... !!" मौसम की चूत से रस की बूंदें टपकने लगी.. बुर की पूरी फांक गीली हो गई


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फाल्गुनी: "मैंने जवाब नहीं दिया और नजरें झुका ली.. तभी अंकल ने कमर पर लपेटा रुमाल निकालकर अपना लंड दिखाया.. !!! और बोले.. ये देख बेटा.. अंकल का लंड.. किसी को बताना मत ये बात.. ये तो तू छुपी नज़रों से देख रही थी इसलिए तुझे दिखा दिया.. अगर तुझे पसंद न हो तो ढँक देता हूँ.. !! यार.. मेरी बुरी फंसी थी.. ढँक दो ऐसा मैं कहना नहीं चाहती थी.. और खुला ही रहने दो, ऐसा मैं बोल ना सकी.. मेरी जो हालत हुई थी तब.. मैं बता नहीं सकती.. कांप रही थी मैं.. "

मौसम: "तूने जब पहली बार देखा तब कडक था पापा का?? जिजू ने जब अपना निकाल तब एकदम टाइट था.. मैंने तो अब तक नरम लंड देखा ही नहीं है" कहते हुए मौसम की बुर ने पानी छोड़ दिया

फाल्गुनी: "जब मैंने उन्हें फोन दिया तब एकदां टाइट तो नहीं था.. और नरम भी नहीं.. पर फिर थोड़ी ही देर में वो बड़ा हो गया.. बाप रे.. देखते ही मेरे तो होश उड़ गए थे"

मौसम अभी अभी झड़ चुकी थी इसलिए उसकी आँखें ढल गई थी.. फाल्गुनी के स्तनों को हल्के हाथों से मसलते हुए कहा "फिर आगे क्या हुआ??"

फाल्गुनी: "फिर अंकल ने मुझसे पूछा.. की क्या तूने कभी किसी मर्द का लंड देखा है?? मैंने गर्दन हिलाकर ना कहा.. फिर अंकल ने अपना पकड़कर मुझे दिखाते हुए कहा.. ये देख.. इसे कहते है लंड.. इसकी नसों में जब खून का भराव होता है तब ये सख्त हो जाता है.. और इसे लड़की की चूत में डालकर अंदर बाहर करने की क्रिया को ही सेक्स, संभोग या चोदना कहते है.. फिर उन्हों ने कहा.. फाल्गुनी तू अगर चाहें तो इसे छु सकती है.. अभी घर पर कोई नहीं है इसलिए किसी को पता नहीं चलेगा.. बाकी तेरी मर्जी.. !! सच कहूँ मौसम.. मुझे तो टच करने का बहोत मन था.. और मैं सोच रही थी की अगर अंकल जबरदस्ती अपना पेनीस मुझे हाथ में पकड़ा देंगे तो मैं मना नहीं करूंगी.. पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया यार.. शर्म के मारे मैंने मना कर दिया.. सिर्फ गर्दन हिलाकर.. बोलने की तो मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी.. फिर अंकल ने मुठ्ठी मे लँड पकड़कर हिलाया तो वो और मोटा हो गया.. मुझे तो उस विकराल मोटे लंड को देखकर ही डर लगने लगा था.. और रह रहकर यही विचार आता था की इतना मोटा लंड छोटे से छेद के अंदर कैसे घुस सकता है?? हम तो अंदर उंगली डालते थे तो भी दर्द होने लगता था.. मैं उन्हें लंड हिलाते देखती रही और वो बार बार मुझे पकड़ने के लिए कहते रहे.. पेनीस का आगे वाला लाल गोल हिस्सा इतना चमक रहा था.. मैं तो देखकर ही पागल हो रही थी.. !!"


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मौसम: "तो फिर तूने पापा का पहली बार कब टच किया??"

फाल्गुनी: "उस दिन के काफी समय बाद.. फिर जब जब हम अकेले मिलते तब अंकल मुझे अपना लंड दिखाते.. कभी कभी तो तेरे और आंटी की मौजूदगी में भी दरवाजे की आड़ से मुझे एक सेकंड के लिए अपना लंड दिखा देते.. फिर तो मुझे ऐसी आदत लग गई की अंकल का लंड देखने की लालच में.. मैं बार बार तेरे घर आने लगी.. !!

मौसम: "बाप रे.. !! लंड देखने की इतनी चूल थी तुझे.. !!"

फाल्गुनी: "वो तो तूने अपने पापा का देखा होता तो पता चलता.. !! फिर अंकल मुझे किसी न किसी बहाने अपने कमरे में बुलाते और अपना लंड नजदीक से दिखाते.. याद है तुझे.. जब भी तुम घर पर होती और वो नहाने जाते.. तब बाहर सूख रहा टॉवेल लेने तुझे बाहर भेजते थे.. !! "

मौसम: "हाँ.. हाँ याद आया"

फाल्गुनी: "बस उतनी देर में वो अपना लंड मुझे दिखा देते.. तेरे आने से पहले तो पिक्चर का पर्दा गिर जाता.. इसलिए तुझे कभी भी भनक नहीं लगी"

मौसम ध्यान से फाल्गुनी की एक एक बात सुन रही थी.. सिर्फ बातें सुनकर ही वो एक बार झड़ चुकी थी.. अब फिर से उसकी मुनिया में चुनचुनी होना शुरू हो गया था

बगल में सो रही मौसम की हंस जैसी नाजुक चिकनी गर्दन को चाटते हुए फाल्गुनी ने बात आगे बढ़ाई


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फाल्गुनी: "मौसम, तेरे पापा का लंड देखने की इतनी गंदी आदत लग चुकी थी उन दिनों में दिन में सात-आठ बार फिंगरिंग करती.. मुझे पूरा दिन उनका लंड ही नजर आता.. अगर किसी कारणवश एकाध दिन उनका लंड देख न पाती तो मेरा मन बेचैन हो जाता.. लगभग डेढ़ महीने तक ये सिलसिला चला.. उस दौरान मैंने उनका लंड करीब बीस-पच्चीस बार देखा था.. और फिर एक दिन कुछ नया हुआ.. तीन दिन हो गए थे उनके लंड का दर्शन किए हुए.. क्योंकी मेरे घर मेहमान आए हुए थे और मैं बहोत बीजी थी.. इसलिए तेरे घर आना नहीं हुआ था.. चौथे दिन तू कॉलेज में आखिरी लेक्चर अटेंड करने बैठी थी और मैं घर को निकल गई.. सोचा मम्मी की मदद करूंगी.. रास्ते में ही अंकल का ऑफिस था.. मन किया की एक बार अंकल को मिल लूँ.. वहीं बस से उतर गई.. अंकल काम में मशरूफ़ होंगे ये सोचकर मैंने उन्हें कॉल किया.. तो उन्हों ने मुझे तभी ऑफिस आने से मना किया.. और कहा की वो बाहर ही निकल रहे थे क्योंकी उन्हें घर जाना था.. उन्हों ने मुझे पार्किंग में गाड़ी के पास उनका इंतज़ार करने के लिए कहा.. थोड़ी देर बाद वो आए और मैं उनके साथ गाड़ी में बैठ गई.. आज पहली बार गाड़ी में.. मैं आगे की सीट पर बैठी थी.. मैंने पूछा.. क्या बात है अंकल? घर क्यों जा रहे हो इतनी जल्दी?? सब ठीक तो है ना.. !! उन्हों ने मेरे गाल को हल्के से छूकर कहा.. कहीं जाना नहीं है.. वो तो सामने कस्टमर बैठे थे इसलिए मुझे बहाना बनाना पड़ा.. फिर उन्हों ने मुझसे पूछा.. बोल फाल्गुनी.. घर चलें या लॉंग ड्राइव पर जाना है? मैंने कहा.. मैं एक घंटे के लिए फ्री हूँ.. इतना सुनते ही उन्होंने गाड़ी बाहर हाइवे की ओर चला दी.. मौसम, उस दिन उन्होंने मुझसे पहली बार सेक्स करने की पेशकश की.. मैंने कहा.. अंकल आप ऐसा सब करते हो तो डर नहीं लगता क्या.. !! अंकल ने बिंदास कहा.. वो तो तुझे मेरा लंड देखना पसंद है इसलिए मैं हिम्मत करता हूँ.. और फिर बोलें.. फाल्गुनी तुझे कैसा लगा मेरा?? मैं तो शर्म से पानी पानी हो गई.. बस इतना ही कहा की.. बहोत बड़ा है अंकल आपका.."

मौसम बड़े ही चाव से सुनते ही अपनी क्लिटोरिस को कुरेद रही थी

फाल्गुनी: "अचानक उन्होंने गाड़ी मैन रोड से उतारकर कच्ची सड़क पर ले ली. मैं डर गई और उनसे पूछा की ये कहाँ ले जा रहे है आप मुझे.. !! अंकल ने कहा की इस रास्ते पर आगे ही मेरा फार्म-हाउस है.. जिंदगी के सबसे हसीन पल मैंने यही पर बिताए है.. और मुझे पता है की आज मैं तुझे किस करने वाला हूँ इसलीये तुझे यहाँ ले आया.. और हाँ.. इस फार्म-हाउस के बारे में घर पर किसी को नहीं पता.. इसलिए तू मौसम को बताना मत.. मैंने कहा.. नहीं कहूँगी अंकल.. पर मैं आपको किस नहीं करूंगी, प्लीज.. !! मेरी रगों में तेजी से खून दौड़ रहा था.. अनजान जगह अंकल के साथ.. पता नहीं क्या क्या होने वाला था.. !!"

मौसम: "यार पापा के फार्म-हाउस के बारे में तो मुझे भी नहीं पता.. कभी बताया नहीं उन्हों ने"

फाल्गुनी: "इसी लिए तो मुझे सीक्रेट रखने को कहा था"

गहरी सोच में डूब गई मौसम.. साथ ही साथ उसकी आँख में एक अनोखी चमक भी आ गई.. उस चमक का कारण फाल्गुनी को भी पता नहीं चला.. पर फार्म हाउस का नाम सुनकर मौसम यह सोच रही थी की अब पापा की गैर-मौजूदगी में.. उस फार्म हाउस का क्या हुआ होगा?? हो सकता है की पापा ने वहाँ कोई केर-टेकर रखा हो.. !!

मौसम: "तुम लोग फार्म हाउस पर पहुंचे तब वहाँ कोई चौकीदार था क्या?"

फाल्गुनी ने थोड़ा सोचकर कहा "हाँ यार.. अंकल ने किसी को फोन करके चाबी मँगवाई थी और कोई देने आया था.. पर उस दौरान अंकल ने मुझे गाड़ी में छुपकर रहने को कहा था इसलिए देख नहीं पाई.. !!"

मौसम: "फोन पर चौकीदार से बात करते हुए उन्हों ने कुछ नाम बोला था क्या?"

फाल्गुनी: "कुछ बोला तो था पर अभी मुझे याद नहीं है.. पर तू क्यों पूछ रही है?"

मौसम: "बस ऐसे ही.. मुझे जानना था.. !!"

फाल्गुनी: "इतनी पूछताछ क्यों कर रही है?"

मौसम: "क्योंकी मुझे वो फार्म हाउस देखना है.. जल्दी से जल्दी.. हो सकें तो हम दोनों कल ही स्कूटी लेकर वहाँ जाते है.. !!"

फाल्गुनी ने थोड़ी सी झिझक के साथ कहा "पहले मेरी बात तो खत्म होने दे.. !!"

मौसम: "हाँ बोल.. "

फाल्गुनी: "वो चौकीदार चाबी देकर चला गया उसके बाद अंकल ने मुझे गाड़ी से उतरने के लिए कहा.. बहुत बड़ा फार्म हाउस था.. चारों तरफ हरियाली थी.. ढेर सारे पेड़ों के बीच एक सुंदर सा छोटा मकान था.. दरवाजा खोलकर उस मकान में अंदर ले गए और अंदर का नजर देखकर मैं चोंक गई.. !!"

मौसम: "क्यों? ऐसा क्या था अंदर?"

फाल्गुनी: "अंदर एक विशाल बेडरूम था.. बड़ा सा बेड बीच में था.. एक कोने में अल.सी.डी टीवी लगा हुआ.. फ्रिज था.. माइक्रोवेव भी था.. कई कुर्सियों के बीच एक बड़ा सा टेबल था.. जिस पर ढेर सारी शराब की बोतलें रखी हुई थी.. यही समझ की पूरा घर बसाया हुआ था.. !!"

फाल्गुनी के स्तनों पर अपना सर रखकर.. अपनी छोटी सी क्लिटोरिस को रगड़ते हुए मौसम बड़े ही आश्चर्य से, अपने बाप की अईयाशी की सारी बातें सुन रही थी...


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फाल्गुनी: "मुझे बेड पर बिठाकर अंकल फ्रिज से पानी लेकर आए.. मैं बिस्तर पर बैठी और वो सामने कुर्सी पर.. मुझे बड़ा ही विचित्र सा महसूस हो रहा था.. पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था की अंकल किसी भी वक्त खड़े होकर मुझे अपनी बाहों में भर लेंगे.. मेरे बूब्स दबाएंगे... और अपना कडक पेनीस मेरे हाथों में थमा देंगे.. सच कहूँ तो बाकी सारी चीजें करने का मुझे भले ही डर था.. पर अंकल का लंड तो मैं खुद ही पकड़ना चाहती थी"

"आह्ह.. !!" अपनी क्लिटोरिस को दबाते हुए सिसक दिया मौसम ने

फाल्गुनी ने बात आगे बढ़ाई

"फिर अंकल ने मुझसे पूछा.. कैसी लगी ये जगह? सुंदर है ना.. !! जब काम के टेंशन से ज्यादा परेशान हो जाता हूँ तब यहाँ आकर दो पेग लगाकर रिलेक्स हो जाता हूँ..

मैंने पूछा.. आपको यहाँ कंपनी कौन देता है अंकल? आज जैसे मुझे लेकर आए है.. वैसे हर बार कौन आता है आपके साथ?

अंकल ने जवाब दिया... अब तुझसे क्या छुपाना फाल्गुनी.. !! जिस इंसान की जरूरतें घर पर संतुष्ट न होती हो.. वो बाहर तो जाएगा ही.. पर मेरी पसंद बहोत ऊंची है.. पैसों की मुझे कोई फिक्र नहीं है.. सिर्फ पार्टनर मेरी पसंद की होनी चाहिए.. कोई पसंदीदा लड़की आने के लिए तैयार हो तो ठीक है.. वरना मैं और मेरी तनहाई.. दारू की बोतल और सिगरेट का धुआँ.. !!! आज तू मिल गई तो मूड बन गया यहाँ आने का.. वरना मैं यहाँ पिछले चार महीने से नहीं आया हूँ.. अब बता.. मेरे फार्महाउस को किस तरह रंगीन बनाएगी तू?? जो तू कहेगी वही होगा..

मैंने शरमाकर कहा.. अंकल मैंने तो आपको पहले दिन ही मेसेज में बता दिया था.. मैं सिर्फ सब कुछ देखूँगी.. मेरा नुकसान हो ऐसा कुछ नहीं करूंगी.. मैं तो आपकी मौसम जैसी ही हूँ"

अपने नाम का उल्लेख सुनते ही मौसम का दूसरी बार पानी निकल गया.. निप्पल सख्त हो गई और वो बड़े ही जुनून से अपनी चूचियाँ दबाने लगी


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फाल्गुनी मौसम की हवस को देखते हुए आगे बताने लगी

फाल्गुनी: "अंकल मेरी आँखों में आँखें डालकर देखते हुए मुसकुराते रहे.. फिर उन्हों ने कहा.. तो अब मैं बाहर निकालूँ?

मेरा तो कब से मन कर ही रहा था मौसम..

अंकल ने कहा.. रोज हम दूर से.. डरते डरते जो काम करते है.. वो आज बड़े ही निश्चिंत होकर आराम से कर सकते है.. तू भी थोड़ी ओर रिलेक्स हो जाए तो मज़ा आएगा हम दोनों को..

मैंने कहा.. मैं तो रिलेक्स ही हूँ अंकल.. मैं इस बार करीब से देखना चाहती हूँ..

अंकल: क्या देखना चाहती हो? मैंने कहा.. आपका.. जो रोज आप दिखाते हो
अंकल: फाल्गुनी, कब तक तुम इसका नाम लेने से हिचकती रहोगी.. ??एक न एक दिन तो बोलना ही पड़ेगा ना.. तो आज ही क्यों नहीं.. !! बोल मुझे.. की अंकल मुझे आपका लंड दिखाइए..

मैंने शरमाते हुए कहा.. अंकल, आप अपना... वो.. लंड खोलिए ना.. !!

अंकल ने हँसते हुए कहा.. शाबाश बेटा.. चल आज तू ही अपने हाथों से मेरी चैन खोल दे.. मैंने चैन खोलने की कोशिश की.. आधी चैन खुलकर अटक गई.. अंकल ने फिर मुस्कुराकर अपनी चैन पूरी खोल दी.. और कहा.. देख फाल्गुनी.. ऐसे खुलती है चैन"

अपने बाप की हरकतें सुनकर... वासना से गरम हो चुकी मौसम के कान लाल ला हो गए थे.. उसके दिमाग पर सेक्स का भूत सवार हो गया था.. वो आँखें बंद कर ऐसी कल्पना कर रही थी जैसे फाल्गुनी नहीं.. पर वो खुद ही पापा के पेंट की चैन खोल रही हो.. !! जैसे जैसे फाल्गुनी उसके पापा के लंड के प्रथम स्पर्श की तरफ आगे बढ़ी.. वैसे वैसे मौसम भी कैसी अलौकिक दुनिया में विहार करने लगी थी

फाल्गुनी ने मौसम के कच्चे अमरूद जैसे स्तनों को जोर से दबाया.. क्योंकी उसकी उत्तेजना भी अब चिनगारी से भड़कती आग का स्वरूप धारण कर चुकी थी.. फाल्गुनी की बातों का मौसम ने कोई जवाब नहीं दिया.. न शब्दों से और ना ही अपने वर्तन से.. इसलिए फाल्गुनी ने आगे की बात बताना शुरू किया


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फाल्गुनी: "मौसम, मुझे बराबर याद है.. उस दिन अंकल ने लाल कलर की अन्डरवेर पहनी थी.. उन्होंने अपना पेंट घुटनों तक उतार दिया.. और फिर कुर्सी पर बैठ गए.. उनकी जांघों पर बालों का जंगल देखकर मेरी चूत से इतना पानी टपका.. जितना उससे पहले कभी नहीं निकला था.. !! मैं तो थरथर कांप रही थी.. अंकल के इस रूप की मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.. वो थोड़ी देर तक खामोश बैठे रहे और फिर बोलें.. फाल्गुनी, जरा यहाँ आना तो.. !!

सुनकर ही मैं स्तब्ध हो गई.. !! जैसे बिस्तर से मेरा शरीर चिपक गया हो.. !! मैंने कोई जवाब नहीं दिया पर वो द्रश्य मुझे बड़ा ही अनोखा स लग रहा था.. मैं अभी भी उनके गुच्छेदार बालों को देख रही थी.. !!"

मौसम: "क्यूँ बालों को ही देख रही थी?? उनका खड़ा नहीं हुआ था क्या?" मौसम को अपने स्वर्गीय पापा के बारे में बात करने में बड़ा मज़ा आ रहा था

फाल्गुनी: "अरे.. उनका वो तो अंदर उठ ही चुका था.. अन्डरवेर के अंदर बड़ा सा तंबू बन चुका था.. और बार बार ऊपर नीचे हो रहा था.. इसलिए मैंने मज़ाक करते हुए कहा.. अंकल, देखो वो अंदर कैसे तड़प रहा है.. !! उसे बाहर निकालिए वरना उसका दम घुट जाएगा.. !!

अंकल ने कहा.. बेटा, जब तक तू न कहें, मैं इसे कैसे बाहर निकालूँ?? तुझे अपने हाथों से बाहर निकालना है क्या? अगर तेरी इच्छा हो तो खुद ही बाहर निकाल ले..."

मौसम के बेडरूम में एक विचित्र सी गंध फैल गई थी.. दो दो चूतों के अमृत के रिसाव की गंध थी वो.. फाल्गुनी ने मौसम के सामने देखते हुए कहा "लगता है तेरा पानी भी मेरे साथ ही छूट गया"


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मौसम आँखें बंद कर मुस्कुरा रही थी

फाल्गुनी: "हाँ मौसम... तेरे पापा के लंड को सिर्फ याद करते हुए भी मेरा पानी निकल गया.. जरा सोच.. उस वक्त मुझे कैसा महसूस हो रहा होगा.. !!"

मौसम: "वो सब तो मैं समझ गई.. जब इतना ही मज़ा आया था.. तो फिर मेरे और वैशाली के सामने सेक्स से डरने का नाटक क्यों कर रही थी.. ??"

फाल्गुनी: "अंकल के कारण.. उन्हों ने मुझे कहा था की तू मेरे साथ इन्जॉय कर रही है उसका आनंद तेरे चेहरे पर साफ झलक रहा है.. क्यों की तुझे अपने भावों को छुपाना नहीं आता.. उनकी ही हिदायत थी.. की मैं मेरी अन्य सहेलियों के साथ जब सेक्स की बातें हो रही हो तो जरा भी दिलचस्पी न दिखाऊँ.. और ऐसा जताऊँ जैसे मुझे इन सब बातों से बहोत डर लग रहा है.. ऐसा करने से किसी को भी शक नहीं होगा की मैं इन सब बातों में एक्टिव हूँ.. और हमारे संबंधों को आसानी से गुप्त रख पाऊँगी... बस इसी कारणवश मैं ऐसा अभिनय कर रही थी तुम लोगों के सामने.. उस वक्त मुझे मन ही मन इतनी हंसी आ रही थी.. क्यों की उन दिनों तो मैं अंकल का पूरा लंड अंदर डलवाकर रोज मजे करती थी... हा हा हा हा हा हा.... !!"

फाल्गुनी का एक नया ही रूप देख रह थी मौसम... इतने सालों के परिचय के बाद मौसम को आज ये एहसास हो रहा था की वो फाल्गुनी को पूर्णतः जानती ही नहीं थी.. !! जिस फाल्गुनी को वो बड़ी ही भोली, नादान और घबरु समझ रही थी.. वो हकीकत में बेहद चालक और शातिर निकली.. माउंट आबू में उसने इतना वास्तविक अभिनय किया था की वो वाकई डर गई थी.. ये सोचकर की कहीं उसके साथ किसी ने कुछ गलत न किया हो.. !!

फाल्गुनी: "मौसम, अंकल ने अपना लंड अन्डरवेर से बाहर निकालने का आमंत्रण तो दे दिया.. पर मेरी हिम्मत नहीं हुई.. मैंने कहा.. अंकल, मुझे देर हो रही है.. और शर्म भी आ रही है.. आप ही निकालिए बाहर

अंकल ने कहा.. अगर तुझे देर हो रही हो.. तो अभी वापिस चलते है.. मेरा लंड तो वैसे भी तू रोज देखती ही है ना..

यह सुनते ही मैं घबरा गई.. कहीं अंकल के लंड को छूने का मौका हाथ से न फिसल जाए.. मैंने कहा.. एक बार देख लूँ.. फिर हम वापिस लौट जाएंगे.. अभी पंद्रह मिनट और रुक सकते है... यार मौसम.. अंकल अन्डरवेर के ऊपर से ही अपने लंड को सहलाते हुए सख्त करते जा रहे थे.. उनके पेनीस का उभार उनकी नाभि तक पहुँच रहा था.. सहलाते हुए अचानक उन्हों ने अपना अन्डरवेर साइड में करते हुए लंड बाहर निकाल दिया.. स्प्रिंग की तरह उछलकर उनका लंड बाहर निकला.. उस वक्त मेरे और उनके बीच करीब दो फिट का ही अंतर था.. इतने नजदीक से परिपक्व कडक लंड को देखने का मेरे लिय पहला मौका था.. यार, उसे देखते ही मेरी पुच्ची में ऐसी सुरसुरी होने लगी.. आज भी याद है.. उनका लंड बाहर झूलते हुए आगे पीछे हो रहा था.. मैंने उनके सामने देखे बगैर ही उसे पकड़ लिया.. जीवन का वह प्रथम स्पर्श.. इतना सुहाना लग रहा था..

अंकल ने कहा.. शाबाश बेटा.. अब इसे मुठ्ठी में पकड़कर हिला.. मज़ा आएगा..

मैंने उनके कहे अनुसार मुठ्ठी में पकड़कर हिलाना शुरू किया.. उनका लंड इतना गरम था की मेरी हथेलियों पर जलन हो रही थी..


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अंकल ने कहा.. बेटा.. एक किस तो दे मुझे.. प्लीज.. !!

सुनकर मेरे तो होश उड़ गए मौसम.. बड़ी हिम्मत करके मैंने उसे पकड़ा था.. और मैं अंकल को किसी बात के लिए मना नहीं करना चाहती थी.. और हाँ कहने की हिम्मत नहीं थी.. मैंने कहा.. ओह अंकल, मैं नहीं कर पाऊँगी.. पर आप चाहो तो कर लो..

मेरी इजाजत मिलते ही अंकल ने पहली बार मुझे गाल पर चूम लिया.. यार, मुझे तो लगा था की वो होंठों पर किस करेंगे.. आखिर मैंने शर्म छोड़कर अंकल से कहा.. वहाँ नहीं अंकल.. होंठों पर कीजिए.. वो टाइटेनिक फिल्म में करते है ना.. बिलकूल वैसे ही.. अंकल ने हँसते हँसते मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दीये.. और करीब तीन मिनट तक मेरे होंठों को अलग अलग तरीकों से चूसते रहे.. मेरी आँखें बंद हो गई.. और जो मुझे फ़ील हो रहा था.. आहाहाहा.. मैं बयान नहीं कर सकती.. उस दौरान मैं उनका लंड हिला रही थी... जब उन्हों ने मेरे होंठों पर से अपने होंठ हटाए तब मुझे अपनी हथेली पर गरम गुनगुना चिपचिपा सा एहसास हुआ.. उस वक्त उनका लंड इतना सख्त होकर फूल चुका था की मुझे डर था कहीं उसकी नसें फट न जाएँ.. फिर अंकल ने मुझे समझाया की इसे मर्दों का ऑर्गजम कहते है.. और यह चिपचिपा प्रवाही जब हमारी चूत में डिस्चार्ज करते है तब बच्चा होता है.. !!"




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फाल्गुनी ने अपनी बात खतम की तब मौसम ने एक गहरी सांस लेकर छोड़ी.. उसकी मदमस्त छातियाँ ऊपर नीचे हो रही थी..

मौसम: "हाँ, जीजू का भी ऐसा ही हुआ था.. मुझे तो देखकर घिन आई थी.. चिपचिपा गंदा सा था.. छी.. !!"

फाल्गुनी: "हाँ यार.. सफेद सफेद.. फेविकोल जैसा.. !!"

कामुक बातें करते हुए.. दोनों अपनी उँगलियाँ चूत पर चला रही थी.. और झड़ती जा रही थी.. मौसम की चूत अब तक तीन बार पानी छोड़ चुकी थी.. और अभी भी उसकी चूत से शहद टपक रहा था.. आज बातों का विषयय था ही कुछ ज्यादा उत्तेजक.. !!!

फाल्गुनी: "मौसम, उस पहली लीप किस के बाद ही मुझे अंकल से प्यार हो गया.. अब तक उन्हों ने मेरे बूब्स को टच भी नहीं किया था.. हाँ.. उस दौरान वो मेरी छातियों को भूखी नज़रों से घूर जरूर रहे थे.. पर शायद वो मेरी इजाजत की.. या मेरी पहल करने की वैट कर रहे थे.. जो मुझे करना उस दिन सुझा ही नहीं.. !!"

मौसम: "हाँ यार.. पहली बार बूब्स दबवाने में कितना मज़ा आता है वो मुझे तभी पता चला जा जीजू ने पहली बार मेरे दबाए थे"

फाल्गुनी: "हाँ, वो तो बाद की मुलाकातों में जब अंकल ने बताए तब मुझे भी एहसास हुआ.. और जब अंकल ने पहली बार मेरी निप्पल को मुंह में लेकर चूसा.. ओह्ह.. क्या बताऊँ यार..इतना मज़ा आया था.. जैसे स्ट्रॉ से कोल्डड्रिंक चूस रहे हो.. बिल्कुल वैसे ही चूस रहे थे अंकल.. !!"

मौसम: "जीजू ने जब पहली बार मेरे चूसे थे.. तब तो मैं होश ही गंवा बैठी थी.. "

फाल्गुनी ने तभी मौसम की गुलाबी निप्पल को मुंह में लेकर चूसा... निप्पल पर अपनी जीभ गोल गोल फेरकर.. अंकल की सिखाई सारी विद्या आजमा दी फाल्गुनी ने.. !! और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई..


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फाल्गुनी: "अंकल समय के बड़े ही पक्के थे.. मैंने पंद्रह मिनट कहा था.. तो पंद्रह मिनट होते ही वो खड़े हो गए.. और हम वापिस जाने के लिए निकल गए.. यार मौसम, मेरा इतना मन कर रहा था की बीच रास्ते अंकल मेरे साथ कुछ न कुछ करेंगे.. मेरा इतना मन कर रहा था की वो मुझे बाहों में जकड़कर मेरा दम घोंट दे.. मेरे शरीर की धज्जियां उड़ा दे.. पर उन्हों ने कुछ भी नहीं किया.. देखते ही देखते मेरे घर तक गाड़ी पहुँच गई.. मेरे गाड़ी से उतारने से पहले उन्हों ने मेरी हथेली को हल्के से चूम लिया और मेरा हाथ अपने लंड के ऊपर रख दिया.. अभी भी खड़ा था अंदर.. उनका लंड.. मुझे एक बार फिर लीप किस करने की बड़ी ही तीव्र इच्छा थी.. !!"

मौसम: "तू भी पागल है.. सिर्फ पकड़कर बैठी रही.. !!! अंदर डलवाया होता तो कितना मज़ा आता.. !!"

फाल्गुनी: "यार, उस वक्त कहाँ पता था की अंदर डलवाने में इतना मज़ा आता है.. और डर भी लग रहा था.. दूसरी बात की उनके लंड की मोटाई देखकर इतना डर लग रहा था की मेरे छोटे से छेद के अंदर ये कैसे जाएगा.. !! लेकीन उस दिन के बाद.. मैंने अपनी चूत में अलग अलग चीजें डालकर देखने की शुरुआत कर दी.. पहले उंगली डालकर देखा.. फिर पेन डाली.. एक बार तो मोमबत्ती भी डाल ली.. उस लीप किस के बाद मैं अंकल के साथ एकदम खुलकर बातें करने लगी थी.. बिना संबंधों वाले प्रेम की शुरुआत हो चुकी थी हम दोनों के बीच में.. उनके स्पर्श से मुझे जितना सुख मिलता.. उतना ही मज़ा मुझे उनकी नंगी बातों में आता था.. उनके मुंह से "लंड" और "चूत" जैसे शब्द सुनकर ही मैं सिहर जाती.. वो जब गाली-गलोच करते तब मेरी पुच्ची गीली हो जाती..

परोक्ष रूप से मैंने इस संबंध का स्वीकार कर लिया था.. तेरे पापा ने मुझे कभी भी हर्ट नहीं किया था.. कभी भी किसी बात से दुख नहीं पहुंचाया था.. और ना ही कभी किसी बात के लिए जबरदस्ती की थी.. यही सारी बातें मुझे उनकी तरफ खींचती चली गई"

मौसम: "हम्म... तो फिर तूने अपने प्यार का इजहार कब किया? और उन्हों ने तुझे आई लव यू कब कहा था? तेरे बूब्स सब से पहले कब दबाए थे?? पहली बार तूने उनके सामने अपने सारे कपड़े कब उतारे थे?? पहली बार पापा का लंड मुंह में और चूत में कब लिया था? पापा ने पहली बार कब तेरी चूत चाटी थी? फाल्गुनी, प्लीज मुझे सब कुछ बता.. मुझे तेरे और पापा के इस रोमांस के सफर के बारे में सुनने में बाद मज़ा आ रहा है"

एक गहरी सांस लेकर फाल्गुनी ने आगे की कहानी सुनाई...

"उस दिन के बाद.. मुझे अंकल की ऐसी आदत लग गई की एक दिन भी उनके बगैर रह नहीं पाती थी.. उनके साथ बात करने के लिए तरसने लगी थी मैं.. और चौबीसों घंटे बस उनके ही विचार मन में घूमते रहते थे.. उनके स्पर्श और उनके लंड की याद आते ही मैं पागल सी हो जाती थी.. उस मुलाकात के बाद.. उनके मेसेज की संख्या भी बढ़ गई.. जिन्हें पढ़कर मुझे बहोत मज़ा आता था.. देर रात तक हम मेसेज पर चैट करते रहते.. ज्यादातर वलगर जोक्स और अश्लील बातें ही होती थी.. और उस दौरान मैंने अपनी उंगली से आनंद लेना सीखा था.. दो चार मेसेज पढ़कर ही मैं झड़ जाती.. इतना हॉट हॉट लिखते थे अंकल.. !!"



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अपनी दोनों निप्पलों को मसलते हुए मौसम सोच रही थी... जीजू के साथ भी इसी तरह द्विअर्थी मेसेज और नंगे जोक्स से शुरुआत हुई थी.. !!

मौसम: "फाल्गुनी.. हम दोनों मिलकर जीजू को फँसाये तो कैसा रहेगा?? दोनों मजे करेंगे.. मुझे बहोत मन कर रहा है यार.. कितना अरसा हो गया लंड देखे हुए"

फाल्गुनी: "आह्ह.. मौसम.. !! तेरी बातें सुनकर तो नीचे आग ही लग गई है.. मुझे तो लंड और चूत का घर्षण इतना याद आता है.. !! पूरा दिन दिल करता है की कोई पकड़कर बस मुझे चोदता ही रहें.. अंकल क्या गए.. मेरी तो पूरी ज़िंदगी ही बेरंग हो गई.. पर क्या जीजू मेरे साथ करने के लिए मानेंगे?? मैं तो तैयार हूँ.. पर अगर कविता दीदी को पता चल गया तो?"

मौसम: "यार, कुछ भी शुरू होने से पहले ऐसा बोलकर पनौती मत लगा.. एक जीजू ही है जिसके साथ हम ऐसा ट्राय कर सकते है.. और कहीं मुंह मारने जाएंगे तो किसी को मुंह दिखाने की काबिल नहीं रहेंगे"

फाल्गुनी: "मैं तो कहती हूँ.. किसी और के साथ ही ट्राय करते है.. कुछ नहीं होगा.. पर जीजू के साथ नहीं.. दीदी को पता चलेगा तो क्या सोचेगी हमारे बारे में.. ??"

मौसम: "यार फाल्गुनी.. जीजू को फंसाना जरूरी है.. मुझे एक बहोत ही इम्पॉर्टन्ट बातें उन से उगलवानी है.. वो बता ही नहीं रहे.. अब यह आखिरी उपाय बचा है"

फाल्गुनी: "कौनसी इम्पॉर्टन्ट बात??"

मौसम: "यही की तरुण ने मुझ से सगाई क्यों तोड़ दी.. !! मुझे आज तक असली कारण का पता नहीं है.. की उस बुद्धू ने आखिर ऐसा क्यों किया.. जीजू उस रात तरुण से मिलकर घर लौटे तब उनके और दीदी के बीच कुछ चुपके चुपके बातचीत हुई थी.. मुझे पक्का यकीन है की उनको ये कारण के बारे में तरुण ने बताया है पर वो मुझे बता नहीं रहे.. मैंने दीदी से भी पूछा.. जीजू ने दीदी को भी कुछ नहीं बताया है अब तक.. !!"

फाल्गुनी: "कविता दीदी को भी नहीं बताया जीजू ने?? मैं नहीं मानती.. बात कैसी भी हो.. पति अपनी पत्नी को जरूर बताएगी"

मौसम: "यार.. एक बार नहीं.. हजार बार पूछा मैंने दीदी से.. पर दीदी ने मम्मी की कसम खाकर कहा की उन्हें नहीं मालूम है.. "

फाल्गुनी: "तो सीधा तरुण को ही फोन लगाकर पूछ ले.. !!"

मौसम: "पूछ लेती.. पर वो फोन भी तो उठाना चाहिए ना.. बहोत बार ट्राय किया.. फिर मुझे लगा की जिसके साथ सगाई टूट चुकी हो उसे बार बार कॉल करने से मेरी ही बेइज्जती हो रही थी.. "

फाल्गुनी: "हम्म.. क्या तू अभी भी तरुण को मिस करती है?"

मौसम ने एक गहरी सांस छोड़कर कहा "मिस करने से क्या होगा फाल्गुनी.. चाँद को कितना भी चाह लो.. वो रहेगा तो हमारी पहुँच के बाहर ही.. मुझे दुख इस बात का है की सब सही चल रहा था हम दोनों के बीच.. और अचानक वो कौनसी वजह आ गई जिसने सब तहस नहस कर दिया.. और वो भी मेरी किसी गलती के बगैर है.. पर तरुण का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है की उसे मिस करने से अपने आप को मैं रोक नहीं पाती.. !!"

फाल्गुनी: "ऐसा है... या ऐसा था.. ??"

मौसम: "दिल की किताब में प्यार कभी अतीत नहीं बनाता.. वो ताज़ा ही रहता है.. मरते दम तक"

फाल्गुनी: "एक काम कर.. मुझे उसका नंबर दे"

बिना किसी एतराज के मौसम ने फाल्गुनी को तरुण का नंबर दे दिया.. जो फाल्गुनी ने अपने मोबाइल में सेव कर लिया

मौसम: "तो यही बात है.. इसीलिए मैं जीजू को फिर से पटाना चाहती हूँ.. अपने जाल में फँसाकर मुझे वो बात जांननी है"

फाल्गुनी: "ठीक है.. तू कर अपने हिसाब से कोशिश.. अगर सब कुछ नाकाम रहे तो आखिर में एक ब्रह्मास्त्र है.. जिसका उपयोग करेंगे तो हमारा काम जरूर हो जाएगा"

प्रशनार्थ भारी नज़रों से मौसम फाल्गुनी की तरफ देखती रही

फाल्गुनी: "मैं शीला आंटी की बात कर रही हूँ.. कविता डू ने एक दिन कहा था मुझे की शीला आंटी बहोत बड़ी महा-माया है.. और ऑल-राउंडर खिलाड़ी है.. जब सारे रास्ते बंद हो जाए तब आंटी कहीं से भी रास्ता ढूंढ निकालने में माहिर है"

"वैसे उनकी जरूरत पड़नी नहीं चाहिए" मौसम ने कहा

फाल्गुनी ने मौसम के जिस्म को सहला सहला कर इतना उत्तेजित कर दिया था की तीन बार झड़ने के बावजूद मौसम ने कहा "यार फाल्गुनी.. जरा नीचे चाट दे ना.. बहोत मन कर रहा है यार"

फाल्गुनी ने मौसम की दोनों जांघें चौड़ी की और अपनी चूत को मौसम की चूत के साथ रगड़ने लगी.. घर्षण से ऊर्जा पैदा होती है.. लंड के बगैर तरस रही दोनों चूत.. बाह्य घर्षण से स्खलित होकर शांत हो गई.. हाँ.. चूत की अंदर की दीवारें तो अब भी भूखी थी.. मौसम की चूत चटवाने की इच्छा अधूरी रह गई..


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दोनों सहेलियाँ फ्रेश होकर रिलेक्स हो गई.. मौसम की बाहों से बाहर निकलकर फाल्गुनी ने अपनी ब्रा पहनी और फिर घूम गई.. मौसम ने पीछे से हुक बंद कर दिया और फाल्गुनी के एटम-बॉम्ब जैसे स्तनों को ब्रा के कप में अच्छे से पेक कर दिया.. फाल्गुनी ने अपनी टीशर्ट पहन ली.. उसके स्तनों का उभार.. उसके सौन्दर्य का आलेख कर रहे थे..

फाल्गुनी: "यार मौसम.. अब तो मेरे पापा लड़का पसंद करने की जिद कर रहे है.. क्या करू?? अंकल की यादें भुलाये नहीं भूलती.. मुझे तो शादी करने की इच्छा ही नहीं है.. क्या करूँ समझ में नहीं आता.. अब तक तो सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन अब मेरी जिद नहीं चलेगी.. मम्मी भी पीछे पड़ गई है"

मौसम: "कभी न कभी तुझे शादी करनी तो होगी ही.. पूरी ज़िंदगी थोड़े ही ऐसे बैठी रहेगी.. !! अगर लड़का अच्छा हो तो कर ले शादी.. पर ध्यान रखना.. कहीं मेरे जैसा हाल न हो"

मौसम फिर से उदास हो गई.. तरुण की याद आते ही.. "मेरे तो अब पापा भी नहीं रहे.. जो कहीं और मेरे रिश्ते की बात कर सकें" मौसम की आँखें भर आई.. दोनों सहेलियाँ एक दूसरे से लिपटकर रोने लगी.. आँसू बहाने से मन हल्का जरूर होता है.. यह दोनों सहेलियों ने तो एक दूसरे के कंधे पर सर रखकर अपना दुख हल्का कर लिया.. पर बेचारी रमिलाबहन कहाँ जाती.. किसको कहती... !! इस उम्र में पति की छत्रछाया गँवाने के बाद.. स्त्री सही अर्थ में अबला बन जाती है.. सीधे-सादे स्वभाव की रमिलाबहन का दुख समझने वाला या बांटने वाला कोई नहीं था.. जिसके पास अपना दुखड़ा सुनाने के लिए कोई न हो.. जिसके पास रोकर अपना दिल हल्का कर सकें.. उस ससए ज्यादा कंगाल कोई नहीं होगा इस दुनिया में

फाल्गुनी कपड़े पहन कर तैयार हो गई.. और मौसम को गले लगाकर एक आखिरी बार उसके बूब्स दबा दीये.. लीप किस करने के बाद वो चली गई

उसे जाते देख मौसम सोच रही थी.. पिछले एक साल में.. फाल्गुनी का इस घर में आना काफी कम हो गया था.. पहले तो वो पूरा दिन इसी घर में पड़ी रहती.. मौसम समझ सकती थी की पापा की यादों से दूर रहने के लिए फाल्गुनी यहाँ कम आती थी..

मौसम के घर से निकलकर अपने घर की ओर जाते हुए फाल्गुनी सोच रही थी.. इतने लंबे अंतराल के बाद आखिर राजेश अंकल ने क्यों फोन किया होगा.. !! कहीं उनके हाथ मेरे और अंकल के फ़ोटो-विडिओ तो नहीं लग गए.. !! अंकल के फोन में सब कुछ था ही और वो फोन राजेश अंकल के पास दो दिनों तक रहा था.. पर अगर ऐसा होता तो राजेश अंकल ने एक साल का इंतज़ार क्यों किया?? हो सकता है की सही समय का इंतज़ार कर रहे हो या फिर हिम्मत न जुटा पा रहे हो.. जो भी था.. उनसे बात करना जरूरी था.. और यह जानना भी की आखिर वो क्या क्या जानते है
 
मौसम के घर से निकलकर अपने घर की ओर जाते हुए फाल्गुनी सोच रही थी.. इतने लंबे अंतराल के बाद आखिर राजेश अंकल ने क्यों फोन किया होगा.. !! कहीं उनके हाथ मेरे और अंकल के फ़ोटो-विडिओ तो नहीं लग गए.. !! अंकल के फोन में सब कुछ था ही और वो फोन राजेश अंकल के पास दो दिनों तक रहा था.. पर अगर ऐसा होता तो राजेश अंकल ने एक साल का इंतज़ार क्यों किया?? हो सकता है की सही समय का इंतज़ार कर रहे हो या फिर हिम्मत न जुटा पा रहे हो.. जो भी था.. उनसे बात करना जरूरी था.. और यह जानना भी की आखिर वो क्या क्या जानते है

रास्ते पर चलते चलते जा रही फाल्गुनी ने आखिरकार राजेश को फोन लगाया

राजेश: "मेरा फोन क्यों नहीं उठा रही थी फाल्गुनी??? नाराज है क्या मुझसे"

फाल्गुनी: "नहीं ऐसा कुछ नहीं है.. असल में जब भी आपका फोन आता तब कोई न कोई आसपास होता था.. इसलिए उठा नहीं सकी.. सॉरी.. कहिए कुछ अर्जेंट काम था?? पहले कभी नहीं और अब क्यों आप फोन पर फोन कर रहे है?" बिंदास होकर फाल्गुनी ने पूछ लिया.. अनुभव ने उसे सिखाया था की झाड़ू को गोल गोल घुमाने से कुछ नहीं होता.. सीधा मकड़ी पर ही झाड़ू मारने से काम होता है

राजेश: "देख फाल्गुनी.. मैं घुमा-फिराकर बात नहीं करूंगा.. मेरी बात का बुरा मत मानना.. पर सुबोधकांत के मोबाइल से मुझे तुम्हारे और उनके काफी आपत्तिजनक फोटोस और विडिओ मिले.. फाल्गुनी, तुझे तो मुझे थेंकस कहना चाहिए.. मैंने वो सब डिलीट कर दिया और किसी को इस बारे में नहीं बताया अब तक.. चाहता तो उसी वक्त तुम्हारा भंडाफोड़ कर सकता था.. पर वक्त की नजाकत को देखते हुए मैंने अब तक इंतज़ार करने में ही भलाई समझी.. पिछले एक साल से मुझे यही प्रश्न सता रहा है की तुझ जैसी सुंदर और जवान लड़की को उस बूढ़े में क्या नजर आ गया भला??"

फाल्गुनी: "माउंट आबू के टॉइलेट में जब वैशाली ने आपको अंदर खींच लिया था.. तब उसे आप के अंदर क्या नजर आ गया था?" बेवाक होकर फाल्गुनी ने कह दिया..

एक पल के लिए राजेश की बोलती बंद हो गई.. पर वो तुरंत पटरी पर आ गया

राजेश: "समझ गया तेरी बात.. अब मैं तुझसे जो भी कहूँगा.. आशा रखता हूँ की उसके बारे मैं तू खुले मन से सोचेगी और सही निर्णय लेगी.. मैं तेरे ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डाल रहा"

फाल्गुनी: "कहिए अंकल.. मैं सुन रही हूँ.."

राजेश: "वैशाली ने मेरे साथ आबू में जो कुछ भी किया उससे तुम यह बात तो मानेगी ही.. की मेरे अंदर भी वो सारी खूबियाँ होगी जो लड़कियों और औरतों को मेरी ओर आकर्षित करे"

फाल्गुनी: "जरूर होगी.. वरना इतनी सुंदर और सेक्सी वैशाली.. आपको घास क्यों डालती?? पार्टी में उस वक्त कई हेंडसम जवान लड़के थे.. सो आई बिलिव की आप मैं भी वो सारी खूबियाँ होंगी जिनके कारण मैं सुबोध अंकल के प्रति आकर्षित हुई थी.. "

राजेश: "देख फाल्गुनी.. तेरे वो सुबोध अंकल तो अब इस दुनिया में नहीं रहें.. और मैंने तेरे और उनके जो सारे विडिओ देखे है.. उससे यह साफ प्रतीत होता है की सेक्शुअल इच्छाएं काफी प्रबल है.. जिस तरह तू उनके साथ सेक्स कर रही थी उसे देखकर यही विचार आता है की अब तक तू बिना किसी के सहारे कैसे रह पाती होगी?? उंगली चलाने से लंड जैसा मज़ा तो आता नहीं होगा तुझे.. !!"

एक साल के बाद, फाल्गुनी किसी मर्द के मुंह से सेक्स जैसा शब्द सुन रही थी.. उस दौरान वो चलते चलते अपने घर तक पहुँच गई थी.. वो फटाफट अपने कमरे में घुस गई और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया

राजेश: "चुप क्यों हो गई?"

फाल्गुनी: "दरअसल मैं मौसम के घर से निकली और अभी अपने घर पहुंची.. ड्रॉइंगरूम में मम्मी थी इसलिए चुप हो गई थी.. अब बोलीये अंकल.. आपने ठीक कहा.. अंकल के साथ मैंने बहुत मजे किए है.. पर अब क्या हो सकता है.. !!"

राजेश: "तो शादी क्यों नहीं कर लेती तू?"

फाल्गुनी: "मेरे मम्मी-पापा काफी समय से मेरे लिए लड़के देख रहे है.. पर मेरा ही मन नहीं करता.. ऊपर से मौसम के साथ तरुण ने जो किया उसके बाद से शादी करने से जी घबरा रहा है"

राजेश: "सुबोधकांत के लिए तेरे मन में जो जज़्बात है उसे मैं समझ सकता हूँ.. पर कब तक उनकी याद में तड़पती रहेगी?? कभी न कभी तो तुझे उन्हें भूलना ही पड़ेगा और नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी ही होगी"

फाल्गुनी: "वो तो है ही, अंकल.. पर भूलना कहाँ आसान है.. !! और किसी को याद करना या भूलना ये हमारे बस में तो होता नहीं है.. फिलहाल मैं और मौसम एक दूसरे के सहारे जी रहे है.. हम दोनों को नए साथी की तलाश है.. जो सुबोध अंकल की तरह समजदार हो.. मेच्योर हो.. आई मिस हीम वेरी मच.. उनके साथ बिताया एक एक पल मुझे हरदम याद आता है.. !!"

राजेश: "उनका टच भी तो याद आता होगा.. है ना.. !!"

अब ये एकदम पर्सनल सवाल था जिसका जवाब फाल्गुनी देना नहीं नहीं चाहती थी.. पर राजेश ने उसके और अंकल के चुदाई के विडिओ तो देख ही लिए थे.. इसलिए अब औपचारिकता दिखाने की कोई जरूरत नहीं थी..

बिंदास होकर फाल्गुनी ने जवाब दिया.. "ऑफ कोर्स.. याद क्यों नहीं आएगा.. !! उस मामले मे वो एकदम परफेक्ट थे.. उन्हें कभी कुछ कहना नहीं पड़ता था.. वो सब समझ जाते थे.. उनके पास से मुझे जो मिला.. वो अप्रतिम था.. मैं कभी भूल नहीं पाऊँगी" फाल्गुनी की आवाज और आँखें नम हो गई..

राजेश: "फाल्गुनी, अब मैं और क्या कहूँ? पर अगर तुझे या मौसम को मेरा कुछ भी काम हो तो बेझिझक बताना.. तुम दोनों मुझसे या रेणुका से बात कर सकती हो.. वैसे मैंने रेणुका को तुम्हारे और सुबोधकांत के संबंधों के बारे में कुछ नहीं बताया है इसलिए वो बात मत करना.. वैशाली और उसकी मम्मी भी है.. कविता और पीयूष वहाँ शिफ्ट हो गए उसका ये मतलब नहीं की हमें भूल जाओ.. याद है ना.. एक साल पहले हम सब माउंट आबू गए थे रेणुका के बर्थडे पर तब कितना मज़ा किया था??"

फाल्गुनी: "हाँ अंकल याद है.. पर ऐसा कोई फ़ंक्शन हो तो आ सकते है.. आप फिर से रेणुका भाभी का बर्थडे सेलिब्रेट करेंगे तो हम जरूर आएंगे"

राजेश: "वैसे मजे करने के लिए मौकों का इंतज़ार नहीं करते.. मौके बनाने पड़ते है.. तुझे साथ लेकर घुमाने के लिए सुबोधकांत बिजनेस मीटिंग का बहाना बनाते ही थे ना.. !!"

फाल्गुनी: "वैसे बिजनेस आपका भी है.. तो क्या आप भी मीटिंग के नाम पर ये सब करते हो?"

राजेश: "सिर्फ मैं ही नहीं.. मेरे जैसे काफी लोग ऐसा करते है.. अगर सुबोधकांत अपनी पत्नी से ये कहते की मैं फाल्गुनी के साथ सेक्स करने जा रहा हूँ, तो क्या वो उन्हें जाने देती??"

फाल्गुनी: "हम्म.. मैं समझ गई अंकल"

राजेश: "डॉन्ट वरी.. मैं कुछ जुगाड़ करता हूँ मिलने का"

फाल्गुनी: "मैं फोन रखती हूँ"

राजेश: "रखने से पहले मैं तुम्हें पूछना चाहता हूँ.. क्या आगे से मैं तुम्हें फोन कर सकता हूँ? और क्या तुम मेरा फोन उठाओगी?"

फाल्गुनी: "हाँ अंकल.. पर कॉल करने से पहले मेसेज कर देना.."

राजेश: "उससे बेहतर यही होगा की तू ही सामने से मुझे फोन करना... जब तू अकेली हो.. सुबह नौ बजे से लेकर रात के आठ बजे तक मैं ऑफिस में होता हूँ.. उस समय तुम मुझे फोन कर सकती हो"

फाल्गुनी: "ठीक है अंकल"

राजेश: "बाय डीयर.. !!"

राजेश ने फोन रख दिया और आगे की रणनीति के बारे में सोचने लगा..

फाल्गुनी ने तुरंत मौसम को फोन लगाया और राजेश के फोन के बारे में बता दिया..

वैसे फाल्गुनी को राजेश से बात करने के बाद बहुत अच्छा लगा.. अंकल के जाने के बाद जो खालीपन महसूस हो रहा था.. उसमें कहीं न कहीं राजेश फिट होता नजर आने लगा था

मौसम से बात करने के बाद.. फाल्गुनी ने शीला को फोन लगाया और उन्हें बताया की तरुण के लिए मौसम के दिल में अभी भी जज़्बात है.. और हो सकें तो वो एक बार तरुण से बात करें.. शीला भी अब गंभीरता से इस बारे में सोचने लगी थी

मौसम के घर में अब केवल वो और उसकी मम्मी ही बचे थे.. कविता और पीयूष नजदीक ही रहते थे और आते जाते रहते थे.. पर सुबोधकांत का इतना बड़ा कारोबार अकेले संभालते हुए पीयूष के नाक में दम हो जाता.. पीयूष अक्सर सोचता की इतना बड़ा बिजनेस संभालने के बाद भी ससुरजी को गुलछर्रे उड़ाने का समय कैसे मिल जाता था.. !!!

कविता के पास अब ढेर सारा पैसा था.. वो जैसे चाहती उड़ा सकती थी.. उसे काफी बार पिंटू की याद आ जाती.. और पीयूष जब बेहद व्यस्त होता तब पुराने दिन भी याद आ जाते जब पीयूष राजेश की ऑफिस मे सिर्फ एक मुलाजिम था.. कम से कम शाम के सात बजे घर तो आ जाता था.. दौलत तो बहोत आ गई थी पर पति का साथ नहीं मिल रहा था.. काफी समय हो गया था कविता और पीयूष की शादी को.. अनुमौसी की आँखें उनके संतान को देखने के लिए तरस रही थी.. कविता को भी अक्सर अपनी सुनी कोख सताती रहती थी..

ऐसी ही एक शाम को कविता उदास मन से.. बरामदे में झूले पर बैठकर सब्जी काट रही थी..

तभी मौसम वहाँ पहुंची..

मौसम: "मुंह लटकाकर क्यों बैठी हो दीदी? जीजू ने रात को ठीक से डोज़ नहीं दिया क्या?" पिछले एक साल में मौसम और फाल्गुनी, कविता के साथ काफी बिंदास हो गए थे.. और सारी बातें खुलकर करते थे.. कविता और मौसम बहनों की तरह नहीं पर सहेलियों की तरह बन गई थी

कविता: "तेरे जीजू को टाइम ही कहाँ है मुझ डोज़ देने का.. पहले तो पीयूष रोज रात को सेक्स करने के लिए मुझे इतना तंग करता था.. मैं तो यही सोचती की इन मर्दों को सेक्स के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं होगा क्या.. !! चौबीसों घंटे खड़ा ही रहता था उसका.. मौका मिलते ही बाहर निकालकर खड़ा हो जाता था वो.. शादी के शुरुआती समय में तो मैं ऐसा ही सोचती थी की लंड हमेशा सख्त ही रहता होगा क्योंकी नरम लंड मैंने कभी देखा ही नहीं था.. वही पीयूष आज बिजनेस में इतना डूब चुका है की मुझे कई बार ताज्जुब होता है.. इसे मेरी याद आती भी है या नहीं?"

मौसम: "दीदी... जीजू ने पापा का इतना बड़ा कारोबार इतने कम समय में संभाल लिया वही बहोत बड़ी बात है.. वरना सब कुछ बिखर जाता"

कविता: "वो सब तो ठीक है मौसम.. पर बिजनेस के चक्कर में घर-गृहस्थी बिखर जाएगी उसका क्या??"

मौसम किचन में पानी लेने चली गई इसलिए उसने सुना नहीं..

अपने दिल की भड़ास निकाल रही कविता पर पीयूष को फोन आया और उसने कहा की उसे देर हो जाएगी और खाना ऑफिस में ही खा लेगा..

कविता ने फोन रख दिया.. अभी अभी उसने फूलगोभी काटी थी सब्जी बनाने के लिए.. काटी हुई सब्जी की थाली उसने कंपाउंड के बाहर खड़े सांड के सामने उंडेल दी.. और उस विशालकाय सांड को खाते हुए देखती रही.. मन ही मन वो हंस रही थी.. पीयूष को फूलगोभी की सब्जी बहोत पसंद थी.. इसलिए मार्केट जाकर वो खास उसके लिए खरीद कर लाई थी.. पर पीयूष के पास समय ही कहाँ है.. !! फूलगोभी किसके लिए लाई थी और कौन खा रहा है.. !!

कहते है ना.. दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम.. !! फूलगोभी को चट करने के बाद वो सांड आभारवश कविता के सामने देख रहा था

"अरे दीदी.. ये क्या किया?? इतनी महंगी सब्जी आपने गाय को खिला दी?" मौसम ने बाहर आकर कहा

"वो गाय नहीं.. सांड है मौसम.. !!" कविता ने कहा

"अरे यार.. गाय हो या सांड.. क्या फरक पड़ता है?" मौसम का संकेत फूलगोभी की सब्जी की ओर था

"सांड सांड होता है और गाय गाय होती है.. फरक तू नहीं समझेगी.. जो काम सांड कर सकता है वो गाय कभी नहीं कर सकती.. !!" शादी-शुदा दीदी की अनुभवयुक्त वाणी सुनकर मौसम के गाल शर्म से लाल लाल हो गए.. दीदी के कहने का अर्थ भलीभाँति समझ रही थी मौसम

"हाँ दीदी.. मुझे कैसे समझ आएगा.. मैं ठहरी अनपढ़ और गंवार.. " दीदी की उदासी छटते देखकर मौसम ने मज़ाक जारी रखा

"मैंने कब कहा की तू अनपढ़ गंवार है.. !! हा सामाजिक तौर पर तुझ में अनुभव की कमी जरूर है.. पर आज कल की इंटरनेट जनरेशन बहोत जल्दी बड़ी हो जाती है.. अठारह की उम्र में ही लड़कियों को सारे अनुभव हो जाते है.. मेरी भी तो फ्रेंडशिप हो गई थी ना उस पिंटू के साथ"

मौसम ने कविता के कंधे से कंधा टकराते हुए शरारती अंदाज में कहा "तो क्या वो पिंटू के साथ भी तुमने अनुभव कर लिया था क्या?"

कविता: "मैं तो तैयार थी.. पर वो बेवकूफ ही नहीं माना.. !!"

मौसम: "अरे हाँ दीदी.. आपको बताना भूल गई.. मेरे खयाल से पिंटू अब वैशाली के साथ है.. और शायद वो दोनों जल्द ही शादी करने वाले है.. " मौसम ने बॉम्ब फोड़ दिया.. जिसने कविता के दिल के चींथड़े उड़ा दीये.. दिल बैठ गया उसका.. पर फिर उसे खयाल आया की उसके भरोसे पिंटू थोड़े ही पूरी ज़िंदगी कुंवारा बैठा रहेगा.. !!

कविता: "क्या सच मे?? मुझे तो पता ही नहीं था.. ये सब कब तय हुआ?? और तुझे किसने बताया?"

मौसम: "वो तो एक दिन वैशाली से बात करने के लिए फोन किया तो शीला भाभी ने उठाया.. बातों बातों में पता चला की वैशाली पिंटू के साथ घूमने गई हुई थी.. जिस साहजीकता से उन्होंने यह बात बताई उससे साफ जाहीर है की उनके संबंधों पर शीला भाभी और मदन भैया का ठप्पा लग चुका है"

कविता: "वो क्यों मना करेंगे भला.. पिंटू जैसा लड़का तो नसीब से ही मिलता है"

मौसम के गाल खींचकर कविता ने कहा "अब तेरी बारी है.. मैंने एक लड़का ढूंढ लिया है तेरे लिए"

मौसम ने थोड़े से गुस्से के साथ कहा "क्या दीदी आप भी.. मुझे नहीं करनी कोई शादी-वादी.. मैं तो जीजू से मिलने ऑफिस जा रही हूँ.. बहोत दिन हो गए उनसे मिले हुए.. जाकर पूछती हूँ.. की उन्हें अपनी ये सुंदर साली याद भी है या भूल गए?? तुम चलोगी?"

कविता: "नहीं यार.. तू जा.. शायद तुझे देखकर उसे अपनी मर्दानगी की याद आ जाए"

मौसम ठहाका मारकर हंसने लगी.. "क्या दीदी तुम भी.. !! अगर जीजू को अपनी मर्दानगी की याद आ गई तो ऑफिस में मेरा क्या हाल करेंगे?" स्कूटी स्टार्ट करके मौसम निकल गई.. कविता उसे पीछे से देखती रही.. सुंदर गुड़िया जैसी मौसम.. ऐसे रूप के खजाने को तरुण ने छोड़ दिया..

मौसम के जाने के बाद कविता घर के अंदर आई और शीला को फोन लगाया

शीला: "ओह्ह कविता.. साली भेनचोद... कहाँ है तू??" अपने खास अंदाज में शीला ने कहा.. शीला की आवाज सुनते ही कविता की सारी उदासी एक पल में गायब हो गई..

कविता: "क्या भाभी.. मैं तो यहीं हूँ.. आप ही मुझे भूल गई हो.. !!"

शीला: "हम्म.. मैं तो भूल गई हूँ तुझे.. पर वो बेचारा रसिक बहोत याद करता है"

कविता: "तो यहाँ का पता देकर भेज दो उसे मेरे पास.. मुझे वैसे भी बहोत जरूरत है"

शीला: "क्यों?? वो पीयूष विदेश चला गया क्या मेरे मदन की तरह??"

कविता: "जिसका पति विदेश हो उसे ही सर्विस देता है क्या रसिक?? तो मैं भी भेज देती हूँ पीयूष को विदेश.. पीयूष यहीं है लेकिन उसके पास बिजनेस से फुरसत ही नहीं है मेरे लिए.. इसलिए कह रही हूँ.. रसिक को भेज दो यहाँ.. हा हा हा हा हा ... !!"

शीला: "भूल जा.. रसिक को बर्दाश्त करना, तेरे बस की बात नहीं है"

कविता: "क्यों भला??"

शीला: "क्योंकि उसका सामान बहोत भारी है.. मुझ जैसी बड़ी सूटकेस भी उसके सामान को संभाल नहीं पाती.. तो तेरा क्या हाल करेगा?? रसिक से एक बार करवाने के बाद.. नीचे एक हफ्ते तक ताला लग जाता है.. ताकि उसके दीये हुए घाव ठीक हो सके.. तू बोल.. अचानक रसिक की इतनी जरूरत क्यों आन पड़ी?? और फोन भी इसीलिए किया था क्या?" कविता के शरीर को पाने के लिए रसिक कितना उत्सुक था वो शीला जानती थी.. और कविता भी तो जानती थी

कविता: "नहीं भाभी.. वो देसी पट्ठा मुझे तोड़-मरोड़कर रख देगा.. मेरे लिए तो पीयूष ही ठीक है.. रसिक आपको मुबारक.. !!"

शीला: "हाँ कविता.. उसे झेलना तेरे बस का नहीं है.. और मुझ जैसी को उसके अलावा और कोई राज नहीं आता.. मदन भी आठ महीनों के लिए विदेश गया था.. एक प्रोजेक्ट के सिलसिले मे.. तब रसिक से ही मेरा गुजारा चलता था.. मैं तो कहती हूँ की अच्छा हुआ जो तूने उसे अब तक चखा नहीं.. वरना और कोई पसंद ही न आता.. !!"

कविता: "इतना स्वादिष्ट है क्या रसिक?? फिर तो एक बार चखना पड़ेगा.. !!"

शीला: "तो आजा इधर एक दिन.. कर देती हूँ सेटिंग.. वो तो कब से तेरे पीछे पड़ा है.. तुझे तो पता ही होगा.. !!"

सुनकर कविता चोंक गई.. शीला को इस बारे में कैसे पता चला.. !! कहीं रसिक ने तो उस रात के बारे में शीला को बता तो नहीं दिया.. !!

कविता: "कितना भी मन क्यों न हो.. पर आने का मौका ही कहाँ मिलता है भाभी.. !! अक्सर मैं पुराने समय के बारे में सोचती हूँ.. आपके साथ थी तब जो मज़ा आता था.. वो सब तो गायब ही हो गया ज़िंदगी से"

हकीकत में कविता ने बड़े मजे कीये थे शीला के साथ.. दिन भर शीला भाभी की सेक्सी बातें.. नॉन-वेज जोक्स.. कामुक छेड़खानियाँ.. और एक दो बार का वो लेस्बियन सेक्स.. शीला भाभी के साथ रहकर कविता इतनी उत्तेजित हो जाती की वो इंतज़ार करती.. कब पीयूष आए और कब उससे लिपट कर चुदवाऊँ.. !! और पीयूष तो शीला भाभी को देखकर ऐसे उत्तेजित हो जाता जैसे अभी अभी वायग्रा की गोली खाई हो

कविता: "यहाँ और सब कुछ है भाभी.. सिर्फ आप नहीं हो.. बहोत मिस करती हूँ आपको"

शीला: "तो मैं भी यहाँ पर अकेली ही हूँ.. आप सब को याद करके कई बार रोना आ जाता है मुझे.. !!"

कविता: "एकाद बार आप क्यों नहीं आ जाती यहाँ?? उसी बहाने मेरा घर भी देख लोगी.. इतना बड़ा घर है मेरा.. आप और मदन भैया अलग अलग कमरे में सो सकते हो.. !!"

शीला: "आऊँगी.. जरूर आऊँगी.. और जब भी आऊँगी.. तेरे और पीयूष के बीच में सोऊँगी.. हा हा हा हा हा.. !! और बता.. सब ठीक चल रहा है बाकी सब?"

कविता: "दरअसल एक काम था इसलिए फोन किया था.. आप तरुण का नंबर नोट कीजिए.. उससे बात कीजिए और किसी भी तरह जानने की कोशिश कीजिए की उसने आखिर सगाई तोड़ क्यों दी थी.. !! बात बात में ये भी बताना है की मौसम अब भी बिन-ब्याही है.. और अगर उसकी इच्छा हो तो फिर से एक बार सोच लें इस बारे में"

शीला सोचने लगी.. पिछले दिन फाल्गुनी का इसी काम के लिए फोन आया था.. अब कविता भी वही बात कह रही है.. जो रिश्ता तरुण एक साले पहले तोड़ चुका था.. उससे फिर से जोड़ने के लिए कैसे कहें?? समाज क्या कहेगा? और अभी सगाई तोड़ने की असली वजह का तो पता भी नहीं है

शीला: "तू चिंता मत कर कविता.. मैं और मदन कुछ करेंगे इस बारे में"

शीला भाभी के आत्मीयता भरे आश्वासन से कविता का दिल भर आया.. पीयूष के बीजी होने से जो असंतोष था वो सब शीला भाभी को बताना चाहती थी.. पर तभी अचानक मदन आ गया और शीला ने फोन रख दिया..

मदन कपड़े बदलने लगा.. शायद कहीं जाने की तैयारी कर रहा था.. मदन को नंगा देखकर शीला के दिल के अरमान जाग उठे.. शीला अपनी कमर मटकाती हुई बेडरूम के अंदर आई.. तब मदन वॉर्डरोब से कपड़े निकाल रहा था..

मदन सुबोधकांत के निधन के बाद, एक प्रोजेक्ट के लिए कन्सल्टन्ट के तौर पर आठ महीनों के लिए फिर विदेश चला गया था.. वापिस लौटने के बाद भी शीला ने अपना गुस्सा नहीं छोड़ा था.. वो अब भी उस रात की बात निकालकर मदन को ताने मारती रहती थी.. अब भी मदन के साथ संबंध उसने सामान्य होने ही नहीं दीये थे.. तो मदन ने भी गुस्से में आकर शीला के साथ सेक्स करना बंद कर दिया था.. उसे बराबर पता था की बिना सेक्स के शीला ज्यादा दिन रह नहीं पाएगी और लँड लेने के चक्कर में उसके पास सामने से चलकर आएगी

अपनी आदत के अनुसार.. शीला को रोज रात चुदाई की इच्छा होती.. पर मदन करवट लेकर सो जाता और वो मन ही मन भड़कती रहती.. तकलीफ तो मदन को भी बहोत हो रही थी.. ठंड का वक्त था.. और बगल में गरम तंदूर जैसी बीवी सो रही हो.. और बिना कुछ कीये रात बिताने में उसी भी बड़ी तकलीफ हो रही थी.. आखिर वो बाथरूम में जाकर मूठ लगाकर सो जाता.. जिस आग में मदन जल रहा था उस आग ने शीला का कई ज्यादा नुकसान कर दिया था..

बेडरूम में घुसते ही शीला ने अपना पल्लू गिरा दिया.. और मदन के बिल्कुल करीब खड़े रहकर ऐसा अभिनय करने लगी जैसे वो भी वॉर्डरोब में कुछ ढूंढ रही हो..

♩♫ प्यास भड़की है सरे शाम से जल रहा है बदन,
इश्क से कह दो की ले आए कहीं से सावन..♫

शीला ये गीत गुनगुना कर मदन को उकसा रही थी.. जिसे सुनकर मदन का दृढ़ निश्चय चकनाचूर हो रहा था.. मदन वहाँ से हटकर शीला से दूर जाना चाहता था पर कमबख्त पेंट ही नहीं मिल रहा था.. उसने तिरछी नज़रों से कपड़े ढूंढ रही शीला की काँखों से नजर आ रहे खरबूजे जैसे स्तनों को देखा.. इतनी ठंड में भी शीला के जिस्म पर पसीना आ रहा था.. गोरी गर्दन से पसीने की धारा उसकी क्लीवेज के बीच जा रहा था.. वही क्लीवेज जिसमें कई मर्दों की मर्दानगी दफन पड़ी थी..

♫पिया तू... अब तो आजा..
शोला सा मन भड़के.. आ के बुझा जा..
तन की ज्वाला ठंडी हो जाए.. ऐसे गले लगा जा ♬

शीला ने दूसरा गीत गाकर आग में पेट्रोल डालने का काम कर दिया..!!!

शीला के गूँदाज बबलों को देखकर मदन मन ही मन आहें भर रहा था.. सोच रहा था.. भेनचोद.. ये मेरे ही है.. बाकायदा ब्याह किया है मैंने.. फिर भी दबाने के लिए तरस रहा हूँ?? शीला की भव्य कमर और गहरी सेक्सी नाभि को देखता रहा मदन.. शीला के रूप.. और उसके गानों ने मदन के मन मे हवस की आग को हवा तो दे ही दी थी.. ऊपर से अकेलेपन ने आग में घी का काम किया.. और काम-यज्ञ शुरू हो गया.. मदन का सारा अहंकार एक ही पल में भांप बनकर उड़ गया..



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आखिर आग और घी के मिलने से जो होता है वही हुआ

"मादरचोद.. कितने महीने हो गए.. साली तू तो सामने भी नहीं देखती?? बहोत चर्बी चढ़ी है तुझे रंडी.. आजा, आज तुझे दिखाता हूँ" कहते हुए मदन ने शीला को अपनी बाहों में जकड़ लिया

मन ही मन अपने विजय पर खुश हो रही शीला ने चेहरे पर अब भी क्रोध के भाव धारण कर रखे थे.. वो मदन की पकड़ से छूटने की नाकाम कोशिश करती रही.. वैसे वो छूटना चाहती ही नहीं थी.. सिर्फ नाटक कर रही थी..

"नालायक, भड़वे.. छोड़ मुझे.. राँडों को लेकर चोदने गया था तब मेरी याद नहीं आई तुझे.. साले हिजड़े.. !!" शीला की ये स्टाइल थी.. मदन की मर्दानगी को ललकारने पर वो बेकाबू हो जाता.. शीला के पुष्ट पयोधर स्तन मदन की छाती से दबकर चपटे हो गए थे.. शीला के गोरे गुलाबी गालों पर मदन ने उत्तेजनावश काट लिया..

"आह्ह छोड़ मुझे.. मर गई.. छोड़ दे मुझे भेनचोद.. जा उस बार्बी और सुनंदा को पकड़.. मुझे छोड़.." जैसे जैसे शीला नखरे करती गई वैसे वैसे मदन और हिंसक होता गया.. वो एक साल से भूखा था.. आज वो ऐसे गुर्रा रहा था जैसे लाल कपड़ा देखकर कोई सांड भड़क रहा हो.. उसने एक झटके में शीला का ब्लाउज फाड़ दिया.. कपड़ा फटते ही उसमें कैद मोटे खरगोश जैसे स्तन बाहर झूलने लगे.. उन्मुक्त मदन बेपरवाह होकर शीला के जिस्म पर हमले कर रहा था.. शीला को मदन का यह रूप बेहद पसंद था.. कभी कभी तो वो मदन को सामने से जोर-जबरदस्ती करने के लिए कहती.. इस तरह संभोग का पिशाची आनंद लेने में शीला को बहोत मज़ा आता.. आज कितने महीनों के बाद उसे मदन का यह रूप देखने मिला था.. अगर वो सहयोग देने लगती.. तो जोर-जबरदस्ती का सिलसिला रुक जाता.. जो वो नहीं चाहती थी.. वो तो चाहती थी की मदन ज्यादा से ज्यादा आक्रामक हो.. हिंसक हो.. और इसके लिए यह बेरुखी का नाटक जारी रखना बेहद जरूरी था.. ताकि मदन उसे काबू में करने के लिए और जोर आजमाए.. !!

मदन की राक्षसी पकड़ से शीला जैसे तैसे छूट तो गई.. पर भाग कर जाती कहाँ.. !! वैसे वो कहीं भागकर जाना चाहती भी नहीं थी.. दूसरे ही पल मदन ने झपट्टा मारकर उसे पकड़ लिया और शीला को बिस्तर पर गिराकर.. उसके ऊपर चढ़ गया.. !!! जबरदस्त उत्तेजित था मदन.. पूरे एक साल की सारी कसर वो आज शीला पर निकालना चाहता था.. शीला का फटा हुआ ब्लाउज.. जांघों तक ऊपर चढ़ चुका पेटीकोट.. शीला के जिस्म को रति जैसा सौन्दर्य प्रदान कर रहे थे.. शीला के पेट पर सवार होकर दोनों हाथों से स्तन पकड़कर मदन ने मसलते हुए चूस लिए..


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मदन की जीभ का स्पर्श निप्पल पर महसूस होते ही शीला का विरोध पचास प्रतिशत कम हो गया.. उसकी ताकत कमजोर हो गई और एक जबरदस्त सिसकी के साथ उसने काम-यज्ञ में आहुति देने का कार्य शुरू किया.. शीला खुद ही बड़ी उत्तेजना से मदन के लंड को जांघिये के ऊपर से ही पकड़ लिया.. इस खेल में.. कौन जीता, कौन हारा.. उसका फैसला करने के लिए मदन ने शीला की तरफ एक नजर देखा.. पर शीला ने मदन को सर के बालों से पकड़कर अपनी ओर खींचा और वासना सभर चुंबनों से पिछला तमाम हिसाब चुका दिया.. !!

पति-पत्नी के सामान्य झगड़ों और मन-मुटाव का अंत हमेशा कुछ ऐसा ही होता है.. और ऐसा ही अंत होना भी चाहिए..!! दो जिस्म जब एक हो जाए, फिर किसी भी गीले-शिकवे की कोई गुंजाइश नहीं बचती.. जरूरत होती है पहल करने की.. और छोटी-मोटी अनबनों को हद से ज्यादा न खींचने की..

शीला के गरम तंदूर जैसे भोसड़े से, मदन के प्रति प्रेम के कारण, बहोत ही जल्दी गीलापन रिसने लगा था.. केवल जाँघिया पहनकर शीला के शरीर पर सवार मदन के लंड को उकसाने का काम शीला ने शुरू कर दिया था.. जब उसे तसल्ली हो गई की उसका लंड पूरी तरह तनकर टाइट हो चुका था.. तब उसने जाँघिया सरकाकर लंड को बाहर निकाला..


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"आह्हहहह...!!" शीला के मुख से.. मदन के लंड को देखकर ही आह निकल गई.. लंबा सख्त लोडा देखकर शीला को अनायास ही सुबोधकांत और राजेश के मोटे तगड़े लंड की याद आ गई.. उसे अब इतना मज़ा आ रहा था की उसने पलटी मारकर मदन को लिटा दिया और वो खुद उस पर सवार हो गई.. बिना किसी झिझक या शर्म के शीला ने मदन का लंड पकड़ा और अपने चूत के होंठों की बीच टिकाकर.. जिस्म का पूरा वज़न डालते हुए बैठ गई.. !!
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बड़े ही आराम से मदन के लंड को अपने भोसड़े में छुपाकर वह अपने विशाल स्तनों से मदन के मुंह को दबाते हुए बोली

"साले भड़वे.. तू क्या मुझे चोदेगा.. !! देख मैं तुझे कैसे चोदती हूँ अब.." कहते हुए वो गुर्राकर मदन के लंड पर उछलने लगी



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दोनों एक दूसरे में इतने मशरूफ़ थे की भूल ही गए.. मुख्य दरवाजा लॉक नहीं किया था.. और जब वैशाली ऑफिस से आई और इन दोनों की काम-क्रीडा में लिप्त देखा तब उसके पैर जमीन से जैसे चिपक से गए.. !! वो सोच रही थी.. की अगर ५५ की उम्र में भी मम्मी इतनी कामुक और हवसखोर ही की दरवाजा बंद करना भूल गई.. तो अपने जवानी के दिनों में वो क्या क्या नहीं करती होगी.. !! जिस पोजीशन में चुदाई चल रही थी.. वह वैशाली की पसंदीदा सेक्स पोजीशन थी.. स्त्री ऊपर और मर्द नीचे.. !! वो बेडरूम के दरवाजे के पीछे छुप गई.. मम्मी-पापा का सेशन खतम होने के बाद ही वो अपनी मौजूदगी जताना चाहती थी.. पर इस दौरान अगर कोई और घर के अंदर आ गया तो.. ?? दरवाजा तो अभी भी खुला था क्योंकि अब अगर वो बंद करने जाती तो उसकी आवाज से शीला और मदन को पता लग जाता और उनकी चुदाई के बीच बाधा पड़ती..

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वैशाली चाहती थी की किसी तरह मम्मी और पापा को सचेत किया जाए.. पर ऐसा करने मे उसकी मौजूदगी जाहीर हो जाने का खतरा था.. तभी वैशाली के फोन पर पिंटू का फोन आया.. रिंगटोन सुनते ही शीला मदन के शरीर से छलांग मारकर बेड से उतर गई और पास पड़ी साड़ी से अपने तन को ढँक लिया.. मदन अपनी नग्नता को छुपाने के लिए दौड़कर बाथरूम में घुस गया.. गनीमत थी की फोन की रिंग बजते ही वैशाली उनके बेडरूम के दरवाजे से हटकर तुरंत ड्रॉइंगरूम में चली गई.. इसलिए शीला और मदन को किसी शर्मनाक परिस्थिति का सामना न करना पड़ा..

शीला ने फटाफट कपड़े पहने और बाहर आई.. उसने देखा की बेखबर होकर वैशाली सोफ़े पर बैठकर फोन पर बात कर रही थी.. शीला ने चैन की सांस ली.. उसने अंदर बेडरूम मे जाकर मदन का पेंट उठाया.. और बाथरूम के दरवाजे पर दस्तक देकर.. मदन को थमा दिया..

शीला वापिस ड्रॉइंग रूम में आई उससे पहले वैशाली अपने कमरे में जा चुकी थी.. बेड पर आँखें बंद कर लेटी हुई वैशाली की आँखों के सामने से वह द्रश्य हट ही नहीं रहा था जो उसने कुछ पलों पहले देखा था.. मम्मी के उछलते हुए स्तन... उनके भारी भरकम चूतड़.. बिखरे हुए बाल.. और नीचे पुचूक पुचूक कर रहा पापा का लंड.. आह्ह.. !! वैशाली को न चाहते हुए भी अपनी उंगली पेन्टी में डालनी पड़ी.. जब मम्मी पापा के लंड के ऊपर से छलांग लगाकर उठी तब पापा के लंड की जो हालत थी वो बार बार याद आ रही थी वैशाली को.. !!! क्यों की उनका पूरा लंड मम्मी की योनि के स्खलन-जल से लिप्त होकर चमक रहा था.. और अपने आप ऊपर नीचे हो रहा था.. वैशाली सोच रही थी की ऐसा तो क्या हो गया होगा जो वो लोग दरवाजा खुला छोड़कर ही शुरू हो गए?? नए कुँवारे जोड़ों के साथ ऐसा होना मुमकिन था.. पर शादी के तीस साल बीता चुके जोड़ों का संभोग पूरे प्लैनिंग के साथ होता है.. वक्त का सही चयन और परिस्थिति के पूर्ण आकलन के बाद ही अनुभवी विवाहित जोड़ें संभोग में रत होते है..

पेन्टी के अंदर अपनी उंगली से भगोष्ठ को रगड़ते हुए वैशाली सोच रही थी.. पिंटू के साथ ऐसा सुख मुझे न जाने कब मिलेगा.. !!! वैशाली का जिस्म अब पुरुष का भोग मांग रहा था.. शारीरिक भूख अब उसकी बर्दाश्त के बाहर होती जा रही थी
 
उस रात डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाते हुए वैशाली ने मदन से पूछा.. "पापा, इस क्रिसमस के वेकेशन मे क्या मैं अपने दोस्तों के साथ घूमने जाऊँ?? ३१ दिसंबर मनाने के लिए वह सब किसी हिल-स्टेशन पर जाने का सोच रहे है.. !!"

मदन: "तू जाना चाहती है तो जरूर जा.. पर मेरा मानना है की न्यू-यर की पार्टी किसी फ्रेंड के घर पर ही इन्जॉय करो तो बेहतर रहेगा.. बेटा, तेरे साथ एक दुर्घटना तो घट चुकी है.. कुछ उन्नीस-बीस हो गया तो तेरी बाकी की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी.. और ३१ दिसंबर को बाहर क्या क्या होता है ये तू भी जानती है और मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ.. अच्छे घर की लड़कियों के साथ हेवानियत भरे जो किस्से घटते है.. वो अक्सर अखबार में पढ़ता हूँ.. आश्चर्य की बात तो ये है की जिन लड़कों पर वो भरोसा कर निकलती है.. वहीं लड़के उनके साथ यह दुर्व्यवहार करते है.. और इन्जॉय करने के लिए बाहर ही जाना जरूरी थोड़े ही है.. !! किसी सलामत जगह भी मजे कीये जा सकते है.. अनजानी दूर जगह पर मिलती स्वतंत्रता, कब स्वेच्छाचार का स्वरूप धारण कर लेती है, कुछ कह नहीं सकते"

वैशाली अपने पापा की हिदायतों को बड़े ही ध्यान से सुन रही थी.. उसने तुरंत जवाब नहीं दिया और चुपचाप खाती रही.. खाना खतम करने के बाद हाथ ढोते हुए उसने मदन से कहा "आप ठीक कह रहे हो पापा.. वैसे अभी कुछ तय नहीं हुआ है.. दो-तीन दिनों में हम सब सोच के फाइनल करेंगे.. "

मदन ने स्माइल देकर बात को वहीं विराम दिया.. वैशाली बाहर चली गई और तभी शीला बाहर आई और बोली "मैं भी अपनी सहेली के घर इन्जॉय करने वाली हूँ.. हम सब महिलायें साथ मिलकर न्यू-यर की पार्टी मनाने वाले है"

मदन: "ओहोहों.. क्या बात है.. फिर मैं भी क्यों पीछे रहूँ?? मैं भी राजेश के साथ मिलकर कोई प्रोग्राम बना लेता हूँ.. !!"

शीला ने बेफिक्री से कहा "तेरी मर्जी.. तुझे जो करना हो वो कर.. बस इकत्तीस तारीख को मुझे डिस्टर्ब मत करना.. !!"

मदन: "हम्म.. लगता है कुछ बड़ा प्लान किया है आप लोगों ने.. किस तरह की पार्टी है?? बता तो सही.. !!"

शीला: "तू समझ रहा है ऐसी कोई फ्री-सेक्स पार्टी नहीं है.. जिसके लिए मुझे घर पर झूठ बोलकर.. मीटिंग का बहाना बनाकर जाना पड़े.. !!"

मदन की बोलती बंद हो गई.. शीला नटखट मुस्कान के साथ, मदन को ध्वस्त कर, किचन में बर्तन रखने चली गई..

मदन ने शीला के सामने ही राजेश को फोन किया.. और ३१ दिसंबर के प्लान के बारे में पूछा.. पर राजेश ने बताया की उसका तो पहले से ही अन्य दोस्तों के साथ पार्टी का प्लान बन चुका था.. और वो फ्री नहीं था.. !!

मदन ने और एक-दो दोस्तों को फोन किया.. पर सब का कुछ न कुछ प्लान बन चुका था.. निराश होकर मदन अपने बिस्तर पर लेट गया और सोचता रहा.. भेनचोद, ३१ दिसंबर को मैं अकेला बैठकर क्या मुठठ मारूँगा.. ?? पूरी दुनिया मजे कर रही होगी और मैं घर पर बैठे बैठे टीवी पर अनुपमा देखूँगा क्या.. !!

रात को मदन और वैशाली सोफ़े पर बैठकर टीवी देख रहे थे.. घर का सारा काम निपटाकर शीला भी टीवी देखने बैठ गई.. तीनों साथ बैठकर तारक मेहता का उल्टा चश्मा देख रहे थे.. ब्रेक के दौरान शीला ने वैशाली को मौसम और तरुण की सगाई टूटने के कारण के बारे मैं पूछा.. यह सोचकर की शायद वैशाली को कुछ पता हो.. पर वैशाली इस बारे में कुछ भी नहीं जानती थी.. बल्कि उसने तो यह भी कहा की वह खुद असली कारण जानने के लिए उत्सुक थी..

वैशाली की ओर से कुछ मदद की आशा न दिखाई दी तो शीला ने मदन की तरफ रुख किया "मदन, क्यों न तू ही फोन लगाकर तरुण से इसका कारण पूछ लेता.. !! उस घटना को भी काफी समय हो गया है.. हो सकता है की वो थोड़ा सा नरम हुआ हो और वो तुझे बता दे.. !!"

वैशाली सुन न सके उस तरह मदन ने शीला के कान मे कहा "वो आदमी है.. कोई लंड नहीं.. जो नरम हो जाए"

सुनकर शीला हंस पड़ी.. मदन की जांघ पर चिमटी काटते हुए उसने अपने मोबाइल में सेव तरुण का नंबर मदन को दिया..

मदन ने तरुण को फोन लगाया.. फोन उठाते ही मदन ने अपनी पहचान दी.. तरुण ने उसे तुरंत पहचान लिया..

मदन के एक बार पूछने पर ही तरुण ने उसे सारी बात बता दी.. और फोन रख दिया..

वैशाली ने उत्सुकतावश पूछा "क्या हुआ पापा? उसने कुछ बताया??"

एक भारी सांस छोड़कर मदन ने कहा "नहीं बेटा.. वो कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं है"

लेकिन शीला समझ गई की मदन झूठ बोल रहा था.. मदन के चेहरे के हाव भाव से यह स्पष्ट था की तरुण ने उसे हकीकत बता दी थी

बात जानने के लिए शीला को चटपटी होने लगी.. रात को बेडरूम मे जाते ही उसने मदन से पूछा "तूने वैशाली से झूठ क्यों बोला ??"

मदन: "अब उसे कैसे बताता की सुबोधकांत सेक्स-रैकिट की रैड में रंगेहाथों पकड़ा गया था.. इस बात का तरुण के परिवार को पता लग गया था.. इसलिए उन्हों ने रिश्ता तोड़ दिया.. और यार, तरुण के पास तो ये बात भी आई है की सुबोधकांत और फाल्गुनी के बीच नाजायज संबंध थे.. !!"

मम्मी और पापा के बेडरूम के दरवाजे पर कान लगाकर सुन रही वैशाली स्तब्ध हो गई.. !!! वैसे उसे तभी अंदाज लग चुका था की तरुण ने पापा को सब बता दिया था.. इसीलिए तो उनका फोन इतना लंबा चला था.. किसी कारणवश उन्हों ने वैशाली को सच नहीं बताया था पर वैशाली को यकीन था की बेडरूम में जाते ही मम्मी और पापा के बीच इस बारे में जरूर बात होगी.. !!!

वैशाली का दिमाग चक्कर खाने लगा.. पापा को तो चलो तरुण ने बताया.. पर तरुण को फाल्गुनी और सुबोधकांत के बारे में किसने बताया होगा?? वो सोच रही थी.. क्या फाल्गुनी को इस बारे में मुझे आगाह करना चाहिए??

रात को अपने कमरे से वैशाली ने पिंटू को फोन पर सारी बात बता दी.. वो तो तभी कविता को भी सारी बात बताना चाहती थी.. पर यह सोचकर नहीं फोन किया क्यों की उसे मालूम था की वो इस वक्त पीयूष के साथ होगी.. कविता के साथ सुबह बात करेगी ये सोचकर वैशाली सोने की कोशिश करने लगी.. पर मम्मी-पापा की बातों ने उसे सोच में डाल दिया था.. बाप के दुष्कर्मों की सजा संतानों को भुगतनी पड़ सकती है.. वैशाली के केस में उसके पति के कुकर्मों की सजा भुगतना लिखा था.. बिना किसी गुनाह के वैशाली को इस कठिन परिस्थिति से गुजरना पड़ रहा था.. ज़माना कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाए.. कितनी भी तरक्की क्यों न कर ले.. लोग जवान लड़कियों के प्रति कभी अपनी संकुचित विचारधारा नहीं छोड़ेंगे.. किसी लड़की की सगाई टूटी हो.. या उसका तलाक हुआ हो.. उसका हर कोई मूल्यांकन करने लगता है..

वैशाली का मन किया की वो अभी के अभी तरुण को फोन लगाकर झाड दे.. !! की उसने बाप के गुनाहों की सजा उनकी बेटी की क्यों दी? पर तब उसे एहसास हुआ.. की बात सिर्फ मौसम से शादी की नहीं थी.. हमारे समाज में शादी सिर्फ दो इंसानों का मिलाप नहीं होता.. दो परिवारों का.. दो समाजों का मिलन होता है.. जाहीर सी बात थी की सुबोधकांत के बारे में यह सब जानकर तरुण के परिवार वालों को या रिश्ता मंजूर न हो.. सोचते सोचते वैशाली सो गई

सुबह ऑफिस जाते हुए रास्ते में वैशाली ने कविता और बाद में मौसम को फोन करके तरुण के सगाई तोड़ने का असली कारण बता दिया.. हालांकि उसने सिर्फ सुबोधकांत की रंगरेलियों के बारे में ही बताया और फाल्गुनी वाली बात नहीं बताई

मौसम तो अपने बाप के रंगीन किस्सों के बारे में फाल्गुनी से जान ही चुकी थी.. उसे तो पापा और फाल्गुनी के संबंधों के बारे में भी पता था इसलिए उसे कोई खास ताज्जुब नहीं हुआ.. पर कविता को जबरदस्त सदमा पहुंचा.. !!! क्या मेरे पापा इतने गिरे हुए थे?? वैशाली ने तो पूरी बात खतम कर फोन रख दिया था

पर कविता से रहा नहीं गया.. उसने सीधा तरुण को फोन लगाया.. सुबह सुबह तरुण अभी बस ऑफिस पहुंचा ही था की कविता का फोन आया.. सगाई तोड़ने के बाद तरुण ने मौसम के परिवार के सारे नंबर डिलीट कर दीये थे

तरुण: "हैलो.. कौन बात कर रहा है"

कविता: "गुड मॉर्निंग तरुण.. मैं कविता बोल रही हूँ.. मौसम की बड़ी बहन"

तारुण: "ओह हाय दीदी.. कैसी है आप??"

कविता: "बस ठीक ही हूँ.. तुम कैसे हो?"

तरुण: "ठीक न भी हो तो भी "ठीक हूँ" कहने का तो हमारा जैसे रिवाज ही है.. हैं ना दीदी..!!

कविता: "तरुण अगर आसपास कोई न हो तो मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूँ.. क्या पूछ सकती हूँ?"

तरुण: "हाँ पूछिए ना दीदी.. वैसे ऑफिस में हूँ पर अकेला हूँ इसलिए कोई दिक्कत नहीं है"

कविता: "तरुण, पापा के चारित्र को लेकर जिन अफवाहों के कारण तुमने सगाई तोड़ दी.. उसका मुझे पता चला.. तुमने जो भी निर्णय लिया वो अब पुरानी बात हो चुकी है.. पर मुझे ये समझ मे नहीं आ रहा की इतने पढे लिखे और समझदार होने के बावजूद तुमने ऐसी वाहियात अफवाहों को मानकर मौसम जैसी निर्दोष लड़की के साथ इतना बड़ा अन्याय कर दिया.. !!!"

तरुण: "दीदी, मैं पागल नहीं हूँ की सिर्फ कही-सुनी बातों पर विश्वास कर इतना बड़ा कदम उठाता.. मैं खुद मौसम को बेहद पसंद करता हूँ.. और यह निर्णय मेरे लिए भी उतना ही कठिन था जितना मौसम के लिए.. !!"

कविता: "तरुण, तुम्हारी सगाई तो टूट चुकी है.. इसलिए तुझे यह कहना चाहिए की "मौसम को पसंद करता था "

तरुण: "दीदी, मैं झूठ नहीं बोलूँगा.. मुझे यह फैसला अपने परिवार के दबाव में आकर लेना पड़ा पर उसका मतलब यह नहीं की मुझे मौसम पसंद नहीं है.. कॉलेज के वक्त जब सारे लड़के-लड़कियां जवानी के जोश में मजे कर रहे थे.. तब मैं किताब में मुंह छुपाकर पढ़ रहा था.. अगर वैसा न किया होता तो आज सी.ए. नहीं बन पाता.. पढ़ाई खत्म करने के बाद, मौसम वो पहली लड़की थी जो मेरी ज़िंदगी में आई और मौसम में ऐसा एक नुक्स नहीं है जिस में बता सकूँ.. किसी नसीबवाले को ही मौसम जैसी लड़की मिलेगी.. और मेरे भाग्य में मौसम नहीं है, उसका मुझे बेहद अफसोस है"

कविता समझ गई की सगाई तोड़कर तरुण भी काफी दुखी था.. और वो अब तक मौसम को भूल नहीं सका है

कविता: "फिर भी.. मुझे लगता है तुमने मेरे पापा के बारे में जो भी बातें सुनी.. उसकी चर्चा तुम्हें एक बार मौसम से करनी चाहिए थी"

तरुण: "मुझे वह बात करना इसलिए जरूरी नहीं लगा क्यों की मुझे यकीन था की मौसम को पहले से ही उस बात का पता था"

चोंक गई कविता... !!! मौसम को मालूम था.. !!!! कैसे??

कविता: "मैं नहीं मानती ये बात.. क्योंकी मौसम खुद अभी इस कारण को तलाश रही है.. यही जानने के लिए उसने तुम्हें कितनी बार फोन कीये है ये तो तुम्हें पता ही होगा"

तरुण: "हाँ दीदी.. बहोत बार फोन आए.. पर मैंने उठाए नहीं.. उठाकर क्या कहता?? की तेरे पापा एक रंगीन मिजाज और अईयाश किस्म के आदमी है.. ये कहता???"

अपने स्वर्गीय पापा के बारे में ऐसी बात सुनकर कविता का खून घौल उठा..

तरुण: " दीदी, आपके पापा के बारे में खराब बोलकर मैं आपको दुख देना नहीं चाहता.. पर मुझे लगता है की आपको भी पूरी बात मालूम होनी ही चाहिए"

कविता: "देख तरुण.. तुझे पता तो लग गया होगा की आधी बात तो मैं जान ही गई हूँ.. तू मुझे दिल खोलकर साफ साफ सब बता दे.. जिससे की हम आगे मौसम के जीवन के बारे में कुछ भी फैसला लेने से पहले... इस पहलू को ध्यान में रख सकें"

तरुण खामोश हो गई

कविता: "बता ना तरुण?? प्लीज ऐसे चुप मत हो जा"

एक लंबी सांस लेकर तरुण ने कहा "दीदी, आप के पापा और फाल्गुनी के बीच अवैद्य संबंध थे.. जिस्मानी संबंध.. !! उतना ही नहीं.. आपके पापा एक होटल में चल रही ग्रुप सेक्स पार्टी में पड़ी रैड के दौरान पुलिस द्वारा पकड़े गए थे.. और ये सब मैं ऐसे ही नहीं कह रहा.. अखबार में उनके नाम के साथ पूरा आर्टिकल छपा था.. शायद आपने पढ़ा न हो.. पूरी रात लॉक-अप में बंद थे आपके पापा.. बड़े चर्चे हुए थे उस घटना के.. और स्थानिक अखबारों में तो दो दिन तक सब छपता रहा था.. ये तो अच्छा हुआ की यह घटना सिर्फ हमारे शहर के लोकल अखबार में ही छपी थी.. वरना आपके शहर में लोगों को पता चलता तो आप सबका जीना दुसवार हो जाता.. मेरे रिश्तेदारों ने यह खबर पढ़ी.. आपके पापा का नाम पढ़ा.. अरे, मेरे एक चाचा तो पुलिस स्टेशन जाकर तसल्ली भी कर चुके है.. अब आप ही बताइए..कौन से शरीफ माँ-बाप, अपने बेटे का रिश्ता ऐसे इंसान की बेटी के साथ करना चाहेंगे?"

कविता ने परेशान होकर बेतुकी बात कह दी "तुम आरोप पर आरोप लगा रहे हो.. पर तुम्हारे पास इस बात का कोई सबूत भी है??"

तरुण: "वो आर्टिकल जिस अखबार में छपा था उसका कटिंग अभी भी मैंने संभाल कर रखा हुआ है.. और तो और.. मेरे पापा के साथ तुम्हारे पापा की फोन पर जो बातें हुई उसका रेकॉर्डिंग भी है मेरे पास.. आप सुनना चाहेगी??"

कविता: "हाँ, मुझे सुनना है.. प्लीज तरुण.. क्या तुम मुझे वो भेज सकते हो?"

तरुण: "भेज तो नहीं सकता पर आपको सुना जरूर सकता हूँ.. उसके अलावा भी मेरे पास एक रेकॉर्डिग है जिससे साबित होता था की तुम्हारे पापा कितने बड़े अईयाश थे.. और ढेर सारी गंदी आदतों के शिकार भी थे"

सुनकर कविता के आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा... एक और टेप???

तरुण: "हाँ दीदी.. आज तो मैं आपको सब कुछ साफ साफ बता देना चाहता हूँ.. जिससे कम से कम आप तो मुझे गलत न समझो.. क्यों की यही कारण जानने के लिए कल रात फाल्गुनी का फोन आया था.. फिर मदन भैया ने फोन किया था.. और हाँ.. आपका फोन आया उससे थोड़ी देर पहले ही वैशाली का भी फोन आया था.. मैं कितने लोगों को सफाई देता रहूँ?? उससे अच्छा तो यही होगा की मैं आपको सब कुछ सच सच बता दूँ.. ताकि आप बाकी सब लोगों को बता सकें.. मौसम के लिए मेरे दिल में बहोत हमदर्दी है.. उसे कहना की वो मुझे माफ कर दे.. मैं अपने माँ-बाप की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सका.. मैं अब ये फोन कट कर रहा हूँ.. क्यों की वो वोइस रेकॉर्डिंग ईसी फोन में है.. मैं आपको लेंडलाइन से फोन करता हूँ और फिर वो दोनों रेकॉर्डिंग सुनाता हूँ.. आप अकेले में सुनिएगा.. कुछ आपत्तिजनक शब्द और बातें भी होगी.. उसके लिए क्षमा चाहूँगा.. आप दोनों क्लिप सुन लीजिएगा.. सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा"

जिस आत्मविश्वास के साथ तरुण बोल रहा था.. उससे साफ प्रतीत हो रहा था की तरुण के पास पुख्ता सबूत थे और वो शत-प्रतिशत सच बोल रहा था.. कविता के चेहरा सफेद पड़ गया.. पापा.. जो मौसम की शादी के लिए इतने उत्साहित थे.. उनकी गलत हरकतों की वजह से आज मौसम की ज़िंदगी तबाह हो गई... तरुण जैसा होनहार लड़का गंवाना पड़ा.. पापा.. पापा... ये आपने क्या किया?? और क्यों किया???

तभी लेंडलाइन से तरुण का फोन आया..

तरुण: "दीदी, अब मैं मोबाइल पर वो क्लिप प्ले कर रहा हूँ.. आप ध्यान से सुनिए"

रेकॉर्डिंग:

तरुण: "सॉरी पापा.. पर मेरे घर वाले अब इस सगाई को तोड़ना चाहते है.. होल्ड कीजिए.. मैं मेरे पापा को फोन देता हूँ"

सुबोधकांत: "भाई साहब.. आपको मौसम से कोई शिकायत है क्या?? ये मैं क्या सुन रहा हूँ?"

तरुण के पापा: "शिकायत मौसम से नहीं.. आप से है सुबोधकांत.. आपकी हरकतें ही ऐसी है की मैं तो क्या कोई भी आपकी बेटी का हाथ न पकड़ें"

सुबोधकांत: "मुंह संभाल कर बात कीजिए... "

तरुण के पापा: "संभालने की जरूरत मुझे नहीं.. आपको थी.. सुबोधकांत.. इस उम्र में अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ होटल में रंगरेलियाँ मनाते हुए शर्म नहीं आती??"

सुबोधकांत: "आपको कुछ गलतफहमी हुई है समधी जी.. !!"

तरुण के पापा: "पुलिसस्टेशन में जाकर सारी जानकारी लेकर ही बोल रहा हूँ.. यहाँ के अखबार में भी आपके कारनामे छपे थे.. आपके नाम के साथ.. होटल का नाम.. लड़की का नाम.. कमरे का रूम नंबर.. सब मालूम है.. बताऊँ आपको?? राँडों के साथ इस उम्र में मुंह काला करते हुए आपको शर्म नहीं आई??"

तरुण के पापा की बात सुनकर कविता स्तब्ध हो गई.. वो अब अपने पापा के जवाब का इंतज़ार कर रही थी

सुबोधकांत: "देखिए भाई साहब.. अब जब आपको सबकुछ पता चल ही गया तो फिर मेरे आगे बात करने का कोई मतलब नहीं है.. मैं अपना गुनाह कुबूल करता हूँ.. आपको सगाई तोड़ने से मैं नहीं रोकूँगा..पर मेरी आप से एक विनती है.. !! महरबानी करके प्लीज आप ये बात मेरे परिवार वालों को मत बताना.. आपकी नज़रों से तो मैं गिर ही चुका हूँ.. अपनी बेटियों की नजर में, मैं नहीं गिरना चाहता.. मेरी भोली पत्नी तो ये बर्दाश्त ही नहीं कर पाएगी.. वैसे भी वो दिल की मरीज है और अगर उसे कुछ हो गया तो हमारा पूरा परिवार बिखर जाएगा"

तरुण के पापा: "मुझे कोई शौक नहीं है आपके परिवार वालों के ये सब बताने का.. आप का प्रॉब्लेम है और आप ही जानों.. दोबारा यहाँ फोन मत करना और आपके परिवार के सदस्यों को भी कहना की सफाई मांगने के लिए फोन न करे.. मैं आपके बेटी से हुई सगाई तोड़ रहा हूँ.. और आप को भी सलाह देता हूँ... की सुधर जाइए... वरना बर्बाद हो जाएंगे.. अपनी बेटी को ब्याहने की उम्र में यह सब शोभा नहीं देता.. !!"

फोन कट हो गया..

तरुण: "सुना आपने दीदी??"

कविता सुबक सुबककर रो रही थी..

तरुण: "दीदी प्लीज आप रोइए मत.. मौसम को मुझसे भी अच्छा लड़का मिल जाएगा.. अरे, आप कहेंगे तो मैं ढूँढूँगा मौसम के लिए लड़का.."

तरुण की सज्जनता देखकर कविता को बहोत अच्छा लगा.. रोते रोते उसने कहा :तरुण, पापा की नादानी सजा आज मौसम को भुगतनी पड़ रही है"

तरुण: "हाँ दीदी.. मुझे भी मौसम को लेकर बड़ा दुख हो रहा है पर अब मैं कुछ कर नहीं सकता"

थोड़ी देर रोने के बाद कविता शांत हो गई.. इसलिए तरुण ने कहा "आप दूसरी क्लिप सुनना चाहेगी, दीदी?"

अपनी नाक पोंछते हुए कविता ने कहा "हाँ.. सुना.. !!"

तरुण ने क्लिप प्ले कर दी.. सुबोधकांत और किसी अनजान शख्स के बीच बात चल रही थी..

शख्स: "हैलो.. !!"

सुबोधकांत: "हाँ बोलीये.. "

शख्स: "जी मैं हेमंत बोल रहा हूँ.. होटल का मेनेजर.. पहचाना.. ??"

सुबोधकांत: "अरे तुम्हें तो मैं कैसे भूल सकता हूँ?? तेरी वजह से ही तो मेरी ज़िंदगी आज रंगीन है.. एक मिनट लाइन पर रहना हेमंत.. !!"

हेमंत: "ठीक है सर.. !"

सुबोधकांत: "अरे यार.. मेरे आसपास लोग खड़े थे इसलिए मुझे बाहर आना पड़ा"

हेमंत: "सर, मैंने याद दिलाने के लिए फोन किया की आज की पार्टी तय है.. आप जॉइन कर रहे है ना.. ??"

सुबोधकांत: "अरे यार थोड़ा पहले से बताना चाहिए ना.. तू अभी बता रहा है.. अब मैं पार्टनर कैसे अरेंज करू?"

हेमंत: "क्यों आपके साथ वो जवान लड़की आती है ना.. जिसे आप अक्सर होटल पर लेकर आते है.. !!"

सुबोधकांत: "अरे वो लड़की फाल्गुनी तो मेरी पर्सनल माल है यार.. उसे मैं ऐसी ग्रुप सेक्स पार्टी में नहीं लेकर आ सकता.. और वैसे भी वो अभी कच्ची कली है.. वो ये सब देखेगी तो डर जाएगी.. ऐसी पार्टी के लिए तो कोई बाजारू माल का बंदोबस्त करना पड़ेगा"

हेमंत: "तो अब क्या करेंगे सर?"

सुबोधकांत: "तू ही बता.. हर बार तू ही कुछ सेटिंग करता है"

हेमंत: "हाँ सर.. लेकिन ऐसी पार्टी के लिए लड़कियां बहोत ज्यादा पैसा चार्ज करती है.. "

सुबोधकांत: "जो भी हो तू ही कुछ जुगाड़ कर.. अभी मैं लड़की ढूँढने कहाँ जाऊँ?? होटल पहुँचने में भी मुझे तीन घंटों का समय लगेगा.. "

हेमंत: "सर, दो औरतें यहाँ आई है जो पार्टी जॉइन करना चाहती है.. लेकिन उनके पार्टनर नहीं है.. मैंने उनको अभी रोक कर रखा है.. सोचा अप से बात कर लूँ.. फिर उन्हें जवाब दूँ.. आप कहें तो एक आप के लिए रख लूँ?? वैसे उम्र थोड़ी सी ज्यादा है"

सुबोधकांत: "कितनी उम्र होगी??"

हेमंत: "४०-४५ के करीब.. पर दोनों गजब का माल है सर"

सुबोधकांत: "चलेगा.. पैसा कितना लेगी?"

हेमंत: "पच्चीस हजार.. !!"

सुबोधकांत: "ओके.. वैसे भी पार्टी में कौन किसके पास जाएगा क्या पता.. !! कोई फ़र्क नहीं पड़ता.. कर दे फिक्स उसे.. !!"

हेमंत: "ठीक है सर.. दूसरी वाली के साथ मैं पार्टनर बन जाऊंगा"

सुबोधकांत: "ठीक है.. अब रखता हूँ... मुझे अभी निकलना होगा.. तीन घंटे का रास्ता है"

हेमंत: "ओके सर.. "

क्लिप खतम हो गई.. कविता को खड़े खड़े चक्कर आने लगे...

तरुण: "हैलो... हैलो दीदी.. आप लाइन पर है??" कविता की ओर से कोई रिस्पॉन्स न मिलने पर तरुण ने कहा

कविता: "सुन रही हूँ तरुण.. पर अब बोलने जैसा कुछ रहा ही नहीं.. मैं तुमसे बाद मैं बात करती हूँ"

तरुण: "ओके दीदी.. आपका खयाल रखिएगा.. और मौसम का भी... बाय"

फोन खतम होते ही कविता सोफे पर धम्म से बैठ गई.. पापा का आज नया ही रूप सामने आया था.. सारे सबूत सामने होने के बावजूद उसका मन इससे मनने को तैयार ही नहीं था.. पापा की इस रास-लीला का फल मौसम को भुगतना पड़ा था..

भयानक गुस्से के साथ कविता ने फाल्गुनी को फोन लगाया

फाल्गुनी कॉलेज में थी और लेक्चर चल रहा था इसलिए उसने फोन काट दिया.. बाहर आकर उसने कविता को फोन लगाया

फाल्गुनी: "हैलो दीदी.. मैं लेक्चर में थी इसलिए फोन काट दिया.. बताइए क्या काम था??"

कविता: "कॉलेज से निकलकर तू सीधे मेरे घर आना.. मुझे अकेले में तुझ से कुछ बातें करनी है.. और हाँ.. मौसम को इस बारे में कुछ भी मत बताना.. "

इतना कहकर कविता ने फोन काट दिया..

फाल्गुनी सोच में पड़ गई.. दीदी को आखिर ऐसा क्या काम होगा?? और मौसम को बताने से क्यों मना किया होगा?

कॉलेज के बाकी लेक्चर छोड़कर फाल्गुनी सीधे कविता के घर पहुँच गई..

ड्रॉइंग रूम के अंदर आते ही सोफ़े पर बैठकर फाल्गुनी ने पूछा "क्या काम था दीदी?"

कविता के दिमाग में विचारों का ज्वालामुखी सा फट रहा था.. उसने तय तो किया था की साफ साफ शब्दों में फाल्गुनी को बता देगी की आज के बाद उसका मम्मी के घर आना जाना बंद.. पापा के साथ उसके नाजायज संबंधों के कारण मौसम की सगाई टूटी थी.. इसलिए अब से वो मौसम से मिलने कभी नहीं आएगी..

पर अचानक उसके विचार बदल गए.. दिमाग में कुछ सुझा और उसने पूरी बात ही बदल दी

कविता: "काम तो कुछ खास नहीं था.. तुझे मिलें हुए बहोत दिन हो गए थे.. पापा के जाने के बाद तो तूने घर आना ही बंद कर दिया" ताना मारते हुए कविता ने कहा

सुनकर एक पल के लिए फाल्गुनी सकपका गई.. फिर अपने आप को संभालते हुए उसने कहा

"ऐसा कुछ नहीं है दीदी.. मैं और मौसम तो अक्सर मिलते रहते है"

कविता: "पता नहीं क्यों.. पर आज पापा की बहोत याद आ रही है.. कितने अच्छे थे मेरे पापा.. !! तुझे भी अपनी बेटी मानते थे"

अब फाल्गुनी का दिमाग जागृत हो गया.. जरूर दीदी को कुछ शक हुआ है.. वरना वो ऐसे लहजे में कभी बात नहीं करती थी..

सिर्फ दो ही प्रहारों में फाल्गुनी का मुंह लटक गया.. और उसका अब कविता के सामने ज्यादा देर बैठ पाना मुश्किल था..

फाल्गुनी: "दीदी, मुझे घर जाना पड़ेगा.. रास्ते में ही मम्मी का फोन आया था.. उनका बीपी बढ़ गया है.. मैं घर जाने ही वाली थी की तब आपका फोन आ गया इसलिए यहाँ आ गई.. अगर कुछ अर्जेंट न हो तो मैं निकलूँ??"

कविता जवाब देती उससे पहले फाल्गुनी अपना पर्स उठाकर भाग गई

उसे जाता हुआ खिड़की से देखते हुए कविता मन ही मन हंसने लगी.. कविता ने देखा की फाल्गुनी चलते चलते मौसम के घर के पास गई.. मौसम बाहर ही खड़ी थी.. दोनों बातें करते हुए आगे चल दीये

मौसम: "क्या काम था दीदी को??"

फाल्गुनी: "कुछ खास नहीं.. ऐसे ही मिलने बुलाया था.. !!"

मौसम: "सच सच बता फाल्गुनी.. मुझे बेवकूफ मत बना"

फाल्गुनी: "यार मौसम, मुझे लगता है की अंकल और मेरे संबंधों के बारे में दीदी को शक हो गया है.. आज जिस टोन में उन्हों ने मुझसे बात की.. मुझे पक्का यकीन है यार"

मौसम सोच में पड़ गई.. दीदी को इसके बारे में कैसे पता चला होगा??

मौसम: "हो सकता है वैशाली ने पिंटू को बताया हो.. और पिंटू ने दीदी को बता दिया हो.. !!"

फाल्गुनी: "मुझे क्या पता यार.. "

मौसम: "चल छोड़ वो सब.. जो होना था वो हो गया.. जब पापा ही नहीं रहे तो उन सब पुरानी बातों से डरने का कोई मतलब नहीं है.. भूल जा सब... कल शाम को मैं अपनी ऑफिस गई थी.. जीजू से मिलने.. कितने महीनों के बाद गई वहाँ यार.. !!"

फाल्गुनी: "अंकल के जाने के बाद.. मैं उस रास्ते से गुजरी भी नहीं हूँ"

मौसम: "वहाँ ऑफिस में एक लड़का काम करता है.. विशाल नाम है उसका.. बहोत ही हेंडसम है यार"

फाल्गुनी: "अरे वाह.. बोल दे जीजू को.. की तेरी बात चलाएं उसके साथ"

मौसम: "वक्त आने दे.. वो भी करूंगी.. मैं तुझे ये बताने वाली थी की जीजू ने ३१ दिसंबर को अपने घर पर ही मस्त पार्टी करने का प्लान बनाया है.. वैशाली और पिंटू को भी बुलाने वाले है.. और दीदी से छुपकर रखा है.. उन्हें सरप्राइज़ देना का विचार है"

यह सुनकर फाल्गुनी की उदासी थोड़ी कम हुई..

फाल्गुनी: "अरे वाह.. तब तो बड़ा मज़ा आएगा, मौसम.. !! काफी टाइम हो गया.. किसी पार्टी में गए हुए.. !!"

मौसम: "और ये सब मेरी बदौलत हुआ है.. मैंने ऑफिस जाकर जीजू को झाड ही दिया तब जाकर वो तैयार हुए.. बाकी उन्हें बिजनेस से फुरसत ही कहाँ मिलती है.. !! जीजू ने प्लान बनाया और फिर विशाल और फोरम को भी न्योता दे दिया पार्टी में आने का.. मज़ा आएगा फ्लर्ट करने का.. और हाँ फाल्गुनी. पहले से बोल देती हूँ.. तू विशाल से दूर ही रहना"

फाल्गुनी: "अरे बाबा.. तू कहेगी तो मैं उसे पार्टी से पहले ही राखी बांध दूँगी... पर ये फोरम कौन है?"

मौसम: "जीजू की ऑफिस की रीसेप्शनिस्ट.. जैसे अंकल ने तुझे जुगाड़कर रखा हुआ था वैसे जीजू ने इस फोरम को रखा होगा.. आज कल तो सभी गाड़ियों में स्पेर-व्हील की सुविधा होती ही है ना.. हा हा हा हा.. !"

फाल्गुनी: "तो फोरम की जगह तुझे रीसेप्शनिस्ट बन जाना चाहिए था.. जीजू का अनुभव तो तू पहले ही कर चुकी है.. !!"

मौसम: "हम्म विचार तो अच्छा है.. ये कॉलेज का आखिरी साल खत्म हो जाने दे.. अब और पढ़ाई नहीं करनी है.. बस पापा की ऑफिस में आराम से बैठना है"

फाल्गुनी: "बात तो सही है.. तू वहाँ बैठकर ऑफिस का ध्यान भी रखेगी और जीजू का भी.. !!"

मौसम: "और साथ में विशाल का भी.. !!"

फाल्गुनी: "देखना पड़ेगा इस विशाल को.. उसका नाम बोलते बोलते तेरे गाल लाल हो जा रहे है"

दोनों बातें करते करते घूम कर वापिस आ गई.. मौसम अपने घर चली गई और फाल्गुनी अपने घर..
 
३१ दिसंबर की सुबह, वैशाली ऑफिस जाने के लिए निकल गई.. आज कुछ दोस्तों के साथ मिलकर ३१ दिसंबर का प्रोग्राम बनाया था.. वैशाली ने शीला और मदन को बता दिया था की वो आज पिंटू के साथ दोस्त के घर जाने वाली है.. और आते आते देर हो जाएगी

वैशाली ऑफिस पहुंची और अपना काम कर ही रही थी की पिंटू ने आकर उसे बताया की पीयूष का फोन आया था और ३१ दिसंबर की पार्टी के लिए उनके घर.. वैशाली और पिंटू को आमंत्रित किया गया था.. और वहाँ पहुँचने के लिए उन्हें अभी निकलना था..

वैशाली ने फोन करके मदन से अनुमति ली.. पीयूष और कविता के घर वैशाली जाएँ उसमें मदन और शीला को क्या आपत्ति होगी भला.. !!! मदन ने तुरंत हाँ कह दिया..

पिंटू राजेश से छुट्टी मांगने गया.. राजेश ने खुश होकर दो दिन की छुट्टी दे दी.. और साथ में कंपनी की गाड़ी ले जाने को कहा..

पिंटू और वैशाली दोनों ही खुश हो गए.. गाड़ी लेकर दोनों कविता के शहर की और निकल पड़े.. रास्ते में वैशाली ने पिंटू को उकसाने की बेहद कोशिशें की.. अपने स्तन पिंटू के कंधे से रगड़ रगड़कर उसे उत्तेजित करना चाहा.. पर पिंटू ने अपना सारा ध्यान ड्राइविंग पर ही केंद्रित रखा..

आखिर वैशाली को शीला का तरीका आजमाना पड़ा.. क्योंकी ये पिंटू तो भाव ही नहीं दे रहा था.. !! वो सोच रही थी की अभी दो घंटों का सफर बाकी था और गाड़ी में दोनों अकेले थे.. ऐसा मौका अगर पीयूष को मिला होता तो उसने अब तक अपना लंड वैशाली के मुंह में दे दिया होता और उसके बबले दबा दबाकर ढीले कर दीये होते..!!

बड़ी सुहानी रात थी.. जोबन लूटने के लिए बेकरार था.. वैशाली मर्दाना स्पर्श के लिए तड़प रही थी.. उसकी मादक जवानी अपनी माँद में पिंटू का लंड लेने के लिए मचल रही थी.. हाइवे पर सरपट गाड़ी दौड़ रही थी.. आसपास कोई देखने वाला नहीं था.. मस्त रोमेन्टीक म्यूज़िक भी बज रहा था..

वैशाली ने पिंटू की तरफ देखा.. पिंटू का सारा ध्यान रास्ते पर था

वैशाली: "पिंटू, लड़की के सारे अंगों में से कौन सा अंग तुझे सब से ज्यादा पसंद है?"

पिंटू ने तीरछी नज़रों से वैशाली की ओर देखा और हंसने लगा

वैशाली: "अरे बता ना... !!"

पिंटू: "कैसा वाहियात सवाल पूछ रही है तू..!! लड़की का तो हर अंग पसंद होता है सब को"

वैशाली: "यार तुझे कैसे पटाऊँ कुछ समझ ही नहीं आता.. अच्छा ये बता.. तुझे गालियां बकने में मज़ा आता है क्या?"

पिंटू: "ना... जरा भी नहीं"

वैशाली: "तो भेनचोद तुझे अच्छा क्या लगता है??"

वैशाली के मुंह से गाली सुनकर पिंटू स्तब्ध हो गया.. वो बेचारा इस प्रहार के लिए जरा भी तैयार नहीं था.. एक पल के लिए तो उसके हाथ से गाड़ी का स्टियरिंग ही छूट गया

वैशाली: "यार... तूने कभी मुझे ध्यान से देखा है कभी?? मेरा बहोत मन है की तुझे मैं अपना जिस्म दिखाऊँ.. तुझे पता है.. ऑफिस के सारे मर्द मेरे बूब्स को बड़े ध्यान से देखते रहते है.. एक तू ही बेवकूफ है जिसका ध्यान नहीं जाता"

पिंटू: "तेरे है ही ऐसे.. सब का ध्यान वहाँ चला जाता है"

वैशाली: "ऐसे मतलब?? कैसे है मेरे बूब्स?"

पिंटू को लगा की अब अगर उसने जवाब नहीं दिया तो वैशाली उसे पता नहीं कौन सी गाली सुना देगी

पिंटू: "मस्त.. कडक और बड़े बड़े"

वैशाली: "तुझे बड़े बड़े पसंद है या छोटे?"

पिंटू: "मुझे तो तेरे पसंद है"

पिंटू का जवाब सुनकर वैशाली खिलखिलाकर हंस पड़ी.. "वाह वाह पिंटू.. मान गई.. जवाब देना तो कोई तुझ से सीखें.. पर अगर तुझे मेरे पसंद है तो कभी हाथ क्यों नहीं लगाता??"

पिंटू: "वैशाली, तुझे एक रीक्वेस्ट करूँ?"

वैशाली: "हम्म... बोल.. !!"

पिंटू: "मुझे कभी बेवकूफ मत बोलना.. हर्ट होता है यार.. प्लीज"

वैशाली: "अरे यार मैं तो मज़ाक मज़ाक में कह रही थी.. अगर तुझे नहीं पसंद तो नहीं बोलूँगी कभी.. पर इतने सामान्य शब्द से तुझे ऐसा तो क्या परहेज है?"

पिंटू ने थोड़ी देर सोचकर कहा "यार, वैशाली.. मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा.. मुझे बेवकूफ कहकर सिर्फ कविता ही बुलाती थी..और तुझे तो पता है की हम दोनों एक दूसरे को चाहते थे"

वैशाली: "चाहते थे या अभी भी चाहते है??"

पिंटू: "कहने के लिए कह सकते है की चाहते थे.. वरना मुझे पूछ तो अब भी कहूँगा की चाहते है"

वैशाली: "तो फिर मेरे साथ तू टाइम पास कर रहा है क्या??"

पिंटू: "बिल्कुल नहीं.. कविता मेरा भूतकाल थी और तू मेरा वर्तमान है"

वैशाली: "हम्ममम.. तो भविष्य के लिए कीसे पसंद कर रखा है?"

पिंटू: "भविष्य हमेशा वर्तमान पर आधारित होता है.. और भूतकाल केवल यादों के लिए होता है"

वैशाली: "तो फिर मुझे अभी अपना भविष्य बना ले.. " पिंटू की ईमानदारी की कायल हो गई वैशाली.. पिंटू के गालों को चूम लिया उसने

पिंटू के शरीर में बिजली सी दौड़ गई.. चूमते वक्त वैशाली का एक स्तन उसके कंधे से दब गया.. वैशाली ने पिंटू की जांघ पर हाथ रखकर कहा "आई लव यू यार.. !!"

पिंटू: "वैशाली, मैंने तुझे कविता का स्थान तब ही दे दिया था जब तेरे मम्मी पापा से तेरा हाथ मांगा था.. झूठ नहीं बोलूँगा पर कविता को लेकर अब भी मेरे मन में जज़्बात है.. उसे भूलने की मैं पूरी कोशिश करूंगा.. ये मेरा वादा है तुझसे.. आई लव यू टू.. !!"

वैशाली: "थेंकस पिंटू.. सब कुछ साफ साफ बताने के लिए.. मुझे गर्व है की तुझ जैसा दोस्त मुझे मिला है.. !!"

पिंटू: "मेरे लिए प्रेम एक एहसास होने के साथ साथ.. एक जिम्मेदारी भी है.. तेरी हर जरूरत को पूरा करना मेरा धर्म है"

वैशाली: "अभी तो मेरे शरीर को तेरे मर्दानगी भरे स्पर्श की बेहद जरूरत है.." कहते हुए पिंटू के लंड पर उसने हाथ रख दिया.. छूते ही वैशाली को लगा की अभी पेंट के अंदर किसी प्रकार की हरकत नहीं हो रही थी.. इसलिए वैशाली ने पिंटू का हाथ गियर से हटाकर अपने स्तन पर रख दिया..


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"आह्ह दबा इन्हें पिंटू.. बहोत दिनों से मेरे यह दोनों किसी मर्दाना स्पर्श के लिए तरस रहे है.. "

पिंटू ने दोनों स्तनों को बारी बारी मसल दीये.. वैशाली कराहने लगी.. पिंटू की तरफ से ३१ दिसंबर की सब से अनोखी भेंट थी यह वैशाली के लिए



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गियर बदलने के लिए पिंटू ने अपना हाथ वैशाली की चूचियों से हटाया तब वैशाली ने अपने व्हाइट शर्ट के तीन बटन खोल दीये और ब्रा को ऊपर कर दोनों स्तनों को बाहर निकाल लिया.. और पिंटू के हाथों की प्रतीक्षा करने लगी.. पर पिंटू की तरफ से कोई प्रतिक्रीया नहीं मिली..

आखिर वैशाली को सामने से कहना पड़ा "तुझे बहोत पसंद है ना मेरे.. ले, तेरे लिए खोल कर बाहर निकाल दीये.. एक बार देख तो सही"

वैशाली के खुले स्तन देखकर पिंटू की आँखें फट गई.. "वाऊ... जबरदस्त है बेबी.. "

वैशाली: "अब इन्हें छु भी ले यार.. !!"

पिंटू ने पहली बार वैशाली के नंगे बबलों का स्पर्श किया था.. नरम नरम मांस के गोलों की वो गर्माहट.. हाथ लगाते ही पिंटू का लंड टॉप गियर में आने लगा..

अंधेरी रात में हाइवे पर एक कोने पर.. गाड़ी रोक दी पिंटू ने.. अब पिंटू ने सामने से वैशाली का हाथ पकड़कर अपने लंड पर रख दिया.. थोड़ी देर पहले शांत बैठा लंड.. अब पूरे खुमार पर था.. पिंटू की इस हरकत से वैशाली को बहोत अच्छा लगा.. उसने पेंट के ऊपर से ही पिंटू की मर्दानगी को मसलकर रख दिया.. उसका कडक लंड देखने के लिए वैशाली मर रही थी..


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वैशाली ने सामने से कहा "ओहह पिंटू.. प्लीज बाहर निकाल इसे.. मैं मन भरकर देखना चाहती हूँ"

पिंटू ने तुरंत अपनी चैन खोल दी और लंड को बाहर निकाल दिया.. स्प्रिंग की तरह उछलकर बाहर निकले लंड को देखने के लिए वैशाली कब से बेताब थी..

मुठ्ठी में पकड़कर हिलाते हुए वैशाली बोली "मस्त लंड है तेरा यार.. अब इसे मेरे अंदर डालकर कब मुझे स्वर्ग की सैर कराएगा??"

पिंटू: "सब कुछ होगा वैशाली.. जब तू कायदे से मेरी हो जाएगी.. तब वो भी करेंगे.. तब तक ऐसे ही मजे करते है ना.. मुझे भी तेरी ये दमदार छातियों को देखकर बहोत सारी इच्छाएं हो रही है.. पर फिलहाल हमें कंट्रोल रखना पड़ेगा..."

पिंटू की बातें सुनते हुए वैशाली उसके कंधे पर सर रखकर लगभग सो ही गई.. पिंटू का लंड हिलाते हुए भविष्य के सुनहरे सपने देखते देखते वो दूसरे हाथ से जीन्स के अंदर अपनी चूत को सहलाने लगी..

इन सब हरकतों के बीच वो दोनों कविता के शहर कब पहुँच गए पता ही नहीं चला.. वैशाली को कविता के घर छोड़कर पिंटू अपने घर चला गया.. क्योंकी अब वैशाली से नजदीक आने के बाद कविता के सामने जाना नहीं चाहता था.. उसके प्रति प्रेम को वो अब भूलना चाहता था..

पीयूष या मौसम में से किसी ने भी पार्टी के बारे में कविता को कुछ भी नहीं बताया था.. इसलिए वैशाली को आया देख वो चोंक गई..

कविता: "क्या बात है वैशाली.. !! तू यहाँ.. इस वक्त??"

वैशाली दौड़कर कविता से गले मिल गई.. दोनों सखियाँ काफी समय बाद मिल रही थी.. शरारती वैशाली ने पिंटू के साथ थोड़ी देर पहले हुए गरमागरम सेशन की कसर कविता के होंठों को चूमकर निकाल दी.. बगैर पीयूष के साथ के तड़प रही कविता ने भी उसे रिस्पॉन्स दिया.. और वैशाली के दोनों स्तनों को हल्के से दबा दिया.. तो वैशाली ने भी कविता के मस्त कूल्हों पर हाथ फेर लिए...


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दोनों लड़कियां संसर्ग के लिए तड़प ही रही थी.. अचानक से दो गरम जिस्मों का मिलन होते ही.. वह देखते ही देखते लेस्बियन सेक्स पर उतर आई.. बिना कुछ कहें ही दोनों एक दूसरे के वस्त्रों को उतारने लगी.. टॉप उतर चुके थे और कमर से ऊपर अर्ध-नग्न सुंदरियाँ एक दूसरे की तड़प को बढ़ा रही थी..


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उसी दौरान, फाल्गुनी और मौसम ने दौड़कर घर के अंदर प्रवेश किया.. पीयूष ने दोनों को यह कहकर भेजा था की वो दोनों जाएँ और कविता को सरप्राइज़ दे..

ड्रॉइंग रूम में कविता और वैशाली सिर्फ ब्रा में आवृत स्तनों को हाथों से महसूस कर रही थी.. तभी फाल्गुनी और मौसम को आया हुआ देखकर, वैशाली को तो कुछ फरक नहीं पड़ा.. लेकिन कविता शर्म से पानी पानी हो गई.. वैसे मौसम और फाल्गुनी ने कई बार कविता को टॉप-लेस अवस्था में भी देखा था.. जवान लड़कियां अक्सर साथ कपड़े बदलते वक्त एक दूसरे को इस अवस्था में देखने की आदि होती है.. पर यहाँ सीन अलग था.. मौसम और फाल्गुनी दोनों ने वैशाली और कविता को एक दूसरे के आलिंगन में देखा था.. और वो भी स्तनों से खेलते हुए.. !!

कविता इतनी शरमा गई की मौसम को धमकाते हुए बोली "जरा भी मेनर्स नहीं है इस लड़की मे.. घर में घुसने से पहले डोरबेल तो बजानी चाहिए ना.. !!"

मौसम खिलखिलाकर हँसते हुए बोली "उत्तेजना में किसी बात का ध्यान नहीं रहता.. ये आज समझ में आ गया मुझे.. !! दीदी, तुम मेनर्स की बात कर रही हो तो इतना भी पता नहीं चलता की ऐसा कुछ करने से पहले दरवाजा बंद कर लेना चाहिए.. !!! ये तो अच्छा है की मैं और फाल्गुनी थे.. अगर मम्मी आ गई होती तो??"

वैशाली: "अरे यार.. तुम लोग छोड़ो भी यह सब बातें.. मैं यहाँ तुम लोगों का भाषण सुनने नहीं आई.. 31 दिसंबर की पार्टी के मजे लेने आई हूँ.. बोलो, क्या इंतेजाम किया है तुम लोगों ने?"

कविता: "अरे यार.. मोस्ट वेलकम.. मैं वैसे भी अकेले बोर हो रही थी.. तुम लोगों की बहोत याद आ रही थी.. आज अगर शीला भाभी के साथ होते तो पार्टी के लिए सोचना भी नहीं पड़ता"

मौसम: "वैशाली यार.. बहोत अच्छा किया जो तू आ गई.. आज जैसा तू कहेगी वैसे हम पार्टी मनाएंगे.. बोल क्या करना है? मूवी देखने चले? या फिर किसी अच्छी होटल में??"

वैशाली: "पागल है क्या तू.. एक जवान तलाकशुदा लड़की को इन सर्दियों में क्या चाहिए वो तुझे कैसे बताऊँ.. !! मैं तो अभी इन्जॉय ही कर रही थी.. हमारी पार्टी चल रही थी तभी तुम दोनों, कबाब में हड्डी की तरह टपक पड़ी.. !!"

फाल्गुनी: "वैशाली, जो तू मांग रही है.. वो सिर्फ तुझे नहीं.. हम सब को चाहिए.. !!"

कविता: "हाँ.. सब को जरूरत है.. जिनके पति को बिजनेस से फुरसत नहीं उसे भी चाहिए और जिनका आशिक गुजर चुका हो उसे भी"

सुनकर फाल्गुनी उदास हो गई..

मौसम: "दीदी यार तुम भी ना.. वैशाली इतनी दूर से पार्टी करने आई है और तुम बेकार की बातें करके मूड खराब कर रही हो"

कविता को मन तो बहोत था की वो फाल्गुनी को सुनाएं.. पर फिर उसने सोचा.. ये बातें तो वैशाली के जाने के बाद भी हो सकती थी..

वैशाली की छेड़खानियों के कारण उत्पन्न हुई शारीरिक गर्मी से कविता अब भी उत्तेजित थी.. वैशाली की हरकतों ने कविता के शांत पड़े अरमानों को झकझोर कर जगा दिया था..पिछले काफी सप्ताहों से पीयूष ने एक बार भी कविता को ढंग से संतुष्ट नहीं किया था..

चारों लड़कियां मिलकर बातें कर रही थी तभी पीयूष का फोन आया की काम के चक्कर में उसे बहोत देर हो जाएगी और वो घर नहीं आ पाएगा..

गुस्से से लाल हो गई कविता.. !! उसने फोन काटकर सोफ़े पर लगभग फेंक ही दिया..

मौसम और फाल्गुनी को थोड़े स्नेक्स फ्राई करने का काम सौंपकर, कविता वैशाली का हाथ पकड़कर बेडरूम में खींचकर ले गई.. !!

बेडरूम मे जाते ही कविता ने दरवाजा बंद किया और धक्का देकर वैशाली को बेड पर लैटा दिया.. और छलांग मारकर उसपर सवार हो गई.. वैशाली के दोनों उभारों को पकड़कर जोर जोर से मसलते हुए उसने झुककर उसके होंठों को चूम लिया..



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वैशाली तो पहले से ही गरम थी.. उसने कहा "यार कविता.. तू तो आज जबरदस्त मूड में है.. पीयूष ठीक से चोदता नहीं है क्या तुझे?"

कविता: "नहीं यार.. इस बिजनेस के कारण हम दोनों की बीच बहोत दूरी आ गई है.. देख ना.. !! आज ३१ दिसंबर है और उसने फोन कर दिया की नहीं आ पाऊँगा.. उसे खाना खाने का टाइम नहीं है.. तो चोदने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.. आज तो इतना मन कर रहा था की चांस मिलता तो रसिक के सामने ही टांगें खोल देती??"

वैशाली: "कौन रसिक?? वो दूधवाला भैया??"

कविता: "हाँ यार.. तू अब मेरे भी दबा... आह्ह.. तुझे पता नहीं होगा.. वो दूधवाला भैया.. तेरी मम्मी का दूध भी चूसता है और मेरी सास को घोड़ी बनाकर चोदता है.. सोसायटी की आधी बुढ़ियाँ उससे चुदवाती होगी.. मेरी बारी भी आते आते रह गई.. !!"

तब तक दोनों ने अपने सारे कपड़े उतार दीये थे... और दोनों एक दूसरे की चूतों को रगड़ रही थी..


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वैशाली के लिए यह जानकारी अचंभित करने वाली थी.. उस मामूली दूध वाले के साथ मम्मी??

वैशाली: "तेरी बारी आते आते रह गई मतलब?? क्या तू भी उसके साथ.. !!!"

कविता: "नहीं यार.. वो तो बिना तेल लगाएं मेरे लेने की फिराक में था.. पर तभी तुम लोग आ गए और मेरी फटते फटते बची"

कविता ने उस रात की पूरी घटना बताई वैशाली को

अपनी कुहनी तक इशारा करते हुए कविता ने कहा "यार इतना बड़ा है उसका.. काला काला.. और तेरी कलाई से भी मोटा.. अगर डाल देता तो मैं वहीं मर जाती.. !!"


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कविता की चूत से पानी रिसने लगा था.. और वैशाली पिंटू के लँड को याद करते हुए एकदम गरम हो चुकी थी.. ऊपर से रसिक के मूसल जैसे लंड का वर्णन सुनकर उसकी आग और भड़क गई.. दोनों लड़कियों को स्खलित होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा.. उत्तेजना की बॉर्डर लाइन पर खड़ी दोनों ने.. केवल एक दूसरे की चूत मैं उंगली कर ही स्खलन प्राप्त कर लिया..

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शांत होकर दोनों ने कपड़े पहने और बेडरूम के बाहर निकली.. तब दोनों के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे.. उन्हें बाहर आया देख मौसम और फाल्गुनी ने एक दूसरे की तरफ देखा और मुस्कुराने लगी.. क्योंकी अभी थोड़ी देर पहले ही वो दोनों मौसम के बेडरूम में संतुष्ट होकर ही आई थी

वैशाली: "मज़ा आ गया" उसने बिंदास होकर अपनी तृप्ति के भाव प्रदर्शित कर दीये.. वैसे भी उसे फाल्गुनी और मौसम से शर्माने की कोई वजह नहीं थी.. पर मौसम अपनी दीदी की मौजूदगी में शरमा रही थी..

चार चूत मिलकर.. बिना लोड़े के.. ३१ दिसंबर की पार्टी मनाने की तैयारियां कर रही थी.. अंदर बेडरूम में कविता की चूत में उंगली करते हुए ही वैशाली ने अपने और पिंटू के संबंधों के बारे में कविता को बता दिया था.. कविता और पिंटू का पहले से चक्कर था, यह बात तो कविता उसे पहले ही बता चुकी थी.. कविता ने अब वैशाली और पिंटू के संबंधों का मन ही मन स्वीकार कर लिया था
 
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