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“अकेली क्यों है जी? वह ब्राह्मणों की बेटी गौरी जो है उनके साथ।”
गौरी का नाम सुनकर वह चौंका। उसके जासूस साथी ने भी घर में एक और लड़की के बारे में उसे लिखा था।
“तो ठीक है भैया! कल से तुम दी लीटर दूध दे जाया करना।” रशीद पास से गुजरते हुए एक और अजनबी के ‘नमस्ते’ का उत्तर देते बोला, “अब यह सामान तो किसी तरह पहुँचा दो।”
“लाओ मेरे सिर पर लाद दो।”
कालूराम ने सामान सिर पर उठा लिया और रशीद उसके पीछे पीछे चल पड़ा। इस समय कालूराम का मिल जाना बड़ा शुभ था क्योंकि रशीद उसके साथ बिना किसी कठिनाई के घर पहुँच सकता था।
रास्ते में बहुत से आते-जाते व्यक्तियों ने उसे पहचान कर प्रसन्नता से उसका अभिवादन किया। रशीद सबके अभिवादन का मुस्कुराकर उत्तर देता हुआ जल्दी से आगे बढ़ता गया। एक अच्छे पक्के मकान के दरवाज़े पर पहुँच कर कालूराम रुक गया। ‘सो यह है रणजीत जा घर!’ उसने सोचा और धड़कते दिल से अंदर प्रवेश करने लगा। यह उसकी परीक्षा की सबसे कड़ी मंज़िल थी।
उसने दहलीज पर पैर रखा भी नहीं था कि बारह तेरह वर्ष की एक उठती हुई बालिका खुशी से रणजीत भैया कहकर चीख पड़ी और उसे वहीं रोकती हुई बोली, ” अरे अरे ठहरो…पहले तेल तो छुआ लेने दी…माँ जी की पता चल गया, तो मेरी चोटी और जान एक कर देंगी।” यह कहकर वह तेल लाने अंदर चली गई।
रशीद की समझ में कुछ न आया कि यह तेल छुआना क्या होता है। उसे चुप देखकर कालूराम बोल उठा, “इन्हीं बातों से तो इसने माँ का दिल जीत लिया है और फिर वह भी इस अनाथ लड़की को अपनी औलाद के समान ही चाहती हैं।”
तभी गौरी एक छोटी कटोरी में सरसो का तेल लेकर आ गई और कुछ बूंदे रशीद के पैरों के पास टपका कर बोली, “बस, अब आ जाओ भैया…अंदर।”
“अरी गौरी! तू तो एकदम इतनी लंबी-चौड़ी हो गई।” रशीद ने घर के अंदर आते हुए कहा और फिर इधर-उधर देखते हुए बोला, “माँ कहाँ है?”
“मंदिर गई हैं। दोनों समय, देवी माता से आपकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने जाती हैं। बस आती ही होंगी।” गौरी ने कहा और जल्दी-जल्दी पलंग का बिस्तर ठीक करती हुई बोली, “बैठो न भैया!”
रशीद चारपाई पर बैठता हुआ कालूराम से बोला, “अच्छा भैया! सामान रख दो…और हाँ…सुबह दो लीटर दूध लेकर आना।” उसने कालूराम की मुठ्ठी में दो रुपए रख दिए, जिन्हें पहले तो कालूराम ने लेने से इंकार किया, लेकिन रशीद के आग्रह पर लेकर चला गया।
कालूराम के चले जाने के बाद रशीद ने पूरे घर का जायज़ा लिया और गौरी से बोला, “हर चीज वैसी ही है, जैसी मैं छोड़ कर गया था।”
“और क्या भैया! मैंने तुम्हारी एक-एक चीज़ संभाल कर रखी है।”
“देखूं तो कैसे रखा तुमने मेरी चीज़ों को?” घर का इतिहास और भूगोल जानने का इससे सुंदर और कौन सा अवसर हो सकता था। गौरी के साथ वह एक-एक कमरे में जाकर हर चीज़ को ध्यानपूर्वक देखने लगा। रणजीत की पुस्तकें, उसके कॉलेज स्कूल में जीते हुए कप और दूसरी सब चीज़ें बड़े सलीके से सजी रखी थीं। रशीद ने गौरी के सलीके की प्रशंसा करते हुए कहा, “गौरी! तुमने हर चीजों किस सुंदर ढंग से वैसी की वैसी रखी गई। तुम बहुत सयानी लड़की हो।”
“हाँ भैया! तुम्हारी सब चीज़ें तो वैसी ही हैं, लेकिन माँ जी के चेहरे कि खिलन को मैं वैसे ही बचा कर न रख सकी। लड़ाई का एक एक दिन उनके चेहरे की रंगत छीनता चला गया और फिर जब तुम कैद हो गये, तो उनका चेहरा जैसे बिल्कुल वीरान हो गया।”
“घबराओ नहीं…अब मैं आ गया हूँ…माँ के चेहरे की खिलनन फिर लौट आयेगी।”
“अब तो वह एक ही चीज़ से लौट सकती है।” गौरी ने शरारत से मुस्कुराकर कहा।
“बस अब पूनम भाभी को बहू बनाकर के आओ। माँ जी के चेहरे पर ही क्या, सारे घर में बाहर आ जायेगी।”
तभी गौरी की दृष्टि दरवाज़े से बाहर एक स्वस्थ, परिश्रमी वृद्धा पर पड़ी और उसने झट रशीद का हाथ थामकर उसे अलमारी की आड़ में करते हुए धीरे से कहा, “भैया! इधर छिप जाओ।”
“छिप जाओ न भैया…ज़रा मज़ा आयेगा।”
रशीद झट अलमारी की ओट में खड़ा हो गया। माँ ने घर में दाखिल होते हुए कहा, “आरी गौरी! तू यहाँ खड़ी-खड़ी क्या कर रही है? अभी तक चूल्हा नहीं जलाया।“
“अभी जलाती हूँ माँ जी!” गौरी ने कुछ थकान का अभिनय करते हुए कहा।
“तू दिन-ब-दिन आलसी होती जा रही है। अच्छा चल तू आटा गूंध दे…खाना मैं बना लूंगी।”
“खाना बन जायेगा माँ जी। पहले आप यह बताइए कि देवी माता ने आपकी प्रार्थना सुनी कि नहीं।” गौरी ने माँ का ध्यान रणजीत की ओर मोड़ते हुए कहा।
“अरे, जब अपना बेटा ही नहीं आना चाहता, तो देवी माँ क्या उसे धकेल कर भेजेंगी।” माँ ने कुछ निराश होकर कहा।
“निराश मत हो माँ जी…फ़ौज की नौकरी ठहरी…जब छुट्टी मिलेगी, तुरंत आ जायेंगे।” गौरी ने एक्टिंग करते हुए कहा।
“चल हट…तू हमेशा उसका पक्ष लेती है। यह फ़ौज की नौकरी मेरी बैरन बन गई है…आ जाने दे रणजीत को। मैं उससे यह नौकरी ही छुड़वा दूंगी। अब युद्ध समाप्त हो गई है, तो उसे फौजी में रहने की क्या ज़रूरत है…बस हो चुकी बहुत देश भक्ति।” कहते हुए अचानक उसने दृष्टि आंगन में रखे रशीद के सामान पर पड़ी और चिल्लाकर बोली, “अरे! यह सामान किसका है?”
गौरी ने लपककर सामान में रखी टोकरी में से मिठाई का डिब्बा निकाला और उसमें से मावे एक लड्डू लेकर माँ के मुँह में देती हुई बोली, “पहले मुँह मीठा कर लीजिये…फिर बताती हूँ, कौन मेहमान आया है।”
माँ यह सुनते ही खुशी से कांपने लगी और भराई हुई आवाज़ में बोली, “अरे जल्दी बता??? कहीं मेरा रणजीत तो नहीं आ गया।”
तभी रशीद ने पीछे से आकर माँ की दोनों आँखें अपने हाथों से बंद कर दी और शरारत से मुस्कुराने लगा। माँ ने अपने हाथों से उसके दोनों हाथ टटोले और असीम खुशी से बोल उठी, “अरे यह तो मेरे लाल के हाथ हैं। इनसे मेरे बेटे की खुशबू आ रही है।” कहते हुए माँ ने धीरे से रशीद के दोनों हाथ अपनी आँखों पर से हटा दिए और पलटकर बोली –
“रणजीत मेरे लाल…आखिर तुझे अपनी माँ की याद आ ही गई।” और फिर दोनों हाथ रशीद की ओर फैला दिये।
रशीद ‘माँ’ कहकर उनसे लिपट गया और माँ की आँखों से खुशी के आँसुओं की झड़ी लग गई। उनके होंठ थरथराने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन रोते हुए गले से आवाज नहीं निकल रही थी। उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे जीवन में पहली बार अपने बच्चे को सीने से लगा रही थीं। वह निरंतर रशीद को चूमे जा रही थी। उनके आँसुओं से रशीद का चेहरा भीग गया था। उसने माँ का असीम प्यार नहीं देखा था। उसे प्रथम बार वास्तविक ममता की अनुभूति हुई थी। थोड़ी देर के लिए वह भूल गया कि यह उसकी नहीं रणजीत की माँ है।
आखिर माँ ने उसे अलग किया और उसका भीगा चेहरा अपने आंचल से साफ करने लगी। लेकिन अभी तक उनके हृदय में ममता का तूफान शांत नहीं हुआ था। वह अंदर ही अंदर कांपे पर जा रही थी। फिर बड़ी मुश्किल से अपने उमड़ते हुए भावों को नियंत्रित किया और बोली, “यह कैसी पागल ममता है। मुझे ऐसा जान पड़ता है, जैसे मैं जीवन में पहली बार तुमसे मिली हूँ। इतने बरसों बाद लौटकर आया है। अब तो माँ को छोड़कर कभी नहीं जायेगा।”
“हाँ माँ…तू कहेगी, तो नहीं जाऊंगा।” रशीद ने मुश्किल से अपने भावों को दबाते हुए कहा।
माँ बेटे की भावुकतापूर्ण भेंट देखकर गौरी का जी भर आया था और वह सिसक सिसक कर रो रही थी। अम ने उसे सिसकते देखा, तो बोली, “अरी पगली! तू क्यों रो रही है? चल जल्दी से भैया के लिए खाना तैयार कर दे। अच्छा ठहर…आज मैं खुद अपने बेटे के लिए खाना बनाऊंगी।”
“नहीं माँ, तुम कष्ट मत करो।” रशीद ने उसे रोकते हुए कहा।
“कष्ट कैसा बेटा…माँ को तो बेटे को खिलाने में आनंद मिलता है…छोड़ दे मुझे। हाँ पहले उठ…चल मेरे साथ।”
माँ रशीद को साथ लेकर घर के छोटे से मंदिर में आई, भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाकर उन्होंने रशीद को चरणामृत दिया और भगवान के चरणों से भभूत लेकर उसके माथे पर लगाई।
न जाने क्यों आज रशीद को इन बातों में ज़रा भी आपत्ति ना हुई। उसने बड़ी श्रद्धा से माँ के हाथों से चरणामृत लेकर पिया, माथे पर भभूत लगाई और भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। शायद माँ के अथाह स्नेह ने उसके मन में खड़ी घृणा की दीवार ढहा दी थी…अब उसे मंदिर, मस्जिद, ओम और अल्लाह में कोई अंतर नहीं दिखाई दे रहा था।
अम ने अपने हाथों बनाए पराठे और सरसों का साग जब उसके सामने लाकर रखा, तो उनके सुगंध से बेचैन होकर वह खाने पर ऐसा टूटा, जैसे बहुत दिनों का भूखा हो। उसने माँ को भी खींचकर अपने साथ ही खाने पर बैठा लिया। जितनी देर तक वह खाना खाते रहे, गौरी उनके पास खड़ी उनकी बातें सुनती रही। रशीद को आज खाने में जो आनंद आया था, इतना आनंद उसने ऑफिसर्स मेस, बड़े-बड़े होटलों के बढ़िया खानों में भी कभी अनुभव नहीं किया था। उसने इतना खा लिया कि उसे नींद आने लगी। माँ ने गौरी से कहा, “जा जल्दी से बिस्तर लगा दे। नींद आ रही है मेरे बेटे को।”
गौरी का नाम सुनकर वह चौंका। उसके जासूस साथी ने भी घर में एक और लड़की के बारे में उसे लिखा था।
“तो ठीक है भैया! कल से तुम दी लीटर दूध दे जाया करना।” रशीद पास से गुजरते हुए एक और अजनबी के ‘नमस्ते’ का उत्तर देते बोला, “अब यह सामान तो किसी तरह पहुँचा दो।”
“लाओ मेरे सिर पर लाद दो।”
कालूराम ने सामान सिर पर उठा लिया और रशीद उसके पीछे पीछे चल पड़ा। इस समय कालूराम का मिल जाना बड़ा शुभ था क्योंकि रशीद उसके साथ बिना किसी कठिनाई के घर पहुँच सकता था।
रास्ते में बहुत से आते-जाते व्यक्तियों ने उसे पहचान कर प्रसन्नता से उसका अभिवादन किया। रशीद सबके अभिवादन का मुस्कुराकर उत्तर देता हुआ जल्दी से आगे बढ़ता गया। एक अच्छे पक्के मकान के दरवाज़े पर पहुँच कर कालूराम रुक गया। ‘सो यह है रणजीत जा घर!’ उसने सोचा और धड़कते दिल से अंदर प्रवेश करने लगा। यह उसकी परीक्षा की सबसे कड़ी मंज़िल थी।
उसने दहलीज पर पैर रखा भी नहीं था कि बारह तेरह वर्ष की एक उठती हुई बालिका खुशी से रणजीत भैया कहकर चीख पड़ी और उसे वहीं रोकती हुई बोली, ” अरे अरे ठहरो…पहले तेल तो छुआ लेने दी…माँ जी की पता चल गया, तो मेरी चोटी और जान एक कर देंगी।” यह कहकर वह तेल लाने अंदर चली गई।
रशीद की समझ में कुछ न आया कि यह तेल छुआना क्या होता है। उसे चुप देखकर कालूराम बोल उठा, “इन्हीं बातों से तो इसने माँ का दिल जीत लिया है और फिर वह भी इस अनाथ लड़की को अपनी औलाद के समान ही चाहती हैं।”
तभी गौरी एक छोटी कटोरी में सरसो का तेल लेकर आ गई और कुछ बूंदे रशीद के पैरों के पास टपका कर बोली, “बस, अब आ जाओ भैया…अंदर।”
“अरी गौरी! तू तो एकदम इतनी लंबी-चौड़ी हो गई।” रशीद ने घर के अंदर आते हुए कहा और फिर इधर-उधर देखते हुए बोला, “माँ कहाँ है?”
“मंदिर गई हैं। दोनों समय, देवी माता से आपकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने जाती हैं। बस आती ही होंगी।” गौरी ने कहा और जल्दी-जल्दी पलंग का बिस्तर ठीक करती हुई बोली, “बैठो न भैया!”
रशीद चारपाई पर बैठता हुआ कालूराम से बोला, “अच्छा भैया! सामान रख दो…और हाँ…सुबह दो लीटर दूध लेकर आना।” उसने कालूराम की मुठ्ठी में दो रुपए रख दिए, जिन्हें पहले तो कालूराम ने लेने से इंकार किया, लेकिन रशीद के आग्रह पर लेकर चला गया।
कालूराम के चले जाने के बाद रशीद ने पूरे घर का जायज़ा लिया और गौरी से बोला, “हर चीज वैसी ही है, जैसी मैं छोड़ कर गया था।”
“और क्या भैया! मैंने तुम्हारी एक-एक चीज़ संभाल कर रखी है।”
“देखूं तो कैसे रखा तुमने मेरी चीज़ों को?” घर का इतिहास और भूगोल जानने का इससे सुंदर और कौन सा अवसर हो सकता था। गौरी के साथ वह एक-एक कमरे में जाकर हर चीज़ को ध्यानपूर्वक देखने लगा। रणजीत की पुस्तकें, उसके कॉलेज स्कूल में जीते हुए कप और दूसरी सब चीज़ें बड़े सलीके से सजी रखी थीं। रशीद ने गौरी के सलीके की प्रशंसा करते हुए कहा, “गौरी! तुमने हर चीजों किस सुंदर ढंग से वैसी की वैसी रखी गई। तुम बहुत सयानी लड़की हो।”
“हाँ भैया! तुम्हारी सब चीज़ें तो वैसी ही हैं, लेकिन माँ जी के चेहरे कि खिलन को मैं वैसे ही बचा कर न रख सकी। लड़ाई का एक एक दिन उनके चेहरे की रंगत छीनता चला गया और फिर जब तुम कैद हो गये, तो उनका चेहरा जैसे बिल्कुल वीरान हो गया।”
“घबराओ नहीं…अब मैं आ गया हूँ…माँ के चेहरे की खिलनन फिर लौट आयेगी।”
“अब तो वह एक ही चीज़ से लौट सकती है।” गौरी ने शरारत से मुस्कुराकर कहा।
“बस अब पूनम भाभी को बहू बनाकर के आओ। माँ जी के चेहरे पर ही क्या, सारे घर में बाहर आ जायेगी।”
तभी गौरी की दृष्टि दरवाज़े से बाहर एक स्वस्थ, परिश्रमी वृद्धा पर पड़ी और उसने झट रशीद का हाथ थामकर उसे अलमारी की आड़ में करते हुए धीरे से कहा, “भैया! इधर छिप जाओ।”
“छिप जाओ न भैया…ज़रा मज़ा आयेगा।”
रशीद झट अलमारी की ओट में खड़ा हो गया। माँ ने घर में दाखिल होते हुए कहा, “आरी गौरी! तू यहाँ खड़ी-खड़ी क्या कर रही है? अभी तक चूल्हा नहीं जलाया।“
“अभी जलाती हूँ माँ जी!” गौरी ने कुछ थकान का अभिनय करते हुए कहा।
“तू दिन-ब-दिन आलसी होती जा रही है। अच्छा चल तू आटा गूंध दे…खाना मैं बना लूंगी।”
“खाना बन जायेगा माँ जी। पहले आप यह बताइए कि देवी माता ने आपकी प्रार्थना सुनी कि नहीं।” गौरी ने माँ का ध्यान रणजीत की ओर मोड़ते हुए कहा।
“अरे, जब अपना बेटा ही नहीं आना चाहता, तो देवी माँ क्या उसे धकेल कर भेजेंगी।” माँ ने कुछ निराश होकर कहा।
“निराश मत हो माँ जी…फ़ौज की नौकरी ठहरी…जब छुट्टी मिलेगी, तुरंत आ जायेंगे।” गौरी ने एक्टिंग करते हुए कहा।
“चल हट…तू हमेशा उसका पक्ष लेती है। यह फ़ौज की नौकरी मेरी बैरन बन गई है…आ जाने दे रणजीत को। मैं उससे यह नौकरी ही छुड़वा दूंगी। अब युद्ध समाप्त हो गई है, तो उसे फौजी में रहने की क्या ज़रूरत है…बस हो चुकी बहुत देश भक्ति।” कहते हुए अचानक उसने दृष्टि आंगन में रखे रशीद के सामान पर पड़ी और चिल्लाकर बोली, “अरे! यह सामान किसका है?”
गौरी ने लपककर सामान में रखी टोकरी में से मिठाई का डिब्बा निकाला और उसमें से मावे एक लड्डू लेकर माँ के मुँह में देती हुई बोली, “पहले मुँह मीठा कर लीजिये…फिर बताती हूँ, कौन मेहमान आया है।”
माँ यह सुनते ही खुशी से कांपने लगी और भराई हुई आवाज़ में बोली, “अरे जल्दी बता??? कहीं मेरा रणजीत तो नहीं आ गया।”
तभी रशीद ने पीछे से आकर माँ की दोनों आँखें अपने हाथों से बंद कर दी और शरारत से मुस्कुराने लगा। माँ ने अपने हाथों से उसके दोनों हाथ टटोले और असीम खुशी से बोल उठी, “अरे यह तो मेरे लाल के हाथ हैं। इनसे मेरे बेटे की खुशबू आ रही है।” कहते हुए माँ ने धीरे से रशीद के दोनों हाथ अपनी आँखों पर से हटा दिए और पलटकर बोली –
“रणजीत मेरे लाल…आखिर तुझे अपनी माँ की याद आ ही गई।” और फिर दोनों हाथ रशीद की ओर फैला दिये।
रशीद ‘माँ’ कहकर उनसे लिपट गया और माँ की आँखों से खुशी के आँसुओं की झड़ी लग गई। उनके होंठ थरथराने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन रोते हुए गले से आवाज नहीं निकल रही थी। उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे जीवन में पहली बार अपने बच्चे को सीने से लगा रही थीं। वह निरंतर रशीद को चूमे जा रही थी। उनके आँसुओं से रशीद का चेहरा भीग गया था। उसने माँ का असीम प्यार नहीं देखा था। उसे प्रथम बार वास्तविक ममता की अनुभूति हुई थी। थोड़ी देर के लिए वह भूल गया कि यह उसकी नहीं रणजीत की माँ है।
आखिर माँ ने उसे अलग किया और उसका भीगा चेहरा अपने आंचल से साफ करने लगी। लेकिन अभी तक उनके हृदय में ममता का तूफान शांत नहीं हुआ था। वह अंदर ही अंदर कांपे पर जा रही थी। फिर बड़ी मुश्किल से अपने उमड़ते हुए भावों को नियंत्रित किया और बोली, “यह कैसी पागल ममता है। मुझे ऐसा जान पड़ता है, जैसे मैं जीवन में पहली बार तुमसे मिली हूँ। इतने बरसों बाद लौटकर आया है। अब तो माँ को छोड़कर कभी नहीं जायेगा।”
“हाँ माँ…तू कहेगी, तो नहीं जाऊंगा।” रशीद ने मुश्किल से अपने भावों को दबाते हुए कहा।
माँ बेटे की भावुकतापूर्ण भेंट देखकर गौरी का जी भर आया था और वह सिसक सिसक कर रो रही थी। अम ने उसे सिसकते देखा, तो बोली, “अरी पगली! तू क्यों रो रही है? चल जल्दी से भैया के लिए खाना तैयार कर दे। अच्छा ठहर…आज मैं खुद अपने बेटे के लिए खाना बनाऊंगी।”
“नहीं माँ, तुम कष्ट मत करो।” रशीद ने उसे रोकते हुए कहा।
“कष्ट कैसा बेटा…माँ को तो बेटे को खिलाने में आनंद मिलता है…छोड़ दे मुझे। हाँ पहले उठ…चल मेरे साथ।”
माँ रशीद को साथ लेकर घर के छोटे से मंदिर में आई, भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाकर उन्होंने रशीद को चरणामृत दिया और भगवान के चरणों से भभूत लेकर उसके माथे पर लगाई।
न जाने क्यों आज रशीद को इन बातों में ज़रा भी आपत्ति ना हुई। उसने बड़ी श्रद्धा से माँ के हाथों से चरणामृत लेकर पिया, माथे पर भभूत लगाई और भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। शायद माँ के अथाह स्नेह ने उसके मन में खड़ी घृणा की दीवार ढहा दी थी…अब उसे मंदिर, मस्जिद, ओम और अल्लाह में कोई अंतर नहीं दिखाई दे रहा था।
अम ने अपने हाथों बनाए पराठे और सरसों का साग जब उसके सामने लाकर रखा, तो उनके सुगंध से बेचैन होकर वह खाने पर ऐसा टूटा, जैसे बहुत दिनों का भूखा हो। उसने माँ को भी खींचकर अपने साथ ही खाने पर बैठा लिया। जितनी देर तक वह खाना खाते रहे, गौरी उनके पास खड़ी उनकी बातें सुनती रही। रशीद को आज खाने में जो आनंद आया था, इतना आनंद उसने ऑफिसर्स मेस, बड़े-बड़े होटलों के बढ़िया खानों में भी कभी अनुभव नहीं किया था। उसने इतना खा लिया कि उसे नींद आने लगी। माँ ने गौरी से कहा, “जा जल्दी से बिस्तर लगा दे। नींद आ रही है मेरे बेटे को।”