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शाम का धुंधलापन अंधेरे में परिवर्तित होने लगा था। आकाश में चांद निकल आया था। पूनम ने उस झील में शिकारे द्वारा घूमने की इच्छा प्रकट की। परंतु रशीद ने यह कहकर टाल दिया कि उसे 11:00 बजे से पहले ही हेडक्वार्टर लौट जाना है। जब से वह पाकिस्तान से लौटा है, कुछ बंदिशें बढ़ गई हैं।
“तो छुट्टी क्यों नहीं ले लेते?” पूनम ने इठला कर कहा।
“वह तो मिलने ही वाली है।”
“कब?”
“बस कुछ ही दिनों बाद …एक महीने की छुट्टी मिलेगी।”
“तब तक तो मैं यहाँ से जा चुकी होंगी!”
“तू क्या हुआ? मैं तुमसे मिलने दिल्ली चला आऊंगा।”
“सच..!” वह खुश होकर बोली।
“हाँ पूनम..इन सुंदर सुहानी वादियों में तो चंद दिन साथ न गुजार सके। दिल्ली में तुम छुट्टी ले लोगी, तो हम एक साथ ही माँ के पास चलेंगे।”
“तो फिर रहा वचन। दिल्ली पहुंचकर छुट्टी के लिए अप्लाई कर दूं?”
रशीद ने हाँ में सिर हिला दिया और दोनों एक साथ मुस्कुरा पड़े। इससे पहले की भी अगला प्रोग्राम निश्चित करते जॉन और रुखसाना ने उन्हें आकर घेर लिया। रशीद ने उन दोनों का परिचय पूनम से कराया। जॉन ने पूनम को बताया कि वह कश्मीर में रहकर इन लोगों के बारे में एक पुस्तक लिख रहा है। लड़ाई आरंभ होने के कारण उसका यह काम अधूरा रह गया था, अब इसे पूरा कर रहा है। रुखसाना उसकी मंगेतर है और गाँव-गाँव उसके साथ जाकर नारियों के घरेलू जीवन को समझने में उसकी सहायता करती है। इसी संबंध में उसकी रणजीत से दोस्ती हो गई थी।
“लेकिन कश्मीरी लोगों के जीवन से इन फौजियों का क्या संबंध हो सकता है।” पूनम ने अचानक जॉन और रणजीत की दोस्ती पर टिप्पणी करते हुए कहा।
“कश्मीर और मिलिट्री का तो एक ऐसा नाता जुड़ चुका है, जिससे हर कश्मीरी के जीवन पर कुछ असर पड़ा है। यह जंग, बॉर्डर के झगड़े, यूएनओ का बीच बचाओ। इन पॉलिटिकल बातों से इन लोगों का जीवन अलग कैसे किया जा सकता है।” जॉन ने गंभीरता से कहा।
................................
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
रशीद की आँखों में नींद का कहीं पता तक नहीं था। सोने के प्रयत्न में वह बार-बार करवटें बदल रहा था। उसके मस्तिष्क में चिंगारियाँ सी फूट रही थी। अंत में ऊबकर वह बिस्तर से उठ कर आराम कुर्सी पर बैठा और समय बिताने के लिए टेबलेट जलाकर कोई पत्रिका देखने लगा।
जैसे ही उसने पत्रिका खोली, उसकी दृष्टि अपनी हथेली के छालो पर पड़ गई, जो पूनम के आँचल में आग बुझाते समय पड़ गए थे। मरहम लगाने पर भी छालों में हल्की-हल्की जलन हो रही थी। जलन की मिठास से अचानक उसे याद आ गया कि ऐसे ही छाले उसकी हथेली पर पहले भी पड़ चुके थे। सलमा की पहली मुलाकात में भी ऐसे ही मोती उसकी हथेलियों पर डाल दिए थे।
पत्नी की याद आते ही उसका सारा शरीर जैसे किसी अज्ञात आग में झुलस किया….वह तड़प उठा। रात के उस गहन अंधेरे में उसकी कल्पना उसे दो वर्ष पहले की करांची में घटित घटना की तरफ ले गई। सलमा से उसकी पहली भेंट का दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम गया।
कैसी छुट्टियों में अपने दोस्त असलम लखनवी से मिलने करांची गया हुआ था। उसे शेरो-शायरी में बिल्कुल रुचि ना थी और इसी कारण वह अपने शायर दोस्त का मज़ाक उड़ाया करता था। उसके विचार से शेर सुनना और सुनाना बेकार आदमियों का काम था। एक दिन वह ना जाने किस मूड में था कि असलम ने उसे फुसला ही लिया। उसने मिर्ज़ा वसीम भाई के मकान पर होने वाले मुशायरा का ज़िक्र इस सुंदरता से किया और उसकी ऐसी रंगीन तस्वीर खींची कि मन ना चाहते हुए भी रशीद उसके साथ मिर्ज़ा जी के घर की ओर चल पड़ा।
आज मिर्ज़ा जी साठवीं सालगिरह थी। इस उपलक्ष में उनके यहाँ एक विशेष मुशायरे का आयोजन किया गया था। असलम रशीद के साथ वहाँ पहुँचा, तो मुशायरा पूरे जोश पर था। ‘वाह वाह सुभान अल्लाह’ ‘माशा अल्लाह’ से सारा हॉल गूंज रहा था। उनकी ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। वे चुपके से आगे जाकर बैठ गये।
मुशायरे के लिए एक छोटा सा मंच बना हुआ था। वास्तव में यह एक ऊँचा चबूतरा था, जिसके बीच में पतला रेशमी पर्दा डालकर उसे पुरुषों और स्त्रियों के लिए दो भागों में विभाजित कर दिया गया था। एनाउंसर जब किसी शायर के बाद शायरा का नाम पुकारता, तो रेशमी पर्दे के पीछे से खनकती हुई किसी नारी की आवाज आती – “मतला अर्ज़ करती हूँ…”
सब सुनने वालों की आँख एक साथ पर्दे पर जम कर रह जाती और कान स्वर व शब्दों का रस लेने के लिए एकाग्र हो जाते। फिर किसी सुंदर शायरा का शरीर पर्दे के पीछे ही इंद्रधनुष के समान उजागर होता, रसिक युवक दिल थाम कर बैठ जाते।
रशीद इस प्रकार के मुशायरे में पहली बार आया था। उसे यह सब एक सुहाना सपना सा लग रहा था। जब कोई शायारा तरन्नुम से अपनी ग़ज़ल सुनाती, तो वह विभोर सा हो जाता और सोचने लगता कि अब तक वह क्यों ऐसे रंगीन मनोरंजन से वंचित रहा।
कितने हसीन तखल्लुस चुने हैं इन शायराओं ने …सबा देहलवी, लैला लखनवी, तरन्नुम बरेलवी, तबस्सुम लाहौरी इत्यादि….उसने मन ही मन सोचा और चुपचाप बैठा गजलें सुनता रहा। अचानक एक शायर को दाद देते हुए असलम लखनवी ने रशीद को देखा और उसे मूर्तिमान बना चुपचाप देख कर टहूका देते हुए कहा, “अमां! तुम घुग्घू बने ख़ामोश क्यों बैठे हो? तुम भी दाद दो।“
और रशीद बेढंगेपन से हर शेर पर ‘वाह वाह सुभान अल्लाह इललला’ की रट लगाने लगा।
“ऊं हूं…इललला नहीं कहते सिर्फ सुभान अल्लाह कहो।” असलम ने उसे टोका।
और अब रशीद ऊँची आवाज में ‘सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह’ की रट लगाने लगाने लगा। प्रायः शेर बाद में पढ़ा जाता और रशीद के मुँहह से ‘सुभान अल्लाह’ पहले निकल पड़ता। उसकी इस हरकत पर मुशायरे में एक जोरदार ठहाका हुआ। मिर्ज़ा साहब ने मुँह बनाकर रशीद की ओर देखते हुए कहा, ‘अगर आप दाद देना नहीं जानते, तो मेहरबानी फ़रमा कर ख़ामोश बैठे रहिये।”
“कौन साहब है यह? कोई नये जानवर मालूम होते हैं।” पर्दे के पीछे से हल्के-हल्के ठहाकों में मिली-जुली आवाजें सुनाई देने लगी। कुछ चंचल लड़कियाँ पर्दा हटा-हटा कर रशीद की ओर झांकने लगी।
“ए हे…क्या बांका जवान है।” सबा देहलवी ने झांककर कहा।
“मगर अक्ल से बिल्कुल कोरा मालूम होता है।” लैला लखनवी ने टिप्पणी की। इस पर महिलाओं में फिर एक ठहाका हुआ। तभी अनाउंसर की आवाज गूंजी – “खातून व हजरात! हमा तन हो जाइए। अब मैं मोहतरमा सलमा लखनवी से कुछ सुनाने के लिए अर्ज़ करता हूँ।”
“तो छुट्टी क्यों नहीं ले लेते?” पूनम ने इठला कर कहा।
“वह तो मिलने ही वाली है।”
“कब?”
“बस कुछ ही दिनों बाद …एक महीने की छुट्टी मिलेगी।”
“तब तक तो मैं यहाँ से जा चुकी होंगी!”
“तू क्या हुआ? मैं तुमसे मिलने दिल्ली चला आऊंगा।”
“सच..!” वह खुश होकर बोली।
“हाँ पूनम..इन सुंदर सुहानी वादियों में तो चंद दिन साथ न गुजार सके। दिल्ली में तुम छुट्टी ले लोगी, तो हम एक साथ ही माँ के पास चलेंगे।”
“तो फिर रहा वचन। दिल्ली पहुंचकर छुट्टी के लिए अप्लाई कर दूं?”
रशीद ने हाँ में सिर हिला दिया और दोनों एक साथ मुस्कुरा पड़े। इससे पहले की भी अगला प्रोग्राम निश्चित करते जॉन और रुखसाना ने उन्हें आकर घेर लिया। रशीद ने उन दोनों का परिचय पूनम से कराया। जॉन ने पूनम को बताया कि वह कश्मीर में रहकर इन लोगों के बारे में एक पुस्तक लिख रहा है। लड़ाई आरंभ होने के कारण उसका यह काम अधूरा रह गया था, अब इसे पूरा कर रहा है। रुखसाना उसकी मंगेतर है और गाँव-गाँव उसके साथ जाकर नारियों के घरेलू जीवन को समझने में उसकी सहायता करती है। इसी संबंध में उसकी रणजीत से दोस्ती हो गई थी।
“लेकिन कश्मीरी लोगों के जीवन से इन फौजियों का क्या संबंध हो सकता है।” पूनम ने अचानक जॉन और रणजीत की दोस्ती पर टिप्पणी करते हुए कहा।
“कश्मीर और मिलिट्री का तो एक ऐसा नाता जुड़ चुका है, जिससे हर कश्मीरी के जीवन पर कुछ असर पड़ा है। यह जंग, बॉर्डर के झगड़े, यूएनओ का बीच बचाओ। इन पॉलिटिकल बातों से इन लोगों का जीवन अलग कैसे किया जा सकता है।” जॉन ने गंभीरता से कहा।
................................
रात आधी से अधिक बीत चुकी थी।
रशीद की आँखों में नींद का कहीं पता तक नहीं था। सोने के प्रयत्न में वह बार-बार करवटें बदल रहा था। उसके मस्तिष्क में चिंगारियाँ सी फूट रही थी। अंत में ऊबकर वह बिस्तर से उठ कर आराम कुर्सी पर बैठा और समय बिताने के लिए टेबलेट जलाकर कोई पत्रिका देखने लगा।
जैसे ही उसने पत्रिका खोली, उसकी दृष्टि अपनी हथेली के छालो पर पड़ गई, जो पूनम के आँचल में आग बुझाते समय पड़ गए थे। मरहम लगाने पर भी छालों में हल्की-हल्की जलन हो रही थी। जलन की मिठास से अचानक उसे याद आ गया कि ऐसे ही छाले उसकी हथेली पर पहले भी पड़ चुके थे। सलमा की पहली मुलाकात में भी ऐसे ही मोती उसकी हथेलियों पर डाल दिए थे।
पत्नी की याद आते ही उसका सारा शरीर जैसे किसी अज्ञात आग में झुलस किया….वह तड़प उठा। रात के उस गहन अंधेरे में उसकी कल्पना उसे दो वर्ष पहले की करांची में घटित घटना की तरफ ले गई। सलमा से उसकी पहली भेंट का दृश्य उसकी आँखों के सामने घूम गया।
कैसी छुट्टियों में अपने दोस्त असलम लखनवी से मिलने करांची गया हुआ था। उसे शेरो-शायरी में बिल्कुल रुचि ना थी और इसी कारण वह अपने शायर दोस्त का मज़ाक उड़ाया करता था। उसके विचार से शेर सुनना और सुनाना बेकार आदमियों का काम था। एक दिन वह ना जाने किस मूड में था कि असलम ने उसे फुसला ही लिया। उसने मिर्ज़ा वसीम भाई के मकान पर होने वाले मुशायरा का ज़िक्र इस सुंदरता से किया और उसकी ऐसी रंगीन तस्वीर खींची कि मन ना चाहते हुए भी रशीद उसके साथ मिर्ज़ा जी के घर की ओर चल पड़ा।
आज मिर्ज़ा जी साठवीं सालगिरह थी। इस उपलक्ष में उनके यहाँ एक विशेष मुशायरे का आयोजन किया गया था। असलम रशीद के साथ वहाँ पहुँचा, तो मुशायरा पूरे जोश पर था। ‘वाह वाह सुभान अल्लाह’ ‘माशा अल्लाह’ से सारा हॉल गूंज रहा था। उनकी ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। वे चुपके से आगे जाकर बैठ गये।
मुशायरे के लिए एक छोटा सा मंच बना हुआ था। वास्तव में यह एक ऊँचा चबूतरा था, जिसके बीच में पतला रेशमी पर्दा डालकर उसे पुरुषों और स्त्रियों के लिए दो भागों में विभाजित कर दिया गया था। एनाउंसर जब किसी शायर के बाद शायरा का नाम पुकारता, तो रेशमी पर्दे के पीछे से खनकती हुई किसी नारी की आवाज आती – “मतला अर्ज़ करती हूँ…”
सब सुनने वालों की आँख एक साथ पर्दे पर जम कर रह जाती और कान स्वर व शब्दों का रस लेने के लिए एकाग्र हो जाते। फिर किसी सुंदर शायरा का शरीर पर्दे के पीछे ही इंद्रधनुष के समान उजागर होता, रसिक युवक दिल थाम कर बैठ जाते।
रशीद इस प्रकार के मुशायरे में पहली बार आया था। उसे यह सब एक सुहाना सपना सा लग रहा था। जब कोई शायारा तरन्नुम से अपनी ग़ज़ल सुनाती, तो वह विभोर सा हो जाता और सोचने लगता कि अब तक वह क्यों ऐसे रंगीन मनोरंजन से वंचित रहा।
कितने हसीन तखल्लुस चुने हैं इन शायराओं ने …सबा देहलवी, लैला लखनवी, तरन्नुम बरेलवी, तबस्सुम लाहौरी इत्यादि….उसने मन ही मन सोचा और चुपचाप बैठा गजलें सुनता रहा। अचानक एक शायर को दाद देते हुए असलम लखनवी ने रशीद को देखा और उसे मूर्तिमान बना चुपचाप देख कर टहूका देते हुए कहा, “अमां! तुम घुग्घू बने ख़ामोश क्यों बैठे हो? तुम भी दाद दो।“
और रशीद बेढंगेपन से हर शेर पर ‘वाह वाह सुभान अल्लाह इललला’ की रट लगाने लगा।
“ऊं हूं…इललला नहीं कहते सिर्फ सुभान अल्लाह कहो।” असलम ने उसे टोका।
और अब रशीद ऊँची आवाज में ‘सुभान अल्लाह सुभान अल्लाह’ की रट लगाने लगाने लगा। प्रायः शेर बाद में पढ़ा जाता और रशीद के मुँहह से ‘सुभान अल्लाह’ पहले निकल पड़ता। उसकी इस हरकत पर मुशायरे में एक जोरदार ठहाका हुआ। मिर्ज़ा साहब ने मुँह बनाकर रशीद की ओर देखते हुए कहा, ‘अगर आप दाद देना नहीं जानते, तो मेहरबानी फ़रमा कर ख़ामोश बैठे रहिये।”
“कौन साहब है यह? कोई नये जानवर मालूम होते हैं।” पर्दे के पीछे से हल्के-हल्के ठहाकों में मिली-जुली आवाजें सुनाई देने लगी। कुछ चंचल लड़कियाँ पर्दा हटा-हटा कर रशीद की ओर झांकने लगी।
“ए हे…क्या बांका जवान है।” सबा देहलवी ने झांककर कहा।
“मगर अक्ल से बिल्कुल कोरा मालूम होता है।” लैला लखनवी ने टिप्पणी की। इस पर महिलाओं में फिर एक ठहाका हुआ। तभी अनाउंसर की आवाज गूंजी – “खातून व हजरात! हमा तन हो जाइए। अब मैं मोहतरमा सलमा लखनवी से कुछ सुनाने के लिए अर्ज़ करता हूँ।”