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वह अभी-अभी उठा था और अपनी कोठरी में था। बाहर संतरी पहरा दे रहा था। आते-जाते उसके जूतों की आवाज रणजीत के कानों से टकरा रही थी। उसने सर को झिंझोरा और उठकर बैठ गया। अब तक वह सोच सकता था…उसका मस्तिष्क साफ था…स्वतंत्रता…देश…माँ…पूनम…कल्पना और मधुर विचारों की वही कड़ियाँ फिर चल निकली। वह सोचने लगा, अभी उसे पुकारा जाएगा और शायद शाम तक वह सीमा पर अपने देश में होगा।
तभी कैंप एडजुटेंट कैप्टन रयाज ने आकर उसे बताया कि बीमार पड़ जाने के कारण उसे दूसरे कैदियों के साथ नहीं भेजा जा सका था। अब उसे कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जिस जत्थे के साथ उसे जाना था, उसे गए तीन दिन हो चुके थे। कैप्टन रणजीत ने कैंप कमांडेंट से मिलने की प्रार्थना की। किन्तु कैप्टन रयाज ने यह कह कर टाल दिया कि मेजर राशिद कहीं बाहर गए हुए हैं।
रणजीत का कलेजा धक से रह गया। अचानक उसके मस्तिष्क में कई भ्रम जाग उठे। क्या उसे जानबूझकर रोक लिया गया है? आखिर इसका क्या उद्देश्य था? उसे बीमार किया गया…बेहोश किया गया और फिर कैंप में डाल दिया क्या…क्यों? क्यों? तभी एकाएक उसके विचारों ने पलटा खाया। वह तड़प उठा। मेजर रशीद उसका बिल्कुल हमशक्ल है…हम दोनों की आवाज और कई आदतें भी आपस में मिलती हैं…मैंने अपने जीवन संबंधी बहुत सी बातें मेजर रशीद को बता दी है… ऐसा तो नहीं कि यह लोग इस बात से लाभ उठायें। उसका मन ग्लानि से भर गया कि दुश्मन की चाल में आकर उसने अपने बहुत से राज़ प्रकट कर दिए थे। यह बहुत बुरा हुआ…उसे कुछ करना ही पड़ेगा। अब स्वतंत्रता अपने बलबूते और साहस द्वारा ही प्राप्त करनी पड़ेगी। यहाँ से भागने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था…लेकिन भागा कैसे जाये? इतनी कड़ी निगरानी में इसका अवसर कैसे मिल सकता है? लेकिन फिर भी वह प्रयत्न करेगा…कैंप से भागने की इतनी दृढ़ इच्छा उसके मन में पहले कभी नहीं उत्पन्न हुई थी। भागने की योजना पर विचार करने लगा। उसने सोचा कि कैंप के कर्मचारियों को इस बात का विश्वास रहना चाहिए कि वह उनकी चाल से अनभिज्ञ है।
दोपहर होते-होते रणजीत के मस्तिक में फरार होने का प्लान पूर्ण रूप से बन चुका था। जिस पुराने किले में जंगी कैदियों का कैंप था, उससे सटा हुआ अंग्रेजों के जमाने का एक फौजी बैरक था, जो इस युद्ध में हिंदुस्तानी बमबारी ने खंडहर में परिवर्तित कर दिया था। किले के क्वार्टर कैदियों के लिए गुसलखाने के लिए काम आती थीं। इस कोठरी की दीवार फोड़ कर उस खंडहर में पहुँचा जा सकता था… लेकिन इससे दीवार के उस तरफ पहरा देते हुए संतरी की नजर पड़ सकती थी। इसलिए रणजीत ने इस कोठरी की फर्श से खंडहर तक सुरंग खोदने का फैसला किया यह काम कठिन अवश्य था, किंतु जब निश्चय दृढ़ हो तो कुछ भी कठिन नहीं होता। कैदियों ने विचित्र ढंग से भागने के उसे कई उदाहरण याद थे। इस काम में वह कुछ और कैदियों को अपने साथ मिलाने में भी सफल हो गया।
रणजीत ने अपने एक मुसलमान साथी सूबेदार अली अहमद को भी अपने इस भेद में शामिल कर लिया था। सूबेदार अहमद पक्का नमाजी था और इस कारण पाकिस्तानी कर्मचारियों में प्रिय बन गया था, परंतु उसके विचार हिंदुस्तानी थे। वह एक राष्ट्रवादी मुसलमान था। कैंप के कुछ अफसरों उसे काफ़िर मोमेन कहते थे। सूबेदार अली अहमद पांचों समय नियम से नमाज पढ़ता था। कैप्टन रणजीत के कहने से अब वह इस कोठरी के दरवाजे के सामने नमाज पढ़ने लग गया था। जितनी देर तक वह नमाज पढ़ता रहता, गुसलखाने में कोई आदमी नहाने के बहाने सुरंग खोदकर रहता। पाकिस्तानी संत्री कभी नमाज व्यवधान डालने का साहस नहीं करते। जुहर की नमाज के समय रणजीत स्वयं गुसालखाने के टाइल्स उखाड़ रहा था। जमीन खोदने के लिए उसे पूरा एक घंटा मिल गया। खुदाई के लिए कोई औजार तो उनके पास था नहीं आया था। यह काम उन्होंने अपनी तामचीनी की प्लेटों के किनारे को तेज करके किया था। उनका एक साथी तो बगीचे के माली का खुरपा भी चुरा लाया था। जमीन खोजने में इससे उन्हें बहुत सहायता मिली।
अहमद ने इसी तरह असर की नमाज़ पढ़ी, फिर मगरब की और आशा की और इस इबादत के साथ साथ सुरंग तैयार होती रही।
मिलिट्री ट्रक जंगी कैदियों को लिए हिंदुस्तान की सीमा की ओर तेजी से उड़ा जा रहा था। प्रतिक्षण उन्हें अपने देश के निकट लिए जा रहा था। स्वतंत्र वातावरण में भारत माता के चरण स्पर्श करने, देश की मिट्टी की महक सुनने के लिए व्याकुल थे, परिजनों से मिलने की उत्कंठा प्रतिपल बढ़ती जा रही थी…उनके दिलों की धड़कन तीव्र होती जा रही थी। लेकिन जहाँ उन्हें स्वदेश लौटने की खुशी थी, वह इस बात की चुभन भी थी कि वह विजयी सिपाही के रूप में नहीं लौट रहे थे… कैदी हो जाने का कलंक उनके माथे पर लगा हुआ था।
इन सब अफसरों में एक रशीद ही ऐसा था जिसकी भावनायें इन सबसे भिन्न थीं… गुजरता हुआ हर क्षण उसे परीक्षा की पहली मंजिल के निकट लिए जा रहा। वह मन ही मन अपने आप को इस परीक्षा के लिए तैयार कर रहा था। दूसरे कैदियों के चेहरे पर प्रसन्नता से खिलते जा रहे थे। रसीद ध्यानपूर्वक उन्हें देख रहा था और साथ-साथ अपने गंभीर मुख पर प्रसन्नता का मुखौटा चढ़ाने का प्रयत्न कर रहा। वे लोग मुस्कुरा कर आपस में बातें करते जा रहे। जब कोई अफसर उससे बात करने लगता है, तो वह मुस्कुरा कर उंगली से संकेत से आगे बैठे पाकिस्तानी अफसर और ड्राइवर की ओर संकेत कर होठों पर उंगली रख देत। उसके इस संकेत पर साथी अफसर चुप हो जाते हैं।
ट्रक बाघा बॉर्डर पहुँचकर रुक गया। दसवीं की परीक्षा की पहली मंज़िल यही थी। उधर से भी पाकिस्तानी कैदियों का एक जत्था भी भी पहुँचा था। तबादला करने वाले अफसरों ने पाकिस्तान से आये कैदियों की जांच पड़ताल शुरू कर दी। रशीद ने उनके हर प्रश्न का नपा तुला उत्तर दिया। जब उसके कागजों की जांच हो रही थी तो अपने चेहरे की घबराहट छुपाने के लिए उसने सिगरेट मुँह में ले लिया…और ज्यों ही उसने जेब से लाइटर निकालकर उसे सुलगाने का प्रयास किया कि चेक करने वाले अफसर ने अपने लाइटर से उसका सिगरेट जलाते हुए कहा – “शायद गैस समाप्त हो चुकी है।”
“थैंक यू…” रशीद ने धुआं हवा में छोड़ते हुए कहा।
थोड़ी ही देर में यह परीक्षा समाप्त हो गई और भारतीय सेना के अफसरों ने रशीद को रणजीत समझकर स्वीकार कर लिया। यह पहली बाधा दूर होने पर रशीद के चेहरे पर संतोष की तरंग दौड़ गई और वह अपना सामान उठा कर दूसरे अफसरों के साथ उस ट्रक में जा बैठा, जो थोड़ी ही देर में उनको अपने देश की सीमा में पहुँचा देने वाला था। इस ट्रक ने दूसरे कैंपों से लाए गए कुछ और अफसर तथा जवान भी आ मिले थे। रशीद में आने वाली समस्याओं के संबंध में सोचते हुए गंभीर दृष्टि उस धरती पर डाली, जिससे वफादारी की प्रतिज्ञा करके, सिर पर कफन बांध कर घर से निकला था।
तभी कैंप एडजुटेंट कैप्टन रयाज ने आकर उसे बताया कि बीमार पड़ जाने के कारण उसे दूसरे कैदियों के साथ नहीं भेजा जा सका था। अब उसे कुछ दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जिस जत्थे के साथ उसे जाना था, उसे गए तीन दिन हो चुके थे। कैप्टन रणजीत ने कैंप कमांडेंट से मिलने की प्रार्थना की। किन्तु कैप्टन रयाज ने यह कह कर टाल दिया कि मेजर राशिद कहीं बाहर गए हुए हैं।
रणजीत का कलेजा धक से रह गया। अचानक उसके मस्तिष्क में कई भ्रम जाग उठे। क्या उसे जानबूझकर रोक लिया गया है? आखिर इसका क्या उद्देश्य था? उसे बीमार किया गया…बेहोश किया गया और फिर कैंप में डाल दिया क्या…क्यों? क्यों? तभी एकाएक उसके विचारों ने पलटा खाया। वह तड़प उठा। मेजर रशीद उसका बिल्कुल हमशक्ल है…हम दोनों की आवाज और कई आदतें भी आपस में मिलती हैं…मैंने अपने जीवन संबंधी बहुत सी बातें मेजर रशीद को बता दी है… ऐसा तो नहीं कि यह लोग इस बात से लाभ उठायें। उसका मन ग्लानि से भर गया कि दुश्मन की चाल में आकर उसने अपने बहुत से राज़ प्रकट कर दिए थे। यह बहुत बुरा हुआ…उसे कुछ करना ही पड़ेगा। अब स्वतंत्रता अपने बलबूते और साहस द्वारा ही प्राप्त करनी पड़ेगी। यहाँ से भागने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं था…लेकिन भागा कैसे जाये? इतनी कड़ी निगरानी में इसका अवसर कैसे मिल सकता है? लेकिन फिर भी वह प्रयत्न करेगा…कैंप से भागने की इतनी दृढ़ इच्छा उसके मन में पहले कभी नहीं उत्पन्न हुई थी। भागने की योजना पर विचार करने लगा। उसने सोचा कि कैंप के कर्मचारियों को इस बात का विश्वास रहना चाहिए कि वह उनकी चाल से अनभिज्ञ है।
दोपहर होते-होते रणजीत के मस्तिक में फरार होने का प्लान पूर्ण रूप से बन चुका था। जिस पुराने किले में जंगी कैदियों का कैंप था, उससे सटा हुआ अंग्रेजों के जमाने का एक फौजी बैरक था, जो इस युद्ध में हिंदुस्तानी बमबारी ने खंडहर में परिवर्तित कर दिया था। किले के क्वार्टर कैदियों के लिए गुसलखाने के लिए काम आती थीं। इस कोठरी की दीवार फोड़ कर उस खंडहर में पहुँचा जा सकता था… लेकिन इससे दीवार के उस तरफ पहरा देते हुए संतरी की नजर पड़ सकती थी। इसलिए रणजीत ने इस कोठरी की फर्श से खंडहर तक सुरंग खोदने का फैसला किया यह काम कठिन अवश्य था, किंतु जब निश्चय दृढ़ हो तो कुछ भी कठिन नहीं होता। कैदियों ने विचित्र ढंग से भागने के उसे कई उदाहरण याद थे। इस काम में वह कुछ और कैदियों को अपने साथ मिलाने में भी सफल हो गया।
रणजीत ने अपने एक मुसलमान साथी सूबेदार अली अहमद को भी अपने इस भेद में शामिल कर लिया था। सूबेदार अहमद पक्का नमाजी था और इस कारण पाकिस्तानी कर्मचारियों में प्रिय बन गया था, परंतु उसके विचार हिंदुस्तानी थे। वह एक राष्ट्रवादी मुसलमान था। कैंप के कुछ अफसरों उसे काफ़िर मोमेन कहते थे। सूबेदार अली अहमद पांचों समय नियम से नमाज पढ़ता था। कैप्टन रणजीत के कहने से अब वह इस कोठरी के दरवाजे के सामने नमाज पढ़ने लग गया था। जितनी देर तक वह नमाज पढ़ता रहता, गुसलखाने में कोई आदमी नहाने के बहाने सुरंग खोदकर रहता। पाकिस्तानी संत्री कभी नमाज व्यवधान डालने का साहस नहीं करते। जुहर की नमाज के समय रणजीत स्वयं गुसालखाने के टाइल्स उखाड़ रहा था। जमीन खोदने के लिए उसे पूरा एक घंटा मिल गया। खुदाई के लिए कोई औजार तो उनके पास था नहीं आया था। यह काम उन्होंने अपनी तामचीनी की प्लेटों के किनारे को तेज करके किया था। उनका एक साथी तो बगीचे के माली का खुरपा भी चुरा लाया था। जमीन खोजने में इससे उन्हें बहुत सहायता मिली।
अहमद ने इसी तरह असर की नमाज़ पढ़ी, फिर मगरब की और आशा की और इस इबादत के साथ साथ सुरंग तैयार होती रही।
मिलिट्री ट्रक जंगी कैदियों को लिए हिंदुस्तान की सीमा की ओर तेजी से उड़ा जा रहा था। प्रतिक्षण उन्हें अपने देश के निकट लिए जा रहा था। स्वतंत्र वातावरण में भारत माता के चरण स्पर्श करने, देश की मिट्टी की महक सुनने के लिए व्याकुल थे, परिजनों से मिलने की उत्कंठा प्रतिपल बढ़ती जा रही थी…उनके दिलों की धड़कन तीव्र होती जा रही थी। लेकिन जहाँ उन्हें स्वदेश लौटने की खुशी थी, वह इस बात की चुभन भी थी कि वह विजयी सिपाही के रूप में नहीं लौट रहे थे… कैदी हो जाने का कलंक उनके माथे पर लगा हुआ था।
इन सब अफसरों में एक रशीद ही ऐसा था जिसकी भावनायें इन सबसे भिन्न थीं… गुजरता हुआ हर क्षण उसे परीक्षा की पहली मंजिल के निकट लिए जा रहा। वह मन ही मन अपने आप को इस परीक्षा के लिए तैयार कर रहा था। दूसरे कैदियों के चेहरे पर प्रसन्नता से खिलते जा रहे थे। रसीद ध्यानपूर्वक उन्हें देख रहा था और साथ-साथ अपने गंभीर मुख पर प्रसन्नता का मुखौटा चढ़ाने का प्रयत्न कर रहा। वे लोग मुस्कुरा कर आपस में बातें करते जा रहे। जब कोई अफसर उससे बात करने लगता है, तो वह मुस्कुरा कर उंगली से संकेत से आगे बैठे पाकिस्तानी अफसर और ड्राइवर की ओर संकेत कर होठों पर उंगली रख देत। उसके इस संकेत पर साथी अफसर चुप हो जाते हैं।
ट्रक बाघा बॉर्डर पहुँचकर रुक गया। दसवीं की परीक्षा की पहली मंज़िल यही थी। उधर से भी पाकिस्तानी कैदियों का एक जत्था भी भी पहुँचा था। तबादला करने वाले अफसरों ने पाकिस्तान से आये कैदियों की जांच पड़ताल शुरू कर दी। रशीद ने उनके हर प्रश्न का नपा तुला उत्तर दिया। जब उसके कागजों की जांच हो रही थी तो अपने चेहरे की घबराहट छुपाने के लिए उसने सिगरेट मुँह में ले लिया…और ज्यों ही उसने जेब से लाइटर निकालकर उसे सुलगाने का प्रयास किया कि चेक करने वाले अफसर ने अपने लाइटर से उसका सिगरेट जलाते हुए कहा – “शायद गैस समाप्त हो चुकी है।”
“थैंक यू…” रशीद ने धुआं हवा में छोड़ते हुए कहा।
थोड़ी ही देर में यह परीक्षा समाप्त हो गई और भारतीय सेना के अफसरों ने रशीद को रणजीत समझकर स्वीकार कर लिया। यह पहली बाधा दूर होने पर रशीद के चेहरे पर संतोष की तरंग दौड़ गई और वह अपना सामान उठा कर दूसरे अफसरों के साथ उस ट्रक में जा बैठा, जो थोड़ी ही देर में उनको अपने देश की सीमा में पहुँचा देने वाला था। इस ट्रक ने दूसरे कैंपों से लाए गए कुछ और अफसर तथा जवान भी आ मिले थे। रशीद में आने वाली समस्याओं के संबंध में सोचते हुए गंभीर दृष्टि उस धरती पर डाली, जिससे वफादारी की प्रतिज्ञा करके, सिर पर कफन बांध कर घर से निकला था।