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वापसी : गुलशन नंदा

शाम का धुंधलापन अंधेरे में परिवर्तित होने लगा था। आकाश में चांद निकल आया था। पूनम ने उस झील में शिकारे द्वारा घूमने की इच्छा प्रकट की। परंतु रशीद ने यह कहकर टाल दिया कि उसे 11:00 बजे से पहले ही हेडक्वार्टर लौट जाना है। जब से वह पाकिस्तान से लौटा है, कुछ बंदिशें बढ़ गई हैं।

“तो छुट्टी क्यों नहीं ले लेते?” पूनम ने इठला कर कहा।

“वह तो मिलने ही वाली है।”

“कब?”

“बस कुछ ही दिनों बाद …एक महीने की छुट्टी मिलेगी।”

“तब तक तो मैं यहाँ से जा चुकी होंगी!”

“तू क्या हुआ? मैं तुमसे मिलने दिल्ली चला आऊंगा।”

“सच..!” वह खुश होकर बोली।

“हाँ पूनम..इन सुंदर सुहानी वादियों में तो चंद दिन साथ न गुजार सके। दिल्ली में तुम छुट्टी ले लोगी, तो हम एक साथ ही माँ के पास चलेंगे।”

“तो फिर रहा वचन। दिल्ली पहुंचकर छुट्टी के लिए अप्लाई कर दूं?”

रशीद ने हाँ में सिर हिला दिया और दोनों एक साथ मुस्कुरा पड़े। इससे पहले की भी अगला प्रोग्राम निश्चित करते जॉन और रुखसाना ने उन्हें आकर घेर लिया। रशीद ने उन दोनों का परिचय पूनम से कराया। जॉन ने पूनम को बताया कि वह कश्मीर में रहकर इन लोगों के बारे में एक पुस्तक लिख रहा है। लड़ाई आरंभ होने के कारण उसका यह काम अधूरा रह गया था, अब इसे पूरा कर रहा है। रुखसाना उसकी मंगेतर है और गाँव-गाँव उसके साथ जाकर नारियों के घरेलू जीवन को समझने में उसकी सहायता करती है। इसी संबंध में उसकी रणजीत से दोस्ती हो गई थी।

“लेकिन कश्मीरी लोगों के जीवन से इन फौजियों का क्या संबंध हो सकता है।” पूनम ने अचानक जॉन और रणजीत की दोस्ती पर टिप्पणी करते हुए कहा।

“कश्मीर और मिलिट्री का तो एक ऐसा नाता जुड़ चुका है, जिससे हर कश्मीरी के जीवन पर कुछ असर पड़ा है। यह जंग, बॉर्डर के झगड़े, यूएनओ का बीच बचाओ। इन पॉलिटिकल बातों से इन लोगों का जीवन अलग कैसे किया जा सकता है।” जॉन ने गंभीरता से कहा।

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रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।

रशीद की आँखों में नींद का कहीं पता तक नहीं था। सोने के प्रयत्न में वह बार-बार करवटें बदल रहा था। उसके मस्तिष्क में चिंगारियाँ सी फूट रही थी। अंत में ऊबकर वह बिस्तर से उठ कर आराम कुर्सी पर बैठा और समय बिताने के लिए टेबलेट जलाकर कोई पत्रिका देखने लगा।

जैसे ही उसने पत्रिका खोली, उसकी दृष्टि अपनी हथेली के छालो पर पड़ गई, जो पूनम के आँचल में आग बुझाते समय पड़ गए थे। मरहम लगाने पर भी छालों में हल्की-हल्की जलन हो रही थी। जलन की मिठास से अचानक उसे याद आ गया कि ऐसे ही छाले उसकी हथेली पर पहले भी पड़ चुके थे। सलमा की पहली मुलाकात में भी ऐसे ही मोती उसकी हथेलियों पर डाल दिए थे।

पत्नी की याद आते ही उसका सारा शरीर जैसे किसी अज्ञात आग में झुलस किया….वह तड़प उठा। रात के उस गहन अंधेरे में उसकी कल्पना उसे दो वर्ष पहले की करांची में घटित घटना की तरफ ले गई। सलमा से उसकी पहली भेंट का दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम गया।

कैसी छुट्टियों में अपने दोस्त असलम लखनवी से मिलने करांची गया हुआ था। उसे शेरो-शायरी में बिल्कुल रुचि ना थी और इसी कारण वह अपने शायर दोस्त का मज़ाक उड़ाया करता था। उसके विचार से शेर सुनना और सुनाना बेकार आदमियों का काम था। एक दिन वह ना जाने किस मूड में था कि असलम ने उसे फुसला ही लिया। उसने मिर्ज़ा वसीम भाई के मकान पर होने वाले मुशायरा का ज़िक्र इस सुंदरता से किया और उसकी ऐसी रंगीन तस्वीर खींची कि मन ना चाहते हुए भी रशीद उसके साथ मिर्ज़ा जी के घर की ओर चल पड़ा।

आज मिर्ज़ा जी साठवीं सालगिरह थी। इस उपलक्ष में उनके यहाँ एक विशेष मुशायरे का आयोजन किया गया था। असलम रशीद के साथ वहाँ पहुँचा, तो मुशायरा पूरे जोश पर था। ‘वाह वाह सुभान अल्लाह’ ‘माशा अल्लाह’ से सारा हॉल गूंज रहा था। उनकी ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। वे चुपके से आगे जाकर बैठ गये।

मुशायरे के लिए एक छोटा सा मंच बना हुआ था। वास्तव में यह एक ऊँचा चबूतरा था, जिसके बीच में पतला रेशमी पर्दा डालकर उसे पुरुषों और स्त्रियों के लिए दो भागों में विभाजित कर दिया गया था। एनाउंसर जब किसी शायर के बाद शायरा का नाम पुकारता, तो रेशमी पर्दे के पीछे से खनकती हुई किसी नारी की आवाज आती – “मतला अर्ज़ करती हूँ…”

सब सुनने वालों की आँख एक साथ पर्दे पर जम कर रह जाती और कान स्वर व शब्दों का रस लेने के लिए एकाग्र हो जाते। फिर किसी सुंदर शायरा का शरीर पर्दे के पीछे ही इंद्रधनुष के समान उजागर होता, रसिक युवक दिल थाम कर बैठ जाते।

रशीद इस प्रकार के मुशायरे में पहली बार आया था। उसे यह सब एक सुहाना सपना सा लग रहा था। जब कोई शायारा तरन्नुम से अपनी ग़ज़ल सुनाती, तो वह विभोर सा हो जाता और सोचने लगता कि अब तक वह क्यों ऐसे रंगीन मनोरंजन से वंचित रहा।

कितने हसीन तखल्लुस चुने हैं इन शायराओं ने …सबा देहलवी, लैला लखनवी, तरन्नुम बरेलवी, तबस्सुम लाहौरी इत्यादि….उसने मन ही मन सोचा और चुपचाप बैठा गजलें सुनता रहा। अचानक एक शायर को दाद देते हुए असलम लखनवी ने रशीद को देखा और उसे मूर्तिमान बना चुपचाप देख कर टहूका देते हुए कहा, “अमां! तुम घुग्घू बने ख़ामोश क्यों बैठे हो? तुम भी दाद दो।“

और रशीद बेढंगेपन से हर शेर पर ‘वाह वाह सुभान अल्लाह इललला’ की रट लगाने लगा।

“ऊं हूं…इललला नहीं कहते सिर्फ सुभान अल्लाह कहो।” असलम ने उसे टोका।

और अब रशीद ऊँची आवाज में ‘सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह’ की रट लगाने लगाने लगा। प्रायः शेर बाद में पढ़ा जाता और रशीद के मुँहह से ‘सुभान अल्लाह’ पहले निकल पड़ता। उसकी इस हरकत पर मुशायरे में एक जोरदार ठहाका हुआ। मिर्ज़ा साहब ने मुँह बनाकर रशीद की ओर देखते हुए कहा, ‘अगर आप दाद देना नहीं जानते, तो मेहरबानी फ़रमा कर ख़ामोश बैठे रहिये।”

“कौन साहब है यह? कोई नये जानवर मालूम होते हैं।” पर्दे के पीछे से हल्के-हल्के ठहाकों में मिली-जुली आवाजें सुनाई देने लगी। कुछ चंचल लड़कियाँ पर्दा हटा-हटा कर रशीद की ओर झांकने लगी।

“ए हे…क्या बांका जवान है।” सबा देहलवी ने झांककर कहा।

“मगर अक्ल से बिल्कुल कोरा मालूम होता है।” लैला लखनवी ने टिप्पणी की। इस पर महिलाओं में फिर एक ठहाका हुआ। तभी अनाउंसर की आवाज गूंजी – “खातून व हजरात! हमा तन हो जाइए। अब मैं मोहतरमा सलमा लखनवी से कुछ सुनाने के लिए अर्ज़ करता हूँ।”
 
सलमा का नाम सुनते ही लोग संभल कर बैठ गये। असलम रशीद के कान में कहा –

“अब कोई उटपटांग हरकत ना कर बैठना। यह मिर्ज़ा साहब की साहबजादी हैं।”

“साहब! खूब गज़ल कहती है।” पास बैठे एक साहब ने विचार प्रकट किया।

“खाक कहती हैं….मिर्ज़ा साहब ग़ज़ल कह देते हैं और शोहरत वह कमा रही है। उनके कलाम में मिर्ज़ा साहब का रंग साफ झलकता है।”

तभी सलमा लखनवी की सुरीली आवाज हॉल में गूंज उठी, “मतला समाअत फरमाइए। शायद किसी काबिल हो। अर्ज़ किया है।”

“निगाहों को शराब आँखों को पैमाना बना डाला,

भिरे साकी वे हर महफिल को मयखाना बना डाला।”

“आ हा हा…हर महफिल को मयखाना बना डाला।” एक साहब इतनी जोर से दोहराया कि थोड़ी देर के लिए मुशायरे पर सन्नाटा छा गया और फिर दाद देने का ऐसा सिलसिला चला कि कई आवाजें एक साथ टकराकर खो गई।

सलमान लखनवी बार-बार शेर दोहराए जा रही थी और हर बार ‘मुकर्रर मुकर्रर’ का शोर होता। रशीद परदे की ओंट से सलमा के दैवीय सौंदर्य को निहार रहा था। जब भी वह कोई शेर पड़ती, तो उसका जी दाद देने को चाहता। लेकिन फिर वह यह सोचकर चुप रह जाता कि कहीं कोई अनुचित शब्द उसके मुँह से ना निकल जाये। फिर सलमा ने यह शेर पढ़ा –

“वह उनका नाज़ से बाहें गले में डाल कर कहना

बढ़िया है कहीं के मुझको दीवाना बना डाला।”

तो उससे ना रहा गया और वह अनायास ‘वाह वाह सुभान अल्लाह’ कहता हुआ खड़ा हो गया। मिर्ज़ा साहब ने घूरकर उसे देखा और असलम ने जल्दी से उसे खींचकर कुर्सी पर बैठा दिया। लेकिन उसकी दृष्टि निरंतर सलमा पर जमी हुई थी। सलमा भी हर थोड़ी देर बाद उसकी ओर देख लेती थी।

सलमा मत्ता पढ़कर जब अपने स्थान पर बैठ गई। रशीद को ऐसा अनुभव हुआ जैसे सृष्टि की गति रुक गई हो। उसके बाद भी काफ़ीदेर तक मुशायरा चलता रहा, किंतु रशीद को किसी के कलाम में दिलचस्पी ना रही। वह केवल जी भर कर एक बार सलमा को देख लेना चाहता था।

अचानक छत से लटके झाड़ से एक धमाके की आवाज हुई। एक बल्ब फटा और लोगों की चीख निकल गई। बिजली के शॉर्ट सर्किट से एक चिंगारी निकली और उस झाड़ में आग लग गई। किसी ने लपक कर मेन स्विच ऑफ कर दिया और सारी बत्तियाँ एक साथ बुझ गए।

अंधेरा होते ही पूरे हॉल में खलबली मच गई। बच निकलने के लिए ऐसा कोलाहल मचा कि दरवाजों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया। झाड़ में से अभी तक चिंगारियाँफूट रही थी, उन्हीं चिंगारिओं से मंच पर लगे रेशमी पर्दे में आग लग गई। जलते हुए पर्दे में से एक शोला सलमा की ओर लपका और उसके आंचल में आग लग गई। मिर्ज़ा साहब एकाएक चिल्ला उठे – “बचाओ बचाओ मेरी सलमा को बचाओ। मेरी बच्ची को बचाओ।”

सलमा शोलों में झपटकी हुए भागी। इसके पहले की आग सलमा को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लेती, रशीद अपने स्थान से चीते के समान उछलकर उसके सामने आ गया और तेजी से सलमा के जलते हुए दुपट्टे को खींचकर अपने हाथों से मसल-मसल कर आग बुझाने लगा।

दुपट्टे की आग तो बुझ गई, लेकिन जब रशीद और सलमा ने इतने पास एक दूसरे को देखा, तो दोनों के दिलों में चाहत की चिंगारियाँ सी भर गई। सलमा का उभरता हुआ यौवन घबराहट से पसीना-पसीना हुआ जा रहा था। दुपट्टे के बिना तो वह सचमुच कहर ढा रही थी। रशीद लोगों की परवाह न करते हुए स्थिर खड़ा उसे एकटक ताकता रहा। आखिर सलमा के थरथराते होठों से आवाज निकली – “शुक्रिया!”

इससे पहले की रशीद कोई उत्तर देता, मिर्ज़ा साहब चीखते-चिल्लाते वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने झट अपनी शेरवानी उतारकर बेटी के कंधों पर डाल दी और रशीद से लिपटते हुए बोले- “बरखुरदार! तुमने मेरी इकलौती बेटी की जान बचाई है। मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगा।”

“आप बुजुर्ग हैं, मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं। यह तो मेरा फ़र्ज़ था।” रशीद ने झुलसे हुए दुपट्टे को जमीन पर फेंकते हुए कहा और अपने जले हुए हाथों को देखने लगा।

“हाय अल्लाह! इनके तो हाथ बुरी तरह जल गए हैं। अब्बा जान! इन पर मरहम लगा दीजिये।” सलमा ने घबराकर कहा।

“देख क्या रही हो। जाओ जल्दी से मलहम की डिबिया मेरे अलमारी से उठा लाओ।” मिर्ज़ा साहब ने बेटी से कहा।

सलमा थोड़ी देर में मरहम की डिबिया ले आई। बाहर की भीड़ से बचाकर मिर्ज़ा साहब रशीद को अंदर वाली बैठक में ले आए और सलमा को उसके फफोलों पर मरहम लगाने को कहा। सलमा कुछ शरमाई, तो मिर्ज़ा साहब बोल उठे, “अरे भाई लगाओ लगाओ। शर्माने की क्या बात है? इस हंगामे में मेरा चश्मा कहीं खो गया, वरना मैं ही लगा देता।”

अब्बा की बात सुनकर सलमा ने निगाहें झुका ली और ख़ामोशी से रशीद के हाथों पर मरहम लगाने लगी। थोड़ी देर के लिए मिर्ज़ा साहब बाहर चले गए, तो वह रशीद की ओर देखती धीरे से बोली, “आपने खामखा अपने आप को परायी आग में जला लिया।”

“लेकिन मुझे इसका कोई गम नहीं!”

“क्यों?”

“इतनी दिलकश मुलाकात जो मयस्सर हो गई!”

तभी रशीद का दोस्त असलम उसे ढूंढता हुआ बैठक में आ गया। सलमा ने किसी और की उपस्थिति में वहाँ रुकना उचित न समझा और अनायास अंदर की ओर भाग गई। असलम में अर्थपूर्ण दृष्टि से पहले रशीद को और फिर उस भागते हुए सौंदर्य को देखा और कोई उपयुक्त व्यंग्य का तीर चलाने ही वाला था कि मिर्ज़ा जी को आते देख कर चुप रह गया। झट रशीद के हाथों पर फिर से मलहम लगाते हुए धीरे से बोला, “दोस्त फफोलों के निशान तो इस मलहम से मिट जायेंगे, लेकिन जो घाव तुम्हारे दिल पर लगा है, उसका मरहम कहाँ से लाओगे?”

रशीद याद की सुंदर वादी में ही खोया हुआ था कि अचानक दरवाजे पर किसी जीप गाड़ी की आवाज ने उसे चौंका दिया। कोई इतनी रात गए उससे मिलने क्यों आया है? यह सोचकर वह कुछ डर सा गया।

उसने झट लाइफ ऑफ कर दिया और आराम कुर्सी से उठकर दरवाजे पर चला आया। उसने दरवाजे का पर्दा हटाकर शीशे पर जमी धुंध को साफ किया और बाहर झांकने लगा। मेजर सिंधु की जीप गाड़ी को पहचानने में देर नहीं लगी, जिसमें से शाहबाज उतर कर अंदर की ओर आ रहा था। इतनी रात के शाहबाज को देख कर उसे आश्चर्य हुआ।

जैसे ही शाहबाज ने हौले से दरवाजे पर दस्तक दी, रशीद ने दोबारा कमरे की बत्ती जला दी और हाउस कोट पहनते हुए दरवाजा खोल दिया।

शाहबाज के अंदर आते ही रशीद को सैल्यूट किया और दाएं-बाएं देखता हुआ उसकी ओर बढ़ा। रशीद ने झट दरवाजा बंद करके पर्दा फैला दिया और पलटकर पूछा, “क्या बात है शाहबाज इतनी रात गये?”

“एक ज़रूरी काम से आया हूँ सर!”

“क्या काम है?”

“555 का पैगाम है सर…कल सुबह यूएनओ में रखे जाने वाले सवालों के बारे में यह मीटिंग होने वाली है। उसकी रिपोर्ट रात के पहले हेडक्वार्टर में पहुँचनी चाहिए। यह कहते हुए शाहबाज में जेब से एक पत्र निकालकर रशीद की ओर बढ़ा दिया।

रशीद ने पत्र खोलकर पढ़ा। यह कोड में लिखा हुआ कोई नोट था। नोट पढ़कर उसने शाहबाज को देखा और बोला फिर कहा, “वहाँ पहुँचाने के लिए हमें कहाँ जाना होगा?”

“कल रात 9:00 बजे रुखसाना आपको अपने साथ ले जायेगी, उस अड्डे पर।”

“ऐसी लेकिन तुमको इतनी रात के अपने अफसर कि जीप गाड़ी में नहीं आना चाहिए था।”

“आप इसकी फ़िक्र मत कीजिए साहब! सिंधु साहब से इज़ाजत ले ली थी….अपनी बीमार बीवी को देखने गाँव जा रहा हूँ….सुबह लौटूंगा।”

“तो जाओ…जल्दी से यहाँ से खिसक जाओ।” रशीद ने कहा और आगे बढ़ कर दरवाजा खोल दिया।

शाहबाद में रशीद को फिर सैल्यूट किया और जल्दी से बाहर निकल गया। रशीद ने एक बार फिर उस नोट को पढ़ा और कुछ सोचते में बिस्तर पर आ लेटा। इस समय उसके मन में एक नई चिंता उभर आई थी। जो समय हेड क्वार्टर में सिग्नल के लिए निश्चित किया था, उसी समय पूनम ने उसे अपने यहाँ खाने पर आमंत्रित कर रखा था। इसी असमंजस में बिस्तर पर करवटें लेते हुए उसने सारी रात गुज़ार दी।
 
दूसरे दिन जब पूनम और उसके आंटी कमला रात के खाने के लिए बेचैनी से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी, तो रशीद का अर्दली पूनम के लिए एक संदेश लेकर आया। पूनम ने अर्दली के हाथ से पर्चा लेकर पढ़ा और उसके चेहरे की रंगत बदल गई। आंटी ने पास आकर जब उसकी चिंता का कारण जानना चाहा, तो उसने क्रोध भरे स्वर में बड़बड़ाते हुए आंटी को बताया कि रणजीत इस समय यहाँ नहीं पहुँच रहा। उसने किसी ज़रूरी काम का बहाना बनाकर खाने पर आने से इंकार कर दिया है।

“तुम्हारा रणजीत शायद मुझसे मिलने से घबराता है।” आंटी ने हँसते हुए कहा।

“नहीं आंटी! यह रुखा व्यवहार वे केवल आपके साथ ही नहीं, मेरे साथ भी करते हैं। जब से भी पाकिस्तान से लौटे हैं, जैसे अपने आप में नहीं है।”

“आप ठीक कहती है मेम साहब! रशीद का अर्दली बीच में बोला, “वह सचमुच अपने आप में नहीं है। रात में ठीक से सोते भी नहीं। न वक्त पर नाश्ता, ना खाना…सब कुछ छोड़कर ड्यूटी पर चले जाते हैं। अगर उन्हें कुछ कहे, तो फौरन बिगड़ जाते हैं।”

“खैर! आज बिगड़ें या बुरा माने, मैं अभी खींच कर लाती हूँ। देखती हूँ, कैसे नहीं आते।” कहते हुए पूनम बाहर जाने के लिए तैयार होने लगी।

“कोई फायदा नहीं जाने से मेम साहब।” अर्दली ने उन्हें रोकते हुए कहा।

“क्यों?”

“वे घर पर नहीं मिलेंगे। आठ बजे ही चले गए थे। कह गए थे रात को देर से लौटेंगे।”

पूनम अर्दली की बात सुनकर बुरी तरह झुंझला गई। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अपने दिल की भड़ास कैसे निकाले। उधर रुखसाना के साथ रशीद एक टैक्सी में बैठा बारामुला की सड़क पर जा रहा था।

कुछ देर बाद टैक्सी दो-चार गलियों में से घूमती हुई एक छोटे से गाँव के बाहर आ रुकी। सड़क के किनारे एक टीले पर छोटा सा मकान था। रुखसाना ने उस मकान की ओर संकेत करते हुए रशीद से कहा, “चलिए।’

“बड़ी उजाड़ रास्ता है। कहाँ चलना होगा?” रशीद के चारों ओर देखते हुए कहा।

“बस, उसी मकान तक। वही है पीर बाबा का मकान।” रुखसाना ने टैक्सी से उतरते हुए कहा।

“इस घटिया से मकान में वे रहते हैं?” रसीदें टूटे-फूटे मकान पर घृणा भरी दृष्टि डालते हुए कहा।

“तौबा कीजिए साहब तौबा…बहुत पहुँचे हुए बुजुर्ग है बाबा, उनकी शान में गुस्ताखी मत कीजिए। बड़े-बड़े लोगों की हिम्मत नहीं होती उनके सामने ज़बान खोलने की।” ड्राइवर ने डर से कांपते के बीच में कहा।

“अच्छा!” रशीद ने व्यंग्य से कहा।

“अजी हुजूर! आज नौ साल से वे चुप शाह का रोजा रखे हुए हैं। किसी से बात नहीं करते। लेकिन गरजमंद ऐसे ऐसे हैं कि टूट पड़ते हैं। जिनकी जानिब करम की नज़र उठ जाती है, उसकी बिगड़ी बन जाती है। आप बड़े खुशनसीब हैं, जो बाबा के अस्ताने पर हाजिर हो गए हैं।” ड्राइवर एक सांस में बोल गया।

“अच्छा तुम यही ठहरो, हम बाबा का नयाज हासिल करके आते हैं।” रशीद ने कहा और रुकसाना के साथ एक टीले पर चढ़ने लगा।

किले की चढ़ाई चढ़कर जब वे मकान के दरवाजे पर पहुँचे, तो अंदर काफ़ी चहल-पहल थी। दरवाजे के दाई और अंगूठी पर एक देग चढ़ी हुई थी, जिसमें कहवा उबल रहा था। देग के पास बैठा हुआ एक बूढ़ा आदमी छोटी-छोटी प्यालियों में कहवा डाल रहा था। कहवे के लिए बाबा के मुरीदों की एक लंबी पंक्ति लगी हुई थी। शायद यही बाबा का प्रसाद था। लोग बड़ी श्रद्धा से हाथ में प्यालियाँ लिए कहवा पी रहे थे। मकान के अंदर पहुँचने से पहले रशीद और रुकसाना हो गया प्रसाद लेना पड़ा। रशीद ने पहला घूंट पीते हुए बुरा सा मुँह बनाया। इतना बेस्वाद कहना उसने कभी नहीं पिया था। लेकिन बाबा का ध्यान करते हुए उसे पूरी प्याली पीनी पड़ी।

वापी का जब दोनों मकान के अंदर गए, तो वहाँ एक अजीब दृश्य दिखाई दिया। एक अधेड़ उम्र का स्वस्थ पीर चटाई पर गाँव तकिया लगाए बैठा था। लंबे खिचड़ी बाल और दाढ़ी तथा बड़ी-बड़ी लाल आँखों से उसका विशेष व्यक्तित्व झलक रहा था। उसके सामने मिट्टी के दो बड़े प्यालों में लौहबान सुलग रहा था और दाईं ओर एक बड़े बालों वाली पहाड़ी बकरी बंधी थी। हर आने वाले श्रद्धालुओं का पहला काम यह होता कि पास रखी टोकरी में से एक मुट्ठी घास लेकर बकरी को खिलाता। अगर बकरी घास खा लेती, तो बाबा उसे बैठने का संकेत कर देते। परंतु यदि बकरी घास ना खाती, तो बाबा क्रोध भरी आँखों से उस आदमी को देखते और वह घबराकर बाहर चला जाता।

तभी एक बूढ़ी औरत दाखिल हुई। उसने टोकरी से मुट्ठी भर खास लेकर बकरी की ओर बढ़ाई। बकरी ने खास खाने की जगह उछलकर बुढ़िया को टक्कर मारने चाही। बाबा का चेहरा सहसा गुस्से से लाल हो गया और उन्होंने बुढ़िया के मुँह पर थूक दिया। रशीद बाबा की इस घृणित हरकत पर कुछ कहना ही चाहता था, रुखसाना ने झट से चुप रहने का संकेत कर दिया।

रुखसाना और रशीद ने भी आगे बढ़कर बकरी को घास खिलाया। सौभाग्य से बकरी ने उनकी घास खा ली और दोनों पीर बाबा के पांव के पास जा बैठे।

कुछ देर तक आँखें बंद किए बाबा अंतर्ध्यान रहे। फिर अचानक आँखें खोल कर उन्होंने कागज का एक पुर्जा उठाकर उस पर पेंसिल से कुछ लिखा और वह पुर्जा रुखसाना की ओर फेंककर आँखें बंद कर ली। रुखसाना ने वह पुर्जा उठाया और बाबा के पांव छूकर रशीद के साथ बाहर चली आईं।

बाहर दरवाजे पर एक आदमी बैठा पुर्जे पढ़कर लोगों को बारी-बारी से बाबा के लिखी बात का मतलब समझा रहा था। जब रुखसाना ने अपना कागज पढ़वाने के लिए उसे दिया, तो उसने कागज पढ़कर एक गहरी दृष्टि दोनों पर डाल दी और फिर दरवाजे के पास अंदर ही एक अंधेरी गुफा की ओर संकेत करके उनसे बोला, “तुम्हें अंदर जाने का हुक्म है बाबा का।”

“वहाँ तो अंधेरा है।” रशीद ने चौक कर कहा।

“हाँ, इसी अंधेरे गार में तुम्हें जाना है। वहाँ बाबा की धुनी जल रही है। उस धुनी से राख लेकर माथे से लगाकर गार के दूसरे सिरे से बाहर निकल जाओ। जाओ तुम्हारी हर मुश्किल आसान हो जाएगी। इसी अंधेरे में तुम्हारी तकदीर का उजाला फूटेगा।”

रशीद और रुकसाना जब गुफा में प्रविष्ट हुए तो चारों ओर घोर अंधेरा था। रशीद एक स्थान पर लड़खड़ाने लगा, तो रुखसाना ने तुरंत सहारा देकर उसे संभाल लिया। थोड़ी दूर आगे एक बड़ी सी देग में धुनी जल रही थी। रुखसाना और रशीद ने उसमें से चुटकी भर राख उठाई और माथे पर लगा ली।

तभी अंधेरे में एक ओर जुगनू सा क्षणिक जलता बुझता प्रकाश दिखाई दिया। रुखसाना ने इस सिग्नल को समझ लिया और रशीद को लेकर उस ओर बढ़ी। यहाँ गुफा काफी चौड़ी थी। आगे सीढ़ियां थीं। दो-एक सीढ़ियाँ उतरकर उन्हें एक छोटा सा बल्ब जलता दिखाई दिया। यहाँ से सीढ़ियाँ मुड़ गई थी। कुछ देर इन्हीं चीजों से सावधानी पूर्वक चलने के बाद वे एक तहखाने में पहुँच गये।
 
उनके तहखाने में पहुँचते ही ‘चट’ की हल्की सी आवाज सुनाई दी और तहखाने में प्रकाश हो गया। वे एक बड़े से कमरे में खड़े थे। अभी रशीद तहखाने को देख रहा था कि जॉन उसके सामने आ खड़ा हुआ। जॉन ने मुस्कुराकर रशीद का स्वागत किया और दोनों को साथ लेकर उसी दरवाजे में लौट गया, जिससे अभी-अभी वह बाहर आया था। उनके दाखिल होते ही वह दरवाजा अपने आप बंद हो गया और अब उस ट्रांसमीटर रूम में थे, जो 555 का अड्डा था।

रशीद ने ध्यान से अड्डे को देखा। जॉन के अतिरिक्त वहाँ दो नकाबपोश लड़कियाँ और थी । जॉन ने मेजर रशीद से उनका परिचय कराया, “रजिया और परवीन! हमारे अड्डे की बेहतरीन वर्कर्स?…दिनभर पीर साहब की खिदमत करती हैं और रात में अड्डे की इंचार्ज।”

“कहीं किसी को इस अड्डे पर शक ना हो जाये। यहाँ बहुत भीड़ जमा रहती है।” रशीद ने कुछ सोचते हुए कहा।

“नामुमकिन!” जॉन झट से बोला। पीर बाबा को यह लोग ख़ुदा का भेजा एक फ़रिश्ता समझते हैं। उन पर किसी ने शक की नज़र भी डाली, तो लोग एक हंगामा खड़ा कर देंगे।”

“लेकिन ख़ुद पीर साहब तो भरोसे के आदमी हैं ना?”

“मुल्क और कौम के सच्चे जानिसार…आजाद कश्मीर फौज के पुराने अफसर है। गोली लगने से एक टांग बेकार हो गई, तो हमारी खिदमत करने यहाँ चले आये।” रुखसाना ने पीर साहब का परिचय देते हुए रशीद से कहा।

तभी ट्रांसमीटर के सिग्नल लाइट हुई। जॉन ने सिग्नल से ओके कहा। उसका संकेत पाते ही रशीद उधर चला आया। रजिया और परवीन झट मशीन के पास आकर बैठ गई और टेप चला दिया।

रशीद सिग्नल द्वारा श्रीनगर और यूएनओ की सारी रिपोर्ट कोड शब्दों में हेडक्वार्टर पहुँचा दी और वहाँ से अगले दो सप्ताह के लिए अपने लिए आदेश ले लिये। उसने हेडक्वार्टर को यह भी संदेश दिया कि उसकी कुशलता का संदेश सलमा को पहुँचा दिया जाये।

सिग्नल बंद होने के साथ ही रशीद मुड़ा और उसने रजिया और परवीन को पूरे आदेश लिख लेने के लिए कहा। रुखसाना ने आगे बढ़कर रशीद को सिगरेट दिया और पूछा, “एनीथिंग स्पेशल।”

“”नथिंग! सब काम मेरे से सुपुर्द हुए हैं। शायद मुझे आजाद कश्मीर के बॉर्डर तक जाना पड़े।”

“कोई बात नहीं! सब इंतजाम हो जायेगा।” जॉन ने सिगरेट का लंबा कश खींचते हुए रशीद को सांत्वना दी और रुकसाना को दो कप कॉफी बनाने के लिए कहा।

रशीद और रुकसाना जब पीर बाबा के मकान से लौटे, तो टीले के नीचे टैक्सी वाला अभी तक खड़ा उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। इसके पहले कि वह उनसे कुछ कहे रशीद ने मुस्कुराते हुए कहा, “तुमने तुम्हें ठीक ही कहा था, पीर बाबा इस दुनिया के इंसान मालूम नहीं होते, वे तो सचमुच आसमान से उतरे हुए फ़रिश्ता है।”

टैक्सी वाला उसकी बात सुनकर जैसे लंबी प्रतीक्षा का सारा कष्ट भूल गया। उसने मुस्कुराकर टैक्सी स्टार्ट की और श्रीनगर जाने वाली सड़क पर हो लिया।
 
पूनम की आंटी ने ज्यों ही धुली हुई साड़ी सुबह की चमकती धूप में रस्सी पर फैलाई, वह अपने सामने किसी अजनबी को देखकर इकाई ठिठक गई। फौजी वर्दी पहने हुए उस अजनबी को पहचानने मैं उन्हें जरा भी देर न लगी। उनकी भांजी पूनम के मंगेतर रणजीत के सिवा यह नौजवान अफसर और कौन हो सकता था? उसका स्वागत करने के लिए उपयुक्त शब्द खोज ही रही थी कि उसने हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए अपना परिचय दिया –

“आदि नमस्ते मैं रणजीत हूँ!”

“आओ आओ! मैं पहचान गई हूँ। आज सुबह-सुबह कैसे आ गये?”

“कल रात की गुस्ताखी के लिए माफ़ी मांगने आया हूँ आपसे।”

“अरे माफ़ी कैसी? मैं तो समझ गई थी कि किसी जरूरी काम में उलझ गए होगे। फौज की ड्यूटी कब आ पड़े, कौन जानता है?”

“लेकिन मेरे अर्दली ने बताया था कि आप मुझसे नाराज हैं, आप समझती हैं मैं आपके सामने नहीं आना चाहता।”

“नहीं बेटा! वह तो यों ही पूनम बिगड़ बैठी थी, तो उसका गुस्सा ठंडा करने के लिए कह दिया था। अंदर आ जाओ, यहाँ पर खड़े क्यों हो गये।”

यह कहकर आंटी सिर को आँचल से ढकते हुए रशीद को लेकर कमरे में चली गई।

रशीद बड़ी घनिष्टता से कुर्सी खींचकर जलती हुई अंगीठी के सामने बैठ गया। उसके बैठते ही आंटी ने पूछा, “क्या लोगे चाय या कॉफी?”

“चाय तो लूंगा ही, लेकिन खाली नहीं, कुछ नाश्ते के साथ!”

“हाँ हाँ क्यों नहीं?” आंटी खुश होती हुई बोली, “लगता है, आज तुम्हें अवकाश है।” फिर ऊँची आवाज से अपने कश्मीरी नौकर को पुकारा, जिसका नाम भी ‘कश्मीरी’ था।

रशीद ने इधर-उधर झांक कर पूनम की आहट लेना चाही और आंटी से बोला, “आंटी आज पूरे दिन की छुट्टी ले रखी है। सोचा आप का गिला मिटा डालूं। आप ही के हाथों बना नाश्ता खाऊं, इसलिए सवेरे आ गया।”

तभी कश्मीरी अंदर आया और आंटी ने उसे प्याज काट के अंडे फेंकने का आदेश दिया और कहा कि नाश्ता वह स्वयं आकर तैयार करेंगी। रशीद आंटी की ओर देख कर मुस्कुराया और अंगीठी में जलती हुई लकड़ियाँ ठीक करता हुआ बोला, “बाहर तो गजब की ठंडक है।”

“धूप निकलने के बाद यहाँ प्रातः हवाओं में शीत बढ़ जाती है।”

“कुछ भी हो जाड़े का अपना अलग ही मजा होता है!”

रशीद की बात सुनकर आंटी ने लपक कर अलमारी से बादाम, किशमिश और चिलगोजा की प्लेट निकाली और रशीद की ओर बढ़ाती हुई बोली, “लो थोड़ा सूखा मेवा खाओ। मैं अभी नाश्ता तैयार करके लाती हूँ।”

“आप क्यों कष्ट कर रही हैं, कश्मीरी बना लेगा।”

“नहीं बेटा! यह कैसे हो सकता है? अभी तो तुम कह रहे थे, आंटी के हाथ का बना नाश्ता खाओगे।”

रशीद मुस्कुराकर चुप हो गया। जब आंटी अंदर चली गई, तो सूखे मेवे खाता हुआ वह थोड़े-थोड़े समय बाद दाएं-बाएं तांक-झांक करने लगा कि शायद पूनम कहीं दिखाई दे जाये। वास्तव में आंटी को किचन में भेजने का उसका यही उद्देश्य था कि पूनम से अकेले में बातें करने का अवसर मिल जायेगा। लेकिन उसने तो जैसे बाहर न आने का आने की सौगंध खा रखी थी। उसकी प्रतीक्षा में रशीद बादाम की गिरियाँ और किशमिश खाता रहा।

जब बहुत देर तक पूनम बाहर न आई, तो वह समझ गया कि रात उसके ना आने के कारण वह उसे रूठी हुई है और शायद अंदर बैठकर उसके धैर्य की परीक्षा ले रही है। रशीद ने भी ठान लिया कि आज वह यहीं डाटा रहेगा, आंटी के हाथ का बना नाश्ता खायेगा, लंच करेगा, फिर डिनर! देखेगा कि कब तक पूनम उससे रूठी रहती है।

थोड़ी देर में कमला आंटी एक ट्रे उठाई हुई आ पहुँची और अंगीठी के सामने तिपाई खिसकाकर रशीद के आगे अंडों से तैयार किया हुआ नाश्ता और ढेर सारे फल रख दिये। उनके पीछे चाय की ट्रे उठा कश्मीरी अंदर आया और उसने चाय तिपाई पर टिका दी।

नाश्ता आ जाने पर रशीद दाएं-बाएं झांकता हुआ कुछ बेचैन दिखाई देने लगा। आंटी उसके सामने बैठती बोली, “क्या सोच रहे हो? नाश्ता ठंडा हो रहा है।”

यह कहकर वो चाय की प्याली में चीनी डालकर चाय उड़ेलने लगी। रशीद खिसियाता हुआ बोला, “ओह! तो क्या मुझे अकेले ही खाना होगा। आप नाश्ता न करेंगी।”

“नहीं आज मेरा मंगल का उपवास है।” आंटी ने चाय की प्याली उसे थमाते हुए कहा।

“लेकिन पूनम तो साथ दे सकती है।” रशीद ने आखिर अपनी उत्सुकता व्यक्त कर ही दी।

“ज़रूर साथ देती, लेकिन वह तो चली गई!”

“कहाँ?” वह बौखला आ गया और चाय की प्याली उसके हाथों से गिरते-गिरते बची।

“घबराओ नहीं, वह दिल्ली नहीं बाजार गई है, शॉपिंग के लिये।” आंटी उसकी बौखलाहट पर हँसते हुए बोली।

“आपने तो मुझे डरा ही दिया था।” रशीद झेंप गया और फिर जल्दी-जल्दी चाय का घूंट भरते हुए पूछ बैठा, “कब तक लौटेगी?”

“दोपहर तक। वास्तव में हम लोग कल दिल्ली जा रहे हैं। इसलिए आज का पूरा दिन पूनम ने शॉपिंग के लिए रखा है।”

“लेकिन यह इतनी जल्दी लौटने का प्रोग्राम कैसे बन गया?”

“पूनम के डैडी का तार आया है, उनकी तबीयत कुछ अच्छी नहीं है।”

रशीद चुप हो गया। आंटी ने आमलेट की प्लेट उसके आगे बढ़ा कर प्लेट में थोड़ी सास उड़ेल दी। रशीद कुछ सोचता वह चुपचाप खाने लगा। चाय की दूसरी प्याली बनाकर उसके सामने रखते हुए आंटी ने अनुभव किया कि पूनम के घर में ना होने से वह कुछ बुझ सा गया था।

उसका दिल बहलाने की आंटी ने इधर-उधर की कई बातें की, किंतु रशीद कुछ खोया सा ही रहा। नाश्ता कर चुकने के बाद वह उठ खड़ा हुआ और जाने की आज्ञा चाही।

“पूनम की प्रतीक्षा ना करोगे।” आंटी ने उसे रोकने का आग्रह करते हुए कहा।

“मैं उसे रास्ते में ही मिल लूंगा।”

“रास्ते में उसे कहाँ ढूंढोगे?”

“श्रीनगर का बाजार तो चौक के आस पास ही है…वहीँ ढूंढ लूंगा। क्या खरीदने गई है वह?”

“तब तो वह ज़रूर मिल जायेगी। “

“यही कुछ अखरोट की लकड़ी का सामान, कुछ कपड़े, ड्राई फ्रूट्स!”

रशीद ने आंटी का धन्यवाद किया और कष्ट के लिए क्षमा मांग कर बाहर निकल आया।

श्रीनगर की प्रायः सभी बड़ी दुकानें चौक के इर्द-गिर्द ही है। दस-बारह दुकानों में घूमने से ही श्रीनगर आए हुए सभी लोग मिल सकते हैं। रशीदी चौक के पास आकर पूनम को एक दुकान में ढूंढने लगा।

कपूर सिंह के स्टोर के काउंटर पर रेशमी साड़ियों का एक ढेर लगा था और वहाँ का सेल्समैन हर साड़ी की प्रशंसा में जमीन आसमान के कुलाबे मिला रहा था, लेकिन पूनम का दिल किसी साड़ी पर न ठहर रहा था।

फिर अचानक उसे एक सफेद सिल्क की साड़ी पसंद आ गई, जिस पर नीले रंग की रेशम से कढ़ाई की गई थी। वह अपने ढंग की एक ही साड़ी थी। पूनम को वह साड़ी टटोलते हुए देखकर सेल्समैन पूनम की मनोदशा को ताड़ दिया और बढ़ा-चढ़ाकर उस साड़ी की प्रशंसा करने लगा। पूनम ने बिना उसकी ओर देखकर पूछा, “क्या दाम है इसका?”

“चार सौ चालीस मेम साहब!” सेल्समैन ने उत्तर दिया।

उसने साड़ी वहीं छोड़ दी और जाने के लिए पलटी। इससे पहले कि सेल्समैन ग्राहक को रिझाने का आखिरी प्रयास करता, एक आवाज ने पूनम के कदमों को जैसे वहीं रोक दिया।

“यह साड़ी पैक कर दो।”

यह आवाज रशीद की थी, जो पूनम को खोजते-खोजते यहाँ तक चला आया था। अचानक उसे वहाँ देखकर पूनम चकित रह गई। सेल्समेन ने दोनों की दृष्टि में कुछ और उखड़ापन सा पाकर रशीद को याद दिलाने के लिए साड़ी की कीमत दोहरायी।
 
“हाँ हाँ भाई सुन लिया – चार सौ चालीस। कहा न पैक कर दो।” रशीद ने बिना उसकी ओर देखे हुए कहा।

“लेकिन मुझे यह साड़ी नहीं चाहिए।” पूनम जल्दी से बोली।

“पर मुझे यह चाहिए।” रशीद ने अपने हाथ में पकड़ी छड़ी को उंगली से नाचते हुए कहा और फिर सेल्समैन से संबोधित होकर बोल, “हरी अप!”

सेल्समैन ने झट साड़ी पैक कर दी और बिल काट कर रशीद को थमा दिया। पूनम अभी तक चुप खड़ी थी। रशीद को बिल चुकाते देखकर वह कंधे झटक कर दुकान से बाहर जाने लगी।

“पूनम!” रशीद ने लपक कर उसका रास्ता रोक लिया।

“क्या है ?” पूनम ने रुखाई से पीछे देखते हुए पूछा।

“मुझे माँ के लिए एक शाल और साड़ी लेनी है।” रशीद ने नम्रता से कहा।

“तो ले लीजिये।”

“माँ की पसंद क्या है? उसे क्या अच्छा लगेगा? तुम ही बता सकती हो।” यह कहता हुआ रशीद काउंटर की ओर मुड़ा और यूं ही नीले रंग की एक साड़ी को छूता हुआ बोला, “यह रंग कैसा लगेगा माँ को?”

“यह भी कोई रंग है उनके पहनने का।” वह तुनक कर बोली।

“तो यह कैसा रहेगा?” उसने गुलाबी रंग की साड़ी को हाथ लगाते हुए पूछा।

पूनम ने माथे पर बल डालकर उसे यों देखा, जैसे कह रही हो कि उसकी पसंद बिल्कुल व्यर्थ है और फिर दूसरे काउंटर पर जाकर चंद साड़ियों में से एक सफेद रंग की साड़ी माँ के लिए पसंद कर ली। फिर शालों वाले काउंटर पर जाकर एक सफेद ऊनी शॉल चुन दी। रशीद ने दोनों को पैक करा कर मूल्य चुका दिया।

इसके पहले की पहले रशीद पूनम का धन्यवाद करता, वह दुकान से बाहर जा चुकी थी। रशीद भी जल्दी-जल्दी पैकेट संभाल कर बाहर निकल आया। लेकिन पूनम तब तक तेज-तेज पाने उठाती हुई फ्रूट की दुकान में जा घुसी थी। रशीद बाजार में खड़ा इधर-उधर दृष्टि घुमाकर उसे ढूंढता रहा और वह फ्रूट की दुकान के कोने में छिप कर खिड़की से उसकी बेचैनी देख कर मुस्कुराती रही। वह कुछ देर तक वहीं खड़ी रही, लेकिन रशीद ने भी शायद निश्चय कर लिया था कि जब तक वह उसे ना मिल जायेगी, वह भी वहाँ से नहीं हिलेगा।

कुछ देर बाद पूनम ने फ्रूट खरीद लिये और छोटी सी एक टोकरी लिए बिना रशीद की ओर देखे एक ओर चल पड़ी। रशीद ने उसे दुकान से निकलते देख लिया और तेजी से आकर उसके साथ कदम मिलाकर चलने लगा। पूनम को उसका साथ चलना अच्छा लग रहा था, परंतु उसके चेहरे से बनावटी क्रोध झलक रहा था। रशीद ने दो-एक बार उससे बात करना चाहा, लेकिन कोई उत्तर ना पाकर और उसकी नाराजगी का अनुभव करके वह चुप रहा। पूनम बाजार छोड़कर उस सड़क पर हो ली, जो कश्मीर एंपोरियम की ओर जाती थी।

“पूनम ! आखिर रूखाई क्यों?” अंत में रशीद से न रहा गया।

“यह अपने दिल से पूछिये।” पूनम ने बिना उसकी ओर देखे उत्तर दिया।

“मैं अपनी भूल मानता हूँ, जो कल रात में आ सका। वास्तव में…”

“मैं आप की विवशता और बहाने सब समझती हूँ।” रशीद की बात काटते हुए उसने कहा और फिर पल भर चुप रहकर रूंधी हुई आवाज़ में बोली, “आप नहीं जानते, कल रात आप की वजह से मुझे कितना शर्मिंदा होना पड़ा।”

“मैं जानता हूँ। मेरे अर्दली ने मुझसे सब कुछ कह दिया था।”

“इस पर भी आपने मेरी प्रार्थना को कोई महत्व नहीं दिया। कितनी निराश नहीं मैं!”

“मुझे खेद है पूनम! इसके बारे में मैंने सुबह ही जाकर तुम्हारी आंटी से क्षमा मांग ली।”

रशीद की बात सुनकर पूनम में चौंक कर उसे देखा। दृष्टि मिलते ही रशीद अपनी बात आगे बढ़ाता हुए बोला, “हाँ हाँ! उनका सारा क्रोध पिघल गया है। मैंने उन्हीं के हाथ का बनाया नाश्ता किया और काफ़ी देर तक गपशप कर के यहाँ आया हूँ।”

“बाजार क्या करने आये थे आप?”

“तुम्हें ढूंढने…विश्वास ना हो, तो आंटी से पूछ लेना। यह तो अच्छा हुआ इसी बहाने माँ के कपड़े ले लिये, वरना कब से प्रोग्राम बन ही नहीं रहा था।”

“और वह साड़ी किसके लिए ली है?”

“अपनी होने वाली पत्नी के लिये।”

“झूठ!” वह उसी गंभीरता से बोली, “मैं देख रही हूँ, जबसे पाकिस्तान से लौटे हैं, बहुत चतुर हो गए हैं आप!”

“नहीं पूनम! युद्ध और गोला बारूद के अंधेरों से निकलने के बाद उजाले में हर चीज अनोखी लगने लगती है। अपने पराये की भी पहचान नहीं रही। कुछ अजीब सा हो गया है दिमाग।” रशीद ने बनते हुए कहा।

“मुझमें क्या अंतर मिला आपको?”

“पहले प्यार की बातें अधिक करती थी। अब बात-बात पर गुस्सा करने लगी हो।”

रशीद मैं यह बात इतने भोलेपन से कही कि ना चाहते भी पूनम मुस्कुरा दी और रशीद की आँखों में आँखें डालती हुई बोली, “तो क्या आप चाहते हैं कि मैं फिर से अधिक प्यार की बातें करने लगूं।”

“अंधा क्या चाहे दो ऑंखें।” रशीद ने शरारत का ढंग अपनाते हुए कहा।

“उसका एक ही ढंग है।” पूनम ने आँखें झुका कर कहा, “माँ से कहकर शादी की तारीख निश्चित करा लो।”

पूनम की इस बात में रशीद को चौंका दिया। वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि वह बातों-बातों में अचानक उसके सामने इतनी बड़ी समस्या रख देगी। स्थिर खड़ा रुमाल से माथे पर पसीने की बूंदों को पोंछने लगा और उन लाज भरी आँखों को देखने लगा, जो मन की बात कहकर जमीन गड़ी जा रही थी। कुछ क्षण अनोखा मौन रहा, फिर रशीद ने पूछा, “तुम कल जा रही हो?”

“हाँ! दोपहर की फ्लाइट से। डैडी का तार आया है।”

“मैं जानता हूँ। आज ने बताया था।”

“आप छुट्टी पर कब आ रहे हैं?”

“अगले महीने। माँ को पत्र लिख डालूंगा।”

“क्या?” पूनम ने प्रश्न सूचक दृष्टि से उसे देखा।

“तुम्हारे मन की बात। यही कि अब तुम से अधिक प्रतीक्षा नहीं होती।”

“उं हूं यू नहीं!”

“तो फिर कैसे?”

“लिखियेगा, अब हम दोनों से प्रतीक्षा नहीं होती।” वह मुस्कुराकर बोली।

रशीद उसकी बात पर अनायास हँस दिया और फिर अपनी हँसी रोकते हुए साड़ी का पैकेट उसकी ओर बढ़ाते बोला, “यह लो इस भेंट का साधारण सा उपहार।”

पूनम ने कृतज्ञता भरी दृष्टि से उसे देखा और पैकेट स्वीकार करते हुए बोली, “थैंक यू!”

“अब कहाँ चलना होगा?” रशीद ने पूछा।

“कुछ शॉपिंग और बाकी है। फिर प्रोग्राम यह है कि अगर मैं बारह बजे तक घर नहीं पहुँची, तो आंटी कश्मीर एंपोरियम के पास मुझसे आकर मिलेंगी और फिर हम लोग उनकी किसी सहेली के यहाँ खाना खायेंगी ।”

“तो मैं चलूं…जीप गाड़ी चौक में पार्क कर रखी है।”

“फिर कब मिलियेगा।”

“कल दोपहर को एयरपोर्ट पर!”

“रात को आ जाइए ना।” उसने अनुनय करते हुए कहा।

“नहीं, पूनम सॉरी! आज ऑफिसर्स मेस में एक ऑफिसर का सेंड ऑफ है। जल्दी नहीं निकल सकूंगा।”

“पार्टी में औरतें भी तो आ सकती है ना?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं?”

“बस तो ठीक है! मैं आपसे मिलने वहीं आ रही हूँ।” पूनम ने बिना किसी झिझक के कहा और बाय-बाय कहती हुई इंपोरियम की ओर चली गई।
 
रशीद चुपचाप खड़ा उसे देखता रहा और जब वह आँखों से ओझल हो गई, तो उसने ख़ुदा का शुक्र किया कि आज सचमुच मैस में सेंड ऑफ था और उसने हर रोज की तरह पूनम से झूठा बहाना नहीं किया था। वह मुस्कुराता हुए जीप गाड़ी के बढ़ने लगा।

उसी शाम जब वह घर लौटा, तो रणजीत का घनिष्ट दोस्त गुरनाम पहले से ही वहाँ विराजमान था। उसे अचानक वहाँ देखकर रशीद ने आश्चर्य से कहा, “ओ गुरनाम! तू कब आया?”

“दोपहर की बस से।”

“आने की सूचना तो दे दी होती।”

“अरे यार को खबर दूं कि मैं आ रहा हूँ। यह मेरी आदत नहीं। मैं तो बोरिया बिस्तर उठाकर बस अचानक ही आ धमकता हूँ।”

“यह तो तुमने अच्छा किया और सुनाओ कैसे हो?” रशीद मुस्कुरा कर बोला।

“अरे यार क्या पूछते हो…जंग के बाद तो हमारी ढिबरी टाइट करके रख दी है सरकार ने। जानते हो इतने दिनों में छः ड्यूटियाँ बदल चुका हूँ। अब जाकर कहीं आराम मिला है।”

“अब किस ड्यूटी पर हो?” रशीद ने यों हो सरसरी ढंग से पूछा।

“दुश्मन के जासूसों का पता लगाने की ड्यूटी।” गुरनाम में सोफे पर पहलू बदलते हुए कहा और थोड़ा रुककर बोला, “इसी संबंध में यहाँ आया हूँ।”

गुरनाम की बात सुनते ही रशीद के मस्तिष्क को झटका सा लगा। लेकिन उसने झट अपने आप को संभालते हुए बात का विषय बदल दिया और अर्दली को पुकार कर गुरनाम के रहने और खाने का प्रबंध करने के लिए कहा।

“रणजीत यार! खाने की क्या जल्दी है? जरा पीने का प्रबंध कर दो, ताकि रात को गपशप का मजा आ जाये।”

“आज रात मेरा तो खाना मैस में है। कर्नल चौधरी को सेंड ऑफ दिया जा रहा है।”

“अरे वह कर्नल चौधरी जो जंग से पहले हमारे सी.ओ. था।”

“नहीं गुरनाम, यह वह चौधरी नहीं।”

“तो क्या हुआ! हम इस पार्टी में आयेंगे। तेरे गेस्ट बनकर। अफसरों से जान पहचान करने का अच्छा अवसर मिल जायेगा।”

“ठीक है!” रशीद ने धीरे से कहा और गुरनाम ने सोफे पर पहलू बदलते हुए अर्दली को चाय लाने के लिए कह दिया।

रशीद ने कमरे में बिखरे हुए सामान को देखकर अर्दली से गुरनाम का सामान ले जा कर दूसरे कमरे में टिकाने को कहा।

“तो कितने बजे चलना होगा?” गुरनाम ने अपने ठाठे को संभालते हुए पूछा।

“यही कोई आठ बजे!”

“तो समझो खालसा साढ़े सात बजे तैयार!”

थोड़ी देर में अर्दली चाय की बड़ी ट्रे ले आया और रशीद गुरनाम के लिए चाय बनाने लगा। गुरनाम ने तिरछी नजर से देखते पूछा, “पूनम मिली क्या?”

“मिली!” रशीद ने प्याली में चाय डालते भी धीरे से कहा।

“शादी की कोई तारीख ठहरी?”

“नहीं! पर शायद जल्द ठहर जायेगी।”

“सुना है तू माँसे मिलने भी नहीं गया।”

“तुझसे किसने कहा?”

“तेरी माँ की चिट्ठी ने। तेरा पता उसी से तो मंगवाया था।”

“हाँ गुरनाम छुट्टी ना मिल सकी। अगले महीने जाऊंगा।”

“छुट्टी नहीं मिली!” गुरनाम ने उसकी नकल उतारते हुए व्यंग्य से कहा, “अच्छा बहाना गड़ा है। अबे तू कैसा बेटा है, जो अभी तक माँ से नहीं मिला। जा मैं तुझसे नहीं बोलता।”

“नहीं गुरनाम, तू मेरी मजबूरी को नहीं समझता। “

“खूब समझता हूँ। प्रेमिका से मिलने में कोई मजबूरी नहीं थी।” गुरनाम ने कटाक्ष किया।

“अरे भाई! मैं उससे मिलने कहाँ गया था। वह स्वयं ही मुझसे मिलने आई।” रशीद ने अपनी सफाई देते हुए कहा।

“पूनम यहाँ चली आई।” गुरनाम ने मुस्कुराते पूछा, “सच कह रहा है तू?” उसके स्वर से लगता था कि उसे दोस्त की बात का विश्वास नहीं आ रहा था।

“क्यों इसमें आश्चर्य की क्या बात है?”

“आश्चर्य नहीं दोस्त! तेरे सौभाग्य पर ईर्ष्या कर रहा हूँ। तुझे अपना वचन निभाने का अवसर आप ही मिल गया।”

“कैसा वचन?”

“यही कि लड़ाई समाप्त हो जाने पर इन्हीं वादियों में उसके साथ दस दिन बिता सकेगा।”

“ओह! तो ब तक याद है तुझे वह बात!”

“हाँ दोस्त! उस वचन के बाद पूनम ने जो कुछ कहा था, उसी आवाज को तो सिगरेट लाइटर में सुन-सुन केर आप जीता था और हम सबको सुना कर बोर करता था।”

“वह कल जा रही है।”

“क्या पूनम अभी तक यही है।” गुरनाम उछल पड़ा।

“हाँ और आज पार्टी में भी आ रही है।”

“ओह! तब तो हम भी दर्शन कर लेंगे।”

“लेकिन देखना कोई अशिष्टता!”

“अरे जा! हमें शिष्टता सिखाता है।” गुरनाम ने उसकी बात काट दी और फिर बोला, “अरे हम तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार कर ले, लेकिन औरतों की हमेशा इज्जत करते हैं।”

तभी अर्दली ने आकर गुरनाम को बताया कि उसके स्नान के लिए पानी तैयार है। गुरनाम ने जल्दी जल्दी लंबे घूंट लेकर चाय की प्याली खाली कर दी और एक डकार लेते हुए बोला, “लेकिन पार्टी में एक बात का ध्यान रहे रणजीत!”

“क्या?”

“लोगों से मेरा परिचय कराते समय यही बताना कि मैं छुट्टी पर हूँ, ड्यूटी पर नहीं!”

“अबे तो क्या अपनी तरह मुझे भी बुद्धू समझता है।”

“नहीं यार सावधानी के लिए कह रहा था। क्या करें ड्यूटी ही ऐसी है। तेरे यहाँ तो मैं दोस्ती निभाने के लिए आ गया। वरना मुझे होटल में ठहरने का आर्डर है।”

रशीद कुछ सोचने लगा। फिर कुछ दिन मौन रहकर सरसरी ढंग से गुरनाम से पूछ बैठा, “तुम्हें यहाँ रहते क्या करना होगा।”

“लोगों से मेलजोल बढ़ाना। भारतीय अफसरों और यूएनओ के पर्यवेक्षकों पर दृष्टि रखना।”

“इससे क्या मिलेगा?”

“उस ‘रिंग’ का पता, जो दुश्मनों के लिए कश्मीर में जासूसी कर रहा है।”

“कोई सुराग तो मिला होगा?”

“केवल इतना कि उस रिंग का कोड नंबर है 555!” गुरनाम में बहुत धीरे से कहा और अपना साफा खोलता हुआ गुसल घर की ओर चला गया।
 
555 का नंबर सुनकर रशीद के मस्तिष्क को जैसे बिजली का झटका लगा और वह कुछ क्षण के लिए स्थिर सा रह गया। उसे यूं अनुभव हुआ जैसे कि से भयानक शक्ति ने से जकड़ लिया हो और वह कोशिश करने पर भी उसकी पकड़ से निकलना पा रहा हो।

(11)

ऑफिसर्स मैस में कर्नल चौधरी को दी जाने वाली विदाई की पार्टी पूरे यौवन पर थी। व्हिस्की और कोल्ड ड्रिंक से गिलास लोगों के हाथों में चमक रहे थे। अफसरों की पत्नियाँ और कुछ अतिथि रमणी महफिल की शोभा को चार चाँद लगा रही थीं। पश्चिमी संगीत के धीमी मधुर ध्वनि हॉल में गूंज रही थी। इसके साथ लोगों की बातचीत और ठहाके तथा गिलासों की खनक अनोखा समा उत्पन्न कर रही थीं।

रशीद गुरनाम को साथ लिए हुए सभी अफसरों से उसका परिचय करा रहा था। और गुरनाम हर मिलने वाले के साथ अपना गिलास टकराकर पीता जा रहा था। अब तक वह काफ़ीशराब पी चुका था और थोड़ा बहकने भी लगा था। रशीद ने उसे संभालकर साथ में जाकर कोने में रखे एक सोफे पर बिठा दिया और बैरे को ताकीद कर दी कि उसका ध्यान रखे।

इस बीच रशीद की दृष्टि बार-बार मुख्य प्रवेश द्वार की ओर जाती और निराश लौट आती। उसे पूनम की प्रतीक्षा थी, जो अभी तक नहीं आई थी। कर्नल चौधरी ने उसकी व्याकुलता को अनुभव करते हुए पूछा, “क्या बात है कैप्टन?”

“कुछ नहीं सर!”

“ज़रूर कोई बात है। मैं देख रहा हूँ, तुम पार्टी इंजॉय नहीं कर रहे हो।”

“यह बात नहीं सर! मुझे वास्तव में अपने फियांसी की प्रतीक्षा है। वह पार्टी में आने वाली थी।”

“तो यंग मैन जाओ, उसे उठा लाओ।”

“नहीं सर! वह आप ही आ जायेगी।”

“डोंट बी क्रुएल टू लव।” कर्नल ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा।

“कुछ देर और प्रतीक्षा करता हूँ। नहीं आई, तो चला जाऊंगा।” रशीद ने कर्नल के हाथ से गाली गिलास लेकर भरा हुआ गिलास उसे देते हुए कहा।

कर्नल चौधरी ने चमकती आँखों से घूरते हुए पूछा, “तुम्हारा गिलास कहाँ है।”

“आज नागा है सर। मंगल का व्रत है मेरा।”

“ओ आई सी! तो कब से रिलीजियस बन गये?”

“जब से पाकिस्तान से लौटा हूँ। कैद के एकाकीपन ने भगवान के निकट कर दिया है सर।”

कर्नल चौधरी जो नशे की तरंग में थे, रशीद की बोर कर देने वाली बात सुनकर खिसककर दूसरी ओर चले गये। रशीद मुस्कुराकर जवान अफसरों के एक झुरमुट में जा मिला। वह किसी से कुछ बात कर रहा था कि अचानक उसकी पीठ पर धीरे से उंगली का टहूका लगा। उसने पलट कर देखा, रुखसाना जॉन के पास खड़ी मुस्कुरा रही थी। वह अभी-अभी पार्टी में आये थे। रशीद ऐसी घनिष्ठता से उन्हें मिला, मानो बहुत देर के बिछड़े दोस्तों से मिला हो। फिर वह संकेत से उन्हें एक एकांत कोने में ले गया।

“सब ठीक है ना मेजर! आप कुछ परेशान से मालूम होते हैं?” जॉन ने धीरे से पूछा।

“यू हैव टू बी केयर फुल जॉन।” रशीद ने इधर उधर देखते हुए धीमे स्वर में कहा।

“क्यों क्या हुआ?”

“भारत सरकार को हमारे रिंग का पता चल गया है।”

“वह कैसे?” रुखसाना ने घबराकर पूछा।

“इसका भेद जानने के लिए उन्होंने कैप्टन गुरनाम तो यहाँ भेजा है।”

“लेकिन आपको कैसे पता चला?” रुखसाना ने जल्दी से पूछा।

“गुरनाम रणजीत का दोस्त है ना। वह मुझे रणजीत समझकर मेरे यहाँ ही ठहरा हुआ है।”

“तो यह उसी ने आपको बताया?” जॉन ने चिंतित स्वर में पूछा।

“हाँ और यह भी कि उस रिंग के बारे में तहकीकात करने यहाँ आया है, जो कश्मीर में पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहा है। वह यहाँ ड्यूटी पर है, लेकिन रहेगा सिविलन ड्रेस ही में।”

“तो हमें क्या करना होगा?”

“ज़रा होशियार रहना होगा। आदमी चालाक और तजुर्बेकार है। मिलिट्री में आने से पहले ये इंटेलिजेंस ब्यूरो में था।”

“क्यों ना हम अपना अड्डा यहाँ से बदल लें।” रुखसाना ने राय दी।

“कोई ज़रूरत नहीं है।” जॉन झट से बोला, “सिर्फ कोड नंबर मालूम होने से क्या होता है? पीर बाबा पर किसी को शक नहीं हो सकता। देखते हैं, अगर ज़रूरत समझेंगे, तो अड्डा बदल दिया जायेगा।”

“यह ठीक है।” रशीद ने उसका साहस बढ़ाने के लिए कहा और फिर मुस्कुराते हुए बोला, “चलो, तुम्हें उस जासूस से मिला दूं, जो तुम्हारी खोज में कश्मीर आया है।”

वह जॉन और रुखसाना को लेकर उधर चला आया, जहाँ पर गुरनाम को बैठा आया था। गुरनाम वहाँ अकेला नहीं था, बल्कि दो-चार अफसरों को घेरे अंट-शंट बहस कर रहा था। रशीद ने उसे अपनी और आकर्षित करते हुए जॉन और रुखसाना का परिचय कराया। गुरनाम बड़े तपाक से उन दोनों से मिला और जब रशीद ने उसे जॉन और रुखसाना के आपसी प्रेम संबंध के बारे में बताया, गुरनाम ने बड़े उत्साह से उन दोनों को बधाई दी और उनको अपने पास में बैठा कर उनके रिश्ते की ख़ुशी में जाम पिया। रशीद ने जॉन को आँख से कुछ संकेत किया और हँसते हुए बोला, “देखो अब मेरा दोस्त हम दोनों के हवाले हैं। इसकी खातिर में कोई कमी ना रहे।”

“चिंता मत करो। कैप्टन तुम्हारा दोस्त हमारा दोस्त है।” जॉन ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया।
 
रशीद वहाँ से हटकर अफसरों के झुरमुट में जा मिला। तभी अचानक उसकी दृष्टि प्रवेश द्वार की ओर उठ गई और वह चौंक पड़ा। पूनम द्वार में खड़ी चार ओर दृष्टि दौड़ा कर उसे ढूंढ रही थी। उसकी सज-धज देखकर क्षण भर के लिए तो रसीद की आँखें चौंधिया गई। उस दिन पूनम वही सफेद रेशमी साड़ी पहने हुए थी, जो आज रशीद ने उसे भेंट में दी थी। सुंदर साड़ी में बिजली के प्रकाश में इस रंग भरी सभा में वह सबसे सुंदर और आकर्षक लग रही थी, मानो उजाले बर्फ से पंखों में आकाश से कोई अप्सरा उतर आई हो।

रशीद कुछ देर खड़ा एकटक उसके यौवन को निहारता रहा। यूं तो उसने पूनम को कई बार देखा था, किंतु हर बार उसे किसी दूसरे की प्रेमिका मानकर तभी गहराई से उसने दृष्टि नहीं डाली। लेकिन आज उसका प्रलय ढाने वाला सौंदर्य देखकर वह अपने दिल पर नियंत्रण न रख सका। उसकी दृष्टि उसके सुंदर मुखड़े से फिसलती हुई उसके शरीर की पूरी भौगोलिक रेखाओं को नापने लगी। तभी पूनम की निगाह उस से टकराई और वह चौक पर एकाएक सचेत हो गया। तेज-तेज कदमों से चलता हुआ वह उस तक पहुँचा और मुस्कुराती आँखों से उसका स्वागत करता हुआ बोला, “मैं कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।”

“प्रायः तो मैं ही आपकी प्रतीक्षा करती थी। इसलिए आज का श्रेय आप ही ले लीजिये।” पूनम मुस्कान की बिजलियाँ गिराती हुई बोली।

“तुम्हारे लिए तो सरल सी बात हुई और यहाँ एक-एक पल एक बरस के बराबर बीता है।”

“चलिए अब तो मैं आ गई। क्या खिला-पिला रहे हैं?”

“आओ…अंदर आओ! आंटी को नहीं लाई?”

“आपने उन्हें इनवाइट ही कब किया था?”

“अरे वाह कमाल करती हो! तुम्हारे साथ तो उन्हें आना ही चाहिए था। अपनों में भी कहीं फॉर्मेलिटीज़ बरती जाती हैं।” रशीद खिसियाकर बोला।

पूनम उसकी खिसियाहट देख कर मुस्कुरा दी और जल्दी से बोली, “अरे नहीं! मैं तो मज़ाक कर रही थी। वास्तव में उन्हें पार्टियों इत्यादि में जाना अच्छा नहीं लगता।”

पूनम के आते ही पार्टी में जैसे नवजीवन फूंक गया हो। नशे में झूमते अफसरों ने प्रशंसा से उस परी जैसी सुंदर रमणी को देखा और कुछ एक ही पत्नियों ने अपने पतियों की भूखी नज़रों को ताड़ते हुए नाक-भौं चढ़ा ली। कर्नल चौधरी ने रशीद के उत्तम चुनाव की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़कर पूनम का हाथ थामा और स्टेज पर ले जाकर ऊँचे स्वर में रणजीत की मंगेतर के रूप में सबसे उसका परिचय कराया। हॉल तालियों के शोर से गूंज उठा।

लोगों से मिल चुकने के बाद पूनम जमघट से थोड़ा अलग हटकर खड़ी हो गई। नशे की तरंग में कुछ अफसरों की बेबाकी के लिए रशीद ने उससे क्षमा मांगना चाहा, तो हम मुस्कुरा कर बोली, “क्षमा मांगने की क्या बात है? आप तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे मैं पहली बार ऐसी पार्टियों में सम्मिलित हुई हूँ। याद नहीं, जब आप पहली बार मुझे पालम मैस वाली पार्टी में साथ ले गए थे?”

“तब की बात और थी।”

“क्यों?”

“तब मैं तुम्हें केवल एक प्रेमिका के रूप में देखता था।”

“और अब!”

“अब…अब…अब मैं तुम्हें अपने जीवन का एक अंग समझता हूँ।”

रशीद की उस दर्शनमयी बात में पूनम को क्षण भर के लिए स्थिर कर दिया। वह ध्यान से उसके चेहरे को देखती हुई सोचने लगी कि आज से पहले तो कभी उसने इतनी गंभीर बात नहीं कही थी।

वह कुछ कहना चाहती थी कि एक गरजते हुए कर्कश स्वर ने उनके बीच छाई निस्तब्धता को झकझोर कर रख दिया। यह गुरनाम की आवाज थी, जो जॉन और रुखसाना से किसी बात पर उलझ पड़ा था। वह जॉन का गिरेबान पकड़कर गुस्से में चिल्ला रहा था, “ओ लाट साहब के बच्चे…मैं तेरे ढिबरी टाइट कर दूंगा। मुझे बरस दो बरस में बस एक ही बार गुस्सा आता है और जब गुस्सा आता है, तो मैं खून कर देता हूँ।”

इससे पहले कि लोग झगड़े का कारण जान पाते, रशीद झपट कर उनके पास जा पहुँचा। उसने गुरनाम से जॉन का गिरेबान छुड़ाया और उसे खींचता हुआ हॉल से बाहर ले जाने लगा। गुरनाम रशीद के साथ घिसटता हुआ चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था, “क्रिस्तान है साला। अंग्रेज का पिट्ठू। इसे निकालो यहाँ से। बाहर निकालो।”

रशीद से खींचता हुआ बाहर बगीचे में ले गया और उसे शांत करने के लिए बोला, “हाँ हाँ! तुम ठीक कहते हो गुरनाम। यह अपने आप को अंग्रेज ही समझता है। तुम चिंता मत करो। मैं उसका दिमाग ठीक कर दूंगा।”

“केवल दिमाग ठीक मत करो, मार डालो साले को, जान से मार डालो।”

“हाँ हाँ! मार डालूंगा अच्छा तुम अब जाओ। घर जाकर आराम करो।”यह कहते हुए रचित ने उसे ले जाकर उसके जीप गाड़ी में बिठा दिया। फिर उसने इधर उधर देखा, तो कुछ दूर बरामदे में उसे शाहबाज खड़ा दिखाई दिया। रशीद ने उसे बुलाकर गुरनाम को घर छोड़ आने का आदेश दिया। शाहबाज उसकी बात सुनकर कुछ दुविधा में पड़ गया तो रशीद बोल उठा, “घबराओ मत! मैं जानता हूँ, तुम सिंधु साहब के ड्राइवर हो न….मैं उनसे कह दूंगा तुम्हें अपने काम से भेजा है।”

शाहबाज ने रशीद की जीप में बैठकर स्टेयरिंग संभाल लिया। गुरनाम ने मुश्किल से नशे से बोझिल आँखें खोलकर शाहबाज को देखा और लड़खड़ाती आवाज में बोला, “यह कौन है?”

“दोस्त…दुश्मन नहीं।” रशीद ने उसके कोट के बटन ठीक करते हुए शाहबाज को संकेत किया और उसने जीप आगे बढ़ा दी। रशीद ने संतोष की सांस ली और मैस में लौटा आया।

जॉन रुखसाना के पास आकर उसे क्षमा मांगी, “आई एम सॉरी जॉन! उसने बहुत पी ली थी।”

“इट्स ऑल राइट! कसूर मेरा ही था, जो उससे उलझ गया।”

“क्या बात हुई थी?” रशीद ने झगड़े का मूल कारण जानना चाहा।

“यूं ही नशे की तरह में रुखसाना से कुछ कह बैठा था।”

“दरअसल शराब उसकी कमजोरी है। पीने लग जाता है, तो भूल जाता है, वह कहाँ है? क्या कर रहा है?”

“कौन था वह रणजीत?” पूनम ने बीच में आकर मधुर स्वर में पूछा।

“अपना दोस्त गुरनाम!”

“कौन गुरनाम?”

“अरे वही कैप्टन गुरनाम! तुम्हें तो अच्छी तरह जानता है।”

“लेकिन मैं तो उस से कभी नहीं मिली।” वह आश्चर्य से बोली।

रशीद को पूनम का उत्तर सुनकर एक झटका सा लगा, लेकिन इससे पहले कि वह उसे उलझन में डाल दे, उसने बात का विषय बदलते हुए पूनम से पूछा, “क्या लोगी पाइन एप्पल जूस…लेमन स्क्वैश?”

“पाइन एप्पल जूस!”

पूनम का उत्तर सुनते ही रुखसाना काउंटर से जाकर पाइन एप्पल जूस के दो गिलास ले आई और रशीद और पूनम को उसने एक एक गिलास थमा दिया। जॉन ने अपना व्हिस्की का गिलास उठाया और आधा रुखसाना की खाली गिलास में उड़ेल दिया। चारों गिलास चीयर्स की आवाज के साथ टकराए और उन चारों के होंठ तर करने लगे।

ज्यों ही घड़ी ने ग्यारह बजाये ‘बॉटम अप’ की ध्वनि के साथ सबने अपने गिलास खाली कर दिये। यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर ने सबको संबोधित करते हुए कर्नल चौधरी को दी गई पार्टी के बारे में कुछ शब्द कहें और उनकी फौजी सेवाओं तथा चरित्र की जी खोलकर सराहना की। आखिर में रात्रि खाने की घोषणा कर दी। खाने की मेज पर कश्मीरी, पंजाबी और अंग्रेजी खाने पहले ही चुन दिए गए थे। खाने की घोषणा के बाद सभी उस पर बढ़ गये।

रशीद पूनम के साथ मेज तक आया और खानों तक पहुँचने में उसकी सहायता करने लगा। पूनम को इस पार्टी की चहल-पहल बहुत भली लग रही थी। खाने की प्लेट हाथ में लिए वह एक ओर खड़ी महिलाओं के पास चली गई। सभी महिलायें शायद पुरूषों के अधिक पीने पिलाने से ऊब चुकी थी और अब खाना खाती हहुई चहकने लगी थी। वही घिसे-पिटे औरतों के विषय चल रहे थे। किसी की साड़ी या गहने की प्रशंसा, किसी के फैशन पर टिप्पणी, कोई रसोईघर का वर्णन, आया, नौकरियों की बातें और अपने पतियों के गुणों की चर्चा।

पूनम चुपचाप खड़ी सबकी बातें सुन रही थी और मन ही मन अपने भावी जीवन के बारे में सोच रही थी। जब उसका रणजीत से ब्याह हो जायेगा। वह भी गृहणी बन जायेगी और सहेलियों से यही बातें किया करेगी।

“तुम इन चहकती बुलबुलों में चुपचाप खड़ी क्या सोच रही हो?” अचानक रशीद ने उसके पास आकर पूछा।

“घर संसार के बारे में!”

“घर संसार!” रशीद ने आश्चर्य से दोहराया।

“हाँ! उस जीवन के बारे में विचार कर रही हूँ, जब मेरे सिर पर भारी उत्तरदायित्व होगा। सुबह से शाम तक चौके की चिंता, नौकरों पर दृष्टि, मेहमानों की देखभाल, बच्चों का ध्यान, घर की सफाई, महीने भर के बजट का नापतौल। कहिये कैसा रहेगा यह जीवन?”

“तुम तो बहुत दूर की सोचने लगी।” रशीद ने कुछ बोझिल हुए स्वर में कहा।

पूनम ने गहरी दृष्टि से उसे देखा और झट अपनी प्लेट से एक ग्रास उठा कर उसके मुँह में ठूंसते हुए बोली, “शायद तुम यह सब कुछ नहीं सोचते होगे। मैं तो रात भी उस दिन की कल्पना में डूबी रहती हूँ, जब तुम तुम न रहोगे और मैं मैं न रहूंगी।”

तभी पास खड़ी कुछ औरतों की हँसी ने उन्हें चौंका दिया। वे लोग उसी की बात सुनकर हँस पड़ी थी। रशीद कुछ सोच कर वहाँ से खिसक गया, किंतु पूनम ठीठ बनी वहीं खड़ी रही और औरतों की ओर पलट कर बोली, “इट्स जस्ट द बिगिनिंग।”
 
पार्टी के बाद जब रशीद पूनम को छोड़ने उसके घर की ओर जा रहा था, तो रास्ते में उसके साथ फ्रंट सीट पर बैठे हुए पूनम अपने कुछ अधिकारों का प्रयोग करने लगी। वह अपने सिर से खिसकते-खिसकते बिल्कुल उससे सट गई और फिर धीरे से अपना सिर रशीद के कंधे पर टिका दिया।

पूनम की लहराती जुल्फें बार-बार उड़कर रशीद के चेहरे पर आ जाती और वह उन्हें प्यार से हटा देता। पूनम इस खेल से आनंदित हो रही थी। उस पर एक नशा सा छाने लगा था।

रशीद रात के सन्नाटे में धीमी गति से जीप गाड़ी चलाता हुआ चश्माशाही की टूरिस्ट लॉज की ओर बढ़ रहा था। उसकी दृष्टि सामने सड़क पर थी, जहाँ चिनार की लंबी परछाइयों के कारण अंधेरा था। गाड़ी की हेडलाइट का प्रकाश उस अंधेरे को चीरता चला जा रहा था।

पूनम की निकटता की गर्मी और कोमलता से एकाएक उसकी कल्पना उसे मरी की सुंदर वादियों में ले गई, जहाँ पहली बार सलमा के साथ हनीमून मनाने गया था। सलमा को रात के सन्नाटे में ड्राइव करने का बड़ा शौक था और वह रसीद को मजबूर करके मीलों दूर कश्मीर के रास्ते पर निकल जाती थी। चांदनी रात का वह दृश्य उसकी आँखों के सामने घूमने लगा, जब चिनार की लंबी परछाइयों के तले उसे अपनी गाड़ी में बैठाये वह न जाने किस मंज़िल की ओर दौड़ा चला जा रहा था। उस रात सलमा की जुल्फ़ें इसी प्रकार और उनके चेहरे को छू रही थी और उनकी सुगंध सारे वातावरण को विभोर सा कर रही थी। प्रतिक्षण दोनों की कामनायें तरुण सांसे तेज हो जा रही थी। इस उमड़ते हुए भाव के तूफान को नियंत्रित करने के लिए सलमा ने एक प्यार भरा गीत छेड़ दिया था।

रशीद उस मधुर गीत की कल्पना में खोया हुआ आगे बढ़ता जा रहा था कि अचानक एक मोड़ से एक ट्रक उसके सामने आ गया। ट्रक की तेज रोशनी और चिरमिराती ब्रेकों की चीख ने उसे कंपकपा दिया, लेकिन वह जल्दी संभल गया और उसने गाड़ी को सड़क के नीचे उतार दिया। अनायास उसके लरजते होठों से सलमा का नाम निकल गया।

एक चीख के साथ पूनम ने अपने आप को संभाला और धुंधली रोशनी में ध्यान से रशीद के चेहरे को देखने लगी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थी, वह अब तक अपनी घबराहट पर नियंत्रण न पा सका था। पूनम ने दाएं-बाएं झांक कर देखा। जीप डल झील के बिल्कुल किनारे एक पेड़ के तने के साथ लगी खड़ी थी। कुछ देर तक दोनों पर एक अजीब सी कंपकंपी सी छाई रही। फिर पूनम ने कांपते स्वर में पूछा, “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं! न जाने किस दिन में ड्राइव कर रहा था। ट्रक की ओर ध्यान ही नहीं गया।”

“लेकिन सलमा कहकर किसे पुकार रहे थे?” पूनम ने संदेहमयी दृष्टि से उसे देखते हुए पूछा।

“सलमा रशीद की पत्नी है।” रशीद ने झट कहा और पूनम के चेहरे पर आई लटें हटाता हुआ बोला, “वही दोस्त, जिसने मुझे अपनी जीप में बॉर्डर तक पहुँचाया था, तब सलमा भी उसके साथ थी।”

“वह रशीद, जिसने आपकी सुरक्षा के लिए वह लॉकेट दिया था!”

“हाँ वही! उस दिन भी एक ऐसी ही घटना होते-होते रह गई थी और मैं चीख पड़ा था – सलमा। आज भी अनायास उसी का नाम जुबान पर आ गया। तुम्हें बुरा लगा क्या?”

“नहीं तो!” पूनम ने हिचकिचाते हुए कहा और फिर क्षण भर रुक कर बोली, “मैंने आपसे वह लॉकेट ले लिया था। शायद इसी कारण यह दुर्घटना हो गई। लीजिये इसे आप दोबारा पहन लीजिये।” यह कहते हुए पूनम ने अपने गले से लॉकेट उतार कर रशीद के गले में डाल दिया।

रशीद, जो अभी तक यादों के सागर से निकल ना पाया था, जंजीर से लटके लॉकेट को हाथ में थाम कर अचानक कांप उठा। लॉकेट में ‘अल्लाह’ के स्थान पर ‘ओम’ का शब्द जगमगा रहा था। लॉकेट में किये गए इस परिवर्तन से उसका अंतर जल उठा था। वह अभी यह निश्चय ही नहीं कर पाया था कि पूनम की इस हरकत पर उसे क्या कहें कि वह स्वयं ही मुस्कुरा कर बोल उठी, “मैंने केवल अल्लाह को पिघलाकर ओम करवा लिया है।”

“लेकिन ऐसा तुमने क्यों किया?” रशीद अपने क्रोध को दबा ना सका और बोला, “तुम नहीं जानती, यह लॉकेट मुझे कितना प्रिय है। इसमें मेरे दोस्त का प्यार और पवित्र भावनायें गुंथी हुई है।”

“तो क्या हुआ? अल्लाह और ओम में अंतर ही क्या है?” पूनम ने उसे समझाना चाहा।

“अंतर नहीं है, तो तुम्हें पिघलवाने की क्या ज़रूरत थी? इससे तो यही स्पष्ट होता है कि तुम भी संकीर्ण मन की हो। मुसलमानों से घृणा करती हो।”

“मुझे तो किसी जाति से घृणा नहीं, लेकिन मैं यह देख रही हूँ कि पाकिस्तान में रहने के बाद आप को हिंदू धर्म से ज़रूर घृणा हो गई है। आपके विचार और दृष्टिकोण बदल गए हैं।”

रशीद को अनुभव हुआ जैसे पूनम ने उसकी दुखती रग पर उंगली रख दी हो। उसने अपने आप को संभाला और बोला , “अच्छा रहने दो, अब जो हुआ वह हो गया।”

“नहीं! अब तो आपको अल्लाह वाला लॉकेट ही पहनना होगा।” पूनम ने कहा और अपने पर्स में से वह लॉकेट निकालकर रशीद के हाथ में थमा दिया और उसे ध्यान से देखते हुए फिर बोली, “मैंने तो केवल आपकी परीक्षा देने के लिए लॉकेट बदला था।”

“कैसी परीक्षा?” वह लॉकेट को उंगलियों से डोलते हुए घबराकर बोला।

“यही कि आपको एक दोस्त अधिक प्रिय है या प्रेमिका!” पूनम ने कहा और फिर अचानक कूदकर जीप गाड़ी से नीचे उतर गई।

रशीद ने आवाज देकर उसे रोकने का प्रयत्न किया। लेकिन पूनम ने पलटकर नहीं देखा और उस पगडंडी पर चलने लगी, जो उसके मकान की ओर जाती थी। जब तक पूनम दृष्टि से ओझल नहीं हो गई, रशीद वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

पलटकर जब उसने जीप गाड़ी को देखा, तो इंजन पर पेड़ के तने की ठोकर लगने से गाड़ी से खौलता हुआ पानी बाहर आ चुका था और भाप ठंडी हवा में मिलती जा रही थी।

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