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राजमाता कौशल्यादेवी

चुंबन, स्तन मर्दन और मदनमणि की रगड़... तीन तरफा हमले से चन्दा ध्वस्त हो गई... थरथराते हुए उसकी साँवली चुत ने फव्वारा दे मारा... उसके घुटने कमजोर पड़ गए... अपने शरीर का सारा भार उसने पीछे खड़े शक्तिसिंह पर डाल दिया... समय पर शक्तिसिंह ने सहारा न दिया होता तो वह जमीन पर गिर जाती... इतना धमाकेदार स्खलन हुआ चन्दा का!!!

उस ज्वालामुखी जैसे स्खलन से संभल रही चन्दा के गोल मजबूत चूतड़ों के बीच शक्तिसिंह अपना तगड़ा लंड रगड़े जा रहा था... चन्दा तो चरमसीमा पर पहुँच गई पर शक्तिसिंह अभी भूखा था... और अब उतावला भी हो चला था।

बिना ज्यादा वक्त जाया किए, शक्तिसिंह ने अपने थूक से लंड के टोपे को गीला किया... और अपनी मूल योजना को अमल में लाने की शुरुआत की।

चन्दा के चूतड़ों के बीच उसने लंड रखकर धक्का लगा दिया...

पराकाष्ठा के नशे में अभी भी झूम रही चन्दा को सहसा एक झटका लगा.. शक्तिसिंह का सुपाड़ा उसकी गांड के छेद पर मजबूती से दस्तक दे रहा था.. उसकी दोनों बाहों को शक्तिसिंह ने इतनी सख्ती से पकड़ रखा था की वह हिल भी नही पा रही थी...

"क्या कर रहा है मूर्ख? निकाल अपना लिंग वहाँ से... में मुड़ जाती हूँ... फिर जितना मन करें आगे डालते रहना"

"नहीं चन्दा... तू थोड़ी सी धीरज धर...और मुझे पीछे से प्रवेश करने दे... फिर देख... की कितना आनंद आता है... "

"नही नही शक्ति... पीछे मत डाल... आगे के छिद्र में जितनी बार चाहे उतनी बार करने दूँगी" चन्दा छटपटाई... बात करते करते भी शक्तिसिंह सुपाड़े को उसके छेद के अंदर धकेल रहा था

"देख चन्दा... तूने मुझे वचन दिया था... की मुख मैथुन के अलावा में जो चाहे कर सकता हूँ... अब मुकर मत जा... " शक्तिसिंह के सुपाड़े ने चन्दा की गांड के छेद को फैलाना शुरू कर दिया था...

चन्दा विवश हो गई... वह अपने वचन का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध थी...

"ठीक है... कर ले अपनी मनमानी... " चन्दा ने हथियार डाल दिए...

"तू थोड़ा सा झुक जा... और पैर फैला ले... तो प्रवेश करने में आसानी होगी.. और हाँ... थोड़ा बहोत दर्द होगा तो सह लेना... " शक्तिसिंह को अब अपनी मंजिल बड़ी ही करीब नजर आई।

चन्दा अपने घुटनों पर हथेलियाँ टिकाती हुई झुक गई और अपने पैरों को भी फैला लिया... अब शक्तिसिंह की राह आसान हो गई... उसने एक धक्के में आधा लंड चन्दा की गांड में डाल दिया...

दाँत भींचकर चन्दा ने अपनी चीख को रोका... उसे काफी पीड़ा हो रही थी पर उसकी सहनशक्ति गजब की थी... तालिम के दौरान हर तरह के दर्द को सहने की वह अभ्यस्त हो गई थी... हालांकि वह यह तय नही कर पाई की इस तरह का संभोग करने में आनंद कैसे आएगा...!!

शक्तिसिंह ने चन्दा की गांड में धीरे धीरे धक्के लगाना शुरू कर दिया... उसकी गुदा की मांसपेशिया इतनी कसी हुई थी की उसका दबाव मुश्किल से बर्दाश्त हो पा रहा था... शक्तिसिंह ने झुकी हुई चन्दा की चूचियों को दबाना शुरू कर दिया... चन्दा अपनी गांड में हो रही जलन को सहती जा रही थी... उसका अनुमान था की शायद कुछ देर बाद या तो दर्द कम हो जाएगा या तो उसे आदत हो जाएगी... जो भी हो, फिलहाल अपना वचन पालने के लिए उसे इस अवस्था से गुजरना आवश्यक था...

स्तनों को और चूचकों को मसलने के कारण चन्दा फिर से ताव में आने लगी। अब वह खुद अपने दाने को एक हाथ से रगड़ने लगी.. पहले से द्रवित चुत में अब उसने अपनी एक उंगली अंदर बाहर करना शुरू कर दिया...

चन्दा का बदन अब हवस से तपने लगा... अपनी गांड पर हो रहे प्रहारों को अनदेखा कर वह अपनी चुत में अंदर बाहर हो रही उंगली से मिल रहें आनंद पर ध्यान केंद्रित करने लगी... उसकी चुत के रस से लसलसित उंगली बड़ी ही आसानी से अंदर बाहर हो रही थी... उत्तेजना से उसकी निप्पलें काफी सख्त हो गई थी... उंगली करते करते वह बुरी तरह हांफ रही थी... और पीछे शक्तिसिंह तेजी से उसकी गांड में अपना लंड अंदर बाहर कर रहा था।

उंगली करने के कारण वह फिर से स्खलित होने के कगार पर आ गई... एक जोर की कराह मारकर वह झड गई और उस स्खलन के कारण उसके शरीर की माँसपेशियाँ बेहद तंग हो गई... शक्तिसिंह के लंड पर इतना दबाव पड़ा की वह न चाहते हुए भी स्खलित हो गया... चन्दा की गांड का अंदरूनी हिस्सा गुनगुने वीर्य से लसलसित हो गया... चन्दा ने एक कदम आगे बढ़ाया... और शक्तिसिंह का लंड पुचुक की आवाज करते हुए उसकी गांड से निकल गया... थकी हुई चन्दा, वहीं जमीन पर ढेर हो गई..

हांफ रही चन्दा की बगल में शक्तिसिंह भी आराम से लेट गया... आसमान के तारे गिनते हुए कब दोनों की आँख लग गई पता ही न चला..

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उंगली करने के कारण वह फिर से स्खलित होने के कगार पर आ गई... एक जोर की कराह मारकर वह झड गई और उस स्खलन के कारण उसके शरीर की माँसपेशियाँ बेहद तंग हो गई... शक्तिसिंह के लंड पर इतना दबाव पड़ा की वह न चाहते हुए भी स्खलित हो गया... चन्दा की गांड का अंदरूनी हिस्सा गुनगुने वीर्य से लसलसित हो गया... चन्दा ने एक कदम आगे बढ़ाया... और शक्तिसिंह का लंड पुचुक की आवाज करते हुए उसकी गांड से निकल गया... थकी हुई चन्दा, वहीं जमीन पर ढेर हो गई..

हांफ रही चन्दा की बगल में शक्तिसिंह भी आराम से लेट गया... आसमान के तारे गिनते हुए कब दोनों की आँख लग गई पता ही न चला..

भोर की पहली किरण आँखों पर पड़ते ही, शक्तिसिंह की नींद खुली... वह आँखें मलते हुए बैठ गया... उसकी बगल में पूर्ण नग्नावस्था में चन्दा, घोड़े बेचकर सो रही थी... उसने हड़बड़ाकर चन्दा को जगाया.. अंगड़ाई लेकर जागी चन्दा ने शक्तिसिंह को कंधों से अपने ऊपर खींच लिया और जमीन पर फिर से लेट गई।

"क्या कर रही है री तू? छावनी पर चलना नही है क्या? सब के जागने से पहले अगर हम वहाँ नही पहुंचे तो लेने के देने पड़ जाएंगे..!! चल छोड़ मुझे... और कपड़े पहन ले..." शक्तिसिंह अपने आप को चन्दा की गिरफ्त से छुड़ाते हुए बोला

उसकी बात को अनसुना कर, चन्दा ने फिर से शक्तिसिंह को अपनी छातियों की ऊपर खींच लिया

"शक्ति.. रात को तूने पीछे से हमला कर मुझे थका दिया.. पर में तो अभी भी प्यासी हूँ" अपनी चुत की ओर इशारा करते हुए चन्दा ने कहा

"तेरी प्यास फिर कभी बुझा दूंगा... अभी इसके लीये वक्त नहीं है" शक्तिसिंह फिर से उठने लगा..

चन्दा एकदम से चीते की तरह झपटी और शक्तिसिंह को जमीन पर गिराकर उस पर सवार हो गई..

"दृष्ट.. तूने अपना लिंग ठंडा कर लिया.. और अब मेरी आग बुझाने के लिए तेरे पास वक्त नहीं है... में तुझे ऐसे नही छोड़ूँगी" हँसते हुए चन्दा ने कहा... और फिर अपनी कठोर चूचियों को उसकी छाती पर रगड़ने लगी...

जिस बात का शक्तिसिंह को डर था वही हुआ... उसका लंड ताव में आने लगा.. फिलहाल तो लंड चन्दा के जिस्म के बोझ तले दबा हुआ था... अपने चूतड़ों तले सख्ती का एहसास होते ही चन्दा के चेहरे पर मुस्कान छा गई.. वह पीछे की तरफ हटी और शक्तिसिंह के लंड को बाहर निकाला.. दिन की रोशनी में उसका कलाई जितना मोटा लंड बड़ा ही मनोहर लग रहा था...

चन्दा ने अपने मुंह से लार निकालकर, चुत के होंठों पर मल दी... अपने चूतड़ उठाए और शक्तिसिंह के लंड पर चुत के होंठों को रख दिया... हल्का सा वज़न देने पर शक्तिसिंह का पौना लंड अंदर चला गया...

चन्दा के मुंह से आह्ह निकल गई.. इतने पुष्ट लंड को पहली बार अपनी चुत में लेकर वह सिहरने लगी... अब वक्त था तेज धक्के लगाने का... मजबूत जांघों वाली चन्दा ने ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया...

इस शक्तिशाली स्त्री को वासना से लिप्त होकर लंड पर कूदते देख शक्तिसिंह भी उत्तेजित हो गया... वह आराम से जमीन पर लेटे लेटे इस घमासान उछलकूद को दर्शक बनकर देखता रहा... साथ ही साथ वह चन्दा की चूचियों को मसलता रहा...

उस घनघोर वन की झाड़ियों में चन्दा की सिसकियाँ और कराहने की आवाज गूंजने लगी.. पेड़ की शाख पर बैठा बंदरों का झुंड, इंसानों की इस अनोखी चुदाई को बड़े ही कुतूहल से देख रहा था... चन्दा की उत्तेजना अब प्रखरता पर पहुँच रही थी... वह कामवेश में शक्तिसिंह की छाती पर चपेट लगाते जा रही थी... उसकी चुत का रस द्रवित होकर शक्तिसिंह के अंडकोशों का अभिषेक कर रहा था...

करीब दस मिनट तक अंधाधुन कुदाई के बाद भी जब चन्दा न झड़ी तब शक्तिसिंह ने अपनी उंगलियों को उसके दाने की मदद करने भेजा... वह सोते सोते चन्दा के दाने को बेरहमी से रगड़ने लगा... इस दोहरे आक्रमण के सामने चन्दा ने हथियार टेक दिए... और गुर्राते हुए वह झड़ गई.. शक्तिसिंह के जिस्म से नीचे उतरकर जैसे ही वह नीचे लेटी की शक्तिसिंह उसपर चढ़ गया... चन्दा की दोनों टाँगे फैलाते हुए उसने अपने लंड को चन्दा की गीली साँवली चुत में घुसेड़ दिया... और आनन-फानन में धक्के लगाने लगा.. १०-१२ धक्कों में ही शक्तिसिंह के अंडकोशों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर सारा वीर्य लंड के मार्ग से, चन्दा की चुत में दे मारा...

शक्तिसिंह चन्दा की छातियों पर काफी देर तक लेटा रहा... दोनों अब पूर्णतः संतृप्त हो चुके थे। कुछ देर पश्चात दोनों ने अपने वस्त्र पहने और छावनी की ओर चल दिए...

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दूसरे दिन का लंबा सफर करते हुए सूरजगढ़ की सेना शौर्यगढ़ से थोड़ी दूर, अपनी पहले से स्थापित सैन्य छावनी पर पहुंची... इस अतिरिक्त सेना को देखकर, पहले से वहाँ मौजूद सैनिकों में नया जोश भर गया... उन्मे यह विश्वास पैदा हुआ की अब वह शौर्यगढ़ को माकूल जवाब दे पाएंगे...

अतिरिक्त सेना और उनके नायकों के लिए छावनियाँ डालने का काम शुरू किया गया... सारे अश्वों को अस्तबल में विश्राम करने के लिए ले जाया गया... हाथियों को विशाल पेड़ों की छाँव में बांधा गया...

इन गतिविधियों को अपने किले के बुर्ज की खिड़की से देखते हुए, शौर्यगढ़ के राजा बलवानसिंह के ललाट पर चिंता की शिकन पड़ने लगी.. हालांकि उसे अपने किले की दीवारों की मजबूती पर और अपने सैन्य की बहादुरी पर पूरा भरोसा था... लेकिन फिर भी इस विशाल सैन्य को देखकर... और खासकर राजमाता कौशल्यादेवी की उपस्थिति के कारण, वह थोड़ी सोच में जरूर पड़ गया...

बलवानसिंह का शरीर साढ़े छह फिट के कद का बेहद भारी भरकम और मजबूत था... उस रंग एकदम काला था.. और चेहरे पर लगे चेचक के दाग उसे बेहद डरावना और कुरूप बनाते थे... वह बड़ा ही काबिल योद्धा था.. और रणभूमि में उसने कई संग्राम बड़ी विरतापूर्वक लड़कर जीते थे। शौर्यगढ़ हमेशा से ही काफी समृद्ध राज्य रहा था... पास की पहाड़ियों की तलहटी से जब सुवर्ण प्राप्त होने लगा, तब इस राज्य की संपत्ति और ताकत सौ गुना बढ़ गए.. इस सुवर्ण का उपयोग उन्होंने अपने किले को शक्तिशाली और अभेद्य बनाने के लिए किया... किले के अंदर बड़े बड़े भूगर्भ भंडार बनाए गए थे जिसमे अनाज का संग्रह किया जाता था... उन्होंने सेंकड़ों कुओं और बावरियों का निर्माण किया जिससे किले के अंदर कभी भी पानी की किल्लत न हो। कुल मिलाकर उसने एक ऐसे किले का सर्जन किया था जिसके अंदर वह सालों तक बंद रहकर भी जीवित रह सके...

जब सूरजगढ़ ने अन्य राज्यों को अपने साम्राज्य में जोड़ने की अपनी मुहिम शुरू की, तभी बलवानसिंह चौकन्ना हो गया था... शौर्यगढ़ पर हमला होने की सूरत में जो भी सावधानियाँ बरतनी आवश्यक थी, उसने परिपूर्ण कर दी। गुप्तचरों द्वारा वह सूरजगढ़ के सैन्य की पल पल की खब रखता था.. इस मुहिम की जनेता, राजमाता कौशल्यादेवी के बारे में भी उसे बहुत कुछ ज्ञात था...

इस तरफ राजमाता बिना विश्राम किए, सैन्य की तैयारियों का ब्योरा करने निकल पड़ी.. उनके सिर पर खून सवार था.. वह अब किसी भी सूरत में पीछे हटना नही चाहती थी... पिछली रात सेनापति के साथ हुई बातचीत के अनुसार, बलवानसिंह के सैन्य का संख्याबल पर्याप्त था। पर उनकी ताकत थी गेरीला युद्ध पद्धति... जब दुश्मन की अपेक्षा न हो तब... रात्री के अंधकार में... वह अक्सर छावनी पर हमला कर देते.. इसके लिए वह किले की दीवारों से रस्सियों की मदद से उतरते थे। आमने सामने की लड़ाई में भी वह सूरजगढ़ की सेना को दो बार पस्त कर चुके थे...

किले के दो द्वार थे... एक था आगे की तरफ... और दूसरा पीछे की ओर... जो अक्सर पहाड़ियों में सोने की खान की ओर जाने के लिए उपयोग में लिया जाता था.. पूरा किला पहाड़ियों से घिरा हुआ था.. और उनकी चोटियों पर सूरजगढ़ के गुप्तचर डेरा डाले बैठे थे... किले के अंदर की गतिविधियों को जानने के लिए.. हालांकि इतनी दूर से देखकर कोई ठोस जानकारी प्राप्त कर पाना अत्यंत मुश्किल था..

राजमाता अपने तंबू में वापिस लौटी... सारी स्थिति का जायजा लेने के बाद उन्हे यह परिस्थिति बड़ी गंभीर प्रतीत हुई। उन्होंने उसी शाम अपने सेनापति और सारे सेना नायकों से बात करने के हेतु से बुलाया, जिसमे शक्तिसिंह भी शामिल था...

शाम को जब राजमाता के तंबू में इकठ्ठा हुए तब सब काफी गंभीर थे... सभी के मन में यह चिंता थी की आखिर इस गढ़ को जीत कैसे जाए... सब की नजर अब राजमाता के अनुदेश और आयोजन पर टिकी हुई थी...

"सेनापति जी, बताइए... आगे किस तरह की रणनीति का गठन किया जाए?" वेधक नज़रों से देखते हुए राजमाता ने सेनापति से पूछा

"राजमाता जी, आप तो जानते है.. हमने हर तरह के हथकंडे आजमा लिए... हमारे सामने दो बड़ी समस्ये है... पहली यह की हम किसी भी तरह किले के अंदर घुस नही सकते... सात परतों से बना फौलादी दरवाजा, आगे बड़ी खाई जिसमे मगरमच्छ छोड़ रखे है... और किले की बेहद ऊंची दीवारें... अंदर घुसना नामुमकिन है... दूसरी समस्या यह है की.. वह किले के ऊपर से हम पर कड़ी नजर रखे हुए है... भूमि का यह भाग जहां पर हमारी छावनी लगी हुई है... वह काफी नीचा होने के कारण, हमारी जरा सी भी हरकत उन्हे नजर आ जाती है... वह तांक में रहते है की कब हम निष्क्रिय होकर विश्राम करने जाए... हमारी सेना पर वह रात में छापे मारकर असावधान परिस्थिति में हमला कर देते है... दो बार हमने आमने-सामने लड़ाई की... उनके सैनिक बेहद कुशल और प्रशिक्षित है... कांटे की टक्कर होने के बावजूद वह हम पर हावी हो जाते है... अब हमारा संख्याबल बढ़ गए होने से हम टक्कर जरूर दे सकते है... पर फिर भी... किले में न घुस पाने की मूल समस्या का निराकरण तो अब भी नही होगा।" लटके हुए मुंह के साथ सेनापति ने अपना संभाषण समाप्त किया

उनकी यह बात सुनकर राजमाता, बड़ी ही गहरी सोच में पड़ गई... समस्या वाकई कठिन थी... अगर किले में घुसने का कोई मार्ग नही मिलता तो शौर्यगढ़ को हराना मुमकिन नही था... उन्हे अब विद्याधर की सिखाई बातें याद आने लगी... जब प्रत्यक्ष लड़ाई का कोई परिणाम न निकले तब परोक्ष तरीके ईजाद करने चाहिए... अब इस सूरत में वह कौन सा परोक्ष तरीका हो सकता था?

"में जब सैनिकों से वार्ता कर रही थी तब एक बात मेरे ध्यान में आई.. किले में पीछे की तरफ भी एक रास्ता है.. जो पहाड़ियों की तरफ जाता है। वहाँ से हम घुसने का प्रयास क्यों नही कर सकते?" राजमाता ने पूछा

"राजमाता जी, वह रास्ता भी बंद ही रहता है... और उस तरफ भी सुरक्षा के इंतेजाम इतने ही कड़े है..." सेनापति ने कहा

"हाँ, पर उस तरफ ना तो कोई बुर्ज है और ना ही दीवार पर कोई पहरा रहता है... गुप्तचरों की सूचना के मुताबिक पिछले दो महीनों में दो बार, केवल रात के समय, उस द्वार को खोला गया था... और सैनिकों के दस्ते के साथ कुछ मजदूर सोने की खान की तरफ गए थे... अगर हम घात लगाकर उनके निकालने के वक्त पर हमला कर दे, तो हमे अंदर घुसने का रास्ता मिल सकता है" राजमाता की आँखें चमकने लगी...

"पर हमें यह कैसे पता चलेगा की द्वार कब खुलने वाला है?" सेनापति को अब भी राजमाता की योजना समझ में नही आ रही थी

"सैनिकों के एक बड़े दल को वहाँ की झाड़ियों के बीच छुपकर घात लगाए बैठना होगा... वह रात को ही द्वार खोलेंगे इसलिए हम हर रात को इंतज़ार करेंगे... तब तक.. जब तक की हमें मौका ना मिले.. इसमें कई दिन, हफ्ते या महीने बीत सकते है पर यही एक सटीक रास्ता है किले में अंदर घुसने का.. सैनिकों का दल, दिन के समय पहाड़ियों में जाकर छुप जाएगा... और रात को जंगल के रास्ते द्वार के ठीक सामने, झाड़ियों के बीच, उसके खुलने का इंतज़ार करेगा... सेनापति जी, आप तुरंत ही चुनिंदा सैनिकों का एक बड़ा दल नियुक्त करें, जो इस काम को अंजाम देने कल निकल जाएगा... " राजमाता ने आदेश देते हुए कहा

राजमाता की योजना अब सेनापति के दिमाग में उतर गई... तुरंत परिणाम मिलने की संभावना तो न थी पर आर-पार की लड़ाई में सेंकड़ों सैनिकों की जान गँवाने से यह योजना काफी बेहतर थी...

"मेरा एक सुझाव है राजमाता जी, सैनिकों के दल को रात में जंगल में चौकीदारी करनी है और सुबह होने से पहले पहाड़ियों पर चले जाना है... जंगल से पहाड़ियों पर जाने के लिए बहुत कम वक्त मिलेगा... अगर हम इस काम के लिए हमारे अश्वदल को नियुक्त करें तो बेहतर होगा... घुड़सवार तेजी से पहाड़ियों के पीछे छुप सकते है और रात को वापिस लौट सकते है... उनके दिख जाने की संभावना भी काफी कम हो जाएगी। मेरे खयाल से हमे अश्वदल के प्रमुख शक्तिसिंह के नेतृत्व में घुड़सवारों को वहाँ भेजना चाहिए"

शक्तिसिंह का उल्लेख होते ही राजमाता के पैर कमजोर पड़ गए.. अगर वह चला गया तो इस लंबे युद्धकाल में कौन उनका बिस्तर गरम करेगा? पर फिलहाल उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को कामोत्तेजना से अधिक महत्व देने की सोची...

"आपका आकलन बिल्कुल सही है.. पैदल सैनिक के मुकाबले घुड़सवार सैनिक उत्तम रहेंगे... शक्तिसिंह, तुम कल ही अपने दल के साथ किले के पीछे की तरफ नजर रखने के लिए पहुँच जाओ... पहाड़ी के पीछे तुम्हारी छावनी स्थापित कर दी जाएगी... और समय समय पर, पीछे के रास्ते से तुम्हें रसद, हथियार आदि सामग्री पहुंचा दी जाएगी"

"जैसी आपकी आज्ञा, राजमाता जी... " सिर झुकाए शक्तिसिंह ने उत्तर दिया...

सुरक्षा बैठक बर्खास्त कर दी गई...

तंबू से बाहर आकर शक्तिसिंह की नजर चन्दा को तलाश रही थी... कुछ ही दूर, एक पेड़ के नीचे बैठी वह अपने बरछे की धार निकाल रही थी। शक्तिसिंह को अपनी तरफ आता हुआ देख वह मुस्कुराने लगी...

"बैठक समाप्त हो गई?" उसने पूछा

"हाँ, मुझे और मेरे अश्वदल को किले के पीछे के जंगल में नजर रखने के लिए तैनात किया जा रहा है... दिन को पहाड़ियों के पीछे छुप जाएंगे.. और रात होते ही.. वापिस जंगल में... जब तक की दरवाजा न खुले... और हमे हमला करने का अवसर ना मिले... " शक्तिसिंह ने बताया

"मुझे भी अपने दल में क्यों नही शामिल कर लेते? में भी बढ़िया घुड़सवारी कर लेती हूँ... " शरारती आँखों के साथ चन्दा ने कहा

"तू बिना घोड़े के भी अच्छी सवारी कर लेती है... " शक्तिसिंह ने आँख मारते हुए कहा। दोनों ही हंस पड़े... चन्दा शरमा गई... आज पहली बार शक्तिसिंह ने इस कठोर युवती को शरमाते हुए देखा था... शायद कल रात के संभोग से उसमें स्त्रीयत्व जाग गया था...

"वैसे तेरा सुझाव उत्तम है... यहाँ तो युद्ध फिलहाल होने से रहा... उससे अच्छा मेरे साथ ही चल... कुछ साहस करने का मौका मिलेगा और मेरी संगत भी.. " शक्तिसिंह ने मुसकुराते हुए कहा

चन्दा ने मुसकुराते हुए आँखें झपकाकर हामी भर दी...

उस रात वापिस वो दोनों उस पत्थर के पास जा पहुंचे... जहां पिछली रात मिले थे... कल रात की घटना का पुनरावर्तन करने से पहले वह दोनों बातें कर रहे थे...

तभी एक सैनिक, शक्तिसिंह को ढूँढता हुआ वहाँ पहुँच गया

"राजमाता ने आपको याद किया है" संदेशा देकर वह लौट गया

शक्तिसिंह ने चन्दा की तरफ देखा... उसका चेहरा उदास हो गया...

"अरे पगली... अब तो हम दोनों साथ ही है ना... मन भरकर आनंद करेंगे... " शक्तिसिंह ने उठते हुए कहा

"शक्ति... चल न.. जाने से पहले एक बार... !!" चन्दा ने मायूस होकर कहा

"तू मुझे अभी निचोड़ देगी... तो वहाँ राजमाता के पास पिचके हुए थन जैसा लिंग लेकर कैसे जाऊँ? निराश मत हो... में वचन देता हूँ... आने वाली रातों में, मैं तेरी सारी इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा.... " उदास मन से चन्दा देखती ही रही और शक्तिसिंह उसकी आँखों से ओजल हो गया

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"तू मुझे अभी निचोड़ देगी... तो वहाँ राजमाता के पास पिचके हुए थन जैसा लिंग लेकर कैसे जाऊँ? निराश मत हो... में वचन देता हूँ... आने वाली रातों में, मैं तेरी सारी इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा.... " उदास मन से चन्दा देखती ही रही और शक्तिसिंह उसकी आँखों से ओजल हो गया

राजमाता के तंबू की सारी रोशनीयां बुझा दी गई थी... कोने में केवल एक दीपक जल रहा था... उस दीपक की रोशनी में भी साफ दिखाई दे रहा था की राजमाता अपने बिस्तर पर टाँगे फैलाए लेटी हुई थी।

शक्तिसिंह ने बिस्तर तक पहुँचने से पहले ही अपना ऊपरी वस्त्र उतार फेंका और धोती की गांठ खोल दी। अब वह पूर्णतः नग्न होकर राजमाता के बिस्तर के करीब जा पहुंचा।

वह अपने कूल्हों पर हाथ रखकर और चेहरे पर मुस्कुराहट लेकर खड़ा रहा और इंतजार करता रहा। राजमाता मखमली चिकने बिस्तर पर आगे की ओर बढ़ी और उसके लिंग के उभरे हुए सिरे को अपने मुँह में ले लिया। धीरे-धीरे उसने अपना मुंह, लंड के निचले हिस्से को अपनी जीभ से चाटते हुए चलाया, जब तक कि शक्तिसिंह के झांट के बाल उनके होंठों तक नहीं पहुंच गए। लंड चूसते हुए अपनी आँखों में कुटील मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा। हमेशा से शक्तिसिंह को यह बात चकित कर देती थी की कितनी आसानी से राजमाता उसका पूरा लंड निगल जाती थी!!

अपने हाथ कूल्हों से हटाकर राजमाता के रेशमी काले बालों को सहलाने लगा और राजमाता अपनी जीभ से उसके लंड के निचले हिस्से को सहलाती रही। शक्तिसिंह ने अचानक अपने दोनों हाथों से राजमाता का सिर पकड़ लिया और बड़ी बेरहमी से उसे अपने लंड पर आगे-पीछे करने लगा। राजमाता कराहने लगी लेकिन अपनी जीभ से लंड के निचले हिस्से चाटती रही क्योंकि शक्तिसिंह की बढ़ती उत्तेजना ने तेजी से उसके धक्कों की गति बढ़ा दी। अचानक, एक लम्बी चीख के साथ शक्तिसिंह झड़ गया। वीर्य के फव्वारे ने राजमाता का कंठ गीला कर दिया।वह जितना निगल सकती थी, निगल गई लेकिन आज काफी ज्यादा मात्रा में वीर्यस्त्राव हुआ था और वह अतिरिक्त वीर्य, राजमाता के मुंह से छलक कर उनकी ठुड्डी और छाती पर रिस गया।

अपना मुरझाया हुआ लंड, शक्तिसिंह ने वापस राजमाता के मुँह में डाल दिया।

आज न तो दोनों के बीच कोई संवाद हुआ और ना ही कोई शरारत... शायद युद्धभूमि में होने के एहसास ने राजमाता को गंभीर कर दिया था.. और शायद उसी कारण शक्तिसिंह ज्यादा आक्रामक बन गया था... किसी और दिन राजमाता, शक्तिसिंह को यूं मनमानी नही करने देती और खुद ही संभोग का संचालन करती.. पर आज का माहोल अलग था...

राजमाता ने उसके लंड को ज़ोर-ज़ोर से तब तक चूसा जब तक कि वह फिर से सख्त नही हो गया। लंड कडा होते ही, शक्तिसिंह ने एक झटके से राजमाता के मुंह को अपने लंड से अलग किया और उन्हे बड़े बिस्तर पर पटक दिया। अब उसने राजमाता की ढीले घाघरे को ऊपर उठाया और उनका झांटेदार भोंसडा उजागर हो गया। बिना कोई विलंब किए वह राजमाता पर चढ़ गया।

"आज आपको ऐसा चोदूँगा की आप बड़े लंबे काल तक याद रखेंगी!!" जैसे ही उसने अपना लंड राजमाता की गर्म और गीली योनी में डाला, उनके जिस्म में एक गरम झुरझुरी सी चल गई। शक्तिसिंह के इस आवेश को वह समझ नही पा रही थी.. कल वह लंबे अरसे तक उनसे दूर जाने वाला था इसलिए कसर पूरी कर रहा था... या फिर कुछ और कारण था.. जो भी हो... राजमाता को बड़ा ही मज़ा आ रहा था इसलिए वह शक्तिसिंह के निर्देश का पालन करती गई।

शक्तिसिंह ने अपना चेहरा नीचे किया और राजमाता के होठों को चूमा और फिर अपनी जीभ उनके मुँह में डाल दी और जैसे ही उसने अपनी जीभ को उसकी जीभ से मिलाया, उसने अपने लंड के धक्के के साथ उसे समय-समय पर अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया।

फिर उसने राजमाता को बेरहमी से चोदना शुरू कर दिया। उसने अंदर-बाहर उनके भोसड़े पर बुरी तरह से तब तक प्रहार किया जब तक कि वह दर्द से चिल्ला नहीं उठी। राजमाता की चिल्लाहट सुनकर शक्तिसिंह का जोश उतर गया। उसने धक्के लगाना रोक दिया

"आपको दर्द हुआ राजमाता?" चिंतित शक्तिसिंह ने पूछा

"बकवास बंद कर.. और चोदना जारी रख... मूर्ख" कराहते हुए राजमाता ने कहा... उन्हे इस पीड़ा में भी बेहद मज़ा आ रहा था और इस अंतराल को वह बर्दाश्त न कर पाई

वह गुर्राती रही और पूरी ताकत के साथ अपने चूतड़ उठाकर धक्के लगाती रही, अपनी जांघों को उन्होंने पूरा फैला दिया था ताकि शक्तिसिंह का लंड ज्यादा से ज्यादा अंदर तक वार कर सके। शक्तिसिंह ने अपना चेहरा राजमाता के कोमल चेहरे पर रगड़ा, और बारी-बारी से उनके चेहरे को चाटा। अब वह थोड़ा स नीचे पहुंचा और राजमाता की कढ़ाईदार रेशमी चोली को एक ही झटके में फाड़ दिया। उनके गुलाबी निप्पलों को पागलों की तरह चूसने लगा। अतिरिक्त उत्तेजना से कराहती हुई राजमाता अपने चरमसुख तक पहुंच गई। और स्खलित होते होते उन्होंने अपनी जांघों की कुंडली में शक्तिसिंह के लंड को ऐसे फसाया की वह भी कांपते हुए झड़ गया। राजमाता की चुत, शक्तिसिंह के पौष्टिक तरल पदार्थ से भर गई थी, और अब भी वह उसके विशाल लंड को लयबद्ध तरीके से निचोड़ रही थी।

शक्तिसिंह निढाल हो कर राजमाता के स्खलन के नशे के उतरने का इंतजार कर रहा था। उनकी चुत की माँसपेशियाँ स्खलन के कारण अकड़ गई थी और शक्तिसिंह का लंड फंस गया था। अपने लंड को चुत से बाहर निकालने में असमर्थ होने के कारण वह लेटे लेटे उनकी निप्पलों को चबाता रहा.. तब तक चूसता रहा जब तक अंततः राजमाता की चुत ने उसके विशाल लंड को छोड़ नहीं दिया।

दो बार झड़ने के बावजूद शक्तिसिंह का लंड बैठने का नाम ही नही ले रहा था... उसने राजमाता को अपने हाथों और घुटनों के बल पलट दिया और वह उनके पीछे बिस्तर पर चढ़ गया और अपने घुटनों को उनके घुटनों के साथ मिला दिया।

शक्तिसिंह ने हौले से राजमाता के नितंबों को अलग किया और वहाँ उसका सिकुड़ा हुआ गुलाबी असुरक्षित द्वार नजर आते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने अपने हाथों पर थूका और राजमाता की गाँड़ के छिद्र की मांसपेशियों को महसूस करते हुए थूक को छेद के चारों ओर घुमाया। अचानक राजमाता की गाँड़ का छिद्र सिकुड़ गया, और उस कसाव को अपनी उंगली पर महसूस कर वह रोमांचित हो गया।

उसने अपनी तर्जनी को छेद पर रखा और धीरे-धीरे उसे अंदर धकेला जब तक कि उनका छेद फिर से शिथिल न हो गया। अब उसने अपनी दूसरी उंगली अंदर डाल दी। राजमाता भी इन एहसासों को बड़े ही मजे से महसूस कर रही थी। शक्तिसिंह ने उन्हे धीरे-धीरे अपनी गांड के छेद को भरने की अनुभूति का आदी बना दिया। राजमाता अब उस कगार पर आ गई थी की वह चिल्लाकर कहना चाहती थी कि शक्तिसिंह उसके लंड को अपनी गुदा में घुसाए, पर वह अपनी गांड मराने की तड़प को जताना नही चाहती थी।

अब शक्तिसिंह ने अपनी उँगलियाँ हटाईं, अपने लंड पर थूका और फिर उसकी गांड के छेद पर भी थूका और फिर अपना लंड राजमाता के उस झुर्रीदार छेद पर रख दिया। धीरे-धीरे उसने अपना शिश्नमणि अंदर घुसाय। जब उसका सुपाड़ा छेद के पार गया तो राजमाता दर्द से कराह उठी।

पर इस बार शक्तिसिंह ने निश्चय कर लिया था की राजमाता कितना भी चिल्लाए, वह नही रुकेगा... उसने अपना आधा लंड अंदर घुसेड़ा तब राजमाता छटपटाने लगी पर फिर भी उन्होंने शक्तिसिंह को नही रोका... इस दर्द से कैसे आनंद उठाते है, वह शायद सिख चुकी थी।

आख़िरकार उसने अपना पूरा लंड अंदर घुसा दिया और फिर अंदर बाहर करना शुरू किया। मंत्रमुग्ध होकर वह लंड को आते जाते देखता रहा। बाहर निकालते वक्त उसका लंड तब तक फिसलता रहा जब तक कि केवल उसका सुपाड़ा ही उसमें नहीं फंसा रह गया। वह एक पल के लिए रुका और फिर लंड को जोर से अंदर घुसा दिया, इसबार राजमाता की वास्तविक चीख निकल गई। राजमाता की गांड पर उसने लगातार हमला करना शुरू कर दिया, उनके सिर को जबरदस्ती पकड़कर उनकी गर्दन के पिछले हिस्से को काटने लगा। इस स्थिति से संतुष्ट नहीं होने पर उसने राजमाता को पेट के बल लिटा दिया और उनकी गांड को धमाधम पेलने लगा। । राजमाता के चेहरे पर वासना से भरे भाव उसे और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए उत्साहित कर रहे थे।

ताव में आकर जबरदस्त धक्के लगाते हुए शक्तिसिंह तीसरी बार झड़ गया... राजमाता की गांड को पावन कर उसने अपना लंड बाहर खींचा और उनके बगल में लाश की तरह ढल गया...

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ताव में आकर जबरदस्त धक्के लगाते हुए शक्तिसिंह तीसरी बार झड़ गया... राजमाता की गांड को पावन कर उसने अपना लंड बाहर खींचा और उनके बगल में लाश की तरह ढल गया...

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दूसरे दिन की सुबह शक्तिसिंह का दल पहाड़ियों की तरफ निकल गया... साथ में चन्दा भी थी।

अपने बिस्तर पर अब तक सो रही राजमाता की जब आँख खुली तब उन्हे एहसास हुआ की उनका एक एक अंग दर्द कर रहा था.. शक्तिसिंह ने कल उनके तीनों छेद की बराबर मरम्मत जो की थी!!! उसे मीठे दर्द का अनुभव करते हुए वह उठी और अपने नित्यक्रम से फारिग होकर तैयार हो गई।

उनका ध्येय था.. किसी भी तरह बलवानसिंह को अपने घुटनों पर लाना... अब तक सारी मूहिमो मे उन्हे विद्याधर की सलाह कारगर होती मालूम हुई... उसके सिखाए तरीके सटीक थे... और इस बार भी वह वहीं सारे हथकंडे आजमाने वाली थी...

किले को फतह करने के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य था वह था किले के अंदर प्रवेश पाना... जैसे की पहले बैठक में विचार हुआ था... आगे के द्वार से प्रवेश करना मुमकिन नही था... पीछे के द्वार पर शक्तिसिंह का दल घात लगाए बैठा था... पर उसमे कितना वक्त लगेगा, कहना मुश्किल था।

राजमाता के खुराफाती दिमाग को एक और तरीका सुझा.... सेनापति को तुरंत बुलावा भेजकर वह तंबू में पहुंची

सेनापति हाजिर हुए...

"जी राजमाता जी... आपने याद किया?" सेनापति ने पूछा

"में सोच रही थी... क्यों न हम किले के अंदर तक एक सुरंग खोद दे? दीवार का काफी हिस्सा जंगल से सटा हुआ है... पेड़ों की आड़ में हमारे सैनिक एक सुरंग खोद देंगे तो हम आसानी से अंदर घुस सकते है.. "

"योजना काफी अच्छी है... इससे हम बिना वक्त गँवाए किले को फतह कर सकते है.. में अभी नायकों को सूचित कर, इस कार्य की शुरुआत करवाता हूँ... "

"पर ध्यान रहे, सुरंग खोदने का स्थान ऐसा हो जहां किले की दीवार के ऊपर से कुछ नजर न आता हो.. और हमारे सैनिक बेझिझक इस काम को अंजाम दे सके"

"जैसी आपकी आज्ञा, राजमाता जी" सलाम करते हुए सेनापति लौट गए

रात की थकान से अब तक उभर नही पाई थी राजमाता... सैन्य का संचालन और योजना का व्यवस्थापन, मानसिक रूप से थका देने वाला कार्य था.. असल में तो यह कार्य महाराज कमलसिंह को खुद संभालना चाहिए था.. यह सब ज़िम्मेदारियाँ तो राजा का मूल कर्तव्य था। पर अईयाश महाराज हमेशा से इस उत्तरदायित्व से बचते रहे थे.. इसीलिए आखिर राजमाता को यह पदभार संभालना पड़ा..

राजमाता अपने बिस्तर पर करवट लेटकर विश्राम करने लगी.. अपनी जांघों को रगड़ते हुए, कल रात शक्तिसिंह के लगाए हुए मजबूत धक्कों को याद करते हुए उनकी आँख लग गई।

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केवल ५ दिनों में सैनिकों ने सुरंग अंदर थक खोद दी थी... दिन रात काम चलता रहा.. अब किले तक पहुँचने में थोड़ी सी खुदाई ही बाकी थी.. वह खतम होते ही अंदर तक जाने का रास्ता खुल जाने वाला था। अंदर प्रवेश करने के लिए रात का समय तय किया गया... सेना की एक बड़ी टुकड़ी अंदर घुस कर हमला करने के लिए सज्ज थी.. सेनापति स्वयं उस दस्ते का नेतृत्व कर रहे थे।

खुदाई कर रहे सैनिकों का दल अंदर आखिरी चरण खतम करने अंदर पहुचे.. बाहर खड़ी सेना बेसब्री से उनके इशारे का इंतज़ार कर रही थी। तभी एक प्रचंड विस्फोट हुआ... सुननेवालों को कान के परदे हिल गए और उनकी रूह कांप गई!! विस्फोट के साथ सुरंग के मुख से मिट्टी का बवंडर सा उठा और साथ कई खुदाई करते सैनिक के शरीर खिलौने की तरह उछल कर बाहर आ गिरे... एक पल के लिए सब हक्के-बकके रह गए!! पता ही नही चल रहा थी की अचानक यह क्या हुआ और कैसे हुआ!!

बाहर खड़े सैनिक मलबे से घायल सैनिकों को बाहर निकालने लगी... जो सैनिक थोड़े से होश में था उसने बताया की जैसे ही खोदते हुए किले की उस तरफ निकले की वहाँ पर शौर्यगढ़ के सैनिक मौजूद थे और उन्होंने बारूद के गोले फेंककर विस्फोट किया था... एक ही पल में पूरी सुरंग ढह गई थी... और कम से कम १६ सैनिक नीचे दब चुके थे.. जिनके बचे होने की संभावना ना के बराबर थी... जो सैनिक विस्फोट के प्रभाव से उछलकर बाहर गिरे थे वह भी स्थल पर मर गए थे... जैसे तैसे घायल सैनिकों को घोड़ों पर लादकर सेना वापिस लौटी।

सेना के लौटते ही तुरंत इस घटना के बारे में तुरंत राजमाता को सूचित किया गया। सूरजगढ़ की सेना के लिए यह बहुत बड़ी नाकामयाबी थी.. सुरंग की योजना तो असफल हुई ही थी साथ ही साथ यह भी चिंता जुड़ी.. की इतनी गुप्तता के बावजूद शौर्यगढ़ के सैनिकों को पता कैसे चल गया!!

हकीकत में बुर्ज पर बैठे किले के शातिर निरीक्षकों ने सैनिकों को खुदाई की सामग्री लिए घोड़े पर जाते देख लिया था और तब से उन्हे अंदेशा था की दुश्मनी सैनिक सुरंग बनाने की फिराक में थे... उन्होंने किले की दीवार के हर कोने पर चौकसी बढ़ा दी थी.. और उसी के चलते सुरंग खुलने से पहले उनके सैनिक वहाँ पहुँच गए और बारूदी गोलों से उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।

इस योजना के असफल होने से राजमाता व्यथित हो गई। उनका दिमाग काम नही कर रहा था.. दुश्मन को हराने के सारे दावपेच नाकाम रहे थे.. बलवानसिंह को उन्होंने कम आँका था... वह बेहद शातिर और चालाक निकला... राजमाता को यह भी समझ में आ गया की पारंपरिक तरीकों से शौर्यगढ़ को झुकाना नामुमकिन सा था..

दिन पर दिन बीतते गए.. हर दूसरी रात को किले की दीवार से शौर्यगढ़ के सैनिक चुपके से आकर छावनी के अलग अलग हिस्सों पर हमला करते... तंबूओ में आग लगाते... और इससे पहले की सूरजगढ़ की सैनिक उन्हे जवाब दे... वह रस्सियाँ चढ़कर वापिस किले में चले जाते.... सेना के सैनिक तंग आ गए थे... रात की सुरक्षा के लिए १०० सैनिकों का एक दल अब पूरी रात छावनी की रक्षा करने लगा... अगली तीन रातों में किए गए हमलों को रोक दिया गया... उसके बाद वह हमले होना बंद हो गए..

इस तरफ एक हफ्ते से रोज रात को जंगल में छुपकर, शक्तिसिंह और उसका दल, किले का पिछला द्वार खुलने का इंतज़ार कर रहे थे.. अब उनकी धीरज जवाब दे रही थी... वह युद्ध के लिए उतावले हो रहे थे... पर दुश्मन सैनिक बाहर भी तो आने चाहिए...!!!

इसी बीच, पेड़ पर बैठे शक्तिसिंह को पिछले दरवाजे के ऊपर की दीवार पर मशालें जलती दिखाई दी... और दीवार के पीछे से थोड़ा शोर भी सुनाई दिया... पिछले एक हफ्ते में इस दरवाजे पर ऐसी कोई भी हरकत अब तक दिखाई या सुनाई नही दी थी... शक्तिसिंह को पक्का यकीन हो गया की द्वार खुलने वाला था...

शक्तिसिंह ने सीटी बजाकर अगल बगल के वृक्षों पर तैनात सैनिकों को आगाह कर दिया... जंगल मे तैनात अश्वसवार भी चौकन्ना हो गए।

शक्तिसिंह का अनुमान सही था... कीचुड़ कीचुड़ की आवाज के साथ किले का द्वार खुला... इशारे से शक्तिसिंह ने सबको अपने स्थान पर मुस्तैद रहने को कहा... वह चाहता था की हमला तब किया जाएँ जब दुश्मन एकदम करीब आ जाएँ...

द्वार से करीब ६० से ७० सैनिकों का दस्ता, मजदूरों के झुंड के साथ बाहर निकला... उनके बाहर निकलते ही द्वार बंद कर दिया गया.. बेहद धीमी गति से वह जंगल से गुजरते रास्ते की ओर आने लगे... शक्तिसिंह ने अपने हथियार तैयार कर लिए...

जैसे ही वह दस्ता जंगल में प्रविष्ट हुआ... रास्ते के दोनों तरफ के पेड़ों पर बैठे सैनिकों ने भाले फेंके... ऊपर की तरफ से हुए इस अचानक हमले से शौर्यगढ़ के सैनिक बोखला गए... पेड़ पर बैठे सारे सैनिक छलांग लगाकर नीचे कूद गए... और उन्होंने सैनिकों पर हमला कर दिया... शौर्यगढ़ के सैनिक संभल पाते इससे पहले घुड़सवार सैनिकों ने भी आगे और पीछे दोनों तरफ से हमला कर दिया... अब वह चारों ओर से घिर चुके थे.. और अब शुरू हुआ मौत का नंगा नाच... घुड़सवारों के साथ चन्दा दुश्मनों पर टूट पड़ी... गाजर-मुली की तरह वह एक के बाद एक सैनिकों को काटे जा रही थी... शक्तिसिंह की तलवार ने भी दुश्मनों में कहर ढा दिया... करीब १५ मिनट चले इस संग्राम में सारे दुश्मन मारे गए... शक्तिसिंह के दल ने आनंदित होकर विजयी पुकार लगाई...

यहाँ वहाँ बिखरी लाशों के बीच विजयी सैनिक विश्राम करने बैठ गए... अपना पसीना पोंछते हुए शक्तिसिंह भी एक पेड़ के तने पर बैठा था.. अपने घोड़े पर सवार चन्दा वहाँ पहुंची... घोड़े से उतरकर वह शक्तिसिंह के पास आई

"गजब का लड़ती है रे तू... " शक्तिसिंह ने चन्दा की तारीफ की... वाकई चन्दा ने अपने युद्धकौशल का जबरदस्त प्रदर्शन किया था

"मुझे कम आँकने की गलती मत करना शक्ति.. युद्धभूमि हो या बिस्तर... में सामने वाले को कहीं भी ध्वस्त करने की काबिलियत रखती हूँ" मुसकुराते हुए चन्दा ने कहा... उसके वस्त्र रक्तरंजित थे।

"मान गया आज तुझे... साक्षात रणचंडी का स्वरूप प्रतीत हो रही थी.. " शक्तिसिंह वाकई चन्दा से काफी प्रभावित हो गया था...

"तो अब आगे क्या योजना है?" चन्दा ने पूछा

"में इन सारी लाशों का ढेर किले के दरवाजे पर लगाना चाहता हूँ.. ताकि दुश्मनों को हमारे कारनामे का पता चले.. " शक्तिसिंह ने कहा

"व्यर्थ में ऐसा परिश्रम क्यों करे? मर तो गए है सारे... वापिस नही लौटेंगे तो वह खुद ब खुद समझ ही जाएंगे "

"युद्ध केवल शस्त्रों से नही होता... दुश्मन के मन पर भी वार करना आवश्यक है। जब अपने सैनिकों को इस तरह मरे हुए देखेंगे तब वह आवेश में आकर कोई न कोई गलती जरूर करेंगे... और इसी का तो हमे इंतज़ार है" शक्तिसिंह ने जवाब दिया

बिना उत्तर दिए चन्दा ने हामी भरी...

कुछ ही देर में, उन सारे मृत सैनिकों और मजदूरों को घोड़े पर लादकर, किले के पिछले दरवाजे के आगे ढेर बना दिया गया। शक्तिसिंह का दल उसके बाद तुरंत पहाड़ियों के पीछे, अपने गुप्त स्थान पर लौट गया।

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शक्तिसिंह की इस सफल मुहिम के समाचार मिलते ही राजमाता अत्यंत प्रसन्न हुई। दुश्मन को मात देने में मिली इस विजय से वह गर्व महसूस कर रही थी। बलवानसिंह को इस बार मुंह की खानी पड़ी थी... और इस बार उन्होंने शौर्यगढ़ को माकूल जवाब दिया था...

एक सप्ताह बीत चुका था... और राजमाता का जिस्म अब भोग मांग रहा था.. पर यहाँ ना ही शक्तिसिंह मौजूद था.. ना ही विद्याधर.. और उस तांत्रिक जोड़ी का यहाँ आना तो बिल्कुल ही मुमकिन नही था.. जिस्मानी भूख ने राजमाता को परेशान कर रखा था...

वह बिस्तर पर आधे से ज्यादा दिन पड़ी रहती.. और कभी कभार अपने दाने को रगड़कर तृप्त होने का प्रयास करती.. पर इससे तो उनकी इच्छा और प्रबल हो गई.. ऐसा नही था की वह हर वक्त संभोग चाहती थी लेकिन अपने मानसिक संतुलन को स्थिर रखने के लिए यह उनकी एक आवश्यकता थी।

अपने कलुषित दिमाग को शांत करने के लिए वह छावनी के इर्दगिर्द भ्रमण करने घोड़े पर बैठ कर निकली... करीब आधे घंटे तक दूर जंगल में घूमने के बाद वह छावनी पर वापिस लौट रही थी तभी उनका घोडा अजीब तरीके से पेश आने लगा... वह लगाम खींचने पर ठीक से संचालित नही हो रहा था.. कभी रुक जाता... कभी तेजी से भागने लगता... तो कभी कूद कूद कर राजमाता को नीचे गिराने की कोशिश करता... राजमाता भयभीत हो गई.. छावनी अभी कुछ दूरी पर था... और नजदीक कोई ऐसा नजर नही आ रहा था जो उनकी मदद कर सके.. डर के मारे वह चीखने लगी.. और बड़ी ही मुश्किल से घोड़े को छावनी की ओर लेकर आई... वह जल्द से जल्द उस घोड़े से उतर जाना चाहती थी... पर घोडा स्थिर खड़ा ही न रहता...

तभी एक गोरा तंदूरस्त युवक, जिसकी आयु २० साल के करीब थी, वह अस्तबल से भागता हुआ आया... उस युवक ने कुछ ही समय में उस घोड़े को पूरी तरह शांत कर दिया। युवक का शक्तिशाली शरीर था, चौड़े कंधे और पेड़ के तने जैसी जांघें थीं। ताकतवर होने के बावजूद जिस सौम्यता और संवेदनशीलता से उसने उसके घोड़े को संभाला, राजमाता उससे बेहद प्रभावित हुई। बड़ा ही संभालकर हाथ पकड़कर उसने राजमाता को घोड़े से उतरने में मदद की..

उस दिन से वह युवक, राजमाता की आँखों में बस गया... वह हररोज उससे अस्तबल में काम करते हुए देखती। जितना अधिक उसे देखती थी उतनी ही अधिक उससे चुदवाने की उनकी इच्छा बढ़ती जा रही थी। वह बेहद मजबूत और आकर्षक था। लेकिन उसकी ओर बढ़ने से पहले वह हर कदम फूँक फूँक कर रखना चाहती थी। वह अपनी वासना को अपने सुरक्षित अस्तित्व पर हावी होने देना नहीं चाहती थी।

एक दिन वह दोपहर के समय अस्तबल की ओर गई... उन्हे पता था की उस वक्त वह अकेला ही वहाँ मौजूद रहता था। वह युवक, सेनापति के घोड़े को संवारने में व्यस्त था। वह पानी डालकर, घोड़े की त्वचा को रगड़ रगड़कर साफ कर रहा था। उनके यौन छिद्रों को संतुष्ट हुए काफी समय बीत चुका था। हवस और वासना उनके गदराए जिस्म को झुलसा रहे थे।

ताव में आई राजमाता उस युवक के पीछे से उसके करीब गई और बोली... "इस घोड़े की तरह क्या मुझे भी रगड़ सकते हो?" वह मुद्दे पर आने में समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी।

वह घोड़े को साफ करने में इतना तल्लीन था कि राजमाता की आवाज़ ने उसे चौंका दिया। वह हड़बड़ाकर गिर गया और बड़ी ही बारीक दूरी से घोड़े की लात खाने से बच गया। बदन पे लगी मिट्टी साफ करते हुए वह खड़ा हुआ और अपने चेहरे पर एक मूर्खतापूर्ण दृष्टि के साथ राजमाता की ओर देखने लगा।

थोड़ा सा संभलने पर उसे राजमाता के कहने का पूरा अर्थ समझ में आया। उसने कांपते हुए राजमाता की ओर देखा - क्या वह मज़ाक कर रही थी, या क्या उसने सही सुना था की राजमाता उसे उन्हे रगड़ने के लिए कह रही थी? वह था तो बांका जवान, और हर नौजवान की तरह उसमे वह कामुकता भी थी जो जवानी के साथ जुड़ी होती है और इसलिए सामाजिक व्यवस्था में उसकी अधीनस्थ स्थिति के बावजूद, यौन उत्तेजना उसके अस्तित्व के हर अंग में लाल गर्म आग की तरह प्रवाहित हो रही थी। राजमाता के इस प्रस्ताव को सुनने भर से ही उसका लंड खड़ा हो गया था।

जिस दिन से वह राजमहल के अस्तबल की सेवा में जुड़ा था तब से वह राजमाता को दूर से देखता आया था। उनकी दैवी सुंदरता, आकर्षक शरीर, गदराया जिस्म, उनकी गतिविधियों की स्वतंत्रता, शाही शैली और मनमोहक मुस्कान... पहली नजर में ही उसे प्यार हो गया था...पर वह अपने स्तर को जानता था.. राजमाता उसके लिए पूरी तरह से अप्राप्य थी,वह केवल सम्मान में उनके सामने सिर झुकाकर आंखों के कोने से देख सकता था। इसलिए इस सुंदरता को मन ही मन पूजने के अलावा और कुछ करने के बारे में उसने सपने में भी नही सोचा था। लेकिन अब वह उनके चेहरे की कामुक अभिव्यक्ति को देखकर आश्चर्य से देखता रहा।

राजमाता ने उसके कंधों पर हाथ फेरा और उसके मजबूत हाथों को धीरे से सहलाते हुए कहा, "बड़ी मेहनत कर रहे हो इन शक्तिशाली हाथों से।"

अब राजमाता ने अपना हाथ उसके चेहरे पर फिराया, "कितना कांटेदार है तेरा चेहरा," वह बोल पड़ी। वह युवक कई दिनों से नाई के पास नहीं गया था। उनका हाथ आगे बढ़ते बढ़ते उसके कंधों पर, फिर छाती पर और फिर धीरे-धीरे दक्षिण की ओर बढ़ते हुए नीचे की ओर पहुँच गया। अब उनके अंदर वह संयम और धीरज नही बचे थे... समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं था क्योंकी चुदाई करने की लिए वह गरमाई घोड़ी की तरह पैर पटक रही थी!

राजमाता की बात सुनकर और शरीर पर उनका स्पर्श पाकर वह शर्मिंदगी से छटपटाने लगा। हाथ फेरते हुए जैसे ही राजमाता के हाथों को उसका पत्थर जैसा कठोर लिंग मिला, वह सिहर उठी

"ओह," राजमाता ने हँसते हुए कहा, "लगता है तेरे मन में भी बुरे विचार आने शुरू हो ही गए आखिर,"

राजमाता ने अपना हाथ उसके कपड़ों के अंदर सरका दिया और उसके नग्न, कड़े और तने हुए लंड को पकड़ लिया। वह हांफने लगा और लगभग बेहोश सा हो गया। उसके सपनों की देवी ने वास्तव में उसके लंड को अपने हाथ में पकड़ रखा था! वह तय नही कर पा रहा था की यह हकीकत थी या दोपहर का स्वप्न!!

जहां राजमाता का एक हाथ उसके चेहरे को सहला रहा था वहीं दूसरा हाथ उसके उग्र लंड को सहलाने में व्यस्त था। उसके लिंग को सहलाने का अपेक्षित प्रभाव पड़ा। आख़िरकार वह एक अति-कामुक युवक था और उसके सपनों की रानी उसका लंड हाथ में पकड़े हिला रही थी!! बेचारा कितना टिक पाता!! कुछ ही पलों में उसे अपने लंड में तीव्र जलन का एहसास हुआ... और वह पिचकारियाँ मारते मारते झड़ गया... उसके वीर्य से उसका शरीर और राजमाता के हाथ... दोनों ही सन गए थे...

इतनी जल्दी स्खलित हो जाने पर वह बहुत शर्मिंदा हुआ, वो वहां से भाग जाना चाहता था.. इस दिव्य सुंदरी के सामने, उसके लंड ने उसकी किरकिरी कर दी थी। लेकिन राजमाता उसके लिंग को छोड़ना ही नही चाहती थी। वह लगातार उसके वीर्य-युक्त स्खलित लंड को तेजी से हिलाते हुए उसे सिकुड़ने का मौका ही नही दे रही थी।

अब राजमाता ने उसकी पतलून को कसने वाली डोरी को खोल दिया और उसके ऊपरी वस्त्र को भी उतरवा दिया, ताकि वह उसके सामने उसी तरह नग्न खड़ा हो, जैसा की वह चाहती थी। वह करीब आई और अपने होठों को उसके होठों पर फिराया, जबकि उनके हाथ ने उसके सिर को घेर लिया और उसे अपनी तरफ मजबूती से खींच लिया। उनकी जीभ अब बाहर निकली और कामुकता से वह उसके होठों के चाटने लगी। वह युवक, शर्मिंदगी से ज्यादा सदमे के कारण हांफने लगा।

जैसे-जैसे राजमाता उसके साथ कामुकतापूर्वक खेलती रही वैसे वैसे उस युवक की प्राकृतिक कामुकता सिर चढ़कर बोलने लगी। बड़े ही अजीब तरीके से उसने राजमाता के स्तनों को टटोला। जब राजमाता ने उसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, तो वह और अधिक साहसी हो गया और उसने अपना हाथ उनकी चोली के अंदर डाल दिया और उनके नग्न स्तन को पकड़ लिया। उसने राजमाता की रबर जैसी निप्पल को महसूस किया और धीरे से चुटकी काट ली। उसके छूने भर से ही वह निप्पल एकदम कठोर होकर और ज्यादा स्पर्श की अपेक्षा करने लगी।

अब वह युवक पूरे ताव में आ गया... उसक शर्मिंदगी अब धीरे धीरे अद्रश्य होने लगी... और हवस हावी हो गई। उसने बड़ी ही हिम्मत से राजमाता के घाघरे के ऊपर से ही उनकी चुत को हथेलियों से पकड़कर महसूस किया और उस माँसपिंड को वह रगड़ता रहा...

फिर, जब राजमाता ने कोई प्रतिरोध नहीं दिखाया तब उसने राजमाता के घाघरे के अंदर अपना हाथ डाल दिया। जब उसकी उंगलियों ने शानदार शाही झांटों और मुलायम योनि होठों को महसूस किया तब उसे लगा की जैसे उसके शरीर से प्राण ही निकल जाएंगे!! और जब उसने राजमाता की कोमल मुलायम पंखुड़ियों पर उंगली घुमाई तब उनके मुँह से एक अनैच्छिक "आहहह" निकल गई।

राजमाता ने उसे उनके गुलाबी होठों को चूमने के लिए प्रेरित किया और उस युवक ने अपनी जीभ उनके मुँह में डालकर जवाब दिया। जब दोनों की जीभें एक दूसरी सी उलझी हुई थी तब वह अपनी उंगली को उनकी चुत में अंदर-बाहर कर रहा था। फिर उसने उसके चेहरे को अपने हाथों में मजबूती से पकड़ लिया और उसे तब तक नीचे की ओर धकेला जब तक कि वह उसकी जांघों में कांटे के बराबर नहीं हो गया, जैसे ही उसका मुंह उसकी जांघों तक पहुंचा, उसकी उंगली खुल गई।

राजमाता को अब इस खुले अस्तबल में इससे आगे की गतिविधियां करना सही नही लगा... उन्हों ने इशारे से उस युवक को अपने तंबू में आने के लिए कहा... अपने वस्त्र ठीक कर वह फौरन तंबू की तरफ चल दी।
 
राजमाता को अब इस खुले अस्तबल में इससे आगे की गतिविधियां करना सही नही लगा... उन्हों ने इशारे से उस युवक को अपने तंबू में आने के लिए कहा... अपने वस्त्र ठीक कर वह फौरन तंबू की तरफ चल दी।

युवक ने अपने तंग लंड को दबाकर अपनी पतलून पहन ली... ऊपर का वस्त्र चढ़ाकर, वह सब से नजर बचाते हुए, पीछे के रास्ते से राजमाता के तंबू में पहुँच गया... उसके अंदर आते ही राजमाता ने तंबू के द्वार को गांठ से बांधकर सुरक्षित कर दिया...

अब आगे कैसा बढ़ा जाए यह सोच में डूबे उस युवक का सर पकड़कर राजमाता ने उसे नीचे की ओर दबा दिया... इतने नीचे की वह लगभग जमीन पर बैठ गया... राजमाता ने दोनों हाथों से अपना घाघरा उठाया और अपना फनफनाता हुआ भोसड़ा, उसके चेहरे के सामने पेश कर दिया।

असमंजस में वह युवक मूर्ति की तरह उनकी चुत के सामने देखता ही रहा... उसे पता ही नही चल रहा थी की आगे क्या करें!! राजमाता ने नाड़ी खोलकर अपना घाघरा निकाल ही दिया... और अपनी चोली खोलकर स्तनों को मुक्त कर दिया... फिर उस घुग्गू बनकर बैठे युवक का सर पकड़कर, अपने झांटेदार भोसड़े में उसका चेहरा दबा दिया...

उस हांफ रहे कामुक युवक को पता नहीं चल रहा था कि अब उसे आगे क्या करना था!! उसके नथुने राजमाता की सुलगती चुत की गंध से भर गए। काफी अलग फिर भी बेहद मादक गंध थी। अस्थायी तौर पर उसकी जीभ ने उसकी योनि के होठों को छुआ। उसने ख़ुशी से आह भरी. इससे उन्हें आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिला। सिर्फ अंदाजे से उसने अपनी जीभ बाहर निकाली... और राजमाता की चुत के होंठों पर फेरने लगा.. राजमाता कराह उठी... और उस युवक को वैसे ही करते रहने के लिए उत्तेजित करने लगी।

राजमाता को अधिक प्रसन्न करने के लिए उत्सुक होकर वह अपनी जीभ से उनकी पूरी चुत को चाटने लगा.. चुत के होंठों को.. जंगामूल को और ऊपरी चर्बीयुक्त हिस्से को। वह धीरे-धीरे उनके मदनमणि तक पहुँच गया और फिर अपनी गरम जीभ को उनकी चुत में डाल दिया। अन्दर-बाहर और गोल-गोल तब तक घुमाता रहा जब तक की राजमाता मजे से सिहरने न लगी। इस युवक की अनुभवहीन हरकतें राजमाता को बड़ा ही अनोखा आनंद दे रही थी।

अचानक उन्होंने उसे अपनी चुत से धक्का देकर दूर कर दिया और उसे हाथ खींचकर खड़ा किया। फिर वह उसे धकेलते हुए अपने बिस्तर तक ले गई और आखिर एक धक्का देकर उसे अपने बिस्तर पर गिरा दिया।

राजमाता अब बिस्तर पर चढ़कर इस युवक के दोनों पैरों के बीच जम गई। नीचे झुककर उन्होंने उसके आधे खड़े लंड को अच्छी तरह चूसकर फिर से उसे सख्त कर दिया। युवक नौसिखिया था... राजमाता के तीन-चार बार चूसने पर ही उसके लंड तन कर खड़ा हो गया।

अब वह उस पर सवार होने लगी और उसके लंड को पकड़कर धीरे-धीरे अपनी चुत फैलाकर अंदर डालने लगी। आहहह... कठोर लंड को गरमाई चुत में अंदर लेने की वह दिव्य अनुभूति... उनकी चुत में भूचाल सा आ गया..!!

अब राजमाता ने अपने चूतड़ों खुद को ऊपर उठाया और फिर नीचे गिरा दिए, धीरे-धीरे स्थिर गति से वह उस नौजवान लंड पर उछलने लगी। वह युवक अब पूरी तरह मंत्रमुग्ध हो चुका था, उसकी इंद्रियाँ अभिभूत हो चुकी थीं। अब वह राजमाता के शरीर के और अधिक अंगों का आनंद चाहता था। उसने अपना सिर उठाकर पहले एक और फिर उनके दूसरे स्तन को दोनों हाथों से पकड़कर पागलों की तरह चूसने लगा। फिर उसने अपने हाथों से उनके नितंबों को खोज लिया और राजमाता के प्रत्येक नीचे के धक्के के साथ उन्हे अपने ऊपर खींचने लगा।

राजमाता इस संभोग की अनुभूति जितना हो सके लंबा करना चाहती थी, उस उत्तेजना और अंतरंगता का स्वाद लेना चाहती थी जो वह महसूस कर रही थी, लेकिन कई दिनों के चुदाई के अभाव के बाद मिले लंड के कारण, उनका अतिउत्साह उन पर हावी हो गया और वह एक लंबी और तेज़ कराह के साथ झड़ने लगी। उनकी चुत से निकले तरल पदार्थ की एक धार ने उस युवक को लंड को सराबोर कर दिया।

उस युवक ने मोर्चा संभाल लिया और उनके चूतड़ों को मजबूती से पकड़कर नीचे से प्रहार करने लगा। जब वह निष्क्रिय रूप से उठती थी और उसके लंड पर गिरती थी, तब भी वह उसके लंड को अपने अंदर चुभवाती थी। युवक ने उनकी भरपूर नितंबों को दोनों हथेलियों में मजबूती से दबोच लिया... राजमाता ने उसके होंठों को चूम लिया तब वह उनके मुंह की लार को शहद की तरह चूसने लगा।

नीचे से ताबड़तोड़ धक्के लगाते हुए वह लम्बी घुरघुराहट और एक चीख के साथ झड़ गया। उसके स्खलित होते ही राजमाता ने उसका लंड अपनी चुत से निकाला... बाहर निकले उस डंडे की नोक से अभी भी वीर्य की धराएं निकल रही थी... तृप्त राजमाता बिस्तर पर लेटकर हांफने लगी।

उस युवक को अपने तंबू में ज्यादा देर तक रोके रखना उन्हे ठीक नही लग रहा था... अगर वह इस मिलन को गुप्त रखेगा तो आगे भी ऐसे मौके मिलेंगे, ऐसा वचन देकर राजमाता ने उसे कपड़े पहनकर रुखसत होने को कहा... जिस रास्ते से वह आया था उसी रास्ते अस्तबल लौट गया।

और राजमाता ने अपना वादा निभाया, उचित समय और स्थानों पर उससे मिलने की व्यवस्था की। यदि कोई व्यक्ति समय और स्थान का चयन बहुत सावधानी से करता है तो उस जंगल के आस-पास के वातावरण में ऐसी कई जगहें थी, जो उनकी गुप्त मुलाकातों के लिए उत्कृष्ट थी। और राजमाता ने बड़ी ही सावधानी से यह काम किया!

उन्होंने अस्तबल के एकांत मे(दोपहर के समय जब सब का भोजन और विश्राम का समय होता था) पीछे से खड़े-खड़े चुदवाया; दोपहर की धूप की गर्मी में तंबू के बिस्तर पर, शाम के समय जंगल की झाड़ियों में... राजमाता ने अपने नग्न रूप को एक पेड़ के सामने पकड़ रखा था और अपने लंबे पैरों को उस युवक की कमर के चारों ओर लपेटकर, उछल उछलकर चुदवाया। रात के अंधेरे में, खुले मैदान में जाकर, उसके लंड को तब तक चूसा जब तक कि वह उनके खूबसूरत मुँह में झड़ नहीं गया, फिर उन्होंने पास के एक टीले के शिखर पर घास की शैया में सोये सोये भरपूर चुदाई करवाई।

चूँकि उन दोनों को समय की हमेशा कमी रहती थी इसलिए उनका मैथुन उन्मत्त होता था। वह कभी-कभी चाहती थी कि उनका प्रेम-प्रसंग अधिक आरामदायक और लंबा चले, जैसा कि शक्तिसिंह के साथ होता था। पर वह युवक अनुभवहीन था.. और राजमाता की मदमस्त सुंदरता उसे ज्यादा देर टिकने नही देती थी... इसलिए उन्हे जो कुछ भी मिल सकता था और जब भी मिलता था, वह ले लेते थे।

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शुरुआती हमले में मिली सफलता के बाद शक्तिसिंह के दल को फिर दोबारा ऐसा मौका नही मिला... दुश्मन सतर्क हो गया था... और अपने ढेरों साथियों की लाशें देखकर सकते में भी था... उस दिन के बाद कई सप्ताह बीत गए लेकिन वह द्वार दोबारा नही खुला..

इस तरफ राजमाता की छावनी में सूरजगढ़ की सेना इंतज़ार करते करते थक गई थी... वह चाहते थे के एक बार आर-पार की लड़ाई हो और उन्हे दुश्मनों को सबक सिखाने का अवसर मिलें... पर किले का अगला दरवाजा खुलने की कोई संभावना नजर नही आ रही थी। सुरंग के ढह जाने के बाद कोई नई योजना कार्यान्वित भी नही थी... ऐसी सूरत में ओर कितने दिन प्रतीक्षा में व्यतीत हो जाएंगे, उसका किसी को अंदाजा न था... ऊपर से भीषण गर्मी ने सारे सैनिकों को सुस्त कर दिया था... भोजन की रसद तो विपुल मात्रा में थी पर पानी की बड़ी ही किल्लत थी... किले के अंदर ढेर सारे कुएं और बावरियाँ थी पर किले के बाहर जल का कोई स्त्रोत नही था... हर सप्ताह सूरजगढ़ से पानी की रसद भेजी जाती थी उसी पर सब निर्भर थे... ऐसी सूरत में पानी की हर बूंद को संभालकर इस्तेमाल करना पड़ रहा था...

हररोज राजमाता और सेनापति इस बारे में विचार विमर्श करते... पर उनकी मुलाकातें किसी भी ठोस नतीजे पर नही पहुँच पाती थी... आखिरकार उन्होंने शौर्यगढ़ की सेना को उकसा कर उन्हे लड़ने पर मजबूर करने की योजना बनाई।

योजना यह थी की प्रशिक्षित तीरंदाजों को किले की दीवार के जीतने नजदीक हो सके भेजा जाएँ... वह तीरंदाज लंबी दूरी तक जा सके ऐसे बाणों से बुर्ज पर खड़े चौकीदारों को एक के बाद एक मार गिराएं... किले की दीवार के करीब लगे घने पेड़, इस कार्य के लिए उत्कृष्ट स्थान थे.. शाखों में छुपकर तीरंदाज आसानी से वार कर सकते थे।

सारा घटनाक्रम योजना के मुताबिक चलता नजर आया... रात के अंधेरे में वह तीरंदाजों ने पेड़ों पर अपना स्थान ले लिया... सुबह होते ही, किले की दीवार पर गश्त लगाते सैनिकों पर एक साथ तीर चलाए गए... कुछ ही पलों में करीब २५ सैनिकों की लाशों का अंबार लग गया... शौर्यगढ़ में अफरातफरी मच गई... कुछ ही दिन पहले वह ५० से अधिक सैनिकों को गंवा चुके थे... और आज कई सारे सैनिक हताहत हो गए..!!

बलवानसिंह का क्रोध सातवे आसमान पर पहुँच गया... अपने सेना अध्यक्ष को बुलाकर एक बड़े ही विस्तृत हमले के लिए तैयारी करने का उन्होंने आदेश दिया... हमला घातक, सटीक और निर्दयी होना चाहिए, यह उन्होंने स्पष्ट किया..

इस तरफ राजमाता भी जानती थी की अब शौर्यगढ़ की सेना जरूर हमला करेगी... सूरजगढ़ की सेना भी पूरी तरह से तैयार थी...

दूसरे दिन भोर की पहली किरण के साथ... किले की दीवार से युद्ध के बिगुल बजने की आवाज सुनाई देते ही राजमाता और उनका सैन्य सतर्क हो गए... कड़कड़ाहट की आवाज के साथ किले का मुख्य दरवाजा खुला... पहले तो उसमे से धूल मिट्टी का बड़ा सा बवंडर नजर आया... और फिर उसमे से प्रकट हुई तेज तर्रार घोड़ों पर सवार सैनिकों की सेना... उनके सैनिकों का प्रवाह, उस द्वार से निकलता ही जा रहा था... रुकने का नाम ही नही ले रहा था... सेनापति के आकलन से कई ज्यादा संख्याबल था उनका...

अलग अलग श्रेणियों में सूरजगढ़ की सेना किले की तरफ आगे बढ़ी... किले की दीवारों से अनगिनत तीर छोड़े गए... सूरजगढ़ की सेना की प्रथम दो श्रेणियों के सैनिक उन बरसते तीरों के शिकार बन गए... फिर दोनों सेनाओ में घमासान युद्ध हुआ... शाम ढलने तक सूरजगढ़ की आधे से ज्यादा सेना वीरगति को प्राप्त हो गई.. शौर्यगढ़ के सैनिकों की संख्या और उनके जुनून का सामना वह नहीं कर पाए... कई सप्ताहों की थकावट ने उनका जोश भी कम कर दिया था...

उसी रात किले का पीछे का दरवाजा भी खुला... पिछली बार के मुकाबले, इस बार सैनिकों की संख्या २० गुना थी... बाहर निकलते ही वह दस्ता तीन हिस्सों में बँट गया.. एक हिस्सा दायी ओर गया.. एक बायी ओर और एक हिस्सा सीधा जंगल में घुस गया... जंगल में पहुंचते ही शक्तिसिंह के दल ने पहले पेड़ पर बैठे बैठे हमला किया... अश्वदल ने भी मजबूत टक्कर दी.. लेकिन थोड़ी ही देर बाद दोनों तरफ गए सैनिकों के गुट ने शक्तिसिंह के दल को पूरी तरह से घेर लिया... शक्तिसिंह के दल की संख्या १०० के करीब थी जबकी दुश्मन १००० से भी ज्यादा थे...

शुरुआती हमले के बाद इतनी बड़ी संख्या में दुश्मन को देखकर शक्तिसिंह पेड़ की टहनी से नीचे कूदने ही वाला था जब उसकी टांग फिसल गई... और वह सिर के बल जमीन पर गिरा... और वहीं मूर्छित हो गया... दुश्मनों ने चारों तरफ से सिकंजा कसकर पूरे दल को बंदी बना लिया और उन्हे उठाकर वापिस किले के अंदर चले गए...

दूसरी सुबह होश में आए शक्तिसिंह ने अपने आसपास का नजारा देखकर उसे झटका लगा... कहीं पर भी उसके दल के सदस्य नजर नही आ रहे थे... अगर वह मारे गए होते तो उनकी लाशें नजर आती... और उसे छोड़कर वह छावनी में लौट गए हो ऐसा मुमकिन नही था... शक्तिसिंह को यकीन हो गया की उन्हे बंदी बनाकर ले जाया गया है... और उन सब में चन्दा भी शामिल थी...

बड़ी मुश्किल से उठे शक्तिसिंह को अपना अश्व कहीं भी नजर नही आया... उसके सर में भयानक दर्द के झटके लग रहे थे... वह काफी अशक्त भी महसूस कर रहा था... फिलहाल उसे राजमाता और सेनापति को इस दुर्घटना के बारे में सूचित करने की आवश्यकता नजर आई... पर उन तक खबर पहुंचाने का कोई माध्यम नही था... शक्तिसिंह को खुद ही यह समाचार लेकर मुख्य छावनी पहुंचना था..

जंगल के रास्ते लड़खड़ाते हुए वह जब मुख्य छावनी तक पहुंचा तब तक वह अधमरा हो चुका था... छावनी के पहले तंबू के आगे ही वह फिर से बेहोश हो गया... तुरंत उसे तंबू में ले जाकर लेटाया गया... और वैद्य के परामर्श अनुसार उसका इलाज किया गया...

शक्तिसिंह के आगमन की खबर मिलते ही राजमाता के उदास चेहरे पर चमक आ गई.. पर उसे इस अवस्था में देखकर वह काफी चिंतित हो गई... उन्हे दूसरी चिंता यह भी थी की उसके बाकी साथियों का क्या हुआ!! शक्तिसिंह के होश में आने तक उस पहेली का उत्तर नही मिलने वाला था..

करीब ३० घंटे के बाद शक्तिसिंह को होश आया... उससे सारा वृतांत जानकर सभी को गहरा सदमा पहुंचा... इतने सारे सैनिक अब दुश्मन की गिरफ्त में थे... और इस खेमे के आधे से ज्यादा सैनिक मर चुके थे... स्थिति काफी गंभीर थी।

एक दिन पश्चात, शक्तिसिंह और राजमाता उनके तंबू के बिस्तर पर बैठे हुए थे... यह पहली बार था की रात्री के समय, तंबू के एकांत में, दोनों बिस्तर पर बैठे हो... और दोनों मे से किसी के भी मन में संभोग या उससे जुड़े कोई विचार न चल रहे हो... होश में आने के बाद शक्तिसिंह ज्यादा कुछ बोल नही रहा था... अगर कुछ बोलता या पूछता तो राजमाता के पास उसका कोई उत्तर नही था..

"राजमाता जी, आप से विनती है... की मुझे मेरे साथीयों को छुड़ाने के लिए जाने की अनुमति दीजिए" शक्तिसिंह ने हाथ जोड़कर कहा

"कैसे छुड़ाएगा तू उनको? कोई योजना है तेरे पास?" राजमाता ने पूछा

"में रात्री के समय रस्सियों के सहारे किले की दीवार चढ़कर अंदर जाऊंगा... कुछ भी कर उन्हे ढूंढ निकालूँगा" शक्तिसिंह बावरा हो गया था

"पागलों जैसी बात मत कर... अंदर घुस भी गया तो अकेले तू कर भी क्या पाएगा? में तुझे इस तरह मौत के मुंह में जाने की अनुमति नही दे सकती"

शक्तिसिंह बिस्तर से उतरकर राजमाता के पैरों में गिर गया... उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे...

"में अब और बर्दाश्त नही कर सकता... में मर भी जाऊँ तो मुझे मंजूर है.. पर बिना कुछ प्रयास किए में अपने दल को उस दृष्ट के हाथों मरने के लिए छोड़ नही सकता... में आपसे भीख माँगता हूँ... मुझे जाने दीजिए" शक्तिसिंह अब फुटफुट कर रोने लगा...

राजमाता ने शक्तिसिंह को अपने पैरों से उठाया और वापिस बिस्तर पर बैठा दिया

"मूर्ख मत बन... हम हमारे सैनिकों को छुड़ाएंगे... में कोई न कोई तरीका ढूंढ निकालूँगी... फिलहाल तू जा और विश्राम कर..."

उदास शक्तिसिंह सुस्त कदमों से चलते हुए तंबू से बाहर चला गया..

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दूसरे दिन सुबह, राजमाता ने सेनापति और शक्तिसिंह दोनों को अपने तंबू में बुलाया... दोनों ही के मन में अनगिनत प्रश्न उठ रहे थे...

तंबू में पहुंचते ही सेनापति ने राजमाता के सामने रखी कुर्सी पर स्थान ग्रहण किया... शक्तिसिंह वहीं मूरत की तरह खड़ा रहा और राजमाता की ओर देखता रहा...

काफी देर तक चुप रहने के बाद राजमाता ने अपना मौन तोड़ा...

"मैंने यह सारी समस्या का हल ढूंढ लिया है... " बोलकर वह फिर से चुप हो गई

यह अंतराल सेनापति और शक्तिसिंह दोनों को व्यग्र कर रहा था... पर इतना तो मालूम हो रहा था की जो भी हल था वह राजमाता के लिए आसान नही था... वरना वह इतने भारी मन से न कहती...

"क्या हल निकाला है आपने, राजमाता जी?" सेनापति ने पूछा

एक भारी सांस लेकर राजमाता ने उत्तर दिया...

"हम शौर्यगढ़ के राजा बलवानसिंह को शांति संदेश भेजेंगे और साथ ही गुहार लगाएंगे की वह सारे बंदियों को छोड़ दे"

यह सुन सेनापति व्याकुल हो गए... यह क्या कह रही थी राजमाता? दुश्मन के सामने घुटने टेक देना...? यह तो सूरजगढ़ की शान के विरुद्ध था... यह बलवान राज्य की सेना ने कभी भी हार नही मानी थी... पिछले कई महीनों से चल रही इस मुहिम में उन्होंने अनगिनत राज्य और रजवाड़े जीत लिए थे... हाँ, यह एक मजबूत दुश्मन जरूर था... पर इस तरह शांतिसंदेश भेजकर संधि का प्रस्ताव रखना उन्हे राज्य के गौरव को नष्ट कर देने के बराबर प्रतीत हो रहा था। शक्तिसिंह की प्रतिक्रिया भी कुछ अलग नही थी

"यह आप क्या कह रही है राजमाता जी? इसे तो हमारी पराजय मान लिया जाएगा" सेनापति ने कहा

"सेनापति जी, में जानती हूँ की मैं क्या कह रही हूँ... हम पर्याप्त प्रयत्न कर चुके है... आधे से ज्यादे सैनिक गंवा चुके है... कई सैनिक उनके कब्जे में है.. बाकी के सैनिक थक चुके है... शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से... फिलहाल शौर्यगढ़ का जो किला है, उसे भेद पाना नामुमकिन है... अंदर वह इतनी रसद जमा कर बैठे है की वह अगले दो साल तक उस दुर्ग के अंदर सुरक्षित भाव से जी सकते है... बाहर बैठे रहकर हम कुछ नही कर पाएंगे.. अगर भावनाओ को नियंत्रण में रखकर सोचे तो यही सबसे श्रेष्ठ विकल्प है.. हमारी प्राथमिकता उन बंदियों को छुड़ाना है... भविष्य में हम बेहतर शस्त्रों के साथ उन पर फिर हमला कर सकते है... मुहिम को यूं ही जारी रखने से हमारा ही नुकसान होगा... बेहतर यही होगा की अभी के लिए हम उनसे संधि कर ले और अपने सैनिकों को छुड़ाकर, सूरजगढ़ वापिस ले जाए... इस लिए मैंने तय किया है की कल शक्तिसिंह मेरा लिखा शांतिसंदेश लेकर राजा बलवानसिंह के पास जाएगा" राजमाता ने उत्तर दिया

"पर राजमाता जी, मुझे ऐसे हार मान लेना उचित नही लगता" सेनापति ने कहा

"सेनापति जी, यह मेरा आदेश है" बड़े ही ठंडी और दृढ़ सवार में राजमाता ने कहा

"जैसी आपकी आज्ञा" सेनापति ने हथियार डाल दिए

"मैं कल संदेशा लिखकर तैयार रखूंगी... शक्ति, तुम ५ सैनिकों के साथ कल वह संदेश बलवानसिंह को पहुंचाओगे... "

"जी राजमाता जी... " शक्तिसिंह ने सिर झुकाकर कहा...

दूसरी सुबह.. शक्तिसिंह अपने सैनिकों के गुट के साथ, हाथ में सफेद ध्वज लिए शौर्यगढ़ के किले की ओर निकल गया... द्वार पर पहुंचते ही उसने अपना झण्डा फहराया, जिसे देख किले का द्वार खोल दिया गया....

पूरी तरह से तलाशी लेने के बाद शक्तिसिंह और उसके साथियों के हथियार जब्त कर लिए गए...

शौर्यगढ़ के नगर की शोभा और समृद्धि देखकर शक्तिसिंह दंग रह गया... वैभवशाली इमारतें, भव्य घंटाघर, पक्की सड़कें, जगह जगह बने प्याऊ, सुवर्ण लेपित धार्मिक स्थान वगैरह देखकर ही इस नगर की धनवानता का अंदाजा लग रहा था... नगवासियों की वेशभूषा भी उनकी अमीरी दर्शा रही थी... किले की अंदर की दीवारें लोहे के स्तंभों से अधिक मजबूत की गई थी... सैनिकों के शस्त्र भी आम हथियारों से अलग और ज्यादा कार्यक्षम नजर आ रहे थे... सुवर्ण की उपलब्धि के कारण यह नगर अतिसमृद्ध था।

शस्त्रधारी सैनिकों से घिरकर शक्तिसिंह और उसके साथी महल में पहुंचे... गुलाबी दुर्लभ पत्थरों से बनी महल की दीवारें, रत्नों से सुशोभित थी.. भव्य प्रवेशद्वार से चलकर वह सभाखण्ड तक पहुंचे... महल में चारों तरफ भारी सुरक्षा का इंतेजाम था... दरबार की गतिविधियां चल रही थी... और इसलिए शक्तिसिंह को इंतज़ार करना पड़ा...

बलवानसिंह काले रंगे के राक्षस जैसा दिखने वाला लंबा तगड़ा पुरुष था... गहरी दाढ़ी और मुछ के कारण वह दिखने में विकराल था... बोलते वक्त दिख रहे उसके बड़े दाँत, ताम्बूल खा खा कर लाल हो गए थे... बड़े बड़े मोतियों की माला गले में लटकाकर वह विशाल मुकुट सिर पर धारण किए दरबार की कार्यवाही का संचालन कर रहा था...

कुछ ही देर में सभा बर्खास्त कर दी गई... और शक्तिसिंह को बलवानसिंह के सामने पेश किया गया...

शक्तिसिंह ने झुककर सलाम करने के बाद, अपने हाथों में रखा शांतिसंदेश दिखाया.. एक सैनिक ने उसके हाथों से वह संदेश ले जाकर बलवानसिंह को दिया... वह संदेश पढ़ने के बाद वह जोर जोर से हंसने लगा... बड़ी ही भयानक हंसी थी उसकी...

"अक्ल ठिकाने आ गई तुम्हारी राजमाता की? आए थे बड़े शौर्यगढ़ को हराने... मेरे सामने ना किसी का घमंड टीका है और ना ही मैं टिकने दूंगा... बाकी राज्यों के जैसे शौर्यगढ़ को कमजोर समझकर जो भूल तेरी राजमाता ने की है... उसका फल तो उसे भुगतना ही होगा... जाकर कह दो अपनी राजमाता से ... मैं बंदियों को मुक्त नही करूंगा... और अगर वह तुरंत अपनी छावनी उठाकर यहाँ से नही लौट गए तो उन सब की गर्दन काटकर उन्हे पेश कर दूंगा... " बलवानसिंह ने बड़ी ही क्रूरता से कहा

सुनकर शक्तिसिंह के होश उड़ गए... वह जमीन पर गिरकर गिड़गिड़ाने लगा...

"आपसे विनती है महाराज, कृपया मेरे साथियों को छोड़ दे... दो राजवीओ की लड़ाई में निर्दोष सिपाहीयों को दंड न दे... में आप से क्षमा माँगता हूँ... आपकी दरियादिली की ख्याति मैंने कई बार सुनी है... दयाभाव रखकर आप उन्हे छोड़ दीजिए" शक्तिसिंह ने कहा

अपनी तारीफ सुनकर बलवानसिंह खुश हो गया...

"चर्चे तो हमने तुम्हारी राजमाता के हुस्न के भी बड़े सुने है... क्या वाकई में वह इतनी सुंदर है? " बलवानसिंह ने पूछा

यह सुनकर शक्तिसिंह थोड़ा सा झेंप गया... बात को बदलने के लिए उसने कहा

"महाराज, मैं कई राज्यों की यात्रा कर चुका हूँ... सब आपकी तारीफ़ों के पूल बांधते है " शक्तिसिंह ने जूठी तारीफ़ करते हुए कहा

"हम्ममम... बात तो तुम्हारी सही है... लेकिन फिर भी... में इतनी आसानी से तुम्हारी राजमाता को बक्श नही दूंगा... में एक उदाहरण स्थापित करना चाहता हूँ... ताकि फिर से को शौर्यगढ़ की तरफ आँख उठाकर देखने की जुर्रत न करें.. " बलवानसिंह ने बड़े ही अहंकार के साथ कहा

"महाराज, आप तो दयालु है... आपका राज्य कितना महान है वह तो देखते ही बनता है... आपसे गुजारिश है की अगर आप बड़ा दिल रखकर बिना किसी कठोर कदम को उठायें... इस गुस्ताखी को नजरअंदाज करने की कृपा करेंगे तो हमारे दोनों राज्यों के बीच अच्छे संबंध स्थापित होंगे... सूरजगढ़ के पास उत्कृष्ट बंदरगाह है... जिसका उपयोग कर.. आप अपने सुवर्ण को दूर देशों में भेज सकते है... दोनों राज्यों को पारस्परिक लाभ होगा... " शक्तिसिंह इस बड़बोले महाराज को ज्यादा से ज्यादा खुश कर अपने साथियों को छुड़ाना चाहता था..

"हम्ममम... " गहरी सोच में डूब गया बलवानसिंह... थोड़ी देर सोचते रहने के बाद उसने कहा

"में अपनी मांगें लिखकर एक पत्र तुम्हें दे रहा हूँ... याद रहे यह पत्र सिर्फ और सिर्फ राजमाता के लिए है... और किसी को भी इस बारे में भनक नही लगनी चाहिए... यदि तुम्हारी राजमाता मेरी मांग स्वीकारती है तब मैं उन बंदियों को मुक्त कर दूंगा... यदि नही... तो परिणाम तो तुम जानते ही हो..." अपने लाल दाँत दिखाते हुए, हँसते हुए बलवानसिंह ने कहा..

कुछ ही देर में, एक मखमली कपड़े पर... बलवानसिंह ने पत्र लिखा... तांबे की नली में उस पत्र को डालकर शक्तिसिंह को दिया गया...

"यह पत्र देकर राजमाता से कहना... की उनके पास ज्यादा समय नही है, मुझे कल तक उत्तर नही मिला तो में सारे सैनिकों को मार दूंगा " बलवान सिंह ने कहा

क्रोध से अपनी मुठ्ठी भींचते हुए शक्तिसिंह ने झुककर सलाम की.. उसका मन कर रहा था की वहीं झपट कर उस राक्षस की गर्दन मरोड़ दे.. पर ऐसा करने से उसके साथियों के मुक्त होने की कोई गुंजाइश नही थी... वह मन मारकर वहाँ से लौट गया...

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क्रोध से अपनी मुठ्ठी भींचते हुए शक्तिसिंह ने झुककर सलाम की.. उसका मन कर रहा था की वहीं झपट कर उस राक्षस की गर्दन मरोड़ दे.. पर ऐसा करने से उसके साथियों के मुक्त होने की कोई गुंजाइश नही थी... वह मन मारकर वहाँ से लौट गया...

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"यह बलवानसिंह समझता क्या है अपने आप को?" पत्र पढ़कर राजमाता अत्यंत क्रोधित हो गई... गुस्से से तिलमिलाते हुए उन्होंने मेज पर पड़ी सुराही और प्याले को उठाकर फेंक दिया... उनका चेहरा लाल हो गया था... वह क्रोध से कांप रही थी

शक्तिसिंह वह पत्र लेकर सीधे राजमाता के तंबू में पहुँच गया था.. उसे अंदेशा था की जो भी मांग होंगी वह अप्रिय ही होंगी... पर राजमाता इतनी क्रोधित हो जाएगी, इसका उसे अंदाजा न था... वह स्तब्ध होकर राजमाता के इस रौद्र स्वरूप को देखता रहा... आज से पहले उसने कभी राजमाता को इतने गुस्से में नही देखा था..

"क.. क्या हुआ राजमाता जी... ऐसा तो क्या लिखा है पत्र में..?" डरते हुए शक्तिसिंह ने पूछ लिया...

राजमाता ने उत्तर नही दिया... वह खड़ी हुए और पैर पटकते हुए कोने में पड़े दीपक के पास पहुँच गई... उस पत्र को दीपक की लौ पर रखकर जला दिए... जलते पत्र के अवशेष उन्हों ने जमीन पर फेंक दिए...

अब वह धीमे पैरों से चलकर अपने बिस्तर की ओर आई... और बैठ गई... पत्र को जला देने से प्रायः उनका क्रोध थोड़ा सा कम हुआ लग रहा था.. वह आँखें बंद कर थोड़े समय तक वैसे ही बैठी रही... उनके मन में चल रहे घमासान को दर्शक बनकर निरीक्षण करते हुए उलझी हुई लग रही थी।

शक्तिसिंह तो मुक प्रेक्षक की तरह बस उन्हे निहार रहा था... उन्हे अपने ध्यान से विमुख करने की उसमे हिम्मत नही थी...

थोड़ी देर बाद आँखें खोलकर राजमाता ने शक्तिसिंह की ओर देखा... उसकी आँखों में वह उसके प्रश्न को पढ़ सकती थी लेकिन फिर भी वह कुछ नही बोली

और थोड़ा समय बीतने पर शक्तिसिंह का इत्मीनान समाप्त हो गया

"कहिए न राजमाता जी... ऐसी कौन सी मांग कर दी बलवानसिंह ने जो आप इतनी गुस्सा हो गई?"

एक लंबी गहरी सांस लेने के बाद राजमाता ने कहा

"उन सैनिकों को छोड़ने के बदले में... वह मेरे शरीर को भोगना चाहता है... " बड़ी ही वेधक नज़रों से उन्होंने शक्तिसिंह की आँखों में देखा

सुनकर शक्तिसिंह हक्का-बक्का रह गया!! यह कैसी मांग कर ली बलवानसिंह ने?? हालांकि उसने राजमाता के हुस्न का जिक्र जरूर किया था पर उसे जरा भी अंदाजा नही था की वह इस तरह की मांग रखेगा...

"मुझे वह वेश्या या गणिका समझता है... सैनिकों को छोड़ने के लिए वह मेरे जिस्म का सौदा करना चाहता है" राजमाता के क्रोध का ज्वालामुखी फिर से फट पड़ा

"शांत हो जाइए राजमाता जी.. कोई न कोई तरीका जरूर निकल आएगा" शक्तिसिंह ने ढाढ़स बांधते हुए कहा

"कोई तरीका नही है... मुझे यह अंदेशा तो था ही... उसका राज्य इतना समृद्ध है की उसे सुवर्ण, सैनिक या जमीन देकर संतुष्ट नही किया जा सकता... और दूसरा ऐसा कोई प्रलोभन नही है जो उसके मन को भाएं... जरूर वह किसी और चीज की मांग करेगा... पर क्या मांगेगा वह तय नही कर पा रही थी... उसका पत्र पढ़कर अब स्पष्ट हो गया.. " गहरी सांस लेकर राजमाता ने कहा

समस्या बड़ी ही संगीन थी.. यदि प्रश्न सैनिकों के प्राणों का न होता तो राजमाता इसके बारे में सोचती भी नही... ऐसा भी नही था की राजमाता चंद सैनिकों के लिए अपने आप को सौंप देने के लिए राजी हो जाती... युद्ध में तो कई सैनिक अपनी जान गँवाते है... थोड़े और सही... पर अगर वह उन सैनिकों को छुड़ाने में असफल रही तो अपने सैन्य का विश्वास गंवा बैठती... विद्याधर ने इस बारे में उन्हें बड़े ही विस्तार से शिक्षित किया था... अगर सैनिक को इस बात का आश्वाशन न हो की उसका मुखिया उसके लिए जान तक लड़ा सकता है... तो वह भी अपनी जान को अपने ऊपरी के लिए न्योछावर नही करेगा। सैनिकों के विश्वास को बरकरार रखने के लिए उन बंदियों को छुड़ाना अतिआवश्यक था..

"मुझे अकेला छोड़ दो... " बिस्तर पर लेटते हुए राजमाता ने कहा

शक्तिसिंह ने आजतक राजमाता को इतनी हद तक असंतुलित नही देखा था... वह कुछ पलों के लिए वहीं खड़े होकर उन्हे देखता रहा... और फिर तंबू के बाहर चला गया

शाम तक शक्तिसिंह व्यग्रता से यहाँ वहाँ घूमता रहा... उसे न भोजन की इच्छा हो रही थी... ना ही प्यास लग रही थी... अपने साथियों के साथ साथ वह चन्दा की याद में भी व्यग्र हो रहा था... शक्तिसिंह को यह स्वप्न में भी अंदाजा नही था की उसका दिल चन्दा के लिए इतना व्याकुल हो सकता था...

बड़े ही तनाव में वह छावनी से थोड़े दूर एक पेड़ के नीचे बैठा रहा... राजमाता क्या तय करेगी, इस दुविधा में उसका वक्त ही नही कट रहा था... दिल के किसी कोने में यह आशा जागृत थी की वह सैनिकों को बचाने के लिए कुछ न कुछ तो जरूर करेगी.. लेकिन जो बलवानसिंह की इच्छा थी वह वास्तविकता में परिवर्तित होने की संभावना नजर नही आ रही थी...

इस तनाव से थका हुआ शक्तिसिंह कब सो गया उसे पता ही न चला... जब उसकी आँख खुली तब रात ढल चुकी थी... उसकी अपेक्षा की विपरीत कोई उसे जगाने या बुलाने नही आया था... हमेशा की तरह उसे प्रतीक्षा थी राजमाता के बुलावे की...बस वजह अलग थी... आज वह उन्हे भोगने की चाह में नही था... उसे उत्कंठा थी यह जानने की, की आखिर राजमाता ने क्या निर्णय लिया...

वह उठकर चलते चलते सैनिकों की छावनी की तरफ गया... हो सकता है राजमाता ने उसे याद किया हो पर सैनिक उसे ढूंढ न पाए हो... पर किसी भी सैनिक ने इस बारे में जिक्र नही किया... निराश शक्तिसिंह अपने तंबू की ओर लौट गया... बिस्तर पर अपना सर पकड़कर काफी समय तक बैठा रहा... इस अवस्था को वह अधिक बर्दाश्त नही कर पाया... अनिश्चितता को सब्र से नियंत्रित करना उसके बस के बाहर की बात थी.. अधिरपना और बेचैनी ने उसे लगभग पागल सा बना दिया...

वह उठ खड़ा हुआ और उसने राजमाता के तंबू की ओर प्रयाण किया... बिना बुलाए राजमाता के तंबू में जाने की गुस्ताखी के एवज में वह हर सजा भुगतने को तैयार था... उसे किसी भी हाल में राजमाता का उत्तर जानना था...

तंबू के द्वार तक पहुंचकर उसने देखा की राजमाता के तंबू में घनघोर अंधेरा छाया हुआ था... वह बाहर तो कहीं भी थी नही.. चूंकि वह अभी अभी उन सभी जगहों से गुजरता हुआ यहाँ आया था... असमंजस में घिरे हुए शक्तिसिंह ने पर्दा उठाया... पूरे तंबू में अंधेरा था.. पर बिस्तर पर किसी मानव आकृति की रेखाएं नजर आ रही थी... शायद राजमाता सो गई थी.. हताश होकर वह वापिस जा ही रहा था तब..

"अंदर आ जाओ शक्ति... " गंभीर गहरी आवाज में राजमाता ने उसे पुकारा.. अनपेक्षित आवाज सुनकर वह चोंक गया... वह तुरंत पीछे मुड़ा और धीरे से चलकर बिस्तर की ओर आया और वहीं खड़ा रहा

"आप कहें तो दीपक जला दूँ?" शक्तिसिंह ने पूछा

"नही, ऐसे ही ठीक है... जीवन में ऐसे भी पल आते है जब खुद का सामना करना भी कठिन हो जाता है... यह अंधेरा ही वह पर्दा है जो मुझे अपने आप से छुपाने में सहायता कर रहा है... " राजमाता की आवाज ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे वह काफी रो चुकी हो

शक्तिसिंह मौन रहा... वह पूछना चाहता था पर उसकी जुबान साथ नही दे रही थी

"मुझे यह ज्ञात है की तुम यहाँ किस उद्देश्य से आए हो... तो यह जान लो की हम जल्द ही सैनिकों को मुक्ति दिलाएंगे" राजमाता ने कहा

शक्तिसिंह के चेहरे पर ऐसी मुस्कान पहले कभी नही आई थी... पर फिलहाल अंधेरे में राजमाता को नजर नही आ रही थी... सैनिक मुक्त हो जाएंगे इसका मतलब.. मतलब... एक पल के लिए चेहरे पर आई मुस्कान, भांप बनकर उड़ गई!!!

बेहद गंभीर हो गया शक्तिसिंह... बलवानसिंह जैसे राक्षस के हाथों, इस दैवी सुंदरता की साम्राज्ञी के जिस्म को रौंदे जाने की कल्पना भर से ही शक्तिसिंह के रोंगटे खड़े हो गए... इतना बड़ा त्याग...!! आज पहली बार वह राजमाता को दिल से दंडवत प्रणाम करना चाहता था...

"मेरे करीब आओ शक्ति... " अंधेरे में अंदाजे से उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचते हुए राजमाता ने कहा

शक्तिसिंह यंत्रवत बिस्तर पर पहुंचा और राजमाता के बगल में लेट गया... उसके सर पर हाथ फेरने के बाद उन्होंने अपना चेहरा शक्तिसिंह की मजबूत छाती में दबा दिया... और उनकी आँखों से बरसते आंसुओं ने उसकी छाती भिगो कर रख दी..

"आज में बेहद अकेलापन महसूस कर रही हूँ शक्ति... " कहते हुए वह फुट-फुट कर रोने लगी... उन्हे सांत्वना देने के लिए शक्तिसिंह उनकी पीठ पर और गालों पर हाथ फेरता रहा... वह उनकी स्थिति समझ सकता था... बहुत कठिन निर्णय लिया था उन्हों ने..

रात्री का समय था... तंबू में अंधकार था... बिस्तर पर दो जिस्म आपस में लिपटे हुए थे... एक दूसरे के अंगों को सहला रहा थे... पर फिर भी दोनों में से किसी के मन में आज रत्तीभर भी वासना या हवस नही थी... थी तो बस सहानुभूति, प्रेम और सांत्वना की भावना...

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रात्री का समय था... तंबू में अंधकार था... बिस्तर पर दो जिस्म आपस में लिपटे हुए थे... एक दूसरे के अंगों को सहला रहा थे... पर फिर भी दोनों में से किसी के मन में आज रत्तीभर भी वासना या हवस नही थी... थी तो बस सहानुभूति, प्रेम और सांत्वना की भावना...

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दूसरी सुबह, शक्तिसिंह अपने साथ राजमाता का सहमति-संदेश लेकर राजा बलवानसिंह के दरबार में पहुंचा...

संदेश को पढ़कर, बलवानसिंह की आँखें चमक उठी... उसके चेहरे की मुस्कान छुपाई छिपती न थी...

"आखिर आ गया न ऊंट पहाड़ के नीचे... " अपनी मुछ पर ताव देते हुए बलवानसिंह ने कहा

"भला आपकी बात को कौन टाल सकता है महाराज... " सर झुकाए खड़े शक्तिसिंह ने कहा... शक्तिसिंह ने, न चाहते हुए भी निर्बल रूप धारण कर रखा था... वह नहीं चाहता था की गुस्से में कहे गए कोई भी शब्द, उसके साथियों की... और खासकर चन्दा की जान के लिए खतरा बन जाए... वह मन बनाकर आया था की वह जितनी हो सके, राजा की खुशामद करेगा...

"फिर किस बात की प्रतीक्षा है? अभी हाजिर करो अपनी राजमाता को" बलवानसिंह उस खूबसूरत जिस्म को भोगने की कल्पना करने लगा...

"क्षमा कीजिए महाराज... राजमाता अपनी दासियों के संग पूर्णतः तैयारी के साथ आएगी.. इसमें थोड़ा वक्त तो लगेगा... आप कहें तो वह कल आपके महल में हाजिर हो जाएगी... " शक्तिसिंह ने उत्तर दिया

"हम्म... यह भी ठीक है... कल शौर्यगढ़ में स्थापना-दिवस का उत्सव बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाने वाला है... मेरी तरफ से राजमाता को न्योता दे देना... पर ध्यान रहें, में किसी भी सैनिक को प्रवेश की अनुमति नही दूंगा... " बलवानसिंह ने कहा

"इत्मीनान रखिए महाराज, राजमाता के संग केवल उनकी दासियों का समूह रहेगा... और सिर्फ मैं... और कोई नही होगा... और वैसे भी हम दोनों राज्यों के बीच शांति स्थापित हो चुकी है... हम आशा करते है की शौर्यगढ़ और सूरजगढ़ के बीच नए संबंधों का इतिहास रचा जाएँ... दोनों महान राज्य एक दूसरे की प्रगति में योगदान देकर... नई ऊँचाइयाँ हासिल करें... " शक्तिसिंह ने बलवानसिंह की कदमबोसी कर उसे प्रसन्न करना चाहा

"अगर मेरी शर्तों पर राजमाता की सहमति हो तो दोनों राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण व्यवहार अवश्य स्थापित हो सकता है... अगर यही बात तुम्हारी राजमाता को पहले समज आ गई होती तो व्यर्थ में इतना रक्तपात नही होता" बलवानसिंह की भृकुटी तंग हो गई

"जो हो गया उसे भूल जाइए महाराज... आप बड़े ही दयालु है.. बीती बातें भूलकर ही हम आगे बढ़ पाएंगे... और वैसे भी... आपके जितना शक्तिशाली और महान सहयोगी प्राप्त कर, हम भी धन्यता का अनुभव कर रहे है" शक्तिसिंह के मिश्री-घुलित शब्दों से बलवानसिंह अति प्रसन्न हो गया

"सामान्य सैनिक होने के पश्चात तुम बड़े ही बुद्धिमान हो... उस मूर्ख सेनापति की बजाए अगर राजमाता तुम्हारी सलाह लेती तो आज यह दिन देखना न पड़ता... अब तुम हमारा न्योता राजमाता को देकर उन्हे सूचित करो की जल्द से जल्द यहाँ पहुँचने की तैयारी करें... मैं अधीरतापूर्वक उनकी प्रतीक्षा करूंगा... " यह कहते हुए राजा बलवानसिंह अपनी धोती के ऊपर से ही लंड को मसलते हुए बोला

शक्तिसिंह का क्रोध सारी सीमाएं पार कर गया था... फिर भी उसने बड़ी ही विनम्रता से कहा

"जी महाराज, यह संदेश तुरंत राजमाता तक पहुंचा दूंगा.. बस आप से एक विनती है मेरी" दो हाथ जोड़कर शक्तिसिंह ने कहा

"कहो... क्या विनती है तुम्हारी?" बलवानसिंह ने पूछा

"मेरे साथी... जिन्हे आपने बंदी बनाया है... क्या में उन्हे एक बार मिल सकता हूँ?" शक्तिसिंह ने कहा

"क्या आवश्यकता है? वैसे भी कल राजमाता जैसे ही मेरे कक्ष में दाखिल होगी... तुम्हारे साथियों को मुक्त कर दिया जाएगा"

"कृपा करें महाराज, मुझे सिर्फ अपने साथियों की कुशलक्षेम होने की पुष्टि करनी है... हाथ जोड़कर विनती कर रहा हूँ महाराज... मुझ गरीब को निराश मत कीजिए... " हाथ जोड़े विनम्रता का अभिनय करते हुए शक्तिसिंह ने कहा

"ठीक है... सिपाहियों, इस सैनिक को उन बंदियों से भेंट करवा दो" बलवानसिंह ने आदेश दिया

"बड़े दयालु है आप महाराज... आपका आभारी रहूँगा... " सलाम करते हुए शक्तिसिंह दरबार से निकालकर अपने साथियों से मिलने चला गया

उन बंदी सैनिकों और चन्दा को देखकर शक्तिसिंह की आँखों में आँसू टपक पड़े... उन्हे कुशल देखकर वह बड़ा ही खुश हो गया.. उनकी रिहाई का समाचार सुनकर वे अति प्रसन्न हो गए... किन शर्तों पर उन्हे छोड़ा जा रहा था, यह शक्तिसिंह ने उन्हे नही बताया था...

सैनिकों से मिलकर, खुश होते हुए शक्तिसिंह छावनी पर वापिस लौटा.. राजमाता के तंबू में जाकर उसने राजा बलवानसिंह का संदेश शब्दसः सुनाया... पूरी बात बड़ी ध्यान से सुनते हुए राजमाता की आँखों में एक अनोखी सी चमक जाग उठी... उन्होंने शक्तिसिंह को तुरंत रुखसत किया और सेनापति को बुलावा भेजा...

कुछ देर विचार विमर्श के बाद, राजमाता के निर्देश अनुसार, सेनापति ने दो सैनिकों को, पास के नगर से कुछ सामान जुटाने को कहा... महाराज बलवानसिंह ने किस तरह की मांग की थी, इसका पता राजमाता और शक्तिसिंह के अलावा किसी तीसरे को नही था... सेनापति केवल इतना ही जानते थे की राजमाता ने शांति-संदेश भेजा था... जिसका स्वीकार कर, राजा बलवानसिंह ने उन्हे स्थापना-दिवस के उत्सव में शरीक होने के लिए न्योता भेजा था, और उनकी मुलाकात के बाद, सारे बंदी सैनिकों को मुक्ति किया जाने वाला था...

उस शाम को जब शक्तिसिंह राजमाता से मिलने उनके तंबू में पहुंचा... तब वह कुर्सी पर बैठकर कोई गीत गुनगुना रही थी... राजमाता को इस तरह चिंतामुक्त देखकर शक्तिसिंह को सुखद आश्चर्य हुआ...

"आओ शक्ति... अभी तो रात भी नही हुई है... फिर कैसे आना हुआ?" बड़े ही शरारती लहजे में राजमाता ने शक्तिसिंह से पूछा

शक्तिसिंह एक पल के लिए झेंप गया... वैसे परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए.. ऐसा कोई विचार उसके मन में प्रकट भी नही हुआ था.. पर राजमाता को खुश देखकर उसे बहुत अच्छा महसूस हुआ... इतने समय से चल रहे जिस्मानी संबंधों के चलते अब वह ह्रदय के किसी कोने में वह राजमाता को बड़े ही स्नेह और प्रेम से देखता था और उनका अहित होते हुए नही देख सकता था...

चुपचाप खड़े शक्तिसिंह का हाथ पकड़कर राजमाता ने अपनी ओर खींचा... कुर्सी पर बैठी राजमाता के जिस्म से सटकर वह खड़ा हो गया... उसकी मजबूत जांघों पर हाथ फेरते हुए उन्होंने शक्तिसिंह के लंड को वस्त्र के ऊपर से मुठ्ठी में भर लिया... शक्तिसिंह के मुंह से आहह सरक गई.. उत्तेजित होकर शक्तिसिंह ने अपने हाथ को राजमाता के कंधे पर फेरना शुरू कर दिया... उसका हाथ जैसे ही उनकी चूचियों को दबाने पहुंचा की राजमाता ने उसका हाथ पकड़ लिया और अपने बदन से अलग कर दिया... शक्तिसिंह अचंभित होकर उन्हे देखता रहा

"कल का दिन बड़ा ही लंबा और थका देने वाला रहेगा... तुम विश्राम करो और मैं भी आज की रात पूरा आराम करूंगी" राजमाता की इशारा तुरंत समझ गया शक्तिसिंह... कल उस बलवानसिंह के सामने राजमाता नग्न होगी और फिर... इस कल्पना से भी वह भयभीत हो गया...

राजमाता को सलाम कर वह तंबू से बाहर निकल गया।

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अगली सुबह राजमाता प्रातः काल ही अपने नित्य क्रम से फारिग होकर तैयार हो गई.. शक्तिसिंह बाहर ही तैयार बैठा था... जैसे ही राजमाता तंबू से बाहर आई... सेनापति अपने साथ लाल साड़ी में सज्ज दासियों के समूह के साथ प्रकट हुए... सारी दासियों ने अपनी छाती तक घूँघट ताने चेहरे को ढंका हुआ था... उनकी संख्या १०० के करीब थी... इतनी सारी दासियों को देखकर शक्तिसिंह भी दंग रह गया... इससे पहले की वह राजमाता को इस बारे में पूछ पाता... राजमाता रथ में सवार हो गई। शक्तिसिंह भी अपने घोड़े पर सवार हो गया और इस काफिले में जुड़ गया...

जैसे ही यह दस्ता किले के दरवाजे पर पहुंचा... द्वारपाल ने दरवाजा खोलने का निर्देश दिया... लकड़ी का सेतु गिराया गया... और उस पर बड़ी ही धीमी गति से चलते हुए वह खेमा किले के अंदर पहुँच गया... उनके अंदर जाते ही लकड़ी के सेतु को वापिस खींच लिया गया और द्वार बंद कर दिया गया।

शौर्यगढ़ का माहोल आज कुछ अलग ही नजर आ रहा था... चारों तरफ रंगबिरंगी तोरण और फूलमालाओं से नगर को सजाया गया था... रास्तों पर ढोल नगाड़े बजाए जा रहे थे... उत्सव मना रहे नगरजन और सैनिक मदिरा के प्याले पीते हुए नाच रहे थे... स्थापना-दिवस का उत्सव बड़े ही जोर-शोर से मनाया जा रहा था...

यह पूरा खेमा राजमहल के द्वार पर पहुंचा... उन्हे बड़े ही सन्मान के साथ अंदर ले जाया गया... शक्तिसिंह और दासियों के समूह को बाहर के खंड में रुकने के लिए कहा गया और केवल राजमाता को अंदर महाराज बलवानसिंह के पास ले जाया गया...

पूरा दरबार खाली था... सब दरबारी स्थापना-दिवस के उत्सव में सम्मिलित होने गए थे... राजमाता को महाराज के पास छोड़कर उनका सैनिक लौट गया

राजमाता को देखकर ही राजा की आँखें चार हो गई... आज तक उसने अनगिनत स्त्रियों को भोगा था... पर इतनी सुंदर स्त्री को उसने आज तक नही देखा था... कौशल्यादेवी के हुस्न के चर्चे तो उसने बहुत सुने थे... आज रूबरू होकर वह इस सौन्दर्य को देखकर धन्य हो गया.. इस अप्रतिम अद्वितीय सौन्दर्य का दीदार कर... राजमाता को भोगने की उसकी इच्छा अति-तीव्र हो गई...

"पधारिए राजमाता जी... शौर्यगढ़ में आपका हार्दिक स्वागत है" लार टपकाते हुए बलवानसिंह ने राजमाता से कहा

बड़ी ही गरिमा के साथ चलते हुए राजमाता ने एक नजर इस बदसूरत राजा पर डाली और फिर उनके पास पड़ी शाही कुर्सी पर बिराजमान हो गई... राजा के शरीर का रंग बिल्कुल काला था... चेहरे पर घनी दाढ़ी और मुछ के कारण वह विकराल और कुरूप लग रहा था... राजमाता के हुस्न को वह बेशर्मी से देखे जा रहा था और उसका जबड़ा लटक रहा था..

"बलवानसिंह जी, आपकी शर्त के मुताबिक मैं यहाँ आ चुकी हूँ... अब सबसे पहले उन सारे सैनिकों को रिहा कर दीजिए" बड़े ही दृढ़ता से राजमाता ने कहा

"जल्दी क्या है राजमाता जी... हम दोनों मेरे कक्ष में बैठकर एक दूसरे को ठीक से जान लेते है.. फिर सी भी मुक्त हो जाएंगे... " कुटिल मुस्कुराहट के साथ बलवानसिंह ने कहा

"नही... में आपके कक्ष में तभी प्रवेश करूंगी जब मेरे सैनिक मुक्त कर दिए जाएंगे" बेहद दृढ़ता और सख्ती से राजमाता ने कहा

बलवानसिंह के सिर पर हवस सवार हो चुकी थी... वह जल्द से जल्द इस दिव्य सौन्दर्य की साम्राज्ञी को भोगना चाहता था

"ठीक है... उन सैनिकों को मुक्त किया जाए... पर ध्यान रहे... वह बंदी सैनिक फिलहाल राजमाता की दासियों के साथ रखे जाए... वे वापिस तब ही लौटेंगे जब राजमा जी वापिस जाएंगी.. "

"मुझे मंजूर है" राजमाता ने कहा

तुरंत एक सिपाही कारागार की ओर चला गया... थोड़ी ही देर में, चन्दा और बाकी सारे सैनिकों को बेड़ियों से मुक्त किया गया और उन्हे दरबार के अग्र-खंड में दासियों के साथ स्थान दिया गया... बलवानसिंह का आकलन यह था की ऐसा न हो की सैनिक भी छूट जाएँ और राजमाता भी हाथ से निकल जाए... इसीलिए उसने सूचना दी थी की वह बंदी सैनिक तब तक किले से बाहर नही जाएंगे जब तक राजमाता उसके कमरे से बाहर निकलकर वापिस लौटने के लिए तैयार नही हो जाती। एक तरफ उसे राजमाता को जल्द से जल्द भोगने की चाह थी... तो दूसरी तरफ वह स्थापना-दिवस के समारोह में शरीक भी होना चाहता था... शौर्यगढ़ के लिए आज बहुत बड़ा दिन था... इसी दिन सदियों पहले, बलवानसिंह के पुरखों ने इस राज्य की स्थापना की थी... हर वर्ष इस दिन को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता था...

सारे सैनिकों के क्षेमकुशल मुक्त हो गए यह सुनिश्चित करने के बाद शक्तिसिंह वापिस राजमाता के पीछे आकर खड़ा हो गया... अब राजमाता को बलवानसिंह के शयनखंड में जाना था...

"चलिए राजमाता जी... मेरे कक्ष की ओर पधारिए... " थोड़ी सी हिचकिचाहट के साथ राजमाता चलने लगी... साथ में शक्तिसिंह भी उनके पीछे गया।

बलवानसिंह के अंदर प्रवेश करने के बाद राजमाता शक्तिसिंह के कानों में फुसफुसाई "मेरा इशारा मिलते ही तुम अंदर चले आना... और उससे पहले मेरी सूचना के अनुसार... सारी जानकारी प्राप्त कर तैयार रहना... "

"जी राजमाता जी..." शक्तिसिंह ने सिर झुकाते हुए कहा

राजमाता ने कमरे में प्रवेश किया। पहले खंड से गुजरकर अंदर के विशाल शयनखंड में जा पहुंची।

बलवानसिंह बाहें फैलाए राजमाता के स्वागत के लिए तैयार खड़ा था... थोड़ी सी झिझक के साथ राजमाता उसके करीब जा पहुंची।

प्रथम थोड़ी क्षणों के लिए तो वह राजमाता के बेनमून हुस्न को निहारता ही रह गया... कोई इतना सुंदर कैसे हो सकता है!! वह मन ही मन सोच रहा था...

अब उससे और रहा न गया

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राजमाता ने कमरे में प्रवेश किया। पहले खंड से गुजरकर अंदर के विशाल शयनखंड में जा पहुंची।

बलवानसिंह बाहें फैलाए राजमाता के स्वागत के लिए तैयार खड़ा था... थोड़ी सी झिझक के साथ राजमाता उसके करीब जा पहुंची।

प्रथम थोड़ी क्षणों के लिए तो वह राजमाता के बेनमून हुस्न को निहारता ही रह गया... कोई इतना सुंदर कैसे हो सकता है!! वह मन ही मन सोच रहा था...

अब उससे और रहा न गया

उसने धीरे से राजमाता को अपने बाहुपाश में घेर लिया और फिर अपने होंठ उनके होंठों से चिपका दिए। उस घृणास्पद कुरूप बलवानसिंह के चुंबन से राजमाता विचलित हो उठी और अपने आप को छुड़ाने के लिए संघर्ष करने लगी। लेकिन बलवानसिंह अब उन्हे छोड़ने वाला नही था। उसने राजमाता को अपनी बलिष्ठ भुजाओं से मजबूती से पकड़ लिया और अपना एक हाथ उनके सिर के पीछे ले जाकर उनका चेहरा स्थिर पकड़ रखा, और उसने फिर से अपने होंठ उसके होंठों पर दबा दिए। थोड़ी देर के लिए उसे प्रतिरोध महसूस हुआ और फिर राजमाता ने विरोध त्याग दिया।

चुंबन से मुक्त होकर बलवानसिंह धीरे से नीचे सरक गया. राजमाता के गालों को चूमा, फिर गर्दन को और फिर उनके चोली में ढके हुए स्तनों के ऊपरी हिस्से को चूमा। उसके एक हाथ ने उनकी गर्दन के पिछले हिस्से को मजबूती से पकड़ रखा था, जबकि दूसरा उनकी पीठ से होते हुए उनके विशाल गोलाकार नितंबों तक पहुँच गया, जिनमें से प्रत्येक को वह बारी बारी धीरे से दबाता जा रहा था। राजमाता के नितंब बेहद शानदार थे। उनके मांसल नितंबों को दबाते ही राजमाता सिहरने लगी। राजमाता के आगे के हिस्से के स्तनों की परिधि और पीछे के नितंबों का कद लगभग समान थे।

राजमाता के स्तन बलवानसिंह की विशाल हथेली से भी बड़े थे। चोली की गांठ खोलकर जब उन दोनों महाकाय स्तनों को मुक्त किया गया तब उन पहाड़ जैसी चूचियों की सुंदरता देखकर बलवानसिंह का जबड़ा लटक गया। बेदाग गोरी त्वचा से बने माँस के वह विशाल गोले... और उनपर लगी लंबी गुलाबी निप्पल... उन्हे देखते ही बलवानसिंह का लंड उसकी धोती में ही कथकली करने लगा...

उन आकर्षक निप्पलों को अपनी उंगलियों से दबाते हुए बलवानसिंह धन्य हो गया... स्पर्श प्राप्त होते ही वह चूचक सख्त होकर तन गए। बलवानसिंह अपने होंठ उन निपल्स के पास ले गया और उन्हें अपनी जीभ से छेड़ने लगा, पहले एक और फिर दूसरे को। उसने अपने हाथों को राजमाता के सुडौल शरीर पर फिराया - कोमल और सुडौल, जिसमें ज़रा भी झुर्रियाँ नहीं थीं। उसने राजमाता के दोनों स्तनों को अपनी हथेलियों से मसलना शुरू कर दिया...

राजमाता अब बलवानसिंह की हरकतों का विरोध नहीं कर रही थी। धीरे धीरे वह उत्तेजना की धुंध में खोने लगी थी। उनके जीवन का यह पहला प्रसंग था जब उन्होंने किसी अनचाहे पुरुष को अपना जिस्म सौंपा हो... अपना उत्तेजित होना उन्हे भी समझ में नही आ रहा था... अब तक के सारे संभोग उन्होंने खुद संचालित किए थे... यह पहला मौका था जब वह संचालन नही कर रही थी बल्कि संचालित हो रही थी.. शायद यही उनका उत्तेजित होने का कारण भी था...

वह वास्तव में आहें भर रही थी और हांफ रही थी। बलवानसिंह के हाथ अब उसकी योनी को घाघरे के ऊपर से ही पकड़ रहा था और उसके ढंके हुए चुत के होंठों को रगड़ रहा था।

बलवानसिंह ने साहसपूर्वक अपना हाथ राजमाता की साड़ी और अंतःवस्त्र के बंधे हुए सिरे के नीचे सरकाया और उनके शानदार झांटों के बीच स्थित गीले योनि द्वार को अपनी उंगलियों से महसूस किया। धीरे से, उसने उभरे हुए अंदरूनी हिस्से में एक उंगली डाली तब राजमाता और भी अधिक हांफने लगी। उसने राजमाता के मुँह को अपने मुँह से मिला लिया और अपनी जीभ उनके मुख में अंदर तक डाल दी।

राजमाता ने सहजता से उसकी जीभ को चूसकर जवाब दिया और इससे बलवानसिंह इतना उत्तेजित हो गया कि उसने दो उंगलियां उसकी चिपचिपा शहद छोड़ रही योनी में डाल दीं और उन्हें अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। सारी सज्जनता अब ख़त्म हो गई थी, अब वह बेशर्मी से राजमाता को अपनी उंगलियों से चोद रहा था और राजमाता भी उतनी ही बेशर्मी से खुद को उन क्रूर उंगलियों पर उछालकर जवाब दे रही थी।

फिर अचानक दबी हुई चीख से हाँफती हुई वह स्खलित हो गई। बलवानसिंह के साथ पहली बार उन्हे चरमसुख प्राप्त हुआ। उस स्खलन की तीव्रता से वह लगभग होश खो बैठी।

लड़खड़ाती राजमाता को बलवानसिंह सहारा देते हुए बिस्तर तक ले गया। नरम आलीशान बिस्तर पर राजमाता को लिटाकर वह भी उनके बगल में लेट गया। तकिये पर आँख बंद कर लेटी हुई राजमाता के हसीन चेहरे पर वह जगह जगह चूमे जा रहा था। उनके चेहरे की निर्दोष त्वचा, अप्रतिम संरचना और बादाम के आकार की भूरी भूरी आँखें!! कितना भी देख लें, मन ही नही भरता था...

अपने स्खलन से धीरे धीरे होश में आ रही राजमाता को बलवानसिंह ने कामोन्माद की ऊंचाइयों से उतरने दिया। फिर वह धीरे-धीरे उन्हे निर्वस्त्र करने लगा।

उस लंपट लीचड़ राजा ने धीरे-धीरे अनावृत होने वाली हर चीज का आनंद लिया - चिकनी सफेद लहरदार त्वचा, मांसल गदराया जिस्म, लंबी गुलाबी निप्पलें, सुडौल परिपूर्ण विशाल स्तन, गहरी नाभि जो सपाट पेट पर उसकी उत्तेजित सांसों के साथ कामुकता से उठती और गिरती थी, लचकदार कमर जिसे वह पूरी तरह से देख सकता था उसे अपने हाथों से घेरा। फिर जैसे ही उसने राजमाता की साड़ी उतारी - उसे नजर आई वह योनी जिसे उसने संभोग सुख के लिए उंगलियों से छुआ था, मलाईदार जांघें जो झुके हुए घुटनों तक फैली हुई थीं और उसके नीचे सूडोल पैर और आकर्षक उँगलियाँ... वह राजमाता के नंगे शरीर को देखकर चकित रह गया, घूमफिर कर वही बात बार बार दिमाग में आती थी कि उसने राजमाता से अधिक सुंदर स्त्री अपने जीवन में कभी नही देखी थी।

अब बलवानसिंह का मन वही करने को चाह रहा था जो राजमाता की उस गूँदाज चुत को देखनेवाले हर किसी का होगा... उसने कई कामी स्त्रियों से चुत-चटाई के पाठ पढे थे... और फिलहाल उसके सामने एक ऐसी योनि थी जो उन सब कलाकारियों की पूर्ण हकदार थी।

राजमाता ने बलवंतसिंह को उनकी चुत को घूरते हुए पकड़ लिया। वह मुस्कुराकर पलट गई ताकि वह उनके सुंदर नितंबों को पूरी तरह से देख सके। वे अद्भुत नितंब, जो पूर्णतः मांसल थे, गोरी त्वचा में लिपटे हुए वह माँस के गोले जिन्हे देखते ही बलवानसिंह को उन्हे अलग कर अपना लंड घुसाने की तीव्र इच्छा हुई।

अब राजमाता ने इशारे से उसे अपने कपड़े उतारने को कहा।

वह अपने कपड़े उतारने के लिए खड़ा हुआ और कुछ ही पल में सम्पूर्ण नग्न हो गया। काले आबनूस जैसा उसका शरीर बालों से भरा पड़ा था। देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे कोई जंगली भालू हो!! लेकिन राजमाता को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा, वह उसके कठोर शरीर को घूर रही थी और उसके कद में छोटे पर कलाई जीतने मोटे लंड को तांक रही थी।

बलवानसिंह ने राजमाता की उन पेड़ के तनों जैसी तंदूरस्त जाँघों को अलग कर दिया और अपना चेहरा उनकी दिव्य योनी पर रख दिया। उसने अपनी जीभ से चुत के होठों को अलग किया और उनकी उत्तेजित योनी का रस चाटने लगा। उसने इस उत्तेजित खूबसूरत महिला की ताज़ी खुशबू को महसूस किया। फिर उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और उनकी योनि के होंठों का स्वाद चखा। अपनी जांघों के बीच उसके काले सिर को देखकर एक पल के लिए राजमाता घृणा से भर गई - वह इधर-उधर फड़फड़ाने लगी और खुद को अलग करने की कोशिश करने लगी।

बलवानसिंह को इस साधारण प्रतिरोध से कोई फरक नही पड़ा। उसने राजमाता की योनि पर हमले की तीव्रता बढ़ा दी और उनकी अद्भुत जाँघों को मजबूती से पकड़ लिया। उसने राजमाता के भगोष्ठ को चाटा तब महसूस किया कि कामोत्तेजना के कारण अंगूर के जैसे फूला हुआ था और जाहिर तौर पर उसका हर छोटा हिस्सा संवेदनशील था क्योंकि वह कराह रही थी और छटपटा रही थी, और कुछ ही समय में, जैसे ही उसने अपनी जीभ को योनिमार्ग के अंदर घुसेड़कर गुदगुदाया, राजमाता एक और स्खलन से कांप उठी।

राजमाता की जाँघों के बीच की सुंदरता में बलवानसिंह पूर्णतः खो गया। कुछ महिलाओं के चेहरे तो बदसूरत होते हैं लेकिन योनि सुंदर होती है; अन्य आकर्षक महिलाओं की चुत बदसूरतनी होती है - जैसे अनियमित बदरंग चुत के होंठ वाली या फिर फड़फड़ाते मांसल होंठों के बीच गहरे खुले छेद वाली।

राजमाता के पास सुंदर चेहरा और आकर्षक योनि दोनों थे। बलवानसिंह अपनी जीभ से उस सुंदर चुत को उत्तेजित किए जा रहा था। उसकी उंगलियाँ उनकी जाँघों पर और फिर उनके चमड़ी के छत्र के नीचे छिपे हुए भगोष्ठ पर घूम रही थीं, जिससे वह दाना अंकुरित होकर मोटा हो गया था। राजमाता फिर से नई चरमसीमा की ओर यात्रा कर रही थी। जब बलवानसिंह की खुरदरी जीभ उनके दाने से घिसती तब राजमाता के चेहरे पर उत्तेजक जज़्बातों की बाढ़ आ जाती थी और उनकी जाँघें आपस में भिड़कर लयबद्ध तरीके से बलवानसिंह के सिर को कुचल देती थीं।

एक बार फिर से स्खलित होकर जब राजमाता की जाँघों ने आख़िरकार उसके सिर को आज़ाद किया तब उन्होंने बलवानसिंह की ओर देखा.. उसका पूरा चेहरा ओर दाढ़ी, चुत के रस से भीगे हुए थे... राजा अपना मुंह ऊपर तक ले गया और योनिरस से लिप्त जीभ से वह राजमाता की जीभ को चाटने लगा ताकि राजमाता को भी अपनी चुत के रस का स्वाद मिले। उसका लंड सटकर उनकी चुत के होंठों के बीच अटक गया था और उनकी चिपचिपी नाली में घुसने के लीये फुदक रहा था।

बलवानसिंह का लंड ज्यादा लंबा नही था पर थोड़ा मोटा जरूर था... उसने एक ही झटके में राजमाता की रसदार चुत में लंड पेल दिया... दोनों के झाँट एक दूसरे के संग उलझ गए। और वह उन पर सवार हो गया और अपने लंड को उनकी चुत के अंदर मथनी की तरह मथते हुए घुमाने लगा , इस दौरान वह अपने मुंह ने उनकी जीभ को चाटने लगा और लार को चूसने लगा।

हथोड़े की तरह तेजी से राजमाता की चुत में ठोक रहा था... योनि की दीवारों के बीच उसके लंड को जो अनोखी अनुभूति हुई उससे वह गुर्राते हुए वीर्य स्खलित कर बैठा... राजमाता की योनी को इतने गरम तरल वीर्य से भर दिया कि वह वीर्य चुत से छलक कर उनके झाँट, जांघ और बिस्तर की चादर पर फैल गया।

पस्त होकर बलवानसिंह, राजमाता के दो स्तनों पर गिर पड़ा... अभी भी उसका लंड राजमाता की गुनगुनी चुत के अंदर ही था... यह विश्राम का दौर कुछ ही वक्त तक सीमित रहा...बलवानसिंह के लंड ने उनकी योनी में फिर से हरकत शुरू कर दी और कुछ ही समय में फिर से सख्त हो गया। उसने खुद को ऊपर उठाया और राजमाता के चेहरे को देखा और अपना मुंह उनके मुंह से चिपका लिया और अपने लंड से उसकी योनी पर हमला करते हुए अपनी जीभ से उनके मुंह को बेरहमी से चोदने लगा।
 
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